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STUDY FOR CIVIL SERVICES-GYAN

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सामान्य परिचय

क्षेत्रफलः-`

  • भारत विश्व में क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवां (रुस, कनाडा, अमेरिका, चीन, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया के बाद) तथा जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा (चीन के बाद) बड़ा देश है।

  • भारत मे वर्तमान में 29 राज्य एवं 7 संघ राज्य क्षेत्र हैं।

  • इसका कुल क्षेत्रफल 3287263 वर्ग किमी. है, जो संसार के समस्त क्षेत्रफल के स्थलीय भाग का लगभग 2.4% है।

  • भारत में संपूर्ण विश्व की 17.5% जनसंख्या निवास कर रही है (2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार)।

  • भारत के मुख्य भूमि का विस्तार उत्तर से दक्षिण तक 3214 किमी. तथा पूर्व से पश्चिम तक 2933 किमी. है।

  • भारत के कुल क्षेत्रफल (3287263 वर्ग किमी.) में गैर-कानूनी ढंग से पाकिस्तान के कब्जे वाला 78114 वर्ग किमी. क्षेत्र, पाकिस्तान द्वारा गैर-कानूनी ढंग से चीन को दिया गया 5180 वर्ग किमी. क्षेत्र तथा गैर-कानूनी ढंग से चीन के कब्जे वाला 37555 वर्ग किमी. क्षेत्र शामिल है।

  • 2001 की जनगणनानुसार, भारत में लगभग 6 लाख 38 हजार 5 सौ 88 गांव थे, जबकि 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, गांवों की संख्या 6 लाख 40 हजार 9 सौ 32 है।

  • भारत विश्व का सातवां बड़ा देश है। संपूर्ण भारत का अक्षांशीय विस्तार 6045‘ से 3706‘ उत्तरी अक्षांश के मध्य है, जबकि उष्मकटिबंध क्षेत्र का विस्तार 23030‘ उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य है। भारत स्थलमंडल के कुल क्षेत्रफल का 2.4% अधिकृत किए हुए है एवं 82030‘ पूर्वी देशांतर उपयोग भारतीय मानक समय निर्धारित करने के लिए किया जाता है।

  • भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल 3.28 मिलियन वर्ग किमी. है। इसका अक्षांशीय विस्तार 804‘ उत्तर से 3706’ उत्तर का तथा देशांतरीय विस्तार 6807’ पूर्व से 97025’ पूर्व तक है। भारत में कुल 29 राज्य एवं 7 संघशासित प्रदेश हैं।

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अक्षांशीय विस्तार

  • भू-पृष्ठ पर विषुवत रेखा (Equator) से उत्तर या दक्षिण दिशा में स्थित किसी भी बिंदु की पृथ्वी के केन्द्र से मापी गई कोणीय दूरी को अक्षांश कहा जाता है।

  • अक्षांश रेखाएं वह काल्पनिक रेखाएं हैं, जो पृथ्वी के चारों ओर पूर्व से पश्चिम दिशा में विषुवत रेखा के समानांतर खीची जाती हैं।

  • अक्षांश को अंशो, मिनटों, सेकंडो मे दर्शाया जाता है।

  • पृथ्वी को दो बराबार भागों में बांटने वाले 00 अक्षांश को भूमध्य रेखा कहा जाता है।

  • विषुवत वृत्त (भूमध्य रेखा) के उत्तरी भाग को उत्तरी गोलार्ध्द और दक्षिणी भाग को दक्षिणी गोलार्ध्द कहते हैं।

  • भूमध्य रेखा के उत्तर में स्थित अक्षांश रेखाओं को उत्तरी अक्षांश रेखाएं तथा भूमध्य रेखा के दक्षिण मे स्थित अक्षांश रेखाओं को दक्षिणी अक्षांश रेखाएं कहते हैं।

  • यदि अक्षांश रेखाओं को 10 के अंतराल पर खीचा जाए, तो उत्तरी गोलार्ध्द में 89 अक्षांश रेखाएं तथा दक्षिणी गोलार्ध्द में 89 अक्षांश रेखाएं होंगी।

  • इस प्रकार विषुवत वृत्त को लेकर अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179(89+89+1) होगी। किन्ही दो समांतर अक्षांश रेखाओं के मध्य की दूरी 111 किमी. होती है।

  • भृ-पृष्ठ पर उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा जो पृथ्वी को दो बराबार भागों में बांटती है, को प्रधान याम्योत्तर रेखा (Greenwich Mean Time) कहा जाता है।

  • यह रेखा लंदन के ग्रीनविच शहर से गुजरती है। प्रधान याम्योत्तर रेखा को 00 देशांतर भी कहा जाता है।

  • प्रधान याम्योत्तर के पूर्व एवं पश्चिम में उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओं को देशांतर रेखाएं कहा जाता है।

  • देशांतर रेखाएं समांतर नही होती हैं।

  • ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर बढ़ने पर देशांतर रेखाओं के मध्य की दूरी बढ़ती जाती है।

  • विषुवत रेखा पर देशांतर रेखाओं के बीच अधिकतम (111.33 किमी.) दूरी होती है।

  • भारत पूर्णतया उत्तरी गोलार्ध्द में स्थित है।

  • इसकी मुख्य भूमि 804‘ और 3706‘ उत्तरी अक्षांश एवं 6807‘ और 97025’ पूर्वी देशांतर के मध्य फैली हुई है।

  • उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का विस्तार 23030‘ उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के मध्य है।

  • संपूर्ण भारत का अक्षांशीय विस्तार 6045‘ से 3706‘ उत्तरी अक्षांश के मध्य है। अतः भारत का विस्तार उष्ण एवं उपोष्ण दोनों कटिबंध में है।

  • कर्क रेखा भारत के लगभग बीचो-बीच से होकर गुजरती है।

  • सिक्किम से गुजरने वाली अक्षांश रेखा राजस्थान से होकर गुजरती है।

  • 700 पूर्वी देशांतर रेखा जैसलमेर जिले से गुजरती है।

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भारत एवं कर्क रेखा

  • विषुवत रेखा के उत्तर में स्थित 23030‘ उत्तरी अक्षांश को कर्क रेखा कहा जाता है।

  • कर्क रेखा भारत के लगभग मध्य से होकर गुजरती है।

  • कर्क रेखा भारत के कुल आठ राज्यों से होकर गुजरती है जिनमें गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम हैं।

  • सूर्य के उत्तरायण (भूमध्य रेखा के उत्तर) होने के बाद से ही उत्तरी गोलार्ध्द मे दिनों की अवधि बढ़ती जाती है।

  • 21 जून को सूर्य उत्तरायण स्थिति के सर्वोच्च बिंदु पर होता है। जून माह के कर्क रेखा के उत्तर जाने पर दिनों की अवधि बढ़ने लगती है।

  • कुछ भारतीय नगरों की अक्षांशीय स्थित निम्नानुसार है –

स्थल          अक्षांश        अंतर स्थिति 23030‘ से

अगरतला  –    23050 उत्तर    -20‘

गांधीनगर  –    23013‘ उत्तर   +17’

जबलपुर   –    23011‘ उत्तर   +19‘

उज्जैन    –    23009‘ उत्तर   +21’

  • नगरों से कर्क रेखा के परिप्रेक्ष्य में अक्षांशीय स्थितियां –

दिल्ली    –    28061‘ उत्तर

कोलकाता  –    22033‘ उत्तर

जोधपुर   –    26029‘ उत्तर

नागपुर    –    21006’ उत्तर

कर्क रेखा (Tropic) का वास्तविक अक्षांश विषुवत रेखा के उत्तर में 23030‘ है।

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मानक समय

  • किसी देश में किसी एक मध्यवर्ती देशांतर के स्थानीय समय को पूरे देशा का समय मान लिया जाता है, जिसे मानक समय कहते हैं।

  • भारत की प्रमाणिक मध्याह्न रेखा अथवा भारतीय मानक समय (IST) 82030‘ पूर्वी देशांतर से लिया जाता है।

  • यह देशांतर रेखा इलाहाबाद के नैनी से होकर गुजरती है।

  • भारतीय मानक समय (S.T. = Indian Standard Time) ग्रीनविच माध्य (G.M.T. = Greenwich Mean Time) से 5 घंटा, 30 मिनट आगे है।

  • भारतीय मानव समय की याम्योत्तर रेखा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, आंध्र प्रदेश (कुल 5 प्रदेश) से होकर गुजरती है।

  • प्रधान याम्योत्तर (00) के पूर्व एवं पश्चिम दोनों ओर 1800 तक देशांतर रेखाएं होती हैं तथा कुल मिलाकर 3600 तक होती हैं। सभी देशांतर रेखाएं पृथ्वी को बराबर भागों में विभाजित करती हैं इसलिए इन सभी को महान वृत्त (Great Circle) कहा जाता है।

  • ग्रीनविच या प्रधान याम्योत्तर रेखा के पूर्व मे स्थित 1800 तक सभी देशांतर को पूर्वी देशांतर कहा जाता है।

  • पृथ्वी 23 घंटे (1440 मिनट) में 3600 घूम जाती है तथा कुल देशांतर रेखाओं की संख्या भी 3600 है। अतः 10 देशांतर घूमने में पृथ्वी को 4 मिनट (1440/360) का समय लगता है।

  • इस प्रकार प्रत्येक 150 देशांतर पर एक घंटे का अंतर होता है।

  • सूर्य पूर्व में उदित होता है एवं पृथ्वी, पश्चिम से पूर्व अपनी धुरी पर घूम रही है। अतः 00 (प्रधान याम्योत्तर) से पूर्व की ओर जाने पर समय M.T. से आगे और पश्चिम की ओर जाने पर समय G.M.T. से पीछे रहता है।

  • 00 से 1800 पूर्व की ओर जाने पर 12 घंटे की अवधि लगती है एवं यह ग्रीनविच समय से 12 घंटे आगे रहता है। इसी प्रकार 00 से 1800 पश्चिम की ओर जाने पर ग्रीनविच समय से 12 घंटे पीछे का समय मिलता है।

  • 1800 पूर्व एवं 1800 पश्चिमी देशांतर में कुल 24 घंटे अर्थात दिन-रात का अंतर पाया जाता है।

  • भू-पृष्ठ पर 1800 पूर्व एवं पश्चिम याम्योत्तर के लगभग साथ-साथ स्थल खंडों को छोड़ते हुए निर्धारित की गई काल्पनिक रेखा अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line) कहलाती है।

  • जब भारतीय मानव समय के याम्योत्तर पर अर्ध्दरात्रि है, एक स्थान पर सुबह का 6 बजता है, वह स्थान भारत से पूर्व में होगा, क्योंकि पूर्व में सुबह सबसे पहले होती है। 6 घंटे के अंतराल पर उनके याम्योत्तर के बीच 150´6 = 900 (150=1 घंटा) का अंतराल होगा। भारत का मानक समय 82*10/2 है।

 

  • गुजरात का देशांतरीय विस्तार 6804‘ पूर्व से 7404‘ पूर्वी देशांतर के मध्य तथा अरुणाचल प्रदेश का देशांतरीय विस्तार 91030‘ पूर्व से 97030‘ पूर्व है। अतः गुरात के पश्चिम एवं अरुणाचल के पूर्वी छोर के मध्य देशांतरीय अंतर 97030‘-6804’ = 29026‘ है। चूंकि 1 देशांतर में 4 मिनट का अंतर आता है इसलिए 29026‘´4 = लगभग 118 मिनट (अर्थात लगभग 2 घंटे) का अंतराल होगा।

 

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  • नगरों की अक्षांशीय एवं देशांतरीय स्थितियाँ –

जबलपुर       –    23.110N, 79.950E

इंदौर          –    230N, 76 0E

भोपाल        –    23.250N, 77.420E

औरंगाबाद      –    190 53‘47“N, 750 23‘54“E

बड़ोदरा        –    22.300N, 73.190E

पुणे           –    180 31‘N, 730 52‘E

बंगलुरू        –    12.970N, 77.560E

चेन्नई         –    13.040N, 80.170E

  • मानक समय के निकटता के संबध में नगरों की स्थिति –

रीवां      –    81.190 पू. देशांतर

सागर     –    78.500 पू. देशांतर

उज्जैन    –    75.430 पू. देशांतर

होशंगाबाद –    77.450 पू. देशांतर

  • 920 पूर्वी देशांतर पर स्थित शिलांग (मेघालय की राजधानी) एवं भारत के मानक समय के बीच 920-82*1/20 = 9*1/20 देशांतर का अंतर है। चूकिं 1 देशांतर पर 4 मिनट का अंतर आता है इसलिए इनके बीच 9*1/20´4 = 38 मिनट का अंतर होगा।

  • अरुणाचल प्रदेश के तिरप (95031‘) और गुजरात के कांडला (70011‘) में सूर्योदय के समय देशांतर स्थिति के अनुरुप लगभग 2 घंटे का अंतर रहता है।

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दूरस्थ बिंदु

  • भारत पूर्वी एवं उत्तरी गोलार्ध्द में स्थित है।

  • भारत में सर्वाधिक पूर्वी राज्य- अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी राज्य- गुजरात, उत्तरी राज्य- जम्मू कश्मीर एवं दक्षिणी राज्य- तमिलनाडु है। भारत के इतने वृहद क्षेत्रफल के चार दूरस्थ बिंदु (Extreme Points) इस प्रकार हैं –

  • सुदूरस्थ दक्षिणी बिंदु (Southernmost Point) – इंदिरा प्वाइंट (ग्रेट निकोबार अथवा बड़ा निकोबार द्वीप) है एवं भारत की मुख्य भूमि पर दक्षिणतम बिंदु कन्याकुमारी (तमिलनाडु)।

  • सुदूरस्थ उत्तरी बिंदु (Northernmost Point) – सियाचिन ग्लेशियर के निकट, इंदिरा कोल (Indira Col) (जम्मू एवं कश्मीर)।

  • सूदूरस्थ पश्चिमी बिंदु (Westernmost Point) – गौरा मोता या गुहार मोती (गुजरात)।

  • सुदूरस्थ पूर्वी बिंदु (Easternmost Point) – किबिथु (अरुणाचल प्रदेश)।

  • भारत के मुख्य भूमि का सुदूरस्थ पश्चिमी बिंदु 23.713 उत्तरी अक्षांश तथा 6807‘ पूर्वी देंशांतर पर गौरा मोता (गुहार मोती-गुजरात) में स्थित है।

  • भारत के कुछ शहरों के देशांतरीय विस्तार –

हैदराबाद   –    78029‘ पूर्वी देशांतर

भोपाल    –    77030‘ पूर्वी देशांतर

लखनऊ   –    810 पूर्वी देशांतर

बंगलुरु    –    77040‘ पूर्वी देशांतर

  • भारतीय मुख्य भूमि के दक्षिणी छोर पर स्थित कन्याकुमारी वह स्थान है, जहां बंगाल की खाड़ी, अरब सागर तथा हिंद महासागर मिलते हैं। कन्याकुमारी भारतीय राज्य तमिलनाडु मे स्थित है। यह प्रायद्वीप भारत के अंतिम छोर पर स्थित है।

सीमावर्ती देश

  • भारत के निकटतम पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, मालदीव व श्रीलंका हैं।

  • देश की सीमाएं प्राकृतिक एवं मानव निर्मित दोनों प्रकार की हैं।

  • भारत की स्थलीय सीमा उत्तर में चीन व नेपाल, उत्तर-पश्चिम में अफगानिस्तान, पश्चिम में पाकिस्तान, पूर्व में बांग्लादेश एवं म्यांमार तथा उत्तर-पूर्व में भूटान से मिलती है।

  • पश्चिम में पाकिस्तान तथा पूर्व में बांग्लादेश के साथ भारत की सीमाएं कृत्रिम अथवा मानव निर्मित हैं, जबकि अन्य 6 देशों – अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, भूटान तथा म्यांमार के साथ भारत की सीमाएं प्राकृतिक हैं।

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  • पड़ोसी देशों की सीमाओं को स्पर्श करने वाले भारतीय राज्य इस प्रकार हैं –

  1. पाकिस्तान की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य – जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान व गुजरात।

  2. अफगानिस्तान की सीमा को स्पर्श करने वाला राज्य – जम्मू-कश्मीर

  3. चीन की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य – जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम तथा अरुणाचल प्रदेश।

  4. बांग्लादेश की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य – मिजोरम, त्रिपुरा, असम, मेघालय व पश्चिम बंगाल।

  5. म्यांमार की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य – अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर व मिजोरम (म्यांमार को लैंड ऑफ गोल्डेन पैगोड़ा भी कहते हैं)। इसमें अरुणाचल प्रदेश की सर्वाधिक सीमा म्यांमार से स्पर्श करती है।

  6. नेपाल की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य – उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल एवं सिक्किम हैं।

  7. भूटान की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य – पश्चिम बंगाल, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा असम (भूटान को लैंड ऑफ थंडरबोल्ट भी कहते हैं)

  • उत्तर में हिमालय, दक्षिण-पूर्व में बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिंद महासागर तथा दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर, भारत की प्राकृतिक सीमाएं निर्धारित करते हैं।

  • भारत तथा पाकिस्तान के मध्य सीमा-रेखा अध्यारोपित सीमा (Superimposed Boundary) का एक उदाहरण है। अध्यारोपित सीमा एक ऐसी सीमा होती है, जो किसी बाह्य शक्ति द्वारा आरोपित की जाती है। वर्ष 1947 में भारत और पाकिस्तान ने ग्रेट-ब्रिटेन द्वारा अध्यारोपित सीमा को साझा किया था।

  • इस रेखा को रेडक्लिफ रेखा कहते हैं।

  • चीन, भारत से मैकमोहन रेखा द्वारा पृथक होता है।

  • अफगानिस्तान, भारत से डूरंड रेखा द्वारा पृथक होता है।

  • समुद्र पार भारत का सर्वाधिक निकटतम देश श्रीलंका है, जो एक पाक जलडमरुमध्य द्वारा भारतीय मुख्य भू-भाग (तमिलनाडु) से पृथक होता है। यह बंगाल की खाड़ी को गल्फ ऑफ मन्नार से जोड़ता है। इसकी चौड़ाई 64-137 किमी. है। इसका नामकरण ब्रिटिश भारत में तत्कालीन  मद्रास प्रेसीडेसी के गवर्नर (1755-63) रॉबर्ट पाक (Robert Palk) के नाम पर किया गया है।

  • भारत की सबसे लंबी स्थलीय सीमा बांग्लादेश के साथ लगती है। इसकी कुल लंबाई 4096.7 किमी. है।

  • सबसे छोटी स्थलीय सीमा अफगानिस्तान (106 किमी) के साथ लगती है।

  • भारत-म्यांमार के मध्य हिमालय की उत्तरी-पूर्वी पर्वत श्रेणियाँ (अरकामायोमा, नागा, पटकाई) स्थलीय सीमा बनाती हैं। ये भारत को इरावदी नदी द्वारा म्यांमार से अलग करती हैं।

  • सिक्किम प्रदेश की सीमाएं तीन देशों क्रमशः नेपाल, भूटान एवं चीन से मिलती हैं। इसी प्रकार प. बंगाल (नेपाल, भूटान एवं बांग्लादेश) एवं जम्मू-कश्मीर (अफगानिस्तान, चीन एवं पाकिस्तान) की सीमाएं तीन देशों से मिलती हैं।

  • त्रिपुरा राज्य उत्तर, पश्चिम एवं दक्षिण में तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा हुआ है। अतः इसके तीन तरफ अंतरराष्ट्रीय सीमा है।

  • नवंबर, 1998 में भारत और पाकिस्तान के बीच प्रारंभ ‘सम्मिश्र संवाद प्रक्रिय’ (Composite Dialogue Process) के तहत वार्ता हेतु कुल 6 मुद्दे निर्धारित थे जिसमें सरक्रीक की समुद्री जल सीमा, सिंधु नदी जल बंटवारे के अंतर्गत तुलबुल एवं वूलर बैराज तथा नियंत्रण रेखा पर सैन्य दलों का विनियोजन शामिल था।

  • भारत तथा पाकिस्तान के मध्य सीमा-रेखा अध्यारोपित सीमा (Superimposed Boundary) का एक उदाहरण है। अध्यारोपित सीमा एक ऐसी सीमा होती है, जो किसी बाह्य शक्ति द्वारा आरोपित की जाती है। वर्ष 1947 में भारत और पाकिस्तान ने ग्रेट ब्रिटेन द्वारा अध्यारोपित सीमा को साझा किया था।

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भौतिक विभाजन

भारत के प्राकृतिक प्रदेश

  • पुराचुंबकत्व (Paleomagnetism) अध्ययन की वह शाखा है, जो चट्टानों, अवसादों के निर्माण के समय संरक्षित गुणों का अध्ययन करती है। विज्ञान की यह शाखा प्राचीन भूवैज्ञानिक घटनाओं के अध्ययन में सहायक होती है।

  • पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन भी पुराचुंबकत्व के माध्यम से किया जाता है। अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिध्दांत को प्रमाणित करने के लिए भी पुराचंबकीय अध्ययन को आधार बनाया गया है।

  • महाद्वीपीय विस्थापन सिध्दांत के अनुसार, भारतीय स्थल पिंड गोंडवानालैंड का भाग है।

  • गोंडवाना भू-भाग के विशाल क्षेत्र में भारत, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका तथा अंटार्कटिक के क्षेत्र शामिल थे।

  • मध्यवर्ती मध्यजीवी कल्प (200 मिलियन वर्ष पूर्व) में संवहनीय धाराओं द्वारा गोंडवानालैंड को अनेक टुकड़ों में विभाजित कर दिया गया।

  • इस विभाजन के फलस्वरुप भारतीय प्लेट गोंडवाना भूमि से अलग होने के बाद उत्तर दिशा की ओर विस्थापित होने लगी। उत्तर दिशा की ओर विस्थापन के परिणामस्वरुप भारतीय प्लेट अपने से अधिक विशाल प्लेट, यूरेशियन प्लेट से टकराई।

  • इस टकराव के कारण इन दोंनों प्लेटों (भारतीय तथा यूरेशियन) के बीच स्थित टेथिस सागर के अवसादी चट्टान वलित होकर हिमालय तथा पश्चिम एशिया की पर्वतीय श्रृंखला के रुप में विकसित हो गए।

  • हिमलाय की पूरी पर्वत श्रृंखला एक युवा स्थालाकृति को दर्शाती है। इसमें ऊंचे शिखर, गहरी घाटियां तथा तेज बहने वाली नदिया हैं।

  • हिमालय के तराई क्षेत्र में पाताल तोड़ कुएं भी पाए जाते हैं।

  • टेथिस सागर के हिमालय के रुप में ऊपर उठने तथा प्रायद्वीपीय पठार के उत्तरी किनारे के नीचे धंसने के कारण एक वृहद द्रोणी (Basin) का निर्माण हुआ। समय के साथ-साथ यह बेसिन उत्तर के पर्वतों एवं प्रायद्वीपीय पठारों से बहने वाली नदियों के अवसादी निक्षेपों द्वारा धीरे-धीरे भर गया।

  • इस प्रकार जलोढ़ निक्षेपों से निर्मित एक विस्तृत समतल भू-भाग भारत के उत्तरी मैदान के रुप में विकसित हो गया।

  • भूगर्भीय भाग भारत का सर्वाधिक स्थिर भाग है।

  • प्रायद्वीपीय पठार आग्नेय तथा रुपांतरित शैलों वाली कम ऊंची पहाड़ियों एवं चौड़ी घाटियों से बना है।

  • मेघालय पठार प्रायद्वीपीय पठार का बहिर्शायी (Outlier) है।

  • यह एक समतल भूमि है, जो भ्रंशन के कारण भारतीय प्रायद्वीप से माल्दा गैप द्वारा पृथक हो गया है।

  • भारत के पश्चिमी तट का निर्माण भूमि के उत्थान एवं निर्गमन के कारण हुआ।

  • भारत की भूमि बहुत अधिक भौतिक विभिन्नताओं को दर्शाती है। इसलिए भारत को चार प्राकृतिक प्रदेशों में विभाजित किया जाता है। ये हैं –

  1. उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र

  2. विशाल मैदान

  3. प्रायद्वीपीय पठार तथा

  4. तट एवं द्वीप

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  • इसके अतिरिक्त भारत को शैल स्तर क्रम, उच्चावच और विवर्तनिक प्रक्रमों के आधार पर तीन प्रमुख और छः उपभौतिक भू-आकृतिक प्रदेशों में बांटा गया है –

  1. उत्तरी पर्वत

  2. सिंधु गंगा मैदान

  3. थार मरुस्थल

  4. मध्य उच्च भूमि और दक्कन का पठार

  5. तटीय मैदान

  6. अपतटीय सागर और द्वीप

  • पाताल तोड़ कुएं ऐसे प्राकृतिक जलस्रोत होते हैं, जो धरातल से स्वतः ऊपर प्रकट होते हैं और सतह पर जल निकलता रहता है, परंतु जल स्रोत तथा पाताल तोड़ कूप में अंतर होता है – प्रथम में जल स्वतः ऊपर आ जाता है, परंतु दूसरे के लिए (पातल तोड़ कूप में) मनुष्य को धरातलीय सतह पर पहले कुँआं खोदना पड़ता है और बाद में जल स्वतः निकलने लगता है। पाताल तोड़ कुएं भारत में तराई क्षेत्र में पाए जाते हैं।

  • यदि हिमालय-पर्वत श्रेणिया नही होती, तो भारत के अधिकांश भाग में साइबेरिया से आने वाली शीत लहरों का अनुभव होता, सिंधु-गंगा मैदान इतनी सुविस्तृत जलोढ़ मृदा से वंचित होता तथा मानसून का प्रतिरुप वर्तमान प्रतिरुप से भिन्न होता।

  • भारत के पश्चिमी समुद्र तट का निर्माण नदियों की जमाव क्रिया द्वारा नही बल्कि भूमि के उत्थान एवं निर्गमन के कारण हुआ है। भारत कोयले का विशाल भंडार यहां की गोंडवाना शैलों में पाया जाता है, हिमालय वलित पर्वत का एक उदाहरण है। भौमिकीय दृष्टि से प्रायद्वीपीय क्षेत्र भारत का सबसे प्राचीन भाग है।

  • दक्कन ट्रैप की उत्पत्ति – क्रिटेशियस काल के अंतिम चरण में

पश्चिम घाट पर्वत की उत्पत्ति – सेनोजोइक (उत्तर नूतन) काल में

अरावली पर्वत की उत्पत्ति – प्री कैम्ब्रियन युग में

नर्मदा-पाप्ती जलोढ़ निक्षेप – अत्यंत नूतन काल में

  • केरल का टुट्टानाड भारत का न्यूनतम ऊंचाई वाला क्षेत्र है। समुद्र तल से नीचे अपने खेती के तरीकों के लिए प्रसिध्द है। इसे केरल का धान का कटोरा कहा जाता है। कुट्टानाड सतत कृषि और मत्स्य पालन के लिए भी जाना जाता है। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा कुट्टानाड की खेती के तरीकों को वैश्विक महत्वपूर्ण कृषि विरासत प्रणाली (GIAHS) घोषित किया गया है।

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उत्तर का प्रर्वतीय प्रदेश

  • भारत की उत्तरी सीमा पर विस्तृत हिमालय भूगर्भीय रुप से युवा एवं बनावट के दृष्टिकोण से वलित पर्वत श्रृंखला है।

  • ये पर्वत श्रृंखलाएं पश्चिम-पूर्व दिशा में सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फैली हैं।

  • हिमालय विश्व की सबसे ऊंची पर्वत श्रेणी हैं।

  • हिमालय 2400 किलोमीटर की लंबाई में फैलकर अर्ध्दवृत्त का निर्माण करता है। इसकी चौड़ाई कश्मीर से 400 किमी. एवं अरुणाचल प्रदेश में 150 किमी. है।

  • हिमालय के पश्चिमी भाग की अपेक्षा पूर्वी भाग की ऊंचाई में अधिक विविधता पाई जाती है।

  • हिमालय को निर्माण की आयु के आधार पर वलयों की तीव्रता के आधार पर सामांतर संरचनात्मक क्षेत्रों में बांटा जा सकता है –

  1. ट्रांस हिमालय (तिब्बत का क्षेत्र)

  2. वृहद हिमालय (महान हिमालय)

  3. लघु हिमालय (मध्य हिमालय)

  4. बाह्य उप हिमालय (शिवालिक)

  • हिमालय की सभी श्रेणियों का उत्थान टर्शियरी काल के विभिन्न युगों में हुआ है।

  • वृहद हिमालय सबसे प्राचीनतम श्रेणी है, जिसका निर्माण ओलिगोसीन युग (25-40 मिलियन वर्ष पूर्व) में हुआ है, उसके पश्चात लघु हिमालय श्रेणी का निर्माण मध्य मायोसीन युग (14 मिलियन वर्ष पूर्व) में तथा शिवालिक सबसे नवीनतम श्रेणी का निर्माण प्लायोसीन युग (5-1.7 मिलियन वर्ष पूर्व) मे हुआ है।

  • हिमालय के उत्तरी भाग में स्थित श्रृंखला को महान या आंतरिक हिमालय या हिमाद्रि कहते हैं। यह  सबसे अधिक सतत् श्रृंखला है जिसमें 6000 मीटर की औसत ऊंचाई वाले सर्वाधिक ऊंचे शिखर हैं।

  • महान हिमालय स्थित एवरेस्ट विश्व की सर्वोच्च चोटी है। यह नेपाल और तिब्बत की सीमा पर स्थित है।

  • कंचनजंगा हिमालय पर्वत श्रृंखला में स्थित विश्व की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। यह पूर्व में तीस्ता नदी और पश्चिम मे तामुर नदी के बीच स्थित है।

  • कंचनजंगा पूर्वी नेपाल और भारत के सिक्कम राज्य की सीमा पर स्थित है। अन्नपूर्णा चोटी की स्थिति उत्तर-मध्य नेपाल मे है। धौलागिरी चोटी भी नेपाल के मध्य में स्थित है।

  • महान हिमालय के वय की प्रकृति असममित (Asymmetric) है।

  • हिमालय के इस भाग का क्रोड ग्रेनाइट का बना है। यह श्रृंखला हमेशा बर्फ से ढकी रहती है।

  • इसमें बहुत सी हिमानियों का प्रवाह होता है इसलिए हिमालय से निकलने वाली नदियां सतत वाहिनी हैं।

  • महान हिमालय के दक्षिण में स्थित श्रृंखलाओं को लघु हिमालय/मध्य हिमालय कहा जाता है। इसका निर्माण मुख्यतः अत्यधिक संपीडित तथा परिवर्तित शैलों से हुआ। इनकी ऊंचाई 3700 मीटर से 4500 मीटर के बीच तथा औसत चौड़ाई 50 किलोमीटर है।

  • मध्य हिमालय में पीर पंजाल श्रृंखला सबसे लंबी है।

  • धौलाधर एवं महाभारत श्रृंखलाएं भी महत्वपूर्ण हैं। इसी श्रृंखला में कश्मीर की घाटी तथा हिमाचल के कांगड़ा एवं कुल्लू की घाटियां स्थित हैं।

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  • हिमालय की सबसे बाहरी श्रृंखला को शिवालिक कहा जाता है। इनकी चौड़ाई 10 से 50 किमी. तथा ऊंचाई 900 से 1200 मीटर के बीच है।

  • ये श्रृंखलाएं उत्तर में स्थित मुख्य हिमालय की श्रृंखलाओं से नदियों द्वारा लाई गई असंपीडित अवसादों से बनी है।

  • निम्न हिमाचल (लघु हिमालय) तथा शिवालिक के बीच में स्थित लंबवत् घाटी को दून के नाम से जाना जाता है। कुछ प्रसिध्द दून हैं – देहरादून, कोटलीदून, एवं पाटलीदून

  • शिवालिक क्षेत्र में गिरिपाद क्षेत्र में पश्चिम में सिंधु से पूर्व में तीस्ता के बीच फैले समतल मैदान को भाबर कहा जाता है। यह सामान्यतया 8 से 16 किमी. चौड़ी  हिमालयी नदियों द्वार अचानक ढाल भंग होने के कारण शिवालिक अग्र क्षेत्र में की गई कंकड़ और बजरी के जमावों से निर्मित मेखला है।

  • कंकड़ और बजरी की सरंध्रता इतनी अधित होती है कि समूची नदी इसमें लुप्त हो जाती है और धरातल पर केवल सूखी घाटी ही दिखाई पड़ती है।

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  • भाबर मैदान की चौड़ाई पूर्व में कम और पश्चिम भाग में अधिक पाई जाती है।

  • भाबर के दक्षिण में 15-30 किलोमीटर चौड़ा दलदली क्षेत्र फैला हुआ है जिसे तराई कहते हैं।

  • महान हिमालय के उत्तर में ट्रांस हिमालय स्थित है।

  • पामीर की गांठ (तिब्बत) ट्रांस हिमालय मे ही स्थित है।

  • काराकोरम पर्वत श्रेणी ट्रांस हिमालय का ही भाग है।

  • हिंदू धर्म का पवित्र कैलाश पर्वत ट्रांस हिमालय पर्वत माला के पश्चिमी हिस्से में स्थित है।

  • हिमालय को पश्चिम से पूर्व तक स्थित क्षेत्रों के आधार पर भी विभाजित किया गया है। उदाहरण के लिए – सतलज एवं सिंधु के बीच स्थित हिमालय के भाग को पंजाब हिमलाय के नाम से जाना जाता है। पश्चिम से पूर्व तक क्रमशः इसे कश्मीर तथा हिमालय, हिमालय नाम से भी जाना जाता है।

  • सतलज तथा काली नदियों के बीच स्थित हिमालय के भाग को कुमाऊं हिमालय के नाम से भी जाना जाता है।

  • काली तथा तीस्ता नदियों के बीच स्थि हिमालय के भाग को नेपाल हिमालय के नाम से जाना जाता है।

  • तीस्ता एवं दिहांग नदियों के बीच स्थि हिमालय को असम हिमालय के नाम से जाना जाता है।

  • ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय की सबसे पूर्वी सीमा बनाती है।

  • दिहांग महाखड़ड (गार्जः Guarge) के बाद हिमलाय दक्षिण की ओर तीखा मोड़ बनाते हुए भारत की पूर्वी सीमा के साथ फैल जाता है।

  • इन्हें पूर्वांचल या पूर्वी पहाड़ियों के नाम से जाना जाता है। ये पहाड़िया उत्तर-पूर्वी राज्यों से होकर गुजरती है।

  • पूर्वी हिमालय की पहाडियाँ अधिकतर समानांतर श्रृंखलाओं एवं घाटियों के रुप में फैली हैं।

  • पूर्वांचल में पटकाई, नागा, मिजो तथा मणिपुर पहाड़ियाँ शामिल हैं।

  • भारत के प्रमुख हिमालयी राज्य निम्नवत हैं –

जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा। इनके अलावा असम और प. बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र भी इसके अंतर्गत आते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश का विस्तार मैदानी क्षेत्र में है।

  • पश्चिम भाग में हिमालय की श्रेणियों में सबसे दक्षिण में शिवालिक श्रेणी है उसके बाद उत्तर की ओर क्रमशः लघु या मध्य हिमालय एवं महान हिमालय हैं।

  • भारत में सबसे नवीन पर्वत श्रेणी शिवालिक है, जो कि वलित पर्वत का उदाहरण है।

  • जम्मू-कश्मीर की पर्वत श्रेणियाँ –

  1. काराकोरम श्रेणी

  2. लद्दाख श्रेणी

  3. जास्कर श्रेणी

  4. पीर पंजाल

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  • धारवाड़ क्रम की चट्टानों की का निर्माण आर्कियन क्रम की चट्टानों के रुपांतरण, अथवा भ्रंशन से हुआ। ये शिलाएं अत्यधिक धात्विक हैं। जिनमें सोना, लोहा, मैंगनीज, अभ्रक, कोबाल्ट, क्रोमियम, तांबा, टंगस्टन, सीसा आदि खनिज प्राप्त होते हैं। कुडप्पा क्रम की चट्टानों का निर्माण धारवाड़ क्रम की चट्टानों के बाद हुआ है। विंध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण कुड़प्पा क्रम की चट्टानों के बाद हुआ है। इनमे चूने का पत्थर, बलुआ पत्थर, चीनी मिट्टी तथा वर्ण मिट्टी प्राप्त होती है। विंध्यन क्रम की चट्टानों के काफी काफी समय बाद गोंडवाना क्रम की चट्टानों का निर्माण हुआ। भारत का अधिकांश कोयला गोंडवाना क्षेत्र से ही प्राप्त होता है। इस क्षेत्र का कोयला उच्च श्रेणी का होता है। यहां सर्वाधिक बिटुमिनस कोयले की प्राप्ति होती है। इसमे सल्फर की मात्रा न्यून होती है।

  • दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमशः धौलाधर, जास्कर, लद्दाख और काराकोरम स्थित हैं। काराकोरम, लद्दाख और जास्कर श्रेणियाँ ट्रांस हिमलाय क्षेत्र से संबंधित हैं, जबकि धौलाधर पर्वत श्रृंखला लघु या मध्य हिमालय श्रेणी मे स्थित हैं।

  • दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर स्थित पर्वत श्रेणियां क्रमशः पीर पंजाल, जास्कर, लद्दाख तथा काराकोरम हैँ। पीर पंजाल पर्वत श्रेणी मध्य हिमालय के क्षेत्र में स्थित है।

  • ट्री-लाइन या वृक्ष रेखा पर्यावास की वह सीमा है जहां पर वृक्ष उग पाने में सक्षम होते हैं। पूर्वी हिमालय और मध्य हिमालय में प्राकृतिक ट्री-लाइन का मान 3600-3800 मी. तक है, जबकि पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में इसका मान घटकर 3300-3600 मी. ही रहता है। अतः पूर्वी पूर्वी हिमालय की तुलना में पश्चिमी हिमालय में ट्री-लाइन का मान कम रहता है।

  • हिमालय की पहाड़ी श्रृंखला में ऊंचाई के साथ-साथ वनस्पति में परिवर्तन आता जाता है, साथ ही जैव-विविधता में भी कमी देखने को मिलती है। इस परिवर्तन के प्रमुख कारणों में ऊंचाई, तापमान में गिरावट, वर्षा परिवर्तन, मिट्टी का अनउपजाऊ होना, वायुमंडलीय दबाव कम होना तथा हवा का हल्का होना शामिल है। इसके अतिरिक्त ऊंचाई बढ़ने के साथ भू क्षेत्र का कम होना, जलवायु परिवर्तन तथा अक्षांशीय स्थिति का भी प्रभाव पड़ता है।

  • पटकाई पहाड़ियाँ असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम एवं नागालैंड से संलग्न हैं। मिजो पहाड़ियाँ त्रिपुरा से संलग्न हैं।

  • पीर पंजाल श्रेणी मध्य हिमालय में अवस्थित है, यह हिमाचल और जम्मू-कश्मीर राज्यों मे दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम तक विस्तारित है।

  • अक्साई चिन की अवस्थिति भारत, चीन और पाकिस्तान की सीमाओं के सम्मिलन संधि स्थल पर है। इस भारतीय भू-भाग पर वर्ष 1962 के युध्द में चीन ने कब्जा कर लिया था। तब से ये भारत-चीन के मध्य सीमा विवाद का क्षेत्र है। लद्दाख पठार अक्साई चिन क्षेत्र में ही अवस्थित है।

  • पश्चिमी हिमालय संसाधन प्रदेश के प्रमुख संसाधन वन हैं। इस क्षेत्र के 65% भू-भाग पर वन हैं।

  • महान हिमालय की औसत ऊंचाई 6100 मी. है, जबकि इसकी सर्वोच्च चोटी माउंट एवरेस्ट की उंचाई लगभग 8848 मी. (लगभग 8850 मी.) है।

  • मध्य अथवा लघु हिमालय श्रेणी को महाभारत श्रेणी अथवा हिमाचल हिमालय के नाम से भी जाना जाता है।

  • भारत के प्रमुख हिमालयी राज्य – जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम एवं त्रिपुरा हैं। इनके अलावा असम और पश्चिम बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र भी इसके अंतर्गत आते हैं। अतः हिमालय का पांच से अधिक राज्यों में विस्तार है। पश्चिमी घाट गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल राज्यों मे फैला हुआ है। इस प्रकार इसका विस्तार छः राज्यों में है। पुलिकट भारत का दूसरा सबसे बड़ा (चिल्का के बाद) लैगून है। इसका विस्तार तमिलनाडु एवं आध्रं प्रदेश में है।

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दक्षिण एवं मध्य भारत की पर्वत श्रेणियाँ एवं पहाड़ियां

  • भारत के वृहद क्षेत्रफल में प्रायद्वीपीय पठार एक मेज की आकृति वाला स्थल है, जो पुराने क्रिस्टलीय आग्नेय तथा रुपांतरित शैलों से बना है।

  • प्रायद्वीपीय भाग गोंडवाना भूमि के टूटने एवं अपवाह के कारण बना प्राचीनतम भू-भाग है। इस पठारी भाग में चौड़ी तथा छिछली घाटियाँ एवं गोलाकार पहाड़ियाँ हैं। इस पठार के दो मुख्य भाग हैं – मध्य उच्च भूमि तथा दक्कन का पठार।

  • नर्मदा नदी के उत्तर में प्रायद्वीपीय पठार का वह भाग जो कि मालवा पठार के अधिकतर भागों पर फैला है, उसे मध्य उच्च भूमि के नाम से जाना जाता है। विंध्य श्रृंखला दक्षिण में मध्य उच्च भूमि तथा उत्तर-पश्चिम में अरावली से घिरी है।

  • अरावली श्रेणी गुजरात के पालनपुर से लेकर राजस्थान एवं हरियाणा से होकर दिल्ली तक लगभग 800 किमी. की लंबाई मे फैली है।

  • इसका निर्माण प्री-कैम्ब्रियन काल में हुआ था, जो 600 से 570 मिलियन वर्ष पूर्व माना जाता है।

  • यह भारत ही नहीं बल्कि विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसकी सर्वोच्च चोटी गुरु शिखऱ (1722 मी.) है।

  • अरावली अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountain) का उदाहरण है।

  • अवशिष्ट पर्वत उन पर्वतों को कहते कहा जाता है, जो प्रारंभिक पर्वत अपरदन की शक्तियों द्वारा काटकर नीचे हो जाते हैं तथा उनका अवशिष्ट या शेष अवरोधक भाग ही दृष्टिगोचर होने से होता है, अतः इन्हें घर्षित पर्वत या अवशिष्ट पर्वत भी कहा जाता है। उदाहरण – विंध्याचल, अरावली, सतपुड़ा आदि।

  • सतपुड़ा पहाड़ियाँ (Satpura Range) दक्कन पठार का भाग हैं। इनका विस्तार मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र राज्यों में है। इन श्रेणियों के उत्तरी भाग पर नर्मदा नदी तथा दक्षिणी भाग पर ताप्ती नदी बहती है।

  • सतपुड़ा श्रेणियाँ इन दोनों नदियों के मध्य मे स्थित हैं। अजंता श्रेणी, महाराष्ट्र राज्य के औरंगाबाद जिले में स्थि है।

  • धूपगढ़ चोटी सतपुड़ा श्रेणी की सबस ऊंची चोटी है यह पंचमढ़ी में स्थित है।

  • पश्चिमी घाट को सह्याद्रि के नाम से भी जाना जाता है इसका विस्तार पश्चिम तट पर गुजरात से लेकर तमिलनाडु तक लगभग 1600 किमी. में है।

  • पश्चिमी घाट की औसत ऊंचाई लगभग 1200 मी. है। केरल में इसे सव्यपर्वतम के नाम से जाना जाता है।

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  • पश्चिमी घाट की सबसे ऊंची चोटी केरल मे स्थित अनाइमुड़ी चोटी (2695 मी.) है। पश्चिमी घाट का दक्षिणी क्षेत्र, उत्तरी क्षेत्र की अपेक्षा अधिका ऊंचा है।

  • नल्लामलाई पहाड़ियां आंध्र प्रदेश में कृष्णा और पेन्नरु नदी के मध्य स्थित हैं यह पूर्वी घाट की पहाड़ी में पूर्वी तटीय मैदान के समानांतर महानदी (ओड़िशा में) से नीलगिरि की पहाड़ियों के मध्य विस्तृत है।

  • जवादी पहाड़ियां तमिलनाडु राज्य के उत्तरी अर्काट जिले में स्थित हैं।

  • पहाड़ियों की रानी के नाम से विख्यात नीलगिरी पहाड़ियाँ पूर्वी घाट एवं पश्चिमी घाट के सम्मिलन स्थल पर अवस्थित हैं। दोद्दाबेट्टा (2637 मी.) नीलगिरि पहाड़ी की सर्वोच्च चोटी है।

  • दक्षिण भारत की प्रसिध्द टोडा (तमिलनाडु) जनजाति यहीं निवास करती है। अन्नामलाई पहड़ियां केरल एवं तमिलनाड़ु राज्य की सीमा पर अवस्थित हैं। इसकी सर्वोच्च चोटी अनाइमुड़ी है।

  • नीलगिरी पर्वतमाला तमिलनाडु, केरल एवं कर्नाटक राज्यों में विस्तृत है। यह एक पर्वत ग्रंथि है।

  • कर्डामम पहाड़ियां दक्षिण भारत में दक्षिण-पश्चिमी घाट के केरल के दक्षिण-पूर्वी हिस्से तथा तमिलनाडु के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में अवस्थित है।

  • इन पहाड़ियों पर इलायची (Cardamom) की खेती व्यापक पैमाने पर की जाती है।

  • शेवराए पहाड़ियां तमिलनाडु के सलेम कस्बे के पास अवस्थित है। लगभग 50 वर्ग किमी. क्षेत्रफल पर विस्तृत ये पहाड़ियाँ पूर्वी घाट का हिस्सा हैं।

  • तमिलनाडु का प्रसिध्द हिल स्टेशन यारकॉड इन्हीं पहाड़ियों पर स्थित है।

  • महादेव कैमूर महाड़ियां मध्य प्रदश में स्थित हैं।

  • गढ़जात की पहाड़ियां ओड़िशा राज्य मे स्थित हैं जहां गोंड जनजाति निवास करती है।

  • बालाघाट श्रेणी, हरिश्चन्द्र श्रेणी तथा सतमाला पहाड़ियाँ महाराष्ट्र राज्य में विस्तृत हैं।

  • अजंता श्रेणी का विस्तार केवल महाराष्ट्र राज्य में ही है।

  • रामगिरि की पहाड़ियाँ आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित है।

  • यह पूर्वी घाट या महेन्द्र पर्वत का हिस्सा हैं।

  • मैकाल श्रेणी सतपुड़ा श्रेणी का पूर्वी भाग है यह छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है।

  • अनाइमुडी दक्षिण भारत की सर्वोच्च पर्वत चोटी है। इसकी ऊंचाई 2695 मी. है तथा यह केवल केरल के इडुक्की जिले में स्थित है। यह चोटी पश्चिमी घाट पर्वत का भाग है।

  • नीलगिरि पहाड़ी भारतीय प्रायद्वीप के पूर्वी घाट तथा पश्चिमी घाट के मिलन बिंदु पर स्थित है। नीलगिरि पहाड़ी को ब्लू माउंटेन भी कहा जाता है। इसकी सर्वाधिक ऊंची चोटी दोद्दाबेट्टा (लगभग 2637 मी. ऊंची) है।

  • नीलगिरी पर्वतमाला तमिलनाडु, केरल एवं कर्नाटक राज्यों में विस्तृत हैं।

  • भारतीय समुद्र शास्त्रियों ने तीन समुद्र पर्वत श्रेणियों की खोज की है जिनमें एक मध्य हिंद महासागर बेसिन में, दूसरा पूर्वी अरब सागर में सागर कन्या तथा तीसरा मुंबई से 455 कि.मी. दक्षिण-पश्चिम में खोजा गया। इस सागर का नामकरण महान वैज्ञानिक सी.वी. रमन के नाम पर सागर पर्वत रखा गया है।

  • समुद्रतल से 4000-5000 फीट ऊंचे पठार से संलग्न शेवरॉय पहाड़ियां तमिलनाडु के सलेम कस्बे के पास अवस्थित हैं।

  • धूपगढ़ चोटी की ऊंचाई 1350 मी. है, जो सतपुड़ा श्रेणी की सबसे ऊंची चोटी है। यह पंचमढ़ी में स्थित है।

  • रामगिरि के पहाड़ियां आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित हैं। यह पूर्वी घाट या महेन्द्र पर्वत का हिस्सा हैं। इसके अतिरिक्त रामगिरि की पहाड़ियां छत्तीसगढ़ के मैकाल श्रेणी में भी स्थित हैं।

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  • पहाड़ियां राज्य

गारो          मेघालय

मिरी          अरुणाचल प्रदेश

कोल्लइ मलाई  तमिलनाडु

डालमा         झारखंड

 

पर्वत चोटियां

  • माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) विश्व का सर्वोच्च पर्वत शिखऱ है। इसकी ऊंचाई 8848 मी. तथा अवस्थिति नेपाल में है।

  • बछेन्द्री पाल प्रथम भारतीय महिला हैं, जिनको एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने में वर्ष 1984 में सफलता प्राप्त हुई थी।

  • भारत का सर्वोच्च पर्वत शिखर माउंट गॉडविन ऑस्टिन या K2 है। यह पर्वत शिखर काराकोमर श्रेणी पर स्थित है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 8611 मी. है। K2 पाक अधिकृत भारतीय भू-भाग में स्थित है।

  • भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी कंजनजंगा है, जो भारत के सिक्किम राज्य में अवस्थित है। कंचनजंगा की ऊंचाई 8598 मी. है।

  • नंदा देवी भारत की तीसरी सर्वोच्च चोटी है। नंदा देवी शिखर की ऊंचाई 7816 मी. है। यह पूरा क्षेत्र नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया जा चुका है। यूनेस्कों द्वारा वर्ष 1988 में इसे प्राकृतिक महत्व की विश्व धरोहर के रुप में संरक्षित किया गया।

  • अरावली की सर्वोच्च चोटी गुरु शिखर (1722 मी.) है। यह राजस्थान के सिरोही जिले में अवस्थित है।

  • कामेत तथा त्रिशूल पर्वत शिखर भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित है।

  • गोसाईनाथ तिब्बत में नेपाल की सीमा के निकट स्थित है।

  • माउंट आबू अरावली पर्वत का भाग है।

  • उटकमंड नीलगिरी पहाड़ी पर स्थित है।

  • दक्षिण भारत का कोडाईकनाल तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले में पलनी पहाड़ी में अवस्थित है।

  • जुंको ताबेई एक जापानी पर्वतारोही हैं। जिन्होंने 16 मई, 1975 को माउंट एवरेस्ट को फतह कर इतिहास रच दिया तथा ऐसा करने वाली वे प्रथम महिला बन गई। ये सातों महाद्वीपों के सर्वोच्च शिखर पर चढ़ने वाली पहली महिला हैं।

  • विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर सबसे कम समयांतराल पर दो बार विजय प्राप्त करने वाली महिला पर्वतारोही संतोष यादव (भारत की एवरेस्ट पर चढ़ने वाली द्वीतीय महिला) हैं।

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घाटियां

  • हिमालय समानांतर श्रेणियों से निर्मित है। इन्हें कश्मीर घाटी, दून घाटी, कांगड़ा एवं कुल्लू घाटियां (हिमाचल प्रदेश), भागीरथी घाटी (गंगोत्री के समीप) एवं मंदाकिनी घाटी (केदारनाथ के समीप) आदि अनेकों घाटियों द्वारा प्रतिच्छेदित किया जाता है। ये पर्यटकों के आकर्षण के स्थान हैं एवं यहां जनसंख्या का जमाव भी पाया जाता है।

  • कुल्लू घाटी हिमालय प्रदेश में धौलाधार और पीर पांजाल श्रेणियों के मध्य अवस्थित है। नेलांग घाटी भारत के उत्तराखंड राज्य (उत्तरकाशी जिला स्थित गंगोत्री नेशनल पार्क में) में स्थित है।

  • भारत-चीन सीमा के निकट सुरम्य नेलांग घाटी है, जो वर्ष 1962 युध्द के बाद नागरिकों के लिए बंद कर दिया गया था। मई, 2015 में इसे पर्यटकों के लिए खोल दिया गया।

  • मर्खा घाटी लद्दाख (जम्मू और कश्मीर) की प्रसिध्द घाटी है।

  • समुद्र तल से 2438 मी. की ऊंचाई पर भारत के पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में जफू श्रेणी के पीछे जुकू घाटी स्थित है।

  • सांगला घाटी किन्नौर (हिमाचल प्रदेश) मे स्थित है। यह चारों ओर से पर्वतीय चोटियों और वस्पा नदी से घिरी हुई है।

  • युथांग घाटी गंगटोक (सिक्किम की राजधानी) से 149 किमी. की दूरी पर स्थित है, यह रोकोडेंड्रान झाड़ियों एवं अन्य वनस्पति प्रजातियों से ढकी हुई है। इस घाटी को Hot Spring के रुप से भी जाना जाता है।

  • शांत घाटी या मौन घाटी (Silent Valley) केरल के पलक्कड़ पालघाट जिले में स्थित है। यह पश्चिमी घाट की नीलगिरि पहाड़ियों पर स्थित है।

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दर्रे

  • किसी पर्वत अथवा पहाड़ी में स्थित निचला भाग है जिससे होकर स्थल मार्ग गुजरता है, उसे दर्रा (Pass) कहा जाता है। दर्रा पर्वत के द्रोणी (Basin) से होकर गुजरता है। भारत के हिमालय क्षेत्र एवं पश्चिमी घाट में अनेक दर्रे मिलते हैं जिनसे होकर सड़क एवं रेलमार्ग गुजरता है।

  • जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में स्थित काराकोरम दर्रा भारत का सबसे ऊंचा दर्रा (5654 मी.) है।

  • बुर्जिल दर्रा श्रीनगर को गिलगित से जोड़ता है।

  • जोजिला जास्कर श्रेणी में स्थित है, इससे श्रीनगर-लेह मार्ग गुजरता है।

  • पीर पंजाल दर्रे से कुलगांव से कोठी जाने का मार्ग गुजरता है।

  • बिनहाल दर्रे से जम्मू से श्रीनगर जाने का मार्ग गुजरता है। जवाहर सुरंग बिनहाल दर्रे में स्थित है।

  • शिपकी ला शिमला (हिमाचल प्रदेश) से तिब्बत को जोड़ता है।

  • बड़ालाचा दर्रे से मंडी से लेह जाने का मार्ग गुजरता है।

  • थांगा ला दर्रा उत्तराखंड के कुमाऊं श्रेणी में स्थित है।

  • माना दर्रा हिमालय क्षेत्र में भारत और तिब्बत के बीच स्थित है। जिसे चिरबितया-ला या डूंगरी-ला भी कहा जाता है। यह उत्तराखंड राज्य में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व से जास्कर पर्वत श्रेणी के पूर्वी छोर तक फैला हुआ है। इसी दर्रे में देवताल झील है जहां से अलकनंदा की सहायिका नदी सरस्वती का उद्गम होता है।

  • लिपुलेख दर्रा भारत-चीन सीमा पर उत्तराखंड राज्य में स्थित है।

  • थांगा ला, माना, नीति एवं लिपुलेख दर्रे से मानसरोवर झील कैलाश घाटी का मार्ग गुजरता है।

  • सिक्किम स्थित नाथू ला हिमाचल क्षेत्र में समुद्र तल से 4508 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। भारतीय क्षेत्र में सिक्किम की राजधानी गंगटोक से 52 किमी. पूर्व मे स्थित नाथू ला चीनी क्षेत्र में तिब्बत पठार की चुंबी घाटी में खुलता है।

  • नाथू ला भारत एवं चीन के बीच तीसरा सीमा व्यापार प्वाइंट है अन्य दो व्यापार प्वाइंट उत्तराखंड में लिपुलेख तथा हिमाचल प्रदेश में शिपकीला है। वर्ष 1962 में भारत-चीन युध्द के दौरान बंद किए गए नाथू ला को भारत  और चीन के मध्य व्यापार के विस्तार के उद्देश्य से 6 जुलाई, 2006 को पुनः खोला गया।

  • सिक्किम मे स्थित जेलेप ला पूर्वी सिक्किम जिले को ल्हासा (तिब्बत) से जोड़ता है।

  • बोमडि ला दर्रा अरुणाचल प्रदेश (पश्चिमी कामेंग जिला) एवं ल्हासा (तिब्बत) को जोड़ता है।

  • यांग याप दर्रा अरुणाचल प्रदेश मे स्थित है। इस दर्रे के पास ही ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है। यहां से चीन के लिए भी मार्ग जाता है।

  • दिफू व पांगसाड दर्रा अरुणाचल प्रदेश भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित है।

  • मणिपुर में स्थित तुजू दर्रा से इम्फाल से तामू व म्यांमार जाने का मार्ग गुजरता है।

  • पश्चिमी घाट पाप्ती के मुहाने से लेकर कन्याकुमारी अंतरीप तक 1600 किमी. की लंबाई में विस्तृत है। पश्चिमी घाट पर कुछ प्रमुख दर्रे पाए जाते हैं।

  • महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट में स्थित थालघाट दर्रे (855 मी.) से मुंबई-नागपुर-कोलकाता रेलमार्ग तथा सड़क मार्ग गुजरते हैं।

  • भोरघाट दर्रा (229 मी.) महाराष्ट्र में स्थित हैं। यहां से मुंबई-थाणे-बेलगांव-चेन्नई रेलमार्ग एवं सड़क मार्ग गुजरता है।

  • पालघाट दर्रा (300 मी.) नीलगिरि और अन्नामलाई श्रेणियों में स्थित है। केरल में स्थित इस दर्रे से कालीकट-त्रिचूर-कोयम्बटूर-इडोर के रेल एवं सड़क मार्ग गुजरते हैं।

  • भारत के कुछ अन्य प्रमुख दर्रों में चांग ला- जम्मू कश्मीर में, बुम ला – अरुणाचल प्रदेश में, रोहतांग दर्रा – हिमाचल प्रदेश एवं नीति दर्रा – उत्तराखंड में स्थित है। मुलिंग ला गंगोत्री के उत्तर में स्थित मौसमी दर्रा है, जो  उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ता है। शीतकाल में यह बर्फ से ढका रहता है और आवागमन संभव नही होता है।

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  • दर्रा राज्य

चांग ला       जम्मू एवं कश्मीर

रोहतांग        हिमाचल प्रदेश

बॉमडि ला      अरुणाचल प्रदेश

से ला         अरुणाचल प्रदेश

शिपकी ला     हिमाचल प्रदेश

जोजि ला      जम्मू-कश्मीर

नाथू ला       सिक्किम

नीति          उत्तराखंड

माना          उत्तराखंड

लिपु लेख      उत्तराखंड

बुम ला        अरुणाचल प्रदेश

मुलिंग ला      उत्तराखंड

जेलेप ला      सिक्किम

रोहतांग        हिमाचल प्रदेश

पालघाट       केरल

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हिम रेखा एवं हिमनद

  • हिम की निचली सीमा को हिम रेखा कहते हैं। अक्षांशों, उच्चावच, वर्षण की मात्रा, ढाल एवं स्थानीय स्थालाकृति में भिन्नताओं के कारण हिमालय के अलग-अलग हिस्सों में हिमरेखा अलग-अलग है। परंतु औसत हिम रेखा की ऊंचाइयां उत्तरी भाग पर 5500-6000 मी. और महान हिमालय के दक्षिणी भाग पर 4500-6000 मी. पाई जाती है। इसी प्रकार पश्चिमी हिमालय की औसत हिम रेखा 5800 मी. तथा पूर्वी हिमालय में 4300 मी. पाई जाती है।

  • काराकोरम (जम्मू एवं कश्मीर) और अरुणाचल प्रदेश के मध्य हिमालय का लगभग 40,000 वर्ग किमी. क्षेत्र हिमनदों (बर्फीले क्षेत्रों) से ढका है।

  • हिमालय के प्रमुख हिमनद, महान हिमालय (Great Himalaya) और परा-हिमालय (Trans Himalaya) के पर्वतों में विद्यामान है।

  • काराकोरम, लद्दाख और जास्कर श्रेणियों में हिमनद पाए जाते हैं।

  • लघु हिमालय के हिमानी छोटे होते हैं, जबकि पीर पंजाल और धौलाधर श्रेणियों में बड़े हिमनदों के अवशेष मिलते हैं।

  • पीर पंजाल का सबसे बड़ा हिमनद सोना पानी है, जो लाहुल और स्पीति प्रदेश के चन्द्रा घाटी में स्थित है।

  • काराकोरम और महान हिमालय में बड़े आकारों के हिमनद विद्यामान हैं। जिनमें सियाचिन (76.64 किमी.), हिस्पारा (61 किमी.), बीयाफो (60 किमी.), बालटोरो (58 किमी.), ससाइनी (17.85 किमी.) प्रमुख हैं।

  • चौराबाड़ी ग्लेशियर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ मंदिर के उत्तर में अवस्थित है। इस ग्लेशियर के दक्षिणी ढलान की दूरी मंदिर से 4 किमी. उत्तर मे  है। ग्लेशियर के पिघलने के कारण एक झील का निर्माण हो गया है जिसे गांधी सरोवर के नाम से भी  जाना जाता है।

  • मिलाम हिमनद उत्तराखंड के कुमाऊं प्रक्षेत्र में अवस्थित मुख्य हिमनद है। इसी हिमनद से शारदा नदी (काली गंगा) का उद्गम होता है।

  • भारत के प्रमुख हिमनद

हिमानी के नाम      स्थिति        लंबाई (किमी.)

सियाचिन           काराकोरम      76.64

बीयाफो            काराकोरम      60

हिस्पारा            काराकोरम      61

बालटोरो            काराकोरम      58

चोगोलुंगमा         काराकोरम      50

खोर्दों जीन          काराकोरम      41

रिमों               कश्मीर        40

पुन्माह             कश्मीर        27

गंगोत्री             उत्तराखंड       26

जेमु               सिक्किम/नेपाल  25

ससाइनी            काराकोरम      17.85

रुपल              कश्मीर        16

दीयामीर            कश्मीर        11

  • हिमालय के हिमनदों के पिघलने की गति सर्वाधिक है। गंगा नदी के उद्गम स्थल पर स्थित गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। इसी के परिणामस्वरुप इसका विस्तार कम होकर पिछले 50 वर्षों की तुलना में लगभग आधा हो गया है।

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पठार

  • प्रायद्वीपीय भारत की चट्टानों की उत्पत्ति लगभग 3600 मिलियन वर्ष पूर्व हुई थी।

  • कार्बोनीफेरस युग के पहले यह गोंडवानालैंड का एक भाग था।

  • कार्बोनीफेरस युग के दौरान दामोदर, सोन, महानदी और गोदावरी बेसिन मे कोयले का निर्माण हुआ, जबकि क्रिटैशियस युग के दौरान अत्यधिक ज्वालामुखी उद्गार से दक्कन ट्रैप का निर्माण हुआ।

  • दक्कन ट्रैप का निर्माण लगभग 146 मिलियन वर्ष पूर्व हुआ। प्रायद्वीपीय पठार में चौड़ी, छिछली घाटियां एवं गोलाकार पहाड़ियां है। इस पठार के दो मुख्य़ भाग हैं – मध्य उच्च भूमि तथा दक्कन का पठार।

  • नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित मालवा के पठार के अधिकतर भागों को मध्य उच्च भूमि नाम से जाना जाता है। मध्य उच्च भूमि पश्चिम में चौड़ी परंतु पूर्व में संकीर्ण हैं।

  • मध्य उच्च भूमि के पूर्वी विस्तार को स्थानीय रुप से बुंदेलखंड तथा बघेलखंड के नाम से जाना जाता है।

  • दामोदर नदी द्वारा अपवाहित छोटानागपुर पठार मध्य उच्च भूमि का भाग है।

  • छोटानागपुर पठार का विस्तार झारखंड के रांची, हजारी बाग, संथाल परगना, पलामू, धनबाद, सिंहभूम जिलों तथा पश्चिमी बंगाल के पुरुलिया जिले के 87239 वर्ग क्षेत्रफल मे है।

  • इस पठार में विभिन्न ऊंचाइयों के पठारों का क्रम मिलता है। मध्य पश्चिमी भाग पर पाट भूमि स्थित है जिसकी अधिकतम ऊंचाई 1100 मी. मिलती है। इस पठार के प्रत्येक दिशा में सोपान मिलते हैं। अतः यह एक अग्रगंभीर है।

  • मध्य उच्च भूमि क्षेत्र में बहने वाली नदियां चंबल, सिंध, बेतवा तथा केन दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की तरफ बहती हैं इस प्रकार ये नदियां इस क्षेत्र के ढाल को दर्शाती हैं।

  • मालवा का पठार 530 किमी. लंबाई एवं 390 किमी. चौड़ाई के साथ प्रायद्वीप के लगभग 150,000 वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तृत है। इसकी उत्तरी सीमा अरावली एवं दक्षिणी सीमा विंध्य श्रेणी और पूर्वी सीमा बुंदेलखड पठार द्वारा निर्धारित की जाती है।

  • दक्कन का पठार एक त्रिभुजाकार भू-भाग है, जो नर्मदा नदी के दक्षिण मे स्थित है। इसके उत्तर में चौड़े आधार पर सतपुड़ा की श्रृंखला है, जबकि महादेव, कैमूर तथा मैकाल श्रृंखला इसके पूर्वी विस्तार को प्रदर्शित करती है।

  • दक्कन ट्रैप में काली मृदा पाई जाती है, जिसका निर्माण बेसाल्ट लावा के अपक्षय/अपरदन के फलस्वरुप हुआ है।

  • अरावली की पहाड़ियां प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर पश्चिमी किनारे पर स्थित है। ये बहुत अधिक खंडित एवं अपरदित पहाड़ियां हैं। प्रायद्वीपीय पठार का एक भाग उत्तर-पूर्व में पाया जाता है इसे स्थानीय रुप से मेघालय पठार, कार्बी आंमलांग पठार तथा उत्तर कचार पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। यह भ्रंशन के कारण प्रायद्वीपीय भाग से माल्दा गैप द्वारा पृथक हो गया है। मेघालय पठार में तीन महत्वपूर्ण पहाड़ियाँ गारो खासी तथा जयंतिया हैं।

  • दंडकारण्य क्षेत्र ओड़िशा (कोरापुट और कालाहांडी जिला), छत्तीसगढ़ (बस्तर जिला) और आंध्र प्रदेश (विशाखापत्तनम और श्री काकुलम जिलों) के 89078 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है। इस क्षेत्र का पूर्व से पश्चिम तक विस्तार लगभग 480 किमी. में तथा उत्तर से दक्षिण तक विस्तार लगभग 320 किमी. में है।

  • प्रायद्वीपीय पर्वतों का निर्माण पैलियोजोइक कल्प से संबंधित है।

  • धनबाद कोयला खनन और औद्योगिक संस्थापन के लिए जाना जाता है। धनबाद में लाल मिट्टी व्यापक क्षेत्र में पाई जाती है, जो कृषि के लिए उपयोगी नही होती है। कोयला, लोहा, अभ्रक, तांबा इत्यादि का पाया जाना जनसंख्या के संकेन्द्रण का कारण नही हो सकता।

  • दंडकारण्य भारत के मध्यवर्ती भाग में स्थित है।

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तटीय भाग

भारत की तट रेखा

  • भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है।

  • भारत के तट रेखा की लंबाई 7516.6 किमी. है।

  • भारत की तट रेखा पूर्व से बंगाल की खाड़ी, दक्षिण में हिंद महासागर और पश्चिम में अरब सागर सहित मुख्य भूमि और द्वीपों मे घिरी है। भारत की तट रेखा पर नौ राज्य स्थित हैं।

  • भारत के तटीय राज्यों में गुजरात (1214.70 किमी), महाराष्ट्र (652.60 किमी.), गोवा (101 किमी.), कर्नाटक (280 किमी.), केरल (569.70 किमी.), तमिलनाडु (906.9 किमी.), आंध्र प्रदेश (973.7 किमी.), ओड़िशा (476.4 किमी.) एवं पश्चिम बंगाल (157.50 किमी.) है।

  • भारत के तट पर चार संघ शासित क्षेत्र जिसमें दमन और दीव (42.20 किमी.), लक्षद्वीप (132 किमी.), पुडुचेरी (47.6 किमी.) एवं अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह (1962 किमी.) अवस्थित है।

  • भारत की मुख्य भूमि से लगे कुल तट की लंबाई 5422.6 किमी. है। मुख्य भूमि से दूर कुल तट की लंबाई 2094 किमी. है।

  • भारत में गुजरात राज्य की तट रेखा सर्वाधिक लंबी है तथा सर्वाधिक छोटी तट रेखा गोवा राज्य की है।

  • अंतः स्थल के सागर की ओर निकले भागों को मिलाने वाली सीधी रेखा को आधार रेखा कहते हैं।

  • किसी भी देश के प्रादेशिक जल क्षेत्र को क्षेत्रीय सागर कहा जाता है।

  • क्षेत्रीय सागर की दूरी आधार रेखा से सागर की ओर नापी जाती है, जो सामान्यतया 12 समुद्री मील तक होती है। इस क्षेत्र के उपयोग का भारत को संपूर्ण अधिकार प्राप्त है।

  • समीपस्थ मंडल का विस्तार आधार रेखा से 24 समुद्री मील तक है। इस क्षेत्र में भारत को सीमा शुल्क वसूली और वित्तीय अधिकार प्राप्त है।

  • किसी भी देश का अनन्य आर्थिक क्षेत्र आधार रेखा से 200 समुद्रीय मील तक होता है। इस क्षेत्र में भारत को वैज्ञानिक अनुंसधान की छूट मिली हुई है।

  • स्थलीय भाग एवं आधार रेखा के मध्य सागरीय जल को आंतरिक जल कहते हैं।

  • भारत का औसत समुद्र तल चेन्नई तट से नापा जाता है।

  • प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक साक्ष्यों में हिंद महासागर को रत्नाकर से संबंधित किया गया है।

  • तटीय अपरदन मे समुद्री लहरों, ज्वार-भाटा, धाराओं, सुनामी लहरों तथा मानवीय क्रिया-कलापों आदि की प्रमुख भूमिका होती है। इनमें से सर्वाधिक तटीय अपरदन लहरों द्वारा होता है।

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पूर्वी एवं पश्चिमी तट

  • भारत का पश्चिमी तट, पश्चिमी घाट तथा अरब सागर के बीच स्थित एक संकीर्ण मैदान है। इस तट को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। तट के उत्तरी भाग को कोंकण तट (मुंबई तथा गोवा), मध्य भाग को कर्नाटक तट (कर्नाटक) एवं दक्षिणी भाग को मालाबार तट कहा जाता है। पूर्वी तटीय मैदान महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टाओं द्वारा निर्मित होने के कारण बड़ा उपजाऊ है। इसमें महानदी एवं कृष्णा नदियों के बीच के मैदान को उत्तरी सरकार तट कहा जाता है।

  • कोरोमंडल तट का विस्तार भारत के दक्षिणी प्रायद्वीप के दक्षिण पूर्व मे आंध्र प्रदेश के फाल्स डीबी बिंदु (कृष्णा डेल्टा के पास) से तमिलनाडु के केप कॉमोरिन (कन्याकुमारी) तक है।

  • भारत की पश्चिमी तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाह में मुंबई (महाराष्ट्र), कंडला (गुजरात), मुर्मुगाव (गोवा), जवाहरलाल नेहरु (महाराष्ट्र), जंजीरा (महाराष्ट्र), उडूपी (कर्नाटक), कोचीन (केरल) एवं न्यू मंगलोर आदि हैं।

  • भारत के पूर्वी तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाह विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश), हल्दिया (प. बंगाल), पारादीप (ओड़िशा), एन्नौर (तमिलनाड़ु) एवं न्यू तूतीकोरिन (तमिलनाडु) आदि हैं।

  • जंजीरा – महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में

  • सिंधु दुर्ग – महाराष्ट्र के सिंधु दुर्ग जिले में

  • कन्नूर – केरल के कन्नूर जिले में

  • उडुपी – कर्नाटक के उड़ुपी  जिले में

  • ओरोविले – तमिलनाडु एवं पुडुचेरी की सीमा पर कोरोमंडल तट पर पुडुचेरी में।

  • नागरकोइल – तमिलनाडु राज्य के कन्याकुमारी जिले में

  • तमिलनाड़ु तट पर अवस्थित तरंगम बाड़ी डेनमार्क से संबध्दता के लिए विख्यात हैं। न्यू जेरुशलम चर्च, जिरवेन चर्च आदि यहां की प्रमुख इमारतें हैं, डेनमार्क निवासियों ने बनाई थी। डेनमार्क निवासी  यहां 1620 ई. में आए थे। 1845 ई. में डेनमार्क ने यह बस्ती अंग्रेजों को बेच दी।

