संपूर्ण पर्यावरण GK का सार FULL ENVIRONMENT and ecology SUMMARY COMPLETE GENERAL KNOWLEDGE GK GS REVISION NOTES GIST NCERT UPSC IAS PCS UPPSC UPSSSC SSC BPSC MPPSC CGPSC RAS OPSC PPSC HAS KAS APPSC UKPSC GD UPP UP POLICE BSSC LOWER PCS ALLAHABAD ARO RO AHC ARO MANDI PARISHAD VDO VYAPAM SSC CGL CHSL GD RPF POLICE SI CONSTABLE CLERK


पर्यावरण एवं सतत विकास

 

 

 

STUDY FOR CIVIL SERVICES-GYAN

MOST IMPORTANT ENVIRONMENT AND ECOLOGY PARYAVAN SAMANYA GYAN  GK SUMMARY GENERAL KNOWLEDGE NOTES ECONOMICS  FOR ALL COMPETITIVE EXAMS INCLUDING  UPSC STATE PCS SSC UPSSSC AND OTHER ONE DAY GOVERNMENT EXAMS

 

पर्यावरण

  • पृथ्वी पर पाए जाने वाले भूमि, जल, वायु, पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं का समूह जो हमारे चारों ओर है, सामूहिक रुप में पर्यावरण कहलाता है।

  • पर्यावरण के ये अजैविक और जैविक संघटक आपस में अंतर्क्रिया भी करते हैं। यह संपूर्ण प्रक्रिया एक तंत्र के रुप में संचालित होती है जिसे पारिस्थितिकी तंत्र के रुप में पाऱिभाषित किया जाता है।

  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अनुसार, पर्यावरण किसी जीव के चारों तरफ घिरे भौतिक एवं जैविक दशाएं एवं उनके साथ अंतःक्रिया को सम्मिलित करता है।

  • ध्यातव्य है कि परि और आवरण शब्दों को जोड़ने पर पर्यावरण शब्द की उत्पत्ति होती है। अतः पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है, जो आवरण हमें चारों ओर से घेरे हुए है।

  • वायुमंडल (Atmosphere)

  • क्षोभमंडल (Troposphere)

  • समतापमंडल (Stratosphere)

  • स्थलमंडल (Lithosphere)

  • पर्वत

  • मैदान

  • मरुस्थल

  • जीवमंडल (Bioshpere)

  • पौधे

  • जंतु

  • जलमंडल (Hydrosphere)

  • हिमनद

  • झील

  • नदी

  • सागर

  • पर्यावरण एक अविभाज्य समष्टि है तथा जैविक एवं अजैविक तत्वों वाले पारस्परिक क्रियाशील तंत्रों से इसकी रचना होती है।

  • पर्यावरण के तीन संघटक हैं –

  1. भौतिक या अजैविक संघटक – स्थल, वायु, जल

  2. जैविक संघटक – पादप, मनुष्य, जंतु, सूक्ष्म जीव तथा

  3. ऊर्जा संघटक – सौर्यिक ऊर्जा एवं भूतापीय ऊर्जा।

अतः पर्यावरण कई संघटकों से निर्मित एक संरचना है।

  • यह सभी जैविक और अजैविक अवयवों का सम्मिश्रण है, जो जीवों को चारों ओर से प्रभावित करता है।

  • पर्यावरण के कुछ कारक संसाधन के रुप में कार्य करते हैं तथा कुछ कारक नियंत्रक के रुप में कार्य करते हैं।

  • पर्यावरण को वृहद व लघु स्तर पर समझा जा सकता है। इसके साथ ही क्षेत्रीय तथा भूमंडलीय स्तर पर भी पर्यावरण मे विभिन्नताएं पाई जाती हैं।

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पर्यावरण

कारक –

  • संसाधन के रुप में

  • नियंत्रक के रुप में

संघटक

  • भौतिक – स्थल, वायु, जल

  • जैविक – पादप, मनुष्य, जंतु, सूक्ष्म जीव

  • ऊर्जा – सौर, भूतापीय

स्तर

  • लघु – जीवाणु का पर्यावरण

  • वृहत – वृक्ष का पर्यावरण

विभिन्नताएं

  • कारक

जलवायु मे परिवर्तन

मृदा प्रकार

स्थलाकृति में अंतर

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धारणीय विकास या सतत विकास

  • धारणीय विकास विकास की वह अवधारणा है जिसके तहत वर्तमान की आवश्यकताओं के साथ-साथ भविष्य की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाता है।

  • धारणीय विकास प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के संदर्भ में अंतर—पीढ़ीगत संवेदनशीलता का विषय है।

  • धारणीय विकास का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का न्यायसंगत उपयोग संरक्षण तथा उचित प्रबंधन करना है।

  • ध्यातव्य है कि इस शब्द की व्याख्या वर्ष 1987 में Word Commission on Environment and Development- WCED अपनी रिपोर्ट Our Common Future में की थी।

  • वर्ष 1992 में आयोजित प्रति पूर्ण समर्थन व्यक्त किया गया था।

  • इसके साथ ही वर्ष 2002 में जोहान्सबर्ग में आयोजित सम्मेलन का मुख्य मुद्दा सतत विकास था।

  • सतत विकास के लिए जैविक विविधता का संरक्षण, प्रदूषण का निरोध एवं नियंत्रण तथा निर्धनता घटाना सभी आवश्यक हैं।

  • प्रकृति की अपनी सुंदरता है, अपनी सीमाएं हैं। अतः हमें चाहिए कि पहले हम प्रकृति को समझने का प्रयास करें उसके बाद अपनी विकास नीतियों का निर्धारण करें। अतः आर्थिक विकास और पर्यावरण सुरक्षा के मध्य एक वांछित संतुलन बनाए रखना ही टिकाऊ विकास या सतत विकास है।

  • टिकाऊ विकास की जो अनिवार्य शर्तें हैं वे सूचनाओं की उपलब्धता पर आधारित होती हैं।

टिकाऊ विकास हेतु आवश्यक सूचनाएं

पर्यावरण से संबंधित सूचनाएं

  • जैविक अधिवास से संबंधित

  • प्राकृतिक संसाधन से संबंधित

  • पर्यावरण के आधारभूत कारकों के संदर्भ में

  • वर्तमान पर्यावरण की स्थिति

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 मनुष्य व उसके क्रिया-कलापों से संबंधित सूचनाएं

  • जनसंख्या वृध्दि दर

  • जनसंख्या का आकार

  • विभिन्न संसाधन या खाद्य उपलब्धता

  • गैर-अनिवार्य संरचनात्मक सुविधाएं

  • औसत जीवन स्तर तथा प्रति व्यक्ति आय

  • तकनीकी स्तर

  • उल्लेखनीय है कि ये सूचनाएं सुदूर संवेदन तकनीक, सांख्यिकी विधि तथा भौगोलिक सूचना तंत्र व पर्यावरण सूचना तंत्र इत्यादि तरीकों से प्राप्त की जाती है। इन प्राप्त सूचनाओं के आधार पर अनुकूलतम स्तर का निर्धारण किया जाता है फिर विकास की योजनाओं की रुपरेखा तैयार की जाती है।

प्रकृति में कार्बन चक्र व जल चक्र

  • पर्यावरण विभिन्न अजैविक व जैविक घटकों से मिलकर बना है। ये घटक आपस में अंतःक्रिया करते हैं। सामान्यतया यह अंतःक्रिया एक चक्रीय स्वरुप में होती है। अर्थात तत्वों का चक्रण एक रुप से दूसरे रुप मे होता रहता है। यह चक्रण प्रकृति में कार्बन चक्र, जल चक्र इत्यादि के रुप में दिखाई देता है।

  • पृथ्वी के कार्बन चक्र मे कार्बनिक पदार्थों के अपघटन से, जीवधारियों द्वारा श्वसन प्रक्रिया से, ज्वालामुखी प्रक्रियाओं से, जीवाश्म ईंधनों के दहन इत्यादि से कार्बन डाइऑक्साइड पहुंचती है।

  • स्वपोषित पौधे प्रकास संश्लेषण की क्रिया द्वारा कार्बोहाइड्रेट्स के निर्माण में वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते है।

  • ध्यातव्य है कि कार्बन पृथ्वी पर बहुत सारी आवस्थाओं में पाया जाता है यह अपने मूल रुप में ग्रेफाइट एवं हीरा में पाया जाता है।

  • यौगिक के रुप में यह वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड के रुप में, कार्बोनेट और हाइड्रोजन कार्बोनेट के रुप में पाया जाता है। विभिन्न प्रकार के खनिजों में भी कार्बन पाया जाता है।

  • जल की तरह कार्बन का भी विभिन्न भौतिक एवं जैविक क्रियाओं के द्वारा पुनर्चक्रण होता रहता है।

  • वहीं दूसरी ओर जल चक्र में सौर विकिरण की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। सौर विकिरण जल चक्र को चालित करता है और जल का वाष्पीकरण करता है।

  • वायुमंडल में नमी वर्षा का निर्धारण करती है। सभी प्रकार की वर्षा की मात्रा यथा बूंदा-बांदी, वर्षा, बर्फबारी इत्यादि वायुमंडल मे नमी की मात्रा में बढ़ोत्तरी से बढ़ जाती है। सौर विकिरण द्वारा बर्फ का जल मे द्रवीकरण होता है।

  • जल चक्र हाइड्रोस्फीयर में जल की विभिन्न गतिविधियों को दर्शाता है।

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  • जल चक्र पौधो की वृध्दि में सहायक होता है। पौधे भूमि में प्रतिरोपित किए जाते हैं तथा भूमि में उपस्थित उनके मूल रोमों द्वारा ये जल का अवशोषण करते हैं। सामान्यतया पौधो के अधिकांश मूल रोम प्रतिरोपण के कारण नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कई प्रतिरोपित पौधों में वृध्दि नहीं होती।

  • ध्यातव्य है कि मूलरोम मृदा में उपस्थित मृदा विलयन (Soil Solution) के संपर्क में रहते हैं। इन मूलरोमों के द्वारा ही पौधे भूमि से जल का अवशोषण करते हैं।

  • मूलरोमों की कोशा-भित्ति मुख्यतया सेलुलोज से बनी होती है। इसके साथ इनमें कुछ पेक्टिन भी पाया जाता है। पेक्टिन के कारण ही मूलरोम मृदा से चिपके रहते हैं।

  • मूलरोमों की कोशिका भित्ति पारगम्य कला (Permeable Membrane) की तरह कार्य करती है।

  • इसके अलावा एक कारण यह भी है कि खेतों में उर्वरकों (Fertilizers) का प्रयोग करने पर यदि शीघ्र ही अधिक जल से खेतों की सिंचाई नही होती, तो मृदा विलयन की सांद्रता अधिक हो जाती है।

  • इससे जड़ के मूल रोमों द्वारा जल अवशोषण कठिन हो जाता है। इससे पौधे मुरझा जाते हैं।

  • उल्लेखनीय है कि जल अवशोषण प्राप्य भूमि जल (Available Soilwater), मृदा के तापमान, मृदा विलयन की सांद्रता व मृदा की वायु (Soil Air) जैसे कारकों पर निर्भर करता है। इस प्रकार जलमंडल में स्थित जल, जल चक्र द्वारा पर्यावरण में अपनी भूमिका विभिन्न प्रकार से निभाता रहता है। जल चक्र के साथ-साथ वायुमंडल मे होने वाली गतिविधियां भी पर्यावरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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वायुमंडल

  • रासायनिक संगठन के आधार पर पदार्थ को तत्व, यौगिक और मिश्रण के रुप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

  • तत्व पदार्थ का साधारणतम रुप होता है जिसे रासायनिक या भौतिक विधियों द्वारा आगे उपविभाजित नहीं किया जा सकता।

  • यौगिक ऐसा पदार्थ होता है जिसमें दो या अधिक तत्व द्रव्यमान के एक स्थिर अनुपात में संयोजित होते हैं।

  • मिश्रण ऐसा पदार्थ होता है जिसमें दो या अधिक तत्व या यौगिक किसी भी अनुपात में साधारण रुप से मिश्रित होते हैं।

  • वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है।

  • पृथ्वी के परितः विद्यमान गैसों (वायु) के समूह को वायुमंडल कहते हैं। इसमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसे पाई जाती हैं। गैसो का यह मिश्रण वायुमंडल (Atmosphere) में पाया जाता है। शुष्क वायु में घनत्व के अनुसार सर्वाधिक मात्रा नाइट्रोजन की होती है।

गैस

प्रतिशत

नाइट्रोजन

78.08%

ऑक्सीजन

20.95%

ऑर्गन

0.93%

कार्बन डाइऑक्साइड

0.038%

निऑन

0.0018%

हीलियम

0.0005%

मीथेन

0.00017%

 

  • पेड़-पौधे, प्राण-वायु ऑक्सीजन का उत्सर्जन और वायुमंडल को दूषित करने वाली एवं ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैस कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करते हैं।

  • अगर वनस्पतियां नहीं होंगी, तो ऑक्सीजन की कमी से पृथ्वी की जीवन पर घातक प्रभाव पड़ेगा।

  • इस प्रकार पादप वायुमंडल में ऑक्जीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के संतुलन को भी बनाए रखते हैं। इसलिए वनों को हरे फेफड़े भी कहते हैं।

  • इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों मे सड़कों के किनारें हरे वृक्षों की कतारें खड़ी करके ध्वनि प्रदूषण से भी बचा जा सकता है।

  • वायुमंडल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, ऑर्गन, कार्बन डाइऑक्साइड, निऑन, हीलियम आदि गैसें उपस्थित रहती हैं। शुष्क वायु में घनत्व के अनुसार सर्वाधिक मात्रा नाइट्रोजन की होती है। यह 78.08 प्रतिशत होती है।

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पर्यावरण सुरक्षा

  • जहां एक ओर प्रदूषण पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए एक संकट है वहीं दूसरी ओर धारणीय विकास पर्यावरण के क्षरण को कम करने में सहायक होता है। अतः धारणीय विकास पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

  • धारणीय विकास एवं कागज के थैलों का प्रयोग पर्यावरणीय सुऱक्षा के सकारात्मक पहलू से संबंधित है। वातानुकूलन का पर्यावरणीय सुऱक्षा के नकारात्मक पहलू से संबंध है, जबकि गरीबी से पर्यावरण पर नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ते हैं। दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए, तो गरीबी का पर्यावरण से अप्रत्यक्ष संबंध है, जबकि धारणीय विकास, कागज के थैलों का प्रयोग वातानुकूलन का पर्यावरण से प्रत्यक्ष संबंध है। वही दूसरी ओर प्राकृतिक आवास का विनाश, जैव विविधता की हानि या प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण होने से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को पर्यावरण अपकर्ष कहते हैं। पर्यावरण अपकर्ष प्राकृतिक या मानव जनित होता है। जबकि अपक्षय चट्टानों की टूट-फूट की वह क्रिया है जिसके अंतर्गत चट्टानें तथा वियोजन द्वारा ढीली पड़कर एवं विदीर्ण होकर अपने स्थान पर ही बिखर कर रह जाती है। उल्लेखनीय है कि पर्यावरण की सुरक्षा हेतु धारणीय विकास एक उपयोगी युक्ति है। अतः धारणीय विकास एवं पर्यावरण सुरक्षा आपस में अंतर्सबंध रखते हैं।

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धारणीय विकास

  • धारणीय विकास (Sustainable Development), विकास की वह अवधारणा है जिसके तहत वर्तमान की आवश्यकताओं के साथ-साथ भविष्य की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाता है।

  • इसी तत्वावधान में धारणीय विकास लक्ष्य बनाए गए हैं जिन्हें वर्ष 2030 तक प्राप्त करने का लक्ष्य है।

  • धारणीय विकास लक्ष्य को सर्वप्रथम वर्ष 2012 में रियो +20 सम्मेलन में प्रस्तावित किया गया था।

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  • ध्यातव्य है कि 17 धारणीय विकास लक्ष्य तय किए गए हैं। ये इस प्रकार हैं –

  1. गरीबी के सभी रुपों की पूरे विश्व से समाप्ति।

  2. भूख (Hunger) की समाप्ति, खाद्य सुरक्षा, बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा।

  3. सभी आयु के लोगो में सेहत और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा।

  4. समावेशी व न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही सभी को आजीवन सीखने का अवसर देना।

  5. लैंगिक समानता प्राप्त करने के साथ ही महिलाओं व लड़कियों को सशक्त करना।

  6. सभी के लिए स्वच्छ जल एवं सफाई (Clean Water and Sanitation) की उपलब्धता सुनिश्चित करना।

  7. सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुंच सुनिश्चित करना।

  8. सभी के लिए समावेशी और सतत आर्थिक विकास, रोजगार और समुचित कार्य को बढ़ावा देना।

  9. लचीले बुनियादी ढांचे, समावेशी औद्योगीकरण को बढ़ावा एवं नवाचार को प्रोत्साहन देना।

  10. देशें के बीच और भीतर असमानता को कम करना।

  11. सुरक्षित, लचीले (Resilient) और टिकाऊ शहर का निर्माण।

  12. स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना।

  13. जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई करना।

  14. महासागरों, समुद्र और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और सतत उपयोग करना।

  15. मरुस्थलीकरण को रोकना, वनो का संवहनीय प्रबंधन करना, भूमिक्षरण एवं जैव विविधता के नुकसान पर रोक लगाना।

  16. न्यायसंगत, शांतिपूर्ण, व समावेशी समाजों को बढ़ावा।

  17. सतत विकास हेतु वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करना।

  • उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 17 सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals – SDG’S) का निर्धारण किया है। जिन्हें वर्ष 2030 तक प्राप्त करने का लक्ष्य है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रगति की दिशा में विभिन्न  देशों द्वारा किए गए प्रयासों की प्रगति जानने हेतु सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल इंडेक्स का निर्माण किया गया है।

  • यह सूचकांक 17 सतत विकास लक्ष्यों के संबंध में सामाजिक समावेश, आर्थिक विकास की स्थिति तथा पर्य़ावरण की सततता से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है।

  • 157 देशों की इस सूची में वर्ष 2017 में भारत का स्थान 116वां है।

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सतत विकास सूचकांक 2017 में विभिन्न देशों का स्थान

क्रम

स्थान

देश

1.    

1

स्वीडन

2.    

2

डेनमार्क

3.    

3

फिनलैंड

4.    

110

म्यांमार

5.    

116

भारत

6.    

120

बांग्लादेश

7.    

122

पाकिस्तान

8.    

157

मध्य अफ्रीकी गणराज्य

 

  • धारणीय विकास के कई आयामों मे धारणीय कृषि भी एक पहलू है।

  • ध्यातव्य है कि वर्ष 2003 को यू.एन.ओ. द्वारा सतत विकास का वर्ष घोषित किया गया था।

  • धारणीय कृषिः धारणीय विकास के कई आयामों मे धारणीय कृषि भी एक पहलू है।

  • धारणीय कृषि का अर्थ है पर्यावरण को अक्षुण्ण रखते हुए भूमि का इस प्रकार प्रयोग कि उसकी गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहे।

  • वर्तमान में भारत की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। ध्यातव्य है कि अत्यधिक जनसंख्या वृध्दि के कारण खाद्य समेत अन्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता महसूस हुई।

  • इसकी वजह से कृषि में रासायनिक खादों/उर्वरकों एवं जहरीले कीटनाशकों का भरपूर उपयोग किया गया ताकि पैदावार बढ़े। परंतु इससे प्राकृतिक असंतुलन व मृदा की गुणवत्ता व उसकी उर्वरता को व्यापक क्षति पहुंची। इससे मानव के स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ा।

  • इससे निपटने हेतु आज संपूर्ण विश्व का झुकाव सतत/धारणीय कृषि की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इस हेतु जैविक खाद (Bio Fertilizer) का प्रयोग किया जा रहा है।

  • उल्लेखनीय है कि भारत में टिकाऊ कृषि के लिए राष्ट्रीय मिशन वर्ष 2014-15 से चल रहा है। यह मिशन जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्री कार्ययोजना (National Action Plan on Climate Change) का एक भाग है। जलवायु परिवर्तन के कारण मानवता के समक्ष कई प्रकार कई चुनौतियां प्रकट होती रहती हैं।

  • उल्लेखनीय है कि क्लव ऑफ रोम वैज्ञानिकों, अर्थविदों, सिविल सेवकों तथा व्यवसायियों की एक संस्था है, जो मानवता के समक्ष उपस्थित होने वाली वैश्विक चुनौतियों के समाधान हेतु सुझाव देती है।

  • यह संस्था शोध, वाद-विवाद, सम्मेलनों इत्यादि के माध्यम से वैज्ञानिक विश्लेषण कर इन सुझावों को उपलब्ध कराती है।

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पृथ्वी शिखर सम्मेलन (रियो समिट)

  • जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के संकट उत्पन्न हो रहे हैं।

  • वर्ष 1992 में हमारी धरती पर मंडरा रहे संकट से निपटने के लिए साझी रणनीति बनाने के मकसद से दुनिया भर के नेता ब्राजील के शहर रियो डी-जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन में एकत्र हुए थे। इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं को लेकर गहरी चिंता जताई थी और इनसे लड़ने के लिए मिलकर प्रयास करने का संकल्प लिया गया था।

  • 172 देशों के प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्यावरण और विकास के मुद्दों पर आयोजित इस वैश्विक सम्मेलन में शिरकत की थी।

  • रियो डी-जेनेरियो (ब्राजील) में वर्ष 1992 में संपन्न अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit), संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन था।

  • रियो अर्थ समिट, 1992 के दौरान वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF- Global Environment Facility) की स्थापना की गई। यह 18 संस्थाओं के साथ मिलकर 183 देशों में वैश्विक पर्यावरण से संबंधित चुनौयितों से निपटने मे सहायता करता है।

  • यह संकटग्रस्त पारिस्थितिकीय तंत्रों (स्थलीय व जलीय) को संरक्षित करने में अपनी भूमिका निभाता है।

  • GEF, UNFCCC के तहत अल्पविकसित देशों को अल्पविकसित देश निधि (Least Developed Countries Fund: LDCF) उपलब्ध कराता है। यह इन देशों को उनके National Adaption Programs of Action (NAPA’S) की तैयारी एवं क्रियान्वयन में सहायता करता है।

  • ध्यातव्य है कि वर्ष 2001 में CoP-7 की बैठक माराकेश में आयोजित की गई। इस बैठक से प्राप्त निर्देशों के आधार पर विशिष्टि जलवायु परिवर्तन निधि (The Special Climate Change Fund: SCCF) की स्थापना की गई।

  • यह निधि अनुकूलन के साथ-साथ विकासशील देशों को तकनीकी हस्तांतरण में भी सहायता करती है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) एवं विश्व बैंक GEF के साथ जुड़े हुए हैं।

  • वर्तमान में GEF की मुख्य कार्यकारी अधिकारी व अध्यक्षा नाओको इशी (Naoko Ishii) हैं।

  • भूमंडलीय पर्यावरण सुविधा (Global Environment Facility- GEF), जैव विविधता पर अभिसमय, (Convention on Biological Diversity- CBD), जलवायु परिवर्तन पर कुछ राष्ट्र ढांचा अभिसमय (United Nation Framework Convention on Climate Change- UNCCD) स्थायी जैव प्रदूषकों पर स्टॉकहोम अभिसमय (Stockholm Convention on Persistent Organic Pollutants- Stockholm (POPs) एवं पारा पर मिनीमाता अभिसमय (Minimata Convention on Mercury) इत्यादि के लिए वित्तीय क्रियाविधि के रुप में काम करता है।

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एजेंडा 21

  • ब्राजील की राजधानी रियो डी-जेनेरियो में वर्ष 1992 में पर्यावरण और विकास सम्मेलन आयोजित किया गया। इसे अर्थ समिट या पृथ्वी शिखर सम्मेलन भी कहा जाता है। यह सम्मेलन स्टॉकहोम सम्मेलन की 20वीं वर्षगांठ मनाने के लिए आयोजित किया गया।

  • इसमें सम्मिलित देशों ने धारणीय विकास के लिए एक कार्यवाही योजना स्वीकृत की जिसे एजेंडा 21 के नाम से जाना जाता है।

  • एजेंडा 21 (Agenda -21) धारणीय विकास के लिए एक वैश्विक कार्ययोजना है। यह पारिस्थितिकी विनाश तथा आर्थिक असमानता को समाप्त करने पर बल देता है।

  • इसके साथ ही पृथ्वी सम्मेलन में 21वीं सदी के लिए पर्यावरणीय विकास हेतु कार्यक्रम निर्धारित किए गए। इन कार्यक्रमों को एजेंडा-21 नाम दिया गया।

  • इस एजेंडा को निम्न प्रमुख भागों में बांटा गया है –

एजेंडा-21

  • जैविक विविधता का सर्वेक्षण और संकटग्रस्त जीवों का संरक्षण

  • विकासशील देशों में गरीबी निवारण व जनसंख्या नियंत्रण

  • पूंजी स्थानांतरण को उदार बनाने पर बल

  • सबको खाद्य, स्वच्छ जल व सामाजिक सुरक्षा

  • अतः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण एवं विकास की दिशा में यह महत्वपूर्ण प्रयास था।

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रियो +20 सम्मेलन

  • वर्ष 1992 में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन के ठीक 5 वर्षों बाद 23-27 जून, 1997 के मध्य न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक विशेष बैठक का आयोजन किया, जो रियो+5 या पृथ्वी सम्मेलन+5 के नाम से जाना जाता है। बैठक एजेंडा-21 को लागू करने की दिशा में उठाए गए कदमों के मूल्यांकन हेतु बुलाई गई थी।

  • एजेंडा-21 के तहत पहली बैठक में उन सभी कारकों को सूचीबध्द किया गया था, जिसे टिकाऊ विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

  • उल्लेखनीय है कि रियो+10 का आयोजन जोहॉन्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में सितबंर, 2002 में एवं रियो+20 का आयोजन रियो डी-जेनेरियो (ब्राजील) में 20-22 जून, 2012 के मध्य संपन्न हुआ।

  • रियो+20, धारणीय विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का लघु नाम है। यह सम्मेलन जून, 2012 में रियो डी-जनेरियो, ब्राजील में संपन्न हुआ था। यह सम्मेलन वर्ष 1992 में रियो डी जेनेरियो मे हुए पृथ्वी सम्मेलन की 20वीं वर्षगांठ तथा वर्ष 2002 में जोहॉन्सबर्ग में हुए पृथ्वी सम्मेलन की 20वीं वर्षगांठ तथा वर्ष 2002 में जोहॉन्सबर्ग में आयोजित विश्व सतत विकास सम्मेलन की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था।

  • वर्ष 2012 में ब्राजील के रियो डी-जनेरियो में आयोजित रियो-20 सम्मेलन के घोषणा-पत्र का शीर्षक द फ्यूचर वी वांट (The Future We Want) था। इस मसौदे में जनसंख्या नियंत्रण, गरीबी उन्मूलन, सतत विकास, सामाजिक समानता इत्यादि पहलुओं पर विचार किया गया।

  • इसी सम्मेलन में भारत ने हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

  • ध्यातव्य है कि सतत लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए रियो+20 सम्मेलन में कोई स्पष्ट रणनीति नहीं बनाई गई। इसके साथ किसी कानून बंधन की व्यवस्था नही की गई। औद्योगिक राष्ट्रों का पर्यावरण व सतत विकास के मुद्दों के प्रति उदासीन रवैया भी इस सम्मेलन को अपेक्षित सफलता नही दिला सका।

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विभिन्न संगठन एवं संस्थान

  • पर्यावरण संरक्षण एवं सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न प्रकार के संगठनों एवं संस्थानों की स्थापना की गई है।

  • राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी शोध संस्थान (NEERI) महाराष्ट्र राज्य के नागपुर शहर में अवस्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1958 में केन्द्रीय लोक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग शोध संस्थान (CPHERI) के रुप में वॉटर सप्लाई, सीवरेज प्लान, इससे संबंधित बीमारियों एवं औद्योगिक प्रदूषण की रोकथाम के क्षेत्र में शोध एवं विकास के लिए की गई थी। इसकी पांच क्षेत्रीय प्रयोगशालाएं चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता एवं मुंबई में हैं।

  • NEERI भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

  • E.A. का तात्पर्य पर्यावरण प्राधिकरण (National Environment Authority) से है। यद्यपि इसका पूरा नाम राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण (NEAA) है।

  • राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण (NEAA) का गठन वन व पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा किया गया है।

  • इसे कुछ प्रतिबंधित क्षेत्रों में ऐसे मामलों के देखने के लिए, जिनमें पर्यावरण मंजूरी आवश्यक है, स्थापित किया गया था। इसे राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम, 1997 के तहत स्थापित किया गया था ताकि पर्य़ावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत, क्षेत्रों के प्रतिबंध हेतु किसी भी उद्योग, संचालन या प्रक्रिया या उद्योगो, संचालन या प्रक्रियाओं की श्रेणी के संबंध में अपील की सुनवाई की जा सके।

  • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषज्ञ एजेंसी है, जो पृथ्वी के वायुमंडल की दशा और व्यवहार का अध्ययन करती है।

  • 23 मार्च, 1950 को विश्व मौसम विज्ञान अभिसमय (World Meterological Convention) लागू हुआ। 17 मार्च, 1951 को आई.एम.ओ. (International Meterological Committee), विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meterological Organisation) के नाम से अस्तित्व में आई। इसका मुख्यालय जेनेवा (स्विट्जरलैंड) में स्थित है। इसके वर्तमान महासचिव पेटेरी टलास एवं अध्यक्ष डेविड ग्रीम्स हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP- United Nations Environment Programme) की स्थापना वर्ष 1972 में हुई थी। इसका मुख्यालय नैरोबी (केन्या) में अवस्थित है। इसके वर्तमान प्रमुख नॉर्वे के एरिक सोल्हेम (Erik Solheim) हैं।

  • EPA (Environmental Protection Agency) संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की संघीय एजेंसी है जिसकी स्थापना 2 दिसंबर, 1970 को की गई थी। यह मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संबंधी नियमों के निर्माण एवं प्रवर्तन से संबंधित है।

  • ग्रीन पीस इंटरनेशनल एक गैर-सरकारी पर्यावरण संगठन है, जिसके कार्यालय 40 से अधिक देशों मे स्थापित हैं और इसका मुख्यालय नीदरलैड्स के एम्सटर्डम में स्थित है।

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पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अधिनियम

  • पर्यावरण की सुरक्षा के संदर्भ में विभिन्न प्रकार के अधिनियम पारित किए गए हैं –

  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (The Environment (Protection) Act, 1986) भारत में वर्ष 1986 में पारित हुआ था। यह संपूर्ण भारत में लागू है।

  • भारत में पर्य़ावरण संरक्षण अधिनियम 1986 को छाता विधान (Umbrella Legislation) के रुप में जाना जाता है।

  • वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के प्रथम मानव पर्यावरण सम्मेलन के निर्णयों को कार्यान्वित करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 पारित किया।

  • यह अधिनियम केन्द्र सरकार को शक्ति देता है कि वह अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा संरक्षण के लिए और पर्यावरणीय प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण, उपशमन के उपाय करे।

  • उल्लेखनीय है कि भोपाल गैस त्रासदी के बाद भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 को पारित किया। इस अधिनियम ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बनाए गए अन्य कानूनों में समन्वय बनाने व उन्हें मार्गदर्शन प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • जेनेटिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति का गठन पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अधीन किया गया है। ध्यातव्य है कि 22 जुलाई, 2010 को गजट नोटिफिकेशन के द्वारा जेनेटिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति (Genetic Engineering Approval Committee) का नाम बदल दिया गया है।

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  • इसके अनुसार, परिसंकटमय सूक्ष्म जीवों/आनुवांशिक निर्मित जीवों या कोशिकाओं के विनिर्माण, उपोयग, आयात-निर्यात और भंडारण नियम, 1989 में आनुवांशिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति शब्दों के स्थान पर, जहां कहीं वे आते हैं, आनुवांशिक इंजीनियरिंग आकलन समिति (Genetic Engineering Appraisal Committee) शब्द रखे जाएंगे।

  • पर्य़ावरण संतुलन के संरक्षण से प्रत्यक्षतः संबंध वन नीति और पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 का है, जबकि औद्योगिक नीति और शिक्षा नीति में भी पर्यावरणीय दृष्टिकोण को सम्मिलित किया गया है।

  • राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम, 2010 भारतीय संविधान के अंतर्गत दिए गए नागरिकों को स्वच्छ पर्यावरण में रहने के अधिकार, जो जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) में अंतर्निहित हैं, के अनुरुप है। इस अधिनियम के द्वारा देश में एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (National Green Tribunal) का गठन किया गया है। पूर्व में इसके अध्यक्ष जस्टिस स्वतंत्र कुमार थे। वर्तमान में इसके कार्यवाहक अध्यक्ष जस्टिस डॉ. जवाद रहीम हैं।

  • राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की स्थापना राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत 18 अक्टूबर, 2010 को की गई थी। इसकी स्थापना पर्यावरण बचाव एवं वन संरक्षण और अन्य प्राकृतिक संसाधन सहित पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन, पीड़ित व्यक्ति अथवा क्षतिग्रस्त संपत्ति के लिए क्षतिपूर्ति प्रदान करने और इससे जुड़े मामलों का प्रभावशाली तीव्र गति से निपटारा करने के लिए की गई है।

  • उल्लेखनीय है कि न्यायाधिकरण पर्यावरण के मामलों मे द्रुत गति से पर्यावरणीय न्याय देंगे और उच्च न्यायालयों के मुदकमों के भारत को कम करने में मदद करेंगे।

  • न्यायाधिकरण को यह आदेश है कि आवेदनों और याचिकाओं को उसके मिसिलबंदी (Filling) से, 6 माह अंदर निपटाया जाए।

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पर्यावरणः परीक्षोपयोगी तथ्य

पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं –

  • प्राकृतिक वनस्पति जलवायु का सही सूचकांक है तथा वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा से हो रहे जलवायु परिवर्तन से प्राकृतिक वनस्पति मे भी परिवर्तन हो रहे हैं।

  • जल-प्रिय पौधे (Water-Loving plants or Aquatic plants) वे हैं – जो जल मे (जैसे – वाटर लिली), दलदली भूमि में या तालाबों के किनारें पाए जाते हैं। जलवायु की आर्द्रता कम होने पर इनका क्षरण होने लगता है।

  • इकोमार्क – प्रमाण-पत्र उन भारतीय उत्पादों को दिया जाता है, जो पर्यावरण के प्रति मैत्रीपूर्ण हों। यह प्रमाण-पत्र ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडडर्स द्वारा वर्ष 1991 से दिया जा रहा है।

  • अतिनगरीकरण और औद्योगीकरण संतुलित विकास, पर्य़ावरण एवं पारिस्थितिकी तथा जैव विविधता के संरक्षण, इन तीनों के लिए हानिकारक हैं।

  • डब्ल्यू.एम. एडम्स द्वारा लिखित पुस्तक हरित विकास (ग्रीन डेवलपमेंट) है। इसका पूरा नाम Green Development: Environment and Sustainability in a Developing World है। इस पुस्तक का पहला संस्करण वर्ष 1990 में प्रकाशित हुआ था।

  • प्राकृतिक कृषि के अन्वेषक मसानोबू फुकुओका (Masanobu Fukuoka) हैं। वह एक जापानी किसान एवं दार्शनिक थे।

  • पर्यावरण संरक्षण के लिए 17-24 वर्ष के 15000 युवाओं को नियुक्त करने के उद्देश्य से ऑस्ट्रेलिया ने ग्रीन आर्मी को लांच किया था। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने इस कार्यक्रम हेतु 360 मिलियन डॉलर आवांटित किए हैं जिससे प्रतिवर्ष 500 परियोजनाओं को सहायता प्रदान की जाएगी।

  • पलाचीमाड़ा दक्षिण भारतीय राज्य केरल के पलक्कड़ जिले में अवस्थित एक छोटा-सा गांव है। कोका-कोला कंपनी ने यहां अपनी इकाई स्थापित की है, जिससे बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र के जल का दोहन करने के कारण यहां पर्यावरण की भारी क्षति हुई है।

  • पंजाब के मार्कफेड (Markfed) और इस्त्राइल के सयाग (Sayag) के बीच 21 अप्रैल, 2001 को हुए एक समझौते के तहत पंजाब में ग्रीन हाउस कृषि के माध्यम से सब्जियां उगाई गईं।

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  • नेशनल जियोग्राफिक सोसायटी एवं अंतरराष्ट्रीय मतदान कंपनी ग्लोबस्कैन ने ग्रीनडेक्स 2009 स्कोर के तहत भारत को शीर्ष स्थान दिया है। इसमें विभिन्न देशों में पर्यावरणीय रुप से धारणीय उपभोक्ता व्यवहार के अनुसार अंक दिया जाता है।

  • ग्रीनडेक्स 2014 के स्कोर के अनुसार भी भारत इस संदर्भ में प्रथम स्थान पर बना हुआ है।

  • भारत में कृषि के पर्यावरण अनुकूल, दीर्घस्थायी विकास के लिए मिश्र शस्यन, कार्बनिक खादें, नाइट्रोजन यौगिकीकरण पौधे और कीट प्रतिरोध शस्य किस्मों का प्रयोग सर्वश्रेष्ठ है।

  • विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाता है। प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस वर्ष 1973 मे मनाया गया था। उल्लेखनीय है कि स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन वर्ष 1972 में आयोजित किया गया था। पर्यावरण पर यह पहला वैश्विक शिखर सम्मेलन था। इसी सम्मेलन में 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाने का निर्णय भी लिया गया।

  • ध्यातव्य है कि विश्व पर्यावरण दिवस प्रत्येक वर्ष 5 जून को मनाया जाता है। वर्ष 2017 के विश्व पर्यावरण दिवस का केन्द्रीय विषय (Theme) था – प्रकृति से लोगों को जोड़ना (Connecting Peole to Nature)वर्ष 2017 के विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों का मेजबान देश कनाडा था।

  • वर्ष 2018 में विश्व पर्यावरण का केन्द्रीय विषय (थीम) था – प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करो (Beat Plastic Pollution)। वर्ष 2018 में विश्व पर्यावरण दिवस का मेजबान देश भारत था।

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पारिस्थितिकी

पारिस्थितिकी

  • पारिस्थितिकी जीव विज्ञान की एक शाखा है जिसमें जीव समुदायों तथा उनके वातावरण के मध्य पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करते हैं। जीव तथा उसके बाहरी वातावरण के बीच एक सक्रिय संबंध होता है। कुछ स्त्रोतों के अनुसार, पारिस्थितिकी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1865 ई. में रेटर (Reiter) ने किया था।

  • अर्नेस्ट हैकल ने पारिस्थितिकी (Ecology) शब्द का प्रयोग Oikologie के नाम से किया तथा इसकी विस्तृत व्याख्या की। Oikologie शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों Oikos (House or living space = घर का आवास) तथा logos (Science or Study = अध्ययन) को मिलाकर बनाया गया है।

  • अर्नेस्ट हैकल (Ernst Hackel, 1869) के अनुसार, जीवधारियों के कार्बनिक और अकार्बनिक वातावरण और पारस्परिक संबंधों के अध्ययन को पारिस्थितिकी अथवा पारिस्थितिकी-विज्ञान कहते हैं।

  • यूजीन ओडम (Eugene Odum, 1963) के अनुसार, पारिस्थितिकी, प्रकृति की संरचना एवं प्रक्रिया का अध्ययन है।

  • वर्तमान समय में पारिस्थितिकी को व्यापक आयाम प्रदान कर दिया गया है। अब पारिस्थितिकी के अंतर्गत जंतु, वनस्पति एवं जलवायु ही नहीं वरन् मानव, समाज एवं उसके भौतिक पर्यावरण की क्रियाविधि का भी अध्ययन किया जाता है।

  • वर्ष 1935 में ए.जी. टांसले द्वारा सर्वप्रथम ‘पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की संकल्पना प्रस्तावित की गई। ए.जी. टांसले के अनुसार, पारिस्थितिकी तंत्र भौतिक तंत्रों का एक विशेष प्रकार होता है। जिसकी रचना अजैविक एवं जैविक घटकों से होती है। इनके अनुसार पारिस्थितिकी तंत्र, खुला तंत्र होता है। ये आकार में भिन्न-भिन्न होते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र के अनुसार परिवर्तन होता रहता है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र की विचारधारा को कार्ल मोबियस ने बायोसिनोसिस (Biocoenosis) तथा फोर्ब्स ने माइक्रोकॉस्म (Microcosm) कहा।

  • पारिस्थितिकी तंत्र प्रकृति की एक कार्यात्मक इकाई (Functional Unit) के रुप में जानी जाती है।

