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आर्थिक एवं सामाजिक विकास

 

 

 

STUDY FOR CIVIL SERVICES-GYAN

MOST IMPORTANT INDIAN ECONOMY  GK SUMMARY GENERAL KNOWLEDGE NOTES ECONOMICS  FOR ALL COMPETITIVE EXAMS INCLUDING  UPSC STATE PCS SSC UPSSSC AND OTHER ONE DAY GOVERNMENT EXAMS

 

आर्थिक विकास

भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरुप

  • अंग्रेजों से पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति ग्रामीण थी तथा व्यवस्था अविकसित थी।

  • गांव एक पृथक इकाई थी तथा व्यवसाय वंशानुगत था। यहां का प्रमुख व्यवसाय कृषि था, लेकिन उद्योग के क्षेत्र में भी यह उन्नत था।

  • भारत द्वारा उत्पादित रेशमी व सूती वस्त्र, विश्व में उत्तम क्वालिटी के माने जाते थे।

  • यहां संगमरमर का कार्य, नक्काशी का कार्य, सोने-चांदी के आभूषण व पत्थर पर तराशी का कार्य बहुत ही उत्तम किस्म का होता था। अतः इनका निर्यात किया जाता था।

  • निर्यात की वस्तुओं में नील, अफीम व मसाले भी शामिल थे। इस प्रकार सत्रहवीं व अठ्ठारहवीं शताब्दियों तक भारतीय अर्थव्यवस्था अपने परंपरागत स्वरुप में गतिमान रही।

  • अंग्रजों ने भारत पर न केवल राज्य किया, बल्कि इसको एक उपनिवेश बना दिया।

  • उपनिवेश का अर्थ है कि इस देश को किसी प्रकार की राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त नही थी तथा इसकी आर्थिक गतिविधियों पर उनका सीधा नियंत्रण था।

  • भारत पर 1857 से 1858 तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने तथा इसके बाद 1858 से 1947 तक ब्रिटिश सरकार ने शासन किया।

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ी, अल्पविकसित, गतिहीन व सुस्त अर्थव्यवस्था थी।

  • किसी भी देश का विकास उस देश की कृषि एवं उद्योगों पर आधारित होता है। कृषि के लिए शक्ति, साख, परिवहन आदि चाहिए तो उद्योगों के लिए मशीनरी, विपणन, सुविधा, परिवहन, संदेशवाहन आदि यदि कोई देश तेजी से विकास करना चाहता है, तो उसे इस आधारभूत ढांचे में –

  1. शक्ति – कोयला, तेल, सूर्यशक्ति, वायु आदि।

  2. संदेशवाहन – डाक, तार, टेलीफोन, रेडियो, बेतार का तार आदि।

  3. बैंक, वित्त व बीमा

  4. विज्ञान व तकनीक

  5. कुछ सामाजिक मद जैसे – शिक्षा, स्वास्थ्य हैं।

  • स्वतंत्रता के समय उपरोक्त सभी आधारभूत ढांचे की कमी थी।

  • स्वतंत्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था ब्रिटेन की एक कॉलोनी का रुप ले चुकी थी। कृषि उदास थी, किसान गरीब थे, कृषि उत्पादकता विश्व में सबसे कम थी। संगठित उद्योग थोड़े थे, लेकिन बड़े शहरों में केन्द्रित थे, भारी एवं आधारभूत उद्योग नही थे।

  • यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक पहलू उसके अल्पविकसित स्वरुप का बोध कराता है, किंतु नियोजन काल की अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरुप मे कुछ मूलभूत परिवर्तन हुए हैं, जिनके आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था को विकासोन्मुख कहा जा सकता है।

  • स्वतंत्रता प्राप्त के पश्चात भारत में आर्थिक नियोजन को विकास का आधार बनाया गया है।

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  • सभी योजनाओं का प्रमुख एवं मौलिक उद्देश्य देश में समन्वित एवं संतुलित विकास को प्रोत्साहित करना रहा है।

  • नियोजन काल में कृषि, उद्योग, व्यापार, सभी क्षेत्रों में विकास के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए तथा भारत की गरीबी एवं बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने का प्रयास किया गया।

  • नियोजना काल में भारतीय अर्थव्यवस्था का संस्थागत ढांचा पर्याप्त रुप मे विकसित हुआ है। बढ़ता सार्जनिक विकास व्यय, बैंक एवं बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण, ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़क एवं रेल पहिवहन का विकास, कृषि का मशीनीकरण एवं हरित क्रांति, औद्योगिक विस्तार, बढ़ती शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं आदि अनेक विकासोन्मुख घटक हैं।

  • भारतीय नियोजन अवधि में अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में उत्पादन में पर्याप्त विकास हुआ है।

  • नियोजन काल में कृषि उत्पादन बढ़ा है, आधारभूत उद्योगों की स्थापना हुई है।

  • लोहा, इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, रसायन उर्वरक आदि सभी उद्योगो का नियोजन काल मे तीव्र विकास हुआ है, जिससे भारत का आयात कम हुआ है और विदेशी निर्भरता में कमी आई है।

  • भारतीय नियोजन के मौलिक उद्देश्यों में समाजवादी अर्थव्यवस्था की झलक मिलती है। समाज में व्याप्त आर्थिक विषमता एवं शोषण को समाप्त करने के लिए नियोजन काल में अनेक कदम उठाए गए हैं। जैसे – जमींदारी उन्मूलन भूमि पर कृषि को अधिकार दिलाना, बंधुआ प्रथा समाप्त करना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विस्तार करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना, सहकारी आंदोलन का विकास, समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम लागू करना, किसानों की ऋण मुक्ति घोषणा आदि।

  • उपर्युक्त विकासोन्मुख तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत यद्यपि अपनी विकसित अवस्था तक नही पहुंच पाया है, फिर भी भारतीय अर्थव्यवस्था एक विकासशील अर्थव्यवस्था है, जहां आर्थिक विकास के समन्वित एवं नियोजनबध्द प्रयास जारी हैं।

  • ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें निजी एवं सार्वजनिक दोनों क्षेत्र विद्यमान होते हैं मिश्रित अर्थव्यवस्था कहलाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था, मिश्रित अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख उदाहरण है।

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  • भारत में जनसंख्या की अधिकता के कारण ही इसे एक श्रम-आधिक्य वाली अर्थव्यवस्था के रुप में परिभाषित किया जाता है।

  • उद्योग की प्रधानता, विकसित अर्थव्यवस्था का अभिक्षण है, चूंकि भारत की अर्थव्यवस्था विकासशील है। अतः यह भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषता नही।

  • आर्थिक विकास के निर्धारक तत्व –

आर्थिक तत्व-

  • प्राकृतिक साधन

  • श्रम शक्ति व जनसंख्या

  • पूंजी निर्माण

  • तकनीक तथा नवाचार

  • पूंजी उत्पाद अनुपात

  • संगठन

अनार्थिक तत्व –

  • सामाजिक घटक

  • धार्मिक घटक

  • राजनीतिक घटक

  • अंतरराष्ट्रीय

  • वैज्ञानिक घटक

  • भारतीय अर्थव्यवस्था विकासशील अर्थव्यवस्था है। विकासशील अर्थव्यवस्था में उत्पादन का ढांचा, उत्पादन के स्वरुप एवं उत्पादित वस्तुओं में परिवर्तन होता है तथा सामाजिक संबंधों में भी विकास के साथ-साथ परिवर्तन होता है।

  • भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) के स्वरुप को अपनाया गया है। मिश्रित अर्थव्यवस्था के तहत सार्वजनिक (Public) एवं निजी (Private) दोनों क्षेत्रों की देश के विकास कार्यक्रमों में भागदारी होती है। सार्वजनिक क्षेत्र का प्रशासन जहां राज्य (State) करता है वहीं निजी क्षेत्र का प्रशासन व्यक्ति (Person) के साथ में होता है। इस प्रकार विकास का भारतीय मॉडल राज्य एवं व्यक्ति दोनों के हितों की रक्षा करता है।

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राष्ट्रीय आय

आर्थिक  (देशीय) सीमा की संकल्पना

  • राष्ट्रीय आय लेखांकन समष्टि अर्थशास्त्र की एक शाखा है और राष्ट्रीय आय तथा संबंधित समुच्चयों का आकलन इसका एक भाग है। राष्ट्रीय आय और इससे संबंधित कोई भी समुच्चय एक देश की उत्पादन क्रियाओं का माप है।

आर्थिक सीमा

  • संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसारः आर्थिक सीमा एक देश की सरकार द्वारा प्रशासित वह भौगोलिक सीमा है जिसमें व्यक्तियों, वस्तुओं और पूंजी का निर्बाध संचालन होता है। इस परिभाषा का आधार व्यक्तियों, वस्तुओं और पूंजी के संचलन की स्वतंत्रता है।

आर्थिक सीमा का क्षेत्र

  1. देश की राजनीतिक सीमा (समुद्री सीमा और आकाशी क्षेत्र सहित)

  2. देश के विदेशों में दूतावास, वाणिज्य दूतावास तथा सैनिक प्रतिष्ठान।

  3. देश के निवासियों द्वारा दो या दो से अधिक देशों के मध्य चलाए जाने वाले जलयान व वायुयान।

  4. मछली पकड़ने की नौकाएं, तेल व प्राकृतिक गैस यान, जो अंतरराष्ट्रीय जलसीमाओं में या उन क्षेत्रों में चलाए जाते हैं जिन पर देश का अनन्य अधिकार है।

  • राष्ट्रीय आय समुच्चयों की दो श्रेणियां होती हैं – देशीय और राष्ट्रीय यानि देशीय उत्पाद और राष्ट्रीय उत्पाद। एक देश की आर्थिक सीमा में स्थित उत्पादन इकाइयों द्वारा किया गया उत्पादन देशीय उत्पाद कहलाता है।

 

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निवासी की संकल्पना

  • नागरिक और निवासी दो भिन्न शब्द हैं। एक व्यक्ति एक देश का नागरिक हो सकता है और किसी अन्य देश का निवासी। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे भारत के नागरिक हैं और जिस देश में रहते हैं उसके निवासी हैं।

निवासी की परिभाषा

  • एक व्यक्ति या एक संस्था, उस देश का निवासी कहलाता है जिस देश में रहता है, या स्थित है, व उसी की आर्थिक सीमा मे उसके आर्थिक हित का केन्द्र है।

  • “आर्थिक हितों का केन्द्र” मे दो बाते शामिल होती हैं –

  1. वह निवासी (व्यक्ति या संस्था) उस देश की आर्थिक सीमा में रहता है (या स्थित है)।

  2. उसकी कमाने, खीच करने और संचय करने की आर्थिक क्रियाएं वहीं से होती हैं।

  • एक देश के निवासियों द्वारा किया गया उत्पादन, राष्ट्रीय उत्पाद कहलाता है। यह उत्पादन चाहे उस देश की आर्थिक सीमा में किया गया हो या उससे बाहर।

  • इसकी तुलना में, उन सभी उत्पादन इकाइयों द्वारा किया गया उत्पादन जो एक देश की आर्थिक सीमा में स्थित है, देशीय उत्पाद कहलाता है, चाहे यह उत्पादन निवासियों द्वारा किया गया हो या गैर-निवासियों द्वारा किया गया है।

राष्ट्रीय उत्पाद और देशीय उत्पाद में संबंध

  • किसी देश की आर्थिक सीमा में किया गया कुल उत्पादन “घरेलू उत्पाद’ होता है। किसी देश के निवासियों द्वारा किया गया कुल उत्पादन ‘राष्ट्रीय उत्पाद’ होता है।

  • राष्ट्रीय उत्पाद =       देशीय उत्पाद  +    देश के निवासियों द्वारा आर्थिक सीमा से बाहर किया गया उत्पादन     –   देश की आर्थिक सीमा मे गैर-निवासियों द्वारा किया गया उत्पादन 

या

राष्ट्रीय उत्पाद =       देशीय उत्पाद +    विदेशों से प्राप्त कारक आय  –    विदेशो को दी गई कारक आय

या

राष्ट्रीय उत्पाद     =       देशी उत्पाद   +         विदेशों से निबल कारक आय

  • यदि विदेशों से प्राप्त कारक आय, विदेशों को दी गई कारक आय से अधिक होती है, तो विदेशों से निबल कारक आय धनात्मक होगी।

  • यदि विदेशों से प्राप्त कारक आय, विदेशों की दी गई कारक आय से कम होती है, तो विदेशों से निबल कारक आय ऋणात्मक होगी।

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औद्योगिक वर्गीकरण

  • उत्पादन इकाईयों का अलग-अलग औद्योगिक समूहों या क्षेत्रफलों में समूहीकरण औद्योगिक वर्गीकरण कहलाता है।

  • प्राथमिक क्षेत्र – इस क्षेत्रक में उन उत्पादन इकाइयों को शामिल किया जाता है, जो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से उत्पादन करती हैं जैसे – कृषि, पशुपालन, मछली पकड़ना खनिज निकालना, वानिकी आदि। इनसे द्वीतीयक क्षेत्रक के लिए कच्चा माल मिलता है।

  • द्वीतीयक क्षेत्रक – इस क्षेत्रक में वे उत्पादन इकाइयां शामिल की जाती हैं, जो एक प्रकार की वस्तु को दूसरे प्रकार की वस्तु में परिवर्तित करती हैं। कारखानें, निर्माण, बिजली उत्पादन, जल आपूर्ति आदि इसके कुछ उदाहरण हैं।

  • तृतीयक क्षेत्रक – इसे सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं, इसके अंतर्गत सेवाएं उत्पादन करने वाली उत्पादन इकाइयां आती हैं। परिवहन, व्यापार, शिक्षा, होटल, सरकारी प्रशासन, वित्त आदि इसके कुछ उदाहरण हैं।

  • राष्ट्रीय आय लेखांकन में राष्ट्रीय आय संबंधी बहुत से समुच्चय होते हैं –

  1. देशीय व राष्ट्रीय

  2. सकल व निबल

  3. कारक लागत पर आकलित और बाजार कीमत पर आकलित

निबल राष्ट्रीय व देशीय उत्पाद

निबल देशीय उत्पाद    =       सकल देशीय उत्पाद       –   मूल्य ह्रास

निबल राष्ट्रीय उत्पाद   =       सकल राष्ट्रीय उत्पाद   –   मूल्य ह्रास

  • बाजार कीमत पर आकलन और साधन लागत पर आकलन –

साधन लागत पर देशीय उत्पाद   =         बाजार मूल्य पर देशीय उत्पाद – अप्रत्यक्ष कर + सरकारी सहायता (आर्थिक सहायता)

  • अप्रत्यक्ष कर और सरकारी सहायता के अंतर को निबल अप्रत्यक्ष कर कहते हैं।

निबल अप्रत्यक्ष कर    =       अप्रत्यक्ष कर – सरकारी सहायता

  • साधन लागत पर राष्ट्रीय उत्पाद को राष्ट्रीय आय कहते हैं।

राष्ट्रीय आय  =       बाजार मूल्य पर सकल देशीय उत्पाद – मूल्यह्रास – निबल अप्रत्यक्ष कर + विदेशों से निबल कारक आय

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राष्ट्रीय आय के आकलन की विधियां

  • राष्ट्रीय आय के चक्रीय प्रवाह से हमें इसके आकलन की तीन विधियां मिलती हैं –

  • उत्पादन (मूल्य संवृध्दि) विधि

  • आय विधि

  • व्यय विधि

  • उत्पादन (मूल्य संवृध्दि) विधि – इसके अंतर्गत पहले हम प्रत्येक क्षेत्रक में बाजार कीमत पर सकल मूल्य संवृध्दि ज्ञात करते हैं और सभी क्षेत्रकों की इस मूल्य संवृध्दि का योग करने में हमे बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद ज्ञात हो जाता है।

  • आय विधि – इस विधि के अंतर्गत पहले क्षेत्रक द्वारा किए गए कुल कारक भुगतान का आकलन करते हैं। फिर तीनों क्षेत्रकों के कारक भुगतानों का योग करने से हमें साधन लागत पर निबल मूल्य वृध्दि (देशीय उत्पाद) या देशीय कारक आयत ज्ञात हो जाती है।

  • देशीय कारक आय (कारक भुगतान) के निम्नलिखित घटक होते हैं –

  1. कर्मचारियों का पारिश्रमिक

  2. किराया और रायल्टी

  3. ब्याज

  4. लाभ

  • मिश्रित आय से तात्पर्य है, सारे कारकों की सम्मिलित आय। अतः

  • साधन लागत पर निबल देशीय उत्पाद = कर्मचारियों का पारिश्रमिक +   किराया व रायल्टी + ब्याज + मिश्रित आय (यदि हो)

व्यय विधि

  • इस विधि के अंतर्गत हम उपभोग और निवेश पर किए गए व्यय का जोड़ लेते हैं। यह व्यय देशीय उत्पाद पर किया गया व्यय होता है। इसके विभिन्न घटक हैं –

  1. निजी अंतिम उपभोग व्यय

  2. सरकारी अंतिम उपभोग व्यय

  3. सकल देशीय पूंजी निर्माण

  4. निबल निर्यात (निर्यात-आयात)

प्रयोज्य आय

  • उपभोग व्यय और बचत के लिए उपलब्ध आय को प्रयोज्य आय कहते हैं। इसमें कारक आय और हस्तांरण (गैस-कारक आय) दोनों शामिल होती हैं। राष्ट्रीय आय में केवल कारक आय शामिल की जाती है। यदि राष्ट्रीय आय ज्ञात हो, तो प्रयोज्य आय ज्ञात की जा सकती है।

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राष्ट्रीय प्रयोज्य आय

  • राष्ट्रीय प्रयोज्य आय से संबंधित दो समुच्चय होते हैं –

  1. सकल राष्ट्रीय प्रयोज्य आय

  2. निबल राष्ट्रीय प्रयोज्य आय

सकल राष्ट्रीय प्रयोज्य आय =     राष्ट्रीय आय + निबल अप्रत्यक्ष कर + मूल्य ह्रास + विदेशों से निबल चालू हस्तांतरण

भारत के संबंध में

  • किसी राष्ट्र के नागरिकों द्वारा एक वर्ष की अवधि में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य राष्ट्रीय आय कहलाता है।

  • राष्ट्रीय आय की गणना तीन विधियों से की जाती है –

  1. उत्पादन विधि – समस्त संसाधनों द्वारा कुल अंतिम उत्पादन।

  2. आय विधि – समस्त संसाधनों द्वारा अर्जित कुल आय।

  3. व्यय विधि – समस्त उपभोग / व्ययों का योग।

  • भारत में राष्ट्रीय आय का सर्वप्रथम अनुमान दादा भाई नौरोजी ने 1868 ई. में लगाया था।

  • स्वतंत्रता पूर्व भारत में विलयम डिग्वी, फिंडले शिराज, शाह एवं खम्भाता, आर.सी. देसाई, बी. नटराजन आदि ने भी राष्ट्रीय आय का अनुमान प्रस्तुत किया।

  • स्वतंत्रता पूर्व सर्वाधिक वैज्ञानिक अनुमान वर्ष 1931-32 में वी.के. आर. वी. राव द्वारा प्रस्तुत किया गया।

  • स्वतंत्रता के पश्चात भारत में राष्ट्रीय आय की गणना हेतु वर्ष 1949 में पी.सी. महालनोविस की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आय समिति गठन किया गया।

  • तीन सदस्यीय इस समिति में डी.आर. गाडगिल एवं वी.के.आर.वी. राव भी सदस्य थे।

  • इस समिति द्वारा वर्ष 1951 में पहली, जबकि वर्ष 1954 में दूसरी रिपोर्ट प्रस्तुत किया गया।

  • वर्तमान मे राष्ट्रीय आय की गणना केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) द्वारा की जाती है।

  • CSO केन्द्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अधीन कार्य करती है।

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राष्ट्रीय आय की अवधारणाएं

  1. सकल घरेलू उत्पाद (GDP)

  • किसी देश की भौगोलिक सीमा के भीतर एक वित्तीय वर्ष में उत्पादित समस्त अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य उस देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहलाता है।

  • वर्तमान में क्रय शक्ति क्षमता (PPP) के आधार पर भारत की GDP विश्व की तीसरी (चीन एवं USA के बाद) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

  • वास्तविक जीडीपी में भारत 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।

  • भारत से बड़ी पांच अर्थव्यवस्थाएं क्रमशः (घटते क्रम में) –

यूएसए

चीन

जापान

जर्मनी

यूनाइटेड किंगडम

  • 31 मई, 2018 के जारी अनंतिम अनुमान के अनुसार वर्ष 2017-18 में स्थिर कीमतों (2011-12) पर भारत का सकल घरेलू उत्पाद 6.7 प्रतिशत की वृध्दि के साथ 130.11 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

  • वहीं चालू कीमतों पर भारतीय जीडीपी वर्ष 2017-18 में 10.0 प्रतिशत की वृध्दि के साथ 167.73 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

  1. सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP)

  • किसी देश के नागरिकों (निवासी एवं अनिवासी दोनों) द्वारा किसी वित्तीय वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को उस देश का सकल राष्ट्रीय उत्पाद GNP कहा जाता है।

  • सकल राष्ट्रीय आय की गणना में विदेश में कार्यरत देश के नागरिकों की आय को जोड़ा जाता है, जबकि देश के भीतर कार्यरत विदेशी व्यक्तियों की आय को घटा दिया जाता है।

GNP = GDP + विदेश से अर्जित शुध्द आय

  • वर्ष 2017-18 हेतु जारी अनंतिम अनुमान में भारत की सकल राष्ट्रीय आय (GNI) स्थिर कीमतों पर 6.7 प्रतिशत की वृध्दि के साथ 128.64 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

  • चालू कीमतों पर भारत की GNI वर्ष 2017-18 में 10 प्रतिशत की वृध्दि के साथ 165.87 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

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  1. शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद (NNP)

  • सकल राष्ट्रीय उत्पाद में से मूल्य ह्रास को घटा देने पर शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद प्राप्त होता है।

  • साधन लागत पर शुध्द राष्ट्रीय उत्पाद को ही राष्ट्रीय आय कहा जाता है।

  • वर्ष 2017-18 में भारत की राष्ट्रीय आय (NNI)8 प्रतिशत की वृध्दि के साथ 114.06 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

  • जबकि वर्ष 2017-18 में अनंतिम अनुमान में चालू कीमतों पर राष्ट्रीय आय (NNI)1 प्रतिशत की वृध्दि के साथ 148.49 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

  • वर्ष 2017-18 में भारत की प्रतिव्यक्ति आय स्थिर कीमतों पर 86668 रुपये, जबकि चालू कीमतों पर 112835 रुपये अनुमानित (अनंतिम अनुमान) है।

  • निवल अप्रत्यक्ष कर (INT) = अप्रत्यक्ष कर – Subsidy

  • NDP(FC) = मजदूरी + लगान + लाभ + मिश्रित आय

  • NDP(MP) = NDP (FC) + INT – S, जहां S = Subsidy

  • GNP = सकल राष्ट्रीय उत्पाद,

  • NNP = निवल राष्ट्रीय उत्पाद

  • GDP = सकल घरेलू उत्पाद

  • NDP = निवल घरेलू उत्पाद

  • MP = बाजार कीमत पर

  • FC = साधन लागत पर

  • D = मूल्यह्रास

  • INT = निवल अप्रत्यक्ष कर

  • NFI = विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय

  • निवल राष्ट्रीय उत्पाद (NNP – Net National Product) और सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP – Gross National Product) के द्वारा राष्ट्रीय उत्पाद का मूल्य मापन किया जाता है तथापि ये दोनों भिन्न-भिन्न हैं। GNP किसी देश के नागरिकों द्वारा (देश के भीतर या बाहर) एक वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं का कुल मूल्य होता है जिसमें से पूंजी ह्रास (Depreciation) को घटाने से NNP  प्राप्त होता है। अर्थात

NNP = GNP – मूल्य ह्रास

  • एक दी हुई समयावधि मे कीमतें और मौद्रिक आय दोनों दुगुनी होने पर वास्तविक आय अपरिवर्तित रहेगी क्योंकि बढ़ी हुई कीमतें बढ़ी हुई मौद्रिक आय को प्रति संतुलित कर देंगी। इससे वास्तविक आय पर कोई प्रभाव नही पड़ेगा।

  • आर्थिक विकास में सकल घरेलू उत्पाद (GDP), सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) व प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद में वृध्दि का ध्यान रखा जाता है।

  • अमर्त्य सेन कल्याणकारी अर्थशास्त्र से संबंधित हैं। उनके अनुसार, आर्थिक विकास का मुख्य लक्ष्य मानवीय विकास है।

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  • प्रो. राजकृष्ण ने वर्ष 1981 में अमेरिकन इकोनॉमिक एसोसिएशन में बोलते हुए हिंदू वृध्दि दर का सर्वप्रथम प्रयोग किया था। उनके अनुसार, हिंदू परंपरा जो विकास के अनुकूल नही है अथवा जिसमें विकास को प्रश्रय नही दिया जाता है, के कारण ही भारतीय अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय की वृध्दि दर 3.5% के आस-पास बनी हुई है। स्पष्ट है कि प्रो. राजकृष्ण द्वारा प्रयुक्त हिंदू वृध्दि दर राष्ट्रीय आय से संबंधित है।

  • आर्थिक विकास के साथ-साथ सामान्यतः वस्तुओं की मांग बढ़ती है और आय में भी वृध्दि होती है। इसी कारण आर्थिक विकास सामान्यतया स्फीति (Inflation) के साथ युग्मित होता जाता है।

  • सकल राष्ट्रीय उत्पाद में श्रम की भागदारी कम होने का कारण, कीमतों की तुलना में मजदूरी का कम होना है। कीमत वृध्दि भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख लक्षण है, जिस कारण मजदूरी में यदि वृध्दि होती भी है, तो भी परिणामी लाभ कम होता है।

  • आर्थिक विकास –   संरचनात्मक परिवर्तन

आर्थिक वृध्दि     –   सकल घरेलू उत्पाद

संपोषित विकास   –   पर्यावरण

जीवन की गुणवत्ता –   स्वास्थ्य

  • मेल्ट डाउन (Melt Down) प्रतिभूतियों एवं बंध-पत्रों (Mortagages) की गिरावट की स्थिति है जबकि मंदी (Recession), व्यावसायिक एवं औद्योगिक चक्रों के संकुचल की स्थिति है और Slow Down आर्थिक क्रियाओं की ह्रासमान स्थिति है।

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  • भारत द्वारा वर्ष 1991 से नई आर्थिक नीति जो मुख्यतः उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण पर आधारित है, को अपनाए जाने की आलोचना अभी भी जारी है। विश्व के विकसित देश नई आर्थिक नीति को समग्र एवं निश्चित समय में न अपनाए जाने के कारण जहां भारत सरकार की आलोचना कर रहे हैं, वहीं भारत के भीतर इसकी आलोचना इस आधार पर भी हो रही है, कि नई आर्थिक नीति के कारण भारत पूंजीवाद का अंगीकरण कर रहा है तथा संविधान में उल्लिखित समाजवाद के पथ से विचलित हो रहा है। वस्तुतः ये आलोचनाएं आदर्शों के मतभेदों पर ही आश्रित हैं।

  • जून, 1991 में नरसिम्हा राव सरकार के सत्ता ग्रहण के पश्चात अपनाई गई नई आर्थिक नीति के तहत उदारीकरण का प्रारंभ 24 जुलाई, 1991 को हुआ। 24 जुलाई, 1991 को नई औद्योगिक नीति घोषित हुई। इस नीति में 18 प्रमुख उद्योगो को छोड़कर अन्य सभी उद्योगो को लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया।

  • स्वतंत्रता के बाद भारत के GDP में कई गुना वृध्दि तथा GDP में प्राथमिक, द्वीतीयक एवं तृतीयक क्षेत्र के योगदान में वृहत परिवर्तन में बावजूद भारत की व्यावसायिक संरचना कमोबेश स्थिर बनी हुई है। इसका प्रमुख कारण आर्थिक विकास के लिए कृषि से उद्योग की दिशा में अंतरण की कमी है। यद्यपि जनता इस विषय में भिज्ञ है परंतु आज भी कृषि को उद्योग नही अपितु परंपरा ही माना जाता है।

  • भारतीय अर्थव्यस्था में उदारीकरण वर्ष 1991 से माना जाता है। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह, भारत के वित्त मंत्री थे। परिणामतः उन्हें ही भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का अग्रदूत कहा जाता है।

  • किसी देश की आर्थिक संवृध्दि की सर्वाधिक उपयुक्त माप प्रति व्यक्ति उत्पाद/प्रति व्यक्ति वास्तविक राष्ट्रीय आय होती है क्योकि, यह राष्ट्रीय आय की प्रति व्यक्ति उलब्धता को दर्शाती है।

  • 1990-2000 के दशक के दौरान वित्तीय वर्ष 1996-97 मे सकल राष्ट्रीय उत्पाद की वृध्दि दर 8.0% थी, जो इस दशक के किसी भी अन्य वित्तीय वर्ष मे प्राप्त सकल राष्ट्रीय उत्पाद की वृध्दि दर की अपेक्षा अधिक थी। 2001-2010 के दशक में सकल राष्ट्रीय उत्पाद की सर्वाधिक वृध्दि दर वर्ष 2006-07 (9.6%) में रही है।

  • भारत में पूंजी निर्माण के आंकड़ें एकत्रित करने का काम भारतीय रिजर्व बैंक और केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन द्वारा किया जाता है।

  • अब राष्ट्रीय आय के मापन में वर्ष 2004-05 के बजाय वर्ष 2011-12 को आधार वर्ष माना गया है। साथ ही GDP के स्थान पर अब GVA (Gross Value Added) की गणना की जाने लगी। अतः आधार वर्ष एवं गणना विधि दोनों में बदलाव किया गया है।

  • भारत के आर्थिक सर्वेक्षण का प्रत्येक वर्ष सरकारी तौर पर प्रकाशन, भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के आर्थिक विभाग द्वारा किया जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण में अर्थव्यवस्था की नीतिगत समीक्षा प्रस्तुत की जाती है। इसमें पिछले वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन से संबंधित तथ्य एवं आंकड़े भी संग्रहित होते  हैं।

  • केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन (CSO) का गठन 2 मई, 1951 को किया गया था, जो भारत की राष्ट्रीय आय की गणना करता है। CSO द्वारा समाकलित राष्ट्रीय आय एवं संबंधित तथ्य राष्ट्रीय आय के तीन आयामों पर प्रकाश डालते हैं – देशीय उत्पाद, कारक आय के रुप मे इसका वितरण तथा अंतिम उपभोग एवं पूंजी निर्माण के रुप में इसका उपयोग।

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  • आर्थिक समीक्षा, 2012-13 के अनुसार, वर्ष 2009-10 में चालू मूल्यों पर प्रतिव्यक्ति आय 46117 रु. थी जो 46500 रु. के निकटतम है। आर्थिक सर्वे, 2017-18 के अनुसार वर्ष 2017-18 में स्थिर एवं चालू कीमतों पर प्रति व्यक्ति आय क्रमशः 86660 तथा 111782 रुपये है। 31 मई, 2018 को जारी अनन्तिम अनुमानों के अनुसार, स्थिर एवं चालू कीमतों पर प्रति व्यक्ति क्रमशः 86668 रुपये तथा 112835 रुपये है।

  • वर्ष 1951-52 से 2015-16 की स्थिर कीमतों पर भारत की सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आय की वृध्दि दर वर्ष 2007-08 मे दर्ज की गई। इस वर्ष भारत के प्रति व्यक्ति आय में 8.60% की वृध्दि दर्ज की गई। जबकि वर्ष 2010-11, 2014-15 एवं वर्ष 2015-16 में प्रति व्यक्ति आय की वृध्दि दर क्रमशः 8.3%, 5.0% एवं 5.5% रही है।

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विगत पांच वर्षों में 2004-05 आधार मूल्यों पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृध्दि दर एवं प्रति व्यक्ति आय (PCI) की वृध्दि दर इस प्रकार थीः

वृध्दि दर (प्रतिशत में)

वर्ष

2006-07

2007-08

2008-09

2009-10

2010-11

GDP

9.6

9.3

6.7

8.6

9.3

PCI

7.9

8.1

4.7

6.8

7.2

इस तालिका से स्पष्ट है कि न तो सकल घरेलू उत्पाद और न ही प्रति व्यक्ति आय की वृध्दि दर विगत पांच वर्षों में सतत रुप से बढ़ी है।

GDP और संबंधित संकेतक नई श्रृंखला (2011-12) के आधार पर –

                                                         (रु. करोड़ में)

GDP

2012-13

2016-17

2017-18 (P.E.)

(स्थिर बाजार कीमतो पर)

9226879

12196006

13010843

वृध्दि दरें

5.6

7.1

6.7

मूल कीमतों पर GVA (2011-12 कीमतों पर)

8546552

10437579

11964479

वृध्दि दर

5.4%

7.3%

6.5%

31 ई, 2018 को जारी अनंतिम अनुमानों के अनुसार स्थिर मूल्यों पर वर्ष 2017-18 में सकल घरेलू उत्पाद 6.7% अनुमानित है जब कि वर्ष 2016-17 में यह 7.1% था। स्थिर मूल्यों पर ही सकल मूल्यवर्धन (GVA) वर्ष 2016-17 के 7.1% की तुलना में वर्ष 2017-18 में 6.5% अनुमानित है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  • भारत की लगभग 69% जनसंख्या गांवों में निवास करती है जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि है।

  • अर्थशास्त्रियों ने पूंजी को आर्थिक संवृध्दि (Economic Growth) हेतु सबसे महत्वपूर्ण कारक माना है। भारतीय योजना के अनुसार, “ऊंची उत्पादकता तथा आय और रोजगार के बढ़ते हुए स्तर की वास्तविक कुंजी पूंजी निर्माण की बढ़ती हुई दर है।”

वर्ष तथा उनमें प्राप्त सकल घरेलू बचत की दर (जीडीपी के प्रतिशत के रुप में) का विवरण निम्नानुसार है –

वर्ष

सकल घरेलू बचत की दर

2006-07

34.6%

2007-08

36.8%

2008-09

32.0%

2009-10

33.7%

2014-15

33.1%

2015-16

32.3%

 

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आर्थिक सतत विकास

  • सतत विकास सामाजिक-आर्थिक विकास की वह प्रक्रिया है, जिसमें पृथ्वी की सहनशक्ति के अनुसार विकास की बात की जाती है। यह अवधारणा 1960 के दशक में तब विकसित हुई, जब लोग औद्योगीकरण के पर्यावरण पर हानिकारक प्रभावों से अवगत हुए।

  • सतत विकास की अवधारणा की शुरुआत वर्ष 1962 में हुई जब वैज्ञानिक रॉकल कारसन ने दी साइलेंट स्प्रिंग नामक पुस्तक लिखी।

  • यह पुस्तक पर्य़ावरण, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक पक्षों के मध्य परस्पर संबंधों के अध्ययन में मील का पत्थर साबित हुई।

  • वर्ष 1968 में जीव विज्ञान शास्त्री पॉल इरलिच ने अपनी पुस्तक पशुपालन बम प्रकाशित की जिसमें उन्होंने मानव जनसंख्या, संसाधन दोहन तथा पर्यावरण के बीच संबंधों पर प्रकाश डाला।

सतत विकास का अर्थ तथा परिभाषाएं

  • स्थायी विकास का अभिप्राय आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण को सुरक्षित करना है। इसका उद्देश्य वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रखना है। सततशीलता शब्द को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है –

  1. सततशीलता का अर्थ एक स्थिति से है, जो हमेशा के लिए बनी रहे।

  2. प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग इस प्रकार से है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन न हो तथा प्रकृति का उत्पादन क्षमता से अधिक शोषण न हो।

  • सतत विकास की अवधारणा आर्थिक विकास नीतियों को पर्यावरण के अनुरुप बनाने पर जो देती है। इसका उद्देश्य पर्यावरण के विरुध्द चलने वाली विकास नीतियों मे बदलाव लाना है।

  • सतत विकास की सबसे अच्छी परिभाषा बेण्टलैड आयोग ने अपनी रिपोर्ट अवर कॉमन फ्यूचर (1987) में दी। उसने सतत विकास को ऐसा विकास कहा जो भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति से बिना समझौता किए बिना की आवश्यकताएं पूरी करता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विकास हमारी आज की जरुरतों को पूरा करे, साथ ही आने वाली पीढ़ियों की जरुरतों की भी अनदेखी न करे।

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सतत विकास का उद्देश्य

  • सतत विकास के कुछ दूरगामी तथा व्यापक उद्देश्य हैं जो जाति, धर्म, भाषा तथा क्षेत्रीय बंधनों से मुक्त हैं। ये उद्देश्य शोषणकारी मानसिकता की जंजीरों से अर्थव्यवस्था की मुक्ति हेतु ऐसा अधिकार पक्ष है, जिन्होंने राष्टों की जैव संपदा को नष्ट होने से बचाया है, संक्षेप में ये उद्देश्य निम्न हैं –

  • पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों को दुरुपयोग से बचाना

  • ऐसी नई वैज्ञानिक तकनीकों की खोज हो, जो प्रकृति के नियमों के अनुरूप कार्य करें।

  • विविधता की रक्षा करना तथा विकास की नीतियों मे स्थानीय समुदायों को शमिन करना

  • शासन की संस्थाओं का विकेन्द्रीकरण करना और उन्हें अधिक लचीला, पारदर्शी तथा जनता के प्रति उत्तरदायी बनाना

  • ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की योजना बनाना जो निर्धन देशों की आवश्यकताओं को समझकर बिना उनके पर्यावरण नुकसान पहुंचाए, उनके विकास में मदद करें, अधिकांश लोगों के जीवन-स्तर को समानता तथा न्याय के अनुरुप बनाना।

  • विश्व के सभी राष्ट्रों में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ाना, क्योंकि केवल शांति ही मानवता के व्यापक हितों की रक्षा सुनिश्चित करती है।

  • सतत विकास एक मूल्य आधारित आवधारणा है, जो परस्पर सह-अस्तित्व तथा सभी के लिए सम्मान जैसे आदर्शों की मांग करता है। यह एक निरंतर विकास प्रक्रिया है जो सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा पर्यावरणीय घटकों में सामंजस्य पर आधारित है।

  • धारण क्षमता या वहन क्षमता का तात्पर्य किसी विशेष संसाधन द्वारा अपने भीतर जीवों की अधिकतम संख्या को बनाए रखने की क्षमता से है। अतः इसके अंतर्गत वर्तमान की आवश्यकताओं को पारिस्थितिकी तंत्र के सामर्थ्य से समझौता किए बगैर पूरा किया जाता है।

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  • मानव पूंजी को भी अन्य के समान ही माना गया है। मानव पूंजी में बढ़ता हुआ विनियोग उत्पादकता में वृध्दि की ओर ले जाएगा। जिसका क्रमिक विस्तार निम्नवत है –

  • कुशलता में विकास

  • संसाधनों का समुचित प्रयोग

  • उत्पादकता में वृध्दि

  • समावेशी विकास का आशय समाज के सभी वर्गों तक संसाधन एवं सुविधाओं की पहुंच से है।

  • समावेशित विकास (Inclusive Growth) समग्रता के साथ विकास की बहुआयामी अवधारणा है। इसमें बुनियादी सुविधाओं में सुधार के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बेहतर अवसरों की  उपलब्धता परिलक्षित होती है। इसके साथ गरीबी को कम किया जाना इसका प्रमुख आयाम है। केवल राष्ट्रीय आय की ऊंची वृध्दि दर के समावेशित विकास के बढ़ने की आशा नही की जा सकती है।

  • नीमराणा राजस्थान के अलवर जिले में अवस्थित है। यहां पर किए गए लगभग सभी विकास कार्य टिकाऊ आर्थिक विकास के मॉडल पर आधारित हैं।

  • वर्ष 2011-12 के आर्थिक सर्वेक्षण में पहली बार धारणीय विकास और जलवायु-परिवर्तन का नवीन अध्याय जोड़ा गया था।

  • आर्थिक विकास से संबंधित जनांकिकीय संक्रमण की चार चरणीय प्रमुख विशिष्टताएं होती हैं –

प्रथम चरण में राज्य विकास की निम्न स्थिति के कारण जन्म दर उच्च होने के साथ मृत्यु दर भी उच्च बनी रहती है क्योंकि स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव रहता है।

द्वीतीय चरण में विकास कुछ आगे बढ़ता है और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होता है। अतः जन्म दर उच्च होने के साथ मृत्यु  दर में कमी आती है।

तृतीय अवस्था मे राज्य जब विकसित हो जाता है,  तो शिक्षा, स्वास्थ्य एवं रोजगार में अभूतपूर्व वृध्दि होती है। अतः लोग अत्यधिक जनसंख्या के प्रति सचेत हो जाते हैं और घर का साथ-साथ देश संसाधनों के हिसाब से जनसंख्या बढ़ता हैं। इस प्रकार निन्म दर के के साथ, निम्न मृत्यु दर की अवस्था आती है।

चौथी अवस्था में जनसंख्या स्थिरता की स्थिति आ जाती है।

  • समावेशी शासन से तात्पर्य है कि समाज के सभी वर्गों को समान रुप से शासन के द्वारा प्रदत्त सुविधाएं प्रदान की जाएं। सभी जिलों कें प्रभावशाली जिला समितियों की स्थापना करना, जन-स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय में बढ़ोत्तरी करना तथा मध्याह्न भोजन योजना को सशक्तीकरण प्रदान करना समावेशी शासन के अंग हैं। गैर-बैंकिग वित्तीय कंपनियों को बैंकिंग करने की अनुमति प्रदान करने को समावेशी शासन का भाग नही माना जा सकता है।

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कृषि एवं संबंध क्षेत्र

महत्व

  • कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है।

  • आज भी भारतीय कृषि भारत की सकल रोजगार का आधा, समग्र राष्ट्रीय आय में लगभग 1/6 भाग (15-18%) अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लगभग 18 प्रतिशत (आयात में लगभग 6% तथा निर्यात में लगभग 12%) का योगदान करती है।

  • यह देश की अधिकांश जनसंख्या की आश्रयस्थली है।

  • वर्ष 2016-17 में कृषि में लगभग 6.3 प्रतिशत की वृध्दि दर्ज की गई तथा वर्ष 2017-18 में यह 3.0 प्रतिशत अनुमानित है।

  • वर्ष 2017-18 में सकल खाद्यान्न उत्पादन 277.4 मिलियन टन रहा, जब तक का सर्वाधिक रिकॉर्ड है।

  • इसमें से 111 मि. टन चावल तथा 97 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ है।

भारतीय कृषि की विशेषताएं

  • भारतीय कृषि अभी भी काफी पिछड़ी अवस्था में है। आज भी किसान अवैज्ञानिकि विधि से कृषि कर रहे हैं।

  • भारत में कृषि की उत्पादकता (उत्पादन प्रति हेक्टेयर) काफी कम है।

  • भारत में कृषि में बड़ी मात्रा में प्रच्छन्न बेरोजगारी पाई जाती है, जो किसानों मे गरीबी के प्रमुख कारणों मे से एक है।

  • आज भी भारतीय कृषि में अनिश्चितता व्याप्त है जिस कारण मौसम अच्छा होने पर फसल अच्छी होती है, जबकि मौसम के प्रतिकूल होने पर फसल भी खराब हो जाती है।

  • छोटी जोतें भी भारतीय कृषि की प्रमुख विशेषता है।

  • सकल जोतों का 67.1 प्रतिशत सीमांत जोत (1 हेक्टेयर से कम) से कम है तथा 17.9 प्रतिशत एक से हो हेक्टेयर की लघु जोते हैं।

  • इस तरह लगभग 85 प्रतिशत जोतें 2 हेक्टेयर से कम हैं।

क्र.स.

भारत में जोतों  वितरण

प्रतिशत

1.    

सीमांत  जोत (0-1 हेक्टेयर)

67.1%

2.    

लघु जोत (1-2 हेक्टेयर)

17.9%

3.    

मध्यम जोत (2-10 हेक्टेयर)

14.2%

4.    

वृहद जोत (10 हेक्टेयर से अधिक)

08%

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भारत में भूमि सुधार

  • स्वतंत्रता के बाद भूमि बंदोबस्त व्यवस्था को सुधारने तथा किसानों के हितों को संरक्षित करने एवं उन्हें कृषि हेतु प्रेरित करने किए अधनियम बनाकर भूमि सुधार कार्यक्रम लाए गए।

उद्देश्य

  1. ऐसे भू-संबंध विकसित करना जहां खेती करने वाले ही वास्तविक मालिक हो।

  2. भू-व्यवस्था में समस्त बाधाओं को दूर करना जिससे शोषण रुक सके।

कार्य

  1. मध्यस्थों का उन्मूलन – इसके तहत जमींदारी या उस जैसी सभी व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया तथा भूमि के संबंध में किसानों का सीधे सरकार मे संपर्क हुआ।

  2. कास्तकारी सुधार – इसके अंतर्गत लगान का नियमन किया गया, कास्त आधिकारियों को संरक्षित किया गया तथा कास्तकारों को भूमि का मालिकाना हक दिया गया।

  3. कृषि का पुनर्गठन – इसके अंतर्गत कृषि भूमि पुनर्वितरण किया गया। अधिकतम भृ-धारकता का निर्धारण कर अतिरिक्त भूमि, भूमिहीनों में बांट दी गई।

  • अतिरिक्त चकबंदी के माधमय से छोटे-छोटे चकों को मिलाकर बड़े चक बनाए गए, जिससे उन पर वैज्ञानिक कृषि की जा सके।

  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी कृषि को भी प्रोत्साहित किया गया।

हरित क्रांति

  • हरित क्रांति भारत में कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में तीव्र वृध्द लाकर भारत को खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने हेतु अनेक कार्यक्रमों का एक समुच्चय था।

  • मैक्सिकों के एक वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग ने बीजों पर अनुसंधान कर अधिक उत्पादकता वाले बीजों (HYV) की खोज की।

  • इन बीजों को उचित सुविधाएं एवं संरक्षण मिलने पर इनसे काफी अधिक मात्रा में उत्पादन प्राप्त किया जा सकता था।

  • इसी कारण बोरलॉग को हरित क्रांति का जनक माना जाता है।

  • भारत में हरित क्रांति के जनक माने  जाने वाले एम.एस. स्वामीनाथन ने मैक्सिकों की  पध्दति को भारत में भी अपनाने पर बल दिया तथा भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर बनाने की नींव रखी।

  • हरित क्रांति  एक पैकेज कार्यक्रम था, जिसके अंतर्गत उच्च उत्पादकता वाले बीजों (HYV) को उर्वरक एवं सिंचाई के माध्यम से पोषण दिया गया तथा कीटनाशकों के माध्यम से इसे संरक्षित किया गया.

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  • इसके अतिरिक्त कृषि को आधुनिक एवं वैज्ञानिक बनाने हेतु कृषि में मशीनीकरण को भी बढ़ावा दिया गया।

  • प्रायोगिकि तौर पर वर्ष 1960-61 में गहन कृषि जिला कार्यक्रम के तहत इसे अपनाया गया तथा 1966 से इसे पूरे देश में लागू किया गया।

  • द्वीतीय हरित क्रांति में फसलों के दायरे तथा क्षेत्रों में वृध्दि के साथ-साथ कृषि पध्दति को संपोषणीय बनाने हेतु कार्बनिक कृषि को अपनाने पर जोर दिया गया है।

  • इसमें पूर्वी उत्तर भारत सहित अनेक ऐसे क्षेत्रों पर फोकस किया गया है जहां संभाव्यता तो है, परंतु हरित क्रांति सफल नही हो पाई थी।

  • इसमें दलहन जैसी फसलों के उत्पादन पर भी फोकस किया गया है।

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कृषि वित्त

  • कृषि वित्त की आवश्यकता अलग-अलग समस्याओं के लिए होती है।

  • अल्प अवधि में कृषि आगतों (Inputs) के लिए अल्पवधि ऋण, (15 माह से कम) सशीनें आदि खरीदने हेतु मध्यवधि ऋण (15 माह-5वर्षों हेतु) तथ भूमि स्थायी सुधार करने, बड़ा निवेश करने आदि जैसी जरुरतों के लिए 5 वर्ष से अधिक के लिए दीर्घकालिक ऋणों की  आवश्यकता होती है।

कृषि वित्त के स्रोत

  1. संस्थागत स्रोत

  • संस्थागत स्रोतों में कृषि वित्त की सर्वोच्च संस्था कृषि एवं ग्रमीण विकास बैंक (नाबार्ड) है।

  • इसकी स्थापना 1982 में की गई थी। यह प्रत्यक्ष तौर पर ऋण न देकर कृषि ऋण देने वाली संस्थाओं का विनियमन करती है.