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  • सागरीय पुलिनों तथा उनसे संबंधित राज्य

सागर पुलिन    –    राज्य

दीघा      –    पश्चिम बंगाल

गोपालपुर  –    ओड़िशा

कलांगुट   –    गोवा

मरीना    –    तमिलनाडु

 

 

 

 

द्वीप समूह

बंगाल की खाड़ी के द्वीपसमूह

  • बंगाल की खाड़ी के मुख्य द्वीपों में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह आते हैं।

  • अंडमान और निकोबार द्वीपसमूहों को दस डिग्री चैनल (10 डिग्री चैनल) द्वारा अलग किया जाता है। इस चैनल की चौड़ाई लगभग 150 किमी. है।

  • यह 10 डिग्री उत्तरी अक्षांश रेखा के समानांतर है।

  • अंडमान और निकोबार केन्द्र शासित प्रदेश हैं, ये बंगाल की खाड़ी में अवस्थित हैं।

  • अंडमान द्वीपसमूह का सर्वोच्च शिखर सैडल पक (Saddle Peak) है।

  • सैडल पीक (732 मी.) उत्तरी अंडमान द्वीप पर दिग्लीपुर के निकट स्थित है। निकोबार द्वीपसमूह का सर्वोच्च शिखर माउंट थुलिवर (642 मी.) ग्रेट निकोबार द्वीप पर स्थित है।

  • अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में 222 द्वीप हैं। जिनमें 204 द्वीप अंडमान बंगाल की खाड़ी के अंडमान सागर में पोर्टब्लेयर से 135 किमी. दूर उत्तर-पूर्व में अवस्थित है। यह दक्षिण एशिया का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है। इस ज्वालामुखी का पहला उद्गार 1787 ई. में हुआ था। इसी सागर में नारकोण्डम द्वीप भी स्थित है, जो प्रसुप्त ज्वालामुखी है।

  • अंडमान द्वीपों की उत्पत्ति तृतीयक पर्वत श्रेणी अराकान योमा के विस्तार में हुई है। बलुआ पत्थर, चूना पत्थर और शैल इस द्वीप की प्रमुख चट्टाने हैं।

  • दक्षिण अंडमान एवं ग्रेट निकोबार द्वीपसमूहों में स्थित बांडूर समुद्री जैवमंडलीय प्रारक्षित क्षेत्र विश्व के सबसे बड़े और दुर्लभ वृहत्काय रॉबर केकड़े के लिए विश्व प्रसिध्द है। भारत के पूर्वी तट पर श्रीहरिकोटा आंध्र प्रदेश में पुलिकट झील के समीप स्थित है। यह द्वीप पुलिकट झील को बंगाल की खाड़ी से पृथक करता है। यहां भारत का उपग्रह प्रक्षेपण केन्द्र सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र स्थित है।

  • तमिलनाडु मे स्थित रामसेतु प्रारंभ होकर श्रीलंका के मन्नार द्वीप तक एक श्रृंखला में उथले जलीय भाग के रुप में विस्तारित है।

  • अंडमान निकोबार द्वीसमूह में द्वीपों की संख्या 222 है, जबकि द्वीपों एवं टापुओं की संख्या 572 है।

  • ग्रेट निकोबार भारत का दक्षिणतम द्वीप है। यह 6045‘ N से 7015‘ N अक्षांश एवं 93037‘ E से 93056‘ E के मध्य स्थित है। यह पोर्ट ब्लेयर से लगभग 480 किमी. दूर स्थित है। यह इंडोनेशिया के द्वीप सुमात्रा से सबसे कम दूरी (145 किमी.) पर स्थित है। बोर्नियों, जावा एवं श्रीलका की दूरी ग्रेट निकोबार से सुमात्रा की दूरी की तुलना में काफी अधिक है।

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अरब सागर के द्वीपसमूह

  • भारत के केरल के मालाबार तट के पास लक्षद्वीप स्थित है। लक्षद्वीप समूह छोटे प्रवाल द्वीपों से बना है। पहले इनो मकादीव, मीनीकाय तथा एकीनदीव के नाम से जाना जाता था।

  • वर्ष 1973 में इनका नाम लक्षद्वीप रखा गया।

  • लक्षद्वीप अरब सागर के केरल तट से 200-300 किमी. की दूरी पर विस्तृत द्वीपों का समूह है। यह भारत का केन्द्रशासित प्रदेश भी है। इसका कुल क्षेत्रफल 32 वर्ग किमी. है।

  • लक्षद्वीप समूह में द्वीपों की की कुल संख्या 36 है, जबकि इनमें से केवल 10 द्वीप ही आबाद है।

  • लक्षद्वीप के सबसे उत्तरी द्वीपसमूह को अमीन दीवी और सबसे दक्षिणी द्वीपसमूह को मिनिकाय कहते हैं।

  • मिनीकाय शेष द्वीपों से 9 डिग्री चैनल द्वारा पृथक होता है। यह लक्षद्वीप का दूसरा सबसे बड़ा (4.80 वर्ग किमी.) द्वीप भी है।

  • कवरत्ती लक्षद्वीप की राजधानी है, जो कवरत्ती द्वीप पर स्थित है।

  • लक्षद्वीप का सबसे बड़ा द्वीप एंडरॉट अथवा एंडरॉथ (4.90 वर्ग किमी.) है।

  • एलीफैंटा द्वीप मुंबई स्थित गेटवे ऑफ इंडिया से 10 किमी., दूरी पर स्थित है।

  • सालसेट द्वीप भारत के पश्चिम तटीय महाराष्ट्र राज्य में स्थित है।

  • मुंबई एवं थाणे नगर इसी द्वीप पर स्थित है।

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  • अपतटीय द्वीप (Offshore Islands)- गंगा के डेल्टा प्रदेशों, भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तटों तथा मन्नार की खाड़ी में अनेक द्वीप स्थित हैं। इन द्वीपों मे पिरम (खम्भात की खाड़ी) मैसला (काठियावाड़), दीव, बैदा, नोरा, पिर्तन, करुनभार (कच्छ तट), खडियाबेट (अलियाबेट (नर्माद-तापी), सेंट मेरी (मंगलौर तट के पास, अंजीदीव (गोवा तट के पास, वायपिन (कोच्चि के पास), शॉट्र, व्हीलर (महानदी-ब्रह्माणी के मुहाने के पास), न्यू मूर एवं गंगा सागर (गंगा डेल्टा में) इत्यादि भारत के कुछ प्रमुख द्वीप हैं।

  • कोरी क्रीक अथवा निवेशिका एक ज्वारीय क्रीक है।

  • भारत एवं पाकिस्तान के मध्य विवादित सर क्रीक कच्छ के रन मे स्थित एक 96 किमी. लंबा जलीय (दलदली) क्षेत्र है। यह भारत के गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रांत को  अलग करता है। मुख्य विवाद कच्छ और सिंध के बीच समुद्री सीमा के निर्धारण को लेकर है। फिलहाल इस क्षेत्र पर भारत का कब्जा बरकरार है।

  • द्वीप पर निर्मित भारत का सबसे बड़ा नगर मुंबई है। पोर्टब्लेयर का कुल क्षेत्रफल मुंबई के क्षेत्र से अधिक है, परंतु नगरीय क्षेत्र की दृष्टि से मुंबई का क्षेत्रफल पोर्टब्लेयर के क्षेत्रफल से अधिक है।

  • द्वीप तथा उनकी अवस्थित –

द्वीप          अवस्थिति

वेयंत शयोधर   कच्छ की खाड़ी

पिरम         खम्भात की खाड़ी

द्वारका        अरब सागर की खाड़ी

दीव           काठियावाड़ तट

 

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भारत के राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश

  • भारत में 29 राज्य और सात केन्द्रशासित प्रदेश हैं। भारत की राजधानी नई दिल्ली है।

  • वर्तमान में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे दिल्ली के अतिरिक्त हरियाणा उपक्षेत्र के तहत फरीदाबाद, गुड़गांव, मेवात, रोहतक, सोनीपत, रेवाड़ी, झज्जर, पानीपत, पलवल, भिवानी, महेन्द्रगढ़, जींद एवं करनाल जिले, उत्तर-प्रदेश उपक्षेत्र के तहत मेरठ, गाजियाबाद, हापुड़, गौतमबुध्द नगर, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर एवं बागपत जिले तथा राजस्थान उपक्षेत्र के तहत अलवर एवं भरतपुर जिले शामिल हैं।

  • भारत सरकार के गृह मंत्रालय के महापंजीयक कार्यालय के अनुसार, क्षेत्रफल की दृष्टि से पांच बड़े राज्यों में राजस्थान (342239 वर्ग किमी.), मध्य प्रदेश (308252 वर्ग किमी.) महाराष्ट्र (307713 वर्ग किमी.) उत्तर-प्रदेश (240928 वर्ग किमी.) तथा जम्मू एवं कश्मीर (222236 वर्ग किमी.) है।

  • भारत में जनसंख्या की दृष्टि से पांच बड़े राज्य क्रमशः उत्तर प्रदेश (199812341), महाराष्ट्र (112374333), बिहार (104099452), पश्चिम बंगाल (91276115) तथा आंध्र प्रदेश (84580777) है।

  • उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा से स्पर्श करने वाले कुल 8 राज्य एवं एक केन्द्रशासित प्रदेश हैं, जो इस प्रकार है – हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार एवं उत्तराखंड केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली।

  • मध्य प्रदेश की सीमा वर्तमान में पांच राज्यों गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से लगी हुई है।

  • मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल 23025‘ उत्तरी अक्षांश पर अर्थात् कर्क रेखा (23030‘) के दक्षिण में स्थित है।

  • आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (शंशोधन) अधिनियम, 2014 के अनुसार, आंध्र प्रदेश की सीमाएं ओड़िशा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु से अर्थात् कुल 5 राज्यों से लगी हुई है।

  • तेलंगाना राज्य की सीमा छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश को स्पर्श करती हैं। यदि पुदुचेरी केन्द्रशासित प्रदेश के यनम क्षेत्र को जोड़ा जाए तो सीमा 6 राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेश से लगी मानी जाएगी।

  • कर्नाटक की सीमाएं – आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, केरल तथा तमिलनाड़ु अर्थात कुछ 6 राज्यों से लगी हुई है।

  • केरल की सीमाएं – कर्नाटक और तमिलनाड़ु अर्थात दो राज्यों से लगी हुई हैं। पुडुचेरी के माहे क्षेत्र को जोड़ने से केरल की सीमाएं तीन राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेश से लगी हुई मानी जाएगी।

  • तमिलनाडु की सीमाएं – केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश अर्थात कुल 3 राज्यों और पुडुचेरी केन्द्रशासित प्रदेश मुख्य क्षेत्र तथा कराइकल क्षेत्र अर्थात कुल चार राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेश से लगी हुई मानी जा सकती है।

  • पंजाब राज्य की सीमाएं राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर से लगी हुई है।

  • छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र राज्य की सीमाओं को स्पर्श करती है।

  • उत्तर-पूर्वी राज्यों में सात बहनों के नाम से प्रसिध्द राज्य हैं – अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा।

  • असम राज्य की सीमाएं कुल 7 राज्यों से मिलती हैं।

  • असम की सीमा को स्पर्श करने वाले राज्य – पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय हैं।

  • मणिपुर पूर्वोत्तर भारत छोटा एवं स्थलबध्द राज्य है। इस राज्य का कुल क्षेत्रफल 22327 वर्ग किमी. है, जो संपूर्ण भारत के भू-सतह का 0.7% है। मणिपुर की कुल भूमि का 1843 वर्ग किमी. क्षेत्र नदी घाटी बेसिन से संबंधित है।

  • मणिपुर की 92% भूमि पहाड़ी और पर्वतीय किस्म की है। फुमडीज मणिपुर की लोकटक झील मे तैरने वाले छोटे-छोटे भूखंड या द्वीप हैं। इनका निर्माण लटकी हुई सिल्ट से बंधे अपतृणों, मिट्टी एवं अन्य जैविक पदार्थों तथा सड़ती हुई वनस्पति से हुआ है।

  • फुमडीज विलुप्त प्राय हरिण प्रजाति शंगाई का प्राकृतिक निवास स्थल है।

  • 280 उत्तरी अक्षांश रेखा अरुणाचल प्रदेश के मध्य भाग से होकर गुजरती है। अरुणाचल प्रदेश का 80% से अधिक भाग वनावरण के अंतर्गत है तथा यहां 12% से अधिक वनच्छादित क्षेत्र इस राज्य के रक्षित क्षेत्र के नेटवर्क मे हैं

  • राजस्थान का मरुक्षेत्र विश्व का सबसे घना बसा स्थल (83 व्यक्ति/वर्ग किमी.) है। यह अनुमानतः 10000 वर्ष पुराना है। यहां केवल 40 से 60% क्षेत्र ही कृषि हेतु उपयुक्त है। सिंचाई सुविधाओं में विकास के फलस्वरुप शुध्द बोए गए क्षेत्र में वृध्दि के कारण चारागाह क्षेत्र के विस्तार पर कुप्रभाव पड़ा है।

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  • कर्नाटक भारता का जनसंख्या की दृष्टि से आठवां और क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवां सबसे बड़ा राज्य है। सूचना प्रौद्योगिकी के गढ़ इस राज्य को IT Power house या सिलिकान वैली के नाम से प्रसिध्द बंगलुरू शहर स्थित है। मालनड कर्नाटक का एक पहाड़ी प्रदेश है, जो घने जंगलों से आच्छादित है।

  • पाट अंचल छोटानागपुर प्रदेश में अवस्थित है। इस क्षेत्र मे ऊंचे पहाड़ी शिखर होते हैं। छोटानागपुर पठार का अधिकांश भाग झारखंड राज्य के अंतर्गत है। आंध्र प्रदेश के कोल्लूर की खान से ही विश्व प्रसिध्द कोहिनूर हीरा प्राप्त किया गया था। इसी कारण इस राज्य को भारत का कोहिनूर कहा जाता था।

  • विदर्भ महाराष्ट्र राज्य का उत्तर-पूर्वी प्रादेशिक क्षेत्र है। वर्तमान में इस क्षेत्र के अंतर्गत नागपुर और अमरावती दो डिवीजन हैं। जिसके अंतर्गत महाराष्ट्र के नागपुर, अमरावती, चन्द्रपुर, अकोला, वर्धा, बुल्ढ़ाना, यावतमाल, भंडारा गोंडिया, वाशिम और गढ़चि रौली जिले आते हैं।

  • लातूर तल से 636 मी. की ऊंचाई पर स्थित इस नगर में 30 सितंबर, 1993 को भीषण भूकंप आया था।

  • वृष्टि छाया प्रदेश महाराष्ट्र राज्य से मिलता है।

  • पाट अंचल छोटानागपुर प्रदेश में अवस्थित है। इस क्षेत्र में ऊंचे पहाड़ी शिखर होते हैं। छोटानागपुर पठार अधिकांश भाग झारखंड राज्य के अंतर्गत आता है।

  • वर्तमान में झुमरी तलैया झारखंड राज्य के कोडरमा जिले में स्थित है।

  • बिहार, जनसंख्या की दृष्टि की से भारत का तीसरा बड़ा राज्य तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से 12वां बड़ा राज्य था। तेलंगाना के गठन के बाद क्षेत्रफल की दृष्टि से बिहार का स्थान 13वां हो गया।

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  • कुछ राज्यों की समुद्रतल से ऊंचाईयाँ –

बंगलुरु (पूर्व नाम बंग्लौर) – 920 मी.

दिल्ली – 254 मी.

जोधपुर – 232 मी.

नागपुर – 312.42 मी.

  • कुछ राज्य तथा उनकी राजधानियां –

असम          – दिसपुर

मेघालय        – शिलांग

मिजोरम        – आइजोल

नगालैंड        – कोहिमा

गुजरात        – गांधीनगर

मणिपुर        – इम्फाल

त्रिपुरा          – अगरतला

अरुणाचल प्रदेश – ईटानगर

राजस्थान       – जयपुर

केन्द्रशासित प्रदेश

  • भारत की वर्तमान में 29 राज्य और 7 केन्द्रशासित प्रदेश हैं (आंध्र प्रदेश को विभाजित कर तेलंगाना एवं सीमांध्र के गठन के बाद राज्यों की संख्य 29 हो गई है। ये 7 केन्द्रशासित प्रदेश हैं –दिल्ली, चंडीगढ़, लक्षद्वीप, दादरा एवं नगर हवेली, पुडुचेरी, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह तथा दमन व दीव।

  • केन्द्रशासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह 60 और 140 उत्तरी अक्षांश तथा 920 और 940 पूर्वी देशांतर में स्थित है। 100 उत्तरी अक्षांश के उत्तर में स्थित द्वीप अंडमान द्वीपसमूह कहलाते हैं,  जबकि 100 उत्तरी अक्षांश के दक्षिण में स्थित द्वीप निकोबार द्वीपसमूह कहलाते हैं। अंडमान निकोबार का क्षेत्रफल 8249 वर्ग किमी. है। केन्द्रशासित क्षेत्रों में सर्वाधिक क्षेत्रफल अंडमान निकोबार का है। अंडमान निकोबार की जनसंख्या 380581 (2011 जनगणना के अनुसार) है।

  • अंडमान के द्वीपसमूहों में महा अंडमानी, ओगे, जारवा और सेंटीनली नाम की चार निग्रेटों जनजातियां पाई जाती हैं। अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है।

  • चंड़ीगढ़ और उसके आस-पास के क्षेत्र को 1 नवंबर, 1966 को केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया। यह हरियाणा एवं पंजाब दोनो राज्य की राजधानी है। चंडीगढ़ का क्षेत्रफल 114 वर्ग किमी. एवं जनसंख्या 10.55 लाख है। दादरा और नगर हवेली गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों से घिरा हुआ है। इसके दो भाग हैं – एक दादरा और दूसरा नगर हवेली। दादरा और नगर हवेली का क्षेत्रफल 491 वर्ग किलोमीटर एवं जनसंख्या 3.44 लाख है। इसकी राजधानी सिलवासा है।

  • दमन और दीव भारत का संघ शासित प्रदेश है। यह दोनो भागों मे दमन (महाराष्ट्र एवं गुजरात की अरब सागर तटीय सीमा पर) और दीव  (सौराष्ट्र गुजरात तट पर) में विभाजित हैं। दमन और दीव का राजधानी दमन हैं तथा दोनों के मध्य खम्भात की खाड़ी स्थित है। दमन और दीव का क्षेत्रफल 111 वर्ग किमी. एवं  जनसंख्या 243247 (जनगणना 2011) है।

  • दिल्ली केन्द्रशासित प्रदेश के साथ भारत की राजधानी भी है। दिल्ली का क्षेत्रफल 1483 वर्ग किमी. है तथा इसकी जनसंख्या 1.68 करोड़ (2011 जनगणना) है। जनसंख्या की दृष्टि से दिल्ली सबसे बड़ा केन्द्रशासित प्रदेश है।

  • भारत का सबसे छोटा केन्द्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप है भू-भाग की दृष्टि से लक्षद्वीप सबसे छोटा (32 वर्ग किमी.) केन्द्रशासित क्षेत्र है। इसके अलावा जनसंख्या की दृष्टि से भी लक्षद्वीप की जनसंख्या सबसे कम (64473 व्यक्ति है) लक्षद्वीप के अंतर्गत कुल 36 द्वीप आते हैं।

  • लक्षद्वीप की राजधानी कवरत्ती है।

  • पुडुचेरी चार अलग-अलग जिलों में विभाजित है, जिनमें से दो (कराइकल और पुडुचेरी) तमिलनाड़ु के पास विस्तारित हैं। यनम-आंध्र प्रदेश के पास तथा माहे केरल के पास विस्तरित है। पुडुचेरी का क्षेत्रफल 490 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या 12.48 लाख (जनगणना 2011) है। पुडुचेरी इस केन्द्रशासित प्रदेश की राजधानी है।

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प्रजाति / जनसंख्या

  • भारतीय संविधान अनुसूचित जनजाति को परिभाषित नही करता। संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के अनुसार, अनुसूचित जनजाति उन समुदायों को कहा गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित किए गए हो।

  • भारत में जनजातियों के निर्धारण के लिए उनके सांस्कृतिक विशेषीकरण और विभिन्न आवास को आधार बनाया जाता है।

  • जनजातीय क्षेत्रों के अनुसार, देश को सात हिस्सों में बांटा गया है-

  1. उत्तरी क्षेत्र

  2. पूर्वोत्तर क्षेत्र

  3. पूर्वी क्षेत्र

  4. मध्य क्षेत्र

  5. पश्चिमी क्षेत्र

  6. दक्षिणी क्षेत्र

  7. द्वीपीय क्षेत्र

  • भारत की में कुल जनसंख्या का 8.6% जनजातियाँ पाई जाती हैं। इनकी सर्वाधिक जनसंख्या मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़िशा में पाई जाती है।

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब, हरियाणा, चंड़ीगढ़, दिल्ली तथा पुडुचेरी में जनजातीय समुदाय नही पाए जाते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत का सबसे बड़ा जनजातीय समूह भील है, इसकी जनसंख्या 17071049 है। गोंड जनजातीय समूह जनसंख्या (13256928) की दृष्टि से दूसरा बड़ा जनजातीय समूह है। इसी प्रकार तीसरे एवं चौथे नंबर पर क्रमशः संथाल (6570807) तथा नैकदा (3787639) जनजातीय समूह हैं।

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भारत की प्रमुख जनजातियां-

थारुः

  • थारु जनजाति उत्तराखंड के नैनीताल जिले से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के तराई क्षेत्र में निवास करती है। ये हिंदू धर्म मानते हैं।

  • थारु जनजाति दीपावली को शोक पर्व के रुप मे मनाते हैं। इनमें संयुक्त परिवार की प्रथा है। थारु किरात वंश के माने जाते हैं। थारु जनजाति उत्तराखंड की सबसे बड़ी जनजाति है।

भोटियाः

  • यह जनजाति उत्तराखंड की पहाड़ियों मे एवं उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में निवास करती है। भोटिया मंगोल प्रजाति के होते हैं।

  • भोटिया जनजाति ऋतु प्रवास करती है।

  • भुटिया जनजाति सिक्किम, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा में पाई जाती है। यह भी ऋतु प्रवास करती है।

जौनसारीः

  • जौनसारी उत्तराखंड में स्थायी निवास करने वाली कृषक-जनजाति है। इनमें बहुपति विवाह प्रथा पाई जाती है।

बुक्साः

  • यह जनजाति उत्तराखंड के नैनीताल, पौड़ी एवं गढ़वाल जिलों में मुख्य रुप से तथा उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में पाई जाती है। इन जनजातियों में अनुलोम व प्रतिलोम विवाह प्रचलित हैं। बुक्सा जनजाति राजपूत वंश से संबधित हैं।

राजीः

  • यह जनजाति उत्तराखंड में पाई जाती है। स्थानीय रुप में इन्हें बनरौत भी कहा जाता है। इनका धर्म हिंदू है। इन जनजातियों में कृषि की झूमिंग प्रथा अति प्रचलित है।

खरवारः

  • खरवार जनजाति उत्तर प्रदेश के देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी एवं सोनभद्र जिलों में निवास करती है। ये स्वभाव से अत्यंत क्रोधी एवं शारीरिक रुप में मजबूत होते हैं। यह उत्तर प्रदेश की दूसरी बड़ी जनजाति है।

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गद्दीः

  • यह जनजाति पश्चिमी हिमालय की धौलाधार श्रेणी जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा तथा चंबा आदि जिलों में निवास करती है। धौलाधार श्रेणी में गद्दी जनजाति प्राचीन जनजाति है जिसकी जनसंख्या 1.5 लाख से अधिक है। गद्दी स्वयं को गढ़वा (राजस्थान) शासकों के वंशज मानते हैं।

  • धौलाधार श्रेणी की मुख्य जनजातियों में गद्दी, लद्दाखी, गुज्जर, बकरवाल, लाहोली, बारी आदि प्रमुख हैं।

गोंडः

  • ये गोंडवानालैंड के मूल निवासी हैं जिस कारण इन्हें गोंड कहा जाता है। यह जनजातीय समूह बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित) गुजरात में पाई जाती है। ये लोग मुख्यतः आखेट तथा मछली पर निर्भर हैं।

  • गोंड जनजाति स्थानांतरी कृषि भी करते हैं। गोंड लोक कम वस्त्र पहनते हैं, परंतु स्त्रियों के आभूषण पहनने का बड़ा शौक है। पशुबलि इनकी महत्वपूर्ण प्रथा है। गोंड जनजाति समूह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जनजातीय समूह है।

भीलः

  • भील शब्द की उत्पत्ति तमिल भाषा के बिल्कुवर शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है धनुषकारी।

  • यह प्रोटो ऑस्ट्रेलियाड प्रजाति के हैं। यह जनजाति भारत के गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, कर्नाटक, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना सहित राजस्थान प्रातों में अधिवासित है। भीलों की संस्कृति में धूमर नृत्य का विशेष महत्व है।

संथालः

  • ये जनजाति संथाल परगना क्षेत्र के मूल निवासी हैं। जिस कारण इन्हें संथाल नाम से जाना जाता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, संथाल लोग बिहार, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, झारखंड एवं ओड़िशा में निवास करते है। इनकी शारीरिक रचना द्रविड़ लोगो से मिलती है। इनका मुख्य आहार चावल है.

मुंडाः

  • यह जनजाति झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, त्रिपुरा, ओडिशा, एवं बिहार राज्यों में निवास करती है। मुंडा जनजाति अनेक त्योहार मनाती है, जिसमें भागे, फागु, कर्मा, सरहुल और सोहरई, प्रमुख हैं। सरहुल त्यौहार मार्च-अप्रैल माह के दौरान मनाया जाता है। यह एक तरह के फूलों का त्योहार होता है।

कोरबाः

  • कोरबा जनजाति मुख्यतः झारखंड एवं छत्तीसगढ़ में पाई जाती है। यह जानजाति मुख्यतः जंगली कंद-मूल एवं शिकार पर निर्भर है। कुछ कोरबा कृषक भी हैं।

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कोलः

  • बिहार, झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र मे निवास करने वाली इस जनजाति का प्रमुख व्यवसाय कृषि है।

मंगानियरः

  • राजस्थान के रेगिस्तानों में निवास करने वाली मुस्लिम जनजाति है। यह जनजाति अपनी संगीत परंपरा के लिए विख्यात है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में भी ये काफी संख्या में पाए जाते हैं।

खासीः

  • खासी जनजाति मुख्यतः उत्तरी-पूर्वी राज्यों मेघालय, असम एवं मिजोरम में निवास करती है। यह जनजाति झूमिंग कृषि करती है।

टोडाः

  • यह जनजाति नीलगिरि की पहाड़ियों पर निवास करती है। इन्हें टोड़ी और टुडा के नाम से भी जाना जाता है। इन लोगों का दावा है कि यह आर्यों के वंशज हैं। इनका मुख्य व्यवसाय पशुचारण है। टोडा जनजाति के बहुपति विवाह प्रथा प्रचलित है.

जारवाः

  • भारत की सर्वाधिक आद्य जनजाति जारवा है। यह अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के दक्षिणी अंडमान द्वीप एवं मध्य अंडमान द्वीप पर निवास करती है। इनके आवासीय क्षेत्रों को मानवीय गतिविधियों के लिए निषिध्द घोषित कर दिया गया था।

  • भारत में औंज जनजाति के लोग अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के छोटा अंडमान द्वीप के पश्चिमी हिस्से मे अधिवासित हैं। शोम्पेन, सेंटीनेलीज जनजाति भी अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में पाई जाती है।

  • नागा जनजाति नगालैंड, मणिपुर व अरुणाचल प्रदेश की जनजाति है। नागा जनजाति झूमिंग कृषि करते हैं तथा अधिकांशतः नग्न अवस्था में पाए जाते हैं।

  • झारखंड की अन्य जनजातियों में उरांव, हो, भूमिज, खडिया, सोरिया, बिरहोर, खोंड, खरवार, असुर, बैग आदि प्रमुख हैं। राजस्थान की प्रमुख जनजातियों में भील, मीणा, सहरिया, गरसिया, दमोर, पटेलिया आदि प्रमुख हैं।

  • चांग्या तिब्बतीय प्रजातीय समूह की अर्ध्द – खानाबदोश जाति, जो मुख्यतया जम्मू एवं कश्मीर के जास्कर क्षेत्र में पाई जाती है।

  • मंगोलायड लोग उत्तरी-पूर्वी और दक्षिणी-पूर्वी एशिया में रहते हैं, जो कि अमेरिका के मूल निवासी थे। इस प्रजाति के लोगों का रंग पीला होता है। इनके शरीर पर बालों की कमी होती है और बाल सीधे होते हैं। इनकी प्रमुख विशेषता इनकी अधखुली आंखो का होना है।

  • संथाल जनजाति प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड प्रजाति से संबंधित है।

  • उत्तरी-पूर्वी भारत के पहाड़ी एवं जंगली क्षेत्रों में मंगोलायड प्रजातीय समूह पाया जाता है।

  • द्रविड़ियन प्रजाति मुख्य रुप से भारत के दक्षिणी भाग में संकेन्द्रित हैं। ये द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित हैं। इनमें तमिल, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु और तुलु प्रमुख हैं। द्रविड़ियन प्रजाति के लोग मध्य भारत तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में भी बिखरे हुए हैं।

  • उत्तर-पूर्व क्षेत्र में पाया जाने वाला असम का श्वेतभौं गिबन भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र का मानवाभ कपि है।

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली तथा पुडुचेरी में जनजातीय समुदाय नही की गई है।

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जनजाति       मूल राज्य

थारु          उत्तराखंड

भूटिया        उत्तर प्रदेश

मुंडा          बिहार

कोल          राजस्थान

लिम्बू         सिक्किम

कार्बी          असम

डोंगरिया       ओड़िशा

बोंडा          ओड़िशा

गद्दी         हिमाचल प्रदेश

लेप्चा         सिक्किम

डाफर         गुजरात

चेंचू           आंध्र प्रदेश (नल्लामलाई)

बीरहोर        झारखंड

टोडा           तमिलनाडु

सेंटिनेलीज      अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह

राजी          उत्तराखंड

गारो          मेघालय

मुंडौ          झारखंड

जौनसारी       उत्तराखंड

पहाड़ी कोरबा   जशपुर

मारिया        पातालकोट (छिंदवाड़ा)

सहरिया        ग्वालियर

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  • सरहुल त्यौहार, झारखंड क्षेत्र के उरांव, मुंडा और हो जनजातियों द्वारा मनाया जाता है। यह प्रत्येक वर्ष हिंदू कैलेंडर के प्रथम माह क्षेत्र में मनाया जाता है। सरहुल से तात्पर्य वृक्षों की पूजा से है। यह जनजातियों की प्रकृति से समीपता को प्रकट करता है।

  • संथालों में विवाह को बापला (बुपला) कहा जाता है। बापला कई प्रकार के होते हैं – जैसे सदय बापाला, सेता बापला, गोंग बापला, किंरिंग, बापला आदि। संथालों में वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को दिया जाने वाला वधू-मूल्य पोन कहलाता है। शादियां तोड़ी भी जा सकती हैं। इस मामले में स्त्री-पुरुष दोनों को समान अधिकार प्राप्त हैं। बिटलाहा संथाल समाज में सबसे कठोर सजा है। यह एक प्रकार का सामाजिक बहिष्कार है। संथाल गांव (आतो) क प्रधान मांझी कहलाता है।

  • बोडो जनजाति एक नृजातीय और बहुभाषी समुदाय है, जो भारत के उत्तर-पूर्वी की गारों पहाड़ियों में पाई जाती है।

  • उरांव जनजाति का युवागृह धुमकरिया कहलाता है। उरांव जनजाति में समगोत्रीय विवाह निषिध्द है। उरांव समाज में बाल विवाह की प्रथा नही है। उरांवों में विवाह का सर्वाधिक प्रचलित रुप आयोजित विवाह है। इसमें विवाह प्रस्ताव वर पक्ष के सामने रखा जाता है। इस विवाह में वर पक्ष को वधू-मूल्य देना पड़ता है। उरांव गांव की मुखिया महतो कहलाता है। उरांव की पंचायत को पंचोरा कहा जाता है।

  • जनगणना 2011 के अनुसार, उत्तराखंड मे निवास करने वाली जनजातियों एवं उनकी जनसंख्या –

जनजाति           जनसंख्या

थारु          –    91342

जौनसारी       –    88664

बुक्सा         –    54037

भोटिया        –    39106

राजी          –    690

  • ओणम केरल राज्य का त्यौहार है।

  • सहरिया जनजाति राजस्थान की जनजातियों में से एक है इसका संर्वाधिक बारा जिले में है।

  • भारत में जनजातियों के निर्धारण के लिए उनके सांस्कृतिक विशेषीकरण और विभिन्न आवास को आधार बनाया जाता है।

  • झारखंड की 32 जनजातियों में से आठ जनजातियां आदि जनजाति समूह मे आती हैं। इनमें असुर, बिरहोर, बिराजिया, कोरवा, परहिया (बैगा), साबर, माल पहरिया और सौरिया पहरिया शामिल हैं। झारखंड की कुल जनसंख्या का 27 प्रतिशत भाग जनजातियों का है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, आदिम जनजातियों की जनसंख्या 2.23 लाख है।

  • जरवा जनजाति अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की एक प्रमुख जनजाति है। यह जनजाति दक्षिण एवं मध्य अंडमान द्वीपों के पश्चिमी तटों पर पाई जाती है। इनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा जरवा संरक्षित क्षेत्र का निर्माण किया गया है, जो कि वर्तमान में 1028 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है।

  • कत्था बनाने वाली अनुसूचित जनजाति खैरवार है। चूंकि कत्था को खैर भी कहा जाता है, इसलिए माना जाता है कि इसी के नाम पर इस जनजाति का नाम खैरवार पड़ा।

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भाषाएं

  • भारत में हिंदी सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है।

  • भारत में हिंदी के पश्चात बांग्ला भाषा सर्वाधिक बोली जाती है। बांग्ला विश्व में सातवे नंबर की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। विश्व में इसके बोलने वालों की संख्या 208 मिलियन से अधिक है।

  • भारत की विभिन्न भाषाओं को निम्न समूहों में विभाजित किया जाता है-

  1. यूरोपीय भाषा परिवार से संबंधित भाषाएं – मराठी, संस्कृत, पाली, अंग्रेजी, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, बांग्ला, गुजराती आदि।

  2. द्रविड़ परिवार की भाषाएं – तेलुगू, तमिल, मलयालम, कन्नड़, गोंड, ओरांव, ब्राहुई आदि।

  3. आस्ट्रिक समूह की भाषाएं – खासी, संथाली, मुंडारी तथा भूमिज आदि। यह भारतीय जनजातियों द्वारा बोली जाने वाली भाषा हैं।

  • भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदी के पश्चात सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बांग्ला है।

  • जनगणना 2011 के अनुसार भारत में हिंदी के पश्चात सर्वाधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाने वाली भाषा क्रमशः बंगाली एवं तेलुगू है।

  • भारत की 76.87% जनसंख्या इंडो-आर्यन भाषा समूह से संबंधित है। द्वीतीय क्रम का भाषा समूह द्रविड़ (20.82% जनसंख्या) है।

भाषा परिवार        संबध्द जनसंख्या प्रतिशत (मातृ भाषा के रुप में)

  1. भारत-यूरोपीय

  2. इंडोन आर्यन 87

  3. ईरानी .0022

  4. यूरोपीय .02

  5. द्रविड़ 82

  6. आस्ट्रो-एशियाई 11

  7. तिब्बती-बर्मी 00

  8. सेमिटो-हैमिटिक 01

  9. अन्य 17

कुल             100%

  • 20 फरवरी, 2014 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने ओड़िया भाषा को शास्त्रीय भाषा के तौर पर वर्गीकृत करने को स्वीकृति प्रदान कर दी। अब तक तमिल को वर्ष 2004, में संस्कृत को वर्ष 2005 में तेलुगू तथा कन्नड़ को वर्ष 2008 में तथा मलयालम को वर्ष 2013 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया जा चुका है।

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अपवाह तंत्र

गंगा नदी तंत्र

  • हिमालय की नदियां पूर्ववर्ती अपवाह की उदाहरण हैं। ये हिमालय के उत्थान क्रम में निरंतर अपरदन कार्य करती रहती हैं। अतः इनके द्वारा गार्ज, महाखड्ड आदि का निर्माण किया जाता है। इस प्रकार की नदिया सिंधु, सतलज, गंगा और ब्रह्मपुत्र हैं।

  • गंगा भारत की सबसे लंबी (2525 किमी.) नदी है। इसका उद्गम गंगोत्री हिमानी के गोमुख से होता है। टिहरी में इसमें भिलांगना और देव प्रयाग में अलकनंदा नदी आकर मिलती है।

  • भागीरथी और अलकनंदा का संयुक्त रुप ही गंगा कहलाता है।

  • गंगा हरिद्वार में मैदानी भागों में प्रवेश करती है। गंगा झारखंड की सीमा पर स्थित राजमहल की पहाड़ी के उत्तर की ओर प्रवाहित होती हुई पश्चिम बंगाल के फरक्का नामक स्थान पर यह बांग्लादेश में प्रवेश करती है। यहां इसे पद्मा के नाम से जाना जाता है.

  • बांग्लादेश में यह ब्रह्मपुत्र (जमुना) से मिलने के बाद संयुक्त धारा के रुप में आगे चलकर मेघना में मिल जाती है एवं मेघना के नाम से ही बंगाल की खाड़ी में अपने जल का त्याग करती है और अपने मुहाने पर विश्व के सबसे  बड़े  डेल्टा का निर्माण करती है।

  • गंगा-ब्रह्मपुत्र का यह डेल्टा हुगली और मेघना नदियों के बीच बनता है।

  • अलकनंदा नदी चमेली, टिहरी और पौढ़ी गढ़वाल जिले से होकर बहती है। चमोली जिले की नगर पंचायत बद्रीनाथ अलकनंदा के तट पर अवस्थित है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित 4 पीठों में से एक बद्रीनाथ में स्थापित है।

  • केदारनाथ से रुद्रप्रयाग की ओर बहने वाली नदी मंदाकिनी है। यह चोराबाड़ी ताल से निकलती है तथा सोन प्रयाग में कालीगंगा से मिलती हुई आगे बढ़ती है। अतः केदारनाथ से रुद्रप्रयाग के मध्य प्रवाहित होने वाली नदी मंदाकिनी है।

  • रुद्रप्रयाग में मंदाकिनी, अलकनंदा से मिलती है।

  • केदारनाथ, मंदाकिनी नदी के तट पर अवस्थित है।

  • कर्ण प्रयाग में अलकनंदा नदी से पिंडर नदी मिलती है।

  • अकलनंदा, शिवलिंग शिखर के उत्तर-पूर्वी भाग में अलकापुरी स्थित संतोपंथ शिखर में हिमनद से निकलती है।

  • हिमालय से निकलने वाली बहुत-सी नदियां आकर गंगा में मिलती हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख नदिया हैं

  • रामगंगा, शारदा (सरयू), घाघरा, गंडक, कोसी, यमुना।

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  • यमुना नदी हिमालय के यमुनोत्री हिमानी से निकलती है। यह गंगा के दाहिने किनारे के समानांतर बहती है तथा इलाहाबाद में गंगा में मिल जाती है।

  • शारबाद नदी नेपाल हिमालय में मिलाम हिमानी से निकलती है। प्रारंभ में इसे गौरी  गंगा कहते हैं। भारत-नेपाल सीमा पर इसे काली नदी कहते हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में यह घाघरा से मिलती है।

  • कोसी नदी नेपाल हिमालय से निकलकर गंगा नदी में मिल जाती है। प्रायः मार्ग बदलने की प्राकृति के कारण इनमें भीषण बाढ़ आती है। इसी कारण इसे बिहार का शोक कहा जाता है।

  • गंडक नदी नेपाल हिमालय से निकलकर पटना के निकट सोनपुर में गंगा से मिल जाती है। त्रिवेणी नहर (Triveni Canal) में गंडक नदी से पानी आता है। यह पश्चिमी चंपारन जिले में स्थित है।

  • रामगंगा नदी का उद्गम उत्तराखंड राज्य के पौढ़ी गढ़वाल स्थित दूधाटोली श्रेणी से होता है। यमुना नदी यमुनोत्री हिमनद के बंदरपूंछ चोटी के पास उद्गमित हुई है इसकी प्रमुख महायक नदियां चंबल, बेतवा, केन हैं।

  • अमरकंटक के पठार से निकलने वाली सोन, गंगा के दक्षिणी तट (दाहिने तट) की मुख्य सहायिका है, जो पठार के किनारे पर जल-प्रपातों की एक श्रृंखला बनाती हुई उत्तर दिशा की ओर बहती है तथा पटना के निकट गंगा में मिल जाती है।

  • दामोदर नदी झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र से निकलकर हुगली नदी के समुद्र में गिरने के पूर्व उससे मिलती है। दामोदर नदी में अचानक बाढ़ आ जाने के कारण इसे बंगाल का अभिशाप कहा जाता है।

  • चंबल नदी मध्य प्रदेश के महू के निकट से निकलती है। यह पहले उत्तर दिशा में प्रवाहित होकर कोटा (राजस्थान) के निकट गार्ज का निर्माण करती है। यह नदी राजस्थान के सवाई माधोपुर और धौलपुर से होती हुई अंत में यमुना से मिल जाती है।

  • गोमती नदी का उद्गम क्षेत्र गोमतताल (फुल्हर झील) जिला पीलीभीत उत्तर प्रदेश में है। यह गंगा नदी की एक मात्र सहायक नदी है, जिसका उद्गम मैदान में है।

  • गंगा नदी पूर्ववर्ती अपवाह का उदाहरण है।

  • गंगा हरिद्वार में मैदानी भागों में प्रवेश करती है। झारखंड की सीमा पर स्थित राजमहल की पहाड़ी के उत्तर की ओर प्रवाहित होती हुई  पश्चिम बंगाल के फरक्का नामक स्थान पर यह बांग्लादेश मे प्रवेश करती है।  यहां इसे पद्मा नाम से जाना जाता है।

  • सुंदरबन डेल्टा भारत तथा बांग्लादेश में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा है। इसका निर्माण गंगा, ब्रह्मपुत्र तथा मेघना नदियों द्वारा हुआ है। इसका लगभग दो-तिहाई भाग बांग्लादेश में तथा शेष भाग भारत में आता है।

  • यह सही है कि गंगा विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से एक है लेकिन इसका कारण उसकी पवित्रता नही है। गंगा के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण शहरों का अशोधित प्रदूषण गंगा नदी में मिलाया जाना है।

  • ओल्डहम के अनुसार, गंगा के जलोढ़ निक्षेपों की मोटाई 4000-6000 मीटर तथा ग्लेनी के अनुसार 2000 मीटर है।

  • पूर्वी धौलीगंगा नदी काली नदी की सहायक नदी है। काली नदी लिपुलेख दर्रे के पास कालापानी से निकलती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में गोरी, कुथुजंगती, सरजू, लोहावती, लधिया आदि हैं।

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  • भारत की नदियों की लंबाईयां –

गंगा नदी  –    2525 किमी.

गोदावरी   –    1465 किमी.

नर्मदा नदी –    1312 किमी.

महानदी   –    858 किमी.

  • भागीरथी, गंगोत्री से 19 किमी. दूर शिवलिंग शिखर के नीचे गंगोत्री हिमनद के गोमुख से निकलती है।

  • यमुना नदी और सोन नदी के मध्य जलद्वीभाजक का कार्य कैमूर श्रेणी करती है। सोन नदी प्रायद्वीपीय भारत में आने वाली गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी है। कैमूर श्रेणी सोन नदी के उत्तर-पश्चिम सीमा का निर्धारण करती है। यह पटना के निकट गंगा से मिलती है।

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ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

  • तिब्बत से निकलने वाली यरलूंग जंगबो नदी को भारत में ब्रह्मपुत्र नदी के नाम से जाना जाता है। यह पश्चिमी तिब्बत के आंग्सी ग्लेशियर से निकलती है। यह हिमालय के समानांतर पूर्व की ओर बहती है।

  • नामचा बरवा शिखर के पास पहुंचकर यह अंग्रेजी के यू (U) अक्षर जैसा मोड़ बनाकर भारत के अरुणाचल प्रदेश में दिहांग नाम से प्रवेश करती है, आगे असम प्रदेश में इसे ब्रह्मपुत्र नाम से जानते हैं।

  • बांग्लादेश में इसे जमुना नदी के नाम से संबोधित किया जाता है।

  • ब्रह्मपुत्र, सतलज और सिंधु नदियों का स्रोत तिब्बत के मानसरोवर झील के पास ही स्थित है।

  • तिब्बत में उत्पत्ति पाने वाली ब्रह्मपुत्र, इरावदी और मेकांग नदियां अपने ऊपरी पाटों में संकीर्ण और समानांतर पर्वत श्रेणियों से होकर प्रवाहित होती हैं।

  • ब्रह्मपुत्र को तिब्बत में सांग्पों या सांपू के नाम से जाना जाता है।

  • ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियां – जयमोली, तिस्ता, कामेग, सुबनसिरी, धनसिरी, दिहांग, दिसांग, संकोश और लोहित हैं।

  • लोहित नदी, पूर्वी तिब्बत की जयाल चू पर्वत श्रेणी से निकलती है। यह नदी अरुणाचल प्रदेश तथा असम में बहती है।

  • सुबनसिरी नदी का उद्भव हिमालय क्षेत्र से होता है, यह असम, अरुणाचल प्रदेश तथा तिब्बत क्षेत्र (चीन) में बहती है।

  • बराक नदी, मणिपुर पहाड़ी से निकलकर मिजोरम तथा असम से बहती हुई बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है।

  • असम घाटी में ब्रह्मपुत्र नदी गुंफिल जलमार्ग बनाती है। जिसमें कुछ बड़े नदी द्वीप भी मिलते है। इनमें विश्व का सबसे बड़ा नदीय द्वीपीय तंत्र माजुली शामिल है।

  • तिब्बत पठार, जिसे चेंग तांग और क्वाघाई-तिब्बत पठार के नाम से भी जाना जाता है। समुद्र तल से औसतन 4500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे विश्व का छत (The roof of the world) भी कहा जाता है। 2.5 मिलियन वर्ग किमी. क्षेत्रफल वाले इस पठार से निकलने वाली नदियां इस प्रकार हैं –

  1. यांग्त्जी नदी (चेंग जियांग)

  2. ह्वांग हो (पीत नदी)

  3. सिंधु नदी

  4. सतलज नदी

  5. ब्रह्मपुत्र नदी

  6. मेकांग नदी

  7. सालवनी नदी

  • तिब्बत में उत्पत्ति पाने वाली ब्रह्मपुत्र, इरावदी और मैकांग नदियां अपने ऊपरी पाटों में संकीर्ण और समानांतर पर्वत श्रेणियों से होकर प्रवाहित होती हैं। ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश से पूर्व एक यू-टर्न लेती हैं, यह यू-टर्न भू-वैज्ञानिक तरुण हिमालय के अक्षसंघीय नमन के कारण है।

  • मानस नदी ब्रह्मपुत्र नदी की सहायक नदी है।

  • दिबांग

  • अरुणाचल प्रदेश के लोअर दिबांग घाटी जिले में प्रवाहित होती है। यह ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदी है।

  • कमेंग

  • अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिलें पूर्वी हिमालय पहाड़ियों से उद्गामित यह नदी अरुणाचल प्रदेश में कमेंग नाम से तथा असम में जिया भारेली नाम से जानी जाती है। यह भी ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है।

  • लोहित

  • पूर्वी तिब्बत में जयाल चू (Zayal chu) पर्वत श्रेणी से उद्गमित यह नदी ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी है। उग्र एवं अनियंत्रित यह नदी खून की नदी के नाम से जानी  जाती है।

  • तीस्ता नदी का उद्गम सिक्किम स्थित चोलामू झील से होता है, जो लगभग सात हजार मीटर की अधिक ऊंचाई पर स्थित है। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल पश्चिमी तिब्बत में आंग्सी हिमनद है। रंगीत नदी का उद्गम सिक्किम के रथोंग हिमनद से हुआ है। यह तीस्ता नदी की एक सहायक नदी है।

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दक्षिण भारत की नदियां

  • दक्षिण (प्रायद्वीपीय) भारत मे मुख्य जल विभाजक का निर्माण पश्चिमी घाट द्वारा होत है, जो पश्चिमी तट के निकट उत्तर से दक्षिण की ओर स्थित है।

  • प्रायद्वीपीय भाक की अधिकतर नदियां जैसे – महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी पूर्व की ओर बहती है तथा बंगाल की खाड़ी में गिरती है। ये नदियां अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करती हैं।

  • प्रायद्वीपीय भारत में नर्मदा, ताप्ती एवं माही मुख्य नदियां हैं, जो कि पश्चिम की ओर बहती हैं और ज्वारनद मुख का निर्माण करती हैं।

  • नर्मदा नदी का उद्गम मैकाल पर्वत की अमरकंटक चोटी से है। अरब सागर में गिरने वाली प्रायद्वीपीय भारत की यह सबसे बड़ी नदी है। इसके उत्तर में विंध्याचल और दक्षिण में सतपुड़ा पर्वत हैं। इन दोनों पर्वतों के बीच एक भ्रंश घाटी है जिससे होकर नर्मदा बहती है।

  • नर्मदा नदी का पश्चिम की ओर बहाव का कारण भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होना है।

  • नर्मदा नदी की लंबाई 1312 किमी. एवं नदी का जल ग्रहण क्षेत्र 98796 वर्ग किमी. है।

  • भ्रंश घाटी में प्रवाहित होने के कारण नर्मदा नदी अपने मुहाने पर एश्चुअरी का निर्माण करती है।

  • जबलपुर के निकट संगमरमर शैलों में नर्मदा नदी गहरे गार्ज से बहती है। यहां यह नदी तीव्र ढाल से गिरती है, वहां धुंआधार प्रपात का निर्माण करती है।

  • ताप्ती नदी मध्य प्रदेश के बैतुल जिले के मुल्ताई के निकट सतपुड़ा पहाड़ियों से निकलती है। इसकी लंबाई लगभग 724 किमी. और अपवाह क्षेत्र 65145 किमी. है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात से प्रवाहित होती हुई यह नदी अरब सागर से ज्वारनद मुख का निर्माण करती है।

  • गोदावरी प्रायद्वीपीय भारत की बसे लंबी (1465 किमी.) नदी है। यह नदी महाराष्ट्र में मुंबई के निकट नासिक के त्र्यम्बकेश्वर से निकलती है और दक्षिण-माध्य भारत को पार कर दक्षिण-पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी से मिल जाती है।

  • प्रायद्वीपीय नदियों में गोदावरी का अपवाह तंत्र सबसे बड़ा है। इसकी द्रोणी महाराष्ट्र (नदी द्रोणी का 50 प्रतिशत भाग), तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक तथा पुडुचेरी (यनम) में स्थि है।

  • गोदावरी में अनेक सहायक नदियां मिलती हैं जैसे – पूर्णा, वर्धा, प्राणहिता, मंजीरा तथा बेनगंगा।

  • गोदावरी नदी को बड़े आकार और विस्तार के कारण दक्षिण गंगा एवं वृध्द गंगा के नाम से भी जाना जाता है।

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  • कृष्णा नदी महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट में महाबलेश्वर से निकलकर 1400 किमी. प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

  • तुंगभद्र, कोयना, घाटप्रभा, मुसी तथा भीमा इसकी मुख्य सहायक नदियां हैं। इसकी द्रोणी (Basin) महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश मे फैली है (कृष्णा नदी जल विवाद आंध्र प्रदेश, कर्नाटक ओर महाराष्ट्र के मध्य वर्ष 1957 से चला आ रहा है। इसके निपटारे के लिए कई समितियों के अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों आर.एस. बहावत एवं बृजेश कुमार की अध्यक्षता में कृष्णा नदी जल विवाद पर दो भिन्न न्यायाधिकरणों का गठन किया जा चुका है।

  • महानदी मध्य पूर्व भारत की नदी है, जो छत्तीसगढ़ मे सिहावा पहाड़ी (धमतरी जिला) से निकलकर पूर्व की ओर बहती है।

  • 858 किमी. लंबी यह छत्तीसगढ़ एवं ओड़िशा में प्रवाहित होती हुई पारादीप के पास बंगाल की खाड़ी से डेल्टा का निर्माण करती है।

  • कावेरी नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले में ब्रह्मगिरी की पहाड़ियों से निकलकर 805 किमी. लंबाई तथा 87900 वर्ग किमी. अपवाह क्षेत्र में प्रवाहित होती है। यह तिरुचिरापल्ली के निकट बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसका अपवाह क्षेत्र केरल, कर्नाटक तमिलनाडु तथा संघ शासित क्षेत्र पुडुचेरी में विस्तृत है। पहाड़ी से नीचे उतरने के पश्चात कावेरी नदी दक्कन पठार मे प्रवाहित होती है जहां यह श्री रंगपट्टनम शिव-समुद्रम एवं श्रीरंगम द्वीपों का निर्माण करती है। कावेरी नदी की प्रमुख सहायक नदियां – अमरावती, भवानी, हेमावती तथा काबिनि है।

  • भारत में आयतन की दृष्टि से सबसे बड़ा जल प्रपात, कावेरी नदी बनाती है। इसे शिव समुद्रम के नाम से जाना जाता है। प्रपात द्वारा उत्पादित विद्युत मैसूर, बंगलुरु तथ कोलार स्वर्ण क्षेत्र को प्रदान की जाती है।

  • एश्चुअरी जल की ऐसी अर्ध्दसंलग्न तटीय स्थलाकृति है जहां नदियों द्वारा बहाकर लाए गए मलबे बहकर समुद्र में चले जाते हैं। इस प्रकार के समुद्र तथा नदियों के मिलान बिंदु को एश्चुअरी (ज्वारनदमुख) कहते हैं।

  • विश्व की सबसे बड़ी एश्चुअरी सेंट लारेंस नदी की है.

  • प्रायद्वीपीय भारत की प्रमुख नदियों का उद्गम पश्चिमी घाट से ही होता है। पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली नदियां लंबे मार्ग का अनुसरण करती हैं तथा डेल्टा निर्माण भी करती हैं। पश्चिमी घाट से निकलकर पश्चिम की ओर प्रवाहित होने वाली नदियां कठोर चट्टानों से होकर प्रवाहित होती हैं तथा छोटे मार्ग का अनुसरण करती हैं, ये नदियां इसी कारण डेल्टा निर्माण नहीं कर पाती हैं।

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  • प्रायद्वीपीय भारत की सभी नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, परंतु नर्मदा तथा तापी (या ताप्ती) नदियां अरब सागर में गिरती हैं। इसका प्रमुख कारण है कि ये नदियां पठार के ढाल का अनुसरण ने करके भ्रंश से प्रवाहित होती है।

  • नर्मदा नदी का पश्चिम की ओर बहाव का कारण भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होना है। भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होना है। नर्मदा नदी विंध्य और सतपुड़ा के बीच बहती है। मध्य भारत में भूमि का ढलान पूर्व की ओर है।

  • नर्मदा नदी अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण नहीं करती हैं। इसका प्रमुख कारण है कि वह भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती हैं, भ्रंश से प्रवाहित होने के कारण उसमें गाद का अभाव रहता है।

  • 16 सितंबर, 2015 को गोदावरी तथा कृष्णा नदियों को जोड़ने का कार्य पूरा हुआ। नदी  जोड़ों परियोजना के तहत प्रायद्वीप भारत की नदियों से 16 लिंक तथा हिमालयी नदियों से 14 लिंक निर्मित किए जाने प्रस्तावित हैं।

  • प्रायद्वीपीय भारत में पूर्व में बहने वाली नदियों का उत्तर से दक्षिण की ओर क्रम – सुवर्ण रेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार, कावेरी और वेंगई। भारत का अपवाह मानचित्र देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि सुवर्ण रेखा नदी सबसे उत्तरी भाग की ओर वेंगई सबसे दक्षिण भाग में प्रवाहित हो रही है।

  • कावेरी नदी – भारत की ऐतिहासिक नदियों में एक है जिसे हिंदू पवित्र मानते हैं। इसकी उत्पत्ति कर्नाटक की पश्चिमी घाट श्रेणियों में ब्रह्मगिरि पहाड़ी से होती है, जो कोडगू जिले मे स्थित है.

  • सोन नदी, नर्मदा नदी और महानदी तीनों का उद्गम अमरकंटक पठार से होता है.

  • तेल नदी, महानदी की प्रमुख सहायक नदी है। यह नदी मात्र 8 किमी. तक प्रवाहित होती है। यह ओड़िशा राज्य की प्रमुख नदी है। महानदी की अन्य सहायक नदियों में शिवनाथ, जोंक, हंसदों, ईब, मांड आदि हैं।

  • साबरमती तथा ताप्ती नदी के घाटों पर जल की कमी रहती है।

  • केरल में पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली नदियां पामबार, भवानी और कबानी हैं। मध्य प्रदेश मे नर्मदा, ताप्ती और माही पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती हैं और अरब सागर में गिरती हैं।

  • नर्मदा नदी का जलग्रहण क्षेत्र 98796 वर्ग किमी., महानदी का 141600 वर्ग किमी., गोदावरी का 312813 वर्ग किमी., तथा कृष्णा का 258948 वर्ग किमी. है।

  • कृष्णा नदी की लंबाई 1290 किमी. है।

  • गोदावरी नदी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी है। इसकी कुल लंबाई 1465 किमी. इसकी सहायक नदियों में प्रणहिता, वर्धा, बानगंगा, मानेर, इंद्रावती, सबरी, मंजिरा, पूर्णा, प्रवरा, मुला, दूधना, आदि हैं। पेन्नार (597 किमी.) और वंशधारा (254 किमी.) नदियां भी प्रायद्वीपी भारत की नदियां हैं.

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अन्य नदियां

  • सतलज नदी का उद्गम तिब्बत में कैलाश पर्वत एवं मानसरोवर झील के निकट स्थित राकसताल (Rakas Lake) झील है। यह उत्तर-पश्चिमी दिशा में बहते हुए शिपकी दर्रे के पास हिमाचल प्रदेश राज्य में प्रवेश करती है। यह हिमालय की श्रेणियों को काटकर गहरे गार्ज का निर्माण करती है। आगे चलकर यह व्यास नदी मे मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 1500 किमी. है।

  • सोन नदी की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के शहड़ोल जिले में अमरकंटक के पास से हुई है। सोन नदी मध्य प्रदेश में उद्गमित होकर उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार से प्रवाहित होते हुए पटना के समीप गंगा नदी में मिल जाती है। सोन की प्रमुख सहायक नदी रिहंद और उत्तरी कोयल है।

  • कोसी नदी पूर्वी नेपाल में गोसाईथान से निकलती है। कोसी की लंबाई 720 किमी. है। भागलपुर (बिहार) के समीप यह गंगा में मिल जाती है। कोसी नदी की सात धाराएं हैं जिनमें अरुणा प्रमुख है। यह नदी अपना मार्ग परिवर्तित करने तथा आकस्मिक बाढ़ लाने के लिए प्रसिध्द है। इसलिए इसे बिहार का शोक कहते हैं।

  • दामोदर नदी का उद्गम छोटानागपुर पठार से होता है। यह नदी भ्रंश घाटी से होकर बहती है। इसकी सहायक नदियां बराकर, जमुनिया एवं बरकी आदि हैं। दामोदर नदी रुप नारायण नदी के जल को संग्रह करती हुई कोलकाता के 48 किमी. दक्षिण में हुगली में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई 541 किमी. है। एडन नहर वर्ष 1938 में दामोदर नदी से निकाली गई है। गिरिडीह एवं दुर्गापुर के बीच 300 किमी. लंबे मार्ग में यह जैविक मरुस्थल बन गई है।

  • हंगरी नदी पश्चिमी घाट से निकलकर, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से प्रवाहित होते हुए तुंगभद्रा नदी में मिल जाती है। इसे वेदावथी नदी के नाम से भी जाना जाता है। वेदा और अवथी नदियां सह्याद्रि से उद्गमित होकर पुरा के पास मिलकर वेदावथी कहलाती है।

  • झेलम नदी हिमालय पर्वत श्रृंखला में पीर पंजाल पर्वत पर स्थित वेरीनाग झरने से निकलती है। यह नदी उत्तर-पश्चिम दिशा में बहती हुई वूलर झील में मिलती है। श्रीनगर शहर झेलम नदी के किनारे बसा है। झेलम और रावी पाकिस्तान में झंग के निकट चिनाब नदी में मिल जाती है। झेलम की सहायक नदी किशनगंगा है, जिसे पाकिस्तान में नीलम कहा जाता है.

  • लूनी नदी अजमेर के दक्षिण-पश्चिम में अरावली श्रेणी से निकलती है। 320 किमी. तक प्रवाहित होने के पश्चात यह कच्छ का रन के दलदली क्षेत्र में विलुप्त हो जाती है। इसका संपर्क समुद्र से नही हो पाता है।

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  • श्योक नदी को काराकोरम क्षेत्र में मृत्यु की नदी के नाम से जाना जाता है। ऐसे साक्ष्य हैं कि प्राचीनकाल में मध्य एशिया के यारकंड से लद्दाख के बीच व्यापार इसी नदी से होता था।

  • जस्कर नदी जस्कर श्रेणी में गहरे गार्ज का निर्माण करते हुए कठोर चट्टानी भागों से होकर बहती है। यह पहले उत्तर फिर पूर्व की ओर बहते हुए अंततः नेमू (Nemu) में सिंधु नदी से मिल जाती है। इसकी उत्पत्ति हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर की सीमा पर सरचू के उच्च हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर की सीमा पर सरचू के उच्च अक्षांशीय पठारी भाग से होती है। जास्कर नदी की कुल लंबाई 150 किमी. है।

  • स्पिती नदी 16000 फीट ऊंचे कुंजुम दर्रे से निकलती है। 60 मील बहने के पश्चात यह हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में नामगिया गांव के पास सतलज नदी में मिल जाती है।

  • काली नदी पश्चिमी घाटी पर्वतीय क्षेत्र में स्थित उत्तर कन्नड़ जिले (कर्नाटक) के डिग्गी गांव से उद्गमित होकर चाप के आकार में पश्चिम की ओर प्रवाहित होकर अरब सागर में मिल जाती है। इस नदी की कुल लंबाई 184 किमी. है।

  • संकोश नदी उत्तरी भूटान से उद्गमित होकर असम और पश्चिम बंगाल के बीच सीमा बनाती हुई असम-बांग्लादेश सीमा के निकट ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है।

  • माही नदी मध्य प्रदेश से उद्गमित होकर खांदू के निकट राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में प्रवेश करती है। यह नदी नरबाली तक बहने के पश्चात् दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर गुजरात से प्रवाहित होती हुई खम्भात की खाड़ी में गिरती है।

  • मीठी नदी मुंबई स्थित विहार झील के अधिप्रवाह से उद्गमित होती है। 2 किमी. के प्रवाह के बाद इसमें पोवई झील का पानी भी अधिप्रवाह के चलते मिल जाता है और यह कुल 18 किमी. की दूरी तय कर माहिम खाड़ी के पास अरब सागर में मिल जाती है।

  • तेल नदी महानदी की एक प्रमुख सहायक नदी है।

  • कपिली (कोपीली) नदी ब्रह्मपुत्र नदी की सहायक नदी है। कामरुप नगर इसी नदी पर अवस्थित है।

  • दूध-गंगा नामक नदियां जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त उत्तराखंड एवं महाराष्ट्र में भी प्रवाहित होती हैं।

  • कृष्णा नदी की प्रमुख सहायक नदियां कोयना, यरला, डीना, वार्णा, पंचगंगा, घाटप्रभा, भीमा तथा तुंगभद्रा हैं। तेल नदी महानदी की एक प्रमुख सहायक नदी है।

  • हगरी नदी पश्चिमी घाट से निकलकर, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से प्रवाहित होकर तुंगभद्रा नदी में मिल जाती है।

  • सोन नदी की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में अमरकंटक के पास से हुई है।

  • व्यास, चेनाब, रावी, सतलज और यमुना हिमाचल प्रदेश से होकर बहने वाली प्रमुख नदियां हैं।

  • दोआब नदियां

बिस्ट दोआब        व्यास तथा सतलज के मध्य

बारी दोआब         रावी तथा व्यास के मध्य

रचना दोआब        रावी तथा चिनाब के मध्य

चाज दोआब         चिनाब तथा झेलम के मध्य

  • एडन नहर वर्ष 1938 में दामोदर नदी से निकाली गई थी। यह 65 किमी. लंबी है और लगभग 10 हजार हेक्टेयर भूमि को सींचती है।

  • दामोदर नदी का उद्गम छोटानागपुर पठार से होता है।

  • रांची से 80 किमी. दूर रामगढ़-चित्रापुर रोड पर स्थित राजरप्पा एक शक्ति-पीठ है। राजरप्पा दामोदर और भैरवी या भेरा नदियों के संगम पर अवस्थित है। यहां स्थित चिन्नमस्तिका मंदिर एक बहुत प्रसिध्द और हिंदू तीर्थ स्थल का एक प्रमुख स्थान है। यह मंदिर बहुत पुराना है और इसका वास्तुशिल्प डिजाइन तांत्रिक महत्व के अन्य मंदिरों के समान है।

  • निम्नावलन के कारण विभ्रंश घाटी के निर्माण का संबंध दामोदर घाटी से है।

  • खारी नदी चंबल की सहायक नदी है, चंबल यमुना की सहायक नदी और यमुना गंगा की सहायक नदी है, जो कि बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

  • संथाल परगना में दुमका के हिजला नामक स्थान पर जनजातीय मेला लगता है। हिजला मयूराक्षी नदी के तट पर अवस्थित है।

  • केन-बेतवा लिंक परियोजना पर मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबू लाल गौर, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन जल संसाधन मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी के मध्य 25 अगस्त, 2005 में समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

  • महात्मा गांधी सेतु बिहार में पटना से हाजीपुर को जोड़ने के लिए गंगा नदी पर 5.575 किमी. लंबा निर्मित नदी पुल है। इसे औपचारिक रुप से मार्च, 1982 में खोला गया था।

 

 

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  • मुख्य नदियां तथा उनकी सहायक नदी

मुख्य नदी          सहायक नदी

गंगा          –    सोन

गोदावरी       –    मंजरा

कृष्णा         –    भीमा

यमुना         –    केन

ब्रह्मपुत्र       –    तिस्ता

झेलम         –    किशनगंगा

  • उद्गम क्षेत्र नदी

ब्रह्मागिरी पहाड़ी     कावेरी

वेरीनाग सोता (झरना) झेलम

महाबलेश्वर         कृष्णा

छोटानागपुर का पठार सुवर्णरेखा

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नदियों के किनारे स्थित नगर

  • भारत के आर्थिक विकास में नदियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नदियां यहां आदि-काल से ही मानव के जीविकोपार्जन का साधन रही हैं। भारत में नदियों के किनारे अनेक नगर बसे हुए हैं।

  • गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है जो उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गोमुख नामक स्थान से निकलती है। उत्तरकाशी (उत्तराखंड) भागीरथी के किनारे स्थित नगर है।

  • देव प्रयाग भागीरथी एवं अलकनंदा के संगम में स्थित है।

  • गंगा नदी के किनारे स्थित प्रमुख नगरों में हरिद्वार (उत्तराखंड), फतेहपुर, कानपुर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश), भागलपुर, पटना (बिहार) आदि हैं।

  • इलाहाबाद नगर गंगा एवं यमुना के संगम पर स्थित है।

  • यमुना नदी के किनारे पर स्थित प्रमुख नगर नई दिल्ली, आगरा, मथुरा, इटावा आदि हैं।

  • लुधियाना (पंजाब), फिरोजपुर (पंजाब) दो शहर सतलज नदी के किनारे पर स्थित हैं, जहां से वर्तमान समय में सतलज नदी 13 किमी. उत्तर से होकर प्रवाहित हो रही है।

  • हैदराबाद शहर कृष्णा की सहायक नदी मूसी के किनारे स्थित है। कृष्णा नदी के तट पर आंध्र प्रदेश का प्रसिध्द नगर विजयवाड़ा स्थित है।

  • नांदेड़, नासिक (महाराष्ट्र) एवं राजमुंद्री (आंध्र प्रदेश) तीनों प्रमुख शहर गोदावरी नदी के तट पर स्थित हैं।

  • कश्मीर में श्री नगर झेलम नदी के तट पर एवं लेह नगर सिंधु नदी के दाएं तट पर अवस्थित है।

  • अहमदाबाद शहर साबरमती (गुजरात) के तट पर अवस्थित है।

  • उत्तर प्रदेश राजधानी लखनऊ गोमती नदी के तट पर स्थित है।

  • ताप्ती नदी का उद्गम बेतुल जिले मध्य प्रदेश के मुल्ताई नामक स्थान से होता है। सूरत (गुजरात) ताप्ती नदी के तट पर स्थित है।

  • जमशेदपुर (झारखंड का औद्योगिक नगर) स्वर्ण रेखा नदी पर स्थित है।

  • जगदलपुर छत्तीसगढ़ राज्य का नगर है, जो इन्द्रावती नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है।

  • जबलपुर नगर (मध्य प्रदेश) नर्मदा नदी के तट पर स्थित है।

  • उज्जैन मध्य प्रदेश का प्राचीनतम नगर है, जो क्षिप्रा नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित है। इस नगर का प्राचीन नाम उज्जयनी था, जो अवन्ति गणराज्य की राजधानी थी। इसे महाकालेश्वर नगरी के नाम से भी जाना जाता है।

  • उत्तर प्रदेश में प्रसिध्द बरेली नगर रामगंगा नदी के किनारे स्थित है।

  • उत्तराखंड राज्य में गौरीकुंड, रामबाड़ा एवं गुप्तकाशी मंदाकिनी नदी के किनारे अवस्थित हैं, जबकि गोविद घाट अकलनंदा नदी के तट पर अवस्थित है।

  • अयोध्या नगर (उत्तर प्रदेश) सरयू नदी के तट पर स्थित है।

  • गोरखपुर नगर (उ.प्र.) राप्ती नदी के किनारे बसा है।

  • ब्रह्मपुत्र नदी पर बसे असम राज्य के प्रमुख नगर गुवाहाटी एवं डिब्रूगढ़ हैं।

  • राजस्थान राज्य का शैक्षिक नगर कोटा चंबल नदी के तट पर अवस्थित है।

  • 2011 की जनगणना के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार गंगा नदी के किनारे बसे संकुलनों (UA) की जनसंख्या इस प्रकार है –

कानपुर (UA)       –         2920067

पटना (UA)          –         2046652

वाराणसी (UA)    –         1435113

इलाहाबाद (UA)   –         1216719

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  • जम्मू एवं कश्मीर राज्य मे स्थित लेह शहर सिंधु नदी के दाएं तट पर अवस्थित है।

  • नगर जिन नदियों के किनारे स्थित हैं –

नगर              नदी

कटक (ओड़िशा)             महानदी

लुधियाना (पंजाब)    सतलज नदी

नासिक (महाराष्ट्र)    गोदावरी नदी

उज्जैन (मध्य प्रदेश)  क्षिप्रा नदी

अहमदाबाद         साबरमती

लखनऊ            गोमती

भुवनेश्वर           महानदी

  • बेतूल (Betul) – यह मध्य प्रदेश का एक जिला है। ताप्ती नदी का उद्गम इसी जिले के मुल्ताई नामक स्थान से होता है।

  • जगदलपुर (Jagdalpur) – छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का एक नगर है जो इन्द्रावती नदी के किनारे पर स्थित है।

  • जबलपुर (Jabalpur) – मध्य प्रदेश का एक जिला है। इस जिले का प्रशासनिक मुख्यालय जबलपुर है। यह नर्मदा नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित है.

  • उज्जैन (Ujjain) – यह प्राचीनतम नगर है। यह क्षिप्रा नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित है।

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प्रपात और झीलें

  • जल प्रपात शब्द से साधारणतया पानी के संकलित रुप से गिरने का बोध होता है। जल प्रपातों की उत्पत्ति प्राकृतिक तथा कृत्रिम दोनों प्रकार की होती है। प्राकृतिक जल प्रपात बहुधा पर्वतीय क्षेंत्रों में होते हैं, क्योंकि वहां भूतल का उतार चढ़ाव अधिक होता है.