  • एक पारिस्थितिकी तंत्र जलाशय की एक बूंद जितनी छोटी भी हो सकती है। इसे सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र (Micro Ecosystem) कहते हैं। वहीं दूसरी ओर एक पारिस्थितिकी तंत्र एक महासागर जितना बड़ा भी हो सकता है। हमारी पृथ्वी स्वयं एक विशाल पारिस्थितिकी तंत्र है।

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  • जैवमंडल (Bioshphere) मिट्टी, शैल, जल तथा वायु की पतली परत है, जो पृथ्वी के चतुर्दिक आवरण मंडल के रुप में व्याप्त सबसे बड़ा पारिस्थितिकी तंत्र है जिसके साथ जीवित जीव (Living Organisms) संबंधित हैं तथा यह मंडल जीवों का भरण-पोषण करता है। इस प्रकार जैवमंडल एक आधारभूत ग्रहीय तंत्र (Basic Global System) होता है, जिसके जैविक (Biotic) एवं अजैविक (Abiotic) दो संघटक होते हैं।

  • ध्यातव्य है कि पारिस्थितिकी तंत्र एक प्राकृतिक इकाई है जिसमें एक क्षेत्र विशेष के सभी जीवधारी अर्थात पेड़-पौधे, जानवर और सूक्ष्म जीव शामिल हैं, जो कि अपने अजैव पर्यावरण के साथ अंतःक्रिया करके एक संपूर्ण जैविक इकाई बनाते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं –

  • पारिस्थितिकी तंत्र जीवमंडल में एक सुनिश्चित क्षेत्र धारण करता है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र एक कार्यशील क्षेत्रीय इकाई है।

  • इसकी रचना तीन मूल संघटकों से होती है –

  1. ऊर्जा संघटक

  2. जैविक (बायोम) संघटक

  3. अजैविक या भौतिक संघटक

  • पारिस्थितिकी तंत्र एक खुला तंत्र होता है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र प्राकृतिक संसाधन होते हैं अर्थात् इसकी अपनी उत्पादकता होती है।

  • किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र का, समय इकाई के संदर्भ में पर्य़वेक्षण किया जाता है।

 

 

पारितंत्र के घटक

  • किसी क्षेत्र के सभी जीवधारी तथा वातावरण में उपस्थित अजैव घटक संयुक्त रुप से पारितंत्र (Ecosystem) का निर्माण करते हैं। पारितंत्र जैविक व अजैविक घटकों से मिलकर बनी हुई एक रचना है होती है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र जीवमंडल में एक सुनिश्चित क्षेत्र धारण करता है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र एक कार्यशील क्षेत्रीय इकाई है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र एक कार्यशील क्षेत्रीय इकाई है।

  • पारिस्थितिकी तत्र एक खुला तंत्र होता है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र प्राकृतिक संसाधन होते हैं अर्थात इसकी अपनी उत्पादकता होती है।

  • अतः जीवमंडल में उपस्थित सभी संघटकों के वे समूह जो पारस्परिक क्रिया में सम्मिलित होते हैं। पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं। जीव विभिन्न प्रकार के जैविक संगठनों द्वारा जीवमंडल का निर्माण करते हैं।

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  • जीव से जैवमंडल का जैविक संगठन का सही क्रम है –

जनसंख्या – समुदाय – पारिस्थितिकी तंत्र – भू-दृश्य

  • ध्यातव्य है कि एक ही जाति के जीवधारियों की संख्या को उनकी जनसंख्या कहा जाता है। दो या दो से अधिक जातियों की जनसंख्या मिलकर समुदाय का निर्माण करती है। कई समुदाय मिलकर पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं तथा एक निश्चित भू-क्षेत्र में एक या उससे अधिक पारिस्थितिक तंत्र पाए जा सकते हैं।

पारिस्थितिक तंत्र के घटक

  • पारिस्थितिक तंत्र के अंतर्गत जैविक संघटकों को दो प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है – 1. स्वपोषित संघटक परपोषित संघटक

  1. स्वपोषित संघटक (Autotrophic Compnent) वे होते हैं, जो प्रकाश संश्लेषण अथवा रसायन संश्लेषण द्वारा अपना आहार स्वयं निर्मित करते हैं।

  2. उपभोक्ता (Consumers) मानव सहित परपोषित जंतु होते हैं, जो स्वपोषित पौधो (प्राथमिक उत्पादक या प्राथमिक पोषण) द्वारा उत्पन्न जैविक तत्वों से अपना आहार ग्रहण करते हैं। अतः उपभोक्ता द्वीतीयक, पोषक या द्वीतीयक उत्पादक कहलते हैं।

  • वियोजक (Decomposers) सूक्ष्मजीव होते हैं, जो मृत पौधों, जंतुओं और अन्य जैविक पदार्थों को सड़ा-गला कर वियोजित करते हैं। इसी प्रक्रिया के दौरान ये अपना आहार ग्रहण करते हैं और जैविक तत्वों की पुनर्व्यवस्था भी करते हैं

  • प्रकृति में पारिस्थितिकी तंत्र को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। वे स्थलीय एवं जलीय तंत्र कहलाते हैं। घास स्थल, वन तथा मरुस्थल, स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों के उदाहरण हैं। जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र में झील, नदियां तथा समुद्र आते हैं।

  • प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र मानवीय गतिविधियों द्वारा मानवीकृत पारिस्थितिक तंत्र में परिवर्तित हो सकता है। उदाहरणतया घास स्थल प्रदेश के बहुत बड़े भाग को जोतकर उसे शष्य भूमि में परिवर्तित किया जा चुका है। मानव ने प्राक़ृतिक वनों के बड़े भाग को काटकर उस भूमि पर वृक्षारोपण या कृषि कार्य किया है। अतः वन, झील तथा घास का मैदान प्राकृतिक पारितंत्र हैं, जबकि धान का खेत मानव निर्मित कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र है।

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  • पारिस्थितिक तंत्र को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है –

पारिस्थितिक तंत्र

स्थलीय – वन, घास स्थल, मरुस्थल

जलीय  – अलवणीय जल (तालाब, झील, झरना),  लवणीय जल (लवण झील, ज्वारनदमुख, समुद्र)

मानवीकृत – कृषि-खेत/खलिहान, जल जीवशाला (Aquarium), अंतरिक्ष यान

  • पृथ्वी के लगभग 71 प्रतिशत भाग पर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार है। अतः यह तंत्र विश्व के सर्वाधिक क्षेत्र पर फैला है।

  • समुद्र विश्व का विशालतम पारिस्थितिक तंत्र है। पृथ्वी पर विद्यमान जलमंडल (Hydrosphere) का लगभग 97 प्रतिशत भाग समुद्री जल होता है। समुद्री जल में सर्वाधिक व्याप्त लवण सोडियम क्लोराइड है।

  • पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न समुद्र आपस में मिले हुए हैं। ये बंटे हुए नहीं हैं जैसा कि स्थलीय महाद्वीपों के बीच देखने को मिलता है। ध्रुवों (Poles) तथा मध्य रेखा (Equator) के तापमान में बहुत अधिक अंतर पाया जाता है। इससे समुद्री धाराएं उत्पन्न होती हैं। इन समुद्री धाराओं के कारण जल का सारे समुद्र में एक-सा मिश्रण बना रहता है। इस कारण तापमानों का स्तरण (जैसा कि झीलो में होता है) नही हो पाता और जल में ऑक्सीजन की कमी भी नहीं होने पाती है।

  • समुद्र में ज्वार-भाटे आते रहते हैं जिससे स्तर बदलता रहता है। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र मे स्तरण (Stratification) पाया जाता है।

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पारिस्थितिकी असंतुलन

  • पारिस्थितिकी तंत्र सामान्यतया संतुलित अवस्था में अपनी विभिन्न गतिविधियों को संचालित करता रहता है। परंतु विभिन्न कारणों यथा वनोन्मूलन, प्रदूषण इत्यादि से पारिस्थितिक असंतुलन की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

  • पारिस्थितिक असंतुलन का मूल कारण वनोन्मूलन (लकड़ी काटना) है। वनोन्मूलन के कारण हैं जो निम्न हैं –

वनोन्मूलन के कारण –

  • प्राकृतिक आपदाएं

  • कागज की भारी मांग

  • शहरीकरण

  • नीति निर्धारण में सतत विकास की संकल्पना का अभाव

  • औद्योगिक व व्यावसायिक उपयोग के लिए लकड़ी काटना

  • वनाग्नि

  • झूम कृषि

  • वन भूमि का कृषि भूमि में परिवर्तन

  • वनों का चारागाह में परिवर्तन

  • भारत में पारिस्थितिक असंतुलन का मूल कारण वनोन्मूलन है, जबकि मरुस्थलीकरण, बाढ़, अकाल और वर्षा की परिवर्तनता इसके गौण कारणों में है।

  • वन्य जीवन संरक्षण एवं पर्यावरण में व्याप्त प्रदूषण का निवारण पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मददगार होता है।

  • ध्यातव्य है कि जल प्रबंधन, वन रोपण तथा वन्य जीव सुरक्षा से पारिस्थितिकी संतुलन सकारात्मक रुप से प्रभावित होता है। जबकि औद्योगिक प्रबंधन से पारिस्थितिकी संतुलन का कोई संबंध नही है। बनो को काटना भी पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मदद नही करता।

वहन क्षमता व पारिस्थितिकी कर्मता

  • एक संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र में जीवों की वृध्दि भी संतुलित होती है। यह संतुलित वृध्दि किसी पारितंत्र की वहन क्षमता के अनुरुप होती है।

  • वहन क्षमता अथवा जनसंख्या वहन-क्षमता (Carrying Capacity) किसी भौगोलिक क्षेत्र के पारितंत्र में किसी जीवधारी प्रजाति की उस अधिकतम जनसंख्या के रुप में पारिभाषित की जाती है जिसे उस पारितंत्र के संसाधन पोषण प्रदान कर सकते हैं।

  • वहन क्षमता से अधिक जनसंख्या वृध्दि उस पारितंत्र पर दबाव डालेगी और अत्यधिक वृध्दि उस तंत्र के विफल हो जाने का कारण भी बन सकती है।

  • ध्यातव्य है कि प्रजनन या संख्या वृध्दि-क्षमता किसी भी जीवधारी का अंतर्निहित गुण होता है।

  • बिना पर्यावरण की रुकावट के प्रजनन की यह क्षमता जैविक विभव (Biotic Potential) कहलाती है, जिसे संकेताक्षर r से दर्शाया जाता है। परंतु पर्यावरणीय प्रतिरोध बढ़ने के साथ वृध्दि रुक जाती है। यह वृध्दि एक निश्चित ऊपरी सीमा तक ही होती है। इसी ऊपरी सीमा को वहन क्षमता कहते हैं।

  • ध्यातव्य है कि पारिस्थितिक कर्मता पद द्वारा केवल किसी जीव द्वारा ग्रहण किए गए स्थान का ही नहीं, बल्कि जीवों के समुदाय में उसकी कार्यात्मक भूमिका का भी वर्णन किया जा सकता है।

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खाद्य श्रृंखला

  • किसी पारिस्थितिक तंत्र के संचालन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जीवों में यह ऊर्जा खाद्य पदार्थों के माध्यम से पहुंचती है।

  • ऐसे पदार्थ जिनके ऑक्सीकरण के पश्चात जीवधारियों को ऊर्जा प्राप्त होती है, खाद्य (Food) कहे जाते हैं। पौधे अपना खाद्य स्वयं निर्मित करते हैं। जबकि जंतु खाद्य के लिए पौधों पर निर्भर करते हैं।

  • खाद्य श्रृंखला विभिन्न प्रकार के जीवधारियों का एक ऐसा क्रम है जिससे किसी पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह होता है। ध्यातव्य है कि जीवों द्वारा ऊर्जा का यह प्रवाह एकदिशीय (Unidirectional) होता है। उदाहरणतया किसी घास स्थल पारितंत्र की खाद्य श्रृंखला मे विभिन्न घटकों का क्रम इस प्रकार है –

घास  – उत्पादक

टिड्डा – प्राथमिक उपभोक्ता

मेंढक – द्वीतीयक उपभोक्ता

सर्प  – तृतीयक उपभोक्ता

  • घास, बकरी तथा मानव आहार श्रृंखला का निर्माण करते हैं।

घास (प्राथमिक) – बकरी (शाकाहारी उपभोक्ता) – मनुष्य (सर्वाहारी उपभोक्ता)

  • ध्यातव्य है कि जीवीय संघटक (Biotic Components) ऐसी जीवित वस्तुएं हैं, जो एक पारिस्थितिकीय तंत्र का निर्माण करती हैं। जीवित संघटकों में सामान्यतः शामिल होते हैं –

  1. उत्पादक – जैसे – पौधे

  2. उपभोक्ता – जैसे – जानवर, मनुष्य आदि

  3. अपघटक – जैसे – कवक एवं जीवाणु

  • अतः तंत्र में ऊर्जा का अंतरण क्रमबध्द स्तरों की एक श्रृंखला में होता है जिसे खाद्य श्रृंखला कहता हैं।

  • पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न जीव (पेड़-पौधे एवं जंतु) अपनी पोषण संबंधी आवश्यकताओं के अनुसार एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं।

  • पारितंत्र के जैविक घटकों मे से हरें पौधे उत्पादक घटक के अंतर्गत आते हैं। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण की विधि द्वारा अपना आहार स्वयं निर्मित करते हैं। इस प्रकार के पौधों को स्पोषित (Autotrophs) भी कहा जाता है।

  • हरे पौधे मानव सहित समस्त जंतुओं के लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से आहार एवं ऊर्जा की आपूर्ति के प्रमुख स्त्रोत हैं।

  • वे सभी पौधे जो कि प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं, प्राथमिक पोषक या उत्पादक कहलाते हैं।

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  • पौधे प्रकाश संश्लेषण हरे रंग के लवक (क्लोरोफिल) की सहायता से करते हैं। क्लोरोफिल के कारण ही पौधे हरें रंग के दिखते हैं।

  • समुद्री खाद्य श्रृंखला में फाइटोप्लैन्क्टान्स मुख्य प्राथमिक उत्पादक होते हैं। ये प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

  • पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित ऑक्सीजन की अधिकतर मात्रा के लिए फाइटोप्लैन्कटॉन्स ही उत्तरदायी हैं। विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र के प्राथमिक उत्पादक इस प्रकार हैं –

प्राथमिक उत्पादक

पारिस्थितिक तंत्र

पादप्लवक (Phytoplankton)

गहरे जलीय स्त्रोत या समुद्र

जड़युक्त पौधे

छिछले पानी में

विभिन्न प्रकार की घासें एवं जंगली शाकीय पौधे

घास स्थल (Grassland)

फसल के पौधे

फसल भूमि (Cropland)

 

  • किसी खाद्य श्रृंखला में मुख्यतः शाकाहारी प्राणी ही प्राथमिक उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं। उदाहरणतया हिरण शाकारी प्राणी है, अतः यह प्राथमिक उपभोक्ता है।

  • चींटी अपघटक (Decomposer) तथा प्राथमिक उपभोक्ता दोनों की श्रेणी में आती है। यह पौधों को खाकर सेलुलोज से ऊर्जा प्राप्त करती है।

  • बाघ मांसाहारी प्राणी है तथा लोमड़ी सर्वाहारी है, ये दोनों प्राथमिक उपभोक्ता की श्रेणी में नही आते हैं।

  • अतः वे जीवधारी जो अपना भोजन प्राथमिक उत्पादकों (हरें पौधों) से प्राप्त करते हैं, प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं।

  • इन शाकाहारी प्राणियों को खाने वाले जीवधारियों को मांसाहारी कहा जाता है। अतः उपभोक्ता परपोषी जीव होता है।

  • ध्यातव्य है कि शाक-शब्जियों का सेवन करने पर मनुष्य प्राथमिक उपभोक्ता जबकि मांसभक्षी होने पर द्वीतीयक उपभोक्ता की श्रेणी में आएगा।

  • अपघटक वे जीव होते हैं, जो अपक्षय या सड़न की प्रक्रिया को तेज करते हैं जिससे पोषक तत्वों का पुनः चक्रीकरण हो सके। अपघटक निर्जीव कार्बनिक तत्वों को अकार्बनिक यौगिकों में तोड़ते हैं।

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  • सूक्ष्म जीवों की एक विस्तृत किस्म जैसे फंफूद, जीवाणु गोलकृमि, प्रोटोजोआ और केंचुआ अपघटकों की भूमिका अदा करते हैं। अपघटक पोषण के लिए मृत कार्बनिक पदार्थ अपरदन पर निर्भर करते हैं।

  • अपघटक उपभोक्ता की तरह अपना भोजन निगलते नहीं, बल्कि वे अपने शरीर से, मृत या मृतप्राय जीवधारियों (पौधों व जंतुओं) पर विभिन्न प्रकार के एंजाइम का स्त्रावण करते हैं। इससे विखंडित होकर मृदा में सामान्य अकार्बनिक पदार्थ का उत्सर्जन हो जाता है तथा इन्हें पौधे मृदा से प्राप्त करते हैं। इस प्रकार कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस व अन्य अकार्बनिक तत्वों का पारितंत्र में पुनः चक्रीकरण हो जाता है।

  • स्थलीय पारितंत्र की तरह ही समुद्री पारितंत्र में भी खाद्य/आहार श्रृंखला पाई जाती है।

  • एक साधारण समुद्री आहार श्रृंखला का सही क्रम है –

डायटम (स्वपोषी) – क्रस्टेशियाई (शाकाहारी उपभोक्ता) – हेरिंग (मांसाहारी उपभोक्ता)

  • उल्लेखनीय है कि तितलियां पौधों के परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, अतः इनकी संख्या में गिरावट से पौधों के परागण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। तितलियां खाद्य श्रृंखला में निम्न सदस्य (Lower Member) के रुप में कार्य करती हैं। यह बर्रे, मकड़ी, पक्षी, मेंढक, सर्प इत्यादि का भोजन हैं। अतः तितलियों की संख्या में गिरावट से इस खाद्य श्रृंखला पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

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ऊर्जा का प्रवाह

  • पारिस्थितिकी निकाय में ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत और ऊर्जा है।

  • जैवमंडलीय पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह एक दिशी होता है।

  • जैवमंडलीय पारिस्थितिकी तंत्र धरती पर स्थापित सभी पारिस्थितिकी प्रणालियों का योग है।

  • ऊर्जा का प्रवाह अजैविक प्रणाली से जैविक प्रणाली की दिशा में होता है।

  • ऊष्मागतिकी के पहले नियम के अनुसार, ऊर्जा का न तो सृजन हो सकता है और न ही उसे नष्ट किया जा सकता है। यह एक स्वरुप से दूसरे स्वरुप में परिवर्तित हो सकती है।

  • दूसरे नियम के अनुसार, जब ऊर्जा एक रुप से दूसरे रुप में परिवर्तित होती है, तो उसका कुछ ह्रास होता है। अतः उत्पाद में अपेक्षाकृत कम ऊर्जा होती है। ऊर्जा उत्पादक से प्राथमिक उपभोक्ता की तरफ, प्राथमिक से द्वीतीयक उपभोक्ता की तरफ तथा द्वीतीयक से तृतीयक उपभोक्ता की तरफ प्रवाहित होती है।

  • हर पोषण स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है। उल्लेखनीय है कि स्वपोषी जीवों द्वारा ग्रहण की गई ऊर्जा पुनः सौर ऊर्जा में परिवर्तित नही होती तथा शाकाहारियों को स्थानांतरित की गई ऊर्जा को स्पपोषी जीव नही प्राप्त कर सकते हैं। अतः ऊर्जा का प्रवाह एक दिशीय होता है।

  • ध्यातव्य है कि विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में उत्पादकों की सकल उत्पादकता का लगभग 10 प्रतिशत भाग ही शाकाहारियों द्वारा स्वांगीकृत हो पाता है।

  • लिंडेमान (Lindeman, 1942) ने 10 प्रतिशत का नियम (Ten Percent Law) दिया है। इसके अनुसार, शाकाहारी जंतु, उत्पादक की शुध्द प्राथमिक उत्पादकता (Net Primary Productivity) का 10 प्रतिशत भाग अपने में संचित करता है। इस प्रकार खाद्य कड़ी के प्रत्येक स्तर (प्रथम, द्वीतीय, तृतीय एवं सर्वश्रेष्ठ श्रेणी के स्तर) पर उपभोक्ता केवल 10 प्रतिशत संचित ऊर्जा को अपने शरीर में रुपांतरित करता है।

पोषण स्तर

  • पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) की आहार श्रृंखला में सामान्यतः तीन से चार पोषण स्तर होते हैं। ये इस प्रका हैं –

पोषण स्तर एक (आधार पोषण स्तर) – स्वपोषित जीव, प्राथमिक उत्पादक

पोषण स्तर दो – प्राथमिक उपभोक्ता

पोषण स्तर तीन – द्वीतीयक उपभोक्ता

पोषण स्तर चार – सर्वाहारी/अंतिम उपभोक्ता (उच्चतम पोषण स्तर)

  • अपघटक (Decomposers) उपर्युक्त सभी पोषण स्तरों से आहार ग्रहण करते हैं।

पिरामिड

  • पारिस्थितिकीय तंत्र के विभिन्न स्तरों के प्रति इकाई क्षेत्र में उपस्थित जीवभार के रेखाचित्रीय निरुपण को जीवभार का पिरामिड कहते हैं।

  • स्थलीय पारिस्थितिकीय तंत्र में जीवभार का पिरामिड सीधा (Upright) होता है, जबकि जलीय पारिस्थितिकीय तंत्र (जैसे तालाब) में जीवभार का पिरामिड उलट जाता है अर्थात उल्टा (Inverted) होता है।

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जैव वानिकी एवं जैविक आवर्धन

  • जैव वानिकी अर्थात बायोनॉमिक्स शब्द bio तथा nomics शब्दों से मिलकर बना है। Bio शब्द का तात्पर्य जीव या जीवन से है, जबकि nomics ग्रीक शब्द nomos से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है, नियम (Law)।

  • इस प्रकार बायोनॉमिक्स शब्द का शाब्दिक अर्थ जीवन के नियम समीचीन प्रतीत होता है। यह पारिस्थितिकी का पर्याय है। साथ ही, यह प्राकृतिक तंत्र के मूल्यों पर बल देता है, जो मानव तंत्रों को प्रभावित करते हैं।

जैविक आवर्धन

  • ध्यातव्य है कि कुछ प्रदूषक आहार श्रृंखला के साथ सांद्रता में बढ़ते जाते हैं और ऊतकों मे जमा होते हैं, तो इस घटना को जैविक आवर्धन (Biomagnification) कहते हैं।

  • DDT जैसे प्रदूषक जैव अनिम्नीकरणीय (Non Biodegradable) होते हैं। इनका एक बार अवशोषण होने के पश्चात उत्सर्जन द्वारा बाहर निकलना लगभग असंभव हो जाता है।

  • DDT एक ऐसा रसायन है जिसे जैविक रुप से नष्ट नहीं किया जा सकता। खाद्य श्रृंखला में DDT का सांद्रण प्रथम स्तर पर सबसे कम, द्वीतीय स्तर पर सबसे अधिक एवं तृतीय स्तर पर सबसे अधिक होगा।

  • घास स्थल पारितंत्र में चूंकि सांप एक तृतीयक उपभोक्ता है, अतः DDT का सांद्रण सांप में सबसे अधिक होगा। ये सामान्यतः जीवों के वसा वाले ऊतकों में जमा होते हैं। उल्लेखनीय है कि DDT एक कीटनाशक है।

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जैव भू-रासायनिक चक्र एवं जैविक अनुक्रमण

  • पारिस्थितिक तंत्र में अजैविक तत्वों के जैविक प्रावस्था में परिवर्तन तथा इन जैविक तत्वों के अजैविक रुप में पुनरागमन के प्रारुप को जैव भू-रासायनिक चक्र कहते हैं।

  • प्रकृति में नाइट्रोजन, फास्फोरस, कार्बन इत्यादि तत्वों के जैव भू-रासायनिक चक्र (Bio Geochemical Cycle) पाए जाते हैं। यह मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं –

  1. गैसीय चक्र (Gaseous Cycle) – O2N2 चक्र

  2. अवसादीय चक्र (Sedimentary Cycle) – Ca, P, S तथा K चक्र

  • ध्यातव्य है कि जल चक्र को ओडम (Odum) ने गैसीय चक्र में सम्मिलित किया है।

  • भौतिकीय वातावरण में किसी समुदाय का समय के साथ रुपांतरण ही पारिस्थितिक अनुक्रमण कहलाता है। उदाहरणतया घास स्थलों में घास वर्षा में अधिकार जल को पौधों की जड़ों तक पहुंचाने से पूर्व ही अवशोषित कर लेती है। साथ ही आग लगने आदि कारणों से घास स्थलों की भूमि पथरीली और बंजर हो जाती है। ऐसी भूमि लाइकेनों के उगने के लिए आदर्श वातावरण उपलब्ध कराती है।

  • एफ. क्लिमेंट ( Clement) ने वर्ष 1916 में पौंधों की विभिन्न प्रजातियों का अध्ययन किया तथा अनुक्रमण (Succession) की सर्वमान्य परिभाषा दी। उनके अनुसार, अनुक्रमण वह प्राकृतिक विधि है जिसके अंतर्गत एक ही निहित तथा निश्चित स्थान पर एक विशेष समूह,  दूसरे समूह द्वारा विस्थापित हो जाता है।

  • ओडम (Odum) नाम वैज्ञानिक ने अनुक्रमण को एक क्रमागत विधि बताया। जैविक अनुक्रमण का सही क्रम निम्नलिखित है –

  • नग्नीकरण (Nudation)

  • प्रवास (Migration)

  • आस्थापना (Ecesis)

  • प्रतिक्रिया (Reaction)

  • स्थिरीरकण (Stabilization)

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पारिस्थितिक आंदोलन

  • पारिस्थितिक तंत्र को साम्यावस्था में रखने हेतु जागरुक व्यक्तियों द्वारा समय-समय पर विभिन्न आंदोलन चलाए गए हैं। उनमें से एक प्रमुख आंदोलन चिपको आंदोलन है।

  • चिपको आंदोलन पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए किया गया एक महत्वपूर्ण आंदोलन था।

  • वनों की कटाई को रोकने के लिए 26 मार्च, 1974 को गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाएं वृक्षों से चिपककर खड़ी हो गई और पेड़ों को नहीं काटने दिया। 70 के दशक का यही आंदोलन पादप संरक्षण की मिसाल बन गया।

  • नर्मदा बचाओं आंदोलन नर्मदा नदी के ऊपर बनाई जा रही बहुउद्देशीय बांध परियोजना को रोकने के लिए चलाया गया आंदोलन है।

  • एपिको आंदोलन दक्षिण भारत का पर्यावरण संरक्षण सें संबंधित आंदोलन है। यह आंदोलन कर्नाटक में आरंभ हुआ था।

पारिस्थितिक पदछाप एवं मिलेनियम इकोसिस्टम एसेसमेंट

  • पारिस्थितिकीय तंत्र के विभिन्न घटकों का उपयोग मानव जीवन के लिए आवश्यक है।

  • पारिस्थितिकीय घटकों की वह आवश्यक मात्रा जो मनुष्य को उसकी जीवनशैली को सुचारु रुप से चलाने के लिए आवश्यक होती है, पारिस्थितिक पदछाप कहलाती है। इसके अंतर्गत मनुष्य द्वारा कार्बन उत्सर्जन का भी मापन किया जाता है।

  • अविवेकशील जीवनशैली जिसमें पारिस्थितिक तंत्र घटकों यथा – जल, ऊर्जा इत्यादि का आवश्यकता से अधिक दोहन किया जाता है, पदछाप के आकार को बढ़ा देती है।

  • आधुनिक युग में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बढ़ रही है। इससे मुख्यतया ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में भी बढ़ोत्तरी हो रही है।

  • मानव, समुदाय व देश नीतियों के सतत विकास के संदर्भ में बनाकर अपने-अपने पारिस्थितिकीय पदछाप के आकार को सम्यक् बना सकते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि पारिस्थितिक पदछाप या पदचिन्ह, पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्रों पर मानवीय मांग का एक मापक है। यह इंसान की मांग की तुलना, पृथ्वी की पारिस्थितिकी के पुनरुत्पादन करने की क्षमता से करता है।

  • पारिस्थितिकीय पदछाप के माप की इकाई भूमंडलीय हेक्टेयर (Global Hectares) है।

  • ध्यातव्य है कि पारिस्थितिक तंत्र मानव व प्रकृति को विभिन्न सेवाएं प्रदान करता है।

  • वर्ल्ड डेपलपमेंट रिपोर्ट, 2010 के अनुसार, मिलेनियम इकोसिस्टम असेसमेंट पारिस्थितिक तंत्र की सेवाओं के निम्न पांच प्रमुख वर्गों का वर्णन करता है।

  • पोषण चक्रण और फसल परागण समर्थन सेवाएं हैं।

पारिस्थितिक तंत्र की सेवाएं

  1. व्यवस्था सेवाएं (Provisioning Services) – खाद्यान्न एवं जल का उत्पादन

  2. नियंत्रण सेवाएं (Regulating Services) – जलवायु और रोग का नियंत्रण

  3. समर्थन सेवाएं (Supporting Services) – पोषण चक्रण, फसल चक्रण

  4. सांस्कृतिक सेवाएं (Cultural Services) – आध्यात्मिक, शैक्षणिक, मनोरंजन सेवाएं

  5. संरक्षण सेवाएं (Preserving Services) – विविधता अनुरक्षण

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पारिस्थितिक तंत्रः परीक्षोपयोगी तथ्य

  • यूकेलिप्टस को उसकी अत्यधिक जल ग्रहण शक्ति के कारण पर्यावरण शत्रु के रुप में घोषित किया गया है। इसको जिस स्थान पर लगाया जाता है। वहां की मिट्टी का जलस्तर काफी नीचे चला जाता है। यह पौधा ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में बहुतायत में पाया जाता है।

  • स्थिर जल के आवास लैन्टिक आवास के अंतर्गत आते हैं, जैसे आर्द्रभूमि, तालाब, झील, जलाशय इत्यादि। बहते जल के आवास लोटिक (Lotic) आवास कहे जाते हैं, जैसे – नदी।

  • दो भिन्न समुदायों के बीच का संक्रमण क्षेत्र इकोटोन कहलाता है।

  • सर्वाधिक स्थायी पारिस्थितिक तंत्र महासागर है।

  • पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) शब्द का प्रथम प्रयोग ए.जी. टांसले द्वारा किया गया है।

  • परितंत्रों की घटती उत्पादकता के क्रम में उनका सही अनुक्रम है – मैंग्रोव, घास स्थल, झील, महासागर। अधिक विविधता वाले पारितंत्र की उत्पादकता भी अधिक होगी।

  • पिक्नोक्लाइन किसी जल निकाय में घनत्व प्रवणता को दर्शाती है। हैलोक्लोइन किसी जल निकाय में लवणता प्रवणता को प्रदर्शित करती है।

  • थर्मोक्लाइन किसी जल निकाय मे गहराई के साथ तापमान परिवर्तन को दर्शाती है।

  • अर्नीज नेस ने वर्ष 1973 में सर्वप्रथम गहन पारिस्थितिकी शब्द का प्रयोग किया था।

  • पारिस्थितिकी निशे (Niche) शब्द को सर्वप्रथम जोसेफ ग्रीनेल (Joseph Grinnell) ने वर्ष 1917 में प्रस्तुत किया था जिसे इन्होंने सूक्ष्म-आवास (Micro-Habitats) कहा था।

  • भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम वर्ष 1972 मे लागू किया गया। पर्यावरण (संरक्षण), अधिनियम, पर्य़ावरण के संरक्षण एवं सुधार के लिए वर्ष 1986 मे लागू किया गया।

  • जनजातियों एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों ( वन अधिकारों को मान्यत) अधिनियम दिसंबर, 2006 में लागू किया गया। वन संरक्षण अधिनियम वर्ष 1980 में लागू किया गया था।

  • समुद्री उत्प्रवाह एक ऐसी घटना है जिसमें वायु प्रवाह द्वारा समुद्र की सतह पर विद्यमान गर्म, पोषकरहित जल को, सघन, ठंडे तथा पोषक तत्वो से परिपूर्ण जल द्वारा स्थानांतरित क दिया जाता है।

  • पारिस्थितिक संवेदी क्षेत्र वें हैं जिन्हें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत घोषित किया गया है।

  • पारिस्थितिक संवेदी क्षेत्रो में रात्रि के समय व्यावसायिक प्रयोजनों हेतु वाहनो के आवागमन को विनियमित (Regulated) किया जाता है और यह प्रतिबंधित नही है। अतः कृषि को छोड़कर सभी मानव क्रियाओं का निषेध नहीं है बल्कि कुछ पर प्रतिबंध लगाया गया है और कुछ को विनियमित किया गया है।

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जैव विविधता

जैव विविधता

  • किसी पर्यावरण में विभिन्न प्रजातियों की श्रेणियों को जैव विविधता के रुप में जाना जाता है।

  • पर्यावरण में जातियां कई समुदायों में संगठित रहती हैं ये समुदाय एक पारितंत्र में पाए जाते हैं। इसके आधार पर जैव विविधता का मापन किया जाता है।

  • जैव विविधता अल्फा (a), बीटा (b), गामा (g) नामक श्रेणिंयों में विभाजित की जाती है। यह विभाजन व्हिटैकर (Whittaker) ने वर्ष 1972 मे किया था।

  • किसी पारिस्थितिक तंत्र में विद्यमान सजीव प्राणियों (पौधों एवं जंतुओं) की विविधता को ही जैव विविधता के रुप में पारिभाषित किया जा सकता है। प्रारंभ में जैव विविधता शब्द को अंग्रेजी शब्द Biological Diversity के रु में प्रथमतः रेमेंड एफ. दासमैन (Ramymond F. Dassmann) ने  वर्ष 1968 में अपनी पुस्तक A Different Kind of Country में दिया था।

  • बाद में जैव विविधता को अंग्रेजी शब्द Bilogical Diversity से परिवर्तित कर Biodiversity के रुप में सर्वप्रथम डब्ल्यू. जी. रोसेन (G. Rosen) ने प्रयोग किया था।

  • जैव विविधता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पारिस्थितिक तंत्र का निर्वहन है। यह कार्य विभिन्न स्तरों पर किया जाता है। जैव विविधता आनुवांशिक, जाति, समुदाय व पारितंत्र के स्तर पर विभिन्न प्रकार के कार्य़ करके पारिस्थितिक तंत्र का निर्वहन करती है।

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जैव विविधता के स्तर

आनुवांशिक विविधता – जीन्स (Genes) की विभिन्नता

जाति विविधता      – विभिन्न जातियों के बीच विविधता

समुदाय व पारितंत्र विविधता – एक क्षेत्र में पाई जाने वाली विविधता

  • अतः जैव विविधता के विषय में जागरुकता फैलाने हेतु जैव विविधता दिवस व जैव विविधता दशक मनाने जैसे आयोजन किए जाते हैं।

  • ध्यातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 22 मई को जैव विविधता दिवस मनाया जाता है, जबकि विश्व के कई देश 29 दिसंबर को जैव विविधता दिवस मनाते हैं। उल्लेखनीय है कि 29 दिसंबर, 1993 से जैव विविधता अभिसयम प्रभावी हुआ था।

  • ध्यातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने दिसंबर, 2010 में प्रस्ताव संख्या 65/161 के माध्यम से 2011-20 को जैव विविधता दशक (United Nations Decade on Biodiversity) घोषित किया था।

जैव विविधता प्रवणता

  • जैव विविधता हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं पाई जाती है। यह उस क्षेत्र की जलवायु, मृदा, तापमान, आर्द्रता इत्यादि जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करती है। जैव विविधता कहीं पर कम तथा कहीं पर ज्यादा पाई जाती है।

  • सर्वाधिक जैव विविधता उष्णकटिबंधीय वर्षों वनों में पाई जाती है। इस क्षेत्र का विस्तार 100 उ. तथा 100 द. अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। इन क्षेत्रों में पादप तथा प्राणियों के विकास तथा वृध्दि के लिए अनुकूलतम दशाएं पाई जाती हैं क्योकि इसमें वर्ष भर उच्च वर्षा तथा तापमान रहता है। इसी कारण इसे अनुकूलतम बायोम (Optimum Biome) भी कहा जाता है।

  • उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में पृथ्वी के सभी पारिस्थितिक तंत्रों से सर्वाधिक जैव विविधता पाई जाती है। उष्णकटिबंधीय वर्षा वन भूमध्य रेखा के आस-पास विस्तृत हैं।

  • जैव विविधता पृथ्वी पर समान रुप से वितरित नहीं है। जैव विविधता भूमध्य रेखा की तरफ बढ़ती है। सर्वाधिक जैव विविधता उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इसका कारण यह है कि यहां गर्म जलवायु, अधिक वर्षा एवं पादप तथा प्राणियों के विकास तथा वृध्दि के लिए अनुकूलतम दशाएं पाई जाती हैं।

  • उच्चतर अक्षांशों की तुलना में निम्नतर अक्षांशों में जैव विविधता सामान्यतः अधिक  होती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र जहां की जैव विविधता सर्वाधिक है निम्न अक्षांशों में ही अवस्थित हैं।

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  • पर्ववतीय क्षेत्रों में उच्चतर उन्नतांशो (चोटियों) की तुलना में निम्नतर उन्नतांशों (घाटियों) में जैव विविधता सामान्यतः अधिक होती है।

  • उदाहरणतया केरल स्थित शांत घाटी (Silent Valley) में प्रचुर जैव विविधता (Bio-Diversity) पाई जाती है। यह केरल के पलक्कड़ जिले में 12 किमी. लंबी एवं 7 किमी. चौड़ाई में विस्तृत है। इसकी अवस्थिति 11003‘ से 11013‘ उत्तरी अक्षांशों तथा 76021‘ से 76035‘ पूर्वी देशांतरों के मध्य मिलती है। यह पश्चिमी घाट पर्वतों का हिस्सा है।

  • वर्तमान में शांत घाटी को बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया था। इस घाटी को वर्ष 1984 में नेशनल पार्क घोषित किया गया था। साइलेंट वैली परियोजना का संबंध केरल राज्य से है। यह शांत घाटी में स्थित है.