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  1. गैर-संस्थागत स्रोत

  • महाजन/साहूकार, मित्र/संबंधी जमींदार, व्यापारी आदि।

  • स्वतंत्रता के समय इनकी भूमिका काफी अधिक थी।

  • कृषि वित्त के संस्थागत स्रोतों में वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक तथा सरकार हैं।

  • वर्ष 2016-17 मे कृषि में सर्वाधिक योगदान वाणिज्यिक बैंकों (69%) का है।

  • इसके बाद शीर्ष स्थान सहकारी बैंकों (17.5%) एवं क्षेत्रीय ग्रमीण बैंकों (13.5%) का स्थान है।

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना वर्ष 1975 से शुरु हुई।

  • इन बैंकों में 50% पूंजी केन्द्र सरकार की, 35 प्रतिशत पूंजी किसी वाणिज्यिक बैंक (Sponcer Bank) तथा 15 प्रतिशत संबंधित राज्य सरकारों की लगी होती है।

  • यह ग्रामीण वित्त हेतु समर्पित संस्थान है।

सहकारी बैंक

  • सहकारी बैंक तीन स्तरीय होती है –

  1. राज्य स्तर पर –   राज्य सहकारी बैंक

  2. जिले स्तर पर –   केन्द्रीय सहकारी बैंक

  3. स्थानी स्तर पर – प्राथमिक सहकारी साख संगठन

  • राज्य सरकारी बैंक उपभोक्ताओं से सीधे जुड़े नहीं होते हैं, बल्कि यह शेष दोनों स्तरों के बैंकों का विनियमन करते हैं तथा इनका पुनर्वित्त पोषण करते हैं।

  • नोट- कृषि में दीर्घकालीन ऋण भूमि विकास बैंकों द्वारा दिया जाता है।

  • राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने तथा कृषि जिंसों के पारदर्शी व्यापार को सुनिश्चित करने हेतु बनाई गई है। इसके इलेक्ट्रॉनिक पोर्टल (e-NAM) का शुभारंभ 14 अप्रैल, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया। यह एक एक अखिल भारतीय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है, जो निवर्तमान कृषि उपज विपणन समितियों (APMCs) को एकीकृत कर कृषि जिंसो हेतु एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का सृजन करता है। इलेक्ट्रॉनिक व्यापार होने के कारण किसानों को उनके उपज की गुणवत्ता के अनुरूप प्रतिस्पर्धी (बेहतर) मूल्य प्राप्त होता है।

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  • राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (SHCS) का शुभारंभ 19 फरवरी, 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा राजस्थान के सूरतगढ़ से स्वस्थ धरा, खेत हरा, नारे के साथ किया गया था। इसका उद्देश्य किसानों को उनकी भूमि की गुणवत्ता के विषय में जागरुक कर उन्हें उर्वरकों के अति-प्रयोग (अनावश्यक प्रयोग) से रोकना तथ कृषि को अधिक उत्पादक, धारणीय तथा पर्यावरण के प्रति लोचशील बनाना है।

  • प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने नेहरु के सोवियत शैली से आर्थिक विकास का विरोध किया। चौधरी चरण सिंह का विचार था कि सहकारी फार्म भारत में सफल नही हो सकते हैं। अतः चरण सिंह को भारत में सहकारी कृषि का समर्थक नहीं माना जाता है।

  • भारत में आजादी के समय एक ऐसी कृषि व्यवस्था मौजूद थी जिसमें भूमि का स्वामित्व कुछ हाथों में केन्द्रित था। अतः देश को समृध्द बनाने हेतु भूमि सुधार को अति आवश्यक माना गया तथा इस हेतु जमींदारी प्रथा का उन्मूलन, भूमि जोतो की अधिकतम सीमा का निर्धारण एवं काश्तकारी सुधार के कार्यक्रम अपनाए गए।

  • भारत में नीली क्रांतित (Blue Revolution) मत्स्य पालन से संबंधित है। कृषि एवं संबंध्द क्षेत्र से संबंधित अन्य क्रांतिया निम्नलिखित हैं –

हरित क्रांति   –   खाद्य उत्पादन

श्वेत क्रांति    –   दुग्ध उत्पादन

भूरी क्रांति    –   उर्वरक उत्पादन

पीली क्रांति   –   तिलहन उत्पादन

लाल क्रांति    –   मांस/टमाटर उत्पादन

गुलाबी क्रांति  –   झींगा/प्याज उत्पादन

काली क्रांति   –   कच्चा तेल उत्पादन

  • भारत में सीमांत जोत (Marginal Land Holding) का आकार 1 हेक्टेयर से कम है। लघु जोतों का आकार 1-2 हेक्टेयर, उप- मध्यम जोतों का आकार 2-4 हेक्टेयर, मध्यम जोतो का आकार 4-10 हेक्टेयर तथा बृहद् जोतो का आकार 10 हेक्टेयर या इससे अधिक होता है। भारत में सकल जोतों में 67 प्रतिशत सीमांत जोतें, 18 प्रतिशत लघु जोतें, 10 प्रतिशत उप- मध्यम जोतें, 4 प्रतिशत मध्यम जोतें तथा 1 प्रतिशत से भी कम बृहद जोते हैं।

  • ताज निकलने की अवस्था गेहूं की सिंचाई हेतु अति क्रांतिक अवस्था होती है। यदि किसी किसान को एक सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, तो उसे इसी अवस्था में सिंचाई करने की सलाह दी जाती है।

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  • सामुदायिक विकास (Community Development) कार्यक्रम अमेरिकी संस्था फोर्ड फाउंडेशन की सहायता से भारत में वर्ष 1952 से प्रारंभ किया गया तथा इसकी शुरुआत करने वाला भारत विश्व का प्रथम देश था। एक आत्मनिर्भर, आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था कायम करना सामुदायिक विकास का लक्ष्य रहा है।

  • व्यक्तिगत रुप से किसानों को आवंटित भूमि रैय्यतवाड़ी प्रणाली, बड़े सामंतों को आवंटित भूमि जागीरदारी प्रणाली, मालगुजारी के इजारेदारों अथवा तहसीलदारों को आवंटित भूमि जमींदारी प्रणाली तथा ग्राम्य स्तर पर की गई भू-राजस्व व्यवस्था महालवाड़ी प्रणाली कहलाती है।

  • कपास की फसल के लिए सर्वोत्तम मिट्टी काली मिट्टी है, जो भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब तथा आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक पाई जाती है।

  • ग्रामीण निर्धनता कृषकों को कृषि में उन्नत तकनीक के निवेश को हतोत्साहित करती है। कृषिरत अधिकांश भारतीय जनता शहरों के बजाय गांवो में निवास करती है। अतः शहरी निर्धनता का कृषि विकास पर प्रभाव अल्प या नगण्य है जबकि शहर मे गांवों की ओर पलायन सर्वथा असत्य है।

  • प्रौद्योगिकीय प्रगति दो प्रकार की होती है –

  1. श्रम बढ़ाने वाली प्रौद्योगिकीय प्रगति

  2. पूंजी बढ़ाने वाली प्रौद्योगिकीय प्रगति।

कृषि उत्पादन में काष्ठ के हलों के स्थान पर इस्पात के हलों का उपयोग पूंजी भढ़ाने वाली प्रौद्योगिकीय प्रगति (Capital Augmentation) की इंगित करता है। उन्नत पूंजी संवर्धन प्रगति मौजूदा पूंजीगत वस्तुओं के अधिक उत्पादक उपयोग पर बल देता है।

  • वर्ष 2011 की जनगणनानुसार, उत्तर प्रदेश में कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक (59.3%) कर्मचारी नियोजित हैं। प्रदेश के कुल कर्मियों में कृषक 29.0% जबकि कृषि श्रमिक 30.3% है।

  • नकदी फसलें वो फसलें होती हैं, जिनका उत्पादन वाणिज्यिक उद्देश्य से किया जाता है न कि उपभोग के उद्देश्य से। ज्वार को मोटे खाद्यान्न फसलों के अंतर्गत श्रेणीबध्द किया जाता  है।

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आर्थिक समीक्षा भारत सरकार, भारत की प्रमुख फसलों में निम्न प्रकार प्रदर्शित करता है –

खाद्यान्न फसलें (या खाद्य फसल)

  1. चावल, गेहूं, मक्का, मोटे अनाज

  2. दलहन

गैर-खाद्यान्न फसलें (नकदी फसलें)

  1. तिलहन – मूंगफलीं रैपसीड और सरसों

  2. रेशेदार – कपास, जूट, मेस्ता

  3. बगानी फसलें – चाय, कॉफी, रबड़

  4. अन्य – गन्ना, तंबाकू, आलू।

  • विशेष कृषि ग्राम उद्योग योजना का मुख्य उद्देश्य कृषि निर्यात को प्रोत्साहित करना है।

  • वर्ष 1999-2000 के रबी मौसम से प्रारंभ राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना को वर्ष 2004-05 के बजट से खऱीफ फसलों पर भी लागू किया गया।

  • भारत में फसल बीमा हेतु प्रथम प्रयास 1 अप्रैल 1985 को खरीफ के दौरान किया गया जब भारत सरकार द्वारा व्यापक फसल बीमा योजना (CCIS: Comprehensive Crop Insurance Scheme) का शुभारंभ किया गया था।

  • किसान बही योजना उत्तर प्रदेश में वर्ष 1992 में लागू की गई थी।

  • केन्द्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा अप्रैल, 1985 से प्रारंभ व्यापक फसल बीमा योजना की जगह पर रबी मौसम 1999-2000 से राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना प्रारंभ की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सूखा, बाढ़, ओला वृष्टि, चक्रवात, आग, कीट/बीमारियों तथा प्राकृतिक आपदाओं आदि से फसलों की हुई क्षति से कृषकों को संरक्षण प्रदान करना था। वर्तमान में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ने इसे प्रतिस्थापित कर दिया है।

  • त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम वर्ष 1996-97 में ऐसे राज्यों को ऋण सहायता उपलब्ध कराने के लिए शुरु किया गया था जिनकी अधूरी वृहद/मध्यम सिंचाई परियोजनाएं पूरी होने के अग्रिम चरणों में थी। केन्द्र द्वारा प्रायोजित कमांड क्षेत्र विकास कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1974-75 में सिंचाई संभाव्यता का दक्ष उपयोग करने के लिए किया गया था।

  • आठवीं पंचवर्षीय योजना हेतु आयोग द्वारा भारत को 15 कृषि जलवायु प्रदेशों में विभाजिक किया गया था।

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  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना 16 अगस्त, 2007 से संचालित है जो वित्त वर्ष 2007-08 के अंतर्गत है। इस हेतु 11वीं पंचवर्षीय योजना में 25000 करोड़ रु. व्यय की राशि सुनिश्चित की गई थी। इस योजना के अंतर्गत राज्यो को अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता 100% अनुदान के रुप में प्राप्त होगी।

  • राष्ट्रीय हॉर्टीकल्चर मिशन (NHM) एक केन्द्र प्रायोजित योजना है। इसे वर्ष 2005-06 (5 मई, 2005 से) मे दसवीं योजना के दौरान प्रारंभ किया गय था। इस योजना का उद्देश्य भारत में बागवानी क्षेत्र का समग्र विकास तथा उत्पादन में वृध्दि करना है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन का लक्ष्य वर्ष 2011-12 तक देश में बागवानी उत्पादन को 300 मिलियन टन तथा इसके तहत बुवाई क्षेत्र को 40 लाख हेक्टेयर करना था। भारत में बागवानी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2012 को बागवानी वर्ष (Year of Horticulture) भी घोषित किया गया था।

  • राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHM) वर्ष 2005-06 से देश में क्रियान्वित किया जा रहा है। वर्तमान स्थिति – Statistical Year Book, 2015 के अनुसार, पूर्वोत्तर व हिमालयी राज्यों (सिक्किम, जम्म-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड) के अलावा सभी राज्य  और तीन केन्द्रशासित प्रदेश ( अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप और पुडुचेरी) NHM में शामिल हैं।

  • लघु कृषक-विकास एजेंसी प्रोग्राम वर्ष 1971 से देश के 1818 विकास खंडो में आरंभ की गई। यह कार्यक्रम छोटे और सीमांत किसानों के मूल्यांकन एवं अध्ययन के लिए प्रारंभिक तौर पर असम के कामरुप जिले में आरंभ किया गया था।

  • सब्जियों का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला देश चीन है। चीन के बाद दूसरा स्थान भारत तथा तीसरा स्थान अमेरिका का है।

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भातर द्वारा आयातित प्रमुख दालें निम्न हैं –

दालें

मात्रा (वर्ष – 2015-16 में हजार टन में)

मात्रा (वर्ष 2015-15 में हजार टन में)

मटर

2245.39

3172.75

चना

1031.48

1080.63

मूंग/उड़द

581.60

573.90

मसूर

1260.19

829.44

अरहर (तूर)

462.71

703.54

 

वर्ष 2010-11 की स्थिति के अनुसार, कृषि उत्पादों का निर्यात मूल्य इस प्रकार था – कच्ची कपास (2910 मिलियन डॉलर),चावल (2545 मिल.डॉलर), चाय (736 मि. डॉलर) एवं कहवा (662 मि. डॉलर)।

वर्तमान स्थिति (आर्थिक समीक्षा वर्ष 2017-18 के अनुसार वर्ष 2016-17 में) –

कॉफी/कहवा

843 मि. डॉलर

चावल

5734 मि.डॉलर

कच्ची कपास

1621 मि. डॉलर

टी एंड मेट (Mate)

731 मि. डॉलर

खली

805 मि. डॉलर

मसाले

2852 मि. डॉलर

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  • रेशम के ज्ञात सभी 5 व्यापारिक किस्मों का एकमात्र उत्पादक देश भारत है। रेशम की ये 5 श्रेणियां इस प्रकार हैं –

  1. मलबेरी (Mulberry)

  2. ट्रॉपिकल टसर (Tropical Tasar)

  3. ओक टसर (Oak Tasar)

  4. इरी (Eri)

  5. मूगा (Muga)

रेशम उत्पादन में चीन का प्रथम एवं भारत का द्वीतीय स्थान है। भारत, विश्व में रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश भी है। मलबेरी रेशम का उत्पादन कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर एवं प. बंगाल राज्यों में जबकि गैर-मलबेरी रेशम का उत्पादन झारखंड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा एवं उत्तर पूर्वी राज्यों में बहुतायत से होता है।

  • 20वें दशक के प्रारंभ में भारत में सहकारी कृषि की दिशा में प्रारंभिक प्रयास आरंभ हुए। स्वतंत्रता के उपरांत प्रारंभिक वर्षो में सहकारी कृषि को बढ़ावा देने का विशेष प्रयास किया गया। सहकारी कृषि उत्पादकता में वृध्दि करती है। इस प्रकार सहकारी कृषि भारतीय कृषि की निम्न उत्पादकतात का कारण नही है।

  • राष्ट्रीय खाद्य सुऱक्षा मिशन अक्टूबर, 2007 में प्रारंभ किया गया था। मिशन के निम्न उद्देस्य हैं –

  1. देश के अभिज्ञात जिलों में क्षेत्र विस्तार और सतत रीति से उत्पादकता वर्धन के माध्यम से धान, गेहूं और दलहन के उत्पादन में बढ़ोत्तरी।

  2. मृदा उत्पादकता और उर्वरता का संरक्षण।

  3. खेत के स्तर पर आर्थिक लाभ को बढ़ाना, ताकि किसानो में आत्मविश्वास पैदा हो सके।

  • राष्ट्रीय बागवानी मिशन का उद्देश्य बागवानी क्षेत्र में ऊंची संवृध्दि प्राप्त करना, शस्योत्तर व्यवस्था करना तथा संसाधन का विकास करना है।

  • कृषि श्रमिक सामाजिक सुरक्षा योजना को 1 जुलाई, 2001 से प्रारंभ किया गय था। यह योजना जीवन बीमा सुरक्षा, एकमुश्त जीवन लाभ तथा कृषि मजदूरों को पेंशन लाभ उपलब्ध कराती है।

  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM: प्रारंभ वर्ष 2007-08 रबी सीजन से) एक केन्द्र प्रायोजित योजना है जिसे वर्ष 2011-12 तक (11वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक) गेहूं, चावल और दलहन का क्रमशः 10, 8 और 2 मिलियन टन अतिरिक्त उत्पादन (कुल 20 मिलियन टन खाद्यान्न का अतिरिक्त उत्पादन) प्राप्त करने के लक्ष्य के साथ प्रारंभ किया गया था। वर्तमान स्थिति – आच्छादित फसलें – चावल , गेहूं, दलहन, मोटे अनाज व वाणिज्यिक फसलें, 4 मिलियन टन दलहन और 3 मिलियन टन मोटे अनाज समेत कुल 25 मिलियन टन अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य है।

  • पीत या पीली क्रांति (Yellow Revolution) का संबंध तिलहन उत्पादन से है। इस क्रांति की शुरुआत ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद‘ (Indian Council of Agricultural Research) द्वारा चलाए गए तिलहन पर तकनीकी मिशन (Technology Mission on Oilseeds) से वर्ष 1986 मे हुई। इस मिशन के प्रारंभ से विभिन्न तिलहनों में 25% से लेकर 420% तक की वृध्दि दर अंकित की गई है। वर्ष 2005-06 में भारत में तिलहनों का कुल उत्पादन 27.98 मिलियन टन रहा था। अगस्त, 2018 में जारी चतुर्थ अग्रिम अनुमान के अनुसार वर्ष 2017-18 में तिलहन उत्पादन 31.31 मिलियन टन अनुमानित है।

  • अमेरिकी वैज्ञानिक नॉर्मन ई. बोरलॉग को हरित क्रांति का जनक (Father of Green Revolution) माना जाता है। इन्हें वर्ष 1970 में शांति का नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize for Peace) दिया गया था।

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  • भारत में हरित क्रांति का प्रारंभ वर्ष 1966 से माना जाता है। भारत में हरित क्रांति लाने में कृषि विश्वविद्यालय, पंतनगर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है इसलिए इसे हरित क्रांति की जन्मस्थली भी कहा जाता है।

  • भारत में हरित क्रांति (1966) के जनक कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन थे जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एवं तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री सी. सुब्रह्मण्यम की भूमिका भी इसमे अत्यंत अहम रही।

  • भारत में वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में दुग्ध व्यवसाय के विकास के लिए वर्ष 1970 में ऑपरेशन फ्लड नामक अभियान चलाया गया। अब तक ऑपरेशन फ्लड-1 (1970 से मार्च, 1981 तक), ऑपरेशन फ्लड-2 (अप्रैल, 1981 से मार्च, 1985 तक), ऑपरेशन फ्लड-3 (अप्रैल, 1985 से मार्च, 1995 तक), ऑपरेशन फ्लड-3 (अप्रैल, 1995 से मार्च, 2000 तक) पूरे हो चुके हैं। ऑपरेशन फ्लड एक सफल कार्यक्रम सिध्द हुआ। जिसके परिणामस्वरुप दुग्ध उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान प्राप्त कर चुका है।

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System) के माध्यम से सरकार गरीब परिवारों को उचित मूल्य पर खाद्यान्न उपलब्ध कराती है। PDS से जारी खाद्यान्नों पर सरकार सब्सिडी प्रदान करती है। PDS द्वार जारी खाद्यान्नों की कीमतें बाजार कीमतों की अपेक्षा कम होती हैं। अतः यदि सरकार PDS से वितरित अनाजों की कीमत में वृध्दि करती है, तो इसका सीधा प्रभाव यह होगा कि PDS पर दी जाने वाली सब्सिडी (उपादान) का भार कम होगा।

  • हरित क्रांति की यह अलोचना की जाती है कि इसका लाभ कुछ विशेष क्षेत्रो एवं बड़े किसानों को ही मिला है। पुनः हरित क्रांति में मोटे अनाजों की अपेक्षा कर  गेहूं, चावल एवं कुछ नकदी फसलों के उत्पादन को बढ़ाने पर ही ध्यान केन्द्रित किया गया। खाद्यान्न की कीमतें मात्र प्रथम पंचवर्षीय योजना की अवधि को छोड़कर निरंतर बढ़ती रही है जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्यों (Minimum Support Price) में वृध्दि का प्रमुख योगदान रहा है। खाद्यान्नों की कीमत वृध्दि की अपेक्षा समाज के निम्न आय वर्ग के लोगों की आय में कम वृध्दि हुई है। अतः वर्ष 1950-90 की अवधि में खाद्यान्नों में लगभग तीन गुनी वृध्दि के बावजूद भारत को अभी भी भूख से मुक्ति प्राप्त नही हो सकी है।

  • जैविक खेती या ऑर्गेनिक फार्मिंग एक ऐसी उत्पादन प्रणाली है जो मृदा, पारिस्थितिक तंत्र और लोगो के स्वास्थ्य के अनुकूल होती है।

  • निर्यात हेतु आम की पसंदीदा प्रजाति अल्फांजो या अल्फांसों है। भारत में इसका प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र है।

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  • कृषि वित्त के प्रमुख सिध्दांत हैं – उद्देश्य, व्यक्ति, उत्पादकता नियोजन, संगठन आदि।

  • किसी फार्म के चल लागत पूंजी मे भूमि राजस्व शामिल नही होगा जबकि बीज, उर्वरक तथा सिंचाई जल इत्यादि इसकी चल लागत पूंजी में शामिल होंगे। क्योंकि ये सभी कृषि आगत मे शामिल हैं।

  • सरकार अधिप्राप्ति मूल्यों या वसूली मूल्यों (Procurement Prices) पर कृषकों से कृषि उपज का क्रय करती है। अधिप्राप्ति मूल्य सामान्यतः न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से ऊंचे होते हैं।

  • कृषिगत उपजों की कीमतों पर सरकार को सलाह देने के उद्देश्य से वर्ष 1965 में कृषि मूल्य आयोग की स्थापना की गई थी। वर्ष 1985 में कृषि मूल्य आयोग का नाम बदलकर कृषि लागत और मूल्य आयोग कर दिया गया। इसका मुख्यालय नई दिल्ली मे है। ज्ञातव्य है कि सैध्दांतिक रुप से सरकार इसकी सलाहों के मद्देनजर ही कृषिगत उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों की घोषणा करती है, परंतु सरकार इसकी संस्तुतियों को मानने के लिए बाध्य नही है।

  • कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP: Commission for Agricultural Coast and Price) निम्न कीमतों की घोषणा करने का सुझाव देता है –

  1. न्यूनतम समर्थन कीमतें (Minimum Support Price) – MSP वे कीमतें हैं जिन पर सरकार कृषि उत्पादों को खरीदने को तैय़ार रहती है। MSP यह सुनिश्चित करता है कि कृषि उत्पादों की कीमत न्यूनतम समर्थन कीमत से नीचे नही जाएगी। MSP कृषकों के सुरक्षा (कीमत संबंधी) उपलब्धता कराता है तथा यह कृषि मूल्यो का स्थिरीकरण सुनिश्चित करता है।

  2. वसूली कीमतें (Procurement Price) – वसूली कीमतें वह कीमतें हैं जिस पर सरकार कृषकों से कृषि उपज का क्रय करती है। वसूली कीमतें सामान्यतया MSP से ऊंची होती हैं।

  3. जारी कीमतें (Issue Prices) – इस कीमत पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) खाद्यान्नों की बिक्री करता है। MSP जहां कृषकों के हित की रक्षा करता है, वहीं जारी कीमतें उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण करती हैं।

  • कृषि लागत और कीमत आयोग (CACP) वर्तमान में MSP के अंतर्गत कुल 25 फसलों के मूल्यों की घोषणा करता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM: National Food Security Mission) केन्द्र सरकार द्वारा वित्तपोषित योजना है, जो चावल (Rice), गेहूं (Wheat) और दालों (Pluses) के उत्पादन की वृध्दि से संबंधित है। वर्तमान मे इसके अंतर्गत मोटे अनाज की भी शामिल कर लिया गया है। इसका क्रियान्वयन कृषि मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस मिशन का प्रारंभ वर्ष 2007-08 में हुआ था।

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  • राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंध अकादमी (NAARM: National Academy of Agricultural Research Management) हैदराबाद मे स्थित है।

  • भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (Indian Grass Land and Fodder Research Institute) झांसी में स्थित है।

  • नीरु-मीरु (जल और आप) जल संग्रहण कार्यक्रम भारत के आंध्र प्रदेश राज्य में वर्ष 2000 में प्रारंभ किया गया था।

  • केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (CFTRI: Central Technological Research Institute) मैसूर में स्थित है।

  • वर्ष 1960 में स्थापित जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय भारत का प्रथम कृषि विश्वविद्यालय है जो पंतनगर, उत्तराखंड में स्थित है।

  • कृषि उत्पादों की मांग स्थायकत्वहीन (Inelastic Demad: लोचहीन मांग) होती है। इसी कारण अत्यधिक पैदावार की स्थिति में किसानों के लिए कीमत व उनकी कुल आय (Total Revenue) पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

  • सुनहला चावल (गोल्डन चावल) औरिजा सैटिवा चावल की एक किस्म है जिसे बीटा-कैरोटिन, जो खाने वाले चावल में प्रो-विटामिन ए उपलब्ध कराता है, के जैव संश्लेषण के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग के द्वारा बनाया जाता है।

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  • भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (National Agricultural Cooperative Marketing Federation of India: NAFED) कृषि विपणन से संबंधित है, जिसकी स्थापना 2 अक्टूबर, 1958 को की गई थी। यह राष्ट्रीय स्तर पर एक शीर्ष सहकारी संगठन है, जिसका कार्य चुनी हुई कृषि वस्तुओं का प्रबंधन, वितरण, निर्यात तथा आयात करना है।

  • उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (UP Council of Agricultural Research) लखनऊ में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1989 में हुई थी।

  • भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (Indian Institute of Vegetable Research: IIVR) वाराणसी में स्थित है।

  • हैंड बुक ऑफ एग्रीकल्चर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से प्रकाशित होती है।

  • भारत के अधिकतर भागों में कृषि उत्पादों के बाजार को राज्यों द्वारा अधिनियमित कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम (APMC Acts) के अधीन विकसित एवं संचालित किया जाता है।

  • राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (NLRMP) अगस्त, 2008 में प्रारंभ किया गया था।

  • किसान क्रेडिट कार्य योजना का प्रारंभ वर्ष 1998-99 में किया गया था। इस योजना का उद्देश्य बैंकिंग व्यवस्था से किसानों को समुचित और यथासमय सरल एवं आसान तरीके से आर्थिक सहायता दिलाना है ताकि खेती एवं जरुरी उपकरणों की खरीद के लिए उनके वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

  • भारत सरकार के कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा रेनफेड एरिया डेवलपमेंट कार्यक्रम वर्ष 2011-12 में प्रारंभ किया गया। यह राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (K.V.Y.) के अंतर्गत एक उपयोजना है। इसका मुख्य उद्देश्य किसानों के स्तर में सुधार लाना है।

 

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उद्योग क्षेत्र

उद्योग एवं नई आर्थिक नीति

  • स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1948 तथा 1956 की औद्योगिक नीति में उद्योगों पर सरकार का नियंत्रण बनाए रखा गया, परंतु कालांतर में उद्योगो में अध्यक्षता के कारण इनके प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप की कमी की जरुरत महसूस की जाने लगी।

  • कालांतर में इसमें कुछ ढील दी गई तथा अंतः वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीति जिसके तहत निजीकरण, उदारीकरण तथा वैश्वीकरण को अपनाया गया।

निजीकरण

  • इसके तहत सरकार सार्वजनिक स्वामित्व को कम करती है तथा अपनी हिस्सेदारी निजी व्यक्तियों को बेच देती है।

  • इसे विनिवेश (Disinvestment) कहा जाता है।

उदारीकरण

  • इसके तहत सरकार द्वारा सरकारी निरीक्षण एवं नियंत्रण में कमी की जाती है तथा नियमों को सरल एवं उदार बनाया जाता है।

  • इंस्पेक्टर राज की समाप्ति लाइसेंसिंग की समाप्ति या उसके नियमों में छूट आदि उदारीकरण के तहत उठाए जाने वाले कदम हैं।

वैश्वीकरण

  • यह विश्व के एकीकरण से संबंधित अवधारणा है, जिसके तहत विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ जाती हैं तथा इनके मध्य वस्तुओं, सेवाओं, संसाधनों, पूंजी आदि का स्वतंत्र प्रवाह (बाधा रहित) होने लगता है।

  • नोट- उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण को ही LPG (Liberalization, Privatization and Globalization) पॉलिसी कहते हैं।

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नई औद्योगिक नीति, 1991

  • 24 जुलाई, 1991 को घोषित हुई औद्योगिक नीति में उद्योगों पर सार्वजनिक नियंत्रण को शिथिल करते हुए अनेक उदारीकृत कदम उठाए गए।

  1. औद्योगिक लाइसेंसिंग से मुक्ति

इस नीति में 18 प्रमुख उद्योगों को छोड़कर शेष सभी उद्योगों के लिए लाइसेंस लेने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया। कालांतर में इसमें भी कमी की गई तथा वर्तमान में केवल, पांच उद्योगों (शराव, सिगरेट या तंबाकू उत्पाद, खतरनाक रसायन, रक्षा उपकरण तथा औद्योगिक विस्फोटक) को लाइसेंस के अंतर्गत रखा गया है।

  1. सार्वजनिक क्षेत्र के महत्व में कमी

नई औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित रखे गए 17 उद्योगों को घटाकर 8 कर दिया गया। कालांतर में इसे और भी कम करते हुए वर्तमान मे केवल दो उद्योगों (परमाणु ऊर्जा तथा रेलवे) को सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित रखा गया है।

  1. MRTP परिसंपत्ति सीमा की समाप्ति

इस नीति में एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम के अंतर्गत आने वाली कंपनियों की अधिकतम परिसंपत्ति सीमा को समाप्त कर दिया गया जिससे वे अधिक निवेश, विलय एवं अधिग्रहण कर अपनी उत्पादक गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सकें।

  1. इनके अतिरिक्त उद्योगों के स्थापना संबंधी नीति में भी सुधार किया गया तथा 10 लाख तक की जनसंख्या वाले शहरों में उद्योग लगाने हेतु अनुमति लेने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया।

  2. उद्योगों में विदेशी निवेश को आकर्षित करने हेतु प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा एवं शर्तों को उदार बनाने संबंधी अनेक घोषणाएं की गई।

नोटः विदेशी पूंजी के संबंध में वर्ष 1999 में पूर्व के कठोर अधिनियम फेरा (FERA- Foreign Exchange Regulation Act) के स्थान पर फेमा (Foreign Exchange Management- FEMA) को लाया गया। यह अधिनियम जून, 2000 से प्रभावी हुआ।

  1. नई औद्योगिक नीति में सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यमों के विकास पर भी बदल दिया गया। वर्तमान में सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यमों को निवेश के आधार पर इस प्रकार परिभाषित किया गया है –

क्षेत्र

सूक्ष्म

लघु

मध्यम

उद्योग क्षेत्र

25 लाख रु. तक

25 लाख-5 करोड़ रु.

5-10 करोड़ रु.

सेवा क्षेत्र

10 लाख रु. तक

10 लाख-2 करोड़ रु.

2-5 करोड़ रु.

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  • भारत में उद्योग अपनी वित्त की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु आंतरिक साधनों (अंशपूंजी/शेयरों के विक्रय, ऋण पत्र तथा लाभ का पुनर्निवेश) के अतिरिक्त संस्थागत स्रोतों से भी करते हैं। प्रमुख संस्थाएं जो उद्योगों का वित्त पोषण करती हैं, निम्नलिखित हैं –

  1. भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लिमिटेड (IFCI)

स्थापना – वर्ष 1948 में

    कार्य –

  • औद्योगिक प्रतिष्ठानों को दीर्घकालीन एवं मध्यकालीन ऋण देना।

  • यह औद्योगिक उत्पादन क्षमता में स्थायी सुधार हेतु ऋण देता है।

  • यह अधिकतम 25 वर्षों तक के लिए ऋण देता है।

  1. भारतीय औद्योगिक साख एवं निवेश निगम लिमिटेड (ICICI)

स्थापना – वर्ष 1955 में

कार्य – निजी क्षेत्र में स्थापित औद्योगिक इकाइयों का वित्तपोषण

नोटः वर्ष 2002 से इस संस्था का विलय ICICI बैंक में कर दिया गया।

  1. भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (IDBI)

स्थापना – वर्ष 1964 में

कार्य – औद्योगिक उद्देश्यों के सभी स्तरों का वित्तपोषण आधारभूत उद्योगों को प्रोत्साहन।

नोटः अक्टूबर, 2004 से इसे वाणिज्यिक बैंक के रुप में अधिसूचित कर दिया गया है।

  1. भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक (IIBI)

  • वर्ष 1971 में भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण निगम लिमिटेड की स्थापना कमजोर औद्योगिक इकाइयों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने हेतु की गई थी।

  • वर्ष 1985 में इसे भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण बैंक में रुपांतरित कर दिया गया।

  • मार्च, 1997 में पुनः इसका नाम बदलकर भारतीय औद्योगिक निवेश बैंक रखा गया।

कार्य – बीमार औद्योगिक इकाइयों का वित्तपोषण।

  1. भारतीय यूनिट ट्रस्ट (UTI)

स्थापना – नवंबर 1963 में

कार्य – 1 जुलाई, 1964 से इसने यूनिट बेंचकर बचत एकत्रित करने का कार्य प्रारंभ किया।

  • छोटी बचतों को इकठ्ठा कर उससे उद्योगों का वित्तपोषण करना।

  1. भारतीय लघु उद्योग बैंक (SIDBI)

स्थापना – अक्टूबर, 1989 में अधिनियम द्वारा। अप्रैल, 1990 से कार्यरत

कार्य – लघु उद्योगों को वित्त उपलब्ध कराना।

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भारत में सार्वजनिक उद्यम

नवरत्न कंपनियों

  • भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की 9 चुनिंदा कंपनियों को अधिक निर्णय में स्वतंत्रता देने हेतु वर्ष 1997 में इन्हें नवरत्न कंपनियों का दर्जा दिया गया। वर्तमान में इनकी संख्या 16 है।

महारत्न कंपनियां

  • श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली कंपनियों को जो निम्न मानकों को पूरा करती हैं, महारत्न का दर्जा दे दिया जाता है –

  1. पिछले तीन वर्षों में वार्षिक निवल लाभ 5 हजार करोड़ हो।

  2. कंपनी का निवल मूल्य 15 हजार करोड़ रुपये हो।

  3. तीन वरषों मे औसत रुप से 25 हजार करोड़ रुपये का कारोबार किया हो।

  4. यह शेयर बाजार में सूचीबध्द हो।

वर्तमान में कुल आठ कंपनियों को महारत्न का दर्जा दिया जा चुका है –

  1. NTPC

  2. ONGC

  3. SAIL

  4. IOC

  5. GAIL

  6. BHEL

  7. CIL

  8. BPCL

नोटः सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ कंपनियों को मिनी रत्न का दर्जा भी दिया जाता है।

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प्रमुख समितियां एवं आयोग

समिति/आयोग

स्थापना

कार्य

1.   महालनोबिस समिति

1960

आय वितरण का आकलन

2.   खुसरो समिति

1989

कृषि एवं ग्रामीण साख

3.   दांतेवाला समिति

1969

बेरोजगारी अनुमान

4.   सरकारिया आयोग

1983

केन्द्र राज्य संबंध

5.   गोइपोरिया समिति

1990

बैंकिंग सेवा सुधार

6.   गोस्वामी समिति

1990

औद्योगिक रुग्णता

7.   नरसिंहम समिति

1991

वित्तीय सुधार

8.   राजा चेलैया समिति

1991

कर सुधार

9.   जानकीरमन समिति

1992

प्रतिभूति घोटला

10.                     मल्होत्रा समिति

1993

बीमा सुधार

11.                     भंडारी समिति

1994

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की पुनर्संरचना

12.                     आबिद हुसैन समिति

1995

लघु उद्योग

13.                     मीरा सेठ समिति

1997

हथकरघा विकास

14.                     महाजन समिति

1997

चीनी उद्योग

15.                     तारापोर समिति

1997

रुपये की पूंजी खाते में परिवर्तनीयता

16.                     सुरेश तेंदुलकर समिति

2005

गरीबी आकलन

17.                     सच्चर समिति

2000

मुस्लिमों की सामाजिक आर्थिक एवं शैक्षणिक स्थिति में सुधार

18.                     पारिख समिति

2013

पेट्रोलियम उत्पादों की मूल्य प्रणाली

19.                     मालेगाम समिति

2018

बैंकिंग क्षेत्र में बुरे (खराब)  लोन हेतु

 

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प्रमुख बोर्ड

भारतीय कॉफी बोर्ड

बंगलुरु (कर्नाटक)

भारतीय बोर्ड

कोट्टायम (केरल)

भारतीय चाय बोर्ड

कोलकाता (प. बंगाल)

भारतीय तंबाकू बोर्ड

गुंटूर (आंध्र प्रदेश)

भारतीय मसाले बोर्ड

कोच्चि (केरल)

राष्ट्रीय अंगूर प्रसंस्करण बोर्ड

पुणे (महाराष्ट्र)

राष्ट्रीय जूट बोर्ड

कोलकाता (प. बंगाल)

राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड

हैदराबाद (तेलंगाना)

  • भारत सरकार ने 4 नवंबर, 2011 को राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (NMP) अधिसूचित की। इस नीति का उद्देश्य का एक दशक में जीडीपी (GDP) में विनिर्माण क्षेत्र का अंश बढाकर 25 प्रतिशत करना और 10 करोड़ से अधिक रोजगारों का सृजन करना है।

  • वर्ष 1929 का व्यापार विवाद अधिनियम प्रायोगिक तौर पर पांच वर्ष के लिए लागू किया गया था। इस अधिनियम द्वारा व्यापार विवादों के जांच एवं समाधान हेतु समझौता बोर्ड (Board of Conciliation) तथा जांच न्यायालय (Court of inquiry) के गठन का प्रावधान किया गया। अधिनियम द्वारा रेलवे, डाक, टेलीग्राफ तथा टेलीफोन जैसी सार्वजनिक रुप से उपयोगी सेवाओं में बिना पूर्व सूचना के हड़ताल अथवा तालाबंदी को निषिध्द कर दिया गया।

  • भारत सरकार ने भारतीय गुणवत्ता परिषद (Quality Council of India: QCI) की स्थापना वर्ष 1977 में भारतीय उद्योगो के साथ संयुक्त रुप से की थी। भारतीय गुणवत्ता परिषद (QCI) मे भारतीय उद्योग का प्रतिनिधित्व तीन प्रमुख उद्योग संघों जैसे – एसोचैम (ASSOCHAM), सीआईआई (CII) तथा फिक्की (FICCI) के द्वारा किया जाता है। यह भारतीय उत्पादों एवं सेवाओं की गुणवत्ता प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के उद्देश्य से अनुरूपता मूल्यांकन प्रणाली, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी गई है, कि स्थापना करके देश में गुणवत्ता संबंधी अभियान को एक नीतिपरक दिशा देता है।भारतीय गुणवत्ता परिषद 38 सदस्यों का एक परिषद द्वारा संचालित है, जिसमें सरकार उद्योग तथा उपभोक्ताओं का समान प्रतिनिधित्व है। क्यूसीआई (QCI) के अध्यक्ष की नियुक्ति उद्योग द्वारा सरकार को की गई संस्तुतियों पर प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। वर्तमान में इस परिषद के अध्यक्ष आदिल जैनुलभाई हैं, जिनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री द्वारा सितंबर, 2014 में की गई थी।

  • प्रथम कारखाना अधिनियम, 1881 में पारित किया गया था। इसमे केवल ऐसे मजदूर जो बच्चे थे, उन्ही की सुरक्षा से संबंधित प्रावधान बनाया गया था। इस अधिनियम में महिला मजदूर में संबंधित कोई प्रावधान नहीं बनाया गया था। अतः इस अधिनियम से मजदूर सामान्यतः निराश थे। एन.एम. लोखंडे (Narayan Meghaji Laokhande) भारत में मजदूर आंदोलन संगठित करने में अग्रगामी थे। 19वीं शताब्दी में वे न केवल हथकरघा एवं कपड़े के मिल की दयनीय स्थिति को सुधार करने के लिए याद किए जाते हैं, बल्कि जाति एवं संप्रदाय जैसे मुद्दे पर भी उन्होंने साहसिक पहल किया।

उद्योगो में वृध्दि दर (प्रतिशत में) वर्ष 2000-01 एवं 2017-18 में इस प्रकार है –

उद्योग

2000-01

2016-17

2017-18

अप्रैल-दिसंबर

सीमेंट

-0.9

2.8

2.7

कोयला

3.5

1.5

1.3

बिजली

3.9

6.4

4.9

इस्पात

6.5

10.9

6.7

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  • भारत के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) की गणना CSO द्वारा की जाती है। इस दो आधारों पर परिगणित किया जाता है –

  1. पहला ब्रॉड सेक्टर्स (विस्तृत क्षेत्र) पर आधारित IIP जिसमें खनन, विनिर्माण तथा विद्युत शामिल होता है।

  2. दूसरा यूज बेस्ड (Use Based) IIP जिस के अंतर्गत बेसिक गुड्स, पूंजीगत गुड्स, इंटरमीडिए गुड्स, उपभोक्ता गुड्स, कंज्यूमर ड्यूरेबल तथा गैर-कंज्यूमर ड्यूरेबल शामिल होते हैं। इसमें निर्माण (Construction) सम्मिलित नहीं होता है।

  • औद्योगिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 1960 से परिवर्तित कर 1982 किया गया था। वर्तमान मे औद्योगिक उपभोक्ता सूचकांक आधार वर्ष 2010 है।

  • भारत में 8 उद्योगों को मूल उद्योगों (Core Industries) का दर्जा प्राप्त है। संपूर्ण औद्योगिक उत्पादन में इन मूल उद्योगों का योगदान 37.90% है। ये आठ मूल उद्योग हैं –

  1. कच्चा तेल

  2. पेट्रोलियम रिफाइनरी उत्पाद

  3. प्राकृतिक गैस

  4. उर्वरक

  5. कोयला

  6. विद्युत

  7. सीमेंट

  8. तैयार इस्पात

  • मशीनों, औजारों और श्रम का उपयोग करके सामान बनाने की क्रिया को विनिर्माण (Manufacturing) कहते हैं। विनिर्माण के अंतर्गत हस्तकला से लेकर उच्च तकनीकी तक की गतिविधियां शामिल होती हैं, किंतु इस शब्द का उपयोग प्रायः औद्योगिक उत्पादन के अर्थ में किया जाता है। इसमें कच्चा माल बड़े पैमे पर तैयार माल में बदला जाता है। निर्माण उद्योग को विनिर्माण से अलग रखा जाता है। इस उद्योग के तहत बुनियादी सुविधाओं (भवन, पुल, बांध आदि) का निर्माण किया जाता है।

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  • राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, 4 नवंवर 2011 को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा अधिसूचित की गई। इस नीति का उद्देश्य जीडीपी में विनिर्माण के हिस्से को एक दशक के भीतर 25 प्रतिशत तक बढ़ाना तथा 100 मिलियन रोजगारों का सृजन करना है।

  • भारत सरकार ने अप्रैल, 2000 में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) की नीति की घोषणा की। यह एक शुल्क मुक्त आर्थिक क्षेत्र है, जहां व्यापार संचालन तथा शुल्क एवं तटकर से काफी छूट प्राप्त होती है। भारत सरकार द्वारा विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम वर्ष 2005 में पारित किया गया, जो फरवरी, 2006 से प्रभावी हुआ।

  • वर्तमान में भारतीय लघु उद्योगों के सम्मुख प्रमुख समस्याएं हैं – पूंजी का अभाव, विपणन की समस्या, कच्चे माल का अभाव, आधारभूत संरचना की बाधा, सीमा शुल्क नीति, विलंबित भुगतान, रुग्णता की समस्या, निम्न स्तरीय आंकड़ों की उपलब्धता आदि।

  • लघुस्तरीय व कुटीर उद्योगो का महत्व इस बात में है कि ये प्रति इकाई पूंजी निवेश पर अधिक रोजगार उत्पन्न करने वाले क्षेत्र हैं। भारत जैसे विकासशील देश जहां श्रमाधिशेष हैं, ये महत्वपूर्ण उद्योग हैं।

  • भारत में सबसे महत्वपूर्ण लघु स्तर उद्योग हथकरघा उद्योग है जिसके अंतर्गत मलमल, छींट, दरी, खादी आदि उद्यम सम्मिलित हैं। हथकरघा उद्योग असंगठित क्षेत्र के तहत आता है जिसमें लगभग 65 लाख से अधिक श्रमिक नियोजित हैं।

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  • एस्सार ऑयल लिमिटेड निजी क्षेत्र मे है जबकि मंगलौर रिफाइनरी तथा बोंगाईगांव रिफाइनरी क्रमशः ONGC तथा IOC की सहायक इकाइयां हैं। देश में इस समय कुल 23 तेल शोधनशालाएं (रिफाइनरी) हैं, जिनमें 18 सार्वजनिक/संयुक्त क्षेत्र, 3 निजी क्षेत्र तथा 2 संयुक्त उद्यम में हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरी –

  1. भारतीय तेल निगम (IOC), गुवाहाटी, नूनमती (असम)

  2. भारतीय तेल निगम (IOC), बरौनी (बिहार)

  3. भारतीय तेल निगम (IOC), कोयाली (बड़ोदरा) गुजरात

  4. भारतीय तेल निगम (IOC), हल्दिया (प. बंगाल)

  5. भारतीय तेल निगम (IOC), मथुरा (उत्तर प्रदेश)

  6. भारतीय तेल निगम (IOC), डिग्बोई (असम)

  7. भारतीय तेल निगम (IOC), पानीपत (हरियाणा)

  8. भारतीय तेल निगम (IOC), बोगाईगांव (असम)

  9. चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. (CPCL) (IOC की सहायक), मनाली (चेन्नई)

  10. चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. (CPCL), नागपट्टिनम (तमिलनाडु)

  11. हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. (HPCL), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश)

  12. हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लि. (HPCL), मुंबई (महाराष्ट्र)

  13. भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. (BPCL), मुंबई (महाराष्ट्र)

  14. कोच्चि रिफाइनरीज लि. (BPCL की सहायक कंपनी), कोच्चि (केरल)

  15. नुमालीगढ़ रिफाइनरीज लि. (NRL) (BPCL की सहायक), नुमालीगढ़ (असम)

  16. तातीपाका (ONGC), तातीपाका (आंध्र प्रदेश)

  17. मंगलौर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) (ONGC की सहायक), मंगलौर (कर्नाटक)

  18. पारादीप रिफाइनरी, (IOC) ओड़िशा।

निजी क्षेत्र की रिफाइनरी –

  1. रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL), जामनगर (गुजरात)

  2. रिलायंस पेट्रोलियम लिमिटेड (RPL; SEZ), जामनगर (गुजरात)

  3. एस्सार ऑयल लिमिटेड (EOL), बाडीनार (Vadinar) (गुजरात)

संयुक्त क्षेत्र की रिफायनरी –

  1. भारत ओमान रिफाइनरीज लिमिटेड (OOCL), बीना (मध्य प्रदेश)

  2. HPCL, भटिंडा।

  • प्राकृतिक गैस उर्वरक उत्पादन में एक महत्वपूर्ण आदान (Input) है, अतः भारत में संभावित विशाल प्राकृतिक गैस संसाधनों का उपयोग उर्वरक उत्पादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।

  • कपड़ा उद्योग भारत का सबसे पुरना एवं विशाल उद्योग है। भारत में आधुनिक स्तर की प्रथम सती मिल 1818 ई. में कलकत्ता (अब कोलकाता) के निकट स्थापित की गई थी। 13 अगस्त, 1947 तक भारत में 394 सूती वस्त्र मिलें थी। पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात यहां 380 मिलें रह गई थी।

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  • ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) सार्वजनिक क्षेत्र का एक उपक्रम है, जो रुक्ष तेल तथा प्राकृतिक गैस के अनुसंधान, विकास और उसके उत्पादन तथा रेल परिवहन में संलग्न है।

  • बड़े आकार का कागज अर्थात अखबारी कागज का उत्पादन सबसे अधिक भारत के नेशनल न्यूज प्रिंट एंड पेपर मिल्स लिमिटेड, नेपानगल में किया जाता है, जो मध्य प्रदेश में है। वर्ष 1960-61 में अखबारी कागज का उत्पादन भारत में 0.4 लाख टन था। जो वर्ष 2003-04 में बढ़कर 6.5 लाख टन हो गया। वर्तमान में भी भारत अखबारी कागज की भारी कमी है और हमारी आवश्यकता का लगभग 70% आयात किया जाता है।

  • भारत की सरकारी क्षेत्र में सबसे बड़ी व्यापारिक संस्था खनिज एवं धातु व्यापार निगम (MMTC) है। यह भारत के दो सबसे बड़े विदेशी मुद्रा कमाने वाले संस्थानों में से एक है। यह भारत में खनिजों का विशालतम निर्यातक एवं भारत का विशालतम बुलियन व्यापारी है।

  • भारत में पर्यटन और होटल उद्योग के विकास का कार्य आई.टी.डी.सी. (Indian Tourism Development Corporation: TDC) का है। यह एक अर्ध्दस्वायत्त संस्था है। यह संस्था पर्यटकों से जुड़ी समस्याओ के समाधान का कार्य करती है।

  • विनिर्माण क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय निवेश तथा विनिर्माण क्षेत्रों की स्थापना करने के साथ-साथ एकल खिड़की मंजूरी की सुविधा प्रदान की है। विनिर्माण क्षेत्र को विकसित बनाने के लिए प्रौद्योगिकी अधिग्रहण तथा विकास कोष की स्थापना भी सरकार द्वारा की गई है।

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  • सरकार द्वारा वित्तीय उत्प्रेरक (Financial Stimulation) अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने अथवा आर्थिक संकट में पड़ने से बचाने के लिए प्रदान किया जाता है। इसके तहत देश में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को राजकोषीय प्रोत्साहन दिए जाते हैं।

  • सरकार ने मेगा फूड पर्क योजना को सितंबर, 2008 में अनुमोदित किया था। एमएफपीएस के मूल उद्देश्यों में शामिल हैं –

  1. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए पर्याप्त/उत्तम अवसंरचना सुविधाओं के साथ फर्म से बाजार तक मूल्यवर्धित आपूर्ति श्रृंखला उपलब्ध कराना

  2. खराब होने वाले (Perishable) पदार्थों का प्रसंस्करण वर्तमान के 6% से बढ़ाकर 20% तक करना और अपव्यय घटाना।

परंतु उद्यमियों के लिए उद्गामी एवं पारिस्थितिकी अनुकूल खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियां उपलब्ध कराना इसमें शामिल नही है।

  • 25 अक्टूबर, 2011 को आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडली समिति (CCEA) ने 15 नए मेगा फूड पार्क परियोजनाओं की स्थापना को स्वीकृति प्रदान की थी जो पहले से घोषित 15 परियोजनाओं के अतिरिक्त थी। इनकी स्थापना अवसंरचना विकास योजना के तहत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए अवसंरचना सुविधाओं मे सुधार हेतु की जा रही है।

  • तारापोर समिति पूंजीगत खाते में रुपये की परिवर्तनीयता पर सलाह हेतु गठित हुई थी।

  • भारत के 8 कोर सेक्टर हैं –

  1. कोयला

  2. कच्चा तेल

  3. प्राकृतिक गैस

  4. रिफाइनरी उत्पाद

  5. उर्वरक

  6. इस्पात

  7. सीमेंट

  8. विद्युत

  • रोजगार की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा उद्योग हथकरघा उद्योग है।

  • औद्योगिक विकास की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का पश्चिमी क्षेत्र सर्वाधिक विकसित है।

  • टिस्को (टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी) सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम नही है। यह भारत की प्रमुख इस्पात कंपनी है जिसकी स्थापना वर्ष 1907 में जमशेदपुर में की गई थी। NTPC, SAIL, BHEL ये तीनों सार्वजनिक क्षेत्र की महारत्न कंपनियां हैं।

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  • उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों का विशिष्ट योगदान है। लघु एवं मध्यम उद्योग कम लागत से रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराते हैं। उ.प्र. प्रदेश में लघु एवं मध्यम उपक्रमों को जिनके द्वारा दीर्घकालीन ऋण उपलब्ध कराया जाता है वे निम्न हैं –

– उ.प्र. लघु उद्योग निगम

– उ.प्र. औद्योगिक विकास निगम

– उ.प्र. वित्तीय निगम इत्यादि।

  • 19 सितंबर, 2006 को भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र की जिन 6 अतिरिक्त औद्योगिक इकाइयों को मिनीरत्न का दर्जा प्रदत्त किया गया था वे इस प्रकार थी –

  1. BSNL

  2. BEML

  3. Hindustan Latex

  4. Engineering Project India Ltd.

  5. Rashtriya Ispat Limited

  6. Garden Reach Shipbuilders and Engineers

  • सरकारी नीति वर्ष

सूचना तकनीक नीति           2000

खनिज नीति                  2011

होटल नीति                   2006

औद्योगिक एवं निवेश प्रोत्साहन  2010

  • किसी पीएसयू को मिनी रत्न का दर्जा बनाए रखने के लिए पिछले लगातार तीन वर्षों तक मुनाफा अर्जित करते रहने की आवश्यकता होती है। मिनीरत्न का दर्जा पीएसयू को बिना सरकार की मंजूरी के लिए 500 करोड़ रुपये तक के निवेश की स्वायत्तता देता है।

  • नवरत्न सार्वजनिक उपक्रमों का एक विशिष्ट वर्ग है जिनमें सरकार ग्लोबल कंपनी होने की संभाव्य क्षमता देखती है।

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  • एशिया का सबसे बड़ा एल्युमीनियम संकुल नेशनल एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड (NALCO) वर्ष 1981 में भारत सरकार के एक सार्वजनिक उद्यम के रुप में स्थापित किया गया था। अद्यतन स्थिति के अनुसार नवरत्न दर्जा प्राप्त कंपनियों में नाल्कों भी शामिल है। महारत्न कंपनियों की संख्या 8 है। मिनीरत्न कटेगरी-1 (cPSEs) में 56 तथा मिनीरत्न कटेगरी-2(cPSEs) में 17 कंपनियां हैं।

  • उद्योग मंत्रालय द्वारा 16 नवंबर, 2010 को सार्जनिक क्षेत्र की 4 नवरत्न कंपनियों को महारत्न का दर्जा दिया गया। ये चार कंपनियां थी –

  1. भारतीय तेल निगम (IOC)

  2. राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC)

  3. तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC)

  4. स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लि. (SAIL)

इनके अतिरिक्त बाद में कोल इंडिया लि. (CIL), भारत हैवी इलेक्ट्रानिकल्स लिमिटेड (BHEL), गेल (GAIL) तथा BPCL  को  भी महारत्न का दर्जा दिया गया है।

  • एचएएल (Hindustan Aeronautics Limited: HAL) वायुयानों के उपकरणों का उत्पादन करती है।

  • भारत में पेट्रोल, डीजल जैसे तेल सरकारी नियंत्रण-मुक्त पदार्थ (De- regulated Commodities) हैं जिनकी कीमतें तेल कंपनियां निर्धारित करती हैं।

तृतीयक क्षेत्र (सेवाएं)

  • तृतीयक क्षेत्र के अंतर्गत सेवा क्षेत्र या सेवा उद्योग आता है, जिसमें व्यापार, होटल, परिवहन, संचार, बैंकिंग, बीमा, वास्तविक संपत्ति, सार्वजनिक प्रशासन, सुरक्षा, शिक्षा, पत्र-पत्रिकाएं, मनोरंजन एवं विदेशी क्षेत्र आदि आते हैं।

  • विपणन तृतीयक क्रियाकलाप है, इसके अंतर्गत पदार्थों का संग्रह, भंडारण, प्रसंस्करण एवं विपणन, परिवहन, होटल, संचार, पैकिंग, वर्गीकरण और विवरण आदि किया जाता है। कृषि एवं वानिकी प्राथमिक क्षेत्र से जबकि विनिर्माण द्वीतीयक  क्षेत्र से संबधित है।

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आधारभूत मूल्यों पर सकल मूल्य संवर्धन में हिस्सा

क्षेत्र

2016-17 (1st RE)

चालू कीमतों पर

2017-18

चालू कीमतों पर

कृषि

17.9

16.4

उद्योग

29.0

31.2

खनन व उत्खनन

2.2

3.0

विनिर्माण

16.6

18.1

इलेक्ट्रिसिटी, गैस व जलापूर्ति

2.5

2.2

निर्माण

7.7

8.0

GVA at Basic Price

100.0

100

 

भारत में सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GDP) में स्थिर मूल्यों (2004-05) एवं उपादान लागत पर वर्ष 2012-13 के अग्रिम अनुमान के अनुसार, सेवा क्षेत्र (तृतीयक क्षेत्र) का योगदान 59.29%  उद्योग क्षेत्र का योगदान 27.03% एवं कृषि क्षेत्र का योगदान 13.68% का था। वर्तमान (2015-15) में भी सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी सर्वाधिक है।

चालू कीमतों पर GVA (मूलभूत कीमत पर) में क्षेत्रवार हिस्सेदारी (% मे)-

 

2014-15

2015-16

2017-18 (1ST AE)

कृषि एवं संबंध्द क्षेत्र

18.0

17.5

18.67

उद्योग

30.1

29.6

26.17

सेवा

51.8

53.0

55.16

 

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राजकोषीय नीति एवं राजस्व

  • सरकार द्वारा देश में स्थिरता के साथ विकास को बढ़ावा देने हेतु राजकोषीय नीति का क्रियान्वयन किया जाता है।

  • राजकोषीय नीति का क्रियान्वयन बजटीय घोषणाओं के माध्यम से किया जाता है।

  • राजकोषीय नीति के चार उपकरण हैं –

  1. कर

  2. सार्वजनिक व्यय

  3. ऋण

  4. नई मुद्रा का निर्माण

  • कर जनता को दिया जाने वाला एक अनिवार्य भुगतान होता है, जिसके बदले में सरकार किसी प्रतिपूर्ति का वादा नही करती है।

  • करों को दो भागों में बांटा जाता है –

  1. प्रत्यक्ष कर

  2. अप्रत्यक्ष कर

  • ऐसे कर जिन्हें दूसरे पर टाला जा सके, अप्रत्यक्ष कर कहलाते हैं, जबकि ऐसे कर जिन्हें दूसरे टाला जा सके उसे प्रत्यक्ष कर कहते हैं।

  • कर की दर के निर्धारण के आधार पर करारोपण के चार मॉडल हैं –

  1. प्रगतिशील

  2. आनुपातिक

  3. प्रतिगामी

  4. अधोगामी

  5. प्रगतिशील करारोपण (Progressive Taxation) – जब आय में वृध्दि के साथ-साथ कर की दर में भी वृध्दि होता जाए, तो ऐसे करारोपण को प्रगतिशील करारोपण कहते हैं।

  6. आनुपातिक करारोपण (Proporational Taxation) – जब आय चाहे जितनी भी बढ़ जाए, परंतु कर की दर कोई परिवर्तन न हो तो इस प्रणाली को आनुपातिक करारोपण कते हैं।

  7. प्रतिगामी करारोपण (Rgressive Taxation) – जब आय में वृध्दि के साथ कर की दर मे कमी कर दी जाए, तो इसे प्रतिगामी करारोपण कहा जाता है।

  8. अधोगामी करारोपण (Degressive Taxation) – जब कर की दर एक निश्चित सीमा तक आय में वृध्दि के साथ बढ़े परंतु उस सीमा के बाद स्थिर हो जाए, तो इसे अधोगामी करारोपण कहते हैं।

  • भारत में अधोगामी प्रणाली है यहां 2.5-5 लाख तक 5 प्रतिशत, 5.10 लाख तक 20 प्रतिशत तथा 10 लाख रुपये से अधिक आय पर 30 प्रतिशत की दर से कर लगाया जाता है।

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लैफर वक्र (Laffer Curve)

  • लैफर वक्र का प्रतिपादन आर्थर लैफर द्वारा किया गया था।

  • यह वक्र कर की दर एवं कर से संग्रहित राजस्व के मध्य ऋणात्मक संबंध को दर्शाता है।

  • वक्र के अनुसार यदि एक सीमा के बाद कर की दर बढ़ा दी जाए, तो कर राजस्व में कमी आने लगती हैं।

  • इसके विपरीत यदि कर की दर में कमी की जाती है, तो कर राजस्व में वृध्दि होती है।

  • इसके दो प्रमुख कारण हैं –

  1. कम दर के कारण कर चोरी में कमी आती है।

  2. कर की दर व्यापार एवं वाणिज्य को बढ़ा देता है, जिससे आधार बढ़ जाता है।

सार्वजनिक व्यय

  • सार्वजनिक व्यय का तात्पर्य सरकार द्वारा विभिन्न उत्पादक, अनुत्पादक, कल्याण आदि पर किए गए व्ययों से है। व्यय को दो आधारों पर विभाजित किया जाता है –

  1. प्रकृति के आधार पर

  • राजस्व व्यय

  • पूंजीगत व्यय

  1. उत्पादकता के आधार पर

  • योजनागत व्यय

  • गैर-योजनागत व्यय

राजस्व व्यय (Revenue Expenditure)

  • राजस्व व्यय वह व्यय होता है, जो अपने स्वरुप में आवर्ती (निश्चित अंतराल पर लगातार होने वाला) होता है तथा जिससे न तो किसी दायित्व में कमी आती और न ही किसी संपत्ति का ह्रास होता है। जैसे – वेतन, ब्याज आदि।

पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure)

  • ऐसा व्यय को कभी-कभी होता हो तथा जिसके व्यय से किमी न किसी संपत्ति का सृजन होता हो या किसी न किसी दायित्व में कमी आती हो, पूंजीगत व्यय कहलाता है। उदाहरण – ऋणों का भुगतान, बांध निर्माण आदि।

योजनागत एवं गैर-योजनागत व्यय (Planned & Non  Planned  Expenditure)

  • जब किसी योजना के क्रियान्वयन हेतु अथवा योजनागत निर्माण हेतु व्यय किया जाता है तो उसे योजनागत व्यय कहते हैं, जबकि योजनाओं से इतर (रख-रखाव, प्रशासनिक आदि) किया गया व्यय गैर-योजनागत व्यय कहलाता है।

  • वर्तमान में भारत में योजनागत एवं गैर-योजनागत व्यय का लेखांकन समाप्त कर दिया गया है। वर्तमान मे केवल पूंजीगत एवं राजस्व व्यय का ही लेखांकन किया जाता है।

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सार्वजनिक ऋण (Public Debt)

  • किसी समय विशेष पर देश के ऊपर सकल ऋण दायित्व ही सार्वजनिक ऋण कहलाता है।

  • सार्वजनिक ऋण आंतरिक (Internal) एवं बाह्य (External) दोनों होता है।

  • देश के अंतर से अल्पबचत योजनाओं आदि से लिया गया ऋण आंतरिक ऋण होता है, जबकि देश के बाहर से लिए गए बहुपक्षीय, द्वीपक्षीय, वाणिज्यिक उधार आदि बाह्य सार्वजनिक ऋण की श्रेणी में आता है।

भारत का बाह्य सार्वजनिक ऋण

  • भारत में प्रथम दो तिमाहियों में बाह्य सार्वजनिक ऋण के आंकड़े भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा, जबकि अंतिम दो तिमाहियों के आंकड़े वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किए जाते हैं।

  • जून अंत, 2018 में भारत के समस्त वाह्य ऋण में लगभग 80.8 प्रतिशत दीर्घअवधिक ऋण, जबकि 19.2 प्रतिशत अल्पवधिक ऋण था।

  • इन ऋणों में 50.1 प्रतिशत ऋण डॉलर में तथा 3.5.4 प्रतिशत ऋण रुपये में था।

  • वाह्य ऋण में सबसे बड़ा हिस्सा वाणिज्यिक उधारों (37.8%) (ECB- External Commercial Borrowing) का रहा। इसके बाद NRI जमाएं (24.2%) रहीं।

  • भारतीय संविधान के भाग 12 का अनुच्छेद 280 भारत में वित्त आयोग का प्रावधान करता है।

  • अनुच्छेद के अनुसार संविधान लागू होने के दो वर्ष के भीतर तथा उसके बाद प्रत्येक 5 वर्ष पर राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग का गठन किया जाएगा।

  • इसमे एक अध्यक्ष एवं चार सदस्यों का प्रावधान किया गया है।

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कार्य

  • वित्त आयोग के चार प्रमुख कार्य हैं –

  1. विभाजनीय करों का केन्द्र एवं राज्यों के मध्य तथा विभिन्न राज्यों के मध्य बंटवारा करने संबंधी फार्मूले का निर्धारण।