  • भारत के अधिकांश जलप्रतात दक्षिण भारत में पाये जाते हैं।

  • वर्ल्ड वाटर फाल्स डाटाबेस के अनुसार चौड़ाई की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा जल प्रपात जोग प्रपात है। यह कर्नाटक में शरावती नदी पर अवस्थित है।

  • भारत में आयतन की दृष्टि से सबसे बड़ा जल प्रपात कावेरी नदी पर स्थित शिवसमुद्रम जल प्रपात है। यह जल प्रपात कर्नाटक राज्य में स्थित है। हुंड्रू प्रपात रांची स 45 किमी. की दूरी पर सुवर्ण रेखा नदी पर स्थित है। इसकी ऊंचाई 98 मी. (322 फीट) है।

  • कपिल धारा जल प्रपात मध्य प्रदेश के नव सृजित जिले अनूपपुर में नर्मदा नदी पर है।

  • चित्रकूट जल प्रपात छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले में जगदलपुर के पास इन्दावती नदी पर अवस्थित है। इसकी ऊंचाई 29 मी. है तथा इसे भारत का नियाग्रा प्रपात के रुप में भी जाना जाता है।

  • दूध सागर जल प्रपात पश्चिमी घाटी मे स्थित है। यह गोवा और कर्नाटक की सीमा पर मांडवी नदी पर स्थित है।

  • धुंआधार जल प्रपात मध्य प्रदेश के जबलपुर में नर्मदा नदी पर स्थित है।

  • पूर्वोत्तर भारत में लैंडसिंग जल प्रपात एवं नोहकालीकई जल प्रपात मेघालय राज्य में स्थित है।

  • कर्नाटक राज्य में स्थित कुंचीकल प्रपात की ऊंचाई कम से कम 400 फीट एवं अधिक से अधिक 800 फीट (लगभग 183 मी.) बताई गई है। इस माप के आधार पर अब यह भारत का सबसे ऊंचा जल प्रपात नही है। पूर्व मे विश्व जल प्रपात डाटाबेस के अनुसार कुंचीकल को भारत का सबसे ऊंचा जल प्रपात माना गया था। तब इसक ऊचाई 455 मी. (1500 फीट) प्रदर्शित थी। इसी प्रकार विश्व जल प्रपात डाटाबेस के नए मापन में बरही पानी जल प्रपात की संशोधित ऊंचाई 217 मी. (पूर्व माप 399 मी.) है। जबकि नोहकालीकई प्रपात की ऊंचाई 335 मी. से बढ़कर 340 मी. है। अतः विश्व जल प्रपात डेटाबेस की वर्तमान स्थिति के अनुसार भारत का सबसे ऊंचा जल प्रपात नोहकालीकई (मेघालय) में है।

  • अनेक आधिकारिक स्त्रोतों में अभी भी भारत का सर्वाधिक ऊंचा जल प्रपात कुंचीकल प्रदर्शित है।

  • जल से भरे हुए प्राकृतिक गर्त को झील कहते हैं। बढ़ती आबादी तथा जल के अभाव में झील लोगो के लिए जल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। भारत में झीलों का विभिन्न उद्गम स्थान है।

  • बेम्बनाद केरल की सबसे बड़ी लैगून है। यह 96 किमी. लंबी तथा 14.48 किमी. चौड़ी है। केरल के कोट्टायम, अलपुझा व एर्नाकुलम जिलों की सीमाओं को वेम्बनाद लैगून स्पर्श करती है।

  • चिल्का लैगून भारत के ओड़िशा राज्य में महानदी के मुहाने पर स्थित खारे पानी की लैगून है।

नोटः किसी बड़े जल निकाय का उथला भाग, जो किसी संकीर्ण स्थलीय पेटी अथवा अवरोध द्वारा अंशतः अथवा पूर्णतः पृथक होता है, लैगून कहा जाता है। स्थलीय भाग मे स्थित विस्तृत गर्त जिसमें  जल भरा रहता है, झील कहलाती  है।

  • ओड़िशा तट को भौगोलिक दृष्टि से उत्तरी सरकार तट कहा जाता है। चिल्का झील की अधिकतम लंबाई 29 किमी. तथा चौड़ाई 132 किमी. है।

  • वूलर झील जम्मू कश्मीर राज्य में स्थित भारत की सबसे बड़ी ताजे पानी की झील है। वूनर झील, झेलम नदी पर निर्मित गोखुर झील का उदाहरण है।

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  • डल झील श्रीनगर (जम्मू व कश्मीर) में स्थित मीठे पानी की झील है।

  • पेरियार झील 55 वर्ग किमी. क्षेत्रफल की एक कृत्रिम झील है। अतः यह लैगून नही है। पेरियार झील पेरियार नदी से जल प्रपात करती है।

  • पुलीकट झील तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश राज्यों की सीमा पर कोरोमण्डल तट पर स्थित बड़ी खारे पानी की लैगून झील है।

  • लोकटक झील, मणिपुर राज्य में स्थित ताजे पानी की झील है। इस झील के केयबुल लाम जाओ नामक राष्ट्रीय पार्क भी है।

  • सांभर झील जयपुर शहर से लगभग 70 किमी. दूर पश्चिम की ओर स्थि है। यह भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। भारत मे खारे पानी की दूसरी बड़ी झील पुलीकट झील है। श्रीहरिकोटा द्वीप पुलीकट झील को बंगाल की खाड़ी से अलग करता है।

  • कोलेरु झील आंध्र प्रदेश में स्थित मीठे पानी की झील है।

  • पुष्कर झील राजस्थान के अजमेर जिले मे स्थित एक कृत्रिम झील है। इस झील का निर्माण 12वीं सदी में हुआ, जब लूनी नदी के नदी शीर्ष पर एक बांध बनाया गया।

  • नक्की झील राजस्थान में स्थित है।

  • रुपकुंड झील को रहस्यमयी झील की संज्ञा भी दी जाती है। यह झील भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक हिम झील है। यह झील यहां पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण चर्चा का विषय बनी।

  • फुल्हर झील से गोमती नदी की उत्पत्ति हुई है। यह पीलीभीत जिले (म.प्र.) के मादों टांडा के पास स्थित है।

  • अष्टामुदी झील केरल राज्य के कोलम जिले में एक लैगून/कयाल है। अष्टमुडी का अर्थ आठ शाखाएं हैं। रामसर समझौते के तहत यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की एक आर्द्र भूमि के रुप में दर्ज है।

  • असम राज्य में स्थित झीलों में चंदुबी झी, चपनामा झील, हाफजांग झील आदि प्रमुख हैं। चपनामा झील नैगांव कस्बे से 33 किमी. की दूरी पर स्थित है। इस झील से ही अद्यार नदी का उद्गम होता है। चेन्नई महानगर की जलापूर्ति इसी झील से होती है।

  • हैदराबाद शहर में हुसैन सागर एवं उस्मान सागर (कृत्रिम) नामक दो झीले हैं।

  • हिमाचल प्रदेश में रेणुका झील (सिरमौर जिला) एवं नाको झील (किन्नौर जिला) स्थित है।

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  • जलप्रपात नदी

दूधसागर           मांडवी (कर्नाटक एवं गोवा की सीमा पर)

डुडुमा             मच्छकुंड (कोरापुट, ओड़िशा)

गोकाक             घाट प्रभा (बेलगाम, कर्नाटक)

जोग               शरावती (कर्नाटक)

शिवसमुद्रम प्रपात    कावेरी

चुलिया प्रपात       चम्बल

जोग प्रपात         शरावती

धुंआधार प्रपात      नर्मदा

  • लोध जल प्रपात, झारखंड के लातेहर जिले में बूढ़ा नदी पर स्थित है। इसे बूढ़ा घाट जल प्रपात भी कहा जाता है। यह झारखंड का प्रमुख जलप्रपात तथा भारत का 21वां सबसे ऊंचा जल प्रपात है। इसकी ऊंचाई 469 फीट है।

  • मध्य प्रदेश में धुआंधार जलप्रपात भेड़ाघाट पर स्थित है। यह जबलपुर जिले में स्थित है। इसकी ऊंचाई लगभग 30 मीटर है। यह प्रपात नर्मदा नदी पर स्थित है।

  • समुद्र से पृथक होकर तटीय क्षेत्रों में निर्मित छिछली खारे पानी की झीलें लैगून झीलें कहलाती हैं।

पेरियार झील – 55 वर्ग किमी. क्षेत्रफल की एक कृत्रिम झील है। पेरियार झील पेरियार नदी से जल प्राप्त करती है।

  • झील प्रदेश

वेम्बनाद       केरल

लोकटक       मणिपुर

डल           जम्मू और कश्मीर

पुलिकट        आंध्र प्रदेश-तमिलनाडु सीमा पर

लोनार झील    महाराष्ट्र

नक्की         राजस्थान

कोलेरू झील    आंध्र प्रदेश

अष्टामुडी      केरल

रुपकुण्ड       उत्तराखंड

सूरजकुण्ड      हरियाणा

हमीरसर झील  गुजरात

अंचार झील    श्रीनगर (जम्मू कश्मीर)

  • असम की झीलों में चन्दुबी झील, चपनाला झील, हाफलांग झील आदि प्रमुख हैं।

  • रुपकुण्ड झील को रहस्यमयी झील की संज्ञा भी दी जाती है। यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक हिम झील है।

  • बर्फ से ढकी घेपन झील हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिला में स्थित है।

  • केरल स्थित लैगून झीलों को कयाल के नाम से संबोधित किया जाता है। यहां कई कयाल (लैगून) पाए जाते हैं, जैसे – पुन्नामाद कयाल, अष्टमुदी कयाल, वेम्बनाद कयाल आदि।

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जलवायु

मानसून

  • मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के मौसिम (Mausim) शब्द से हुई है, जिसका तात्पर्य मौसम (ऋतु) से है। परंपरागत रुप से मानसून का संबंध मौसमी हवाओं मे परिवर्तन से है, जिसके माध्यम से दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में वर्षा होती है।

  • भारत में कुल वर्षा का लगभग (92%) दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होता है। भारत में इसकी सक्रियता जून से सितंबर तक रहती है। दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रारंभ भारत के केरल राज्य से शुरु होता है। भारतीय कृषि का अधिकांश भाग अभी भी वर्षा पर निर्भर है। अतः मानसून का समय पर आना कृषि के लिए अच्छा माना जाता है।

  • भारत एक उपोष्ण मानसूनी जलवायु वाला देश है।

भातीय मानसून की उत्पत्तिः

  • मानसून की प्रारंभिक अवस्था – मानसून की उत्पत्ति का मुख्य कारण में भारत के उत्तरी-पश्चिमी भाग मे तापमान बहुत ऊंचा हो जाता है जिस कारण वहां पर निम्न वायुदाब क्षेत्र विकसित हो जाता है। इसके विपरीत हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठण्डा रहता है और वहां उच्च वायुदाब बना रहता है। इससे अंतः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (Inter-Tropical Convergence-ITCZ) विषुवत रेखा के निकट निम्न वायुदाब वाला क्षेत्र है जहां उत्तरी दक्षिणी गोलार्ध्दों से व्यापारिक पवने आकर मिलती हैं। इस क्षेत्र में वायु ऊपर की ओर उठती है। इसके उत्तर की ओर खिसकने से दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें 400 से 600 पूर्वी देशांतर के बीच भूमध्य रेखा पार करती हैं और दिशा परिवर्तन के बाद ये दक्षिण-पश्चिम मानसून के रुप में भारत में प्रवेश करती हैं।

  • अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) की स्थिति में परिवर्तन का संबंध हिमालय के दक्षिण भाग में पश्चिमी जेट-प्रवाह द्वारा अपनी स्थिति से प्रत्यावर्तन से भी है।

  • पूर्वी जेट-प्रवाह की उत्पत्ति हिमालय तथा तिब्बत के उच्च स्थलों के ग्रीष्म तापन से होती है। इन उच्च स्थलों में हुए विकिरण से क्षोभमंडल मे वायु का दक्षिणा वर्ती परिसंचरण  आरंभ हो जाता और वायु राशि दो दिशाओं में चलने लगती है इन धाराओं में एक भूमध्यरेखा की ओर बहने लगती है जिसे पूर्वी जेट प्रवाह के नाम से जाना जाता है।

  • पश्चिमी जेट प्रवाह ग्रीष्म ऋतु में भी मध्य एशिया के ऊपर बहती है।

  • भारतीय जलवायु पर हिमालय एवं तिब्बत का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।

  • भारत में मानसून पवनों की उत्पत्ति हिमालय एवं मध्य एशिया के ग्रीष्म तापन तथा भूमध्य रेखीय द्रोणी के ऊपर की ओर स्थानान्तरण के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है।

  • मानसूनी वर्षा – मानसूनी वर्षा निरंतर नही होती है। इनके वर्षाकाल में अंतराल पाया जाता है। भारत के उत्तरी मैदान में बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न होने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवात वर्षा करते हैं जबकि पश्चिमी तटीय भाग मे वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून द्वारा होती है। भारत के पश्चिमी तट पर वर्षा की गहनता, समुद्र तट से दूर घटने वाली मौसमी दशाओं तथा पूर्वी अफ्रीका के तट के साथ भूमध्य रेखीय जेट प्रवाह की स्थिति पर निर्भर करती है।

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  • बंगाल की खाड़ी में उठने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या तथा उनका मार्ग अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण की स्थित पर निर्भर करते हैं। इसे मानसून द्रोणी कहते हैं।

  • मानसून में विच्छेद (Break in the Monsoon) – जब मानसून पवनें दो सप्ताह या इससे अधिक अवधि के लिए वर्षा करने में असफल रहती हैं तो वर्षा काल मे शुष्क दौर आ जाता है, इसे मानसून का विच्छेद कहते हैं। मानसून विच्छेद का प्रमुख कारण उष्णकटिबंधीय चक्रवातों मे कमी आना या भारत में अंतः उष्णकटिबंधीय अभीसरण क्षेत्र की स्थित में परिवर्तन आना है।

  • मानसून का प्रत्यावर्तन (The Retreat of the Monsoon) – दक्षिणी-पश्चिमी मानसून भारत के उत्तर-पश्चिम भाग से 1 सितंबर से लौटना शुरु कर देता है और 15 सितंबर तक पश्चिमी उ.प्र., पंजाब, परियाणा, राजस्थान तथा गुजरात के अधिकांश भागो से चला जाता है। मध्य अक्टूबर तक दक्षिण-पश्चिम मानसून दक्षिणी प्रायद्वीप तट लौट जाता है। लौटती हुई पवनें बंगाल की खाड़ी से जल वाष्प ग्रहण कर लेती हैं और उत्तर-पूर्वी मानसून के रुप में तमिलनाडु पहुंचकर वहां पर वर्षा करती हैं.

  • भारत मूलतः मानसूनी देश है। यहां की जलवायु में मानसूनी जलवायु की लगभग सभी विशेषताएं पाई जाती हैं। हिमालय पर्वत भारतीय जलवायु को इस मायने में विशिष्टता प्रदान करता है, क्योंकि यह मानसूनी हवाओं के लिए भौतिक अवरोध उत्पन्न करता है जिसके फलस्वरुप भारत में मानसूनी हवाओं का पूर्णतः प्रसार संभव हो पाता है और मानसून की भरपूर वर्षा हो पाती है। साथ ही यह मध्य एशिया से आने वाली शीत हवाओं को रोककर भारत की पूरी तरह रक्षा भी करता है।

  • भारत एक उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु वाला देश है। भारत उष्ण कटिबंधीय अक्षांशों (23030‘ उत्तरी से 23030‘ दक्षिणी अक्षांशों) के बीचों-बीच अवस्थित नही है बल्कि इसके मुख्य भूमि का विस्तार 804‘ से 3706‘ उत्तरी अक्षांशों के मध्य है)

  • ग्रीष्म ऋतु में भारत में उच्च तापमान के कारण उ.प्र. भारत में निम्न दाब की स्थिति बनती है, जिस कारण दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाएं भारत में प्रवेश करती है।

  • लेह भारत में सबसे कम वर्षा का क्षेत्र है। यह भारत का सबसे शुष्क स्थल है।

  • भारत को उष्णकटिबंध और उपोष्ण कटिबंध में विभाजन करे के आधार के रुप में मानी गई जनवरी की समताप रेखा 180 C है।

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  • भारत में राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में सर्वाधिक दैनिक तापान्तर पाया जाता है। यहां का तापमान असामान्य रुप से दिन की अपेक्षा रात में कम होता है। दैनिक तापान्तर मरुस्थलीय जलवायु की विशेषताओं मे से एक है।

  • अक्टूबर से दिसंबर माह के मध्य दक्षिण भारत मे उत्तर-पूर्व मानसून का मौसम रहता है, जो मुख्य रुप से आंध्र प्रदेश, रॉयलसीमा, तमिलनाडु मे सक्रिय रहता है। यही तमिलनाडु की मुख्य वर्षा वाली अवधि होती है। उल्लेखनीय है कि इसी मानसून के समय 26 दिसंबर, 2004 को तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में सुनामी आई थी।

  • भारतीय मानसून मौसमी विस्थापन वाला है। जिसकी दिशा छः माह तक (जाड़े में) उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा सेष छः मास तक (ग्रीष्म में) दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व रहती है। इन मानसूनी हवाओ की उत्पत्ति तापक्रम में भिन्नता के कारण होती है या अन्य किसी कारण से इस पर पर्याप्त मतभेद हैं। इसके लिए दो संकल्पनाओं का प्रतिपादन किया गया है –

  1. तापीय संकल्पना अर्थात मानसून की उत्पत्ति स्थल एवं जल के असमान संगठन तथा उनके गर्म एवं ठंडा होने के विरोधी स्वभाव के कारण होती है अर्थात इस पर सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायन होने का पर्याप्त प्रभाव है।

  2. नवीन संकल्पना के अनुसार मानसूनी हवाओँ की उत्पत्ति वायुदाब और हवाओं की पेटियों के खिसकाव के कारण होती है। इस संकल्पना का पहली बार प्रतिपादन फ्लोन नामक विद्वान ने किया।

  • दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में मानसून की अवधि कम होती है। दक्षिण भारत में मानसून जून के प्रथम सप्ताह में प्रवेश करता है, जबकि उत्तर भारत में प्रवेश करने मे दक्षिण की अपेक्षा अधिक समय लगता है। इसी प्रकार वापसी मे भी मानसूनी हवाएँ दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत में जल्दी पलायन करती हैं। उत्तर भारत के मैदानों मे वार्षिक वृष्टि-की मात्रा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है।

  • इंडियन ओशन डाइपोल को भारतीय नीनों के नाम से भी जाना जाता है। यह समुद्री सतह के तापमान के अनियमित दोलन का परिणाम है, जिसमें पश्चिमी हिंद महासागर का तापमान प्रकारांतरेण पूर्वी हिंद महासागर की अपेक्षा गर्म एवं ठंडा हो जाता है।

  • अमृतसर (31.640 N) एवं शिमला (31.610 N) लगभग एक ही अक्षांश पर स्थित हैं, परंतु उनकी जलवायु में भिन्नता का कारण उनकी ऊंचाई में भिन्नता का होना है। अमृतसर की समुद्र तल से ऊंचाई 768 फीट है जबकि शिमला की समुद्र तल से ऊंचाई 7866.10 फीट है। क्षोभमंडल में ऊंचाई बढ़ने के साथ ही तापमान में गिरावट आती जाती है।

  • कोच्चि और तेजपुर में अधिक आर्द्र जलवायु का अनुभव होता है क्योंकि यहां वर्षा अधिक होती है। कोच्चि में 3228 मिमी., अहमदाबाद में 800 मिमी., लुधियाना में 730 मिमी., तथा तेजपुर में 1600 मिमी., वर्षा होती है।

  • उत्तरी भाग से जब मानसून लौटने लगता है तो प्रारंभ में तापमान में थोड़ी-सी वृध्दि होती है। मानसून के लौटने के साथ-साथ उत्तर पश्चिम में विस्तृत निम्न दाब का क्षेत्र बंगाल की खाड़ी की ओर बढ़ने लगता है। इस प्रकार आकाश स्वच्छ हो जाता है.

  • सामान्यतः 300-600 के मध्य दोनों गोलार्ध्दों मे पछुआ पवने चलती हैं। उपोष्ण वायुदाब कटिबंध से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंध की ओर चलने वाली पश्चिमी पवनों को पछुवा पवन कहते हैं। पछुआ पहनों का सर्वश्रेष्ठ विकास दक्षिणी गोलार्ध्दों में 400-650 अक्षांश के मध्य होता है जबकि भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में शीतकालीन वर्षा पश्चिमी विक्षोभ के कारण होती है। पश्चिमी विक्षोभ पक्षुआ हवाओं के ही भाग हैं जो जेटस्ट्रीम के सहारे यहां प्रवाहित होते हैं एवं वर्षा करते हैं।

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वर्षा

  • भारत में सामान्य रुप से जून से सितंबर तक वर्षा ऋतु होती है जब संपूर्ण देश पर दक्षिणी-पश्चिमी मानसून प्रभावी होती है। इस समय उत्तर पश्चिमी भारत में ग्रीष्म ऋतु में बना निम्न वायुदाब का क्षेत्र अधिक तीव्र एवं व्यवस्थित होता है। इस निम्न वायुदाब के कारण ही दक्षिण-पूर्वी सन्मार्गी हवाएं, जोकि दक्षिणी गोलार्ध्द में मकर रेखा की ओर से भूमध्य रेखा को पार करती है, भारत की ओर आकृष्ट होती हैं तथा भारतीय प्रायद्वीप से लेकर बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर तक प्रसारित हो जाती है। समुद्री भागों में आने के कारण आर्द्रता से परिपूर्ण ये पवनें अचानक भारतीय परिसंचरण से घिर कर दो शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं तथा प्रायद्वीपीय भारत की ओर तेजी से आगे बढ़ती हैं। दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पवनें जब स्थलीय भागों में प्रवेश करती हैं, तो प्रचण्ड गर्जन एवं तड़ित झंझावत के साथ तीव्रता से घनघोर वर्षा करती हैं। इस प्रकार पवनों के आगमन एवं उनसे होने वाली वर्षा को मानसून का फूटना अथवा टूटना कहा जाता है। इन पवनों की गति 30 किमी. प्रति घंटे से भी अधिक होती है और ये एक महीने की भीतर संपूर्ण देश मे प्रभावी हो जाती है।

  • मौसमी विभाग द्वार प्रस्तुत 2014 के आंकड़ों के अनुसार दक्षिण-पश्चिम मानसून से ही भारत की कुल वर्षा का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्राप्त होता है।

  • वर्षा ऋतु मे देश के अधिकांश भाग में हवाओं की सामान्य प्रवाह दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर होती है। परंतु हिमालय की उपस्थिति के कारण ये उत्तर-पूर्व और गंगा के मैदान में दक्षिण-पूर्व और पूर्व से प्रवाहित होती है।

  • भारत में सितंबर महीने से मानसून का प्रत्यावर्तन शुरु हो जाता है जिसका कारण सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र का दक्षिण की ओर खिसकना है। इस क्रम में उत्तर-पूर्व भारत से चलने वाली मानसून बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता ग्रहण कर तमिलनाडु विशेषतः चेन्नई में वर्षा करती हैं। उत्तर-पूर्वी मानसून में तमिलनाडु के कुल वर्षा का 50-60 प्रतिशत प्राप्त होता है।

  • भारत में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाले क्षेत्र पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय तथा मेघालय हैं। इन क्षेत्रो में 400 सेमी. से अधिक वर्षा होती है।

  • दक्षिण-पश्चिम मानसून से इन क्षेत्रों में सर्वाधिक वर्षा होती है।

  • भारत में मॉसिनराम-1148 सेमी (मेघालय) देश ही नही दुनिया का सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान है।

  • भारत में सबसे कम वर्षा वाला स्थान लेह (जम्मू एवं कश्मीर) है जहां मात्र 9.20 सेमी. वर्षा होती है।

  • आम्र वर्षा कर्नाटक एवं केरल से होने वाली मानसून पूर्व वर्षा फुहार है जो आम की फसल के लिए अधिक लाभकारी होती है। यह वर्षा बंगाल की खाड़ी से उत्पन्न तूफानों के फलस्वरुप अप्रैल माह में होती है। इस वर्षा से आम की बौरे पेड़ से टूटकर गिरती नहीं है। अतः आम की फसल अच्छी होती है।

  • भारत की औसत राष्ट्रीय वर्षा 110 सेमी. है।

  • राज्य दीर्घकालिक औसत वार्षिक वर्षा (मिमी. में)

अरुणाचल प्रदेश      2933.7

केरल              2924.3

सिक्किम           2971.6

जम्मू एवं कश्मीर    1205.3

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  • अजमेर (26027‘ उत्तर) और शिलांग एक ही अक्षांश पर अवस्थित हैं किंतु अजमेर की वार्षिक वर्षा 60.18 सेमी. के स्तर पर है जबकि शिलांग में 143 सेमी. वर्षा होती है।

  • भारतीय मौसम विभग द्वारा प्रदत्त आंकड़ों के अनुसार चेन्नई का औसत तापमान जाड़ों में 240 C तथा गर्मियों में 300 C तक रहता है तथा यहां वर्षा औसतन 60-70 सेमी. के मध्य रहती है। यहां वर्ष भर तापमान का औसत लगभग 260 C रहता है। प्रतिदिन न्यूनतम एवं अधिकतम तापमान का वार्षिक परिसर 8 से 90 C के मध्य रहता है।

  • कुछ भारतीय नगरों में वर्ष 2004 में सामान्य वार्षिक वर्षा इंडियन मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट, दिल्ली के अनुसार –

स्थान         वर्षा (सेमी.)

कोच्चि        250

कोलकाता      150

पटना         100

दिल्ली         50

लेह           9.20 (देश भर में सबसे कम)

बीकानेर       24.30 सेमी.

जैसलमेर       10 सेमी. (राजस्थान राज्य में सबसे कम)

चेरापुंजी       1100 सेमी. (मॉसिनराम-1148 सेमी. से पहले चेरापुंजी देश ही नहीं दुनिया का सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान था)

  • भारत में मरुस्थलीय विकास कार्यक्रम (DDP- Desert Development Programme) राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश राज्यों में वर्ष 1977-78 में प्रारंभ की गई थी। वर्ष 1995-96 में इसमें आंध्र प्रदेश और कर्नाटक को भी सम्मिलित कर लिया गया। वर्तमान में यह कार्यक्रम देश के कुल सात राज्यों के 40 जिलों के 235 ब्लाकों में क्रियान्वित है। जबकि 1994-95 तक यह कार्यक्रम 5 राज्यों के (कर्नाटक और  आ.प्र. को सम्मिलित किए जाने के पहले) 21 जिलों के 231 ब्लाकों में क्रियान्वित किया जा रहा था।

  • भारत में अन्तर्देशीय जल मार्गों का पर्याप्त विकास नही हुआ है तथा भारत के अधिकतर भागों में वर्षा साल के चार महीनों में ही होना इसका मुख्य कारण है। अधिकांश समय तक मौसमी नदियों में परिवहन योग्य जल का अभाव रहता है जिससे अन्तर्देशीय जलमार्गों के विकास में बाधा उत्तन्न हो जाती है।

 

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शीतकालीन वर्षा

  • भारत मे शीतकालीन मानसून पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलने के कारण सामान्यतः वर्षा नही करती हैं। अधिकांश भारत में शीत ऋतु में वर्षा नही होती है। अपवाद स्वरुप कुछ क्षेत्रों में शीत ऋतु में वर्षा होती है जो इस प्रकार है –

  1. पश्चिमी विक्षोभ के कारण उत्तर-पश्चिमी भारत (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में कुछ वर्षा होती है।

  • शीत ऋतु में सूर्य के दक्षिणी गोलार्ध्द में होने के कारण पश्चिमोत्तर भारत में उच्च दाब पर क्षेत्र बन जाता है। पवन प्रवाह उत्तर-पश्चिम भारत से पूर्व की ओर होता है एवं भारत के पूर्वी तटीय भाग में व्यापारिक पवनों के प्रभाव से वर्षा होती है। इस समय मुख्य रुप से भूमध्यसागरीय पश्चिमी विक्षोभों से वर्षा प्राप्त होती है।

  • भारत में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का कारण उपोष्ण पछुआ जेट पवनें हैं। इन चक्रवातों के पूर्व की ओर बढ़ने पर इनमें वर्षा की मात्रा कम होने लगती है। यह अल्प वर्षा भी पंजाब, हरियाणा आदि के गेहूं,  चना सरसों आदि रबी फसलों में सहायक होती है।

  • राजस्थान में इस वर्षा को मावट कहते हैं।

  • हिमालय क्षेत्र में हिम रेखा के ऊपर इनसे हिमपात होता है, जिससे नदियां वर्षावाहिनी बनी रहती है। पश्चिमी विक्षोभों के प्रभाव से उत्तर-पश्चिमी भारत में इस समय अत्यधिक सर्दी का अनुभव होता है। भारत में पश्चिमी विक्षोभों से औसत वार्षिक वर्षा लगभग 3% प्राप्त होता है।

  1. उत्तर-पूर्वी मानसून के कारण अक्टूबर से नवंबर के मध्य तमिलनाडु, दक्षिणी आंध्र प्रदेश, दक्षिणी-पूर्वी कर्नाटक तथ दक्षिणी-पूर्वी केरल में झंझावती वर्षा होती है। उत्तर-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण करती है।

  • भारत के उत्तरी मैदानों मे शीत ऋतु मे होने वाली वर्षा पश्चिमी विक्षोभों द्वारा होती है। ये अतिरिक्त उष्णकटिबंधीय गर्त होते हैं। इनकी उत्पत्ति मुख्यतः भूमध्य सागर एवं अटलांटिक महासागर में होती है जहां से ये आर्द्रता भी ग्रहण करते हैं। उत्तर भारत में पश्चिमी विक्षोभों से होने वाली वर्षा गेहूं की कृषि के लिए अत्यधिक लाभकारी होती है।

  • भारत में शरद ऋतु काल अर्थात अक्टूबर-नवंबर में लौटते मानसून (उत्तरी-पूर्वी मानसून) से तमिलनाडु तट पर 65-75 सेमी. तक वर्षा होती है जो आन्तरिक भागों की तरफ घटती जाती है। इसके अतिरिक्त उत्तर-पश्चिम भारत में भी पश्चिमी विक्षोभ से वर्षा प्राप्त होती है जिनमें पंजाब सम्मिलित है।

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प्राकृतिक आपदाएं

  • मानव पर दुष्प्रभाव डालने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों को प्राकृतिक आपदाएं कहते हैं।

  • ज्वालामुखी विस्फोट, भूकंप, सागरकंप, सूखा, बाढ़, चक्रवात, मृदा, अपरदन, अपवाहन (Deflation), पंक प्रवाह, हिम अवधाव (Snow avalanche) आदि प्राकृतिक आपदाओं के मुख्य उदाहरण हैं। इनमे से अधिकांश आपदाएं प्राकृतिक शक्तियों द्वारा उत्पन्न होती हैं। परंतु मानव के अवांछनीय क्रियाकलापों से इन आपदाओं का दुष्प्रभाव बढ़ जाता है।

  • हिमालय पर्वत नवीन वलित पर्वत है जिसका निर्माण अभी पूरा नही हुआ। इसका कारण यह है कि हिमालय क्षेत्र में अभी भू-संतुलन की स्थिति उत्पन्न नही हुई है। भारतीय प्लेट निरतंर उत्तर की ओर गतिशील है और इस क्षेत्र में प्रायः भूकंप आते रहते हैं। उत्तरी मैदान में अपेक्षाकृत कम शक्ति के भूकंप कम संख्या में आते हैं। दक्षिणी पठार अपेक्षाकृत अधिक स्थिर भू-भाग है फिर भी यहां न्यूनतम भूकंपों ने प्रायद्वीपीय भारत की स्थिरता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (Indian Meteorological Department-IMD) तथा अन्य एजेंसियों द्वारा प्रदत्त आंकड़ों के आधार पर भारतीय मानक ब्यूरों ने भारत का भूकंप प्रतिरोधी डिजाइन कोड (Earthquake Resistant Design Code of India, IS-1893 Part-I: 2002) तैयार किया है जोकि  भारत के भूकंपीय क्षेत्रीकरण मानचित्र (Seismic zoning Map) का नवीनतम संस्करण है। इसमें भारत के भू-क्षेत्र को भूकंप प्रवणता की दृष्टि से 4 क्षेत्रों (Zone) में बांटा गया  है।

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भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zone)                    तीव्रता (Intensity)

II (अल्प तीव्रता क्षेत्र)               Low Damage

III (मध्यम तीव्रता क्षेत्र)             Damage to Building

IV (गहन तीव्रता क्षेत्र)               Destruction of Building

V (अति प्रचंड तीव्रता क्षेत्र)           Very High Damage

  • क्षेत्र (Zone) V – इस क्षेत्र को IS कोड के तहत क्षेत्र कारक (Zone Factor)36 दिया गया है अर्थात इस क्षेत्र में किसी संरचना पर भूकंप के फलस्वरुप गुरुत्वीय त्वरण का 36% तक क्षैतीज त्वरण अनुभूत हो सकता है। यह अत्यधिक उच्च क्षति जोखिम क्षेत्र है। भारत के जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड एवं बिहार राज्यों के कुछ भाग, कच्छ का रन, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र इस क्षेत्र में आते हैं। इसमें देश के कुल भू-क्षेत्र का 10.9 प्रतिशत भाग आता है।

  • क्षेत्र (Zone) IV – इसका क्षेत्र कारक IS कोड के तहत 0.24 है। देश की राजधानी दिल्ली सहित भारतीय-गंगा मैदान क्षेत्र, शेष हिमालय, गुजरात के भाग, महाराष्ट्र का कोयना क्षेत्र एवं सिक्किम इसमे शामिल हैं। देश के कुल भू-क्षेत्र का 17.3% भाग इसमें आते हैं।

  • क्षेत्र (Zone) III – इसका क्षेत्र कारक 0.18 है। लक्षद्वीप, पश्चिमी घाट, एवं प्रायद्वीपीय भारत का भ्रंशित क्षेत्र तथा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित गंगा मैदानों का दक्षिण भाग इसी क्षेत्र में है। यह क्षेत्र भारत के 30.4 प्रतिशत-भू भाग को समाहित करता है।

  • क्षेत्र (Zone) II- इसका क्षेत्र कारक 0.10 है। पूर्व के जो I एवं II को एक में समाहित कर अब जोन II का निर्धारण किया गया है। इसमें भारत का 41.4 प्रतिशत भू-क्षेत्र आता है। प्रायद्वीपीय पठार के अंतर्गत ही है। अतः यह सबसे कम भूकंप प्रभावित मेखला में सम्मिलित है।

  • सुनामी (Tsunami) एक जापानी शब्द है जो tsu (meaning = harbour तथा nami (meaning-wave) से बना है। भारत की High Powerd Committee on Disaster Management की रिपोर्ट (2001) के अनुसार, “सुनामी समुद्र में भूकंप, भू-स्खलन अथवा ज्वालामुखी उद्गार जैसी घटनाओं से पैदा होती हैं।” अधिकांश सुनामी समुद्र अधःस्तल पर आए भूकंपों से पैदा होती है। सुनामी को बंदरगाह लहरें या भूकंपीय समुद्री लहरें भी कहा जाता है। भारत में सुनामी वार्निंग सेंटर का परिचालन जुलाई 2005 से हैदराबाद में किया गया है। 26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर में आए सुनामी द्वारा भारत का कोरोमंडल तट सर्वाधिक प्रभावित हुआ था। कोरोमंडल तट का विस्तार प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी तट पर उत्तर में फाल्स प्वाइंट से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक है।

  • भारतीय मौसम विज्ञान (Indian Meteorological Department) जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है, की स्थापना 1875 ई. में हुई थी और यह पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन एक एजेंसी है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान तथा मौसम विभाग का उपनिदेशक स्तर का कार्यालय पुणें में स्थित है। उल्लेखनीय है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का मुख्यालय सर्वप्रथम कोलकाता में बना जिसे वर्ष 1905 में शिमला, 1928 मे पुणे तथा अंततः वर्ष 1944 में दिल्ली स्थानांतरित किया गया था।

  • किसी नदी या तटीय भाग में उच्च जलस्तर की उस स्थिति को बाढ़ कहते हैं जिससे भूमि का कुछ भाग जलमग्न हो जाता है। मानसून की अनिश्चितता तथा अनियमितता का दूसरा महत्वपूर्ण परिणाम बाढ़ों का आना है। केन्द्रीय जल आयोग ने बाढ़ों की गणना करने के लिए बाढ़ पूर्वानुमान संगठन (Flood For Casting Organisation) की स्थापना की है। वर्तमान में इस संगठन ने देश के 14 बाढ़ प्रभावित राज्यों एवं एक केन्द्रशासित प्रदेश में 166 स्टेशनों को चिन्हित किया है जिनमें सर्वाधिक 35 स्टेशन उत्तर प्रदेश में है। उत्तर प्रदेश बाढ़ प्रवण क्षेत्रों को उच्च बाढ़ प्रवण, मध्यम बाढ़ प्रवण एवं निम्न बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में विभक्त किया जाता है। उच्च बाढ़ प्रवण क्षेत्र मे उत्तर प्रदेश के कुल बाढ़ प्रवण क्षेत्र का 48 प्रतिशत आता है। उच्च प्रवण क्षेत्र उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र को आच्छादित करता है। 14 बाढ़ प्रभावित राज्यों में 32 स्टेशनों के साथ बिहार दूसरे स्थान पर है।

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  • चक्रवाती तूफान अथवा चक्रवात वायुमंडल में हवाओं के चक्राकार वायुपिंड होते हैं। उत्तरी गोलार्ध्द में इनकी दिशा घड़ी की सूईयों के विपरीत एवं दक्षिणी गोलार्ध्द में घड़ी की सुईयों की दिशा में होती है। भारत में चक्रवात बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर दोनों को ही प्रभावित करते हैं। बंगाल की खाड़ी में अधिक ताप के कारण बने निम्न दाब से अधिक चक्रवात उत्पन्न होते हैं। यहां से उठने वाली चक्रवात घड़ी की सूईयों की दिशा में विपरीत घूमते हुए चलते हैं अतः बंगाल की खाड़ी दक्षिण में उत्पन्न होने वाले चक्रवात तमिलनाडु और श्रीलंका को (जनवरी-मार्च) तथा मध्य बंगाल की खाड़ी में उठने वाले चक्रवात आंध्र प्रदेश एवं ओड़िशा को प्रभावित करते हैं। मानसून काल (जून-सितंबर) के मध्य इन चक्रवातों की उत्पत्ति मध्य और उत्तरी बंगाल सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। मानसून पश्चात् (अक्टूबर-दिसंबर) दक्षिण एवं मध्य बंगाल की खाड़ी में उठने वाले चक्रवात तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओड़िशा और बंगाल तट को प्रभावित करते हैं। ओड़िशा चक्रवात, बाढ़ एवं सूखा तीनों ही प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित राज्य है। जिस कारण यह अन्य राज्यो की अपेक्षा अधिक आपदाएं झेलता है। गुरुत्वाकर्षण के प्रभावाधीन चट्टान तथा मिट्टी के अचनाक ढलान से नीचे की ओर खिसकने की क्रिया को भू-स्खलन कहते हैं। हिमालय में भूस्खलन की आवृत्ति में वृध्दि हुई है इसका प्रमुख कारण भूकंपों की आवृत्ति में वृध्दि के साथ-साथ, सड़क एवं बांध बनाने जैसी मानवीय क्रियाकलापों का बढ़ना है। यहाँ सड़क, बांध, निर्माण तथ खनिज के लिए बड़े पैमाने पर खनन कार्य किए गए हैं, जिके कारण हिमालय में भूस्खलन की आवृत्ति में वृध्दि हुई है। भारत में आपदा प्रबंधन हेतु निवारक और संरक्षी उपाय, तैयारी तथा मानवों पर आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए देश के पहले आपदा प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना लातूर (महाराष्ट्र) में की जा रही है।

  • उष्णकटिबंधीय चक्रवात हुदहुद अक्टूबर, 2014 में बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न हुआ था। इसने भारत के आंध्र प्रदेश, ओड़िशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश के साथ-साथ नेपाल को भी प्रभावित किया था। इस चक्रवात से भारत का आंध्र प्रदेस तट सर्वाधिक प्रभावित हुआ था। अंडमान निकोबार द्वीप समूह भी इससे प्रभावित रहा।

  • नगर भूकंप मंडल

भुज      V

हैदराबाद   II

श्रीनगर   V

चेन्नई    II

  • बिहार भारत का सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त राज्य है।

  • उत्तर प्रदेश में बाढ़ प्रवण क्षेत्रों को उच्च बाढ़ प्रवण, मध्यम बाढ़ प्रवण एवं निम्न बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में विभक्त किया जाता है। उच्च बाढ़ प्रवण क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के कुल बाढ़ प्रवण क्षेत्र का 48% आता है। उच्च बाढ़ प्रवण क्षेत्र उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र को आच्छादित करता है.

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मिट्टियाँ

काली मिट्टी

  • काली मिट्टी को रेगुर (Regur), कपास की मिट्टी, ट्रापिकल ब्लैक अर्थ एवं ट्रापिकल चेर्नोजेम (Chernozem) आदि नामो से भी जाना जाता है। भारत में रेगुर मिट्टियों का निर्माण बेसाल्ट लावा के अपक्षय एवं अपरदन के कारण हुआ। ये मिट्टियाँ दक्कन ट्रैप के ऊपरी भागों मे विशेष रुप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में पाई जाती है।

  • काली मिट्टी भारत के विभिन्न राज्यों में लगभग 5 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में मिलती है।

  • काली मिट्टी कपास के खेती के लिए अत्यधिक उपयुक्त होती है इनमें लोहा, चूना, कैल्शियम, पोटाश, एल्युमिनियम एवं मैग्नीशियम कार्बोनेट की अधिकता और नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा जैविक पदार्थों की कमी पाई जाती है।

  • काली मिट्टी में तीव्र जल धारण की क्षमता पाई जाती है। यह भीगने पर ठोस और चिपचिपी हो जाती है तथा सूखने पर आंकुचित एवं दरारयुक्त हो जाती है। इसलिए इसे स्वतः जुताई वाली मिट्टी कहा जाता है।

  • इस मिट्टी का रंग गहरा काला से हल्का काला और चेस्टनट की तरह होता है।

  • क्रेब्स के अनुसार रेगुर एक परिपक्व मृदा है जिसके निर्माण में विशिष्ट उच्चावच और जलवायु की प्रमुख भूमिका है।

  • पश्चिमी भारत की काली मिट्टी का निर्माण लावा से हुआ है। इसलिए इसे लावा मिट्टी भी कहते हैं। मालवा का पठार इसी दक्कन ट्रैप की काली मिट्टी क्षेत्र के अन्तर्गत आता है।

लैटेराइट मिट्टी

  • लैटेराइट मिट्टियों का सर्वप्रथम अध्ययन सन् 1905 मे बुकानन ( Buchanan) द्वारा किया गया। इनका नाम लैटिन भाषा के शब्द Later से लिया गया है जिसका अर्थ है ईट। भीगने पर ये मिट्टियां मक्खन की भांति मुलायम परंतु सूखने पर काफी कड़ी और ढेलेदार हो जाती हैं। ये मानसून सदृश मौसमी वर्षा वाली उष्णकटिबंधीय जलवायु की विशिष्ट मिट्टियां हैं। उष्णकटिबंधीय भारी वर्षा के कारण होने वाली तीव्र विक्षालन क्रिया के परिणामस्वरुप लैटेराइट मिट्टी का निर्माण हुआ है।

  • लैटेराइट मिट्टियाँ आर्द्र-प्रदेशों की अपक्षालित मिटटियां हैं जिनकी उर्वरता कम होती है। इस मिट्टी में लौह ऑक्साइड एवं एल्युमिनियम ऑक्साइड की प्रचुरता होती है परंतु इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरिक अम्ल, पोटाश, चूना और कार्बनिक तत्वों की कमी मिलती है। यह मिट्टी भारत मे केरल, पूर्वी तमिलनाडु के छोटे भाग में, ओड़िशा, छोटा नागपुर पठार, पूर्वोत्तर में मेघालय के उत्तरी भाग तथा पश्चिमी घाट के पर्ववतीय क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मिट्टी भारत के 1.26 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तृत है। इसका सर्वाधिक विस्तार केरल राज्य (मालाबार तटीय प्रदेश) में और इसके बाद महाराष्ट्र मे है।

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  • लैटेराइट मिट्टियों के रासायनिक संघटन और ऊंचाई में सामान्य संबंध पाया जाता है। इन मिट्टियों के निचले भागों की अपेक्षा ऊपरी भागों की मिट्टियां अधिक अम्लीय हैं।

  • लैटेराइट मिट्टी में प्रायः कम उर्वरता वाली मिट्टियां हैं किंतु उर्वरकों के प्रयोग से इनमें कपास, चावल, रागी, गन्ना, दाल, चाय, कहवा और काजू आदि की कृषि की जाती है।

दोमट या जलोढ़ मिट्टी

  • जलोढ़ मृदाएं (Alluvial Soils) देश के 40 प्रतिशत भागों के लगभग 15 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है। यह मिट्टी पंजाब से असम तक के विशाल मैदानी भागों के साथ-साथ नर्मदा, ताप्ती, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी घाटियों में फैली हुई है। इनका निर्माण हिमालय तथा प्रायद्वीप से प्राप्त मालवा तथा अपसारी सागर द्वारा छोड़े गए गाद द्वारा हुआ है। इनका रंग हल्के धूसर के भस्मी धूसर के बीच और गठन रेतीली से गाढ़ी दोमट के बीच पाया जाता है।

  • दोमट मिट्टी में पोटाश, फास्फोरिक एसिड, चूना और जैव पदार्थों की प्रचुरता पाई जाती है परंतु इनमें नाइट्रोजन और ह्यूमस की कमी होती है।

  • फलीदार फसलों की खेती से इनमें से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण संभव है। ये मिट्टियां सिंचाई हेतु सर्वोपयुक्त है जिनकी मदद से इनमें चावल, गेहूँ, गन्ना, जूट, कपास, मक्का, तिलहन, फल और शाक-सब्जियों की खेती की जाती है।

  • सामान्यतः दोमट मिट्टी में 40% बालू के कण 40% मृत्तिका कण, एवं 20% गाद (पाशु कण) के कण पाए जाते हैं।

  • बलुई दोमट मिट्टी की जलधारण क्षमता सबसे कम होती है क्योंकि इसमें रवे भारी मात्रा में एवं बड़े होते हैं।

  • जलोढ़ मिट्टियों को दो उपवर्गों में विभाजित किया जाता है –

  1. नवीन जलोढ़ या खादर (Khadar)इन मिट्टियों का विस्तार नदी के बाढ़ के मैदानी क्षेत्र मे पाया जाता है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ के दौरान मिट्टी की नवीन परत का जमाव रहता है। इस मिट्टी की जलधारण क्षमता अधिक होती है। यह मिट्टी सदैव उर्वर बनी रहती है।

  2. प्राचीन जलोढ़ या बांगर (Bangar) – बांगर मिट्टी की स्थिति बाढ़ की पहुंच से दूर कुछ ऊंचाई पर होती है। यहां मिट्टी का रंग गहरा (पीला रक्ताभ भूरा- Pale reddish brown) पाया जाता है। जिसमें चूनेदार कंकड़ के पिंड अधिक पाए जाते हैं। बांगर मिट्टियों पर लवणीय और क्षारीय प्रस्फुटन के कारण रेह (reh) का जमाव मिलता है। यह मिट्टी कम उर्वर होती है इसमें नियमित उर्वरकों की आवश्यकता होती है।

  3. भाबर (Bhabar) – शिवालिक के गिरिपदीय क्षेत्र में जलोढ़ पंख पाए जाते हैं जिनकी मिट्टी स्थूल गुटिकायुक्त होती है। इसे भाबर कहा जाता है। भाबर के दक्षिणी दलदली और गाढ़ी मिट्टी वाले क्षेत्र को तराई कहा जाता है। यहां की मिट्टी में नाइट्रोजन और जैविक पदार्थों की प्रचुरता और फास्फेट की कमी पाई जाती है। यहां के ऊंचाई भागों में प्राप्त प्राचीन जलोढ़ को राढ़ नाम से जाना जाता है।

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मिट्टीः विविध

  • लाल मिट्टियां (Red Soils) भारत में लगभग 6.5 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र पर विस्तारित है। लाल मिट्टी का निर्माण जलवायविक परिवर्तनों के परिणामस्वरुप रवेदार एवं कायान्तरित शैलों के विघटन एवं वियोजन से होता है। इस मिट्टी में सिलिका एवं आयरन की बहुलता होती है। इस मिट्टी का लाल रंग फेरिक ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण होता है लेकिन जलयोजित रुप में यह पीली दिखाई देती है। इनका विस्तार मुख्यतः पश्चिमी तमिलनाडु, कर्नाटक, दक्षिणी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, ओड़िशा एवं छोटा नागपुर पठार (झारखंड) में पाया जाता है।

  • पर्वतीय मिट्टियां (Mountain Soil) हिमालय क्षेत्र की घाटियों और ढालों पर 2700 मी. से 3000 मी. की ऊंचाई के भागों में पाई जाती है। ये मिट्टियां छिछली और आपरिपक्व हैं तथा इनमें कार्बन-नाइट्रोजन  अनुपात काफी अधिक होता है। ये मिट्टियां हल्की अम्लीय होती हैं।

  • मरुस्थलीय मिट्टियों (Desert Soil) का विकास शुष्क और अर्ध्द शुष्क जलवायु दशाओं मे हुआ है। ये राजस्थान, सौराष्ट्र (गुजरात), कच्छ (गुजरात), द. बंगाल क्षेत्र मे पाई जाती है। यह मिट्टी रेत एवं बजरी से युक्त है जिसमें जैव पदार्थों और नाइट्रोजन की कमी पाई जाती है।

  • दलदली फसलें वायुमण्डलीय नाइट्रोजन स्थिरीकरण के द्वारा मृदा को नाइट्रोजन से भरपूर कर देती हैं। मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाली प्रमुख फसलें इस प्रकार हैं – अल्फा-अल्फा, ड्राई बीन्स, गारबेंजों बीन्स, मटर, सोयाबीन, उड़द आदि।

  • पश्चिमी राजस्थान के अंतर्गत जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर, जालौर, जोधपुर, गंगानगर, सिरोही, झुंझनू, पाली और सीकर जिले आते हैं। इन जिलो की मिट्टी चूना (कैल्शियम के लवण) आधारित क्षारीय एवं लवणीय प्रकार की होती है। अतः  इस क्षेत्र की मिट्टी में कैल्शियम की अधिक मात्रा पाई जाती है.

  • चिकनी मिट्टी में जल धारण की क्षमता सबसे अधिक होती है। इसलिए पौधों को सबसे अधिक पानी इसी मिट्टी में मिलता है। चिकनी मिट्टी में 50% से कम गाद, 50% तक मृत्तिका व बालू की कुछ मात्रा पाई जाती है। इसमें वायु का आवागमन कम होता है, जिससे जलक्रांति हो जाती है।

  • मृत्तिका (Clay) का व्यास 0.002 मिमी. से कम होता है। जबकि गाद का व्यास 0.002 मिमी. से 0.06 मिमी. के मध्य तथा महीन बालू या रेत का व्यास 0.06 मिमी. से 2 मिमी. के मध्य होता है।

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अम्लीय एवं क्षारीय मृदा

  • मिट्टा का pH मान कम होना मिट्टी का अम्लीयता को तथा pH मान अधिक होना मिट्टी की क्षारीयता को प्रदर्शित करता है। अधिक अम्लीय या अधिक क्षारीय मिट्टी सामान्य फसलों के लिए उपयुक्त नही होती है।

  • सामान्य फसलें उगाने वाली मिट्टी का pH मान 6.0-7.0 के मध्य होना आवश्यक है।

  • तेजाबी (Acidic) मृदाएं अवसादी (Sedimentary) प्रकृति की होती हैं। ये मिट्टियां लैटेराइट, लौहमय लाल और अन्य लाल मृदा समूह की मृदाएं होती हैं। इनका विकास मुख्यतः भू-आकृति, अम्ली मूल सामग्री, और नमीयुक्त जलवायु के प्रभाव से होता है। ताप एवं नमीयुक्त जलवायु और अत्यधिक वर्षा की स्थिति में मृदाओं की मूल सामग्री में तीव्र अपक्षय होता है और क्षारों की लीचिंग काफी बढ़ जाती है। उच्च तापमान के साथ भारी वर्षा और अत्यधिक लीचिंग से अम्लीय मृदाओं का निर्माण होता है।

  • तेजाबी मिट्टी को कृषि योग्य बनाने के लिए सामान्यतः चूने का प्रयोग किया जाता है।

  • भारत में क्षारीय मृदा शुष्क एवं अर्ध्द शुष्क भागों एवं दलदली क्षेत्रो में पाई जाती है। इस मिट्टी की उत्पत्ति शुष्क एवं अर्ध्द शुष्क भागों में जल के ऊँचा होने एवं जलप्रवाह के दोषपूर्ण होने के कारण होती है। ऐसी स्थिति में कोशिका कर्षण की क्रिया द्वारा सोडियम (Na), कैल्शियम (Ca) एवं मैग्नीशियम (Mg) के लवण मृदा की ऊपरी सतह पर निक्षेपित हो जाते हैं। यह मिट्टी मुख्यतः दक्षिणी पंजाब, दक्षिणी हरियाणा, पश्चिमी राजस्थान आदि  क्षेत्रों में पायी जाती है। मिट्टी की क्षारीयता को बदलने और खारेपन को  हटाने के लिए जिप्सम (कैल्शियम सल्फेट) का प्रयोग किया जाता है। साथ ही चूने की लीचिंग के लिए कम से कम एक फीट जल की भी आवश्यकता रहती है।

  • मिट्टियो में जब सोडियम एवं मैग्नीशियम की अधिकता होती है तो लवणीय मृदा का निर्माण होता है।

  • भारत में सर्वाधिक लवणीय प्रभावी मृदा क्षेत्र गुजरात में है। लवणीय प्रभावी मृदा को लवणीय, क्षारीय एवं तटीय लवणीय में विभाजित किया जाता है।

  • भारत में सर्वाधिक क्षारीय मृदा क्षेत्र उत्तर प्रदेश में है जबकि सर्वाधिक लवणीय मृदा क्षेत्र गुजरात में है। मृदा का लवणीभवन मृदा में एकत्रित, सिंचित जल के वाष्पीकृत होने से पीछे छूटे नमक और खनिजों से उत्पन्न होता है। सिंचित भूमि पर लवणीभवन होने के कारण मृदाएं अपार गम्य बन जाती हैं।

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  • राज्य लवणीय मृदा क्षेत्र    क्षारीय मृदा क्षेत्र         तटीय लवणीय       कुल लवणीय मृदा क्षेत्र 

गुजरात   1218255 हे.       541430 हे.        462315 हे.        2222000

उ.प्र.      21989 हे.          1346971 हे.       0                 1368960 हे.

हरियाणा  49157 हे.          183399 हे.        0                 232556

पंजाब     0                 151717 हे.        0                 151717 हे.

भारत     1710673          3788159          1246136          6744968

  • चाय बागानों के लिए गहरी, अम्लीय और अच्छे जल निकास वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है। जल निकास का पर्याप्त सुविधा के कारण ही इन बागानों को पर्वतीय ढलानों पर लगाया जाता है।

मृदा अपरदन एवं सुधार

  • प्राकृतिक अभिकर्ता जैसे जल, वायु, पवन आदि द्वारा मिट्टी के ऊपरी आवरण के क्रमिक कटाव तथा स्थानांतरण (Ablution) को मृदा अपरदन (Soil Erosion) कहते हैं। मृदा अपरदन के कई कारक होते है। जिसमें निर्वनीकरण, अत्यधिक पशुचारण, झूम कृषि, अवैज्ञानिक कृषि पध्दति, परिवहन एवं संचार साधनों द्वारा प्राकृतिक अपवाह का अपवर्तन एवं अवरोध तथा अंधाधुंध खनन आदि मुख्य हैं। भारत में मृदा अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में चंबल एवं यमुना नदियों की उत्खात भूमि क्षेत्र, पश्चिमी हिमालय का गिरिपदीय क्षेत्र (शिवालिक पहाड़ियों के पाद क्षेत्र इसमें शामिल हैं), छोटा नागपुर पठार, ताप्ती से साबरमती घाटी तक का क्षेत्र (मालवा पठार), महाराष्ट्र का काली मिट्टी क्षेत्र, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात के शुष्क क्षेत्र इत्यादि प्रमुख है।

  • भारत में चंबल घाटी क्षेत्र में खोह-खड्डों का निर्माण अवनालिका अपरदन के कारण हुआ है। अवनालिका अपरदन सामान्यतः तीव्र ढालों पर होता है, वर्षा से गहरी हुई अवनालिकाएं कृषि भूमियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित कर देती हैं जिससे वे कृषि के लिए अनुपयुक्त हो जाती हैं। जिस प्रदेश में अवनालिकाएं अथवा बीहड़ अधिक संख्या में होते है, उसे उत्खात भूमि स्थलाकृति कहा जाता है। मृदा अपरदन प्रक्रियाओं का क्रमिक अनुक्रम इस प्रकार है –

आस्फाल अपरदन (Splash Erosion) – जब जल पत्तियों से नीचे गिरता है।

परत अपरदन (Sheet Erosion) – जब मिट्टी जल के साथ बहने लग जाती है।

रिल अपरदन (Rill Erosion) – जब मिट्टी में छोटी एवं कम गहरी नालियां बन जाती हैं।

अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) –  जब रिल अपरदन की नालियां बड़ी एवं विस्तृत हो जाती हैं।

धारा चैनल अपरदन (Stream Channel Erosion)- जब जल एक मोटी धारा के रुप में प्रवाहित होने लगता है और चैनल को तब तक अपरदित करता है जब तक कि वह स्थिर ढाल प्राप्त नही कर लेता है।

  • सोर्धम (ज्वार) किसी अन्य फसल की तुलना में भूमि अपरदन के लिए अधिक उत्तरदायी है।

  • मृदा संरक्षण के संबंध में प्रचलित पध्दतियों में सस्यावर्तन, वेदिका निर्माण और वायुरोध को भारत में उपयुक्त माना जाता है। मृदा सुधार के अंतर्गत फसल चक्र, मिश्रित खेती और बहुफसलीय खेती द्वारा मृदी की उर्वरता को पोषित किया जा सकता है।

  • म.प्र. में चम्बल और अन्य नदियों द्वारा अवनालिका अपरदन के कारण मुरैना (192000 हे.), भिंड (119000 हे.) एवं ग्वालियर (108000 हे.) जिलों की भूमि बीहड़ एवं बंजर हो गई है।

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प्राकृतिक वनस्पति

  • प्राकृतिक वनस्पति में वे पौधे सम्मिलित किए जाते हैं जो मानव की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष सहायता के बिना उगते हैं और अपने आकार, संरचना तथा अपनी आवश्यकता को प्राकृतिक पर्यावरण के अनुसार टाल लेते ढ़ाल लेते हैं। भारत में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां पाई जाती हैं। बनो के प्रकार कई भौगोलिक तत्वों पर निर्भर करते हैं जिनमे वर्षा, तापमान, आर्द्रता, मिट्टी समुद्र तल से ऊंचाई तथा भूगर्भिक संरचना महत्वपूर्ण है। इन तत्वों के प्रभावाधीन देश के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न प्रकार के वन उगते हैं।

इस आधार पर वनों का निम्नलिखित वर्गीकरण किया जाता है –

  1. उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests) –

  • ये वन भारत के अत्यधिक आर्द्र तथा उष्ण भागों में मिलते हैं। इन क्षेत्रों में औसत वार्षिक वर्षा 250 सेमी. से अधिक तथा सापेक्ष आर्द्रता 70% से अधिक होती है। इन क्षेत्रों में औसत तापमान 250 से. के आस-पास रहता है। उच्च आर्द्रता तथा तापमान के कारण ये वन बड़े सघन तथा ऊंचे होते हैं। विभिन्न जाति के वृक्षों के पत्तों के गिरने का समय भिन्न-भिन्न होता है जिस कारण संपूर्ण वन सहाबहार रहता है।

  • भारत में उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन का क्षेत्र – असम, केरल, पश्चिम बंगाल, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और पश्चिमी तटीय मैदान हैं।

  • उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वनों का मुख्य वृक्ष सिनकोना रबड़, महोगनी, एबोनी, नारियल, बांस तथा आयरन वुड है।

  1. उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती अथवा मानसूनी वन (Tropical Deciduous or Mansoon Forests)

  • इन्हें मानसूनी वन भी कहते हैं जो 100-150 सेमी. वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते है। इनके पाए जाने वाले मुख्य क्षेत्र पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल, प्रायद्वीपीय भारत का उत्तर-पूर्वी भाग, भाबर एवं तराई क्षेत्र हैं। इस प्रकार के वनों में मुख्यतः साल, शीशम, चंदन, आम तथा सागौन हैं। सागौन (Teak) संपूर्ण देश में 8.9 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में पाया जाता है। संपूर्ण सागौन क्षेत्र का 50% हिस्सा मध्य प्रदेश में विस्तारित है।

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  1. उष्ण कटिबंधीय शुष्क वन (Tropical Dry Forests)

  • ये वन उन क्षेत्रों में पाये जाते हैं जहां वार्षिक वर्षा 70 से 100 सेमी. होती है। इन वनों का विस्तार मुख्यतः उत्तर प्रदेश, मध्य गंगा मैदान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र वनो के मुख्य वृक्ष शीशम, बबूल, कीकर (बबूल), चंदन आम, महुआ है।

  1. मरुस्थलीय वन (Arid Forests)

  • मरुस्थलीय वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां वर्षा 50 सेमी. से कम होती है। इनका विस्तार भारत में राजस्थान, द.प. पंजाब तथा द.प. हरियाणा मे है। इन क्षेत्रों में छोटे आकार कटीले वृक्ष एवं झाड़ियां होती है, जैसे बबूल, खेजरी, नागफनी एवं कहीं-कहीं मरुधानों में खजूर के पेड़ मिलते हैं। इन्हें उष्णकटिबंधीय कांटेदार वृक्ष कहते हैं।

  1. डेल्टाई वन (Delta Forests)

  • इन्हें मैंग्रोव, दलदली अथवा ज्वारीय वन भी कहते है। ये वन गंगा, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा आदि नदियों के डेल्टाओं में उगते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा का सुन्दरवन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसमें सुंदरी नामक वृक्ष की बहुलता है जिस कारण इसे सुंदर वन कहते हैं। ये वन बहुत सघन होते हैं.

  1. पर्वतीय वन (Mountain Forests)

  • हिमालय के गिरिपदों में पर्णपाती प्रकार के वन पाये जाते हैं। हिमालय क्षेत्र में 1000 से 2000 मी. की ऊंचाई के बीच नम शीतोष्ण प्रकार के ऊंचे एवं घने वन पाए जाते हैं। यहां सदाबहार ओक एवं चेस्टनट के वृक्ष प्रमुख रुप से मिलते हैं।

  • हिमालय की दक्षिणी ढालों पर 2000 मीटर से 3000 मीटर की ऊंचाई के  बीच आर्द्र शीतोष्ण वनों का आवरण मिलता है। इसमें घुमावदार शंकुल वृक्षों का विस्तार मिलता है। इनमें प्रमुख वृक्ष ओक, फर, जूनीपर, सिल्वर, फर तथा स्प्रूस प्रमुख हैं।

  • अल्पाइन वन हिमालय के ऊंचाई वाले भागों में 2800-4000 मीटर पर पाए जाते हैं। अरुणाचल प्रदेश मे भी इन वनों का विस्तार मिलता है। इनमें प्रमुख वृक्ष सिल्वर, फर, जूनीपर,  चीड़, बर्च, रोडोण्ड्रोन एवं देवदार है।

  • देवदार के वृक्ष पश्चिमी हिमालय में 1500 से 2500 मीटर की ऊंचाई के मध्य पाए जाते हैं।

  • देवदार समुद्रतल से सर्वाधिक ऊंचाई पर पाया जाने वाला वृक्ष है।

  • प्रायद्वीपीय पहाड़ें पर मुख्यतः मैग्नोलिया, लारेल, यूकेलिप्टस आदि वृक्ष पाए जाते हैं।

  • वनों का देश की अर्थव्यवस्था में विशिष्ट योगदान है। आर्थिक दृष्टि से सागौन, साल, शीशम, रोजवुड, देवदार, चीड़, पाइन एवं स्प्रूस अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।

  • ब्यूटिया मोनों स्पर्मा को जंगल की आग कहा जाता है। इसे ढ़ाक अथवा पलाश के नाम से भी जाना जाता है।

  • पलाश के फूल को उत्तर प्रदेश का राजकीय पुष्प घोषित किया गया है।

  • सामाजिक वानिकी में प्रयुक्त बहु-उद्देशीय वृक्ष का उदाहरण खेजरी है। खेजरी वृक्ष को मरुस्थल का राजा कहा जाता है। इसके बहु-उद्देशीय उपयोग तथा अधिक तापमान सहन करने की क्षमता तथा कम पानी की आवश्यकता के कारण सामाजिक वानिकी कार्यक्रम में इसे वरीयता दी गई है।

  • उत्तराखंड के चीड़ वनों से प्राप्त होने वाली लीसा एक महत्वपूर्ण गैर प्रकोष्ठ वन उपज है। लीसा से विरोजा तथा तारपीन का तेल बनाया जाता है जिसका उपयोग कागज उद्योग, साबुन तथा पेंट बनाने में होता है। उत्तराखंड में लीसा स्वरोजगार एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख साधन है।

  • महोगनी मूलतः उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का वृक्ष है।

  • भोजपत्र वृक्ष हिमालय क्षेत्र में पाया जाने वाला वृक्ष है। पेड़ का सफेद कागज की तरह छाल लिखने के लिए प्राचीन समय से इस्तेमाल होता रहा है। यह वृक्ष 4500 मी. की ऊंचाई तक उगता है।

  • कत्था खैर की लड़की से प्राप्त होता है। खैर वृक्ष भारत भर में विशेष कर सूखे क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

  • पश्चिमी हिमालय की शीतोष्ण कटिबंधीय वन पेटी 1500-3600 मी. की ऊंचाई के मध्य विस्तृत है। इस पेटी में शीतोष्ण कटिबंधीय वनो का विस्तार मिलता है जिनके प्रमुख वृक्ष ओक, फर, देवदार, स्प्रूस, चेस्टनट, सिडार और चीड़ हैं। यहां देवदार के वृक्ष अन्य की अपेक्षा अधिक मात्रा में हैं।

  • ऑरिक्स गर्म और शुष्क क्षेत्रों में जैसे अरब आदि क्षेत्रों में रहने के लिए अनुकूलित हैं जबकि चीरू ठंडे उच्च पर्वतीय घास के मैदान और अर्ध-मरुस्थली क्षेत्रों में रहने के लिए अनुकूलित हैं।

  • उष्ण कटिबंधीय वन –    साइलैंट वैली

शंकुवृक्ष वन         –    हिमाचल प्रदेश

कच्छ वनस्पति      –    सुंदरबन

पतझड़ वन         –    राजस्थान

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  • 1997 में मध्य प्रदेश के साखू के वन कीड़ों के लग जाने से संक्रमित हो गए थे। पेड़ों में लगने व ले ये कीड़े वृक्षों को धीरे-धीरे कुतरने लगे परिणामस्वरुप कई पेड़ जंगलों में धराशायी हो गए ।

  • महोगनी मूलतः उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र का वृक्ष हैं यह वृक्ष मुख्य रुप से वेस्टइंडीज, मध्य अमेरिका एवं दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है।

  • भारत के विभिन्न राज्यों के कच्छ वनस्पति क्षेत्र –

महाराष्ट्र की कच्छ वनस्पतियां – अच्रा, रत्नागिरि, देवगढ़-विजयदुर्ग, कुंडालिका-रेवडंडा, मुम्बरा-दीवा, श्रीवर्धन, वैतरना, मालवन इत्यादि।

कर्नाटक राज्य की कच्छ वनस्पतियां – कुंडापुर, दक्षिण कन्नड़ / होन्नावर, कारवार, इत्यादि।

केरल की कच्छ वनस्पतियां- वेम्बनाद, कन्नूर।

तमिलनाडु की कच्छ वनस्पतियां- पिचवरम, मथुपेट, रामनाड, पुलीकट, काजूवेली आदि।

पश्चिम बंगाल की कच्छ वनस्पतियां – सुंदरबन।

ओड़िशा की कच्छ वनस्पतियां – भितरकनिका, देवी,  धामरा, चिल्ला इत्यादि।

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सिंचाई एवं नहरें

  • भारत की स्थिति उपोष्ण जलवायु क्षेत्र में पाई जाती है। पश्चिमी हिमालय, उ.पू. असम, मेघालय और दक्षिण के कुछ भागों को छोड़कर देश का अधिकांश क्षेत्र उच्च तापीय मंडल में समाहित है। ऊंचे तापमान से अधिक वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन होता है। इस प्रकार बोई गई फसलों हेतु नमी की कमी को पूरा करने के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है।

  • भारत मे सिंचाई के विभिन्न साधन है। वर्ष 2013-14 (अनंतिम) के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान मे देश मे सिंचाई के प्रमुख साधन नलकूप हैं। जिनका कुल सिंचाई में लगभग 45.70% का योगदान है। नलकूप और अन्य कुओं को जोड़कर सिंचाई की जाने वाली कुल भूमि की प्रतिशत मात्रा 62.32% आती है। नहरों द्वारा सिंचित भूमि 23.90% तथा टैंक्स द्वारा सिंचित भूमि लगभग 2.70% है। शेष 11.07% में अन्य साधन सम्मिलित हैं।

  • भारीय सिंचाई परियोजनाओं को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. लघु सिंचाई परियोजनाएं – इसके तहत 2000 हेक्टेयर से कम क्षेत्र की सिचाई होती है। इसमें कुआं, नलकूप, पंपसेट, तालाब, ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकल, एनीकेट आदि शामिल किए जाते हैं। भारत की सिंचाई की लगभग 62% की आपूर्ति लघु सिंचाई परियोजनाओं से होती है।

  2. मध्यम सिंचाई परियोजनाएं – इसके तहत 2000 से 10,000 हेक्टेयर तक क्षेत्र की सिंचाई की जाती है।

  3. वृहत सिंचाई परियोजनाएं – इसके तहत 10,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रों की सिंचाई होती है। बड़ी एवं मध्यम परियोजनाओं से देश की 38% सिंचाई की आवश्यकता पूरी होती है.