  • फूलों की घाटी (Valley of Flowers) उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है।

  • इसके अतिरिक्त हिमालय पर्वत प्रदेश भी जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृध्द है। इसका प्रमुख कारण, यहां विभिन्न जीव-भौगोलिक क्षेत्रों का सम्मिलन होना है।

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जैव विविधता हॉटस्पॉट

  • हॉटस्पॉट, ऐसे स्थान को कहा जाता है जहां पर जातियों की पर्याप्तता तथा स्थानीय जातियों की अधिकता पाई जाती है लेकिन साथ ही इन जीव जातियों के अस्तित्व पर निरंतर संकट बना हुआ है।

  • हॉटस्पॉट शब्द को सर्वप्रथम प्रयोग नार्मन मायर्स ने वर्ष 1988 में किया।

  • जैव विविधता हॉटस्पॉट केवल उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में ही नहीं बल्कि उच्च अक्षांशीय प्रदेशों में भी पाए जाते हैं।

  • भारत में चार जैव विविधता हॉटस्पॉट स्थल हैं। ये हॉटस्पॉट स्थल हैं –

  1. पूर्वी हिमालय

  2. पश्चिमी घाट

  3. म्यांमार-भारत सीमा

  4. सुंडालैंड

  • अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह म्यांमार-भारत सीमा तथा सुंडालैंड का ही भाग है।

  • पूर्व हिमालय ( Eastern Himalays) जैव विविधता हॉटस्पॉट स्थलो में शामिल है। इसके अतिरिक्त भूमध्य सागरीय बेसिन और दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया भी इसमें शामिल हैं।

  • कंजर्वेशन इंटरनेशनल द्वारा जैव विविधता से संबंधित प्रखर स्थलों (Hotspots) की अद्यतन सूची जारी की गई है, जिसमें विश्व के 35 स्थल सूचीबध्द हैं। इसमें भारत के पश्चिमी घाट सहित श्रीलंका तथा पूर्वी हिमालय क्षेत्रा का नामोल्लेख है।

  • ध्यातव्य है कि फरवरी, 2016 में सी.ई.पी.एफ. (Critical Ecosystem Parnership Fund- C.E.P.F.) द्वारा उत्तरी अमेरिका के तटीय मैदान (The North American Coastal Plain) को 36वां जैव विविधता हॉटस्पॉट घोषित किया गया है।

  • जैव विविधता के प्रखर स्थलों (Hotspots) को जाति बहुतायता, स्थानिकता तथा आशंका बोध के आधार पर मान्यता प्रदान की जाती है।

  • भारत एक ऐसा देश है, जो उल्लेखनीय जैव विविधता को प्रदर्शित करता है।

  • भारत में 18 विशाल विविध (Mega-Diverse) देशो के कुल स्तनधारियों का 7.6 प्रतिशत, पक्षियों की 12.6 प्रतिशत, सरीसृपों की 6.2 प्रतिशत तथा उभयचरों की 4.4 प्रतिशत आबादी है। पश्चिमी घाट जैव विवधता की दृष्टि से संतृप्त क्षेत्र है।

  • ध्यातव्य है कि 36वें संविधान संशोधन, 1975 के द्वारा सिक्किम को भारत का अभिन्न अंग बना लिया गया। इसे वनस्पति शास्त्रियों का स्वर्ग माना जाता है क्योंकि यह पूर्वी हिमालय के हॉटस्पॉट क्षेत्र में आता है, जो जैव विविधता से परिपूर्ण है। यहां के मुख्य निवासी लेप्चा, भूटिया और नेपाली लोग हैं। परंतु इन प्रयासों के उपरांत भी जैव विविधता का ह्रास हो रहा है। विभिन्न प्राकृतिक एवं मानवजनित कारक इस ह्रास के लिए उत्तरदायी हैं।

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जैव विविधता ह्रास के प्रमुख कारक

  • जैव विविधता के नाश का प्रमुख कारण प्राकृतिक आवासों का ह्रास, प्राक़ृतिक संसाधनों का अतिदोहन, विदेशी प्रजातियों का आक्रमण, वन क्षेत्र या वनों की सघनता कम होना, औद्योगीकरण तथा अवैज्ञानिक तरीके से खनन के साथ अवैध शिकार और तस्करी आदि हैं।

  • प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तथा औद्योगिक उत्पादन एवं नगरीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राकृतिक वास का विनाश किया जा रहा है, जो जैव विविधता के ह्रास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक है।

  • भौगोलिक क्षेत्र में जैव विविधता वैश्विक तापन, आवास के विखंडन एवं विदेशी जाति के संक्रमण से संकटापन्न स्थिति में पहुंच सकती है। जबकि शाकाहार को प्रोत्साहन जैव विविधता के लिए संकट नहीं उत्पन्न करता है।

जैव विविधता ह्रास के महत्वपूर्ण कारक:-

जैव विविधता को खतरा

  • विदेशी जातियों का पुनर्वास

  • आवास ह्रास एवं विखंडन

  • वैश्विक तापन एवं प्रदूषण

  • जातियों का विलोपन – नैसर्गिक विलोपन, समूह विलोपन, मानवोद्भवी विलोपन

  • ध्यातव्य है कि जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक विकास एवं प्राकृतिक आवासों में कमी के चलते जैव विविधता के समक्ष बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है।

  • देश के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों में झूम खेती प्रचलित है, जो कि खेती का अवैज्ञानिक तरीका है। झूम खेती के फलस्वरुप बड़ पैमाने पर वनों का नाश हुआ है और भूमि की उर्वरा शक्ति कम हुई है।

  • वहीं दूसरी ओर बंजर भूमि का वनीकरण जैव विविधता के विकास में सहायक है न कि इससे जैव विविधता में ह्रास होता है। इस प्रकार बंजर भूमि का वनीकरण जैव विविधता के ह्रास का कारण नहीं है। इसके विपरीत सड़कों का विस्तार, नगरीकरण एवं कृषि का विस्तार जैव विविधता के ह्रास के लिए उत्तरदायी कारकों में शामिल हैं।

  • उल्लेखनीय है कि भारत की आबादी (Population) में उत्तरोत्तर प्रगति हो रही है किंतु पक्षियों (Birds) की संख्या में गिरावट का करण इनके वास स्थान (Habitat) में व्यापक तौर पर कटौती तथा कीटनाशकों (Insecticides), रासायनिक उर्वरकों एवं मच्छर भगाने वाली दवाओं का अतिशय उपयोग है।

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  • D.T. जैसे कीटनाशी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) द्वारा पक्षियों में पहुंच जाते हैं जिससे उनके अंडे समय से पहले फूट जाते हैं तथा इनकी संख्या में गिरावट आती है।

  • ध्यातव्य है कि पारिस्थितिकी तंत्र, एक गतिकीय तंत्र होता है, जिसके भीतर अनेक प्रकार की घटनाएं होती रहती हैं। जैसे, पौधों को प्राणी खाते हैं तथा स्वयं इन प्राणियों को अन्य प्राणी खाते रहते हैं। इस तरह कई पोषण स्तरों का निर्माण होता है।

  • पोषण स्तरों में कमी से एक विशेष वर्ग के जीवों की संख्या में वृध्दि होती है, जबकि जैव विविधता में कमी आती है। वहीं जैव विविधता की बढ़ोत्तरी में पारिस्थितिकी तंत्र की उत्पादकता, उसकी आयु तथा मध्य-व्यवधान सहायक होते हैं।

जैव विविधता का संरक्षण

  • जैव विविधता के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण रणनीति जैवमंडल रिजर्व है।

  • जैवमंडल रिजर्व की स्थापना का उद्देश्य प्राकृतिक एक अर्ध्द-प्राकृतिक भूमि पर मुख्यतया स्वस्थाने (in-Situ) जैव विविधता का संरक्षण करना है।

  • ध्यातव्य है कि जैव विविधता संरक्षण के लिए स्वस्थाने (In-Situ) व बाह्य –स्थाने (Ex-Situ) तकनीके अपनाई जाती हैं।

  • राष्ट्रीय उद्यानों तथा वन्य जीव अभ्यारण्यों में इन-सीटू संरक्षण (In-Situ Conservation) द्वारा आनुवांशिक विविधता का रख-रखाव किया जाता है। जब किसी वनस्पति या जीवों का संरक्षण उनके मूल प्राकृतिक आवास क्षेत्र में ही किया जाता है, तो उसे इन-सीटू संरक्षण कहते हैं, जबकि उन्हें कहीं दूसरे स्थान पर संरक्षित किया जाता है तो उसे एक्स-सीटू (Ex-Situ) संरक्षण कहा जाता है।

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  • अतः स्पष्ट है कि वनस्पति संरक्षण हेतु वानस्पतिक उद्यान स्वस्थाने (In-Situ) पध्दति के अंतर्गत नही आता है।

  • एक्स-सीटू संरक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा वनस्पतियों एवं जानवरों की विलुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण उनके प्राकृतियों आवास से पृथक किया जाता है। एक्स-सीटू संरक्षण की दो विधियां हैं – पहली विधि के तहत जूलॉजिकल पार्कों में विलुप्तप्राय प्रजातियों का पालन-पोषण किया जाता है। जबकि दूसरी विधि के तहत जीवित शुक्रीणुओँ, अंडो तथा भ्रूणो के नमूनों को अत्यंत कम तापमान पर द्रवित नाइट्रोजन में संरक्षित किया जाता है।

  • जैव विविधता के साथ-साथ मनुष्य के परंपरागत जीवन के संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीति जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र की स्थापना करने में निहित हैं।

  • एक जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र में मानव भी व्यवस्था का अभिन्न अंग होता है। इन क्षेत्रों में चतुर्दिक पारिस्थितिक संवर्ध्दन को प्रमुखता दी जाती है।

  • जीवमंडल आरक्षित क्षेत्रों के मुख्य उद्देश्य हैं –

  1. पौधों, जीव-जंतुओँ और सूक्ष्मजीवों की विविधता तथा संपूर्णता को बनाए रखना।

  2. सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक तंत्र की दृष्टि से निर्वहन योग्य आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना।

  3. पारिस्थितिकी विज्ञान में शोधों को प्रोत्साहन देना।

  4. शिक्षा एवं जनजागरुकता प्रशिक्षण की सुविधाएं प्रदान करना।

  • भारत सरकार ने अब तक 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए हैं जिनमें से निम्न 10 को यूनेस्कों ने जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों के विश्व संजाल में सम्मिलित किया है –

  1. नीलगिरि

  2. नंदा देवी

  3. सुंदरबन

  4. मन्नार की खाड़ी

  5. नोकरेक

  6. पंचमढ़ी

  7. सिमलीपाल

  8. अचानकमार-अमरकंटक

  9. ग्रेट निकोबार

  10. अगस्त्यमलाई

  • जीवमंडल आरक्षित परिरक्षण क्षेत्र आनुवांशिक विभिन्नता से संबंधित होते हैं। इनमें जीवों की आनुवांशिकता को बनाए रखने के लिए उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाता है।

  • भारतीय सामुद्रिक विज्ञान संस्थान के अनुसार भारत मे प्रवाल भित्ति वाले 4 प्रमुख क्षेत्र-अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, कच्छ की खाड़ी, मन्नार की खाड़ी और लक्ष्यद्वीप हैं।

  • प्रवाल भित्ति क्षेत्रों में मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी तथा अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में फ्रीजिंग (Fringing) प्रकार की प्रवाल भित्तियां तथा लक्षद्वीप में एटॉल (Atoll) प्रकार की प्रवाल भित्तियां पाई जाती हैं।

  • प्रावल-विरंजन समुद्री तापमान और अम्लता में वृध्दि, वैश्विक ऊष्मन सहित पर्य़ावरण दबाव के कारण होता है जिससे सहजीवी शैवाल का मोचन और प्रवालों की मृत्यु, दोनों घटित होते हैं। ध्यातव्य है कि सुंदरवन मैंग्रोव वन क्षेत्रों के लिए जाना जाता है।

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जैव विविधता के उपयोग

  • जैव विविधता मृदा निर्माण, मृदा अपरदन की रोकथाम, अपशिष्ट का पुनःचक्रण और सस्य परागण द्वारा मानव अस्तित्व का आधार बनी हुई है।

  • जैव विविधता के कई अन्य उपयोग हैं।

जैव विविधता के उपयोग

भोजन व उन्नत किस्मों का स्त्रोत – नई फसलें, उन्नत किस्म की फसलें

दवाएं एवं औषधियां – कुनैन, टैक्साल, बोटानोकेमिकल्स, मॉर्फीन

पारितंत्र सेवाएं – अपशिष्ट का पुनः चक्रण, जल संरक्षण, मृदा निर्माण, मृदा अपरदन की रोकथाम, पोषण चक्रण, सस्य परागण, जलवायु नियंत्रण (वनों व सागरों द्वारा)

सांस्कृतिक लाभ – धार्मिक विश्वास, राष्ट्रीय गौरव

सौंदर्य़परक लाभ – पर्यटन, पालतू जानवर, साहित्य रचना।

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IUCN

  • आईयूसीएन एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जो प्रकृति संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रयोग के क्षेत्र में कार्यरत हैं। यह संयुक्त राष्ट्र का अंग नही है। इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा में पर्यवेक्षक का आधिकारिक दर्जा प्राप्त है।

  • प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधन अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा प्रकाशित रेड डाटा बुक्स में विलुप्ति के कगार पर खड़े संकटाग्रस्त पौधों और पशु जातियों की सूचियां सम्मिलित की जाती है। अतः विलुप्त होने वाली प्रजातियों की सूचीबध्दता रेडा डाटा बुक में होती है।

  • प्रकृति संरक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय संघ (IUCN – International Union for Conservation of Nature) की परिभाषा के अनुसार, किसी प्रजाति को तब विलुप्त (Extinct) माना जाता है जब वह अपने प्राकृतिक आवास में 50 वर्ष से न देखी गई हो।

  • IUCN सूची के की लाभ होते हैं।

IUCN सूची के लाभ –

  • जैव विविधता (संकटग्रस्त) के महत्व के विषय में जागरुकता उत्पन्न करना।

  • स्थानीय स्तर पर संरक्षण कार्यों का निर्देशन

  • संकटापन्न प्रजातियों की पहचान व उनका अभिलेखन

  • जैव विविधता ह्रास की लिखित सूची का निर्माण

  • जून, 2012 में आई.यू.सी.एन. द्वारा वर्ष 2012 की संकटग्रस्त प्राजातियों की रेड डाटा सूची जारी की गई जिसमें भारत में पाई जाने वाली पक्षियों की 15 प्रजातियों को अति संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल किया गया है। इस सूची में चिरैया या महान भारतीय सारंग (Great Indian Bustard), साइबेरियन सारस और सलेटी टिटहरी (Sociable Lapwing) अति संकटग्रस्त श्रेणी में, कस्तूरी मृग संकटग्रस्त श्रेणी में और एशियाई वन्य गधा संकट के नजदीक (Near Threatened) श्रेणी में, जबकि लाल पांडा संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल हैं।

जैव विविधता एवं संकटापन्न जातियां

  • पर्यावरण में प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों की वजह से विभिन्न जातियों पर संकट उत्पन्न होते रहते हैं। इससे इनकी संख्या कम होती रहती है।

  • पिछले दस वर्षो में गिध्दों की संख्या में एकाएक गिरावट आई है।

  • वर्ष 2013 में पैराग्रीन फंड नामक एक गैर-सरकारी संस्था और कुछ अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने पाकिस्तान में इसके लिए उत्तरदायी कारक को खोज लिया है।

  • डिक्लोफिनेक सोडियम एक साधारण-सी दर्द निवारक दवा है, जिसका उपयोग किसानों द्वारा पशुओं के लिए दर्द निवारक के रुप में एवं बुखार के इलाज में किया जाता है। दर असल जब डिक्लोफिनेक सोडियम के उपयोग के दौरान पशु मर जाता है और उसी मरे हुए पशु का मांस गिध्द एक बार भी खा लेता है, तो 30 दिन के भीतर उसकी मृत्यु हो जाती है। इस दवा के कुप्रभाव का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले 10 वर्षों के भीतर भारत, नेपाल और पाकिस्तान में 8.50 करोड़ गिध्दों की मौत हो चुकी है।

  • मॉरीशस में टम्बलाकोक (Tambalacoque), जिसे डोडो वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है, डोडो पक्षी के विलुप्त होने के कारण प्रजनन में असफल रहा, जिसकी वजह से यह भी लगभग विलुप्त हो रहा है। वस्तुतः इसके बीज डोडो पक्षी का मुख्य भोजन थे, जो उसकी निष्ठा के साथ बाहर निकलकर भूमि में अंकुरित होते थे।

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  • इंडियन फ्लाइंग फॉक्स चमगादड़ों की एक प्रजाति है, जो बांग्लादेश, चीन, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका में पाई जाती है। इसे ग्रेटर इंडियन फ्रूट बैट (Greater Indian Fruit Bat) के नाम से भी जाना जाता है।

  • डुगोन्ग (Dugong) एक विशाल स्तनधारी (Large Marine Mammal) है, जो विलोपन के कगार पर है। यह एक शाकाहारी स्तनधारी है और घास खाने की इनकी आदत के कारण इन्हें समुद्री गाय (Sea Cow) भी कहा जाता है। यह पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है। भारत में इसकी सबसे बड़ी संख्या भारत एवं श्रीलंका के मध्य मन्नार की खाड़ी एवं पाक की खाड़ी (Palk Bay) में निवास करती है।

  • कच्छ की खाड़ी सौराष्ट्र तट तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में भी इनकी उपस्थिति देखी गई है।

  • ड्यूगोंग को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के अधीन विधिक संरक्षण प्रदान किया गया है।

  • कच्छ का रन भारतीय वन्य गधे का प्राकृतिक आवास है। इस क्षेत्र में इसका कोई परभक्षी नहीं है किंतु आवास क्षेत्र के सीमित होते जाने के कारण इसका अस्तित्व खतरें में है।

  • सिंह-पुच्छी वानर दक्षिण भारत में स्थित पश्चिमी घाट में पाया जाता है। यह वानर तमिलनाडु, केरल एवं कर्नाटक राज्यों में पाया जाता है।

  • वर्ष 1952 में चीता को भारत से विलुप्त घोषित किया गया था। हाल ही में चीतों को भारत मे एक बार फिर बसाने की सरकार की योजना पर उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी है।

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  • उल्लेखनीय है कि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने चीतों को नामीबिया के जंगलों से लाकर मध्य प्रदेश के अभ्यारण्य में बसाने की योजना बनाई थी।

  • समुद्र तल से 3000-4500 मीटर की ऊंचाई पर दुर्लभ हिम तेंदुआ पाया जाता है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में किए गए एक सर्वेक्षण में इस  बात की पुष्टि हुई कि हिम तेंदुआ भारत में उपस्थित है।

  • काली गर्दन वाला सारस जम्मू एवं कश्मीर का राज्य पक्षी है। उड़ने वाली गिलहरी भारत के साथ ही रुस, चीन, जापान तथा यूरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका के अनेक भागों में पाई जाती है। भारत में उड़न गिलहरी की सात जातियां पाई जाती हैं।

  • भारत में हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में सर्वाधिक उड़न गिलहरी हैं। यहां इसकी छः जातियां देखने को मिलती हैं।

  • अंडमान एवं निकोबार के समुद्री जीव जंतुओं में डूगॉग्स, डॉल्फिन, व्हेल, साल्ट वाटर क्रोकोडाइल (लवण जल मगर), समुद्री कछुआ, समुद्री सांप आदि सामान्य रुप से बहुतायत से पाए जाते हैं। श्रू एवं टैपीर विशाल हिमालय श्रृंखला में पाए जाते हैं। ये मालाबार क्षेत्र मे नहीं पाए जाते हैं।

  • रैकून जैसा दिखाई देने वाले रेड पांडा को फायर कैट के नाम से भी जाना जाता है। यह वृक्षों पर रहने वाला स्तनधारी है। इसका जूलॉजिकल नाम ऐलुरस फल्गेंस (Ailuras Fulgens) हैं।

  • भारत में रेड पांडा प्राकृतिक रुप में उत्तर-पूर्वी भारत के उप-हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है (मुख्य रुप से सिक्किम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल प्रदेश राज्यों में)। भारत के अतिरिक्त रेड पांडा नेपाल, भूटान, चीन, लाओस और म्यांमार में  भी पाए जाते हैं।

  • भारत में स्लो लोरिस मुख्यतः उत्तर-पूर्वी राज्यों असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय में पाया जाता है। भारत के अतिरिक्त स्लो लोरिस, बांग्लादेश, ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, थाईलैंड और वियतनाम में पाया जाता है।

  • भारत सरकार ने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधीनस्थ अभिकरण भारतीय प्राणि सर्वेक्षण (Zoological Survey of India) के एनविस सेंटर ऑन फौनल डायवर्सिटी (Envis Centre on Faunal Diversity) की वेबसाइट पर प्रदर्शित सूची के अनुसार, कुछ दिए गए जानवरों की खतरें की स्थिति निम्नानुसार है –

  1. सुनहरे लंगूर –   विलुप्तप्राय

  2. हूलॉक गिब्बन –   विलुप्तप्राय

  3. एशियाई जंगली कुत्ते –   विलुप्तप्राय

  4. मरुस्थलीय बिल्ली –   कम खतरे में

  • आईयूसीएन रेड लिस्ट की नवीनतम सूची में मरुस्थलीय बिल्ली के नाम से कोई भी जानवर सूचीबध्द नही है। चीनी मरुस्थलीय बिल्ली (Chinese Desert Cat) सूची में शामिल है, जिसे नाजुक (Vulnerable) श्रेणी में शामिल किया गया है।

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रामसर सम्मेलन

  • जैव विविधता पृथ्वी पर जल व थल दोनों जगह पर पाई जाती है। आर्द्रभूमियां भी जैव विविधता का बड़ा संग्रहागार हैं।

  • आर्द्र भू-क्षेत्र जलीय तथा शुष्क स्थलीय पारिस्थितिकीय तंत्र के बीच के क्षेत्र हैं। आर्द्र भू-क्षेत्र प्रकृति में पानी को सोखने और छानने के विशाल स्पंज हैं। ये पोषक पदार्थों की मात्रा को कम करके तलछटों को हटाकर जल को शुध्द करते हैं।

  • बाढ़ के दौरान नम भूमियां पानी में मौजूद तलछट और पोषक तत्वों को अपने में समा लेती हैं और सीधे नदी में जाने से रोकती हैं।

  • रामसर सम्मेलन आर्द्रभूमियों के संरक्षण से संबंधित हैं। रामसर ईरान में अवस्थित नगर है तथा 2 फरवरी, 1971 में यहीं हुई बैठक के बाद इस कन्वेशन की नींव पड़ी तथा वर्ष 1975 में यह पूर्णतः क्रियान्वित हुआ। रामसर में हुई बैठक के कारण ही इसे रामसर कन्वेंशन के नाम से जाना जाता है।

  • विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) प्रत्येक वर्ष 2 फरवरी (2 फरवरी, 1971 को रामसर, ईरान में हस्ताक्षरित आर्द्रभूमियों पर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के उपलक्ष्य में) को मनाया जाता है। ध्यातव्य है कि वर्ष 2018 में विश्व आर्द्रभूमि दिवस की थीम थी – धारणीय शहरी भविष्य हेतु आर्द्रभूमियां (Wetlands for a Sustainable Urban Future)

  • भारत में आर्द्रभूमियों के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र वाला राज्य गुजरात है, जबकि आंध्र प्रदेश का दूसरा स्थान है।

  • रामसर सूची अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की सूची है। इस सूची में वर्तमान में भारत के कुल 26 स्थल शामिल हैं। ये इस प्रकार हैं –

  • अष्टमुडी, वेम्बनाद-कोल एवं सस्थामकोट्टा झील (केरल)

  • भितरकनिका मैंग्रोव एवं चिल्का झील (ओड़िशा)

  • भोज (म.प्र.)

  • चंद्रताल, पोंग बांध झील एवं रेनुका (हिमाचल प्रदेश)

  • दीपोर बील (असम)

  • पूर्वी कलकत्ता (पश्चिम बंगाल)

  • हरिके, कांजलि एवं रोपड़ (पंजाब)

  • होकेरा, सुरीनसर-मानसर झील, त्सोमोरिरि एवं वूलर झील (जम्मू कश्मीर)

  • केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान एवं सांभर झील (राजस्थान)

  • कोलेरु झील (आंध्र प्रदेश)

  • लोकटक झील (मणिपुर)

  • नलसरोवर पक्षी अभ्यारण्य (गुजरात)

  • प्वॉइंट कैलिमरे वन्यजीव एवं पक्षी अभ्यारण्य (तमिलनाडु)

  • रुद्रसागर झील (त्रिपुरा)

  • ऊपर गंगा नदी (ब्रिज घाट से नरौरा स्ट्रेच-उत्तर प्रदेश।

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  • मॉन्ट्रियो रिकॉर्ड उन अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों की सूची में उन आर्द्रभूमियों का रजिस्टर है जहां मानवीय हस्तक्षेप के परिणामस्वरुप आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक स्वरुप में परिवर्तन या तो हो गया है, यो हो रहा है या होना संभावित है।

  • ध्यातव्य है कि भारत में आर्द्रभूमियों के कुल भौगोलिक क्षेत्र का आंतरिक आर्द्रभूमि के अंतर्गत 69.22 प्रतिशत क्षेत्र तथा तटीय आर्द्रभूमि के अंतर्गत 27.13 प्रतिशत क्षेत्र है, जबकि शेष 3.64 प्रतिशत क्षेत्र सूक्ष्म आर्द्रभूमियों के अंतर्गत आते हैं।

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विभिन्न अधिनियम एवं करार

  • जैव विविधता के संरक्षण हेतु समय-समय पर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अधिनियम एवं करार किए जाते रहे हैं। उनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं –

  • भारतीय संसद द्वारा जैव विविधता अधिनियम 11 दिसंबर, 2002 को पारित किया गया था।

  • जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों को कार्यान्वित करने के उद्देश्य से भारतीय राष्ट्रीय जैविक-विविधता प्राधिकरण की स्थापना वर्ष 2002 में की गई थी। इसका मुख्यालय चेन्नई, तमिलनाडु में स्थित है।

  • खाद्य एवं कृषि हेतु पादप आनुवंशिक संसाधनों के विषय में अंतरराष्ट्रीय संधि (International Treaty on Plant Resources for Food and Agriculture) जैव विविधता पर अभिसमय (Convention on Biological Diversity) के साथ समन्वय में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो खाद्य एवं कृषि हेतु पादप अनुवांशिक संसाधनों के संरक्षण, विनियम तथा सतत प्रयोग द्वारा खाद्य सुरक्षा की गारंटी प्रदान करने हेतु प्रतिबध्द है। विश्व विरासत अभिसमय तथा मरुस्थलीकरण का सामना करने हेतु राष्ट्र अभिसमय भी जैव विविधता से संबंध रखता है।

  • भारत रामसर अभिसमय का एक पक्षकार है और उसने बहुत से क्षेत्रों को रामसर स्थल घोषित किया है ताकि इन सभी स्थलों का, पारिस्थितिकी तंत्र उपागम से संरक्षण किया जाए और साथ-साथ उनके धारणीय उपयोग की अनुमति दी जाए।

  • वर्डलाइफ इंटरनेशनल संरक्षण संगठनों की एक वैश्विक भागीदारी है जो पक्षियों, उनके आवासों तथा वैश्विक जैव विविधता को संरक्षित करने हेतु कार्यरत है। यह प्रकृति के संरक्षण हेतु, विश्व की सबसे बड़ी भागीदारी है जिसके विश्व भर में 119 भागीदार हैं। यह संस्था महत्वपूर्ण पक्षी एवं जैव विविधता क्षेत्र के रुप में स्थलों की पहचान करती है और अब तक ऐसे 12000 से अधिक क्षेत्रों की पहचान की जा चुकी है। जैव विविधता हॉटस्पॉट की संकल्पना ब्रिटिश पर्यावरणविद् नॉर्मन मायर्स द्वारा दी गई थी।

  • जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना उपसंधि (प्रोटोकॉल) के पक्षकारों की प्रथम बैठक (MOP) मलेशिया की राजधानी क्वालालम्पुर में 23-27 फरवरी, 2004 के मध्य सम्पन्न हुई थी। भारत ने जैव-सुरक्षा उपसंधि (प्रोटोकॉल) जैव विविधता पर समझौते पर हस्ताक्षर 23 जनवरी, 2001 को किया था। जैव-सुरक्षा उपसंधि (प्रोटोकॉल) आनुवांशिक रुपांतरित जीवों से संबध्द है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैव-सुरक्षा उपसंधि/जैव विविधता पर समझौते का सदस्य नही है।

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  • बौध्दिक संपदा अधिका हेतु भारत में अथवा भारत से बाहर किसी अनुसंधान पर आधारित किसी आविष्कार के लिए या भारत से अभिप्राप्त जैव संसाधन पर आधारित किसी आविष्कार के लिए या भारत से अभिप्राप्त जैव संसाधन पर आधारित जानकारी के लिए ऐसा आवेदन करने से पूर्व, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त करना आवश्यक है। एनबीए जैव चोरी को रोकने तथा देशी और परंपरागत आनुवांशिक संसाधनों का संरक्षण करने का कार्य करता है। वाणिज्य में प्राणिजात और वनस्पति-जात के व्यापार संबंधी विश्लेषण (ट्रेड रिलेटेड एनालिसिस ऑफ फौना एंड फ्लोरा इन कॉमर्स – TRAFFIC) एक गैर-सरकारी संगठन (Non-Government Organization) है। यह सतत विकास एवं जैव-विविधता संरक्षण के संदर्भ में वन्य पादपों एवं जंतुओं के व्यापार पर निगरानी रखने का कार्य करता है। TRAFFIC का मिशन यह सुनिश्चित करना है कि वन्य पादपों और जंतुओ के व्यापार से प्रकृति के संरक्षण को खतरा नहीं हो। TRAFFIC की स्थापना वर्ष 1976 में की गई थी। यह WWF एवं  IUCN का रणनीतिक गठबंधन हैं। यह UNEP के अंतर्गत एक ब्यूरों नही है।

जैव विविधता तथा संयुक्त राष्ट्र व विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थान

  • जैव विविधता के संरक्षण हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ समय-समय पर विभिन्न प्रकार के सम्मेलन का आयोजन करता रहता है।

  • जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दलों का दसवां सम्मेलन नगोया (जापान) में वर्ष 2010 में आयोजित किया गया। इसमें जैव विविधता के संरक्षण संबंधी उपायों पर चर्चा की गई एवं इसके परिप्रेक्ष्य में आवश्यक कदम उठाए गए।

  • जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दलों का ग्यारहवां सम्मेलन (CoP-11) 8-9 अक्टूबर, 2012 के मध्य हैदराबाद, भारत में आयोजित किया गया।

  • CoP-12 का आयोजन प्योंगचांग, दक्षिण कोरिया में 6-17 अक्टूबर, 2014 के मध्य संपन्न हुआ।

  • CoP-13 का आयोजन नवंबर, 2016 में कानकुन, मेक्सिको में संपन्न हुआ।

  • UN-REDD (Reducing Emissions from Deforestation and Forest Degradation) एक अंतर्संस्थागत कार्यक्रम है, जो UNFCCC के सदस्य देशों के तत्वाधान में चलाया जा रहा है। इस प्रोग्राम को सितंबर, 2008 मे आरंभ किया गया था। UNDP, FAO, UNEP जैसी संस्थाएं इस कार्यक्रम से जुड़ी हुई हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत वनों में संचित कार्बन की मात्रा का आर्थिक मूल्य आंका जाता है तथा विकासशील देशों को वनीकृत भूमि से कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने हेतु प्रोत्साहन दिए जाते हैं।

  • UN-REDD+ कार्यक्रम निर्वनीकरण व वन उन्मूलन से आगे बढ़कर वनों के संरक्षण के टिकाऊ प्रबंधन पर भी केन्द्रित होता है। यह जलवायु परिवर्तन संबंधी दुष्प्रभावों के उपशमन में भी अपनी भूमिका निभाता है।

  • UN-REDD+ प्रोग्राम की समुचित अभिकल्पना और प्रभावी कार्यान्वयन, जैव विविधता का संरक्षण करने में महत्वपूर्ण योगदान दें सकता है। साथ ही साथ वन्य पारिस्थितिकी की समुत्थानशीलता में तथा विकासशील देशो को आर्थिक प्रोत्साहन द्वारा गरीबी कम करने में भी भूमिका निभा सकती है।

  • ध्यातव्य है कि REDD कार्यक्रम से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन कम करने हेतु वित्त प्रवाह संभव है, जो गरीब देशों के विकास व जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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  • पारितंत्र एवं जैव विविधता का अर्थतंत्र (The Economics o f Ecosystems and Biodiversity) एक विश्वव्यापी पहल है। यह जैव विविधता तथा पारितंत्र के आर्थिक लाभों के प्रति ध्यान आकर्षित करने पर केन्द्रित हैं। यह निर्णयन प्रक्रिया में निर्णय लेते समय पारितंत्र व जैव विविधता द्वारा प्राप्त लाभों को ध्यान में रखने में सहायता करती है।

  • यह पहल पारितंत्र एवं जैव विविधता के आर्थिक लाभों को प्रस्तुत कर निर्णयकर्ताओँ के लिए सभी स्तरों पर दिग्दर्शक की भूमिका निभाती है।

  • TEEB, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programmes) के अंतर्गत कार्य करने वाली संस्था है। इसका कार्यालय जेनेवा (स्विट्जरलैंड) में है।

  • जैव-सुरक्षा से संबंधित कार्टाजेना प्रोटोकॉल (Cartagena Protocol on Bio-Safety) पर भारत ने 23 जनवरी, 2001 को हस्तक्षर किए थे। भारत में इसको पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय कार्यान्वित करता है।

  • वेटलैंड्स इंटरनेशनल (Wetlands International) एक गैर-सरकारी एवं गैर-लाभकारी वैश्विक संगठन है, जो आर्द्रभूमियों एवं उनके संसाधनों को बनाए रखने तथा उन्हें पुनः स्थापित करने हेतु कार्यरत हैं। इसका मुख्यालय नीदरलैंड्स में स्थित है। वैश्विक स्तर पर आर्द्रभूमियों के संरक्षण एवं पुनः स्थापन के प्रयास इस संगठन को सर्वश्रेष्ठ कार्यप्रणाली विकसित करने में सहायता करते हैं। यह संगठन विभिन्न अनुसंधानों से प्राप्त ज्ञान का प्रयोग अन्य आर्द्र भूमियों के संरक्षण में करता है। साथ ही यह संगठन को अतिरिक्त साधनों को विकसित करने तथा और अधिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करने में मदद करता है।

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जैव विविधताः विविध

  • सीबकथार्न लद्दाख की पहाड़ी पर पाया जाने वाला पेड़ है। इस पेड़ की बेर में विटामिन तथा पोषक तत्व की प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। चंगेज खां ने इसका प्रयोग अपनी सेना की ऊर्जास्विता को उन्नत करने के लिए किया था। रुसी कास्मोनाट ने इसके तेल को कास्मिक विकिरण से बचाव के लिए प्रयोग किया था।

  • सीबकथार्न भारत में लेह बेरी के नाम से लोकप्रिय एक पर्णपाती झाड़ी है। भारत के लद्दाख क्षेत्र (जम्मू एवं कश्मीर), कुकुमसारी, लाहौल, काजा, ताबो (हिमाचल प्रदेश), नाथुला (सिक्कम) तथा उत्तराखंड एवं अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में यह पाया जाता है। इस पौधे की पत्ती, फल, जड और कांटे सभी उपयोगी हैं, जिनका परंपरागत रुप से औषधि-निर्माण, पोषण पूरकता, ईंधन, पर्यावरण संरक्षण, बाड़ इत्यादि हेतु इस्तेमाल किया जाता रहा है। लद्दाख में इसके फल का जूस भी पेय के रुप में प्रयोग किया जाता है। नाइट्रोजन स्थिरीकरण में यह सहायक होता है। शीत मरुस्थल नियंत्रण हेतु यह आदर्श पौधा है। अधिक ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में उगने की क्षमता रखता है।

  • सतशीतोष्ण (Temperate) और शीतप्रधान प्रदेशों में रहने वाले जीवों की उस निष्क्रिय तथा अवसन्न अवस्था को शीतनिष्क्रियता (Hybernation) कहते हैं जिसमें वहां के अनेक प्राणी जाड़े की ऋतु बिताते हैं। यह अवस्था नियत-तापी (Warm Blooded) तथा अनियततापी (Cold Blooded), दोनों प्रकार के प्राणियों मे पाई जाती है।

  • गिलहरी, भालू और कुछ कीटभक्षी चमगादड़ों को जब गर्म मौसम के आहार सर्दियों में नहीं मिलते हैं तब वे शीतनिष्क्रियता का सहारा लेते हैं। शीतनिष्क्रियता की स्थिति में इन प्राणियों का ताप गिरकर आश्रयस्थल के ताप के बराबर हो जाता है, श्वसन मंद हो जाता है, उपापचय घटता है और ये उसी वसा के सहारे जीवित रहते हैं, जो शीतनिष्क्रियता के पूर्व उनके शरीर में संचित हो जाती है।

  • यहाँ उल्लेखनीय है कि कृंतक (Rodents) गण में गिलहरियां (Squirrels), छछूंदर (Must Rats), चूहे (Rats), मूषक (Mice), आदि स्तनधारी प्राणी आते हैं।

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  • व्यापक निच (Broad Niche) किसी प्रजाति के विलोपन के लिए उत्तरदायी नहीं है।

  • सबसे लंबा जीवित वृक्ष सिकोया (Sequoia) का होता है। यह संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी कैलिफोर्निया मे पाया जाता है। इसकी लंबाई 379 फीट (115.5 मीटर) तक होती है।

  • ब्राह्मणी नदी और वैतरणी नदी समुद्र में प्रवाहित होने से पूर्व भितरकनिका नामक स्थान पर मिलती है। भितरकनिका वन्यजीव तथा जैव विविधता से संबंधित सुरक्षित क्षेत्र है। ब्रह्माणी नदी को झारखंड में दक्षिणी कोयल के नाम से जाना जाता है।

  • शंख नदी (उद्गम क्षेत्र छत्तीसगढ़ तथा झारखंड सीमा के पास) के राउरकेला के पास दक्षिणी कोयन में मिल जाने के बाद इसका नाम ब्राह्मणी हो जाता है। वैतरणी नदी का उद्गम गुप्त गंगा पहाड़ी से होता है, जो उड़ीसा राज्य के क्योंझार जिला में अवस्थित है।

  • जैव द्रव्यमान के उत्पादन की दृष्टि से उष्णकटिबंधीय वर्षा वन में प्रथम स्थान पर आते हैं। इनमें जैव द्रव्यमान उत्पादन लगभग 2200 ग्राम (शुष्क  भार)/वर्ग मीटर/प्रति वर्ष होता है। उपर्युक्त प्रश्न में दिए गए बायोम में जैव द्रव्यमान के प्रति वर्ष उत्पादन की मात्रा इस प्रकार है –

उष्णकटिबंधीय पतझड़ी वन  – 1200 ग्राम (शुष्क भार)/वर्ग मीटर/प्रति वर्ष

टैगा                     – 800 ग्राम (शुष्क भार)/वर्ग मीटर/प्रति वर्ष

प्रेयरी                    – 600 ग्राम (शुष्क भार)/वर्ग मीटर/प्रति वर्ष

जबकि हमारे  सागर में वार्षिक स्तर पर नगण्य जैव द्रव्यमान उत्पादन होता है।

  • टुमारोजो बायोडायवर्सिटी पुस्तक (प्रकाशन वर्ष – 2000) वंदना शिवा द्वारा लिखित है जो एक सक्रिय पर्यावरण कार्यकत्री एवं भूमंडलीय विरोधी लेखिया हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 22 मई को जैव विविधता दिवस मनाया जाता है, जबकि विश्व के कई देश 29 दिसंबर को जैव विविधता दिवस मनाते हैं। उल्लेखनीय है कि 29 दिसंबर, 1993 से जैव विविधता अभिसमय प्रभावी हुआ था।

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हरित गृह प्रभाव एवं जलवायु परिवर्तन

ग्रीन हाउस इफेक्ट या हरित गृह प्रभावः-

  • पृथ्वी पर ऊर्जा विद्युत चुंबकीय विविरणों के रुप में पहुंचती है, जिसे सौर ऊर्जा कहा जाता है। और ऊर्जा में मुख्यतः पराबैंगनी, दृष्टिगोचर विकिरणों और अवरक्त विकिरणें होती हैं। इनमें से नुकसानदायक पराबैंगनी विकिरणें अधिकतर ओजोनमंडल में अवशोषित हो जाती हैं। जबकि दृष्टिगोचर और अवरक्त विकिरणें पृथ्वी पर ऊष्मीय विकरणों के रुप में पहुंचती हैं।

  • ऊष्मीय विकिरण पहले धरातल को गर्म करती है फिर इसी गर्मी से विकिरण, संवहन और चालन द्वारा वायुमंडल गर्म होता है।

  • सूर्य की ऊष्मा से गर्म होने के बाद जब पृथ्वी ठंडी होने लगती है, तब ऊष्मा पृथ्वी से बाहर विसरित होती है। लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरोकार्बन, नाइट्रस ऑक्साइड, जलवाष्प, मीथेन एवं अन्य ऊष्मारोधी गैसें इस ऊष्मा का कुछ भाग अवशोषित कर लेती हैं एवं शेष बची ऊष्मा को पुनः धरातल को वापस कर देती हैं जिससे वायुमंडल के निचले भाग में अतिरिक्त ऊष्मा एकत्र हो जाती है।

  • पृथ्वी की ऊष्मा अवरक्त विकिरण के रुप में विकरित होती है जिसके लगभग 90% भाग को वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस अवशोषित कर लेती है।

  • विगत कुछ वर्षों में इन ऊष्मारोधी गैसों की मात्रा वायुमंडल मे बढ़ जाने के कारण वायुमंडल के औसत ताप में वृध्दि हो गई है, जिसे भूमंडलीय तापन (Global Warming) अथवा ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाता है।

  • ध्यातव्य है कि जोसेफ फोरियर (Joseph Fourier) ने 1824 में ग्रीन हाउस या हरित गृह गैसों की संकल्पना की थी।

  • ग्रीन हाउस प्रभाव एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी ग्रह या उपग्रह के वातावरण में मौजूद कुछ गैसे उस ग्रह/उपग्रह के वातावरण के ताप को अपेक्षाकृत अधिक बनाने में मदद करती हैं।

  • विश्वव्यापी ताप वृध्दि के पीछे मुख्य कारण कार्बन डाइऑक्साइड गैस है जिसे ग्रीन हाउस गैस कहा जाता है। मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड भी इसी प्रकार की गैसें हैं। ये सभी गैसें वातावरण की ऊष्मा को सोख लेती हैं। यह ठीक उसी प्रकार होता है जैसे ग्रीन हाउस में ग्लास (सीसा) अपने अंदर समाहित गर्म वायु को बाहर नही निकलने देता। इसे ग्रीन हाउस प्रभाव के नाम से जाना जाता है।

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  • अतः ग्रीन हाउस गैसें वायुमंडल में उपस्थित वह गैसें हैं, जो तापीय अवरक्त विकिरण की रेंज के अंतर्गत विकिरणों का अवशोषण एवं उत्सर्जन करती हैं।