  2. राज्यो को राजस्व सहायता/अनुदानों के वितरण का सिध्दांत सुझाना

  3. सुदृढ़ वित्त के संदर्भ में किसी भी विषय पर सुझाव देना।

  4. नगर पालिकाओं/पंचायतों के संसाधनों में वृध्दि हेतु राज्यों की संचित निधि के संवर्धन हेतु आवश्यक सुझाव देना। यह कार्य 73वें संविधान संशोधन, 1992 में द्वारा जोड़ा गया है।

  • भारत में अब तक 15 वित्त आयोग गठित किया जा चुके हैं।

  • वर्तमान में 14वें वित्त आयोग (वर्ष 2015-2020 तक) की सिफारिशें प्रभावी हैं।

14वां वित्त आयोग

  • 14वें वित्त आयोग का गठन जनवरी, 2013 में किया गया था तथा इसने अक्टूबर, 2014 में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की।

  • इस आयोग के अध्यक्ष वाई.वी. रेड्डी थे।

  • इस आयोग की सिफारिशें 1 अप्रैल, 2015 से 31 मार्च, 2020 तक (5 वर्षो) के लिए हैं।

प्रमुख सिफारिशें

  • इसने 42 प्रतिशत राजस्व को राज्यों को देने की अनुशंसा की जो 13वें वित्त आयोग की 32 प्रतिशत की सिफारिश की तुलना में 10 प्रतिशत अधिक है।

  • इस वित्त आयोग ने राज्यों के मध्य राजस्व वितरण हेतु सर्वाधिक भार आय असमानता (50%) को दिया।

  • 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार राज्यों के मध्य आय वितरण फार्मूले के भारांश इस प्रकार हैं –

 

14वें वित्त

13वें वित्त

a.    1971 की जनसंख्या

17.5%

25%

b.   2011 की जनसंख्या

10.0%

c.    क्षेत्रफल

15.0%

10%

d.   वन क्षेत्र

7.5%

e.   आय असमानता

50.0%

47.5%

f.      राजकोषीय अनुशासन

17.5%

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  • 14वें वित्त आयोग के अनुसार सर्वाधिक वित्त प्राप्ति वाले राज्य –

  1. उत्तर प्रदेश –   96%

  2. बिहार –   67%

  3. मध्य प्रदेश – 55%

  4. प. बंगाल –   32%

  5. महाराष्ट्र –   52%

  • न्यूनतम आवंटन वाले राज्य –

  1. सिक्किम –   37%

  2. गोवा –   38%

  3. मिजोरम –   46%

  4. नगालैंड –   49%

  5. मणिपुर –   62%

  • भारत सरकार ने राष्ट्रपति की स्वीकृति से 27 नवंबर, 2017 को 15वें वित्त आयोग के गठन की घोषणा की।

  • 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष श्री एन.के. सिंह होंगे।

  • वित्त आयोग में अध्यक्ष के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  1. शक्तिकांत दास (भारत सरकार के पूर्व सचिव) – सदस्य

  2. डॉ. अनूप सिंह (सहायक प्रोफेसर, जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय, वाशिंगटन डी.सी. अमेरिका – सदस्य

  3. डॉ. अशोक लाहिडी (अध्यक्ष (गैर-कार्यकारी, अंशकालिक) बंधन बैंक

  4. डॉ. रमेश चन्द्र (सदस्य, नीति आयोग)

  • श्री अरविंद मेहता आयोग के सचिव होंगे।

  • 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्य कार्यभार  ग्रहण रने की तारीख से रिपोर्ट प्रस्तुत करने की तारीख या 30 अक्टूबर, 2019 तक जो भी पहले हो, अपना पद् धारण करेंगे।

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भारत के वित्त आयोग

वित्त आयोग

समय

अध्यक्ष

समयावधि

पहला

1951

के.सी. नियोगी

1952-57

दूसरा

1956

के. संथानम

1957-62

तीसरा

1960

ए.के. चंदा

1962-66

चौथा

1964

पी.वी. राजमन्नार

1966-69

पांचवा

1968

महावीर त्यागी

1969-74

छठवां

1972

के. ब्रह्मानंद रेड्डी

1974-79

सातवां

1977

जे.एम. शेलैंट

1979-84

आठवां

1983

वाई.बी. चह्वाण

1984-89

नौवां

1987

एन.के.पी. साल्वे

1989-95

दसवां

1992

के.सी. पंत

1995-2000

ग्यारहवां

1998

ए.एम. खुसरो

2005-2010

बारहवां

2003

सी. रंगराजन

2005-2010

तेरहवां

2007

विजय केलकर

2010-2015

चौदहवां

2013

वाई.वी. रेड्डी

2015-2020

पंद्रहवा

2017

एन.के. सिंह

2020-2025

 

  • राष्ट्रीय पेंशन योजना जिसे 1 जनवरी, 2004 को भारत सरकार द्वारा प्रारंभ किया गया था, एक स्वैच्छिक पेंशन योजना है। इसके अंतर्गत 18-60 वर्ष तक की आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक (निवासी अथवा अनिवासी) शामिल हो सकता है। सरकारी नौकरियों में कार्यरत लोगों हेतु विशेष उपबंध है। केन्द्र सरकार के वे कर्मचारी (सशस्त्र बलों को छोड़कर) जो 1 जनवरी, 2004 को अथवा उसके बाद से सेवा में कार्यरत हैं,  योजना में दाखिल होने के पात्र हैं। राज्य सरकारों के सभी कर्मचारी, जो संबंधित राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचना किए जाने के बाद सेवा में आएं है, भी इस योजना के पात्र हैं।

  • जीएसटी पूरे देश के लिए एक अप्रत्यक्ष कर है, जो भारत को एकीकृत साझा बाजार बना देगा। जीएसटी के लागू हो जाने से अंतिम उपभोक्ताओं को आपूर्ति श्रृंखला के अंतिम डीलर द्वारा लगया गया जीएसटी ही वहन  करना होगा। इससे पिछले चरणों के सभी मुनाफे समाप्त हो जाएंगे।

जीएसटी से लाभ –

व्यापार और उद्योग के लिए – आसान अनुपालन, कर दरों और संरचनाओं की एकरुपता, करों पर कराधान (कैसकेडिंग) की समाप्ति, प्रतिस्पर्धा में सुधार, विनिर्माताओं और निर्यातकों को लाभ।

केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए – सरल और आसान, प्रशासन, कदाचार पर  बेहतर नियंत्रण, अधिक राजस्व निपुणता।

उपभोक्ताओं के लिए – वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य  के अनुपाती एकल एवं पारदर्शी कर समग्र कर भार में राहत।

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  • वित्त वर्ष 2017-18 के केन्द्रीय बजट की दस मुख्य विषय वस्तुएं हैं – किसान, ग्रामीण आबादी, युवा, गरीब तथा विशेष सुविधाओं से वंचित वर्ग, अवसंरचना, वित्तीय क्षेत्र, डिजिटल अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक सेवा, विवेकपूर्ण राजकोषीय प्रबंधन तथा कर प्रशासन, निर्यात निष्पादन इसमें सम्मिलित नहीं है।

  • भारत में राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) का निर्धारण केन्द्र सरकार का वित्त मंत्रालय करता है जबकि मौद्रिक नीति RBI द्वारा निर्धारितत की जाती है। वित्त आयोग केन्द्र एवं राज्यों के मध्य राजस्व एवं वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करता है। योजना आयोग का कार्य पंचवर्षीय योजना का बंटवारा करता है। योजना आयोग का कार्य पंचवर्षीय योजना को तैयार करना था ज्ञातव्य है कि 1 जनवरी, 2015 से नीति आयोग ने योजना आयोग को प्रतिस्थापित कर दिया है।

  • 2015-16 के आर्थिक सर्वेक्षण में भारतीय अर्थव्यवस्था के समाजवाद से निर्गमन रहित सीमित बाजारवाद की ओर जाने को भारतीय अर्थव्यवस्था की चक्रव्यूह चुनौती माना गया है।

  • वर्ष 1985-86 के बजट भाषण में तत्कालीन वित्त मंत्री वी.पी. सिंह द्वारा दीर्घकालीन राजकोषीय नीति की घोषणा की गई थी।

  • कीन्स ने यह प्रतिपादित किया कि अवसाद (Depression) से किसी अर्थव्यवस्था को बाहर निकालने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार राजकोषीय नीति का सहारा ले तथा सार्वजनिक व्यय में वृध्दि लाए। वर्ष 1936 में कीन्स ने अपनी प्रसिध्द पुस्तक General Theory of Employment, Interest and Money इसी पर प्रकाशित की थी।

  • वित्तीय या राजकोषीय (Fiscal) नीति मुख्यतः सरकार से संबंधित होती है। राजकोषीय नीति में सरकार की आय (कर एवं कर भिन्न आय) तथा सरकार के व्यय से संबंधित नीतियां शामिल होंती हैं।

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  • बजट निर्माण के विभिन्न चरण निम्नवत हैं –

  1. आहरण एवं संवितरण

  2. अधिकारियों द्वारा अनुमानों को तैयार करना

  3. विभागों तथा मंत्रियों द्वारा संवीक्षा एवं समेकन

  4. वित्त मंत्रालय द्वारा संवीक्षा

  5. विवादों का निपटारा

  6. वित्त मंत्रालय द्वारा समेकन

  • आर्थिक समीक्षा वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार की जाती है। इसे प्रत्येक वर्ष वार्षिक बजट से पहले भारत के वित्त मंत्री द्वारा संसद में रखा जाता है। जिसमें देश के विगत वर्ष के आर्थिक स्थिति में समीक्षा की जाती है।

  • बजट सरकार की राजकोषीय नीति से संबंधित होता है। बजट प्रत्येक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल-31 मार्च) के लिए सरकार की प्राप्तियों तथा व्ययों का विवरण होता है।

  • 25 फरवरी, 2016 को रेल मंत्री सुरेश प्रभू ने रेल बजट प्रस्तुत करते हुए एक शोधकत और विकास संगठन – स्पेशल रेलवे इस्टेब्लिशमेंट फॉर स्ट्रेटजिक टेक्नोलॉजी एंड हॉलिस्टिक एडवांसमेंट (SHRESTHA- श्रेष्ठ) के गठन का प्रस्ताव किया। इसके गठनोपरांत पूर्ववर्ती संगठन RDSO केवल रोजमर्रा के मामलों पर ही ध्यान केन्द्रित करेगा जबकि श्रेष्ठ का लक्ष्य दीर्घकालिक शोध करना होगा। श्रेष्ठ का प्रधान एक प्रख्यात वैज्ञानिक होगा।

  • वर्ष 2010-11 के लिए कुल प्राप्तियां 1108749 करोड़ रही जिसमें से 61% धनराशि आयगत (राजस्व) प्राप्तियों से आता था और 39% पूंजीगत प्राप्तियों से आता था। बजट अनुमान 2018-19 के अनुसार, कुल प्राप्तियां 2442213 करोड़ रु. अनुमानित हैं जिनमें राजस्व प्राप्तियां 1725738 करोड़ रु. तथा पूंजीगत प्राप्तियां 716475 करोड़ रु. है।

  • सब्सिडी, ब्याज भुगतान, रक्षा व्यय, पिछली पंचवर्षीय योजनाओं में पूरी की गई परियोजनाओं का रख-रखाव व्यय, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन भुगतान, राज्यों को संवैधानिक हस्तांतरण आदि गैर-योजना व्यय के अंतर्गत आते हैं। वर्तमान में बजट से (बजट अनुमान 2017-18 से) व्यय के योजनागत एवं गैर योजनागत व्यय को व्याप्त कर दिया गया है। रेल बजट को भी आम बजट में शामिल कर लिया गया है।

  • केन्द्रीय बजट में राजस्व व्यय (गैर-योजनागत व्यय) की सबसे बड़ी मद ब्याज की अदायगी है।

वर्ष 2018-19 (B.E.) मे कुल व्यय (Total Expenditure) 2442213 करोड़ रुपये है जिसमें से –

ब्याज भुगतान     –   575795

मुख्य उपादान     –   292825

रक्षा व्यय        –   282733

  • समयावधि 2008-10 के मध्य केन्द्र सरकार के राजस्व या चालू खाते में व्यय का सबसे प्रमुख मद ब्याज अदायगियां थी, इसके पश्चात क्रमशः सहायिकाएं एवं रक्षा व्यय का स्थान था।

  • वर्ष 2015-16 के बजट में गैर-नियोजन व्यय का सबसे बड़ा मद ब्याज अदायगी था।

  • वर्ष 2011-2012 मे राजकोषीय घाटा जी.डी.पी. का 5.7% था।

  • बजट 2018-19 में सकल राजस्व प्राप्तियों में सीमा शुल्क तथा केन्द्रीय उत्पाद शुल्क का योगदान क्रमशः 6.52% तथा 16.05% रहा/अनुमानित है।

  • बजट अनुमान 2018-19 मे राजकोषीय घाटे को 3.3 प्रतिशत पर लक्षित किया गया है।

  • राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण संस्थागत सुधार के द्वारा पाया जा सकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा या उच्च शैक्षिक संस्थानों का निजीकरण राजकोषीय घाटे के नियंत्रण के उपाय नही हैं।

  • भारत में शून्य आधारित बजट सर्वप्रथम वर्ष 1983 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग में तथा बाद में वर्ष 1986-87 से समस्त मंत्रालयों में लागू किया गया। शून्य आधारित बजट में प्रत्येक योजना को शून्य से प्रारंभ मानकर पुनः समीक्षा की जाती है।

  • वित्तीय वर्ष 2002-03 में राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा 102122 करोड़ रुपया था। वर्ष 2016-17 में भारत का सकल राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6.9% रहा। इनमे से केन्द्र का घाटा 3.5% तथा राज्यों का संयुक्त घाटा 2.6% रहा।

  • वर्ष 2012-13 के बजट में सब्सिडी पर किए जाने वाले व्यय को GDP के 2.0% तक रखने का प्रस्ताव किया गया था। वर्ष 2016-17 में कुल सब्सिडी व्यय GDP का 2.14% रहा।

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केन्द्र सरकार के प्रारंभिक घाटा, राजकोषीय घाटा, आगम घाटा (करोड़ रु. में) निम्न प्रकार से हैं –

घाटा

बजट

2003-2004

बजट

2017-18

बजट

2018-19

राजकोषीय घाटा

125960

546531

624276

आगम घाटा

(राजस्व घाटा)

98308

321163

416034

प्रारंभिक घाटा

1699

23453

48481

 

  • सरकार द्वारा बढ़ रहे घाटों को नियंत्रित करने के लिए सब्सिडी का युक्तीकरण, राजस्व व्यय में कमी तथा चालू खाते में घाटा को कम किया जाता है। इसके विपरीत सार्वजनिक व्यय बजट घाटे को और बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त मुद्रस्फीति को कम करके व सार्वजनिक व्यय की गुणवत्ता पर जोर देकर नए करों के युक्तीकरण द्वारा भी घाटे को कम किया जा सकता है।

  • प्राथमिक घाटे को प्राप्त करने हेतु राजकोषीय घाटे में से ब्याज अदायगियों को घटा दिया जाता है। अतः

प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा –  ब्याज अदायगी

बजटीय घाटा = कुल प्राप्तियां – कुल व्यय

राजस्व घाटा = राजस्व प्राप्तियां – राजस्व व्यय

राजकोषीय घाटा = बजटीय घाटा (कुल प्राप्ति-कुल व्यय) + सरकार का ऋण एवं अन्य देयताएं। या

राजकोषीय घाटा = राजस्व  प्राप्तियां + ऋण से प्राप्तियां + अन्य प्राप्तियां – कुल व्यय

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  • राजकोषीय घाटा, बजटीय घाटे से बड़ा होता है इसका कारण यह है कि बजटीय घाटा यहां सरकार के कुल व्यय एवं कुल प्राप्तियों का अंतर होता है वही राजकोषीय घाटा सरकार की कुल आय और कुल व्यय का अंतर होता है। सार्वजनित ऋण एवं अन्य देयताएं सरकार की प्राप्तियां तो हैं, किंतु ये सरकार की आय नहीं हैं क्योंकि सरकार पर इन्हे लौटाने का दायित्व रहता है। अतः राजकोषीय घाटा बजट घाटे की अपेक्षा अधिक होता है।

  • बजट के हिसाब-किताब की जांच सार्वजनिक लेखा समिति द्वारा की जाती है। इस समिति में 22 सदस्य (15 लोक सभा + 7 राज्य सभा) होते हैं। विपक्षी दल का कोई सदस्य ही इस समिति का अध्यक्ष होता है। यह संसद की सबसे पुरानी वित्तीय समिति है।

  • संघीय सरकार के बजटों मे राजकोषीय घाटे के बड़े भाग की पूर्ति घरेलू ऋण एवं अन्य देयताओं के माध्यम से की जाती है। वर्ष 2015-16 में घाटे का लगभग 98% वित्तपोषण घरेलू संसाधनों द्वारा ही किया गया।

  • केन्द्रीय बजट 2016-17 के अनुसार, 1 करोड़ रुपये वार्षिक से अधिक आय होने पर 15 प्रतिशत का अधिभार देय होगा।

  • हीनार्थ प्रबंधन (अर्थात घाटे की पूर्ति के लिए नए नोट छापना) से मुद्रास्फीति की संभावना बनती है क्योंकि इससे मुद्रा की आपूर्ति वस्तुओं एवं सेवाओं की तुलना में अधिक हो जाती है।

  • भारत जैसे देश में घाटे की वित्त व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास को बढ़ावा देना होता है। इन देशों में विकास योजनाओं के वित्त पोषण के लिए यह आवश्यक हो जाता है, जबकि विकसित देशों में घाटे की वित्त व्यवस्था अवसाद की स्थिति को दूर करने के लिए आर्थिक नीति के साधन के रुप में प्रयोग किया जाता है।

  • ओपेन-जनरल लाइसेंस –   विदेशी व्यापार

TRYSEM                                       –        रोजगार

थोक मूल्य सूचकांक        –    मुद्रास्फीति

नकदी-रिजर्व अनुपात       –   ऋण नियंत्रण

  • आर्थिक मंदी के संदर्भ में कर दरों में कटौती करना और सरकारी व्यय को बढ़ाना राजकोषीय उद्दीपन पैकेज का भाग माना जा सकता है जबकि उपादानों को समाप्त करना इसमें शामिल नही है।

  • आयात कोटा के माध्यम से सरकार द्वारा किसी निश्चित समयावधि (सामान्यतया 1 वर्ष) में आयातित वस्तु की मात्रा निश्चित कर दी जाती है। आयात कोटा में निश्चत मात्रा से अधिक आयात नही किया जा सकता है। अतः आयात कोटा भौतिक नियंत्रण का एक प्रभावी उपाय है।

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  • पंचायतों के मुख्य पांच आय के स्त्रोत निम्नलिखित हैं –

  1. लोक सहयोग एवं धन सहायता

  2. कर, फीस एवं आर्थिक दंड

  3. अनुदान

  • राज्य सरकार द्वारा प्रशासन हेतु

  • राज्य सरकार की योजनाओं हेतु

  • केन्द्र सरकार की योजनाओं हेतु

  • जिला परिषद/समिति आदि से

  • केन्द्र सरकार से

  • राज्य सरकार से

  1. आर्थिक ऋण आदि

  2. स्वयं की आय।

  • पैन कार्ड पर अंकित 10 संकेताक्षर 5 भागों में विभक्त होते हैं। प्रथम पांच अंग्रेजी अक्षरों में प्रथम तीन अक्षर वर्णानुक्रमक श्रृंखला में होते हैं – AAA to ZZZ

चौथा अक्षर कार्ड धारक की स्थिति दर्शाता है जिसमें शामिल हैं –

C – Company

P – Person

H – HUF (Hindu Undivided Family)

F – Firm

A – Association of Persn (AoP)

T – Trust

B – Body of Individuals (BoI)

L – Local Authority

J – Artificial Juridical Person

G – Government

  • तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने 1999-2000 का बजट प्रस्तुत करते हुए, पूर्वोत्तर क्षेत्र में औद्योगीकरण को प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु 10 वर्षों के लिए कर अवकाश की घोषणा थी।

  • तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भूकंप आपदा से दुष्प्रभावित कच्छ जिले के उद्योगों के लिए उत्पादन शुल्क में 5 वर्ष के लिए अवकाश की घोषणा की थी।

  • PAN कार्ड आयकर विभाग द्वारा जारी किया गया पहचान-पत्र होता है जिस पर व्यक्ति का नाम, जन्म तिथि एवं पैन नंबर अंकित होता है। इसमें पता (Address) का उल्लेख नही होता है। अतः यह पते को प्रमाणित नही करता है।

  • बैंकिंग विभाग, वित्त मंत्रालय का विभाग नही है। वित्त मंत्रालय के 5 विभाग हैं – आर्थिक कार्य विभाग, व्यय विभाग, राजस्व विभाग, वित्तीय सेवा विभाग एवं विनिवेश विभाग।

  • ग्यारहवीं योजना के दौरान शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate) को कम करके 28 प्रति 1000 जीवित जन्मों पर करने का लक्ष्य था। 12वीं योजना में आईएमआर का लक्ष्य 25 प्रति हजार जीवित जन्म है।

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  • यदि विविध अवधियों में भिन्न-भिन्न आय वर्गों के व्यक्तियों की आय में विषमता मे क्रमशः वृध्दि की प्रवृत्ति परिलक्षित हो, तो विषमता मे यह वृध्दि इंगित करती है कि धनी अधिक धनी तथा निर्धन और निर्धन होते जा रहे हैं।

  • स्टार्ट-अप्स की विशेष आवश्यकताओं को दूत निवेशकों (Angel In-vestors), जोखिम युक्त पूंजी (Venture Capital) तथा भीड़ वित्त पोषण (Crowd Funding) के माध्यम से पूरा किया जाता है। इन्हें वित्त पोषण (Financing) के क्षेत्र में नई पीढी के स्रोत का दर्जा दिया जाता है।

  • आयकर अधिनियम की धारा 88 के अंतर्गत कर छूटों को समाप्त करने की अनुशंसा केलकर कमेटी ने की थी। केलकर समिति का गठन प्रत्यक्ष कर सुधार संबंधी सुझाव प्रदान करने हेतु किया गया था। इसमें अपनी रिपोर्ट वर्ष 2003 में प्रस्तुत की थी।

  • भारत सरकार द्वारा अनुमोदित सक्षम परियोजना नवीन अप्रत्यक्ष कर नेटवर्क से संबंधित है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने इस परियोजना को 28 सितंबर, 2016 को अपनी स्वीकृति दी। परियोजना की कुल लागत 2256 करोड़ रुपये है, जबकि अवधि सात वर्ष है। यह परियोजना वस्तु एवं सेवा कर के कार्यान्वयन में सहायक होगी। साथ ही यह योजना कस्टम विभाग के व्यापार के सुगमीकरण हेतु सिंगल विंडो इंटरफेस (SWIFT) को विस्तारित भी करेगी।

  • कर सुधार समिति (आर. जे. चेलैया केमटी) ने कर सुधारों की व्यापक रुपरेखा प्रस्तुत की, जिस पर वर्ष 1991 के बाद के राजकोषीय सुधार आधारित थे।

  • 13वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं मे वस्तुओं एवं सेवाओं पर कर लगाए जाने का अभिकल्प तथा इस प्रस्तावित अभिकल्प के संपालन से संबध्द क्षतिपूर्ति पैकेज तथा केन्द्रीय करों के एक निश्चित अंश का स्थानीय निकायों को अनुदान के रुप में हस्तांतरण तो शामिल है जबकि भारत के जनांकिकीय लाभांश के अनुरूप अगले दस वर्षों में लाखों नौकरियां सृजन करने की योजना इसकी अनुशंसाओं का भाग नही है।

  • 101वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत संविधान में अनुच्छेद 279A जोड़कर वस्तु एवं सेवा कर परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है। इसकी अध्यक्षता संघीय वित्त मंत्री करते हैं और केन्द्र राजस्व या वित्त के प्रभारी राज्य मंत्री इसके एक सदस्य होते हैं।   जीएसटी परिषद कर दर से छूट वाली वस्तुओं के  बारे में निर्णय करेगी और नई कर नीति की देहली निर्धारण भी करेगी। जीएसटी लागू होने के पश्चात राज्य सरकारों के पास वैट उगाही (Levy) का विकल्प नही होगा।

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  • 12वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार, वर्ष 2009-10 तक केन्द्र एवं राज्यों का राजस्व घाटा शून्य होना चाहिए। 12वें वित्त आयोग की सिफारिशों की कार्यावधि वर्ष 2005-2010 तक थी।

  • 13वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार वर्ष 2014-15 तक कुल ऋण-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात (Debit/GDP) 68% होना चाहिए।

  • 13वें वित्त आयोग (अध्यक्ष विजय एल. केलकर) ने केन्द्रीय करों में राज्यों की भागीदारी को न्यूनतम 32% करने की अनुशंसा की थी।

  • 12वें वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. सी. रंगराजन ने 30 नवंबर, 2004 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को सौंपी थी, जिसमें उन्होंने केंन्द्रीय करों एवं शुल्कों में राज्यों की हिस्सदारी को 29.5 से बढ़ाकर 30.5 करने की अनुशसा की थी।

  • डॉ. विजय केलकर के नेतृत्व में गठित केलकर समिति ने भारतीय आयकर अधिनियम की धारा-88 में उपलब्ध आयकर छूट को समाप्त करने की सिफारिश की थी।

  • केलकर टास्क फोर्स की सिफारिशों का संबंध कर सुधार से है। सिफारिशों में मुख्य जोर कृत्रिम भत्ते और वर्तमान कटौती को विभिन्न धाराओं के तहत हटाने पर है। डॉ. विजय केलकर 13वें वित्त आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं और इसके अतिरिक्त भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक पदों पर आसीन रहे हैं।

  • वित्त आयोग एवं योजना आयोग दोनों सलाहकारी संस्थाएं हैं।

  • वर्ष 1995-2000 की अवधि के लिए केन्द्र-राज्यों के मध्य राजस्व वितरण एवं सहायता अनुदान के संबंध में गठित दसवें वित्त आयोग के अध्यक्ष के. सी. पंत थे।

  • राष्ट्रीय कृषि नीति –   2000

समुद्रीय मत्स्य नीति   –   2004

नवीन विदेशी व्यापार नीति  –   2014

सातवां वित्तीय आयोग   –   1978

  • वित्त मंत्रालय द्वारा स्वैच्छिक आय घोषणा योजना (VDIS) 1 जुलाई, 1997 से प्रारंभ हुई और 31 दिसंबर, 1997 को समाप्त हुई।

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  • ह्यूपर आयोग (1949) की संस्तुति पर निष्पादन बजट का सबसे पहले प्रयोग यू.एस.ए. में कृषि क्षेत्र में किया गया। इस प्रकार का बजट लागत- लाभ विश्लेषण को निरुपित करता है।

  • विदेशी ऋण, प्रत्यक्ष निवेश तथा पोर्टफोलियों निवेश आदि पूंजीगत लेखा की रचना करते हैं।

  • रेल बजट 2013-14 में उत्कृष्ट माहौल और नवीनतम सुविधाएं एवं सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए अनूभूति नामक सवारी गाड़ी चलाने की स्वीकृति प्रदान की गई थी।

  • बजट 2017-18 में अनुमानित कुल कर राजस्व 1227014 करोड़ रुपये है, जिसमें निगम कर, आयकर, केन्द्रीय उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क तथा सेवा कर का अंशदान क्रमशः 19%, 16%, 14%, 9% तथा 10% है। इस प्रकार वर्तमान संदर्भ में कुल कर राजस्व में सर्वाधिक हिस्सा निगम कर एवं आयकर का है। बजट 2018-19 में भारत सरकार की कर आय के दो सबसे बड़े स्रोत वस्तु एवं सेवाकर (लगभग 7.44 लाख करोड़ रुपये) तथा निगमकर (6.21 लाख करोड़ रुपये) एवं आयकर  (5.29 लाख करोड़ रुपये) केन्द्रीय उत्पाद शुल्क है। वर्तमान में केन्द्रीय उत्पाद शुल्क, सेवा कर  आदि अप्रत्यक्ष करों को  S.T. में शमिल कर लिया गया है।

  • भारत में मार्ग कर (Toll Tax) भारत सरकार द्वारा नही लिया जाता है, यह राज्य सरकारों द्वारा लिया जाता है।

  • कैपिटल गेन टैक्स – कैपिटल गेन दो तरह के होते हैं – लांग टर्म कैपिटल गेन और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन। जैसा कैपिटल गेन वैसा उसका टैक्स इम्पैक्ट होता है। अगर संपत्ति को तीन साल से अधिक समय के बाद बेचा जाता है तो लांग टर्म कैपिटल गेन होता है। अगर इसे तीन साल से कम  समय में बेचें, तो शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन होता है। इस प्रकार यह  संपत्ति विक्रय से संबंधित है।

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  • सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी या केन्द्रीय उत्पाद शुल्क – किसी भी कंपनी अथवा फैक्टरी द्वारा उत्पादित वस्तुओं के मूल्यों पर लगाया जाता है।

  • सीमा शुल्क – यह एक अप्रत्यक्ष कर है, जिसे देश की सीमा से बाहर जाने वाली तथा देश में बाहर से आने वाली वस्तुओं पर लगाया जाता है अर्थात यह वस्तुतः निर्यात एवं आयात पर लगाया जाता है।

  • कॉर्रोपरेट टैक्स – यह कंपनियों के लाभ पर लगाया जाता है। इसी कारण इसे कंपनी लाभ कर भी कहा जाता है। यह आयकर की भांति एक प्रत्यक्ष कर है।

  • स्टाम्प शुल्क का आरोपण केन्द्र करता है, किंतु उसका संग्रह और विनियोजन (व्यय) राज्य करते हैं (अनुच्छेद 268)। अनुच्छेद 268 में स्टाम्प शुल्क के साथ-साथ औषधि तथा प्रसाधनों पर उत्पाद शुल्क का भी उल्लेख है।

  • उत्पाद शुल्क के इतिहास में वर्ष 1986 एक ऐतिहासिक वर्ष रहा जब दीर्घकालीन राजकोषीय नीति (1985) के क्रियान्वयन में वी.पी. सिंह (वित्त मंत्री) द्वारा 1 मार्च, 1986 से मोडवेट लागू किया। मोडवेट (संशोधित मूल्य वर्धित कर ) भी एक प्रकार का केन्द्रीय उत्पाद शुल्क ही है।

  • सीमा शुल्क और निगम कर संघीय सरकार के द्वारा लगाए एवं उद्ग्रहीत किए जाते हैं। बिक्री कर पर राज्य सरकारों को अनन्य रुप से अधिकार है। संपत्ति कर, भू राजस्व कर, उपहार कर और जोत कर पर राज्य सरकारों का अधिकार  है।

  • आयकर, संपत्ति कर एवं संपदा शुल्क प्रत्यक्ष कर है क्योंकि इनमें करापात और कराघात दोनों एक ही व्यक्ति पर होते हैं। जबकि बिक्री कर में पर विक्रेता पर लगता है (कराघात) पर अंततः कर का भुगतान क्रेता को करना होता है (करापात)। अतः यह अप्रत्यक्ष कर है।

  • मूल्य आधारित कर (VAT- Value Added Tax) बहु-बिंदु लक्ष्य आधारित कर प्रणाली है जिसमें उत्पादन/वितरण श्रृंखला में लेन-देन के प्रत्येक चरण में हुए मूल्य-संवर्धन पर कर लगाया जाता है। साथ ही यह वस्तुओं तथा सेवाओं के अंतिम उपभोग पर लगाया गया कर है जिसका वहन अंततः उपभोक्ता को करना पड़ता है।

  • सेनवैट (CENVAT – Central Value Added Tax) का संबंध केन्द्रीय उत्पाद शुल्क से है।

  • सेवा कर एक अप्रत्यक्ष कर है। इसे चेलैया समिति की संस्तुति पर वर्ष 1994-95 के वित्तीय वर्ष की अवधि में लागू किया गया था। यह संघ सूची का विषय है।

  • संपदा कर भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1957 में लागू किया गया था।

  • देश के केन्द्रशासित प्रदेशों अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप में बिक्री कर लागू नही है।

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  • 1 अप्रैल, 2005 से लागू वैट प्रणाली को तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश (स.पा. शासित राज्य) तथा तमिलनाडु (AIADMK शासित राज्य) ने अपनी सहमति नही दी थी। अतः कांग्रेस शासित प्रदेशों-आंध्र प्रदेश तथा महाराष्ट्र में तो इसे लागू किया गया किंतु छत्तीसगढ़  और उत्तर प्रदेश में इले लागू नहीं किया गया।

  • भारत में आयकर 24 जुलाई, 1860 को सर जेम्स  विल्सन द्वारा आरंभ किया गया था। यह ऐसा कर था जो चुनिंदा अमीरों, शाही परिवारों और ब्रिटिश नागरिकों पर लगाया जाता था। आधुनिक समय में आयकर व्यक्ति की आय पर लगाया जाने वाला एक वार्षिक कर है।

  • भारत में सर्वप्रथम (वर्ष 2003 में) मूल्य वर्धित कर (VAT) लगाने वाला राज्य हरियाणा था।

  • ऐसे कर जो वस्तुओं पर आरोपित होते हैं (अर्थात अप्रत्यक्ष कर) वस्तु के मूल्य में वृध्दि ही करते हैं। इसके विपरीत प्रत्यक्ष कर के कारण वस्तुओं के मूल्य अप्रभावित रहते हैं।

  • केन्द्र सरकार द्वारा आयात या निर्यात पर लगाया जाने वाला कर सीमा शुल्क (Custom D uty) के नाम से जाना जाता है।

  • मनोरंजन कर भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-2 (राज्य सूची) के अधीन आता है। सूची-2 में उल्लिखित मदों पर राज्य सरकारें कर आरोपित करती हैं।

  • शराब पर उत्पादन कर राज्य सरकारों द्वारा लगाया जाता है। इसका उल्लेख संविधान की सातवीं अनुसूची के सूची-2 (राज्य सूची) के 8वें मद में किया गया है।

आयोजन

  • स्वतंत्रता पश्चात भारत के लोगों को आर्थिक न्याय दिलाने तथा देश को आत्मनिर्भर एवं नेतृत्वकर्ता देशों की श्रेणी में लाने हेतु नियोजन की रणनीति बनाई गई।

  • इस रणनीति के तहत अपने संसाधनों की संभाव्यता का आकलन करते हुए प्राथमिकताओं का निर्धारण किया गया तथा उनकी प्राप्ति हेतु पांच वर्षीय रणनीति बनाई गई। इसे पंचवर्षीय योजनाएं कहा गया।

  • भारत में अब तक 12 पंचवर्षीय सफलतापूर्वक संचालित की जा चुकी हैं।

  • नई सरकार द्वारा आधुनिक जरुरतों को देखते हुए पंचवर्षीय रणनीति को छोड़कर नवीन दीर्घकालिक रणनीति पर अग्रसर है।

  • जिसके तहत दीर्घकालिक रणनीति को बनाकर उसकी प्राप्ति हेतु मध्यकालिक एवं वार्षिक योजनाएं बनाई जाएंगी।

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योजना आयोग

  • योजना आयोग का गठन नियोगी समिति की अनुशंसा पर 15 मार्च, 1950 को मंत्रिमंडलीय प्रस्ताव के द्वारा किया गया था।

  • यह एक गैर-संवैधानिक संस्था है।

  • इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।

  • यह एक सलाहकारी निकाय है।

  • योजना आयोग के प्रथम अध्यक्ष पं. जवाहरलाल नेहरु तथा प्रथम उपाध्यक्ष गुलजारी लाल नंदा थे।

राष्ट्रीय विकास परिषद

  • योजना निर्माण मे राज्यों की भूमिका को सुनिश्चित करने हेतु 6 अगस्त, 1952 को राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन किया गया।

  • यह भी संविधानोत्तर  निकाय है। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।

  • राष्ट्रीय विकास परिषद की संरचना निम्नलिखित है –

संरचना

अध्यक्ष – प्रधानमंत्री

सदस्य –

  1. सभी राज्यों के मुख्यमंत्री एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल/मुख्यमंत्री

  2. योजना आयोग के सभी सदस्य

  3. केन्द्रीय मंत्रिपरिषद

कार्य

  • योजना आयोग द्वारा तैयार की गई योजनाओं को अंतिम रुप देना।

  • राष्ट्रीय योजनाओं के संचालन का मूल्यांकन।

  • राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाली नीतियों की समीक्षा।

नोटः वर्तमान में योजना आयोग की जगह नीति आयोग ने ले ली है, जबकि राष्ट्रीय विकास परिषद की संरचना अभी-भी अपनी पुरानी स्थिति में यथावत है। इसलिए अभी भी राष्ट्रीय विकास परिषद के सदस्य के रुप मे योजना आयोग सदस्य ही दिया जा रहा है।

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भारतीय संविधान में नियोजन

  • भारत में नियोजन की प्रेरणा संविधान की प्रस्तावना (आर्थिक एवं सामाजिक न्याय) तथा नीति निर्देशक तत्वों (अनुच्छेद 38, 39 व 46) से प्राप्त होती है।

  • आर्थिक एवं सामाजिक नियोजन का उल्लेख सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रवृष्टि 20 में मिलता है।

  • केन्द्रीय मंत्रिमंडल के प्रस्ताव पर 15 मार्च, 1950 को गठित योजना आयोग एक संविधानेत्तर परामर्शदात्री निकाय है। भारत के प्रधानमंत्री योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष होते हैं। 1 नजवरी, 2015 से योजना आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर उसी तारीख (1 जनवरी, 2015) से नीति आयोग का गठन किया गया है। इसके उपाध्यक्ष वर्तमान में राजीव कुमार है। NITI का अर्थ है – National Institution for Transforming India

नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार

प्रदेश

2014-15 में GSDP वृध्दि दर (वर्तमान कीमतों पर) (%में)

मध्य प्रदेश

16.86

महाराष्ट्र

11.69

बिहार

17.06

गोवा

अनुपलब्ध

नोटः वर्ष 2013-14 में गोवा की वृध्दि दर 15.30% थी।

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  • मंत्रिमंडल के प्रस्ताव पर गठित योजना आयोग एक संविधानेत्तर निकाय है। जिसके उपाध्यक्ष एवं सदस्यों की संख्या एवं कार्यकाल सरकार की इच्छा पर आधारित होता है तथा इसके सदस्यों के लिए किसी विशिष्ट योग्यता का उल्लेख नही है।

  • डॉ. मनमोहन सेंह 15 जनवरी, 1985 से 31 अगस्त, 1987 तक योजना आयोग के अध्यक्ष रहे और प्रणब मुखर्जी 24 जून, 1991 से 15 मई, 1996 तक तथा मोंटेक सिंह अहलूवालिया 4 जुलाई 2004 से 26 मई, 2014 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे हैं।

  • अखिल भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति (1952) जिसे ए.डी. गोरवाला समिति के नाम से जाना जाता है, ने इंपीरियल बैंक के साथ कुछ राज्य-संबध्द बैंकों को मिलाकर भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना की संस्तुति की। 1 जुलाई, 1955 को इंपीरियल बैंक की सभी संपत्तियों तथा देनदारियों का अधिग्रहण करते भारतीय स्टेट बैंक ने कार्य करना शुरु किया। यह देश का पहला सबसे बड़ा राष्ट्रीयकृत बैंक है।

  • योजना आयोग ने जून, 2000 में इंडिया विजन 2020 पर एक समिति गठित की थी, जिसके अध्यक्ष योजना आयोग के सदस्य डॉ. एस.पी. गुप्ता थे।

  • 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) का उपशीर्षक है – तीव्र, अधिक समावेशी एवं धारणीय विकास। इस योजना में 25 मुख्य लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, जिनमें कुछ निम्नवत हैं –

  • GDP में 8 प्रतिशत की वास्तविक दर सें संवृध्दि

  • 4 प्रतिशत की दर से कृषि संवृध्दि

  • 10 प्रतिशत की दर से विनिर्माण संवृध्दि

  • प्रति व्यक्ति उपभोग गरीबी में 10 प्रतिशत कमी

  • योजना के दौरान गैर-कृषि क्षेत्रक में 50 मिलियन ने कार्य अवसरों का सृजन आदि।

  • भारत में पंचवर्षीय योजना का प्रारुप योजना आयोग द्वारा तैयार कर केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। मंत्रिमंडल के मंजूरी के बाद उसे स्वीकृति हेतु राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) के पास भेजा जाता है। अंत में संसद की अनुमति मिलने के पश्चात इसे आधिकारिक योजना के रुप में भारत के राजपत्र मे प्रकाशित कर दिया जाता है।

  • किसी राष्ट्र में नियोजन निम्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनाया जाता है –

  1. संतुलित सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए

  2. विकास के लाभ समरुप में विस्तृत करने के लिए

  3. आंचलिक विषमताओं को दूर करने पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए

  4. उपलब्ध संसाधनों के उपयोग को अधिकतम बनाने के लिए

  • वर्तमान में भारत की योजनाओं के सार्वजनिक व्यय हेतु अधिकतम साधन ऋण से जुटाए जाते हैं। ऋणों के अंतर्गत बाजर ऋण, अल्पावधि ऋण विदेशी सहायता, लघु बचतों की एवज में जारी प्रतिभूतियों, राज्य भविष्य निधियां, पूंजीगत प्राप्तियों के उधार एवं अन्य देयताएं आते हैं। बजट 2016-17 में उधार एवं अन्य देयताएं का हिस्सा 21% है।

  • वर्ष 1938 में नेशनल प्लानिंग कमेटी का गठन सुभाषचन्द्र बोस के निर्देशन पर किया गया था। इस कमेटी की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरु ने की थी।

  • वर्ष 1944 में प्रसिध्द गांधीवादी अर्थशास्त्री श्रीमन नारायण अग्रवाल द्वारा भारत के आर्थिक नियोजन हेतु एक योजना प्रस्तुत की गई,  जिसे गांधीवादी योजनात के नाम से जाना गया। इस योजना द्वारा स्वावलंबी गांवों के साथ-साथ विकेंद्रीकृत आर्थिक संरचना की स्थापना की संकल्पना थी।

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  • पिछले देशों के लिए रोलिंग प्लान का सुझाव जी. मिर्डल द्वारा दिया गया था। इस व्यवस्था में  प्लान अनवरत चलती रहती है। वर्ष 1978 में मोरार जी देसाई के नेतृत्व वाले जनता पार्टी सरकार ने भारत में इसे स्वीकार किया था। परंतु इस योजना के परिणाम सकारत्मक नही रहे। फलतः वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस  सरकार ने इसके स्थान पर पुनः पंचवर्षीय योजनाओं को स्वीकार किया।

  • चल योजना या रोलिंग प्लान एक दीर्घकालिक योजना होती है इसमें तीन योजनाएं अल्पकालीन (एक वर्ष), मध्यकालीन (3-5 वर्ष हेतु) तथा दीर्घकालीन (10-20 वर्ष हेतु) योजनाएं बनाई जाती हैं। रोलिंग प्लान के तहत योजना मे आवश्यक संशोधन किया जाता है। इस प्रकार यह एक लचीली योजना है जो स्वयं को परिस्थितियों के अनुरुप समायोजित करते हुए आगे बढ़ती है।

  • संविधान के सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 20 में आर्थिक एवं सामाजिक नियोजन का उल्लेख किया गया है।

  • गुन्नार मिर्डल ने अपनी पुस्तक Indian Economic in its Broader Setting में रोलिंग प्लान को विकासशील देशों के लिए अनुशंसित किया था।

  • वर्ष 1951 जब से योजना प्रक्रिया प्रारंभ हुई, से लेकर अब तक पंचवर्षीय योजनाओं में अनाच्छादित कुल वर्षों की संख्या 7 है। 1966-69 तक 3 वर्षों तक योजनावकाश रहा। पुनः 1978-79 में अनवरत योजना लागू रही जबकि वर्ष 1979-80 में कोई योजना नही लागू की गई और सातवीं योजना के समापन वर्ष 1990 तथा आठवीं योजना के प्रारंभिक वर्ष 1992 के मध्य 2 वर्ष का अंतराल रहा।

  • पांचवी पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत पहली बार गरीबी निवारण के उद्देश्य के साथ गरीब वर्ग की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों को प्रारंभ किया गया था।

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  • राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा बारहवीं पंचवर्षीय योजना हेतु प्रस्तावित दृष्टिकोण पत्र मे सकल घरेलू उत्पाद दर हेतु 9-9.5% का लक्ष्य रखा गया था। तथापि 27 दिसंबर, 2012 को राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC) द्वारा बारहवीं पंचवर्षीय योजना को स्वीकृति दिए जाने के साथ इसके तहत औसत वार्षिक विकास दर के लक्ष्य को घटाकर 8%, कृषि एवं संबध्द क्षेत्र विकास दर लक्ष्य 4.0%, औद्योगिक क्षेत्र विकास दर लक्ष्य 7.6% तथा सेवा सेत्र विकास दर लक्ष्य 9.0% कर दिया गया है।

  • चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में क्षेत्रीय विषमता को दूर करने के उद्देश्य के साथ विकास केन्द्र उपागम की शुरुआत की गई। यद्यपि विकास केन्द्र उपागम का प्रारंभ चौथी योजना में हुआ, तथापि इस पर विशेष बल पांचवी योजना में दिया गया। संसाधन आधारित कार्यक्रम, समस्या आधारित कार्यक्रम, लक्षित समूह उपागम, प्रोत्साहन दृष्टिकोण और व्यापक क्षेत्र उपागम आदि विकास केन्द्र उपागम के घटक थे।

  • बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि, वानिकी की मत्स्यपालन की वृध्दि दर 4% के स्तर पर अनुमानित है।

  • भारत में द्वीतीय पंचवर्षीय योजना 1 अप्रैल, 1956 – 31 मार्च, 1961 तक चली। यह योजना प्रो.पी.सी. महालनोबिस के मॉडल पर आधारित थी। इस योजना का मूलभूत उद्देश्य देश में औद्योगीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ करना था। वर्ष 1956 मे घोषित  औद्योगिक नीति में समाजवादी ढंग से समाज की स्थापना को स्वीकार किया गया।

  • नौवी पंचवर्षीय योजना में कुल शिक्षा बजट का 66% प्राथमिक शिक्षा हेतु आवंटित किया गया था।

  • बारहवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल वर्ष 2012-17 है।

  • सरकार के अनुमानों के अनुसार, 12वीं पंचवर्षीय योजना में आधारभूत संरचना के लिए आवश्यक निवेश 55.7 लाख करोड़ रु. (लगभग एक ट्रिलियन डॉलर अथवा 1000 बिलियन डॉलर) रहने का अनुमान है।

  • भारत की 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) का आधार 3644718 करोड़ रु. रखा गया था। 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) का आकार 8050123 करोड़ रु. था।

12वीं पंचवर्षीय योजना में सर्वाधिक धनराशि सामाजिक सेवाओं की मद में विनिहित की गई है। इसमें कुल 2664843 करोड़ रुपये विनिहित किया गया है जो कुल परिव्यय का 3.4% होगा।

क्षेत्रानुसार 12वीं योजना का परिव्यय है –

लक्षित राशि

प्रतिशत अंश

1.   कृषि एवं संबध्द क्षेत्र (करोड़ रु. में)

363273

4.7

2.   ग्रामीण विकास

457464

6.0

3.   ऊर्जा

1438466

18.8

4.   परिवहन

1204172

15.7

5.   संचार

80984

1.1

6.   सामाजिक सेवाएं

26644843

34.7

12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के अवधारणा दस्तावेज का केन्द्र बिंदु है – तीव्र, अधिक समावेशी और धारणीय विकास (Faster, More Inclusive and Sustainable Growth)

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  • सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) 31 मार्च, 1990 को समाप्त हुई। सातवीं पंचवर्षीय योजना के समापन से दो वर्ष के अंतराल के बाद आठवीं योजना 1 अप्रैल, 1992 से प्रारंभ हुई थी जिसकी अवधि 31 मार्च, 1997 तक थी।

योजना

कार्यक्रम

प्रथम योजना (1951-1956)

वर्ष 1952 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं 1953 में राष्ट्रीय प्रसार सेवा प्रारंभ

द्वीतीय योजना (1956-1961)

आधारभूत तथा भारी उद्योगों पर विशेष बल के साथ तीव्र औद्योगीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता

तृतीय योजना (1961-1966)

आधारभूत उद्योगों के विकास के साथ कृषि क्षेत्र (खाद्यान्न) पर विशेष बल

चतुर्थ योजना (1969-1974)

स्वावलंबन (आत्मनिर्भरता) की प्राप्ति एवं स्थिरता के साथ आर्थिक विकास (Growth with stability)

पंचम योजना (1974-1979)

वर्ष 1974 में न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम वर्ष 1977-78 में खाद्य के बदले अनाज कार्यक्रम तथा 1977-78 में अंत्योदय योजना की शुरुआत

 

 

  • सामाजिक न्याय एवं समानता के साथ संवृध्दि पर बल 9वीं पंचवर्षीय योजना में दिया गया। इस योजना का काल वर्ष 1997-2002 था। इस योजना में लक्षित विकास दर 6.5% के विरुध्द वास्तविक वृध्दि 5.4% हुई।

  • नवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में प्रमुख व्यूहरचना (Major Strategy) के रुप में महिला अंश योजना (Women’s Component Plan) को प्रारंभ किया गया था। इस योजना में महिलाओं से संबंधित क्षेत्रो हेतु 30% धनराशि (कुल राशि का) आवंटित की गई थी।

  • प्रथम पंचवर्षीय योजना (1 अप्रैल, 1951 से 31 मार्च, 1956) हैरोड-डोमर संवृध्दि मॉडल पर आधारित थी। प्रथम योजना में मुख्य प्राथमिकता कृषि एवं सिचाई क्षेत्र को दिया गया। द्वीतीय पंचवर्षीय योजना (1956-1961) पी.सी. महालनोबिस मॉडल पर आधारित थी।

  • प्लानिंग एंड द पुअर पुस्तक के लेखक बी.एस. मिनहास हैं।

  • योजना पत्रिका का प्रकाशन भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन प्रकाशन विभाग द्वारा किया जाता है। यह एक मासिक पत्रिका है।

  • प्रथम पंचवर्षीय योजना पं. जवाहर लाल नेहरु द्वारा 8 दिसंबर, 1951 को संसद में प्रस्तुत की गई। राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन 6 अगस्त, 1952 को किया गया था। स्वतंत्र भारत में मुद्रा का अवमूल्यन प्रथम बार 1949 में हुआ था। जबकि भारत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (स्थापित-1945) का संस्थापक सदस्य है।

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  • बाजार अर्थव्यवस्था मूल्य तंत्र होने के कारण लाभ से संचालित होती है। फलतः अर्थव्यवस्था के वे क्षेत्र जिनमें पर्याप्त लाभ-उपार्जन की संभावना न हो, में निवेश कम होता है और ऐसे क्षेत्र विकास के क्रम में पीछे छूट जाते हैं। भारतीय कृषि क्षेत्र ऐसा ही क्षेत्र है, जिसमें लाभ की दर तो कम है, किंतु जो समग्र अर्थव्यवस्था के विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • योजना में कोर सेक्टर ऐसे उद्योग हैं, जो अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक आर्थिक विकास की दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं। कोर सेक्टर की श्रेणी में 8 आधारभूत उद्योग यथा – इस्पात, सीमेंट, उर्वरक , खनिज तेल, कोयला, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद और विद्युत सम्मिलित हैं।

  • संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले भाग 4 में पंचायती राज (अनु. 40) का उल्लेख है। अनु. 40 में ग्राम को नियोजन की सबसे प्राथमिक इकाई के रुप में स्वीकार किया गया है। 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायती राज को मूर्त रुप देने का प्रयास किया गया है। ऐसा इसलिए किया गया है, क्योंकि नीचे से ऊपर नियोजन ऐसा लक्ष्य है, जिसे प्राप्त करना अभी शेष है।

  • ग्यारवहीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के लिए विषय-वस्तु (Theme) अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा है। इस योजना में Drop Out Rate को 20% तक करने एवं प्रारंभिक शिक्षा हेतु न्यूनतम मानक तय करने के साथ वर्ष 2011-12 तक साक्षरता दर को 85% करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

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  • भारत में हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966-67 में की गई थी तथा 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण पहली बार 19 जुलाई, 1969 में किया गया जबकि गरीबी हटाओं का नारा इंदिरा गांधी द्वारा वर्ष 1971 में दिया गया, जिसे पांचवी पंचवर्षीय योजना (1974-78) के मुख्य लक्ष्य के रुप में शामिल किया गया।

  • 11वीं पंचवर्षीय योजना में प्रति व्यक्ति घरेलू उत्पाद विकास दर का लक्ष्य 7.6% प्रतिवर्ष का था जिसके कारण इसके अगले 10 वर्षों में दो गुना के स्तर पर पहुंचने की संभावना थी।

  • 11वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र की विकास दर के लिए क्रमशः 4.1%, 10.5% और 9.9% का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

  • एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) की शुरुआत 2 अक्टूबर, 1980 को की गई। इसके क्रियान्वयन के लिए संपूर्ण परिवार का अंगीकरण किया गया है। मसलन सरकार ने गरीबी रेखा को परिभाषित करने के लिए IRDP में परिवार को ही इकाई के रुप में चुना है। 1 अप्रैल, 1999 से IRDP को स्वर्ण जंयती ग्राम स्व-रोजगार योजना (SGSY) के रुप में पुनर्गठित किया गया।

  • वर्ष 1985-90 की अवधि वाली पंचवर्षीय योजना की रणनीति गरीबी, बेरोजगारी तथा क्षेत्रीय विषमता पर प्रहार करना था। फलतः इस योजना मे उन सभी नीतियों पर बल दिया गया, जो खाद्यान्नों के उत्पादन की तीव्र वृध्दि एवं रोजगार अवसरों को बढ़ा सके तथा उत्पाकता में वृध्दि करें।

  • आठवीं पंचवर्षीय योजना का मूलभूत उद्देश्य विभिन्न पहलुओं में मानव विकास था।

  • आठवीं पंचवर्षीय योजना की मुख्य प्राथमिकताओं मे निहित था विकास प्रक्रिया को स्थायी आधार पर समर्थन देने हेतु आधारभूत ढांचे (परिवहन, संचार, ऊर्जा एवं सिचाई) को मजबूत करना।

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  • भारत में सर्वप्रथम स्वसंपोषित विकास का उद्देश्य चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में अपनाया गया था। तीसरी पंचवर्षीय योजना में खाद्यान्नों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था।

  • जुलाई, 1991 में नई आर्थिक नीति के अंगीकरण के पश्चात प्रारंभ आठवीं योजना में सार्वजनिक (लोक) क्षेत्र के परिव्यय में कमी आई। इसका कारण यह था, कि विकास की प्रक्रिया में निजी क्षेत्र को अब पहले से अधिक महत्व दिया जाने लगा।

दसवीं एवं बारहवीं पंचवर्षीय योजना में विभिन्न मदों पर व्यय –

 

10वीं योजना

12वीं योजना

ऊर्जा

26.47%

18.8%

सामाजिक सेवाएं

22.79%

34.7%

परिवहन

14.31%

15.7%

संचार

6.43%

1.1%

 

दसवीं पंचवर्षीय योजना के  दौरान दी गई फसलों तथा उनसे संबंधित संवृध्दि दर का सुमेलन निम्नानुसार है –

फसल

संवृध्दि दर (%में)

दलहन एवं तिलहन में

4.29

फल एवं सब्जियों में

2.97

अनाज में

1.28

अन्य फसलों में

3.58

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दसवीं पंचवर्षीय योजना में क्षेत्रों से संबधित वृध्दि दर लक्ष्य था –

क्षेत्र

वृध्दि  दर (लक्ष्य)

कृषि

3.97%

उद्योग

8.90%

यातायात (परिवहन)

6.47%

व्यापार

9.44%

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  • 1 अप्रैल, 2002 से 31 मार्च 2017 की अवधि वाली दसवी पंचवर्षीय योजना में संचार क्षेत्र में 15.0% वृध्दि दर का लक्ष्य निर्धारित था, जो उच्चतम वृध्दि दर लक्ष्य था।

  • दसवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि 1 अप्रैल, 2002 से 31 मार्च, 2007 थी। अतः दसवीं योजना का समापन वर्ष 2007 में हुआ।