  • विश्व की सबसे पुरानी एवं विकसित नहर व्यवस्थाओं में से एक गंग नहर है। इसका निर्माण वर्ष 1927 में बिकानेर के तत्कालीन महाराजा श्री गंग सिंह ने कराया था। यह नहर सतलज नदी से फिरोजपुर के निकट हुसैनी वाला से निकाली गई है।

  • पूर्वी यमुना नहर, यमुना नदी की बाएं तट से ताजेवाला के निकट से निकलती है। मुख्य नहर की सिंचाई 197 किमी. है। इस नहर प्रणाली द्वारा हिंडन, यमुना, दोआब के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ व गाजियाबाद जनपदों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। पुनरोध्दार के पश्चात् यह नहर प्रथम बार 1830 ई. में चलाई गई उस समय इस नहर का परिकल्पित डिस्चार्ज 800 क्यूसेक था। कालांतर में इसे बढ़ाकर 4000 क्यूसेक किया गया। इस नहर प्रणाली में जुलाई से पानी की कमी होने लगती है एवं अक्टूबर आने तक तो इस नहर से जलापूर्ति शून्य हो जाती है।  इस समस्या के समाधान हेतु ताजेवाला से लगभग 3 किमी. ऊपर हथिनी कुंड बैराज (हरियाणा) का निर्माण कराया गया है। ऊपरी गंगा नहर का निर्माण 1842 ई. की अवधि में कराया गया। इस परियोजना के जनक सर पी.टी. काटले थे। इस नहर से प्रथम बार 8 अप्रैल, 1954 को पानी चलाया गया। यह नहर हरिद्वार के भीम गौड़ा नामक स्थान से गंगा नदी के दाहिने तट से निकलती है। मुख्य ऊपरी गंगा नहर की लंबाई 298 किमी. तथा नहर प्रणाली की कुल लंबाई 6496 किमी. है। इस नहर प्रणाली द्वारा हरिद्वार, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, एटा, मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी,  आगरा जनपदों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। प्रारंभ में इस नहर प्रणाली का उपयोग नौ परिवहन हेतु भी किया जाता था। सिंचाई के अतिरिक्त इस नहर प्रणाली से 200 क्यूसेक पानी दिल्ली को पीने हेतु तथा 100 क्यूसेक हरदुवागंज तापीय विद्युत गृह को दिया जाता है। मुख्य गंगा नहर पर निर्मित फाल्स से जल विद्युत उत्पादन भी किया जा रहा है।

  • उत्तर प्रदेश के शारदा/घाघरा दोआब में अवस्थित पीलीभीत, बरेली, लखीमपुर खीरी, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, प्रतापगढ़, फैजाबाद, सुल्तानपुर, जौनपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, इलाहाबाद जनपदों में सुरक्षात्मक सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु जनपद नैनीताल की खटीमा तहसील में बनबसा के पास शारदा नदी पर एक बैराज का निर्माण कर इसके दाहिने तट से शारदा मुख्य नहर निकाली गई। मुख्य नहर की लंबाई 44.3 किमी. है तथा शारदा नहर प्रणाली की कुल  लंबाई  (जल शाखाओं की लंबाई और अल्पिकाओं की लंबाई) 9961.3 किमी. है।

  • निचली गंगा नहर का उद्गम स्थल नरौरा (बुलंदशहर) मे है। इसका निर्माण कार्य 1878 ई. में पूरा किया गया। मुख्य नहर की लंबाई 100 किमी. तथा पूर्ण नहर प्रणाली की लंबाई 8278 किमी. है।

  • इंदिरा गांधी नहर परियोजना के शिलान्यास 30 मार्च, 1958 को तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने किया था। इसका उद्गम पंजाब में सतलज एवं व्यास नदियों के संगम पर स्थित हरिके बांध है। यह विश्व की सबसे बड़ी नहर परियोजना है जिसकी लंबाई 649 किमी. है।

  • इस नहर से पश्चिमी राजस्थान के गंगानगर, बिकानेर, जोधपुर और जैसलमेर जिलों की मुख्य रुप से सिंचाई की जाती है।

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  • गंडक परियोजना के अंतर्गत गंडक नदी पर त्रिवेणी घाट के पास एक 740 मी. लंबा बैराज बनाया गया है, जिससे कुछ नहरें निकाली गई हैं।

  • फरक्का बैराज का निर्माण वर्ष 1975 में हुगली नदी में सिल्ट जमाव को रोकने के उद्देश्य से किया गया था। इस बैराज के दाएं किनारे से निकाली गई नहर द्वारा गंगा नदी के 40,000 क्यूसेक जल को हुगली नदी की ओर मोड़ दिया गया। यही इसकी जलवहन क्षमता होगी।

  • केरल के पलक्कड़ जिले की भरतपुझा नदी एवं उसकी सहायक नदियों पर कुल 10 सिंचाई परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं। पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं में संगलम सिंचाई परियोजना है।

  • माला नहर तंत्र को कैप्टन दिनशॉ जे. दस्तूर ने प्रस्तावित किया था। जबकि नदी जोड़ने का पहली बार विचार सिंचाई इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने दिया था। बाद में के.एल. राव का नाम भी इसमें जुड़ गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 27 जनवरी, 2003 को दो हजार करोड़ रुपये की लागत वाली जल संग्रहण से संबंधित विकास योजना हरियाली का शुभारंभ किया। इस परियोजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जलसंरक्षण के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

  • वर्ष 2013-14 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत में निवल बुवाई क्षेत्र लगभग 141.43 मिलियन हेक्टेयर है, जिसमें लगभग 48.15 प्रतिशत क्षेत्र (68.10 मिलियन हेक्टेयर) पर ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। कृषि की मानसून पर निर्भरता कम करने और हर खेत तक सिंचाई सुविधा पहुंचाने के उद्देश्य से 1 जुलाई, 2015 को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) को स्वीकृति प्रदान कर दी गई।

  • 1 अप्रैल, 2008 तक भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा 3 वाटर शेड विकास कार्यक्रम कार्यान्वित किए गए। ये कार्यक्रम हैं – समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम, सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम तथा मरुभूमि विकास कार्यक्रम।

  • इन कार्यक्रमों को एक व्यापक कार्यक्रम के अंतर्गत लाया गया जिसे समेकित जलसंभर प्रबंधन कार्यक्रम के नाम से जाना जाता है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मृदा, जल और वनस्पति जैसे अवक्रमित प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल, संरक्षण और विकास करके पारिस्थितिकी संतुलन को बहाल करना है। इसके परिणामस्वरुप मृदा ह्रास पर रोक लगती है।

  • प्रायद्वीपीय भारत में सिंचाई का एक प्रमुख साधन तालाब है। प्राचीन काल मे ही इस क्षेत्र मे तालाबों से सिंचाई होती आ रही है। तालाबों में वर्षा का पानी इकठ्ठा करके उसका उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता रहा है। प्रायद्वीपीय क्षेत्र की भूमि चट्टानी होने के कारण यहां नहरों एवं कुओं का आसानी से निर्माण संभव नही होता। इसके अलावा प्रायद्वीपीयि भारत की अधिकांश नदियां मौसमी हैं। जिसके कारण नहरों में पानी का अभाव रहता है। ऐसी स्थिति में तालाब सिंचाई के प्रमुख साधन के रुप में विद्यमान हैं।

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  • भारत के राज्यों का सिंचाई के लिए उपलब्ध भूतल जल संसाधनों की दृष्टि से प्रमुख राज्यों में उत्तर प्रदेश (48.74 बिलियन क्यूबिक मी/वर्ष), पंजाब (34.17 बिलियन क्यूबिक मी./वर्ष), मध्य प्रदेश (17.48 बिलियन क्यूबिक मी./वर्ष) तथा महाराष्ट्र (16.15 बिलियन क्यूबिक मी./वर्ष) है।

  • उत्तर प्रदेश At Glance, 2017 के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश मे विभिन्न साधनों द्वारा शुध्द सिंचित क्षेत्रफल का प्रतिशत वितरण में नलकूप (70.8%), नहर (17.2%), कुआं (10.2%) टैंक्स एवं झील (1.3%) तथा अन्य साधन (1.8%) हैं।

  • नलकूपों द्वारा सिंचाई उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक होती है।

  • राज्यों में सिंचाई की स्थित –

राज्य         2011         2013-14

हरियाणा       83.90%       83.8%

उत्तर प्रदेश     72.76%       84.8%

मध्य प्रदेश     28.20%       61.3%

महाराष्ट्र       16.78%       18.7%

  • पी.डब्ल्यू.पी. (Permanent Wilting Point-PWP) सिंचाई जीवन रक्षक अथवा बचाव सिंचाई को इंगित करती है। परमानेंट विल्टिंग प्वाइंट जमीन के अंदर पानी की उस मात्रा को इंगित करता है, जिसे पौधे अपने उपयोग के लिए प्राप्त नही कर पाते। इस अवस्था में वे मुरझाने लगते हैं। ऐसी स्थित में सिंचाई अति आवश्यक हो जाती है।

  • सरयू पार मैदान में शहरों का अभाव पाए जाने के कारण नलकूपों द्वारा इस क्षेत्र में सिंचाई का कार्य किया जाता है।

  • राज्य के निवल सिंचित क्षेत्र तथा नलकूप द्वारा सिंचित क्षेत्र हजार हेक्टेयर में –

राज्य         निवल सिंचित क्षेत्र (2013-14)       नलकूप द्वारा सिंचित क्षेत्र (2013-14)

उत्तर प्रदेश     14027                          9984

पंजाब         4143                           3022

बिहार         2933                           1830

हरियाणा       2931                           1721

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  • सर आर्थर कॉटन ब्रिटिश सिंचाई अभियंता थे। उन्होने दक्षिण भारतीय राज्यों के सिंचाई व्यवस्था में उल्लेखनीय कार्य किया है। इसलिए सर आर्थर कॉटन को दक्षिण भारत में सिंचाई व्यवस्था का अग्रदूत माना जाता है।

  • केन्द्रीय जल आयोग (Central Water Commission) ने भारत में ड्रिप सिंचाई पर अपनी स्टेटस रिपोर्ट में इसके निम्न लाभों/हानियों का उल्लेख किया है –

लाभ –

  1. जल बचत

  2. पौधों के आकार एवं उत्पादकता में वृध्दि

  3. ऊर्जा एवं श्रम बचत

  4. कम उपजाऊ मृदा के लिए उपयुक्त

  5. खारे पानी का उपयोग संभव

  6. खऱ-पतवार की वृध्दि पर नियंत्रण

  7. उर्वरक क्षमता में वृध्दि

  8. मृदा अपरदन नही

  9. भूमि तैयारी की जरुरत नही

  10. रोग एवं कीट समस्याएं न्यूनतम।

हानियां –

  1. मृदा में लवणता समस्याओं की वृध्दि

  2. डिजाइन स्थापन एवं उत्तरवर्ती संचालन मे उच्च कौशल की जरुरत

  3. आर्थिक एवं तकनीकी सीमाएं

 

 

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बहु-उद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं

नर्मदा घाटी परियोजना

  • नर्मदा भारत की पांचवी सबसे बड़ी नदी है। सर्वप्रथम वर्ष 1945-46 में नर्मदा बेसिन मे सिंचाई, विद्युत उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण हेतु एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार हुई थी। इस परियोजना के अंतर्गत नर्मदा एवं उसकी सहायक नदियों पर 29 बड़ी, 135 मध्यम तथा 3000 छोटे बांध तथा बैराज बनाए जाने की घोषणा की गई थी।

  • सरदार सरोवर परियोजना का निर्माण गुजरात राज्य मे नर्मदा नदी पर (नवगांव के पास 138.68 मी. ऊंचे बांध से) किया गया है। इससे 1450 मेगावॉट जलविद्युत का उत्पादन किया जा सकेगा। सरदार सरोवर बांध से गुजरात के 17.92 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई की सुविधा मिलने से गुजरात राज्य को सर्वाधिक लाभ होगा। यद्यपि परियोजना से उत्पादित विद्युत में से सर्वाधिक 57 प्रतिशत विद्युत की आपूर्ति मध्य प्रदेश को की जाएगी।

  • सरदार सरोवर परियोजना से लाभान्वित होने वाले राज्यों मे गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश शामिल हैं। सरदार सरोवर परियोजना का विरोध करने के उद्देश्य से ही फरवरी, 1986 में समाज विज्ञान  मेधा पाटकर ने मध्य प्रदेश के धुलिया जिले में धारंग राष्ट्र समिति की स्थापना की थी। वर्ष 1989 में अनेक स्थानीय संगठनों के विलय के साथ इसी संगठन का नामकरण नर्मदा बचाओं आंदोलन किया गया।

  • नर्मदा सागर परियोजना इसे इंदिरा सागर बांध भी कहते है। यह बांध मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नगर के निकट है। इससे 1000 मेगावॉट विद्युत उत्पादन तथा 1.23 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य है।

  • नर्मदा घाटी में तवा, बारना, कोलार, सुक्ता और मटीयारी परियोजनाओं का निर्माण पूरा हो चुका है। इन परियोजनाओं से 3 लाख, 73 हजार, 5 सौ हेक्टेयर सिंचाई क्षमता अर्जित कर ली गई है। तवा परियोजना से 13.50 मेगावॉट बिजली का दोहन किया जा रहा है।

  • नर्मदा की सहायक नदी मान पर मान परियोजना, हथनी नदी पर चन्द्रशेखर आजाद परियोजना, वेदा नदी पर अपर वेदा परियोजना का निर्माण किया गया है।

  • नर्मदा नदी पर निर्मित होने वाली 30 बांधों की श्रृंखला में बरगी, ओंकारेश्वर तथा इंदिरा सागर शामिल हैं, जबकि बाण सागर बांध सोन नदी पर स्थित है।

  • हरसूद मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में अवस्थित कस्बा था, जो इंदिरा सागर बांध के बनने के कारण वर्ष 2004 में डूब गया है।

  • नर्मदा बचाओं आंदोलन सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने का विरोध कर रहा है। नर्मदा घाटी परियोजना मध्य प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र की सयुक्त परियोजना है।

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भाखड़ा-नांगल बांध

  • भाखड़ा-नांगल बहु-उद्देशीय परियोजना पंजाब, हरियाणा और राजस्थान राज्यों का संयुक्त उपक्रम है। इसके अंतर्गत भाखड़ा और नांगल के पास सतलज नदी पर दो बांधों का निर्माण किया गया है। भाखड़ा बांध का निर्माण कार्य वर्ष 1963 में पूरा हुआ। यह बांध सतलज नदी पर (अम्बाला से 80 किमी. उत्तर ) बनाया गया है। भाखड़ा-नांगल बांध का कमांड क्षेत्र हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में विस्तारित है। भांखड़ा नांगल बांध का जल संग्रहण गोविंद सागर झील में किया जाता  है।

कावेरी नदी पर बने बांध

  • जलविद्युत का विकास 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में शुरु हुआ। 1897 ई. में दार्जिलिंग नगर को बिजली आपूर्ति के लिए सिद्रापोंग मे जलविद्युत संयंत्र लगाया गया था। यह भारत का सबसे पुराना जलविद्युत शक्ति संयंत्र है।

  • कर्नाटक में कावेरी पर स्थित शिवसमुद्रम में वर्ष 1902 में भारत का दूसरा सबसे पुराना जलविद्युत उत्पादन संयंत्र लगाया गया। शिवसमुद्रम प्राचीन स्थान है। यह मैसूर नगर से करीब 50 किमी. उत्तर-पूर्व में कावेरी दोआब में बसा है। यहां पर कावेरी का जल, पहाड़ की बनावट के कारण, विशाल झील की तरह दिखाई देता है। कृष्णा सागर बांध कर्नाटक में कावेरी नदी पर स्थित है। कृष्णा सागर बांथ की रुप रेखा एम. विश्वेश्वरैया ने बनाया था। कृष्णा सागर बांध के पास वृंदावन उद्यान स्थित है।

  • कावेरी नदी जल विवाद में सम्मिलित राज्य हैं – तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल एवं पुडुचेरी। 20 फरवरी, 2013 को अधिसूचित निर्णय के अनुसार, कावेरी जल की कुल 740 टीएमसी (TMC: Thousand Million Cubic) फीट विश्वसनीय मात्रा से कर्नाटक को 270 TMC फीट, केरल को 30 TMC फीट तमिलनाडु को 419 TMC फीट एवं पुडुचेरी को 7 TMC फीट जल आवंटित किया गया है।

 

नागार्जुन सागर बांध

  • नागार्जुन सागर बहु-उद्देशीय परियोजना कृष्णा नदी पर स्थित है। यह परियोजना वर्ष 1969 में पूरी हुई थी। यह तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सीमा पर स्थित है। इस परियोजना के माध्यम से नालगोंडा, प्रकाशम, खम्मम और गुंटूर जिलों में सिंचाई व्यवस्था उपलब्ध होती है। नागार्जुन सागर बांध की ऊंचाई 124 मीटर है। नागार्जुन सागर बांध के 11 जलाशय में 472 मिलियन क्यूबिक मी. पानी भंडारण की क्षमता है। इस परियोजना के तहत 1550 मीटर लंबा एक चिनाई बांध बनाया गया है। इस परियोजना से आंध्र प्रदेश की 8.67 लाख हे. भूमि को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होती है तथा 210 मेगावॉट विद्युत का भी उत्पादन किया जाता है। यह परियोजना नवगठित आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना दोनों राज्यों में विस्तारित है।

हीराकुंड बांध

  • हीराकुंड बांध ओडिशा राज्य में महानदी पर बनाई गई महत्वाकांक्षी परियोजना है। इस परियोजना का निर्माण वर्ष 1948 में शुरु हुआ और वर्ष 1956-57 के दौरान पूरा हुआ। हीराकुंड बांध संबलपुर से 15 किमी. दूर लगभग 61 मी. (200 फीट) ऊंचा एवं 4801 मी. (मुख्य बांध लंबाई) लंबा विश्व का सबसे लंबा बांध है। इस बांध की कुल लंबाई 25.8 किमी. है। इस बांध से लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई भी की जा रही है।

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चंबल घाटी परियोजना

  • चंबल नदी मध्य प्रदेश के महु के समीप जानापॉव पहाड़ी से निकलती है। इटावा के समीप यह यमुना में मिलती है।

  • चंबल नदी पर निर्मित चंबल परियोजना राजस्थान एवं मध्य प्रदेश की संयुक्त परियोजना है। इस परियोजना के अंतर्गत 3 बांध – गांधी सागर बांध (मध्यप्रदेश), राणा प्रताप सागर बांध एवं जवाहर सागर बांध (राजस्थान) निर्मित किए गए हैं।

  • गांधी सागर बांध, चंबल घाटी की 4 परियोजनाओं में से प्रथम परियोजना है। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में स्थित यह बांध 62.17 मीटर ऊंचा है। इस बांध का निर्माण कार्य वर्ष 1954 में शुरु होकर नवंबर, 1960 मे पूरा हुआ।

  • राणा प्रताप सागर बांध राजस्थान राज्य में स्थित है। राजस्थान राज्य में कोटा से 30 किमी. दूर जवाहर सागर बांध का निर्माण किया गया है.

  • गोविंद सागर (हिमाचल प्रदेश) सतलज नदी पर भाखड़ा-नांगल बांध से संबंधित है, जबकि गोविन्द वल्लभ पंत सागर उ.प्र. के सोनभद्र जिले में रिहंद नदी पर स्थित है। गांधी सागर (मध्य प्रदेश) एवं जवाहर सागर (राजस्थान) चंबल घाटी योजना से संबंधित है।

 

टिहरी बांध परियोजना

  • टिहरी बांध परियोजना का निर्माण भागीरथी (गंगा) नदी पर भागीरथी और भिलांगना के संगम के थोड़ा आगे उत्तराखंड के टिहरी जिले में किया गया है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य भागीरथी एवं भिलांगना नदियों का अतिरिक्त जल संग्रह कर सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण एवं विद्युत उत्पादन करना है। इस परियोजना को योजना आयोग की स्वीकृति वर्ष 1972 मे ही प्राप्त हो गई थी किंतु निर्माण कार्य 5 अप्रैल, 1978 से ही प्रारंभ हुआ। इस परियोजना के लिए टिहरी जलविद्युत विकास निगम (THDC) की स्थापना की गई है।

  • टिहरी बांध देश का सबसे ऊंचा बांध (260.5 मी.) है। टिहरी बांध परियोजना के विरोध के मुख्य कारण इसकी भूकंप प्रवण क्षेत्र में स्थिति एवं पर्यावरण को क्षति और लोगों के विस्थापन से जुड़े हैं।

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दामोदर घाटी परियोजनाएं

  • दामोदर नदी, हुगली की प्रमुख सहायक नदी है। दामोदर नदी में आने वाले बाढ़ों एवं प्रदूषण के कारण इसे बंगाल का शोक कहा जाता था। इस परियोजना की रुपरेखा संयुक्त राज्य अमेरिका की टेनिसी वैली अथॉरिटी (TVA) के आधार पर की गई थी।

  • दामोदर घाटी निगम की स्थापना वर्ष 1948 में की गई थी।

  • मैथान, बेलपहाड़ी और तिलैया बांधों का निर्माण दामोदर की सहायक नदी बाराकर पर दामोदर नदी घाटी परियोजना के प्रथम चरण मे किया गया है।

  • दामोदर घाटी परियोजना के अंतर्गत – तिलैया बांध हजारी बाग जिले में बाराकर नदी पर बनाया गया है। इसका निर्माण कार्य वर्ष 1953 में पूरा हुआ।

  • कोनार बांध, कोनार नदी पर हजारी बाग जिले में दामोदर के संगम से 24 किमी. पूर्व में स्थित है इसका निर्माण वर्ष 1955 में हुआ था।

  • मैथान बांध बाराकर नदी पर बनाया गया है। यह एक मिट्टी का बांध है। मैथान बांध का निर्माण वर्ष 1958 में पूरा किया गया।

  • पंचेत हिल बांध दामोदर नदी पर मैथान बांध से 20 किमी. दक्षिण मे स्थित है। दामोदर घाटी परियोजना के अंतर्गत दुर्गापुर बैराज से दो नहरें निकाली गई हैं इन नहरों से बर्ध्दमान, हुगली और हावड़ा जिलों की भूमि सिंचित होती है।

  • दामोदर नदी अपने ऊपरी भाग में तीव्रता से प्रवाहित होने के कारण इस क्षेत्र के लिए दुख का कारण बनती थी, जबकि निचले क्षेत्र में पानी का बहाव अपेक्षाकृत कम होता था। बहाव कम होने के बावजूद पानी की अत्यधिक मात्रा नदी बंध को  तोड़कर निचले क्षेत्र में बाढ़ का कारण बनती थी। दामोदर घाटी निगम की स्थापना के बाद निर्मित अनेक बांधो के फलस्वरुप तबाही की प्रवृत्ति काफी कम हो गई है।

  • दामोदर घाटी निगम की स्थापना दामोदर घाटी निगम अधिनियम, 1948 की धारा 12 के तहत वर्ष 1948 में किया गया था।

विविध परियोजनाएं

  • भारत में बहु-उद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं से सिंचाई की सुविधा के अलावा बाढ़, नियंत्रण, पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत उत्पादन, नहर, परिवहन और पर्यटन जैसे अनेक कार्य किए जा सकते हैं।

  • भारत में जल विद्युत संयंत्र की स्थापना सर्वप्रथम 1897 ई. में प. बंगाल के दार्जिलिंग के निकट सिद्रापोंग अथवा सिद्राबाग में हुई थी।

  • भारत और भूटान के सहयोग से चुक्का बांध परियोजना का निर्माण किया गया है। चुक्का बांध परियोजना भूटान में वांग चू अथवा रैदक नदी की धारा के ऊपरी भाग पर स्थित है। इस बांध की ऊंचाई 40 मीटर है। वर्ष 1974 में इसका निर्माण कार्य भारत सरकार की पूर्ण वित्तपोषित इकाई के रुप में प्रारंभ किया गया था जिसमें 60% अनुदान और 40% ऋण के रुप मे था। ऋण का भाग 5% वार्षिक की दर पर 15 वर्षों में अदा करना था। इस परियोजना को भूटानी प्रबंधन के हाथ में वर्ष 1991 मे सौंप दिया गया। 336 मेगावॉट क्षमता वाली इस परियोजना से उत्पादित विद्युत का 70% भाग भारत को ही निर्यात किए जाने का प्रावधान है।

  • भाखड़ा-नांगल बांध परियोजना सतलज नदी पर निर्मित की गई है। यह पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान राज्यों की संयुक्त परियोजना है। हीराकुंड बांध परियोजना का निर्माण ओड़िशा राज्य में महानदी पर किया गया है। इसके तहत हीराकुंड, टिकर पाड़ा एवं नराज के पास तीन बांधों का निर्माण किया गया है। इनसे लगभग 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई और लगभग 270.2 मेगावॉट जलविद्युत का उत्पादन किया जा रहा है।

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  • इडुक्की बांध परियोजना का निर्माण केरल राज्य में पेरियार नदी पर किया गया है। यह बांध एशिया का सबसे बड़ा आर्क बांध है। इडुक्की बांध की ऊंचाई 555 फीट है।

  • नगार्जुन सागर बांध परियोजना निर्माण कृष्णा नदी पर किया गया है।

  • तेलुगू-गंगा परियोजना महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक राज्य की संयुक्त परियोजना है। कृष्णा नदी से जलापूर्ति प्राप्त करने वाली इस परियोजना से तमिलनाडु के चेन्नई (मद्रास) नगर को पेयजल प्रदान किया जाता है। तेलुगू गंगा परियोजना आंध्र प्रदेश में स्थित है।

  • मेट्टूर परियोजना तमिलनाडु में कावेरी नदी पर है। मेट्टूर बांध की लंबाई 1615.44 मीटर है।

  • मयूराक्षी परियोजना से पश्चिम बंगाल एवं झारखंड दोंनों राज्य लाभान्वित होते हैं। इस परियोजना के तहत झारखंड (तत्कालीन बिहार) में मयूराक्षी नदी पर ही कनाडा बांध निर्मित किया गया। इस बांध की पृष्ठभूमि में निर्मित जलाशय की जल ग्रहण क्षमता 6610 घन मीटर है। मयूराक्षी परियोजना से 2.91 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इस परियोजना के तहत 4000 किलोवॉट जलविद्युत का उत्पादन किया जाता है।

  • नागार्जुन सागर परियोजना कृष्णा नदी पर स्थित है। यह परियोजना आंध्र प्रदेश एवं तेलांगना की सीमा पर स्थित है।

  • शिवसमुद्रम परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक में स्थित है। इस परियोजना की स्थापना वर्ष 1902 में हुई थी।

  • जायकवाड़ी परियोजना गोदावरी नदी पर महाराष्ट्र में स्थित है।

  • टिहरी परियोजना भागीरथी एवं भीलांगना नदियों के संगम के समीप उत्तराखंड राज्य के टिहरी जनपद में स्थित है। काल्पोंग जलविद्युत परियोजना अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह की प्रथम जलविद्युत परियोजना है। यह काल्पोंग नदी पर स्थित है।

  • रिहंद परियोजना, गोविंद वल्लभ पंत सागर परियोजना के नाम से भी जानी जाती है। यह उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पिपरी नामक स्थान पर रिहंद नदी पर निर्मित है। इसके तहत 934 मी. लंबा तथा 91 मी. ऊंचा बांध बनाया गया है। इस बांध के नीचे ओबरा में 300 मेगावॉट क्षमता का जलविद्युत गृह स्थापित किया गया है। इस बांध की पृष्ठभूमि में 130 वर्ग किमी. क्षेत्र में  एक कृत्रिम झील  गोविंद वल्लभ पंत सागर का निर्माण किया गया है। इस परियोजना के तहत 2.5 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की व्यवस्था की गई है। यह उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी परियोजना है।

  • उकाई, गुजरात राज्य की प्रमुख बहु-उद्देशीय परियोजना है। सूरत से 94 किमी. दूर उकाई नामक स्थान पर ताप्ती नदी पर यह परियोजना निर्मित की गई है। यहीं पर 4928 मीटर लंबा तथा 68.6 मीटर ऊंचा एक विशाल बांध बनाया गया है। इससे निकलने वाली नहरों से लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। इस परियोजना के तहत 300 मेगावॉट क्षमता का एक विद्युत गृह भी निर्मित किया गया है।

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  • कालागढ़ बांध का निर्माण रामगंगा नदी पर किया गया है। इसकी ऊंचाई 128 मी. तथा लंबाई 715 मी. है।

  • कोयना परियोजना कोयना नदी पर निर्मित है, जो कि महाराष्ट्र राज्य में स्थित है।

  • तवा परियोजना मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में तवा नदी पर निर्मित की गई है। इस बांध की ऊंचाई 59 मी. एवं लंबाई 1815 मी. है। इसका निर्माण वर्ष 1958 में प्रारंभ हुआ और वर्ष 1978 में पूरा हुआ। तवा जल संग्रहण क्षेत्र की पश्चिमी सीमा पर सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान तथा बोरी वन्य जीव अभ्यारण्य स्थित है।

  • पोंग बांध का निर्माण व्यास नदी पर हिमाचल प्रदेश के दक्षिण पश्चिम भाग पर किया गया है। इस बांध की ऊंचाई 133 मी. है। इस बांध द्वारा निर्मित जलाशय के जल का उपयोग सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन हेतु किया जाता है। इसे व्यास डैम भी कहा जाता है। यह वर्ष 1974 में बनकर तैयार हुआ। इस बांध के द्वारा महाराणा प्रताप सागर झील का निर्माण हुआ है। जिसे पक्षी विहार घोषित किया गया है। मेजा बांध राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी पर निर्मित है। इस नदी का उद्गम भीलवाड़ा जिले मे होरेरा गांव के पास से अरावली पहाड़ियों की पूर्वी ढाल से होता है। कोठारी, बनास नदी की सहायक नदी है। इस परियोजना की स्थापना मुख्यतः सिंचाई हेतु की गई है। तुलबुल नौवहन परियोजना की स्थापना मुख्यतः जम्मू एवं कश्मीर राज्य में झेलम नदी पर निर्मित की गई है। भारत इसे तुलबुल नौवहन परियोजना कहता है, जबकि पाकिस्तान वूलर वैराज। भारत ने वर्ष 1984 में वूलर झील के मुहाने पर झेलम नदी पर इस बैराज के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया था। इस परियोजना पर भारत एवं पाकिस्तान के मध्य विवाद तब उभरकर सामने आया जब वर्ष 1987 में पाकिस्तान द्वारा इस निर्माण कार्य को वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि का उल्लंघन मानते हुए रोकने की मांग की गई।

  • बगलिहार जलविद्युत परियोजना जम्मू कश्मीर राज्य के डोडा जिले में चिनाब नदी पर बनाई गई है।

  • दमन गंगा सिंचाई परियोजना वलसाड़ जिला, दक्षिणी गुजरात में वापी से 30 किमी. दूर दमनगंगा नदी पर स्थित है।

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  • गिरना सिंचाई परियोजना महाराष्ट्र के जलगांव जिले में गिरना नदी पर निर्मित है।

  • पाम्बा सिंचाई परियोजना पाम्बा नदी पर केरल के पट्टानामथिट्टा जिले में स्थित है।

  • सुइल जलविद्युत परियोजना हिमाचल प्रदेश में चंबा जिले में सुइल नदी पर स्थित है। सुइल रावी नदी की एक सहायक नदी है।

  • दुलहस्ती हाइड्रों पॉवर स्टेशन जम्मू कश्मीर के किश्तवार जिले में चिनाब नदी पर स्थित है। इस संयंत्र की क्षमता 390 मेगावॉट है।

  • ललितपुर में बेतवा नदी पर स्थित राजघाट बांध परियोजना को रानी लक्ष्मीबाई बांध परियोजना के नाम से जाना जाता है।

  • तिलैया अथवा तलैया बांध झारखंड राज्य के कोडरमा जिले में बराकर नदी पर अवस्थित है।

  • किसाऊ बांध यमुना की सहायक नदी टोंस पर स्थापित किया जा रहा है। टोंस हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड की सीमा से होकर प्रवाहित होती है। इस परियोजना से मुख्यतः लाभान्वित होने वाले राज्य उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश हैं।

  • गोदावरी नदी पर स्थित बबली प्रोजेक्ट महाराष्ट्र और तेलंगाना की एक अंतर्राज्यीय अति विवादित बांध परियोजना है।

  • तपोवन और विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजनाएं उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी पर स्थित हैं।

  • महाकाली संधि भारत और नेपाल के मध्य फरवरी, 1996 में हुई थी। इस संधि द्वारा महाकाली अथवा शारदा बैराज, टनकपुर बैराज एवं प्रस्तावित पंचेश्वर परियोजना आच्छादित है।

  • कल्पसर परियोजना के अंतर्गत खम्भात की खाड़ी (गुजरात) के पार एक बांध बनाने की योजना है जिससे ज्वारीय शक्ति उत्पन्न की जाएगी। इस योजना के तहत एक विशाल जलाशय के निर्माण की भी योजना है जिसके ताजे जल का उपयोग कृषि, पेयजल एवं औद्योगिक प्रयोग हेतु किया जाएगा।

  • दिसंबर, 1959 में भारत सरकार और नेपाल सरकार के बीच गंडक बैराज के निर्माण पर समझौता हुआ था। बैराज का निर्माण गंडक नदी पर वाल्मीकि नगर में वर्ष 1968-69 में किया गया, जिसका उद्देश्य नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना था। इसके तहत पश्चिमी नहर प्रणाली, पूर्वी नहर प्रणाली और नेपाल में एक विद्युत केन्द्र हेतु जल के बंटवारे पर सहमति बनी थी।

  • प्रोजेक्ट/डैम/नहर तथा उनसे संबंधित नदी/शहर –

मिदनापुर नहर      –    कंसाबती नदी (कसाइ)

तवा प्रोजेक्ट        –    तवा नदी

मेत्तूर डैम           –    कावेरी नदी

उकाई प्रोजेक्ट       –    तापी नदी

हीराकुंड परियोजना   –    ओड़िशा

हल्दिया रिफाइनरी    –    प. बंगाल

तारापुर परमाणु केन्द्र –    महाराष्ट्र

कुद्रेमुख पहाडियां     –    कर्नाटक

भाखड़ा             –    सतलज नदी

इडुक्की            –    पेरियार नदी

नागार्जुन सागर      –    कृष्णा नदी

अलमट्टी बांध       –    कृष्णा नदी

गांधी सागर बांध     –    चंबल नदी

सरदार सरोवर बांध   –    नर्मदा नदी

तिलैया बांध         –    झारखंड

मयूराक्षी       –    पश्चिम बंगाल

शिवसमुद्रम     –    कर्नाटक

टिहरी  बांध    –    भागीरथी

राम गंगा      –    रामगंगा

भद्रा जलाशय   –    कर्नाटक

भवानी सागर   –    तमिलनाडु

राणा प्रताप सागर    –    राजस्थान

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  • बांध नदी

माताटीला बांध      बेतवा नदी

हीराकुंड बांध        महानदी

गांधी सागर बांध     चंबल नदी

काकरापारा बांध      ताप्ती नदी

दुलहस्ती           चिनाब

उकाई              तापी

तवा               तवा

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कृषि

  • भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम भूमिका है। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की आबादी का लगभग 55 प्रतिशत कृषि और इससे  जुड़ी गतिविधियों में लगा है और देश के सकल मूल्य संवर्धन में इसकी हिस्सेदारी 16.4% है।

  • देश में प्रथम कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 1960 में हुई थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु द्वारा 17 नवंबर, 1960 को उत्तर प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय (UPAU) के रुप में इसका उद्घाटन पंतनगर, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में किया गया था। बाद में इसका नाम, गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कर दिया गया। भारत में 15 कृषि-जलवायु क्षेत्र हैं।

  • नेशनल ब्यूरो ऑफ स्वॉयल सर्वे के अनुसार, भारत को 20 कृषि पारिस्थितिक क्षेत्रों में और 60 कृषि-पारिस्थितिक उपक्षेत्रों में विभाजित किया गया है। इनका वर्गीकरण मिट्टी, जलवायु प्रकार एवं प्राकृतिक भौगोलिक पारिस्थितियों के आधार पर किया गया है।

  • भारतीय कृषि का इतिहास पुस्तक एम.एस. रंधावा द्वारा लिखी गई है। इनका पूरा नाम मेहिंदर सिंह रंधावा है। हरित क्रांति के कारण भारतीय कृषि अपने जीवन-निर्वाहक स्वरुप के बजाए व्यापारिक तथा बाजरोन्मुख रुप ग्रहण करती जा रही है।

  • खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के मानकों के अनुसार, खाद्यान्नों के सुरक्षित भंडारण के समय 14 प्रतिशत तक ही सापेक्षिक आर्द्रता होनी चाहिए।

  • कृषि में युग्म पैदावार का आशय है कि – 2 या 2 से अधिक फसल एक ही भूमि पर एक ही फसल वर्ष में उगाना।

  • एक ही साथ एक भूमि पर दो या अधिक फसल उगाना अंतर्फसली खेती कहलाती है।

  • मिश्रित खेती से तात्पर्य कई तरह की फसलों के उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन को बढ़ावा देने से है, जिससे खेती से शेष बचे समय में पशुपालन करके किसान अपनी आय में वृध्दि कर सके।

  • भारत में ठेकेदारी कृषि को लागू करने में पंजाब राज्य अग्रणी है।

  • सिक्किम पूर्वोत्तर में स्थित एक पहाड़ी प्रदेश है। यहां का अधिकांश भू-भाग जंगलों से घिरा है। इस राज्य की कुल भूमि का मात्र 10% से भी कम भाग ही कृषि कार्य हेतु उपलब्ध है। यहां पर औसत वार्षिक वर्षा 125 सेमी है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश, पंजाब एवं हरियाणा प्रमुख अन्न उत्पादक राज्यों में से है।

  • देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में उत्तर प्रदेश का अंशदान सर्वाधिक है।

  • भारत में 2013-14 (P) के कृषि मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, शुध्द बुवाई क्षेत्र-141428000 हे.  (43.0%), वन क्षेत्र 71828000 हे. (21.8%) एवं अन्य क्षेत्र 115470000 हे. (35.2%) है।

  • विश्व में शीर्ष 10 चावल उत्पादक देशों में चावल की कृषि का लगभग 32.7% भारत में किया जा रहा है। भारत में खाद्यान्न के सकल क्षेत्र में से लगभग 33.7% भाग पर चावल की कृषि की जा रही है।

  • भारत में सर्वाधिक उर्वरक उपभोग करने वाले पांच राज्यों में क्रमशः उत्तर प्रदेश (4230.09 हजार टन), महाराष्ट्र (2724.58 हजार टन), मध्य प्रदेश (1966.54 हजार टन), पंजाब ((1943.71 हजार टन) एवं कर्नाटक (1779.76 हजार टन) हैं। वर्ष 2015-16 के आंकड़ों के आधार प्रति हेक्टेयर किग्रा. की दृष्टि से सर्वाधिक उर्वरक उपभोग करने वाले पांच राज्य क्रमशः हैं – तेलंगाना (268.91 किग्रा.), पंजाब (246.60 किग्रा.), आंध्र प्रदेश (225.70 किग्रा.), हरियाणा (220.42 किग्रा.) एवं बिहार (220.21 किग्रा.)। संतुलित उर्वरकों का उपयोग उत्पादन बढ़ाने के लिए, खाद्य की गुणवत्ता उन्नत करने के लिए और भूमि उत्पादकता बनाए रखने के लिए किया जाता है।

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  • भारत में बीज ग्राम संकल्पना का मुख्य उद्देश्य एक समान विचारों वाले किसानों को स्वयं सहायता समूह में एक साथ प्रशिक्षण प्रदान करना, जिससे कि वे अपनी पसंद की फसलों को उत्पादित करने के साथ काम कर सके जिससे स्वयं की तथा साथी किसानों को बीजों की जरुरतों को उचित समय और सस्ती कीमत पर पूरा किया जा सके।

  • एगमार्क केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना है, जो कृषि उत्पाद (ग्रेडिंग एवं मार्केटिंग) अधिनियम, 1937 के अंतर्गत कृषि और संबध्द उत्पादों की ग्रेडिंग और मानकीकरण को प्रोत्साहित करती है। वर्ष 1938 के बाद से यह योजना अब तक लागू है।

  • कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए भारत सरकार ने इसके सतत विकास हेतु कई कदम उठाए हैं। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना द्वारा सतत् मिट्टी की उर्वरता सुधारने, प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना के माध्यम से पानी की  बढ़ी हुई क्षमता तथा सिंचाई के उपयोग में सुधार करने, परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) द्वारा जैविक खेती को समर्थन और किसानों के आय में वृध्दि हेतु एकीकृत राष्ट्रीय कृषि बाजार के सृजन को समर्थन जैसे कई कदम उठाए गए हैं।

  • किसान क्रेडिट कार्य योजना ( KCC) पूरे देश में संचालित हो रही है और इसका क्रियान्वयन वाणिज्यिक बैंकों, सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा किया जा रहा है।

  • हरी खाद वाली फसलों में से नाइट्रोजन की सर्वाधिक मात्रा बोड़ा (लोबिया) में 0.49 प्रतिशत पाई जाती है। हरी खाद कृषि से उस सहायक फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्वों को बढ़ाने तथा उसमें जैविक पदार्थों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। ढैंचा में 0.42%, शनई में 0.43 प्रतिशत तथा ग्वार में 0.34% नाइट्रोजन की मात्रा पाई जाती है, किंतु शनई की बुआई में खेत सर्वाधिक नाइट्रोजन 86-129 किग्रा/हे. प्राप्त होती है। ढैंचा से 84-105 किग्रा./हे. , ग्वार से 68-85 किग्रा./हे. तथा लोबिया से 74-88 किग्रा./हे. नाइट्रोजन खेत को प्राप्त होता है।

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हरित क्रांति

  • विश्व में हरित क्रांति का जनक नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग को माना जाता है। इनका जन्म 25 मार्च, 1914 को अमेरिका के आइवोआ प्रांत में हुआ था। मेक्सिकों उनका कर्म क्षेत्र रहा है। इनके द्वारा विकसित गेहूँ की उच्च उत्पादकता वाली प्रजातियों से भारत, पाकिस्तान, मेक्सिकों सहित अनेक देशों में गेहूं का उत्पादन दोगुना हो गया।

  • बोरलॉग विश्व के उन 7 व्यक्तियों में शामिल हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार, अमेरिकी राष्ट्रपति का मेडल ऑफ फ्रीडम तथा कांग्रेसनल गोल्ड मेडल तीनों ही प्राप्त हुआ है। बोरलाग को वर्ष 2006 में भारत का पद्म विभूषण सम्मान भी प्रदान किया गया है।

  • भारत में हरित क्रांति का पिता (Father of the Green Revolution) डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन को माना जाता है। इनके नेतृत्व में ही सफलतापूर्वक भारत में गेहूं की उच्च उत्पादकता प्रजातियों का विकास किया गया, तब भारत में उच्च उत्पादक बीजों का प्रयोग प्रारंभ हुआ। इसके अतिरिक्त उर्वरकों का अधिक प्रयोग एवं सिंचाई सुविधाओं के पर्याप्त विकास पर भी विशेष बल दिया गया।

  • भारत में उन्नत बीजें के प्रयोग कार्यक्रमि (HYVP) की शुरुआत सं. रा. अमेरिका आधारित रॉकफेलर फाउंडेशन के सहयोग से की गई।

  • भारत में हरित क्रांति का प्रथम चरण वर्ष 1966 से 1981 तक चला। प्रथम चरण में इसे हरियाणा, पंजाब, और पश्चिम उत्तर प्रदेश में लागू किया गया। इसका दूसरा चरण वर्ष 1981 से 1995 की अवधि को माना जाता है और तीसरा चरण वर्ष 1995 से प्रारंभ हुआ और देश के सभी क्षेत्रों तक विस्तृत कर दिया गया था।

  • भारत में हरित क्रांति का उत्पादन एवं उत्पादकता दोनों में सर्वाधिक लाभ गेहुं की फसल को प्राप्त हुआ। हरित क्रांति के प्रारंभ से पूर्व देश में जहां 12.3 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हो रहा था वहीं वर्ष 2000-01 में यह 69.68 मिलियन टन तथा वर्ष 2013-14 में 95.51 मिलियन टन हो गया। यह वृध्दि मुख्यतः प्रति हेक्टेयर उपज में वृध्दि के कारण थी। गेहूं के उपरांत हरित क्रांति का सर्वाधिक प्रभाव चावल की खेती पर देखा गया।

  • हरित क्रांति में मुख्य पादप मेक्सिकन प्रजाति का गेहूं था जिसे बोरलॉग के मेक्सिको स्थित अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं संवर्धन केन्द्र (CIMMYT) से मंगाया गया था।

  • वर्ष 2015-16 तक हरित क्रांति के फलस्वरुप गेहूं की पैदावार प्रति हे. 3034 किग्रा. तक पहुंच गई।

  • भारत में वर्ष 1965 के बाद उच्च उत्पादन देने वाली किस्म के बींजों, उर्वरक, सिंचाई और तकनीकी प्रयोगों को बढ़ावा देना (ग्रामीण विद्युतीकरण, कृषि उत्पादों की बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण सड़कें और विपणन कार्यों को बढ़ावा देना) ही हरित क्रांति के नाम जाना जाता है।

  • 28 जुलाई, 2000 को केन्द्र सरकार ने नई राष्ट्री कृषि नीति की घोषणा की। इस नई नीति के तहत इन्द्रधनुषी क्रांति की परिकल्पना प्रस्तुत की गई। इसके अंतर्गत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से कृषि से संबंधित सभी क्रांतियों को शामिल किया गया।

  • विभिन्न क्रांतियां एवं संबंधित क्षेत्र –

हरित क्रांति (Green Revolution)              – खाद्य उत्पादन

सुनहरी क्रांति (Golden Revolution)        – फल एवं सब्जी उत्पादन (उद्यान कृषि)

श्वेत क्रांति (White Revolution)               – दुग्ध उत्पादन

भूरी क्रांति (Brown Revolution)               – उर्वरक उत्पादन/गैर-परंपरागत ऊर्जा

नीली क्रांति (Blue Revolution)                 – मत्स्यपालन

लाल क्रांति (Red Revolution)                   – मांस/टमाटर उत्पादन

काली क्रांति (Black Revolution)               – पेट्रोलियम उत्पादन

गोल क्रांति (Round Revolution)              – आलू उत्पादन

पीली क्रांति (Yellow  Revolution)            – तिलहन उत्पादन

गुलाबी क्रांति (Pink Revolution)               – मांस निर्यात/झींगा मछली उत्पादन/प्याज उत्पादन

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  • भारत में सर्वप्रथम जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर (उत्तराखंड) द्वारा जीरो टिल बीज एवं उर्वरक ड्रिल का विकास किया गया। टिलेज पध्दति के अनुसार बिना जुताई किए कई सालों तक खेती की जा सकती है।

  • भारत में नीली क्रांति का संबंध मत्स्यपालन से है। इसकी शुरुआत पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान उस समय की गई, जब केन्द्र सरकार ने फिश फार्मर्स डेवलपमेंट एजेंसी (FFDA) की शुरुआत की। इस क्रांति के द्वारा मत्स्य उत्पादन में तीव्र बढ़ोत्तरी हुई है।

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खाद्यान्न एवं फसलें

रबी की फसलें

  • भारत के विभिन्न भागों में पारिस्थितिकीय अंतर के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार के फसल चक्र अपनाएं जा रहे हैं, जैसे – पंजाब, हरियाणा, प. उत्तर प्रदेश में धान-गेहूं आदि। भारत में तीन शस्य ऋतुएं हैं, जो इस प्रकार हैं –

  1. रबी की फसल

  2. खरीफ की फसल

  3. जायद की फसल

  • रबी की फसलों को शीत ऋतु में अक्टूबर से नवंबर के मध्य बोया जाता है और ग्रीष्म ऋतु में मार्च से अप्रैल के मध्य काटा जाता है। रबी की प्रमुख फसलें – गेहूं, जौ, चना, मटर, सरसों, मसूर तथा आलू इत्यादि हैं। रबी की फसलें देश के विस्तृत भाग में बोई जाती हैं। शीत ऋतु में शीतोष्ण पश्चिमी विक्षोभों में होने वाली वर्षा इन फसलों के अधिक उत्पादन में सहायक होती है।

  • गेहूं भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। यह देश के उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भागों में पैदा की जाती है। भारत मे गेहूं की कृषि के लिए 100C-250C तापमान एवं लगभग 80 सेमी. औसत वार्षिक वर्षा की आवश्यकता रहती है, जिसे मध्यम ताप एवं मध्यम वर्षा कहा जा सकता है।

  • भारत में गेहूं की कृषि 30.23 मि. हेक्टेयर (2015-16) भाग पर की जाती है।

  • गेहूं की कुछ प्रमुख किस्में – सोनालिका, अर्जुन, कुंदन, अमर (HW-2004), भवानी (HW-1085), चन्द्रिका (HPW-184), देशरत्न (BR-104), कंचन (DL-803), गोमती (K-9465) आदि हैं।

  • भारत में गेहूं की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा गेहूं की बौनी प्रजातियों का विकास किया गया। जिनमें लर्मा रोजो 64-A, सोनोरा-63, सोनोरा-64, मेयो 64 और एस-227 का परीक्षण देश के गेहूं उत्पादक राज्यों में किया गया। इस बौनी किस्मों के सफल परीक्षण के फलस्वरुप भारत में गेहूं की उत्पादकता बढ़ी।

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  • नोरिन-10 गेहूं मे बौनेपन का जीन है।

  • मैकरोनी गेहूं असिंचित परिस्थितियों अथवा सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।

  • कल्याण सोना गेहूं की एक उन्नत किस्म है।

  • रस्ट (Rust) गेहूं की फसल का रोग है यह तीन प्रकार का होता है –

  1. पीला किट्ट (Yellow Rust)

  2. भूरा किट्ट (Brown Rust)

  3. काला किट्ट (Black Rust)

  • करनाल बंट गेहूं की एक कवक जनित (Fungal) बीमारी है। यह रोग टिलेटिया इंडिका नामक कवक से होता है। सर्वप्रथम इस रोग की पहचान वर्ष 1931 में हुई थी।

  • ट्रिटिकेल, गेहूं एवं राई के मध्य संकर का प्रतिफल है।

  • वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश (22.42 मि. टन) से प्राप्त होता है। इस दृष्टि से मध्य प्रदेश (17.10 मि. टन) एवं पंजाब (15.05 मि. टन) का क्रमशः दूसरा एवं तीसरा स्थान है।

  • उत्तर प्रदेश में अधिकतम क्षेत्रफल वाली फसल पध्दति धान-गेहूं है।

  • गेहूं की सिंचाई की ताज निकलने की अवस्था सर्वाधिक क्रांतिक अवस्था है। जहां केवल एक ही सिंचाई करना संभव हो वहां इसी अवस्था में सिंचाई को महत्व दिया जाता है, ताज निकलने की अवस्था बुवाई के 20-25 दिन बाद आती है। जहां केवल दो सिंचाई करना संभव होता है। वहां पहली सिंचाई ताज निकलने की अवस्था में एवं दूसरी सिंचाई पुष्प लगने की अवस्था में किए जाने को महत्व दिया जाता है।

  • भारत में मुख्यतः तीन फसलो की बुआई की जाती है –

रबी फसल – बुआईः अक्टूबर-नवंबर, कटाईः मार्च- अप्रैल

प्रमुख फसलें –गेहूं, जौ, चना, मटर, सरसों, मसूर तथा आलू इत्यादि।

खरीफ फसल – बुआईः जून-जुलाई, कटाईः अक्टूबर-नवंबर

प्रमुख फसलें – चावल, ज्वार, बाजरा, मक्का, तिल, मूंगफली इत्यादि।

जायद फसल – मार्च-जुलाई (ग्रीष्मकालीन फसल)

प्रमुख फसलें  – तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, खीरा, भिंडी आदि विभिन्न प्रकार की सब्जियों की खेती।

  • नगदी फसलों (Cash Crops) के अंतर्गत गन्ना (Sugarcane), कपास, जूट, तंबाकू, तिलहन आदि प्रमुख हैं।

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  • मही सुगंधा धान की फसल की एक प्रजाति है। धान की कुछ अन्य प्रमुख प्रजातियां हैं – आभा (R-155-355), अभय (IET-10746), आदित्य (IET-7613), आकाशी, आम्बिका, दीप्ती (R-34-2478), गजपती (IET-13251), गरिमा, गीतांजलि (CRM-2007-1), पीएनआर-546, उन्नत पूसा बासमती-1 (IET-18990)।

  • गेहूं, आलू और गन्ना के उत्पादन में उत्तर प्रदेश का देश में प्रथम स्थान है।

  • राज 3077 गेहूं की एक प्रजाति है। यह देर से बुवाई के लिए एवं सिंचित क्षेत्र हेतु उपयुक्त माना जाता है। इसकी औसत उत्पादकता 36-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रहती है। गेहूं की अन्य कुछ प्रमुख किस्में हैं – सोनालिका, अर्जुन, कुंदन, अमर (HW-2004), भवानी (HW-1085), चंद्रिका (HPW-184), देशरत्न (BR-104), कंचन (DL-803), गोमती (K-9465) , UP-308 इत्यादि।

  • पूरा सिंधु गंगा गेहूं की एक प्रजाति है। गेहूं की कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं – पूसा बसंत, पूसा बहार, पूसा गौतमी, पूसा अमूल्य, पूसा वत्सला, पूसा अनमोल एवं पूसा किरन।

  • अरहर की प्रजातियां – यू.पी.ए.एस.-120, C.P.L.151, I.C.P.L.87, बहार, एन.डी.ए-1।

खरीफ की फसलें

  • खरीफ फसलें देश के विभिन्न क्षेत्रों में मानसून के आगमन के साथ बोई जाती हैं और अक्टूबर-नवंबर में काट ली जाती है। इस ऋतु में बोई जाने वाली मुख्य फसलों में धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, तिल, मूंगफली इत्यादि है। सोयाबीन भी खरीफ की फसल में शामिल हैं।

  • धान की खेती मुख्य रुप से असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और महाराष्ट्र विशेषकर कोंकण तटीय क्षेत्रों, उत्तर प्रदेश और  बिहार में की जाती है। सिंचाई की सुविधा का विकास होने के पश्चात पंजाब एवं हरियाणा में भी धान की फसल बोई जाती है।

  • धान उष्णकटिबंधीय फसल है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण-पूर्व एशिया में मानी जाती है।

  • धान की फसल के लिए 240 C औसत तापमान एवं 150 सेमी. औसत वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है।

  • चावल, भारत की प्रमुख खाद्य फसल है। कृषि मंत्रालय के वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के 44.11 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र पर चावल की कृषि की जाती है। इस प्रकार कृषि क्षेत्र के अनुसार, भारत में सबसे महत्वपूर्ण फसल चावल है।

  • वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, चावल की खेती के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र उत्तर प्रदेश (5.87 मि.हे.) में पाया जाता है। इस संदर्भ में पश्चिम बंगाल (5.38 मि.हे.) का दूसरा एवं ओड़िशा (4.17 मि. हे.) का तीसरा स्थान है.

  • भारत में प्रति हे. चावल का औसत उत्पादन वर्ष 2014-15 में 2391 किलोग्राम था।

  • भारत में धान की उत्पादकता सर्वाधिक पंजाब में है। वर्ष 2014-15 में पंजाब में प्रति हेक्टेयर 3838 किग्रा. धान का उत्पादन हुआ है।

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  • भारत में चावल का कटोरा (Rice Bowl) कृष्णा-गोदावरी डेल्टा क्षेत्र को कहा जाता है। यह क्षेत्र आंध्र प्रदेश के अंतर्गत आते हैं। चावल के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र तेलंगाना और रायलसीमा हैं, जो कृष्णा-गोदावरी डेल्टा क्षेत्रों में ही विस्तृत हैं।

  • भारत में वर्ष 2014-15 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार चार शीर्ष चावल उत्पादक राज्य –

  1. पश्चिम बंगाल (14.68 मि. टन)

  2. उत्तर प्रदेश (12.17 मि. टन)

  3. पंजाब (11.11 मि. टन)

  4. ओड़िशा (8.30 मि. टन)

  • भारत में धान की प्रमुख किस्मों में – जमुना, करुणा, जया, कांची, जगन्नाथ, कृष्णा, कावेरी, हंसा, विजया, पद्मा, अन्नपूर्णा, बाला और रत्ना हैं।

  • अमन धान जून-जुलाई में बोया जाता है तथा नवंबर-दिसंबर में काटा जाता है।

  • पूसा सुगंधा-5 धान की एक सुगंधित किस्म है। पूसा आर एच-10 बासमती चावल की संकर प्रजाति है।

  • धान की अन्य संकर प्रजातियों में पी.एच.बी.-71, गंगा, सुरुचि, के आर एच-2, सह्याद्रि-4 आदि हैं।

  • बासमती चावल की रोपाई करते समय बेहतर उत्पादकता हेतु उपयुक्त बीज दर 15-20 किग्रा./हेक्टेयर होनी चाहिए।

  • बारानी दीप, नरेन्द्र संकर, नरेन्द्र शुशका सम्राट, लालमती इत्यादि धान की प्रजातियां हैं।

  • ब्लू ग्रीन एल्गी (नील हरित शैवाल), एजोस्प्रीलियम, फॉस्फोबैक्टीरिया, एजोला आदि चावल की फसल के लिए प्रमुख जैव उर्वरक हैं।

  • संपूर्ण भारत में चावल की खेती के क्षेत्र का सर्वाधिक हिस्सा 13.31 प्रतिशत उत्तर –प्रदेश का है।

  • भारतीय राज्यों में चावल की सर्वाधिक उत्पादकता (किग्रा./हेक्टेयर) पंजाब राज्य (3952 किग्रा./हेक्टेयर) में है, जबकि कुल चावल उत्पादन में सर्वाधिक योगदान पश्चिम बंगाल का है।

  • मूंग एवं उड़द जैसी फसलें जायद में मुख्यतः सिंचित क्षेत्रों में ही उगाई जाती हैं। इन फसलों को निश्चित समयांतराल पर जल की अति आवश्यकता होती है।

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नकदी फसलें

कपास

  • भारत में कपास दूसरी प्रमुख मुद्रादायी फसल है, जिससे देश के सबसे बड़े सूती वस्त्र उद्योग को कच्चा माल प्राप्त होता है।

  • कपास मालवेसी कुल का पौधा है।

  • कपास की विश्व में दो मुख्य प्रजातियां पाई जाती हैं – प्रथम देशज कपास (Old World Cotton) एवं दूसरा अमेरिकन कपास (New World Cotton) कपास भारत का देशज पौधा है। ऋग्वेद एवं मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है।

  • भारत विश्व का पहला देश है, जहां कपास की संकर किस्म विकसित हुई जिसके परिणामस्वरुप वर्धित उत्पादन प्राप्त होता है।

  • कपास की कृषि के लिए काली मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। इसके लिए 250 c से 350 C का उच्च तापमान, 200 दिन की पाला एवं ओला रहित अवधि, स्वच्छ आकाश, तेज व चमकदार धूप तथा 75 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। वर्तमान में (वर्ष 2014-15 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार) प्रमुख फसलों के संदर्भ में कपास की खेती 7.52% क्षेत्र पर की जा रही है। उत्तर-पश्चिमी व पश्चिमी भारत कपास का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है।

  • वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के अग्रणी चार कपास उत्पादक राज्य इस प्रकार हैं –

  1. गुजरात

  2. महाराष्ट्र

  3. तेलंगाना

  4. आंध्र प्रदेश

  • महाराष्ट्र में काली मिट्टी का व्यापक विस्तार है, जो कपास की कृषि के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मिट्टी होती है। कपास को महाराष्ट्र मे श्वेत स्वर्ण के नाम से जाना जाता है।

  • मध्य प्रदेश में कपास की कृषि मुख्यतः राज्य के पश्चिमी भाग में मालवा पठार एवं नर्मदा घाटी क्षेत्रों में की जाती है। यहां के प्रमुख कपास उत्पादक जिले पूर्वी एवं पश्चिमी निमाड़, धार, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, होशंगाबाद तथा राजगढ़ हैं।

  • शाजापुर-उज्जैन जिलों को कपास की खेती के कारण सफेद सोने का क्षेत्र भी कहा जाता है।

  • कपास के रेशे कपास के बीज से प्राप्त होते हैं।

गन्ना

  • गन्ना एक उष्णकटिबंधीय पौधा है, परंतु उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में भी, जैसे गर्म आर्द्र दशाओं के अंतर्गत उत्तरी भारत में उगाया जा सकता है। यह ग्रेमिनी कुल का पौधा है।

  • गन्ना की फसल के लिए सामान्यतया 200-260C तापमान एवं आठ माह तक लगभग 150 सेमी. वर्षा की आवश्यकता होती है।

  • वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में गन्ने की खेती के अंतर्गत सर्वाधिक भूमि उत्तर प्रदेश (21.41 लाख हे.) में उसके बाद महाराष्ट्र (10.3 लाख हे.) में है।

  • भारत में शुध्द सकल कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक सिंचित क्षेत्र गन्ना (95.3%) का है।

  • भारत में वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, गन्ना उत्पादक चार अग्रणी राज्यों में –

  1. उत्तर प्रदेश (133.06 मि. टन)

  2. महाराष्ट्र (84.70 मि. टन)

  3. कर्नाटक (43.78 मि. टन)

  4. तमिलनाडु (28.09 मि. टन)

 

  • गन्ना उत्पादन के एक व्यावहारिक उपागम जिसे धारणीय गन्ना उपक्रमण अथवा सतत् गन्ना पहल पध्दति कहा जाता है। इसका प्रारंभ भारत में गन्ने की खेती में सुधार हेतु वर्ष 2009 में किया गया था। इस पध्दति का प्रारंभ इक्रीसैट एवं डब्ल्यू.डब्ल्यू.एफ (ICRISAT-WWF) की संयुक्त पहल के रुप में किया गया था। कृषि की प्रारंभिक पध्दति की तुलना में इसमें बीज की लागत बहुत कम होती है। इस पध्दति में च्वयन (ड्रिप) सिंचाई का प्रभावकारी प्रयोग हो सकता है तथा कृषि की पारंपरिक पध्दति की तुलना में अंतराशस्यन की ज्यादा गुंजाइश है। इस पध्दति में अकार्बनिक एवं कार्बनिक दोनों रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है।

  • भारत में गन्ने के प्रजनन का कार्य कोयम्बटूर में किया जा रहा है। कोयम्बटूर (तमिलनाडु) में वर्ष 1912 में गन्ना प्रजनन संस्थान की स्थापना की गई थी। 1 अप्रैल, 1969 को इसे ICAR का भाग बनाया गया।

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  • गन्ने की अडसाली फसल की खेती मुख्य रुप से महाराष्ट्र के कम वर्षा वाले क्षेत्रों में की जाती है। इसकी बुवाई जुलाई-अगस्त मे होती है तथा यह पकने के लिए 18 महीने का समय लेती है।

  • भारत विश्व में चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जबकि चीन दूसरे पर है।

  • वर्ष 1903 में भारत की प्रथम चीनी मिल उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के प्रतापपुर में स्थापित की गई थी।

  • उत्तर प्रदेश राज्य भारत का शक्कर का प्याला कहलाता है।

  • प्रारंभ (1960) में उत्तर प्रदेश व बिहार मुख्य चीनी उत्पादक राज्य थे, किंतु उसके बाद दक्षिण भारत में अनुकूल जलवायु व काली मृदा का क्षेत्र होने के कारण इस उद्योग का स्थानांतरण हो गया। दक्षिण भारत में गन्ने की उच्च उत्पादकता पाई जाती है। यहां गन्ने में शर्करा की मात्रा भी अधिक पाई जाती है।

  • भारत, विश्व में चीनी का दूसरा बड़ा (ब्राजील के बाद) उत्पादक देश है। इस संदर्भ में तीन चीन तीसरे स्थान पर है।

  • नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र का प्रथम, उत्तर प्रदेश का द्वीतीय स्थान है।

  • भारत में सूती वस्त्र के बाद चीनी उद्योग सबसे बड़ा कृषि आधारित उद्योग है।

  • वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में विश्व में चीनी का कुल उत्पादन 172.35 मिलियन टन रहा, जिसमें ब्राजील का हिस्सा 35.53 मिलियन टन तथा भारत का हिस्सा 26.03 मिलियन टन रहा है। ब्राजील से चीनी का निर्यात 24.13 मिलियन टन था।

  • भारत में चीनी का उत्पादन विश्व उत्पादन का 15.1% है।

  • फसलों का उनके शुध्द सकल कृषि क्षेत्र के सिंचित क्षेत्रों का प्रतिशत –

फसल         सिंचित क्षेत्र (प्रतिशत में)

गन्ना         95.3

गेहूं           93.6

चावल         59.6

तिलहन        27.3

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तिलहन

  • तिलहन भारतीय भोजन में वसा का मुख्य स्रोत है।

  • भारत की प्रमुख तिलहनी फसलें (Oilseed Crops) तोरिया, सरसों, तिल, अलसी, सोयाबीन, सूर्यमुखी, अरंडी और बिनौला है।

  • पीली क्रांति का संबंध तिलहन उत्पादन से है। तिलहन से तेल और खली की प्राप्ति होती है। जिनका उपयोग स्नेहक, वार्निश, औषधि, सुगंधित पदार्थ, मोमबत्ती, साबुन, उर्वरक, पशु-आहार आदि के निर्माण में किया जाता है।

  • भारत में वर्ष 2014-15 में कुल तिलहन उत्पादन 27.51 मिलियन टन रहा है।

  • भारत में तिलहन का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश इसके पश्चात् क्रमशः राजस्थान एवं गुजरात का स्थान आता है।

  • मूंगफली एक प्रमुख तिलहनी फसले है। मूंगफली वनस्पतिक प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। मूंगफली उष्णकटिबंधीय पौधा है। इसके लिए 150 c से 250 c तापमान एवं 50 से 80 सेमी. तक की वर्षा पर्याप्त होती है। भारत में मूंगफली को गरीबों का काजू के नाम से भी जाना जाता है।

  • पेगिंग मूंगफली की फसल में होने वाली एक लाभकारी प्रक्रिया है। इसमें परागकण के बाद फूल के अवशेष भाग के आधार से पेग निकलकर जड़ की तरह नीचे की ओर मुड़कर जमीन के भीतर वृध्दि करता है। मूंगफली की फसल के लिए जिप्सम की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।

  • भारत में वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, मूंगफली उत्पादक तीन अग्रणी राज्य हैं –

  1. गुजरात (3.02 मि. टन)

  2. राजस्थान ( 1.01 मि. टन)

  3. तमिलनाडु (0.93 मि. टन)

  • सोयाबीन खाद्य तेल के अलावा प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। सोयाबीन के लिए 150 c से 250 c का तापमान, 40 सेमी. से 60 सेमी. का वार्षिक वर्षा और 6 से 6.5 pH मान वाली अम्लीय दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है।

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  • सोयाबीन खरीफ फसल के तौर पर जून में बोई जाती है और अक्टूबर में काटी जाती है। इस फसल को 3 से 4 बार सिंचाई की आवश्यकता बड़ती है।

  • भारत में वर्ष 2014-15 के कृषि सांख्यिकी के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश के 5.58 मिलियन हे. क्षेत्र पर सोयाबीन की कृषि की जाती है, जो देश के कुल सोयाबीन कृषि क्षेत्र का 51.12 प्रतिशत है। सोयाबीन कृषि क्षेत्र के संदर्भ में दूसरा स्थान महाराष्ट्र का है।

  • भारत में तीन अग्रणी सोयाबीन उत्पादक राज्य –

  1. मध्य प्रदेश (6.35 मि. टन)

  2. महाराष्ट्र (2.38 मि. टन)

  3. राजस्थान (0.69 मि. टन) हैं।

  • सरसों भारत की प्रमुख तिलहनी फसल है। सरसों की फसल के अंतर्गत आती है। सरसों की फसल के लिए 150 c से 250 c का तापमान तथा 75 सेमी. से 100 सेमी. की वार्षिक वर्षा की आवश्यकता है। इसकी बुवाई अक्टूबर-नवंबर एवं कटाई फरवरी-मार्च में की जाती है।

  • वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, देश में राजस्थान सरसों का शीर्ष उत्पादक है। इस संदर्भ में दूसरे स्थान पर मध्य प्रदेश, तीसरे स्थान पर हरियाणा तथा चौथे स्थान पर उत्तर प्रदेश है।

  • सरसों की प्रमुख प्रजातियों में पूसा बोल्ड, पूसा, जय किसान और वरुणा है।

  • पीतांबरी (RYSK-05-02) पीली सरसों की एक प्रजाति है। इसकी परिपक्वता अवधि 110-115 दिन है। इसकी औसत पैदावार 1536 किग्रा. प्रति हे. है।

  • फसलों की औसत वार्षिक जल की आवश्यकता –

गन्ना     –    लगभग 150 सेमी.

जूट      –    लगभग 125-200 सेमी.

गेहूं       –    लगभग 80 सेमी.

मूंगफली   –    लगभग 50-80 सेमी.

  • वर्ष 2014-15 के अनुसार कुछ राज्यों का मूंगफली फसल क्षेत्रफल एवं उत्पादकता –

राज्य         क्षेत्र (हजार हे. में)         उत्पादकता (किग्रा./हे.)