  • पृथ्वी के वायुमंडल में पाई जाने वाली प्रमुख तीन ग्रीन हाउस गैसें हैं – जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरोकार्बन। ध्यातव्य है कि ऑर्गन ग्रीन गैस नहीं है तथा यह वैश्विक ऊष्मन के लिए उत्तरदायी नहीं होती है।

नोटः कार्बन टेट्राफ्लोराइड तथा नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) भी ग्रीन हाउस गैसें हैं परंतु इनका योगदान उपर्युक्त गैसों की अपेक्षा कम है। ग्रीन हाउस प्रभाव में सर्वाधिक योगदान देने वाली प्रमुख गैसें इस प्रकार हैं –

जलवाष्प         –   36-72%

कार्बन डाइऑक्साइड –   9-26%

मीथेन           –   4-9%

ओजोन           –   3-7%

  • वहीं दूसरी ओर हाइड्रोजन ग्रीन हाउस गैसे नहीं है। प्रकृति में यह द्विआणविक गैस के रुप में पाई जाती है, जो वायुमंडल की बाह्य परत की मुख्य संघटक है।

  • आईपीसीसी (International Panel on Climate Change) द्वारा चिन्हित (Identified) 6 प्रमुख हरित गृह गैसों में CH4, CFC तथा N2O शामिल हैं। जबकि सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) ग्रीन हाउस गैस नहीं है, यह अम्ल वर्षा (Acid Rain) के लिए मुख्यतः उत्तरदायी गैस है।

  • ग्रीन हाउस गैसों में प्रत्यक्ष रुप से शामिल गैसें निम्न हैं कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2), मेथन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), CFC, SF6, NF3 आदि। जबकि अप्रत्यक्ष रुप से शामिल गैसें निम्न हैं – नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO), नान-मीथेन वोलेटिल ऑर्गेनिक कम्पाउड्स (NMVOC) तथा सल्फर डाई ऑक्साइड (SO2)।

ग्रीन हाउस प्रभाव का कारण

  • कार्बन डाइऑक्साइड गैस धरती पर जीवन के लिए हानिकारक और लाभदायक दोनों हैं। कार्बन डाइऑक्साइड पौधे ग्रहण कर (प्रकाश-संश्लेषण क्रिया द्वारा) जीवन दायिनी ऑक्सीजन गैस की रचना करते हैं, जो हमारे जीवन के लिए लाभदायक हैं, वहीं यह भूमंडलीय तापन का मुख्य कारण भी है, जो हमारे लिए हानिकारक है।

  • मानवीय गतिविधियों द्वारा उत्पन्न अधिकांश कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल के निचले भाग में नहीं रुकती बल्कि समुद्री पादपों या भूमि पर पौधों एवं मिट्टी द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में पादप प्लवक (Phytoplankton) कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण कर उसे पादप सामग्री में परिवर्तित कर देते हैं।

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  • पृथ्वी के वायुमंडल में पाई जाने वाली प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें हैं – जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड तथा क्लोरोफ्लोरो कार्बन। इसमें से कार्बन डाइऑक्साइड गैस ग्लोबल वार्मिंग के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है क्योंकि वायुमंडल में इसकी सांद्रता अन्य ग्रीन हाउस गैसों की तुलना में बहुत अधिक है। ध्यातव्य है कि पिछले कुछ दशकों से वातावरण में CO2 की सांद्रता में लगातार वृध्दि हो रही है।

  • वैश्विक ऊष्मन कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के उत्सर्जन के कारण होता है।

  • वर्ष 1950 में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा वायुमंडल में जहां 315 PPM (Parts Per Million) के आस-पास थी, वहीं पर अब यह मात्रा 375 PPM को पार कर चुकी है।

  • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक (Pre-Industrial) युग में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता लगभग 278 ppm (0.03%) थी, जिससे वायुमंडल, समुद्र एवं जीवमंडल आदि के बीच संतुलन बना रहता था। हालांकि मानवीय गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधन के जलने आदि से यह प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है। वर्तमान में औसत वार्षिक CO2 सांद्रता 400 PPM (0.04%) तक पहुंच चुकी है।

  • यदि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा इसी तरह बढ़ती रही, तो 21वीं सदी पूरी होने तक यह मात्रा करीब 650-950 PPM हो जाएगी और पृथ्वी का तापमान 60 C बढ़ जाएगा।

  • ध्यातव्य है कि मीथेन (CH4) गैस को मार्श गैस (March Gas) भी कहते हैं, जिसका स्त्रोत (Source) बायोगैस (Biogas), जीवाणु अपघटन तथा जुगाली करने वाले पशु हैं। यह एक हरित गृह गैस (Green-House Gas) है, जो कि वायु प्रदूषक (Air Pollutant) होती है।

  • धान के खेत, कोयले की खदानें एवं घरेलू पशु वातावरण में मीथेन उत्सर्जन के मानवीय स्रोत हैं जबकि आर्द्रभूमि, समुद्र, हाइड्रेट्स (Hydrates) मीथेन उत्सर्जन का सर्वाधिक 76% भाग आर्द्रभूमि से ही उत्सर्जित होता है।

  • चावल की खेती से संबध्द अवायवीय परिस्थितियां मीथेन के उत्सर्जन का कारक हैं तथा जब नाइट्रोजन आधारित उर्वरक प्रयुक्त किए जाते हैं, तब कृष्ट मृदा से नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।

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  • मानव जनित वायुमंडलीय प्रदूषण से जलवायु में परिवर्तन हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के दो प्रमुख कारक हैं – कार्बन उत्सर्जन में वृध्दि वाले कारक तथा कार्बन अवशोषण में कमी लाने वाले कारक कार्बन उत्सर्जन में वृध्दि वाले कारणों में जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक प्रज्वलन, तेल से चलने वाले वाहनों की संख्या में अत्यधिक वृध्दि आदि आते हैं, जबकि अत्यधिक अनोन्मूलन से कार्बन सांद्रण बढ़ रहा है, जो हरित गृह प्रभाव में वृध्दि कर जलवायु को प्रभावित कर रहा है।

  • नासा एवं अन्य अध्ययन सौर धधक (Solar Flare) में वृध्दि को जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण नहीं मानते हैं।

  • इसके अतिरिक्त जीवश्म ईंधन के जलने से वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों में वृध्दि तथा ओजोन परत का अवक्षय जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण है। जलवायु परिवर्तन हेतु ग्रीन हाउस गैसें एवं प्रदूषण प्रत्यक्ष रुप से जबकि पर्त का क्षरण अप्रत्यक्ष रुप से जिम्मेदार है।

ग्रीन हाउस गैस का प्रभाव

  • भूमंडलीय उष्णता या तापन का प्रभाव हिम क्षेत्रों में तेजी से पिघलती बर्फ के रुप में देखा जा सकता है। मौसम में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं और सागर तट के समीपवर्ती क्षेत्र तेजी से डूब रहे हैं।

  • स्कैंडिनेविया प्रायद्वीप के अनेक यूरोपीय देश अपने अनेक ऐसे तटों को गवां चुके हैं।

  • समय से पूर्व आम में बौर आना वैश्विक तापन से ही संबंधित है तथा वैश्विक तापन से स्वास्थ्य भी कुप्रभावित हो रहा है।

  • आर्कटिक एवं ग्रीलैंड हिम चादर (Arctic and Greenland Ice Sheet) वैश्विक तापन द्वारा सामान्यतया पहले प्रभावित होने वाले सर्वाधिक भंगुर पारिस्थितिक तंत्र हैं। वस्तुतः इस क्षेत्र में वैश्विक तापन के कारण बर्फ का पिघलना शेष पृथ्वी को प्रभावित कर रहा है।

  • आईपीपीसी (Intergovernmental Panel On Climate Change) द्वारा प्रकाशित Assessing Key Vulnerabilities and the risk from Climate Change नामक रिपोर्ट के अनुसार, यदि विश्व-तापमान पूर्व-औद्योगिक  स्तर से 20C बढ़ जाता है, तो विश्व भर में प्रवाल मर्त्यता (Coral Mortality)  घटित होगी, साथ ही पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र का 1/6 भाग रुपांतरित हो जाएगा और पृथ्वी पर ज्ञात प्रजातियों का ¼ भाग विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगा।

  • यदि विश्व का तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 30 c से अधिक बढ़ जाता है, तो स्थलीय जीवमंडल एक नेट कार्बन स्त्रोत की ओर प्रवृत्त होगा, साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र का 1/5 से अधिक भाग रुपांतरित हो जाएगा और 30% तक ज्ञात प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगी।

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  • जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) के अनुसार, वर्ष 1990 और 2100 के मध्य तापमान में 1.4-5.80 C की वृध्दि का अनुमान व्यक्त किया गया है। इस वैश्विक ताप वृध्दि के परिणामस्वरुप ध्रुवीय क्षेत्रों सहित विश्व के 144 में 142 पर्वतीय हिमटोपियों के पिघलने की आशंका है जिससे समुद्र सतह में वृध्दि अवश्यंभावी है।

  • IPCC के अनुसार, वर्ष 1990-2100 के बीच समुद्र सतह में 0.33 से 0.45 मीटर वृध्दि का अनुमान लगाया गया है। अनुमानतः पिछले हिमयुग से अब तक लगभग 390 फिट समुद्र सतह में वृध्दि हो चुकी है। समुद्र सतह में वार्षिक वृध्दि की दर 3 मिमी. अनुमानित की गई है। उदाहरण के लिए फिजी में समुद्र तल में वृध्दि दर 0.15 मी. (6 इंच) प्रति वर्ष है। इससे फिजी के डूबने का संकट आसन्न है।

  • पिछली शताब्दी में पृथ्वी के औसत तापमान में 0.80 C की वृध्दि देखी गई है।

  • उल्लेखनीय है कि पादप प्लवक का सागर में वही महत्व है, जो स्थल पर घासों का होता है। अतः इससे महासागर की खाद्य श्रृंखला का प्रभावित होना स्वाभाविक है। जबकि इसके पूर्णतया नष्ट हो जाने से महासागर का जल-घनत्व प्रबल रुप से नही घटेगा।

  • ध्यातव्य है कि यदि किसी महासागर का पादप प्लवक किसी कारण से पूर्णतया नष्ट हो जाए, तो कार्बन सिंक के रुप में महासागर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

जलवायु परिवर्तन

  • पृथ्वी पर पहुंचने वाले सौर विकिरणों की मात्रा में परिवर्तन के लिए, सूर्य के संदर्भ में पृथ्वी की स्थिति में बदलाव भी उत्तरदायी है। यह परिवर्तन जलवायु परिवर्तन के खगोलशास्त्रीय सिध्दांत के अनुसार होता है। वैज्ञानिक इस सिध्दांत को मिलानकोविच परिकल्पना भी कहते हैं। उल्लेखनीय है कि मिलुटिन मिलानकोविच सर्बिया के खगोलविद थे।

  • मिलुटिन मिलानकोविच (Milutin Milankovitch) ने जलवायु परिवर्तन से संबंधित सिध्दांत दिए, जो कि पृथ्वी की लंबी अवधि के कक्षीय स्थिति से संबंधित है। इन्हीं सिध्दांतों को ही जलवायु परिवर्तन के खगोलीय सिध्दांत के रुप में मान्यता प्राप्त है।

  • पृथ्वी की कक्षा की उत्केन्द्रता, पृथ्वी की घूर्णन अक्ष की तिर्यकता, विषुव अयन इस सिध्दांत के अंग हैं, वहीं दूसरी ओर और किरणित ऊर्जा इस सिध्दांत से संबंधित नहीं है।

  • उल्लेखनीय है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी), जो कि संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में गठित अंतर-सरकारी वैज्ञानिक निकाय है, के अनुसार ग्रीन हाउस (हरित गृह) गैसें वे हैं जो पृथ्वी, वातावरण तथा बादलों द्वारा उत्सर्जित उष्मीय अवरक्त विकिरण को अवशोषित एवं उत्सर्जित करती हैं। इनमें से प्रमुख हैं – कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), जलवाष्प (H2O), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), मीथेन (CH4) और ओजोन (O3) जो कि साधारणतः पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित रहती है।

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  • जलवायु परिवर्तन के मापन हेतु हिम तत्व (Ice Core) किसी ग्लेशियर या बर्फ की चादर को छेदकर प्राप्त किया गया एक बेलनाकार नमूना है। आइस कोर अतीत की जलवायु और वातावरण की जांच करने के लिए सबसे प्रत्यक्ष और विस्तृत अभिलेख है। आइस कोर से जलवायु परिवर्तन का क्रायोजेनिक संकेतक प्राप्त किया जाता है।

  • ग्रीनलैंड और आर्कटिका में बड़ी मात्रा में बर्फ की चादर (Ice Sheet) पाई जाती है जिनसे आइस कोर निकाला जाता है। इनसे पूर्वकाल में वातावरण में व्याप्त गैसों आदि की जानकारी प्राप्त की जाती है।

  • उल्लेखनीय है कि जलवायु परिवर्तन कृषि को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। तापमान बढ़ने से मिट्टी की नमी और कार्यक्षमता प्रभावित होगी। इससे मिट्टी में लवणता बढ़ेगी। जलवायु परिवर्तन में फसलों की उत्पादकता भी प्रभावित होगी।

  • जलवायु परिवर्तन से संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। वन, चारागाह, कृषि भूमि, नदीय जल, भू-जल आदि संसाधनों को लेकर तनाव तथा आपदा की स्थिति प्रवसन को लेकर संघर्ष आदि संसाधनों को लेकर तनाव तथा आपदा की स्थिति प्रवसन को लेकर संघर्ष आदि के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं, जो जलवायु परिवर्तन को सामाजिक तनाव में वृध्दि करने वाला एक प्रमुख कारक सिध्द करते हैं।

  • अनेक अध्ययन जलवायु परिवर्तन का कृषि एवं वानिकी के उत्पादन एवं उत्पादकता दोनों पर गंभीर दुष्परिणाम की पुष्टि करते हैं। भविष्य में और भी जटिल स्थिति उत्पन्न होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है। मौसम की चरम दशाओँ की बारंबारता से कृषि क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित होता है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा का प्रश्न खड़ा होता है।

  • खाद्य असुरक्षा की स्थिति में अनावश्यक खाद्य संग्रहण तथा खाद्यान्न संसाधनों पर बलपूर्वक नियंत्रण की प्रवृत्ति का विकास होता है, जो अंततः सामाजिक तनाव को जन्म देता है। अतः खाद्य असुरक्षा भी सामाजिक तनाव का एक प्रमुख कारक है।

  • ध्यातव्य है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में (समोच्च बांध, अनुपद सस्यन एवं शून्य जुताई जलवायु परिवर्तन के मापन हेतु) पध्दतियां मृदा में कार्बन प्रच्छादन/संग्रहण मे सहायक हैं।

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  • कार्बन प्रच्छादन का तात्पर्य कार्बन का पौधों, भूगर्भिक संरचनाओं एवं समुद्र में दीर्घकालीन संग्रहण से होता है। कार्बन डाईऑक्साइड के मानवोद्भवी उत्सर्जनों के कारण आसन्न भूमंडलीय तापन के न्यूनीकरण के संदर्भ में कार्बन प्रच्छादन हेतु परिव्यक्त एवं गैर-लाभकारी कोयला, संस्तर, निःशेष तेल एवं गैस भंडार तथा भूमिगत गंभीर लवणीय शैल समूह संभावित स्थान हो सकते हैं।

  • वर्तमान में (2014 के नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार) कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के उत्सर्जन में सर्वाधिक योगदान करने वाला देश चीन है (विश्व के कुल CO2 उत्सर्जन का 30%)। अमेरिका 15% के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि यूरोपियन संघ 9% के साथ तीसरे स्थान पर तथा भारत 7% के साथ चौथे व रुसी संघ 5% के साथ पांचवे स्थान पर है।

  • चीन विश्व का सबसे बड़ा ग्लोबल कार्बन उत्सर्जक देश है।

  • भूटान को विश्व का शीर्ष कार्बन निगेटिव देश माना गया है।

  • एशिया पैसिफिक संघ (एपेक) की जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का 41% है। ये विश्व के कुल ऊर्जा उद्योग के 48% का उपयोग करते है। एपेक देशों का विश्व की कुल हरित गृह गैसों के उत्सर्जन में 48% से अधिक का योगदान है। एपेक देश क्योटो प्रोटोकॉल का समर्थन करते हैं परंतु इसके कुछ देशों ने इसका अनुमोदन नहीं किया है।

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन

  • यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसका गठन रियो डि जनेरियो में वर्ष 1992 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरण और विकास सम्मेलन में किया गया।

  • 50 से अधिक देशों द्वारा समर्थित जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNFCCC) 21 मार्च, 1994 से प्रभावी हुआ। वर्तमान में यह अभिसमय विश्व के 197 देशों द्वारा अभिपुष्ट (Ratified) है।

  • ध्यातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु परिवर्तन को रोकने की दिशा में समय-समय पर कई महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं।

  • (MOP) The first meeting of the parties to the Kyoto Protocol)

  • उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 में 21वां जलवायु परिवर्तन सम्मेलन पेरिस में हुआ था। वर्ष 2016 में 22वां जलवायु परिवर्तन सम्मेलन CoP22 मारकेश, मोरक्को में आयोजित किया गया था। वर्ष 2017 में 23वां जलवायु परिवर्तन सम्मेलन CoP23 बॉन, जर्मनी में आयोजित किया गया।

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  • वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में कई महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित किए गए। यह समझौता ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है। इसका लक्ष्य है कि इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान की वृध्दि उद्योग-पूर्व स्तर (Pre-Industrial Level) से 20 C या यदि संभव हो सके, तो 1.50 C से अधिक न होने पाए। इस सम्मेलन का महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की तथा साथ-ही साथ कई देशों की सहायता से वर्ष 2020 तक 100 अरब डॉलर जलवायु निधि जमा करने की प्रतिबध्दता जताई। यह समझौता 4 नवंबर, 2016 से प्रभावी हो गया है। इस समझौते पर अब तक 195 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, 2010 (कॉप-16) कानकुन, मेक्सिको में 29 नवंबर से 10 दिसंबर के मध्य आहूत किया गया।

  • कानकुन सम्मेलन मे एक हरित जलवायु कोष (GCF) का प्रावधान किया गया जिसके तहत विकसित राष्ट्र वर्ष 2020 तक, प्रति वर्ष 100 बिलियन डॉलर मुहैया कराएंगे ताकि विकासशील राष्ट्र जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपट सकें।

  • हरित जलवायु निधि, UNFCCC की रुप रेखा के अंतर्गत एक कोष है तथा इसकी स्थापना जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु विकासशील देशों को अनुकूलन एवं न्यूनीकरण प्रक्रियाओं में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। यह कोष GCF बोर्ड द्वारा प्रशासित होता है। इस बोर्ड में 24 सदस्य हैं।

  • पृथ्वी काल (Earth Hour) जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी को बचाने की आवश्यकता के बारे में जागरुकता लाने हेतु वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF: World Wide Fund for Nature) द्वारा आयोजित किया जाने वाला एक विश्वव्यापी आंदोलन है। विश्व भर में प्रतिभागी प्रति वर्ष इस कार्यक्रम के दौरान मार्च महा के अंतिम शनिवार को 8:30 p.m. से 9:30 p.m. तक 1 घंटे के लिए बिजली बंद कर देते हैं। ध्यातव्य है कि वर्ष 2017 में पृथ्वी काल 25 मार्च को मनाया गया। वर्ष 2018 में पृथ्वीकाल 24 मार्च को मनाया गया।

  • मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पैसिफिक महासागर के ऊपर वायुमंडल मे समुद्री जल की बूंदों का छिड़काव कर चमकीले बादल उत्पन्न किए जिससे सूर्य के प्रकाश का अधिक से अधिक परावर्तन कर वैश्विक तापन पर नियंत्रण किया जा सके।

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क्योटो प्रोटोकॉल तथा अन्य प्रोटोकॉल व संधियां

  • क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो UNFCCC (United Nations Framework Convention on Climate Change) से संबध्द है। यह ग्रीन हाउस गैसों के निकास को कम करने से संबंधित है न कि केवल ग्रीन हाउस गैस से।

  • जापान के क्योटो शहर में 11 दिसंबर, 1997 को हुए UNFCCC के तीसरे सम्मेलन मे क्योटो प्रोटोकॉल को स्वीकार किया गया। यह प्रोटोकॉल 16 फरवरी, 2005 से प्रभावी हो गया।

  • क्योटो प्रोटोकॉल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को वर्ष 1990 के स्तर पर लाने के लिए एक बाध्यकारी समझौते के तहत लाया गया है। क्योटो प्रोटोकॉल समझौते के अनुसार, अधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले देशो के लिए उत्सर्जन में वर्ष 2008 से 2012 तक 5.2% की कटौती करने का प्रावधान किया गया था।

  • स्वच्छ विकास युक्ति (CDM- Clean Development Mechanism) UNFCCC के क्योटो प्रोटोकॉल की धारा 12 के अंतर्गत वर्णित है। इसके तहत एनेक्स-I के विकसित देश गैर-एनेक्स देशों में स्वच्छ विकास युक्ति परियोजनाएं कार्यान्वित कर कार्बन क्रेडिट प्राप्त कर सकते हैं।

  • ध्यातव्य है कि कार्बन क्रेडिट का उपयोग विकसिक देश अपनी राष्ट्रीय उत्सर्जन प्रतिबध्दताओं में हुई कमी को पूरा करने में कर सकते  हैं। स्पष्ट है कि परियोजनाएं एनेक्स-I के देशों द्वारा कार्यान्वित की जाती हैं परंतु इन परियोजनाओं को गैर एनेक्स-I विकासशील देशों में क्रियान्वित किया जाता है। इस प्रकार इन परियोजनाओं का संबंध दोनों ही प्रकार के देशों से है।

  • प्रमाणित उत्सर्जन कटौतियां (Certified Emissions Reductions- CER’S), C.D.M. के अंतर्गत आने वाली व्यापारिक इकाई (Tradeable Unit) है। एक CER यूनिट 1 टन कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा को घटाने से प्राप्त होती है। यह वनीकरण (Afforestation) इत्यादि द्वारा प्राप्त की जाती है।

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  • क्योटो प्रोटोकॉल के तहत पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जनों को कम करने के लिए कार्बन क्रेडिट प्रणाली लागू की गाई थी। इस प्रणाल के तहत किसी देश में उपलब्ध उद्योगो के अनुसार, उस देश के द्वारा किए जाने वाले अधिकतम कार्बन उत्सर्जनों का निर्धारण किया जाता है। किसी देश या समूह को उसके निर्धारित अधिकतम कार्बन उत्सर्जनों में से प्रति मीट्रिक टन की कटौती करने पर 1 कार्बन क्रेडिट प्रदान किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कार्बन क्रेडिट का क्रय-विक्रय उनके वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार किया जाता है।

  • क्योटो उपसंधि रुस के हस्ताक्षर के बाद 16 फरवरी, 2005 से प्रभावी हो गई।

  • ध्यातव्य है कि किसी गैस का वैश्विक तापन विभव (GWP: Global Warming Potential) उस गैस के अणुओं की दक्षता एवं उस गैस के वायुमंडलीय जीवनकाल पर निर्भर करता है। कार्बन डाइऑक्साइड का वायुमंडल जीवनकाल परिवर्तनीय है, जबकि सभी समायवधियों के दौरान इसका वैश्विक तापन विभव 1 पाया जाता है। मीथेन का 20 वर्ष के दौरान वैश्विक तापन 72 पाया जाता गया। अतः कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में मीथेन ग्रीन हाउस गैस के रुप में ज्यादा प्रभावी एवं हानिकारक है।

  • सी.डी.एम. (D.M.- Clean Development Mechanism) ग्लोबल वार्मिंग में कमी के लिए हरित गृह गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने की प्रणाली है, जो क्योटो प्रोटोकॉल के तहत सामने आई थी। इसके अंतर्गत वनीकरण, कार्बन सिंक, अन्य देशों में कार्बन न्यूनीकरण की परियोजनाएं आदि आति हैं। यह वैश्विक  तापन को कम करने में सहायक है। इस प्रणाली के तहत विकसित देश विकासशील देशों में कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली परियोजनाओं में पूंजी लगाकर कार्बन क्रेडिट प्राप्त कर सकते हैं।

  • CO2 उत्सर्जन एवं भूमंडलीय तापन के नियंत्रण के लिए कार्बन ट्रेडिंग के प्रोत्साहन की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की जा रही है। UNFCCC (United Nations Framework Convention on Climate Change) के अंतर्गत स्वच्छ युक्ति (CDM- Clean Development Mechanism) का संचालन विकासशील देशों को विकसित देशो से निधियां/प्रोत्साहन उपलब्ध कराने हेतु किया जाता है, ताकि वे अच्छी प्रौद्योगिकी अपना कर ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम कर सके।

  • कार्बन कर (Carbon Tax) उन ऊर्जा स्रोतो पर लगाया जाता जाने वाला कर है, जो वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन करते हैं। यह प्रदूषण कर (Pollution Tax) का एक उदाहरण है। यूं तो स्वीडन, फिनलैंड, नीदरलैंड्स एवं नॉर्वे आदि देश कार्बन टैक्स लगा चुके हैं किंतु वर्ष 2005 में पहली बार, न्यूजीलैंड ने भूमंडलीय तापन के प्रतिकरण हेतु कार्बन टैक्स लगाने का प्रस्ताव किया।

  • फरवरी, 2018 में सिंगापुर सरकार ने घोषणा की है कि वह अपने ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती करने के लिए वर्ष 2019 से एक कार्बन टैक्स लागू करेगी। प्रतिवर्ष 25000 टन या अधिक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के उत्पादन वाले सभी व्यापारिक क्षेत्रों में सभी सुविधाएं कार्बन टैक्स के अधीन होंगी।

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  • ध्यातव्य है कि ग्रीन हाउस प्रोटोकॉल का विकास वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (WRI) तथा वर्ल्ड बिजनेस काउंसिल ऑन सस्टेनेबल डेवलपमेंट (WBCSD) द्वारा किया गया है। यह सरकार एवं व्यवसाय को नेतृत्व प्रदान करने वाले व्यक्तियों के लिए ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को समझने, परिमाण निर्धारित करने एवं प्रबंधन हेतु एक अंतरराष्ट्रीय लेखाकरण साधन हैं। यह ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के मापन, प्रबंधन व प्रतिवेदनों हेतु मानकों को निर्धारित करता है।

  • वन कार्बन भागीदारी सुविधा, विश्व बैंक का एक कार्यक्रम है जो जून, 2008 में प्रारंभ हुआ था। यह सरकारों, व्यवसायों, नागरिकों समाज एवं स्वदेशी जनों की एक वैश्विक भागीदारी  है। इसका सृजन वनोन्मूलन एवं वन निम्नीकरण के फलस्वरुप होने वाले उत्सर्जनों को कम करने में विकासशील देशों की सहायता करने के मुख्य उद्देश्य से किया गया है। यह सुविधा विकासशील देशो कों उनके इन प्रयासों में सहायता हेतु वित्तीय एवं तकनीकी मदद उपलब्ध कराती हैं। परंतु यह सुविधा विश्वविद्यालयों, व्यक्तियों एवं संस्थानों को वित्तीय मदद नहीं देती।

  • बायोकार्बन फंड इनिशिएटिव फॉर सस्टेनेबल फॉरेस्ट लैडस्केप्स एक बहुपक्षीय कोष है जिसका प्रबंधन विश्व बैंक द्वारा किया जाता है। इस कोष हेतु नॉर्वे ने अधिकतम 135 मिलियन डॉलर यू.के. ने लगभग 120 मिलियन डॉलर तथा अमेरिका ने 25 मिलियन डॉलर की प्रतिबध्दता व्यक्त की है। यह कोष स्थलीय क्षेत्र (Land Sector) से ग्रीन हाउस  गैस उत्सर्जनों में कमी करने को बढ़ावा देता है।

  • कार्टाजेना प्रोटोकॉल, जैव-विविधता अभिसमय (Convention Biological Diversity- CBD) का पूरक प्रोटोकॉल है, जो जैव प्रौद्योगिकी द्वारा उत्पन्न जीवित संशोधित जीवों (Live Modified Organisms- LMO) द्वारा उत्पन्न संभावित खतरों से जैव विविधता की रक्षा करने हेतु प्रतिबध्द है। इसे 29 जनवरी, 2000 को अंगीकृत किया गया तथा यह 11 सितंबर, 2003 से प्रभाव मे आया।

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  • नगोया प्रोटोकॉल 12 अक्टूबर, 2014 को प्रभाव में आया। यह भी CBD का पूरक समझौता है। यह आनुवांशिक संसाधनों (Genetic Resources) को प्राप्त करने एवं उनसे मिले लाभों के समुचित निष्पक्ष बंटवारे से संबंधित है।

  • ध्यातव्य है कि भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन संधि (GCCA) यूरोपीय संघ (EU) द्वारा विकासशील देशो के साथ वार्तालाप एवं सहयोग से वर्ष 2007 मे स्थापित की गई। शुरुआत में 4 देशों से प्रारंभ यह संधि 38 देशों, 8 क्षेत्रों और उपक्षेत्रों में क्रियाशील है। यह अपने लक्ष्यों को दो पारस्परिक सुदृढ़ स्तंभों के माध्यम से पूरा करता है। इनमें लक्ष्याधीन विकासशील देशों को उनकी विकास नीतियों और बजटों में जलवायु परिवर्तन के एकीकरण हेतु तकनीकी एवं वित्तीय सहायता प्रदान करना शामिल है। GCCA का ओवरऑल उद्देश्य यूरोपीय संघ और गरीब विकासशील देशो के मध्य नई संधि बनाना है जिनके पास जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए न्यूनतम क्षमता है। इसका समन्वय यूरोपीय कमीशन (EC) द्वारा किया जाता है।

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जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में भारत की कार्ययोजना

  • जून, 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जलवायु परिवर्तन पर भारत की प्रथम राष्ट्रीय क्रिया योजना को जारी किया था।

  • 30 जून, 2008 को जलवायु परिवर्तन पर भारत की राष्ट्रीय कार्ययोजना का शुभारंभ किया गया था। राष्ट्रीय कार्ययोजना आठ राष्ट्रीय मिशनों पर ध्यान केन्द्रित करती है।

  • भारत के राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (National Action Plan on Climate Change) के अंतर्गत निम्नलिखित आठ राष्ट्रीय मिशन शामिल हैं –

  1. राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission)

  2. राष्ट्रीय संवर्धित ऊर्जा बचत मिशन (National Mission For Enhanced Energy Efficiency)

  3. राष्ट्रीय सतत पर्यावास मिशन (National Mission on Sustainable Habitat)

  4. राष्ट्रीय जल मिशन (National Water Mission)

  5. राष्ट्रीय हिमालयी पारिप्रणाली परिरक्षण मिशन (National Mission for Sustainable the Himalayan Ecosystem)

  6. राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (National Mission for a Green India)

  7. राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (National Mission For Sustainable Agriculture)

  8. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्यनीतिक-ज्ञान मिशन (National Mission on Strategic Knowledge for Climate Change)

  • सौर शक्ति, वन्यीकरण तथा अपशिष्ट से ऊर्जा परिवर्तन क्रमशः राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय हिमालयी पारिप्रणाली परिरक्षण मिशन तथा राष्ट्रीय सतत पर्यावास मिशन में शामिल हैं, जबकि नाभिकीय शक्ति या आणविक ऊर्जा उपर्युक्त आठ मिशन में से किसी में भी शामिल नही है। राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के तहत रेखांकित 8 मिशनों मे से एक मिशन राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM) वनों के उस प्रभाव को स्वीकार करता है, जिसका जलवायु परिवर्तन शमन, वन पर निर्भर समुदायों की खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, जैवविविधता, संरक्षण एवं आजीविका पर सुरक्षा के जरिए पर्यावरण को बेहतर बनाने पर पड़ता है।

  • अक्टूबर, 2015 में राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन (जीआईएम)  की राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद (एनईसी) की द्वीतीय बैठक में देश के चार राज्यों – मिजोरम, मणिपुर, केरल, और झारखंड द्वारा प्रस्ताविक संभावित योजनाएं एवं संचालनों की वार्षिक योजना को मंजूरी  दी गई।

  • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के तहत रेखांकित 8 मिशनों मे से एक मिशन राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (GIM) वनों के उस प्रभाव को स्वीकार करता है, जिसका जलवायु परिवर्तन शमन, वन पर निर्भर समुदायों की खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, जैव विविधता, संरक्षण एवं आजीविका पर सुरक्षा के जरिए पर्य़ावरण को  बेहतर बनाने पर पड़ता है। अक्टूबर, 2015 में राष्ट्रीय ग्रीन इंडिया मिशन (जीआईएम) की राष्ट्रीय कार्यकारी परिषद (एनईसी) की द्वीतीय बैठक में देश के चार राज्यों – मिजोरम, मणिपुर, केरल और झारखंड द्वारा प्रस्तावित संभावित योजनाएं एवं सचालनों की वार्षिक योजना को मंजूरी दी गई।

  • जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त संरचना सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी) को सौंपे गए अभीष्ट राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (आईएनडीसी) के तहत भारत के अनेक घोषणाएं की हैं। भारत की कार्ययोजना के तहत आईएनडीसीसी के लक्ष्यों में वन एवं वृक्ष लगाकर कार्बन सिंक को बढ़ावा देना, प्रदूषण उपशमन, स्वच्छ ऊर्जा विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा इत्यादि  शामिल हैं।

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भारत के आई.एन.डी.सी.

  • सकल घरेलू उत्पाद उत्सर्जनों की तीव्रता को वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2030 तक 33-35 प्रतिशत तक कम करना।

  • वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित 40 प्रतिशत संचित विद्युत संस्थापित क्षमता प्राप्त करना।

  • अतिरिक्त वन व वृक्षारोपण के माध्यम से वर्ष 2030 तक 2.5-3.0 बिलियन टन कार्बन सिंक का निर्माण

  • आर्थिक संवृध्दि हेतु जलवायु अनुकूलन व स्वच्छतर मार्ग का अनुसरण

  • ध्यातव्य है कि वर्तमान समय में वैश्विक वायुमंडल चौकसी स्टेशनों की संख्या 31 है। अल्जीरिया, ब्राजील एवं केन्या में वैश्विक वायुमंडल चौकसी स्टेशन स्थापित हैं, जबकि भारत में अभी यह स्थापित नही है।

  • उल्लेखनीय है कि मई, 2011 में हिमालय प्रदेश और विश्व बैंक के बीच हुए उत्सर्जन ह्रास क्रमय समझौते पर हस्ताक्षर हिमाचल प्रदेश के सहायक मुख्य सचिव (वन) श्री सुदरीप्तों रॉय तथा विश्व बैंक के उप-राज्य निदेशक (Deputy Country Director) श्री हुबर्ट नोट जोसरैंड ने किए।

  • ध्यातव्य है कि झारखंड राज्य में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यू.एन.डी.पी.) की सहायता से राज्य जलवायु परिवर्तन केन्द्र स्थापित किया गया है। यह जलवायु परिवर्तन पर राज्य सरकार को परामर्श प्रदान करता है। इसके मुख्य कार्य हैं –

  1. विभिन्न हितधारकों के प्रयोग हेतु जलवायु परिवर्तन संबंधी ज्ञान सामग्री का निर्माण।

  2. जलवायु परिवर्तन संबंधी समस्याओं पर कार्य कर रहे अन्य संगठनों के साथ नेटवर्क बनाना।

  3. जन-जागरुकता बढ़ाने हेतु सरकारी अधिकारियों के क्षमता विकास में सहयोग।

  • जलवायु परिवर्तन पर झारखंड कार्ययोजना वर्ष 2013 एवं 2014 में प्रकाशित हुई। इसका उद्देश्य पर्यावरण धारणीयता सुनिश्चित करने हुए गरीबी उन्मूलन एवं रोजगार बढ़ाने का लक्ष्य प्राप्त करना था। कार्ययोजना विकसित करने की प्रक्रिया की शुरुआत यू.एन.डी.पी. की सहायता से मई, 2011 में प्रारंभ की गई।

  • झारखंड जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना रिपोर्ट (2014) के अनुसार, पर्यावरण संवेदनशीलता के मामले में सरायकेला खारसवां जिला शीर्ष पर है। इसका स्कोर 0.78 है, जो इसकी सुभेद्यता को दर्शाता है। मापन (-1) से (+1) के पैमाने पर किया जाता है, जो क्रमशः कम से अधिक सुभेद्यता दर्शाता है।

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ओजोन परत क्षरण

ओजोन परत

  • ओजोन (O3) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली एक गैस है, जो वायुमंडल में बहुत कम मात्रा में पाई जाती है।

  • जमीन की सतह के ऊपर अर्थात निचले वायुमंडल में यह एक खतरनाक दूषक है, जबकि ऊपरी वायुमंडल में ओजोन परत के रुप में सयह सूर्य के पराबैंगनी विकिरण या अल्ट्रावायलेट किरणों से पृथ्वी पर जीवन को बचाती है।

  • ओजोन परत मुख्यतया स्ट्रेटोस्फीयर (समतापमंडल) के निचले हिस्से में पृथ्वी से लगभग 10 से 50 किमी. की ऊंचाई पर अवस्थित रहती है, परंतु परत के रुप में इसका सर्वाधिक संकेन्द्रण 20 से 35 किमी. के मध्य ही पाया जाता है। इसका 10 प्रतिशत ट्रोपोस्फीयर (क्षोभमंडल) तथा 90 प्रतिशत स्ट्रेटोस्फीयर (समतापमंडल) में पाया जाता है। यह परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet) किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती हैं।

  • ओजोन परत का मुख्य भाग समतापमंडल में मुख्यतः पृथ्वी की सतह से 20 से 35 किमी. की ऊंचाई के मध्य पाया जाता है। पृथ्वी  के ऊपर इसकी सघनता मौसम एवं अन्य भौगोलिक कारकों पर निर्भर करती है।

  • समतापमंडल में ओजोन के स्तर को प्राकृतिक रुप से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड द्वारा विनियमित किया जाता है। ओजोन परत की मोटाई मौसम के हिसाब से बदलती रहती है। बसंत ऋतु में इसकी मोटाई सबसे ज्यादा होती है तथा वर्षा ऋतु में सबसे कम रहती है।

  • ध्यातव्य है कि ओजोन परत को डॉबसन इकाई (Dobson Unit-DU) में मापा जाता है। 1 डॉबसन यूनिट 00C तथा 1 atm  दाब पर शुध्द ओजोन की 0.01 मिमी. की मोटाई के बराबर होती है।

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ओजोन परत क्षरण

  • सर्वप्रथम ब्रिटिश दल ने वर्ष 1985 में टोटल ओजोन मैपिंग स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र का पता लगाया था।

  • ओजोन छिद्र के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) उत्तरदायी है। CFC क्लोरीन, फ्लोरीन एवं कार्बन के मानव निर्मित यौगिक हैं। यह रसायन ग्रीन हाउस प्रभाव में योगदान देने के साथ-साथ ओजोन परत की ओजोन गैस से अभिक्रिया करके ओजोन को ऑक्सीजन के रुप में विघटित कर देता है, जिससे ओजोन परत का क्षरण होता है।

  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन मानव निर्मित रसायनों का एक समूह है, जो रंगहीन एवं गंधहीन है तथा सरलता से द्रव में परिवर्तित हो जाता है। यह ओजोन परत के ह्रास के लिए उत्तरदायी प्रमुख गैस है। यह एक अत्यधिक स्थायी यौगिक है, जो वायुमंडल में 80 से 100 वर्षों तक बना रह सकता है।

  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन, क्लोरीन, फ्लोरीन एवं ऑक्सीजन से बना मानव निर्मित गैसीय व द्रवीय पदार्थ है, जो कि रेफ्रिजरेटर तथा वातानुकूलित यंत्रों में शीतकालीन के रुप में प्रयोग किया जाता है।

  • 1960 के दशक से रेफ्रिजरेटरों, एयरकंडीशनरों, स्प्रे केस, विलायकों, फोम के निर्माण, दाबीकृत प्रसाधनों, उद्योगो में सूक्ष्म मार्जन कार्यों, इलेक्ट्रॉनिक अवयवों की सफाई करने एवं अन्य अनुप्रयोगों में इसका उपयोग बढ़ता जा रहा है। इसका प्रयोग रेफ्रिजरेटर के साथ-साथ प्लास्टिक फोम, एयरकंडीशनर्स, विमान प्रणोदक आदि में किया जाता है।

  • फ्रिजों में प्रशीतक के रुप में भरी जाने वाली गैसों का विपणन सामान्यतः मेफ्रोन ब्रांड नाम के तहत किया जाता है। ये सामान्यतः हैलोनिक हाइड्रोकार्बन (Dichlorodifluoro Methane, FCFC आदि) होते हैं। हालांकि अमोनिया भी प्रशीतक के रुप में बड़े संयंत्रों में प्रयुक्त होती है।