  • कुछ योजनाओं की संवृध्दि दर निम्नलिखित रही –

सातवीं योजना     –   5.8%

आठवी योजना     –   6.8%

नौवीं योजना      –   5.4%

दसवीं योजना     –   7.6%

  • ग्यारहवीं योजना के प्रारुप के प्रपत्र के अनुसार, लक्षित संवृध्दि दर के प्राप्त होने तथा  जनसंख्या के 1.5% वार्षिक वृध्दि होने पर एक औसत भारतीय की वास्तविक आय 10 वर्षों में दोगुनी हो जाएगी।

  • पंचवर्षीय योजनाओ के दौरान आर्थिक विकास की दर निम्नलिखित थी –

पहली पंचवर्षीय योजना      –   3.6%

चौथी पंचवर्षीय योजना      –   3.3%

छठी पंचवर्षीय योजना       –   5.7%

दसवीं पंचवर्षीय योजना      –   7.6%

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मुद्रा एवं बैकिंग

मुद्रा (Money)

  • “मुद्रा वह है, जो मुद्रा का कार्य करें।”

  • मुद्र में निम्न विशेषताएं होती हैं –

  1. मुद्रा सर्व स्वीकार्य होती है।

  2. मुद्रा वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है।

  3. मुद्रा एकरुप एवं विभाजनीय होती है।

कार्य

  • मुद्रा के कार्यों को दों भागों में बांटा जाता है –

  1. प्राथमिक कार्य –

  • विनिमय का माध्यम

  • मूल्य का मापक

  1. गौण कार्य –

  • भावी भुगतान का आधार

  • मूल्य का संचय

  • मूल्य का हस्तांतरण

मुद्रा की मांग

  • मुद्रा की मांग सामान्य तौर पर तीन कार्यों हेतु की जाती है –

  1. लेन-देन (Transaction) उद्देश्यों की पूर्ति हेतु

  2. सतर्कता (Precautionary) उद्देश्यों अर्थात आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्त हेतु

  3. सट्टा (Speculation) उद्देश्यों अर्थात आकस्मिक अवसरों से लाभ कमाने हेतु।

मुद्रा की पूर्ति

  • भारत में मुद्रा की पूर्ति का नियमन भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है।

  • भारत में मुद्रा की पूर्ति हेतु न्यूनतम निधि प्रणाली (Minimum Reserve System) अपनाई जाती है।

  • इसके तहत न्यूनतम 200 करोड़ रुपये की निधि रखकर भारतीय रिजर्व बैंक कितनी भी मुद्रा छाप सकता है।

  • इस 200 करोड़ की निधि में 115 करोड़ रुपये स्वर्ण में रखने होते हैं, जबकि 85 करोड़ रुपये विदेशी प्रतिभूतियों में।

  • भारत में मुद्रा की पूर्ति को चार मापकों के आधार पर मापा जाता है –

  1. M1 = प्रचलन में करेंसी +  मांग जमा + अन्य जमा

   C                          +            D           +                   OD

  1. M2 = M1 + डाकखाने की जमाएं

  2. M3 = M1 + सावधि जमाएं

  3. M4 = M3 + डाकखाने की जमाएं

  • इन मुद्राओं का तरलता क्रम है – M1>M2>M3>M4

  • व्यापकता क्रम – M4>M3>M2>M1

  • नोट – M3 को वृहद मुद्रा (Broader Money) कहा जाता है।

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बैंकिंग

भारत में बैंकिंग इतिहास

  • भारत में सबसे पहला बैंक 1806 ई. में बैंक ऑफ बंगाल स्थापित हुआ।

  • इसके बाद 1840 ई. में बैंक ऑफ बॉम्बे तथा 1843 ई. में बैंक ऑफ मद्रास अस्तित्व में आए।

  • आगे चलकर 1921 में इन्हीं तीनों बैंकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का गठन किया गया जो 1 जनवरी, 1955 को राष्ट्रीयकृत होकर भारतीय स्टेट (SBI) के रुप में सामने आया।

  • 1881 ई. में प्रथम भारतीय बैंक अवध कामर्शियल बैंक की स्थापना की गई।

  • यह सीमित दायित्व वाला भारतीय बैंक था।

  • इसी क्रम में 1894 में प्रथम पूर्ण रुप से भारतीय बैंक पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना की गई।

बैंको का राष्ट्रीयकरण

  • भारतीय बैंकिंग इतिहास में एक बड़ी घटना 19 जुलाई, 1969 को घटी जब 14 बैंकों जिनकी जमाराशि 50 करोड़ रुपये या उससे अधिक थी, का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।

  • इसी क्रम में 15 अप्रैल, 1980 को 5 और वाणिज्यिक बैंकों (200 करोड़) राष्ट्रीयकरण किया गया।

  • कालांतर में वर्ष 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय होने से इनकी संख्या 19 रह गई।

  • वर्तमान में IDBI के राष्ट्रीयकरण के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के कुल बैंकों की संख्या 21 (19+SBI+IDBI = 21 Bank) हो गई है।

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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)

  • भारतीय रिजर्व बैंक देश का केन्द्रीय बैंक है।

  • देश में मौद्रिक नीति का निर्धारण इसी के द्वारा किया जाता है।

  • भारत में एक केन्द्रीय बैंक के गठन की अनुशंसा वर्ष 1926 में गठित हिल्टन यंग समिति द्वारा की गई थी।

  • इसी के अनुपालन मे भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत 1 अप्रैल, 1935 को RBI की स्थापना की गई।

  • इसका 1 जनवरी, 1949 को राष्ट्रीयकरण किया गया तथा सी.डी. देशमुख स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर बने।

RBI के कार्य

  1. नोटो का निर्गमन करना

  2. सरकार के बैंक के रुप में कार्य करना

  3. बैंकों के बैंक के रुप में कार्य करना

  4. साख (ऋण) का नियंत्रण करना।

  • केन्द्रीय बैंक साख का नियंत्रण दो विधियों से करता है – मात्रात्मक नियंत्रण एवं गुणात्मक नियंत्रण।

  • मात्रात्मक नियंत्रण के तहत RBI अर्थव्यवस्था में एक समान रुप से बिना भेदभाव किए सभी क्षेत्रों में साख सृजन को प्रभावित करता है।

  • गुणात्मक साख नियंत्रण हेतु वह किसी क्षेत्र विशेष में साख का नियंत्रण करता है पूरी अर्थव्यवस्था में नही।

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तरलता नियंत्रण के उपकरण

  1. नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ration – CRR)

  • अपनी सभी जमाओं (मांग जमा एवं सावधि जमा) का वह अनुपात जो वाणिज्यिक बैंकों को RBI के पास जमा करना होता है, CRR कहलाता है।

  • वर्तमान में इसकी दर 4 प्रतिशत है।

  • CRR में वृध्दि से बैंकों के पास तरलता मे कमी आती है, जबकि इसके विपरीत इसमें कमी तरलता को बढ़ाती है।

  1. सांविधिक तरलता अनुपात (Stratuary Liquidity Ratio – SLR)

  • बैंकों की समग्र जमाओं का वह अनुपात जो उन्हें सरकारी प्रतिभूतियों, स्वर्ण, नकदी जैसी चल एवं सुरक्षित संपत्तियों के रुप में रखना होता है SLR कहलाता है।

  • यह भी तरलता से ऋणात्मक रुप से संबंधित होता है। वर्तमान में यह 19.5 प्रतिशत है।

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साख नियंत्रण के उपकरण

  1. रेपो दर (REPO Rate)

  • यह वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालीन ऋण उपलब्ध कराता है।

  • यह अनुसूचित बैंकों के साख सृजन क्षमता को प्रभावित करता है।

  • रेपो की कम दर के कारण बैंक अधिम मात्रा में साख सृजन कर सकते हैं, क्योकि उन्हें RBI से सस्ती दर पर ऋण की प्राप्ति होती है।

  1. रिवर्स रेपो दर

  • वह दर जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों की RBI में जमाओं पर ब्याज देती है, रिवर्स रेपो दर कहलाता है।

  1. बैंक दर (Bank Rate)

  • वह दर जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को दीर्घकलीन ऋण देती है, बैंक दर कहलाता है।

  • इसका भी साख सृजन से विपरीत संबंध होता है।

  1. सीमांत स्थायी सुविधा दर (MSF Rate)

  • अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक अपनी अति अल्पकालीन तरलता आवश्यकता की पूर्ति हेतु अपने SLR के बदले RBI से जिस दर पर ऋण लेते हैं, उसे MSF दर कहा जाता है।

  • उल्लेखनीय है कि बैंक MSF दर पर अपनी कुल जमाओं के 2 प्रतिशत से अधिक ऋण नही ले सकते हैं।

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RBI द्वारा साख नियंत्रण

गुणात्मक नियंत्रण उपकरण

  1. बैंक दर

  2. MSF दर

  3. खुले बाजार की क्रियाएं

  4. रेपो/रिवर्स रेपो

  5. CRR एवं SLR

चयनात्मक साख नियंत्रण उपकरण

  1. न्यूनतम सीमा का निर्धारण

  2. नैतिक दबाव एवं सलाह

  3. साख मानदण्ड का निर्धारण

मुद्रास्फीति एवं अवस्फीति

  • कीमतों में एक स्थायी वृध्दि की प्रवृत्ति की मुद्रास्फीति तथा कीमतों में स्थायी कमी की प्रवृत्ति को मुद्रा अवस्फीति कहा जाता है।

दर के आधार पर

दर के आधार पर मुद्रास्फीति को निम्न रुप में बांटा जाता है –

  1. रेंगती स्फीति (Creeping Inflation) – जब स्फीति की दर एक अंकीय हो।

  2. कूदती स्फीति (Hyper Inflation) – जब स्फीति दो या तीन अंकीय हो।

  3. अधिस्फीति (Hyper Inflation) – जब स्फीति की दर बहुत अधिक हो। जैसे जिम्बाब्वे में 22.9 करोड़ प्रतिशत।

  • जब स्फीति मांग के बढ़ने के कारण आए, तो इसे मांग प्रेरित स्फीति कहते हैं, जबकि किन्हीं कारण से लागतों मे वृध्दि हो जाए, तो इस स्थिति में उत्पन्न स्फीति लागत प्रेरित स्फीति कहलाती है।

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स्फीति के तीन प्रमुख कारण

  1. मांग में वृध्दि करने वाले कारक

  • मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाए

  • कालाधन

  • सार्वजनिक व्यय में वृध्दि

  • ऋणों का पुनर्भुगतान किया जाए

  • जनसंख्या में वृध्दि

  • कारारोपण में कटौती

  1. पूर्ति में कमी करने वाले कारक

  • साधनों की पूर्ति मे कमी

  • श्रमिक आंदोलन

  • प्राकृतिक संकट

  • कृत्रिम दुर्लभता

  • निर्यात बढ़ जाए एवं आयात में कमी

  • उत्पत्ति ह्रास नियम प्रभावी हो (अर्थात आगे उत्पादन करने पर लागत बढ़ जाए)

  1. लागत में वृध्दि करने वाले कारक

  • साधनों की मांग में वृध्दि

  • जीवन निर्वाह लागत में वृध्दि

  • एकाधिकार लाभ में वृध्दि

  • मजदूर संघो द्वारा लागत वृध्दि

  • व्यापारियों का अनैतिक गठबंधन

फिलिप्स वक्र

  • वर्ष 1958 में डब्ल्यू. फिलिप्स ने मुद्रास्फीति दर एवं बेरोजगारी के मध्य अल्पकालिक संबंध की व्याख्या की।

  • उनके अनुसार अल्पकाल में बेरोजगारी दर एवं मुद्रास्फीति की मध्य ऋणात्मक संबंध होता है। अर्थात स्फीति दर नियंत्रण बेरोजगारी को बढाएगा।

स्फीति दर a 1/ बेरोजगारी

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मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के उपाय

राजकोषीय उपाय/सरकारी प्रयास

  1. करारोपण में वृध्दि

  2. सार्वजनिक व्यय में कमी

  3. ऋणों मे वृध्दि

  4. प्रत्यक्ष कार्यवाहियां

  5. सार्वजनिक वितरण प्रणाली

  6. आयात में वृध्दि

मौद्रिक उपाय

  1. CRR में वृध्दि

  2. SLR में वृध्दि

  3. Repo दर में वृध्दि

  4. Reverse Repo में वृध्दि

  5. बैंक दर में वृध्दि

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मुद्रास्फीति का प्रभाव

वर्ग

प्रभाव

उपभोक्ता

-ve

ऋणी

+ve

ऋणदाता

-ve

सार्वजनिक बचत

-ve

सार्वजनिक व्यय

+ve

आयात

+ve

निर्यात

-ve

रोजगार

+ve

उत्पादन

+ve

उत्पादक

+ve

व्यापारी

+ve

कृषक

+ve

परिवर्तनशील आय वर्ग

+ve

स्थिर आय वर्ग

-ve

पेंशन भोगी

-ve

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  • वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक ने मई, 2016 में नकदी रहित लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए नीरज कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था, जिसमें 7 सदस्य थे। इसी क्रम में 8 नवंबर को लिए गए विमुद्रीकरण के निर्णय के बाद 25 नवंबर, 2016 को केन्द्र सरकार द्वारा सरकार-नागरिक के मध्य डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने हेतु नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत की अध्यक्षता में भी एक समिति का गठन किया गया।

  • मसाला बॉण्ड के द्वारा भारतीय संस्थान विदेशी बाजारों से विदेशी मुद्रा के बजाय रुपये में पैसा जुटा सकते हैं। जुलाई, 2016 में HDFC पहली ऐसी भारतीय कंपनी बनी, जिसने लंदन स्टॉक एक्सचेंज में समाला बाण्ड्स जारी किए। सरल शब्दों मे विदेशी पूंजी बाजार में निवेश के लिए भारतीय रुपये में जारी किया जाने वाला बॉण्ड, मसाला बॉण्ड है। इस सुविधा के पूर्व अंतरराष्ट्रीय बाजार में निवेश के लिए बॉण्ड डॉलर मे जारी करना होता था।

  • भारत में राष्ट्रीय न्यादर्श सर्वेक्षण 2011-12 के अनुसार, चालू दैनिक स्थिति (CDS) बेरोजगारी दर 5.6 प्रतिशत थी।

  • रंगराजन समिति द्वारा ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के लिए गरीबी रेखा के निर्धारण मे अलग-अलग उपभोग व्यय लिया गया है। समिति के अनुसार, भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 32 रुपये (972 रु. मासिक) उपभोग में व्यय तथा शहरी क्षेत्रों में 47 रुपये (1407 रु. मासिक) प्रतिदिन प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय, गरीबी रेखा को निर्धारित करती है। रंगराजन समिति द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार, वर्ष 2011-12 में भारत की 29.5 फीसदी जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करती है, जबकि वर्ष 2011-12 के लिए तेंदुलकर समिति का अनुमान 21.9 प्रतिशत  गरीबी का है।

  • भारत सरकार द्वारा अनुमोदित सक्षम परियोजना नवीन अप्रत्यक्ष कर नेटवर्क से संबंधित है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने इस परियोजना को 28 सितंबर, 2016 को अपनी स्वीकृति दी। परियोजना की कुल लागत 2256 करोड़ रुपये है, जबकि अवधि सात वर्ष है। यह परियोजना वस्तु एवं सेवा कर के कार्यान्वयन में सहायक होगी। साथ ही यह योजना कस्टम विभाग के व्यापार के सुगमीकरण हेतु सिंगल विंडो इंटरफेस (SWIFT) को विस्तारित भी करेगी।

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  • रुपे कार्ड (RuPay Card) भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) द्वारा अप्रैल, 2011 में विकसित स्वदेशी प्रणाली पर आधारित एटीएम कार्ड है। इसका नाम दो शब्दों रुपया और पेमेंट से मिलाकर रखा गया है। इसे बहुराष्ट्रीय वीजा, अमेरिकन, एक्सप्रेस एवं मास्टर कार्ड की तरह प्रयोग किया जाता है। 8 मई, 2014 को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भारत का अपना भुगतान कार्ड रुपे राष्ट्र को समर्पित किया। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा वर्ष 2008 में स्थापित एक निगम है, जिसे भारत में विभिन्न भुगतान प्रणालियों के लिए मातृसंस्था के रुप में कल्पित किया गया है। यह देश में वित्तीय समवेशन के संवर्धन में सहायता करता है।

  • वित्तीय समावेशन को देशभर में फैलाने के लिए निजी क्षेत्र में छोटे वित्त बैंकों (Small Finance Banks) व भुगतान बैंकों (Payments Banks) की स्थापना की घोषणा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जुलाई, 2014 में केन्द्रीय बजट में की थी। इन बैंकों की स्थापना के लिए अंतिम दिशा-निर्देश भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 27 नवंबर, 2014 मे जारी किए। लघु वित्त बैंकों की स्थापना का उद्देश्य मुख्यतः जनसंख्या के वंचित तथा अल्प सेवा प्राप्त वर्ग के लिए बचत के साधनों का प्रावधान करना तथा लघु कारोबार इकाइयों, छोटे और सीमांत किसानों, माइक्रो और लघु उद्योगो तथा असंगठित क्षेत्र की अन्य संस्थाओं को उच्च प्रौद्योगिकी, कम लागत परिचालनों के माध्यम से ऋण की आपूर्ति करना है।

  • एकीकृत भुगतान अंतरापृष्ठ (UPI) एक त्वरित भुगतान प्रणाली है, जिसे RBI विनियमित इकाई के भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) ने विकसित किया है। यह IMPS अवसंरचना के आधार पर बना हुआ और किसी दो पक्षों के बैंक खातों के बीच पैसों के तुरंत लेन-देन को स्मार्टफोन के माध्यम से संपन्न करता है। यह ग्राहक को एक बैंक खाते से विभिन्न व्यापारियों (Merchants) को ऑनलाइन या ऑफलाइन भुगतान की सुविधा प्रदान करता है, वह भी बिना किसी क्रेडिट कार्ड वितरण, IFSC कोड या नेट बैंकिंग/वॉलेट पासवर्ड की परेशानी के UPI का मुख्य लाभ लेन-देन करना सरल और आसान बनाना है। इसे बैंक खाते से लिंक करने के बाद वॉलेट की तरह टॉपअप किए बिना निर्बाध भुगताने किया जा सकता है। वॉलेट में पैसे हैं या नहीं की चिंता किए बिना सीधे बैंक स्थानांतरण के लिए UPI का प्रयोग करना आसान होता है।

  • वर्ष 1957 में भारत में मुद्रा की दशमलव प्रणाली प्रचलन में आई। वर्ष 1957 से 1964 तर टकसाल से उत्पादित पैसा को नया पैसा कहा गया। वर्ष 1964 में नया पैसा में से न्या शब्द बाहर कर दिया गया तथा अब इसे पैसा कहा गया। अतः मुद्रा की दशमलव प्रणाली के साथ प्रचलित नया पैसा 1 जून 1964 से पैसा हो गया।

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  • बिटकाइंस एक आभाषी मुद्रा (Virtual Currency) है। इसका विकास सातोशी नाकामोतो नामक प्रोग्रामर (या प्रोग्रामरों का समूह) द्वारा किया गया था। यह एक इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणाली है। यह केन्द्रीय बैंकों के नियंत्रण से परे होता है। यह एक पीयर टू पीयर (Peer to Peer) प्रणाली है। इसके अंतर्गत उपयोगकर्ताओं द्वारा बिना किसी मध्यस्थ एवं बिना किसी पहचान को उजागर किए लेन-देन किया जा सकता है।

  • बैंकों के स्थापना वर्ष

भारतीय स्टेट बैंक      –   1955

अग्रणी बैंक योजना     –   1969

क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक     –   1975

नाबार्ड               –   1982

  • सुलभ मुद्रा से तात्पर्य तरल मुद्रा से है। इसके अंतर्गत जनता के पास उपलब्ध करेंसी, बैंकों की मांग जमाएं तथा भारतीय रिजर्व बैंक के अन्य जमा राशियां आती हैं।

  • भारत में मुद्रा गुणक को वृहद या स्थूल मुद्रा (M3) और आरक्षित मुद्रा (M0) के अनुपात के रुप में मापते हैं। अतः यदि मुद्रा गुणक K हो, तो K = M3/M0 या M3/Rm

  • यह विदेशी मुद्रा जिसमें त्वरित प्रवास की प्रवृत्ति होती है, गर्म मुद्रा (Hot Money) कहलाती है। निवेशकों द्वारा उच्च ब्याज दर से लाभ प्राप्ति हेतु इस प्रकार की मुद्रा का प्रवाह एक देश से दूसरे देश में आसानी से किया जाता है।

  • भारतीय रिजर्व बैंक को रु. 10,000 तक करेंसी नोट छापने का अधिकार प्राप्त है। वर्तमान में भारतीय रिजर्व बैंक 1, 2 , 5 रु. के सिक्के तथा 10, 20, 50, 100, 500 तथा 2000 के करेंसी नोट छापने का कार्य कर रही है।

  • नोट निर्गमन के लिए वर्ष 1956 में न्यूनतम विदेशी कोष प्रणाली अपनाई गई जिसके तहत 515 करोड़ रु. विदेशी कोष (जिसमें 115 करोड़ रु. स्वर्ण तथा 400 करोड़ रु. विदेशी प्रतिभूति) के रुप में तथा शेष मूल्य रुपये की प्रतिभूति में रखना आवश्यक था। 31 अक्टूबर, 1957 के बाद रिजर्व बैंक एक्ट के संशोधन के अनुसार, इसे घटाकर  केवल 200 करोड़ रु. कर दिया गया जिसमें 115 करोड़ रु. सोने के रुप में रखना अनिवार्य होगा तथा निर्गमित नोट के शेष हिस्से के पीछे 85 करोड़ रु. की प्रतिभूति रखना अनिवार्य  होगा।

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  • भारत में सिक्के ढालने का एकमात्र आधिकार भारत सरकार को है। सिक्का निर्माण का दायित्व समय-समय पर यथा संशोधित सिक्का निर्माण अधिनियम, 1906 के अनुसार भारत सरकार का है। विभिन्न मूल्य वर्ग के सिक्कों के अभिकल्प तैयार करने और उनकी ढलाई करने का दायित्व भी भारत सरकार का है। भारतीय रिजर्व बैक अधिनियम के अनुसार, परिचालन के लिए सिक्के भारतीय रिजर्व बैंक के माध्यम से ही जारी किए जाते हैं।

  • भारत में मुंबई, कोलकाता तथा हैदराबाद मे टकसालें (सिक्का ढलाई केन्द्र) पूर्व में ही स्थापित की गई थी, इसके अतिरिक्त वर्ष 1988 में नोडा में एक और टकसाल स्थापित की गई।

  • मुद्रा प्रसार से तात्पर्य अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा में वृध्दि से है। मुद्रा प्रसार के कारण मुद्रा की क्रय शक्ति गिर जाती है। अर्थात मुद्रा की निश्चित मात्रा से पूर्व की अपेक्षा, कम वस्तुओं अथवा सेवाओं का क्रय किया जा सकता है। इन सबके परिणामस्वरुप सामान्य कीमत स्तर बढ़ जाता है।

  • भारत में मुद्रा संबंधी नोटों की निर्गमन प्रणाली आनुपातिक कोष प्रणाली से बदलकर वर्ष 1956 में न्यूनतम स्थिर कोष प्रणाली हो गई है।

  • किसी अर्थव्यवस्था में जब वस्तुओं के मूल्य में वृध्दि होती है तथा मुद्रा के मूल्य में कमी तो उस समय मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न होती है।

  • भारत में कागजी मुद्रा की शुरुआत सर्वप्रथम बैंक ऑफ हिन्दुस्तान (1770-1832), जनरल बैंक ऑफ बंगाल एंड बिहार (1773-75 वॉरेन हेस्टिंग्स द्वारा स्थापित) तथा बंगाल बैंक (1784-91) द्वारा की गई थी। 1861 के पेपर करेंसी एक्ट द्वारा भारत की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने निजी और प्रेसीडेंसी बैंकों से कागजी मुद्रा के निर्गमन का अधिकार ले लिया। तत्पश्चात भारत सरकार द्वारा सर्वप्रथम कागजी मुद्रा 1862 में  जारी की गई।

  • ऐसी मुद्रा जो चलन मे नही होती तथा केवल लेखांकन उद्देश्यों के लिए होती है, कृत्रिम मुद्रा कहलाती है। SDR (Special Drawing Right) ऐसी ही मुद्रा है जो IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) के लेन-देन के लेखांकन के लिए इस्तेमाल होती है। ADR अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसिप्ट्स तथा GDR ग्लोबल डिपॉजिटरी को व्यक्त करता है।

  • पश्चिमी हिंद महासागर स्थित सेशेल्स (Seychelles) की मुद्रा रुपया है। भूटान की मुद्रा – न्गुलड्रम, मलेशिया की मुद्रा – रिंगगिट तथ मालदीव की मुद्रा रुपया है।

  • बांग्लादेश की मुद्रा टका है। रुपिया – नेपाल की, दीनार – इराक की तथा लीरा (वर्तमान में यूरो) इटली की मुद्रा है।

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  • बहत (Bahat) थाईलैंड की विधिक मुद्रा है। टर्की लीरा – तुर्की की, डोंग – वियतनाम की तथा रियाल – ईरान की मुद्रा है।

  • चीन की मुद्रा युआन है जबकि लीरा (वर्तमान में यूरो) इटली की, येना – जापान की तथा रुपया – भारत की मुद्रा है।

  • संयुक्त सूडान की मुद्रा दीनार (एवं सूडानी पौंड), पूर्व यूगोस्लाविया की मुद्रा न्यू यूगोस्लाव दीनार तथा ट्यूनीशिया की भी दीनार है जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की मुद्रा दिरहम है।

  • मेक्सिको –   पेसो

आस्ट्रिया     –   शिलिंग (वर्तमान में यूरो)

जापान       –   येन

अऊदी अरब   –   रियाल

  • मूल्य स्तर में लगातार तेज संचयी तथा स्थायी वृध्दि मुद्रास्फीति कहलाती है। इस अवस्था में वस्तुओं का मूल्य तेजी से बढ़ता (मांग आधिक्य के कारण) है तथा मुद्रा का मूल्य गिरता (क्रय शक्ति में कमी के कारण) है। अन्य देशों की तुलना में स्वदेश में कीमतें अधिक तेजी से बढ़ने के कारण यह विदेशी करेंसियों की अपेक्षा रुपये को कमजोर कर देती हैं। अतः विनिमय दर में सुधार नही होता है।

  • भारत में मुद्रास्फीति की दर की माप तीन आधारों – उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), थोक मूल्य सूचकांक (WPI) तथा श्रमिकों के जीवन-निर्वाह लागत सूचकांक, पर की जाती है तथापि इनमे सर्वाधिक प्रचलित माप थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति (WPI Inflation) है।

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  • भारत में मुद्रास्फीति के प्राक्कलन का सबसे प्रचलित माप थोक मूल्य सूचकांक है। पहला थोक सूचकांक 10 जनवरी, 1942 से शुरु होने वाले सप्ताह से प्रारंभ हुआ। जबकि आधार पर वर्ष 1939 = 100 लिया गया। वर्तमान मे थोक मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2011-12 है।

  • अवस्फीति माल तथा सेवाओं के सामान्य कीमत स्तर में आई सतत गिरावट है। यह मुद्रास्फीति की दर में गिरावट नही है, जो डिसइंफ्लेशन (Disinfaltion) के रुप में जानी जाती है।

  • पहले के आंकड़ों का वर्तमान आंकड़ों की गणना पर पड़ने वाला प्रभाव आधार प्रभाव (Base Effect) कहलाता है। स्फीति दर में वृध्दि के संदर्भ में विगत वर्ष की कीमतों का वर्तमान स्फीति दर की गणना पर आया प्रभाव ही आधार प्रभाव है। दूसरे शब्दों में, यदि गत वर्ष स्फीति अत्यंत न्यूनतम स्तर पर हो, तो इस वर्ष मूल्य सूचकांक में थोड़ी-सी वृध्दि भी स्फीति दर को गत वर्ष की तुलना में काफी बड़ा दिखाएगी।

  • बजटीय घाटे की पूर्ति हेतु नई मुद्रा का सृजन सर्वाधिक स्फीतिकारी होगा क्योंकि मुद्रा की पूर्ति मे वृध्दि से लोगों की मौद्रिक आय में वृध्दि होगी जिसके फलस्वरुप मांग में वृध्दि होगी जो कीमतों को बढ़ा देगी।

  • केन्द्रीय सरकार अपने कर्मचारियों के दिए जाने वाले वेतन मे महंगाई के कारण होने वाली क्षति की पूर्ति हेतु औद्योगिक कर्मियों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक (CPI-IW) प्रयोग करती है।

  • भारत में कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (Dearness Allowances of Employees) का निर्धारण औद्योगिक कर्मियों के उपभोक्ता कीमत सूचकांक (Consumer Price Index – Industriasl Workers) के आधार पर किया जाता है। CPI के चार वर्ग होते हैं –

  1. CPI-IW – Consumer Price Index- Industrial workers

  2. CPI-AL – Consumer P rice Index – Agricultural Labourers

  3. CPI-RL – Consumer Price Index – Rural Labourers

  4. CPI-UNME – Consumer Price Index – Urban Non-Nanual Employees.

  • औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तथा ग्रामीण श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाले श्रम ब्यूरो द्वारा संकलित किया जाता है, जबकि शहरी गैर-श्रम कर्मचारियों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (CSO) द्वारा संकलित किया जाता है।

  • अक्टूबर, 2009 में थोक मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 1993-94 से हटाकर वर्ष 2004-05 कर दिए जाने का निर्णय लिया गया था।

  • भारत में सूक्ष्म-वित्त (Microfinance) का प्रारंभ 1980 के दशक के प्रारंभ में छोटे स्तर पर स्व-सहायता समूहों के गठन के माध्यम से हुआ था। वर्तमान में सूक्ष्म-वित्त के तहत उपलब्ध कराई जाने वाली वित्तीय सेवाओं में शामिल हैं – ऋण सुविधाएं, बचत सुविधाएं, बीमा सुविधाएं एवं निधि अंतरण सुविधाएं।

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  • वाणिज्यिक बैंको द्वारा दिए जाने वाले ऐसे ऋण लोक-लुभावन ऋण (Teaser Loan) कहलाते हैं जो ऋण लेने वाले व्यक्ति की ऋण को चुकाने की क्षमता तथ अन्य मानकों का बिना ध्यान  रखे हुए प्रदान किए जाते हैं। ऐस ऋणों पर प्रारंभिक वर्षों में ब्याज की दर आकर्षक रुप से कम रहती है और बाद के वर्षों में बढ़ जाती है। लोक-लुभावन ऋण अधोमुख ऋणों (Subprime  Loans) का ही एक स्वरुप है तथा इनमें  बैंकों के समक्ष यह जोखिम रहता है कि भविष्य में उनके ऋण चुकता न हो। इस प्रकार के ऋण मुख्यतः अल्प या मध्यम आय वर्ग के व्यक्तियों को गृह ऋणों के रुप में प्रदान किए जाते हैं।

  • प्रतिच्छाया बैंकिंग से (Shadow Banking) से तात्पर्य़ गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं द्वारा वित्तीय तथा अन्य गतिविधियों को संपन्न करना है। इस हम आभाषी बैंक व्यवस्था भी कह सकते हैं। इसमें अनेक गैर-बैंकिंग वित्तीय मध्यस्थ परंपरागत वाणिज्यिक बैंकों के समान ही ग्रहकों को सेवाएं उपलब्ध कराते हैं मगर उन पर न तो सरकार का और न ही केन्द्रीय बैंक का कोई नियंत्रण होता है।

  • RBI ने दिसंबर, 1969 से लीड बैंकिंग योजना प्रारंभ की। इसके अंतर्गत प्रत्येक बैंक को एक जिला आवंटित किया जाता है और उस बैंक को लीड बैंक की संज्ञा दी जाती है। प्रत्येक जिले का लीड बैंक संबंधित जिले में साख व्यवस्था के समन्वय में अग्रणी भूमिका निभाता है। भारत के लगभग सभी जिलों मे यह योजना लागू है। लीड बैंक जिला स्तर पर साख योजना का निर्माण कर उसे पूर्ण करने में केन्द्रीय भूमिका निभाता है।

  • निजी क्षेत्र के एक्सिस बैंक ने सर्वप्रथम चीन के शंघाई शहर में अपनी शाखा स्थापित की है।

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  • लघु उद्योगों के संबंध में कार्य करने वाला बैंक मुख्यतः SIDBI (Small Industries Development Bank of India) है। इसकी स्थापना वर्ष 1990 में हुई थी।

  • सितंबर, 2015 में भारतीय स्टेट बैंक ने भारत की 7 सबसे बड़ी ई-कॉमर्स क्षेत्र की कंपनियों के साथ भागीदारी में सिम्पली क्लिक क्रेडिट कार्ड को लांच किया ये 7 कंपनियां हैं –

  1. अमेजन इंडिया

  2. बुकमाईशो

  3. क्लियरट्रिप

  4. फैबफर्निश

  5. फूड पांडा

  6. लेंसकार्टड

  7. ओला कैब्स

  • ICICI की स्थापना –   जनवरी, 1955

  • IDBI की स्थपना –   जुलाई, 1964

  • IFCI की स्थापना     –   जुलाई, 1948

  • भारतीय स्टेट बैंक, भारत का पहला बैंक था जिसने चीन में अपनी प्रथम शाखा खोली।

  • जयपुर की राजपूताना महिला नागरिक सहकारी बैंक ने 30 अगस्त, 1995 से कार्य प्रारंभ किया था।

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  • 13 अगस्त, 2018 से आईसीआईसीआई बैंक लि. के साथ बैंक ऑफ राजस्थान का विलय प्रभावी हुआ।

  • अप्रैल, 2011 से भारतीय स्टेट बैंक के चेयरमैन पद पर प्रतीप चौधरी कार्यरत थे। उन्होंने 7 अप्रैल, 2011 को ओ.पी. भट्ट के स्थान पर पदभार ग्रहण किया था। वर्तमान में (अक्टूबर, 2017) रजनीश कुमार इस पद पर हैं।

  • भारत का निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा बैंक आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड ने 12 दिसंबर, 2002 को मुंबई मे सबसे पहले चलती-फिरती (Mobile ATM) ATM सेवा प्रारंभ की थी।

  • भारतीय औद्योगिक साख एवं निवेश निगम (Industrial Credit and Investment Corporation of India – ICICI) की स्थापना वर्ष 1955 में विश्व बैंक तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के सुझाव एवं सहयोग से की गई थी। इसका उद्देश्य देश की निजी क्षेत्र में लघु एवं मध्यम आकार के उद्योगो का विकास करना था।

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) सबसे  बड़ा व्यापारिक बैंक है। 1 अप्रैल, 2017 से प्रभावी पंच सहयोगी बैंको और भारतीय महिला बैंक के विलय के पश्चात मार्चांत, 2018 तक इसकी 22414 शाखाएं थी।

  • भारत में व्यापारी बैकों की देनदारियों में सबसे महत्वपूर्ण अंश जमाओं (Deposits) का होता है। जमा में भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण सावधि जमाएं (Time Deposits) है। दूसरे स्थान पर बचत बैंक जमा (Saving Deposite) एवं तीसरे स्थान पर मांग जमाएं (Demond Deposite) होती हैं।

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  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक वे बैंक हैं जिनमें सरकार की धारिता सबसे अधिक है। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अंतर्गत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एवं उसके सहायक बैंक तथा 19 राष्ट्रीयकृत बैंक हैं।

  • वर्तमान में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को छोड़कर भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के 20 बैंक हैं (आईडीबीआई बैंक सार्जनिक क्षेत्र का तो बैंक है किंतु राष्ट्रीयकृत नही है। अतः स्टेट बैंक समूह को छोड़कर भारत में राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 19 है)। सितंबर, 2018 में अरुण जेटली के नेतृत्व में एक पैनल ने सार्वजनिक क्षेत्र के तीन बैंको, नामतः बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक के विलय की सिफारिश की।

  • भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) की स्थापना 2 अप्रैल, 1990 को की गई थी। यह देश में लघु उद्योगो की प्रोन्नति, वित्त व्यवस्था एवं विकास के लिए प्रधान वित्तीय संस्थान हैं।

  • भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिया गया वह ऋण जिसकी पिछले भुगतान से 30 दिन बाद से 90 दिन तक न तो मुख्य रकम का स्टॉलमेंट और न ही उस पर देय ब्याज की अदायगी की जाती है तो उसे गैर-निष्पादीय परिसंपत्ति (NPA: Non-Performing Assets) कहा जाता है।

  • कोर बैंकिंग का आशय नेटवर्क से जुड़ी बैंक शखाओं द्वारा मुहैया कराई जाने वाली बैंकिंग सेवाओ से है। कोर बैंकिंग के अंतर्गत ग्राहक बैंक के किसी भी शाखा के खाते का संचालन अन्य शाखाओं से भी कर सकता है। कोर बैंकिंग के अंतर्गत अनेक सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, जैसे एनीव्हेयर बैंकिंग या कहीं भी बैंकिंग साधनो का तीव्रता से हस्तांतरण आदि। कंप्यूटीकरण के माध्यम से RBI का नियंत्रण बढ़ाने तथा बैंकों के अधिग्रहण से इसका संबंध नही है।

  • केन्द्र सरकार के आंतरिक ऋण के अंतर्गत-बाजार उधारी, राज्य सरकारों, व्यापारिक बैंकों तथा अन्य संस्थाओं को सरकार द्वारा निर्मित ट्रेजरी बिल्स, RBI को निर्गमित विशिष्ट प्रतिभूतियां, क्षतिपूरक बॉण्ड आदि सम्मिलित होते हैं।

  • किसी अर्थव्यवस्था मे यदि ब्या दर (Inrterest Rate) को घटाया जाता है, तो वह अर्थव्यवस्था मे उपभोग व्यय व निवेश व्यय को बढाएगा क्योकि, निम्न ब्याज दर से उधार लेना आसान हो जाता है जिससे लोग निवेश एवं उपभोग व्यय हेतु प्रेरित होते हैं।

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  • प्राथमिक क्षेत्र मे निम्नलिखित श्रेणियां शामिल हैं  –

  1. कृषि

  2. लघु एवं सूक्ष्म उद्यम

  3. शिक्षा

  4. गृह

  5. एक्सपोर्ट क्रेडिट एवं

  6. अन्य

  • वित्तीय समावेशन के उद्देश्यों में – गरीब आबादी के लिए वित्तीय सेवाओं का विस्तार करना, कमजोर वर्ग की संभावित संवृध्दि के द्वार खोलना तथा ग्रामीण क्षेत्रों मे वित्तीय सेवाओं का प्रसार करना शामिल है। वित्तीय समावेशन के उद्देश्यों मे बैंकिंग अवसंरचना का विस्तार शामिल है न कि इसको सिकोड़ना।

  • सीमित देयता के आधार पर 1881 में स्थापित अवध कॉमर्शियल बैंक भारतीयों द्वारा संचालित पहला बैंक था। पूर्ण रुप से प्रथम भारतीय बैंक, पंजाब नेशनल बैंक था।

  • अखिल भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण समिति (1952) जिसे ए.डी. गोरवाला समिति के नाम से जाना जाता है, ने इस्पीरियल बैंक के साथ कुछ राज्य संबध्द बैंको को मिलाकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना की संस्तुति की थी। 15 अप्रैल, 1980 को 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था।

  • व्यापारिक बैंक एक वित्तीय संस्था है जो मुद्रा तथा साख में व्यापार करती है। यह न केवल मुद्रा को लोगों से जमा के रुप में स्वीकार करती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उद्यमियों तथा साहसिंयों को उधार देती है। इसके कार्यों में शामिल हैं – ग्राहक की तरफ से शेयरों एवं प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री तथा वसीयतों के लिए निष्पादक तथा न्यासी के रुप में कार्य करना।

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  • सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया सार्वजनिक क्षेत्र का ऐसा अनुसूचित राष्ट्रीयकृत बैंक है जिसकी पूंजी में मार्च, 2018 तक सरकार की हिस्सेदारी 86.4 प्रतिशत है। फलस्वरुप सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया रिजर्व बैंक के नियंत्रण में है।

  • संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 के अनुरुप 9 जुलाई, 1988 को राष्ट्रीय आवास बैंक की स्थापना की गई है। यह बैंक पूर्णतः भारतीय रिजर्व बैंक के स्वामित्व में है।

  • भारत में भविष्य निधि, संविधा आधारित बचत है। भविष्य निधि सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की आय का वह भाग है, जिसे संविदा के आधार पर सरकार के पास जमा करना पड़ता है। ध्यातव्य है कि निधि सरकार की आय नहीं, अपितु दायित्व है।

  • अवधि के आधार पर ऋण को निम्न तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है –

लघु अवधि ऋण       –   15 माह से कम

मध्यम अवधि ऋण    –   15 माह से 5 वर्ष तक

दीर्घ अवधि ऋण       –   5 वर्ष से अधिक

  • पंजाब नेशनल बैंक में विलय होने वाला बैंक न्यू बैंक ऑफ इंडिया था। यह विलय (Merger) वर्ष 1993 में हुआ था।

  • भारतीय स्टेट बैंक ने किसानों के पास आसानी से पहुंचने के लिए किसान क्लबों का गठन किया है।

  • बैंक और उनका मूल देश –

ए.बी.एन.एमरो बैंक     –   नीदरलैंड्स

बारक्लेज बैंक         –   लंदन (यू.के.)

कूकमिन बैंक          –   द. कोरिया

  • भारत में बचत खातों पर ब्याज दरों को पहले भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विनियमित किया जाता था, जिन्हें अक्टूबर , 2012 में नियंत्रण मुक्त कर दिया गया।

  • 31 दिसंबर, 2015 की स्थिति के अनुसार, भारत में विदेशी बैंकों की सर्वाधिक शाकाएं ब्रिटेन के स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक (102) की हैं जिसके पश्चात क्रमशः हांगकांग के एच.एस.बी.सी.लि. (50) तथा अमेरिका के सिटी बैंक (45), फ्रांस के बी.एन.पी. पारीवस बैंक (8) स्थान है।

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  • भारत में वित्त वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च होता है जबकि भारतीय रिजर्व बैंक का लेखा कार्य अथवा लेखा वर्ष 1 जुलाई से 30 जून होता है। पूर्व में RBI का लेखा कार्य वर्ष जनवरी से दिसंबर हुआ करता था। यह व्यवस्था 11 मार्च , 1945 को बदल कर जुलाई से जून कर दी गई।

 

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  • चार आरक्षण अनुपात या परिवर्तनीय कोष अनुपात (Variable Reserve Ratio: VRR) जिसके द्वारा RBI बैंकों के पास रखे जाने वाले तरल कोष में परिवर्तन करती है तथा खुले बाजार की कार्रवाई जिसके द्वारा RBI प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय करती है, ये दोनो RBI के परिणामस्वरुप साख नियंत्रण की विधियां हैं जो मौद्रिक नीति के अंतर्गत आती हैं।

  • भारतीय रिजर्व बैंक खुले बाजार की क्रिया (Open market operation) के तहत सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) एवं ट्रेजरी बिल का क्रय-विक्रय करता है। अर्थव्यवस्था से मुद्रा की अपेक्षित मात्रा निकालने के लिए प्रतिभूतियों का विक्रय जबकि अर्थव्यावस्था में मुद्रा की अपेक्षित मात्रा डालने के लिए प्रतिभूतियों का क्रय किया जाता है।

  • भारत में मुद्रा एवं साख का नियंत्रण भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किया जाता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह परिणामस्वरुप व गुणात्मक उपायों का उपयोग करता है।

मौद्रिक नीति के उपकरण या साख नियंत्रण के तरीके/साधन/विधियां

परिमाणात्मक साख नियंत्रण विधियां

चयनात्मक या गुणात्मक साख नियंत्रण विधियां

बैंक दर

न्यूनतम सीमा या मार्जिन निर्धारण

सीमांत स्थायी सुविधा दर

नैतिक दबाव

खुली बाजार की क्रियाए

साख की राशनिंग

तरलता समायोजन सुविधा(LAF) (रेपो तथा रिवर्स रेप)

उपभोक्ता उधार का नियमन

परिवर्तनीय कोष अनुपात (नकद आरक्षित अनुपात-CRR, सांविधिक तरलता अनुपात – SLR)

`साख स्वीकृतिकरण योजना

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  • आय एवं परिसंपत्तियों का साम्यिक वितरण, मौद्रिक नीति का उद्देश्य नही है।

  • विनिमय साध्य विलेख अधिनियम (Negotiable Instrument Act, 1881) दिसंबर, 1881 में पारित हुआ था परंतु यह 1 मार्च, 1882 को प्रभावी हुआ था। हाल ही में इस अधिनियम में विनिमय साध्य विलेख (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा संशोधन किया गया। इसे 2 अगस्त, 2018 को राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हुई।

  • भारत में ट्रेजरी बिल सर्वप्रथम वर्ष 1917 में जारी किए गए थे। ये RBI द्वारा नीलामी बोली के माध्यम से बेचे जाते हैं। सामान्यतः इनका मूल्य वर्ग 25 हजार या उसके गुणको मे होता है। इनके जारी करने का मुख्य उद्देश्य सरकार के अतिरिक्त खर्चों के लिए फंड जुटाना होता है।

  • भारतीय रिजर्व बैंक के पास अनुसूचित बैंकों को अपनी जमाओं का निश्चित प्रतिशत नकद कोष अनुपात (CRR – Cash Reserve Ratio) के रुप में रखना पड़ता है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सी.आर.आर. में वृध्दि से बैंकों की साख सृजन की क्षमता कम होती है तथा अर्थव्यवस्था में मौद्रिक तरला में कमी आती है।

  • 1 मार्च, 2015 को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र की स्थापना गांधीनगर, गुजरात में की गई। यह एक विशेष आर्थिक क्षेत्र का हिस्सा है।

  • भारत का औद्योगिक वित्त निगम (IFCI) एक विकास बैंक के रुप में कार्य करता है। IFCI की स्थापना 1 जुलाई, 1948 को IFCI अधिनियम, 1948 के  अंतर्गत हुई थी।

संस्था

स्थापना वर्ष

भारतीय औद्योगिक साख एवं निवेश निगम (ICICI)

1955

भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (IDBI)

1964

भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (IFCI)

1948

भारतीय लघु उद्योग विकास निगम (SIDBI)

1990

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  • सेल (Steel Authority of India Limited) एक विपणन संस्था है जबकि सेबी (पूंजी बाजार), सिडबी (सूक्ष्म वित्त) एवं नाबार्ड (कृषि साख) अपने क्षेत्र की शीर्ष संस्थाएं हैं। सेबी की स्थापना वर्ष 1988 में सिडबी की स्थापना वर्ष 1990 में एवं नबार्ड की स्थापना वर्ष 1982 में हुई थी।

  • भारतीय निर्यात-आयात बैंक अधिनियम, 1981 के अंतर्गत वर्ष 1982 में स्थापित भारतीय निर्यात-आयात बैंक (एक्जिम बैंक) देश की एक शीर्ष वित्तीय संस्था है। भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (IDBI) का गठन भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 के तहत एक वित्तीय संस्था के रुप में हुआ था और  यह भारत सरकार द्वारा जारी 22 जून, 1964 की अधिसूचना के द्वारा 1 जुलाई, 1964 से अस्तित्व में आई। भारतीय औद्योगिक  ऋण और निवेश निगम (ICICI) की स्थापना वर्ष 1955 में निजी क्षेत्र के उद्योगो को माध्य एवं  दीर्घकालीन ऋण प्रदान करने हेतु की गई थी। औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (BIFR) की स्थापना जनवरी, 1987 में की गई थी।

  • मल्होत्रा समिति की रिपोट (7 जनवरी, 1994) की प्रमुख सिफारिश के अनुसार, IRDA अधिनियम, 1999 पारित किया गया रिपोर्ट में बीमा क्षेत्र के लिए एक स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण की स्थापना की सिफारिश की गई थी। अप्रैल, 2000 में IRDA एक सांविधिक निकाय के रुप में सामने आया।

  • IRDA का लक्ष्य बीमा धारकों के हितों की रक्षा करना, बीमा उद्योग का क्रमबध्द विनियमन, संवर्धन तथा संबंधित व आकस्मिक मामलों पर कार्य करना है।

  • एक्चुअरीज (Actuaries) शब्द बीमा क्षेत्र से संबंधित है। एक्चुअरीज का संबंध भविष्य की अनिश्चित घटनाओं के वित्तीय प्रभाव के आकलन से है।

  • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFCs) बचत खाते की तरह मांग निक्षेप (Demand Deposit) स्वीकार नही कर सकती हैं ये सरकार द्वारा जारी प्रतिभूतियों के अधिग्रहण में भाग ले सकती हैं।

  • देश के निम्न तथा मध्यम आय वर्ग की लघु बचतों को देश के औद्योगिक विकास हेतु सदुपोयग करने के उद्देश्य से वर्ष 1964 में यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया की स्थापना की गई। 1 फरवरी, 2003 को यूटीआई का औपचारिक रुप से विभाजन हो गया। यूटीआई-1 को यू.एस.-64 सहित उन सभी 26 योजनाओं को सौंपा गया जिनमें सुनिश्चित प्रतिफल का आश्वासन निवेशकों को दिया गया है। यू.टी.आई.-2 सेबी के नियमों के तहत म्युचुअल फंड के रुप में कार्य करती रहेगी।

  • 1 फरवरी, 1964 को स्थापित UTI भारत का सबसे बड़ा म्यूचुअल फंड संगठन है। वर्तमान में UTI भारतीय शेयर बाजारों में सबसे बड़ा निवेशकर्ता है।

  • सीमित देयता साझेदारी फर्म में साझेदारी और प्रबंधन अलग-अलग होना आवश्यक नही है। इसमें आंतरिक प्रशासन साझेदारी के बीच आपसी सहमति से विनिश्चित किया जा सकता है तथा यह शाश्वत उत्तराधिकार से परिपूर्ण निगमित निकाय है। इसमें अधिकतम भागीदारों की संख्या पर कोई ऊपरी सीमा नही है।

  • भारतीय स्टेट बैंक ने 5 अगस्त, 1998 को 5 वर्ष की अवधि वाला रिसर्जेट इंडिया बॉण्ड तीन विदेशी मुद्राओं – यू.एस.  डॉलर, पाउंड स्टर्लिंग  तथा ड्यूश मार्क  (जर्मन मार्क) में जारी किया था।

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  • राष्ट्रीय शेयर बाजार की स्थापना फेरवानी समिति के सिफारिश पर नवंबर, 1992 में हुई। राष्ट्रीय शेयर बाजार का मुख्यालय दक्षिण मुंबई के वर्ली में है।

  • वाणिज्यिक प्रपत्र कार्पोरेट (निगम) उद्योग के लिए साख का स्त्रोत है। भारत में वाणिज्यिक प्रपत्रों का चलन वर्ष 1990 से है। यह प्रपत्र एक प्रकार के प्रामिसरी नोट होते हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि निर्गमन तिथि से 7 दिन से 1 वर्ष के बीच होती है।

  • फर्म या कंपनी जो इस रुप में आर्गनाइज्ड हो जिसमें शेयर धारक अथवा इसके स्वामियों का दायित्व सीमित हो, लिमिटेड () कंपनी कहलाती है।

  • नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया की स्थापना वर्ष 1992 में फेरवानी समिति की सिफारिश पर हुई थी। इसके प्रवर्तकों  (Promotors) में भारत सरकार के अलावा शीर्ष वित्तीय संस्थाएं जिनमें प्रमुख रुप से IDBI, LIC, GIC तथा SBI शामिल हैं।

  • बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के संवेदी सूचकांक को संक्षिप्त रुप में सेंसेक्स (Sensex) कहा जाता है। संवेदी सूचकांक मे चढ़ाव का अर्थ BSE मे सूचीबध्द 30 कंपनियों के शेयरों के समग्र मूल्य मे चढ़ाव से है।

  • निक्की टोक्यो स्टॉक एक्सचेंज का स्टॉक मूल्य सूचकांक (Stock Price Index) है।

  • मार्च, 2014 तक बॉम्बे स्टाक एक्सचेंज के ग्रीनेक्स सूचकांक (BSE- GREENEX Index) में कंपनियों की संख्य 25 थी।

  • बंबई शेयर बाजार (BSE) दलाल स्ट्रीट, मुंबई (महाराष्ट्र) में स्थित है।

  • बुल तथा बियर शेयर बाजार के शब्द हैं, जिनका हिंदी अर्थ क्रमशः तेजड़िया तथा मंदड़िया होता है। जो व्यक्ति शेयर की कीमत बढ़ाना चाहता है उसे तेजड़िया कहते हैं तथा जो व्यक्ति शेयर की कीमत गिरने की आशा करता है, वह मंदड़िया कहलाता है।

  • शेयर बाजार में विभिन्न प्रकार की सट्टेबाजी गतिविधियां निम्नलिखित हैं –

  1. बुल (तेजड़िया)

  2. बियर (मंदड़िया)

  3. लेम डक (Lame Duck)

  4. स्टैग (Stag)

  • भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के निम्नांकित कारण हैं –

  1. विदेशी कोषो का अंतः प्रवाह एवं बाह्य प्रवाह

  2. मौद्रिक एवं राजकोषीय नीति में परिवर्तन

  3. विदेशी पूंजी बाजारों में उतार-चढ़ाव जो निवेशक को प्रभावित करता है।

  4. औद्योगिक वातावरण की स्थिति

  5. बाजार में तरलता की उपलब्धता आदि।

  • इन्साइड ट्रेडिंग शेयर बाजार से संबंधित है। इसके अंतर्गत कंपनी के कर्मचारी या कोई संबंधित व्यक्ति कंपनी की आंतरिक सूचनाओं का उपयोग कर शेयर ट्रेडिंग में अनुचित लाभ प्राप्त करते हैं। यह अवैध कार्य माना गया है।

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  • पूंजी बाजार वित्तीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह दीर्घकालीन फंड का बाजार है जिसमे इक्विटी (या अंशपत्रों) तथा ऋण (Debt) के माध्यम से पूंजी की उगाही सम्मिलित है। यह देश के भीतर तथा बाहर दीर्घकालीन फंड प्राप्त करने का बाजार है।

  • विश्वसनीय प्रतिभूतियों से तात्पर्य ऐसे कंपनियों के शेयर से हैं जिनकी विस्तृत उत्पाद श्रृंखला हो, जिनका उच्च प्रबंधन हो तथा जिनसे हमेशा ऊंची आय और लाभांश प्राप्त होता रहे।

  • गिल्ट बाजार में रिजर्व बैंक के माध्यम से सरकारी और अर्ध्द-सरकारी प्रतिभूतियों का क्रय-विक्रय किया जाता है। गिल्ट एज्ड का अर्थ सर्वोत्तम या उत्कृष्ट होता है। इसे उत्कृष्ट इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इन सरकारी और अर्ध्द-सरकारी प्रतिभूतियों का मूल्य स्थिर रहता है, अन्य प्रतिभूतियों के समान इनमें अस्थिरता नही होती है। यही कारण है कि बैंक और अन्य संस्थाएं इन प्रतिभूतियों के लिए विशेष आकर्षण रखती हैं।

  • भूमि विकास बैंक किसानों को कृषि मे स्थायी सुधार हेतु दीर्घकालिक ऋण प्रदान करता है। भारत मे प्रथम भूमि विकास बैंक की स्थापना वर्ष 1920 में झांग (पंजाब) में हुई थी।

  • सेंसेक्स, बी.एस.ई. तथा निफ्टी शेयर बाजार से संबंधित हैं जबकि सेप्स (SAPs – Structural Adjustment Programmes) देश के वित्तीय असंतुलन को ठीक करने हेतु कार्यक्रम है। भारत सरकार ने सेप्स को नई आर्थिक नीति के साथ वर्ष 1991 मे प्रारंभ किया था।

  • भूमि विकास बैंक किसानों को कृषि में स्थायी सुधार हेतु ऋण प्रदान करता है तथा इस हेतु विकास बैंक द्वारा प्रदान किया जाने वाला ऋण दीर्घकालिक प्रकृति (Long Term) का होता है।

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  • डिबेंचर का अर्थ ऋण पत्रों से होता है। संयुक्त पूंजी कंपनियों ऋण प्राप्त करने हेतु अपने डिबेंचर जारी करती है। जो संस्था इन्हें जारी करती है, वह इन डिबेंचर्स पर धारक को एक निश्चित दर से ब्याज देती है। पब्लिक लिमिटेड कंपनी द्वारा डिबेंचर जारी करना, कंपनी अधिनियम, 1956 तथा 11 जून, 1992 को SEBI द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अधीन है। डिबेंचर की मूल राशि उसके पूर्णता अवधि पर सौंप दी जाती है।

  • भारत में सहकारी बैंक तीन स्तरों पर कार्य करते हैं। प्रथम स्तर पर राज्य के राज्य सहकारी बैंक होते हैं। द्वीतीय स्तर पर केन्द्रीय सहकारी बैंक होते हैं जो जनपद स्तर पर कार्य करते हैं, इसीलिए इन्हें जिला सहकारी बैंक भी कहा जाता है। तृतीय स्तर पर ग्रामीण ऋण समितियां या प्राथमिक ऋण समितियां होती हैं जो ग्राम स्तर पर कार्य करती है।

  • राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) भारत में कृषि क्षेत्र को वित्त प्रदान करने वाली सर्वोच्च संस्था है। इसकी स्थापना 12 जुलाई, 1982 को हुई थी। इसका मुख्यालय मुंबई मे है। नाबार्ड ग्रामीण ऋण ढांचे में एक शीर्षस्थ संस्था के रुप में अनेक वित्तीय संस्थाओं को पुनर्वित्त सुविधाएं प्रदान करता है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक गतिविधियों के विस्तृत क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए ऋण देती है।

  • उपभोक्ता सहकारी भंडार सदस्यों द्वारा स्थापित किए जाते हैं जबकि इनका पंजीकरण सहकारी समितियों के निबंधक के द्वारा होता है।

  • देश में सर्वप्रथम 2 अक्टूबर, 1975 को पांच क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक स्थापित किए गए। ये निम्न हैं –

  • मुरादाबाद (उ.प्र.)