पंजाब         1                      1857

छत्तीसगढ़      26                     1412

पश्चिम बंगाल  77                     2325

उत्तर प्रदेश     98                    857

  • फसल प्रजातियां

चना          पंत G-114, गौरव, राधे के-4

कपास         देशी श्यामली, सुविन, सुजाता

मूंगफली       चित्रा 64, चन्द्रा, कौशल

गेहूं           कुन्दन, कल्याण सोना, सोनालिका

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दलहन

  • भारत में अधिकांश जनसंख्या की प्रोटीन प्राप्ति का सबसे प्रमुख साधन दाले हैं। यहां पर रबी, खरीफ एवं जायद तीनों फसलों के अंतर्गत दाल की कृषि की जाती है।

  • भारत की प्रमुख दलहनी फसल चना, उड़द, मूंग, मटर, मसूर और अरहर हैं।

  • दलहनी फसलों में हवा से नाइट्रोजन संचित करने की क्षमता होती है। कोबाल्ट, राइजोबियम द्वारा तात्विक नाइट्रोजन स्थिरिकरण के लिए आवश्यक तत्व है तथा विटामिन B12 के संश्लेषण मे सहायक होता है।

  • भारत में दालों का अत्यधिक उपभोग होने के कारण इनका अग्रणी उत्पादक होने के बावजूद आयात करना पड़ता है। भारत दलहनी फसलों का मुख्य उत्पादक एवं उपभोक्ता दोनों है। कुल दाल के उत्पादन में भारत के बाद म्यांमार का स्थान है।

  • भारत में वर्ष 2014-15 के अंतिम आंकड़ें के अनुसार, दालों का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश ( 4828 हे. टन) है। इस संदर्भ मे महाराष्ट्र (2053 हे. टन) एवं राजस्थान (1952 हे. टन) का क्रमशः दूसरा एवं तीसरा स्थान है। चौथा स्थान उत्तर प्रदेश का है।

  • भारत के दलहनी फसलों में अरहर का प्रमुख स्थान है। अरहर की फसल के लिए 200-250 C का तापमान और 40 से 80 सेमी. की वार्षिक वर्षा उपयुक्त मानी जाती है। इसकी फसल गंगा मैदान के जलोढ़ मिट्टी क्षेत्र से लेकर प्रायद्वीप के काली मिट्टी तक के क्षेत्रों में उगाई जाती है। त्रुटिपूर्ण अपवाह, जल लग्नता एवं पाला फसल के लिए हानिकारक है। अरहर वर्ष भर की फसल है।

  • अरहर की उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई थी।

  • वर्ष 2014-15 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत में सर्वाधिक अरहर का उत्पादन महाराष्ट्र (726 हे. टन), का है। इस संदर्भ में मध्य प्रदेश (511 हे. टन) का दूसरा एवं कर्नाटक (474 हे. टन) का तीसरा स्थान है।

  • मालवीय चमत्कार अरहर की एक प्रजाति है। अरहर की अन्य मुख्य प्रजातियां – अमर, आजाद, बहार, मालवीय विकाश (MA-6) पारस इत्यादि हैं।

  • भारत में चना का सर्वाधिक उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है।

  • फलीदार अथवा दलहनी फसलों में संतुलित उर्वरक अनुपात (एन.पी.के.) 0:1:1, 1:2:2 अथवा 1:2:3 होता है।

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रेशम

  • भारत में चीन के बाद विश्व का दूसरा प्रमुख रेशम उत्पादक देश है।

  • भारत में शहतूत, टसर, ईरी एवं मूंगा प्रकार के रेशम पाए जाते हैं।

  • रेशम रसायन की भाषा में रेशम कीट के रुप में विख्यात इल्ली (Caterpillar) द्वारा निकाले जाने वाले एक प्रोटीन से बना होता है। ये रेशम कीट कुछ विशेष खाद्य पौधों पर पलते हैं तथा अपने जीवन को बनाए रखने के लिए सुरक्षा कवच के रुप में कोसों का निर्माण करते हैं। रेशम कीट का जीवन चक्र 4 चरणों का होता है – अंडा (Egg), इल्ली (Caterpillar), प्यूपा (Pupa) तथा शलभ (Moth)

  • रेशम प्राप्त करने के लिए इसके जीवन-चक्र मे कोसों के चरण पर अवरोध डाला जाता है जिससे व्यावसायिक महत्व का अटूट तंतु निकाला जाता है तथा इसका इस्तेमाल वस्त्र की बुनाई में किया जाता है।

  • कर्नाटक भारत का सबसे बड़ा रेशम उत्पादक राज्य है इस दृष्टि में आंध्र प्रदेश का दूसरा स्थान है।

  • कर्नाटक शहतूत, रेशम का अग्रणी उत्पादक राज्य है। यहां कुल शहतूत रेशम का 48% उत्पादित किया जाता है। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक देश के कुल कच्चे रेशम का लगभग 34% भाग उत्पादित करता है।

  • कुल रेशम उत्पादन में आंध्र प्रदेश का द्वीतीय स्थान है, जो देश का कुल 18% कच्चा रेशम उत्पादित करता है।

  • मूंगा रेशम असम राज्य में सर्वाधिक पैदा किया जाता है। यह राज्य देश के कुल मूंगा रेशम उत्पादन का 85.5% हिस्सा पैदा करता है।

  • ईरी रेशम उत्पादन असम मे सर्वाधिक होता है। असम भारत के कुल ईरी रेशम उत्पादन का 62.1% भाग उत्पादित करता है।

  • टसर रेशम को ट्रापिकल टसर तथा ओक टसर दो भागों में विभक्त किया जाता है। ट्रॉपिकल टसर का सर्वाधिक उत्पादन झारखंड में, जबकि ओक टसर का सर्वाधिक उत्पादन मणिपुर में होता है। जबकि संपूर्ण टसर का सर्वाधिक उत्पादन झारखंड राज्य में होता है।

  • रेशम के प्रकार उत्पादक राज्य (उत्पादन में हिस्सा)

शहतूत रेशम    –    कर्नाटक (48%)

टसर रेशम     –    झारखंड (81%)

ईरी रेशम      –    असम (62.1%)

मूंगा रेशम     –    असम (85.5%)

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बागानी फसलें

कॉफी/कहवा

  • भारत में सर्वप्रथम कर्नाटक के चिकमंगलूर जिले मे कॉफी उगाया गया था।

  • भारत में कहवा (Coffee) की दो प्रमुख किस्में –

  1. अरेबिका

  2. रोबस्टा पैदा की जाती हैं।

  • भारत में विश्व के कुल कॉफी उत्पादन का मात्र 2 प्रतिशत उत्पादन किया जाता है। किंतु इसका स्वाद उत्तम होने के कारण इसकी मांग विदेशों में अधिक है।

  • कहवा के लिए 150-180 C ग्रेड औसत वार्षिक तापमान तथा 150 सेमी. से 250 सेमी. की औसत वार्षिक वर्षा की आवश्यकता पड़ती है। ढलवा पर्वतीय धरातल एवं दोमट अथवा लावा निर्मित मिट्टी इसके लिए उपयुक्त होती है।

  • देश में कॉफी का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला राज्य कर्नाटक है। वर्ष 2016-17 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कॉफी का कुल उत्पादन 312,000 MTs है। जिसमें कर्नाटक का कुल उत्पादन 221745 MTs (71.07%) है।

  • काफी उत्पादन में केरल (63265 MTs) द्वीतीय स्थान पर है यह भारत में कॉफी उत्पादन का 20.28% कॉफी उत्पादित करता है।

  • तमिलनाडु कॉफी उत्पादन में तृतीय स्थान पर है। यहां भारत के कुल कॉफी उत्पादन का 5.23% कॉफी का उत्पादन होता है।

  • कॉफी का प्रवर्धन बीजों द्वारा होता है।

  • राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की स्थापना वर्ष 1984 मे सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत एक स्वायत्त सोसाइटी के रुप में की गई थी। इसका मुख्यालय गुड़गांव (हरियाणा) में स्थित है।

  • भारत सरकार ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन सांविधिक अधिनियम कॉफी अधिनियम, 1942 की धारा VII के द्वारा कॉफी बोर्ड का गठन किया था।

  • वर्ष 2015-15 च.अ.अ. आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में कहवा की खेती का सर्वाधिक क्षेत्रफल (55.03%) पाया जाता है। इस संदर्भ मे केरल (20.14%) दूसरे तथा आंध्र प्रदेश (15.69%) तीसरे स्थान पर है।

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चाय एवं रबर

  • चाय भारत की सबसे महत्वपूर्ण बागानी फसल है। यह दक्षिणी चीन के यून्नान पठार का मूल पौधा है।

  • चाय उष्णकटिबंधीय जलवायु का पौधा है। चाय के पौधों के लिए 250-300 C का तापमान (शीत ऋतु का 150 C से कम तापमान एवं पाला हानिकारक) की आवश्यकता होती है। इसके लिए 150 सेमी. से 200 सेमी. तक की वार्षिक वर्षा तथा ढलावयुक्त पहाड़ी आदर्श परिस्थितियां होती हैं।

  • भारत में चाय की दो प्रमुख किस्में हैं –

  1. बोहिया या चीनी (Bohea or Chinese)

  2. असामिका या असमी (Assamica or Assamese)

  • भारत मे चाय का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य असम है। वर्ष 2014-15 के अंतिम एवं वर्ष 2015-16 के च.अ.अ. में क्षेत्रफल और उत्पादन दोनों ही दृष्टि से यह भारत का सबसे बड़ा चाय उत्पादक राज्य है। यहां 307 हजार हेक्टेयर भूमि पर चाय की खेती होती है और 607 एवं 653 मिलियन किग्रा. चाय का उत्पादन उपर्युक्त दोनों वर्षों में हुआ है। यहां चाय का अधिकतम क्षेत्र ब्रह्मपुत्र घाटी में फैला है।

  • भारत में प्रमुख चाय उत्पादक राज्य – असम, प. बंगाल, तमिनाडु, केरल तथा कर्नाटक हैं।

  • चाय के उत्पादन एवं उपभोग में भारत का स्थान चीन के बाद दूसरा है। प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष चाय (कैफीन युक्त अर्क अर्थात मेट समेत) खपत के संदर्भ में पराग्वे शीर्ष देश है तथा  उरुग्वे एवं अर्जेंटीना क्रमशः दूसरे एवं तीसरे स्थान पर हैं।

  • वर्ष 2016 के आंकड़ों के अनुसार, विश्व में चाय उत्पादन में चीन का प्रथम स्थान है। इसके पश्चात् भारत का द्वीतीय स्थान है।

  • विश्व में चाय के उत्पादन में तीसरे, चौथे एवं पांचवे स्थान पर क्रमशः केन्या, श्रीलंका एवं तुर्की हैं।

  • वर्ष 2016 (P) के आंकड़ों के अनुसार, विश्व के शीर्ष निर्यातक देशो में –

  1. केन्या (480330 मि. टन)

  2. चीन (328692 मि. टन)

  3. श्रीलंका (280874 मि. टन)

  4. भारत (216790 मि. टन) है।

  • रबर के पौधों के लिए गर्म एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती है। इसके लिए 250-350 C का तापमान एवं लगभग 300 सेमी. औ. वार्षिक वर्षा होती है।

  • भारत का सबसे बड़ा रबर उत्पादक राज्य केरल है। वर्ष 2012-13 के आंकड़ों के अनुसार, यहां देश के कुल रबर उत्पादन का लगभग 87.56 प्रतिशत भाग उत्पादित किया जाता है। वर्तमान में केरल का रबर उत्पादन राष्ट्रीय हिस्सा घटकर 69.66% रह गया है। एर्नाकुलम, कोट्टायम, कोझिकोड एवं कोल्लम केरल के प्रमुख रबर उत्पादक जिले हैं।

  • भारत के प्राकृतिक रबर उत्पादन में शीर्ष राज्यों में –

  1. केरल

  2. त्रिपुरा

  3. कर्नाटक

  4. तमिलनाडु

  5. असम

  • वर्ष 2016 (FAO) के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक रबर उत्पादन में भारत का स्थान चौथा एवं उपभोग में दूसरा है।

  • विश्व में प्राकृतिक रबर का सर्वाधिक उत्पादन थाईलैंड में होता है।

  • नकदी फसलों में भारत को चाय के निर्यात में सर्वाधिक विदेशी मुद्रा प्राप्त हो रही थी। वर्ष 2011-12 में भारत ने (292.4 हजार टन चाय) 4079 करोड़ रुपये मूल्य की चाय का निर्यात किया है।

वर्तमान (2016-17) स्थिति –

नकदी फसल        निर्यात (मिलियन डॉलर में)

तम्बाकू            959

चाय               731

  • वर्तमान में बराक घाटी में उपजायी जाने वाली महत्वपूर्ण फसल धान है, जबकि यहां पर उपजाई जाने वाली दूसरी महत्वपूर्ण फसल गन्ना है।

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अन्य बागानी फसलें

  • बागान अथवा बागानी फसल (Plantation Crop) के अंतर्गत कृषि मंत्रालय के तहत नारियल, सुपारी, ताड़, कोकोआ एवं काजू को रखा जाता है, जबकि वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, इसके (बागान फसल) अंतर्गत चाय, कॉफी एवं रबर को रखा जाता है। अतः नारियल, ताड़, सुपारी, कोकोआ, काजू, चाय, कॉफी एवं रबर बागान अथवा बागानी फसलें हैं।

  • भारत मे तंबाकू का सबसे अधिक उत्पादन आंध्र प्रदेश में होता है। वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुमान के अनुसार, तम्बाकू का 42.55% उत्पादन आंध्र प्रदेश से होता है। वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के अग्रणी तम्बाकू उत्पादक राज्यों में – आंध्र प्रदेश (357 ह. टन), गुजरात (236 ह. टन), उत्तर प्रदेश (132 ह. टन) एवं कर्नाटक (67 ह. टन) हैं।

  • भारत में सर्वाधिक क्षेत्र पर तम्बाकू की कृषि करने वाले राज्य (2014-15) में इस प्रकार हैं – आंध्र प्रदेश (139 हजार हे.), गुजरात (166 हजार हे.), कर्नाटक (94 हजार हे.) एवं उत्तर प्रदेश (31 हजार हे.)।

  • भारत सरकार में कृषि मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2014-15 में नारियल उत्पादन में शीर्ष तीन राज्यों में –

  1. तमिलनाडु (33.8%)

  2. कर्नाटक (25.2%)

  3. केरल (24.0%)

  • इस प्रकार तमिलनाडु, नारियल का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।

  • वैश्विक रुप से इंडोनेशिया, फिलीपींस तथा भारत नारियल के उत्पादन की दृष्टि से आग्रणी देश है।

  • केरल में कई प्रकार की मसाला फसलों के उगाए जाने के कारण इसे मसालों का बागान कहा जाता है। वर्ष 2016-17 (अंतिम) के आंकड़ों के अनुसार, मसालों का अग्रणी उत्पादक राज्य राजस्थान है। केरल प्राचीन काल से ही विश्व में गरम मसालों के संवर्धन के लिए प्रसिध्द है।

  • लौंग, यूजीनिया कैरिया फाइलेटा नामक मध्यम कद वाले सदाबहार वृक्ष की सूखी सूई पुष्प कलिका है। लौंग एक प्रकार का मसाला है। इसका उपयोग औषधि के रुप में भी किया जाता है। वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, लौंग की खेती केरल (1.07 हजार हे. क्षेत्र), तमिलनाडु (1.03 हजार हे. क्षेत्र), कर्नाटक (0.12 हजार हे. क्षेत्र) तथा अंडमान निकोबार द्वीपसमूह (0.16 हजार हे. क्षेत्र) में होती है।

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  • वर्ष 2016 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, सुपारी उत्पादन में भारत के तीन अग्रणी राज्य कर्नाटक (436.29 हजार मीट्रिक टन), केरल (102.20 हजार मी.टन) तथा असम (74.78 हजार मी. टन) हैं।

  • भारत में तीन अग्रणी काजू उत्पादक राज्यों में महाराष्ट्र (220 हजार टन), आंध्र प्रदेश (95.50 हजार टन) एवं ओड़िशा (80.50 हजार टन) हैं।

  • काली मिर्च को काला सोना कहा जाता है।

  • कालीमिर्च के लिए उष्ण और आर्द्र जलवायु, 200 सेमी. वार्षिक वर्षा 1100 से 1300 मीटर तक ऊंचाई के पहाड़ी ढाल तथा 150 C से 300C तक वार्षिक ताप परिसर की आवश्यकता होती है।

  • भारत में वर्ष 2016-17 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, शीर्ष तीन मसाला राज्यों में –

  1. राजस्थान (1391.80 हजार मी. टन)

  2. आंध्र प्रदेश (1099.76 हजार मी. टन)

  3. मध्य प्रदेश (1077.89 हजार मी. टन)

  • 2016 के आंकड़ों के अनुसार, वियतनाम, इंडोनेशिया के बाद कालीमिर्च के उत्पादन में भारत का स्थान तीसरा है।

  • भारत में केसर उत्पादक एकमात्र राज्य जम्मू-कश्मीर है। यहां प्राचीन काल से ही केसर का उत्पादन किया जा रहा है।

  • कुछ फसल तथा उनके अग्रणी राज्य

फसल     –    राज्य

जूट      –    पश्चिम बंगाल

चाय      –    असम

रबर      –    केरल

गन्ना     –    उत्तर प्रदेश

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झूमिंग कृषि

  • झूम कृषि एक स्थानांतरित कृषि पध्दति है। यह कृषि भारत में असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, ओड़िशा, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं आंध्र प्रदेश में जनजातियों द्वारा अपनाया जाता है।

  • झूम कृषि को असम में झूम, आंध्र प्रदेश में पोडु तथा मध्य प्रदेश के विभिन्न भागों में बेवार, पेंडा और मशान नामों से जाना जाता है।

  • झूम कृषि के अंतर्गत वनों/जंगलों को काटकर या जलाकर कृषि योग्य भूमि का निर्माण किया जाता है। उस स्थान की उर्वरता समाप्त होने पर दूसरे स्थान पर यही प्रक्रिया पुनः अपनाई जाती है।

  • झूम कृषि मुख्यतः उष्णकटिबंधीय वन प्रदेशों में की जाती है। झूम खेती उत्तर-प्रदेश राज्यों के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है।

  • चलवासी कृषि असम और बिहार (नवंबर, 2000 से पूर्व, वर्तमान झारखंड) की मुख्य समस्या है।

  • क्षेत्र स्थानांतरी खेती

पश्चिमी घाट            कुमारी

दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान     वाल्तरे

उत्तरी-पूर्वी भारत          झूम

मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ डाहिया

कृषि – विविध

  • भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम भूमिका है। 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की आबादी का लगभग 55 प्रतिशत कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियों में लगा है और देश के सकल मूल्य सवर्धन में इसकी हिस्सेदारी 16.4% (2017-18 Ist A.E.) है।

  • भारत में कम वर्षा और बेमौसम वर्षा तथा ओलावृष्टि के कारण वर्ष 2014-15 में कृषि उत्पादन अनुमान से कम हुआ था। वर्ष 2016-17 के लिए चतुर्थ अग्रिम अनुमानों के अनुसार, देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन 275.68 मिलियन टन तक अनुमानित है। वर्तमान वर्ष का उत्पादन विगत पांच वर्ष (2011-12 से 2015-16) के औसत खाद्यान्न उत्पादन की तुलना में भी 18.67 मिलियन टन (7.26%) अधिक है।

  • भारत मे वर्ष 2016-17 के चतुर्थ अग्रिम अनुमानों के अनुसार, चावल का उत्पादन 110.15 मिलियन टन, गेहूं का उत्पादन 98.38 मिलियन टन, मोटे अनाज का उत्पादन 44.19 मिलियन टन तथा दालों का उत्पादन 22.95 मिलियन टन रहा।  जबकि वर्ष 2015-16 के अंतिम अनुमानों के अनुसार, कुल खाद्यान्न, चावल, गेहूं, मोटे अनाज एवं दालों का उत्पादन क्रमशः 104.41, 92.29, 38.52 एवं 16.35 मिलियन टन है।

  • देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन में 15.71 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ उत्तर प्रदेश शीर्ष खाद्यान्न उत्पादक राज्य है। इस संदर्भ में मध्य प्रदेश (11.38%) का दूसरा एवं पंजाब (10.60%) का तीसरा स्थान है।

  • भारत में उर्वरक की खपत की दृष्टि से उत्तर प्रदेश प्रथम स्थान पर, महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर तथा मध्य प्रदेश तीसरे स्थान पर है।

  • भारत में उर्वरक की किग्रा./हेक्टेयर खपत में तेलंगाना प्रथम तथा पुडुचेरी दूसरे स्थान पर है।

  • भारत में धान एवं गेहूं की उच्चतम उत्पादकता पंजाब राज्य की है।

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  • मक्का में उच्चतम उत्पादकता तमिलनाडु की तथा कपास की उच्चतम उत्पादकता पंजाब राज्य की है।

  • राष्ट्रीय केला अनुसंधान केन्द्र, त्रिची में 21 अगस्त, 1993 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा एक मिशन मोड एवं अनुसंधान केन्द्र के रुप में स्थापित किया गया है। यह केन्द्र केला के उत्पादन में वृध्दि के लिए फसल सुधार फसल उत्पादन एवं फसल संरक्षण पर काम करता है।

  • भारत में केला के उत्पादन में तीन अग्रणी राज्य क्रमशः तमिलनाडु, गुजरात तथा आंध्र प्रदेश हैं।

  • मक्का का वनस्पतिक नाम जिआ मेज (Zea Mays) है। यह एक प्रमुख खाद्य फसल है। इसकी विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता के कारण वर्ष भऱ बोया जा सकता है। वैश्विक स्तर पर इसे अनाजों की रानी कहा जाता है। मक्का एक C4 पौधा है। मक्के का प्रयोग मंड पाउडर और डेक्सिट्रन, सायाटेक्स जैसे मंड उत्पादों के उत्पादन में होता है। इसके अलावा मक्के के तेल का प्रयोग जैव डीजल के उत्पादन के लिए भी किया जाता है मक्के के प्रयोग से कई प्रकार के एल्कोहॉली पेय यथा कॉर्न व्हिस्की (अमेरिकी मदिरा), काउध्दम (ब्राजील की बीयर) आदि भी तैयार किए जाते हैं। मक्का भारत में चावल एवं गेहूं के बाद उत्पादित एवं उपभोग की जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी खाद्यान्न फसल है। विभिन्न मौसमों एवं क्षेत्रों में मक्का की परिपक्वता अवधि प्रायः 90 से लेकर 150 दिन तक है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्यों  में मक्का की परिपक्वता अवधि 80-105 दिन के मध्य है।

  • भारत में मक्का उत्पादन में तीन अग्रणी राज्य क्रमशः कर्नाटक, बिहार एवं तेलंगाना हैं। शक्तिमान-1 और शक्तिमान-2 मक्का की आनुवांशिक परिवर्तित उच्च किस्में हैं।

  • भागीरथी घाटी में राजमा और आलू की खेती प्रारंभ करने का श्रेय फ्रेडरिक विल्सन को दिया जाता है। 19वीं शताब्दी में भागीरथी घाटी में स्थायी रुप से बसने वाले वे प्रथम गोरे व्यक्ति थे। उन्हें पहाड़ी एवं राजा ऑफ हरसिल के उपनाम दिए गए हैं।

  • कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016 (अंतिम अनुमान) में आलू का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश (13851.76 हजार MT) है। उत्तर प्रदेश में देश का 32 प्रतिशत आलू उत्पादित किया जाता है। इसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल एवं बिहार का स्थान आता है। प्रसंस्करण हेतु आलू की सबसे अच्छी किस्म कुफरी चिप्सौना-2 है। चिप्सौना-3 मैदानी क्षेत्रों एवं कुफरी हिम सोना पहाडी क्षेत्रों के लिए प्रसंस्करण हेतु आलू की सबसे अच्छी किस्म है। आलू में लगने वाला प्रमुख रोग पछेता झुलसा है।

  • गंगा के निचले मैदानों में जलवायु में उच्च तापमान के साथ आर्द्रता रहती है। इस प्रकार के जलवायु वाले क्षेत्रों के लिए धान और जूट की फसलें सर्वाधिक उपयुक्त हैं। जूट कांप एवं दोमट मिट्टी में पैदा होता है। पश्चिम बंगाल भारत का सर्वप्रमुख जूट उत्पादक राज्य है। इसके अतिरिक्त अन्य जूट उत्पादक राज्य बिहार, असम, ओड़िशा एवं मध्य प्रदेश हैं।

  • जूट को भारत का स्वर्णिम तंतु कहते है।

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  • मेस्ता जूट की एक किस्म है जिसका उत्पादन पश्चिम बंगाल एवं आंध्र प्रदेश मे होता है।

  • भारत में पश्चिम बंगाल राज्य में जूट का सर्वाधिक क्षेत्रफल (0.58 मिलियन हे.) है। इसके बाद क्रमशः बिहार, असम एवं मेघालय का स्थान आता है।

  • केसर (Saffron) का वाणिज्यिक स्तर पर उत्पादन जम्मू कश्मीर राज्य में होता है। इसे जाफरान भी कहते हैं। भारत के अतिरिक्त केसर के अन्य महत्वपूर्ण उत्पादक देश स्पेन, ईरान, ग्रीस एवं इटली हैं। स्पेन और ईरान मिलकर विश्व मे कुल केसर उत्पादन का 80 प्रतिशत से अधिक केसर उत्पादित करते हैं।

  • बाजरा का सर्वाधिक उत्पादन राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा गुजरात में होता है।

  • हरित बाल रोग बाजरे में पाया जाता है। इसमें बाजरें की बलियों के स्थान पर टेढ़ी-मेढ़ी हरी-हरी पत्तियां सी बन जाती हैं जिससे बाली झांडू के समान दिखाई देती है और पौधे बौने रह जाते हैं।

  • प्याज की खेती लिए पहले बीज डालकर छोटे-छोटे पौधे तैयार किए जात हैं। बाद में इन्हीं पौधों का प्रतिरोपण कर दिया जाता है। वर्ष 2016 (अंतिम अनुमान) के अनुसार, प्याज उत्पादन में भारत की शीर्ष तीन राज्य मध्य प्रदेश, कर्नाटक तथा राजस्थान हैं।

  • कपास की उत्कृष्टता का आधार इसके रेशों की लंबाई होती है। सर्वोत्तम कपास के रेशे की लंबाई 5 सेमी. से अधिक होती है। यह किस्म संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट तथा वेस्टइंडीज में उगाई जाती है।

  • भारत में शीर्ष तीन कपास उत्पादक राज्य क्रमशः गुजरात, महाराष्ट्र तथा तेलंगाना है।

  • वर्ष 2016-17 के अंतिम आंकड़ों अनुसार, भारत में कुल फल उत्पादन में आंध्र प्रदेश का प्रथम स्थान है। इसके पश्चात क्रमशः महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश का स्थान आता है।

  • राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा प्रकाशित (2016 अंतिम अनुमान) के अनुसार, भारत में आम का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों में उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक एवं बिहार का स्थान है।

  • आम की बीजरहित प्रजाति सिंधु है। यह विश्व की एक मात्र बीज रहित प्रजाति है।

  • आम की आम्रपाली किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा द्वारा वर्ष 1971 में दशहरी एवं नीलम क्रास से विकसित की गई थी।

  • आम की नियमित फसल वाली प्रजातियां – बैंगालोरा (तोतापरी), नीलम, आम्रपाली तथा दशहरी-51 हैं।

  • दशहरी, चौसा एवं लंगड़ा आम की, नियमित फसल वाली प्रजाति नही है।

  • ललित एवं बनारसी, अमरुद की उन्नत किस्म है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टीकल्चर रिसर्च फॉर नार्थ प्लेस, लखनऊ में अमरुद की इस किस्म को विकसित किया गया है, वाणिज्यिक उत्पादन के लिए इस किस्म की संस्तुति की गई है।

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  • आंवला (Indian Goose-berry) के फल औषधीय गुणों से युक्त होते हैं। इसमें विटामिन C प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। कंचन, कृष्णा, बनारसी आदि इसकी उन्नत किस्में हैं।

  • मोटे अनाज तथा चावल अधिकांशतः निर्वाह मूलक कृषि के अंतर्गत पैदा किए जाते हैं।

  • अदरक का तना, जो भूमिगत होता है और खाद्य का संग्रहण करता है वह प्रकंद कहलाता है।

  • अनाज के दानों का उत्पाद ओट मील है। सामान्यतः इसे लोगों के भोजन एवं पशुओं के चारे के रुप में उपयोग किया जाता है।

  • उत्तराखंड में उगाया जाने वाला अनाज मड़ुआ (कोदा) का निर्यात जापान को किया जा रहा है। मडुआ से बनी खाद्य सामाग्री की विदेशों में बड़ी मांग है। इसका प्रयोग बच्चो के लिए स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद बनाने मे किया जाता है।

  • लोबिया, मूंग और अरहर तीनों फसलों का प्रयोग खाद्य, चारा एवं दलहन के रुप में होता है। एक हेक्टेयर भूमि में अरहर की खाद का प्रयोग करने से 40 किग्रा. नाइट्रोजन की प्राप्ति होती है।

  • मूंगफली, तिल एवं बाजरा की कृषि शुष्क कृषि क्षेत्रों में की जाती है। इन फसलों की सिंचाई लगभग पूर्णतया वर्षा पर निर्भऱ होती है।

  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का एक लक्ष्य धारणीय रीति से देश के चुनिंदा जिलो में कृषिगत जमीन में बढ़ोत्तरी एवं उत्पादकता में वृध्दि लाकर कुछ फसलों की उत्पादकता में वृध्दि लाना है। ये फसलें हैं – चावल, गेहूं और दलहन इसके अतिरिक्त हाल ही में बाजरा एवं चारे वाली फसलों को भी इसमें शामिल किया गया है।

  • ग्वार का अधिकतर उपयोग जानवरों के चारे के रुप में होता है, साथ ही ग्वार की फली की सब्जी भी बनाई जाती है। विश्व में ग्वार उत्पादन का लगभग 80% भारत एवं पाकिस्तान में होता है। शेल गैस के निष्कर्षण में ग्वार गोंद के महत्व के साबित होने के बाद हाल ही में इनकी मांग में जबरदस्त वृध्दि दर्ज की गई। ग्वार गोंद को ग्वार के बीजों से निकाला जाता है। हॉरिजोंटल फ्रैंकिंग नामक एक नई प्रौद्योगिकी द्वारा शेल गैस के निष्कर्षण में ग्वार का कोई विकल्प नही है।

  • भारत में सुपारी का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य है – कर्नाटक, केरल, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल तथा त्रिपुरा।

  • पशुपालन, डेयरी और मत्स्य विभाग द्वारा जारी वर्ष 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार, कुल मत्स्य उत्पादक अग्रणी राज्य क्रमशः हैं –

  1. आंध्र प्रदेश (2352.26 हजार टन)

  2. पश्चिम बंगाल (1671.42 हजार टन)

  3. गुजरात (809.56 हजार टन)

  4. केरल (727.51 हजार टन)

  5. तमिलनाडु (709.16 हजार टन)

  • आंध्र प्रदेश में ताजे जल की मछली का उत्पादन सर्वाधिक है।

  • समुद्री मछली के उत्पादन में अग्रणी राज्य गुजरात है।

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  • अरुणाचल प्रदेश उत्तर-पूर्वी भारत में एक प्रमुख पर्यटक क्षेत्र के रुप में उभर रहा है। यहां वनस्पतिजात तथा प्राणीजात की समृध्द और व्यापक जैव-विविधता पाई जाती है। यह अपने लहलहातें हरे वनों, विविधतापूर्ण अन्य जीवों, गहरी नदी घाटियों और सुंदर पठारों के लिए प्रसिध्द है। इसे प्रकृति का गुप्त खजाना और ऑर्किड की विविध किस्मों का घर माना जाता है। अरुणाचल प्रदेश में जलवायु की सुलभता के कारण न्यूनतम लागत से ऑर्किड की विवध किस्मों की खेती हो सकती है जिससे वह इस क्षेत्र में निर्यातोन्मुखी उद्योग विकसित कर सकता है।

  • भारत में स्वास्थ्य के अनुकूल एवं पर्यावरण के अनुरुप खेती करते हुए सिक्किम ने भारत का पहला जैविक राज्य होने का दर्जा प्राप्त कर लिया। उल्लेखनीय है कि पूर्ण रुप से जैविक खादों पर आधारित फसल पैदा करना या अन्य शब्दों में बिना कीटनाशकों या रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते हुए फसल पैदा करना जैविक खेती कहलाता है।

  • बोरलॉग पुरस्कार कृषि विज्ञान के क्षेत्र में दिया जाता है। इस पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1972 में नोबल पुरस्कार विजेता नार्मन. ई. बोरलॉग के नाम पर किया गया।

  • राज्य एवं उनकी महत्वपूर्ण फसलें –

केरल     – टैपियोका (प्रथम स्थान)

महाराष्ट्र   – कपास (द्वीतीय स्थान) प्रथम स्थान पर गुजरात का है।

पश्चिम बंगाल  –    जूट एवं पटसन (प्रथम स्थान)

गुजरात   – मूंगफली (प्रथम स्थान)

मध्य प्रदेश     – सोयाबीन

केरल          – कालीमिर्च

पश्चिम बंगाल  – अनन्नास

  • फसल का नाम बीमारी का नाम

धान               रेड राट

धान               खैरा

अरहर             उक्ठा (विल्ट)

आलू              झुलसा

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पशुपालन

  • दूध, मांस, ऊन, चमड़ा आदि पशु उत्पादों को प्राप्त करने और कृषि कार्य तथा माल परिवहन के लिए पशुओं को पालतू बनाने की क्रिया को पशुपालन कहते हैं।

  • Agriculture statistics at a glance, 2016 के अनुसार, भारत में 187 मिलियन गाय-बैल हैं। भारत में गाय-बैल की मुख्यतः दो नस्ले पाई जाती हैं –

  1. दुधारू नस्ले (Milch Breeds) – इस नस्ल की गायें तो अधिक दूध देती हैं। परंतु बैल कृषि कार्य या भार वाहन हेतु अच्छे नही होते हैं। इसमें गिर, साहीवाल, सिंधी, देवनी, थारपरकर आदि प्रमुख नस्लें सम्मिलित हैं।

  2. भारवाही नस्लें (Drought Breeds) – इनमें नागौरी, मालवी, हल्लीकर, कंग्याम, किल्लारी, पोंवार, सीरी आदि प्रमुख नस्ले हैं।

  • देश की सबसे अच्छी देशीय नस्ल की गायें राजस्थान में ही पाई जाती हैं। राजस्थान में मिलने वाली गायों की नस्लें – थारपरकर, राठी, कांकरेज, साहीवाल, लाल सिंधी, गिर, नागौरी, हरियाणवी, मालवी एवं मेवाती हैं।

  • साहीवाल गाय की प्रजाति मुख्य रुप से पाकिस्तान के सिंध प्रांत में पाई जाती है। इसकी दुग्ध देने की क्षमता काफी अधिक होती है।

  • गंगातीरी उत्तर प्रदेश में मुख्यतः पाई जाती है। जिसकी दुग्ध देने की क्षमता काफी कम है।

  • हरियाणवी और थारपरकर मुख्यतः द्वीकाजी (भारवाहक एवं दूध) गायें हैं।

  • भारत में सर्वाधिक भैंस उत्तर प्रदेश में पाई जाती हैं। भारत में भैंसों की कई नस्लें पाई जाती हैं। इनमें मुर्रा, भदावरी, जफराबादी, सूतरी, महसाना, नागपुरी, नीली, पंडरपुरी आदि प्रमुख हैं।

  • भारत में सर्वाधिक भेड़ आंध्र प्रदेश में पाई जाती है। देश की सबसे अच्छी नस्ल की भेंड़े कश्मीर, कुल्लू, चम्बा और कांगड़ा घाटियों में पाई जाती है।

  • बकरी को गरीबों की गाय कहा जाता है। बकरी से दूध, मांस, चमड़ा और ऊन प्राप्त होता है।

  • भारत में मांस का यह मुख्य स्रोत (लगभग 35%) है।

  • भात में सर्वाधिक दुग्ध देने वाली जमना पारी की बकरी है। यह मांस एवं दुग्ध दोनो ही दृष्टिकोण से अच्छी मानी जाती है। इससे प्रतिदिन 2.5-3.0 किग्रा. तक दुग्ध का उत्पादन होता है।

  • भारत में श्वेत क्रांति की शुरुआत जुलाई, 1970 में ऑपरेशन फ्लड-1 योजना के शुभारंभ से हुई। भारत में श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कुरियन को माना जाता है। श्वेत क्रांति का संबंध दुग्ध उत्पादन से है।

  • वर्ष 2016-17 में दुग्ध उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है। इस संदर्भ में भारत के बाद अमेरिका का दूसरा स्थान है।

  • भारत में राज्यों की दृष्टि से दुग्ध उत्पादन में उत्तर प्रदेश का प्रथम स्थान इसके बाद राजस्थान का दूसरा स्थान है।

  • भारत में वर्ष 2016-17 में दुग्ध की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 355 ग्राम प्रतिदिन हो गई है। दुग्ध उत्पादन में वृध्दि लाने के लिए ऑपरेशन फ्लड प्रारंभ किया गया। जिसका प्रथम चरण 1970-80 तक, दूसरा चरण 1981-85 तक तथा तीसरा चरण 1985-94 तक था।

  • भारतीय डेयरी निगम की स्थापना आनंद (गुजरात) में, वर्ष 1970 में की गई। जिनका उद्देश्य ऑपरेशन फ्लड योजना को सफल बनाना था।

  • राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना वर्ष 1965 में हुई। नेशनल डेयरी विकास बोर्ड एवं भारतीय डेयरी निगम के सूत्रधार डॉ. वर्गीज कुरियन थे।

  • राष्ट्रीय डेयरी शोधसंस्थान, करनाल हरियाणा में स्थित है। इसे वर्ष 1989 में डीम्ड विश्व विद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया था।

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  • भारत में सर्वाधिक पशु घनत्व बिहार राज्य का है। वर्ष 2012 में कुल लाइव स्टॉक के संदर्भ में उत्तर प्रदेश शीर्ष तथा राजस्थान एवं आंध्र प्रदेश क्रमशः दूसरे एवं तीसरे स्थान पर थे। जबकि मवेशियों (गोवंशीय) के संबंध में शीर्ष तीन राज्य क्रमशः मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल हैं।

  • वर्ष 2003 की पशुगणना के अनुसार, स्टॉक फार्मिंग का संबंध पशुओं के प्रजनन से है।

  • राज्य सकल कृष्य क्षेत्र में पशु घनत्व

हरियाणा       –    25 प्रति वर्ग किमी.

उत्तर प्रदेश     –    77 प्रति वर्ग किमी.

मध्य प्रदेश     –    106 प्रति वर्ग किमी.

बिहार         –    183 प्रति वर्ग किमी.

  • वर्ष 2012 की पशुगणना के अनुसार, भारत में 190.90 मिलियन गाय-बैल हैं जिनमें से प्रथम तीन राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में क्रमशः 10.27%, 10.24% एवं 8.65% हैं।

  • कुछ राज्य एवं उनके दुग्ध उत्पादन की स्थिति वर्ष 2013-14 एवं 2016-17 के आंकड़ों के अनुसार इस प्रकार हैं –

राज्य             दुग्ध उत्पादन (हजार टन में)

                  2013-14      2016-17

उत्तर प्रदेश          24194        27770

राजस्थान           14573        20850

गुजरात            11112        12780

पंजाब                   10011        11282

  • राष्ट्रीय डेयरी शोध संस्थान करनाल, हरियाणा मे स्थित है। इसे वर्ष 1989 में डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया था।

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खनिज संसाधन

शैल तंत्र

  • भारत अच्छे और विविध प्रकार के खनिज संसाधनों से संपन्न है। परन्तु इनका वितरण असमान है।

  • भारत में प्रायद्वीपीय चट्टानों में कोयले, धात्विक खनिज, अभ्रक व अन्य अधात्विक खनिजों के अधिकांश भंडार संचित हैं।

  • प्रायद्वीप के पश्चिमी और पूर्वी पार्श्वों पर गुजरात और असम की तलहटी चट्टानों में अधिकांश तेल अलौह खनिज पाए जाते हैं।

  • उत्तरी भारत के विस्तृत जलोढ़ मैदान आर्थिक महत्व के खनिजों से लगभग विहीन हैं। ये विभिन्नताएं खनिजों की रचना में अंतरग्रस्त भू-गर्भिक संरचना, प्रक्रियाओं और समय के कारण हैं।

  • विंध्य क्रम की शैलों में स्थूल मध्य एवं सूक्ष्म कणों वाले बलुआ पत्थर, शैल और चूना पत्थर सम्मिलित हैं। जहां निचली विंध्य शैलें चूनेदार, मृण्मय एवं सागरीय हैं वही ऊपरी विंध्य शैले नदीय एवं ज्वार नद मुखी हैं।

  • चूनें का पत्थर, सीमेंट उद्योग का आधार है।

  • भारत में सबसे महत्वपूर्ण खनिजयुक्त शैल तंत्र धारवाड़ तंत्र है। ये शिलाएं अत्यधिक धात्विक हैं जिनमें सोना, लोहा, मैंगनीज, अभ्रक, कोबाल्ट, क्रोमियम, तांबा, टंगस्टन, सीसा आदि खनिज प्रात होते हैं।

  • भारत में दक्षिण-पूर्व में उत्तर-पूर्वी पठारी पट्टी में खनिज प्राप्त होते हैं।

  • भारत में दक्षिण-पूर्व में उत्तर –पूर्व पठारी पट्टी में खनिज संसाधनों के सबसे बड़े भंडार पाए जाते हैं।

  • छोटानागपुर पठार, दण्डकारण्य पठार एवं ओड़िशा पठार इसी क्षेत्र में अवस्थित हैं।

  • प्रायद्वीपीय क्षेत्र खनिज संसाधनों के सबसे बड़े भंडार है। इसे भारतीय खनिज का हृदय स्थल कहा जाता है।

  • वर्ष 2015-16 के कुल खनिज उत्पादन का मूल्य 282966 करोड़ रु. में सर्वाधिक 19% हिस्सा अपतटीय क्षेत्र का है। खनिज मूल्य की दृष्टि से अन्य स्थान प्रमुखतः राजस्थान (12%), ओडिशा (9.44%), छत्तीसगढ़ (7.47%) झारखंड (7.28%) एवं तेलंगाना (6.74%) हैं।

  • भारत में दक्षिण-पूर्व में खनिज संसाधनों के सबसे बड़े भंडार पाए जाते हैं। छोटानागपुर पठार, दण्डकारण्य पठार एवं ओड़िशा पठार इसी क्षेत्र में अवस्थित है।

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धात्विक खनिज

लौह अयस्क

  • भारत में लौह अयस्क प्रमुख रुप से धारवाड़ शैल तंत्र में पाया जाता है। धारवाड़ शैल तंत्र भारत में पाई जाने वाली आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण शैले हैं।

  • भारत में लौह अयस्क उत्पादन के चार प्रमुख क्षेत्र हैं –

  1. उत्तर-पूर्वी – इसमें झारखंड एवं ओड़िशा

  2. मध्य भारत – जिसमे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र।

  3. प्रायद्वीपीय भारत – जिसमें कर्नाटक, गोवा।

  4. अन्य क्षेत्र – जिसमें आंध्र प्रदेश, राजस्थान, केरल, गुजरात, हरियाणा व प. बंगाल सम्मिलित हैं।

  • छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले मे स्थित बैलाडीला खान से उत्तम कोटि के हेमेटाइट और मैग्नेटाइट लौह अयस्क का उत्पादन होता है।

  • बैलाडीला खान भारत में सबसे बड़ी मशीनीकृत खान है। यहां से उत्पादित लौह अयस्क को विशाखापत्तनम बंदरगाह से जापान को निर्यात किया जाता है।

  • कुद्रेमुख कर्नाटक की प्रसिध्द लौह अयस्क खान है।

  • कर्नाटक में अधिकांशतः मैग्नेटाइट लौह अयस्क पाया जाता है।

  • राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित नाथरा-की-पाल एवं थूर-हुंडेर क्षेत्र लौह अयस्क के लिए प्रसिध्द हैं।

  • हेमेटाइट एवं मैग्नेटाइट लोहे के 2 प्रमुख अयस्क हैं। हेमेटाइट अयस्क का 59% पूर्वी क्षेत्र में तथा मैग्नेटाइट का 92% दक्षिणी क्षेत्र में पाया जाता है। भारत में हेमेटाइट की उपलब्धता वाले राज्यों में – ओड़िशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक तथा गोवा हैं।

  • मैग्नेटाइट की बहुलता वाले क्षेत्रों में बाबाबूदन, कुद्रेमुख, बेल्लारी, अनादुर्गा (सभी कर्नाटक), आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु एवं गोवा हैं। कर्नाटक, ओड़िशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं आंध्र प्रदेश IMYB, 2016 के अनुसार क्रमवार लौह अयस्क (हेमेटाइट+मैग्नेटाइट) के शीर्ष संसाधन वाले राज्य हैं।

  • भारत में लौह अयस्क (हेमेटाइट+मैग्नेटाइड) से संपन्न राज्यों में प्रमुख राज्य इस प्रकार हैं – कर्नाटक (10269044 हजार टन), ओड़िशा (7558816 हजार टन), झारखंड (5297084 हजार टन), छत्तीसगढ़ (4869349 हजार टन), हेमेटाइट की उपलब्धता वाले राज्यों में ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोवा आदि तथा मैग्नेटाइट की बहुलता वाले राज्यों में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गोवा आदि राज्य प्रमुख हैं।

  • कुद्रेमुख कर्नाटक की प्रसिध्द लौह अयस्क खान हैं। कर्नाटक में अधिकांशतः मैग्नेटाइट लौह अयस्क पाया जाता है।

जस्ता

  • जस्ता सामान्यतः सीसे के साथ मिले रुप में जस्ते के सल्फाइड से मिलता है। यह लोहे में जंग लगने से रोकने के लिए, मिश्रित धातु बनने, शुष्क बैटरी, इलेक्ट्रोड, मोटर पुर्जा आदि में इस्तेमाल किया जाता है।

  • भारत में राजस्थान राज्य का जस्ते में भंडार और उत्पादन की दृष्टि से एकाधिकार है।

  • एशिया का श्रेष्ठ जस्ता एवं सीसा भंडार भीलवाड़ा जिले के रामपुर आगूचा क्षेत्र में है।

  • राजस्थान राज्य का जवार क्षेत्र (उदयपुर जिला) देश का सबसे बड़ा जस्ता उत्पादक क्षेत्र है।

  • राजस्थान राज्य में स्थित सीसा एवं जस्ता के अन्य भंडार क्षेत्र हैं – राजपुर देवारी क्षेत्र (उदयपुर), डूंगरपुर, अलवर, बांसवाड़ा एवं सिरोही।

  • भारत में जस्ता का अन्य जमाव भोतंग क्षेत्र (सिक्कम), रियासी (जम्मू कश्मीर), अल्मोड़ा, टिहरी-गढ़वाल (उत्तराखंड) में भी पाया जाता है।

  • हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड ने रामपुर आगूचा क्षेत्र में ब्रिटेन का सहायता से सुपर स्मेल्टर यंत्र की स्थापना की है, जो जस्ता एवं सीसा को गलाने का कार्य करता है।

  • राजस्थान देश का जस्ता एवं सीसा उत्पादक राज्य है। वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के अनुसार, देश में जस्ता एवं सीसा अकेले राजस्थान में उत्पादित होता है। एशिया का श्रेष्ठ जस्ता एवं सीसा भंडार भीलवाड़ा जिले के रामपुर आगूचा क्षेत्र में है।

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चांदी

  • चांदी सामान्यतः अम्लीय आग्नेय शिलाओं में सीसा, जस्ता, तांबा आदि के साथ मिश्रित रुप में पाई जाती है। वर्ष 2016-17 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में चांदी का सर्वाधिक उत्पादन राजस्थान राज्य में हुआ। इसके बाद चांदी उत्पादन में कर्नाटक का दूसरा स्थान है।

  • इंडियन मिनरल ईयर बुक, 2017 के अनुसार, भारत में चांदी का भंडार राजस्थान, (शीर्ष भंडारक), झारखंड, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, ओडिशा, मेघालय, सिक्किम, तमिलनाडु एवं महाराष्ट्र में मौजूद है।

  • राजस्थान राज्य में जावर की खान चांद उत्पादन के लिए प्रसिध्द है।

  • कर्नाटक राज्य में कोलार एवं हट्टी की खानों से भी चांदी प्राप्त किया जाता है।

तांबा

  • भारत में तांबा धारवाड़ शिलाओं में रंध्रों में पाया जाता है। तांबा, सल्फाइड, चालकों पाइराइट के रुप में धारवाड़ की शिफ्ट और फाइलाइट शैलों में मिक्षित रुप में पाया जाता है।

  • ताम्र अयस्क के भारत में तीन महत्वपूर्ण जिले झुंझनू (राजस्थान), बालाघाट (म.प्र.), सिंहभूम (झारखंड) है।

  • तांबे का 53.81% प्राकृतिक स्रोत (राजस्थान में पाया जाता है।

  • राजस्थान में खेतड़ी की तांबे का खाने झुंझुनू में हैं।

  • मलाजखंड ( बालाघाट) मध्य प्रदेश का प्रमुख तांबा उत्पादक क्षेत्र है।

  • भारत में शीर्ष ताम्र अयस्क का भंडार क्रमशः राजस्थान, झारखंड एवं मध्य प्रदेश में पाया जाता है। इसी प्रकार तांबे के उत्पादन की दृष्टि से प्रथम तीन राज्य क्रमशः –

  1. मध्य प्रदेश (2378912 टन)

  2. राजस्थान (947400 टन)

  3. झारखंड (179036 टन)

  • भारत के अधिकांश ताम्र उत्पादन पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड (HCL) का नियंत्रण है।

  • भारत में तांबा का सर्वाधिक उत्पादन मध्य प्रदेश से होता है। मलाजखंड (बालाघाट), मध्य प्रदेश का प्रमुख तांबा उत्पादक क्षेत्र है।

  • तांबा के क्षेत्र राज्य

चंदरपुर        –    महाराष्ट्र

हासन         –    कर्नाटक

खम्मान       –    आंध्र प्रदेश

खेत्री          –    राजस्थान

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  • खेतड़ी, तांबा उत्पादन के लिए प्रसिध्द है। यह राजस्थान राज्य के झुंझनू जिले में स्थित है। खेतड़ी के अतिरिक्त इस क्षेत्र में कोलिहान, बनवास, चांदमारी, धानीबासरी आदि क्षेत्रों में भी तांबे के प्रमुख भंडार पाए जातो हैं। वर्तमान में खेतड़ी में तांबे का उत्खनन हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है।

  • तांबे का 53.81% प्राकृतिक स्रोत राजस्थान में पाया जाता है, निकेल का 93% प्राकृतिक स्रोत ओड़िशा में पाया जाता है, टंगस्टन का 42% प्राकृतिक स्रोत कर्नाटक में पाया जाता है।

  • दक्षिणी कर्नाटक में ताम्र निक्षेपों का पता वर्ष 1999 में लगाया गया था।

बॉक्साइट

  • बॉक्साइट, एल्युमिनियम का अयस्क है। इसका रंग लोहांश की मात्रा के आधार पर सफेद, गुलाबी या लाल पाया जाता है।

  • बॉक्साइट टर्शियरी काल की लैटेराइट शैलों में पाया जाता है।

  • बॉक्साइट का उपयोग मुख्यतः एल्युमिना एवं एल्युमीनियम बनाने में होता है।

  • बॉक्साइट मूलतः हाइड्रेट एल्युमीनियम ऑक्साइड होता है।

  • वर्ष 2015-16 के आंकड़ों के आधार पर भारत में ओड़िशा राज्य बॉक्साइट के उत्पादन (49%) एवं संचित भंडार (53%) दोनों दृष्टि से प्रथम स्थान पर है।

  • ओडिशा में बॉक्साइट के जमाव खोंडलाइट श्रेणी की शिलाओं में निक्षिप्त है। यह ओड़िशा में कोरापुट एवं रायगढ़ क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर पाया जाता है।

  • गुजरात राज्य में बॉक्साइट मुख्यतः देवभूमि एवं द्वारिका में पाया जाता है।

  • झारखंड राज्य में लोहरदगा, गुमला, लातेहार बॉक्साइट के प्रमुख क्षेत्र हैं।

  • बॉक्साइट अयस्क के परिशोधन हेतु लोहरदगा और मुरी में एल्युमीनियम के संयंत्र लगाए गए हैं। वर्ष 2015-15 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में शीर्ष बॉक्साइट उत्पादन करने वाले राज्यों में –

  1. ओड़िशा (10839038 टन)

  2. गुजरात (10387092 टन)

  3. झारखंड (2111227 टन)

  4. छत्तीसगढ़ (1991455 टन)

  5. महाराष्ट्र (1907543 टन) हैं।

  • इसी प्रकार बॉक्साइट के कुल भंडार की दृष्टि से भारत के शीर्ष राज्य क्रमशः ओड़िशा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, झारखंड तथा महाराष्ट्र हैं।

  • इंडियन ब्यूरों ऑफ माइंस के अनुसार – वर्ष 2015-16 में बॉक्साइट के शीर्ष उत्पादक राज्य थे क्रमशः – ओड़िशा (49%), गुजरात (24%), झारखंड (9%), छत्तीसगढ़ एवं महाराष्ट्र (प्रत्येक में 8%)।

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टिन

  • टिन अयस्क कैसिस्टेराइट (Cassiterite) के नाम से जाना जाता है। भारत में टिन का भंडार सीमित मात्रा में है।

  • भारत में टिन का उत्पादन करने वाला एक मात्र राज्य छत्तीसगढ़ है। छत्तीसगढ़ राज्य में टिन अयस्क का प्रमुख भंडार भी पाया जाता है। छत्तीसगढ़ में टिन खनन से संबंधित सभी (एक सार्वजनिक क्षेत्र की और 4 निजी क्षेत्र की) कंपनियां दांतेवाड़ा जिले में स्थित हैं।

  • टिन का प्रयोग प्रायः टिन की चादरें बनाने एवं शोल्डरिंग उद्योग में किया जाता है। मिश्रधातुओं के निर्माण में भी इसका उपयोग होता है।

नोटः भारतीय खान  ब्यूरों द्वारा प्रकाशित इंडियन मिनरल ईयर बुक, 2017 में दिए गए आंकड़ों के आधर पर टिन अयस्क के प्रमाणिक भंडार की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का प्रथम स्थान है, जबकि टिन अयस्क के कुल संसाधन की दृष्टि से हरियाणा का अग्रणी स्थान है।

 

 

अधात्विक खनिज

अभ्रक

  • अभ्रक आग्नेय कायांतरित शैलों में पाया जाता है। यह पारदर्शक, लचीला और ताप विद्युत निरोधक है।

  • आंध्र प्रदेश अभ्रक अयस्क का सर्वाधिक उत्पादनकर्ता राज्य है। आंध्र प्रदेश के संपूर्ण अभ्रक का उत्पादन नेल्लोर जिले में होता है।

  • मिनरल ईयर बुक, 2017 के अनुसार, अभ्रक के कुल भंडार की दृष्टि से – आंध्र प्रदेश (41%), राजस्थान (28%), ओडिशा (17%), महाराष्ट्र (13%) तथा बिहार (2%) का स्थान है।

  • भारत की सबसे बड़ी अभ्रक मेखला हजारीबाग, गया और मुंगेर में फैली है। इसी मेखला के अंतर्गत कोडरमा जिला भी आता है जिसे अभ्रक की राजधानी कहा जाता है।

  • नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अभ्रक के उत्पादन में ब्राजील प्रथम एवं चीन द्वीतीय स्थान पर है।

संगमरमर

  • संगमरमर एक कायांतरित चट्टान है जिसका निर्माण अवसादी कार्बोनेट चट्टानों के क्षेत्रीय और कभी-कभी संपर्क कायांतरण के फलस्वरुप होता है।

  • संगमरमर का रुपांतरण अवसादी कार्बोनेट चूना पत्थर या डोलोस्टोन से होता है।

  • मकराना राजस्थान के नागौर जिले मे स्थित है। यहां से सर्वोत्तम किस्म का संगमरमर प्राप्त किया जाता है। से मकराना संगमरमर भी कहा जाता है। इसी मकराना संगमरमर से ताजमहल और विक्टोरिया मेमेरियल (कोलकाता) का निर्माण हुआ है।

  • संगमरमर के पॉलिश एवं कटाई का कारखाना मध्य प्रदेश के कटनी जिले में अवस्थित है।

  • भारत में संगमरमर का सर्वाधिक उत्पादन राजस्थान राज्य से होता है।

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ऊर्जा खनिज

कोयला

  • कोयला मुख्यतः हाइड्रोकार्बन से निर्मित एक ठोस संस्तरित शिला है। कोयला का प्रयोग मुख्यतः उष्मा और प्रकाश की आपूर्ति हेतु ईंधन के रुप में किया जाता है।

  • कोयला वनस्पति एवं जंतुओं का कार्बनिक अवशेष है, जो विभिन्न माध्यमों से अवसादी शैलों में एकत्र कर दिया जाता है।

  • भारत में कोयला दो क्षेत्रों में विशेष रुप से पाया जाता है है – गोंडवाना क्षेत्र एवं तृतीय कल्प क्षेत्र। गोण्डवाना क्षेत्र का कोयला उच्च श्रेणी का होता है इसमें राख की मात्रा अल्प तथा तापोत्पादक शक्ति अधिक होती है, जबकि तृतीय कल्प क्षेत्र का कोयला निम्न किस्म का होता है। इसमें गंधक की प्रचुरता होने के कारण यह कतिपय उद्योगों के लिए प्रयुक्त नही होता है।

  • भारत का अधिकांश कोयला गोण्डवाना क्षेत्र से ही प्राप्त होता है। यहां सर्वाधिक बिटुमिनस कोयले की प्राप्ति होती है। इसमें सल्फर की मात्रा न्यून होती है।

  • भारत के 113 कोयला-क्षेत्रों में से 80 निचले गोण्डवाना काल से संबंध हैं। देश के 90 प्रतिशत से अधिक कोयला भंडार और उत्पादन में गोण्डवाना कोयला का योगदान है।

  • गोण्डवाना तंत्र के प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं – दामोदर घाटी कोयला क्षेत्र, सोन घाटी कोयला क्षेत्र, महानदी घाटी कोयला क्षेत्र, गोदावरी घाटी कोयला क्षेत्र, कान्हन घाटी एवं पेंच घाटी कोयला क्षेत्र, सतपुड़ा कोयला क्षेत्र,  वर्धा घाटी कोयला क्षेत्र और राजमहल कोयला क्षेत्र।

  • रासायनिक संदर्भ में कोयले में कार्बन होता है, जो न केवल इसे रंग प्रदान करता है बल्कि इसकी ऊष्मीय क्षमता को भी निर्धारित करता है। उष्णता एवं अशुध्दता के आधार पर कोयले को चार भागों में विभाजित किया जाता है –

  1. पीट

  2. लिग्नाइट

  3. बिटुमिनस

  4. एंथ्रेसाइट

  • इसमें पीट कोयले में कार्बन की मात्रा 40% से कम होती है। लिग्नाइट कोयले में कार्बन की मात्रा 40-55% होती है। बिटुमिनस कोयले में कार्बन की मात्रा 55-80% तक पाई जाती है। एंथ्रेसाइट कोयले में कार्बन की मात्रा 90-95% तक होती है।

  • एंथ्रेसाइट कोयला का सबसे कठोर, चमकीला और सर्वोत्तम रुप है। कार्बन की मात्रा की अधिकता के कारण इसकी ऊष्मीय क्षमता अधिक होती है।

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  • लिग्नाइट को निकृष्ट कोटि के कोयले की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में लिग्नाइट कोयले के कुल भंडार का सर्वाधिक हिस्सा (80%) तमिलानाडु के पास है। लिग्नाइट कोयले के उत्पादन में भी तमिनाडु प्रथम स्थान पर है।

  • भारत में कोयले का कुल भंडार की दृष्टि से झारखंड प्रथम स्थान पर है। इसके बाद क्रमशः ओडिशा, छत्तीसगढ, पश्चिम बंगाल एवं मध्य प्रदेश हैं।

  • मात्रा की दृष्टि से वर्ष 2016-17 में शीर्ष पांच कोयला उत्पादक –

  1. छत्तीसगढ (21.7%)

  2. ओड़िशा (21.03%)

  3. झारखंड (19.8%)

  4. मध्य प्रदेश (15.84%)

  5. तेलंगाना (8.98%)

  • परंतु वर्ष 2015-16 में मूल्य की दृष्टि से सबसे बड़ा कोयला उत्पादक राज्य झारखंड है।

  • वर्ष 2015-16 में भारत कुल 493 (अनंतिम) कोयले की खाने हैं। जिससे सर्वाधिक 140 खानें झारखंड में हैं द्वीतीय एवं तृतीय क्रम पर खानों की संख्या क्रमशः प. बंगाल (75) एवं मध्य प्रदेश में (70) हैं।

  • भारत में कोयले के कुल उत्पादन में 9.3% हिस्सा कोकिंग कोल का है तथा शेष 90.7% हिस्सा नॉन-कोकिंग कोल का है।

  • भारत में कोयले के उत्पादन का सर्वाधिक 81.1% हिस्सा विद्युत क्षेत्र में उपयोग हेतु भेजा गया।

  • भारत में कोयले के उत्पादन का सबसे बड़ा भाग लगभग (77.65%) झारखंड, छत्तीसगढ, ओडिशा एवं मध्य प्रदेश से प्राप्त होता है। वर्ष 2016-17 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में कोयले का कुल भंडार 82440 मिलियन टन है। झारखंड में कोयले का उत्पादन 126435 हजार टन हुआ। झारखंड के प्रमुख कोयला क्षेत्र झरिया, उ. करनपुरा, द. करनपुरा, बोकारो, चन्द्रपुरा, राजमहल, गिरीडीह इत्यादि हैं। झरिया कोयला क्षेत्र  झारखंड के धनबाद जिले में स्थित है। देश के अधिकांश कोकिंग कोयले का भंडार यही पर स्थित है।

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  • छोटानागपुर पठार झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा और पश्चिम बंगाल राज्यों मे फैला है। इसका देश के कुल उत्पादन में लग भग 80% योगदान है।

  • छत्तीसगढ़ में वर्ष 2016-17 (अनं.) में कोयले का कुल उत्पादन 143849 हजार टन था तथा कुल भंडार 56661 मिलियन टन है। छत्तीसगढ़ में कोरबा कोयला क्षेत्र सहदेव नदी बेसिन क्षेत्र में अवस्थित है। कुल 530 वर्ग किमी. क्षेत्रफल पर विस्तृत कोरबा कोयला क्षेत्र राज्य का प्रमुख कोयला क्षेत्र है। छत्तीसगढ़ राज्य में कोयला के जमाव मुख्यतः तातापानी, रामकोला, बिसरामपुर, सोनहट, बिलासपुर क्षेत्रों में पाया जाता है।

  • ओड़िशा राज्य में वर्ष 2016-17 के अनुसार, कुल भंडार 77285 मिलियन टन तथा उत्पादन 139359 हजार टन था। ओडिशा के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्रों में ब्राह्माणी नदी की घाटी में स्थित तलचर है।

  • तालचिर (तलचर), ओड़िशा के अंगुल जिले मे अवस्थित प्रसिध्द कोयला क्षेत्र है। यहां के कोयला क्षेत्र का प्रबंध कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषंगी महानदी कोल फील्ड लि. द्वारा किया जाता है।

  • प. बंगाल में कोयले का जमाव मुख्यतः रानीगंज कोयला क्षेत्र है। प. बंगाल में कुल भंडार लगभग 31667 मिलियन टन (IMYB-17) है तथा वर्ष 2016-17 में प.  बंगाल में उत्पादन लगभग 27667 हजार टन हुआ। पं. बंगाल के वर्धमान, बांकुडा, पुरुलिया, बीरभूमि, दार्जिलिंग आदि क्षेत्रों में भी कोयला निक्षेप पाए जात  हैं। इसके अतिरिक्त भारत में कोयले का उत्पादन वर्ष 2016-17 (अनं.) में मध्य प्रदेश (105013 हजार टन),  तेलंगाना (59532 हजार टन), महाराष्ट्र (40559 हजार टन) आदि राज्यों में हुआ है।

  • नामचिक-नामफुक कोयला क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले में स्थित है।

  • नेवेली तमिलनाडु राज्य का प्रमुख कोयला उत्पादक राज्य है। यहां लिग्नाइट कोयले का उत्पादन किया जा रहा है। भारत में इस्पात कंपनियों को बड़ी मात्रा में कोकिंग कोयले की आवश्यकता पड़ती है, जिसे आयात करना पड़ता है, क्योंकि भारत में अच्छी गुणवत्ता वाला कोकिंग कोयला सीमित है। भारत में अधिकतर विद्युत संयंत्र के कोयले पर आधारित होने के कारण देश से पर्याप्त मात्रा में कोयले का आयात करना पड़ता है।

  • कोयला-संस्तर मीथेन तथा शैल गैस गैर परंपरागत ऊर्जा के स्रोत हैं। कोयला-संस्तर मीथेन, कोयला संधियों से निष्कर्षित 90% से अधिक शुध्द गैस है। शैल गैस का निष्कर्षण सूक्ष्म कणिक अवसादी शैलों से किया जाता है। शैल गैस केवल प्रोपेन और ब्यूटेन का एक मिश्रण नही है, बल्कि इसमे औसतन 86% से अधिक मीथेन, 4 प्रतिशत इथेन, 1 प्रतिशत प्रोपेन सहित अन्य गैसे भी पाई जाती हैं। भारत में कोयला-संस्तर मीथेन स्रोत बहुतायत में  है। इसके साथ ही भारत में शैल गैस का सिंधु-गंगा के मैदानी क्षेत्रों असम,  गुजरात, राजस्थान तथा तटीय क्षेत्रों में बड़ा भंडार पाया जाता है, जिनमें प्रमुख हैं – निम्न कोटि का कोयला, धुलाई संसाधनों की उपयोग क्षमता में कमी, कोकिंग कोयले का बढ़ता आयात, कोयले के स्थानांतरण में आने वाली  बाधा एवं कार्य संचालन कीमते आदि।

  • भारत के लिए कोयला एक अपरिहार्य संसाधन है, क्योंकि देश के ऊर्जा क्षेत्र में कोयला सबसे प्रमुख ऊर्जा स्रोत है।

  • 1 अप्रैल, 2017 की स्थिति के अनुसार, प्रमाणिक कोयला भंडार की दृष्टि से शीर्ष पांच राज्य इस प्रकार हैं –

  1. झारखंड (44341 मि.टन)

  2. ओडिशा (34810 मि.टन)

  3. छत्तीसगढ (19997 मि.टन)

  4. पश्चिम बंगाल (13723 मि. टन)

  5. मध्य प्रदेश (11269 मि. टन)

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पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस

  • पेट्रोलियम हाइड्रोजन और कार्बन का यौगिक है। यह ठोस, तरल या गैस रुप में पाया जाता है। कच्चा पेट्रोलियम लगभग 30 लाख वर्ष पुरानी सागरीय अवसादी शैलों से प्राप्त किया जाता है।

  • भारत में यह टर्शियरी काल की चट्टानों की अपनतियों और भ्रंश फंदों में पाया जाता है।

  • भारत में खनिज तेल के बारे में सर्वप्रथम 1860 ई. में मार्घेरिटा के समीप असम रेलवे एंड ट्रेडिंग कं. के द्वारा पता लगाया गया। इसके बाद 1867 ई. में माकूम (असम) क्षेत्र में देश का पहला तेल कुआं खोदा गया।

  • भारत में सबसे पुराना तेल भंडार डिग्बोई असम मे है। यह ब्रह्मपुत्र घाटी का तेल भंडार है। भारत मे कच्चे खनिज तेल उत्पादन के चार प्रमुख क्षेत्र हैं –

  1. ब्रह्मपुत्र घाटी

  2. गुजरात तट

  3. पश्चिमी घाटी (अपतटीय क्षेत्र)

  4. पूर्वी तट (अपतटीय क्षेत्र)

  • ब्रह्मपुत्र घाटी देश का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है। इस क्षेत्र के मुख्य तेल उत्पादक क्षेत्र डिब्रूगढ़ और शिवसागर जिलों की नोवा, डिरलिंग और बूढ़ी डिरलिंग नदी घाटियों में अवस्थित हैं। यहां प्रमुख तेल उत्पादक केन्द्र डिगबोई, नाहर कटिया, हगरी जन-मोरान, रुद्रसागर, लकवा व सुरमा घाटी है।

  • नूनमाटी तेलशोधन कारखाना असम राज्य में अवस्थित है। यह  इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के अधिकार में हैं। इसकी स्थापना वर्ष 1962 में गुवाहाटी के निकट की गई थी। इसी प्रकार  डिगबोई तथा नुमालीगढ़ तेलशोधनशाला असम राज्य में अवस्थित हैं।

  • गुजरात भारत मे कच्चा तेल उत्पादन के संदर्भ में तीसरे स्थान पर (अपतटीय क्षेत्र एवं राजस्थान के बाद) है।

  • अंकलेश्वर गुजरात के भरुच जिले में 30 वर्ग किमी. क्षेत्रफल पर फैला खनिज तेल भंडार क्षेत्र है। यहां तेल की खोज जुलाई, 1958 में की गई थी, जबकि उत्पादन वर्ष 1961 में शुरु हुआ।

  • लुनेज तेल उत्पादक क्षेत्र गुजरात राज्य में खम्भात की खाड़ी के ऊपरी सिरे पर स्थित है।

  • कलोल क्षेत्र (अहमदाबाद) गुजरात राज्य में स्थित है, इसके उत्पादक केन्द्रों में नवग्राम, धोलका, सोमासान, कोसम्बा आदि सम्मिलित हैं।

  • कोयाली तेल शोधनशाला (IOCL) गुजरात राज्य में स्थित है। गुजरात राज्य के जामनगर जिले मे स्थित जामनगर नगर की स्थापना वर्ष 1920 में महाराजा रंजीत सिंह ने की थी। तब इसे नवानगर के नाम से जाना जाता था । यहां रिलायंस इंडस्ट्रीज की विश्व की सबसे बड़ी रिफाइनरी स्थित है।

  • भारत में पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र तेल उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र हैं। इसके अंतर्गत बॉम्बे हाई तेल क्षेत्र मुंबई के तट से 160 किमी. की दूरी पर स्थित है। इस तेल क्षेत्र की खोज वर्ष 1964-67 के मध्य की कई तथा इसका नामकरण वर्ष 1965 में किया गया। इस तेल क्षेत्र को रुस एवं भारत की संयुक्त टीम ने खोजा था। यहां सबसे पहले तेल कुआं वर्ष 1974 में खोदा गया था। इसके अतिरिक्त पश्चिमी अपतटीय क्षेत्र के अंतर्गत बसीन क्षेत्र भी सम्मिलित किया जाता है। यह तेल क्षेत्र  बम्बई हाई के दक्षिण में स्थित है।

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  • अलिया बेट खनिज तेल क्षेत्र पश्चिमी तटीय क्षेत्र के अंतर्गत शामिल किया जाता है यह तेल क्षेत्र भावनगर से 45 किमी. दूर खम्भात की खाड़ी में अलिया बेट द्वीप के समीप स्थित है।

  • भारत के पूर्वी तटीय तेल क्षेत्र में गोदावरी-कृष्णा एवं कावेरी नदियों के डेल्टा क्षेत्रों में खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस के भंडारों को शामिल किया जाता है।

  • कावेरी बेसिन के नारिमानम और कोइरल कालापल्ली अपतटीय तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल का उत्पादन किया जाता है। कच्चे खनिज तेल का भंडार राजस्थान मरुस्थल, रामपुर जिले की बिलासपुर तहसील (उत्तर प्रदेश) और पंजाब के ज्वालामुखी क्षेत्र में भी पाया जाता है।

  • राजस्थान में बाड़मेर के निकट मंगलाभाग्यम, शक्ति एवं ऐश्वर्या बाड़मेर सांचौर बेसिन में खोजे गए 22 तेल क्षेत्रों में प्रयुक्त क्षेत्र हैं।

  • भारत के अपतटीय क्षेत्रों के तेल भंडारों पर केन्द्र सरकार का नियंत्रण है और यही से कच्चे तेल का सर्वाधिक  उत्पादन किया जाता है।

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भारत में कच्चे तेल का उत्पादन

मात्रा (हजार टन में)

क्षेत्र

2015-16

2016-17 (P)

1.    अपतटीय क्षेत्र

19088

18419

2.    राजस्थान

8602

8164

3.    गुजरात

4461

4605

4.    असम

4185

4202

5.    आंध्र प्रदेश

295

276

6.    तमिलनाडु

261

284

संपूर्ण भारत

19088

18419

  • भारत के राज्यें में सर्वाधिक तेल उत्पादक राज्य राजस्थान है।

  • भारत में पेट्रोलियम का सर्वाधिक उत्पादन बॉम्बे हाई में होता है यह अपतटीय क्षेत्र में शामिल है।

  • वर्तमान समय में देश मे कुल 23 तेल शोधन शालाएं हैं, जिसमें 18 सार्वजनिक क्षेत्र, 2 संयुक्त क्षेत्र, में तथा 3 निजी क्षेत्र में (रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की 2 तथा 1 एस्सार ऑयल लिमिटेड की) आते हैं।

  • इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की बरौनी तेलशोधनशाला बिहार में स्थित है।

  • हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लि. (HCPL) की विशाखापत्तनम तेलशोधनशाला आंध्र प्रदेश में स्थित है।

  • मथुरा तेल शोधनशाला उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है।

  • तातीपाका तेलशोधनशाला आंध्र प्रदेश में अवस्थित है। यह तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम ( ONGC) के अधिकार में है। इसी प्रकार से भारत की प्रमुख रिफाइनरी हल्दिया (प.बंगाल), पानीपत (हरियाणा), मंगलौर (कर्नाटक), बीना (म.प्र.) इत्यादि हैं। भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति में रुकावट से पृथक रखने हेतु भारत ने इंडिया स्टेटजिक पेट्रोलियम रिजर्व लि. की संस्थापना की है। इस हेतु तीन स्थान (विशाखापत्तनम, मंगलौर तथा पादुर) का चयन किया गया है.