  • वायुमंडल में विद्यमान ओजोन परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोकने का कार्य़ करती है। इससे पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा होती है। ओजोन परत की क्षीणता के लिए उत्तरदायी गैसें हैं – सीएफसी, हैलोजन्स, नाइट्रस ऑक्साइड, ट्राइक्लोरोएथीलीन, हैलोन- 1211, 1301 इत्यादि।

  • वायुमंडल में उपस्थित ओजोन के क्षरण का क्लोरोफ्लोरोकार्बन एक प्रमुख कारण है। वायुमंडल के ध्रुवीय भागों में ओजोन का निर्माण धीमी गति से होता है। अतः ओजोन के क्षरण का प्रभाव सर्वाधिक ध्रुवों के ऊपर परिलक्षित होता है।

  • ध्रुवीय समतापमंडलीय बादलो में नाइट्रिक अम्ल, क्लोरोफ्लोरोकार्बनों से अभिक्रिया कर क्लोरीन का निर्माण करता है, जो कि ओजोन परत के प्रकाश-रासायनिक विनाश के लिए उत्तरदायी है। चूंकि ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल ऐसा माध्यम है, जहां क्लोरीन यौगिक ओजोन परत का विनाश करने वाले क्लोरीन कणों में परिवर्तित हो जाते हैं, अतः ओजोन परत में छिद्र का निर्माण करने में इनकी उपस्थिति आवश्यकता है।

  • ध्यातव्य है कि ओजोन छिद्र का सर्वाधिक निर्माण अंटार्कटिका के ऊपर पाया गया है।

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ओजोन परत संरक्षण के उपाय

  • टोरंटो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जी. डब्ल्यू. केंट मूर के नेतृत्व में अनुसंधानकर्ताओँ ने वर्ष 2005 में तिब्बत पठार के ऊपर ओजोन हैलो का पता लगाया था। इसमें तिब्बत पठार के चारों ओर अतिरिक्त ओजोन की उपस्थिति का पता लगा। पठार के ऊपर केन्द्रीय भाग में ओजोन की कम मात्रा एवं परिधि के चारों ओर अतिरिक्त ओजोन का छल्ला पाया गया।

  • इस अतिरिक्त ओजोन की सांद्रता अत्यधिक प्रदूषित शहरों में उपस्थित ओजोन सांद्रता की तरह थी। ध्यातव्य है कि O3 का उच्च सांद्रण मनुष्यों में खांसी, सीन में दर्द उत्पन्न करने के साथ-साथ फेफड़ों को भी क्षति पहुंचा सकता है।

  • ध्यातव्य है कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसे ओजोन का अवक्षय करने वाले पदार्थों के उत्पादन एवं प्रयोग को चरणाबध्द रुप से समाप्त कर, ओजोन परत को संरक्षित करने हेतु निर्मित किया गया है। अतः मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पृथ्वी की ओजोन परत के संरक्षण से संबंधित है।

  • उल्लेखनीय है कि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के अनुसार, सीएफसी, होलोन्स तथा अन्य ओजोन रिक्तिकरण रसायनों जैसे कार्बन टेट्राक्लोराइड के उत्पादन पर रोक लगाई गई है। क्लोरोफ्लोरोकार्बन, होलोन्स तथा कार्बन टेट्राक्लोराइड तीनों ही पदार्थ ओजोन रिक्तिकारक हैं।

  • यह वियना संधि का एक प्रोटोकॉल है जिसका उद्देश्य ओजोन परत का क्षरण करने वाले पदार्थों (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) को प्रयोग से हटाना है। यह प्रटोकॉल 1 जनवरी, 1989 से प्रभावी हुआ था।

  • वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रतिवर्ष 16 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस के रुप में मनाने की घोषणा की थी।

  • उल्लेखनीय है कि वर्ष 1987 में इसी दिन (16 सितंबर को) मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol on Substances that Deplete the Ozone Layer) पर हस्ताक्षर किए गये थे। अतः 16 सितंबर को ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय ओजोन दिवस मनाया जाता है।

  • वर्ष 2017 के अंतरराष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस का विषय (Theme) था – सूर्य के नीचे सभी प्रकार के जीवन की देखभाल करना (Caring for all life under the Sun)

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ओजोन परत क्षरण के प्रभाव

  • सर्वप्रथम ब्रिटिश दल ने वर्ष 1985 में टोटल ओजोन मैपिंग स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद का पता लगाया था।

  • ध्यातव्य है कि ओजोन परत क्षरण के पृथ्वी पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ते हैं। सूर्य से आने वाले हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से त्वचा कैंसर होने का खतरा रहता है। अधिक समय तक सूर्य के पराबैंगनी विकिरण के शरीर पर पड़ने पर जीएनए में आनुवांशिक उत्परिवर्तन हो सकता है, जो त्वचा कैंसर का कारण ध्यातव्य है कि सूर्य की पराबैंगनी किरणों को सामान्यतया तीन वर्गों में बंटा जाता है। इन्हें UV-A, UV-B तथा UV-C किरणें कहा जाता है।

  • UV-A तथा UV-B किरणों का त्वचा पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। UV- C भी अत्यंत घातक होती है, परंतु पृथ्वी सतह पर नहीं पहुंच पाती है। UV-B किरणों से जीवधारियों पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं।

UV-B विकिरण से पड़ने वाले प्रभाव

  • आनुवांशिक दोष

  • जीन उत्परिवर्तन

  • पौधों की वृध्दि में रुकावट

  • त्वचा कैंसर

  • मोतियाबिंद

  • सनबर्न

  • प्रतिरक्षा तंत्र का कमजोर होना

  • पत्तियों को क्षति

  • ओजोन परत सूर्य के उच्च आवृत्ति के पराबैंगनी प्रकाश की 93-99 प्रतिशत मात्रा अवशोषित कर लेती है, जो पृथ्वी पर जीवन के लिए हानिकारक है।

  • ओजोन परत के अभाव में पृथ्वी पर सूर्य की पराबैंगनी (Ultraviolet) किरणों से जैविक जीवन को अत्यधिक क्षति पहुंचेगी। परंतु यदि ओजोन को मात्र गैस के संदर्भ में ले, तों यह विषैली होने के कारण पृथ्वी की सतह पर जैविक जीवन के लिए हानिकारक है।

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वन एवं वन्य जीव

वन एवं उसके प्रकार

  • भारत में विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते हैं। इनमें उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन एवं उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन, मैंग्रोव वन इत्यादि प्रमुख हैं।

  • उष्णकटिबंधीय आर्द्र सदाबहार वन ऐसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहां वर्षा 200-300 सेमी. के बीच होती है, जैसे पश्चिमी घाट। अरुणाचल प्रदेश एवं मिरोजरम में भी उष्णकटिबंधीय आर्द्र सदाबहार वन पाए जाते हैं।

  • उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों का विस्तार पश्चिमी घाट (सह्याद्रि), उत्तर-प्रदेश पूर्व भारत और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के 200 सेमी. से अधिक औसत वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। उदाहरण – रोजवुड, पान इत्यादि।

  • उष्णकटिबंधीय वर्षा वन – यह बायोम भूमध्य रेखा के निकट है और 100 उत्तरी तथा 100 दक्षिणी अक्षांशों तक विस्तृत है। यह विश्व का सबसे बड़ा बायोम (Bioms)  है, जो पृथ्वी के धरातल का लगभग 8 प्रतिशत भाग घेरे हुए है। यह बायोम पृथ्वी के आधे से अधिक वनस्पतिजात तथा प्राणिजात को संजोए हुए है। वर्षा पूरे वर्ष होती है रहती है। अधिक तापमान तथा अधिक आर्द्रता के कारण चौड़ी पत्ती वाले सदाबहार वृक्ष उगते हैं, जिनका विशिष्ट स्तरण होता है। वनस्पति जीवन में इतनी विविधता पाई जाती है कि एक हेक्टेयर भूमि  पर वृक्षों की 200 से अधिक प्राजातियां देखी जा सकती हैं। प्रकाश पाने की होड़ में वृक्षों और पौधों पर चढ़ती बेले आपस में गुंथकर फंदा जैसा बनाती हैं, इन बेलों को कठलता या लिपाना कहते हैं। सभी ज्ञात कीटों की प्रजातियों में से लगभग 70 से 80 प्रतिशत उष्णकटिबंधीय वर्षा वाले वनों में मिलती है। पशु जीवन का बाहुल्य है और उसमें काफी भिन्नता है। इनमें भूमि  पर तथा वृक्षों पर रहने वाले दोनों जीव शामिल हैं।

  • विषुवतीय वने – ऐसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मिलते हैं जहां 200 सेमी. से अधिक वर्षा होती है। लंबे, चौड़े पत्ते वाले सदाबहार पेड़ यहां की प्रमुख वनस्पतियां हैं। ऊंचे एवं चौड़े पत्ते वाले पेड़ वन की सतह पर पत्तेदार वितान का गठन करते हैं। वितान का ऊपरी हिस्सा अक्सर समृध्द आधिपादप वनस्पति का समर्थन करता है। विश्व भर की लगभग 80 प्रतिशत जैव विविधता विषुवतीय वनों में पाई जाती है।

  • उल्लेखनीय है कि अमेजन वर्षा वन, एमेजोनिया या अमेजन वन के नाम से जाने जाते हैं। ये चौड़ी पत्तियों वाले नमीं-युक्त वन हैं, जो दक्षिण अमेरिका के अमेजन बेसिन के एक बड़े भू-भाग पर फैले हैं। इन्हें ही पृथ्वी ग्रह के फेफड़ों के रुप में जाना जाता है क्योंकि इनकी वनस्पति लगातार कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन मुक्त करती रहती है।

  • पृथ्वी की 20 प्रतिशत से अधिक ऑक्सीजन अमेजन वर्षा वनों द्वारा उत्पादित होती है।

  • पेड़-पौधों एवं जंतुओं की सर्वाधिक विविधता उष्णकटिबंधीय आर्द्र वन में पाई जाती है।

  • उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन – ऐसे क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहां वर्षा 100-200 सेमी. के मध्य होती है। इन वनों में सागौन प्रधान वृक्ष प्रजाति है। यहां बांस, शीशम, चंदन इत्यादि अन्य व्यावसायिक रुप से महत्वपूर्ण वृक्ष प्रजातियां पाई जाती हैं। पूर्वी दक्कन पठार में प्रमुखतया शुष्क सदाबहार वन पाए जाते हैं न कि आर्द्र वन। जबकि हिमाचल प्रदेश में मुख्यतः उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन, उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन आदि पाए जाते हैं। सूखे पर्णपाती वनो का विस्तार गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हैं।

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  • उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों को मानसूनी वन भी कहते हैं। यह साधारणतया भारत, म्यांमार, थाइलैंड तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्य भागों में पाए जाते हैं। इन वनों में उगने वाले वृक्ष चौड़ी पत्ती वाले पर्णपाती (वर्ष में एक बार पत्तियां गिराने वाले) होते हैं।

  • उपोष्ण कटिबंधीय वन – उत्तर-पश्चिमी (कश्मीर को छोड़कर) खासी पहाड़ियों, नगालैंड एवं मणिपुर में पाए जाते हैं। चीड़ इन वनों का मुख्य वृक्ष है परंतु अधिक आर्द्रता वाले भागों में बांज या ओक (Oak) जैसे चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष देखे जाते हैं। इनके अलावा बुरुंश या रोडोडेंड्रोन (Rhododendrom) जैसी पहाड़ियां भी पाई जाती हैं। चंदन उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वृक्ष हैं, हिमालयी क्षेत्रों में नहीं पाया जाता है। अतः यदि आप हिमालय से होकर यात्रा करते हैं, तो आपकों वहां  बांज एवं बुरुंश जैसे पादपों को प्राकृतिक रुप से उगते हुए दिखने की संभावना है परंतु चंदन के वृक्ष वहां नहीं दिखेंगे। चंदन के वृक्ष के जंगल को देखने के लिए आपको दक्षिण भारत की यात्रा करनी होगी।

  • रेड सैंडर्स (रक्त चंदन) – दक्षिण भारत के उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों में पाई जाने वाली वृक्ष की एक प्रजाति है। इसका वैज्ञानिक नाम टेरोकार्पस सेंटेलिनस (Pterocarpus Santalinus) है। यह पेड़ आंध्र प्रदेश के पालकोंडा व सेशाचलम पर्वत श्रेणियों में मुख्यतया पाया जाता है। इसकी लकड़ी सफेद होती है, जो कालांतर में लाल रंग के चिपचिपे रस के स्राव के कारण लाल हो जाती है। भारत इसका निर्यात मुख्यतः चीन तथा जापान को करता है। इस वृक्ष का प्रयोग आयुर्वेद व सिध्दा दवाइयों को बनाने में, पूजा सामग्री में एवं पारंपरिक खिलौनों को बनाने में किया जाता है।

  • उल्लेखनीय है कि टैक्सस वृक्ष हिमालय में प्राकृतिक रुप से पाया जाता है। टैक्सस वृक्ष रेड डाटा बुक में सूचीबध्द है। टैक्सस वृक्ष से टैक्सॉस नामक औषधि प्राप्त की जाती है, जो विशेषतया कैंसर के प्रति प्रभावी है। परंतु इसका प्रयोग पार्किन्सन रोग के विरुध्द भी किया जाता है।

  • अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में मैंग्रोव वन, सदापर्णी वन एवं पर्णपाती वन तीनों ही पाए जाते हैं। भारत वन स्थिति रिपोर्ट, 2017 के अनुसार, अंडमान एवं निकोबार में मैंग्रोव आवरण 617 वर्ग किमी. है।

  • मैंग्रोव (Mangrove)- उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्र तटो के लवणीय जल में उगने वाले वन होते हैं। ये वन जैव विवधता के संरक्षक होने के साथ समुद्र और तट की बीच महत्वपूर्ण कड़ी का काम करते हैं और तट को समुद्र की ओर से आने वाली तीव्र लहरों के विनाश से बचाते हैं। इस प्रकार ये तट रेखा को स्थिर रखते हैं तथा समुद्र द्वारा कटाव से  रक्षा प्राचीर का कार्य करते हैं। इसलिए इन्हें अति विशिष्ट पारिस्थितिक निकाय माना जाता है।

  • मैंग्रोव (गरान) वन सुनामी और चक्रवात जैसी तटीय आपदाओं के विरुध्द विश्वसनीय सुरक्षा बाड़े का कार्य करते है। यह वृक्ष अपनी सघन जड़ों के कारण तूफान और ज्वार भाटे से नहीं उखड़ते हैं।

  • ओड़िशा तट बंगाल की खाड़ी में उठने वाले चक्रवातों से सर्वाधिक प्रभावित राज्य हैं। यहां चक्रवातों के आने की बारंबारता अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है। मैंग्रोव वन चक्रवात अवरोधक के रुप में कार्य करते हैं। हाल के दिनों में महानदी डेल्टाई क्षेत्र में मैंग्रोव वनो का निर्वनीकरण हुआ है जिससे चक्रवातों से होने वाले नुकसान में वृध्दि हुई है।

  • उल्लेखनीय है कि भितरकनिका गरान ओड़िशा के केंन्द्रापाड़ा जिले में ब्राह्मणी, वैतरणी और महानदी डेल्टा क्षेत्र में स्थित है। यह मैंग्रोव वनों के लिए प्रसिध्द है। यह एक रामसर स्थल (वर्ष 2002 में घोषित) भी है।

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  • ज्वारीय वन डेल्टा प्रदेशों तथा समुद्र के ज्वार वाले भागों में होते हैं, इन्हें मैंग्रोव वनस्पति के नाम से भी जाना जाता है। मैंग्रोव वनस्पति का सर्वाधिक क्षेत्र सुंदरवन डेल्टा में पाया जाता है। यहां के वनों में सुंदरी वृक्ष विशेष रुप से उल्लेखनीय है।

  • ध्यातव्य है कि गोवा का चोराव द्वीप (Chorao Island) पूरी तरह से संरक्षित कच्छ-वनस्पति क्षेत्र है।

  • वन अवस्थिति

उष्णकटिबंधीय वन     साइलेंट वैली

शंकुवृक्ष वन           हिमाचल प्रदेश

कच्छ वनस्पति        सुंदरबन

पतझड़ वन           राजस्थान

  • सुंदरबन, पश्चिम बंगाल की कच्छ वनस्पति है। पश्चिमी हिमालय उपअल्पाइन शंकुवृक्ष वन नेपाल, भारत और पाकिस्तान में विस्तारित हैं। भारत में यह उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर में विस्तारित हैं। साइलेंट वैली सदाबहार उष्णकटिबंधीय वन केरल के पालक्कड़ जिलें विस्तारित है। सूखे पर्णपाती वनों का विस्तार गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में है।

वनों से लाभ एवं वनों के उपयोग

  • विकास के चरण के आधार पर प्राकृतिक संसाधनों को निम्न समूहों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. संभाव्य संसाधन (Potential Resources)

  2. वास्तविक संसाधन (Actual Resources)

  3. आरक्षित संसाधन (Reserve Resources)

  4. स्टॉक संसाधन (Stock Resources)

  • संभाव्य संसाधन वे हैं, जो एक क्षेत्र में स्थित है तथा भाविष्य में भी प्रयोग में लाए जा सकते हैं, जबकि वास्तविक संसाधन वे हैं, जिनका सर्वेक्षण किया गया है तथा उनकी मात्रा एवं गुणवत्ता का पता लगाया गया है और जिनका वर्तमान समय में प्रयोग किया जा रहा है। किसी वास्तविक संसाधन का विकास उपलब्ध प्रौद्योगिकी तथा लागत पर निर्भर करता है।

  • वही दूसरी ओर नवीकरणीय संसाधन वे होते हैं, जो एक बार उपयोग होने के बाद पुनः उपयोग में लाए जा सकते हैं। वन एक नवीकरणीय संसाधन हैं क्योंकि इनके एक बार संपोषित दोहन के बाद पुनः दोहन किया जा सकता है। वनों से पर्यावरण की गुणवत्ता बढ़ती है क्योंकि वन पर्यावरण से कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण कर ऑक्सीजन मुक्त करते हैं।

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वनों द्वारा प्राप्त क्रियाएं-

सांस्कृतिक लाभ

  • आध्यात्मिक

  • शैक्षणिक

  • सांस्कृतिक

  • साहित्य रचना

उत्पादक क्रियाएं

  • फल

  • रेजिन

  • एल्कलॉयड

  • रबड़

  • औषधियां

नियमनकारी क्रियाएं

  • तापमान नियंत्रण

  • अवशोषण

  • बाढ़ व सूखा पर नियंत्रण

  • गैसों (CO2, O2) का संतुलन

  • कार्बन के जैव भू-रासायनिक चक्र का नियमन

सुरक्षात्मक

  • भूमि संरक्षण

  • जल संरक्षण

  • सूखा, ठंड, हवा, धूप से सुरक्षा

  • ध्वनि प्रदूषण से बचाव

  • वन मानव जाति को अत्यधिक लाभ पहुंचाते हैं। ये विभिन्न प्रकर की सेवाएं प्रदान कर प्रकृति व मानव को अनगिनत लाभ पहुंचाते हैं।

  • उल्लेखनीय है कि अगर किसी पेड़ को काटे बिना उससे पुल बना दिया जाए, तो उस पुल को ही जीवित पुल या प्राकृतिक पुल कहते हैं।

  • मेघालय राज्य में कई जीवित पुल हैं। इस राज्य के चेरापूंजी में तो जीवित पुलों की भरमार है। इस क्षेत्र में रबर ट्री नामक एक वृक्ष पाया जाता है जिसका वानस्पतिक नाम फाइकस इलास्टिका है। इस पेड़ की शाखाएं जमीन को छूकर नई जड़ बना लेती हैं। इस तरह इस पेड़ की अतिरिक्त जड़ें अलग दिशा में बढ़ सकती हैं। जीवित पुल बनाने के लिए नदी के किनारे के पेड़ों की जड़ों को नदी के दूसरे किनारे कि दिशा में बढ़ाने के प्रयास किए जाते हैं इस तरह कई पेड़ों की जड़ें मिलकर एक पुल का निर्माण करती है।

  • एल्युमीनियम को इसके पर्यावरणीय हितैषी स्वरुप और नवीकरणीय योग्य होने के कारण हरी धातु कहा जाता है। एल्युमीनियम का लकड़ी के स्थान पर प्रयोग नगण्य ही होता है।

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वनोन्मूलन एवं उसके प्रभाव

  • भारत में वन क्षेत्र का ह्रास भारत के जनांकिकीय संक्रमण से प्रत्यक्षतः संबंधित रहा है क्योंकि जनसंख्या बढ़ने के कारण वन क्षेत्र पर दबाव बढ़ता है। कृषि आवास, नगरीकरण, उद्योग आदि के कारण वन क्षेत्रों को काट दिया जाता है। वन क्षेत्र एवं जनसंख्या वृध्दि में प्रायः नकारात्मक संबंध होता है।

  • सामान्यतया विकासशील देशों में जनसंख्या व वृध्दि के साथ वन क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जबकि विकसित देशो में ऐसा नही होता है। पर्यावरणीय जागरुकता एवं वन क्षेत्र के प्रति संवेदनशीलता के कारण विकसित देशो में वन क्षेत्रों में वृध्दि देखी जाती है। हालांकि अधिकांश देशों में जनसंख्या वृध्दि, वन क्षेत्र को द्रष्प्रभावित ही करती हैं।

  • वन ह्रास का मुख्य कारण तेजी से हो रहा औद्योगीकरण ही है जिसमें वनों को काटकर नगरों की स्थापना की जा रही है एवं लकड़ियों का दोहन किया जा रहा है तथा खाली हो रही भूमि का उपयोग कृषि के लिए किया जा रहा है।

वनोन्मूलन के कारण

  • जंगल की आग

  • नीति निर्माण में सतत विकास की अनदेखी

  • खेती योग्य भूमि का विस्तार

  • सड़कों का विकास

  • शहरीकरण

  • औद्योगीकरण

  • पशुओं द्वारा घास चरना

  • काष्ठीय पापदों का अंधाधुंध व्यावसायिक उपयोग

  • वहीं दूसरी ओर नगरीकरण निर्वनीकरण का प्रभाव नहीं है बल्कि यह निर्वनीकरण के कारणों मे से एक है। बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए नगरों और वास स्थानों का विस्तार वनों एवं जैव विविधता को प्रभावित करता है। नगरों की आवश्यकताओं के संदर्भ में भी वनों की कटाई से वन क्षेत्र कम हुए हैं। इसके विपरीत हिमालय में जल स्त्रोतों का सूखना, जैव विविधता की हानि एवं मृदा अपरदन वनोन्मूलन या निर्वनीकरण के प्रभाव हैं।

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वनोन्मूलन के प्रभाव

  • कम वर्षा

  • क्षेत्रीय तथा भूमंडलीय जलवायु पर दुष्प्रभाव

  • जैव विविधता को हानि

  • हिमालय में जल स्त्रोतों का सूखना

  • जाति विलोपन

  • भूमंडलीय तापमान में वृध्दि

  • मृदा अपरदन

  • बाढ़ एवं सूखा

  • मरुस्थल का निर्माण

  • भूमि की उर्वरा शक्ति का ह्रास

  • उल्लेखनीय है कि नगालैंड के पर्वत क्रमशः बंजर होते जा रहे हैं, इसका प्रमुख कारण यहां की स्थानीय जातियों द्वारा व्यापक पैमाने पर की जाने वाली झूम कृषि है। झारखंड के वन के क्षेत्र की जलवायु को प्रभावित करने वाला प्रमुख घटक जंगल की आग है। जंगल की आग से झारखंड के प्रभावित होने वाले जिलों में हजारीबाग, जमशेदपुर, पलामू, बोकारों आदि हैं। जंगल की आग झारखंड के आरक्षित एवं संरक्षित वनों में भी प्रमुख समस्या है।

  • ध्यातव्य है कि वालपराई नगर तमिलनाडु के कोयंबटूर जिलें में स्थित है, यह उक्त विकल्पों में वृक्षारोपण विशिष्टता रखने वाला भारत का नगर है।

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राष्ट्रीय वन नीति (1952)

  • राष्ट्रीय वन नीति (1952) के अनुसार, वनों को निम्न रुप से वर्गीकृत किया गया है –

  1. संरक्षित वन

  2. राष्ट्रीय वन

  3. ग्राम वन

  4. वृक्ष-भूमि (Tree Lands)

  • राष्ट्रीय उद्यान वन का संवर्ग नहीं है।

  • राष्ट्रीय वन नीति (National Forest Policy) के अनुसार, देश के कुल क्षेत्रफल के कम-से-कम एक तिहाई (One Third) अर्थात 33 प्रतिशत भाग पर वन होते होने आवश्यक हैं ताकि पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखा जा सके। पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र में यह निर्धारण दो-तिहाई (Two-Third) है ताकि अपरदन और भू-स्खलन को रोका जा सके।

  • सामाजिक वानिकी को प्रोत्सहान देना तथा देश की कुल भूमि का एक-तिहाई वनाच्छादित करना राष्ट्रीय वन नीति का मुख्य उद्देश्य है।

  • राष्ट्रीय वन नीति, 1988 में सम्मिलित हैं

  1. वनीकरण एवं व्यर्थभूमि विकास

  2. पुनर्वनीकरण और विद्यमान वनों में पुनः पौधरोपण

  3. लकड़ी के अन्य विकल्पों को प्रोत्साहन और अन्य प्रकार के ईंधन की पूर्ति।

जबकि पीड़कनाशकों और कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग का संवर्धन इसमें शामिल नहीं है।

IUCN व विभिन्न संकटापन्न जातियां

  • ध्यातव्य है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ, प्राकृतिक संसाधनों के लिए समर्पित एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। संगठन का घोषित लक्ष्य, विश्व की सबसे विकट पर्यावरण और विकास संबंधी चुनौतियों के लिए व्यावहारिक समाधान खोजने में सहायता करना है। IUCN की स्थापना वर्ष 1948 में की गई थी तथा इसका मुख्यालय जेनेवा, स्विट्जरलैंड में है। IUCN द्वारा जारी की जाने वाली लाल सूची से संगटग्रस्त पौधों और पशु प्रजातियों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

  • आईयूसीएन (International Union for Conservation of Nature) द्वारा भारत में पाए जाने वाले मगरमच्छों की प्राजातियों को संकटग्रस्त जातियों की सूची में शामिल किया गया तथा हाथी भी संकटापन्न जातियों की श्रेणी में है।

  • घड़ियाल (Gavialis) मगरमच्छ कुल (Crocodilia) की एक प्रजाति है, जो गंगा नदी में पाए जाते हैं। ये बांग्लादेश, भारत तथा नेपाल में अधिकांश मात्रा में पाए जाते हैं।

  • घड़ियाल को प्राकृतिक आवास में चंबल नदी में देखना सबसे सही है। घड़ियाल का वैज्ञानिक नाम गैविएलिस गैंगेटिकस (Gavialis Gangeticus) है। घड़ियालों की ज्यादातर संख्या भारत में चंबल नदी एवं गिरवा नदी में पाई जाती है। आईयूसीएन (IUCN) ने घड़ियाल को अति संकटग्रस्त (Critically Endangered) की श्रेणी मे रखा है।

  • घड़िया, लेदरबैक टर्टल एवं अनूप मृग (बाहरसिंहा) तीनों ही संकटापन्न की श्रेणी में आते हैं।

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  • खाराई ऊंट कच्छ (गुजरात) में पाए जाते हैं। यह समुद्र जल में तीन किमी. तक तैरने में सक्षम हैं। ये मैंग्रोव (Mangroves) की चराई पर जीते हैं। उन ऊंटों को संकटाग्रस्त प्रजाति (Endangered Species) घोषित किया गया है। हाल ही में करनाल, (हरियाणा) में स्थित नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज (National Bureau of Animal Genetic Resources) ने खाराई ऊंट को भारत में पाई जाने वाली ऊंट की नौंवी प्रजाति के रुप में मान्यता दी है। ध्यातव्य है कि मालधारी समुदाय की आजीविका इन्हीं ऊंटों पर निर्भर करती है।

  • व्हेल शार्क भारत की ही नहीं पूरे विश्व की सबसे बड़ी मछली है। यह 50 फीट तक लंबी हो सकती है। व्हेल शार्क ऑस्ट्रेलिया एवं अफ्रीका के तट पर प्रवास करती है किंतु प्रत्येक वर्ष मार्च से मई माह के दौरान बड़ी संख्या में व्हेल शार्क भारत के गुजरात तट पर आती है। यह समय व्हेल शार्क की गर्भावधि है। गुजरात तट पर आने वाली इन व्हेल शार्कों की सुरक्षा हेतु वर्ष 2004 में एक कार्यक्रम प्रारंभ किया गया था।

  • स्पाइडर वानर उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों में पाए जाते हैं। यह मुख्यतः मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका के सदाबहार वनों में पाए जाते हैं।

  • उल्लेखनीय है कि विभिन्न वन्य जंतुओं की संख्या के आकलन के लिए पगमार्क तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक में पशुओं के पद चिन्हों की सहायता से उनकी पहचान की जाती है।

  • विभिन्न वन्य प्राणी एवं उनके वैज्ञानिक नाम इस प्रकार हैं –

वन्य प्राणी            वैज्ञानिक नाम

एशियाई जंगली गधा    इक्कस हेमीओनस

बारहसिंहा             रुसर्वस दुआउसेली

चिंकारा               गजेला बेनेट्टी

नील गाय            बोसलाफस ट्रेगोकेमेलस

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वन संपदा संरक्षण से संबंधित भारतीय प्रयास

  • भारत का भू-क्षेत्रफल संचार के कुल भू-क्षेत्र का केवल 2.4 प्रतिशत ही है। ध्यातव्य है कि भारत में विश्व की कुल ज्ञात जैव विविधता का लगभग 8 प्रतिशत प्राप्त होता है। जे.आर.बी. अल्फ्रेड (R.B. Alfred) की पुस्तक फॉनल डाइवर्सिटी इन इंडिया (Faunal Diversity in India) के अनुसार, विश्व के कुल जंतु प्रजातियों (Animal Species) की संख्या का 7.28 प्रतिशत भाग भारत में पाया जाता है।

  • भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 9 सितंबर, 1972 को लागू किया गया। वन्य जीवों की तस्करी, अवैध शिकार से रक्षा एवं संरक्षण के लिए भारत सरकार द्वारा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में पारित किया गया था। इस अधिनियम में कुल 66 धाराएं हैं जिन्हें अध्याय और छः अनुसूचियों मे विभाजित किया गया है।

  • भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में वन्यजीवों के आवास रक्षण के अनेक प्रावधान थे। इसके अंतर्गत रक्षित वन्यजीव की सूचीं भी दी गई है। उल्लेखनीय है कि बाघ को भी अनुसूची (I) में ही रखा गया। अतः यदि कछुए की एक प्रजाति को अनुसूची (I) के अंतर्गत संरक्षित घोषित किया जाएगा, तो उसे भी संरक्षण का वही स्तर प्राप्त होगा जैसा कि बाघ को प्राप्त है।

  • वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम, 1972 के अनुसार, किसी व्यक्ति द्वारा विधि द्वारा किए गए कतिपय उपबंधों के अधीन होने के सिवाय घड़ियाल, भारतीय जंगली गधा एवं भैंस तीनों का शिकार नहीं किया जा सकता है।

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  • भारत में वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 को संसद द्वारा 27 दिसंबर, 1980 को अधिनियम किया गया, यद्यपि इसके लागू होने की तिथि 25 अक्टूबर, 1980 है।

  • राष्ट्रीय पादप आनुवंशिकी संसाधन ब्यूरो (NBPGR) की स्थापना वर्ष 1977 में नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर पौधों के आनुवंशिकी संसाधनों के प्रबंधन के लिए एक नोडल एजेंसी के रुप में की गई थी। इसके 10 क्षेत्रीय कार्यालय विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में स्थित है, जो निम्न हैं –

  1. शिमला

  2. जोधपुर

  3. त्रिसूर

  4. अकोला

  5. शिलांग

  6. भोवाली

  7. कटक

  8. हैदराबाद

  9. रांची

  10. श्रीनगर

  • भारतीय पशु कल्याण बोर्ड देश में पशुओं के कल्याण को बढ़ावा देने तथा पशु कल्याण कानूनों पर एक सांविधिक सलाहकारी निकाय (Statutory Advisory Body) है। इसकी स्थापना पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cuuelty to Animals Act, 1960) के अनुच्छेद 4 के तहत की गई थी। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत एक सांविधिक निकाय है। केन्द्र सरकार ने एक अधिसूचना के द्वारा 20 फरवरी, 2009 को राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की स्थापना की थी। भारत के प्रधानमंत्री इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं।

  • वन अनुसंधान संस्थान की स्थापना उत्तराखंड के देहरादून जिल में वर्ष 1906 में की गई थी। यह इस प्रकार का सबसे पुराना संस्थान है। वर्ष 1991 में इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा डीम्ड विश्वविद्यालय घोषित किया गया है।

  • भारतीय वन्य जीव संस्थान, देहरादून (उत्तराखण्ड) में स्थित है।

  • वन्य जीवों के क्षेत्र में किए गए विशिष्ट कार्यों के लिए शैक्षिक एवं शोध संस्थाओं, वन एवं वन्य जीव अधिकारियों तथा वन्य जीव संरक्षकों आदि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा राजीव गांधी वन्य जीव संरक्षण पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।

  • ध्याव्य है कि वर्ष 1974 में वन विभाग ने जोशीमठ के रैणी गांव के लगभग 680 हेक्टेयर जंगल को नीलाम कर दिया था। तब गौरा देवी के नेतृत्व में सैकड़ों की तादाद में महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर वन कटाई के विरोध स्वरुप चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई। इस आंदोलन के सह-कार्यकर्ता सुंदरलाल बहुगुणा ने भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1982 में चंडीप्रसाद भठ्ठ को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया।

  • चिपको आंदोलन मूल रुप से वन कटाई के विरुध्द था। चंडी प्रसाद भठ्ठ एवं सुंदरलाल बहुगुणा इस आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे।

  • 1970 के दशक में देश भर में वनों के विनाश के विरुध्द हुए संगठित प्रतिरोध को चिपको आंदोलन का नाम दिया था। सुंदरलाल बहुगुणा इस आंदोलन से जुड़े रहे और उन्हें इसका नेता माना जाता है।

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  • अमृता देवी विश्नोई स्मृति पुरस्कार वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण में अभूतपूर्व योगदान के लिए राजस्थान के वन विभाग द्वारा प्रदान किया जाता है।

  • गौंड और कोर्कू जनजाति पारिस्थितिक रुप से महत्वपूर्ण, महीने भर चलने वाले अभियान/त्यौहार (हरि-जिरोती) के दौरान फलदार वृक्षों के पौध का रोपण करते हैं।

  • नेपाल एवं भारत में वन-जी वन संरक्षण प्रयासों के रुप में सेव (SAVE) नामक एक नया संगठन प्रारंभ किया गया है जिसके निर्माण का मुख्य उद्देश्य टाइगर का संरक्षण करना है। तिब्बती बौध्दों द्वारा टाइगर के खाल का प्रयोग आसन लगाने एवं सौंदर्यीकरण के लिए किया जाता है जिसके कारण टाइगर के शिकार में वृध्दि को ध्यान में रखते हुए भारत एवं नेपाल ने जुलाई, 2010 में सेव (SAVE) नाम संगठन की स्थापना की जो इनके संरक्षण एवं इनकी संख्या वृध्दि के लिए कार्य करेगा।

  • अपना वन अपना धन योजना हिमाचल प्रदेश राज्य द्वारा प्रारंभ की गई है। इसका उद्देश्य राज्य में वनरोपण की क्रियाविधि को बढ़ावा देना है। झारखंड राज्य में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने हेतु राज्य में मुख्यमंत्री जन वन योजना को लागू किया गया। इसे 15 नवंबर, 2015 को प्रारंभ किया गया था। इस योजना के निम्नलिखित उद्देश्य हैं –

  • प्रदेश के हरित क्षेत्र में वृध्दि कर पर्यावरण संतुलन कायम रखना।

  • वृक्षारोपण के माध्यम से भू-जल संरक्षण करना।

  • निजी क्षेत्र में वनोपज उत्पादन को बढ़ावा देकर अधिसूचित वनों पर दबाव कम करना।

  • किसानों की भूमि पर वृक्षारोपण कर उनकी आय बढ़ाना।

  • राज्य में जन सहयोग से वनाच्छादन को बढ़ाना।

  • भारतीय सर्वेक्षण विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन राष्ट्रीय सर्वेक्षण और मानचित्रण के लिए भारत सरकार का एक प्राचीनतम विभाग है। इसकी स्थापना 1767 ई. में की गई थी। इसका संबंध पर्यावरण से नही है।

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वन संरक्षण से संबंधित वैश्विक प्रयास

  • CIA की वर्ल्ड फैक्टबुक, 2017 के अनुसार, विकल्प में दिए गए देशों एवं उनके भौगोलिक क्षेत्र में वनावरण की स्थिति निम्नानुसार है –

देश

वनावरण (%में)

जापान

68.5

इंडोनेशिया

51.7

भारत

23.1

चीन

22.3

  • CIA की वर्ल्ड फैक्टबुक, 2017 के अनुसार, विश्व के विभिन्न देशों में वनाच्छादित प्रतिशतता निम्नानुसार है –

देश

वनाच्छादित (% में)

सूरीनाम

94.6

माइक्रोनेशिया

74.5

सेशेल्स

88.5

तुवालू

87.6

गैबन

81

सोलोमन द्वीपसमूह

78.9

मोजाम्बिक

43.7

स्वीडन

68.7

गिनी-बिसाऊ

55.2

बेलिजे

60.6

लाओस

67.9

गुयाना

77.4

फिनलैंड

72.9

जापान

68.5

इंडोनेशिया

51.7

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  • भूटान सरकार ने अपने देश में कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के कम-से-कम 60 प्रतिशत भाग पर वन बनाए रखने के लिए संवैधानिक प्रावधान किया है।

  • वर्तमान में भूटान का लगभग 85.5% भू-भाग वनों से आच्छादित है।

  • मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (United Nations Convention to Combat Desertification) की स्थापना वर्ष 1994 मे की गई थी। यह अकेला कानूनन बाध्यकारी समझौता है, जो पर्यावरण एवं विकास तथा टिकाऊ भूमि प्रबंधन को संयुक्त रुप से पेश करता है। इसका उद्देश्य नवप्रवर्तनकारी राष्ट्रीय कार्यक्रमों एवं समर्थक अंतरराष्ट्रीय भागीदारियों के माध्यम से प्रभावकारी कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है। UNCCD मरुस्थलीकरण को रोकने में स्थानीय लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु ऊर्ध्वगामी उपागम (बॉटन-अप अप्रोच) के लिए प्रतिबध्द है। इसका सचिवालय संबंधित क्षेत्रों में को वित्तीय संसाधनों के बड़े हिस्से का नियतन सुलभ करता है।

  • वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (W.F.) ने वर्ष 1961 में अपनी स्थापना से ही संगठन के प्रतीक चिन्ह के रुप में जाइन्ट पांडा (Giant  Panda) को अपनाया है। इसका वैज्ञानिका Ailuropoda melanoleuca  है। इसका निवास स्थान मुख्यतः शीतोष्ण चौड़ी पत्ती वाले और मिश्रित वनों में मिलता है। वर्तमान में विश्व भर में इनकी संख्या लगभग 1600 है।

  • उल्लेखनीय है कि विश्व वन्य जीव दिवस विश्व के अलग-अलग देशों मे अलग-अलग तिथियों पर आयोजित किया जाता है। यथा – अमेरिका में यह 4 सितंबर को मनाया जाता है। भारत में वन्य जीव सप्ताह 2 से 8 अक्टूबर के मध्य मनाया जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को, जबकि विश्व वानिकी दिवस 21 मार्च को मनाया जाता है।

  • मार्च, 2013 के प्रारंभ में बैंकॉक (थाईलैंड) में आयोजित CITES (Convention of International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) के पक्षकारों की 16वीं बैठक (CoP 16) में 3 मार्च को विश्व वन्य जीव दिवस के रुप में नामित करने का प्रस्ताव रखा गया था।

  • 20 दिसंबर, 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 68वें वार्षिक सत्र के दौरान 3 मार्च को प्रतिवर्ष विश्व वन्य जीव दिवस (World Wildlife Day) के रुप में मनाने का निर्णय लिया गया।

  • ध्यातव्य है कि 21 से 24 नवंबर, 2010 के मध्य विश्व का प्रथम बाघ शिखर सम्मेलन (Tiger Summit) सेंट पीटर्सबर्ग (रुस) में आयोजित किया गया था।