  • गोरखपुर (उ.प्र.)

  • भिवानी (हरियाणा)

  • जयपुर (राजस्थान)

  • माल्दा (प. बंगाल)

  • कर आधार को ज्यादा विस्तृत करने के लिए राजा जे. चेलैया समिति की संस्तुति पर सेवा कर को वर्ष 1994-95 के केन्द्रीय बजट से प्रारंभ किया गया। वर्तमान में सेवा कर का वस्तु एवं सेवा कर (GST) में विलय हो गया  है।

  • भारत सरकार द्वारा शेयर के पूंजी विनिवेश के लिए रंगराजन समिति गठित की गई थी जिसने अपनी रिपोठ अप्रैल, 1993 में सौंपी।

  • योजना आयोग द्वारा वर्ष 2008 में रघुराम राजन की अध्यक्षता में गठित वित्तीय क्षेत्र सुधार समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौप दी है। कमेटी को वित्तीय क्षेत्र सुधार की दूसरी पीढ़ी (Next Generation of Financial Sector Reform) के संबंध में सुझाव देना था।

  • भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रिजर्व बैंक के भूतपूर्व गवर्नर विमल जालान के नेतृत्व में ने बैंको को लाइसेंस देने हेतु आवेदन-पत्रों के सूक्ष्म परीक्षण के लिए एक उच्चस्तरीय पैनल गठित किया गया था जिसने 25 फरवरी, 2014 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

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  • अगस्त, 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने वित्तीय क्षेत्र के सभी पहलुओं मे सुधार हेतु एम. नरसिम्हन की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था। पुनः बैंकिंग सुधार के लिए द्वीतीय नरसिम्हन समिति का गठन किया गया था, जिसने 23 अप्रैल, 1998 को सररकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।

  • वस्तुओं की थोक कीमत सूचकांक श्रेणी को संशोधित करने हेतु एक कार्यकारी समूह का गठन किया गया, जिसका अध्यक्ष प्रो. अभिजीत सेन को बनाया गया। इसकी तकनीकी रिपोर्ट में कार्यदल, आधार वर्ष का चुनाव, आइटम की चयन पध्दति, भार आरेख और कीमतों के संदर्भ में विस्तृत सिफारिशे दी गई हैं।

  • रंगराजन समिति बैंकिंग क्षेत्र में सुधार से संबंधित है।

  • नचिकेत मोर समिति ने वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहित करने के लिए नए बैंक ढांचे की स्थापना की सिफारिश की है। इस समिति का गठन वर्ष 2013 में किया गया था, इसने अपनी रिपोर्ट 7 जनवरी, 2014 को भारतीय रिजर्व बैंक को सौंप दी।

  • भारत सरकार द्वारा वित्तीय क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने, अंतर-नियामकीय समन्वय को बढ़ाने तथा वित्तीय स्थिरता बनाए रखने की प्रणाली को सुदृढ़ बनाने एवं इसे संस्थागत रुप देने के उद्देश्य से दिसंबर, 2010 में वित्तीय स्थिरता एवं विकास परिषद (FSDC) की स्थापना की गई। केन्द्रीय वित्त मंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं, जबकि वित्तीय नियमकों (RBI, SEBI, PFRDA, IRDA, & FMC) के प्रमुख, वित्त सचिव, आर्थिक मामलों के सचिव, वित्तीय सेवा विभाग के सचिव तथा मुख्य आर्थिक सलाहकार इसके सदस्य होते हैं। यह अर्थव्यवस्था के समष्टि सविवेक (Macroprudential) पर्यवेक्षण की निगरानी, अंतर नियमकीय समन्वय तथा वित्तीय क्षेत्र के विकास, वित्तीय साक्षरता, समावेशन आदि के संदर्भ में कार्य करता है।

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  • बैंकिंग लोकपाल की नियुक्त भारतीय रिजर्व बैक करता है। बैंकिंग लोकपाल भारत में खाता रखने वाला अनिवासी भारतीयों की शिकायतें सुन सकता है। बैंकिंग लोकपाल द्वारा पारित आदेश अंतिम और संबंधित पक्षो के लिए बाध्यकारी नही होता बल्कि इसके खिलाफ अपील, अपीलीय प्राधिकरण मे की जा सकती है जो कि रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर के नेतृत्व में कार्य करता है। साथ ही बैंकिंग लोकपाल द्वारा दी गई सेवाएं निःशुल्क होती हैं।

  • वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) पर बनाई गई समिति के अध्यक्ष सी. रंगराजन थे। श्री रंगराजन RBI के गवर्नर भी रह चुके हैं।

  • वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ष 2015-16 के बजट भाषाण में पूर्व में चल रही स्वर्ण जमा योजना तथा स्वर्ण धातु ऋण योजना के स्थान पर स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (Gold Monetization Scheme) तथा संप्रभु स्वर्ण बॉन्ड योजना (Sovereign Gold Bond Scheme) को प्रारंभ करने का प्रस्ताव किया था। स्वर्ण मुद्रीकरण योजना भंडारित स्वर्ण को गतिशील बनाने (मुद्रा में रुपांतरित) की योजना है जबकि संप्रभु स्वर्ण  बॉन्ड योजना नकद भुगतान द्वारा स्वर्ण मूल्य के बराबर वाले स्वर्ण  बॉन्डों की खरीद से संबंधित है। इन योजनाओं का समग्र उद्देश्य भारत के घरेलू तथ संस्थाओं मे रखे स्वर्ण को  गतिशील कर उन्हें उत्पादक गतिविधियों में लगाना तथा दीर्घकालिक मे देश की स्वर्ण आयात पर निर्भरता को कम करना है।

  • स्वयं सहायता समूह-बैंक लिंकेज कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1992 में नाबार्ड द्वारा लघु वित्त प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। यह कार्यक्रम व्यापारिक बैंक, आर.आर.बी. तथा सहकारिता बैंक द्वारा कार्यान्वित की जाती है। नाबार्ड इस कार्यक्रम को कार्य़ान्वित नही करती है। यह एक नियामक संस्था है।

  • किसान क्रेडिट कार्ड योजना की घोषणा वर्ष 1998-99 के बजट में की गई थी, जबकि इसकी शुरुआत अगस्त, 1998 में की गयी। यह किसानों को व्यापारिक बैंको, सहकारी बैंको तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंको से ऋण लेने में सुविधा देता है। इस योजना के तहत किसानों को निवेश साख के साथ-साथ उपभोग साख भी (निवेश साख के प्रतिशत में) प्रदान किया जाता है। मार्च, 2012 मे संशोधन के तहत इच्छुक के.सी.सी. धारकों को ए.टी.एम. डेबिट कार्ड निर्गत किए गए हैं।

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  • केन्द्र सरकार द्वारा फरवरी, 2011 में स्वाभिमान नाम की वित्तीय सुरक्षा योजना का आरंभ किया गया था। जिसका उद्देश्य 2000 से ऊपर आबादी वाले बैंकविहीन गांवो को बैंकिंग सुविधाएं प्रदान करना था। इस योजना के अंतर्गत बैंको द्वारा व्यवसायिक संवाददाताओं या बैंक साथी (Business Correspondents) का चयन किया जाता है जो ग्रामीणों और बैंकों के बीच मध्यस्थता का कार्य करते हैं। बैंक जमा,  आहरण, विप्रेषण (Remittances)  जैसी बुनियादी सेवाएं बैंक साथी के द्वारा प्रदान किए जाते हैं। साथ ही, इस योजना द्वारा सरकारी सहाय्यों (Subsidies) और सामाजिक सुरक्षा लाभों को लाभार्थियों के बैंक खातो मे सीधे हस्तांतरित किया जा सकता है।

  • S & P 500 स्टॉक बाजार का सूचकांक है जिसमें 500 वृहद कंपनियां शामिल होती हैं।

  • बाजार वह स्थान है, जहां वस्तुओं एवं सेवाओं का क्रय-विक्रय होता है। वस्तुओं एवं सेवाओं क्रय-विक्रय उनकी उत्पादन लागत के आधार पर किया जाता है, जिसे वस्तु अथवा सेवा की कीमत कहते हैं। अतः बाजार के अस्तित्व के लिए कीमत आधारभूत तत्व होता है।

  • भारत में वायदा बाजार आयोग की स्थापना वर्ष 1953 में की गई थी। यह जिंसो के वायदा व्यापार का विनियमन करता है। 28 सितंबर, 2015 को वायदा बाजार आयोग का सेबी में विलय (Merge) कर दिया गया।

  • भारत में पेंशन फंड्स का महत्व क्रमशः कम होता गया है क्योंकि Venture व्यापारी प्रायः अपने पूंजी उपलब्धकर्ता पर निर्भर होते हैं और बैं प्रायः अपने सहयोगी संस्थाओं में निवेश करना चाहते हैं।

  • वर्ष 1995-96 में स्थापित ग्रामीण अवस्थापना विकास कोष का हिसाब राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) रखता है।

  • भारत का संविधान केन्द्र सरकार के लिए तीन प्रकार की निधियों की व्यवस्था करता है, जो इस प्रकार है –

  1. भारत की संचित निधि

  2. भारत की सार्वजनिक लेखा

  3. भारत की आकस्मिक निधि

राज्य भविष्य निधि के अंतर्गत सरकार जो धन पाती है, उसको सार्वजनिक लेखा निधि में जमा किया जाता है।

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  • उत्पादन के स्तर मे गिरावट, वस्तु की प्रभावी मांग में वृध्दि तथा मुद्रा की पूर्ति में वृध्दि सामान्य कीमत स्तर में वृध्दि ला देगी।

  • कल्पित कीमत/छाया कीमत (Shadow Price) जिनका प्रयोग पूंजी निवेश के प्रस्तावों के मूल्यांकन के लिए किया जाता है, को जे. टिनबरगिन ( Tinbergen) और होलिस (Hollis) ने प्रतिपादित किया था।

  • स्मार्ट मनी शब्द का प्रयोग क्रेडिट कार्ड के लिए किया जाता है। रिजर्व बैंक इस हेतु सूचना तकनीक को बढ़ावा देती है जिससे क्रेडिट कार्ड/स्मार्ट कार्ड आदि का उपयोग करते हुए बैंक अपनी पहुँच अधिस से अधिक ग्राहकों तक बनाए।

  • विदेशी मुद्रा आरक्षित निधियां किसी देश की अर्थव्यवस्था की बाह्य स्थिति के विश्लेषण मे एक अनिवार्य तत्व होती है। भारत की विदेशी मुद्रा आरक्षित निधियों में 4 घटकों को सम्मिलित किया जाता है – विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति, स्वर्ण, विशेष आहरण अधिकार तथा  M.F. में प्रारक्षित स्थिति।

  • भारत में वर्ष 1963 में संसदीय अधिनियम द्वारा भारतीय यूनिट ट्रस्ट (UTI) के गठन के साथ साझा कोषों (Mutual Funds) की स्थापना हुई थी। UTI द्वारा पहले साझा कोष US-64 वर्ष 1964 में प्रारंभ किया गया। वर्ष 1987 से UTI के अतिरिक्त सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों एवं बीमा कंपनियों द्वारा  भी साझा कोष प्रारंभ किए गए। निजी क्षेत्र के साझा कोषों को भारत में अनुमति वर्ष 1963 में मिली तथा जुलाई, 1993 में पंजीकृत होने वाला काठोरी पायनियर (अब फ्रैंकलिन टेम्पलटन में समाहित) पहला निजी क्षेत्र का साझा कोष था।

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सामाजिक विकास

मानव विकास

भारत

  • मानव विकास एक व्यापक अवधारणा है, जिसके तहत एक लंबे स्वस्थ एक रचनात्मक जीवन की संकल्पना निहित है।

  • सर्वप्रथम संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP – United Nations Development Programme) द्वारा विकास के मानवीय पक्ष पर ध्यान केंन्द्रित किया गया तथा विकास को राष्ट्र की संवृध्दि दर से परे राष्ट्र के निवासियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार से जोड़कर देखा गया।

  • इसी क्रम में सर्वप्रथम वर्ष 1990 में UNDP द्वारा मानव विकास रिपोर्ट जारी की गई।

  • इस रिपोर्ट में मानव विकास सूचकांक (Human Development Index: HDI) के आधार पर देशों की रैंकिंग की गई।

  • मानव विकास सूचकांक के प्रतिपादन का श्रेय पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब-उल-हक को जाता है।

  • नोबेल पुरस्कार प्रात भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का भी इस सूचकांक के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान था।

  • मानव विकास सूचकांक की गणना तीन सूचकों यथा जीवन प्रत्याशा (Life Expenditure), शिक्षा (Education) तथा प्रतिव्यक्ति राष्ट्रीय आय के आधार पर की जाती है।

  • जीवन प्रत्याशा सूचकांक की गणना हेतु अधिकतम आयु प्रत्याशा 85 वर्ष तथा न्यूनतम आयु प्रत्याशा 20 वर्ष (वर्ष 2016 की प्रविधि के अनुसार) ली जाती है।

  • शिक्षा सूचकांक की गणना हेतु दो चरों यथा स्कूल अवधि के औसत वर्ष (Mean years of schoooling) तथा स्कूल अवधि के अनुमानित वर्ष  (Expected years of schooling) को लिया जाता है।

  • उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 से पहले शिक्षा सूचकांक की गणना में सकल नामांकन दर एवं प्रौढ़ साक्षरता को दिया जाता था।

  • आय सूचकांक की गणना प्रतिव्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (NGI percapita) के आधार पर किया जाता है।

  • स्मरणीय है कि वर्ष 2010 से पूर्व इसे प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आधार पर परिगणित किया जाता था।

  • आय सूचकांक की गणना हेतु प्रतिव्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय का अधिकतम मूल्य 75 हजार डॉलर तथा न्यूनतम मूल्य 100 डॉलर निर्धारित किया गया है।

  • मानव विकास सूचकांक (HDI) उपर्युक्त तीनों सूचकांकों का ज्यामितीय माध्य है –

HDI = (जीवन प्रत्याशा ´ शिक्षा सूचकांक ´  आय सूचकांक1/3

  • मानव विकास सूचकांक का मूल्य शून्य से एक (0-1) के मध्य होता है, जिसमें शून्य निम्नतम मानव विकास को, जबकि 1 उच्चतम मानव विकास को प्रदर्शित करना है।

  • नवीनतम मानव विकास रिपोर्ट, 2018 मे मानव विकास सूचकांक, 2017 में प्रकाशित हुई।

  • इस रिपोर्ट में 189 देशो में नॉर्वे, स्विटजरलैंड तथा ऑस्ट्रेलिया क्रम से शीर्ष मानव विकास वाले देश रहे, जबकि नाइजर सबसे निम्नवत (189वां रैंक) मानव विकास वाला देश रहा।

  • HDI, 2017 में भारत 0.640 अंक के साथ 130वें स्थान पर है।

  • भारत में इस सूचकांक में मध्यम मानव विकास वाले देशों के समूह मे है।

  • मानव विकास की दृष्टि से भारत, ब्रिक्स देशो में निम्नवत स्थिति में है।

  • दक्षिण एशियाई देशों में श्रीलंका तथा मालदीव को छोड़कर शेष देशों की तुलना में भारत की स्थिति बेहतर है।

  • वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में भारत में जीवन प्रत्याशा 68.8 वर्ष, स्कूल अवधि के औसत वर्ष 6.7 वर्ष, स्कूल अवधि के अनुमानित वर्ष 12.3 वर्ष तथा प्रतिव्यक्ति राष्ट्रीय आय 6353 डॉलर थी।

  • ध्यातव्य है कि वर्ष 2010 से मानव विकास रिपोर्ट में मानव विकास सूचकांक के साथ-साथ असमानता समायोजित मानव विकास सूचकांक (IHDI), बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (MPI) तथा लैंगिक असमानता सूचकांक (GII) का भी प्रकाशन किया जा रहा है।

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बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (MPI)

  • बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (Multi- dimentional Poverty Index: MPI निर्धनता के मापन की एक बहुआयामी अवधारणा है।

  • MPI का प्रकाशन वर्ष 2010 से मानव विकास रिपोर्ट में किया जा रहा है।

  • बहुआयामी निर्धनता सूचकांक से पूर्व वर्ष 1997 से मानव विकास रिपोर्ट के साथ मानव निर्धनता सूचकांक (HPI) प्रकाशित किया जाता था।

  • इसका विकास UNDP के सहयोग से ऑक्सफोर्ड निर्धनता एवं मानव विकास पहल (OPHI) द्वारा किया गया है।

  • इस सूचकांक का निर्माण तीन आयामों (शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन स्तर) के संदर्भ में 10 सूचकों पर आधारित है। ये सूचक हैं –

  1. शिक्षा संबंधी

  • स्कूल अवधि के वर्ष

  • स्कूल मे उपस्थिति

  1. स्वास्थ्य संबंधी

  • बाल मृत्यु दर

  • पोषण

  1. जीवन स्तर संबंधी

  • विद्युत

  • स्वच्छता (शौचालय)

  • पेयजल

  • आवासीय फर्श

  • भोजन पकाने का ईंधन

  • परिसंपत्ति (टीवी. वाहन, रेफ्रीजरेटर, मवेशी आदि)

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भारतीय राज्यों में मानव विकास

  • भारतीय राज्यों में सबसे पहले वर्ष 1995 में मध्य प्रदेश राज्य द्वारा मानव विकास रिपोर्ट जारी की गई।

  • भारत में राज्यों की मानव विकास के संदर्भ में तुलनात्मक स्थिति के आकलन हेतु योजना आयोग द्वारा वर्ष 2002 मे पहली राष्ट्रीय मानव विकास रिपोर्ट (NHDR) प्रकाशित की गई थी।

  • इसमें मानव विकास की दृष्टि से केरल देश में प्रथम स्थान पर था। इस सूचकांकों मे पंजाब दूसरे, तमिलनाडु तीसरे, महाराष्ट्र चौथे तथा हरियाणा पांचवे स्थान पर था।

  • राष्ट्रीय मानव विकास रिपोर्ट की दूसरी रिपोर्ट योजना आयोग के अधीन Institute of Applied Manpower Research (IAMR) द्वारा वर्ष 2011 में जारी की गई।

  • इस रिपोर्ट का शीर्षक भारत मानव विकास रिपोर्ट, 2011 सामाजिक समावेशन की ओर (India Human Development Report, 2011 – Towards Social Inslusion) था।

  • इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2007-08 में मानव विकास की दृष्टि से सर्वोत्तम राज्य केरल था।

  • केरल 0.790 HDI सूचकांक के साथ राज्यों में प्रथम स्थान पर रहा।

  • इसके बाद दिल्ली (0.750 अंक), हिमाचल प्रदेश (0.652 अंक), गोवा (0.617 अंक) तथा पंजाब (0.605 अंक) क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे एवं पांचवे स्थान पर रहे।

  • इस रिपोर्ट में HDI सूचकांक की दृष्टि से अंतिम स्थान (23वीं रैंक) पर छत्तीसगढ़ रहा।

  • ओड़िशा (22वीं रैंक), बिहार (21वीं रैंक) तथा मध्य प्रदेश (20वीं रैंक) भी निम्नवत मानव विकास वाले राज्य रहे।

  • सूचकांक में उत्तर प्रदेश की 18वीं रैंक थी तथा यह राष्ट्रीय स्तर से नीचे के राज्यों में था।

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भुखमरी (Hunger)

  • भुखमरी की स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति अपनी दैनिक खाद्य आवश्यकता की भी पूर्ति कर पाने में असमर्थ हो जाता है।

  • भुखमरी तीन कारणों से हो सकती है –

  1. लोगो के पास क्रयशक्ति का अभाव हो

  2. खाद्यान्नों की आपूर्ति अपर्याप्त हो।

  3. खाद्यान्नों तक लोगों की सुचारू पहुंच न हो पा रही हो।

  • विश्व के देशों में भुखमरी की स्थिति का आकलन वैश्विक भुखमरी सूचकांक (Global Hunger Index) में प्रदर्शित किया जाता है।

  • यह सूचकांक अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (IFRI- International Food Policy Research Institue) द्वारा किया जाता है।

  • यह सूचकांक चार सूचकों अल्प पोषण (Under Nourishent), बल अल्पवजन (Child Wasting), बाल ठिगनापन (Child Stunning) तथा बाल मृत्यु दर (Child Mortality) के आधार पर निर्मित किया जाता है।

  • वर्ष 2017 के वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत को गंभीर भुखमरी वाले देशों में रखा गया है।

  • इस सूचकांक में 119 देशो में भारत का स्थान 100वां है।

  • इस सूचकांक में बेलारुस को प्रथम स्थान, जबकि मध्य़ अफ्रीकी गणराज्य को अंतिम (119वां) स्थान प्राप्त है।

  • भारतीय ग्रामों मे अधिक जनसंख्या, विभिन्न धर्म, चार जातियां एवं उनकी उपजातियां, विविध संस्कृति, लिंगानुपात का स्तर आदि भारतीय सामाजिक संरचना के मुख्य लक्षण हैं। निर्धनता भारतीय सामाजिक संरचना का लक्षण न होकर बल्कि देश की सामाजिक-आर्थिक (Socio-Economic) संरचना को प्रदर्शित करता है।

  • विकास के मानवीय पक्ष पर सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने ध्यान केंद्रित किया। इसने न केवल आय को अपितु स्वास्थ्य एवं शिक्षा को भी मानव को मापने की प्रक्रिया में अहम माना।

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  • मानव अधिकारों की सार्वभौमिक उद्घोषण (The Universal Declaration of Human Rights) के अनु. 25(1) के तहत शिक्षा का अधिकार, अनु. 21(2) तहत समानता के साथ सार्वजनिक सेवा प्राप्त करने का अधिकार तथा अनु. 25 (1) के तहत भोजन का अधिकार सम्मिलित है।

  • राज्य स्तरीय मानव विकास रिपोर्ट जारी करने वाला भारत का पहला राज्य मध्य प्रदेश है, जिसने अपनी पहली मानव विकास रिपोर्ट वर्ष 1995 मे जारी की थी।

  • देश में मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से केरल का प्रथम स्थान है। 2011 की जनगणनानुसार, केरल में बेरोजगारी दर देश में उच्चतम है।

 

 

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रोजगार, बेरोजगारी एवं कल्याण योजनाएं

रोजगार तथा बेरोजगारी

  • किसी देश में कार्य़ कर सकने की आयु (15-65 वर्ष) वाले सभी व्यक्तियों को संयुक्त रुप से उस देश की श्रम शक्ति (Labour Force) कहा जाता है।

  • इसमें रोजगार प्राप्त व्यक्ति एवं बेरोजगार व्यक्ति दोनों आते हैं।

  • रोजगार के संदर्भ में 273 दिनों तक प्रतिदिन 8 घंटे के कार्य को मानक वर्ष (Stadard Year) कहा जाता है तथा जो व्यक्ति इतने दिनों तक रोजगार में हैं, उसे पूर्ण रोजगार में माना जाता है।

  • उन व्यक्तियों को बेरोजगार माना जाता है, जो कार्य करने की क्षमता तथा इच्छा रखते हैं एवं प्रचलित मय दूरी पर कार्य हेतु प्रस्तुत होते हैं, परंतु उन्हें रोजगार नही मिल पाता हो।

  • विकसित तथा विकासशील/अल्प विकसित देशों में बेरोजगारी अलग-अलग कारणों से अलग-अलग स्वरुप की पाई जाती है।

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बेरोजगारी के प्रमुख स्वरुप इस प्रकार हैं –

  1. चक्रीय बेरोजगारी (Cyclical Unemployment) – ऐसी बेरोजगारी जो बाजार उच्चावचनों (स्फीति/मंदी) के कारण मांग में कमी से उत्पन्न होती है तथा मांग में वृध्दि होने से पुनः समाप्त होती है, चक्रीय बेरोजगारी कहलाती है। यह विकसित देशो में सामान्यतः देखी जाती है।

  2. घर्षण जनित बेरोजगारी (Frictional Unemployment) – घर्षणजनित बेरोजगारी वास्तव में एक रोजगार को छोड़कर दूसरे रोजगार की प्राप्ति के मध्य की अवधि की बेरोजगारी है। तकनीक आदि में परिवर्तन के कारण नौकरियों मे छटनी इस बेरोजगारी का प्रमुख कारण है। यह भी विकसित देशों की सामान्य विशेषता है।

  3. संरचनात्मक बेरोजगारी (Structural Unemployment) – इस तरह की बेरोजगारी लोगों में कौशल के अभाव की स्थिति में उत्पन्न होती है। अर्थात जब लोग रोजगार के अनुरुप योग्यता न धारित कर पाने के कारण बेरोजगार बने रहें, तो इस बेरोजगारी को संरचनात्मक बेरोजगारी कहा जाता है। यह विकासशील एवं अल्प विकसित देशों की सामान्य विशेषता है। भारत में  भी संरचनात्मक बेरोजगारी का स्तर उच्च है।

  4. मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment) – मौसमी बेरोजगारी कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक पाई जाती है। कृषि क्षेत्र में वर्ष की महीनों में काम बढ़ जाता है, जिससे रोजगार की संख्या बढ़ जाती है परंतु शेष महीनों में बेरोजगारी बनी रहती है। मौसमी बेरोजगारी विकासशील एवं अल्प विकसित देशों की सामान्य विशेषता है।

  5. प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment)- किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक लगे हुए लोगों को तकनीकी रुप से बेरोजगार माना जाता है। अर्थात यदि किसी रोजगार में आवश्यकता से अधिक लोग लगे हुए हों, तो उस रोजगार से अतिरिक्त लोगो को निकाल देने पर भी उत्पादन का स्तर बना रहे, तो निकाले गए अतिरिक्त लोगों को प्रच्छन्न  बेरोजगार माना जाता है। तकनीकी शब्दों मे जिस व्यक्ति की सीमांत उपयोगिता शून्य हो (अर्थात उसका उत्पादन में कोई अतिरिक्त योगदान न हो) तो उसे प्रच्छन्न बेरोजगार माना जाता है, भले ही वो रोजगार में क्यों न हो? प्रच्छन्न बेरोजगारी प्राथमिक क्षेत्र (विशेषकर कृषि क्षेत्र) में बहुतायत में पाई जाती है।

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भारत में बेरोजगारी माप

  • भारत में बेरोजगारी मापन की तीन विधियां प्रचलन में हैं – सामान्य स्थिति (Usual Status), चालू साप्ताहिक स्थिति (Current Weekly Status) तथा चालू दैनिक स्थिति (Current Daily Status)।

  • यदि कोई व्यक्ति वर्ष के आधे से अधिक दिनों (183 दिन) तक बेरोजगार प्राप्त नही कर पाता है, तो उसे सामान्य स्थिति (US) का बेरोजगार माना जाता है।

  • यदि सर्वेक्षण सप्ताह में किसी व्यक्ति को सप्ताह मे एक घंटे का भी रोजगार न मिले, तो उसे चालू साप्ताहिक स्तर (CWS) का बेरोजगार माना जाएगा।

  • यदि किसी व्यक्ति को किसी दिन विशेष में एक घंटे का भी रोजगार प्राप्त न हो सके, तो उसे चालू दैनिक स्थिति (CDS) का बेरोजगार माना जाता है।

  • उल्लेखनीय है कि यदि कोई व्यक्ति एक दिन में चार घंटे या इससे अधिक समय तक रोजगार में हैं, तो उसे उस दिन के पूर्ण रोजगार में जबकि एक घंटे से अधिक एवं चार घंटे से कम के रोजगार को उस दिन के आधे दिन के रोजगार में माना जाता है।

  • भारत में बेरोजगारी के मापन हेतु राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO) आंकड़े एकत्रित करता है.

  • NSSO के 68वें दौर की रोजगार एवं बेरोजगारी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011-12 में सामान्य स्थिति (US) के आधार पर भारत में 2.7 प्रतिशत बेरोजगारी थी।

  • भारतीय राज्यो में सर्वाधिक बेरोजगारी नगालैंड (25.6%) दर्ज की गई। इसके पश्चात लक्ष्यद्वीप (15.4%) तथा त्रिपुरा (14.6%) सर्वाधिक बेरोजगारी वाले राज्य रहे।

  • चालू साप्ताहिक स्थिति (CWS) के आधार पर भारत में वर्ष 2011-12 में 3.7 प्रतिशत तथा चालू  दैनिक स्थिति के आधार पर 5.6 प्रतिशत बेरोजगारी दर्ज की गई।

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के विश्व रोजगार एवं सामाजिक परिदृश्य, 2018 के अनुसार, भारत में वर्ष 2018 में 3.5 प्रतिशत की बेरोजगारी दर अनुमानित है।

  • NSQF के अंतर्गत शिक्षार्थी सक्षमता का प्रमाण-पत्र औपचारिक, गैर-औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से किसी भी स्तर पर आवश्यक योग्यता के लिए प्राप्त कर सकता है।

  • NSQF के कार्यान्वयन से अपेक्षित विशिष्ट परिणाम निम्नलिखित हैं –

  1. NSQF के साथ डिग्री के संरेखण द्वारा व्यावसायिक और सामान्य शिक्षा के मध्य संचरण।

  2. पूर्व अधिगम (आरपीएल) की पहचान, गैर-औपचारिक से संगठित नौकरी बाजार में संक्रामण की अनुमति।

  3. राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन ढांचे के माध्यम से पूर देश में प्रशिक्षण की मानवीकृत, सुसंगत, राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य परिणाम।

  4. NSQF के अंतरराष्ट्रीय तुल्यता के माध्यम से भारत के कुशल श्रमिकों की वैश्विक गतिशीलता।

  5. क्षेत्रों के भीतर एवं पार-क्षेत्रीय रुप से प्रगति पथ का मानचित्रण।

  6. कौशल प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय मानकों के रुप में NOS/QPs का अनुमोदन।

  • बेरोजगारी से तात्पर्य आय के साधन की अनुपलब्धता से है। बेरोजगारी बढ़ने पर अधिक लो गरीबी रेखा से नीचे आ जाएंगे और इस प्रकार गरीबी बढ़ेगी।

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  • भारत में शिक्षित बेरोजगारों की सर्वाधिक प्रतिशतता वाला राज्य केरल है।

  • विकास की ऊंची दर के साथ रोजगार का भी सृजन होता है। इसमें रोजगार के अनुरुप शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को तो रोजगार प्राप्त हो जाता है परंतु, व्यावसायिक शिक्षा की कमी होने पर अनेक शिक्षा लोगों को रोजगार से वंचित भी रहना पड़ता है। अतः शिक्षित बेरोजगारी बढ़ती है। भारत में ऐसा ही हो रहा है। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO) ने अपने ताजा सर्वेक्षण मे स्पष्ट किया है कि हाईस्कूल एवं उससे अधिक शिक्षा प्राप्त नवयुवकों मे व्यावसायिक कौशल की कमी के कारण इनसे कम शिक्षा प्राप्त नवयुवकों की तुलना में  बेरोजगारी दर उच्च है।

  • भारत सहित विकासशील देशों और अल्प विकसित देशों में पाई जाने वाली अधिकांशतः बेरोजगारी संरचनात्मक होती है। संरचनात्मक बेरोजगारी का मुख्य कारण व्यक्तियों में रोजगार के अनुरुप कौशल का न पाया जाना होता है। अर्थव्यवस्था के ढांचे का पिछड़ापन, सीमित पूंजी उपलब्धता एवं श्रम का बाहुल्य आदि भी संरचनात्मक बेरोजगारी के प्रमुख कारण हैं।

  • भारत में छिपी हुई (प्रच्छन्न) बेरोजगारी प्राथमिक क्षेत्र (कृषि एवं संबध्द क्षेत्रों) में अधिक पाई जाती है, ऐसा भूमि एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर आबादी के अधिक दबाव के कारण होता है। तकनीकी विकास की कमी के कारण जनसंख्या का अधिकतर भाग कृषि एवं संबध्द गतिविधियों पर निर्भर करता है, जिस कारण एक ही कार्य में आवश्यकता से अधिक लोग होते हैं। यही छिपी हुई बेरोजगारी का कारण बन जाता है।

  • अर्थशास्त्र में छिपी या प्रच्छन्न बेरोजगारी शब्द का प्रयोग सबसे पहले श्रीमती जोन रॉबिन्सन ( Joan Robinson) ने किया था।

  • बेरोजगारी के लिए प्रति व्यक्ति आय में वृध्दि उत्तरदायी नही है, जबकि तीव्र जनसंख्या वृध्दि, कौशल का अभाव तथा जनशक्ति नियोजन का अभाव आदि कारक बेरोजगारी के उत्तरदायी कारक हैं।

  • NSSO द्वारा वर्ष 2004-05 के लिए किए गए 61वें दौर के आंकड़ों में निर्धनता आकलन के लिए यू.आर.पी. (यूनिफॉर्म रिकॉल पीरियड) तथा एम.आर.पी. (मिक्स्ड रिकॉल पीरियड) विधि का प्रयोग किया गया है। यू.आर.पी. विधि में 30 दिन की रिकॉल अवधि में सभी उपयोग मदो के लिए उपभोक्ता व्यय संबंधी आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। जबकि एम. आर.पी. में गैर-खाद्य मदों, जैसे- वस्त्र, जूते, चप्पल टिकाऊ वस्तुएं, शिक्षा तथा संस्थागत मेडिकल व्यय 365 दिन की रिकॉल अवधि के लिए तथा शेष मदो के लिए उपभोग व्यय 30 दिवसीय रिकॉल अवधि से एकत्रित किए जाते हैं, का प्रयोग होता है।

  • राजीव आवास योजना जून, 2011 में प्रारंभ की गई थी, जिसे विस्तारित करते हुए वर्ष 2022 तक कर दिया गया है। इस योजना में झुग्गी मुक्त शहरों की कल्पना की गई है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को बुनियादी नागरिक अवसंरचना और सामाजिक सुविधाओं तथा उचित आश्रय उपलब्ध हो।

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  • मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नवंबर, 1991 में विशेषतः ग्रामीण एवं आदिवासी क्षेत्रों की महिलाओं के कल्याण एवं विकास हेतु पंचधारा योजना शुरु की गई थी। यह योजना पांच योजनाओं वात्सल्य योजना, ग्राम्य योजना, आयुष्मती योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना तथा कल्पवृक्ष योजना का समुच्चय थी।

  • योजना लांच तिथि

सुकन्या समृध्दि योजना     –   22 जनवरी, 2015

अटल पेंशन योजना         –   9 मई, 2015

मेक इन इंडिया            –   25 सितंबर, 2014

प्रधानमंत्री जन-धन योजना   –   28 अगस्त, 2014

डिजिटल जेंडर एटलस फॉर एडवांसिंग  –    9 मार्च, 2015

गर्ल्स एजुकेशन इन इंडिया

प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना    –   9 मई, 2015

मुद्रा बैंक योजना               –   8 अप्रैल, 2015

  • कौशल विकास पहल श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा मई, 2007 में प्रारंभ किया गया था।

  • गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले निर्धन परिवारों को स्वच्छ ईंधन (LPG) उपलब्ध कराने हेतु स्वच्छ ईंधन, बेहतर जीवन की टैगलाइन के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1 मई, 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत की । इस योजना के तहत आगामी तीन वर्षों (2016-19) में 10 करोड़ नए एलपीजी कनेक्शन प्रदान करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

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  • प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) का औपचारिक शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 28 अगस्त, 2014 को नई दिल्ली में आयोजित एक राष्ट्रीय समारोह में किया।

  • पहल (PAHAL) योजना के अंतर्गत एलपीजी अनुदान का हस्तांतरण प्रत्यक्ष हस्तांतरित लाभ योजना के माध्यम से सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में किया जाता है। पहल (PAHA) योजना के प्रथम चरण का शुभारंभ 15 नवंबर, 2014 से 54 जनपदों में किया गया था। जबकि 1 जनवरी, 2015 को यह योजना देश के सभी जनपदों में विस्तारित की गई।

  • नियोजन गारंटी योजना या रोजगार गारंटी योजना नामक ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम सर्वप्रथम महाराष्ट्र सरकार द्वारा 26 जनवरी, 1979 को प्रारंभ किया गया था।

  • रोजगार गारंटी योजना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्रत्याभूत करने के लिए गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले ग्रामीण परिवार के कम से कम एक पुरुष और एक महिला को वित्तीय सहायता देने का विचार करती है।

  • ट्राइसेम (Training of Rural Youth for Self Employment) योजना 18-35 वर्ष के ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार हेतु प्रशिक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से अगस्त, 1979 मे प्रारंभ की गई थी।

  • आर.एल.ई.जी.पी. (Rural Landless Employment Gurantee Programme) योजना 15 अगस्त, 1983 को ग्रामीण भूमिहीनों हेतु रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए प्रारंभ की गई थी।

  • जवाहर रोजगार योजना (JRY) का शुभारंभ राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (NREP) तथा ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम (RLEGP) के विलय द्वारा अप्रैल, 1989 में किया गया था।

  • रोजगार आश्वासन योजना (EAS) का प्रारंभ 2 अक्टूबर, 1993 को किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य मौसमी बेरोजगारी से ग्रसित ग्रामीण युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना था।

  • ग्रामीण अवस्थापना विकास कोष (RIDF) का गठन वर्ष 1995-96 में हुआ था। इसका उद्देश्य राज्य सरकारों तथा राज्य के स्वामित्व वाले निगमों के लिए फंड की व्यवस्था करना है जिससे वे ग्रामीण अवस्थापना परियोजनाओं को पूरा कर सकें। ग्रामीण जलापूर्ति, ग्रामीण सड़कें व ग्रामीण विद्युतीकरण इसके अंतर्गत आते हैं किंतु ग्रामीण उद्योग इसके अतर्गत नही आता।

  • स्वावलंबन योजना असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए भारत सरकार की एक पेंशन योजना है, जिसे वर्ष 2010 में प्रारंभ किया गया था। वर्तमान में इस योजना का स्थान अटल पेंशन योजना (मई, 2015 में प्रारंभ) ने ले लिया है।

  • 25 दिसंबर, 2014 को केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं के टीकाकरण हेतु मिशन इन्द्रधनुष का शुभारंभ किया गया था। मिशन इन्द्रधनुष देश भर में  उच्च टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम है। इसके अंतर्गत सीत टीकों (डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटेनस, क्षय रोग, पोलियो, हेपेटाइटिस बी एवं खसरा) को शामिल किया गया है।

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  • भारत सरकार ने वर्ष 1972-73 में त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम (ARWSP) प्रारंभ किया था। हालांकि 1 अप्रैल, 2009 से ग्रामीण पेयजल आपूर्ति कार्यक्रम को राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम (NRDWP) नाम दिया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम भारत निर्माण के 6 घटकों में से एक है।

  • संकल्प परियोजना HIV/AIDS के समापन से जुड़ी है। यह Hindustan Latex Ltd. एवं कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा संयुक्त रुप से संचालित एक परियोजना है।

  • प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का प्रारंभ 25 दिसंबर, 2000 को किया गया था। इस योजना का उद्देश्य मैदानी क्षेत्रों में 500 से अधिक की आबादी वाले गांवों (पहाड़ी, जनजातीय एवं मरुस्थलीय क्षेत्रों में 250 से अधिक की आबादी वाले गांवों) को बारहमासी सड़क के द्वारा मुख्य सड़क से जोड़ना था इस योजना के मूलतः दो लक्ष्य थे –

  1. योजना के पहले चरण में वर्ष 2003 तक 1000 से अधिक आबादी वाले गांवों को अच्छी बारहमासी सड़क से जोड़ना।

  2. दूसरे चरण में 500 आबादी वाले गांवों को वर्ष 2007 तक अच्छी बारहमासी सड़क से जोड़ना।

  • कृषि श्रमिक सामाजिक सुरक्षा योजना –    2001

स्वर्ण जयंती ग्राम स्व-रोजगार योजना  –    1999

रोजगार गारंटी योजना              –    2006

प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना           –    2000

सर्व शिक्षा अभियान                –    2001

साक्षर भारत मिशन                –    2009

ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड                –    1987

राष्ट्रीय साक्षरता मिशन             –    1988

संगम योजना                     –    1996

जनश्री बीमा योजना                –     2000

आम आदमी  बीमा योजना          –    2007

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन       –     2005

 

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  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA), 5 सितंबर, 2005 को अधनियमित तथा 2 फरवरी, 2006 से इसे लागू किया गया। 2 अक्टूबर, 2009 को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का नाम परिवर्तित कर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MNREGA) कर दिय गया।

  • भारत में सामुदायिक विकास के मुख्य निर्माता ए.के. डे कहलाते हैं। वे भारत के प्रथम सहकारिता एवं पंचायती राज मंत्री थे। वर्ष 1952 में भारत सरकार द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम को प्रारंभ कराने में इनका महत्वपूर्ण योगदान था। जवाहरलाल नेहरु उस समय प्रधानमंत्री थे।

  • राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन अप्रैल, 2005 मे आरंभ किया गया जब दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) जारी थी।

  • समेकित बाल विकास सेवाएं (ICDS – Integrated Child Development Service) नामक कार्यक्रम केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 1975 में प्रारंभ किया गया था।

  • भारत में एकीकृत बाल विकास सेवा योजना 2 अक्टूबर, 1975 को भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा लागू की गई थी।

  • केन्द्र सरकार ने जून, 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना का शुभारंभ किया था। इस योजना की समयावधि 2015-2022 है।

  • कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना का शुभारंभ भारत सरकार द्वारा अगस्त, 2004 में अनुसूचित  जाति,  जनजाति, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक, सेक्स वर्कर, मैला ढोने वालों आदि परिवारों की  बालिकाओं के लिए शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए ब्लॉकों (जहां महिला साक्षरता तथा शैक्षणिक जेंडर गैप राष्ट्रीय स्तर पर कम था) में आवासीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की स्थापना के लिए किया गया था।

  • तरुण भारत संघ डॉ. राजेन्द्र सिंह द्वारा स्थापित एक स्वयंसेवी संगठन है, जो धारणीय विकास के लिए राजस्थान में कार्य कर रहा है।

  • केन्द्र सरकार ने दीपक पारेख कमेटी का गठन (मई, 2007 में) अवस्थापना विकास एवं वित्तीयन के लिए उपाय सुझाने के लिए किया था।

  • भारतवर्ष में केवल विकलांगों के लिए स्थापित प्रथम विश्वविद्यालय चित्रकूट (उ.प्र.) में है, जिसका मुख्यालय भी चित्रकूट है। इस विश्वविद्यालय का नाम जगदगुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय है।

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  • भारत का प्रथम खुला विश्वविद्यालय हैदराबाद में डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर अगस्त, 1982 में स्थापित किया गया था।

  • रुडसेट संस्थान को प्रारंभ करने का उद्देश्य ग्रामीण बेरोजगार युवकों को स्वयं के उद्यम लगाने के लिए दक्षता एव  उदयमिता का प्रशिक्षण देना है।

  • एड्रागोगी (Andragogy) प्रौढ़ शिक्षा (Adult Education) का दूसरा नाम है।

  • पूरा (Providing of Uraban Amenities to Rural Areas: PURA) की अवधारणा को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक “Target 3 Billion” जिसके सह-लेखक सृजन पाल सिंह हैं, में सर्वप्रथम प्रस्तुत की।  भारत के 54वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने पूरा की अवधारणा को जनता के समक्ष प्रस्तुत किया, इसके पश्चात 15 अगस्त, 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री के द्वारा पूरा योजना के क्रियान्वयन की घोषणा कर दी गई।

  • ग्रामीण क्षेत्रो में शहरी सुविधाएं देने की नीति का समर्थन भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने किया था। इस हेतु उन्होंने चार प्रकार के संपर्क मुहैया कराने की बात कही थी। उन्होंने वास्तविक संपर्क, इलेक्ट्रॉनिक संपर्क तथा ज्ञान के संपर्क के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक संपर्क पर जोर दिया था।

  • अक्षयपात्र फाउंडेशन भारत का एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) है, जिसकी स्थापना वर्ष 2000 में बंगलुरू (कर्नाटक) मे हुई थी। यह संस्था स्कूली छात्रों को निःशुल्क मध्याह्न भोजन उपलब्ध कराती है।

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  • भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) द्वारा प्रवर्तित आधार भारतीय नागरिकों को पहचान उपलब्ध कराने के लिए एक कार्यक्रम है। यह 12 अंकीय विशेष पहचान संख्या है, जिसमें शिशुओं सहित प्रत्येक व्यक्ति की आधारभूत जनसांख्यिकीय एवं बायोमैट्रिक सूचना-फोटोग्राफ, फिंगरप्रिंट्स एवं आइरिश स्कैन डाटाबेस संग्रहीत करके तैयार किया जाता है। इसका प्रयोग  बैंक खाता खोलने, टेलीफोन/मोबाइल कनेक्शन लेने, हवाई या रेल टिकट प्राप्त करने आदि पहचान के तौर पर किया जा सकता है।

  • लोक कार्यक्रम एवं ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद अर्थात कापार्ट (Council for Advancement of People’s Action and Rural Technology: CAPART) का गठन 1 सितंबर, 1986 को किया गया था। कापार्ट ग्रामीण विकास मंत्रालय के निर्देशों के अंतर्गत कार्य करता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली मे है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समृध्दि के लिए परियोजनाओं के कार्यान्वयन स्वैच्छिक कार्य को प्रोत्साहन देना और उनमें मदद करना है।

  • भारत सरकार द्वारा 12 जुलाई, 2001 को स्वयंसिध्दा योजना का प्रारंभ किया गया। इसके तहत स्वयं सहायता समूहों के द्वारा  महिलाओं के संपूर्ण सशक्तीरण पर  बल दिया था। स्वाधार योजना का उद्देश्य कठिन परिस्थितियों में पड़ी महिलाओं को सहायता प्रदान करना है। स्वयंसिध्दा तथा स्वाधार दोनों योजनाओं का क्रियान्वय सरकारी निकायों एवं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से कराए जाने का प्रावधान है।

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  • संस्थान         स्थान

राष्ट्रीय दृष्टिहीन संस्थान            –    देहरादून

राष्ट्रीय अस्थिरोग विकलांग संस्थान   –    कोलकाता

अली यावरजंग राष्ट्रीय बधिर संस्थान  –    मुंबई

राष्ट्रीय मानसिक विकलांग संस्थान    –    सिकंदराबाद

  • प्रधानमंत्री श्रम पुरस्कार, भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 मे परिभाषित किए गए केन्द्र और राज्य सरकारों के विभागीय उपक्रमों, केन्द्र और राज्यों के सार्वजनिक केन्द्र और राज्य सरकारों के विभागीय उपक्रमों, केन्द्र और राज्यों के सार्वजनिक उपक्रमों तथा निजी उद्यमों (जिनमें कम से कम 500 पंजीकृत कर्मचारी हैं) के बेहतर प्रदर्शन करने वाले कामगारों को प्रदान किया जाता है।

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  • विजन 2020 फॉर इंडिया तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति डा.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा प्रस्तावित दस्तावेज है जो भारत को वर्ष 2020 तक विकसित राष्ट्र बनाने से संबंधित है।

  • केन्द्र सरकार द्वारा 2 अक्टूबर, 2007 को प्रारंभ की गई आम आदमी बीमा योजना ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता की रेखा से नीचे रहने वाले सभी भूमिहीन  श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है। इस योजना के तहत ग्रामीण भूमिहीन परिवार की मुखिया अथवा परिवार का रोजगार करने वाला एक सदस्य जिसकी उम्र 18-59 वर्ष के मध्य हो, इस योजना के तहत बीमा करा सकेगा। इस योजना का संचालन राज्यों/केन्द्र शासित क्षेत्रों की सरकारों एवं  भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के सहयोग से किया जाता है। योजना के तहत देय प्रीमियम 200 रुपये प्रतिमाह सदस्य प्रतिवर्ष केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा 50:50 के अनुपात में वहन किया जाता है। योजना में बीमाकृत व्यक्ति के कक्षा 9 से 12 की बीच पढ़ रह  दो बच्चों तक के लिए 300 रु. प्रति तिमाही प्रति बच्चा छात्रवृत्ति का प्रावनधान भी है।

  • दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना का उद्देश्य क्षेत्र में कृषि और गैर-कृषि उपभोक्ताओं को विवेकपूर्ण तरीके विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित कराना है। इस योजना का शुभारंभ 25 जुलाई, 2015 को पटना में  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया। चूंकि इस योजना से ग्रामीण शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, बैंकिंग सेवाओं आदि में सुधार होगा और यह सब ग्रामीण सशक्तीकरण के तहत ही आते हैं।

  • 1 अप्रैल, 1999 से प्रारंभ स्वर्ण जयंती ग्राम स्व-रोजगार योजना (SGSY) में पूर्व मे चल रही जिन छः योजनाओं का विलय किया गया था वो निम्नलिखित हैं —

  1. एकीकृत ग्रामीण विकास योजना ( IRDP)

  2. ट्राइसेम

  3. ग्रामीण महिला एवं बाल विकास योजना (DWACRA)

  4. दस लाख कूप योजना (MWS)

  5. उन्नत टूल किट योजना (SITRA)

  6. गंगा कल्याण योजना कालांतर मे SGSY को राष्ट्रीय ग्रामीण अजीविका मिशन (NRLM) नाम से पुनर्गठित किया गया। वर्तमान में इस योजना का नाम दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) है।

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  • राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (RMSA) – की  शुरुआत मार्च, 2009 में भारत सरकार दवारा माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने तथा इसकी गुणवत्ता में सुधार करने के लिए की गई  थी। इसे सत्र 2009-10 से क्रियान्वित किया गया।

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) प्रत्येक भारतीय परिवार को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिन के अकुशल काम का अधिकार देता है। ज्ञातव्य  कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) 5 सितंबर, 2005 में पारित हुआ था तथा 2 फरवरी, 2006 को इसकी शुरुआत प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के बंदापाली गांव से की गई थी। 2 अक्टूबर, 2009 को इसका नाम बदलकर महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) कर दिया गया है।

  • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (National Rural Livelihood Mission) की शुरुआत 2 जून, 2011 को (स्वर्ण जयंती ग्राम स्व-रोजगार योजना (SGSY) का पुनर्गठन कर) राजस्थान के बांसवाड़ा से की गई। योजना का उद्देश्य गरीब ग्रामीणों को सक्षम और प्रभावशाली संस्थागत मंच प्रदान कर उनकी आजीविका में निरंतर वृध्दि करना, वित्तीय सेवाओं तक उनकी पहुंच को बढ़ाना तथा उनकी पारिवारिक आय में वृध्दि करना है।

  • महिलाओं के लिए प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम का समर्थन (STEP- Support to Training ad Employment Programme for Women) को वर्ष 1986-87 में एक केन्द्रीय योजना के रुप में प्रारंभ किया गया था। इसका उद्देश्य महिलाओं में कौशल विकास करना था जिससे वे रोजगार प्राप्त कर सकें या स्व-रोजगार के द्वार आत्मनिर्भर बन सकें। इस योजना के अंतर्गत 16 वर्ष या इससे अधिक उम्र की महिलाओं को सम्मिलित किया गया था।

  • स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) ग्रामीण गरीबों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए एक समन्वित कार्यक्रम के रुप में 1 अप्रैल, 1999 को शुरु की गई थी। 1 दिसंबर, 1997 को स्वर्ण  जयंती शहरी रोजगार योजना शुरु की गई थी। जवाहर रोजगार योजना 1 अप्रैल, 1989 को शुरु की गई थी। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन 12 अप्रैल, 2005 में  शुर किया गया था।

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  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (NREGS) संबंधी विधेयक वर्ष 2005 में संसद द्वारा पारित हुआ तथा 2 फरवरी, 2006 से इस योजना को प्रारंभ किया गया है। यह योजना शुरुआती दौर मे देश के 200 जिलों, दूसरे चरण में 130 अतिरिक्त जिलों अर्थात कुल 330 जिलों तथा 1 अप्रैल, 2008 से देश के सभी जिलों में लागू की गई। 2 अक्टूबर, 2009 को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) कर दिया गया।

  • मध्याह्न भोजन योजना – यह योजना 15 अगस्त, 1995 से शुरु की गई योजना न्यूट्रीशनल सपोर्ट टु प्राइमरी एजुकेशन का संशोधित रुप है जिसे सितंबर, 2004 से प्राइमरी स्तर पर लागू किया गया है। इसे 1 अक्टूबर, 2007 से अपर प्राइमरी (कक्षा 8) स्तर पर लागू कर दिया गया है।

  • सर्व शिक्षा अभियान – शिक्षा के प्रबल अग्रगामी तथा पश्चगामी कड़ियों को दृष्टि में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2001 मे सर्व शिक्षा अभियान को लागू किया।

  • ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन – ग्रामीण जनसंख्या को सुलभ, वहनीय तथा गुणवत्तापूर्वक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु 12 अप्रैल, 2005 को भारत सरकार द्वारा ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना प्रारंभ की गई।

  • लुक ईस्ट पॉलिसी – भारत  द्वारा दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने हेतु लुक ईस्ट पॉलिसी (पूर्व की ओर देखो) की नीति अपनाई गई।

  • भारत में सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रायोगिक स्तर पर 2 अक्टूबर, 1952 में शुरु किया गया था। देश में कृषि कार्यक्रम और संचार की प्रणाली में सुधार के साथ-साथ ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता और ग्रामीण शिक्षा में पर्याप्त वृध्दि के उद्देश्य से सामुदायिक विकास कार्यक्रम को लागू किया गया था। पहली पंचवर्षीय योजना में केवल 248 ब्लॉको में इसको लागू किया गया था। जिसे वर्ष 1964 तक चरणबध्द रुप में पूरे देश में लागू कर दिया गया।

  • भारत में सामुदायिक विकास के मुख्य निर्माता एस.के. डे कहलाते हैं। वे भारत के प्रथम सहकारिता एवं पंचायती राज मंत्री थे। वर्ष 1952 में भारत सरकार द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम को प्रारंभ कराने में इनका महत्वपूर्ण योगदान था। जवाहरलाल नेहरु उस समय प्रधानमंत्र थे।

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  • सामुदायिक विकास कार्यक्रम ने पंचायती राज के संगठन का रास्ता तैयार किया गया था।

  • आश्रय बीमा योजना 10 अक्टूबर, 2001 को प्रारंभ की गई थी। इस योजना का उद्देश्य, काम अथवा नौकरी छूट जाने के कारण प्रभावित कर्मचारियों को सुरक्षा प्रदान करना है।

  • भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 12 अप्रैल, 2005 में प्रारंभ राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रशिक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आशा (ASHA – Accredited Social Health Activists) के प्रमुख कार्यों में शामिल हैं – पोषण एवं प्रतिरक्षण के विषय में समुदाय को सूचना उपलब्ध कराना, स्त्रियों को प्रसव-पूर्व देखभाल जांच के लिए स्वास्थ्य सुविधा केन्द्र साथ ले जाना, गर्भावस्था की प्रारंभिक जानकारी प्राप्त करने के लिए गर्भावस्था परीक्षण किट का प्रयोग करना आदि आशा के कार्यें में शामिल हैं। बच्चे का प्रसव कराना इसका कार्य नही है।

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की घोषणा वर्ष 1983 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा की गई थी। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र मे सुधार हेतु राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 घोषित की गई।