  • भारत में सर्वप्रथम भयानक ऊर्जा संकट वर्ष 1973 में पैदा हुआ जब तेल निर्यातक देशों (OPEC) ने तेल की कीमतों में अकस्मात चार गुना से अधिक वृध्दि कर दी थी। देश का औद्योगिक विकास और परिवहन व्यवस्था का विकास इस प्रकार से किया गया था कि पेट्रोलियम की मांग लगातार बढ़ती जा रही थी। इसलिए तेल की कीमतों मे वृध्दि ने देश के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया था।

  • भारत में तेल अन्वेषण का कार्य ओ.एन.जी.सी. और ऑयल इंडिया लिमिटेड द्वारा किया जाता है।

  • हाइड्रोजन विजन-2025 का संबंध पेट्रोलियम उत्पाद के भंडारण से है।

  • भारत में प्राकृतिक गैस की खोज और उत्पादन का कार्य ONGC एवं OIL द्वारा तथा इसके प्रसंस्करण, संप्रेषण और वितरण का कार्य GAIL द्वारा किया जाता है।

  • भारत में प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा भंडार बम्बई हाई एवं बसीन क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त नहरकटिया, मोरान क्षेत्र (असम), जगतिया, गोधा (गुजरात), मंगमडम, अवाड़ी, विरुगंबकम (तमिलनाडु), बरानुरा (त्रिपुरा), बाड़मेर, चरसवाला (राजस्थान), नाम-चिक, मियाओ पुंग (अरुणाचल प्रदेश) इत्यादि में भी गैस के भंडार प्राप्त हुए हैं।

  • रिलायंस इंडस्ट्रीज लि. ने वर्ष 2002 में आंध्र अपतटीय क्षेत्र के कृष्णा-गोदावरी-6 बेसिन में प्राकृतिक गैस के प्रचुर भंडारों की खोज की। रिलायंस निजी क्षेत्र की देश की पहली ऐसी कंपनी है, जिसने अपतटीय क्षेत्र में समुद्र तल से 6000 फीट की गहराई तक खुदाई करके प्राकृतिक गैस के भंडारों का पता लगाया। कृष्णा-गोदावरी बेसिन (केजी-डी-6 बेसिन) स्थल भाग के 20000 वर्ग किमी. तथा बंगाल की खाड़ी के 24000 वर्ग किमी. के क्षेत्र में विस्तृत एक क्रैटोनिक भ्रंश किनारा है।

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  • भारत में अधिकांश प्राकृतिक गैस का उत्पादन बसीन एवं बॉम्बे हाई अपतटीय क्षेत्र से होता है।

  • भारत में वर्ष 2015-16 (प्राविजनल) के दौरान 32249 मिलियन क्यूबिक मी. गैस का उत्पादन हुआ।

  • भारत में प्राकृतिक गैस के उत्पादन (2015-16 अंतिम) में शीर्ष 5 राज्य/क्षेत्र में –

  1. अपतटीय

  2. असम

  3. गुजरात

  4. राजस्थान

  5. त्रिपुरा का स्थान आता है।

  • हजीरा-बीजापुर-जगदीशपुर (HBJ) गैस पाइपलाइन गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (GAIL) द्वारा निर्मित की गई है। एच.बी.जे. पाइपलाइन द्वारा प्राकृतिक गैस का परिवहन दक्षिण बेसिन से किया जाता है, यह बॉम्बे हाई के अपतटीय क्षेत्र में अवस्थित है।

  • हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय के अनुसार ONGC ने निम्न 5 बेसिन में 187.5 TCF शैल गैस भंडार का अनुमान किया है –

  1. केम्बे

  2. गंगा घाटी

  3. असम, एवं असम अराकान

  4. कृष्णृ-गोदावरी

  5. कावेरी

  • भारत में 14 एन.ई.एल.पी. ब्लॉक्स, 1 जे.बी. ब्लॉक्स 2 नोमिनेशन ब्लॉक्स एवं 4 सी.बी.एम.ब्लॉक्स पेट्रोलियम अन्वेषण से संबंधित हैं। ये वस्तुतः संभावित तेल एवं गैस क्षेत्र हैं जिन्हें विभिन्न कंपनियों को नई अन्वेषण लाइसेंस नीति (NELP) के तहत आवांटित किया गया है। अब तक NELP के 9 दौर हो चुके हैं। 1 अप्रैल, 2016 से NELP के स्थान पर HELP (Hydrocarbon Exploration Licensing Policy) लागू की गई है।

  • तेलशोधक कारखाना राज्य

नुमालीगढ़               असम

तातीपाका               आंध्र प्रदेश

कोयली                 गुजरात

बरौनी                  बिहार

नागापट्टीनम            तमिलनाडु

नूनमती                 असम

मंगलौर                 कर्नाटक

पानीपत                हरियाणा

हल्दिया                 पश्चिम बंगाल

जामनगर               गुजरात

कोच्चि                 केरल

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  • तेलशोधन इकाई चालू होने का वर्ष

डिग्बोई (असम)      –    1901

कोयली (गुजरात)     –    1965

हल्दिया (प.बंगाल)    –    1975

मथुरा (उ.प्र.)        –    1982

विविध – खनिज

  • खनिज प्रायः भू-पृष्ठ में अयस्क के रुप में पाया जाता है। भारत में विभिन्न प्रकार के खनिजों का भंडार पाया जाता है, परंतु इनका वितरण एक समान नही है।

  • पूर्व में भारत अभ्रक उत्पादन में अग्रणी देश था। 10 फरवरी, 2015 को भारत सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के तहत अभ्रक को लघु खनिज घोषित कर दिया गया है। झारखंड राज्य में स्थित कोडरमा अभ्रक उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र है।

  • वर्ष 2016-17 के आंकड़ों के अनुसार, ऐस्बेस्टस का एक मात्र उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश है, जबकि इसका सर्वाधिक भंडारण राजस्थान मे है। वर्ष 2016-17 में किसी राज्य में एस्बेस्टस का उत्पादन नही हुआ।

  • कायांतरित चट्टानें अन्य चट्टानों के रुप में परिवर्तन के फलस्वरुप निर्मित होती हैं। साधारण तौर पर रुप परिवर्तन परतदार एवं अग्नेय शैलों  का होता है, परंतु कभी-कभी रुपांतरित शैल का भ रुपांतरण हो  जाता है, इस क्रिया को पुनः रुपांतरण कहते हैं। गारनेट का संबंध कायांतरित चट्टान से है। गारनेट का निर्माण आग्नेय चट्टानों के कायांतरण से होता है।

  • मौलिक चट्टान बलुआ पत्थर में परिवर्तन से संगमरमर एवं शैल से परिवर्तन से स्लेट रुपांतरित शैलों का निर्माण होता है।

  • भारत में मैंगनीज आयस्क का सबसे अधिक उत्पादन करने वाला राज्य मध्य प्रदेश है। वर्ष 2016-17 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में शीर्ष 5 मैंगनीज अयस्क उत्पादक राज्य हैं –

  1. मध्य प्रदेश (648 ह.टन)

  2. महाराष्ट्र ( 604 ह. टन)

  3. ओडिशा (588 ह.टन)

  4. कर्नाटक (261 ह.टन)

  5. आंध्र प्रदेश (232 ह.टन)

  • मैंगनीज मध्य प्रदेश के बालाघाट एवं छिंदवाड़ा जिलों से प्राप्त होता किया जाता है तथा महाराष्ट्र के भंडारा, नागपुर जिलों में मैंगनीज के निक्षेप पाए जाते  हैं। ओड़िशा से प्राप्त होने वाले मैंगनीज में लोहे की मात्रा अधिक और फॉस्फोरस कम पाया जाता है।

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  • बालाघाट मध्य प्रदेश का खनिज संसाधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण जिला है। यहां से प्राप्त होने वाले खनिजों में बॉक्साइट, कायनाइट, चूना, मैंगनीज एवं तांबा प्रमुख खनिज है।

  • भारत में निकेल का सर्वाधिक भंडार ओड़िशा में मौजूद है। परंतु इसका खनन भारत में नही किया जाता है। इसकी संपूर्ण आपूर्ति आयात के द्वारा की जाती है।

  • सीसा मुख्यतः रवेदार शैलों (शिस्ट) मे चांदी के साथ मिला हुआ पाया जाता है। यह प्रीकैम्ब्रियन और विंध्य चूना पत्थर की शैलों में भी पाया जाता है। सीसा वायुमंडलीय संक्षारण और अम्लीय पदार्थों का प्रतिरोधी होता है।

  • भारत में सीसा का उत्पादन करने वाला एक मात्र राज्य राजस्थान है। राजस्थान का जावर क्षेत्र सीसा उत्पादन के लिए प्रसिध्द है। जिप्सम का सबसे पड़ा उत्पादक राज्य राजस्थान है। यह देश के कुल उत्पादन में सर्वाधिक योगदान करता है। राजस्थान चुरू-बीकानेर की मेखला में जिप्सम बहुलता से पाया जाता है। यह मिट्टी की क्षारीयता दूर कर मिट्टी को उर्वर बनाता है तथा गुणात्मक संवर्धन के पश्चात इसका प्रयोग स्वास्थ्य एवं निर्माण क्षेत्र में होता है।

  • क्रोमाइट लोहा और क्रोमियम का ऑक्साइड है, जो आग्नेय शैलों में पाया जाता है। इसका मिनरल ईयर बुक 2017 के क्रोमाइट उत्पादन आंकड़ों के आधार पर ओडिशा का क्रोमाइट उत्पादन में लगभग एकाधिकार है और केवल कुछ मात्रा ही कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में उत्पादित होती है।

  • भारत में सोना आयस्क का सर्वाधिक उत्पादन कर्नाटक राज्य से होता है। वर्ष 2016-17 (अनंतिम) में कर्नाटक में 577 ह.टन सोना अयस्क का उत्पादन किया गया। झारखंड राज्य में सोना का अल्प मात्रा में उत्पादन किया जाता है। कर्नाटक देश का लगभग 99% प्राथमिक सोना उत्पादन करने वाल राज्य है। कर्नाटक का कोलार, रायचूर जिला सोना उत्पादन के लिए प्रसिध्द है। कर्नाटक में हट्टी सोने की खान (रायचूर) से स्वर्ण उत्पादन किया जाता है।

  • भारत में मध्य प्रदेश हीरा उत्खनन की दृष्टि से सबसे प्रमुख राज्य है। यहां पन्ना तथा सतना जिले मे  हीरे की कई महत्वपूर्ण खाने  हैं।

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  • हीरा-युक्त किम्बरलाइट के वृहत भंडारों की खोज हाल ही में छत्तीसगढ़ के रायपुर  जिले के        पयालीखंड एवं बेहरादीन और बस्तर जिले में तोकापाल में की गई है।

  • जादुगुड़ा झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले मे स्थित है। यह यूरेनियम उत्खनन के लिए प्रसिध्द है। जादुगुड़ा यूरेनियम खान में पहली बार उत्खनन वर्ष 1967 से प्रारंभ हुआ। यहां से प्रतिवर्ष लगभग 200 मेगाटन यूरेनियम का उत्पादन किया जा रहा है।

  • उत्तर प्रदेश के ललितपुर जनपद में यूरेनियम पाया जाता  है।

  • केरल के कई भागों में मूल्यवान खनिज पाए जाते हैं। परंतु कोल्लम जिले के समुद्रतटीय बालू में बड़ी मात्रा में मोनोजाइट, इल्मेनाइट, रुटाइल, जिरकॉन, सिल्मेनाइट आदि खनिज पाए जाते हैं। चाइनाक्ले अथवा काओलिन भी राज्य के कई भागों में पाई जाती है।

  • मोनोजाइट थोरियम, यूरेनियम, सीरियम और लैंथेनम आदि का मिश्रण होता है। यह केरल के तटीय क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पाया जाता है। भारत में थोरियम निक्षेप के व्यापक भंडार हैं।

  • भारत में साल्ट (कॉमन) उत्पादन वर्ष 2015-16 में 27643 लाख टन है, जिसमें राजस्थान का हिस्सा 2384 लाख टन है।

  • साल्ट (कॉमन) उत्पादन (2015-16) में विभिन्न राज्यों का योगदान इस प्रकार है – गुजरात (82%), तमिलनाडु (7.2%), राजस्थान (8.7%), आंध्र प्रदेश (1.4%)।

भारत में प्रमुख खनिज उत्पादक-शीर्ष राज्य

(2016-17)

खनिज

प्रथम

द्वीतीय

तृतीय

बॉक्साइट

ओडिशा

गुजरात

झारखंड

क्रोमाइट

ओडिशा

कर्नाटक

महाराष्ट्र

कोयला

छत्तीसगढ़

ओडिशा

झारखंड

लिग्नाइट

तमिलनाडु

गुजरात

राजस्थान

ग्रेफाइट

तमिलनाडु

ओडिशा

झारखंड

लाइमस्टोन

राजस्थान

मध्य प्रदेश

आंध्र प्रदेश

मैंगनीज अयस्क

मध्य प्रदेश

महाराष्ट्र

ओडिशा

कच्चा तेल

अपतटीय क्षेत्र

राजस्थान

गुजरात

प्राकृतिक गैस

अपतटीय क्षेत्र

असम

गुजरात

ताम्र अयस्क

मध्य प्रदेश

राजस्थान

झारखंड

स्वर्ण

कर्नाटक

झारखंड

लौह अयस्क

ओडिशा

कर्नाटक

छत्तीसगढ़

चांदी

राजस्थान

कर्नाटक

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  • स्थल खनिज

अमगुरी (असम)     पेट्रोलियम

लांजगढड (ओडिशा)   बॉक्साइट

काम्प्टी (महाराष्ट्र)   कोयला

बेल्लारी (कर्नाटक)    लौह अयस्क

मकुम              कोयला

डल्लीराजहरा        लौह अयस्क

कोरापुट            बॉक्साइट

चित्रदुर्ग            मैंगनीज

  • लौह अयस्क क्षेत्र राज्य

बादाम पहाड़        ओड़िशा

डल्लीराजहरा        छत्तीसगढ़

कुद्रेमुख            कर्नाटक

नोआमुंडी           झारखंड

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विद्युत ऊर्जा

तापीय

  • भारत में ताप विद्युत उत्पादन हेतु कोयला, खनिज तेल व प्राकृतिक गैस जैसे जीवश्मी ऊर्जा का उपयोग किया जाता है।

  • राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) की स्थापना वर्ष 1975 में की गई थी। भारत सरकार विद्युत मंत्रालय के अनुसार वर्ष 31 दिसंबर, 2017 तक की स्थिति के अनुसार, भारत में संस्थापित विद्युत क्षमता 330861 मेगावॉट थी। इसमें कोयले पर आधारित तापीय विद्युत का हिस्सा सर्वाधिक अर्थात् 218960 मेगावॉट (66.2%) रहा। भारत में विद्युत उत्पादन में अन्य क्षेत्रों का योगदान इस प्रकार है-

जवविद्युत – 44963 मेगावॉट,

परमाणु विद्युत – 6780 मेगावॉट

गैर पारंपरिक विद्युत – 60158 मेगावॉट

  • भारत सरकार द्वारा पॉवर फाइनेन्स कॉर्पोरेशन को नोडल एजेंसी बनाते हुए कोयला आधारित बड़ी विद्युत परियोजना (अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट) की शुरुआत की जा रही है। इन परियोजनाओं में कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए सुपर क्रिटिकल तकनीक अपनाने का प्रस्ताव है। इन अल्ट्रा मेगा पॉवर प्रोजेक्ट में से प्रत्येक की क्षमता 4000 मेगावॉट या उससे अधिक है। वर्तमान समय में मुंद्रा (गुजरात) में  अल्ट्रा मेगा पॉवर प्रोजेक्ट टाटा पॉवर के द्वारा स्थापित किया जा रहा है। इसी प्रकार से शासन (मध्य प्रदेश), कृष्णाट्टनम (आंध्र प्रदेश), तिलैया (झारखंड), गिरिये (महाराष्ट्र),  येच्चूर (तमिलनाडु), तादरी (कर्नाटक), अलकतरा (छत्तीसगढ़), साल्का खमेरिया (छत्तीसगढ़), मरक्कनम (तमिलनाडु) आदि में यह परियोजना क्रियान्वित की गई है।

  • तमिलनाडु में स्थित नेवेली ताप विद्युत संयंत्र लिग्नाइट कोयले पर आधारित दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रथम संयंत्र है। लिग्नाइट टर्शियरी कोयला (तृतीयक कोयला) है।

  • NTPC फरक्का ताप विद्युत केन्द्र पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में अवस्थित है। इसे राजमहल कोल फील्ड (ECL) से कोयला तथा फरक्का फीडर नहर से जल की प्राप्ति हो रही है।

  • रामगुंडम सुपर थर्मल पॉवर स्टेशन तेलंगाना में अवस्थित है। इसकी कुल क्षमता 2600 मेगावॉट है।

  • ओबरा ताप विद्युत केन्द्र की स्थापना उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में रूसी इंजीनियरों के सहयोग से वर्ष 1971 में हुई थी।

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  • बोकारो तापीय बिजलीघर कोनार बांध के नीचे बोकारों, झारखंड में स्थित है। बोकारों में दो तापीय बिजलीघर हैं। एक बोकारों थर्मल पॉवर स्टेशन जिसका निर्माण दामोदर घाटी निगम द्वारा वर्ष 1952 में किया गया था। दूसरा बोकारों थर्मल पॉर स्टेशन – इसमे तीन विद्युत उत्पादन इकाइय़ां हैं, जिनमें प्रथम इकाई वर्ष 1986 में संचालित की गई थी।

  • गुजरात के जामनगर में अवस्थित बिजली संयंत्र एस्सार पॉवर से संबंधित है।

  • बिहार के नवीनगर स्थित बिजली संयंत्र का प्रबंधन भारतीय रेल बिजली कंपनी के अधीन है। इस संयंत्र में NTPC की 49% की भागीदारी है।

  • केरल के अलाप्पुझा जिले मे स्थित कयम कुलम बिजली संयंत्र राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) के अंतर्गत कार्यान्वित है। इसकी कुल विद्युत क्षमता 350 मेगावॉट है।

  • भारत के प्रमुख ताप विद्युत संयंत्रों में – उकाई ताप विद्युत परियोजना (गुजरात), पत्रातू ताप विद्युत केन्द्र (झारखंड), पेंच ताप विद्युत केन्द्र (मध्य प्रदेश), डाभोल ताप विद्युत केन्द्र (महाराष्ट्र में), उतारन ताप विद्युत केन्द्र (गुजरात में), रायचूर (कर्नाटक में), बेनकबोरी (गुजरात) आदि हैं।

  • कोठागुदम ताप विद्युत केन्द्र तेलंगाना राज्य में अवस्थित है इसकी क्षमता 120 मेगावॉट है।

  • उड़ान महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित गैस आधारित शक्ति परियोजना है। यह परियोजना महाराष्ट्र स्टेट पॉवर जेनरेशन कंपनी लिमिटेड द्वारा परिचालित है। भारत में कुल विद्युत संस्थापित क्षमता में तापीय (66.2%), पनबिजली (13.6%), अक्षय ऊर्जा (18.2 %) और न्यूक्लियर ऊर्जा (2.0%) का योगदान है।

  • भारत में तापीय शक्ति क्षमता के अनुसार शीर्ष राज्यों में –

  1. महाराष्ट्र

  2. गुजरात

  3. उत्तर प्रदेश

  4. प. बंगाल हैं।

  • ताप विद्युत संयंत्र राज्य

बदरपुर             –    दिल्ली

हरदुआगंज          –    उत्तर  प्रदेश

उतारन             –    गुजरात

पारस              –    महाराष्ट्र

उकाई              –    गुजरात

पत्रातू              –    झारखंड

पेंच               –    मध्य प्रदेश

डाभोल             –    महाराष्ट्र

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नाभिकीय

  • भारत में देश की भावी ऊर्जा मांग की आपूर्ति का आशाप्रद स्रोत परमाणु ऊर्जा है।

  • भारत में प्रथम न्यूक्लियर ऊर्जा स्टेशन तारापुर, महाराष्ट्र में स्थापिक किया गया। तारापुर विद्युत गृह के वर्ष 1969 में प्रारंभ होने से भारत विश्व के नाभिकीय ऊर्जा मानचित्र में आ गया। तारापुर में अमेरिकी तकनीकी से परिष्कृत यूरेनियम ईंधन के रुप में तथा साधारण जल द्वारा ठंडा किए जाने की विधि पर आधारित बायलिंग वाटर रिएक्टर की स्थापना की गई।

  • नाभिकीय ईंधन के रुप में प्रयोग किया जाने वाला महत्वपूर्ण परमाणु खनिज यूरेनियम है। थोरियम दूसरा महत्वपूर्ण खनिज है।

  • भारत में थोरियम के अनुमानतः 4.5 लाख टन के भंडार हैं। ये भंडार केरल की मोनोजाइट तटीय बालू, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं ओड़िशा राज्यों में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त मोनोजाइट के जमाव बिहार, कर्नाटक, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में भी मिलते हैं।

  • भारत में वर्ष 2016-17 में कुल विद्युत उत्पादन 1242.010 बिलियन यूनिट है। इसी प्रकार 31 दिसंबर, 2017 तक कुल स्थापित विद्युत क्षमता 330861 मेगावॉट में नाभिकीय विद्युत का भाग 6780र मेगावॉट अर्थात् 2.0% है।

  • रावत भाटा परमाणु विद्युत गृह का निर्माण वर्ष 1973 में कनाडा के सहयोग से कोटा, राजस्थान में किया गया। भारत में 25वें परमाणु विद्युत संयंत्र का निर्माण रावतभाटा (राजस्थान), में ही हो रहा है, जिसका निर्माण कार्य जुलाई, 2011 से प्रारंभ हो गया।

  • नरौरा परमाणु विद्युत गृह बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में स्थित है।

  • काकरापारा नाभिकीय संयंत्र सूरत (गुजरात) में स्थित है।

  • वर्ष 1988 में भारत तथा तत्कालीन सोवियत संघ के मध्य तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने हेतु एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे इस समझौते के तहत रुस वर्ष 2002 से भारत के लिए दो परमाणु रिएक्टरों का निर्माण कर रहा है। दिसंबर, 2008 में अंतर्सकारी समझौते पर हुए हस्ताक्षर के तहत रुस भारत हेतु चार और परमाणु रिएक्टरों की आपूर्ति करने के लिए राजी हुआ था। सभी 4 रिएक्टर क्रियान्वयन के चरण में हैं।

  • कैगा नाभिकीय संयंत्र कर्नाटक राज्य में अवस्थित है। कर्नाटक राज्य के उत्तर कन्नड़ जिले के कैगा नामक स्थान पर कैगा परमाणु विद्युत संयंत्र की स्थापना की गई। इस परियोजना के अंतर्गत चार इकाइयों की स्थापना की गई है। इसके चौथे रिएक्टर का परिचालन 27 नवंबर, 2010 से प्रारंभ हुआ। यह भारत में स्थापित 20वां परमाणु विद्युत संयंत्र है।

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  • तमिलनाडु के तिरुनेवेली जिले के कुडनकुलम मे स्थित कुडनकुलम परमाणु विद्युत संयत्र का पहला रिएक्टर एक दाबित जल रिएक्टर है और यह भारत में स्थापित 21वां परमाणु संयंत्र हैं।

  • मीठी विरदी परमाणु ऊर्जा संयंत्र अमेरिका के सहयोग से स्थापित किया जा रहा है। इसकी घोषणा वर्ष 2008 में  भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के बाद की गई थी। 25 मार्च, 2015 को 6000 मेगावॉट की इस परियोजना को केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा तटीय नियामक क्षेत्र की स्वीकृति प्रदान की गई। यह न्यूक्लियर पावर प्लांट गुजरात के भावनगर जिले में स्थित है.

  • भारत में जैतपुर परमाणु विद्युत गृह रत्नागिरी (महाराष्ट्र) में फ्रांस के अरेवा कंपनी के सहयोग से प्रस्तावित है।

  • भारत में परमाणु ऊर्जा हेतु भारी जल-संयंत्र में थाल गुरुजल संयंत्र महाराष्ट्र राज्य मे स्थित है, मानगुरु जल संयंत्र तेलंगाना में अवस्थित है। इसी प्रकार से अन्य भारी जल संयंत्र हजीरा (गुजरात), बड़ौदा (गुजरात), कोटा (राजस्थान), तालचेर (ओड़िशा), थाल (महाराष्ट्र) एवं तूतीकोरिन (तमिलनाडु) में स्थापित है।

  • अणु शक्ति विद्युत निगम लिमिटेड, NTPC और NPCIL का संयुक्त उपक्रम है। अणुशक्ति विद्युत निगम लिमिटेड में NPCIL की 51 प्रतिशत की तथा NTPC की 49 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इसकी स्थापना जनवरी, 2011 में हुई थी।

  • आणविक संयंत्र चालू होने का वर्ष

कोटा          –    1989

काकरापार      –    1984

कैगा          –    1999

कलपक्कम     –    1995

  • नाभिकीय संयंत्र केन्द्र तथा उनके राज्य –

कोटा (राजस्थान) नाभिकीय संयंत्र     –     राजस्थान

तारापुर नाभिकीय संयंत्र             –      महाराष्ट्र

काकरापार नाभिकीय संयंत्र          –     गुजरात

नरौरा नाभिकीय संयंत्र              –    उत्तर प्रदेश

कैगा नाभिकीय संयंत्र               –     कर्नाटक

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जलविद्युत

  • भारत में जलविद्युत, ऊर्जा के प्रमुख स्रोतों मे से एक है। हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में जलविद्युत विकास की सर्वाधिक संभावना है। भारत में प्रथम जलविद्युत संयंत्र की स्थापना 1897-98 ई. में प. बंगाल के दार्जिलिंग के निकट सिद्रापोंग अथवा सिद्राबाग में हुई थी। इसके बाद दूसरा जल विद्युत गृह वर्ष 1902 में शिवसमुद्रम (कर्नाटक) के निकट कावेरी नदी पर कोलार की सोने की खानों को बिजली देने के लिए बनाया गया। भारत में राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) के वर्ष 1975 में स्थापित किए जाने के बाद से जलविद्युत के उत्पादन में पर्याप्त सुधार हुआ है।

  • कोयना महाराष्ट्र राज्य में कोयना नदी पर निर्मित बांध है, जिसके पीछे शिवाजी सागर झील का निर्माण हुआ है। इस बांध से जलविद्युत उत्पादन का कार्य महाराष्ट्र राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा किया जा रहा है।

  • रावतभाटा (राणा प्रताप सागर), जलविद्युत गृह कोटा (राजस्थान) में स्थापित किया है। यह कनाडा के सहयोग से स्थापित किया गया है।

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ऊर्जा – विविध

  • ऊर्जा के साधन के रुप में कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और परमाणु ऊर्जा व्यावसायिक स्रोत हैं – ये गैर-नवीकरणीय और परंपरागत संसाधन भी कहते जाते हैं, जबकि सौर और पवन ऊर्जा, बायोगैस, अवशिष्ट से प्राप्त ऊर्जा, भू-तापीय एवं ज्वारीय ऊर्जा, लघु विद्युत एवं बायोमास ऊर्जा के गैर-व्यावसायिक और गैर-परंपरागत स्रोत हैं। इन्हें ऊर्जा के नवीकरणीय संसाधन कहा जाता है। नवीकरणीय संसाधन अथवा नव्य संसाधन वे संसाधन हैं जिनके भंडार में प्राकृतिक/पारिस्थितिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्स्थापन होता रहता है। नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा 26 दिसंबर, 2008 से समेकित ऊर्जा नीति को मंजूरी दी गई। सौर ऊर्जा कभी न खत्म होने वाला ऊर्जा का विशाल स्रोत है। जिसका उपयोग खाना, बनाने , जल शुध्दीकरण, विद्युत निर्माण आदि में किया जा सकता है। भारत में पूरे वर्ष 300 दिन औसतन लगभग 5 किलोवॉट प्रति वर्ग सेमी. सौर विकिरण ऊर्जा मिलती है।

  • भारत में रामपुरा गांव अपना सौर ऊर्जा प्लांट लगाने वाला प्रथम गांव बना, जो उत्तर प्रदेश राज्य मे स्थित है।

  • भारत में 2 मेगावॉट क्षमता वाला पहला सोलर फोटोवोल्टिक संयंत्र पश्चिम बंगाल के वर्ध्दमान जिले में आसन सोल के निकट स्थापित किया गया है।

  • भारत में पवन ऊर्जा के उत्पादन के लिए उपयुक्त प्रदेश तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश,  गुजरात और कर्नाटक आदि हैं।

  • भारत में सुजलान ग्रुप द्वारा गुजरात के कच्छ में निर्मित 1100 मेगावॉट पवन ऊर्जा इकाई एशिया की सबसे बड़ी इकाई है।

  • तमिलनाडु राज्य में मुप्पंडाल नामक स्थान पवन इकाई है, इसकी स्थापित क्षमता 150 मेगावॉट है।

  • महाराष्ट्र राज्य मे स्थित सतारा पवन ऊर्जा संयंत्र के लिए प्रसिध्द है। पवन ऊर्जा उत्सर्जित करने हेतु यहां 500 टावर लगाए गए हैं।

  • भारत में पवन ऊर्जा (31 मार्च, 2016) के उत्पादन (स्थापित क्षमता) के संदर्भ में प्रथम स्थान तमिलनाडु राज्य का (7613.86 मेगावॉट) है। तत्पश्चात महाराष्ट्र (4653.83 मेगावॉट), राजस्थान (3993.95 मेगावॉट) एवं गुजरात का स्थान आता  है।

  • समुद्र में उठने वाले ज्वार-भाटा की मदद से विद्युत उत्पादन ज्वारीय ऊर्जा कहलाता है। भारत में 8000-9000 मेगावॉट ज्वारीय विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता भारत में ज्वारीय ऊर्जा के दो प्रमुख संभावित क्षेत्र हैं –

  1. कच्छ की खाड़ी और खंभात की खाड़ी (पूर्व नाम कैम्बे की खाड़ी) अर्थात गुजरात तटीय क्षेत्र। यहां उच्चतम ज्वारीय रेंज 8-11m है, जबकि औसत ज्वारीय रेंज 6.77-5.23m है। इन क्षेत्रों में ज्वारीय ऊर्जा की संभावित क्षमता 8200 मेगावॉट है। कच्छ की खाड़ी में लगभग 1200 मेगावॉट  ज्वारीय विद्युत उत्पादन की क्षमता है। खंभात की खाड़ी में लगभग 7000 मेगावॉट विद्युत उत्पादन क्षमता है।

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  1. पश्चिम बंगाल में सुन्दरबन डेल्टाई क्षेत्र – यहां लगभग 5मी. ऊंची ज्वारीय रेंज है, जबकि औसत ज्वारीय रेंज 2.97 मी. हैं। इस क्षेत्र की संभावित ज्वारीय ऊर्जा संभावनाएं लगभग 100 मेगावॉट हैं।

  • भू-तापीय ऊर्जा के आशय भूपटल की ऊष्मा से है, जो ज्वालामुखी, गेसर, उष्ण स्रोतों आदि के रुप में मिलते हैं।

  • भारत का प्रथम भू-तापी विद्युत संयंत्र वर्ष 2012 में आंध्र प्रदेश (वर्तमान तेलांगाना) के खम्मम मे स्थापित किया गया।

  • भूतापीय ऊर्जा पर आधारित मणिकर्ण बिजली संयंत्र हिमाचल प्रदेश राज्य के कुल्लू जिले में स्थित है। यह गर्म पानी के स्रोतों के लिए प्रसिध्द है। इसकी ऊंचाई 1760 मी. है। पार्वती घाटी मे स्थित मणिकर्ण के गर्म स्रोतो से बिजली उत्पादित की जाती है। मणिकर्ण के अलावा कसोल (760 से.), खीरगंगा (490 से.) और पुल्गा (440से.) में भी गर्म पानी के स्रोत पाए जाते हैं।

  • भारत में उत्पादित कुल व्यावसायिक ऊर्जा में गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतो का योगदान लगभग 14% से अधिक है। वर्ष 2014-15 में भारत की प्रति व्यक्ति प्राथमिक ऊर्जा खपत 423.5 किग्रा. तेल (17731 मेगाजूल) के बराबार थी।

  • गुजरात प्रति व्यक्ति बिजली की स्थापित क्षमता एवं उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। इस दृष्टि से अन्य शीर्ष राज्य क्रमशः हैं –

महाराष्ट्र

तमिलनाडु

आंध्र प्रदेश

उत्तर प्रदेश

  • सकल विद्युत संस्थापित क्षमता की दृष्टि से महाराष्ट्र का प्रथम स्थान है।

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उद्योग

लौह एवं इस्पात उद्योग

  • लोहा एवं इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है।

  • भारत में आधुनिक रुप में इस्पात बनाने का प्रथम प्रयास 1830 ई. में पोर्टोनोवो (तमिलनाडु) के पास किया गया, परंतु यह कारखाना कुछ समय बाद असफल हो गया। भारत में 1874 ई. में प्रथम बार बंगाल आयरन वर्क्स कुल्टी द्वारा लोहे का सफल उत्पादन किया गया।

  • भारत में टाटा आयरन एवं स्टील कंपनी द्वारा वर्ष 1907 में साकची (जमशेदपुर) मे नए कारखाने की स्थापना की गई जिसमें वर्ष 1908 में कच्चा लोहा और वर्ष 1911 में इस्पात का उत्पादन शुरु हो गया। वर्तमान में यह दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अस्पात कंपनी है, जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 28 मिलियन टन है।

  • विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील लि. (VISL) की स्थापना वर्ष 1923 में कर्नाटक के शिमोगा जिले में भद्रावती नदी के तट पर की गई थी। इसे कच्चा लोहा बाबाबूदन पहाड़ियों से, जबकि चूना पत्थर भण्डीमुण्डा से प्राप्त होता था कोयले की स्थानीय आपूर्ति न होने के कारण यहां शक्ति के लिए चारकोल अथवा लकड़ी का प्रयोग किया जाता था, जो मालनन्द वन क्षेत्रों से प्राप्त होता था। वर्ष 1989 से ही यह स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लि. के अनुषंगी के रुप में थी। वर्ष 1998 में इसका विलय सेल में पूरी तरह से हो गया। स्वतंत्रता पश्चात भारत की द्वीतीय पंचवर्षीय योजना में भारी एवं आधारभूत उद्योगों पर विशेष बल दिया गया। इसी के अंतर्गत राउरकेला (ओड़िशा), भिलाई (छत्तीसगढ़), दुर्गापुर (प. बंगाल) में इस्पात संयंत्रों की स्थापना की गई।

  • राउरकेला इस्पात संयंत्र या हिंदुस्तान स्टी लिमिटेड राउरकेला ओड़िशा के सुंदरगढ़ जिले में स्थित है। इस कारखाने को जर्मनी की कंपनी क्रुप्स और डिमैग के सहयोग से लगाया गया था। यहां वर्ष 1959 में उत्पादन शुरु किया गया था। यह मैंगनीज और चूने के पत्थर के भंडारों के निकट स्थित है। यहां लौह अयस्क ओड़िशा के सुंदरगढ़ अथवा क्योंझर और केंदुझार जिलों में लाया जाता है, कोयलास बोकारों, झरिया, और तलचर क्षेत्रों से कोकिंग कोयला कारगली के कोयला प्रक्षालन केन्द्र से तथा मैंगनीज, चूने का पत्थर और डोलोमाइट वीरमित्र पुर से प्राप्त किया जाता है। इसे हीराकुंड से सस्ती पनबिजली आसानी से प्राप्त हो जाती है।

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  • भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना पूर्व सोवियत संघ की सहायता से वर्ष 1953 में छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग जिले में भिलाई नामक स्थान पर कोलकाता-मुंबई रेलमार्ग के सहारे की गई है। भिलाई इस्पात संयंत्र को लौह अयस्क की आपूर्ति डल्लीराजहरा लौह अयस्क भंडार से होती है।

  • हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड (HSL), दुर्गापुर- दुर्गापुर इस्पात संयंत्र की स्थापना वर्ष 1962 में ब्रिटेन के सहयोग से प. बंगाल के वर्धमान जिले में आसनसोल के निकट किया गया है। इस संयंत्र को लौह अयस्क गुआ क्षेत्र के बोलनी खदान से, कोयला झरिया और बराकर की खानों से, मैंगनीज जमदा (क्योंझर जिला) से तथा बिजली और जल दामोदर नदी से प्राप्त होता है।

  • बोकारो स्टी लिमिटेड बोकारों- यह संयंत्र झारखंड राज्य के हजारीबाग जिले में बोकारों और दामोदर नदियों के संगम के पास रुसी सहयोग से वर्ष 1964 में लगाया गया।

  • लोहा एवं इस्पात उद्योग के लिए खनिज पदार्थों के रुप में लौह अयस्क, कोकिंग कोयला, मैंगनीज, राक फॉस्फेट, शोरा, डोलोमाइट तथा क्रोमियम प्रमुख हैं। देश में कोककारी कोयले की कमी होने के कारण मुख्यतः ऑस्ट्रेलिया से इसे आयात किया जाता है।

  • स्टेनलेस स्टील बनाने में सामान्यतः क्रोमियम एवं निकेल को प्रयोग में लाया जाता है। इन दोनो को ही लौह धातु के साथ मिलाकर कुछ मात्रा में कार्बन डालकर स्टेनलेस स्टील तैयार किया जाता है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के वर्ष 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार, लौह एवं इस्पात उद्योग द्वारा 35830 करोड़ रु. की विदेशी मुद्रा का अर्जन किया गया। आर्थिक समीक्षा, 2017-18 के अनुसार, वर्ष 2016-17 में चाय और मेट का निर्यात मूल्य 731 मि. डॉलर, बटे हुए धागे सहित जूट से निर्मित समान 321 मि. डॉलर, लौह अयस्क 1534 मि. डॉलर और चीनी तथा शोरा 1338 मि. डॉलर है।

  • विशाखापत्तनम इस्पात संयंत्र भारत का पहला समुद्र तट पर स्थित इस्पात कारखाना है। इस संयंत्र को लौह अयस्क की आपूर्ति बैलाडीला (छत्तीसगढ़) खान से की जाती है।

  • टिस्को (टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड) भारत की प्रमुख इस्पात कंपनी है। टाटानगर (जमशेदपुर) स्थित इस कारखाने की स्थापना वर्ष 1907 में की गई थी।

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एल्युमीनियम उद्योग

  • भारत में एल्युमीनियम उद्योग की शुरुआत वर्ष 1937 में एल्युमीनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, जे.के. नगर (प.बंगाल) के गठन के साथ हुआ। एल्युमीनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा वर्ष 1942 में एल्युमिना और 1944 में एल्युमीनियम का उत्पादन किया गया।

  • भारत में दूसरी पंचवर्षीय योजना में दो नए एल्युमीनियम संयंत्रों की स्थापना हीराकुंड (INDAL) और रेनुकूट (HINDALCO) में की गई।

  • हिण्डालको (HINDALCO) आदित्य बिड़ला ग्रुप की कंपनी है, जो एल्युमीनियम और कॉपर का उत्पादन करती है। इसकी स्थापना वर्ष 1958 में की गई थी। इस कंपनी का एल्युमीनियम उत्पादन संयंत्र वर्ष 1962 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के रेनुकूट (सोनभद्र) में स्थापित किया गया था। मई, 2007 में हिण्डालकों द्वारा नॉवेलिस का अधिग्रहण कर लिया गया।

  • भारत एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड की स्थापना 11 जनवरी, 1969 को कोरबा में की गई थी। इसको बॉक्साइट की आपूर्ति अमरकंटक (शहडोल, मध्य प्रदेश), गन्धमर्दन (ओड़िशा) से और बिजली की आपूर्ति कोरबा ताप शक्तिकृह से होती है।

  • बाल्को (BALCO) सार्वजनिक क्षेत्र की प्रथम एल्युमीनियम उत्पादक कंपनी है। इंडियन एल्युमिनियम कंपनी लिं. (INDAL) वर्ष 1944 में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रुप में कार्य करने लगी। इसकी दो एल्युमीनियम इकाइयां हैं। पहली हीराकुंड (ओडिशा) और दूसरी अलुपुरम (केरल) में स्थापित है।

  • नेशनल एल्युमीनियम कंपनी (NALCO) की स्थापना वर्ष 1981 में ओड़िशा के कोरापुट जिले के दमनजोड़ी में की गई है। यह वर्ष 1986 से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रुप में कार्यरत है।

  • नेशनल एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड की भुवनेश्वर (ओडिशा) में स्थित इकाई एशिया का सबसे बड़ा (विश्व का छठां सबसे बड़ा) एकीकृत एल्युमीनियम संस्थान है।

  • हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड राजस्थान के खेतड़ी में स्थित है, जो देश में मूलतः तांबे का उत्पादन करने वाली एकमात्र कंपनी है।

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  • एल्युमीनियम संयंत्र राज्य

अलुपुरम           –    केरल

अंगुल              –    ओड़िशा

बेलगाम            –    कर्नाटक

कोरबा             –    छत्तीसगढ़

  • भारत एल्युमीनियम कंपनी लि. (BALCO) कोरबा मुख्य शहर से मात्र 10 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसलिए कोरबा एल्युमीनियम उद्योग के कारण महत्वपूर्ण है।

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विविध – उद्योग

  • सीमेंट उद्योग (Cement Industry) भारत के सर्वाधिक उन्नत उद्योगों में से एक है।

  • भारत में पहली बार समुद्री सीपियों का उपयोग कर चेन्नई में वर्ष 1904 में सीमेंट बनाने का प्रयास किया गया। वर्ष 1912-13 में इंडियन सीमेंट कंपनी के पोरबंदर संयंत्र की स्थापना हुई। सीमेंट उद्योग भार ह्रास वाला उद्योग है, जो मुख्यतः चूना पत्थर पर निर्भर है। अतः यह उद्योग चूना पत्थर प्राप्ति वाले क्षेत्रों में अधिकांशः विकसित हुआ है। सीमेंट उद्योग में अन्य कच्चे माल के रुप में कोयला एवं जिप्सम का प्रयोग किया जाता है।

  • भारत में विंध्य शैलों में सीमेंट निर्माण योग्य चूना पत्थर उपलब्ध है।

  • भारत में सीमेंट उद्योग मध्य प्रदेश के प्रमुख जिलों  जैसे – सतना, कटनी, कैमोर, नीमच, मैहर, जबलपुर, रतलाम आदि में पाया जाता है।

  • बिहार में डालमिया नगर मुख्य रुप से सीमेंट के लिए प्रसिध्द है। इसके अतिरिक्त यहां चीनी, कागज, केमिकल आदि उद्योग भी स्थापित हैं। यह नगर बिहार राज्य के रोहतास जिले में सोन नदी के किनारे स्थित है। डालमिया औद्योगिक नगर की स्थापना रामकृष्ण डालमिया ने की थी।

  • सीमेंट उद्योग का विकास आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा, विजयनगरम एवं विशाखापत्तनम जिलों में किया गया है।

  • राजस्थान के सवाई माधोपुर, सिरोही, लखेरी, सीकर आदि जिलों में सीमेंट उद्योग का विकास किया गया है.

  • उत्तर प्रदेश में चुनार (मिर्जापुर) सीमेंट उद्योग के लिए प्रसिध्द है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में सीमेंट के अन्य कारखाने दादरी (गौतमबुध्द  नगर), चुर्क (सोनभद्र) एवं डाला (सोनभद्र) में स्थित है।

  • विश्व स्तर पर सीमेंट उत्पादन में भारत का स्थान चीन के बाद दूसरा है। इंडियन मिनरल ईयर बुक 2017 आंकड़ो के अनुसार, वर्ष 2016-17 में क्रमश) सीमेंट का भारत में उत्पादन 279.97 मिलियन टन रहा।

  • विश्व के तीन अग्रणी सीमेंट उत्पादक राष्ट्र चीन, भारत एवं अमेरिका हैं।

  • वर्ष 2017 में भारत के सीमेंट संयंत्रों में सीमेंट की कुल संस्थापित क्षमता 502.03 मिलियन टन वार्षिक है।

  • भारत में 1818 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के निकट स्थित फोर्ट ग्लास्टर में भारति का पहला सूती वस्त्र कारखाना शुरु किया गया, परंतु यह प्रयास सफल नही रहा। 1854 ई. में मुंबई में प्रथम सफल सूती वस्त्र के कारखाने (द बॉम्बे स्पीनिंग मिल) की स्थापना कवास जी नानाभाई डावर द्वारा की गई थी। सूती वस्त्र उद्योग, कच्चे माल के भार ह्रासी न होने के कारण यह उद्योग पूरे देश में फैला हुआ है।

  • मुंबई, अहमदाबाद, कानपुर, कोयम्बटूर आदि सूती वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं।

  • तमिलनाडु भारत में कारखाना-निर्मित सूत का अग्रणी उत्पादक है। इसका प्रमुख कारण कताई मिलों की संख्या का अधिक होना, कुल श्रमिकों की प्रचुर मात्रा, सस्ती जलविद्युत की उपलब्धता है।

  • तमिलनाडु में स्थित कांचीपुरम तथा मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले में स्थित, चंदेरी, पारंपरिक साड़ी/वस्त्र उत्पादन के लिए विख्यात है।

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  • पंजाब राज्य में लुधियान, होजारी उद्योग के लिए प्रसिध्द है। इसे पंजाब की औद्योगिक राजधानी कहा जाता है। यह होजरी, बुने हुए कपड़ों और विभिन्न रेडीमेड कपड़ों के लिए प्रसिध्द है। यहां लगभग 10000 औद्योगिक इकाइयां हैं और इनमें पांच लाख कुशल श्रमिक कार्यरत  हैं।

  • भारत में प्रथम उर्वरक संयंत्र सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत स्थापित किया गया था। इसके बाद नांगल (पंजाब) में उर्वरक संयंत्र स्थापित हुआ था।

  • फूलपुर (इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश) में भारत का सहकारिता क्षेत्र में सबसे बड़ा उर्वरक कारखाना स्थित है। 3 नवंबर, 1967 को स्थापित इफकों (Indian Farmers Fertilizer Cooperative Limited-IFFCO) की फूलपुर इकाई की स्थापना वर्ष 1981 में हुई थी। इफकों की अन्य इकाइयां कलोल, कांडला, आंवला और पारादीप में  हैं।

  • भारत का सबसे बड़ा पेट्रो-रसायन कारखाना गुजरात (जामनगर) राज्य में अवस्थित है। इसके अतिरिक्त हल्दिया (प. बंगाल) पेट्रो-रसायन कारखाने के लिए प्रसिध्द है। गुजरात में पेट्रो-रसायन का प्रमुख केन्द्र जवाहर नगर (बड़ोदरा) मे स्थित है।

  • भारत में कुल हस्त शिल्प/हथकरघा उद्यमों की संख्या 1.87 मिलियन (लगभग) है। इन उद्योगों द्वारा 4.2 मिलियन व्यक्तियों को रोजगार मिला है। भारत में कुल हस्तशिल्प/हथकरघा उद्यमों में पश्चिम बंगाल सबसे अधिक (17.62%) उसके बाद उत्तर  प्रदेश (16.55%), ओडिशा (7.8%), आंध्र प्रदेश (7.54%) तथा तमिलनाडु (6.8%) का स्थान है।

  • भारत में भारी इंजीनियरिंग उद्योग की शुरुआत वर्ष 1958 में हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (रांची) की स्थापना से हुई।

  • डीजल लोकोमोटिव वर्क्स वाराणसी में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1961 में भारतीय रेलवे द्वारा की गई थी। इसमे रेल डीजल इंजनों और उनके अन्य कलपुर्जों का निर्माण किया जाता है।

  • इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज की स्थापना वर्ष 1948 में की गई थी। इसका कार्पोरेट मुख्यालय बंगलुरू में स्थित है, जबकि विनिर्माण इकाइयां बंगलुरू के अतिरिक्त नैनी, रायबरेली, मनकापुर (उत्तर प्रदेश) पलक्कड़ (केरल) और श्रीनगर (जम्मू कश्मीर) में स्थित हैं।

  • भारत इलेक्ट्रानिक्स लि. वर्ष 1954 में निगमित की गई। भारत इलेक्ट्रानिक्स लि. की विनिर्माण इकाइयां पंचकुला (हरियाणा), कोटद्वार (उत्तराखंड), गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश), तलोजा एवं पुणे (महाराष्ट्र), हैदराबाद एवं मछलीट्टनम (आं.प्र.), बंगलुरू (कर्नाटक) तथा चेन्नई (तमिलनाडु) मे स्थापित है।

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  • स्काईबस मेट्रो पर (विश्व में स्काईबस मेट्रो रेल का प्रथम परीक्षण) भारतीय स्काईबस के संस्थापक एवं जनक बी.राजाराम के पर्यवेक्षण में किया गया।

  • भारत में सर्वाधिक कागज मीलें (127) गुजरात राज्य में स्थित हैं।

  • उत्तर प्रदेश में कागज मीलों की संख्या लगभग 115 है।

  • ITC कागज बोर्ड इकाई (भारत का सर्वाधिक पर्यावरण मित्र पेपर मील) भद्राचलम (तत्कालीन आंध्र प्रदेश वर्तमान तेलंगाना) में स्थित है।

  • भारत में जलयान का कारखाना वर्ष 1941 में विशाखापत्तनम में स्थापित किया गया जिसे वर्ष 1952 में सरकार ने अधिग्रहीत करके उसका नाम हिंदुस्तान शिपयार्ड रखा। विशाखापत्तनम के अलावा कोलकाता, गोवा, मुंबई तथा कोचीन भारत के प्रमुख जलयान निर्माण केन्द्र हैं। ये सभी सार्वजनिक क्षेत्र में हैं।

  • भारत में सभी प्रकार के छोटे एवं बड़े वाहनों का निर्माण होता है। इस उद्योग से संबंधित प्रमुख इकाइयां हैं – हिंदुस्तान मोटर (कोलकाता), प्रीमियर ऑटोमोबाइल लिमिटेड (जमशेदपुर), महिन्द्रा एंड महिन्द्र (पुणे), मारुति उद्योग लिमिटेड (गुरुग्राम) तथा सन राइज इंडस्ट्रीज (बंगलुरु)

  • भारत में बॉक्साइट से एलुमिना बनाने के संयंत्र दामन जोडी (ओडिशा), कोरबा (छत्तीसगढ़), रेनुकूट (उत्तर प्रदेश), मेटूर (तमिनाडु), मुरी (झारखंड) तथा बेलगाम (कर्नाटक) में  है।

  • वर्तमान में भारत में केवल नाइट्रोजन युक्त और फॉस्फेट युक्त उर्वरकों का ही उत्पादन होता है। वर्ष 1951 मे सिंद्री (झारखंड) में प्रथम सरकारी स्वामित्व वाला संयंत्र स्थापित हुआ। पनकी उर्वरक उद्योग के लिए प्रसिध्द है।

  • एटलस साइकिल कंपनी लिमिटेड सोनीपत (हरियाणा) मे स्थित है उसी प्रकार भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड बंगलौर (बंगलुरू) तथा नेशनल एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड, भुवनेश्वर में स्थित है।

  • भारत के मदुरई कोयम्बटूर-बंगलुरु औद्योगिक प्रदेश में शिवकाशी औद्योगिक क्षेत्र स्थित है। यह एक बड़ा औद्योगिक केन्द्र है, जो कि तमिलनाडु के विरुधनगर जिले मे अवस्थित है। यह आतिशबी उद्योग, माचिस उद्योग, प्रिंटिंग उद्योग आदि के लिए प्रसिध्द हैं। पं. जवाहरलाल नेहरु ने इसे लिटिल जापान उपनाम दिया था।

  • पीतमपुर, मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है। यहां देश एवं विदेश के की छोटे और बड़े उद्योग स्थापित हैं। यहां कुछ प्रमुख वाहन उत्पादन कंपनियां भी हैं तथा इसे देश के ऑटोमोबाइल हब के रुप में जाना जाता है।

  • हिंदुस्तान मशीन टूल्स बंगलुरु स्थित सार्जनिक क्षेत्र का एक उपक्रम है इसकी स्थापना वर्ष 1953 में स्विस सरकार के सहयोग से  की गई थी। इनमें कुल नौ संयंत्र है जिनमें प्रमुख संयंत्र पिंजौर (हरियाणा) में स्थित है।

  • फर्टिलाइजर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लि. वर्ष 1961 में निगमित कंपनी और वर्ष 1978 में इसका पुनर्गठन हुआ। इसकी चार उर्वरक उत्पादक इकाइयां इस प्रकार हैं –

  1. सिंद्री (झारखंड)

  2. रामागुण्डम (तेलंगाना)

  3. तलचर (ओडिशा)

  4. गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

  • पेट्रोनेट एल.एन.जी.लि. भारत सरकार द्वारा निर्मित कंपनी है। इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य LNG आयात और देश में LNG टर्मिनल की स्थापना करना है। यह संयुक्त उद्यम उपक्रम के रुप में गेल (GAIL), ओ.एन.जी.सी. (ONGC), आई.ओ.सी. (IOC) तथा बी.पी.सी.एल. (BPCL) द्वारा पोषित की जा रही है। पेट्रोनेट LNG लि. अभी तक  दाहेज (गुजरात) में 5 MMTPA क्षमता का एवं कोच्चि (केरल) में 2.5 MMTPA क्षमता का टर्मिनल लगा चुकी है। तीसरा LNG टर्मिनल मंगलौर (कर्नाटक) में 5 मिलियन टन का लगाया जाना प्रस्तावित है। यह टर्मिनल आयात पर आधारित होगा।

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  • ड्रेजिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (Dredging Corporation of India-DCI) सामरिक दृष्टि से पूर्वी तट पर विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) में स्थित है। इसके प्रमुख कार्यों में बड़े (Major) एवं छोटे बंदरगाहों नौसेना, मत्स्य, बंदरगाहों का निर्माण और अन्य समुद्री संगठनों के लिए समुद्र में खुदाई का कार्य करना है। यह पूरे विश्व में खुदाई के कार्य को फैला रही है और अन्य क्षेत्रों में इसकी सेवाओं की मांग भी है। इनमें पर्यावरणीय संरक्षण, पर्यटन, बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, ऊर्जा उत्पादन, बंदरगाह विकास, खनन, तटीय क्षेत्रों में पाइपलाइनों को बिछाना आदि सम्मिलित है।

  • भारत में नारवा पहाड़ खान झारखंड में स्थित यूरेनियम की खान है, जिसका संचालन यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि. द्वारा किया जा रहा है।

  • मोन नागालैंड का एक जिला है। मोन के सांगन्यू गांव में नगाओं में सबसे अच्छे लकड़ी के वास्तुकार मिलते हैं।

  • गुवाहाटी के समीप असम में स्थित नलबाड़ी जिला बांस पर आधारित पारंपरिक वस्तु के निर्माण के लिए विख्यात है। इसके अतिरिक्त यहां की सचल रंगशाला परंपरा भी प्रसिध्द है।

  • पासीघाट अरुणाचल प्रदेश में सियांग (अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र नदी का स्थानीय नाम) के दाएं किनारें पर स्थित है। यहां लाली वन्य जीव अभ्यारण्य स्थित है। यहां जनजातीय आदिवासी लोगों का पोनंग नृत्य भी प्रसिध्द है।

  • तुरा ब्रह्मपुत्र नदी के निचले मैदानी भाग के पीछे मेघालय में स्थित पहाड़ी भूदृश्य वाला जिला है। यहां 1400 मीटर ऊंची तुरा चोटी भी स्थित है।

  • भारत में डायमंड पार्क वे औद्योगिक केन्द्र हैं, जो हीरों-जवाहरातों और आभूषणों के निर्माण और निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए बनाए गए हैं।

  • उत्तर प्रदेश का देश में कांच उद्योग मे प्रमुख स्थान है। प्रदेश के कांच केन्द्रों में बहजोई, नैनी, फिरोजाबाद, गाजियाबाद, मेरठ, लखनऊ, मक्खनपुर, हिरनपुर, वाराणसी, सासनी आदि मुख्य हैं।

  • फिरोजाबाद कांच की चूडियां बनाने के लिए विश्व विख्यात हैं।

  • केन्द्र उद्योग

काकीनारा  –    जूट

विरुधनगर –    सूती वस्त्र

चन्ना पटना    रेशम

भदोही    –    कालीन

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  • भारी इंजीनियरिंग उद्योग –    रांची

मशीन औजार            –    पिंजौर

एल्युमीनियम            –    रेनुकूट

उर्वरक                  –    सिंद्री

  • नगर उद्योग

ब्रजराज नगर (ओडिशा)    –    कागज

कैमूर (म.प्र.)            –    सीमेंट

हल्दिया (प.बंगाल)        –    पेट्रो-रसायन

फूलपुर (उ.प्र.)                उर्वरक

  • उद्योग केन्द्र

रेशम वस्त्र     –    मैसूर (कर्नाटक)

पेट्रो रसायन    –    जवाहर नगर (बडोदरा, गुजरात)

उर्वरक         –    तलचर (अंगुल, ओडिशा)

औषधि-निर्माण  –    ऋषिकेश (उत्तराखंड)

  • कागज उद्योग स्थल प्रदेश

अमलाई            –    मध्य प्रदेश

बल्लारपुर           –    महाराष्ट्र

ब्रजराजनगर         –    ओड़िशा

राजमुंद्री            –    आंध्र प्रदेश

 

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भारत के अनुसंधान केन्द्र

  • भारत का प्रथम बागवानी विश्वविद्यालय डॉ. यशवन्त सिंह परमार बागवानी एवं वन विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित है। यह विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री के नाम पर 1 दिसंबर, 1985 को स्थापित किया गया था।

  • महारानी लक्ष्मीबाई की ऐतिहासिक नगरी झांसी में भारत सरकार ने भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान वर्ष 1962 में स्थापित किया। झांसी में इस संस्थान की स्थापना करने का मुख्य कारण यहां सभी घासों का पाया जाना भी था। तत्पश्चात वर्ष 1966 में इसका प्रशासनिक नियंत्रण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली को सौंपा गया। जलवायु तथा कृषि की क्षेत्रीय आवश्यकताओं को  ध्यान में रखकर देश के अन्य भागों में इस संस्थान के तीन क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र स्थापित किए गए हैं, जो कि अविकानगर (राजस्थान), धारवाड़ ( कर्नाटक) एवं पालमपुर (हिमाचल प्रदेश) में स्थित है।

  • भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1952 में हुई थी।

  • राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान ( National Dairy Research Institute-NDRI), करनाल (हरियाणा) में स्थित है। यह संस्थान पशु क्लोनिंग तकनीक के लिए विश्व प्रसिध्द है।

  • भारतीय सब्जी (शाकभाजी) अनुसंधान संस्थान (IIVR) उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित है।

  • केन्द्रीय चावल शोध संस्थान (CRRI- Central Rice Research Institute) की स्थापना वर्ष 1946 में भारत सरकार ने ओडिशा राज्य के कटक में की थी।

  • राष्ट्रीय दुग्ध विकास परिषद, आनंद (गुजरात) में स्थित है।

  • केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (पूर्व नाम- केन्द्रीय आम अनुसंधान संस्थान) लखनऊ में स्थित है।

  • पौध संरक्षण, संग रोध एवं भंडारण निदेशालय, फरीदाबाद (हरियाणा) अवस्थित है।

  • राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र, गाजियाबाद में स्थित है। इसके छः क्षेत्रीय केन्द्र, बंगलुरु, भुवनेश्वर, पंचकुला, इम्फाल, जबलपुर एवं नागपुर में स्थित है।

  • केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान राजस्थान के बीकानेर जिले में बीचवाल नामक स्थान पर स्थित है। यह संस्थान शुष्क/अर्ध्दशुष्क क्षेत्र की बागवानी फसलो का उत्पादन एवं उपयोग बढाने हेतु तकनीक विकसित करने की दिशा में कार्य करता है।

  • इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) गैर-लाभकारी, गैर-राजनैतिक संगठन है, जो एशिया तथा सब-सहारा अफ्रीका के विकास हेतु कृषि संबंधी अनुसंधान संचालित करता है। ICRISAT का मुख्यालय हैदराबाद, तेलंगाना में स्थित है।

  • केन्द्रीय शुष्क भूमि खेती अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद में स्थित है।

  • राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (NAARM), हैदराबाद में अवस्थित है।

  • राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान (National Institute of Agricultural Marketing: N.I.A.M.) जयपुर में स्थित है।

  • राष्ट्रीय एटलस संगठन (National Atlas Organisation) की स्थापना 18 अगस्त, 1956 को हुई थी। प्रो. एस.पी.चटर्जी इसके संस्थापक निदेशक  थे। वर्ष 1978 में इसका नाम राष्ट्रीय एटलस और थिमेटिक मानचित्र संगठन (National Atlas and Thematic Mapping Organisation-NATMO) कर दिया गया। यह भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन कार्य करता है। इसका मुख्यालय साल्ट लेक (विधान नगर) कोलकाता में स्थित है।

  • नेचुरल हिस्ट्री के राष्ट्रीय संग्रहालय की स्थापना वर्ष 1978 में नई दिल्ली में की गई थी। बाद में क्षेत्रीय नेचुरल हिस्ट्री संग्रहालयों की स्थापना देश के कई भागों में की गई है। जैसे – दक्षिणी क्षेत्र संग्रहालय-मैसूर, मध्य क्षेत्र संग्रहालय-भोपाल, पूर्वी क्षेत्र संग्रहालय-भुवनेश्वर में स्थित है। इसके अतिरिक्त दो और क्षेत्रीय संग्रहालयों की स्थापना सवाई मधोपुर (पश्चिमी क्षेत्र) और गंगटोक (उत्तर-पूर्वी क्षेत्र) में की जा रही है।

  • अंटार्कटिका में भारत का प्रथम स्थायी स्टेशन दक्षिण गंगोत्री की स्थापना वर्ष 1983 में की गई थी। अंटार्कटिका में भारत की द्वीतीय स्टेशन मैत्री का स्थापना वर्ष 1988-89 में हुई थी। मैत्री की स्थापना जीव विज्ञान, पृथ्वी विज्ञान, ग्लैसियोलॉजी, वातावरण विज्ञान, मौसम, विज्ञान, शीत क्षेत्र इंजीनियरिंग संचार, मानव फिजियोलॉजी एवं चिकित्सा क्षेत्र में अनुसंधान हेतु की गई थी। अंटार्कटिका में  भारत का तीसरा शोध केन्द्र भारती है जिसकी स्थापना वर्ष 2015 में हुई।

  • सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित है। इसकी स्थापना 15 फरवरी, 1976 को पांचवी पंचवर्षीय योजना के दौरान की गई थी।

  • इंडियन ब्यूरों ऑफ माइंस का मुख्यालय नागपुर में अवस्थित है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस की स्थापना राष्ट्रीय खनिज नीति सम्मेलन की सिफारिशों के आधार पर 1 मार्च, 1948 को हुई। इंडियन ब्यूरों ऑफ माइंस के तीन क्षेत्रीय कार्यालय अजमेर, बंगलुरू एवं नागपुर मे हैं। आई.बी.एम. का एक प्रमुख खनिज मानचित्र तैयार करना, खनिज नीतियों के निर्माण और खनिज संसाधनों की खोज करना है।

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भारत के प्रमुख अनुसंधान केन्द्र/ संस्थान

संस्थान                                     स्थान

मक्का अनुसंधान निदेशालय (D.M.R.)

नई दिल्ली

दाल अनुसंधान निदेशालय (D.P.R.)

कानपुर

गेहूं अनुसंधान निदेशालय (D.W.R.)

करनाल

चावल अनुसंधान निदेशालय (D.R.R.)

हैदराबाद

राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक अनुसंधान ब्यूरों

नई दिल्ली

राष्ट्रीय पौध सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान

हैदराबाद

केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (C.S.S.R.I.)

करनाल

कंद फसल अनुसंधान संस्थान (C.A.Z.R.I.)

जोधपुर

केन्द्रीय धान अनुसंधान संस्थान

कटक

खेती प्रणाली अनुसंधान निदेशालय

मेरठ

भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान

भोपाल

राष्ट्रीय शर्करा संस्थान

कानपुर

मिश्रधातु निगम लिमिटेड

हैदराबाद

सैन्य विधि संस्थान

काम्टी

राष्ट्रीय अखंडता संस्थान

पुणे

केन्द्रीय खनन अनुसंधान संस्थान

धनबाद

राष्ट्रीय पर्य़ावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान

नागपुर

केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान

मैसूर

केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान

शिमला

केन्द्रीय कपास अनुसंधान संस्थान

नगापुर

केन्द्रीय तम्बाकू अनुसंधान संस्थान

राजमुंद्री

वर्षा वन अनुसंधान संस्थान

जोरहाट (असम)

राष्ट्रीय हिमालय हिमनद विज्ञान केन्द्र

देहरादून

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान

बंगलुरू

भारतीय राष्ट्रीय महासागर और सूचना सेवा केन्द्र

हैदराबाद

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण

नोएडा

राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान

रुड़की

भारत का सुनामी चेतावनी केन्द्र

हैदराबाद

परमाणु खनिज अनुसंधान और अन्वेषण निदेशालय

हैदराबाद

प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान

अहमदाबाद

केन्द्रीय मृदा तथा पदार्थ अनुसंधान केन्द्र

नई दिल्ली

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय

भोपाल

भारतीय वानस्पतिक सर्वेक्षण विभाग

कोलकाता

केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान

लखनऊ

राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान

चेन्नई

 

 

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परिहवन

सड़क परिवहन

  • भारत में सिंधु घाटी सभ्यता के समय से ही सड़क निर्माण की प्राचीन परंपरा रही है।

  • ग्रैंड ट्रंक रोड (पुरानी मुगल रोड) ढाका से लाहौर तक उत्तर भारत के सभी प्रमुख नगरों को जोड़ती थी।

  • वर्तमान समय में भारत में लगभग 55 लाख किमी. सड़क नेटवर्क है, जो विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है। परिवहन क्षेत्र में 67% माल का यातायात तथा 90% यात्री यातायात का परिवहन सड़कों द्वारा होता है।

  • नागपुर योजना (1943) ने भारत की सड़कों को 4 वर्गों में विभाजित किया हैः-

  1. राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highways)

  2. प्रान्तीय राजमार्ग (State Highways)

  3. जिला सड़के (Distrct Roads)

  4. ग्रामीण सड़कें (Village Roads)

  • राष्ट्रीय राजमार्ग देश की सबसे महत्वपूर्ण सड़क प्रणाली है, जिसका निर्माण तथा रख-रखाव सार्वजनिक निर्माण विभाग एवं राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा किया जाता है।

  • वर्ष 2015-16 में राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 100475 किमी. थी, जो देश के कुल सड़कों की लंबाई का मात्र लगभग 2 प्रतिशत है। किंतु संपूर्ण देश के सड़क परिवहन का लगभग 40 प्रतिशत यातायात राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा ही संपन्न होता है।

  • देश में कुल 265 से अधिक राष्ट्रीय राजमार्ग हैं, जिसमें सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 है, जो वाराणसी से कन्याकुमारी तक जाता है।

नोट– सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा 5 मार्च, 2010 को जारी अधिसूचना के अनुसार, भारत  का सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग NH-44 है, जो जम्मू और कश्मीर राज्य मे श्रीनगर के निकट NH-1 के जंक्शन से प्रारंभ होकर, बनिहाल, जम्मू कठुआ, पंजाब में पठानकोट, जालंधर, लुधियाना, राजपुरा, हरियाणा में अम्बाला, करनाल, पानीपत, कुंडली, दिल्ली, पुनः हरियाणा में फरीदाबाद, पलवल, होडल, उत्तर प्रदेश में मथुरा, आगरा, राजस्न में धौलपुर, मध्य प्रदेश में मुरैना, ग्वालियर दतिया, पुनः उत्तर प्रदेश में झांसी, ललितपुर, पुनः मध्य प्रदेश में सागर, नरसिंहपुर, लखनादून, शिवानी, महाराष्ट्र में नागपुर, जम्ब पंढर का वाडा, तेलंगाना में आदिलाबाद, निर्मल, रामायम पेट,  हैदराबाद, आंध्र प्रदेश में कुर्नूल, गूटी, पेनुकोंडा, कर्नाटक में देवन हल्ली, बंगलूरू, तमिलनाडु में होसुर, कृष्णागिरी, धर्मापुरी, सलेम एवं कन्याकुमारी (केप कमोरिन) को जोड़ने वाला राजमार्ग है। नया NH-7 फाजिल्का को माण से जोड़ता है।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1 और 2 को सम्मिलित रुप से ग्रैंड ट्रंक रोड कहा जाता है।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग-1 – दिल्ली-अम्बाला-जालंधर-अमृतसर-इंडो पाक-बार्डर

  • राष्ट्रीय राजमार्ग-2- दिल्ली-मथुरा-आगरा-कानपुर-इलाहाबाद-वाराणसी-मेहनिया-बरही-पलसित-वैधवता-बारा-कोलकाता।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-1 मध्य प्रदेश (712 किमी.), महाराष्ट्र (391 किमी.), राजस्थान (32 किमी.) तथा उत्तर प्रदेश (26 किमी.) से होकर गुजरता है, इसकी कुल लंबाई 1161 किमी. है। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 3 का रुट – आगरा-ग्वालियर-शिवपुरी-इंदौर-धुले-नासिक-थाणे-मुंबई।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 4- मुंबई से चेन्नई को जोड़ता है। यह राजमार्ग महाराष्ट्र ( 371 किमी.), कर्नाटक (658 किमी.), आंध्र प्रदेश (83 किमी.) तथा तमिलनाडु (123 किमी.) से होकर जाता है। इसकी कुल लंबाई 1235 किमी.) है। NH-4 पर पड़ने वाले प्रमुख शहर थाणे, पुणे, कोल्हापुर, त्रिचदुर्ग, बंगलुरू, रानीपेट-चेन्नई हैं।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-5 – कोलकाता-भुवनेश्वर-विजयवाड़ा-गुन्टूर-नेल्लौर-चेन्नई से होकर गुजरता है।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 6- हजीरा (गुजरात) से प्रारंभ होकर कोलकाता तक जाता है, इसके मार्ग में पड़ने वाले मुख्य नगरों में सूरत, नागपुर, रायपुर, संभलपुर आदि हैं।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 – देश का सब से बड़ा राजमार्ग है, जिसकी लंबाई 2369 किमी. है। यह राजमार्ग वाराणसी को जबलपुर, नागपुर, हैदराबाद, बंगलुरु होता हुआ कन्याकुमारी से जोड़ता है।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 – दिल्ली-जयपुर-अजमेर-उदयपुर-अहमदाबाद-बडोदरा-मुंबई।

  • नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अनुसार, वर्तमान (30-06-2017 की स्थिति के अनुसार) में राष्ट्रीय राजमार्गों की सर्वाधिक लंबाई महाराष्ट्र (15436 किमी.) में पाई जाती है। इसके बाद क्रमशः उत्तर प्रदेश (8711 किमी.), राजस्थान (7906 किमी.) एवं मध्य प्रदेश (7854 किमी.) का स्थान आता है।

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  • भार में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को आपस में जोड़ती है। इसकी कुल लंबाई 5846 किमी. है। इसके अतिरिक्त यह राजमार्ग विकास परियोजना अहमदाबाद, बंगलुरू, भुवनेश्वर, जयपुर, कानपुर, पुणे, सूरत, गुंटूर, नेल्लौर, विजयवाड़ा और विशाखापत्तनम को भी जोड़ती है। इस परियोजना की शुरुआत सरकार द्वारा वर्ष 2001 में की गई थी।

  • पूर्व पश्चिम गलियारा सिलचर (असम) को पोरबंदर (गुजरात) से तथा उत्तर-दक्षिण गलियारा श्रीनगर को कन्याकुमारी से जोड़ता है। ये एक-दूसरे को झांसी (उत्तर प्रदेश) में काटते हैं।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-15)पठानकोट (पंजाब) से प्रारंभ होकर समयख्याली (गुजरात) तक जाता है। इसके मार्ग में पड़ने वाले प्रमुख नगरों में अमृतसर, भटिंडा, गंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर आदि हैं।

  • प्रधानमंत्री भारत जोड़ो परियोजना (PMBJP) भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है, जो कि राजमार्ग के विकास से संबंधित हैं। इस परियोजना के तहत गलियारों के माध्यम से पर्यटन स्थलों और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों को BOT (Built, Operate, Transfer) के आधार पर चार लेन सड़क को जोड़ा जाना है।

  • प्रांतीय राजमार्ग का निर्माण और रख-रखाव संबंधित राज्य के सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा किया जाता है। ये सड़के राज्य के सभी बड़े कस्बों और नगरों को जोड़ती है।

  • बेसिक सड़क सांख्यिकी 2015-16 के अनुसार, सबसे अधिक प्रांतीय राजमार्ग वाले राज्यों में –

  1. महाराष्ट्र (39000 किमी.)

  2. कर्नाटक (19578 किमी.)

  3. गुजरात (17201 किमी.)

  4. राजस्थान (15188 किमी.)

  5. तमिलनाडु (11752 किमी.)

  6. मध्य प्रदेश (10934 किमी.)

  7. अरुणाचल प्रदेश (8123 किमी.)