  • विश्व वन्य जीव कोष की स्थापना अप्रैल, 1961 हुई थी. जुलाई, 2000 में ओड़िशा के नंदनकानन अभ्यारण्य में 13 शेरों की ट्राइपनोसोमिएसिस रोग के कारण मृत्यु हो गई थी। भारत का सबसे बड़ा जीवनशाला कोलकाता में अवस्थित है।यूकेलिप्टस वृक्ष को पारिस्थितिक मित्र नहीं बल्कि पारिस्थितिक आतंकवादी कहा जाता है।

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अभयारण्य / जैवमंडल रिजर्व

राष्ट्रीय उद्यान

  • जैव विविधता के संरक्षण हेतु विविध प्रकार की विधियां अपनाई जाती हैं। इसमें संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना करना एक महत्वपूर्ण विधि है। संरक्षित क्षेत्रों में राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभयारण्य, संरक्षण रिजर्व एवं सामुदायिक रिजर्व शामिल हैं।

  • देश में वन्य जीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु उद्यानों एवं वन्य जीव अभयारण्यों की स्थापना की गई है। भारत में अब तक (जनवरी, 2018) 769 संरक्षित क्षेत्रों का नेटवर्क स्थापित किया गया है, जो 162072.49 वर्ग किमी. (देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 4.93%) क्षेत्र पर विस्तारित है। इनमें 103 राष्ट्रीय, 544 वन्य जीव अभयारण्य, 76 संरक्षण रिजर्व एवं 46 सामुदायिक रिजर्व शामिल हैं। भारत के अधिकांश वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र घने जंगलों से घिरे इन संरक्षित क्षेत्रों से कई लाभ प्राप्त होते हैं।

संरक्षित क्षेत्रों के लाभ

  • प्राकृतिक एवं संबध्द सांस्कृतिक स्त्रोतों की सुरक्षा

  • सभी मूल निवासी जातियों व उपजातियों की समष्टियों को संभालना

  • समुदायों एवं आवासों की संख्या एवं वितरण को संभालना

  • पर्यावरण परिवर्तन की दशा में जातियों के स्थानांतरण को सुगम बनाना

  • मानव द्वारा विदेशी जातियों की पुनःस्थापना पर प्रतिबंध

  • वर्तमान जातियों की आनुवंशिकी विविधता का रक्षण

  • उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय उद्यान की सीमा रेखा विधान से परिभाषित होती है। जीव आरक्षित क्षेत्रों की स्थापना जैव विविधता और पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा सूक्ष्म जीवों को समग्र रुप में सुरक्षित करने के लिए की जाती है। जीव आरक्षित क्षेत्र वैज्ञानिक अध्ययन के लिए मानव हस्तक्षेप विहीन प्राकृतिक क्षेत्र है। अभ्यारण्य में अनुमति के बिना शिकार करना मना है लेकिन चराई और गो पशुओं का आना-जाना नियमित होता है। राष्ट्रीय उद्यान में शिकार और चराई पूर्णतया वर्जित होते हैं। अभ्यारण्यों में मानवीय क्रिया-कलापों की अनुमति होती है लेकिन राष्ट्रीय उद्यान में मानवीय हस्तक्षेप पूर्णतया वर्जित होता है।

  • उल्लेखनीय है कि वर्तमान में भारत में कुल 103 राष्ट्रीय पार्क है। सर्वाधिक राष्ट्रीय पार्कों की संख्या अंडमान निकोबार एवं मध्य प्रदेश में 9-9 है। इसके बाद केरल, महाराष्ट्र, उत्तराखंड एवं पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय पार्कों की संख्या 6-6 है।

  • उल्लेखनीय है कि जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान भारत में स्थापित पहला राष्ट्रीय उद्यान है। इसकी स्थापना वर्ष 1936 में, हैली नेशनल पार्क के रुप में हुई थी। यह उत्तराखंड के नैनीताल जिल में स्थित है। यहां पर वर्ष 1973 में सर्वप्रथम प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की गई थी।

  • उत्तराखंड में स्थित जिम कार्बेट तथा राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में वन्य जीव प्रबंधन हेतु पैमाने वाले हवाई छाया चित्र उपयुक्त हैं।

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  • केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Keoladeo National Park) को वर्ष 1982 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा प्रदान किया गया। यह राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित है। यूनेस्कों ने वर्ष 1985 में इसे अपनी विश्व प्राकृतिक धरोहर सूची में सम्मिलित किया।

  • केवला घाना राष्ट्रीय उद्यान जिसे पूर्व में भरतपुर पक्षी अभ्यारण्य के नाम से जाना जाता था, भरतपुर (राजस्थान) में स्थित है। यहां 366 पक्षियों की प्रजातियां, 379 फूलों की प्रजातियां तथा मछलियां, सांपो, छिपकलियों, उभयचरों आदि की विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं, परंतु शेर यहां की संरक्षित प्रजाति नही है।

  • रामगंगा एवं कोसी नदियां कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान से होकर प्रवाहित होती हैं। ब्रह्मपुत्र, दिफ्लु, मोरा दिफ्लु एवं मोरा धनसिरि नदियां काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से होकर प्रवाहित होती हैं। कुंतीपुजहा नदी साइलैंट वैली राष्ट्रीय उद्यान से होकर गुजरती है।

  • गैंडे को पुनर्वासित करने का कार्य दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में चल रहा है। यह उद्यान उ.प्र. के लखीमपुर खीरी जनपद में स्थित है। वर्ष 1984 में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में प्रथम गैंडा पुनर्वास योजना शुरु की गई थी। वर्तमान में यहां द्वीतीय गैडा वुनर्वास योजना का कार्यान्वयन किया जा रहा है।

  • बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में स्थित है।

  • पिन वैली राष्ट्रीय उद्यान हिमाचल प्रदेश के लाहौल एवं स्पीति जिले में स्थित है।

  • सरिस्का एवं रणथम्भौर दोनों ही राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान हैं जहां बाघों को संरक्षण मिलता है। सरिस्का टाइगर रिजर्व राजस्थान के अलवर जिले में अवस्थित है। इसे वर्ष 1955 में वन्य जीव अभ्यारण्य जबकि वर्ष 1978 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था।

  • सलीम अली राष्ट्रीय उद्यान (Salim Ali National Park) जम्मू एवं कश्मीर में स्थित है। जम्मू एवं कश्मीर में स्थित सिटी फॉरेस्ट राष्ट्रीय उद्यान का नाम परिवर्तित कर यह नाम रखा गया है।

  • इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान – छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में दंतेवाड़ा जिले में स्थित है। लगभग 2799.08 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत इस राष्ट्रीय उद्यान को वर्ष 1981 में राष्ट्रीय उद्यान का और वर्ष 1983 में टाइगर रिजर्व का दर्जा प्रदान किया गया।

  • बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान – मध्य प्रदेश के शहडोल मंडल के उमरिया जिले में स्थित है। इसे वर्ष 1968 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया है। यह मुख्य रुप से सफेद बाघों (White Tigers) के लिए प्रसिध्द है।

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  • दांडेली अभ्यारण्य – कर्नाटक में स्थित वन्य जीव अभ्यारण्य है। यह कुल 834.16 वर्ग किमी. में फैला है।

  • राजाजी राष्ट्रीय उद्यान – उत्तराखंड के तीन जिलों देहरादून, हरिद्वार और पौड़ी गढ़वाल में अवस्थित है। इसका नामकरण स्वतंत्र भारत के प्रथम भारतीय और अंतिम गवर्नर  जनरल सी. राजगोपालचारी, जिन्हें राजाजी के नाम से जाना जाता है, के नाम पर किया गया है। यहा राष्ट्रीय उद्यान तीन सैंक्चुअरियों –

  1. राजाजी सैंक्चुअरी (1948 में स्थापित)

  2. मोतीचूर सैंक्चुअरी (1964 में स्थापित)

  3. चिला सैंक्चुअरी (1977 में स्थापित) को मिलाकर वर्ष 1983 में बनाया गया था वर्ष 2015 में इसे टाइगर रिजर्व के रुप में अधिसूचित किया गया।

  • महान हिमालयी राष्ट्रीय उद्यान हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में, तथा वन बिहार राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल जिले में विस्तारित है।

  • मन्नार की खाड़ी सागरीय राष्ट्रीय उद्यान है। यह तमिलनाडु में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1986 में हुई थी। नोक्रेक गारों पहाड़ियों की सबसे ऊंची चोटी है। यहां नोक्रेक जीवमंडल रिजर्व स्थापित है।

  • लोकटक झील भारत में ताजे पानी (मीठा पानी) की सबसे बड़ी झील है, जो मणिपुर में स्थित है। नामदफा राष्ट्रीय उद्यान अरुणाचल प्रदेश में स्थित है। यह पूर्वी हिमालय जैव विविधता हॉटस्पॉट में सबसे बड़ा संरक्षित क्षेत्र है।

  • बुक्सा बाघ परियोजना दार्जिलिंग के पास पश्चिम बंगाल में स्थित है। वर्ष 1992 में इसे राष्ट्रीय पार्क का दर्जा दिया गया।

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  • कर्नाटक स्थित नागरहोल राष्ट्रीय पार्क (Nagarhole National Park) मैसूर से 94 किमी. की दूरी पर स्थित है। कोडागू (Kodagu) और मैसूर जिले तक फैला यह राष्ट्रीय पार्क राजीव गांधी नेशनल पार्क के नाम से भी जाना जाता है।

  • बेतला राष्ट्रीय पार्क की स्थापना तत्कालीन बिहार (वर्तमान झारखंड) के पलामू जिले में वर्ष 1986 में हुई थी। यह प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत है।

  • गिर राष्ट्रीय उद्यान गुजरात के जूनागढ़ में स्थित है। यह एशियाटिक शेर के निवास स्थल के लिए प्रसिद्द है। इसके अतिरिक्त महातेंदुआ, सांभर तथा चीतल आदि वन्य जीव भी यहां पाए जाते हैं।

  • भितरकनिका (ओड़िशा) लवण जल मगर तथा मरुस्थल राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान) में महान भारतीय सारंग आकर्षण का केन्द्र है।

  • हुलुक गिबन पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में विशेषतः असम में पाए जाते हैं।

  • यलोस्टोन नेशनल पार्क (Yellow Stone National Park) सं. रा. अमेरिका का प्रथम राष्ट्रीय पार्क (First National Park) है। इसकी स्थापना 1872 ई. में की गई थी। यह पार्क सं. राज. अमेरिका के व्योमिंग, मोंटाना और इडाहो राज्यों में फैला है। ओल्ड फेथफुल गीजर इसी नेशनल पार्क में स्थित है। इसके अतिरिक्त ग्रैंड कैनियन भी यहीं स्थित है।

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राष्ट्रीय उद्यान सूची

  • भारत में समय-समय पर राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना की गई है।

  • भारत में स्थापित होने वाला सर्वप्रथम राष्ट्रीय उद्यान जिम कार्बेट नेशनल पार्क है।

  • सिमिलीपाल राष्ट्रीय उद्यान ओड़िशा राज्य के भुवनेश्वर से 320 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल 2750 वर्ग किमी. है। कुछ राष्ट्रीय उद्यानों एवं उनके स्थापना/घोषणा के वर्ष निम्न हैं –

राष्ट्रीय उद्यान

स्थापना/घोषणा का वर्ष

कॉर्बेट (उत्तराखंड)

1936

कान्हा (मध्य प्रदेश)

1955

दुधवा (उत्तर प्रदेश)

1977

राजाजी (उत्तराखंड)

1983

नमदफा

1983

गुइनडी

1976

काजीरंगा

1974

साइलेंट वैली

1980

 

  • नीलगिरि की मेघ बकरियां इरावीकुलम राष्ट्रीय पार्क में पाई जाती हैं। यह दुर्लभ पर्वतीय बकरियां हैं जिन्हें नीलगिरि तहर भी कहा जाता है।

  • कुछ प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों का उनके राज्यों के साथ सही सुमेलन इस प्रकार हैं –

राष्ट्रीय उद्यान

राज्य

गिर वन राष्ट्रीय उद्यान

गुजरात

भरतपुर पक्षी बिहार

राजस्थान

बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान

मध्य प्रदेश

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

असम

कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान

उत्तराखंड

बांदीपुर राष्ट्रीय उद्यान

मध्य प्रदेश

राजाजी राष्ट्रीय उद्यान

उत्तराखंड

सिमिलीपाल राष्ट्रीय उद्यान

ओड़िशा

मानस राष्ट्रीय उद्यान

असम

अंशी राष्ट्रीय उद्यान

कर्नाटक

बेटला राष्ट्रीय उद्यान

झारखंड

इन्द्रावती राष्ट्री उद्यान

छत्तीसगढ़

गूगामल राष्ट्रीय उद्यान

महाराष्ट्र

इन्तानकी राष्ट्रीय उद्यान

नलालैड

सिरोही राष्ट्रीय उद्यान

मणिपुर

गुईंदी राष्ट्रीय उद्यान

तमिलनाडु

दाचीगाम

जम्मू एवं कश्मीर

पापीकोंडा

आध्र प्रदेश/तेलंगाना

सरिस्का

राजस्थान

बांदीपुर

कर्नाटक

राष्ट्रीय  उद्यान

अवस्थिति

काजीरंगा

गोलाघाट नवगांव

कुद्रेमुख

चिकमगलूर

साइलैंट वैली (शांत घाटी)

पालघाट

पेंच घाटी

नागपुर

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान

मंडला (मध्य प्रदेश)

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  • अभ्यारण्यों/राष्ट्रीय उद्यानों तथा उनसे संबंधित मुख्य संरक्षित वन्य पशुओं का सुमेलन निम्नानुसार है –

अभ्यारण्य/राष्ट्रीय उद्यान

मुख्य संरक्षित वन्य पशु

काजीरंगा

गैंडा

गिर

शेर

सुंदरबन

बाघ

पेरियार

हाथी

राष्ट्रीय पार्क

वन्य जीव

बांदीपुर

बाघ अभ्यारण्य

काजीरंगा

एकल श्रृंग गैडा अभ्यारण्य

सुंदरबन

जैवमंडल एवं बाघ अभ्यारण्य

सिमिलीपाल

हाथी  अभ्यारण्य

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  • पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में मुख्य संरक्षित वन्य पशु बाघ एवं हाथी हैं।

  • मणिपुर में स्थित केइबुल लाम्जाओं नेशनल पार्क विश्व का एकमात्र प्लवमान (Floating) पार्क है। यह पार्क प्लवमान अपघटित पौधों से युक्त है जिनका स्थानिक नाम फुमडिस (Fhumdis) है।

  • ध्यातव्य है कि महान ग्रेट हिमालय राष्ट्रीय पार्क (GHNP) हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित है। वर्ष 1984 में बनाए गए इस पार्क को वर्ष 1999 में राष्ट्रीय पार्क घोषित किया गया था। यह पार्क अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिध्द है। हिमालय के भूरे भालू वाले इस पार्क में समशीतोष्ण एवं एल्पाइन वन पाए जाते हैं। इस पार्क में 30 से अधिक स्तनधारियों एवं 200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती है। 23 जून, 2014 को यूनेस्को ने दोहा में आयोजित 38वें सत्र मे इसे प्राकृतिक विश्व धरोहर का दर्जा दिया।

  • सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान (पूर्व नाम – सुल्तानपुर पक्षी अभ्यारण्य) हरियाणा के गुड़गांव जिले में स्थित है।

  • ध्यातव्य है कि भूटान के 12922 वर्ग किमी. क्षेत्रों पर राष्ट्रीय पार्क का विस्तार है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र (38394 वर्ग किमी.) का लगभग 33.66 प्रतिशत हिस्सा है।

  • दिल्ली चिड़ियाघर को वर्ष 1982 मे राष्ट्रीय प्राणि उद्यान का दर्जा प्रदान किया गया। विकीपीडिया ने दिल्ली के दर्शनीय स्थल शीर्षक से प्रकाशित आलेख में इसी उद्यान को राष्ट्रीय जैविक उद्यान लिखा है। इस उद्यान की आधिकारिक वेबसाइट पर इसका हिंदी नाम राष्ट्रीय प्राणि उद्यान एवं अंग्रेजी नाम National Zoological Park है।

  • राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में साइबेरियन सारस सर्दियों में प्रवास करते हैं।

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जैवमंडल रिजर्व

  • बायोस्फीयर रिजर्व शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम एडवर्ड सुएस ने किया था प्रारंभ में जैव विविधता शब्द को अंग्रेजी शब्द Biological Diversity के रुप में प्रथमतः रेमंड एफ. दासमैन (Raymaond F. Dassmann) ने वर्ष 1968 में अपनी पुस्तक A Different King of Country में दिया था। बाद में जैव विविधता को अंग्रेजी शब्द Bilogical Diversity से परिवर्तित कर Biodiversity के रुप में सर्वप्रथम डब्ल्यू. जी. रोसेन (G. Rosen) ने प्रयोग किया था।

  • जीवमंडल आरक्षित परिरक्षण क्षेत्र आनुवांशिक विभिन्नता से संबंधित होते हैं। इनमें जीवों की आनुवांशिकता को बनाए रखने के लिए उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाता है।

  • भारत सरकरा ने अब तक 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए हैं जिनमें निम्न 10 को यूनेस्कों ने जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों के विश्व संजाल में सम्मिलित किया है –

  1. नीलगिरि

  2. नंदा देवी

  3. सुंदरबन

  4. मन्नार की खाड़ी

  5. नोकरेक

  6. पंचमढ़ी

  7. सिमिलीपाल

  8. अचानकमार-अमरकंटक

  9. ग्रेट निकोबार

  10. अगस्त्यमलाई

  • नंदा देवी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यूनेस्को के MAB कार्यक्रम के तहत जैवमंडलों के विश्व नेटवर्क मे शामिल है। नंदा देवी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र को यूनेस्को द्वारा वर्ष 1988 में विश्व धरोहर सूची (World Heritage List) में शामिल किया गया था तथा वर्ष 2005 में इस सूची के तहत इसे फूलों की घाटी तक विस्तारित किया गया।

  • ध्यातव्य है कि भारत के जैवमंडल रिजर्व की सूची में कोल्ड डेजर्ट (शीत रेगिस्तान) को वर्ष 2009 में जोड़ा गया है। वर्ष 2016 में अगस्त्यमलाई को MAB कार्यक्रम के तहत यूनेस्कों की सूची में जोड़ा गया है।

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प्रमुख जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र

  • जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र पारितंत्रों, जातियों एवं आनुवांशिक स्त्रोतों के संरक्षण का प्रमुख केन्द्र है। भारत के प्रमुख जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों से संबंधित अन्य तथ्य निम्नानुसार हैं –

  • हिमाचल प्रदेश में स्थित शीत मरुस्थल (Cold Desert) को 28 अगस्त, 2009 को भारत का 16वां जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया।

  • 20 सितंबर, 2010 को पूर्वी घाट की सेशाचलम पहाड़ियों (आंध्र प्रदेश राज्य में स्थित) को 17वां तथा 25 अगस्त, 2011 को पन्ना (मध्य प्रदेश) को देश का 18वां जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। जैवमंडल आरक्षित  क्षेत्रों की स्थापना जैव विविधता के संरक्षण व सतत विकास में सहायक होती है। जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र पर्यावरण में अपनी भूमिका निम्न प्रकार निभाता है –

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जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के प्रमुख कार्य

संरक्षण

  • पारितंत्रों, जातियों एवं आनुवांशिक स्त्रोतो का संरक्षण

  • संसाधनों के पारंपरिक उपयोग को प्रोत्साहन

निकास

  • सामाजिक, सांस्कृतिक व पारिस्थितिकीय दृष्टि से निर्वहनीय आर्थिक विकास का उन्नयन

शोध एवं मॉनीटरिंग

  • राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से संबंधित सूचनाओं का आदान-प्रदनान

  • वैज्ञानिक शोध

  • बोधन शिक्षा

  • कच्छ की खाड़ी जैवमंडल आरक्षित स्थानों मे शामिल नही थी परंतु जनवरी, 2008 में इसे जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का दर्जा दिया गया।

  • भारत में अब तक 18 जैवमंडल आरक्षित स्थानों को सूचीबध्द किया जा चुका है। ये इस प्रकार हैं –

क्र.

जैवमंडल रिजर्व

क्षेत्रफल (वर्ग किमी. में)

स्थापना वर्ष

1.    

अचानकमार-अमरकंटक

3835.51

2005

2.    

अगस्त्यमलाई

3500.36

2001

3.    

दिहांग-दिबांग

5111.50

1998

4.    

डिब्रू-सैखोवा

765

1997

5.    

ग्रेट निकोबार

885

1989

6.    

मन्नार की खाड़ी

10500

1989

7.    

कंचनजंगा

2619.92

2000

8.    

मानस

2837

1989

9.    

नंदा  देवी

5860.69

1988

10.                      

नीलगिरि

5520

1986

11.                      

नोकरेक

820

1988

12.                      

पंचमढ़ी

4981.72

1999

13.                     स

सिमिलीपाल

4374

1994

14.                      

सुंदरबन

9630

1989

15.                      

कच्छ

12454

2008

16.                      

शीत रेगिस्तान

7770

2009

17.                      

सेशाचलम पहाड़ियां

4755.997

2010

18.                      

पन्ना

2998.98

2011

         नोटः इन्हें यूनेस्को ने MAB कार्यक्रम के तहत जैवमंडल रिजर्व के विश्वतंत्र की सूची में शामिल किया है।

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  • यूनेस्को का मैन एंड द बायोस्फीयर कार्यक्रम (MAB) एक अंतर-सरकारी वैज्ञानिक कार्यक्रम है जिसका उद्देस्य लोगों एवं उनकि पर्यावरण के मध्य संबंधों में सुधार हेतु एक वैज्ञानिक आधाक की स्थापना करना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1971 में हुई थी।

  • पहले यूनेस्को के मैन एंड बायोस्फीयर (MAB) कार्यक्रम के तहत जैव अभयारण्य के विश्वतंत्र की सूची में भारत से नीलगिरि, सुंदरबन, मन्नार की खाड़ी एवं नंदा देवी के जैव अभयारण्य ही शामिल थे। मई, 2009 में यूनेस्कों द्वारा 17 देशो के 22 नए जैव अभ्यारण्यों को इस सूची में शामिल करने की घोषणा की गई जिसमें भारत के सिमिलीपाल, पंचमढ़ी और नोकरेक के जैव अभ्यारण्य शामिल हैं। इसके पश्चात जुलाई, 2012 में यूनेस्कों द्वारा भारत के अचानकमार-अमरकंटक जैव अभ्यारण्य को भी इस सूची में शामिल किया किया गया है।

  • वर्ष 2013 में भारत के ग्रेट निकोबार जैव अभ्यारण्य को भी इस  सूची में शामिल किया गया है। मार्च, 2016 तक यूनेस्को, की इस सूची में 120 देशों के कुल 669 जैव अभ्यारण्य शामिल हैं। वर्ष 2016 में पश्चिमी घाट में स्थित  अगस्त्यलाई जैवमंडल आगार को इस सूची में शामिल किया गया है।

  • यूनेस्को द्वारा प्रमाणित (क्षेत्रफल की दृष्टि से) भारत की वृहत्तम जैवमंडलीय निधि मन्नार की खाड़ी (क्षेत्रफल 10500 किमी2) है जबकि भारत में यह क्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरा है। भारत में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा जैवमंडलीय निधि कच्छ का रण (गुजरात) है जिसका क्षेत्रफल 12454 किमी.2 है।

  • कुछ महत्वपूर्ण जैवमंडल रिजर्वों एवं उनकी अवस्थिति निम्नानुसार है –

जैवमंडल रिजर्व

अवस्थिति/राज्य

नोकरेक

मेघालय

मानस

असम

दिहांग-दिबांग

अरुणाचल प्रदेश

अगस्त्यमलाई

केरल

सिमिलीपाल

ओड़िशा

कंचनजंगा

सिक्किम

शीत मरुस्थल (कोल्ड डेजर्ट)

हिमाचल प्रदेश

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  • नोकरेक जैव भंडार गारों पहाड़ियों पर फैला हुआ है जबकि अगस्त्यमलाई पश्चिमी घाट पर, दिहांग-दिबांग अरुणाचल प्रदेश में अपर सियांग, पश्चिमी सियांग व देबांग घाटी में फैला हुआ है तथा नंदा देवी उत्तराखंड में हैं।

  • उल्लेखनीय है कि बुंदाला जैव रिजर्व (Bundala Biosphere Reserve) श्रीलंका के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है। यहां एक केन्द्रीय क्षेत्र (बुंदाला रिजर्व का) राष्ट्रीय पार्क भी है, जिसमें चार लवणीय जल लैगून सम्मिलित हैं। लैगून दलदल की पतली पट्टी द्वारा मिले हुए हैं और हल्के तरंगित मैदान (जो निम्न भूमि वाले शुष्क झाड़ीनुमा वनों से ढके हैं) चारों ओर से लैगूनों को घेरे हुए हैं।

  • केन्द्रीय क्षेत्र में प्रवासी एवं आवासीय पक्षी-प्रजातियां भी पाई जाती हैं। बुदाला का सबसे निकटवर्ती कस्बा हम्बनटोटा है।

राष्ट्रीय वन्य  जीव अभ्यारण्य

  • वन्य जीवों को संरक्षण प्रदान करने हेतु राष्ट्रीय वन जीव अभ्याऱण्य की स्थापना की जाती है।

  • कुछ प्रमुख अभ्यारण्य एवं उनसे संबंधित राज्य निम्नानुसार है –

अभ्यारण्य

राज्य

सिमिलीपाल

ओड़िशा

नोकरेक

मेघालय

दिहांग दिबांग

अरुणाचल प्रदेश

अगस्त्यमलाई

केरल-तमिलनाडु

 

गर्म पानी

असम

नामदफा

अरुणाचल प्रदेश

पाखल

आंध्र प्रदेश

सरिस्का

राजस्थान

महुआडार

झारखंड

दाचीगाम

जम्मू एवं कश्मीर

केवलादेव घाना

राजस्थान

पेरियार

केरल

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  • बोंडला वन्यजीव अभ्यारण्य – गोव (उत्तर- पूर्व गोवा में स्थित, 8 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत यह अभ्यारण्य विशेषतः स्कूली छात्रों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है)।

  • कांगेरघाट राष्ट्रीय पार्क – छत्तीसगढ़,

  • ओरंग अभ्यारण्य – असम इसे मिनी काजीरंगा के नाम से भी जाना जाता है।

  • ऊष्माकोठी वन्यजीव अभ्यारण्य – ओड़िशा (संभलपुर से 45 किमी. पूर्व में स्थित)

  • शुल्काफांटा वन्यजीव अभ्यारण्य – नेपाल के तराई में (दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र) कंचनपुर जिले में 305 वर्ग किमी. में  फैला हुआ है। यह क्षेत्र वर्ष 1969 तक शिकार क्षेत्र के रुप में प्रबंधित किया गया था लेकिन वर्ष 1976 में इसे वन्यजीव अभ्यारण्य के रुप में मान्यता दी गई।

  • एक सींग वाला गैंडा पश्चिम बंगाल एवं असम में पाया जाता है।

  • एक सींग वाले गैंडे या राइनों के लिए काजीरंगा अभ्यारण्य प्रसिध्द है।

  • गिर, रणथम्भौर एवं कार्बेट असम राज्य में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है। कुल 1173.58 वर्ग किमी. क्षेत्रफल पर फैले इस इस अभ्यारण्य में एक सींग वाले गैंडे एवं हाथियों का प्रमुख रुप से निवास मिलता है। यह  एक व्याघ्र अभ्यारण्य नही है। जबकि कान्हा  (म.प्र.), रणथम्भौर (राजस्थान) और  बांधवगढ़ (म.प्र.) प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल व्याघ्र अभ्यारण्य हैं।

  • असम का मानस वन्यजीव अभ्यारण्य विशेष रुप से बाघों तथा भारतीय गैंडो के लिए प्रसिध्द है। यह एक प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व, हाथी रिजर्व एवं बायोस्फीयर रिजर्व है तथा  यह यूनेस्को की प्राकृतिक विश्व विरासत स्थल सूची में भी शामिल (1985 से) है। जून, 2011 में इसे वर्ल्ड हेरिटेज इन डैंजर सूची से हटाया गया है (1992 से यह इस सूची में था)

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  • चन्द्रप्रभा वन्यजीव अभ्यारण्य उ.प्र. के चंदौली जिल में 78 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में विस्तारित है, जो वाराणसी से लगभग 70 किमी. की दूरी पर स्थित है।

  • करेरा वन्यजीव अभ्यारण्य – म.प्र. के शिवपुरी जिले में लगभग 202 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है तथा उ.प्र. के झांसी जिले से मात्र 44 किमी. की  दूरी पर स्थित है।

  • 160 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला जयसमंद वन्य जीव अभ्यारण्य राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित है और उदयपुर नगर मुख्यालय से 48 किमी. की दूरी पर स्थित है।

  • नाहरगढ़ वन्यजीव अभ्यारण्य – एक लघु अभ्यारण्य (50 वर्ग किमी. क्षेत्रफल) है, जो राजस्थान के बारां जिले में है। जयपुर उससे लगभग 300 किमी. की दूरी पर स्थित है।

  • पेरियार गेम अभ्यारण्य – केरल राज्य में अवस्थित है, जो जंगली हाथियों के लिए प्रसिध्द है।

  • अस्कोट वन्यजीव सेंक्चुअरी – उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से 54 किमी. की दूरी पर अवस्थित है।

  • उत्तराखंड से स्थित वन्य जीव विहार समूह की स्थिति पश्चिम से पूर्व की ओर इस प्रकार है – केदारनाथ-नंदा देवी- बिनसर – अस्कोट। केदारनाथ वन्य जीव विहार की स्थिति चमोली एवं रुद्रप्रयाग जिलें में, नंदा देवी चमोली जिले में, बिनसर अल्मोड़ा जिले तथा अस्कोट वन्य जीव विहार पिथौरागढ़ जिले में स्थित है।

  • श्योपुर (मध्य प्रदेश) जिले में पालपुर नामक स्थल पर अवस्थित कूनों वन्यजीव अभ्यारणअय एक एशियाई शेरों के पुनर्वप्रवेश स्थल के रुप में चयन किया गया है। शिकार के कारण विलुप्त होने से पूर्व 1873 ई. में यहां एशियाई शेरो का बसाव था इस कारण यह स्थल चुना गया है।

  • एशियाई शेरों को गुजरात के गिर अभ्यारण्य से मध्य प्रदेश के कूनो पालपुर अभ्यारण्य भेजने/स्थानांतरित किए जाने हेतु पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने अपनी स्वीकृति मार्च, 2017 के प्रारंभ में दे थी। समिति के अनुसार, कूनो पालपुर अभ्यारण्य की परिस्थितियां विलुप्त हो रहे एशियाई शेरों के दूसरे घर हेतु उपयुक्त हैं।

  • जंगली गदहों का अभ्यारण्य गुजरात राज्य के कच्छ के रन में स्थित है। 4954 वर्ग किमी. मे फैला यह भारत का बसे बड़ा वन्यजीव अभ्यारण्य है जिसकी स्थापना वर्ष 1972 में की गई थी।

  • महुआडांर अभ्यारण्य झारखंड के लातेहार जिलें में है। 25 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत यह अभ्यारण्य मुख्यतया भेड़ियों के लिए प्रसिध्द है। यहां पाए जाने वाले अन्य जीव हैं  खरगोश, नेवला, चूहे, गिलहरी, छोटे हिरण तथा भूमि पर रहने वाले पक्षी इत्यादि।

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पक्षी विहार एवं तितली संरक्षण

  • पक्षियों के संरक्षण के लिए भारत में विविध प्रयास किए गए हैं। उनमें प्रमुख रुप से पक्षी विहार की स्थापना करना शामिल है।

  • ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल का प्राकृतिक आवास पश्चिमी घाट है। इस पक्षी का वैज्ञानिक नाम ब्यसेरस बाइकार्निस (Buceros Bicornis) है। यह पक्षी एक विशेष प्रकार का घोंसला बनाता है। वनों की कटाई होने से इस पक्षी की प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। यह पक्षी भारत के अलावा नेपाल, भूटान, चीन, इंडोनेशिया इत्यादि देशों मे पाया जाता है।

  • कुछ प्रमुख पक्षी विहार व उनकी अवस्थिति इस प्रकार है –

पक्षी विहार

जिला

नवाबगंज पक्षी विहार

उन्नाव

ओखला पक्षी विहार

गौतमबुध्द नगर

समसपुर पक्षी विहार

रायबरेली

पार्वती अरंगा पक्षी विहार

जयप्रकाश नगर (गोंडा)

उधव पक्षी विहार

साहेबगंज

 

  • भारत का प्रथम तितली उद्यान, बन्नरघट्टा जैविकी उद्यान है, जो बंगलुरु में स्थित है। चमकीले नीले धब्बों के साथ मखमली काले पंखों वाली ब्लू मारमॉन (Blue Mormon) तितली को महाराष्ट्र ने राज्य तितली के रुप में घोषित किया है। ब्लू मारमॉन का वैज्ञानिक नाम पैपिलियो पालिम्नेस्टर (Popilio polymnester) है। यह तितली मुख्यतया श्रीलंका तथा भारत में पाई जाती है। भारत में महाराष्ट्र व पश्चिमी घाट (दक्षिण भारत में स्थित) में यह तितली पाई जाती है। यह तितली भारत की दूसरी सबसे बड़ी तितली है। सदर्न बर्डविंग (Southern Birdwing) भारत की सबसे  बड़ी तितली है। जिसे कर्नाटक ने राज्य तितली का दर्जा दिया है।

  • ध्यातव्य है कि महाराष्ट्र पहला व कर्नाटक दूसरा ऐसा राज्य है जिसने राज्य तितली की घोषणा की है।

  • भारत का पहला तितली उद्यान, बन्नरघट्टा जैविकी उद्यान है, जो बंगलुरु में स्थित है।

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प्रोजेक्ट टाइगर

  • बाघ प्रजाति के विलुप्तप्राय होने की समस्या को देखते हुए, इनके संरक्षण के लिए सरकार ने अप्रैल, 1973 में बाघ परियोजना (Project Tiger) प्रारंभ की थी, जिसका उद्देश्य बाघ को समाप्त होने से बचाना था।

  • समस्त विश्व में बाघों की आकलित संख्या 3000-4000 के मध्य है।

  • भारत में बाघों की संख्या 2226 (नवीनतम बाघ गणना के अनुसार) आकलित है, जो विश्व के अन्य किसी देश से अधिक है।

  • वन्य प्राणी बाघ की स्थिति के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय टाइगर दिवस 29 जुलाई को प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

  • प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के रुप में मनाए जाने का निर्णय वर्ष 2010 में आयोजित सेंटपीटर्सबर्ग बाघ सम्मेलन में किया गया था।

  • M-STrIPES (Monitring System for Tigers – Intensive Protection and Ecological Status) शब्द कभी-कभी समाचारों में बाघ अभय़ारण्यों के रख-रखाव संदर्भ में  देखा जाता है। इस तंत्र के दो मुख्य घटक है –

  1. पारिस्थितिकीय निगरानी, वन्य जीवों से संबंधित अपराधों का अभिलेखन, संबंधित कानूनों को अमल में लाने व गश्ती संबंधी क्षेत्र आधारित प्रोटोकॉल।

  2. संग्रहण, क्षतिपूर्ति, विश्लेषण एवं प्रतिवेदन हेतु विशिष्ट रुप से निर्मित सॉफ्टवेयर।

  • M-STrIPES द्वारा ऐसे प्रतिवेदनों एवं मानचित्रों का निर्माण संभव है जिसकी आसानी से व्याख्या की जा सके एवं जो नीतिगत निर्णयन एवं प्रबंधन के उपयोगी सिध्द हो। समुचित क्रियान्वयन करने पर M-STrIPES बाघ के शिकार होने या आवास विनाश जैसी विघातक पारिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया को सुनिश्चित करता है तथा बाघ अभ्यारण्यों की नब्ज पर नियंत्रण रखने हेतु एक उपयोगी अस्त्र साबित होता है। यह GIS (Geographic Information System) आधारित तंत्र का प्रयोग करता है।

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  • भारत में कुल 50 संरक्षित उद्यान प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल हैं, जो इस प्रकार हैं –

क्र.

प्रोजेक्ट टाइगर वाले राष्ट्रीय उद्यान

राज्य

1.    

कार्बेट

उत्तराखंड

2.    

बांदीपुर

कर्नाटक

3.    

मानस

असम

4.    

पलामू

झारखंड

5.    

रणथम्भौर

राजस्थान

6.    

सिमिलीपाल

ओड़िशा

7.    

सुंदरबन

प.बंगाल

8.    

कान्हा

मध्य प्रदेश

9.    

मेलघाट

महाराष्ट्र

10.                      

पेरियार

केरल

11.                      

सरिस्का

राजस्थान

12.                      

नामदफा

अरुणाचल प्रदेश

13.                      

नागार्जुन सागर-श्रीशैलम

आंध्र प्रदेश

14.                      

अमराबाद

तेलंगाना

15.                      

इंद्रावती

छत्तीसगढ़

16.                      

बुक्सा

प. बंगाल

17.                      

दुधवा कतरनीघाट

उत्तर प्रदेश

18.                      

कालाकाड-मुंडनथुरई

तमिलनाडु

19.                      

वाल्मीकि

बिहार

20.                      

पेंच

मध्य प्रदेश

21.                      

बांधवगढ़

मध्य प्रदेश

22.                      

पन्ना

मध्य प्रदेश

23.                      

दम्पा

मिजोरम

24.                      

तदोबा-अंधेरी

महाराष्ट्र

25.                      

भद्रा

कर्नाटक

26.                      

नमेरी

असम

27.                      

पेंच

महाराष्ट्र

28.                      

बोरी-सतपुड़ा

मध्य प्रदेश

29.                      

पक्के

अरुणाचल प्रदेश

30.                      

अन्नामलाई

तमिलनाडु

31.                      

उदंती और सीतानदी

छत्तीसगढ़

32.                      

सतकोसिया

ओड़िशा

33.                      

काजीरंगा

असम

34.                      

अचानकमार

छत्तीसगढ़

35.                      

डंडेली-अंशी

कर्नटाक

36.                      

संजय-दुबरी

मध्य प्रदेश

37.                      

मुडुमलाई

तमिलनाडु

38.                      

नागरहोल

कर्नाटक

39.                      

पारम्बिकुलम

केरल

40.                      

सह्याद्रि

महाराष्ट्र

41.                      

कावल

तेलंगाना

42.                      

बी.आर.टी.

कर्नाटक

43.                      

सत्यमंगलम

तमिलनाडु

44.                      

मुकुन्द्रा हिल्स

राजस्थान

45.                      

नवेगांव नागजीरा

महाराष्ट्र

46.                      

पीलीभीत

उत्तर प्रदेश

47.                      

बोर

महाराष्ट्र

48.                      

राजाजी

उत्तराखंड

49.                      

ओरंग

असम

50.                      