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गरीबी

  • गरीबी का तात्पर्य आधार भूत आवश्यकताओं तक पहुंच की असमर्थता से है अर्थात जब व्यक्ति अपनी मौलिक जरुरतों को भी पूरा न कर सके तो वह गरीब है।

  • गरीबी को दो रुपों में देखा जाता है – निरपेक्ष गरीबी व सापेक्ष गरीबी।

  • निरपेक्ष गरीबी (Absolute Poverty) यह दर्शाता है कि कितने लोग गरीबी में जी रहे हैं।

  • निरपेक्ष गरीबी मापन को हेड कांउर विधि भी कहा जाता है, क्योंकि यह गरीबों की संख्या को बताता है।

  • इस विधि में उपभोग व्यय या न्यूनतम आवश्यकता पोषण स्तर के आधार पर गरीबी रेखा का निर्धारण कर उन लोगों को गरीब मान लिया जाता है, जिनका उपभोग व्यय गरीबी रेखा से नीचे है।

  • सापेक्ष गरीबी (Relative Poverty) अर्थव्यवस्था में आय एवं संपत्ति के वितरण की स्थिति को दर्शाता है।

  • सापेक्ष गरीबी मापन की दो प्रमुख विधियां हैं – लारेंज वक्र विधि तथा गिनी गुणांक।

  • लारेंज वक्र का प्रतिपादन वर्ष 1905 में मैक्स लॉरेंज द्वारा किया गया था।

  • यह राष्ट्रीय आय के वितरण का रेखाचित्रीय प्रदर्शन है, जिसमें का लारेंज वक्र का प्रत्येक बिंदु राष्ट्रीय आय (प्रतिशत मात्रा) की जनसंख्या (प्रतिशत भाग) मे वितरण को दर्शाता है।

  • लारेंज वक्र कुल आय के संचयी प्रतिशत तथा जनसंख्या के संचयी प्रतिशत के मध्य वितरण का प्रदर्शन करता है।

  • लारेंज वक्र निरपेक्ष समता रेखा से जितनी दूर होगा आय का वितरण उतना ही असमान होगा, जबकि यह निरपेक्ष समता रेखा से जितने नजदीक होगा आय वितरण उतना ही समान होगा।

  • गिनी गुणांक का प्रतिपादन वर्ष 1912 में कोरेडो गिनी (Corrado Gini) ने किया था।

  • यह राष्ट्रीय आय के वितरण की गणितीय माप प्रस्तुत करता है।

  • इसे निरपेक्ष समता रेखा के नीचे के संपूर्ण क्षेत्रफल का लारेंज वक्र एवं पूर्ण क्षमता रेखा के मध्य क्षेत्रफल मे भाग देकर प्राप्त किया जाता है।

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गिनी गुणांक  = पूर्ण समता रेखा एवं लारेंज वक्र के मध्य का क्षेत्रफल/पूर्ण समता रेखा के मध्य का कुल क्षेत्रफल

  • गिनी गुणांक शून्य एवं 1 के मध्य (0£G£1) होता है।

  • जब इसका मान शून्य होता है, तो इसका अर्थ राष्ट्रीय आय की पूर्ण समानता से है। अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को एक समान आय प्राप्त हो रही है।

  • जब इसका मान 1 होता है, तो इसका तात्पर्य़ राष्ट्रीय आय के पूर्णतया असमान वितरण से है। अर्थात एक ही व्यक्ति पूरी आय प्राप्त कर रहा है शेष को कुछ भी नही हो रहा है।

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भारत में गरीबी

  • भारत में गरीबी मापन का प्रथम आधिकारिक प्रयास योजना आयोग द्वारा (डी. आर. गाडगिल समिति द्वारा) वर्ष 1962 में किया गया, जिसमें प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह 20 रुपये उपयोग व्यय को गरीबी की रेखा मानने का सुझाव दिया।

  • वर्ष 1977 में योजना आयोग द्वारा गठित कार्यदल ने गरीबी को प्रतिदिन न्यूनतम भोजन ऊर्जा के आधार पर परिभाषित किया।

  • इसी आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन तथा शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन को गरीबी रेखा माना गया।

  • वर्ष 1989 में गठित प्रो. डी.टी. लकड़वाला समिति जिसने वर्ष 1993 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की ने सभी राज्यों के लिए अलग-अलग गरीबी रेखा सुझाव दिया।

  • लकड़वाला समिति के सुझाव पर ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मूल्य सूचकांक अपनाए जाने लगे।

  • ग्रामीण क्षेत्रों के लिए कृषि श्रमिकों हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI for Agricultural Labour) तथा शहरी क्षेत्रों के लिए औद्योगिक श्रमिकों हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI for Industrial Worker) को अपनाया जाने लगा।

  • स्मरणीय है कि भारत में निर्धनता आकलन हेतु राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (NSSO) द्वारा जारी घरेलू उपभोक्ता व्यय के आंकड़े प्रयोग में लाए जाते हैं।

  • भारत में गरीबी मापन की प्रविधि के निर्धारण हेतु वर्ष 2005 में सुरेश तेंदुलकर समिति का गठन किया गया। नवंबर, 2009 में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

  • तेंदुलकर समिति ने गरीबी को बहुआयामी माना तथा इस समिति ने कैलोरी उपागम के बाजार खाद्य, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर पारिवारिक व्यय को गरीबी मापन का आधार माना।

  • इस समिति ने गरीबी मापन की विधि में URP (Uniform Reference Period) जिसके अंतर्गत 30 दिनों की याददास्त अवधि (Recall Period) के भीतर के उपभोग व्यय को लिया जाता था, के स्थान पर MRP (Mixed Reference Period) को अपनाया गया।

  • MRP के तहत पांच मदों (कपड़े, जूते/चप्पल, शिक्षा, टिकाऊ वस्तुएं एवं संस्थागत स्वास्थ्य व्यय) को 365 दिन की याददाश्त अवधि के लिए, जबकि शेष मदों को 30 दिन की याददाश्त अवधि के लिए उपभोग व्यय के आंकड़े लिए जाते हैं।

  • इस समिति की प्रविधि के अनुसार, वर्ष 2011-12 में भारत में 21.9 प्रतिशत गरीबी रही। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में  7 प्रतिशत, जबकि शहरी क्षेत्रों में, 13.7 प्रतिशत गरीबी दर्ज की गई।

  • इनकी प्रविधि के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा 816 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिमाह अथवा 27.20 रुपये प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति है।

  • जबकि शहरी क्षेत्रों के लिए गरीबी रेखा 1000 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह अथवा 33.3 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है।

  • तेंदुलकर समिति के अनुसार, सर्वाधिक गरीबी प्रतिशतता वाला राज्य छत्तीसगढ़ (39.9%) है, जबकि सर्वाधिक गरीब जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश (598.2 लाख) है।

  • तेंदुलकर प्रविधि के अनुसार, न्यूनतम गरीबी प्रतिशतता वाले केन्द्रशासित प्रदेश एवं राज्य क्रमशः अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (1%) तथा गोवा (5.1%) है।

  • निर्धन आकलन की पुनर्समीक्षा हेतु जून, 2012 में सी. रंगराजन की अध्यक्षता में विशेषज्ञ कार्यदल गठित किया गया जिसने 30 जून, 2014 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत किया।

  • इस समिति ने भी गरीबी को बहुआयामी मानते हुए गरीबी रेखा के आकलन पर्याप्त पोषण, वस्त्र, मकान का किराया, यातायात, शिक्षा तथा अन्य गैर-खाद्य व्यय पर आधारित माना।

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  • पोषक मापन में इन्होंने खाद्य बास्केट को लिया है, जिसमें कैलोरी के साथ-साथ प्रोटीन एवं वसा को भी स्थान प्राप्त है।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में 2155 किलो कैलोरी, 48 ग्राम प्रोटीन एवं 28 ग्राम वसा प्रतिदिन, जबकि शहरी क्षेत्रों के लिए 2090 किलो कैलोरी, 50 ग्राम प्रोटीन एवं 26 ग्राम वसा प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का मानक रखा।

  • रंगराजन प्रविधि के अनुसार वर्ष 2011-12 में भारत में 29.5 प्रतिशत लोग गरीबी में थे।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में 30.9 प्रतिशत, जबकि शहरी क्षेत्रों में 26.4 प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं।

  • रंगराजन प्रविधि के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा 972 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिमाह अथवा 32.40 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन है।

  • शहरी क्षेत्रों के लिए गरीबी रेखा को 1407 रुपये प्रतिमाह अथवा 46.90 रुपये प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन माना गया है।

  • इस प्रविधि के अनुसार, भारतीय राज्यों में सर्वाधिक गरीबी छत्तीसगढ़ (47.9%) मे दर्ज की गई।

  • सर्वाधिक गरीबों की संख्या वाला प्रदेश उत्तर प्रदेश (809.1 लाख) है।

  • रंगराजन प्रविधि के अनुसार, न्यूनतम गरीबी प्रतिशतता वाला केन्द्रशासित प्रदेश एवं राज्य क्रमशः अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह (6.0%) राज्य तथा गोवा (6.3%) है।

  • रंगराजन प्रविधि के अनुमान MMRP (Modified Mixed Reference/Recall Period) पर आधारित हैं।

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  • MMRP में उपभोग व्यय को उनकी प्रकृति के आधार पर तीन भागों में बांटा जाता है – कम आवृत्ति वाली वस्तुओं (कपड़े, जूते, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यय एवं टिकाऊ वस्तुओं) को 365 दिन की याददास्त अवधि के लिए, जबकि अत्यधिक आवृत्ति वाली वस्तुओं (खाद्य तेल, अंडे, मछली/मांस, सब्जियां, फल मसाले, प्रसंस्कृत खाद्य, पान, तंबाकू आदि को 7 दिनों की याददास्त अवधि हेतु तथा शेष मदो (शेष खाद्य वस्तुएं, ईंधन एवं प्रकाश, मकान का किराया, आदि) को 30 दिन की याददास्त अवधि हेतु लिया जाता है।

  • भारत के आर्थिक रुप से पिछड़े राज्यों बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश के साथ-साथ महाराष्ट्र के जनजातीय समूहों में नब्बे के दशक में गरीबी की दर अन्य सामाजिक समूहों की अपेक्षा सर्वाधिक रही।

  • योजना आयोग गरीबी रेखा से नीचे अधिवासित जनसंख्या की गणना हेतु एक विशेषज्ञ दल का गठन करता है। जो राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा एकत्रित उपभोग व्यय के आंकड़ों का इस हेतु उपयोग करता है। भारत में गरीबी अनुमानों का आधार परिवार का उपभोग व्यय है।

  • अर्थशास्त्री रैग्नर नर्क्से ने वर्ष 1953 में प्रकाशित अपनी पुस्तक प्राब्लम ऑफ कैपिटल फॉर्मेशन इन अंडर डेवलप्ड कंट्रीज में निर्धनता के दुश्चक्र (Vicious Cycle of Poverty) की अवधारणा का विवेचन करते हुए यह मत व्यक्त किया था कि गरीब देश निर्धनता के दुश्चक्र के कारण  गरीब  बने रहते हैं। इनका तर्क है कि कम आय से कम बचते होती है जो निवेश सामर्थ्य को हतोत्साहित करती है। कम निवेश उसकी उत्पादकता तथा आय भी कम बनी रहती है और वे गरीब ही बने रहते हैं।

  • भारत में योजना आयोग राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर निर्धनता के अनुमानों के लिए नोडल एजेंसी थी। वर्तमान में नीति आयोग ने योजना आयोग को प्रतिस्थापित कर दिया है।

  • सुरेश तेंदुलकर समिति एवं लकडावाला समिति दोनों ही भारत में निर्धनता के अनुमानों में संबंधित रही हैं।

  • छठी पंचवर्षीय योजना के समय से ही योजना आयोग द्वारा राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर गरीबी का निर्धारण किया जा रहा है। भारत में गरीबी का अनुमान एवं गरीबी के अनुमान की प्रविधि के निर्धारण हेतु समय-समय पर अनेक समितियों का गठन किया जाता रहा है। इन समितियों में अलघ समिति (1977), लकड़ावाला समिति (1989), तेंदुलकर समिति (2005) तथा सी. रंगराजन समिति (2012) आदि प्रमुख हैं।

  • गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाली जनसंख्या के अनुमान के नए मानक निर्धारित करने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2005 मे जो समिति गठित की थी उसके अध्यक्ष सुरेश तेंदुलकर थे।

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  • ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजनावधि मे रोजगार के 7 करोड़ नए अवसर सृजित कर निर्धनता अनुपात में 10 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था।

  • बारहवीं पंचवर्षीय योजना में भी गरीबी में प्रतिवर्ष 2% तथा पांच वर्षों में 10% की कमी का लक्ष्य रखा गया था।

  • बिहार राज्य में पिछड़ेपन का कारण वहां की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पारिस्थितियां हैं। बिहार राज्य में शिक्षा में कमी, आय की विषमता, सामाजिक रुढ़ियाँ, उद्योग धन्धों का अभाव तथा राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी आदि के कारण पिछड़ापन मौजूद है। बिहार में विकास के स्तर में क्षेत्रीय भिन्नता भी मौजूद है, परंतु यह बिहार के अल्प पिछड़ेपन का कारण नही अपितु उसका परिणाम है।

  • वर्ष 1960 के दशक मे सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कीमत सहायक कार्यक्रम की तरह प्रारंभ किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य था सब्सिडाइज्ड कीमतों पर आवश्यक वस्तुओं को प्रदान करना।

  • भारत में खाद्य सब्सिडी में शामिल हैं – समर्थन मूल्य के द्वारा किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी और भारतीय खाद्य निगम के क्रय परिचालन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के द्वारा दी जाने वाली उपभोक्ता सब्सिडी तथा इन सभी की लागतों को कवर (Cover) करने के लिए FCI  को सब्सिडी।

  • सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लक्ष्य कम मूल्य पर गरीबों को खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराना है।

  • पंचम पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत यद्यपि पहली बार गरीबी निवारण के घोषित उद्देश्य के साथ गरीब वर्ग की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों को प्रारंभ किया गया तथापि भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने छठी योजना के प्रारंभ मे गरीबी उन्मूलन का नारा दिया था।

  • विभेदीकृत ब्याज दर योजना को केन्द्र सरकार ने 1972 में प्रारंभ किया था। योजना का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को रियायती दर 4.0% पर ऋण उपलब्ध कराना है।

  • जीवन की भौतिक गुणवत्ता का सर्वाधिक आकलन शिशु मृत्यु दर और साक्षरता है। इसे ओवरसीज डेवलपमेंट काउंसिल के लिए 1970 के दशक में मध्य में मौरिस डेविड के द्वारा विकसित किया गया था।

जीवन की भौतिक गुणवत्ता  =  साक्षरता दर + इंडेक्स्ड शिशु मृत्यु दर + इंडेक्स्ड जीवन प्रत्याशा / 3

  • अपर्याप्त संवृध्दि दर, जनसंख्या की उच्च वृध्दि दर एवं बेरोजगारी निर्धनता के लिए उत्तरदायी है।

  • वर्ष 1952 में भारत ने विश्व का पहला राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरु किया जिसमें राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के अनुरुप स्तर पर जनसंख्या को स्थिर करने के लिए जन्म दरों को कम करने हेतु आवश्यक सीमा तक परिवार नियोजन पर जोर दिया गया।

  • जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (District Rural Development Agencies) का प्रमुख कार्य ग्रामीण भारत में निर्धनता को कम करने में मदद करना है। ये अभिकरण निर्धनतारोधी कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु अंतरक्षेत्रीय तथा अंतरविभागीय समन्वय व सहयोग सुनिश्चित करते हैं। ये निर्धनता को दूर करने के लिए बनाए के कोष की निगरानी के साथ-साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन की सुनिश्चित करते है।

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वैदेशिक क्षेत्र

अंतरराष्ट्रीय व्यापार

भुगतान संतुलन

  • किसी देश के निवासियों का शेष विश्व के साथ समग्र आर्थिक लेन-देन का वार्षिक विवरण भुगतान संतुलन कहलाता है।

  • आर्थिक लेन-देन से तात्पर्य वस्तुओं, सेवाओं, संपत्तियों एवं पूजी के लेन-देन से है।

  • भुगतान संतुलन एक लेखांकन है यह सदैव संतुलित रहता है, क्योंकि चालू खाते का घाटा, पूंजी खाते पर ऋण के द्वारा पूरा कर लिया जाता है।

  • भुगतान संतुलन को दो खातों पर दिखाया जाता है – चालू खाता एवं पूंजी खाता।

  • चालू खाता में समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं का लेन-देन दर्ज होता है।

  • पूंजी खाते पर ऋणों एवं निवेश का विवरण दर्ज किया जाता है।

  • चालू खाते में दो मदों में लेखांकन किया जाता है – अदृश्य मद एवं दृश्य मद।

  • दृश्य मद में वस्तुओं का आयात एवं निर्यात दर्ज होता है, जबकि अदृश्य खाते में सेवाओं एवं  अन्य आय एवं व्यय  दर्ज किए जाते हैं।

  • नोट – दृश्य मद के आयात एवं निर्यात के अंतर को व्यापार घाटा कहा जाता है।

  • चालू खाते के लेन-देन के अंतर को चालू खाते का घाटा कहा जाता है।

  • भुगतान संतुलन में असंतुलन को दूर करने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. विदेशी विनिमय दर में परिवर्तन कर निर्यात को प्रोत्साहन एवं आयात को हतोत्साहन।

  2. मुद्रा का अवमूल्यन।

  3. राजकोषीय घाटे में कमी

  4. निर्यात शुल्क में कमी/समाप्ति, निर्यात सब्सिडी।

  5. आयात शुल्क, आयात कोटा आदि को लगाना।

  6. विदेशी निवेश का आकर्षण।

  7. विदेशी सहायता की प्राप्ति आदि।

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भारत का विदेशी व्यापार

  • आर्थिक समीक्षा, 2017-18 के अनुसार वर्ष 2016-17 में भारत का सकल विदेशी व्यापार 44.17 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें 25.8 लाख करोड़ रुपये का आयात एवं 18.5 लाख करोड़ रुपये का निर्यात किया गया।

भारतीय व्यापार की दिशा

  • भारत का सर्वाधिक व्यापार एशियाई देशों के साथ हुआ। सकल निर्यात का 49.9 प्रतिशत, जबकि सकल आयात का 60 प्रतिशत एशियाई देशों के साथ रहा।

भारत में सर्वाधिक निर्यात (महाद्वीप एवं देश)

महाद्वीप

देश

1.   एशिया (49.9%)

USA (15.3%)

2.   यूरोप (19.3%)

UAE (11.29%)

3.   उ. अमेरिका (17.3%)

हांगकांग (5.1%)

4.   अफ्रीका (8.4%)

चीन (3.7%)

5.   दक्षिण अमेरिका (2.6%)

सिंगापुर (3.5%)

 

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भारत से आयात (महाद्वीप एवं देश)

महाद्वीप

देश

1.   एशिया (60%)

चीन (15.9%)

2.   यूरोप (16%)

USA (5.8%)

3.   उ. अमेरिका  (7.6%)

UAE (5.6%)

4.   अफ्रीका (7.5%)

सऊदी अरब (5.2%)

5.   दक्षिण अमेरिका (4.5%)

स्वीट्जरलैंड (4.5%)

 

भारतीय आयात की  शीर्ष मदें

  • पेट्रोलियम (22.6%)>पूंजीगत वस्तुएं (20.9%)>रत्न एवं आभूषण (14.00%)

भारतीय निर्यात की मदें

  • इंजीनियरिंग वस्तुएं (24.4%)>रत्न एवं आभूषण (15.7%)>रसायन एवं संबंधित उत्पाद (14.2%)

ऐसे शीर्ष देश जिनके साथ भारत का व्यापार संतुलन धनात्मक है –

  • अमेरिक>संयुक्त अरब अमीरात>बांग्लादेश>नेपाल>यूनाइटेड किंगडम

ऋणात्मक व्यापार संतुलन

  • चीन>स्विट्जरलैंड>सऊदी अरब>इराक>द. कोरिया

भारत में विदेशी निवेश

  • विदेशी निवेश का तात्पर्य विदेश स्थित किसी संस्थागत निवेशक द्वारा भारत में किए गए निवेश से है, क्योकि भारत में व्यक्तिगत निवेशक को निवेश की अनुमति नही है।

  • विदेशी निवेश दो रुपों में आता है – पोर्टफोलियो निवेश (FPI) तथा प्रत्यक्ष निवेश (FDI)>

  • FPI – ऐसा निवेश जो किसी कंपनी के शेयर में आए तथा निवेशक कंपनी के प्रबंधन में प्रत्यक्ष भागीदार न हो, तो ऐसे निवेश को FPI कहा जाता है। यह निवेश शेयर बाजार के माध्यम से आता है।

  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) – प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निवेशक प्रत्यक्ष रुप से भागीदारी करता है तथा प्रबंधन को प्रभावित करता है। यह दो रुपो में आता है।

  1. ग्रीनफील्ड FDI

जब निवेशक बिल्कुल नई कंपनी की स्थापना करता है, तो ऐसे निवेश को ग्रीनफील्ड FDI कहा जाता है।

  1. बाउनफील्ड FDI

जब निवेशक पहले से ही स्थापित किसी कंपनी में या तो सहभागिता (विलय) कर लेता है या उसे खरीद (अधिग्रहण) कर लेता है, तो ऐसे विदेशी निवेश ब्राउनफील्ड FDI कहलाते हैं। उल्लेखनीय है कि किसी कंपनी के 10 प्रतिशत से अधिक खरीदने पर FPI को FDI माना जाने लगता है।

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FDI से लाभ

  1. यह स्थायी निवेश होता है तथा यह अपने साथ तकनीक, पूंजी एवं नवीन प्रबंधकीय प्रणाली लेकर आता है।

  2. FDI से आधार संरचानात्मक सुधार होते हैं तथा इससे नवीन रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

  3. यह प्रतिस्पर्धा को बढ़ाता है, जिससे वस्तुओं की गुणवत्ता बढ़ती तथा कीमतें कम होती हैं। इससे उपभोक्ता कल्याण बढ़ता है।

  4. इससे देश का आर्थिक विकास होता है, क्योकि दक्ष तकनीक एवं प्रबंधन संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करती है।

FDI से हानि

  1. कंपनियां लाभांश अपने देश लेकर जाती है।

  2. स्थानीय शिशु अवस्था के उद्योगो का पतन होता है, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है।

  3. दीर्घकाल में ये कंपनियां एकाधिकार प्राप्त कर लेती हैं एवं उपभोक्ताओं का शोषण होता है।

  4. इससे देश की आश्रितता बढ़ती है तथा सरकारी काम-काज में विदेशी हस्तक्षेप होता है।

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भारत में FDI

  • भारत में सर्वाधिक FDI आगमन सेवा क्षेत्र में हुआ है। इसके बाद क्रमशः टेलीकॉम एवं कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर के क्षेत्र का स्थान है।

  • भारत में सर्वाधिक FDI मॉरीशस से आती है। इसके बाद सिंगापुर, जापान एवं यू.के. का स्थान है।

मल्टीब्रांड खुदरा क्षेत्र में FDI

  • भारत सरकार द्वारा माल्टीब्रांड खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत FDI की अनुमति प्रदान कर दी गई है, परंतु इसके लिए कुछ शर्तें भी हैं –

  1. न्यूनतम 100 मिलियन का निवेश करना होगा।

  2. इनमें से आधा निवेश आधार संरचना के निर्माण पर करना होगा।

  3. प्रतिष्ठान केवल 10 लाख या उससे अधिक आबादी वाले शहरों में ही स्थापित होंगे।

  4. 30 प्रतिशत वस्तुओं को स्थानीय उद्योगो से लेना होगा।

  5. किसी भी तरह के बिचौलियों का प्रयोग वर्जित है।

अवमूल्यन

  • अवमूल्यन का तात्पर्य देशी मुद्रा के मूल्य (विनिमय दर) में विदेशी मुद्रा के सापेक्ष कमी करने से है।

  • अवमूल्यन मूल्य ह्रास से अलग अवधारणा है।

  • मूल्य ह्रास में जहां बाजार द्वारा दो मुद्राओं की कीमतों में कमी की जाती हैं, वही अवमूल्यन में सरकार द्वारा जानबूझकर मुद्रा के मूल्य में कमी की जाती है।

  • भारत में अब तक तीन बार अवमूल्यन किया जा चुका है।

  1. 19 सितंबर, 1949

  2. 5 जून, 1966

  3. 1 जुलाई तथा 3 जुलाई, 1991

  • अवमूल्यन से निर्यात सस्ता हो जाता है तथा आयात महंगा इस कारण निर्यात को प्रोत्साहित होता है परंतु आयात हतोत्साहित।

  • इसे व्यापार घाटे को दूर करने हेतु प्रयोग में लाया जाता है।

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विनिमय दर

  • विनिमय दर का तात्पर्य दो देशों की मुद्राओँ के आपसी परिवर्तनशीलता की दर से है। (जैस – 1 डॉलर = 60 रुपया)।

  • इसका निर्धारण देशों द्वारा भी होता है और  बाजार शक्तियों द्वारा भी।

  • आजकल अधिकांश देशों ने विनिमय दर के निर्धारण हेतु बाजार प्रणाली को अपना लिया है।

  • विनमय दर का निर्धारण देश के अंदर विदेशी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति से होता है न कि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में।

  • भारत में भी विनिमय दर का निर्धारण बाजार शक्तियों द्वारा ही होता है लेकिन RBI समय-समय पर आवश्यक हस्तक्षेप भी करता है।

  • वर्ष 1972-73 में और वर्ष 1976-77 में व्यापार संतुलन भारत के लिए अनुकूल था। वर्ष 1972-73 में संसाधन बचत (Resource Balance) 176 करोड़ रुपये तथा वर्ष 1976-77 में संसाधन बचत 525 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2017-18 में भारत का व्यापार घाटा लगभग 162 अरब डॉलर रहा।

  • वाणिज्य विभाग की दीर्घकालीन दृष्टि में भारत को वर्ष 2020 तक विश्व व्यापार में एक मुख्य प्रतिभागी के रुप में स्थापित करना है।

  • बंद अर्थव्यवस्था (Closed Economy) – से तात्पर्य़ ऐसी अर्थव्यवस्था से है जो विदेश व्यापार से अलग होती है। ऐसी अर्थव्यवस्था मे अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ न तो निर्यात होता है और न ही आयात होता है। दूसरे शब्दों में बंद अर्थव्यवस्था वाले देशों का अन्य देशों के साथ वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी आदि का आदान-प्रदान नही होता है।

  • दो देशों के मध्य किसी अवधि में हुए आयात तथा निर्यात के मौद्रिक मूल्य के अंतर को व्यापार संतुलन कहते हैं। किसी देश के लिए जब निर्यात मूल्य आयात मूल्य की तुलना में अधिक होता है तो देश व्यापार अधिशेष में, जबकि निर्यात की तुलना में आयात अधिक होने पर देश व्यापार घाटे की स्थिति में होता है। व्यापार संतुलन में केवल व्यापार की दृश्य मदें (वस्तुएं या माल) शामिल की जाती है। इसके विपरीत भुगतान संतुलन में दृश्य मदों के साथ-साथ अदृश्य मदें (बीमा एवं बैंकिंग सेवाएं,  भाड़ा, रॉयल्टी आदि के भुगतान, ऋण व  ब्याज संबंधी भुगतान आदि) भी सम्मिलित की जाती  हैं।

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  • भारत का व्यापार संतुलन वर्ष 1972-73 तथा 1976-77 के दो वर्षों को छोड़कर (जब वह धनात्मक था) वर्ष 1949-50 से 2015-16 तक की संपूर्ण अवधि के लिए ऋणात्मक था।

  • वर्ष 2016-17 में शीर्ष तीन आयात मद इस प्रकार हैं –

मद                         करोड़ रु. में

पेट्रोलियम, ऑयल व ल्युब्रिकेंट्स  582762

पूंजीगत वस्तुएं                379106

अलौह धातुएं                  262961

  • भारत द्वारा वर्ष 1991 से अधिग्रहीत नई आर्थिक नीति का एक महत्वपूर्ण घटक-उदारीकरण है। इसके अंतर्गत भारतीय अर्थव्यवस्था के विनियमन को उदार बनाया जाता है अर्थात आर्थिक गतिविधियों को बाजार के अनुसार, संचालित होने की स्वतंत्रता दी जाती है। आयात शुल्क में कमी भी इसका महत्वपूर्ण नीति साधन है।

  • माल के आयात हेतु आयातक को विदेशी विनिमय के प्राप्ति के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के विनिमय नियंत्रण विभाग (ECD- Exchange Control Department) के समक्ष आवेदन करना होता है। आवेदन के वैध पाए जाने पर विभाग इसे स्वीकृति प्रदान करता है.

  • कतर, भारत को सर्वाधिक एल.एन.जी. आपूर्ति करने वाला राष्ट्र है। भारत मुख्य रुप से कतर और ऑस्ट्रेलिया से दीर्घकालिक अनुबंधों के तहत एलएनजी आयात करता है और अपने प्राकृतिक गैस स्रोतों को विविधता देने की कोशिश कर रहा है। वर्ष 2017-18 के दौरान भारत ने सर्वाधिक आयात क्रमशः कतर, नाइजीरिया तथा ऑस्ट्रेलिया से किया। BP Statistical Review June, 2018 के अनुसार भारत विश्व चौथा सबसे बड़ा N.G. देश है।

  • आयात आवरण (इंपोर्ट कवर) उन महीनों की संख्या बताता है जितने महीनों के आयात का भुगतान देश के अंतरराष्ट्रीय रिजर्व द्वारा किया जा सकता है। मार्च, 2017 के अंत तक भारत का आयात आवरण 11.3 महीने था। जबकि दिसंबर, 2017 के अंत तक यह 10.8 महीने हो गया।

  • पश्चिम बंगाल स्थित हल्दिया बंदरगाह से आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुएं हैं – उर्वरक उर्वरक हेतु आवश्यक कच्चा माल, खाद्यान्न, चीनी, अखबारी कागज, कुकिंग कोल, पेट्रोलियम कोक, चूना पत्थर, लौह एवं इस्पात, मशीनरी, स्क्रैप, सब्जियां आदि।

  • स्वतंत्रता के उपरांत आयात की दृष्टि से अमेरिका (USA) भारत के लिए सबसे प्रमुख राष्ट्र रहा है।

  • अंतरराष्ट्रीय व्यापार में साख-पत्र (L/C-Letter of Credit) एक भुगतान सुनिश्चित करने संबंधी दस्तावेजी साख (Documentary Credit) है जो आयातकर्ता के निवेदन पर किसी वित्तीय संस्थान द्वारा जारी किया जाता है।

  • आयातक सर्वप्रथम भारतीय रिजर्व बैंक के पास आयात के लिए अभीष्ट विदेशी विनिमय हेतु आवेदन करता है। विदेशी विनिमय स्वीकृत होने के पश्चात आयातक इंडेट के माध्यम से निर्यातक को आपूर्ति हेतु ऑर्डर देता है जिससे आयात की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।

  • भारत फल, सूखे फल (Dry Fruits) एवं ताड़ तेल का आयात मध्य एवं मध्य-पूर्व एशिया के देशों से करता है।

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  • किसी देश की अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण से तात्पर्य उसके औद्योगिक उत्पादन में वृध्दि से होता है। भारत की निर्यात संरचना में विनिर्मित उत्पादों (औद्योगिक उत्पाद) के अंश में वृध्दि इस बात का सूचक है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक रुपांतरण आधुनिकीकरण के पक्ष में हो रहा है।

  • सिले-सिलाए वस्त्रों के निर्यात संवर्धन के उद्देश्य से जुलाई, 2003 में केन्द्रीय कपड़ा मंत्री ने तमिलनाडु के तिरुपुर में प्रथम वस्त्र पार्क का शिलान्यास किया। यहां से विश्व के की देशों को वस्त्र निर्यात होता है। इसे दक्षिण भारत का मानचेस्टर कहा जाता है। इसके अलावा इसे डॉलर सिटी, निट सिटी, कॉटन सिटी आदि नामों से भी जाना जाता है।

  • भारतीय लौह अयस्क का जापान एक बड़ा आयातक है। बैलाडीला खान से प्राप्त लौह-अयस्क जापान को निर्यात किया जाता है। यूनाइटेड किंगडम भारतीय चाय के बड़े आयातकों में प्रमुख है। चमड़े का सामान रुस को निर्यात किया जाता है जबकि सूती कपड़ों का सबसे बड़ा आयातक यू.एस.ए.।

  • वर्ष 2017-18 में भारतीय चमड़े (Indian Leather Products) का सर्वाधिक निर्यात हिस्सा यू.एस.ए. (24.48%) का था जबकि दूसरे स्थान पर जर्मनी (14.76%) रहा। यू.के. (10.94%) इस संदर्भ में तीसरे स्थान पर रहा है।

  • आर्थिक क्रिया-कलापों के संदर्भ में XIX राष्ट्रमंडल खेलों को देखने के लिए विदेशी नागरिकों का भारत में आगमन निर्यात की श्रेणी में माना जाएगा। इस आगमन से देश को प्राप्त आय पर्यटन के अंतर्गत आएगी जो कि निर्यात लेखे के तहत अदृश्य मद है।

  • अर्थव्यवस्था में सेवाओं के निर्यात को अदृश्य निर्यात कहते हैं। पर्यट, बीमा आदि के व्यापार सेवाओं के व्यापार में ही शामिल है।

  • एंट्रीपोर्ट व्यापार (Entreport Trade) पुनः निर्यात के लिए मंगाई गई वस्तुओं के संदर्भ में होता है।

  • ड्यूटी-ड्रॉ बैक उस शुल्क की पूर्ण या आंशिक वापसी है जिसे निर्यातकों निर्यात के उद्देश्य से आयतित वस्तुओं पर सीमा या उत्पाद शुल्क के रुप में सरकार को भुगतान किया  था।

  • नवीनतम विदेश व्यापार नीति 1 अप्रैल, 2015 से 31 मार्च, 2020 तक के लिए है।

  • स्वतंत्र व्यापार नीति (Free Trade Policy) – वह नीति होती है जहां व्यापार पर किसी भी प्रकार का प्रशुल्क नहीं लगाया जाता है। ऐसा प्रायः क्षेत्रीय समझौतों मे देखा जाता है इनमें ग्रुप के सदस्य आपस में तो प्रशुल्क एवं अन्य व्यापार  कर देते हैं परंतु प्रत्येक सदस्य देश  गैर-सदस्य देशों के साथ  अपना प्रशुल्क, व्यापार प्रतिबंध तथा कामर्शियल नीतियां बनाए रखते हैं।

  • नई निर्यात-आयात नीति (EXIM Policy) – मे विदेशी व्यापार के पूर्व की अपेक्षा और उदार बनाया गया है। GATT ( General Agreement on Trade and Tariff) समझौते तथा तत्पश्चात अस्तित्व में आए WTO (World Trade Organization) ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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  • भारत एशिया में प्रथम ऐसा देश है, जिसने निर्यात में प्रभावी वृध्दि के उद्देश्य के तहत वर्ष 1965 में कांडला में निर्यात प्रसंस्करण क्षेत्र (EPZ) की स्थापना की थी।

  • मुक्त या स्वतंत्र व्यापार क्षेत्र (Free Trad Zone) वह क्षेत्र विशेष होता है जहां से वस्तुओं के निर्माण, निर्यात, प्रसंस्करण आदि की सुविधा होती है। उपर्युक्त क्षेत्र कस्टम ड्यूटी, उत्पाद शुल्क आदि से भी मुक्त होते हैं। जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलता है।

  • पश्चिम बंगाल के नंदी ग्राम क्षेत्र सें सेज (SEZ) नीति के अंतर्गत सलीम समूह को (विशेष तौर से जेम्स एंड ज्वैलरी के लिए) अनुमति दी गई थी।

  • भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ – Special Economic Zone) अधिनियम मई, 2005 में संसद द्वारा पारित हुआ था तथा 23 जून, 2005 को इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई थी। यह 10 फरवरी, 2006 से प्रभावी हुआ  था।

  • विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात के प्रोत्साहन हेतु निर्यात प्रोसेसिंग क्षेत्रों को एक प्रभावशाली यंत्र के रुप में प्रयोग किया जा रहा है। इन क्षेत्रों की स्थापना का उद्देश्य देश की निर्यातित वस्तुओं के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करना है ताकि ये अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अपना स्थान बना सके। वर्ष 2000 में सूरत में एक EPZ (विशेष तौर से जेम्स एंड ज्वैलरी के लिए) की स्थापना की गई जो कि भारत का पहला निजी क्षेत्र का EPZ है।

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  • SEZ अधिनियम वर्ष 2006 से प्रभावी हुआ। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. अतिरिक्त आर्थिक गतिविधियों का सृजन

  2. वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात को प्रोत्साहन

  3. घरेलू एवं विदेशी स्रोत से निवेश प्रोत्साहन

  4. रोजगार अवसरों का सृजन

  5. आधारभूत (Infrastructure) सुविधाओं का विकास

  • निर्य़ात साख एवं गारंटी निगम (Export Credit and Guarantee Corporation – ECGC) की स्थापना वर्ष 1957 में निर्यात जोखिम बीमा निगम (ERIC) के नाम से देश से वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात से संबंधित साख के जोखिम कवर हेतु की गई थी। 1964 में इसे ECGC में परिवर्तित किया गया। यह निर्यात व्यापार संबंधी वित्तीयन एवं बीमा से संबंधित है।

  • इंडिया ब्रांड इक्विटी फंड की स्थापना वाणिज्य मंत्रालय द्वारा वर्ष 1996 में की गई थी। इसका उद्देश्य् ब्रांड को वैश्विक बनाना था। इंडिया ब्रांड इक्विटी फंड वर्ष 2002 में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) में परिवर्तित हो गया, जब भारतीय उद्योग (CII) ने उसमें भागीदारी प्राप्त की।

  • मॉर्गन स्टैनले ने वर्ष 1998 में उभरते हुए बाजारों में भारत को तीसरा स्थान प्रदान किया था। मॉर्गन स्टैनले के इस आकलन मे ब्राजील को प्रथम जबकि मेक्सिको को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था।

  • जापान के मिकीमोतो कोकिची ने मोती से कल्चर मोती उत्पादन की तकनीक का आविष्कार किया था। इस आविष्कार के बाद ही जापान में कल्चर मोती उत्पादन का उद्योग तेजी से विकसित हुआ।

  • प्रसिध्द अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ट्रैवेल एंड लेजर के 2009 के सर्वेक्षण में पर्यटन के दृष्टिकोण से उदयपुर को दुनिया का सर्वोत्तम शहर चुना गया था। इस सूची में उदयपुर के बाद दूसरा स्थान दक्षिण अफ्रीका के शहर केपटाउन का था।

  • जुलाई, 2018 तक की अद्यतन स्थिति के अनुसार, ट्रेवेल एंड लेजर के पाठकों ने विश्व के श्रेष्ठ 15 शहरों में तीसरे स्थान पर उदयपुर शहर को चुना है। ये भारत का एकलौता शहर है जिसने इस सूची में अपनी जगह बनाई है। प्रथम दो स्थान प्राप्त करने वाले दोनों शहर मेक्सिको के हैं।

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  • नाथूला दर्ऱा भारत के सिक्किम राज्य और तिब्बत को आपस में जोड़ता है। प्राचीन काल में इसे सिल्क मार्ग कहा जाता था। वर्ष 1962 में  भारत-चीन युध्द के बाद इसे बंद कर दिया था, जिसे वर्ष 2006 में पुनः व्यापार हेतु खोल दिया गया।

  • ई-व्यापार (E-Commerce) का अर्थ इंटरनेट के माध्यम से व्यापार से है।

  • सुपर-301 अमेरिकी व्यापार एवं प्रतिस्पर्ध्दा अधिनियम, 1988 की वह धारा है जिसके तहत अमेरिका द्वारा किसी भी देश के विरुध्द आर्थिक कार्यवाही की जाती है।

  • ई-बिज पोर्टल सरकारी सेवाओं की पहुंच हेतु, एकल द्वारा (प्लेटफार्म) से संबंधित। ई-बिज का संचालन औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (DIPP) वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के निर्देशन में इम्फोसिस द्वारा किया जा रहा है। इसका उद्देश्य जी-टू-बी (Government to-business) सेवाओं की ऑनलाइन सुलभता को बढ़ाकर देश में व्यवसाय परिवेश में सुधार करना है।

  • एक देश के निवासियों का विश्व के अन्य देशों के निवासियों के साथ सामान्यतया एक वर्ष के दौरान, जो अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवहार या लेन-देन (समस्त आयात एवं निर्यात) होते हैं उनकी प्रविष्टि जिस विवरण या खाते में करते हैं उसे भुगतान संतुलन (Balanc of Payment) कहते हैं।

 

  • भुगतान संतुलन (BoP – Balance of Payment) – में दृश्य व्यापार, अदृश्य व्यापार तथा ऋण  तीनों सम्मिलित होते हैं। दृश्य व्यापार के अंतर्गत वस्तुओं का आयात-निर्यात तथा अदृश्य व्यापार के अंतर्गत सेवाओं का आयात-निर्यात सम्मिलित  होता है। इन दोनों (दृश्य एवं अदृश्य) का लेन-देन भुगतान संतुलन के चालू खाते को प्रदर्शित करता है। जबकि  भुगतान संतुलन का पूंजी खाता वैश्विक निवेश एवं ऋण के लेन-देन को प्रदर्शित करता है।

  • विदेशी व्यापार में आयात तथा निर्यात दोनों ही सम्मिलित होते हैं। अतः इसे आयात के गुणों से अथवा निर्यात के गुणों से संबंधित नही किया जा सकता है। जबकि विदेशी व्यापार गुणक यह बताता है कि निर्यात में वृध्दि के फलस्वरुप राष्ट्रीय आय में कितने गुना वृध्दि होती है। भुगतान संतुलन एक विशेष समयावधि ( एक वर्ष) के लिए किसी देश के अंतरराष्ट्रीय लेन-देन (जिसमें विदेशी व्यापार भी शामिल होता है) का एक लेखा है।

  • रुपये की परिवर्तनीयता से तात्पर्य रुपये का विदेशी मुद्राओं में तथा विदेशी मुद्राओं को रुपये में  बिना किसी हस्तक्षेप के स्वतंत्र रुप से परिवर्तन संभव होने से है। रुपये के पूर्ण परिवर्तनीयता (चालू खाते तथा पूंजी खाते पर) से विदेशी पूंजी के भारत में आने एवं भारत से जाने पर कोई प्रतिबंध नही होगा। परिणामस्वरुप भारत द्वारा रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता अपनाए जाने से विदेशी निवेशकों का  भारतीय अर्थव्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा और इसके फलस्वरुप भारत में विदेशी पूंजी के अंतर्प्रवाह में वृध्दि होगी।

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  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 20 मार्च, 2006 को पूंजी खाते में रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता (Full Capital Account Convertibility – CAC) प्रवाहित विनिमय दर (Floating Exchange Rate) लागू करने पर रोडमैप तैयार करने हेतु RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर एस.एस. तारापोर की अध्यक्षता में 6 सदस्यीय समिति नियुक्ति की थी। इस समिति के गठन का उद्देश्य भारत में डॉलरीकरण के क्रियान्वयन का परीक्षण और इसके लागू करने के समय के निर्धारण पर अपनी सिफारिश प्रस्तुत करना था।

  • वर्ष 1994-95 के बजट में सरकार ने 28 फऱवरी, 1994 को चालू खाते पर रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता की घोषणा की थी।

  • अवमूल्यन के कारण देश की मुद्रा का विदेशी मुद्राओं के सापेक्ष मूल्य गिर जाता है जिसके कारण अवमूल्यन करने वाले देश के निर्यात सस्ते तथा आयात महंगे हो जाते हैं। परिणामस्वरुप अवमूल्यन वाले देश के निर्यातों मे वृध्दि तथा आयातों में कमी होती है।

  • मुद्रा के अवमूल्यन का तात्पर्य रुपये का विदेशी मुद्राओं के सापेक्ष मूल्य में कमी से है। भारतीय रुपये का अब तक तीन बार अवमूल्यन (वर्ष 1949, 1966 तथा 1991 में) किया जा चुका है।

  • पूंजी खाते की परिवर्तनीयता से तात्पर्य अन्य देशों से (शेष विश्व से) वित्तीय परिसंपत्तियों मे बिना किसी बाध के बाजार आधारित विनिमय दर पर विनिमय किए जाने के अधिकार से है। इसका तात्पर्य मौद्रिक कोषों/वित्तीय परिसंपत्तियों के देश के भीतर आने एवं बाहर जाने से है। भारत में वैसे पूंजी खाते पर परिवर्तनीयता तो नही है पर विभिन्न पूंजी व्यवहारों के संबंध में RBI अत्यंत ही उदारवादी नीति अपनाया है जो प्रभाव मे पूर्ण परिवर्तीयता की ही तरह है। जैसे EEFC (Exchange Earned Foreign Currency) खाता का उदारीकरण, ECB का विस्तार, MF में विदेशी निवेश की अनुमति आदि।

  • जुलाई, 1991 मे रुपये का तीन बार अवमूल्यन किया गया। सर्वप्रथम 1 जुलाई, 1991 को रुपये का 9.5% अवमूल्यन किया गया, पुनः 3 जुलाई और 15 जुलाई, 1991 को रुपये का क्रमशः 8.5% तथा 2% अवमूल्यन किया गया। इस प्रकार जुलाई, 1991 में रुपये का लगभग 20% अवमूल्यन किया गया।

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  • भारत और अमेरिका के मध्य विदेशी खाता कर अनुपालन अधिनियम (FATCA – Foreign Account Tax Compliance Act) 9 जुलाई, 2015 को हस्ताक्षरित तथा 30 सितंबर, 2015 से प्रभावी हुआ।

  • START (Strategic Arms Reduction Treaty) अमेरिका व सोवियत संघ के मध्य एक द्वीपक्षीय संधि है। स्टार्ट-I और स्टार्ट-II संधि क्रमशः जुलाई, 1991 तथा जनवरी, 1993 में हुई थी। स्टार्ट-I संधि के समय यू.एस. राष्ट्रपति जॉर्ज बुश तथा सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव थे जब कि स्टार्ट-II के समय यू.एस. राष्ट्रपति जॉर्ज बुश तथा सोवियत संघ के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन थे।

  • भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) को वर्ष 2015 में प्रतिष्ठित मिनी रत्न (श्रेणी-I) का दर्जा प्रदान किया गया। इरेडा एक गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्तान  है जो अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षत/संरक्षण परियोजनाओं के संवर्धन, विकास तथा वित्तीय सहायता प्रदान करने  के लिए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय  के प्रशासनिक नियंत्रणाधीन वर्ष 1987 में स्थापित एक पब्लिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है इसका उद्देश्य शाश्वत ऊर्जा है। इसके अन्य प्रमुख उद्देश्य हैं –

  1. नवीन एवं नवकरणीय स्रोतो के जरिए विद्युत उत्पादन और ऊर्जा दक्षता के लिए ऊर्जा संरक्षण हेतु विशिष्ट परियोजनाओं एवं स्कीमों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना।

  2. नवीकरणीय ऊर्जा दक्षता/संरक्षण परियोजनाओं में दक्ष एवं प्रभावी वित्तपोषण प्रदान करने के लिए अग्रणी संगठन के रुप में अपनी स्थिति को बनाए रखना।

  3. अभिवन वित्तपोषण के जरिए नवकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में इरेडा की हिस्सादारी को बढ़ाना आदि।

  4. प्रणालियों, प्रक्रियाओं एवं संसाधनों में सतत सुधार के जरिए  उपभोक्ताओं को प्रदान की गई सेवाओं की दक्षता में सुधार।

  • भौगोलिक सांकेतांक अधिनियम, 1998 के अंतर्गत कुल 169 भौगोलिक संकेतक को पंजीकृत कर सुरक्षा प्रदान की गई है। लखनऊ का चिकन शिल्प, बनारसी साड़ी, दार्जिलिंग चाय और इलाहाबाद का सुर्खा अमरुद सभी का पंजीकरण इस अधिनियम के अंतर्गत किया गया है।

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  • अर्थशास्त्री हाट्रे (Hawtrey) ने व्यापार चक्र का विशुध्द मौद्रिक सिध्दांत प्रतिपादन किया। हाट्रे के अनुसार व्यापार चक्र एवं एक नितांत मौद्रिक समस्या है यह व्यापारियों की ओर से मुद्रा की मांग प्रवाह में होने वाले परिवर्तन हैं जिनके परिणामस्वरुप अर्थव्यवस्था में समृध्दि तथा मंदी आती है।

  • विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (FEMA) विदेशी विनिमय विनियमन अधिनियम (FERA) के स्थान पर 1 जून, 2000 से प्रभावी हुआ था। इसका उद्देश्य व्यापार और भुगतानों को सुविधाजनक बनाना तथा देश में विदेशी मुद्रा  बाजार के सुव्यवस्थित विकास को  बढ़ावा देना है।

  • भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रीय निवेशे एवं अवसंरचना निधि एक अंशदायी और नियत निवेश न्यास के रुप में पंजीकृत संस्था है।

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अंतरराष्ट्रीय संगठन

अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)

  • IMF की स्थापना 27 दिसंबर, 1945 को हुई।

  • भारत इसका संस्थापक सदस्य था।

  • वर्तमान में इसमें कुल 189 सदस्य हैं.

  • इसका 189वां सदस्य नौरु है।

  • IMF का मुख्यालय वाशिंगटन डी.सी. में है।

कार्य

  • अंतरराष्ट्रीय भुगतान संबंधी तरलता की समस्या का समाधान करना।

  • विनिमय दरो में स्थायित्व लाना।

  • देशों को भुगतान संतुलन को दर करने हेतु ऋण देना (अल्पकालीन)

सदस्यता

  • IMF की सदस्य हेतु दो आवश्यक शर्ते हैं –

  1. विश्व बैंक का सदस्य होना।

  2. IMF में निर्धारित अंशदान (कोटा) को जमा करना।

नोट – IMF में कोटा का निर्धारण देश की विश्व व्यापार मे हिस्सेदारी, प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय तथा आर्थिक विकास के आधार पर निर्धारित होता है।

  • देशों को अपने कोटा को 25 प्रतिशत हॉट मनी (सर्व स्वीकार्य मुद्रा जिसमें डॉलर, पाउंड, यूरो, येन और युआन शामिल हैं) में तथा 75 प्रतिशत अपनी मुद्रा में चुकाना होता है।

  • IMF की लेखा मुद्रा विशेष आहरण अधिकार (Special drawing right-SDR) कहलाती है। इसका मूल्य पांच मुद्राओं द्वारा निर्धारित होता है – डॉलर, यूरो, येन, पाउंड तथा युआन।

  • IMF द्वारा विश्व आर्थिक परिदृश्य (World Economic Outlook) प्रकाशित किया जाता है।

  • भारत का IMF में 2.7 प्रतिशत कोटा है तथा यह 8वां बड़ा कोटाधारक देश है।

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विश्व बैंक समूह

विश्व बैंक समूह में पांच संगठन हैं –

संस्थाएं

स्थापना वर्ष

कार्य

1.   अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (IBRD)

1945

विकास एवं पुनर्निर्माण हेतु ऋण

2.   अंतरराष्ट्रीय विकास परिषद (IDA)

1960

विकास हेतु ऋण

3.   अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC)

1956

निजी क्षेत्र को  ऋण

4.   बहुपक्षीय विनियोग गारंटी संस्था (MIGA)

1988

गैर-व्यापारिक जोखिम हेतु निवेश गारंटी

5.   निवेश विवादों के निपटारे हेतु अंतरराष्ट्रीय संगठन (ICSID)

1966

विवादों का निपटारा

 

 

 

  • IBRD तथा IDA को संयुक्त रुप से विश्व बैंक कहा जाता है।

  • इसके भी 189 सदस्य हैं तथा 199वां सदस्य नौरु है।

  • यह आधार संरचना निर्माण, क्षमता विकास (प्रशिक्षण, शिक्षा आदि), शोध एवं विकास तथा सुशासन गतिविधियों हेतु ऋण देता है।

  • IDA को विश्व बैंक की सॉफ्ट लोन की खिड़की कहा जाता है, क्योंकि यह अति उदार शर्तों पर ऋण देता है।

  • विश्व बैंक द्वारा विश्व विकास रिपोर्ट (World Development Report) प्रकाशित किया जाता है।

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विश्व व्यापार संगठन (WTO)

स्थापना

  • विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1 जनवरी, 1995 को की गई।

  • इसका मुख्यालय जेनेवा में है।

  • वर्तमान में इस संगठन के 164 सदस्य हैं।

  • 164वां सदस्य अफगानिस्तान है।

उद्देश्य

  • विश्व व्यापार के माध्यम से विश्व के संसाधनों के कुशलता प्रयोग को सुनिश्चित कर लोगों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाना।

  • इस संगठन के तहत प्रमुख समझौते निम्नलिखित हैं –

  1. कृषि और समझौता (OOA: Agreement on Agriculture)

  2. गैर कृषि बाजार पहुंच (NAMA: Non Agricultural Market Access)

  3. सेवाओं के व्यापार पर सामान्य समझौता (GATS: General Agreement on Trade of Services)

  4. बौध्दिक संपदा से संबंधित व्यापार (TRIPS: Trade Related to Intellectual Properties)

  • ग्रीन बॉक्स, ब्लू बॉक्स तथा रेड बॉक्स सब्सिडी की मदें हैं।

  • ग्रीन बॉक्स एवं ब्लू बॉक्स में आने वाली मदों पर सब्सिडी की अनुमति है, जबकि रेड बॉक्स वाली मदों पर सब्सिडी समाप्त की जा चुकी है।

  • एंबर बॉक्स सब्सिडी को भी चरणबध्द रुप से समाप्त करना है।

  • बौध्दिक संपदा के अंतर्गत आते हैं –

  1. पेटेंट – औद्योगिक उत्पादों पर अधिकार

  2. कॉपीराइट – अभौतिक रचनाओं (संगीत, पुस्तक आदि)

  3. भौगोलिक संकेतक – किसी स्थान विशेष के उत्पाद से (बनारसी साड़ी)

  4. ट्रेडमार्क – व्यापारित चिन्ह्।

  • 6-12 मार्च, 1995 के मध्य कोपेनहेगेन (डेनमार्क) में सामाजिक विकास पर प्रथम विश्व शिखर सम्मेल आयोजित किया गया था।

  • वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (वर्ल्ड बैंक) प्रकाशित करता है।

  • वर्ष 2018 के विश्व विकास रिपोर्ट का मूल विषय है – लर्निंग टू रिएलाइज एजूकेशन्स प्रॉमिंस (शिक्षा के वचन को वास्तविक बनाने के लिए सीखना) जबकि 2019 के विश्व विकास रिपोर्ट का मूल विषय है – द चेंजिंग नेचर ऑफ वर्क।

  • व्यापार करने की सुविधा का सूचकांक (Ease of Doing Business Index) वर्ष 2003 से प्रत्येक  वर्ष विश्व बैंक द्वारा जारी किया जाता है। इस सूचकांक  में व्यापार की सुविधा उपलब्ध कराने को लेकर किए गए बुनियादी बदलावों के आधार पर विश्व के देशों  रैंकिंग  प्रदान की जाती है।

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  • विश्व आर्थिक संभावना (Global Economic Prospects) रिपोर्ट आवधिक रुप से वर्ष मे दो बार (जनवरी एवं जून) विश्व बैंक ग्रुप द्वारा जारी किया जाता है।

  • विश्व बैंक ने भारत को विशिष्ट आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने हेतु वर्ष 1958 में भारत सहायता क्लब की स्थापना की थी, कालांतर में जिसका नाम परिवर्तित कर भारत विकास मंच कर दिया गया है। विश्व बैंक भारतीय राज्यों को अवस्थापना सुधार (परिवहन एवं संचार, सिंचाई, जलापूर्ति, विद्युत शक्ति, सड़क निर्माण आदि) हेतु दीर्घकालिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता रहा है।

  • विश्व बैंक के सहयोग से आई.सी.ए.आर. (Indian Council of Agricultural Research)  द्वारा संचालित राष्ट्रीय कृषि अभिनव परियोजना (NAIP) का शुभारंभ 26 जुलाई, 2006 को किया गया है। इसके चार घटक हैं –

  1. उभरती हुई कृषि नवोन्मेष व्यवस्था में एक उत्प्रेरक के रुप में ICAR की भूमिका को सुदृढ़ करना।

  2. उपभोक्ता प्रणाली के लिए कृषि उत्पादन में शोध।

  3. सतत ग्रामीण आजीविका सुरक्षा पर शोध।

  4. कृषि विज्ञान में बुनियादी एवं सामरिक शोध।

  • औपचारिक रुप से विश्व बैंक की स्थापना वर्ष 1945 में हुई थी, परंतु इसने वास्तव में वर्ष 1946 से कार्य करना शुरु किया। इसका मुख्यालय वॉशिंगटन डीसी में है।

  • अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और IRBD की स्थापना अमेरिका के ब्रेटनवुड्स में वर्ष 1944 के समझौते के अंतर्गत (औपचारिक रुप से 27 दिसंबर – 1945 को) की गई। चूंकि दोनों की स्थापना ब्रेटनवुड्स के ही तहत हुई इसलिए इन दोनों को ब्रेटनवुड्स जुड़वा तथा वाशिंगटन में स्थित होने के कारण वाशिगंटन जुड़वां के रुप में भी जाना जाता है।

  • पत्र-स्वर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का विशेष आहरण अधिकार ( D.R.) है। आई. एम. एफ. ने वर्ष 1970 में इस व्यवस्था को प्रारंभ किया था। इसमें स्वर्ण की दुर्लभता को ध्यान में रखते हुए एसडीआर को स्वर्ण के स्थान पर साख के रुप मे स्वीकार किया गया। इसीलिए इसे पत्र-स्वर्ण (Paper Gold) की संज्ञा दी गई है।

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  • वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक का प्रकाशन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF: Interanational Monetary Fund) द्वारा किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट का प्रकाशन विश्व आर्थिक फोरम द्वारा ग्लोबल कॉम्पटीटिवनेस रिपोर्ट का प्रकाशन तथा विश्व बैंक द्वारा वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट का प्रकाशन किया जाता है।

  • व्यापक-आधारभूत व्यापार और निवेश करार (Broad-Based Trade and Investment Agreement – BTIA) भारत और यूरोपीय संघ के बीच एक मुक्त व्यापार समझौता है। यह समझौता वर्ष 2007 मे लागू हुआ।

  • वैश्विक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Global Financial Stability Report) अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) द्वारा तैयार एवं प्रकाशित की जाती है। यह आई.एम.एफ. द्वारा जारी अर्ध्दवार्षिक प्रतिवेदन होता है जिसमें वैश्विक वित्तीय तंत्र एवं बाजारों का आकलन प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रतिवेदन में वर्तमान बाजार स्थिति तथा वित्तीय स्थिरता को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों का विश्लेषण भी प्रस्तुत किया  जाता है।

  • ट्रिम्स (TRIMs) विश्व व्यापार संगठन (WTO) का एक समझौता है। इसका पूरा नाम ट्रेड रिलेटेड इनवेस्टमेंट मेसर्स (Trade Related Investment Measures) है। TRIMs (ट्रिम्स) का संबंध कछ शर्तों या प्रतिबंधों से है, जो कोई देश अपने देश में विदेशी विनियोगों के संबंध में लगाता है।

  • WTO के प्रथम मंत्रिस्तरीय सम्मेलन जो सिंगापुर में आयोजित हुआ था, में सदस्य देशों में सूचना प्रौद्योगिकी में वाणिज्य पर अनुबंध हस्ताक्षरित हुआ था

  • GATT के अधीन सर्वाधिक अनुग्रह भाजन राष्ट्र (Most Favoured Nation MFN) पद का अर्थ यह है, कि यदि कोई देश किसी अन्य देश को विदेशी व्यापार में कोई विशेष सुविधा प्रदान करता है, तो वह विशेष सुविधा GATT के सभी सदस्य देशों को  भी उपलब्ध कराई जाएगी।

  • गैट का तात्पर्य प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (General Agreement on Tariffs and Trade- GATT) से है। व्यापार बढ़ाने एवं प्रशुल्क घटाने के उद्देश्य से वर्ष 1948 में जेनेवा में 53 देशों की एक बैठक बुलाई गई। समझौते पर 30 देशों ने असहमति जताई थी।  इस प्रकार 23 देशों के मध्य हुए समझौते के आधार पर 1 जनवरी, 1948 से GATT क्रियाशील हो गया।

  • एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर (Agreement on Agriculture), एग्रीमेंट ऑन दि ऐप्लीकेशन ऑफ सैनिटरी एंड पाइटोसैनिटरी मेजर्स और पीस क्लॉज (Peace Clause) विश्व व्यापार संगठन से संबंधित है।

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  • मानव विकास रिपोर्ट UNDP (United Nations Development Programme) द्वरा प्रकाशित की जाती है। वर्ष 1965 में स्थापित UNDP द्वारा वर्ष 1990 में पहली बार मानव विकास रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी।

  • वर्ष 1996 के मानव विकास रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम  (UNDP) द्वारा विकासशील देशों के आर्थिक विकास पथ को  रोजगारविहीन, जड़विहीन, निष्ठुर, आवाजविहीन तथा भविष्यरहित कहा गया। UNDP द्वारा देशों के नीति-निर्माताओं को नीति निर्धारण के समय उक्त तथ्यों की ओर ध्यान देने की अपील भी की गई थी।

  • आसियान (ASEAN Association of South East Asian Nations) दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संघ है।

  • ब्रुनेई वर्ष 1967 मे स्थापित दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के संघ (Association of South- East Asian Nations – ASEAN) का एक सदस्य है।

  • भारत, चीन, ब्राजील एवं अन्य विकासशील देशों द्वारा विश्व व्यापार संगठन से भविष्य में बातचीत करने के लिए बनाए गए समूह को G-77 कहा जाता है। इसकी स्थापना 15 जून, 1964 को हुई थी तथा इसका उद्देश्य विकासशील देशों के आर्थिक हितो का संरक्षण है।

  • रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (Regional Comprehensive Economic Partnership: RCEP) आसियान के दस देशों (ब्रुनेई, म्यांमार,  कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम) और उन छः  देशों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड) जिनके साथ आसियान के पहले से ही एफटीए हैं, के मध्य एक प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है।आर. सी.ई.पी. वार्ता को औपचारिक रुप से नवंबर, 2012 में कंबोडिया में संपन्न आसियान  शिखर सम्मेलन में शुरु किया गया था.