  • उत्तर प्रदेश में प्रांतीय राजमार्ग की लंबाई लगभग 7147 किमी. है।

  • मुंबई-पुणे द्रुतगामी महामार्ग (Mumbai-Pune Expressway) भारत का पह ला 6 पथ गामी एक्सप्रेस मार्ग है। यह मुंबई के कलामबोली से प्रारंभ होकर पुणे के निकट देहो आऱडी तक 93 किमी. लंबा सफर तय करता है। इसका निर्माण महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास प्राधिकरण (MSROC) की निगरानी में हुआ है। इसकी लागत लगभग 362 मिलियन डॉलर आई और अप्रैल, 2002 में यह पूरी तरह से यातायात के लिए खोल दिया गया। इस एक्सप्रेस मार्ग पर निर्मित सुरंगों का निर्माण कोंकण कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा किया गया है।

  • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत 25 दिसंबर, 2000 को की  गई थी। इस योजना के तहत 1000 से अधिक आबादी वाले गांव को प्रत्येक मौसम में उपयुक्त सड़क मार्ग से जोड़ना।

  • जवाहर सुरंग, जम्मू एवं कश्मीर राज्य को पीरपंजाल श्रेणी के बनिहाल दर्रें से होकर गुजरती है।

  • पूर्वोत्तर के प्रमुख राज्यों में राष्ट्रीय राजमार्ग की लंबाई का क्रम वर्तमान में इस प्रकार है- असम (3845 किमी.), अरुणाचल प्रदेश (2537 किमी.), मणिपुर (1746 किमी.), नागालैंड ( 1547 किमी.), मिजोरम (1422 किमी.), त्रिपुरा (854 किमी.) एवं सिक्किम (463 किमी.)।

  • अंतरराष्ट्रीय राजमार्ग (International Highway) एशिया और प्रशान्त के आर्थिक और सामाजिक आयोग (ESCP) के समझौते के तहत पड़ोसी देशों को जोड़ने वाले देश के कुछ राजमार्गों को अंतरराष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किया गया है। जैसे – लाहौर-अमृतसर-दिल्ली, ढाका-कोलकाता, बरही-काठमांडू इत्यादि।

  • एक्सप्रेस राजमार्ग बहुपथीय सुनिर्मित राजमार्ग है, जिन पर द्रुत गति से यातायात प्रवाह होता है। मुंबई में पश्चिमी और पूर्वी राजमार्ग, कोलकाता-दमदम हवाई अड्डा राजमार्ग, सुकिण्डा-पारादीप बंदरगाह राजमार्ग आदि हैं।

 

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नोट- भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना (5 मार्च, 2010 को भारत का राजपत्र मे प्रकाशित) के अनुसार, प्रस्तावित नये कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग इस प्रकार से हैं-

प्रस्तावित नया                                     राष्ट्रीय राजमार्गों का विवरण

राष्ट्रीय राजमार्ग

NH-1

उरी, बारामूला, श्रीनगर, कारगिल को जोड़ते हुए जम्मू और कश्मीर के लेह में समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-2

असम में डिब्रूगढ़ के निकट राष्ट्रीय रा. सं.-15 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर असम में शिवसागर और अमंगुरी को, नागालैंड में मोकोकचुंग, दोखा और कोहिम को, मणिपुर में इम्फाल और चुडाचांदपुर को और मिजोरम में सेलिंग, सेरछिप, लौंगतला को जोड़ते हुए मिजोरम में तुइपंग में समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-3

पंजाब में अटारी (भारत/पाकिस्तान सीमा), अमृतसर-जालंधर-होशियारपुर को और हिमाच प्रदेश में नटओ, हमीरपुर, तीनों देवी, आवा देवी, मंडी, कुल्लू को जोड़ते हुए मनाली में समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-4

अंडमान, निकोबार द्वीपसमूह में मायाबंदर पोर्टब्लेयर, चिड़ियाटापू को जोड़ने वाला राजमार्ग।

NH-5

पंजाब में फिरोजपुर, मोगा, जगरांव,  लुधियाना, खराड़ को, हरियाणा में चंडीगढ़, कालका और हिमाचल प्रदेश में सोलन, शिमला, थियोग, नरकंडा, रामपुर, चिनि को जोड़ते हुए शिपकिला के निकट भारत और तिब्बत सीमा की ओर जाने वाला राजमार्ग।

NH-6

असम में जोरबाट के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-27 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर मिजोरम राज्य में शिलांग, धलेश्वर, कनपुई, आईजोल को जोड़ते हुए शैलिंग में राष्ट्रीय रा. सं.-2  के साथ अपने जंक्शन पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-7

फाजिल्का (भारत/पाकिस्तान सीमा) से प्रारंभ होकर, पंजाब में अबोहर, मलौत, भटिंडा, बरनाला, संगरुर, पटियाला, राजपुरा को, हरियाणा में पंचकुला, रायपुर, रानी, धनाना को, हिमाचल प्रदेश में पोंटा साहिब को, उत्तराखंड में देहरादून, ऋषिकेश, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली, बद्रीनाथ को जोड़ते हुए माण  में समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-8

असम में करीमगंज के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-37 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर त्रिपुरा में पाथरकंडी, चुरईबाडी, अंबासा  तेलियमुझ, अगरतला, उदयपुर को जोड़ते हुए सबरुम (भारत/बांग्लादेश सीमा) पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-9

पंजाब में मलौत के निकट राष्ट्रीय राज.सं.-7 के साथ अपने जंक्शन कसे प्रारंभ  होकर हरियाणा में डबवाली, सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, हंसी, रोहतक, बहादुरगढ़ को, दिल्ली को, उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद, मुरादाबाद, रामपुर, बिलासपुर को, उत्तराखंड में रुद्रपुर, सितारगंज-खतौमा, टनकपुर को जोड़ते हुए पिथौरागढ़ में समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-10

पश्चिम बंगाल में सिलिगुड़ी के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-27 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर शिवोक, कालिमपंग के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-10 को जोड़ते हुए सिक्किम राज्य में गंगटोक पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-11

राजस्थान में जैसलमेर के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-68 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर पोखरन, बीकानेर, श्री डूंगरगढ़, रतनगढ़ को जोड़ते हुए फतेहपुर के निकट राष्ट्रीय रा.सं.52 के साथ अपने जंक्शन पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-12

इलकोला के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-27 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर रायगंज, गजोल, मालदा, फरक्का, मोरग्राम, बहरमपुर, कृष्णानगर, रानाघाट, बारासत, कोलकाता, काकद्वीप को जोड़ते हुए पश्चिम बंगाल राज्य में बोक-खली पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-13

अरुणाचल प्रदेश में तवांग से प्रारंभ होकर बोमडिला, नेचिपू, सेप्पा, सगालि, जिरो, दपोरिजो, अलौंग, पासीघाट, तेजु को जोड़ते हुए वकारु के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-15 के साथ अपने जंक्शन पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

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NH-14

पश्चिम बंगाल में मोरग्राम के निकट राष्ट्रीय रा.सं. -12 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर रामपुर हाट, सिउरि, रानीगंज, बांकुडा, गढ़बेटा, सलबानी को जोड़ते हुए खड़गपुर के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-16 के साथ अपने जंक्शन पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

NH-15

असम मे बैहटा-चराली के निकट  राष्ट्रीय रा.सं.-27 के साथ अपने जंक्शन से प्रारंभ होकर मंगलदाई, डेकिअजुली, तेजपुर, बंदरदेवा, उत्तरी लखीमपुर, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, दमदमा को जोड़ते हुए अरुणाचल प्रदेश में वाकरों के निकट राष्ट्रीय रा.सं.-13 के साथ अपने जंक्शन पर समाप्त होने वाला राजमार्ग।

  • सड़क सांख्यिकी 2012 के अनुसार-

राज्य         प्रति 100 वर्ग किमी. क्षेत्र भूतल मार्ग

पंजाब     –    166.23 किमी.

महाराष्ट्र   –    108.99 किमी.

तमिलनाडु –    144.62 किमी.

हरियाणा  –    87.49 किमी.

रेल परिवहन

  • भारत में लॉर्ड डलहौजी के काल में सर्वप्रथम रेलमार्ग 1853 ई. में बनकर तैयार हुआ, जिस पर 16 अप्रैल, 1853 को मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) से थाणे के बीच पहली ट्रेन चलाई गई थी। यह ट्रेन मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन से 14 सवारी डिब्बों में 400 मेहमान यात्रियों को लेकर 34 किमी. की दूरी तय करके थाणे स्टेशन पहुंची थी। उसके बाद 1854 ई. में कोलकाता से रानीगंज (180 किमी.) और 1856 में चेन्नई  (मद्रास) से अर्कोनम (70 किमी.) के बीच रेल यातायात शुरु हुआ।

  • भारत में 1871 ई. तक कोलकाता, मुंबई और चेन्नई के प्रेसीडेंसी नगर रेल से जोड़ दिए गए।

  • भारतीय रेलमार्गों को चौडाई (पटरियों के मध्य दूरी) की दृष्टि से तीन भागों में विभक्त किया गया है –

  1. मीटर गेज – दोनों पटरियों के मध्य 1 मीटर की दूरी होती है।

  2. चौड़ी या बड़ी लाइन – दोनों पटरियों के मध्य 1.676 मी. या 1676 मिम . या 5*1/2 फीट की दूरी होती है।

  3. छोटी लाइन- दोनो पटरियों के मध्य 762 मिमी. या 610 मिमी. की दूरी होती है।

  • भारत में रेल मार्गों की सबसे अधिक लंबाई उत्तर प्रदेश राज्य में है।

  • इंडियन रेलवे ईयर बुक 2016-17 के अनुसार, वर्ष 2016-17 में देश में कुल रेल मार्ग की लंबाई 67368 किमी. थी, जिसमें बड़ी लाइन (Broad gauge) की लंबाई 61680 किमी. मीटर गेज (Metre Gauge) की लंबाई 3479 किमी. तथा छोटी लाइन (Narrow gauge) की लंबाई 2209  किमी. है।

  • भारत में समतल स्थालाकृति, मंद ढाल, उच्च कृषि उत्पादकता और उच्च जनसंख्या घनत्व के कारण गंगा के मैदानी क्षेत्र में रेल परिपथ का सर्वाधिक संकेन्द्रण देखा  जाता है।

  • भारत में रेलो का प्रबंधन भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अधीन स्थित बोर्ड द्वारा किया जाता है। समूचे रेल परिपथ को प्रबंधन की दृष्टि से 17 रेलवे खंडों में बांटा गया है।

  • उत्तर मध्य रेलवे जोन का मुख्यालय इलाहाबाद में अवस्थित है। उत्तर मध्य रेलवे जोन 1 अप्रैल, 2003 को स्थापित किया गया था।

  • उत्तर रेलवे का मुख्यालय नई दिल्ली एवं पश्चिम-मध्य रेलवे जोन का मुख्यालय  जबलपुर में स्थित है।

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  • उत्तर-पश्चिम रेलवे का मुख्यालय जयपुर मे है।

  • दक्षिण-पूर्वी रेलवे का मुख्यालय कोलकाता में स्थित है, जबकि पूर्वी तटीय रेलवे का मुख्यालय भुवनेश्वर में स्थित है।

  • पूर्व-मध्य रेलवे का मुख्यालय हाजीपुर (बिहार) में स्थित है। अक्टूबर, 2002 को इसकी स्थापना की गई थी। अन्य प्रमुख रेल खंड एवं उनके मुख्यालय निम्नलिखित हैं –

  • दक्षिण रेलवे – चेन्नई

  • मध्य रेलवे – मुंबई (CST)

  • पश्चिमी रेलवे – मुंबई (चर्चगेट)

  • उत्तर-पूर्वी रेलवे – गोरखपुर

  • पूर्वी रेलवे – कोलकाता

  • उत्तर-पूर्वी सीमांत रेलवे – मालीगांव (गुवाहाटी)

  • दक्षिण –मध्य रेलवे – सिकंदराबाद

  • दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे – बिलासपुर

  • भारत में रेल कोच फैक्टरी का निर्माण कपूरथला में किया जाता है। व्हील एवं एक्सल संयंत्र की स्थापना बंगलुरू में किया गया है।

  • भारत में विद्युत इंजन का निर्माण चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स में किया जाता है। इस संयंत्र की स्थापना चितरंजन (पश्चिम बंगाल और झारखंड) सीमा पर 1947 में प्रारंभ किया गया।

  • भारत में डीजल इंजन बनाने का कारखाना 1961 में डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (मडुवाडीह) वाराणसी में स्थापित किया गया। जमशेदपुर में टाटा इंजीनियरिंग एंड कंपनी लि. द्वारा भाप इंजन का निर्माण किया जाता था।

  • भारत में इंटीग्रल कोच फैक्ट्री की स्थापना 1952 में पेरम्बूर चेन्नई में की गई है।

  • रेलवे स्टाफ कालेज बड़ौदा (बडोदरा) में अवस्थित है।

  • फेयरी क्वीन विश्व के सबसे पुराने इंजन का प्रयोग करने वाली गाड़ी है। इस इंजन का निर्माण 1855 ई. में हुआ था और यह 1908 तक चालू रहा। इसे पुनः वर्ष 1977 में भारतीय रेलवे ने चलाया।

  • भारत में तीसरी रेल कोच फैक्ट्री रायबरेली (उ.प्र.) में स्थापित की जा रही है।

  • साल या साखू की लकड़ी बहुत कठोर, भारी, मजबूत तथा भूरे रंग की होती है। इसकी प्रमुख विशिष्टता वजनी होने के कारण इसका प्रयोग अधिकांशतः रेलवे स्लीपर के निर्माण में होता है। मलाया में इस लकड़ी से जहाज बनाया जाता है।

  • कोंकण रेलवे महाराष्ट्र के रोहा स्टेशन से प्रारंभ होकर गोवा के मडगांव से गुजरते हुए कर्नाटक के मंगलौर स्टेशन पर समाप्त होती है। इसकी कुल लंबाई 760.1 किमी. है।

  • भारत के प्रथम सी.एन.जी. ट्रेन की शुरुआत रेवाड़ी-रोहतक खंड पर जनवरी, 2015 में की गई। सी.एन.जी. ट्रेनों का परिचालन भारत में हरित गैस उत्सर्जन को कम करने और डीजल खपत में कटौती करने मे सहायक होगा। सी.एन.जी. ट्रेन के संचालन हेतु रेलवे ने धूमन प्रौद्योगिकी के द्वारा 1400 हॉर्स पॉवर के इंजन को द्वी-ईंधन में संबोधित किया है अर्थात यह ट्रेन सी.एन.जी. और डीजल दोनों से चलती है। 14 जुलाई, 2015 को रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने नई दिल्ली से रिमोट कंट्रोल के जरिए गुजरात में गांधीधाम-टूना टेकरा रेल लाइन की शुरुआत की। यह पी.पी.पी. मॉडल पर आधारित भारत का पहला रेल ट्रैक है। इस ट्रैक की कुल लंबाई 17 किमी. है, जो टूना बंदरगाह तथा टेकरा के ड्राई बल्क टर्मिनल को अपनी सेवाएं प्रदान करेगी।

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  • भारत में पहाड़ी क्षेत्रों में कई रेलवे लाइनों का निर्माण किया गया है, जिन्हें सम्मिलित रुप से माउंटेन रेलवे ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, नीलगिरि माउंटेन रेलवे, कालका-शिमला रेलवे तथा माथेरन हिल रेलवे आते हैं। सिलिगुड़ी तथा दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के अंतर्गत आता  है। इसे यूनेस्कों ने वर्ष 1999 में विश्व धरोहर के रुप  में मान्यता  दी।

  • भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा और मिजोरम में रेल सेवाएं पूर्ण रुप से आरंभ हो चुकी हैं। फरवरी, 2013 में तत्कालीन रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने अरुणाचल प्रदेश में प्रथम रेलवे लाइन (हर मोटी-नहर लगून 23 किमी.) का उद्घाटन किया था। 29 नवंबर, 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेघालय के मेदनी पत्थऱ से असम के गुवाहाटी तक के रेलवे मार्ग पर रेल संचालन का शुभारंभ किया। इस प्रकार अब सिक्किम को छोड़कर  भारत में के सभी राज्यों में रेलवे नेटवर्क का विस्तार हो गया  है।

  • भारत की प्रमुख रेल सुरंगो में –

पीरपंजाल रेल सुरंग – जम्मू-कश्मीर राज्य में स्थित है, इसकी लंबाई -11 किमी.

कारबुद रेल सुरंग – महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में अवस्थित है, इसकी कुल लंबाई 6.5 किमी

नाथुबाड़ी रेल सुरंग – महाराष्ट्र राज्य में स्थित है, इसकी कुल लंबाई 4.3 किमी.

बरदेवादी रेल सुरंग- महाराष्ट्र में, इसकी कुल लंबाई 4 किमी.

टीक रेल सुरंग – महाराष्ट्र में, इसकी कुल लंबाई भी 4 किमी.

सवार्दे रेल सुरंग – महाराष्ट्र में स्थित है, इसकी कुल लंबाई 3.4 किमी.है।

  • भारत में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिसंबर, 2004 में मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाने की योजना को अनुमोदित किया  था। इसके लिए जापान के साथ समझौता हुआ था। 14 सितंबर 2017 को जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की पहली तीव्र गति रेल परियोजना (बुलेट ट्रेन परियोजना) की नींव रखी। यह बुलेट ट्रेन देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को अहमदाबाद से जोड़ेगी।  इसकी कुल लंबाई 508 किमी. है। इस परियोजना का क्रियान्वयन प्रारंभ करने के लिए नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ( NHRCL) का गठन किया गया है। इस मार्ग पर बुलेट ट्रेन की अधिकतम संचालन गति 320 किमी. प्रति घंटा होगी।

  • भारत के रेलमार्ग मानचित्र अवलोकन से स्पष्ट है, कि इलाहाबाद होकर गोरखपुर से मुंबई का मार्ग न्यूनतम दूरी का  होगा।

  • उत्तर-पश्चिम रेलवे का मुख्यालय जयपुर में है। इंडरेल पास विशिष्टतः विदेशि पर्यटकों, अप्रवासी भारतीयों, विदेशी पर्यटकों की भारतीय पत्नियों या पतियों एवं इन सभी के गाइडों के लिए अनुमन्य As you like it नामक यात्रा टिकट है। इसके द्वारा ये व्यक्ति एक निश्चित अवधि में भारत में कहीं भी रेल यात्रा कर सकते हैं।

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नौ/वायु परिवहन

  • भारत में समुद्री क्षेत्र में बंदरगाह, पोत परिवहन, समुद्री जहाज निर्माण और समुद्री जहाज मरम्मत तथा अंतर्देशीय जल प्रणालियां शामिल हैं।

  • भारत एक लंबे समुद्र तट वाला देश है। इसके पूर्वी एवं पश्चिमी समुद्री तटो पर 12 बड़े (प्रमुख) एवं लगभग 200 छोटे बंदरगाह हैं।

  • समुद्री परिवहन के माध्यम से मात्रा के अनुसार, देश का लगभग 95 प्रतिशत तथा मूल्य के अनुसार, 68 प्रतिशत व्यापार किया जाता है।

  • भारत की मुख्य भूमि एवं द्वीपों के सहारे फैला लगभग 7517 किमी. लंबा तट है। इस तट पर 12 प्रमुख बंदरगाह हैं, जो इस प्रकार हैं –

  1. कोलकाता

  2. पारादीप

  3. विशाखापत्तनम

  4. चेन्नई

  5. तूतीकोरिन

  6. कोचीन

  7. न्यू मंगलौर

  8. मर्मुगाओ

  9. मुंबई

  10. जवाहरलाल नेहरु पोर्ट ट्रस्ट (न्हावाशेवा)

  11. एन्नौर

  12. कांडला पोर्ट

  • कोलकाता बंदरगाह देश में एकमात्र नदी क्षेत्रीय प्रमुख बंदरगाह है, जिसकी स्थापना करीब 138 वर्ष पूर्व की गई थी। यह पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों सहित दो बंदरगाह विहीन देशों- नेपाल और भूटान को सेवाएं प्रदान करता है। कोलकाता बंदरगाह के दो डॉक सिस्टम हैं। हुगली नदी के पूर्वी तट पर कोलकाता डॉक सिस्टम (के.डी.एम.) और पश्चिमी तट पर हल्दिया डॉक कॉम्पलेक्स (एच.डी.सी.) स्थित है।

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  • भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने ओड़िशा मे बंगाल की खाड़ी के पूर्वी तट पर महानदी के संगम के पास वर्ष 1962 में पारादीप बंदरगाह का शिलान्यास किया। पारादीप बंदरगाह पर 60,000 DWT वाले जलयान आ सकते हैं, इसकी गहराई लगभग 17.1 मीटर है। इस बंदरगाह का विकास कोलकाता और विशाखापत्तनम बंदरगाह के भार को कम करने के उद्देश्य से किया गया था। यहां से मुख्यतया जापान को लौह अयस्क का निर्यात किया जाता है।

  • भारत में मई, 1974 में न्यू मंगलौर बंदरगाह को नौवें प्रमुख बंदरगाह के रुप में घोषित किया गया था और औपचारिक रुप से वर्ष 1975 में इसका उद्घाटन किया गया। मंगलौर बंदरगाह कर्नाटक में स्थित है।

  • कोच्चि को आधुनिक बंदरगाह सर राबर्ट ब्रिस्टों के अथक प्रयासों के उपरांत वर्ष 1920-40 की अवधि के दौरान विकसित किया गया था। वर्ष 1930-31 तक बंदरगाह को औपचारिक रुप से 30 फीट ड्राफ्ट वाले जहाजों के लिए खोला गया। केरल राज्य स्थित इस बंदरगाह की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें (N.G. – Liquified Natural Gass) प्राकृतिक गैस टर्मिनल पाया जाता है।

  • जवाहरलाल नेहरु बंदरगाह (न्हावाशेवा पत्तन) 1980 के मध्य निर्मित और 1989 से प्रयोग में आने वाले बंदरगाह नेहरु बंदरगाह ने विश्वस्तरीय अंतरराष्ट्रीय कंटेनरों के रख-रखाव वाले बंदरगाहों के रुप में पहचान बनाई है। इस बंदरगाह का निर्माण मुंबई बंदरगाह के दबाव को कम करने के लिए किया गया था। यह बंदरगाह भारत में निजी क्षेत्र की भागीदारी जैसे नई पहल द्वारा बंदरगाह विकास में पथ-प्रदर्शक रहा है। यह एलीफेण्टा द्वीप के निकट मुंबई बंदरगाह के पूर्व तट के किनारे स्थित है। बंदरगाह 12.50 मीटर क्षमता तक के जलयानों हेतु प्रयुक्त होता है।

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  • मुंबई बंदरगाह पूर्ण रुप से एकीकृत बहु-प्रयोजन बंदरगाह है, जहां कंटेनर, शुष्क, तरल एवं अन्य बड़ी मात्रा में थोक कार्गों की आवाजाही होती है। मुंबई, पश्चिमी तट पर स्थित एक प्राकृतिक पोताश्रय और देश का सबसे बड़ा पत्तन है।

  • मुंबई बंदरगाह पर तीन नौका घाट हैं, जिनके नाम हैं –

  1. प्रिसं

  2. विक्टोरिया

  3. इंदिरा घाट

  • इन तीनों में सबसे पुरानी 1880 ई. से प्रयोग में लाया जाने वला प्रिंस घाट है, जो अर्धज्वारीय है।

  • कांडला बंदरगाह कच्छ की खाड़ी के शीर्ष पर भुज (गुजरात) से लगभग 48 किमी. दूरी पर गुजरात में अवस्थित है। कांडला एक ज्वारीय और प्राकृतिक पत्तन है, इसकी गहराई लगभग 10 मीटर है। कांडला भारत का प्रमुख आयातक बंदरगाह है। वर्ष 2014-15 में कांडला पत्तन ने सर्वाधिक आयात नौभार तथा निर्यात नौभार का वहन किया।

  • मर्मुगाओ पत्तन जुआरी नदी के मुहाने पर गोवा राज्य में स्थित है। यह एक निर्यात प्रधान पत्तन है, जहां से देश से निर्यात किए जाने वाले कुल लौह अयस्क का 40 प्रतिशत भाग निर्यात किया जाता है।

  • काकीनाडा बंदरगाह आंध्र प्रदेश में स्थित है। यह एंकरेज एवं डीप वाटर पोर्ट है। यहा आंध्र प्रदेश का मुख्य बंदरगाह है। आंध्र प्रदेश में दो मुख्य एवं 10  छोटे बंदरगाह हैं।

  • विशाखापत्तनम बंदरगाह आंध्र प्रदेश में स्थित भारत का सबसे गहरा पत्तन है, यह एक प्राकृतिक बंदरगाह है।

  • मछलीपट्टनम बंदरगाह आंध्र प्रदेश में स्थित है।

  • कृष्णपट्टनम बंदरगाह के संवर्धन से आंध्र प्रदेश सर्वाधिक लाभान्वित होगा, यह बंदरगाह आंध्र प्रदेश राज्य में अवस्थित है तथा इसके पृष्ठ प्रदेश के अंतर्गत केन्द्रीय और दक्षिणी आंध्र प्रदेश के साथ-साथ उत्तरी तमिलनाडु और कर्नाटक के भाग भी आते हैं।

  • चेन्नई, तमिलनाडु में अवस्थित भारत का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह (प्रथम-मुंबई) तथा सबसे बड़ा कृत्रिम बंदरगाह है। यह एक खुला सागरीय बंदरगा है।

  • भारत का कोयले को संचालित करने वाला बारहवां प्रमुख पत्तन चेन्नई के निकट एन्नौर में बना है।

  • एन्नौर देश का प्रथम निगमित बंदरगाह है।

  • भारत के पूर्वी तट पर स्थित तूतीकोरिन बंदरगाह तमिलनाडु राज्य में स्थित है।

  • अलेप्पी बंदरगाह केरल राज्य में अवस्थित है।

  • भारत में पांच तरल प्राकृतिक गैस (N.G.- Liquified Natural Gas) टर्मिनल हैं, ये इस प्रकार हैं –

  1. दाहेज (गुजरात)

  2. हजीरा (गुजरात)

  3. कोच्चि (केरल)

  4. दाभोल (महाराष्ट्र)

  5. पारादीप (ओड़िशा)

  • पोत प्रांगण (Shipyard) वह स्थल है, जहां जहाजों का निर्माण एवं मरम्मत कार्य होता है। इस दृष्टि से कोचीन (कोच्चि) शिपयार्ड भारत सबसे बड़ा पोत प्रांगण है। वर्ष 1972 में इसे भारत सरकार के एक पूर्ण स्वामित्व कंपनी के रुप में निगमित किया गया।

  • भारत का सबसे बड़ा जहाज तोड़ने का यार्ड अलंग में अवस्थित है। अलंग गुजरात राज्य के भावनगर जिले में स्थित है।

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  • मुंद्रा पत्तन गुजरात राज्य में स्थित है।

  • भारत में दमन, जंजीरा और रत्नागिरी की अवस्थिति पश्चिमी तट पर है।

  • कारीकल (पुडुचेरी) भारत के पूर्वी तट पर अवस्थित है।

  • ज्वारा भाटा महासागरों की महत्वपूर्ण घटना है, जिसका मानव तथा पर्यावरण के घटकों पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। मत्स्य उद्योग, जहाजों को अभीष्ट स्थान पर पहुंचाने, विद्युत उत्पादन आदि में ज्वारीय तरंगों का उपयोग किया जा रहा है। कांडला तथा डायमण्ड हार्बर ज्वारीय बंदरगाह है।

  • खुला सगारीय बंदरगाह उसे कहते हैं, जहां जलीय पोत तट से दूर खुले सागर में ही लंगर डालते हैं। भारत में इस प्रकाक का पत्तन चेन्नई है, जहां तट से दूर समांतर जहाजी घाटों का निर्माण किया गया है।

  • बाह्य पत्तन वह पत्तन होता है, जो गहरे जलीय भाग में स्थित तथा मुख्य पत्तन का सहायक पत्तन होता है।

  • कोलकाता से लगभग 90 किमी. की दूरी पर स्थित हल्दिया बंदरगाह बाह्य पत्तन का विशिष्ट उदाहरण है।

  • भारतीय नौवहन निगम (C.I) की स्थापना वर्ष 1961 में की गई थी।

  • सेतु समुद्रम परियोजना भारत एवं श्रीलंका के मध्य पाक जलडमरुमध्य और मन्नार की खाड़ी को जोड़ने का एक प्रस्ताव है। इसके अंतर्गत बंगाल की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी के बीच 167 किमी. के समुद्री मर्ग को पोतो के परिचालन योग्य बनाना है।

  • भारत में वर्तमान में कुल 5 राष्ट्रीय जलमार्ग अस्तित्व में हैं। राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 द्वारा 106 नए राष्ट्रीय जलमार्ग प्रस्तावित हैं। अब कुल राष्ट्रीय जलमार्गों की संख्या 111 हो जाएगी, जिनकी कुल लंबाई 20275.5 किमी. होगी।

  • गंगा नदी के इलाहाबाद से हल्दिया तक के भाग को राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या (1) घोषित किया गया है। इसकी स्थापना 1886 ई. में हुई थी। इसकी कुल लंबाई 1620 किमी. है, यह देश का सबसे लंबा आंतरिक जलमार्ग है।

  • राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या (2) सदिया से धुबरी तक 891 किमी. लंबा है, इसकी स्थापना वर्ष 1988 में की गई थी।

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  • राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या (3) कोल्लम से कोट्टापुरम तक 205 किमी. लंबा है, इसकी स्थापना 1993 ई. में की गई थी।

  • राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या (4) बजीराबाद-विजयवाडा, भद्राचलम-राजामुंदरी एवं काकीनाडा-पुडुचेरी तक 1095 किमी. लंबा है, इसकी स्थापना 2008 में की गई थी।

  • राष्ट्रीय जलमार्ग संख्य (5) तलचर-धमरा, जियो नखली-चरबतिया, चरबतिया-धमरा, मंगल गढ़ी-पारादीप तक 623 किमी. लंबा है। इसकी स्थापना वर्ष 2008 में की गई थी।

  • राष्ट्रीय अंतरदेशीय नौवहन संस्थान पटना में अवस्थित है। इसकी स्थापना फरवरी, 2004 में की गई थी। अंतरदेशीय जलमार्ग 1, 2, 3, 4 और 5 के विकास और रख-रखाव के लिए विभिन्न परियोजनाएं (गंगा नदी, ब्रह्मपुत्र, पश्चिमी तटीय नहर, कृष्णा गोदावरी नदियों सहित काकीनाडा व पुडुचेरी एवं  ब्रह्माणी नदी, पूर्व तटीय नहर, मताई नदी व महानदी डेल्टा नदियां) भारत के अंतरदेशीय जलमार्ग प्राधिकरण (W.A.I.) द्वारा  कार्यान्वित की गई है।

  • भारतीय अंतरदेशीय जलमार्ग प्राधिकरण को राजस्थान सरकार से जालौर में कृत्रिम अंतरदेशीय बंदरगाह के विकास का प्रस्ताव प्राप्त हुआ है। यह बंदरगाह कच्छ की खाड़ी के साथ एक चैनल का विकास कर अरब सागर से जोड़ने के लिए प्रस्तावित है। मोरी क्रीक से जालौर को जोड़ने के लिए नहर का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है।

  • भारत के प्रमुख शिपयार्ड में गार्डेन-रीच (कोलकाता) पश्चिम बंगाल, हिंदुस्तान शिपयार्ड (विशाखापट्टनम) आंध्र प्रदेश , मझगांव डॉक्स (मुंबई) महाराष्ट्र तथा कोचीन शिपयार्ड (कोचीन) केरल में अवस्थित हैं।

  • महाराष्ट्र अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) का सदस्य है और शुरुआत से ही इसकी परिषद में शामिल है। नागरिक उड्डन प्रखंड के तीन प्रमुख भाग हैं – नियामक, ढांचागत और परिचालन।

  • भारत में हवाई परिवहन सार्वजनिक एवं निजी दोनों ही क्षेत्रों में हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में भारतीय राष्ट्रीय उड्डयन कंपनी लिमिटेड (एयर इंडिया) और उसकी अनुषंगी, एयर इंडिया चार्टर्स लिमिटेड (एयर इंडिया एक्सप्रेस) आदि हैं।

  • नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS) का गठन डी.जी.सी.ए. की एक इकाई के रुप में जनवरी 1978 में हुआ था।

  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी (IGRUA) उड़ान के स्तर और व्यावसायिक पायलटों के बुनियादी प्रशिक्षण में बेहतर सुधार लाने के लिए  फुरसतगंज रायबरेली (उ.प्र.) में स्थापित की गई है।

  • भारतीय विमान पत्तन प्राधिकरण (AAI) दूर-दराज के क्षेत्रों सहित देश के कोने-कोने में हवाई अड्डे के निर्माण में अग्रणी है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अप्रैल, 1995 में अस्तित्व में आया था। यह प्राधिकरण 23 नागरिक परिक्षेत्रों सहित 115 हवाई अड्डों का प्रबंधन करता है।

  • भारत में निजी हिस्सेदारी स्वामित्व वाला भारत का सर्वप्रथम विमानपत्तन कोचीन विमान पत्तन है। इसका शुभारंभ तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन द्वारा 20 मई, 1999 को किया गया था। यह पत्तन केरल की वाणिज्यिक राजधानी कोच्चि से 26 किमी. दूर नेडुम्बसरी में स्थिति है।

  • राजा सांसी अंतरराष्ट्री हवाई अड्डा (श्री गुरु रामदास जी अंतरऱाष्ट्रीय हवाई अड्डा) अमृतसर पंजाब में स्थित है। यह हवाई अड्डा अमृतसर-अजनाला रोड पर राजा सांसी गांव के निकट स्थित है।

  • राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा हैदराबाद (तेलंगाना) में अवस्थित है।

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  • डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, नागपुर (महाराष्ट्र) में अवस्थित है।

  • चेन्नई (मद्रास) हवाई अड्डा, चेन्नई में अवस्थित है।

  • छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मुंबई (महाराष्ट्र) में स्थित है।

  • भारत के अन्य प्रमुख हवाई अड्डो में तिरुवनंतपुरम (केरल), गुवाहाटी (असम), लखनऊ (अमौसी), वाराणसी (लालबहादुर शास्त्री हवाई अड्डा), खजुराहों (म.प्र.), अहमदाबाद (गुजरात), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) इत्यादि हैं।

 

शहर          हवाई अड्डा

श्रीनगर   –    श्रीनगर हवाई अड्डा

अमृतसर  –    श्री गुरु रामदास जी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

नई दिल्ली –    इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

लखनऊ   –    चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

जयपुर    –    जयपुर अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा

वाराणसी  –    लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

सिलीगुड़ी  –    बगडोगरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

गुवाहाटी   –    लोकप्रिया गोपनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

इम्फाल   –    तुलीहाल हवाई अड्डा

अहमदाबाद –    सरदार बल्लभ भाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

नागपुर    –    डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

कोलकाता  –    नेताजी सुभाषा चन्द्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

विशाखापत्तनम  –    विजाग अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

हैदराबाद   –    राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

मुम्बई    –    छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

गोवा     –    दाबोलिंग अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

बंगलुरू    –    केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्री हवाई अड्डा

चेन्नई    –    अन्ना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

तिरुचिरापल्ली   –    तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

कोयम्बटूर –    कोयम्बटूर अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा

तिरुवनंतपुरम   –    त्रिवेन्द्रम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

कोच्चि    –    कोचीन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा

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पर्यटन स्थल

  • भारत सदियों से विदेशी यात्रियों, पर्यटकों और व्यापारियों के आकर्षण का केन्द्र रहा है।

  • भारत में पर्यटन क्षेत्र के विकास के लिए वर्ष 1966 में भारतीय पर्यटन विकास निगम (ITDC) का गठन किया गया था। भारतीय पर्यटन मंत्रालय से पर्यटन को प्रोत्साहित करने हेतु जिस अवधारणा को लोकप्रिय करने का उपाय किया है, वह अतुल्य भारत है। अतुल्य भारत की आत्मा विविधता में एकता में अंतर्निहित है।

  • भारत में पर्यटन की संभावनाओं के विस्तार और इसमें विविधता लाने के लिए नीश टूरिज्म  प्रोडक्टस अर्थात विशेष तरह के पर्यटकों के लिए विशेष सुविधाओं की शुरुआत की गई है।

  • वीजा ऑन अराइवल (विदेशियों के स्वदेश आगमन के बाद उन्हें वीजा देने) सुविधा और ई-टूरिज्म वीजा सुविधा प्रारंभ किए जाने से भारत में पर्यटकों की संख्या बढ़ी है।

  • भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में – असम राज्य में प्रसिध्द कामाख्या मंदिर है। यह एक प्राचीन देवी मंदिर है। तांत्रिक साधना का यह सिध्द पीठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त असम में उमानन्द और नवग्रह मंदिर, काजीरंगा एवं मानस वन्य जीव  अभ्यारण्य, योआ-मोक्का का मस्जिद। डिब्रूगढ़ यहां का प्रसिध्द शहर  है, जहां तेलशोधक कारखाना है। हाफ्लांग, असम राज्य के उत्तरी काचर जिले का एक कस्बा है।

  • हिमाचल प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शिमला, मनाली, पारवानु, डलहौजी, धर्मशाला, कीलांग एवं चंबा घाटी आदि हैं। कसौली, हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित कस्बा है। कुफरी, हिमाचल प्रदेश में शिमला से मात्र 16 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 2510 मी. है।

  • आंध्र प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में तिरुमाला-तिरुपति में भी वेंकटेश्वर मंदिर, श्री सेलम का श्रीमल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर, विजयवाड़ा का कनक दुर्गा मंदिर, अरकुघाटी, होर्सले पहाड़ियां, नेलापट्टू हैं। श्री शैलम, आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में नल्लामाला पर्वत पर  बसा हुआ एक धार्मिक नगर है। यह भगवान मल्लिकार्जुन स्वामी और भ्रमरंबा देवी को समर्पित मंदिर है।

  • गुजरात राज्य के प्रमुख भौगोलिक पर्यटन स्थलों में अहमदपुर, मांडवी, चोरवाड़, उभारत तथा तीथल जैसे समुद्री तट, सतपुड़ा पर्वतीय स्थल, गिर वनों में शेरों का अभयारण्य, कच्छ क्षेत्र के छोटे से मरुस्थल में जंगली गधों का अभयारण्य आदि प्रमुख हैं। चम्पानेर-पावागढ़ पुरातत्वीय उद्यान गुजरात राज्य के पंचमहल जिले में स्थित है। यहां से गुजरात राज्य के 16वीं शताब्दी के हिंदू राजधानी के पुरातात्विक ऐतिहासिक जीवंत सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसे विश्व विरासत सूची में वर्ष 2004 में शामिल किया गया। उड़वाड़ा, गुजरात राज्य का एक कस्बा है जो पारसी फायर टेंपल के लिए प्रसिध्द है।

  • जम्मू-कश्मीर महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल हैं, जो सदियों से पर्यटकों को आकर्षित करता आ रहा है। कश्मीर घाटी का सुहावना मौसम-धरती का स्वर्ग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घाटी का सुहावना मौसम-धरती का यह स्वर्ग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन स्थल, जबकि जम्मू क्षेत्र मंदिरों की भूमि के रुप में बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है, जिनमें प्रमुख मंदिर माता वैष्णों देवी का है। लद्दाख-मूनलैंड, विशेष रुप से विदेशियों का प्रिय  गंतव्य स्थल है। गुलमर्ग, शिव खोड़ी, श्री नगर आदि  जम्मू कश्मीर के प्रमुख स्टेशन हैं।

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  • एक राज्य नई दुनिया के रुप में जाना जाने वाला कर्नाटक दक्षिण भारत का प्रमुख पर्यटन केन्द्र बनता जा रहा है। मैसूर में श्रीरंगपट्टनम,  मैसूर महल, नागरहोल राष्ट्रीय पार्क, 11वीं शताब्दी के होयसल स्थापत्य, और विश्व धरोहर श्रवणबेलगोला, बेलुर, हेलेबिडु, हंपी आदि कर्नाटक राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थल  हैं।

  • कर्नाटक राज्य में होमस्टे नामक नई अवधारणा ने राज्य में पर्यटन के नए आयाम जोड़ दिए हैं। हंपी और पट्टकल को विश्व धरोहर स्थल घोषित कर दिया गया है। बिलिगिरि रंगा पहाड़ियां कर्नाटक के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित है। यह तमिलनाडु और कर्नाटक के मध्य सीमा का निर्धारण करती है। भगवान रंगनाथा (वेंकटेश) का प्रसिध्द मंदिर इसी पहाड़ी की चोटी पर स्थित है।

  • मध्य प्रदेश राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों में – पंचमढ़ी का अद्भुत सौंदर्य, भेड़ाघाट की चमचमाती संगमरमरी चट्टाने और जल प्रपातों का शोर, कान्हा राष्ट्रीय उद्यान, जहां अनूठे बारहसिंगे रहते हैं। ओंकारेश्वर मंदिर, मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में मान्धाता पहाड़ियों पर स्थित  एक पवित्र स्थल है। यह भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों मे से एक है। मध्य प्रदेश में ग्वालियर, मांडू, दतिया, चंदेरी, जबलपुर, ओरछा, रायसेन, सांची, विदिशा, उदयगिरि, भीमबेटका, इंदौर  और भोपाल ऐतिहासिक महत्व के स्थल हैं।

  • ओडिशा बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित है। ओड़िशा के पश्चिमी तट पर सूर्य मंदिर (कोणार्क) स्थित है। 13वी शताब्दी में राजा नरसिंह देव द्वारा इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था, जो 7 घोड़ों और 24 पहियों वाले रथ पर सवार सूर्य भगवान के पृथ्वी भ्रमण की अवस्थाओं को प्रदर्शित करता है। इसे विश्व धरोहरों की सूची में वर्ष 1984 में शामिल किया गया।

  • राजस्थान राज्य के प्रमुख पर्यटन स्थलों में – जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, माउंटआबू, रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान, सरिस्का अभयारण्य भरतपुर मे केवलादेव राष्ट्री उद्यान, चित्तौडगढ़, बूंदी, कोटा, झालावाड़ और शेखावटी आदि हैं।

  • राजस्थान राज्य के राजधानी नगर जयपुर को गुलाबी नगरी के नाम से भी जाना जाता है। राजस्थान राज्य के उदयपुर जिले को झीलों का नगर कहा जाता है।

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  • तमिलनाडु राज्य में पर्यटकों के आकर्षण के कई स्थल हैं, जिनमें 1076 किलोमीटर का समुद्र तल, 30000 से भी अधिक मदिर तथा पूजा स्थल जो ईस्वी सन की शुरुआत से भी कहीं पहले के हैं, जल प्रपात, अभ्यारण्य, पहाड़ी, स्थान, बांस के बने हस्तशिल्प तथा हथकरघा, ऐतिहासिक स्थल, पाक शैली, व्यापार के अवसर इत्यादि शामिल हैं। प्वाइंट कैलीमर तमिनाडु के नागपट्टनम जिले में स्थित है। यह कोरोमंडल तट की शीर्षस्थ भूमि है। तमिलनाडु में ऊंटी पर्यटक स्थल है। मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) पल्लव राजवंश द्वारा निर्मित 7वीं शताब्दी में स्थापित भारत का बंदरगाह नगर है। चेन्नई से 60 किमी. सुदूर दक्षिण में निर्मित मंदिरों को इनके अनोखे सौंदर्य के कारण यूनेस्कों की विश्व धरोहरों की सूची में वर्ष 1984 में शामिल किया गया।

  • उत्तराखंड में तीर्थ यात्रियों/पर्यटकों के आकर्षण के प्रमुख स्थल हैं – गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश, हेमकुंड साहिब, नानकमत्ता आदि। कैलाश मानसरोवर की यात्रा कुमाऊं क्षेत्र से होकर जाती है। चकराता उत्तराखंड राज्य के देहरादून जिले में स्थित है। टाइगर जल प्रपात यहां दर्शनीय है। औली उत्तराखंड राज्य का हिल स्टेशन है।

  • महाराष्ट्र राज्य पश्चिमी घाट अपनी प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिध्द है। अजंता एवं एलोरा यहां के प्रसिध्द ऐतिहासिक स्थल हैं। महाराष्ट्र में विक्टोरिया टर्मिनस के नाम से मशहूर इस बिल्डिंग का निर्माण 1887-88 में हुआ था। इस भवन का नाम 1996 में बदलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनल कर दिया गया। इस बिल्डिंग के डिजाइनर फेड्रिक विलियम्स स्टीवन्स थे। वर्तमान में यह रेलवे स्टेश मध्य रेलवे का मुख्यालय है।त इस ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन को विश्व विरासत सूची में 2 जुलाई, 2004 को शामिल किया गया।

  • गॉड्स ओन कंट्री कहे जाने वाले केरल को नेशनल ज्योग्राफिक ट्रैवलर द्वारा 50 गंतव्यों मे से एक के रुप में चुना है। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किमी. की दूरी पर सबरीमाला मंदिर है। मलयालम में सबरीमाला का अर्थ होता है – पहाड़। असल में यह जगह  सह्याद्रि पर्वतमाला से  घिरे हुए है पथनामथिट्टा जिले मे स्थित है।

  • कालिमपोंग पश्चिमी बंगाल के दार्जिलिंग में स्थित हिल स्टेशन है।

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विविध

  • भारत में 1850 ई. में सर्वप्रथम टेलीग्राफ सेवा कलकत्ता और डायमंड हार्बर के बीच शुरु की गई। वर्ष 1881 ई. में इंग्लैंड की ओरियंटल टेलीफोन कंपनी लिमिटेड ने भारत में कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास और अहमदाबाद मे टेलीफोन एक्सचेंज स्थापित किए। बाद में 28 जनवरी, 1982 को टेलीफोन सेवा की औपचारिक स्थापना की गई।

  • भारतीय डाक विभाग द्वारा द्रुत डाक सेवा 1 अगस्त, 1986 को प्रारंभ की गई थी। इस सेवा के अंतर्गत पत्रों, दस्तावेजों एवं पार्सलों की डिलीवरी एक निश्चित अवधि के अंतर्गत की जाची है। निश्चित अवधि में डिलीवरी न होने पर ग्राहक को डाक शुल्क पूर्ण रुप से वापस कर दिया जाता है।

  • बायोगैस संयंत्र शक्ति तथा खाद दोनों प्रदान करता है। यह ऊर्जा का एक अक्षय स्रोत है। यह कृषि अपशिष्ट, गोबर, नगर निगम कचरे एवं सीवेज आदि से उत्पादित होता है।

  • भारत नाइट्रोजनी उर्वरक का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक एवं उपभोक्ता देश है तथा इस्पात उत्पादन में इसका तीसरा स्थान है।

  • थुम्बा केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के निकट अवस्थित है। प्रो. साराभाई के नेतृत्व में गठित अंतरिक्ष अनुसंधान समिति ने थुम्बा में थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लांचिंग स्टेशन की स्थापना का निर्णय वर्ष 1962 में लिय़ा था। ऐसा इसलिए किया गया क्योकि थुम्बा भू-चुम्बकीय विषुवत रेखा पर स्थत है।

  • श्री हरिकोटा आंध्र प्रदेश में स्थित है।

  • भाभा एटामिक रिसर्च सेन्टर (BARC) मुंबई (महाराष्ट्र) में स्थित है।

  • पोखरन राजस्थान राज्य के जैसलमेर जिले में अवस्थित है। भारत का पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण पोखरन में ही किया गया था।

  • दि हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट दार्जिलिंग (प. बंगाल) में अवस्थित है।

  • जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर (म.प्र.) में स्थित है।

  • सरदार बल्लभभाई पटे कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ (उ.प्र.) में स्थित है।

  • इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले में की गई है।

  • आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन के पश्चात (2014 में) एन.जी. रंगा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी को दो भागों में विभाजित कर दिया गया था, जिसके फलस्वरुप हैदराबाद (तेलंगाना) में एक नए विश्वविद्यालय के रुप में प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना स्टेट एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी का गठन हुआ, जबकि आचार्य एन.जी. रंगा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी का मुख्यालय हैदराबाद से गुंटूर स्थानांतरित कर दिया गया।

  • भारत का प्रथम परमाणु रिएक्टर का ना अप्सरा है। ट्राम्बे स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र में इसका परिचालन अगस्त, 1956 में प्रारंभ हुआ।

  • सिटी ऑफ ब्रॉस की संज्ञा से अभिहित  मुरादाबाद पीतल के बर्तनों के लिए प्रसिध्द है।

  • मध्य प्रदेश के अशोक नगर जिले में स्थित चन्देरी में हाथ से बनी हुई साड़ियां निर्मित हैं।

  • बनारसी सिल्क निर्मित साड़ियां विश्व में प्रसिध्द हैं। यहां बनारसी सिल्क एवं बनारसी जडी साड़ियां उत्पादित होती हैं।

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  • तमिलनाडु के कांचीपुरम में कांजीवरम सिल्क साड़ियां बनती हैं, इसलिए कांचीपुरम को गोल्डन सिटी या वाराणसी ऑफ द साउथ की संज्ञा दी जाती है।

  • 29 सितंबर, 2015 को केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने हरित राजमार्ग- (वृक्षारोपण, प्रतिरोपण, सौंदर्यीकरण एवं रख-रखाव) नीति, 2015 के शुभारंभ की घोषणा की थी। इसके तहत सभी राजमार्ग परियोजनाओं की कुल लागत 1 प्रतिशत राजमार्गों पर वृक्षारोपण और रख-रखाव के लिए खर्च किया जाता है।

  • डिंडीगुल तमिलनाडु का एक नगर है, यही पर हैदर अली ने फ्रांसीसियों के सहयोग से एक शस्त्रागार की स्थापना की थी।

  • जंग महल क्षेत्र पश्चिम बंगाल राज्य में अवस्थित है, यह क्षेत्र नक्सली गतिविधियों का केन्द्र रहा है।

  • डायमंड हार्बर तथा साल्ट लेक सिटी कोलकाता (प.बंगाल) में अवस्थित है।

  • भारत मे भूमिगत रेलवे (मेट्रो रेलवे) की शुरुआत कलकत्ता (प.बंगाल) में हुई थी।

  • केयर्न एनर्जी विश्व की तेल और गैस के अन्वेषण एवं उत्पादन से संबंधित प्रसिध्द कंपनी है। इसका मुख्यालय स्टाकलैंड की राजधानी एडिनबर्ग मे है। यह कंपनी लंदन स्टाक एक्सचेंज में सूचीबध्द है। यह भारत के राजस्थान में तेल उत्पादन में संलग्न है। अलीबाग महाराष्ट्र राज्य में स्थित अवकाश सदन के रुप में प्रसिध्द है।

  • बालापुर महाराष्ट्र राज्य का शैल रासायनिक संकुल के रुप में प्रसिध्द है।

  • महाराष्ट्र राज्य का रत्नागिरी जिला मत्स्य केन्द्र एवं आम उत्पादन के लिए प्रसिध्द है।

  • एशबाग स्टेडियम भोपाल (म.प्र.) में स्थित है।

  • ब्रेबर्न स्टेडियम मुंबई (महाराष्ट्र) में स्थित है।

  • ग्रीन पार्क क्रिकेट स्टेडियम कानपुर, उत्तर प्रदेश में स्थित है।

  • इडेन गार्डेन्स (क्रिकेट स्टेडियम) कोलकाता प. बंगाल में अवस्थित है।

  • टिड्डियां भारत में पाकिस्तान से प्रवेश करती हैं। टिड्डियों के नियंत्रण हेतु भारत में पांच टिड्डी सर्कल कार्यालय और 23 टिड्डी चौकियां हैं।

  • केन्द्र राज्य

श्रीहरिकोटा     –    आंध्र प्रदेश

थुम्बा         –    केरल

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेन्टर     –    महाराष्ट्र

पोखरन        –    राजस्थान

  • स्टेडियम शहर

एशबाग स्टेडियम    भोपाल

ब्रेबर्न स्टेडियम      मुंबई

ग्रीन पार्क           कानपुर

इडेन गार्डेन्स        कोलकाता

  • क्षेत्र मुख्य संसाधन

कोल्हान              खनिज संसाधन

कच्छ                जल संसाधन

मालाबार तट          जल संसाधन

 

 

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मध्य गंगा मैदान       मृदा संसाधन

विश्व भूगोल

 

 

 

 

ब्रह्माण्ड

सामान्य अवधारणा

  • ग्रहों की उत्पत्ति के संबंध में संभवतः सर्वप्रथम तर्कपूर्ण परिकल्पना का प्रदिपादन फ्रांसीसी वैज्ञानिक कास्ते द बफन द्वारा सन् 1749 में किया गया था।

  • ग्रहों की उत्पत्ति में भाग लेने वाले तारों की संख्या के आधार पर वैज्ञानिक संकल्पनाओं को दो वर्गों में विभाजित किया गया है –

  1. अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic Concept)

  2. द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic Concept)

  • अद्वैतवादी संकल्पना के अंतर्गत काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना तथा लाप्लास की निहारिका परिकल्पना अधिक प्रसिध्द हुई थी।

  • द्वैतवादी संकल्पना के अंतर्गत चैम्बरलिन तथा मेल्टॉन की ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis), एच.एन. रसेल का द्वैतारक सिध्दांत आदि प्रमुख हैं।

  • ब्राह्माण्ड की उत्पत्ति का सबसे आधुनिक सिध्दांत महाविस्फोट सिध्दांत (Big Bang Theory) है। इस सिध्दांत का प्रतिपादन जार्ज लेमेंतेयर (1894-96) ने किया था। बाद में रॉबर्ट बेगनर ने वर्ष 1967 में इस सिध्दांत की व्याख्या प्रस्तुत की। वह अवस्था अब संपूर्ण ब्रह्माण्ड एक गर्म एवं सघन बिंदु पर आज से 15 अरब वर्ष पूर्व केन्द्रित था, अत्यधिक संकेन्द्रण के कारण बिंदु में आकस्मिक विस्फोट हुआ। जिसके पश्चात ब्रह्माण्डीय पदार्थ चारो ओर फैल गए। यह पदार्थ ही विभिन्न गैलेक्सी के रुप में दृश्य हैं।

  • गैलेक्सियों के अनंत समूह का सम्मिलित रुप ही ब्रह्माण्ड है। ब्रह्माण्ड में अनुमानतः 1000 अरब गैलेक्सी हैं। प्रत्येक गैलेक्सी में अनुमानतः 100 अरब तारें हैं।

  • हमारी गैलेक्सी जिसमें हमारा सौरमंडल स्थित है, उसे मंदाकिनी या आकाशगंगा या दुग्ध मेखला (Milky Way) कहते हैं। गैलेक्सी अनेक आकार-प्रकार में दृश्य होती हैं यथा- अण्डाकार सर्पिलाकार (Spiral) और अनियमित आकार इत्यादि। वर्ष 2005 में स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कोप ने आकाश गंगा के आकार के बारे में पूर्व धारणाओं एवं विभ्रम के विपरीत इस बात के स्पष्ट साक्ष्य पेश किए कि आकाशगंगा का आकार दंड सज्जित सर्पिलाकार (Barred Spiral) है। ब्राह्माण्ड अनंत गैलेक्सियों का सम्मिलित रुप है। प्रत्येक गैलेक्सी में औसतन एक लाख मिलियन तारे हैं, जिनका निर्माण गैलेक्सी में उपस्थित हाइड्रोजन एवं हीलियम की संघटक निहारिकाओं से होता है।

  • गुरुत्वाकर्षण बल से गैस एवं धूल के बादलों का गोले के आकार में संघटन, गति, उच्च ताप, संलयन अभिक्रिया एक तारे के निर्माण के कारक हैं। तारे के विकास क्रम में सर्वप्रथम (प्रारंभिक अवस्था) प्रोटोस्टार का निर्माण होता है, तत्पश्चात तारा विकास की मुख्य अवस्था में प्रवेश करता है। सूर्य के आकार का तारा इस अवस्था में 10 बिलियन वर्ष तक रहता है। इसके पश्चात तारे का हाइड्रोजन ईंधन विनष्ट होने लगता है और वह मृत्यु की ओर अग्रसर होता है। किसी तारे की जीवन-अवधि उसके आकार पर निर्भर करती है। सूर्य के आकार (एक सोलर मास-One Solar Mass) के तारे की अवधि लगभग 10 बिलियन वर्ष होती है। तारा जितना बड़ा होता  जाएगा, जीवन अवधि उतनी कम होती जाएगी। सूर्य से 50 गुना बड़े तारे की अवधि सिर्फ कुछ मिलियन वर्ष ही होती  है।

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  • विकास की मुख्य अवस्था से निकलकर एक तारा वृध्दावस्था की ओर अग्रसर होता है। जिसमें उसकी बाहरी सतह फैलती है, वह ठंडा होता है और उसकी चमक कम हो जाती है। इस स्थिति को रक्त दानव (Red Giant-छोटा तारा) या सुपर रक्त दानव (Red Super Giant बड़ा दानव) कहते हैं। रक्त दानव या सुपर रक्त दानव अवस्था में क्रमशः नोवा या सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात तारा अपने आकार के अनुरूप मृत्यु की तीन दशाओं – कृष्ण वामन (Black Dwarf), न्यूट्रॉन स्टार (Neutran Star) या कृष्ण विवर (Black Hole) मे से कोई एक प्राप्त करता है, जिनका विवरण इस प्रकार है –

  1. सूर्य सदृश्य छोटे तारे – रक्त दानव अवस्था के पश्चात नोवा विस्फोट के बाद यदि होता तो तारा श्वेत वामन बनेगा और अंत में कृष्ण वामन के रुप में मृत्यु की अंतिम स्थिति प्राप्त करेगा।

  2. मध्यम आकार के तारे- सुपर रक्त दानव अवस्था के पश्चात सुपरनोवा विस्फोट के बाद अवशेष 1.44 सौर्यिक द्रव्यमान से 3 सौर्यिक द्रव्यमान तक रहने वाले न्यूट्रॉन तारे के रुप में परिवर्तित हो जाने की संभावना रखते हैं।

  3. बड़े आकार के तारे – सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात 3 सौर्यिक द्रव्यमान से अधिक अवशेष वाले तारे कृष्ण विवर या ब्लैक होल में परिवर्तित होते हैं।

  • भारतीय-अमेरिकी भौतिकविद् सुब्रमण्यम चंद्रशेखऱ ने वर्ष 1930 में 1.44 सौर्यिक द्रव्यमान की वह सीमा निश्चि की थी, जिसके अंदर के तारे श्वेत वामन बनते हैं और उसके ऊपर के अवशेष द्रव्यमान वाले तारे न्यूट्रॉन स्टार या कृष्ण विवर/ब्लैक होल के रुप में परिवर्तित होते हैं। ध्यान रहे कि 1.44 सौर्यिक द्रव्यमान की चन्द्रशेखर सीमा नोवा या सुपरनोवा विस्फोट के  बाद बचे अवशेष तारे के द्रव्यमान से सुनिश्चित होती है। यह पूर्णतः निश्चित नही है कि विकास की मुख्य अवस्था का किस आकार का तारा विस्फोट के पश्चात 1.44 सौर्यिक द्रव्यमान की सीमा के अंदर अवशेष के रुप में बचता है। किंतु ऐसा माना जाता है कि सूर्य 8 गुने आकार तक के तारे में विस्फोट के पश्चात लगभग 1.44 सौर्यिक द्रव्यमान के बराबर अवशेष बचता है और इससे बड़े तारों का अवशेष 1.44 द्रव्यमान से अधिक होता है। इन्हीं तारों के ब्लैक होल बनने की संभावना होती है।

  • ब्लैक होल का उच्च गुरुत्वाकर्षण तारे के संपूर्ण अवशेष को अपने अंदर समा लेता है। यहां तक कि इसके पास से गुजरने वाली कोई वस्तु भी इसके गुरुत्वाकर्षण से बच नही सकती है। ब्लैक होल छोटा होते-होते अंत में केवल एक बिंदु के रुप में शेष रह जाता है।

  • ब्लैक होल संबंधी प्रथम सूचना डा. एस. चन्द्रशेखर द्वारा प्रस्तुत दी गई थी। 11 जनवरी, 1935 को लंदन की रॉयल एस्ट्रोनामिकल सोसाइटी की एक बैठक में उन्होने अपना मौलिक शोध-पत्र प्रस्तुत किया और बताया कि सफेद बौने तारे एक निश्चित द्रव्यमान प्राप्त करने के बाद अपने भार में और वृध्दि नही कर सकते। अंततः वे ब्लैक होल बन जाते हैं। भौतिकी के क्षेत्र में वर्ष 1983 का नोबेल पुरस्कार डॉ.एस. चन्द्रशेखर एवं डब्ल्यू. ए. फाउलर को संयुक्त रुप से प्रदान किया गया।

  • सुपरनोवा विस्फोट के पश्चात तारा मृत्यु की दशा को प्राप्त होता है। अतः सुपरनोवा एक मृतप्राय तारे की विस्फोट अवस्था है।

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  • सूर्य, हमारी गैलेक्सी आकाश गंगा के 100 अरब तारों में से एक है। गैलेक्सी में स्थित प्रत्येक तारा इसके केन्द्र की परिक्रमा करता है।

  • गैलेक्टिक केन्द्र से लगभग 7.94 KPC या 30 हजार प्रकाश वर्ष की दूरी तथा 220 किमी./सेकंड गति के कारण सूर्य को एक परिक्रमा करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लगते हैं। परिक्रमा की यह अवधि ब्रह्माण्ड वर्ष (Cosmic Year) कहलाती है।

  • निर्वात में प्रकाश द्वारा 3´105 किमी./सेकंड की गति से एक वर्ष में चली गई दूरी प्रकाश वर्ष कहलाती है। प्रकाश वर्ष तारों के मध्य दूरी ज्ञात करने की इकाई है। एक प्रकाश वर्ष में दूरियों का विवरण विभिन्न इकाइयों में इस प्रकार है – एक प्रकाश वर्ष बराबर मीटर में – 9.461´1015, किमी. – 461´1012 (9460528400000 किमी.), मिलीमीटर में – 9.461´1018, खगोलीय इकाई में – 63.24´103, मील में – 5878482164161 है।

  • चंद्रशेखर सीमा से अधिक द्रव्यमान होने पर, मुक्त घूमते इलेक्ट्रॉन अत्यधिक वेग पाकर नाभिक को छोड़कर बाहर चले जाते हैं तथा न्यूट्रॉन बचे रह जाते हैं इस अवस्था को न्यूट्रॉन तारा या पल्सर कहते हैं।

  • क्वासर एक चमकीला खगोलीय पिंड है, जो अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित करता है।

  • आकाश में दिखने वाले कुछ लगभग बराबर चमकीले तारों का ऐसा समूह, जो हमें एक निश्चित आकृति में व्यवस्थित प्रतीत होता है, तारामंडल अथवा नक्षत्र कहलाता है। इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के अनुसार, आकाश में कुल 88 तारामंडल हैं। सप्तऋषि तारामंडल से ध्रुव तारे का संकेत प्राप्त होता है। ध्रुव तारा उत्तर की  दिशा में चमकता है।

  • ऑरियन नेबूला हमारी आकाशगंगा के सबसे शीतल और चमकीले तारों का समूह है।

  • प्रॉक्सिमा संचुरी सूर्य का निकटतम तारा है।

  • बीटलग्यूस ओरियन तारा समूह का दूसरा सबसे चमकीला तारा है। यह पृथ्वी से 427 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। इसे सर्वप्रथम 1836 में सर जॉन हर्शेल ने देखा किंतु वर्ष 1955 में हब्बल दूरबीन ने इसका चित्र खींचा सूर्य के अतिरिक्त किसी तारे का खींचा जाने वाला यह प्रथम चित्र था।

  • तारे उत्तरी और दक्षिणी खगोलीय ध्रुवों के चारों ओर खगोलीय विषुवत रेखा के समानांतर चक्कर लगाते हैं। उत्तर एवं दक्षिणी खगोलीय ध्रुव, भौगोलिक उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुवों के ठीक ऊपर स्थित होते हैं तथा खगोलीय विषुवत रेखा पृथ्वी की विषुवत रेखा के लगभग ऊपर एवं ध्रुवों के सदैव 900 पर स्थित होती है और यह क्षितिज पर पूर्व एवं पश्चिम के बिंदुओं से अंतर्रोध करती है।

  • खगोलीय ध्रुवों के अंशों की संख्या क्षितिज की विषुवत रेखा के अक्षांशों के बराबर होती है। अतः यदि कोई प्रेक्षक तारों को क्षितिज से लंबवत उठते हुए देखता है तो, निश्चित ही वह विषुवत रेखा पर है।

  • अंतरिक्ष यान में बैठ व्यक्ति को आकाश का रंग काला दिखाई देता है, क्योंकि अंतरिक्ष में वायुमंडल नही पाया जाता है।

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  • तारों का रंग उनके ताप का सूचक होता है। विभिन्न रंगों के तारों का ताप निम्न प्रकार है –

नीला     –    50000-28000 K

नीला-श्वेत –    28000-10000 K

श्वेत      –    10000-7500 K

पीत      –    7500-6000 K

नारंगी    –    4900-3500 K

लाल      –    3500-2000 K

  • इवेंट होराइजन – यह एक ऐसी सीमा (Boundary) है, जो अंतरिक्ष में ब्लैक-होल के चारों ओर के क्षेत्र को परिभाषित करती है। इसी सीमा के अंदर भी घटना का प्रेक्षण संभव नही है।

  • सिंगुलैरिटी – यह अंतरिक्ष-काल में एक ऐसा स्थल है, जहां किसी खगोलीय पिंड गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र अनंत हो जाता है।

  • स्ट्रिंग थियरी – इसमें सभी पदार्थों एवं बलों को एकल सैध्दांतिक रुप रेखा में सम्मिलित कर ब्रह्मांड के मूल स्तर की व्याख्या कर्णों के स्थान पर कंपायमान स्ट्रिंग के पद में की जाती है।

  • स्टैंडर्ड मॉडल – कण भौतिकी का स्टैंडर्ड मॉडल एक ऐसा सिध्दांत है, जिसमें ब्रह्मांड में ज्ञात चार मूल बलों में से तीन (विद्युत चुंबकीय, दुर्बल एवं प्रबल) की व्यख्या की जाती है तथा सभी ज्ञात मूल कणों का वर्गीकरण किया जाता है।

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सौरमंडल

  • सूर्य, इसके आठ ग्रह तथा उनके अनेक उपग्रह एक पूरे परिवार की रचना करते हैं, जिसे हम सौरमंडल हैं।

  • सौरमंडल का निर्माण लगभग 4.6 बिलियन वर्ष पूर्व हुआ था। सौरमंडल मे सूर्य (तारा) और ऐसे खगोलीय पिंड सम्मिलित होते हैं, जो गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा उससे जुड़े रहते हैं, इनमें ग्रह, बौने ग्रह, प्राकृतिक उपग्रह, क्षुद्र ग्रह, उल्काएं, धूमकेतु और खगोलीय धूल आदि शामिल हैं।

  • सौरमंडल में ग्रहों की संख्या पूर्व मान्यता के अनुसार 9 थी, जो सूर्य से बढ़ती दूरी के क्रम में निम्न प्रकार थी –

  1. बुध (57.9 मिलियन किमी.)

  2. शुक्र (108.2 मिलियन किमी.)

  3. पृथ्वी (149.6 मिलियन किमी.)

  4. मंगल (227.9 मिलियन किमी.)

  5. बृहस्पति (778.3 मिलियन किमी.)

  6. शनि (1427 मिलियन किमी.)

  7. यूरेनस (2871 मिलियन किमी.)

  8. नेप्चून (4497.1 मिलियन किमी.)

  9. प्लूटो (5913 मिलियन किमी.)