कामलांग

अरुणाच प्रदेश

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  • वर्ष 2015 में उत्तराखंड स्थित राजाजी राष्ट्रीय उद्यान को टाइगर रिजर्व का दर्जा प्राप्त हो गया। यह भारत का 48वां टाइगर रिजर्व है। उत्तराखंड राज्य के राजाजी राष्ट्रीय पार्क को राज्य का दूसरा टाइगर रिजर्व घोषित किया गया है। इस टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल 1075.17 वर्ग किमी. है। इससे पूर्व राज्य में एक टाइगर रिजर्व कार्बेट टाइगर रिजर्व ही स्थित था।

  • उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में कर्नाटक के बाद बाघों की सर्वाधिक संख्या पाई जाती है। इसके बाद असम स्थित ओरंग राष्ट्रीय उद्यान देश का 49वां टाइगर रिजर्व बना। इसम स्थित काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क को वर्ष 2006 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था।

  • भारत का सबसे बड़ा बाघ आवास आंध्र प्रदेश का नागार्जुन सागर-श्रीशैलम टाइगर रिजर्व है। उल्लेखनीय है  कि आंध्र प्रदेश के पुनर्वगठन के पश्चात नागार्जुन सागर-श्रीशैलम  बाघ अभ्यारण्य का 3296.31 वर्ग किमी. क्षेत्र आंध्र प्रदेश की सीमा के अंतर्गत आता है। जबकि नागार्जुन  सागर-श्रीशैलम बाघ अभ्यारण्य का 2611.39 वर्ग किमी. क्षेत्र तेलंगाना की सीमा में है जिसे अब अमराबाद बाघ अभ्यारण्य के नाम से जाना जाता है।

  • हाल ही में कर्नाटक स्थित बांदीपुर बाघ अभ्यारण्य ने वन्यजीव प्रबंधन हेतु मानवरहित विमान (ड्रोन) का उपयोग करना प्रारंभ कर दिया है।

  • दम्पा टाइगर रिजर्व को वर्ष 1994 में बाघ अभ्यारण्य का दर्जा प्रदान किया गया था। यह मिजोरम के पश्चिमी भाग में स्थित है। गुमटी वन्यजीव अभ्यारण्य त्रिपुरा में स्थित है। सारामती चोटी (शिखर) भारत के नगालैंड राज्य एवं बर्मा के सगैंग क्षेत्र में विस्तृत है।

  • अरुणाचल प्रदेश मे स्थित नामदफा नेशनल पार्क एक टाइगर रिजर्व भी है। इसकी जलवायु उष्णकटिबंधीय है से उपोष्ण, शीतोष्ण तथा आर्कटिक तक परिवर्तित होती है।

  • बुक्सा बाघ आरक्षित क्षेत्र प. बंगाल राज्य में है।

  • सरिस्का टाइगर रिजर्व राजस्थान के अलवर जिले में अवस्थित है। इसे वर्ष 1955 में वन्यजीव अभ्यारण्य जबकि वर्ष 1978 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था।

  • पेंच बाघ आरक्षित क्षेत्र का विस्तार मध्य प्रदेश (90%) और महाराष्ट्र (10%) में है, जबकि कान्हा का मध्य प्रदेश, मानस का असम और सरिस्का का राजस्थान मे ही विस्तार है।

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विविध

  • इंग्लैंड के क्यू स्थित रॉयल बॉटेनिक गॉर्डन की स्थापना 1759 ई. में हुई थी। इसे वर्ष 2003 में यूनेस्को विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया था। इसमें पौधों की 40000 से अधिक प्रजातियां हैं तथा यह विश्व का सबसे बड़ा वानस्पतिक उद्यान है।

  • पांच मौसमों का बाग महरौली के समीप स्थित है। इस बाग को फरवरी, 2003 में 20 एकड़  क्षेत्र मे स्थापित किया गया था।

  • हाथियों की मौजूदा आबादी को उनके प्राकृतिक आवास स्थलों में दीर्घकालीन जीवन सुनिश्चित करने के लिए तथा पर्याप्त संख्या में हाथियों की आबादी रखने वाले राज्यों की सहायता करने के उद्देश्य से फरवरी, 1992 में हाथी परियोजना शुरु की गई थी। भारत में हाथियों की कुल संख्या 27785-31368 के मध्य है।

  • सत्यमंगलम बाघ आरक्षित (सत्यमंगलम टाइगर रिजर्व) पूर्वी घाटों एवं पश्चिमी घाटों के मिलन स्थल पर स्थित है। बाघ के अलावा इस टाइगर रिजर्व में हाथी, लकड़बग्घा (Hyena), तेंदुआ (Leopard) इत्यादि पाए जाते हैं। यह तमिलनाडु का सबसे बड़ा वन्यजीव अभ्यारण्य है। ध्यातव्य है कि नल्लामल वन आंध्र प्रदेश में स्थित है। जबकि नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान कर्नाटक में स्थित है। शेषाचलम जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र, आंध्र प्रदेश का पहला जीवमंडल आरक्षित क्षेत्र है।

  • ध्यातव्य है कि जुलाई, 2016 में इस्तांबुल, तुर्की में संपन्न विश्व धरोहर समिति की 40वीं बैठक मे बिहार के नालंदा में स्थित नालंदा महाविहार, चंड़ीगढ़ के ऐतिहासिक कैपिटल कॉम्प्लेक्स और सिक्किम के कंचनजंगा नेशनल पार्क को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था।

  • हरिके आर्द्रभूमि पंजाब प्रांत में व्यास और सतलुज के संगम पर स्थित है, जबकि केवलादेव घाना राष्ट्री उद्यान राजस्थान प्रांत के भरतपुर में  गंभीर और बाणगंगा नदी के संगम पर स्तित है। कोलेरू झील, आंध्र प्रदेश में कृष्णा और गोदावरी नदी के डेल्टा में स्थित ताजे पानी की झील है।

  • सर्वप्रथम समुद्री सेंक्चुअरी कच्छ की खाड़ी में स्थापित की गई, जिसमें डॉल्फिन, मोलस्का, कछुआ आदि अनेक प्रकार के समुद्री जीव संरक्षित किए गए हैं।

  • कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान अपना जल रामगंगा नदी से प्राप्त करता है।

  • चिनार वन्यजीव विहार केरल राज्य में अवस्थित है।

  • तमिलनाडु का पक्षी विहार वेदांगथंगल और कारीकिली में अवस्थित है। कारीकिली चेन्नई से 86 किमी. की दूरी पर है।

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वैकल्पिक ऊर्जा

ऊर्जा एवं ऊर्जा संसाधन

  • प्रकृति के समस्त कार्य ऊर्जा से संचालित होते हैं। यह ऊर्जा हमें विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त होती है।

  • ऊर्जा संसाधनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया जा सकता है-

नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन –

  • सौर ऊर्जा

  • पवन ऊर्जा

  • जल वैद्युत

  • बायो गैस

  • भूतापीय

  • कचरे से उत्पादित ऊर्जा

  • ज्वारीय ऊर्जा

अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन

  • कोयला

  • पेट्रोलियम

  • प्राकृतिक गैस

  • परमाणु ऊर्जा

  • शेल गैस

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  • नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा का वह रुप है जो न तो प्रदूषण कारक है और न ही इसका प्राकृतिक संसाधनों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। वैश्विक स्तर पर स्वीकृत 17 विकास लक्ष्यों में 7वें लक्ष्य के रुप में वर्ष 2030 तक वैश्विक ऊर्जा में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने और सस्ती, विश्वसनीय एवं आधुनिक ऊर्जा सेवाओं तक सार्वभौम पहुंच सुनिश्चत किए जाने की बात की गई है, साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2014-2024 के दशक को सभी के लिए ऊर्जा का दशक घोषित किया गया है।

  • पौधे के वे उत्पाद जो कि हजारों वर्षों से पृथ्वी के नीचे दबे पड़े थे या पौधे के वे जीवाश्म जिनका उपयोग हम ईंधन के रुप में करते हैं,  जीवाश्म ईंधन कहलाते हैं। ये अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन हैं। जीवश्म ईंधन वर्तमान में ऊर्जा के प्रमुख स्रोत  हैं। एक बार इनका प्रयोग करने के पश्चात इन्हें दोबारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जैसे – कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि।

  • ध्यातव्य है कि कच्चे तेल तथा प्राकृतिक गैसे जैसे जीवाश्म ईधनों के समाप्त होने के खतरे को ही ऊर्जा संकट का नाम दिया गया है। यूरेनियम नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन हेतु कच्चे माल के रुप में प्रयुक्त किया जाता है। ध्यातव्य है कि नाभिकीय ऊर्जा परमाणुओं के संयोजन अथवा विखंडन प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न की जाती है।

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अनवीकरणीय व नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन

  • नवीकरणीय ऊर्जा प्राकृतिक प्रक्रिया के तहत लगातार प्राप्त होती रहती है। सौर, पवन, ज्वारीय, पनबिजली ऊर्जा आदि प्राकृतिक संसाधन, नवीकरणीय ऊर्जा के उदाहरण हैं।

  • उल्लेखनीय है कि कोयला, पेट्रोलियम गैस एवं परमाणु ऊर्जा की अपेक्षा जल विद्युत धारणीय विकास के दृष्टिकोण से विद्युत उत्पाद का की अपेक्षा जल विद्युत धारणीय विकास के दृष्टिकोण से विद्युत उत्पाद का सबसे अच्छा स्रोत है।

  • ध्यातव्य है कि 31 मार्च, 2018 तक देश में सौर, पवन, बायोमास एवं लघु पनबिजली (नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन) कुल स्थापित क्षमत का 20.06% थे। कुल स्थापित क्षमता 344002.39 MW के बराबर थी, जिससे सर्वाधिक योगदान पवन ऊर्जा का था, जो 34046.00 MW के बराबर थी।

  • सौर ऊर्जा द्वारा 21651.48 MW, जैव ऊर्जा द्वारा 8839.10 MW तथा लघु पनबिजली द्वारा 4485.81 MW द्वारा प्राप्त हुई। 31 मार्च, 2018 तक देश में नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन की कुल स्थापित क्षमता, कुल विद्युत उत्पादन क्षमता का 20.06% थी।

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वैकल्पिक ऊर्जा सौर ऊर्जा

  • सूर्य ऊर्जा का सबसे अधिक व्यापक एवं असीमित स्रोत है। सौर ऊर्जा (Solar Energy) एक अक्षय प्राकृतिक संसाधन हैं, जो कि सूर्य से विकिरण (Solar Radiation) द्वारा प्राप्त होती है।

  • ध्यातव्य है कि सौर ऊर्जा कभी ना समाप्त होने वाली तथा प्रदूषण रहित ऊर्जा है। सौर ऊर्जा वैकल्पिक ऊर्जा का सबसे बड़ा संग्रहागार है। यह हमें सूर्य से प्राप्त होती है।

  • सौर ऊर्जा जैविक मात्रा में सर्वाधिक उपयोग की जाती है। सूर्य से मिलने वाला प्रकाश एवं ऊष्मा पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। सौर ऊर्जा जहां पौधों के प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक है, तो अन्य सभी के लिए भी उपयोगी है। यह वैकल्पिक ऊर्जा का भी सबसे बड़ा स्रोत है। फोटोवोल्टोइक तकनीक के द्वारा सूर्य के प्रकाश को सौर ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।

सौर ऊर्जा के अन्य उपयोग

  • सौर चिकित्सा (Sun Therapy)

  • प्रकाश संश्लेषण

  • जल का ऊष्मन

  • सोलर कुकर

  • कृत्रिम उपग्रह (मंगलयान)

  • सौर उपकरण

  • परिवहन (ऑटो रिक्शा, हवाई जहाज-Impulse)

  • सौर संयंत्रों द्वारा विद्युत निर्माण

  • सौर ऊर्जा, ऊर्जा का वह विशिष्ट रुप है जिससे पर्य़ावरणीय प्रदूषण की समस्या नहीं होती है।

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  • इसका उपयोग सड़क व्यवस्था, लघु सिंचाई परियोजना हेतु जल की आपूर्ति, आवासीय भवनों को गर्म जल की आपूर्ति, रेलवे सिग्नल, सोलर कुकर इत्यादि में किया जा सकता है, तथापि वर्तमान प्रौद्योगिक स्तर को देखते हुए अभी इससे कुछ गांवों एवं छोटे नगरों के समूहों में बिजली की व्यवस्था नहीं की जा सकती है क्योंकि यह व्ययसाध्य है। इस दिशा में यद्यपि सरकार द्वारा पायलट आधार पर कुछ परियोजनाएं प्रारंभ की गई हैं।

  • सौर बैटरी या सौर सेल फोटोवोल्टोइक प्रभाव के द्वार सूर्य या प्रकाश के किसी अन्य स्रोत से ऊर्जा प्राप्त करता है। यह ऊर्जा का सर्वोत्तम पर्य़ावरण अनुकूल स्रोत है। अतः यह पर्य़ावरण को स्वच्छ रखने में सहायक सिध्द होता है। जबकि पेट्रोलियम उत्पाद, वन उत्पाद एवं नाभिकीय विखंडन से प्राप्त ऊर्जा से कुछ न कुछ मात्रा में पर्यावरण का निम्नीकरण अवश्य होता है।

  • भारत में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में सौर शक्ति सर्वाधिक संभाव्यता वाला है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय उत्तर-पूर्व राज्यों में एक सौर ऊर्जा संयंत्र के लिए स्थापना लागत पर 70% सब्सिडी प्रदान करता है। राष्ट्रीय सौर मिशन इसके विकास में लगा हुआ है। इसको भविष्य का ईंधन भी कहा गया है। भारत में प्राकृतिक रुप से सौर ऊर्जा के लिए काफी सहायक क्षेत्र मौजूद है, जो इसके विकास को संभाव्य बनाते हैं।

  • ध्यातव्य है कि जवाहरलाल नेहरु सौर मिशन भारत का सरकार द्वारा 11 जनवरी, 2010 को शुरु किया गया। इस मिशन ने वर्ष 2022 तक 20000 मेगावॉट सौर विद्युत का लक्ष्य निर्धारित किया है।

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  • ध्यातव्य है कि घरेलू अंश आवश्यकता (DCR) पद का संबंध देश में सौर शक्ति उत्पादन का विकास करने से है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत कौ वैश्विक रुप से अग्रणी देश के रुप में स्थापित करने हेतु जनवरी, 2010 में राष्ट्रीय सौर नीति जिसे जवाहर लाल नेहरु राष्ट्रीय सौर मिशन (JNNSM) नाम दिया गया था, लांच की गई। इसके अनुसार, घरेलू अंश आवश्यकता श्रेणी के अनुसार, भारत में सौर परियोजनाओं हेतु देश में निर्मित सौर उपकरणों और बैटरी का प्रयोग किया जाएगा।

  • मिशन के प्रथम चरण के अंतर्गत नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय विकेन्द्रीकृत सौर उपकरणों जैसे – प्रकाश के उपकरण, पानी गर्म करने के उपकरण या सौर कूकर पर 30 प्रतिशत का अनुदान  देती है।

  • वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (International Solar Alliance –ISA) कर्क रेखा व मकर रेखा के बीच स्थित 121 देशों का  एक समूह है, जो अपनी ऊर्जा आवश्कयताओँ के लिए सूर्य द्वारा प्राप्त ऊर्जा का प्रयोग  करने हेतु प्रतिबध्द है।

  • 30 नवंबर, 2015 को पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में ISA का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद तथा यू.एन. के तत्कालीन महासचिव बॉन की मून की उपस्थिति में किया गया था। इसका सचिवालय फरीदाबाद, हरियाणा में है। इस गठबंधन का प्रथम शिखर सम्मेलन 11 मार्च, 2018 को नई दिल्ली में  संपन्न हुआ।  ISA के घोषणा-पत्र के अनुसार, सदस्य देशों ने वहनीय व कम लागत वाली सौर  ऊर्जा उपलब्ध कराने हेतु वर्ष 2030 तक 1000 बिलियन यू.एस. डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा है।

बायोडिजल

  • ध्यातव्य है कि बायोमास से ऊर्जा का विमोचन जैविक परमाणुओं के बीच बने रासायनिक बांधों के टूटने से होता है। ये रासायनिक बंध प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा बनते हैं। अतः बायोमास में सौर ऊर्जा अप्रत्यक्ष रुप से पाई जाती है।

  • जेट्रोफा बायोडील की फसल है। जेट्रोफा पुष्पीय पादपों की प्रजाति का पौधा है, जो सूखे तथा विनाशकारी कीटों के प्रति प्रतिरोधी है। यह ऐसे बीज उत्पन्न करता है जिसमें 27-40 प्रतिशत तक तेल होता है। जेट्रोफा के तेल को डीजल इंजनों में प्रयोग हेतु बायोडीजल में परिवर्तित कर दिया जाता है। परंतु जैव-ईंधन, जीवाश्म-ईंधन (डीजल, पेट्रोल, कोयला आदि) की तुलना में लागत प्रभावी नहीं होता है। जैव ईंधन जेट्रोफा से भी बनाया जा सकता है। करंज, महुआ व नीम आदि भी जैव ईंधन के रुप में प्रयोग में लाए जा सकते हैं। जैव ईंधन को लेकर आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि इससे अच्छी कमाई होने से किसान अपने खेतों में अन्य फसलों को उपजाना बंद न कर दें। इससे भारत की खाद्य सुरक्षा खतरें में पड़ सकती है।

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  • पौंगामिया पिनाटा भारत के अधिकांश शुष्क क्षेत्रों में प्राकृतिक रुप से उगता है। पौंगामिया पिनाटा के बीजों मे लिपिड अंश बहुतायत मे होता है जिसमे लगभग आधा ओलीइक अम्ल होता है। इसी कारण जेट्रोफा के अलावा इसको भी बायोडीजल का विकल्प माना जाता है।

  • मक्का की खेती एथेनॉल के लिए की जा सकती है जबकि जेट्रोफा, पौंगामिया और सूरजमुखी की खेती बायोडीजल के लिए की जा सकती है।

  • उष्मा-रासायनिक परिवीतन द्वारा ठोस बायोमास का, दहन योग्य गैस मिश्रण में रुपांतरण ही बायोमास गैसीकरण है। इस प्रक्रिया में जैविक पदार्थों या जीवश्म आधारित कार्बनयुक्त पदार्थों को कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन में बदल  जाता है। प्राप्त गैसों का मिश्रण ही प्रोड्यूसर गैस या सिंथेटिक गैस कहलाता है, जो स्वयं एक ईंधन है। इसका महत्व इस बात में है कि यह नवीकरणीय ऊर्जा प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। सबसे सामान्य रुप से उपलब्धता गैसीकारक में लकड़ी तथा लकड़ी वाले बायोमास का प्रयोग किया जाता है। ऐसे पदार्थों यथा-नारियल आवरण, मूंगफली के छिलके तथा धान की भूसी इत्यादि का भी उपयोग किया जा सकता है, जो अन्यथा कचरा समझकर फेंक दिए जाते हैं। इस प्रकार उत्पन्न गैस का उपयोग, बिजली पैदा करने वाले जेनरेटर से जुड़े उपयुक्त रुप से डिजाइन किए गए अंतर्दहन इंजन में, डीजल की जगह किया जा सकता है।

बायोमास के स्रोत

  • कृषि घरेलू अपशिष्ट

  • सीवेज

  • औद्योगिक अपशिष्ट

  • नगरपालिका ठोस अपशिष्ट

  • जीव-जंतुओं के अपशिष्ट

  • वन व लकड़ियां

  • नारियल आवरण, मूंगफली का छिलका तथा धान की भूसी इत्यादि।

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हरित ईंधन

  • हरित ईंधन के प्रयोग से पर्यावरण प्रदूषण मे कमी आती है।

  • एथेनॉल एक प्रसिध्द एल्कोहॉल है। इसे एथिल एल्कोहॉल भी कहते। इसका प्रयोग हरित ईंधन के रुप में होता है। एथेनॉल किसी शक्करमय पदार्थ (गन्ने की शक्कर, ग्लूकोस, शोरा, महुए का फूल आदि) या स्टार्चमय पदार्थ से प्राप्त होता है। पाइन, करंज, फर्न से भी किण्वीकरण कर एथेनॉल प्राप्त किया जाता है। इसे हरित ईंधन स्रोत में शामिल करते हैं। ध्यातव्य है कि गन्ने की खेती द्वारा भी बायो-एथेनॉल की प्राप्ति की जा सकती है। इसका उपयोग ईंधन के रुप में करके ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।

  • सूक्ष्मजैविक ईंधन कोशिकाएं (MFC) जैव-परिपर्तनीय सबस्ट्रेट में उपलब्ध रासायनिक ऊर्जा को सीधे विद्युतीय ऊर्जा में परिवर्तित कर देती हैं। सबस्ट्रेट के इलेक्ट्रॉनों में परिवर्तन हेतु सूक्ष्मजीवों में बैक्टीरिया का उत्प्रेरक के रुप में प्रयोग किया जाता है। अपशिष्ट जल के शोधन हेतु सूक्ष्मजैविक ईंधन कोशिकाओँ के प्रयोग से जल शोधन की लागत तो घटती ही है साथ ही यह विद्युत उत्पादन का एक आकर्षक विकल्प भी है।

  • सूक्ष्मजैविक ईंधन कोशिकाओं में मुख्यतः कार्बनिक पदार्थों जैसे ग्लूकोज, सुक्रोज, सेल्युलोज, स्टार्च, फार्मेंट, एसीटेट, इथेनॉल, मीथेनॉल, एमीनों अम्ल, प्रोटीन इत्यादि सबस्ट्रेट के रुप में प्रयुक्त होते हैं। साथ ही कुछ अकार्बनिक पदार्थों जैसे सल्फाइड्स का भी सबस्ट्रेट के रुप में प्रयोग होता है।

  • शैवाल आधारित जैव-ईधनों का उत्पादन समुद्रों एवं महाद्वीपों दोनों में संभव है। इन ईंधनों के उत्पादन एवं अभियांत्रिकी करने हेतु उच्च स्तर की विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, साथ ही अधिक उत्पादन के लिए नवाचार हेतु भी ज्ञान एवं अनुभव की आवश्यकता होती है। दुर्बल निवेश स्थिति वाले विकासशील देशों में इस प्रकार के ईंधन का उत्पादन कठिन है, क्योकि इस हेतु अधिक पूंजी निवेश की जरुरत पड़ती है, साथ ही आर्थिक रुप से व्यवहार्य उत्पादन के लिए बड़े मैपाने पर सुविधाओं की स्थापना से पारिस्थितिकी एवं समाज प्रतिकूल रुप से प्रभावित हो सकते हैं।

  • बायोऐस्फाल्ट, डामर (Asphalt) का विकल्प है जिसका निर्माण गैर-पेट्रोलियम आधारित नवीकरणीय स्रोतों से किया जाता है। इन स्रोतों में चीनी, शीरा, धान, मक्का, लिग्निन, सेल्युलोज, ताड़ के तेल का अपशिष्ट, सफेद सरसों के तेल का अपशिष्ट आदि सम्मिलित हैं।

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  • गैर-पेट्रोलियम आधारित डामर, सड़कों की सतह का तापमान कम रखने में मददगार है। अतः बायो ऐस्फाल्ट से सड़कों की ऊपरी सतह विछाना पारिस्थितिकी के अनुकूल है।

  • फ्यूल सेल में एक रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से विद्युत का उत्पादन होता है, न कि दहन (Combustion) के माध्यम से। फ्यूल सेल में हाइड्रोजन समृध्द ईधन, ऑक्सीजन से विद्युत-रासायनिक रुप से संयोग कर विद्युत धारा ऊष्मा एवं जल का उत्पादन करता है। ईंधन की निरंतर आपूर्ति होने पर फ्यूल सेल से लगातार विद्युत का उत्पादन किया जा सकता है।

  • फ्यूल सेल से विद्युत धारा (DC) के रुप में उत्पादित होती है। फ्यूल सेल का उपयोग भवनों को विद्युत प्रदान करने के साथ स्मार्टफोनों, लैपटॉप, कंप्यूटरों जैसे पोर्टेबल उपकरणों को विद्युत प्रदान करने के लिए किया जा सकता है।

फ्यूल सेल के लाभ

  • सेल की डिजाइल व माप का आसान मानकीकरण

  • पर्यावरण हितैषी

  • अधिक दक्षता

  • शोर रहित

  • ध्यातव्य है कि जब हाइड्रोजन हवा में जलती है, तो यह ऑक्सीजन के साथ संयुक्त होकर जल का निर्माण करती है और इस प्रक्रिया में ऊर्जा की बड़ी मात्रा (150 किलो जूल प्रतिग्राम) उन्मुक्त होती है। अपने उच्च बल्कि उच्चतम ऊर्जा प्रदायक मान के कारण हाइड्रोजन प्रदूषणरहित उत्कृष्ट ईंधन के रुप में कार्य करती है। हाइड्रोजन का उत्पादन जल के तापीय पृथक्करण, प्रकाश अपघटन अथवा विद्युत अपघटन के द्वारा किया जा सकता है।

  • हाइड्रोजन के महत्व को देखते हुए भारत में वर्ष 2003 में राष्ट्रीय हाइड्रोजन बोर्ड का गठन किया गया है। इसके तहत वर्ष 2020 तक 1000 मेगावॉट (MW) क्षमता की हाइड्रोजन आधारित ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। ध्यातव्य है कि कई वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य का ईंधन हाइड्रोजन गैस है।

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विविध

  • ध्यातव्य है कि खनिज समय के साथ समाप्त होने योग्य है, जबकि सौर ऊर्जा का स्रोत सूर्य है, जो असमाप्त होने योग्य है। बायोगैस के मुख्य अंश मीथेन एवं कार्बन-डाइऑक्साइड हैं तथा वन-अपरोपण से वर्षा में कमी आती है।

  • पृथ्वी की भूपर्पटी में पाए जाने वाले उष्ण जल से प्राप्त होने वाली वह ऊर्जा जिसका उपयोग मानव अपने विभिन्न कार्यों के लिए करता है, भू-तापीय ऊर्जा कहलाती है। भारत में भू-तापीय ऊर्जा स्त्रोत के प्रमुख क्षेत्र हैं – हिमालय, खंभात बेसिन, सोनाटा (SO-NA-TA (Son-Narmada-Tapi) पश्चिमी घाटी, गोदावरी बेसिन और महानदी बेसिन।

  • कोयले में सल्फर की उपस्थिति सल्फर डाइऑक्साइड के लिए उत्तरदायी है। सल्फर डाइऑक्साइड अम्ल वर्षा के लिए प्रमुखतः उत्तरदायी गैस है। साथ ही कोयले के जलने पर कार्बन के ऑक्साइड उत्सर्जित होते हैं।

  • परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करते समय रेडियोधर्मी किरणों तथा रेडियोधर्मी तत्वों के रिसाव का ध्यान रखने की आवश्यकता होती है। रेडियोधर्मी विकिरण से पेड़-पौधों एवं जंतु समूह को क्षति पहुंच सकती है। अतः रेडियोधर्मी अपशिष्ट के निस्तारण की आवश्यकता पड़ती है।

प्रदूषण

प्रदूषण एवं उसके प्रकार

  • प्रदूषण भूमि, वायु तथा जल के भौतिक, रासायनिक अथवा जैव अभिलक्षणों में अनापेक्षित परिवर्तन के फलस्वरुप होता है। यह प्रदूषकों के अत्यधिक जमाव के कारण होता है। वे पदार्थ जिनसे प्रदूषण फैलता है, प्रदूषक कहलाते हैं। प्रदूषण के कई प्रकार होते हैं। इनका विभिन्न आधार पर वर्गीकृत किया जाता है –

प्रदूषण के प्रकार –

भौतिक गुणों के आधार पर

  • गैसीय प्रदूषण

  • धूल प्रदूषण

  • ताप प्रदूषण

  • ध्वनि प्रदूषण

  • रेडियो सक्रिय प्रदूषण

पर्यावरण के भाग के आधार पर

  • वायु प्रदूषण

  • जल प्रदूषण

  • भूमि प्रदूषण

उत्पत्ति के अनुसार

  • प्राकृतिक – ज्वालामुखी का फूटना

  • मानवोद्भवी – मनुष्य द्वारा औद्योगिक क्षेत्र, कृषि से उत्पन्न प्रदूषक

पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर

  • जैव निम्नीकरणीय (Biodegradable)

  • जैव निम्नीकरणीय रहित (Non Biodegradable)

  • अतः स्पष्ट है कि मनुष्यों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण को एंथ्रोपोजेनिक प्रदूषण की श्रेणी में रखा जाता है। मानवीय क्रियाओं द्वारा पर्यावरण मे डाले गए रासायनिक एवं जैविक कचरे को एंथ्रोपोजेनिक (Anthropogenic) प्रदूषक की संज्ञा दी जाती है।

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  • जैव निम्नीकरणीय रहित प्रदूषक मुख्यतया मानव-जनित (एंथ्रोपोजेनिक) प्रदूषण के कारण पर्यावरण में प्रवेश करते हैं। इन प्रदूषकों का या तो अपघटन नहीं होता या प्रवृत्ति के अपघटकों के द्वारा अपघटन बहुत ही धीरे-धीरे होता है। इसलिए मानव जनित जैव अनिम्नीकरण प्रदूषकों को नियत्रण करना बहुत कठित हो जाता है।

  • ऐसे प्रदूषक जो सूक्ष्म जैसे – कीटाणु आदि के द्वारा समय के साथ प्रकृति में सरल, हानिहरित तत्वों में विघटित कर दिए जाते हैं, जैव विघटित प्रदूषक कहलाते हैं। जैव विघटित प्रदूषकों के कुछ उदाहरण हैं, घरेलू अपशिष्ट (कचरा), मूत्र तथा मल, वाहित मल आदि।

  • जैव निम्नीकरण प्रदूषक या जैव विघटित प्रदूषक जैसे कि घर का कूड़ा पशुओं के मल-मूत्र सीवेज इत्यादि का अपघटकों द्वारा पूरी तरह अपघटन कर दिया जाता है। इसीलिए जैव निम्नीकरण प्रदूषकों को आसानी से प्राकृतिक तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। जैसे कूड़ा, उपचार संयंत्र द्वारा सही तरीके से नियंत्रित कर लेने पर यह एक उपयोगी संसाधन साबित हो जाता है।

  • अतः वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम द्वारा अपघटित हो जाते हैं, जैव निम्नीकरण कहलाते हैं। उदाहरणतया रबर जैव निम्नीरणीय है।

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वायु प्रदूषण

  • पर्यावरण के भाग के आधार पर प्रदूषण को मुख्यतया तीन भागों में बांटा जा सकता है –

  1. वायु प्रदूषण

  2. जल प्रदूषण

  3. भूमि प्रदूषण

  • जब मानवीय या प्राकृतिक कारणों से वायुमंडल में उपस्थित गैसों के निश्चित अनुपात में (विषाक्त गैसों या कणकीय पदार्थों की वजह से) अवांधनीय परिवर्तन हो जाता है, तो इसे वायु प्रदूषण कहते हैं।

  • वायु प्रदूषण के दो स्त्रोत हैं – 1. प्राकृतिक स्रोत और 2. मानवजनित स्रोत

  1. प्राकृतिक स्रोत – में वनाग्नि तथा ज्वालामुखी उद्गार, जैविक पदार्थों के सड़ने-गलने से निकलने वाली गैसे जैसे सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx) इत्यादि आते हैं।

  2. मानव जनित स्त्रोतों – में गैसे व धूम्र, कणकीय पदार्थ (Particulate Matter) तथा ऊष्मा (ईंधन को जलाने से) इत्यादि आते हैं।

  • ध्यातव्य है कि लकड़ी, कोयला, डीजल, पेट्रोल इत्यादि को जलाने से विभिन्न प्रकार की गैसें व धुएं की उत्पत्ति होती है। कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि के दहन से मुख्यतः कार्बन और नाइट्रोजन के ऑक्साइड वायु में व्याप्त होते हैं, जो कि वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण है।

  • वायुमंडल में वर्षा एवं ओस द्वारा धुआं, धूल एवं गैसीय अपशिष्ट पदार्थों से वायुमंडल को स्वच्छ किया जाता है। परंतु ऐसे प्रदूषक जिनके कणों का व्यास 2 माइक्रोन से कम होता है, वे वर्षा द्वारा वायुमंडल से स्वच्छ नहीं किए जा सकते।

  • प्रकाश रासानिक धूम कोहरा (Smog) शब्द Smoke और fog के मिलने से बना है। प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरा वायु प्रदूषण की एक अवस्था है। गाड़ियों और औद्योगिक कारखानों से निकले धुएं मे उपस्थित नाइट्रोजन ऑक्साइड एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड गैसे सूर्य के प्रकाश में हाइड्रोकार्बन के साथ अभिक्रिया करके कई सारे द्वीतीयक प्रदूषकों को जन्म देती हैं, ओजोन, फार्मेल्डिहाइड और PAN (Peroxy Acetyl Nitrate) आदि। इन्हीं द्वीतीयक प्रदूषकों से प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरा उत्पन्न होता है। जहां पर अधिक यातायात रहता है, वहां पर भी गर्म परिस्थितियों तथा तेज सूर्य विकिरण से प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरे का निर्माण होता है।

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  • प्रकाश-रासायनिक धूम्र कोहरा खास तौर से नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx), ओजोन (O3), तथा पेरॉक्सीएसीटिल नाइट्रेट से बनता है। कम सूर्य विकिरण वाले क्षेत्रों में या खास मौसम में धूम्र कोहरा अपूर्ण रुप से बनता है। ऐसी वायु को भूरी वायु कहते हैं।

  • ध्यातव्य है कि ऑटोमोबाइल निर्यातक में हाइड्रोकार्बन (HC) तथा NO रहता है एवं ये शहरी क्षेत्रों में O3 तथा PAN के निर्माण मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • मनुष्यों मे इससे आंख, नाक, गले में जलन तथा श्वसन संबंधी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

  • गर्म, शुष्क औत तीव्र सौर विकिरण वाले महानगरों में वायुमंडलीय हाइड्रोकार्बन और वाहनों व बिजली संयंत्रों से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड सूर्य के प्रकाश में अभिक्रिया करके कई सारे द्वीतीयक प्रदूषक बनाती है, जैसे ओजोन, फॉर्मेल्डिहाइड और पेरॉक्सीएसीटिल नाइट्रेट (PAN) आदि। इन अभिक्रियाओं को प्रकाश रासायनिक कहते हैं क्योंकि इनमे सूर्य़ का प्रकाश और रासायनिक प्रदूषक दोनों शामिल होते हैं। इससे बनने वाले भूरे-नारंगी जैसे वायु प्रदूषक के पर्दे को प्रकाश रासायनिक धूम्र कहते हैं।

  • ध्यातव्य है कि ऑक्सीजन व नाइट्रोजन के मिलने से नाइट्रिक ऑक्साइड (NO2) का निर्माण करती है। NO2 भूरे रंग की तीखी गैसे हैं। यह प्रकाश के अवशोषण के फलस्वरुप नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) तथा नवजात ऑक्सीजन (O) का एक-एक परमाणु बना लेती है।

  • उल्लेखनीय है कि नवजात ऑक्सीजन (O) बहुत क्रियाशील होती है। नवजात ऑक्सीजन (Nascent Oxygen) सूर्य़ के तीव्र प्रकाश की उपस्थिति में ऑक्सीजन के एक अणु (O2) से क्रिया करके ओजोन (O3) बना लेती है। तत्पश्चात O3 पत्तियों के खुले रंध्रों (Open Stomata) द्वारा पर्णध्येतक की कोशाओं में प्रवेश कर जाती है। यह कोशिकाओं मे उपस्थित जल से क्रिया करके हानिकारक ऑक्सीजन मुक्त मूलक अथवा परऑक्सिल मूलक जैसे – O2, OH, HO2 आदि का निर्माण करती है। परऑक्सिल मूलक या तो ऑक्सीजन के अणुओं से मिलकर ओजोन (O3) बना लेते हैं अथवा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड  (NO2) से मिलकर पेरॉक्सीएसीटिल नाइट्रेट (PAN) का निर्माण करते हैं।

  • PAN क्लोरोप्लास्ट को नुकसान पहुंचाता है। इस वजह से प्रकाश संश्लेषण की क्षमता एवं पौधे का विकास कम हो पाता है। यह कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया में होने वाले इलेक्ट्रॉन यातायात प्रणाली को बाधित करता है। यह एंजाइम प्रणाली को भी प्रभावित करता है। मनुष्यों की आंखो में PAN  बहुत ज्यादा जलन या उत्तेजना पैदा करता है। PAN तथा O3 मिलकर छोटी-छोटी बूंदे बना लेते हैं। वायु में मिलकर PAN तथा O3 धुंध बना लेती है।  अधिक धूम्र कोहरे के निर्माण से दृश्यता घट जाती है।  इस कारण से पृथ्वी पर पहुंचने वाली प्राकृतिक सौर विकिरणों की मात्रा घट जाती है।

  • इसके फलस्वरुप विटामिन-डी के उत्पादन की मात्रा घट जाती है, जो रिकेट्स जैसे रोगों में वृध्दि कारण बनती है। अधिक धूम्र कोहरे से यातायात के परिचालन में असुविधा होती है जिससे दुर्घटनाओं में वृध्दि होती है।

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  • वे वायु प्रदूषक, जो प्रदूषक स्रोत से सीधे वायु में मिलते हैं, प्राथमिक प्रदूषक कहलाते  हैं – जैसे – CO3, CO2, SO2 इत्यादि। जबकि ऐसे वायु प्रदूषक, जो प्राथमिक वायु प्रदूषकों तथा साधारण वातावरणीय पादर्थों की क्रिया के फलस्वरुप उत्पन्न होते हैं, द्वीतीयक वायु प्रदूषक नाम से जाने जाते हैं। जैसे ओजोन (O3), पेरॉक्सीएसीटिल नाइट्रेट इत्यादि। अतः पीएएन (Peroxyacetyl Nitrate) , ओजोन तथा स्मॉग (Smog) द्वीतीयक प्रदूषक हैं, जबकि  सल्फर के ऑक्साइड (मुख्यतः सल्फर डाइ-ऑक्साइड), नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड आदि प्राथमिक प्रदूषक हैं।

  • वाहनों में पेट्रोल से लेड धातु उत्सर्जित होती है, जो वायु को प्रदूषित करती है। लेड को इंजन में नॉकिंग (Knocking) रोकने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। अब परिशोधनशाला (Refinery) तकनीक में उन्नयन के कारण पेट्रोल मे लेड डालने की आवश्यकता समाप्त हो चुकी है। लेड एक वायु प्रदूषक है जिससे की गंभीर स्वास्थ्य परिणाम हो सकते हैं। लेड बच्चों में दिमाग के विकास में बाधा पहुंचाता है, उनके बुध्दिलब्धि लेवल (Q.) को घटाता है तथा वयस्कों में हृदय व श्वसन संबंधी बीमारियों को उत्पन्न करता है।

  • मोटर कार तथा सिगरेट के अधूरे प्रज्ज्वल के कारण निकलने वाली रंगहीन गैस कार्बन मोनोऑक्साइड है।

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  • कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) एक मुख्य वायु प्रदूषक है। यह गैस रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन से जुड़कर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन बनाती है। जिसके कारण रक्त की ऑक्सीजन को वहन करने की क्षमता कम हो जाती है। जब लगभग 50 प्रतिशत हीमोग्लोबिन, कार्बोक्सीग्लोबिन में बदल जाता है तब ऑक्सीजन की मी से श्वस क्रिया में अवरोध हो जाता है जिसके परिणामस्वरुप मृत्यु हो जाती है।

  • कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) एक प्रमुख प्राथमिक वायु प्रदूषक (Air Pollutant) है, जो कि रंगहीन (Colourless) तथा अति विषैली (Highly Poisonous) होती है। इसकी 90 प्रतिशत मात्रा प्राकृतिक स्रोतों तथा शेष 10 प्रतिशत ईधन पदार्थों मुख्यतः कोयले के जलने, स्वचालित वाहनों इत्यादि से वातावरण में मिलती रहती है। जिसमें से CO उत्सर्जन का 50 प्रतिशत ऑटोमोबाइल से निकलता है। यह सिगरेट के धुएं से भी उपस्थित रहती है। CO वायुमंडल में कम समय के लिए रहती है तथा इसका ऑक्सीकरण CO2 में होता है।

  • कार्बन मोनोऑक्साइड हानिकारक गैस है। जब यह गहरे फेफड़ों में प्रवेश करती है, तो रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी होती है। यह गैस हीमोग्लोबिन अणुओं में ऑक्सीजन की तुलना में 240 गुना से 300 गुना अधिक तेजी से संयुक्त हो जाती है जिस कारण वायु में पर्याप्त ऑक्सीजन होने पर भी सांस लेने में कठिनाई होती है और घुटन महसूस होने लगती है। अतः यह बहुत हानिकारक वायु प्रदूषक है।

  • इस गैस का सर्वाधिक उत्पादन परिवहन से होता है। दबावयुक्त (CNG) तथा द्रवित (LPG) गैसों के प्रयोग एवं ऑटोमोबाइल व उद्योग संयंत्रों में फिल्टर लगाकर इस समस्या को काफी सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है।

  • फ्लाई ऐश (Fly Ash) कोल के दहन से उत्पन्न प्रदूषक है। इसमें सूक्ष्म कण उपस्थित होते हैं, जो धुएं के साथ हवा में तैरते हैं। कोयला आधारित ताप विद्युत घरों से उत्पन्न होने वाले इस सूक्ष्म पाउडर से जीवों में श्वसन संबंधी रोग होते हैं। यह पौधों की पत्तियों पर जमा होकर प्रकाश संश्लेषण को बाधित करता है। इसको वायु में मिलने से रोकने के लिए इलेक्ट्रोस्टेटिक अवक्षेपण या अन्य कण निस्यंदन उपकरणों का प्रयोग किया जाता है।

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  • उल्लेखनीय है कि सिगरेट का धुआं रसायनों का एक जटिल मिश्रण है। इसके धुएं मे कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रजोन साइनाइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे गैसें पाई जाती हैं। साथ ही फार्मेल्डिहाइड, एक्रोलीन तथा बेंजीन जैसे स्थायी रसायन भी इसमें पाएं जाते हैं। निकोटीन भी सिगरेट के धुएं में पाया जाता है लेकिन इसकी मात्रा बहुत कम होती है। यह अत्यंत हानिकारक व कैंसर कारक होता है। इससे आंख, नाक, गले में जलन, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा व कैंसर जैसे खतरनाक रोगों का जन्म होता है।