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  • प्रारंभ में जी-7 विश्व के सात औद्योगिक रुप से विकसित गैर-समाजवादी देशों का एक संगठन था जिसमें अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली एवं जापान सम्मिलित थे। बाजारोन्मुखी अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर होने के पश्चात रुस भी इस संगठन का वर्ष 1997 में सदस्य बन गया। अतः इसे जी-8 के नाम से जाना जाने लगा। उल्लेखनीय है कि वर्तमान में रुस की सदस्यता निलंबित होने के कारण इसे पुनः जी-7 कहा जाने लगा है।

  • जी-15 विकासशील देशो में परस्पर सहयोग को बढ़ाने हेतु स्थापित एक अनौपचारिक संगठन है। इसकी स्थापना सितंबर, 1989 में बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में नौवें निर्गुट शिखर सम्मेलन के समय हुई थी। जी-15 का सचिवालय जेनेवा स्थित प्रौद्योगिकी सेवा सुविधा (Technical Service Facility) से संचालित होता है।

  • SAPTA (दक्षिण एशिया अधिमान्य व्यापार व्यवस्था) ढाका में 11 अप्रैल, 1993 को हस्ताक्षरित हुआ तथा यह दिसंबर, 1995 से प्रभावी हुआ।

  • ISLFTA (भारत-श्रीलंका मुक्त व्यापार समझौता) वर्ष 1998 में हस्ताक्षरित हुआ तथा यह मार्च, 2000 से प्रभावी हुआ।

  • SAFTA (दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र) पर जनवरी, 2004 में हस्ताक्षर हुआ था।

  • CECA (भारत और सिंगापुर के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता) पर 29 जून, 2005 को हस्ताक्षर हुआ।

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  • मेकांग-गंगा सहयोग (Mekong- Ganga Cooperation) की स्थापना वर्ष 2000 में विएनतिएन (लाओस) मे की गई। इसका उद्देश्य दो महान नदियों गंगा और मेकांग द्वारा सीमांकित क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग पर आधारित संबंधों की स्थापना करना है। गंगा क्षेत्र से भारत तथा मेकांग क्षेत्र से 5 देशों – कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम द्वारा मेकांग-गंगा सहयोग पहल की शुरुआत की गई है। प्रारंभिक रुप से पारस्परिक सहयोग के चार क्षेत्रों  – संस्कृति, पर्यटन, मानव संसाधन विकास एवं शिक्षा तथा परिवहन एवं संचार की पहचान की गई है।

  • क्षेत्रीय आर्थिक संगठन निर्माण वर्ष

LAFTA                                  –        1960

ASEAN                                 –        1967

APEC                                   –        1989

NAFTA                                 –        1994

  • शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देश चीन, रुस, ताजिकिस्तान, कजाख्स्तान, किर्गिस्तान तथा उज्बेकिस्तान हैं।

  • विश्व की सर्वाधिक बड़ी उदीयमान बाजार अर्थव्यवस्थाओं – ब्राजील, रुस, भारत तथा चीन के समूह को ब्रिक (BRIC) कहते हैं। इस शब्द का प्रतिपादन वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ नील (Jim O’ Neil) ने किया था।

  • अनाज भंडारण अनुसंधान तथा प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना वर्ष 1958 में हापुड़ में की गई थी।

  • सार्क (SAARC – South Asian Association for Regional Cooperation) – इसका गठन 8 दिसंबर, 1985 को किया गया था। इसका मुख्यालय काठमांडू मे है। इसके 8 सदस्य देश हैं – भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और अफगानिस्तान। सार्क के चौदहवें सम्मेलन (अप्रैल, 2007) में अफगानिस्तान को इसका आठवाँ सदस्य देश बनाया गया था।

  • यूनीसेफ, आई.एम.एफ. तथा डब्ल्यू.एच.ओ वैश्विक संस्थाएं हैं जबकि सार्क दक्षिण एशिया के 8 देशों का एक क्षेत्रीय संगठन है।

  • पेट्रोलियम उत्पादक देशों के संगठन (Organisation of Petroleum Exporting Countries – OPEC) – इसकी स्थापना वर्ष 1960 में हुई थी। ओपेक का विशेष बल पेट्रोलियम उत्पादन तथा पेट्रोलियम कीमतों पर नियंत्रण है। वर्तमान में इस संगठन के 14 देश सदस्य हैं – ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब, वेनेजुएला, कतर, लीबिया, इक्वाडोर, संयुक्त अरब अमीरात, अल्जीरिया, नाइजीरिया, अंगोला, इक्वेटोरियल गिनी तथा गैबॉन।

  • भारत में सार्क सम्मेलन सर्वप्रथम 16-17 नवंबर, 1986 के मध्य आयोजित किया गया था। सार्क का प्रथम सम्मेलन वर्ष 1985 में बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुआ था। सार्क का 18वाँ शिखर सम्मेलन नेपाल की राजधानी काठमांडू में 26-27 नवंबर, 2014 के मध्य संपन्न हुआ, जबकि 19वां शिखर सम्मेलन (2016) पाकिस्तान में प्रस्तावित था, जो निरस्त हो गया। 20वां शिखर सम्मेलन वर्ष 2018 में काठमांडू (नेपाल) में हुआ।

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य हैं – चीन, फ्रांस, रुस,  ब्रिटेन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका।

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  • संस्था अवस्थिति

यू.एन.ओ.    –   न्यूयॉर्क

डब्ल्यू.टी.ओ.  –   जेनेवा

आई.एल.ओ.      –   जेनेवा

एफ.ए.ओ.        –   रोम

  • भारतीय विकास फोरम (IDF) को पहले भारत सहायता क्लब के रुप में जाना जाता था।

  • UNSC का तात्पर्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council) से है। इसके 5 स्थायी तथा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। यह संयुक्त राष्ट्र का एक महत्वपूर्ण अंग है।

  • अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक एवं वित्तीय समिति (IMFC: International Monetary and Financial Committee) की स्थापना आई.एम.एफ. बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सुझाव द्वारा किया गया है। आई.एम.एफ. बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को दो मंत्रालयी समितियों तथा अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक एवं वित्तीय समिति (IMFC) एवं विकास समिति द्वारा सलाह प्रदान की जाती है। IMFC में 24 सदस्य हैं। IMFC का प्रमुख कार्य उन सभी मुद्दों जो वैश्विक आर्थिक प्रणाली को प्रभावित करते हैं, पर परिचर्चा करना एवं बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को सलाह देना है। इसकी बैठक वर्ष में दो बार होती है। इसकी बैठकों में विश्व बैंक भी प्रेक्षक की भांति लेता है।

  • क्रिस्टल पुरस्कार (Crystal Awards) विश्व आर्थिक मंच (WEF – World Economic Forum) द्वारा विश्व परिस्थितियों में सुधार की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रतिबध्दता दिखाने वाले कलाकारों को प्रदान किया जाता है।

  • संस्था कार्य

डब्ल्यू.टी.ओ.  –   सामान्यतः व्यापार में मात्रात्मक प्रतिबंधों के उपयोग को निषिध्द करना।

आई.एम.एफ  –   भुगतान संतुलन में असंतुलन को ठीक करने के लिए वित्त प्रदान करना।

सार्क         –   दक्षिण एशियाई देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना।

आई.डी.ए.    –   नम्य ऋणों की स्वीकृति

  • सार्वभौम रुप से महत्वपूर्ण कृषि विरासत प्रणाली (GIAHS: Globally Important Agricultural Heritage System) कार्यक्रम की शुरुआत खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा वर्ष 2002 में वैश्विक कृषि-सांस्कृतिक विरासत के प्रोत्साहन एवं संरक्षण हेतु एक पहल के रुप में की गई थी। इसका प्रमुख लक्ष्य ऐसी कृषि प्रणाली की पहचान करना तथा उसका सहयोग एवं संरक्षण करना है जो जैवविविधता तथा आनुवांशिक संसाधनों , ग्रामीण एवं परंपरागत ज्ञान, संस्कृति तथा उनसे संबंधित परिदृश्यों का संरक्षण एवं पोषण करती हो।

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विविध

  • वर्ष 1995 में कोपेनगेहन (डेनमार्क) में आयोजित सामाजिक विकास के लिए विश्व शिखर सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र ने गरीबी को परम गरीबी (Absolute Poverty) एवं समग्र गरीबी (Overall Poverty) के दो रुपों में परिभाषित किया।

मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं जैसे – भोजन, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता सुविधाएं, स्वास्थ्य आवास, शिक्षा तथा सूचना तक पहुंच से गंभीर रप से वंचित रहने की स्थिति को परम गरीबी के रुप में परिभाषित किया गया है। इसके अतिरिक्त कुपोषण, अस्थायी एवं अपर्याप्त आजीविका, बीमारी की स्थिति, प्रदूषित वातावरण में निवास आदि जैसी  स्थितियों मे होने जिनसे  निर्णयन क्षमता तथा सम्मानजनक नागरिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर दुष्प्रभाव पड़ता है, को समग्र गरीबी के रुप में परिभाषित किया गया है।

  • श्रीमती हंसा मेहता प्रसिध्द समाजसेवी, स्वतंत्रता सेनानी तथा शिक्षाविद् थी। श्रीमती हंसा मेहता ने वर्ष 1947-48 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। वर्ष 1950 में वे इसकी उपाध्यक्ष भी बनी। वर्ष 1958 में वे यूनेस्को की कार्यकारी समिति की सदस्य भी बनी। वर्ष 1979 में श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित ने भी सं.रा. मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

  • भारत में प्रतिस्पर्धा आयोग का गठन प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के तहत 14 अक्टूबर, 2003 को किया गया था।

  • Gujarat Co-Operative Milk Marketing Federation Ltd. (GCMMF) दुग्ध का विपणन करता है, जिसका अमूल उत्पाद प्रसिध्द है।

  • भारत में तेल और प्राकृतिक गैस की खोज खनन के विकास को आगे बढ़ाने के लिए 14 अगस्त, 1956 को तेल एवं प्राक़ृतिक गैस आयोग स्थापित किया गया लेकिन इसे वैधानिक मान्यता अक्टूबर, 1959 में मिली। इसका मुख्यालय देहरादून, उत्तराखंड में है।

  • देश का पहला इन्वेस्टमेंट एवं मैन्युफैक्चरिंग जोन आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में बनने जा रहा है।

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  • रेखी समिति, निर्यात और आयात के सरलीकरण से संबंधित नही बल्कि अप्रत्यक्ष करों से संबंधित है, जिसने अपनी रिपोर्ट वर्ष 1992 में सौंपी थी।

  • गाडगिल समिति रिपोर्ट और कस्तूरीरंगन समिति रिपोर्ट का संबंध पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकीय संरक्षण से है। गाडगिल समिति जिसके अध्यक्ष माधव गाडगिल थे ने अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त, 2011 को जबकि कस्तूरीरंगन समिति जिसे अध्यक्ष के.कस्तूरीरंगन थे, ने अपनी रिपोर्ट 15 अप्रैल, 2013 को प्रस्तुत किया।

  • एम.एम. स्वामीमाथन जो कि उच्च उत्पादन वाले गेहूँ के प्रजाति के विकास के लिए प्रसिध्द हैं, हरित क्रांति से संबंधित है। एल.के. झा जो कि रिजर्व  बैंक के पूर्व गवर्नर रह चुके हैं, अप्रत्यक्ष करों  से संबंधित व्यक्ति हैं। कुरियन भारत मे दुग्ध क्रांति के जनक हैं। जबकि मोरारजी देसाई बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण प्रणाली के लिए प्रसिध्द हैं।

  • दत्त समिति (1969) –    औद्योगिक लाइसेंसिंग

वांचू समिति (1971)       –   प्रत्यक्ष कर

राजमन्नार समिति (1971)  –   केन्द्र-राज्य संबंध

चक्रवर्ती समिति (1985)     –   मौद्रिक प्रणाली

  • सी.डी. देशमुख RBI के गवर्नर होने के साथ वित्त मंत्री भी रहे थे।

  • SEWA (सेल्फ एम्प्लॉयड वीमेंस एसोसिएशन) एक व्यापार संघ है जो वर्ष 1972 से पंजीकृत है। यह गरीब, स्वरोजगार महिला श्रमिकों का एक संगठन है। यह संस्था लघु ऋण देने, स्वास्थ्य और  जीवन  बीमा और बच्चों की  देखभाल के कामों में संलग्न है। इसने लघु ऋण शिखर सम्मेलन, 1997 में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। 18वां लघु ऋण शिखर सम्मेलन 15-17 मार्च, 2016 के मध्य आबू धावी, (संयुक्त अरब अमीरात) में हुआ था।

  • व्यवसाय कार्यरत महिला कंपनी

जिया मोदी               –   AZB & पार्टनर

अनुराधा जे. देसाई         –   वेंकटेश्वर हेचरीज

विल्लू मोरावाला पटेल       –   अवेस्था जेनग्रेन टेक्नोलॉजीस

मीना कौशिक              –   क्वांण्टम मार्केट रिसर्च

  • नीति संबंधी निर्णयों को प्रभावी एवं निर्णायक रुप से प्रभावित करने वले कतिपय व्यक्तियों के समूह को दबाव समूह की संज्ञा से अभिहीत किया जाता है। दबाव समूह को प्रभावित करने वाले कारक हैं – राज्य एवं सरकार का संगठनात्मक स्वरुप, राजनीतिक संस्कृति, राजनीतियों एवं जन सामान्य से अंतर्सबंध।

  • विश्व आर्थिक मंच की स्थापना वर्ष 1971 में हुई थी। इके संस्थापक जेनेवा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर क्लॉस श्वाब थे। वर्ष 1987 तक इसे यूरोपियन मैनेजमेंट फोरम के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1987 से इसे विश्व आर्थिक मंच कहा जाता है। यह एक अलाभकारी संस्था है।

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  • वर्ष 1998 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन (Amartya Sen) को मिला। उन्हें यह पुरस्कार कल्याणकारी अर्थशास्त्र में दिए गए योगदान के लिए मिला।

  • इंडियन इकोनॉमीः गांधीयन ब्लू प्रिंट नामक पुस्तक भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने लिखी थी।

  • श्रीमती एनी बेसेंट द्वारा बनारस (वाराणसी) में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना वर्ष 1915 में की गई थी। यह कॉलेज वर्ष 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय बना, जो  पं. मदन मोहन मालवीय जी के सार्थक प्रयासों का प्रतिफल था।

  • जब भारत को विदेशी बैंको में सोना रखना पड़ा तो उस समय भारत के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर थे।

  • जयंत पाटिल समिति की स्थापना सूखा क्षेत्रों के विकास के लिए की गई थी। इस समिति के अध्यक्ष योजना आयोग के सदस्य डॉ. जयंत पाटिल थे। इस कार्य हेतु 25 वर्षीय भावी योजना तैयार करने के लिए इसे उच्च शक्ति प्रदान की गई थी।

  • शिकागों विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रघुराम जी. राजन की अध्यक्षता में, भारत सरकार ने उच्चस्तरीय समिति का गठन वर्ष 2007 में किय था। यह समिति वित्तीय क्षेत्र में सुधार से संबंधित थी।

  • भारत के कंट्रोलर और ऑडिटर जनरल (CAG) की रिपोर्ट का परीक्षण संसद की लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee) द्वारा किया जाता है। 22 सदस्यों (15 लोक सभा से 7 राज्य सभा से) वाली यह समिति व्यय के बाद परीक्षण करती है तथा अपनी रिपोर्ट संसद को देती है।

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  • विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum-WEF) द्वारा ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट जारी किया जाता है। इसमें निम्नलिखित मापदंड समाहित होते हैं –

  1. आर्थिक भागीदारी और अवसर (Economic Participation and Opportunity)

  2. शैक्षिक उपलब्धियां (Education Attainment)

  3. स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता (Health and Survival)

  4. राजनीतिक सशक्तीकरण (Political Empowerment)

  • भारत का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 उपभोक्ता शिक्षा और संरक्षण के लिए है। इसमें वस्तुओं और सेवाओं की दरों मे छूट की व्यवस्था नही है।

  • व्यापार एवं माल निशान एक्ट (Trade and Merchandise Marks Act) 1958 में पारित किया गया था। इसे माल पर निशान के प्रयोग की धोखाधड़ी के रोकथाम तथा ट्रेड मार्क के बेहतर सुरक्षा और पंजीकरण की सुविधा प्रदान करने के लिए निर्मित किया गया था।

  • पी.ओ.सी.एस.ओ. (POCSO) कानून का संबंध बच्चों से है। इसका पूर्ण रुप है – Protection of Children fro m Sexual Offences.

  • भूमि अधिग्रहण विधेयक लोक सभा में 9 संसोधनों में पारित हुआ था। इस विधेयक का पूरा नाम है – भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2015, यह विधेयक लोक सभा में 24 फरवरी, 2015 को प्रस्तुत हुआ तथा 10 मार्च, 2015 को यह विधेयक पास हुआ।

  • भारत में जैवविविधता संरक्षण की दृष्टि से 12 प्रमुख अधिनियमों के नाम निम्नानुसार हैं –

  1. मत्स्य अधिनियम, 1897

  2. खतरनाक कीट और पिस्सू अधिनियम, 1914

  3. भारतीय वन अधिनियम, 1927

  4. कृषि उत्पाद (ग्रेडिंग और विपणन) अधिनियम, 1937

  5. भारती कहवा अधिनियम, 1942

  6. आयात और निर्यात (नियंत्रण) अधिनियम, 1947

  7. रबर (उत्पादन एवं विपणन) अधिनियम, 1947

  8. चाय अधिनियम, 1953

  9. खनन एवं खनिज विकास (नियमन) अधिनियम, 1957

  10. प्रिवेंशन ऑफ क्रेएल्टी टू एनिमल एक्ट, 1960

  11. सीमा शुल्क अधिनियम, 1962

  12. इलायची अधिनियम, 1965

  • वर्ष 1957 मे भारत सरकार ने पेटेंट कानून में संशोधन के प्रश्न का परीक्षण करने तथा सरकार को तदनरुप सुझाव देने हेतु न्यायमूर्ति एन.आर. अयंगर समिति नियुक्ति की थी। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर लोक सभा में 21 सितंबर, 1965 को बिल पेश किया गया जो हालांकि व्ययगत हो गया। वर्ष 1967 में एक संशोधित बिल पेश किया गया जिसे संयुक्त संसदीय समिति को प्रेषित किया गया था एवं समिति की अंतिम अनुशंसा के आधार पर पेटेंट अधिनियम, 1970 पारित किया गया। वर्ष 1970 के अधिनियम के अधिकांश प्रावधान 20 अप्रैल, 1972 को पेटेंट नियम, 1972 के प्रकाशन के साथ ही प्रभावी हुए।

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  • इनर्जी स्टैटिस्टिक्स नामक प्रकाशन को सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO- Central Statistical office) वार्षिक आधार पर प्रकाशित करता है।

  • गाडगिल-मुखर्जी फॉर्मूले के अंतर्गत अधिकतम भार जनसंख्या (1971) को दिया जाता है, जो कि 60% है।

  1. 60% 1971 की जनसंख्या के आधार पर

  2. 25% प्रति व्यक्ति आय के आधार पर

  3. 5% कर प्रयास एवं राजकोषीय प्रबंधन के आधार पर

  4. 5% विशिष्ट समस्याओं के आधार पर

  • राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवं नीति अनुसंधान केन्द्र (National Centre for Agricultural Economics and Policy Research- NACP), नई दिल्ली में स्थित है। इसकी स्थापना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा वर्ष 1991 में की गई थी।

  • राष्ट्रीय लैंड यूज एंड कंजर्वेशन बोर्ड का गठन वर्ष 1983 में किया गया था, जिसे वर्ष 1985 में राष्ट्रीय लैंड रिसोर्सेज कंजर्वेशन एंड डेललपमेंट कमीशन कर दिया गया। इस आयोग की सर्वप्रमुख जिम्मेदारी खेती योग्य भूमि की पहचान एवं उसके विकास के साथ देश की भूमि के समुचित उपयोग हेतु नीतियां बनाना है।

  • सैमसंग कॉर्पोरेशन तथा एलजी दोनों ही भारत में कार्यरत बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं जबकि हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड उपभोक्ता वस्तु निर्माता भारतीय कंपनी जिसका मुख्यालय मुंबई में स्थित है।

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  • वर्ष 1947 में केन्द्रीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान की स्थापना कोचीन में की गई थी। केन्द्रीय भेड़ प्रजनन फार्म हरियाणा हिसार में स्थित है। राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान वर्ष 1923 में बंगलुरु में स्थापित किया गया, जिसे वर्ष 1955 में करनाल स्थानांतरित कर दिया गया।

  • राष्ट्रीय विकलांग वित्त एवं विकास निगम (NHFDC) की स्थापना सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 24 फरवरी, 1997 को किया गया। इसकी प्राधिकृत अंश पूंजी 400 करोड़ रुपये है। इसका उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के लाभार्थ आर्थिक विकास संबंधी क्रियाकलापों को बढ़ावा देना तथा विकलांग व्यक्तियों के लाभ/आर्थिक पुनर्वास के लिए अन्य उपक्रमों एवं स्वरोजगार को प्रोत्साहन देना है।

  • राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी की स्थापना एक स्वायत्तशासी सोसाइटी के रुप में जुलाई, 1982 में की गई थी। वर्ष 1990 में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के हिमालय नदी विकास घटक के कार्यों को भी राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण को सौंप दिया गया था।

  • भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान (Entrepreneurship Development Institute of India) अहमदाबाद (गुजरात) मे स्थित है। इसकी स्थापना एक स्वायत्त एवं गैर-लाभ संस्थान के रुप में वर्ष 1983 में की गई थी।

  • BMW A.G. का मुख्यालय म्यूनिख (Munich), जर्मनी में स्थित है। Daimler S.A. का मुख्यालय फ्रांस में तथा Volkswagen A.G. का मुख्यालय जर्मनी में स्थित है।

  • राष्ट्रीय उद्यमिता एवं लघु व्यवसाय विका संस्थान, नोएडा (उ.प्र.) में स्थित है। यह संस्थान सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के अंतर्गत एक शीर्ष संस्था है, जो विशेष रुप से लघु उद्योग और लघु व्यवसाय के उद्यमिता विकास में लगे हुए विभिन्न संस्थानों/एजेंसियों की गतिविधियों के समन्वय और निगरानी के लिए कार्यरत हैं। भारत सरकार द्वारा गठित यह संस्थान सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत एक सोसाइटी के रुप में पंजीकृत है। यह संस्थान 6 जुलाई, 1983 से कार्यरत है।

  • खादी एवं ग्रामीण उद्योग कमीशन का मुख्यालय मुंबई में है। इसका गठन वर्ष 1956 में किया गया था। यह आयोग भारत सरकार का एक सांविधिक निकाय है जो सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। इसके छः जोनल ऑफिस दिल्ली, भोपाल, बंगलुरु, कोलकाता, मुंबई और गुवाहाटी में हैं।

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  • विद्यांजलि मानव विकास मंत्रालय की एक पहल है, जिसके तहत निजी क्षेत्र और समुदाय की सहायता लेकर सरकारी विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाया जाएगा। इसके तहत व्यक्तिगत स्तर पर, सेवानिवृत्त शिक्षक, सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी/कर्मचारी आदि तथा अन्य कोई भी व्यक्ति और संस्थान स्तर पर सरकारी, अर्धसरकारी अथवा कोई भी निजी संस्थान शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हेतु अपना योगदान (शिक्षण, खेलकूद एवं अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में योगदान) दे सकता है।

  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय और भारत भवन भोपाल (म.प्र.) मे स्थित है।

  • उन्नत भारत अभियान ग्रामीण विकास से संबंधित है। इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों को ग्रामीण विकास क्रिया-कलापों से संबंध्द कर ग्रामीण विकास की चुनौतियों को दूर करने की रणनीति बनाई गई है। इस हेतु मानव विकास संसाधन विकास मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा पंचायती राज मंत्रालय के मध्य़ एक समझौता भी किया गया है। ज्ञातव्य है कि ग्रामीण रणनीति के निर्माण में उच्च शिक्षा संस्थानों की सहभागिता से विकास योजनाओं की दक्षता एवं सहभागिता में वृध्दि होगी।

  • 24 अक्टूबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मंत्री मोदी ने वाराणसी में ऊर्जा गंगा गैस पाइप लाइन परियोजना का शिलायन्यास किया। ऊर्जा गंगा परियोजना के अंतर्गत 2540 किमी. लंबी जगदीशपुर-हल्दिया एवं बोकारो-धामरा प्राकृतिक गैस पाइप लाइन (JHBDPL) का निर्माण किया जाना है। यह परियोजना पूर्ण होने पर उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, ओड़िशा तथा झारखंड राज्य को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने में सुविधा होगी।

  • ग्रामीण विकास मंत्रालय के हरियाली कार्यक्रम (1 अप्रैल, 2003 से जारी दिशा-निर्देशों के तहत) का संबंध जल संचयन प्रबंधन कार्यक्रम के समर्थन से है। एकीकृत जल संभर प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP) के तहत आने वाले इस कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न स्रोतों से प्राप्त पानी को रोकने और हरियाली बढ़ाने के उपाय किए जा रहे हैं।

  • 5 नवंबर, 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता मे केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने विद्युत मंत्रालय द्वारा पेश की गई योजना उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना या उदय (UDAY) योजना को अपनी मंजूरी प्रदान की। उदय  योजना का कार्यान्वयन विद्युत मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है। यह योजना  भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही है। उदय योजना को अपनाना राज्यों के लिए स्वैच्छिक है। इस योजना का लक्ष्य बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) का वित्तीय सुधार एवं पुनरुत्थान करना तथा उनकी समस्याओं का स्थायी और टिकाऊ समाधान सुनिश्चित करना है।

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  • डिजीलॉकर (Digilocker) या डिजिटल लॉकर डिजिटल इंडिया के तहत एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके अंतर्गत लोगों के दस्तावेजों/प्रमाण-पत्रों (उदाहरण – निर्वाचन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, स्कूल प्रमाण-पत्र आदि) के लिए डिजिटल लॉकर उपलब्ध कराया जाता है, जिससे इन दस्तावेजों तक हमेशा पहुंच को सुनिश्चित किया जा सके। इसके अंतर्गत नागरिकों को आधार संख्या से संबंध्द वेब स्पेस उपलब्ध कराया जाता है जिससे दस्तावेजों (स्केन कॉपी अथवा संस्थान से स्वतः प्राप्त) को रखा जा सकता है। यह कागज रहित शासन की स्थापना की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

  • प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजनांतर्गत पांच मूलभूत सेवाओं-प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, प्राथमिक शिक्षा, ग्रामीण आवास, पोषण तथा पेयजल को रखा गया है। जिससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगो के जीवनस्तर को सुधारा जा सके। ग्रामीण विद्युतीकरण को इसमें एक सहायक सेवा के रुप में (ने कि मूलभूत) बाद में जोड़ा गया। विद्युत उत्पादन, ट्रांसमिशन एवं वितरण में शतप्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति है। पुनः केन्द्रीय विद्युत मंत्रालय ने  आंध्र प्रदेश, असम, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और  प. बंगाल इन 14 राज्यों  के साथ समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

  • ई-चौपाल भारत की प्रथम बहुराष्ट्रीय कंपनी T.C. (Indian Tobacco Company) द्वारा प्रारंभ इंटरनेट आधारित ग्रामीण परियोजना है। भारत में इसका प्रारंभ जुलाई, 2000 से मध्य प्रदेश राज्य में हुआ था। इस परियोजना को संयुक्त राष्ट्र के शताब्दी विकास लक्ष्यों के समर्थन में स्थापित वर्ल्ड बिजनेस अवॉर्ड का प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है।

  • सेमफेक्स, भूतपूर्व सैनिकों को ऋण प्रदान करने हेतु रक्षा मंत्रालय द्वारा घोषित योजना है। राजस्थान में राजस्थान वित्त निगम (RFC) इस योजनांतर्गत ऋण प्रदान करता है।

  • भाखड़ा-नांगल हरियाणा, पंजाब और राजस्थान राज्यों की संयुक्त परियोजना है। इसके तहत भाखड़ा एवं नांगल में सतलज नदी पर दो बांध बनाए गए हैं जिनके माध्यम से जलविद्युत और सिंचाई आदि की व्यापक व्यवस्था की गई है। यह भारत की सबसे  बड़ी बहुद्देश्यीय परियोजना है।

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  • स्वर्णिम चतुर्भुज (Golden Quadrilateral) एक राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2001 में हुई थी। इसके माध्यम से देश के चार प्रमुख महानगरों (दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता) को सड़क मार्ग द्वारा जोड़ना था। इसकी कुल लंबाई 5846 किमी. है।

  • देश में सबसे अधिक सूती वस्त्र पावरलूम सेक्टर में तैयार किया जाता है। इस क्षेत्र का देश के कुल कपड़ा उत्पादन में 60 प्रतिशत से अधिक का योगदान है। इसके बाद क्रमशः होजरी सेक्टर, हैंडलूम सेक्टर तथा मिल सेक्टर का योगदान है।

  • ब्रिटिश पेट्रोलियम द्वारा जारी विश्व ऊर्जा सांख्यिकीय के अनुसार सर्वाधिक तेल कोश वाला देश वेनेजुएला (300.9 बिलियन बैरल) है। संपूर्ण विश्व तेल भंडार में इसकी हिस्सेदारी 17.6% है। इसके पश्चात सूदी अरब (15.6%), कनाडा (10%), ईरान (9.3%) तथा इराक (9.0%) सर्वाधिक तेल कोश वाले देश हैं।

  • बाजार एक आर्थिक प्रवृत्ति है जो उपभोक्तावाद की ओर रुझान पैदा करती है। उपभोक्तावाद पूंजीवाद का ही एक रुप है।

  • पूर्तिपक्ष अर्थशास्त्र से तात्पर्य वस्तुओं की आपूर्ति (उत्पादन) करने वालों अर्थात उत्पादकों के आर्थिक दृष्टिकोण के अध्ययन से है।

  • वस्तु की मांग तथा वस्तु की कीमत में समानुपात, जबकि वस्तु की पूर्ति तथा वस्तु की कीमत में व्युत्क्रमानुपात होता है। अतः सामान्य बाजार और  सामान्य वस्तु के संदर्भ में यदि स्थिर मांग के साथ आपूर्ति में वृध्दि हो, तो कीमत घटने की संभावना होगी। इस संदर्भ में कुछ स्थितियां निम्नलिखित हैं –

  1. यदि मांग बढ़ती है तथा पूर्ति स्थिर रहती है तो कीमत बढ़ेगी।

  2. यदि मांग घटती है तथा पूर्ति स्थिर रहती है तो कीमत घटेगी।

  3. यदि पूर्ति घटती है तथा मांग स्थिर रहती है तो कीमत बढ़ेगी।

  • एक ऐसा बाजार जहां विक्रेता, क्रेता से अधिक होते हैं, क्रेता का बाजार कहलाता है। इस बाजार में पूर्ति मांग से अधिक होगी फलस्वरुप वस्तुओं के मूल्य कम होंगे।

  • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव या वन बेल्ट एंड वन रोड (OBOR: One Belt and One Road) पहल, जनवादी गणराज्य चीन का एक आर्थिक-रणनीति एजेंडा है। इसके माध्यम से चीन से यूरोप, अफ्रीका और ओसेनिया से जोड़ने हेतु अनेक कदम उठाए जा रहे हैं। इस पहल के दो भाग (Component) हैं –

  1. पहला भूमि आधारित सिल्क रोड आर्थिक पेटी (SREP: Silk Road Econimics Belt)

  2. दूसरा समुद्र आधारित मैरीटाइम सिल्क रोड (MSR: Maritime Silk Road)

  • गांधी अर्थव्यवस्था न्यासिता (Trusteeship) के सिध्दांत पर आधारित है। उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 को संविधान की नवीं अनुसूची में शामिल कर (प्रविष्टि 11) इसे न्यायिक उन्मुक्ति प्रदान की गई है। भारतीय नागरिकों की मतदान आय को 61वें संविधान संशोधन, 1988 में 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई थी। शेतकारी संगठन का गठन शरद जोशी ने वर्ष 1979 में महाराष्ट्र में किया था।

  • यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (USOF) का संबंध टेलीकॉम कंपनियों के देयताओं के समायोजन से है।

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  • भारत को कुल 9 पिन (PIN- Postal Index Number) क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। इनमें 8 पिन क्षेत्र भारत के राज्यों/संघीय क्षेत्रों सें संबंधित है। और 9वां पिन क्षेत्र आर्मी पोस्ट ऑफिस (APO) और फील्ड पोस्ट ऑफिस (FPO) के लिए है।

  • यमुना एक्सप्रेस-वे को ताज एक्सप्रेस-वे के नाम से भी जाना जाता है। 165 किमी. लंबा यह मार्ग उत्तर प्रदेश के दो शहरों ग्रेटर नोएडा एवं आगरा को जोड़ता है।

  • गैर-घरेलू गैस सिलेंडरों में भरी एल.पी.जी. का भार 19.0 किग्रा. होता है। जबकि घरेलू गैस सिलेंडरों में 14.2 किग्रा. एल.पी.जी. होती है।

  • राजस्थान की भौगोलिक पर्यावरण स्थिति तथा संस्कृति को दृष्टि में रखते हुए पर्यटन क्षेत्र को स्वाभाविक नीतिगत प्रमुखता देनी चाहिए ताकि दूरगामी सतत, समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके।

  • वर्ष 1995 में प्रिया एक्जीबिटर प्राइवेट लिमिटेड और विलेज रोड शो लिमिटेड ने मिलकर वर्ष 1997 में साकेत में प्रथम PVR मल्टीप्लेक्स लांच किया। PVR सिनेमा का पूरा नाम प्रिया विलेज रोड शो है।

  • तेल का एक बैरल 42 अमेरिकी गेलन या 158.9873 लीटर (लगभग 159 लीटर) के बराबर होता है।

  • इको मार्क उन भारतीय उत्पादों को दिया जाता है जो पूर्णतः पर्यावरण के लिए अनुकूल हैं। इसकी शुरुआत वर्ष 1991 से की गई थी। इसका लोगो एक मिट्टी का बर्तन है।

  • अदम्य चेतना ट्रस्ट (बंगलुरु), हैवल्स इण्डिया लि., हिन्दुस्तान जिंक लि. एवं डी. एस. एल. कोटा (श्रीराम ग्रुप) आदि ट्रस्ट/कार्पोरेट राजस्थान में मिड- डे मील योजना से संबंधित है।

  • भारतीय पर्य़टन के संदर्भ में स्वर्ण त्रिभुज में आगरा, दिल्ली एवं जयपुर सम्मिलित हैं। मानचित्र पर दिल्ली, आगरा एवं जयपुर द्वारा त्रिभुज का आकार निर्मित करने के कारण यह नाम दिया गया है।

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  • मध्यकालीन विजयनगर साम्राज्य में भू-राजस्व विभाग को अथावाना कहते थे। विजयनगर साम्राज्य में एक कुशल भू-राजस्व प्रणाली लागू थी, जिसके अंतर्गत भू-धारितों का वर्गीकरण (जलमग्न भूमि, असिंचित भूमि, बगीचा इत्यादि) कर उस हिसाब से इन भूमियों पर लगान आरोपित किया जाता था।

  • एगमार्क (AGMARK) एक प्रामाण चिन्ह है जो भारत में कृषि/खाद्य उत्पादों पर लगाया जाता है। ये उत्पाद भारत सरकार के विपणन तथा निरीक्षण निदेशालय द्वारा निर्धारित मानकों पर खरे उतरते हैं। एगमार्क का उपयोग कृषि उत्पाद अधिनियम, 1937 के अधीन किया जाता है। ध्यातव्य है कि इसे वर्ष 1986 में संशोधित कर दिया गया है।

  • विकसित और आर्थिक रुप से पिछड़े हुए राज्यों का सह-अस्तित्व तथा प्रत्येक राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति की दृष्टि से भिन्नता को ही क्षेत्रीय विषमता कहते हैं। जहां एक ओर पंजाब, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, प. बंगाल, केरल, तमिलनाडु आर्थिक दृष्टि से अग्रगामी राज्य हैं, वहीं मध्य प्रदेश, असम, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओड़िशा, बिहार आदि आर्थिक दृष्टि से पिछड़े राज्य हैं।

  • विश्व के जल संसाधनों का लगभग 4.0% भारत के पास उपलब्ध है।

  • कमैया प्रणाली, नेपाल में अनुबंधित श्रमिकों की एक प्रणाली है, जो नेपाली सरकार द्वारा समाप्त घोषित किए जाने के बावजूद मंत्रियों एवं नौकरशाहों द्वारा बदस्तूर जारी है।

  • नेटमीटरिंग (Net Metering) एक बिलिंग प्रणाली (Billing Mechanism) है जिसके तहत अपनी छत पर सोलर प्लांट से बनाई हुई बिजली की ग्रिड को बेचकर उसके बदले में क्रेडिट प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए सोलर प्लांट के साथ एक मीटर लगाया जाता है। यह मीटर बिजली वितरण कपनी की तरफ से दिया जाता है जिसे डिस्कॉम कनेक्शन के साथ जोड़ दिया जाता है। सोलर प्लांट में कितनी बिजली बनी, कितनी खपत हुई और कितनी ग्रिड में गई, मीटर में सबका हिसाब होता है। इससे यह भी हिसाब होता है कि उपभोक्ता ने डिस्कॉम से कितनी बिजली ली। अर्थात नेट मीटरिंग से बिल तो कम होता ही है बेची गई बिजली से कमाई भी होती  है।

  • वैश्वीकरण का संबंध विदेशी निवेश एवं वृहद कंपनियों से है। अतः छोटे उद्यमियों का इसके प्रति आशावान होना तर्कसंगत नही है।

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  • दृष्टि 2025 का संबंध खाद्य उत्पादन में वृध्दि से है।

  • अभीष्ट राष्ट्रीय निर्धारित अंशदान (INDC: Intended Nationally Determined Contribution) का संबंध जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्ययोजना से है। इस पद का प्रयोग जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के अंतर्गत हरित गृह गैसों के उत्सर्जन को कम कर ने के संदर्भ में किया जाता है। उल्लेखनीय है कि पेरिस में आयोजित (CoP-21)में हुए पेरिस समझौते के तहत इस सदी के अंत तक औसत तापमान वृध्दि को अधिकतम 20C तक के स्तर पर रोकने हेतु सभी देशों को अपने घरेलू हरित गृह गैसों के उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य प्रस्तुत करना है,  इसी को INDC कहा जाता है।

  • ISO-14001 एक अंतर्राष्ट्रीय प्रमाण-पत्र है जो पर्यावरण प्रबंध प्रणाली प्रमाणन योजना है। यह प्रमाण-पत्र ऐसी औद्योगिक इकाइयों को ही प्रदान किया जाता है जो पर्य़ावरण संरक्षण तथा पर्य़ावरण संरक्षण तथा पर्यावरण संबंधी कानूनों को लागू करती हैं।

  • सरकार ने संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013, 10 सितंबर, 2013 को अधिसूचित किया है। जिसका उद्देश्य एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए लोगों को वहनीय मूल्यों पर अच्छी गुणवत्ता के खाद्यान्न की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराते हुए उन्हें मानव जीवन चक्र दृष्टिकोण में खाद्य और पौषणिक सुरक्षा प्रदान करना है। इस अधिनियम के लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत राज्य सहायता प्राप्त खाद्यान्न प्राप्त करने के लिए 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 50 प्रतिशत शहरी आबादी को दायरे में लाने का प्रावधान है। इस प्रकार कुल 67 प्रतिशत आबादी को इसके दायरे में लाया जाएगा।

  • वेब पोर्टल DACNET ई-एग्रीकल्चर से संबंधित है। कृषि एवं सहकारिता विभाग की यह एक ई-गवर्नेंस परियोजना है, जिसे कृषि ऑनलाइन की सुविधा के लिए ग्रामीण सूचना विज्ञान केन्द्र (NIC) द्वारा निष्पादित किया जा रहा है।

  • समिति संबंधित

चक्रवर्ती समिति    –   वित्तीय क्षेत्र सुधार

नरसिंहम समिति   –   बैंकिंग क्षेत्र सुधार

तेंदुलकर समिति   –   निर्धनता आकलन

चेलैया समिति     –   कर सुधार

  • लुप्त होती महिलाएं का विचार अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन द्वारा दिया गया। इन्होंने वर्ष 1990 मे यूरोप और एशिया में लिंगानुपात की तुलना करते हुए यह विचार दिया था।

  • भ्रष्टाचार, आर्थिक विकास में अवरोधक का काम करता है। इसका आर्थिक विकास में कोई योगदान नही होता है।

  • क्लासिकल स्कूल के अर्थशास्त्रियों जिसमें एडम स्मिथ, रिकॉर्डों, मिल, मार्शल, जे.वी. से, पीगू आते हैं, ने अर्थव्यवस्था में सरकार के हस्तक्षेप को अस्वीकार करते हुए, बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का प्रबल समर्थन किया था।

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  • क्षतिपूर्ति या हर्जाने से अभिप्राय किसी नुकसान, हानि और चोटिल/बीमार  होने की स्थिति में उस राशि की पूर्ति करना है। गैर-जीवन बीमा पॉलिसी जैसे- हेल्थ, मोटर आदि बीमा पॉलिसी क्षतिपूर्ति के आधार पर काम कती है। इसके तहत बीमाकृत संपत्ति को हुए नुकसान को कवर प्रदान किया जाता है।

  • जब कुल उत्पाद स्थिर होता है, तो सीमांत उत्पादन शून्य होता है। ऐसी अवस्था में कुल उत्पाद अपने उच्चतम स्तर पर भी पहुंच जाता है।

  • भ्रष्टाचार, आर्थिक विकास में अवरोधक का काम करता है। इसका आर्थिक विकास में कोई योगदान नही होता है।

  • एडम स्मिथ एक स्कॉटिश दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री थे। उन्हें आधुनिक अर्थशास्त्र और पूंजीवाद का जनक कहा जाता है।

  • अर्थशास्त्र, कौटिल्य द्वारा रचित राजनीतिशास्त्र की पुस्तक है।

  • 2 मई, 2009 को आर्थिक विकास संस्थान में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर बीना अग्रावाल को नियोनटिफ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

  • सुपर बाजार एक प्रकार का फुटकर विक्रय संगठन होता है। यहां विभिन्न प्रकार की विस्तृत उत्पाद श्रृंखला मौजूद होती है।

  • पुस्तक Planning and the Poor बी.एस. मिनहास के द्वारा लिखी गई है।

  • 1776 ई. में प्रकाशित पुस्तक एन इंक्वाय़री इन टू द नेचर एंड कॉलेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशंस के लेखक स्कॉटलैंड के विख्यात अर्थशास्त्री एडम स्मिथ थे। यह क्लॉसिकल अर्थशास्त्र की मूलभूत पुस्तक मानी जाती है।

  • पूंजी का संग्रहण (The Accumulation of Capital) पुस्तक की लेखिका श्रीमती जॉन राबिन्सन हैं। मूल रुप से वर्ष 1956 में प्रकाशित यह पुस्तक दीर्घावधि में विकास और पूंजी संचय क्या निर्धारित करता है, के प्रश्न को एक गतिशील दृष्टिकोण प्रदान करता है।

  • बंदी की द्वीधा (Prisoner’s Dilemma) खेल या क्रीड़ा सिध्दांत (Game, Theory) के अंतर्गत एक समस्या के रुप में जाना जाता है खेल सिध्दांत अर्थशास्त्र का एक सिध्दांत है। जिसका प्रतिपादन जॉन वान न्यूमैन एवं आस्कर मोर्गस्टन ने किया था।

  • ट्रस्टीशिप की अवधारणा महात्मा गांधी ने प्रस्तुत की थी।

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  • समिति             वर्ष

स्थानीय वित्त जांच समिति   –   1949-51

कराधान जांच आयोग       –   1953-54

ग्रामीण-शहरी संबंध समिति  –   1963-66

शहरीकरण पर राष्ट्रीय आयोग    –    1985-88

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जनसांख्यिकी

भारत – जनसंख्या

  • वर्ष 2011 की भारत की जनगणना के लिए आदर्श वाक्य अवर सेन्सस, अवर फ्यूचर (हमारी जनगणना, हमारा भविष्य) का उपयोग किया गया था। वर्ष 2011 की जनगणना देश की 15वीं राष्ट्रीय जनगणना थी।

  • जनसांख्यिकीय संक्रमण एक ऐसा सिध्दांत है जो समय के साथ-साथ जनसंख्या में हुए परिवर्तन को दर्शाता है। यह सिध्दांत अमेरिकी जनसांख्यिकीविद वॉरेन थाम्पसन द्वारा वर्ष 1929 मे विकसित जनांकिकीय इतिहास की व्याख्या पर आधारित है। यह जनसंख्या वृध्दि के उन चारों स्तरों को स्पष्ट रुप से परिभाषित करता है जो राष्ट्रों में उनके सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ आगे-पीछे गुजरते हैं।

प्रथम चरण – यह चरण विशिष्ट रुप से अल्प विकसित देशों में देखने को मिलता है। जहां उच्च जन्म दर के साथ मृत्यु दर भी उच्च होती है, जिसके कारण जनसंख्या स्थिर हो जाती है।

द्वीतीय चरण – विकास की प्रक्रिया के साथ जन्म दर तो ऊंची होती है किंतु बेहतर भोजन आपूर्ति तथा उन्नत जनस्वास्थ्य की सुविधाओं के कारण मृत्यु दर निम्न हो जाती है।

तृतीय चरण – इस चरण में जन्म दर भी कम हो जाती है। लेकिन जनसंख्या निरंतर बढ़ती जाती है क्योकि पूर्व की पीढ़ियों की उच्च जनन क्षमता के कारण जनन आय समूह में बहुत अधिक संख्या में लोग होते हैं।

चतुर्थ चरण – निम्न जन्म दर और निम्न मृत्यु  दरों के साथ लेकिन उच्चतर सामाजिक और आर्थिक विकास के स्तर के साथ एक बार फिर स्थिर जनसंख्या को प्राप्त कर लेते हैं। इसमें यद्यपि जनसंख्या तो स्थिर होती है तथापि पहले चरण में अधिक।

  • स्थायी जनसंख्या संरचना की स्थिति में जन्म दर तथा मृत्यु दर दोनों ही नियंत्रित तथी नीची दर पर बनी रहती है अर्थात दोनों ही परिवर्तन समान दर पर होता है जिससे जनसंख्या वृध्दि की दर स्थिर बनी रहती है।

  • माल्थस ने अपने जनसंख्या सिध्दांत में यह प्रतिपादित किया कि उत्पादन अंकगणितीय क्रम (1, 2, 3, 4………..) में बढ़ता है जबकि जनसंख्या ज्यामितीय क्रम (1, 2, 4, 8, 16……) में बढ़ती है।

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  • रहन-सहन का स्तर जनसंख्या की जनांकिकीय विशेषताओं का हिस्सा नही है। जनसंख्या की जनांकिकीय विशेषताओं में जनंख्या का घनत्व, लिंगानुपात, ग्रामीण-शहरी जनसंख्या, साक्षरता, आयु संरचना और जीवन प्रत्याशा मुख्य रुप से सम्मिलित किए जाते हैं।

  • भारत में जनसंख्या की तीव्र वृध्दि दर एक समस्या है। इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 70 के दशक में इस दिशा में किए गए प्रयासों की आलोचना के कारण आगे अन्य किसी भी सरकार ने इस दिशा में प्रयास नही किया। भारत में बन्ध्याकरण के प्रति लोगों की अनिच्छा के कारक (Factor) संरचनात्मक हैं, जिसमें उच्च  शिशु मृत्यु दर, गरीबी, अशिक्षा, अज्ञानता, लड़के की इच्छा, धार्मिक विश्वास, मनोरंजन के साधनों की कमी आदि प्रमुख हैं।

  • अंग्रेजों के शासनकाल में आधुनिक प्रणाली की सर्वप्रथम जनगणना लॉर्ड मेयो के शासनकाल में वर्ष 1872 ई. में कराई गई थी, किंतु जनगणना का क्रमवार आकलन अर्थात प्रथम नियमित जनगणना वर्ष 1881 ई. में लार्ड रिपन के शासनकाल से मानी जाती है।

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 2001-2011 के दशक में जनसंख्या वृध्दि दर 17.64% रही, जबकि वर्ष 2001 तथा 1991 की जनगणना में जनसंख्या वृध्दि दर क्रमशः 21.54% तथा 23.87% थी। वर्ष 2001 की जनगणना में भारत की जनसंख्या 1028.73 मिलियन थी, जो वर्ष 2011 की जनगणना में बढ़कर 1210.85 मिलियन हो गई।

 

2011

2011

दशकीय वृध्दि दर (2001-2011)

अनंतिम आंकड़े

17.64%

अंतिम आंकड़े

17.7%

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  • भारत की जनसंख्या में सर्वाधिक प्रतिशत बदलाव वर्ष 1971 में देखने को मिला था।  इस समय दशकीय वृध्दि दर 24.80 प्रतिशत थी। जबकि वर्ष 1981 में 24.66 प्रतिशत, वर्ष 1991 में 23.87 प्रतिशत तथा 2001 में 21.54 प्रतिशत थी। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, दशकीय वृध्दि दर 17.7 प्रतिशत है।

  • वर्ष जनसंख्या (मिलियन में)

1951   –   361.08

1961   –   439.23

1971   –   548.16

1981   –   683.33

1991   –   846.42

2001   –   1028.74

2011   –   1210.85

 

  • बीसवीं सदी की शुरुआत (वर्ष 1901) में भारत का जनसंख्या घनत्व 77 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर था जो निरंतर बढ़ते हुए वर्ष 2011 में 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो गया है। इस प्रकार भारत का जनसंख्या घनत्व निरंतर बढ़ा है।

  • 2011 की जनगणना में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के अतिरिक्त अन्य जातियों को सम्मिलित करने संबंधी मसले पर विचार करने हेतु तत्कालीन केन्द्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में मंत्रियों के समूह (GoM) का गठन किया गया था जिसने इस संदर्भ में अपनी सहमति प्रदान की।

  • भारत की 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत की जनसंख्या 1210854977 है, जिसमें पुरुषों की जनसंख्या 623270258 व महिलाओं की जनसंख्या 587584719 है। भारत का जनंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. तथा लिंगानुपात 943 (प्रति हजार पुरुषों पर महिलाएं) हैं।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, सर्वाधिक दशकीय वृध्दि दर वाला राज्य मेघालय (27.9 प्रतिशत) है।

  • 2011 की जनगणना के अनंतिम एवं अंतिम आंकड़ों के अनुसार, सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश (199812341) है। इस संदर्भ में महाराष्ट्र (112374333) का दूसरा स्थान है।