नोटः 14-15 अगस्त 2006 के मध्य प्राग ( चेक गणराज्य) में संपन्न अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) की 26वीं महासभा की बैठक में प्लूटो को ग्रहों की श्रेणी से हटाकर बौना ग्रह की श्रेणी में डाल दिया गया। अतः नई मान्यता के अनुसार, ग्रहों की संख्या 9 घटकर 8 हो गई है।

  • अंतरराष्ट्रीय खगोल यूनियन की नई परिभाषा के अनुसार, ग्रह वह खगोलीय पिंड है जो –

  1. सूर्य की परिक्रमा करता है।

  2. अपने स्वयं के गुरुत्वाकर्षण के लिए पर्याप्त पदार्थ हो ताकि दृढ़ पिंड की शक्तियों को वशी भूत कर सके और जल स्थैतिकी संतुलन बना सके।

  3. अपनी परिक्रमा के दौरान निकट के ग्रह की कक्षा को काटे ना।

  • ग्रह अपने आकार, संघटन करने वाले पदार्थ, तापमान तथा सूर्य के चारों ओर परिक्रमा की अवधि की दृष्टि से एक-दूसरे से भिन्न है। इन भिन्नताओं का मुख्य कारण सूर्य से इनकी क्रमशः दूरी है।

  • कुछ ग्रह, जैसे बुध, शुक्र तथा मंगल, पृथ्वी की भांति ठोस हैं, इन्हें पार्थिव ग्रह कहते हैं।

  • कुछ ग्रह गैसों के बने होते हैं, जिन्हें गैसीय ग्रह कहते हैं। बृहस्पति, शनि, यूरेनस तथा नेप्चून गैसीय ग्रह हैं। इनके बड़े आकार के कारण इन्हें जोवियन ग्रह कहा जाता है। जोवियन का अर्थ हैं बृहस्पति के समान।

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  • सौरमंडल के सभी आठ ग्रहों में पृथ्वी का माध्य घनत्व सर्वाधिक 5.5 ग्राम/सेमी3 है। अन्य ग्रहों का घनत्व ग्राम/सेमी3 में इस प्रकार है –

  • बुध (5.4)

  • शुक्र (5.2)

  • मंगल (3.9)

  • बृहस्पति (1.3)

  • शनि (0.7)

  • अरुण (1.3)

  • वरुण (1.6)

  • सूर्य में सौर परिवार के द्रव्यमान का 99.8% भाग अंतर्दिष्ट है। सूर्य का द्रव्यमान 1.989´1030 किग्रा. है, जो पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 333000 गुना है।

  • सौरमंडल में कुल 8 ग्रह हैं। जिसमें बुध सबसे छोटा है, जबकि सबसे बड़ा बृहस्पति है।

  • शुक्र सर्वाधिक चमकीला ग्रह है।

  • वरुण सबसे दूर स्थित है। यह सूर्य की परिक्रमा करने में सर्वाधिक समय (लगभग 165 वर्ष) लगाता है।

  • ग्रह अप्रकाशवान होते हैं किंतु सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं।

  • आकार के अनुसार, ग्रहों का अवरोही क्रम इस प्रकार है –

  1. बृहस्पति

  2. शनि

  3. अरुण

  4. वरुण

  5. पृथ्वी

  6. शुक्र

  7. मंगल

  8. बुध

  • द्रव्यमान के अनुसार, ग्रहों का अवरोही क्रम इस प्रकार है –

  1. बृहस्पति

  2. शनि

  3. वरुण

  4. अरुण

  5. पृथ्वी

  6. शुक्र

  7. मंगल

  8. बुध

  • दूरी के अनुसार, ग्रहों का आरोही क्रम इस प्रकार है –

  1. बुध

  2. शुक्र

  3. पृथ्वी

  4. मंगल

  5. बृहस्पति

  6. शनि

  7. अरुण

  8. वरुण

  • ग्रहों में सर्वाधिक गुरुत्वाकर्षण बल बृहस्पति (23.1 मी./से) का है।

  • हाइड्रोजन, हीलियम तथा मीथेन गैसें बृहस्पति, शनि तथा मंगल ग्रह पर बड़ी मात्रा में विद्यामान हैं।

  • गोल्डी लॉक्स जोन को अप्रवासी क्षेत्र भी कहा जाता है। यह किसी तारे के चारों ओर स्थित ऐसा क्षेत्र है, जहां किसी ग्रह की सतह पर तरल पानी होने की उचित स्थिति पाई जाती है। तरल पानी ग्रहों पर जीवन की खोज में एक महत्वपूर्ण घटक है। हमारे सौंरमंडल के गोल्डी लॉक्स जोन स्थित एकमात्र ग्रह पृथ्वी है। अन्य की खोज एवं अनुसंधान जारी है। यह जोन न अत्यधिक गर्म और न ही अत्यधिक ठंडा होता है।

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  • पोलैंड के खगोलशास्त्री एवं गणितज्ञ निकोलस कॉपरनिकस ने 1514 ई. में एक  हस्तलिखित पुस्तक Little Comentary में उस सिध्दांत का प्रतिपादन किया था, जिसमें कहा गया था कि सूर्य ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है तथा पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है। उल्लेखनीय है कि छठवी शती. ई. के प्रसिध्द भारतीय खगोलविद् वराहमिहिर ने इससे लगभग 1000 वर्ष पूर्व ही यह बता दिया था कि चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है।

  • जर्मनी के खगोलविद् जोहॉन्स केप्लर ग्रहीय गतियों के तीन आधारभूत नियमों के जनक हैं।

  • इटली के विज्ञानी गैलीलियों गैलिलेई ने गिरने वाले पिंडो के आधारभूत नियमों का निरुपण किया।

  • अंग्रेजी वैज्ञानिक आइजक न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण तथा गति के तीन नियमों का प्रतिपादन किया।

सूर्य

  • सूर्य (Sun) सौरमंडल के केन्द्र में स्थित है।

  • सूर्य का वह भाग जो हमें आंखों से दिखाई देता है, उसे प्रकाशमंडल (Photoshere) कहते हैं। नासा के अनुसार सूर्य का आकार पृथ्वी से 109.2 गुना बड़ा है। सूर्य की माध्य त्रिज्या 695508 किमी. है।

  • सूर्य के कोर में अत्यधिक उच्च तापमान (लगभग 150000000 C) के कारण उपस्थित सभी पदार्थ गैस और प्लाज्मा के रुप में मिलते हैं। उल्लेखनीय है कि प्लाज्मा द्रव्य की ठोस, द्रव एवं गैस के अतिरिक्त चौथी अवस्था है।

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  • सूर्य के सतह का तापमान नासा के अनुसार 55000 C है।

  • सूर्य के समस्त ऊर्जा का स्रोत नाभिकीय संलयन है। नाभिकीय अभिक्रियाओं को दो भागों – नाभिकीय विखंडन तथा नाभिकीय संलयन में बांटा जा सकता है। जहां नाभिकीय विखंडन अभिक्रिया में एक भारी नाभिक दो या दो से अधिक छोटे नाभिकों में टूटता है, वहीं नाभिकीय संलयन अभिक्रिया में दो छोटे नाभिक आपस में संलयित होकर एक भारी नाभिक का निर्माण करते हैं।

  • तारों से मुक्त होने वाली ऊर्जा, ऊष्मा और प्रकाश का कारण नाभिकीय संलयन अभिक्रिया है।

  • तारों में 1 से 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान पर हाइड्रोजन के परमाणु आपस में संलयित होकर हीलियम का निर्माण करते हैं।

1H2 + 1H2 ®2H4 + ऊर्जा

ड्यूटीरियम       हीलियम

  • सूर्यग्रहण (Solar Eclipse) की स्थिति तब होती है जब चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है, जिससे सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नही पहुंच पाता है। यह स्थिति केवल प्रतिपदा (New Moon Day) या अमावस्या को ही होती है। इस स्थिति में पृथ्वी का जो भाग सूर्य की ओर होता है वही चन्द्रमा की छाया पड़ती है। साथ ही पृथ्वी के अनुप्रस्थ परिच्छेद की तुलना में पृथ्वी पर पड़ने वाला चन्द्रमा की छाया का आकार छोटा होता है। यही कारण है कि पूर्ण सूर्यग्रहण पृथ्वी के सभी भागों पर एक साथ दिखाई नहीं देता तथा यह केवल सीमित भू-क्षेत्र मे ही दिखाई देता है।

  • सूर्य का वह भाग जो केवल सूर्यग्रहण के समय दिखाई देता है, उसे कोरोना कहते हैं।

  • हीरक वलय (Diamond Ring) का दृश्य पूर्ण सूर्य ग्रहण (Total Solar Eclpse) के समय, जब चन्द्रमा, सूर्य को पूर्णतः ढक लेता है, के कुछ सेकंड पूर्व एवं कुछ सेकंड बाद दिखाई देता है। हीरक वलय परिधि रेखा पर दृष्टिगत होता है। किसी भी परिस्थिति में पूर्ण सूर्यग्रहण 8 मिनट से अधिक नही हो सकता है।

  • सूर्य के प्रकाशमंडल से सौर तूफान तीव्र गति से निकलता है जिस कारण वह सूर्य की आकर्षण शक्ति को पार कर अंतरिक्ष में चला जाता है, इसे सौर ज्वाला (Solar Flares) कहते हैं। जब यह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो हवा के कणों से टकराकर रंगीन प्रकाश उत्पन्न करता है। जिसे उत्तरी ध्रुव पर अरौरा बोरियालिस तथा दक्षिणी ध्रुव पर अरौरा आस्ट्रेलिस कहते हैं। सौर ज्वाला जहां से निकलती है,  वहां काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं। जिसे सौर कलंक कहते हैं। यह सूर्य के अपेक्षाकृत ठंडे भाग होते हैं।

  • चन्द्रमा अथवा सूर्य के चारों ओर पक्षाभ एवं पक्षाभ स्तरी बादलों के प्रितबिंबन से  बने श्वेत दूधिया रंग के छल्ले को  प्रभामंडल कहते हैं।

  • पृथ्वी सूर्य के निकटतम दूरी पर 3 जनवरी को होती है, इस स्थिति को पेरीहिलियन (उपसौर) कहते हैं इसके विपरीत 4 जुलाई को पृथ्वी सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर होती है इस स्थिति को अपहिलियन (अपसौर) कहते हैं।

  • खगोलीय इकाई लंबाई मापने की इकाई है। यह इकाई सूर्य एवं पृथ्वी के बीच की औसत दूरी (149.598 ´106 किमी. या 149.6 मिलियन किमी.) के बराबर होती है। अन्य ईकाइयों में इसे इस प्रकार समझा जा सकता है –

मीटर में – 149.598´109

मिली मीटर में – 149.1012

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बुध

  • बुध (Mercury) सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह है तथा यह सूर्य से निकटतम ग्रह है। यह लगभग 88 दिनों में सूर्य की परिक्रमा पूर्ण कर लेता है।

  • बुध (Mercury) एवं शुक्र (Venus) ग्रह के कोई उपग्रह नही हैं। वायुमंडल के अभाव के कारण बुध पर जीवन संभव नही है।

  • बुध ग्रह पर दैनिक तापांतर सबसे अधिक लगभग (6100 से.) रहता है।

  • बुध के सबसे पास से गुजरने वाला कृत्रिम उपग्रह मैरिनर-10 था, जिसके द्वारा भेज गए चित्रों से पता चलता है कि इसकी सतह पर कई पर्वत एवं मैदान हैं।

  • बुध और सूर्य के मध्य दूरी लगभग 58 मिलियन किमी या (0.39 AU) है।

  • सौरमंडल के सभी आठ ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं। उनकी अवधि इस प्रकार हैं –

  • बुध (87.96 दिन)

  • शुक्र (224.68 दिन)

  • पृथ्वी (365.26 दिन)

  • मंगल (686.98 दिन)

  • बृहस्पति (11.862 वर्ष)

  • शनि (29.456 वर्ष)

  • अरुण (84.07 वर्ष)

  • वरुण (164.81 वर्ष)

  • परावर्तित प्रकाश में देखने पर किसी पिंड का एल्बिडो उसकी चमक अर्थात चाक्षुष द्युति निर्धारित करता है। बुध बहुत अधिक मात्रा में सूर्य का प्रकाश ग्रहण करता है किंतु इसका एल्बिडो पृथ्वी की तुलना में कम होने के कारण इसमें चमक कम होती है। पृथ्वी का एल्बिडो 0.367 है, जबकि का बुध का 0.138 है।

  • बुध ग्रह का व्यास लगभग 3000 किमी. है।

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शुक्र

  • शुक्र (Venus) ग्रह को पृथ्वी की जुड़वा बहन (Sister Planet) के नाम से भी जाना जाता है।

  • शुक्र ग्रह सौरमंडल का सर्वाधिक चमकीला ग्रह है।

  • शुक्र ग्रह को भोर का तारा (Morning Star) और सायं का तारा (Evening Star) कहा जाता है।

  • सूर्य से शुक्र ग्रह की दूरी लगभग 108 मिलियन किमी.  है। यह सूर्य से दूसरा सबसे निकटतम ग्रह है।

  • शुक्र, सूर्य के चारों ओर लगभग 225 दिनों मे एक चक्कर लगाता है। वर्तमान समय में सौरमंडल का सर्वाधिक गर्म ग्रह शुक्र है, इसका औसत तापमान 4750 C (726 K) है।

  • सौरमंडल के सभी अन्य ग्रहों का औसत तापमान इस प्रकार है –

बुध = 452 K (दिन + 4300 C, रात्रि- 1800C)

पृथ्वी = 260-310K (150C)

मंगल =  150-310K (-220C)

बृहस्पति = 120K (-1230 C)

शनि = 88K (-1800 C)

अरुण =  59K (-2180C)

वरुण =  48K (-2280C)

  • शुक्र, ग्रहों की सामान्य दिशा के विपरीत सूर्य का पूर्व से पश्चिम दिशा में परिक्रमण करता है।

  • शुक्र ग्रह पर वायुमंडल (Atmosphere) के प्रमाण उपलब्ध हैं। इसके वायुमंडल का लगभग 90 प्रतिशत भाग 9 किमी. की ऊंचाई तक ही विस्तृत है।

  • शुक्र के वायुमंडल में मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड का ही संकेन्द्रण है तथा तापमान 4000C से अधिक रहता है, इस कारण शुक्र पर प्रेशर कुकर की दशा उत्पन्न होती है। उपर्युक्त कारणों से शुक्र पर जीवन की संभावना अत्यधिक कम हो जाती है।

  • बुध के समान शुक्र का भी कोई उपग्रह नही है।

  • मैगलन अंतरिक्षयान को रडार मैपिंग मिशन के तहत शुक्र ग्रह पर वर्ष 1989 में भेजा गया था। इसने शुक्र के चारों ओर वर्ष 1990-1994 के दौरान चक्कर लगाया। इसका मानकरण छठी शताब्दी के पूर्तगाली खोजकर्ता फर्डीनेंड मैगलन के नाम पर रखा गया था।

 

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पृथ्वी

  • पृथ्वी (Earth) सूर्य से दूरी के क्रम में तीसरा ग्रह तथा सभी ग्रहों में आकार की दृष्टि से पांचवा सबसे बड़ा ग्रह है। यह शुक्र और मंगल ग्रह के मध्य स्थित है। पृथ्वी पर जीवन इस पर पाई जाने वाली परिस्थितिकी के कारण है। परिस्थितिकी के कारण ही पृथ्वी ग्रह को ग्रीन प्लैनेट की संज्ञा दी गई है।

  • यूनानी दार्शनिक अरस्तू (384-322 ई.पू.) ने अपनी पुस्तक ऑन द हेवेन्स (On The Heavens) द्वीतीय खंड के 14वें अध्याय में स्पष्ट उल्लेख किया है कि पृथ्वी लध्वक्ष गोलाभ (Oblate Spheroid) के सर्वाधिक निकट है। इस आकृति को जियॉड Geoid) भी कहा जाता है।

  • पृथ्वी को अपने अक्ष पर 23.300 (या 23*1/20) झुकी हुई है। इस झुके हुए अक्ष के सहारे ही पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 1,000 मील प्रति घंटे की गति से चक्कर लगाती है । अपने अक्ष पर एक चक्कर पूरा करने में पृथ्वी को लगभग 24 घंटे का समय लगता है।

  • अपने अक्ष के सहारे पृथ्वी का घूर्णन (Rotation of Earth on its axis) भू-परिक्रमण कहलाता है। भू-परिक्रमण के कारण ही पृथ्वी पर दिन-रात होते हैं। इसक सीधा अर्थ यह है कि, जो भाग सूर्य की ओर पड़ता है उस दिन और पीछे वाले भाग पर रात्रि होती है, यही क्रम चलता रहता है।

  • पृथ्वी का अपने अक्ष पर झुकाव तथा इसकी परिक्रमा पथ के चारों ओर अपनी ध्रुवी पर चक्कर लगाता है। इसकी दोनों ही समयावधियां लगभग समान हैं।

  • 21 मार्च व 23 सितंबर की तिथियों को सूर्य दो बार विषुवत रेखा (भूमध्य रेखा) पर लंबवत् चमकता है। 21 मार्च से 23 सितंबर तक सूर्य विषुवत रेखा एवं कर्क रेखा के बीच (6 माह) रहता है। इस समय उत्तरी गोलार्ध्द में ग्रीष्म ऋतु ओर दक्षिणी गोलार्ध्द में शीत ऋतु होती है। उत्तरी गोलार्ध्द की अपेक्षा दक्षिणी गोलार्ध्द में सूर्य़ की किरणें अधिक तिरछी पड़ती हैं। इसके विपरीत 23 सितंबर से 21 मार्च (6 माह) तक सूर्य विषुवत रेखा से मकर रेखा के बीच रहता है। इस समय दक्षिणी गोलार्ध्द में ग्रीष्म ऋतु एवं उत्तरी गोलार्ध्द में शीत ऋतु होती है। इस समय सूर्य की किरणें दक्षिणी गोलार्ध्द की अपेक्षा उत्तरी गोलार्ध्द में अधिक तिरछी पड़ती है। सूर्य की किरणों के तिरछेपन के कारण ही सूर्य चमकने वाले गोलार्ध्द के विपरीत वाले गोलार्ध्द के ध्रुवीय क्षेत्र 6 माह तक अंधेरे में रहते हैं।

  • 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता रहता है, इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत (Summer Solistice) कहते  हैं। 22 दिसंबर को सूर्य  मकर रेखा पर लंबवत चमकता है, इस स्थिति को शीत अयनांत (Winter Solistice) कते हैं।

  • पृथ्वी के दोनों अक्ष 23*1/20 पर झुके हुए हैं और स्वयं के प्रति समांतर भी हैं। 450 अक्षांश रेखा विषुवत रेखा एवं ध्रुवों के मध्य भाग से होकर गुजरती है। इसका Cosine 450 = 0.707, अतः इसकी लंबाई = 0.707×40075.02 = 28333.039 किमी. है, जबकि विषुवत रेखा की लंबाई 40075.02 किमी. है। अतः यह विषुवत रेखा की आधी न होकर आधे से अधिक है।

  • 600 अक्षांश रेखा विषुवत रेखा की आधी होती है जिसका Cosine 600 = 0.5 है।

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  • पृथ्वी पर विषुवत रेखा की परिधि लगभग 40,075 किमी. है।

  • पृथ्वी का व्यास लगभग 12800 (12756 किमी.) है।

  • पृथ्वी के घूर्णन से उत्पन्न अपकेन्द्रीय बल विषुवत रेखा पर सर्वाधिक होता है। इसी बल के प्रभाव के फलस्वरुप विषुवत रेखा पर किसी पिंड का भार सबसे कम और उच्च अक्षांशों की ओर बढ़ता जाता है तथा ध्रुवों पर सर्वाधिक होता है।

  • पृथ्वी का सूर्य की कक्षा में चक्कर लगाना भू-परिक्रमण कहलाता है। पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में 365.25 दिन या 365 दिन, 6 घंटे, 9 मिनट, 9.51 सेकंड का समय लगता है। इसे सौर दिवस कहा जाता है। सौर वर्ष/सौर दिवस को ट्रॉपिकल वर्ष भी कहा जाता है।

  • ट्रॉपिकल वर्ष एक वसंत विषुव (Vernal Equinox) से दूसरे वसंत विषुव के बीच समय के बराबर होता है। ट्रॉपिकल वर्ष सामान्यतः 365.24 दिनों का होता है। सामान्यतः कैलेंडरों में प्रयोग होने वाले वर्ष को ट्रॉपिकल वर्ष कहा जाता है। जिससे 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट, 45.2 सेकंड या 365.242  दिन होते हैं।

  • वर्ष 2000 में अन्य सामान्य वर्षो की तुलना में लगभग 5 मिनट की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। इसमें 365 दिन, 6 घंटे, 13 मिनट (9 मिनट के स्थान पर) 53.26 सेकंड (9.51 सेकंड के स्थान पर) की गणना की गई। ऐसे वर्षों को परिवर्ष (Anomalistic year) कहते हैं।

  • पृथ्वी सूर्य के चारों ओर 29.8 किमी/सेकंड (लगभग 30 किमी/सेकंड) के वेग से चक्कर लगाती है। यह गति प्रकाश की गति के तुलनात्मक है। विभिन्न ग्रहों के चक्कर लगाने की गतियां इस प्रकार हैं –

  1. बुध (47.9 किमी/से)

  2. शुक्र (35 किमी/से)

  3. पृथ्वी (29.8 किमी/से)

  4. मंगल (24.1 किमी/से)

  5. बृहस्पति (13.1 किमी/से)

  6. शनि (9.6 किमी/से)

  7. अरुण (6.8 किमी/से)

  8. वरुण (5.4 किमी/से)

  • पृथ्वी से सूर्य के मध्य की दूरी 149600000 किलोमीटर है। सूर्य से प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में लगभग 8 मिनट 17 का समय लगता है। इन विद्युत चुंबकीय ऊर्जा तरंगों का वेग 186000 मील प्रति सेकं होता है।

  • चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह है, हो पृथ्वी से 382500 किमी (औसत दूरी) दूर है। पृथ्वी से दूरी के अनुसार, सौरमंडल के ग्रहों का क्रम इस प्रकार है –

  • शुक्र (41.4 किमी.)

  • मंगल (78.3 मिलियन किमी)

  • बुध (91.7 मिलियन किमी.)

  • बृहस्पति (628.7 मिलियन किमी.)

  • शनि (1277.4 मिलियन किमी.)

  • अरुण (1634.4 मिलियन किमी.)

  • वरुण (4347.5 मिलियन किमी.)

  • इस प्रकार ग्रहों में पृथ्वी के सर्वाधिक निकट का ग्रह शुक्र है।

  • पृथ्वी से सर्वाधिक निकट का तारा सूर्य है। पृथ्वी से तारों की दूरी इस प्रकार है

  • ध्रुव तारा (Polaris Star) – 431 प्रकाश वर्ष

  • अल्फा सेंटारी (Alpha Centauri) – 35 प्रकाश वर्ष (सूर्य से)

  • सूर्य – 149.6´106 किमी.

  • लुब्धक (Sirius) – 6 प्रकाश वर्ष (सिरिअस तारा को संस्कृत में लुब्धक के नाम से जाना जाता है।)

  • पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अक्ष अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग होता है। उत्तरी गोलार्ध्द में पृथ्वी का चुंबकीय ध्रुव उत्तरी कनाडा के क्वीन एलिजाबेथ द्वीप पर उत्तरी ध्रुव से 1300 किमी. की दूरी पर स्थित है।

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  • पृथ्वी की चुंबकीय विषुवत रेखा दक्षिण भारत में थुम्बा के अति निकट (90 N, 770E) से गुजरती है। इसलिए इसे उपग्रह प्रक्षेपण हेतु उपयुक्त मानकर यहां TERLS (Thumba Equatorial Rocket Launching Station) की स्थापना की गई है। यह केरल के तिरुवनंतपुरम जिले में स्थित है।

  • पृथ्वी के चारों ओर घूमने वाले कृत्रिम उपग्रह के बाहर गिराई गई कोई वसुत उपग्रह के समान ही उसी दिशा में पृथ्वी का चक्कर काटने लगती है। अधिकांश कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी से पूर्व दिशा की ओर प्रक्षेपित किए जाते हैं। क्योंकि इससे उपग्रह को निकास वेग मिल जाता है लेकिन हमेशा और सभी उपग्रह पूर्वी दिशा की ओर प्रक्षेपित नहीं किए जाते हैं। ध्रुवों का चक्कर लगाने वाले कुछ उपग्रह  उत्तर या दक्षिण की ओर प्रक्षेपित किए जाते  हैं।

  • पृथ्वी की संरचना की कठोर आंतरिक क्रोड (Inner Core) एवं प्रावर (Mantle) के मध्य लौह (Iron) और निकेल (Nickel) की संयुक्त रुप से लगभग 2260 किमी. मोटी द्रवित परत है, जिसे बाहरी क्रोड कहते हैं।

  • भूपर्पटी पर पाए जाने वाले विभिन्न तत्वों का विवरण (भार प्रतिशत में) इस प्रकार है –

  • ऑक्सीजन (O) – 71%

  • सिलिकॉन (Si) – 69%

  • एल्युमीनियम (Al) – 8.07%

  • लोहा (Fe) – 5.05%

  • कैल्शियम (Ca) – 3.65%

  • सोडियम (Na) – 2.75%

  • पोटैशियम (K) – 2.58%

  • मैग्नीशियम (Mg) – 2.08%

  • पृथ्वी दिवस एक वार्षिक आयोजन है, जिसे 22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के लिए आयोजित किया जाता है। उल्लेखनीय है कि प्रथम बार इस दिवस का आयोजन वर्ष 1970 में किया गया था।

  • मौसम परिवर्तन में सबसे बड़ा योगदान पृथ्वी का अपने अक्ष पर 23*1/20 का झुका होना है। इसके अतिरिक्त सूर्य से पृथ्वी की दूरी में परिवर्तन की भी इसमें सूक्ष्म भूमिका रहती है।

  • सूर्य वर्ष में दो बार (21 मार् और 23 सितंबर को) विषुवत रेखा/भूमध्य रेखा पर लंबवत चमकता है। वर्ष की इन दो तिथियों को पृथ्वी के दोनों गोलार्ध्दों में दिन एवं रात की अवधियां बराबर अर्थात 12-12 घंटे होती हैं।

  • यदि पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी एक-चौथाई कम कर दी जाए, तो सूर्य के चारों ओर घूमने वाली पृथ्वी की कक्षा छोटी हो जाएगी। फलतः पृथ्वी पर 365.25 दिन का होने वाला वर्ष छोटा हो जाएगा। चूंकि पृथ्वी की कक्षा छोटी हो जाने पर वह सूर्य से वर्तमान दूरी (149.6. मिलियन किमी.) से कम दूरी पर होगी इसलिए पृथ्वी की गति बढ़ जाएगी। यही कारण है कि सूर्य़ से बढ़ती दूरी के अनुसार, ग्रहों की परिभ्रमण गति घटती जाती है।

  • पृथ्वी के चारों ओर घूमने वाले कृत्रिम उपग्रह के बाहर गिराई गई कोई भी वस्तु उपग्रह के समान ही पृथ्वी का चक्कर काटने लगती है।

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मंगल

  • मंगल (Mars) ग्रह सूर्य से दूरी के अनुसार, पृथ्वी के बाद चौथा ग्रह है। मंगल ग्रह का अक्षीय झुकाव 23 अंश, 59 मिनट है, जो लगभग पृथ्वी के समान है। सूर्य से मंगल ग्रह की दूरी 227940000 किमी. है।

  • मंगल ग्रह सूर्य के चारों ओर 686.98 दिन में एक चक्कर लगाता है। मगल ग्रह का व्यास 6794.4 किमी. ।

  • मंगल ग्रह अपनी धुरी पर लगभग 24.6 घंटे में एक चक्कर लगाता है।

  • मंगल ग्रह के वायुमंडल संघटन (Atmosphere Composition) में 95.3% कार्बन डाइऑक्साइड, 2.7% नाइट्रोन, 1.6% आगर्न, 0.15% ऑक्सीजन और जल पाया जाता है।

  • नासा के मार्स रिकॉनाइसेंस ऑर्बिटर (MRO) अंतरिक्षयान में लगे अत्याधुनिक केमरे से ली गई तस्वीरों के अध्ययन के पश्चात् वैज्ञानिकों ने वर्तमान में मंगल ग्रह पर तरल जल की उपस्थिति की पुष्टि की है। मंगल की ढलानों पर जहां रहस्यमयी धारियां दिखाई दी वहां वैज्ञानिकों ने एमआरओ में लगे इमेजिंग स्पेक्ट्रोमीटर (Imaging Spectrometer) के प्रयोग द्वारा जलयोजित खनिजों (Hydrated Minerals) की उपस्थिति का पता चला है।

  • मंगल ग्रह का औसत तापमान 150-310 K तक पाया जाता है। उपर्युक्त विशेषताओं के कारण ही मंगल ग्रह को पृथ्वी के समकक्ष ग्रह माना जाता है। मंगल ग्रह पर वायुमंडल अत्यंत विरल है।

  • मंगल की सतह लाल होने के कारण इसे लाल ग्रह की संज्ञा दी जाती है।

  • मंगल के दो उपग्रह फोबोस (Phobos) और डीमोस (Deimos) हैं। डीमोस सौरमंडल का सबसे छोटा उपग्रह है।

  • मंगल पर पाया जाने वाला पर्वत निक्स ओलंपिया (Nix Olympia)है, जो एवरेस्ट से लगभग तीन गुना बड़ा है।

  • फीनिक्स मार्श लैंडर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा मंगल ग्रह के अन्वेषण हेतु 4 अगस्त, 2007 को प्रक्षेपित किया गया। 25 मई, 2008 को यह मंगल ग्रह के उत्तरी ध्रुव पर उतरा। 11 नवंबर, 2008 को पृथ्वी से संपर्क टूट जाने के कारण फीनिक्स अभियान समाप्त हो गया। फीनिक्स ने ही सर्वप्रथम मंगल ग्रह पर बर्फ होने की जानकारी दी थी।

  • मंगल पर जीवन की संभावना तथा उसके वातावारण के अध्ययन के लिए नासा (NASA) ने क्यूरियोसिटी रोवर मंगल ग्रह पर ग्रेल क्रेटर (Gale Crater) नामक स्थान पर पहुंचा।

  • मंगल ग्रह के अन्वेषण के लिए भारत का प्रथम अभियान मार्स आर्बिटर मिशन (MOM) या मंगलयान है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, इसरो (IRSO) द्वारा मंगलयान का सफल प्रक्षेपण 5 नवंबर, 2013 को किया गया। मंगलयान उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLVC-25) के माध्यम से मंगल ग्रह की कक्षा में 24 सितंबर, 2014 को पहुंचा। इस सफलता से भारत मार्शियन इलीट क्लब (अमेरिका, रुस और यूरोपीय संघ) में शामिल हो गया।

  • बृहस्पति के चन्द्रमा यूरोपा (Europa) पर वॉयजर (Voyagers) अभियान से प्राप्त संकेतों के अनुसार, यूरोपा की सतह पृथ्वी पर स्थित बर्फीले समुद्रों की भांति दिखाई देती है। इनकी गहराई संभवतः 50 किमी. तक है। यदि ऐसा है, तो सौरमंडल में यह एकमात्र ऐसा स्थान होगा जहां पृथ्वी के अतिरिक्त इतनी बड़ी मात्रा में तरल जल प्राप्त होने के संकेत हैं।

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बृहस्पति

  • बृहस्पति (Jupiter) सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। इसका व्यास 142800 किमी. है। इसका औसत घनत्व 1.30 ग्राम/घन सेमी. है। बृहस्पति अपने अक्ष पर सौरमंडल का सर्वाधिक तेज गति घूर्णन करने वाला ग्रह है।

  • सौरमंडल में आकार की दृष्टि से ग्रहों का क्रम इस प्रकार से है –

  • बृहस्पति – व्यास 142796 किमी.

  • शनि – व्यास – 120660 किमी.

  • अरुण – व्यास – 51118 किमी.

  • वरुण – व्यास – 48600 किमी.

  • पृथ्वी – व्यास – 12756 किमी.

  • शुक्र – व्यास – 12104 किमी.

  • मंगल – व्यास – 6787 किमी.

  • बुध – व्यास – 3000 किमी.

  • बृहस्पति को सूर्य की परिक्रमा करने में 11.862 वर्ष लगता है।

  • बृहस्पति के वर्तमान में 69 उपग्रहों की खोज हो चुकी है। इनमें सबसे पहले खोजे गए चार बड़े उपग्रहों (10, Europa Ganymede and Callisto को गैलीलियन उपग्रह (Galilean Moons) कहा जाता है। इसकी खोज 1610 ई. में गैलिलियों गेलिलेई (Galileo Galilei) द्वारा की गई थी।

  • गैनिमेड सौरमंडल का सबसे बड़ा उपग्रह है।

  • बृहस्पति को लघु सौर तंत्र भी कहते हैं।

  • बृहस्पति के चन्द्रमा यूरोपा पर वॉयजर अभियान से प्राप्त संकेतों के अनुसार यूरोपा की सतह पृथ्वी पर बर्फीले समुद्रों की भांति दिखाई देती है। इनकी गहराई संभवतः 50 किमी. तक है। यदि ऐसा है, तो सौंरमंडल मे यह एक मात्र ऐसा स्थान होगा जहां पृथ्वी के अतिरिक्त इतनी बड़ी मात्रा में तरल जल प्राप्त होने के संकेत हैं।

  • बृहस्पति के वलयों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1979 में वोयाजर 1 स्पेस प्रोब ने की थी। इन वलयों को जोवियन वलय कहा जाता है। माना जाता है कि ये वय सिलिकेटों के बने हुए हैं। विरल एवं लगभग पारदर्शी होने के कारण इन्हें देखना कठिन है परंतु इन्हें अस्तित्वहीन नही माना जा सकता है।

  • बृहस्पति के वायुमंडल में मुख्यतः हाइड्रोजन तथा हीलियम गैस पाई जाती है। तथा अल्प मात्रा में मीथेन तथा अमोनिया का प्रमाण मिला है। बृहस्पति का वायुमंडलीय  दाब पृथ्वी के वायुमंडलीय दाब की तुलना में बहुत अधिक है।

  • बृहस्पति के तीव्र घूर्णन के कारण एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है तथा इसके पास स्वयं की रेडियो ऊर्जा होती है इसलिए यह तारा एवं ग्रह दोनों के गुण को प्रदर्शित करता है।

  • वर्तमान में ग्रह एवं उनके प्राकृतिक उपग्रह इस प्रकार हैं –

  • बुध – 0

  • शुक्र – 0

  • पृथ्वी- 1

  • मंगल-2

  • बृहस्पति – 69

  • शनि – 61

  • अरुण – 27

  • वरुण – 14

  • इस प्रकार सर्वाधिक प्राकृतिक उपग्रह बृहस्पति के पास हैं.

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शनि

  • शनि (Saturn) सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसके उपग्रहों की संख्या 61 है।

  • टाइटन (Titan) शनि का सबसे बड़ा उपग्रह है। जिसका व्यास 5150 किमी. है। शनि का दूसरा सबसे बड़ा उपग्रह रिया है। जिसका व्यास 1530 किमी. है। इयोपेट्स, डिओन, टेथीस, इनसेलाडस, मिमास, एटलस, लापेटस, इंकलेडस, फोइबे एवं हेलन शनि के अन्य प्रमुख उपग्रह हैं।

  • शनि को सूर्य का चारों ओर चक्कर लगाने में 29.456 वर्षों का समय लगता है।

  • शनि को गैसें का गोला (Globe of Gases) तथा गैलेक्सी समान ग्रह (Galaxy Like Planet) भी कहा जाता है।

  • शनि ग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसके मध्य रेखा के चारों ओर पूर्ण विकसित वलयों का होना है। शनि ग्रह के A, B, D एवं E वलय पृथ्वी से भी दिखाई देते हैं। शनि के अतिरिक्त बृहस्पति एवं वरुण में भी वलय के संकेत प्राप्त हुए हैं।

  • पृथ्वी से शनि का रंग पीला दिखाई देता है।

  • शनि ग्रह के दिन की अवधि 10 घंटा 40 मिनट तथा इसके अक्ष का झुकाव-26 अंश, 44 मिनट है। शनि ग्रह का औसत तापमान 88 K (-1800 C) होता है। शनि ग्रह के वायुमंडल में हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन और अमोनिया गैसें मिलती हैं।

  • शनि ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में 578 गुना अधिक है।

  • शनि ग्रह का फोबे नामक उपग्रह शनि की कक्षा में घूमने के विपरीत दिशा में परिक्रमा करता है।

  • पायनियर, कैसिनी इत्यादि शनि के अन्वेषण हेतु भेजे गए यान हैं। कैसिनी यान 15 अक्टूबर, 1997 को शनि ग्रह का चक्कर लगाने के लिए भेजा गया था।

अरुण, वरुण एवं प्लूटो

  • अरुण (Uranus), सूर्य से दूरी के अनुसार, सातवां तथा ग्रहों के आकार की दृष्टि से तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है। अरुण ग्रह की खोज 13 मार्च, 1781 को विलियम हरशेल (William Herschel) द्वारा की गई थी।

  • अरुण ग्रह का अक्षीय झुकाव 82 अंश, 5 मिनट है। अधिक अक्षीय झुकाव के कारण इसे लेटा हुआ ग्रह भी कहते हैं।

  • अरुण ग्रह सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा करने में 84.07 वर्षों का समय लेता है। अरुण ग्रह, ग्रहों के सामान्य दिशा के विपरीत पूर्व से पश्चिम दिशा में सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करता है। अरुण ग्रह अपने अक्ष पर 17.9 घंटों में एक चक्कर पूरा करता है। अरुण ग्रह पर सूर्योदय पश्चिम दिशा में एवं सूर्यास्त पूरब की दिशा में होता है। इस ग्रह पर वायुमंडल काफी सघन है, जिसमें हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन तथा अमोनिया हैं। सूर्य से दूर होने के कारण यह काफी ठंडा तथा दूरदर्शी से देखने पर यह नीला-हरा दिखाई देता है।

  • अरुण ग्रह के उपग्रहों की संख्या 27 है। शनि ग्रह की भांति अरुण ग्रह के भी चारो ओर वलय पाए जाते हैं। अरुण ग्रह से दूरी के अनुसार इनके वलय जेटा – 6, 5, 4, अल्फा, बीटा, इटा,  गामा, डेल्टा, लैम्ब्ड़ा, इपसिलॉन इत्यादि हैं। NASA का वॉयजर-2 यान अरुण ग्रह के अध्ययन के लिए भेजा गया था।

  • वरुण (Neptune) ग्रह की खोज जर्मन खगोल शास्त्री जोहॉन गाले ने 23 सितंबर 1846 को की थी।

  • वरुण ग्रह सूर्य के चारो ओर एक चक्कर लगाने 164.81 वर्ष लगाता है।

  • वरुण ग्रह के दिन की अवधि 16 घंटे तथा इसका अक्षीय झुकाव 28 अंश, 48 मिनट है। सौरमंडल का सर्वाधिक ठंडा ग्रह वरुण है इसका औसत तापमान 48 K (-2280 C) है।

  • वरुण ग्रह के वायुमंडल में हाइड्रोजन, हीलियम, मीथेन और अमोनिया विद्यमान है।

  • वरुण ग्रह के 14 उपग्रह हैं। इनमें ट्रिटोन एवं मेरीड प्रमुख हैं। प्लूटों ग्रह को ग्रहों की श्रेणी से हटाएं जाने के बाद (2006) से वरुण ही सौरमंडल का दूरस्थ ग्रह है।

  • प्लूटो (Pluto) सभी सौरमंडलीय पिंडो में सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर है।

  • प्लूटों की खोज वर्ष 1930 में क्लाइड टाम्बैग ने की थी। इसे सौरमंडल का नौवां एवं सब से छोटा ग्रह माना गया था परंतु 14-25 अगस्त, 2006 मध्य प्राग (चेक गणराज्य) मे संपन्न अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) की 26वीं महासभा की बैठक में प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से हटाकर बौना ग्रह (Dwarf) की श्रेणी में डाल दिया गया। क्योंकि प्लूटों की कक्षा वरुण  कक्षा से ओवरलैप करती है।

  • प्लूटों के पांच ज्ञात उपग्र हैं। प्लूटों की दूरी के अनुसार, इनकी स्थिति है – चारोन, स्टिक्स, निक्स, केरबेरॉस और हाइड्रा

  • चारोन (Charon) प्लूटों का सबसे बड़ा उपग्रह है।

  • प्लूटों को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में 247.7 वर्ष का समय लगता है।

  • ग्रह समय (वर्ष में)

बृहस्पति  –    11.86

अरुण     –    84.01

वरुण     –    164.8

प्लूटो     –    247.7

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चन्द्रमा

  • उपग्रह वे आकाशीय पिंड हैं, जो अपने-अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं तथा अपने ग्रह के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं।

  • पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा (Moon) है। पृथ्वी से चन्द्रमा की न्यूमतम दूरी 363300 किमी. है, जबकि अधिकतम दूरपी 405500 किमी. रहती है, जबकि चन्द्रमा और पृथ्वी की औसत दूरी 384400 किमी. है। चन्द्रमा सौरमंडल का पांचवा सबसे बड़ा उपग्रह है। इसका व्यास 3475 किमी. है। चन्द्रमा अपने अक्ष पर 27 दिन, 7 घंटे, 43 मिनट में एक चक्कर पूरा करता है। यह लगभग उतनी ही अवधि है जितनी वह पृथ्वी की एक परिक्रमा करने में लेता है। चन्द्रमा की औसत अक्षीय गति 2286 मील प्रति घंटे है। चन्द्रमा की पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा दीर्घवृत्तीय और झुकावयुक्त है, फलस्वरुप जब चन्द्रमा पृथ्वी से सर्वाधिक दूरी पर होता है, तो छोटा और जब निकटतम दूरी पर होता है तो बड़ा दिखाई देता है। चन्द्रमा के इसी लिबरेशन के कारण पृथ्वी की सतह से एक समय में उसका केवल 59 प्रतिशत भाग ही देखा जा सकता है। अतः स्पष्ट है चन्द्रमा का एक भाग सदैव पृथ्वी की ओर उन्मुख रहता है। ध्वनि तरंगों के संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। वायुमंडल इसका एक सशक्त माध्यम है। चन्द्रमा पर वायुमंडल का अभाव है, इसी कारण चन्द्रमा पर दो व्यक्ति एक-दूसरे की बात नही सुन सकते हैं।

  • जब सूर्य एवं चन्द्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है, तो सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा पर नही पड़ता है। चूंकि ग्रहों व उपग्रहों का अपना कोई प्रकाश नही है ये केवल सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं। अतः चन्द्रमा पर सूर्य का प्रकाश न पड़ने के कारण ही चन्द्र ग्रहण होता है।

  • चन्द्र ग्रहण का प्रकार और उसकी लंबाई चन्द्रमा की सापेक्षिक स्थितियों व उसके कक्षीय पथ पर निर्भर करती है।

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  • चन्द्रग्रहण सदैव पूर्णिमा के दिन होता है।

  • अर्ध्द चन्द्र के समय पृथ्वी के संदर्भ में सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति समकोणीय (900) होती है।

  • चन्द्रमा अपने दीर्घ वृत्ताकार कक्ष के सहारे पृथ्वी की परिक्रमा करता है। जब चन्द्रमा पृथ्वी के निकटतम (363300 किमी.) होता है, तो उसे चन्द्रमा की उपभू (Perigee) स्थिति कहते हैं। इस स्थिति में चन्द्रमा का ज्वारोत्पादक बल सर्वाधिक होता है। जिस कारण उच्च ज्वार उत्पन्न होता है, जो सामान्य ज्वार से 15 से 20 प्रतिशत बड़ा होता है। इसके विपरीत जब चन्द्रमा पृथ्वी से अधिकतम दूरी (405500 किमी.) पर स्थित होता है, तो उसे अपभू स्थिति (Apogee) कहते हैं। इस समय चन्द्रमा का ज्वारोत्पादक बल न्यूनतम होता है, जिस कारण लघु  ज्वार उत्पन्न होता है, जो सामान्य ज्वार से 20 प्रतिशत छोटा होता है। 22 दिसंबर, 1999 को चन्द्रमा पूर्ण उपभू (Full Perigee) पर था अर्थात इस दिन चन्द्रमा के पृथ्वी की सबसे निकटतम दूरी पर रहने के कारण ही यह सर्वाधिक  चमकदार दिखाई पड़ा। 14 नवंबर, 2016 को पुनः पूर्ण उपभू  की स्थिति बनी थी जिसमें चन्द्रमा 60 वर्षों में सर्वाधिक बड़ा एवं चमकदार दिखाई पड़ा था। इस स्थिति को आम बोलचाल की भाषा में सुपर मून भी कहते हैं। अर्थात सुपर मून वह स्थिति है, जब चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है इसमें चन्द्रमा लगभग 14% ज्यादा बड़ा एवं 30% अधिक चमकीला दिखाई पड़ता है।

  • ब्लड मून (Blood Moon) एक परिघटना है जब पृथ्वी, चन्द्रमा पर पूर्ण छाया डालती है तब पूर्ण चन्द्रग्रहण की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें चन्द्रमा का रंग लाल हो जाता है। इसे ही ब्लड मून कहा जाता है।

  • ब्लू मून एक परिघटना है, जो एक सौर वर्ष में 12 चन्द्र माहो से कुछ अधिक दिन होने के कारण घटित होती है। एक चन्द्र माह लगभग 29.5 दिन का होता है। यदि कैलेंडर वर्ष 29.5´12 अर्थात 354 दिन का होता है तो इसमें 12 पूर्णिमाएं होती और कभी-कभी किसी वर्ष में 1 अतिरिक्त पूर्णिमा अर्थात ब्लू मून का आस्तित्व नही होता लेकिन एक वर्ष में 365*1/4 दिन होने के कारण प्रत्येक वर्ष में 12 पूर्णिमाओं के लिए आवश्यक 354 दिनों के बाद भी लगभग 11 दिन शेष बच जाते हैं। यही कारण है कि लगभग 2.7154 वर्ष में एक अतिरिक्त पूर्णिमा घटित होने के लिए आवश्यकत 29.5 दिन प्राप्त होते हैं। इस अतिरिक्त पूर्णिमा को ही ब्लू मून की संज्ञा दी जाती है।

  • अल्मनक के अनुसार, ब्लू मून एक खगोलीय मौसम मे एक अतिरिक्त पूर्णिमा के अस्तित्व की घटना है।

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  • खगोलीय मौसम एक वर्ष में चार हैं। 21 मार्च एवं 23 सितंबर (विषुव या इक्विनाक्स) तथा 21 जून एवं 22 दिसंबर (अयनांत या संक्रांति या साल्सटिस) इस मौसम की विभाजक तिथियां हैं। एक वर्ष में चार खगोलीय मौसम इस प्रकार होंगे –

  1. 21 मार्च से 20 जून

  2. 21 जून से 22 सितंबर

  3. 23 सितंबर से 21 दिसंबर

  4. 22 दिसंबर से 22 मार्च

  • प्रत्येक खंड लगभग 3 माह का है। प्रत्येक खंड में सामान्यतः 3 पूर्णिमाएं होती हैं किंतु प्रत्येक 2.7154 वर्ष में किसी एक खंड में सामान्यतः 3 पूर्णिमाएं होती हैं। किंतु प्रत्येक 2.7154 वर्ष में किसी एक खंड में 3 के बजाए 4 पूर्णिमाएं होती है। 4 पूर्णिमा वाला खंड ब्लू मून परिघटना वाला खंड होगा। इस खंड की 4 पूर्णिमाओं में से तृतीय को ब्लू मून कहा जाएगा। इस परिभाषा के आधार पर वर्ष 2010 के खगोलीय मौसम खंड 23 सितंबर से 22 दिसंबर के दौरान कुल 4 पूर्णिमाएं हुई- 25 सितंबर, 24 अक्टूबर,  21 नवंबर एवं 20 दिसंबर को 21 नवंबर, 2010 को घटित तीसरी पूर्णिमा  ब्लू मून थी। किसी ग्रह या उपग्रह पर किसी पिंड का भार उसके द्रव्यमान तथा उस ग्रह या उपग्रह के गुरुत्वीयकरण के गुणनफल के  बराबर होता है। पृथ्वी की अपेक्षा चन्द्रमा का गुरुत्वीकरण 1/6  होता है। इसलिए पृथ्वी से चन्द्रमा पर से लाने पर किसी वस्तु का भार घटकर उसके  भार का 1/6 हो जाता है।

  • चंद्रमा पर काले धब्बे वाले क्षेत्र को सी-ऑफ ट्रांक्विल्टी या शांति का सागर के नाम से जाना जाता है। चंद्रमा के इसी भाग में प्रथम समानव चंद्रयान अपोलो-11 अवतरित हुआ था। मानव ने चंद्रमा पर पहला कदम 20 जुलाई, 1969 को रखा था। अमेरिका के  अपोलो-11 मिशन द्वारा भेजे गए तीन अंतरिक्ष  यात्रियों में नील आर्मस्ट्रांग, माइकेल  कोलिंस और एडविन एल्ड्रिन ने  चंद्र तल पर अपने कदम रखे। अपोलो-11  मिशन 16  जुलाई, 1969 को  फ्लोरिडा से उड़ान भरके  चंद्रमा पर स्थित सी ऑफ ट्रांक्विलिटी पर 20 जुलाई, 1969 को उतरा था। 21 जुलाई, 1969 को चंद्रमा से पृथ्वी के लिए चला यह मिशन 22 जुलाई, 1969 को प्रशांत महासागर क्षेत्र में सफलतापूर्वक लौट आया। इस मिशन  द्वारा चंद्रमा की सतह के 47 पाउंड वजन के  पदार्थों को विश्लेषण के लिए पृथ्वी पर  लाया गया था।

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  • भारत द्वारा 22 अक्टूबर, 2008 को आंध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा स्थित सतीश  धवन अंतरिक्ष केन्द्र से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण PSLVC-11 के माध्यम से पहले चंद्रयान चंद्रयान-1 अपने 5 वें और अंतिम चरण के बाद चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कर गया। इस अभियान में भारत द्वारा निर्मित मानव रहित अंतरिक्ष यान मून इम्पैक्ट प्रोब को चंद्रमा की सतह पर उतारा  गया। चंद्रयान पर नजर रखने के लिए बंगलुरु से कुछ दूरी, पर ब्यालालू में इंडियन डीप स्पेस नेटवर्क  सेंटर की स्थापना की गई है.

  • चन्द्रयान-2 चन्द्रमा के लिए भारत का दूसरा मिशन पूरी तरह से स्वदेशी मिशन है। चन्द्रयान-2 मिशन में एक ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर शामिल होंगे। इसरो ने वर्ष 2018 के पहली छमाही के  दौरान GSLV-F10/चंद्रयान-2 मिशन योजना बनाई है।

  • सेलिनी का जापानी उपनाम कागुया है। चन्द्रमा की कक्षा में भेजा गया यह जापान का अंतरिक्ष यान था। इसे 14 सितंबर, 2007 को प्रक्षेपित किया गया  था। 1 वर्ष 8 माह तक  चन्द्रमा की कक्षा में सफलतापूर्वक परिक्रमा करने के पश्चात यह चन्द्रमा की सतह पर गिल क्रेटर के समीप स्वेच्छा से टकरा गया।

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क्षुद्र ग्रह

  • क्षुद्रग्रह (Asteroids) पथरीले और धातुओँ के ऐसे पिंड हैं, जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं। अधिकांश शुद्रग्रह बृहस्पति और मंगल के बीच की एक पट्टी (Asteroids) में स्थित हैं।

  • सभी क्षुद्रग्रह अनियमित आकार के होते हैं।

  • मंगल और बृहस्पति की कक्षाओं के बीच सूर्य के चारों ओर क्षुद्रग्रह परिक्रमारत हैं। अधिकांश क्षुद्रग्रह छोटे हैं किंतु कुछ का व्यास 1000 किमी. तक बड़ा है।

  • सौरमंडल में अवस्थितियों के अनुसार, क्षुद्रग्रहों को श्रेणीबध्द किया जाता है।

  • मुख्य पेटी (Main Belt) – यह सूर्य से 2-4 खगोलीय इकाइयों की दूरी पर मंगल और बृहस्पति ग्रहों के बीच स्थित चट्टानी टुकड़े होते हैं। इस समूह के प्रमुख क्षुद्रग्रह हंगेरियस (Hungarias), फ्लोरस (Floras), फोकिया (Phocaea), कोरोनिस (Koronis), इयोस (Eos), थेमिस (Themis), सिबेल्स (Cybeles)और हिल्डास (Hildas) हैं। पृथ्वी के निकट के क्षुद्रग्रह (NEAS) – इसमें एटेंस (Atens), अपोलोस (Apollos), अमोर्स (Amors) प्रमुख हैं।

  • ट्रॉजंस (Trojans) – यह बृहस्पति के लैंगरेज बिंदु के समीप स्थित है। इस पेटी के कुल सौ क्षुद्रग्रहों को पहचान जा चुका है।

  • इटली के खगोल शास्त्री पियाजे ने क्षुद्रग्रह सिरस की खोज की थी। पलास, जूनो तथा बेस्टा अन्य बड़े क्षुद्रग्रह हैं।

  • धूमकेतु सौरमंडली निकाय हैं जो पत्थर, धूल, बर्फ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे खंड होते हैं। ये ग्रहों के समान सूर्य की परिक्रमा करते हैं। धूमकेतु के तीन मुख्य भाग होते हैं –

  1. नाभि

  2. कोमा

  3. पूंछ

  • नाभि धूमकेतु का केन्द्र होता है, जो पत्थर और बर्फ का बना होता है। नाभि के चारों ओर गैस और धूल के बादल को कोमा कहते हैं। नाभि तथा कोमा से निकलने वाली गैस और धूल एक पूंछ का आकार ले लेती है। धूमकेतु मुख्यतः कूपर बेल्ट (Kuiper Belt) एवं ऊर्ट क्लाउड (Oort Cloud) में पाए जाते हैं। क्षुद्रग्रह पथरीले और धातुओं के ऐसे पिंड हैं, जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं. अधिकांश क्षुद्रग्रह बृहस्पति और मंगल के बीच की एक पट्टी में स्थित हैं.

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धूमकेतु एवं उल्का

  • धूमकेतु (Comets) या पुच्छल तारे, आकाशीय धूल, बर्फ और हिमानी गैसों के पिंड हैं, जो सूर्य से दूर ठंडे व अंधेरे क्षेत्र में रहते हैं। सूर्य के चारों ओर ये लंबी किंतु अनियमित या असमकेन्द्रित (Eccentric) कक्षा में घूमते हैं। धूमकेतु अपनी कक्षा में घूमते हुए कई वर्षों के पश्चात जब ये सूर्य के समीप से गुजरते हैं तो गर्म होकर इनमें गैसों की फुहारें निकलती हैं, जो एक लंबी चमकीली पूंछ के समान प्रतीत होती हैं। कभी-कभी ये पूंछ लाखों किमी. लंबी होती हैं।

  • धूमकेतु में सामान्यतः दो पुच्छ होती हैं –

  1. धूलकणों से युक्त

  2. आयोनाइज्ड

  • दोनों की उत्पत्ति कोमा (Coma) से होती है, विद्युत आवेशित कणों से युक्त आयोनाइज्ड पुच्छ सौर्यिक चुम्बकीय क्षेत्र से उत्पन्न चुम्बकीय बल के विशेष महत्व के कारण सूर्य की विपरीत दिशा में होती है और सौर हवाओं के सहारे आगे बढ़ती है, जबकि धूलकणों से युक्त सूर्य से उत्पन्न विकिरण दबाव में बढ़ती है। धूमकेतु की शीर्ष को कोमा कहते हैं। दीर्ष अवधि के धूमकेतु 70 से 90 वर्षों के अंतराल पर दिखाई पड़ता है। जैसे – हैली धूमकेतु पृथ्वी से 76 वर्षों के अंतराल में दिखाई देता है।

  • हेल-बॉप पुच्छल तारा/धूमकेतु है, जो 23 जुलाई, 1995 को बृहस्पति की कक्षा के बाहर चमक रहा था। इसकी खोज एलन हेल (Alan Hale) (न्यू मेक्सिको) और थामस बॉप (Thomas Bopp) (एरीजोना) ने किया था। दोनों खोजकर्ताओं के नाम के अंतिम शब्दों Hale और Bopp को मिलाकर इस पुच्छल तारे का नामकरण किया गया है। यह पुच्छल तारा हेली की अपेक्षा चमक में 1000 गुना अधिक था, जबकि दोनों की दूरियां लगभग समान हैं।

  • धूमकेतु शूमेकर लेवी-9 (Comet Shoe-maker Levy-9) की खोज 24 मार्च, 1993 को कैलीफोर्निया स्थित पॉलीमर वेधशाला के वैज्ञानिक केरोशील शूमेकर एवं कनाडा के डेविड लेवी द्वारा की गई थी। दोनों वैज्ञानिकों के नामों के अंतिम शब्दों शूमेकर एवं लेवी को संयुक्त कर इसका नामकरण किया गया है। ब्रह्माण्ड में विचरण करता यह धूमकेतु जैसे ही सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति के आकर्षण क्षेत्र में आया 16 से 22 जुलाई, 1994 के मध्य बृहस्पति से टकरा गया। इस टक्कर से बृहस्पति ग्रह को कोई नुकसान नही हुआ। सौरमंडल के दो घटकों के बीच देखी जाने वाली यह पहली टक्कर थी।

  • 67 पी/चुर्युमोव-गेरासिमेंको (67 P/Churyumov-Gerasimenko) नामक धूमकेतु के विस्तृत अध्ययन हेतु रोसेटा रोबोटिक मिशन को 2 मार्च, 2004 को एरियन 5G + रॉकेट द्वारा फ्रेंच गुयाना के कौरु स्थित प्रक्षेपण केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया था.

  • उल्का (Meteor), अंतरिक्ष में तीव्र गति से घूमते हुए अत्यंत सूक्ष्म ब्रह्मांडीय कण हैं। ये आकाश में प्रकाश की चमकती हुई चमकीली लकीर सदृश होते हैं, जिन्हें टूटने वाला तारा भी कहा जाता है। पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते ही घर्षण से ये चमकने लगते हैं और पृथ्वी पर पहुंचने से पूर्व ही सामान्यतः जलकर राख हो जाते हैं जिन्हें उल्काश्म कहते हैं। परंतु कुछ पिंड वायुमंडल के घर्षण से पूर्णतः जल नही पाते और चट्टानों के रुप में पृथ्वी पर आ गिरते हैं जिन्हें उल्कापिंड कहा जाता है।

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पृथ्वी

अक्षांश

  • भृ-पृष्ठ पर विषुवत रेखा या भूमध्य रेखा (Equator) के उत्तर या दक्षिण में एक याम्योत्तर (Meridian) पर किसी भी बिंदु को पृथ्वी के केन्द्र से मापी गई कोणीय दूरी, अक्षांश कहलाती है।

  • विषुवत वृत्त से ध्रुवों तक स्थित सभी समानांतर वृत्तों को अक्षांश रेखाएं कहा जाता है। अक्षांशों को सामान्यतः ग्रीक भाषा के अक्षर फाई (f) से प्रदर्शित किया जाता है।

  • शून्य अंश अक्षांश, जिसे विषुवत रेखा या भूमध्य रेखा भी कहा जाता है। यह रेखा पृथ्वी को दो गोलार्ध्दों उत्तरी या दक्षिणी में विभाजित करता है।

  • वृहत वृत्त (Great Circle) वह रेखा होती है, जो गोले (पृथ्वी) को दो समान परिधियों वाले गोलार्ध्दों में विभाजित करती है। पृथ्वी पर सभी देशांतरों के अतिरिक्त विषुवत रेखा भी वृहत वृत्त है। विषुवत रेखा के अतिरिक्त कोई भी अक्षांश वृहत वृत्त नही है क्योंकि वे विषुवत रेखा की अपेक्षा छोटे होते हैं।

  • 900 उत्तरी अक्षांश को उत्तरी ध्रुव तथा 900 दक्षिणी अक्षांश को दक्षिणी ध्रुव कहते हैं, जो केन्द्र बिंदु होते हैं।

  • उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्ध्दों में अक्षांश 00 से 900 पाया जाता है। इस प्रकार विषुवत रेखा (00) को लेकर कुल अक्षांशों की संख्या 181 होती है। 900 उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश चूंकि एक बिंदु है, इसी कारण अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 179 है।

  • उत्तरी गोलार्ध्दों में 23*1/20 उत्तरी अक्षांश रेखा को कर्क रेखा तथा 66*1/20 उत्तरी अक्षांश रेखा को उत्तरी उपध्रुव वृत्त कहा जाता है।

  • दक्षिणी गोलार्ध्द में 23*1/20 दक्षिणी अक्षांश रेखा को मकर रेखा तथा 66*1/20 दक्षिणी अक्षांश रेखा को दक्षिणी उपध्रुव वृत्त कहा जाता है।

  • शून्य अंश अक्षांश रेखा (विषुवत रेखा) एवं शून्य अंश देशांतर रेखा (प्रधान मध्यान रेखा) का मिलन अफ्रीका के पश्चिमी भाग पर स्थित गिनी की खाड़ी मे होता है। यह खाड़ी अटलांटिक महासागर (अंध महासागर) में स्थित है।

  • ग्लोब अथवा मानचित्रों पर किसी स्थान, शहर एवं देशों के उत्तरतम एवं दक्षितम अवस्थिति का निर्धारण अक्षांशों द्वारा होता है। 00 (भूमध्य रेखा) अक्षांश के उत्तर जिस स्थान का अक्षांश मान जितना अधिक होगा उसकी स्थिति सापेत्र रुप से कम अक्षांश वाले स्थान से उतनी ही अधिक उत्तर मानी जाती है। जैसे बीजिंग (चीन) – 39055‘N, नई दिल्ली -28038‘ N, न्यूयार्क-(USA)- 40045‘ N, तथा रोम (इटली) – 41054‘ N में सर्वाधिक उत्तर में स्थित नगर रोम होगा।

  • एक गोलार्ध्द से दूसरे हवाई जहाज से जाने के लिए ध्रुवों से होकर गुजरना पड़ता है। अतः 300 अक्षांश एवं 500 पूर्व देशांतर से उड़ान भरकर पृथ्वी पर विपरीत सिरे पर उतरने वाला कोई विमान उत्तरी ध्रुव के ऊपर से होकर उत्तरी गोलार्ध्द में ही 300 उत्तरी अक्षांश एवं 500 पश्चिमी देशांतरों पर उतरेगा।

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देशांतर

  • उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली रेखा को देशांतर रेखा कहते हैं। इन्हें Meridians of Longitude अथवा Lines of Longitude भी कहते हैं। सभी देशांतर रेखाएं लगभग भूमध्य रेखा जितनी लंबी होती हैं और वृहत वृत्त कहलाती हैं। जिस देशांतर रेखा के संदर्भ में अन्य देशांतर रेखाओं की गणना की जाती है उसे प्रधान मध्याह्न रेखा कहते हैं।

  • वाशिंगटन डी.सी. में 22 अक्टूबर, 1884 के हुई अंतरराष्ट्रीय बैठक में इंग्लैंड में लंदन के पूर्व में ग्रीनविच नामक स्थान पर स्थित रॉयल वेधशाला से गुजरने वाली देशांतर रेखा को प्रधान मध्याह्न माना गया और इसे ग्रीनविच मध्याह्न का नाम दिया गया। इस समय ग्रीनविच मध्याह्न को शून्य मानकर बाकी देशांतरों की गणना की जाती है। प्रधान मध्याह्न को 00 मानकर इसके पूर्व तथा पश्चिम में 1800 देशांतर रेखाएं खीची जाती हैं। इस प्रकार पूर्ण गोलाकार पृथ्वी पर कुल 3600 देशांतर होते हैं। जो देशांतर रेखाएं प्रधान मध्याह्न के पूर्व से खीचीं जाती हैं उन्हें पूर्वी देशांतर तथा जो देशांतर रेखाएं प्रधान मध्याह्न से पश्चिम में खींची जाती हैं उन्हें पश्चिमी देशांतर कहते हैं। 1800 पूर्वी तथा पश्चिमी देशांतर रेखा एक ही है। यह प्रधान मध्याह्न के विपरीत दिशा में होती है।

  • प्रधान मध्याह्न अर्थात ग्रीनविच रेखा से किसी स्थान की पूर्व अथवा पश्चिम की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का देशांतर कहते हैं।

  • देशांतर तथा समय का संबंध पृथ्वी के अक्ष पर उसके घूर्णन के कारण है। पृथ्वी अपने अक्ष पर 24 घंटे में एक चक्कर लगाती है और इस प्रक्रिया में 3600 घूम जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी एक घंटे में 3600/24=150 घूम जाती है। अतः यदि दो स्थान एक-दूसरे के 150 पूर्व अथवा पश्चिम में है, तो उनके समय में एक घंटे का अंतर होगा और जिन स्थानों के देशांतर में 10 का अंतर है उनके समय में 60/15=4 मिनट का अंतर होगा।

  • 1800 देशांतर रेखा को अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line) कहा जाता है क्योंकि इस देशांतर रेखा के दोनों ओर तिथियों में एक दिन का अंतर होता है। 1800 पूर्वी देशांतर एवं 1800 पश्चिमी देशांतर के बीच 24 घंटे का अंतर होता है। क्योकि जब हम ग्रीनविच के पूर्व में समय की गणना करते हैं तो 1800 पूर्व पर समय 12 घंटे आगे होता है। इसी प्रकार ग्रीनविच के पश्चिम का जाने में 1800 पश्चिमी पर समय 12 घंटे पीछे होता है। 1800 देशांतर के दोनों ओर दो अलग-अलग तिथियां पाई जाती हैं। जब इस रेखा से पूर्व की ओर जाते हैं तो एक दिन बढ़ाया जाता है और इस रेख से पश्चिम की ओर जाने पर एक दिन कम किया जाता है।

  • विश्व के 360 देशांतरों को 24 टाइम जोनों (15-15 देशांतर अंतराल पर) में विभाजित किया गया है अर्थात प्रत्येक टाइम जोन में 1 घंटे का तथा एक देशांतर में 4 मिनट का अंतर आता है।

  • प्रधान मध्याह्न रेखा (00 देशांतर) द्वारा अंतरराष्ट्रीय मानक समय का निर्धारण किया जाता है।

  • प्रधान मध्याह्न रेखा-

  1. यूनाइटेड किंगडम

  2. फ्रांस

  3. स्पेन

  4. अल्जीरिया

  5. माली

  6. बुर्किनाफासो

  7. टोंगा

  8. घाना

  9. अंटार्कटिका द.ध्रुव) से होकर गुजरती है।

  • ब्रिटेन के अतिरिक्त कुछ ऐसे देश हैं, जो GMT (Green wich Mean Time) से इतर होते हुई भी GMT के मानक समय का ही उपयोग करते हैं। ये इस प्रकार हैं – आइसलैंड, आयरलैंड, पुर्तगाल, कनारी द्वीप समूह (स्पेन), मारीतानिया, माली, सेनेगल, असेंसन द्वीप (ब्रिटेन) , गिनी बिसाऊ, गिनि, सिएरा, लिओन, लाइबेरिया, आइवरी कोस्ट, बुर्किनाफासो, टोगा, गाम्बिया, घाना।

  • भारत का मानक समय (82030‘ पूर्वी देशांतर) तथा GMT के मध्य 5.30 घंटे का अंतर है। रायल ग्रीनविच लैबोरेटरी की घोषणानुसार, भारत में नई सहस्त्रादि के सूर्योदय की प्रथम किरण निकोबार द्वीप के निकट स्थित कटचल द्वीप पर दिखाई दी। कटचल भारत की मुख्य भूमि से लगभग 1600 किमी. तथा पोर्ट ब्लेयर से 300 किमी. दक्षिण दक्षिण में 80 उत्तरी अक्षांश एवं 930-940 पूर्वी देशांतरों के मध्य अवस्थित है।

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  • अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा पृथ्वी पर ऐसी प्रतिबिंब रेखा होती है, जो दो क्रमागत कैलेंडर दिनों को अलग करती है। यह ग्रीनविच (इंग्लैंड) से 1800 विपरीत दिशा में प्रशांत महासागर से होकर गुजरती है। अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा को 8 स्थानों पर मोड़ दिया जाता है, ताकि एक ही स्थान पर तिथि को लेकर मतभेद की स्थिति न रहे। अलास्का के पास मोड़ दिए जाने के रास्तें पर दो स्थानों के बीच की दूरी घट-बढ़ जाती है। अतः ग्लोब पर दो स्थानों के बीच न्यूनतम दूरी अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा पार नही होती है।

  • अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा (1800 देशांतर) एवं भारत के मानक समय (82*1/20) के बीच 97.30 देशांतर का अंतर है।

  • बोरिंग जलडमरुमध्य अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा के समानांतर है।

विषुवत रेखा / भूमध्य रेखा

  • अक्षांश समानांतर पूर्व-पश्चिम दिशा में एक-दूसरे के समानांतर खींचे जाते हैं। उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव के मध्य अर्थात दोनों ध्रुवों से समान दूरी पर खीचीं गई काल्पनिक रेखा को विषुवत वृत्त कहते हैं। भूमध्य रेखा वृत्त ग्लोब को दो बराबर भागों में बांटता है और सभी अक्षांश समानांतरों से बड़ा होता है। अतः इसे वृहत वृत्त कहते हैं।

  • विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर अक्षांश समानांतरों की लंबाई उत्तरोत्तर घटती जाती है।

  • पृथ्वी की भूमध्य रेखा की कुल लंबाई लगभग 40045 किमी. (24901 मील) है। इसकी कुल लंबाई का 78.7% भाग जलीय, जबकि 21.3% भाग स्थलीय है।

  • विषुवत रेखा/भूमध्य रेखा पर वार्षिक तापांतर सबसे कम पाया जाता है अर्थात यहां लगभग वर्ष भर सूर्य की किरणें लम्बवत पड़ने से उच्च एवं निम्न तापमान मे ज्यादा अंतर नही आ पाता है। इन क्षेत्रों में कोई शीत ऋतु नहीं होती है।

  • स्थल एवं जल पर विषुवत रेखा (Equator Line) कुल 13 देशों से होकर गुजरती है इन देशों में –

  1. ब्राजील

  2. इक्वेडार

  3. कोलम्बिया

  4. साओ टोम और प्रिंसिप

  5. कांगो गणराज्य

  6. युगांडा

  7. सोमालिया

  8. गैबन

  9. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य

  10. केन्या

  11. इंडोनेशिया

  12. मालदीप

  13. किरिबाती है।

  • कोलम्बों 6055‘30“ अक्षांश पर, जकार्ता 6008‘ दक्षिणी अक्षांश पर, मनीला 14035‘30“ अक्षांश पर तथा सिंगापुर 1018‘30“ अक्षांश पर अवस्थित है। सिंगापुर भूमध्य रेखा से मात्र 137 किमी. की दूरी पर स्थित है।

  • पृथ्वी की भूमध्य रेखा (Equator) की कुल लंबाई लगभग 40045 किमी. (24901 मील) है।

  • भूमध्य रेखा, कर्क रेखा तथा मकर रेखा तीनो अफ्रीका महाद्वीप से गुजरती हैं। द. अमेरिका महाद्वीप से भूमध्य तथा मकर रेखा गुजरती है।

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कर्क रेखा

  • उत्तरी गोलार्ध्द में 23*1/20 उत्तरी अक्षांश रेखा को कर्क रेखा (Tropic of Cancer) कहा जाता है। पृथ्वी के अक्षीय झुकाव (Axial Inclination) तथा परिक्रमण गति के कारण पृथ्वी के गोलार्ध्द में 23*1/20 उत्तरी अक्षांश पर स्थित कर्क रेखा 21 मार्च से सूर्य की ओर उन्मुख होना प्रारंभ करती है। 3 माह बाद 21 जून को कर्क रेखा सूर्य के ठीक सामने होती है अर्थात इस तिथि को सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है। 21 जून की इस तिथि को कर्क संक्रांति या ग्रीष्म अयनांत कहते हैं।

  • कर्क रेखा विश्व के जिन देशों से होकर गुजरती हैः ये इस प्रकार हैं –

  • हवाई द्वीप (USA)

  • बहमास,

  • मॉरीतानिया

  • अल्जीरिया

  • लीबिया

  • मिस्त्र

  • भारत

  • म्यांमार

  • ओमान

  • मेक्सिकों

  • माली

  • नाइजर

  • चाड

  • सऊदी अरब

  • संयुक्त

  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE)

  • बांग्लादेश

  • चीन

  • ताइवान

  • मकर संक्रांति 22 दिसंबर को उस समय होती है जब मकर रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत पड़ती हैं। चूंकि पृथ्वी अपने अक्ष पर 23*1/20 झुकी हुई है, इसलिए मकर रेखा पर जब 900 सूर्य का उन्नतांश कोण होगा, ठीक इसी प्रकार कर्क रेखा पर 900-470=430 का कोण बनेगा। मकर रेखा से कर्क रेखा के मध्य अंतर 23*1/20+23*1/20 = 470 है।

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मकर रेखा

  • दक्षिणी गोलार्ध्द में 23*1/20 दक्षिणी अक्षांश रेखा को मकर रेखा (Tropic of Capricorn) कहा जाता है। सूर्य की किरणें मकर रेखा (23.50 द. अक्षांश) पर लंबवत 21/22 दिसंबर को चमकती हैं। इस दिन दक्षिणी गोलार्ध्द का सबसे बड़ा दिन होता है। इस दौरान दक्षिणी गोलार्ध्द में निम्न वायुदाब अर्थात ग्रीष्म ऋतु होती है। इसी समय उत्तरी गोलार्ध्द में उच्च वायुदाब अर्थात ग्रीष्म ऋतु होती है क्योंकि कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं। चूंकि कर्क रेखा (23.5 उत्तरी अक्षांश) भारत के लगभग मध्य से होकर गुजरती है। इसलिए इस  दौरान उत्तर-पश्चिम भारत में भी उच्च वायुदाब विकसित होता है।

  • मकर रेखा- ब्राजील, पराग्वे, अर्जेंटीना, चिली, फ्रेंच पोलीनेशिया (फ्रांस), बोत्सवाना, आस्ट्रेलिया, मेडागास्कर, मोजाम्बिक, द. अफ्रीका, टोंगा, एवं नामीबिया से होकर गुजरती है।

दिन-रात

  • पृथ्वी सौरमंडल में दो प्रकार से गति करती है –

  1. घूर्णन गति (Rotation) – इसे दैनिक गति भी कहते हैं।

  2. परिक्रमण (Revolution) – इसे वार्षिक गति भी कहते हैं।

  • पृथ्वी सदैव अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमती रहती है, जिसे पृथ्वी का घूर्णन कहते हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.50 झुकी है इसलिए सदैव दिन रात बराबर नही होता है। विषुवत रेखा पर सदैव दिन-रात बराबर होता है, क्योकि इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बांटता है।

  • 21 मार्च से 23 सितंबर की अवधि में उत्तरी गोलार्ध्द सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है। अतः यहां दिन बड़े एवं रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं,  दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है। उत्तरी ध्रुव पर दिन की अवधि छः महीने की होती है।

  • 23 सितंबर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्ध्द में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है। जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर जाते हैं वैसे ही दिन की अवधि भी बढ़ती है। दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने का दिन होता है।

  • पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन के साथ सूर्य के चारों ओर दीर्घ वृत्ताकार मार्ग पर लगभग 365 दिन, 6 घंटे में एक चक्कर लगाती है। अतः  पृथ्वी की सूर्य के सापेक्ष स्थितियां बदलती रहती हैं पृथ्वी के परिक्रमण में चार मुख्य अवस्थाएँ आती हैं तथा इन्हीं विभिन्न अवस्थाओं में ऋतु परिवर्तन होते हैं।

  • संक्रांतियां (Solistices) वर्ष में दो बार होती हैं –

  1. ग्रीष्म संक्रांति (Summer Solistice) – 20/21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है। इस स्थिति को ग्रीष्म संक्रांति कहते हैं। 20/21 जून को उत्तरी गोलार्ध्द में दिन की लंबाई सबसे अधिक रहती है। इस अवस्था को कर्क संक्रांति भी कहा जाता है। इस दिन दक्षिणी गोलार्ध्द में दिन की लंबाई सबसे कम रहती है।

  2. शीत संक्रांति (Winter Solstice) – 21/22 दिसंबर को सूर्य मकर रेखा पर लंबवत चमकता है इस स्थिति को शीत संक्रांति कहते हैं। इस स्थिति में उत्तरी गोलार्ध्द मे दिन की लंबाई सबसे कम रहती है। इस अवस्था को मकर संक्रांति भी कहा जाता है। इस समय दक्षिणी गोलार्ध्द में दिन की लंबाई सबसे लंबी होती है।

  • 20/21 मार्च को वसंत विषुव के समय तथा 22/23 सितंबर को शरद विषुव के समय दिन-रात बराबर होता है। इन स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लंबवत चमकता है। पृथ्वी के अक्षीय झुकाव तथा परिक्रमण गति के कारण पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध्द में 23*1/20 उत्तरी अक्षांश पर स्थित कर्क रेखा 21 मार्च से सूर्य की ओर उन्मुख होना प्रारंभ करती है। 3 माह पश्चात 21 जून को कर्क रेखा सूर्य के ठीक सामने होती है। अर्थात इस तिथि को सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत चमकता है। किसी वस्तु की छाया पृथ्वी की सूर्य से दूरी तथा उस वस्तु के सूर्य़ के प्रकाश से बनने वाले कोण पर निर्भर करती है। सबसे छोटी छाया तब बनेगी जब कोण सबसे कम बनेगा। ग्रीष्म अयनांत की 21 जून की तिथि को ठीक 12 बजे कर्क रेखा पर सूर्य सबसे दूरी से लंबवत चमकेगा अर्थात उन स्थानों पर वस्तु से शून्य या शून्य से कुछ अधिक अंश का कोण बनेगा। पृथ्वी यदि सभी स्थानों पर समतल होती अर्थात इसकी आकृति चपटी होती, तो कर्क रेखा पर सभी स्थानों पर 12 बजे (21 जून को) शून्य अंश का कोण बनता लेकिन वक्राकार होने के कारण मूल स्थान से  हटकर अन्य स्थानों पर 0 से अधिक अंश का कोण बनेगा। 0 अंश का कोण बनने पर छाया एकदम नही बनेगी। कर्क रेखा से विचलन के अनुरूप छाया का आकार भी बढ़ेगा-घटेगा। यह उत्तरी गोलार्ध्द में 21 जून को अन्य दिनों की तुलना में न्यूनतम होगा।

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पृथ्वी की उत्पत्ति

  • पृथ्वी सौरमंडल का एक ग्रह है और इसकी उत्पत्ति अन्य ग्रहों की उत्पत्ति से भिन्न नही हो सकती है। इस विषय में विभिन्न विद्वानों के विभिन्न विचार प्रकट किए हैं। इनमें से एक प्रारंभिक मत इमैनुअल कान्ट (Immanuel Kant) का है। इन्होंने गैसीय राशि सिध्दांत प्रस्तुत किया। 1796 ई. में लाप्लास ने इसका संशोधन प्रस्तुत किया, जो निहारिका परिकल्पना के नाम से जाना जाता है। 1900 ई. में चेम्बरलेन और मोल्टन ने कहा कि ब्रह्माण्ड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के नजदीक से गुजरा। इसके परिणामस्वरुप तारे के गुरुत्वाकर्षण से सूर्य-सतह से सिगार के आकार का कुछ पदार्थ निकलकर अलग हो गया। यह तारा जब सूर्य से दूर चला गया तो सूर्य-सतह से बाहर निकला हुआ यह पदार्थ सूर्य के चारों तरफ घूमने लगा और यही धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रुप में परिवर्तित हो गया। ब्रिटेन के प्रसिध्द वैज्ञानिक सर जेम्स जींस