  • जनसंख्या 2011 के अंतिम आंकड़ों के आधार पर शीर्ष 5 राज्यों का अवरोही क्रम निम्न प्रकार है –

उत्तर प्रदेश > महाराष्ट्र > बिहार > प. बंगाल > आंध्र प्रदेश

  • जनसंख्या 2011 के अंतिम आंकड़ो के अनुसार, 307713 वर्ग किमी. क्षेत्रफल के साथ महाराष्ट्र का राजस्थान (342239 वर्ग किमी.) एवं मध्य प्रदेश (308252 वर्ग किमी.) के बाद क्षेत्रफल की दृष्टि से तीसरा स्थान है जबकि जनसंख्या की दृष्टि से 112374333 व्यक्तियों के साथ उत्तर प्रदेश (199812341) के बाद दूसरा स्थान है।

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  • राज्य जनसंख्या (2011)

उत्तर प्रदेश    –   199812341

महाराष्ट्र     –   112374333

बिहार        –   104099452

पश्चिम बंगाल –   91276115

आंध्र प्रदेश    –   84580777

कर्नाटक      –   61095297

मध्य प्रदेश   –   72626809

तमिलनाडु    –   72147030

ओड़िशा      –   41974218

 

  • जनगणना 2011 के अनुसार, भारत की लगभग 9% (104099452) जनसंख्या बिहार में निवासित है।

  • भारत में जनसंख्या की उच्चतम वृध्दि दर (24.80%) 1961-71 के दौरान थी।

  • 2001-2011 के मध्य नगालैंड राज्य में जनसंख्या वृध्दि नकारात्मक (-0.6%) रही है। इस अवधि में गोवा में जनसंख्या वृध्दि 8.2%, केरल में 4.9% और कर्नाटक में 15.6% रही है।

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  • 2011 की जनगणना के अनुसार, जनसंख्या की सर्वाधिक दशकीय वृध्दि दर वाले 5 राज्यों का क्रम है – मेघालय > अरुणाचल प्रदेश > बिहार > जम्मू-कश्मीर > मिजोरम

  • भारतीय जनगणना के इतिहास में वर्ष 1921 ही एकमात्र ऐसा जनगणना वर्ष रहा है जिसमें जनसंख्या की दशकीय वृध्दि दर ऋणात्मक (-0.31%) रही, इसलिए 1921 को महान विभाजन का वर्ष (Year Of Great Divide) कहा जाता है।

  • भारत की जनसंख्या में सर्वाधिक औसत वार्षिक घातीय व़ृध्दि दर (2.22%) 1971-81 के दशक में दर्ज की गई थी। जबकि 2001-2011 के दशक में औसत वार्षिक घातीय वृध्दि दर 1.64% दर्ज की गई।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत का अधिकतम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य बिहार (1006 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी.) तथा न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य अरुणाचल प्रदेश (17 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी.) है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, लक्षदीप की जनसंख्या 64429 (अंतिम आंकड़ो के अनुसार 64473) है जो भारत में सबसे निम्न है। सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व नई दिल्ली NCT (11297, अंतिम आंकड़ों के अनुसार 11320) में पाया जाता है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, सर्वाधिक जनसंख्या  घनत्व वाले राज्यों का अवरोही क्रम निम्न है – बिहार (1106), प.  बंगाल (1028), केरल (860) एवं उत्तर प्रदेश (829)।

  • राज्य जनसंख्या घनत्व

बिहार    –   1106

पंजाबा   –   551

झारखंड  –   414

उत्तराखंड –   189

केरल    –   860

महाराष्ट्र –   365

उड़ीसा   –   270

त्रिपुरा    –   350

आंध्र प्रदेश    308

मेघालय  –   132

मणिपुर  –   128

नगालैंड  –   119

सिक्किम –   86

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  • जनगणना 2011 के अनुसार, न्यूनतम जनघनत्व वाले पांच राज्य क्रमशः हैं –

अरुणाचल प्रदेश (17), मिजोरम (52), सिक्किम (86), नगालैड (119) तथा हिमाचल प्रदेश (123)

  • जनगणना 2011 के अनंतिम एवं अंतिम आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश का अधिकतम जनघनत्व वाला शहर गाजियाबाद है। जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, इसका जनघनत्व 3971 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है।

  • जनगणना-2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या 1210854977 है।

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या का 2.1 प्रतिशत लोग विकलांग हैं। इनमे से मात्र 2 प्रतिशत विकलांग आत्मनिर्भऱ हैं जबकि पड़ोसी देश चीन में 80 प्रतिशत विकलांग आत्मनिर्भर हैं।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ो के अनुसार, भारत में साक्षरता का प्रतिशत 74.04% था। 30 अप्रैल, 2013 को जारी जनगणना के अंतिम आंकड़ो के अनुसार, भारत में साक्षरता दर 73.0% ( पुरुष 80.9% एवं महिला 64.6%) के स्तर पर है जो 20001 की तुलना में 8.2 प्रतिशतांक अधिक है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार केरल की साक्षरता दर 94.0% है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की साक्षरता दर 67.7% है, जिसमें पुरुष साक्षरता दर 77.3% तथा महिला साक्षरता दर 57.2% है।

  • जनणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक साक्षर जिला गौतमबुध्द नगर (80.12%) है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ो के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक साक्षरता दर वाले चार जिलों का सही अवरोही क्रम है – गाजियाबाद (85.00%), गौतमबुध्द नगर (82.20%), कानपुर नगर (81.31%), औरैया (80.25%)।

  • जनगणना 2011 के अनुसार, पुरुष (76%) और स्त्री (72.9%) साक्षरता के प्रतिशत दरों में न्यूनतम अंतर (3.1%) मेघालय में है। जनगणना 2011 के अनुसार, पुरुष और स्त्री के साक्षरता के प्रतिशत दरों में न्यूनतम अंतर वाले चार क्रमशः क्रमशः मेघालय, मिजोरम, केरल तथा लगालैंड हैं।

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  • 2011 जनगणना के अंतिम आंकड़ो के अनुसार, उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में महिला साक्षरता न्यूनतम (34.8प्रतिश) है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ो के अनुसार, सबसे कम साक्षरता वाले 5 राज्य हैं – बिहार (61.8%), अरुणाचल प्रदेश (65.4%), राजस्थान (66.1%), झारखंड (66.4%) तथा आंध्र प्रदेश (67.0%)

  • वर्तमान जगणना के अनुसार बिहार, भारत का सर्वाधिक निरक्षरता वाला राज्य तथा केरल सर्वाधिक साक्षर राज्य है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ो के अनुसार, जबलपुर (81.1%) मध्य प्रदेश का सर्वाधिक साक्षर जिला है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ो के अनुसार, राज्यों का बाल लिंग अनुपात (शिशु लिंगानुपात) निम्न है –

उत्तर प्रदेश    –   899

मध्य प्रदेश   –   912

राजस्थान     –   883

बिहार        –   933

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  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ो के अनुसार शिशु लिंगानुपात –

उत्तर प्रदेश    –   902

मध्य प्रदेश   –   918

राजस्थान     –   888

बिहार        –   935

छत्तीसगढ़     –   969

पंजाब        –   846

हरियाणा     –   834

  • वर्ष 2011 के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के आकलन के अनुसार, भारत के मध्य प्रदेश राज्य में कुपोषण के शिकार बालकों का प्रतिशत उच्चतम है। यहां 60% बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं। इसके अलावा झारखंड में 56.5% तथा बिहार में 55.9% बच्चे कुपोषित हैं।

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में शिशु मृत्यु दर 44 प्रति हजार है। देश में न्यूतनतम शिशु मृत्यु दर वाले राज्य गोवा व मणिपुर (प्रत्येक में  11 प्रति हजार) हैं।

  • सर्वाधिक शिशु मृत्यु दर वाला राज्य मध्य प्रदेश (59 प्रति हजार) है। इसके पश्चात उत्तर प्रदेश एवं ओडिशा (प्रत्येक में 57 प्रति हजार) में शिशु मृत्यु दर सर्वाधिक है।

  • भारत में बाल (0-6 वर्ष) जनसंख्या  के लिंगानुपात में वर्ष 1961 से निरंतर गिरावट की प्रवृत्ति रही है। 1961 में यह 976 थी जो वर्ष 1981 में 962, वर्ष 2001 में 927 तथा वर्ष 2011 में और गिरकर 919 हो गई।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ो के अनुसार, भारत में शिशु लिंगानुपात 914 (अंतिम आंकडों के अनुसार 919) था।

  • जनगणना 2011 के अनुसार राज्यों में बौध्दों की संख्या –

राज्य            बौध्दो की जनसंख्या

महाराष्ट्र     –   6531200

कर्नाटक      –   95710

उत्तर प्रदेश    –   206285

बिहार        –   25453

  • भारत की गिनती जनांकिकीय लाभांश (Demographic Dividend) वाले देश के रुप में की जाती है क्योकि यहां कार्यकारी (Working) जनसंख्या अर्थात 15-64 वर्ष आयु वर्ग की जनसंख्या का प्रतिशत अधिक है।

  • जनसांख्यिकीय बोनस से तात्पर्य जनसंख्या में उत्पादनकारी (श्रम संबंधी) आयु समूह में वृध्दि से है। भारत में Demographic Bonus उत्पादन वृध्दि में सहायक है।

  • कार्यकारी जनसंख्या के आकार में वृध्दि, जनसंख्या वृध्दि का प्रतिकूल प्रभाव नही है बल्कि यह जनसंख्या वृध्दि का अनुकूल प्रभाव है। जनसंख्या वृध्दि के कारण कार्यकारी जनसंख्या के आकार में उत्तरोत्तर वृध्दि होती है जबकि जोतो के आकार की कमी, बढ़ती हुई बेरोजगारी तथा अनाजों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में कमी जनसंख्या वृध्दि का प्रतिकूल प्रभाव है।

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  • 2011 की जनगणना के अनुसार लिंगानुपात –

राज्य                लिंगानुपात

हरियाणा             879

पंजाब                895

सिक्किम             890

उत्तर प्रदेश            912

छत्तीसगढ़             991

तमिलनाडु            996

मणिपुर              985

गुजरात              919

हिमाचल प्रदेश         879

दादर एवं नगर हवेली   774

दमन और दीव        618

अरुणाचल प्रदेश       938

केरल                1084

उत्तराखंड             963

आंध्र प्रदेश            993

झारखंड              949

पंजाब                895

उत्तर प्रदेश            912

बिहार                918

राजस्थान             928

जम्मू-कश्मीर          889

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  • जनगणना 2011 के अनुसार, सबसे कम लिंगानुपात वाला राज्य हरियाणा (879) है जबकि सिक्किम (890), पंजाब (895) तथा जम्मू-कश्मीर (899) इससे अधिक लिंगानुपात वाले राज्य हैं।

  • 2011 की जनगणनानुसार भारत में दिए गए धार्मिक समुदायों की उनके लिंगानुपात के आधार पर स्थिति है –

धार्मिक समुदाय        लिंगानुपात

ईसाई            –   1023

बौध्द            –   965

जैन             –   954

मुसलमान        –   951

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, न्यूनतम लिंगानुपात (618) दमन एवं दीव का है।

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, पुडुचेरी में लिंगानुपात 1000 से ऊपर अर्थात 1037 है।

  • जनगणना वर्ष भारत में लिंगानुपात

1951           946

1991           927

2001           933

2011 (अंतिम)     943

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, कुछ राज्यों के उनके ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु जनसंख्या प्रतिशतता –

राज्य            प्रतिशतता

केरल        –   10.4%

पंजाब        –   11.2%

हरियाणा     –   13.2%

जम्मू-कश्मीर  –   17.5%

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत की जनसंख्या का सर्वाधिक जमाव उत्तर प्रदेश में पाया जाता है, जिसकी जनसंख्या 199812341 है, जबकि देश मे सर्वाधिक घना राज्य बिहार (1106) तथा दूसरा घना बसा राज्य प. बंगाल (1028) है।

  • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के अंतर्गत निर्मित दस-वर्षीय कार्य योजना मे स्वयं सहायता समूहों की उच्चतर संलग्नता, 6 से 14 वर्ष तक निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा और विवाहों एवं गर्भधारण का अनिवार्य पंजीकरण को सम्मिलित किया गया है। नीति में उन महिलाओं के लिए विशेष पुरस्कार देने का प्रावधान भी किया गया है जो  अन्त्य परिवार नियोजन उपायों का उपयोग करती हों।

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  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ो के अनुसार, कुछ राज्यों में शिशु लिंगानुपात (0-6 आयु वर्ग) इस प्रका हैं –

मिजोरम          –   971

मेघालय          –   970

पंजाब            –   846

हरियाणा         –   830

  • जनगणना 2011 के अनंतिम एवं अंतिम आंकड़ों के अनुसार, लिंगानुपात में राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों का अवरोही (घटते हुए क्रम में) क्रम निम्नानुसार है –

  1. केरल

  2. पुडुचेरी

  3. तमिलनाडु

  4. आंध्र प्रदेश

  • जनगणना 2011 के अनुसार, कुल जनसंख्या में (65+ आयु वर्ग) की आबादी लगभग 4.8 प्रतिशत है।

  • 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या में अनुसूचित जनजातियों का अनुपात 8.6% है।

  • जनगणना 2011 के अनुसार अनुसूचित जाति की सर्वाधिक जनसंख्या प्रतिशतता वाले चार राज्य अवरोही क्रम है –

  1. पंजाब (31.9%)

  2. हिमाचल प्रदेश (25.2%)

  3. पश्चिम बंगाल (23.5%)

  4. उत्तर प्रदेश (20.7%)

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ो के अनुसार –

राज्य            अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या

बिहार           16567325

उत्तर प्रदेश       41357608

पश्चिम बंगाल    21463270

पंजाब           8860179

  • 2011 जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारतीय राज्यों में सर्वाधिक जनजातीय जनसंख्या मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में है।

राज्य

जनजातीय जनसंख्या

मध्य प्रदेश

15316784

छत्तीसगढ़

7822902

तमिलनाडु

794697

केरल

484839

असम

3884371

त्रिपुरा

1166813

उत्तराखंड

291903

उत्तर प्रदेश

1134273

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  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, सर्वाधिक साक्षरता वाला जिला सरचिप (मिजोरम) है जिसकी साक्षरता प्रतिशत 98.76% है। वहीं निम्नतम साक्षरता वाला जिला मध्य प्रदेश का अलीराजपुर (37.22%) है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत के 5 सर्वाधिक साक्षर जिले –

जिला

साक्षरता दर

सरचिप (मिजोरम)

97.91%

आइजॉल (मिजोरम)

97.89%

माहे (पुदुचेरी)

97.87%

कोट्टायम (केरल)

97.21%

पथानामथिट्टा (केरल)

96.55%

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  • भारत में प्रभावित साक्षरता दर की गणना 7 वर्ष एवं उससे अधिक उम्र की जनसंख्या से की जाती है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम एवं अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत में पुरुष और महिला साक्षरता दर का अंतराल निम्न है –

 

अनंतिम

अंतिम

पुरुष साक्षरता दर

82.14

80.9

महिला साक्षरता दर

65.46

64.6

साक्षरता अंतराल

16.68

16.3

 

  • 2011 जनगणना के अनंतिम आंकड़ो के अनुसार, भारत की जनसंख्या का लगभग 17% (16.49) उत्तर प्रदेश में रहती है। अंतिम आंकड़ो के अनुसार, कुल जनसंख्या का 16.51% उत्तर प्रदेश में रहती है।

  • कुछ राज्यों की 2011 जनगणना के अनुसार साक्षरता दर –

बिहार    –   51.5%

झारखंड  –   55.4%

उत्तर प्रदेश-   57.2%

छत्तीसगढ़ –   60.2%

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ो के अनुसार, न्यूनतम महिला साक्षरता दर वाले तीन राज्य है – बिहार < राजस्थान < झारखंड

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, महिला साक्षरता दर उच्चतम एवं न्यूनतम क्रमशः केरल और राजस्थान मे हैं, जबकि अंतिम आंकड़ों के अनुसार, यह शर्त केरल और बिहार पूरी करते हैं।

  • 2011 में राज्यों की महिला साक्षरता दर प्रतिशत में –

राज्य        साक्षरता दर

छत्तीसगढ़     60.2

उड़ीसा       64.0

मध्य प्रदेश   59.2

राजस्थान     52.1

  • जनगणना 2011 के अनुसार, भारत की सकल प्रजनन दर (TFR)4 है।

  • शून्य जनसंख्या वृध्दि के लिए प्रति महिला उत्पन्न बच्चों की संख्या 2.1 आकलित की गई। इसे प्राप्त कर लेने पर जनसंख्या वृध्दि रुक जाती है।

  • जनसंख्या स्थिरीकरण वह स्तर है, जहां जनसंख्या मे कोई परिवर्तन नही होता। विश्व की जनसंख्या को उस समय स्थिर कहा जाता है जब जन्म और मृत्यु दर समान हो जाती है तथापि कुछ विशिष्ट देशों के मामलों में देश में आने वाले और देश से जाने वाले लोगों की भी जनसंख्या में गणना की जाती है। ऐसी दशा में उस देश में जनसंख्या का स्तर उस समय स्थिर कहा जाएगा जब देश में जन्में बच्चों तथा बाहर से आने वालों की संख्या देश में मरने वालो तथा देश से बाहर जाने वालों की संख्या के बराबर हो जाएगी।

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  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, साक्षरता की दृष्टि से शीर्ष 5 राज्य हैं

  1. केरल (94%)

  2. मिजोरम (91.3%)

  3. गोवा (88.7%)

  4. त्रिपुरा (87.2%)

  5. हिमाचल प्रदेश (82.8%)

  • फिलिप एम. हौसर ने विश्व जनसंख्या का पृथ्वी के सतह के छोटे हिस्से पर बढ़ते संकेद्रण अर्थात नगरीकरण एवं महानगरीकरण को पापुलेशन इम्प्लोजन की संज्ञा दी थी। शहरी जनसंख्या में असाधाराण नृजातीय मिश्रण पापुलेशन डिस्प्लोजन है। जनसंख्या में तीव्र वृध्दि पापुलेशन एक्सप्लोजन है।

  • शहरी वृध्दि शहर में रहने वालों की संख्या में वृध्दि, शरही केन्द्रों की संख्या में वृध्दि, देश की कुल जनसंख्या में वृध्दि तथा शहरी क्षेत्रों से होने वाली आय में वृध्दि का परिणाम अथवा सूचक है।

  • गंगा का मैदान भारत ही नहीं विश्व में सर्वाधिक सघन आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है। इसका कारण है कि गंगा भारत की सर्वाधिक उपयोग में लाई जाने वाली नदी है।

  • जनांकिकीय लाभांश से तात्पर्य सभी क्षेत्रों में कुशल मानव शक्ति की जरुरतों की भरपाई होना है और यह तभी संभव है जब कौशल की मांग और आपूर्ति के बीच मौजूदा अंतर को कम करते हुए कुशलता विकास को प्रोत्साहित दिया जाए।

  • भारत के प्रगतिशील जनसंख्या संसाधन के पांच क्षेत्रों के नाम निम्नानुसार है –

  1. पश्चिम बंगाल डेल्टा

  2. दक्कन ट्रैप (महाराष्ट्र और गुजरात)

  3. तमिलनाडु

  4. पंजाब मैदान और गंगा यमुना दोआब

  5. दक्षिण-पूर्वी कर्नाटक पठार

  • भारत में जनसंख्या में तीव्र वृध्दि के मद्देनजर खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि संबंधी दबाव के कारण कीटनाशक तथा रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में वृध्दि हो रही है जो पक्षियों की संख्या में गिरावट के लिए प्रमुख उत्तर दायी कारक है। साथ ही साथ मानवीय आवास परिधि में वृध्दि तथा वनों एवं पेड़-पौधों के कटाई के कारण पक्षियों के प्राकृतिक वास स्थलों मे कमी भी पक्षियों की संख्या में गिरावट के लिए जिम्मेदार है।

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  • भारत में जनसंख्या वृध्दि के प्रतिफल स्वरुप कृषि योग्य भूमि में कमी आई है तथा विकास के लिए किए प्रयासों से प्रदूषण में वृध्दि हुई है। आवासीय जरुरतों तथा औद्योगिकीकरण के लिए भूमि की आवश्यकता के लिए अन्य क्षेत्रों का भारी मात्रा में कटान किया गया है जिससे वन्य क्षेत्रों की कमी के कारण बाढ़ों मे वृध्दि तथा जंगली जानवरों की जनसंख्या में कमी हुई है।

  • नवीनतम अनुसंधानों से यह स्पष्ट है कि अंडमान द्वीप समूह की जनजातियां अफ्रीकी नीग्रेटों से साम्य रखती है।

  • राष्ट्रीय साक्षरता मिशन 5 मई, 1988 को पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी द्वारा प्रारंभ किया गया था। मिशन के तहत 15 से 35 आयु वर्ग में 1990 तक 30 मिलियन, 1995 तक 50 मिलियन तथा 2007 तक थ्रेशहोल्ड साक्षरता का 75% करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।

  • राज्य/केन्द्र शासित प्रदेशों की जनसंख्या इस प्रकार है –

राज्य            जनसंख्या (2011)

चंडीगढ़          1055450

मिजोरम          1097206

पुडुचेरी           1247953

सिक्किम         610577

  • जनगणना (Census) में तीन प्रकार के हाउस होल्ड्स (Households) होते हैं –

नॉर्मल हाउसहोल्ड – यह व्यक्तियों का वह समूह जो सामान्यतया साथ रहता है और सा झी रसोई का प्रयोग करता है।

संस्थागत हाउसहोल्ड – ऐसा समूह जिनमें आपस में कोई संबध्दता (रिश्ता) नही है परंतु साथ रहते हैं। जैसे – बोर्डिंग हाऊस, हॉस्टल्स, जेल तथा अनाथालय इत्यादि।

घरविहीन हाउसहोल्ड – जो भवनों या जनगणना घरों में नही निवासित है। जैसे फुटपाथ, पुलों के नीचे, रेलवे प्लेटफार्म इत्यादि पर रहने वाले लोग।

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जनगणना 2011 के अनुसार

राज्य

हाउसहोल्ड का आकार (माध्य/Mean)

उत्तर प्रदेश

6.0

जम्मू और कश्मीर

5.8

बिहार और लक्षद्वीप

5.5

मेघालय एवं राजस्थान

5.4

  • जनगणना 2011 के अनुसार, न्यूनतम लिंगानुपात वाले 5 जिले –

दमन (दमन एवं दीव)      –   534

लेह (जम्मू-कश्मीर)         –   690

तवांग (अरुणाचल प्रदेश)     –   714

उत्तर सिक्किम (सिक्किम)   –   767

दादरा और नगर हवेली      –   774

  • जनसंख्या के पिरैमिड में सामान्यतः 0-14 वर्ष आयु समूह को आश्रित आबादी के रुप में जाना जाता है। इनके अतिरिक्त 65 वर्ष एवं अधिक आयु के व्यक्तियों को भी आश्रित आबादी माना जाता है जबकि 15-64 वर्ष आयु वर्ग को कार्यशील जनसंख्या (Working Population) के रुप में परिगणित किया जाता है।

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या में 20 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों का प्रतिशत लगभग 59.29% है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत की जनसंख्या में स्त्रियों का प्रतिशत 48.46% था जबकि  अंतिम आंकड़ों के अनुसार, यह 48.53% है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत की 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु (0-34 वर्ष) की थी। इसी जनगणना के अनुसार, कुल जनसंख्या में 35 वर्ष से कम आयु की जनसंख्या 65.6% है।

  • जनसंख्या की संरचना यथा – शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति आदि सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख कारक हैं। इसी प्रकार कामकाजी महिलाओं की प्रजननता, गैर-कामकाजी महिलाओं की अपेक्षा कम होती है।

  • राज्यों का जनघनत्व (प्रति वर्ग किमी.) में –

राज्य            जनघनत्व (2011)

प. बंगाल     –   1028

तमिलनाडु    –   555

महाराष्ट्र     –   365

आंध्र प्रदेश    –   308

  • 2016 के आंकड़ों के अनुसार, कुछ राज्यों में प्रति हजार जीवित जन्म पर शिशु मृत्यु दर –

राज्य            शिशु मृत्यु दर

तमिलनाडु    –   17

राजस्थान     –   41

उत्तर प्रदेश    –   43

मध्य प्रदेश   –   47

भारत        –   34

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  • बीमारु (BIMARU) राज्यों के अंतर्गत 4 राज्य बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश आते हैं। इन राज्यों का 2011 के अनुसार जनघनत्व –

राज्य            जनघनत्व (2011)

बिहार            1106

उत्तर प्रदेश        829

मध्य प्रदेश       236

राजस्थान         200

  • जनगणना 2011 के अनुसार, भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति/वर्ग किमी. हो गया है तथा जनसंख्या की औसत वार्षिक घातांकी वृध्दि दर 1.64% रही।

  • न्यूनतम शिशु मृत्यु दर केरल में पाई जाती है। 2016 के आंकड़ों के अनुसार, केरल में नगरीय क्षेत्र मे शिशु मृत्यु दर (प्रति हजार जीवित जन्मों पर) 10, महाराष्ट्र के नगरीय क्षेत्र में 13, तमिलनाडु के नगरीय क्षेत्र में 14, एवं गुजरात के नगरीय क्षेत्र में 19 हैं।

  • भारत में सर्वप्रथम मृत्यु गणना की शुरुआत कर्नाटक राज्य ने की थी।

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भारतः नगरीकरण

  • पद्म भूषण से सम्मानित समाजशास्त्री टी.के. ओमेन ने नगरीय परिवारों को स्पष्ट करने के लिए निम्न प्रतिमानों को आधार बनाया है –

  1. आय के साधन तथा उभरते या बदलते हुए मूल्यों के प्रतिमान

  2. सत्ता के संरचना

  3. नगरीय सामाजिक वातावरण तथा सामाजिक पारिस्थितिकी का आधार

  • नगरीकरण हेतु दो कारक उत्तरदायी होते हैं। एक आकर्षण तथा दूसरा प्रतिकर्षण। आकर्षण के अंतर्गत शहरों का उच्च जीवन स्तर, बेहतर आधारभूत सुविधाएं, रोजगार के अवसर आदि आते हैं। दूसरी ओर गांवों मे रोजगार अवसरों में कमी, निम्न जीवन स्तर आदि प्रतिकर्षक कारक हैं। गांवो ने नगरी क्षेत्रों की ओर उच्च दर से पलायन तथा नगरों में शैक्षिक संस्थाओं की बढ़ती संख्या नगरीकरण के स्वाभाविक अक्षिलक्षण हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहन-सहन का ऊंचा स्तर नगरीकरण की प्रक्रिया को अवरोधित करता है।

  • आर्थिक समीक्षा 2015-16 के अनुसार, समावेशी विकास को सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) तथा वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) में प्रगति के रुप में देखा जा सकता है। दशकों के योजनाबध्द आर्थिक विकास के बावजूद जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा जैसे भूमिहीन कृषि श्रमिक, सीमांत कृषक तथा अनूसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति सामाजिक एवं वित्तीय अपवर्जन का सामना कर रहे हैं। अतः ये सीमांत वर्ग समावेशी विकास के कार्यक्रम के केन्द्र में हैं। अर्ध्दशहरी क्षेत्रों में रहने वाले व्यक्ति इन सीमांत वर्गों में शामिल नही हैं क्योंकि इस क्षेत्र के निवासियों में अमीर-गरीब दोनों समुदाय निवास करते हैं।

  • वर्ष 2011 के जनगणना के अनुसार, भारत की जनसंख्या 1210.85 मिलियन है जिसमें 377.1 मिलियन जनसंख्या नगरों में निवास करती है। जहां वर्ष 2001 में 10 लाखी नगरों की संख्या 35 थी, वहीं वर्ष 2011 में यह बढ़कर 53 हो गई जो यह सिध्द करता है कि भारत में वर्ष 2001 के पश्चात शहरीकरण में तीव्र वृध्दि हुई। भारत में मोबाइल का उपयोग वर्ष 1995 से प्रारंभ होकर गत 20 वर्षों में लगातार बढ़ते हुए टेलीफोन नेटवर्क के मामले में वैश्विक स्तर पर दूसरे स्थान पर  है। भारतीय दूरसंचार  उद्योग का मार्च, 2001 में टेली घनत्व 3.58 प्रतिशत से फरवरी, 2015 में बढ़कर 78.13 प्रतिशत हो गया है।

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  • वर्ष 1931-61 तक की अवधि को भारत में मध्यम नगरीकरण का काल कहा जाता है। इस दौरान नगरीय जनसंख्या में 45.46 मिलियन (135.86 प्रतिशत) की वृध्दि हुई जबकि नगरीकरण का प्रतिशत 12.2 से बढ़कर 18.3 तक ही पहुंचा।

  • भारतीय नगरीकरण के प्रादेशिक प्रतिरुप में अत्यधिक विषमता है। सबसे अधिक नगरीकृत राज्य गोवा है, जहां पर आधी से अधिक (जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार) जनसंख्या नगरों में रहती है। हिमाचल प्रदेश सबसे कम नगरीकृत प्रदेश है, जहां पर मात्र 10 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में रहती है। इस प्रकार भारत में सभी क्षेत्रों का नगरीकरण सर्वथा समान नही है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश भारत का सबसे कम नगरीकृत (10%) राज्य है। भारत का सबसे अधिक नगरीकृत राज्य गोवा (62.2%) है। तथा भारतीय नगरीय जनसंख्या का सर्वाधिक सांद्रण महाराष्ट्र में पाया जाता है।

  • भारत में किसी अधिवासी को नगरीय क्षेत्र घोषित करने के लिए निम्न शर्तें पूरी होनी चाहिए –

  1. कम से कम 5000 जनसंख्या हो।

  2. पुरुष कार्यशील जनसंख्या का कम से कम 75% गैर-कृषि व्यवसायों में कार्यरत हो।

  3. कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. जनघनत्व हो।

  • नगरीकरण होने से लोगों के उपभोग की सुविधाएं बढ़ी हैं। समुचित विद्युत, स्वास्थ्य, आवागमन एवं संचार व्यवस्था से सुव्यवस्थित ढंग से सेवाएं प्राप्त करने में आसानी होती है। यदि व्यवस्था अच्छी रहती है, खान-पान स्वास्थ्य सेवाएं आवश्यकता के अनुरुप उपलब्ध होती हैं, तो जन्म दर और मृत्यु दर दोनों में कमी आती है।

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के आधार पर –

सर्वाधिक शहरीकृत राज्य            –    तमिलनाडु

अधिकतम शहरी आबादी वाला राज्य   –    महाराष्ट्र

अधिकतम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य    –   दिल्ली

सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य    –   अरुणाचल प्रदेश

  • 2011 की जनगणना के अनुसार, सर्वाधिक नगरीकृत राज्यों का क्रम –

राज्य            प्रतिशत

गोवा        –   62.2

मिजोरम      –   52.1

तमिलनाडु    –   48.4

  • नगरीकरण का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जो अधिवासित प्रारुप में गयात्मक परिवर्तन लाती है। यह परिवर्तन मूलतः जनसंख्या, आकार, संरचना और कार्मिक क्षेत्र में होता है। कार्मिक  दृष्टि से नगरीय अधिवासित क्षेत्रों में गैर-प्राथमिक (कृषि) कार्यों की प्रधानता होती है। भारत जैसे विकासशील देशों में ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण के कारण नगरीकरण की प्रक्रिया को अधिक बल मिला है। भारत के अधिकतर नगर पहले गांव थे जो सेवाओं के केन्द्रीकरण के कारण नगर बन गए।

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  • भारत सरकार के जनगणना विभाग ने नगरीय केन्द्रों को जनसंख्या के आधार पर 6 भागों में वर्गीकृत किया है –

  1. प्रथम वर्ग के नगर –  100,000 से अधिक जनसंख्या

  2. द्वीतीय वर्ग के नगर –   50,000 से 99,999 जनसंख्या

  3. तृतीय वर्ग के नगर –   20,000 से 49,999 जनसंख्या

  4. चतुर्थ वर्ग के नगर –   10,000 से 19,999 जनसंख्या

  5. पंचम वर्ग के नगर –   5000 से 9999 जनसंख्या

  6. षष्ठ वर्ग के नगर –   5000 से कम जनसंख्या

  • नगरीय अधिवास ग्रामीण अधिवासों से अपने आकार (जनसंख्या) तथा प्रकार्यात्मक आधार पर भिन्न होते हैं। कृषि, वानिकी तथा पशुपालन जैसी प्राथमिक आर्तिक क्रियाएं ग्रामीण अधिवासों के प्रमुख प्रकार्य हैं। इसके विपरीत बस्तियों के प्रमुख प्रकार्य द्वीतीयक तथा तृतीयक आर्थिक क्रियाओं से संबंधित होत हैं। आतः नगरीकरण औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र के विकास के साथ परिष्कृत आय अवसरों के निर्माण का भी आधार है।

  • प्रति 1000 पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या को लिंगानुपात के रुप में व्यक्ति किया जाता है। महानगरों का लिंगानुपात निम्नानुसार है –

 

महानगर         2011 (अंतिम आंकड़े)

चेन्नई           985

कोलकाता         935

दिल्ली           868

मुंबई            863

  • 2011 की जनगणना के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, भारत में जनगणना नगरों की कुल संख्या 3892 (अनंतिम आंकड़ों के अनुसार यह संख्या 3894 थी) है, जबकि 2001 मे यह संख्या 1362 थी। एक जनगणना नगर की न्यूनतम जनसंख्या 5000 होती है, पुरुष जनसंख्या का कम से कम 75% गैर-कृषि व्यवसायों में संलग्न होता है और न्यूनतम जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. होता है।

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ें के अनुसार, भारत में कुल नगरीय जनसंख्या 377.1 मिलियन (37.71 करोड़) है, जो भारत की कुल जनसंख्या का 31.2% है। ध्यातव्य है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, यह 31.16 प्रतिशत थी।

  • 2011 की जनगणनानुसार भारत में 40 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरीय संकुलन हैं – वृहत मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे और सूरत।

  • जनगणना 2011 के अनुसार, देश की कुल नगरीय जनसंख्या का लगभग 42.6% दस लाखीय नगरों में निवास करती है।

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  • जनगणना 2011 (अनंतिम आंकड़ों) के अनुसार, प्रथम वर्ग के नगरों (Class 1 U As/Towns) की कुल संख्या 468 है। इन नगरों की जनसंख्या 364.9 मिलियन है, जो कुल नगरीय जनसंख्या का 70% है।

  • 2011 की जनगणनानुसार अब ग्वालियर भी दसलाखी नगर है।

  • ओड़िशा राज्य में एक भी दस लाखी नगर नही है। जबकि हरियाणा में एक (फरीदाबाद), जम्मू-कश्मीर मे एक (श्रीनगर) तथा झारखंड राज्य में तीन (जमशेदपुर, धनबाद, रांची) दस लाखी नगर हैं।

नगर            जनसंख्या (2011)

फरीदाबाद    –   1404653

जमशेदपुर    –   1337131

श्रीनगर      –   1273312

धनबाद      –   1195298

रांची         –   1126741

  • जनगणना 2011 के अनुसार तीन सर्वाधिक नगरीय जनसंख्या वाले राज्य –

राज्य            नगरीय जनसंख्या (हजार में)

महाराष्ट्र         50818

उत्तर प्रदेश        44495

तमिलनाडु        34917

  • राज्यों की नगरीकृत स्थिति –

राज्य            प्रतिशत (2011)

तमिलनाडु        48.4%

महाराष्ट्र         45.2%

गुजरात          42.6%

कर्नाटक          38.7%

पंजाब            37.5%

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  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, राज्यों में नगरीय जनसंख्या घनत्व (नगरीय जनसंख्या में नगरीय क्षेत्रफल का भाग देकर प्राप्त) निम्नानुसार हैं –

महाराष्ट्र     –   5594

पंजाब        –   4136

तमिलनाडु    –   2561

पश्चिम बंगाल –   5683

  • जनगणना 2011 के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, देश के सर्वाधिक नगरीकृत 5 राज्य क्रमशः –

  1. गोवा (62.2%)

  2. मिजोरम (52.1%)

  3. तमिलनाडु (48.4%)

  4. केरल (47.7%)

  5. महाराष्ट्र (45.2%)

  • भारत में सबसे कम नगरीय जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, सिक्किम की नगरीय जनसंख्या 153578 है। इसके बाद क्रमशः अरुणाचल प्रदेश (317369), नगालैंड (570966) तथा मिजोरम (571771) में कम नगरीय जनसंख्या पाई जाती है। वैसे केन्द्र शासित प्रदेशों व राज्यों दोनो की दृष्टि से सबसे कम नगरीय जनसंख्या लक्षद्वीप (50332) की  है।

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, ग्रामीण जनसंख्या का सर्वाधिक अनुपात ( 90%) हिमाचल प्रदेश मे है जबकि बिहार (88.70%), असम (85.92%), ओड़िशा (83.32%), मेघालय (79.92%) तथा उत्तर प्रदेश (77.72%) में ग्रामीण जनसंख्या अनुपात मे क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे एवं पांचवे स्थान पर है। राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में ग्रामीण जनसंख्या का अनुपात क्रमशः 75.11 प्रतिशत तथा 72.37 प्रतिशत है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ो के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 1 लाख और उससे अधिक की जनसंख्या वाले नगरीय संकुलन/शहरों की संख्या 64 है।

राज्य

नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत (2011) अनंतिम

नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत (2011) अंतिम

हरियाणा

34.79

34.87

जम्मू तथा कश्मीर

27.21

27.37

पंजाब

37.49

37.48

मध्य प्रदेश

27.63

27.63

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  • जनसंख्या की व्यावसायिक विशेषताएं कार्यबल (Working Force), निर्भरता, बोझ, रोजगार और बेरोजगारी में परिलक्षित होती हैं। जनसंख्या का व्यावसायिक ढांचा, विभिन्न व्यवसायों मे कार्यकारी जनसंख्या के वितरण को व्यक्ति करता है।

  • 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में दसलाखी (Metropolitan) शहर हैं। उत्तर प्रदेश के सातों दसलाखी शहर निम्नलिखित हैं –

  1. कानपुर –   20 लाख

  2. लखनऊ –   01 लाख

  3. गाजियाबाद –   58 लाख

  4. आगरा –   46 लाख

  5. वाराणसी –   35 लाख

  6. मेरठ –   24 लाख

  7. इलाहाबाद –   16 लाख

  • भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार, देश के मिलियन (दस लाखी) नगरों (कुल 53 नगर) की सूची में अंतिम स्थान पर कोटा (राजस्थान) है जिसकी जनसंख्या (1001365 है।

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शहर        –   जनसंख्या

सूरत       –   4585367

इलाहाबाद   –   1216719

कोटा       –   1001365

मंगलोर     –   476000

  • जनगणना 2011 के अनुसार आगरा नगर की जनसंख्या 1275134, इलाहाबाद की 1050000 मेरठ की, 1068772 तथा लखनऊ की 2185927 है। ये आंकड़े इन शहरों के नगर निगम क्षेत्र हैं। 2011 की जनगणनानुसार इन दस लाखी नगरों का सही क्रम (नगर निगम क्षेत्र की जनसंख्या के आधार पर है) – लखनऊ – आगरा – मेरठ – इलाहाबाद।

  • जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार, निम्नलिखित नगरीय केन्द्रों के सही अवरोही क्रम निम्न है – गाजियाबाद (4681645) > आगरा (4418797) > वाराणसी (3678841) > मेरठ (3443689)।

  • भारत में जनसंख्या के आधार पर नगरों को छः वर्गों में बांटा गया है। इनमें से नगर वर्ग IV, V और VI को लघु नगरों की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है।

  • 2011 की जनगणना में फोटो, उंगली के निशान और  आंख की पुतली के प्रतिचित्रण के लिए किसी व्यक्ति की न्यूनतम आयु 15 वर्ष निर्धारित है। यह राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के तहत संपन्न किए जाने  वाले कार्यों का हिस्सा है।

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, केन्द्र शासित प्रदेशों में सबसे कम ग्रामों की संख्या दमन एवं दीव में है। यहां स्थित ग्रामों की संख्या मात्र 25 है। इसकी तुलना में लक्षद्वीप में 27, दादरा एवं नगर हवेली में 70 तथा पुडुचेरी में 95 गांव हैं। उल्लेखनीय है कि केन्द्र शासित प्रदेशों में न्यूनतम ग्राम चंडीगढ़ (12) में स्थित है।

  • जवाहरलाल नेहरु राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन दिसंबर, 2005 में शुरु किया गया। यह एक 7 वर्षीय कार्यक्रम (मार्च, 2012 तक ) था। सरकार द्वारा इसे दो वर्ष का विस्तार (अप्रैल, 2012 से 31 मार्च 2014 तक) दिया गया था। जिसमे शहरी अवसंरचना के उन्नयन, बड़ी संख्या में आवासों के निर्माण और गरीबों के लिए मूलभूत सेवाओं की व्यवस्था पर ध्यान दिया गया था जिससे समावेशी विकास को बढ़ावा दिया जा सके।

जवाहर लाल नेहरु राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (JNNURM) मे दो उप-मिशन शामिल थे – STUDY FOR CIVIL SERVICES-GYAN

  1. शहरी अवसंरचना एवं शासन हेतु उप मिशन- इसका उद्देश्य जल आपूर्ति एवं सफाई, सीवरेज, ठोस कचरा प्रबंधन, रोड नेटवर्क, शहरी परिवहन एवं पुराने नगर क्षेत्रों की अवसंरचना को पुनर्विकसित करना है।

  2. शहरी गरीबों को बुनियादी सेवाओं के लिए उपमिशन – इसका उद्देश्य स्लमों का एकीकृत विकास है। स्पष्टतः शहरी विद्युतीकरण JNNURM योजना के साथ संबंध्द नही है। यह मिशन शुरुआत में मार्च, 2012 तक सप्तवर्षीय अवधि के लिए ही था जिसे पहले से ही अनुमोदित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए मार्च, 2014 तक बढाया गया था। मार्च, 2013 के दौरान  चल रहे कार्यों को पूरा करने के लिए मिशन अवधि को मार्च, 2015 तक के लिए एक वर्ष तक और बढ़ा दिया गया था।

  3. वर्ष 2011 की जनगणनानुसार, सर्वाधिक स्लम प्रतिवेदित नगरों की संख्या की दृष्टि से शीर्ष पांच राज्य/के.शा.प्र. का अवरोही क्रम है – तमिलनाडु (507), मध्य प्रदेश (303), उत्तर प्रदेश (293), कर्नाटक (206) एवं महाराष्ट्र (189)।

  4. 2011 की जनगणनानुसार, कुल स्लम (मलिन बस्ती) जनसंख्या में सर्वाधिक हिस्सेदारी वाले पांच राज्य/के.शा.प्रा. का अवरोही क्रम है – महाराष्ट्र (18.1 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (15.6 प्रतिशत), पश्चिम  बंगाल (9.8 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (9.5 प्रतिशत) एवं तमिलनाडु (8.9 प्रतिशत)।

  • देश के प्रमुख शहरों में आधारभूत ढांचे के विकास तथा सेवाओं के विस्तार के लिए जवाहरलाल नेहरु राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (JNNURM) का शुभारंभ प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिह ने 3 दिसंबर, 2005 में नई दिल्ली में किया था। इसके तहत मेट्रोपालिटन शहरों, राज्यों की राजधानियों 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों के अतिरिक्त धार्मिक, ऐतिहासिक एवं पर्यटन की दृष्टि में महत्वपूर्ण कुल मिलाकर 65 शहरों का कायाकल्प किए जाने का लक्ष्य था।

  • नगरीकरण और औद्योगीकरण में वृध्दि और नगरीय जनसंख्या में तीव्र वृध्दि कई प्रकार के सामाजिक अपराधों को भी बढ़ावा देती है, क्योंकि अपर्याप्त सुविधाओं की उपलब्धता सापेक्षिक वंचना को जन्म देती है। इसके कारण सांस्कृतिक एवं पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों का विघटन भी होता है।

  • जनगणना 2011 में वृहत मुंबई में कुल शहरी घरेलू क्षेत्र में 41.3% हिस्सा मलिन  बस्तियों का  है, जो भारत में सर्वाधिक है। भारत में मलिन  बस्तियों में रहने वाली कुल जनसंख्या (2011 अंतिम) 65494604 है, जो भारत की कुल जनसंख्या का लगभ ग 5.4% जबकि कुल नगरीय जनसंख्या का 17.4% है।

  • नगरीय गलियारों का संबंध परिवहन सुविधा के विस्तार के माध्यम से नगरीय क्रियाकलापों को विस्तार देने से है।

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विश्वः जनसंख्या एवं नगरीकरण

  • वर्ष 1972 में प्रकाशित Limits to Growth पुस्तक के लेखकों में से एक मीडोज के अनुसार, विश्व जनसंख्या प्रवृत्ति औद्योगीकरण, प्रदूषण इत्यादि की वर्तमान प्रवृत्तियों के यथावत जारी रहने पर अगले 100 वर्षो में संवृध्दि की परिसीमा आ जाएगी, जिससे भूख और आर्थिक तथा सामाजिक जोखिमों में वृध्दि होगी। मीडोज महोदय द्वारा 2004 में इस सीमा को घटा कर 30 वर्ष कर दिया गया है।

  • लोक-नगरीय सातत्य (Folk-Urban Continuum) के विचार को अमेरिका सांस्कृतिक मानवविज्ञानी रॉबर्ट रेडफील्ड द्वारा विकसित किया गया है। इसके लिए उन्होंने मेक्सिको के मेरिडा, युकेटन तथा ग्रामीण माया मसुदायों का अध्ययन किया था।

  • रेडफील्ड तथा सिंगर के विचार में प्राथमिक नगरीकरण की प्रक्रिया को वृहद परंपरा (Great Tradition) के विकास के विशेषीकृत किया जाता है। उन्होने राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक शहरो का विचार प्रस्तुत किया।

  • 31 अक्टूबर, 2011 को जन्मी भारतीय बच्ची नरगिस, फिलीपींस की बच्ची डैनिका कामेको, श्रीलंका की बच्ची वट्टालागे मुथुमई तथा रुप के कालिनिग्राद में जन्में बच्चे प्योट्र निकोलायेवा को विभिन्न संगठनों द्वारा प्रतीकात्मक रुप से 7 अरबवां व्यक्ति माना गया है। तथापि संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक रुप से अब तक इनमें से किसी भी देश के बच्चे को विश्व के 7 अरबवें व्यक्ति का दर्जा नही दिया गया है।

  • विश्व जनसंख्या दिवस प्रति वर्ष 11 जुलाई को मनाया जाता है। इसका निश्चय वर्ष 1989 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा किया गया था। इसे 11 जुलाई, 1987 को विश्व जनसंख्या के अनुमानतः पांच अरब (5 बिलियन) होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

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  • 11 जुलाई, 2015 को विश्व भर में विश्व जनसंख्या मनाया गया। वर्ष 2015 के विश्व जनसंख्या दिवस की विषय-वस्तु आपात स्थिति में असुरक्षित आबादी (Vulnerable Population In Emergencies) थी। 2018 की विषय वस्तु थी – परिवार नियोजन एक मानवाधिकार है (Family Planning is a Human Right).

  • जनसंख्या की दृष्टि से विश्व के प्रथम पांच बड़े राष्ट्र – चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, इंडोनेशिया तथा ब्राजील मे से चीन, भारत तथा संयुक्त राज्य अमेरिका का अधिकांश भाग 200-400 उत्तरी अक्षांश के बीच अवस्थित है। पुनः अफ्रीका का उत्तरी भाग, मध्य एशिया भी 200-400 उत्तरी अक्षांश के  बीच अवस्थित है। अतः स्पष्ट है कि विश्व की 50% जनसंख्या 200-400 उत्तरी अक्षांशों के बीच संकेन्द्रित है।

  • विश्व में लिंगानुपात घटने का डर, लिंग निर्धारण के परीक्षण के बढ़ने से है।

  • तीसरी दुनिया में जैसे-जैसे विकास की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, नगरीकरण की दर भी वृध्दी की प्रवृत्ति परिलक्षित हो रही है। नगरीकरण की दर में इस तीव्र वृध्दि को ही तीसरी दुनिया में नया जनसंख्या बम की संज्ञा दी जा रही है।

  • जनगणना 2011 के अनंतिम आंकड़ों के अनसार, भारत की जनसंख्या विश्व जनसंख्या में 17.5 प्रतिशत की भागीदारी है । जबकि विश्व की जनसंख्या में सर्वाधिक अंश चीन का (19.4%) है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या डिवीजन (UNPD) के World Population Prospects: 2017 रिवीजन के अनुसार, विश्व जनसंख्या 2017 में 753.4 मिलियन है जबकि भारत की जनसंख्या 1339.2 मिलियन (विश्व जनसंख्या का 17.78%) है।

  • विश्व के नगरों की स्थिति पर यू.एन. हैबिटेट्स रिपोर्ट के अनुसार, नगरों की समृध्दि निर्धारित करने का आधार उत्पादकता, जीवन की गुणवत्ता, समता आदि है लेकिन अनुकूलतम जनसंख्या नही है।

  • दक्षिणी सूडान के सूडान से पृथक होने के बाद नाइजीरिया अब अफ्रीका में सबसे अधिक आबादी वाला देश है (वर्ष 2015 में विश्व में सातवां स्थान)। यह दुनिया में काले लोगो की सबसे अधिक आबादी वाला देश  है। वर्ष 2100 तक भारत एवं चीन (क्रमशः पहला एवं दूसरा) के पश्चात नाइजीरिया विश्वा का तीसरा सर्वाधिक जनसंख्या वाल देश होगा।

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  • देश जनसंख्या घनत्व 2017

चीन             150

जापान           348

उत्तरी कोरिया      113

दक्षिणी कोरिया    528

  • संयुक्त राष्ट्र संघ के 2015 के आंकड़ों के अनुसार, कुछ देशों की जनसंख्या का विवरण निम्नलिखित है –

देश             जनसंख्या 2015

डोमिनिका        55572

सेंट किट्स        52993

मार्शल द्वीप      37731

मोनाको          72680

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  • विश्व विकास संकेतक के अनुसार, नगरीय जनसंख्या (वर्ष 2014) निम्नवत है –

देश             नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत (वर्ष 2014)   

अर्जेंटीना         92

ब्राजील           85

उरुग्वे            95

वेनेजुएला         89

  • वर्ष 2014 में बरमूडा, केमैन द्वीप समूह, हांगकांग, मकाउ, मोनाको, सिंगापुर तथा सेंट मार्टेन (डच पार्ट) में नगरीय जनसंख्या शत-प्रतिशत दर्ज की गई।

  • देश UNFPA के अनुसार 2016 में जनसंख्या (मिलियन में)

ब्राजील           209.6

इंडोनेशिया        260.6

नाइजीरिया        187.0

पाकिस्तान        192.8

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  • विश्व जनसंख्या संभाव्यताः 2017 पुनरीक्षण के अनुसार दक्षिण अमेरिका का सबसे घना बसा देश इक्वेडोर (66) है।

  • अफ्रीका में जनसंख्या वृध्दि दर अन्य सभी महाद्वीपों से अधिक है। यहां की जनसंख्या वृध्दि दर 2.14% रही जबकि एशिया महाद्वीप की 1.28% उत्तरी अमेरिका की 1.11%, द. अमेरिका की 1.19% तथा ओशीनिया की  29% रही। विश्व जनसंख्या संभाव्यताः 2017 के पुनरीक्षण के अनुसार 2010-15 के मध्य जनसंख्या वृध्दि दर अफ्रीका में 2.59% एशिया में 1.05% उत्तर अमेरिका में 0.75% और ओशीनिया में 1.53% थी।

  • 20वीं शताब्दी में विकसित देशों की नगरीकरण की प्रक्रिया तीव्र थी, परंतु इसके उत्तरार्ध्द में जनसंख्या विस्फोट एवं ग्रामीण नगरीय स्थानांतरण के कारण विकासशील देशों में यह प्रक्रिया तीव्र हो गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, विश्व के नगरों की जनसंख्या में वार्षिक वृध्द दर का एक-तिहाई से भी अधिक भाग ग्रामीण-नगरीय  स्थानांतरण का परिणाम है। एक अनुमान के अनुसार, 2030 तक विश्व की 60% आबादी शहरी क्षेत्रों में निवास करेगी जबकि वर्ष 2050 तक विश्व की 70% आबादी नगरों  निवासित होगी।

  • विश्व विकास संकेतक के अनुसार, वर्ष 2014 में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा सर्वाधिक (84) हांगकांग और जापान है। जबकि वर्ष 2014 में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा न्यूनतम (49) स्वाजीलैंड में रही है। वर्ष 2014 में डेनमार्क में जीवन प्रत्याशा 81 वर्ष, अमेरिका में 79 वर्ष तथा स्विट्जरलैंड में  83 वर्ष रही।

  • वर्ल्ड पापुलेशन प्रॉस्पेक्टस के अनुसार, वर्ष 2011 में निम्नलिखित महाद्वीपों मे जनसंख्या घनत्व का विवरण इस प्रकार था –

महाद्वीप

जनसंख्या घनत्व  (व्यक्ति प्रति वर्ग किमी.)

एशिया

135.8

दक्षिणी अमेरिका

23.0

उत्तरी अमेरिका

18.6

यूरोप

33.3

अफ्रीका

36.1

  • संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुसार, इतिहास में सर्वप्रथम 2008 में विश्व की कुल जनसंख्या का आधे से अधिक भाग नगरीय जनसंख्या हो गया।

  • देश जनसंख्या का औसत वार्षिक परिवर्तन दर (%) 2010-2016

बहरीन           1.7

इजराइल         1.6

जापान           -0.1

सिंगापुर          1.9

  • नील नदी को मिस्र का वरदान कहा जाता है। नील नदी के पानी की उपलब्धता के कारण नील नदी के किनारे-किनारे सघन कृषि की जाती है। कृषि सुलभता के कारण यहां जनसंख्या घनत्व उच्चतम है।

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  • देश जनसंख्या (करोड़ में) 2016

इंडोनेशिया    26.1

ब्राजील       20.9

रुस         14.3

जापान       12.6

  • देश जन घनत्व (2015)

मालदीव      1364

बांग्लादेश     1237

भारत        441

श्रीलंका       334

पाकिस्तान    245

नेपाल        199

अफगानिस्तान 50

भूटान        20

  • विश्व जनसंख्या संभाव्यताः 2017 पुनरीक्षण के अनुसार वर्ष 2017 में दक्षिण एशियाई देशों में जनसंख्या घनत्व मालदीव (1454), बांग्लादेश (1265), भारत (450), श्री लंका (332), पाकिस्तान (255), नेपाल (204) आफगानिस्तान (54) और भूटान (21) है।

  • देश प्रति 100 महिलाओं पर पुरुषों की संख्या (2015)

बांग्लादेश     102

पाकिस्तान    106

भारत        108

चीन         106

  • सीआईए की वर्ल्ड फैक्ट बुक (World Fact book), 2012 के अनुसार देशों का लिंगानुपात निम्नवत है –

  • देश जन्म के समय        सामान्य

बांग्लादेश     1.04                0.93

पाकिस्तान    1.05                1.09

भारत        1.12                1.08

चीन         1.13                1.06

  • देशों की मातृ मृत्यु दर (MMR- प्रति एक लाख जीवित जन्म पर) की स्थिति इस प्रकार है-

देश         वर्ष 2015 के अनुसार

नेपाल        258

भारत        174

बांग्लादेश     176

इंडोनेशिया    126

  • देशों की संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग के अनुसार, प्रजनन दर –

देश         2015-2020 (अनुमान)

स्वीडन       1.9

इटली        1.5

ऑस्ट्रेलिया    1.9

फ्रांस         2.0

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  • क्षेत्रों की जनसंख्या की वार्षिक वृध्दि दर (प्रतिशत में) –

क्षेत्र                 2010-2015

मध्य एशिया          1.60%

पश्चिम बंगाल         2.00%

दक्षिण एशिया         1.36%

दक्षिण-पूर्व एशिया      1.20%

  • देश कुल जनसंख्या के प्रतिशत के रुप में अंतरराष्ट्रीय प्रवासी

(Migrant) स्टॉक (वर्ष 2015)

    ऑस्ट्रेलिया            28.2

    गुयाना               2.0

    यूनाइटेड अरब अमीरात 88.4

    सऊदी अरब           32.3

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देश

महिलाओं की श्रमिक बल सहभागिता दर (2014) 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग वालों के प्रतिशत के रुप में

चीन

64

यू.एस.ए.

56

रुस

57

दक्षिण कोरिया

50

 

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