  • ध्यातव्य है कि भारत में अब सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करना निषिध्द कर दिया गया है

  • दिल्ली में जाड़े में ऋतु में वायु प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ जाता है क्योंकि ठंडी वायु भारी होती है इसलिए बहुत ऊंचाई तक नहीं उठती है और धरातल के कुछ ऊंचाई पर धूल, गैस आदि की एक परत बन जाती है। जाड़े की ऋतु में गाड़ियों की दहन प्रक्रिया घट जाता है।

  • ध्यातव्य है कि वाहनों के नए उत्सर्जक प्रतिमान लागू करने के लिए गठित भूरेलाल कमेटी ने कई अनुशंसाएं दी हैं। जिसमें केन्द्र व राज्य सरकारों को यह सुझाव दिया गया है कि वे पाक्षिक तौर पर नियमित प्रदूषण नियंत्रण अभियान चलाएं और अत्यधिक धुआं उगलने वाले वाहनों की पहचान करे। इसके साथ ही केन्द्रीय परिवहन  मंत्रालय देश भर के लिए एक केन्द्रीय सॉफ्टवेयर विकसित करे ताकि पूर देश में प्रदूषण का स्तर समान हो सके। कमेटी ने यह भी सुझाव दिया कि अत्यधिक धुआं उगलने वाले व्यवसायिक वाहनों के लाइसेंस रद्द करते वक्त प्राइवेट वाहनों पर भी कार्यवाही की जाए।

  • उल्लेखनीय है कि एशियाई भूरा बादल 2002 अधिकांशतः दक्षिण एशिया में फैला था। यह वस्तुतः प्रदूषण के कारण था। वर्ष 2007 में भी इसकी रिपोर्ट आई थी। एशियाई ब्राउन क्लाउड या एशियाई भूरा बादल वायु प्रदूषण के कारण उत्पन्न होता है। इस घटना में वायु प्रदूषण से जनित भूरे बादलों  एक परत बन जाती है, जो प्रत्येक वर्ष जनवरी से मार्च के महीनों के दौरान मुख्यतया दक्षिण एशियाई क्षेत्र पर आच्छादित रहती है। वर्ष 2008 में इसकी दूसरी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के हवाले से बताया गया कि ब्राउन क्लाउड के हॉटस्पॉट एशिया के साथ-साथ दक्षिण अमेरिका तथा अमेजन बेसिन में भी है। इस भूरे बादल में लगभग 85 प्रतिशत एरोसॉल है। इस बादल में सल्फेट, काला कार्बन व कई घातक रसायन हैं। ये विषाक्तता को बढ़ाकर श्वास संबंधी बीमारियों को उत्पन्न करते हैं। उल्लेखनीय हैं कि चीन व भारत के  सौर विकिरण में परिवर्तन, सतही एवं वातावरणीय तापमान में परिवर्तन तथा मानसूनी वर्षा के पैटर्न मे भारी परिवर्तनों का कारण भूरा बादल भी है।

  • कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों से विद्युत उत्पादन के फलस्वरुप उपोत्पाद के रुप में फ्लाई ऐश प्राप्त होता है। फ्लाई ऐश में पाए जाने वाले मुख्य खनिज यौगिक सिलिकॉन डाइऑक्साइड (SiO2), एल्युमीनियम ऑक्साइड (Al2O3) तथा कैल्शियम ऑक्साइड (CaO) हैं। इसमे कुछ मात्रा में विषाक्त तत्व भी पाए जाते हैं। फ्लाई ऐश का उपयोग ईंटों के उत्पादन में तथा कंक्रीट उत्पादन में पोर्टलैंड सीमेंट के स्थानापन्न के रुप में किया जाता है। फ्लाई ऐश सूक्ष्म पाउडर होता है। यह वायु के साथ दूर तक यात्रा करता है। इसमें सीमा, आर्सेनिक, कॉपर जैसी भारी धातुओं के कण भी होते हैं।

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फ्लाई  ऐश से लाभ –

  • भूमि भराव व खानों के भराव में प्रयोग

  • खेतों में छिड़काव से मृदा की जल ग्रहण क्षमता में बढ़ोत्तरी

  • फ्लाई ऐश से निर्मित ईंटे वजन में हल्की एवं सीमेंट की अपेक्षा अधिक मजबूत

  • फसलों की पैदावार अधिक

हानियां फ्लाई ऐश से –

  • श्वसन तंत्र के रोग

  • वायु की गुणवत्ता में कमी

  • पौधो की पत्तियों पर जमा होकर प्रकाश संश्लेषण में बाधा

  • इसकी रोकथाम हेतु सामान्यतया इलेक्ट्रोस्टेटिक अवक्षेपक का उपयोग किया जाता है।

  • ध्यातव्य है कि गैसीय व कणकीय पदार्थों द्वारा होने वाले वायु प्रदूषण को रोकने के लिए कई प्रकार के यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। कारखानों की चिमनियों से निस्सृत धुएं तथा कालिख के साथ मिश्रित कणकीय पदार्थों को अलग करने के लिए प्रयोग किए जाने वाले विशिष्ट को बैग फिल्टर कहते हैं।

  • 50 माइक्रोमीटर से कम व्यास वाले कणकीय पदार्थों को पृथक करने के लिए बैग फिल्टर का प्रयोग किया जाता है। जबकि 50 माइक्रोमीटर से बड़े आकार वाले कणकीय पदार्थों को फिल्टर करने हेतु साइक्लोन सेपरेटर या साइक्लोन कलेक्टर तथा वेट स्क्रबर नामक उपकरणों का उपयोग किया जाता है । जबकि साइक्लोन डिवाइडर वायु प्रदूषण की रोकथाम की यंत्रीय विधि नहीं है।                

  • साइक्लोन सेपरेटर में धुएं का साइक्लोन या चक्रवात की तरह मंथन कराया जाता है। इसके फलस्वरुप ठोंस कणकीय पदार्थ भारी होने के कारण नीचे आ जाते हैं। कणकीय पदार्थों से मुक्त गैस सिलेंडर के ऊपरी भाग में लगे हुए निकास से वायुमंडल में विसर्जित हो जाती है। 

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  • इस प्रकार वायु प्रदूषण की रोकथाम में साइक्लोन सेपरेटर का प्रयोग किया जाता है।

  • उल्लेखनीय है कि नाइट्रीकरण करने वाली जीवाणु, भूमि की स्वतंत्र नाइट्रोजन को नाइट्रेट में परिवर्तित कर देते हैं। इस पौधे जड़ों द्वारा खाद के रुप में ग्रहण करते हैं। इसके बदले पौधे इन जीवाणुओं को भोजन एवं रहने के लिए स्तान देते हैं। इस प्रकार सहजीविता का प्रभाव पौधों एवं वातावरण पर पड़ता है। वायु प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव लाइकेन पर पड़ता है, क्योंकि ये बड़े  संवेदनशील होते हैं, जो कि प्रदूषण के जैविक सूचक का कार्य करता है। लाइकेन पेड़ों की छालों पर उगे हुए होते हैं।  लाइकेन का निर्माण शैवाल तथा कवक के द्वारा होता है।  लाइकेन्स निम्न श्रेणी की ऐसी छोट वनस्पतियों का एक समूह है, जो विभिन्न प्रकार के आधारों पर उगे हुए पाए जाते हैं। यह वायु प्रदूषण के प्रति संवेदी हैं इसीलिए यह नगरों के समीप नहीं पाए जाते हैं।

  • अंकलेश्वर भारत का सर्वाधिक प्रदूषित नगर है। इसका प्रदूषण स्कोर 88.5/100 है। वापी दूसरी सर्वाधिक प्रदूषित नगर है। इसका प्रदूषण स्कोर 88.09/100 है। परंतु जून, 2016 के आंकड़ों के अनुसार, वापी (गुजरात) सर्वाधिक प्रदूषित शहर बन चुका है।  इसका CEPI (Comprehensive Environment Pollution Index) स्कोर 85.31 है, जबकि गाजियाबाद का स्कोर 84.13 है। यह दूसरा सर्वाधिक प्रदूषित नगर है।

  • उल्लेखनीय है कि विभिन्न देशों की भांति भारत में भी वायु गुणता सूचकांक (Air Quality Index) आठ मुख्य प्रदूषकों के आधार पर बनाया जाता है।

  1. <10 माइक्रोमीटर आकार के कणिकायुक्त पदार्थ (Particulate Matter) या (PM10)

  2. <2.5 माइक्रोमीटर आकार के कणिकायुक्त पदार्थ (Particulate Matter) या (PM5)

  3. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2)

  4. कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)

  5. ओजोन (O3)

  6. सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)

  7. अमोनिया (NH3)

  8. लेड (Pb)

  • CO तथा O3 को आठ घंटे के औसत से मापा जाता है, जबकि अन्य सभी प्रदूषकों को 24 घंटे के औसत से मापा जाता है। मापन की इकाई NO2, O3 तथा कणिकायुक्त पदार्थ के लिए माइक्रोग्राम (CO के लिए मिलीग्राम) प्रति क्यूबिक मीटर होती है।

  • उल्लेखनीय है कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा मीथेन का ग्लोबल वार्मिंग स्तर के मापन में प्रयोग किया जाता है। ध्यातव्य है कि वायु गुणता सूचकांक की छः श्रेणियां निर्धारित की गई हैं –

सूचकांक

श्रेणी

प्रदर्शित रंग

प्रभाव

0-50

अच्छा (Good)

हरा

न्यूनतम प्रभाव

51-100

संतोषजनक (Satisfactory)

हल्का हरा

संवेदनशील लोगों को सामान्य श्वास संबंधी परेशानी

101-200

मध्यम प्रदूषित (Moderately Polluted)

गुलाबी

अस्थमा व हृदय रोग से पीड़ितों को परेशानी

201-300

खराब (Poor)

पीला

ज्यादा समय तक संपर्क से श्वास संबंधी

301-400

बहुत खराब (Very Poor)

लाल

लंबे समय तक संपर्क से श्वसन संबंधी रोग फेफड़, व  हृदय क  रोगियों पर गंभीर प्रभाव

401-500

गंभीर (Severe)

गहरा लाल

स्वस्थ लोगों में भी श्वसन संबंधी परेशानी, हल्की शारीरिक मेहनत पर भी स्वस्थ्य पर कुप्रभाव

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  • ध्यातव्य है कि शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को रोकने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 17 अक्टूबर, 2014 को राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक (National Air Quality  Index: NAQI) जारी किया गया था। यह सूचकांक शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का स्तर बताने के लिए एक संख्या-एक रंग-एक विवरण (One Number-One Colour-One Discription) के रुप में कार्य़ करता है। उल्लेखनीय है कि स्वच्छ भारत अभान के तहत इस पहल को आरंभ किया गया है।

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  • उल्लेखनीय है कि जलवायु एवं स्वच्छ वायु गठबंधन (Climate and Clean Air Coaltion:CCAC) विभिन्न देशों, नागरिक समाजों व निजी क्षेत्रों का एक वैश्विक प्रयास है, जो अल्पजीवी जलवायु प्रदूषकों को न्यूनीकृत कर वायु की गुणवत्ता को बेहतर बनाने हेतु प्रतिबध्द है। यह 53 देशों एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा निर्मित एक गठबंधन है। CCAC, मेथन, काला कार्बन एवं हाइड्रोफ्लुओरोकार्बनों पर मुख्यतया केन्द्रित करता है। यह गठबंधन अल्पजीवी जलवायु प्रदूषकों के प्रभावों के बारे में जागरुकता फैलाने के साथ-साथ, उनकी उपशमन रणनीति तथा क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर नई कार्यवाहियों को बढ़ावा देने का कार्य भी करता है। इसके साथ ही इस गठबंधन सहयोगी देश इस तथ्य को भी मान्यता देते हैं कि अल्पजीवी जलवायु प्रदूषकों का न्यूनीकरण कार्बन डाइऑक्साइड के न्यूनीकरण को वैश्विक प्रयासों में पूरक एवं अनुपूरक का कार्य करने में भी सक्षम हो।

  • वाहनों से उत्सर्जित NOx, CO तथा HCs को गैर-हानिप्रद यौगिकों में परिवर्तित करने के लिए उत्प्रेरकी परिवर्तक नामक उपकरण का प्रयोग किया जाता है। इसमे एक उत्प्रेरक (प्लेटिनम या पैलेडियम अथवा दोनों) पर से उत्सर्जित गैस को प्रवाहित किया जाता है जिससे उसमें उपस्थित गैसीय मिश्रण CO से CO2, NOx से N2 और HCs से CO2 एवं जल में परिवर्तित हो जाता है।                   Pd

2CO+O2®2CO2+O2

  • जीवाश्म ईंधन के ज्वलन से उत्पन्न होने वाली वायु प्रदूषक गैस सल्फर डाइऑक्साइड है। सल्फर डाइऑक्साइड वायु प्रदूषक है तथापि वातावरण में जल से प्रतिक्रिया करके वर्षा जल में सल्फ्यूरिक एसिड के मिश्रण का कारण यह हो सकता है।

  • घरेलू गतिविधियों के कारण उत्पन्न होने वाले वायु प्रदूषण को घरेलू वायु प्रदूषण कहा जाता है।

  • इनडोर वायु प्रदूषण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रदूषक रेडान गैस है। रेडान एक रंगहीन, गंधहीन रेडियोएक्टिव अक्रिय गैस है। रेडान गैस रेडियम से उत्सर्जित होती है। रेडान गैस से फेफड़े का कैंसर (Lung Cancer) तथा रक्त कैंसर होने की संभावना होती है। ध्यातव्य है कि रेडान गैस मृदा से प्राकृतिक रुप में निकलती है। शहरों मे वातायन की कमी के कारण घरों में इकठ्ठा होकर यह गैस फेफड़ों के कैंसर को जन्म  देती है। WHO के अनुसार, प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मृत्यु घरेलू वायु प्रदूषण के कारण होती है।

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अम्ल वर्षा

  • जब वर्षा के जल में अम्लों की मात्रा बढ़ जाती है, तो इसे अम्ल वर्षा के नाम से जाना जाता है। सामान्यतया ऐसी वर्षा जिसका Ph मान 5-6 से कम हो, अम्ल वर्षा कहलाती है।

  • उल्लेखनीय है कि शुध्द जल का Ph मान 7.0 होता है। वर्षा का जल भी पूर्णतया शुध्द नही होता है क्योंकि वायुमंडल में उपस्थित CO2 वर्षा के जल में घुलकर कार्बोनिक अम्ल (H2CO3) का निर्माण करती है। यह कार्बोनिक अम्ल वर्षा के जल को थोड़ा अम्लीय बना  देता है। वातावरणीय प्रदूषण, औद्योगिक निःसृतों एवं प्रकृति में होने वाली विभिन्न क्रियाओं के फलस्वरुप उत्पन्न सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रस ऑक्साइड गैसे वायुमंडल में पहुंचकर, ऑक्सीजन और बादल के जल के साथ रासायनिक अभिक्रिया कर क्रमशः सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल बनाकर वर्षा के साथ पृथ्वी पर गिरती हैं। इससे अम्ल का जमाव पृथ्वी पर होता है। यह दो प्रकार का होता है –

  1. आर्द्र जमाव – आर्द्र मौसम – वर्षा, कुहरा या बर्फ के द्वारा

  2. शुष्क जमाव – शुष्क मौसम – वायु द्वारा बहाकर लाए गए कणों द्वारा ,  अम्लीय गैसों द्वारा

  • ध्यातव्य है कि अम्लीयता का लगभग आधा हिस्सा वायुमंडल से पृथ्वी पर स्थानांतरित होकर शुष्क रुप में ही जमा होता है। उल्लेखनीय है कि मरुस्थलीय क्षेत्र मे शुष्क से आर्द्र निक्षेप का अनुपात उच्च रहता है क्योंकि वहां पर शुष्क जमाव ज्यादा होता है।

  • अम्लीय वर्षा, अम्लीय कोहरे और अम्लीय धुंध को सम्मिलित रुपि से अम्ल निक्षेप कहा जाता है। अम्लीय वर्षा से सभी प्रकार के जीवों, वनस्पतियों, मृदा, कृषि, तालाब, झीलों व नदियों के साथ-साथ, इमारतों, स्मारकों एवं अन्य आधारभूत संरचनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

  • अम्ल वर्षा वह परिस्थिति है जिसमें वायु में उपस्थित प्रदूषणकारी रसायनों की प्रतिक्रिया से प्राकृतिक वर्षा का जल अम्लीय हो जाता है। वर्षा के जल को अम्लीय बनाने के लिए मुख्यतः सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) तथा नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) उत्तरदायी है।

  • उल्लेखनीय है कि SO2 गैस विभिन्न स्रोतों से उत्सर्जित होकर, वायुमंडल में नमी को सोखने के बाद सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) का निर्माण करती है। यही वर्षा की बूंदों के साथ मिलकर अम्ल वर्षा का निर्माण करती है। इसके कारण भवनों की ईंट से परत-दर-परत लाल पाउडर जैसा निकलता है।

  • ध्यातव्य है कि SO2 को क्रैकिंग गैस भी कहते हैं, क्योंकि यदि लगातार यह पत्थर पर प्रवाहित की जाए, तो पत्थर क्षत-विक्षत हो जाता है। मथुरा तेलशोधक कारखाने से निकलने वाली SO2 ही आगरा के ताजमहल की तबाही का कारण बनी हुई थी।

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  • ध्यातव्य है कि वातावरणीय प्रदूषण, औद्योगिक निःसृतों एवं प्रकृति में होने वाली विभिन्न क्रियाओं के फलस्वरुप उत्पन्न सल्फर डाइऑक्साइड तथा नाइट्रस ऑक्साइड गैसें वायुमंडल में पहुंचकर ऑक्सीजन और बादल के जल के साथ रासायनिक अभिक्रिया कर क्रमशः सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल बना कर वर्षा के साथ पृथ्वी पर गिरती हैं। इसे अम्लीय वर्षा (Acid Rain) कहते हैं। पृथ्वी पर गिर के मृदा से संपर्क कर अम्ल वर्षा मृदा को अभूतपूर्व क्षति पहुंचाती है। अधिक अम्लता के कारण अम्ल वर्षा के हाइड्रोजन आयन एवं मृदा के पोषक धनायन (यथा K+ एवं mg++) के बीच आदान-प्रदान होता है। इसके फलस्वरुप पोषक तत्वों का निक्षालन हो जाती है एवं मृदा की उर्वरता समाप्त हो जाती है।

  • उद्योगों एवं यातायात के उपकरणों से निस्सृत कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) तथा सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) जैसी गैसें वायुमंडल में स्थित जलवाष्प से प्रतिक्रिया करके सल्फ्यूरिक तथा नाइट्रिक अम्ल बनाती हैं और ओस अथवा वर्षा की बूंदो के रुप में पृथ्वी पर गिरने लगती हैं। यही अम्ल वर्षा पृथ्वी के समस्त प्राणी समुदायों के लिए काफी घातक सिध्द होती है। ये स्कैंडिनेवियाई तथा खाड़ी देशों में अक्सर देखने को मिलती है। अम्ल वर्षा के लिए उत्तरदायी गैसों के स्रोत निम्न हैं –

अम्लीय गैस

प्राकृतिक स्रोत

मानव  निर्मित स्रोत

नाइट्रोजन (N2) एवं उसके ऑक्साइड

ज्वालामुखी  उद्गार आकाशीय विद्युत जैविक गतिविधियां

तेल, कोयला व गैस का दहन वनाग्नि

सल्फर (S) एवं उसके ऑक्साइड

ज्वालामुखी उद्गार सागर प्लैंकटन व वनस्पतियों के सड़ने से

कोयले का जलना पेट्रोलियम पदार्थ कच्चे तेल के परिशोधन से रासायनिक व उर्वरक उद्योग से

कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2)

श्वसन अपघटन सागर

वनोन्मूलन औद्योगिक प्रक्रियाओं द्वारा जीवाश्म ईंधन के जलने से

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  • ध्यातव्य है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हेलसिंकी प्रोटोकॉल (1985) के तहत सल्फर के उत्सर्जन में कमी का प्रयास किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त द्वीपक्षीय व बहुपक्षीय स्तर पर कई देशो के द्वारा प्रयास किए जा रहे हैं।

  • उल्लेखनीय है कि मथुरा की तेलशोधनशालाओं से उत्सर्जित SO2 से उत्पन्न अम्ल वर्षा, ताजमहल के सौंदर्य को क्षति पहुंचा रही है। ताजमहल पर अम्ल वर्षा से जनित हानिकारक प्रभाव रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा ताज ट्रोपिजियम (Taz Trapezium) जोन विकसित किया गया है। इसके तहत स्मारक के चारों तरफ उत्सर्जन मानकों का कड़ाई से पालन किया जा रहा है।

  • सल्फर डाइऑक्साइड व नाइट्रोजन ऑक्साइड अम्ल वर्षा के निर्माण के मुख्य कारक होते हैं। अम्ल वर्षा, वर्षा जल एवं हिम को प्रदूषित करती है। इस कारण से झीलों, नदियों, तालाबों आदि पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

अम्ल वर्षा के जलीय तंत्र पर हानिकारक प्रभाव

  • मे फ्लाई (May Fly) की मृत्यु – मेंढकों को भोजन का अभाव

  • जीवों में ब्लैक फुट बीमारा

  • मछलियों की मृत्यु

  • अम्ल के अणुओं द्वारा मछलियों के गिल के ऊपर Mucus का निर्माण – O2 के अवशोषण मे बाधा

  • कई मछलियों के अंडो का हैच (अंडे से बच्चे का निकलना) ना हो पाना

  • पीने के पानी एवं भोजन के माध्यम से भोजन विषाक्तता

  • निम्न pH की वजह से ऊतकों का लवण संतुलन समाप्त

  • शंकुधारी वृक्षों के घने कैनौपी में अम्ल वर्षा का निक्षेप पत्तियों के भूरे रंग के लिए उत्तरदायी होता है। इससे पेड़ों की वृध्दि रुक जाती है। पौधे मौसम, कीड़ों व बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। ध्यातव्य है कि मृदा के pH का मान अम्ल वर्षा से कम हो जाता है। हम जानते हैं कि किसी खास वातावरण में किसी सूक्ष्मजीव की जातियों का प्रसार व उत्पादन दर वहां के pH मान पर निर्भर करती है। अतः अम्ल वर्षा का प्रभाव सूक्ष्मजीवों पर भी पड़ता है। इसके अलावा अम्ल वर्षा जहरैली धातुओं को उनके प्राकृतिक रासायनिक यौगिकों से टूटने में मदद करती है। ये धातु पीने योग्य जल एवं मृदा में प्रवेश कर बच्चों के तांत्रिका तंत्र पर दुष्प्रभाव डालते हैं। इनसे गंभीर मस्तिष्कीय क्षति एवं मृत्यु तक होने की संभावना रहती है।

  • अम्ल वर्षा से क्षतिग्रस्त देश कनाडा और नॉर्वे है। ध्यातव्य है कि जर्मनी तथा यूनाइटेड किंगडम में स्थित मिलों से उत्सर्जित SO2 तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड के कारण नॉर्वे तथा स्वीडन में अधिक अम्ल वर्षा होती है। नॉर्वे अम्ल वर्षा से काफी प्रभावित देश है। इसके दक्षिणी आधे भाग पर व्यापक अम्लीय वर्षा होती है, जिसके कारण से यहां की झीलों नदियों का अधिकांश जल अम्लीय हो चुका है। इस अम्ल वर्षा के कारण यहां की झीलें अब जैविकीय दृष्टि से मृत हो रही हैं। इन्हीं वजहों से अम्ल वर्षा को  झील कातिल (Lake Killer) भी कहा जाता है।

  • कनाडा व अन्य स्कैंडिनेवियाई देशों में भी अम्ल वर्षा होती है, जो वहां काफी नुकसान पहुचाती हैं। उल्लेखनीय हैं कि USA एवं कनाडा के मध्य वायु गुणवत्ता समझौता भी किया गया है। वर्तमान समय में भारत में अम्ल वर्षा की समस्या विकराल नहीं है। BARC (Bhaba Atomic Research Center), WMO (World Meterological Organization) द्वारा किए गए अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि की है कि अधिकांश भारतीय नगरों में वर्षा के जल में अम्लता का स्तर अभी सुरक्षा सीमा से कम ही है।

  • ध्यातव्य है कि अंतरराष्ट्रीय अम्ल वर्षा सूचना केन्द्र (International Acid Rain Information Centre) इंग्लैंड के मैनचेस्टर में स्थापित किया गया है।

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जल प्रदूषण

  • जल में प्रदूषण एक व्यापक समस्या है। नाना प्रकार के प्रदूषकों से जल में प्रदूषण फैलता है। यहां तक कि जल में पोषत तत्वों की अधिकता भी जीवों के ऊपर प्रभाव डालती है। जल में जब जैविक तथा अजैविक दोनों प्रकार के पोषत तत्वों की वृध्दि हो जाती है, तो इस घटना को सुपोषण कहते हैं।

  • अपशिष्ट जलों के बहाव के साथ कार्बनिक पोषक तत्वों के आने के अलावा, कार्बनिक अपशिष्टों का जमाव भी जलाशयों की पोषक मात्रा को बढ़ा देता है। अत्यधिक पोषकों की उपस्थिति में शैवालों का विकास तेजी से होने लगता है। इसे शैवाल ब्लूम (Algi Bloom) कहते हैं।

  • इस तरह का शैवाल ब्लूम, जिसमें मुख्यतया ब्लू-ग्रीन शैवाल की अधिकता रहती है, पूरी जल सतह पर आच्छादित हो जाता है। शैवाल के साथ-साथ जलीय पौधों की संख्या में वृध्दि हो जाती है। शैवाल व जलीये पौधे श्वसन क्रिया के लिए जल के अधिकांश ऑक्सीजन को अपने उपयोग में लेते हैं। साथ ही ये जहर (Toxin) भी जलाशय में निष्कासित करते रहते हैं। जलाशय में जलीय जंतु O2 के अभाव में मरने लगते हैं। इस प्रकार सुपोषण के कारण भी जैव प्रजातियों की विविधता नष्ट होना आरंभ हो जाती है। अतः पोषण की अत्यधिक वृध्दि के फलस्वरुप भी जैव प्रजातियों का नाश होने लगता है।   

  • अतः यूट्रोफिकेशन जल प्रदूषण से संबंधित है। जल में अप्राकृतिक रुप से नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा बढ़ना ही यूट्रोफिकेशन है। इससे जल की गुणवत्ता में कमी आने के साथ ही ऑक्सीजन की मात्र भी कम हो जाती है।

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  • बीओडी (BOD): Biological Oxygen Demand) जल प्रदूषण मापने की मुख्य इकाई है। कार्बनिक एवं अकार्बनिक अपशिष्ट अपघटित होने के लिए जल निकायों में घुलनशील ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं, जिससे जल में घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है। घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा घटने से उसकी मांग बढ़ जाती है। बीओडी का अधिक होना, जल के संक्रमित होने का दर्शाता है। ध्यातव्य है कि कार्बनिक अपशिष्ट (जैसे- सीवेज) की मात्रा बढ़ने से अपघटन की दर बढ़ जाती है तथा O2 का उपयोग भी इसी के साथ-साथ बढ़ जाता है। इसके फलस्वरुप घुली ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen-DO) की मात्रा घट जाती है। अतः O2 की मांग का बढते अपशिष्ट की मात्रा से सीधा संबंध है। इसी मांग को जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (Biological Oxygen Demand: BOD) कहते हैं। BOD ऑक्सीजन का मापक है। अतः जहां उच्च BOD वहां निम्न DO होगा।

BOD a 1/DO

  • ध्यातव्य है कि मात्र कुछ ही सहनशील प्रजातियों के जीव जैसे ऐनेलीड तथा कुछ कीटों के डिंब ही बहुत अधिक प्रदूषित तथा कम DO वाले जल में जीवित रह सकते हैं। इनको प्रदूषक जल की सूचक प्रजातियों के रुप में पहचाना जाता है। उल्लेखनीय है कि जिस जलाशय के DO का मान 8.0 mhL-1 से नीचे हो जाता है। उसे संक्रमित जल की श्रेणी में रखा जाता है जब यह मात्रा 4.0 mgL-1 से कम हो जाती है, तो इसे अत्यधिक प्रदूषित जल कहा जाता है।

  • गंगा नदी में बी.ओ.डी. की सर्वाधिक मात्र कानपुर एवं इलाहाबाद के मध्य पाया जाता है। वस्तुतः कानपुर से गंगा नदी में भारी मात्रा में प्रदूषित पदार्थ डाले जाने के कारण यहां बी.ओ.डी. अधिक होता है।

  • भूमिगत जल को प्रदूषित करने वाला अजैविक प्रदूषक आर्सेनिक है। यौगिक अवस्था में आर्सेनिक पृथ्वी पर अनेक स्थानों मे पाया जाता है। यह ज्वालामुखी के वाष्पों में, समुद्र के जल तथा अनेक खनिजी जलो में मिश्रित रहता है। भारत में कई जगहों पर भूमिगत आर्सेनिक से संक्रमित होते हैं। यह संक्रमण मुख्यतया प्रकृति में पाए जाने वाले बेडरॉक (Bed Rock) से उत्पन्न आर्सेनिक से होता है। भूमिगत जल के अत्यधिक उपयोग से भूमि तथा चट्टानों से स्रोतों से आर्सेनिक का निक्षालन शुरु होने की संभावना बढ़ जाती है। आर्सेनिक के लगातार संपर्क से ब्लैक फुट नामक बीमारी हो जाती है।

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आर्सेनिक से उत्पन्न बीमारियां

  • त्वचा कैंसर

  • ब्लैक फुट

  • डायरिया

  • फेफड़े का कैंसर

  • पेरिफेरल न्यूरीटिस

  • हाइपर केराटोसिस

  • ध्यातव्य है कि गंगा नदी के तटीय क्षेत्रों के भूमिगत जल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा पाई जाती है। उल्लेखनीय है कि आर्सेनिक रासायनिक कीटनाशकों व खर-पतवार नाशियों के छिड़काव के द्वारा भी पारिस्थितिकी तंत्र में समा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक के अनुसार, आर्सेनिक की मात्रा 0.05 मिग्रा./लीटर ही होनी चाहिए।

  • उल्लेखनीय है कि धान का पौधा आर्सेनिक का बेहतर अवशोषक माना जाता है। यह भूजल के जरिए यह अनाज में पहुंच रहा है। इससे समूची खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो रही है।

  • भारत के गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों तथा बांग्लादेश के पद्मा-मेघना के मैदानी इलाकों में भूमिगत जल आर्सेनिक प्रदूषण से अत्यधिक ग्रस्त है।

  • भारत के सात राज्यों – पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, मणिपुर तथा छत्तीसगढ़ का राजनंदगांव में भूमिगत जल आर्सेनिक प्रदूषण से अत्यधिक प्रभावित है। भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1983 में पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक द्वारा जल-प्रदूषण का मामला सामने आया था।

  • दामोदर नदी झारखंड के खमार पाट से निकलकर हुगली में मिलती है। कोयना खदान और औद्योगिक क्षेत्रों से प्रवाहित होने के कारण यह देश की अति प्रदूषित नदी बन गई है। गिरिडीह और दुर्गापुर के मध्य के 300 किमी. लंबे मार्ग मे तो यह जैविक मरुस्थल होकर रह गई है।

  • औद्योगिक मलबे से सर्वाधिक रासायनिक प्रदूषण चमड़ा उद्योग से होता है। जल प्रदूषण तथा मृदा प्रदूषण के लिए प्रमुख रुप से यही उद्योग उत्तरदायी है।

  • देश में मणिपुर, त्रिपुरा, ओड़िशा, मेघालय, झारखंड और मध्य प्रदेश मे पेयजल की गुणवत्ता का स्तर अत्यधिक चिंताजनक है। भारत की 85 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या भूजल पर निर्भर है। शेष 15 प्रतिशत जनसंख्या खुले कुओं या जल के खुले स्रोतों से पेयजल प्राप्त करती है। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और यूरेनियम जैसे जानलेवा रसायन मिले होते हैं।

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  • ध्यातव्य है कि नॉक-नी संलक्षण फ्लुओराइड के प्रदूषण के द्वारा उत्पन्न होता है।

  • यद्यपि फ्लुओराइड तत्व पानी में अल्प मात्रा में उपलब्ध होता है, जो मसूड़ों और दांतों को संरक्षण प्रदान करता है परंतु इसका अत्यधिक सांद्रण फ्लुओरोसिस नामक रोग का कारण बनता है। अत्यधिक फ्लुओराइड को ग्रहण करने के परिणामस्वरुप कूबड़पीठ होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके लगातार उपभोग से हड्डियों के जोड़ विशेषकर मेरुरज्जु में कमजोरी आती है। उच्च फ्लुओराइड संग्रहण ही पैरों के मुड़ने का कारण होता है जिसे नॉक-नी संलक्षण कहते हैं।

  • ध्यातव्य है कि दिल्ली भारत में सर्वाधिक ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करने वाला महानगर है।  फिक्की द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, दिल्ली प्रतिदिन लगभग 7000 मीट्रिक टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है, जबकि मुंबई द्वारा प्रतिदिन लगभग 6500 मीट्रिक टन ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है।

  • उल्लेखनीय है कि जैव शौचालय प्रणाली में अवायवीय जीवाणु अपशिष्ट पदार्थों को विखंडित कर उसे पानी और गैस (मीथेन) में परिवर्तित कर देता है। पानी को टैंक में जमा कर उसे क्लोरीन की मदद से साफ कर दिया जाता है, जबकि गैस वाष्पीकृत हो जाती है।

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समुद्री प्रदूषण

  • समुद्र में बढ़ रहा प्रदूषण चिंता का विषय है। ध्यातव्य है कि CO2 के लिए समुद्र एक भंडार गृह की तरह कार्य करता है मानवजनित क्रिया-कलापों से उत्पादित एक-तिहाई CO2 को अवशोषित कर, जलवायु परिवर्तन हेतु यह बफर जोन की तरह कार्य करता है।

  • अनुसंधानों में यह बात सामने आई है कि समुद्र द्वारा बड़ी मात्रा में CO2 को अवशोषित करना वहां के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहा है। समुद्री अम्लीयता में यह बढ़ोत्तरी प्रवाल विरंजन की घटना के लिए उत्तरदायी है। महासागरों में बढ़ते अम्लीयता के कारण कैल्शियमी पादपप्लवक की वृध्दि उत्तरजीविता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसी प्रकार का प्रभाव भित्ति एवं डिम्भक पापदप्लवक वाले प्राणियों पर पड़ेगा।

  • भारत के समुद्री जल में हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन में वृध्दि के प्रमुख कारकों में ज्वारनदमुख से पोषकों का प्रस्त्राव, मानसून में भूमि में जलप्रवाह तथा समुद्रों में उत्प्रवाह शामिल हैं। ध्यातव्य है कि नदियों एवं वर्षा द्वारा लाया गया सीवेज, कृषि अपशिष्ट कीटनाशक एवं उर्वरक, भारी धातुएं, प्लास्टिक आदि समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्र को हानि पहुंचाते हैं। इससे नाइट्रोजन की मात्रा में वृध्दि होती है। नाइट्रोजन की अधिक मात्रा शैवालों की तीव्र वृध्दि को प्रेरित करती है।

  • उल्लेखनीय है कि वर्ष 1948 में जेनेवा के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय समुद्रीय संगठन का औपचारिक रुप  से गठन किया गया जिसका उस समय वास्तविक नाम अंतर-सरकारी समुद्री सलाहकार संगठन (Inter- Governmental Maritime Consultative Organization- IMCO) था लेकिन वर्ष 1982 में इस संगठन का नाम बदलकर अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (International Maritime  Organization-IMO) कर दिया गया। अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन का मुख्यालय लंदन (ब्रिटेन) मे है। यह संयुक्त राष्ट्र संघ की विशेष एजेंसी है जिस पर अंतरराष्ट्रीय नौवहन के सुरक्षा सुधार संबंधी उपाय करने और पोतों से होने वाले समुद्री प्रदूषण की रोकथाम की जिम्मेदारी है। यह संस्था उत्तरदायित्व और मुआवजा से संबंधित वैधानिक मामलों को देखने के अलावा अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात को सुविधाजनक बनाने का कार्य करती है।

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ध्वनि प्रदूषण

  • किसी वस्तु से उत्पन्न सामान्य आवाज को ध्वनि कहते हैं। जब ध्वनि की तीव्रता अधिक हो जाती है, तो उसे शोर कहते हैं। तेज ध्वनि को वातावरण में इसके विपरीत प्रभाव का अनुमान लगाए बगैर उत्पन्न करने को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं।

  • यह अवांछित ध्वनि मानव वर्ग में अशांति व बेचैनी उत्पन्न करती है। ध्वनि की इकाई डेसीबल (Db) है। इसे यह नाम एलेक्जेंडर ग्राह्य बेल के काम को सराहने की दृष्टि से दिया गया है।

  • अनियोजित औद्योगिक विकास, अत्यधिक मोटर वाहनों का प्रयोग तथा यांत्रिक दोषयुक्त विभिन्न प्रकार के वाहनों का परिचालन ध्वनि प्रदूषण करने मे महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। जेट एयरक्राफ्ट के उतरने या उड़ान भरने के समय बहुत अधिक ध्वनि प्रदूषण होता है।

 

 

 

ध्वनि स्रोत

ध्वनि (डेसीबल में)

पत्तियों की सरसराहट

20 Db

फुसफुसाहट

30 db

कमरे/शांत कार्यालय की ध्वनि

40 db

सामान्य बातचीत के समय की ध्वनि

60 db

ट्रक की आवाज

80-85 db

जेट इंजन की आवाज

120 db

जेट प्लेन का उतरना

150 db

रॉकेट इंजन

180 db

 

  • ध्यातव्य है कि ध्वनि की गति से तेज चलने वाले जेट विमानों से उत्पन्न शोर को सोनिक बूम (Sonic Boom) कहते हैं। सोनिक बूम को मैक इकाई (Mach Unit) में व्यक्त किया जाता है। उल्लेखनीय है कि जो वस्तुएं ध्वनि की रफ्तार से चलती हैं, उनसे उत्पन्न शोर को मैक-1 कहते हैं। यदि यह रफ्तार ध्वनि की रफ्तार की दोगुनी होती है, तो इसे मैक-2 कहा जाता है।

  • विशालकाय हरे पौधे अधिक ध्वनि प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रोपित किए जाते हैं क्योंकि उनमें ध्वनि तरंगों को अवशोषित करने की क्षमता होती है। ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले ये हरे पौधे ग्रीन मफ्लर कहलाते हैं।

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मृदा प्रदूषण

  • उर्वरक का अत्यधिक प्रयोग विभिन्न प्रकार के प्रदूषण उत्पन्न करता है। जिनमें मृदा प्रदूषण, जल प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण प्रमुख हैं। यह प्रदूषण विभिन्न प्रकार के फसलों के माध्यम से मानव एवं पशुओं के आहार श्रृंखला में भी पहुचता है तथा विभिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियों से मनुष्य एवं पशुओं को ग्रस्त करता है।

  • अत्यधिक अकार्बनिक उर्वरकों तथा जैवनाशकों के अवशेष, भूमि एवं भूमिगत जल संसाधनों को हानि पहुंचाते हैं। अकार्बनिक पोषक जैसे फॉस्फेट तथा नाइट्रेट घुलकर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में आ जाते हैं। यह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में सुपोषण को बढ़ाते हैं। नाइट्रेट पेयजल को भी प्रदूषित करता है। वहीं दूसरी ओर अकार्बनिक उर्वरक तथा कीटनाशक अवशेष मृदा के रासायनिक गुणों को बदल देते हैं तथा भूमि के जीवों पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

  • उर्वरक, पीड़कनाशी, कीटनाशी और शाकनाशी मृदा के प्राकृतिक, भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों को नष्ट करके मृदा को बेकार कर देते हैं। रासायनिक उर्वरक मृदा के सूक्ष्म जीवों को नष्ट कर देते हैं।

  • ये जीव मृदा में नाइट्रोजन परिवर्तन का कार्य करते हैं। उर्वरक अनुर्वरता में वृध्दि करते हैं तथा मृदा की जलधारण क्षमता को घटा देते हैं। इनके कुछ अंश फसलों में चले जाते हैं, जो मानव के लिए मंद विष का कार्य करते हैँ।

मृदा प्रदूषण के प्रभाव

  • वनो में कमी – ग्लोबल वार्मिंग

  • सूक्ष्म जीवों की मृत्यु – खाद्य श्रृंखला पर प्रभाव

  • मृदा अपरदन – बाढ़, सूखा

  • पेस्टिसाइड्स, खतरनाक रसायन द्वारा उर्वरता में ह्रास

  • मृदा अम्लीयकरण

  • मृदा क्षारीयकरण

  • जल प्रदूषण – लेड व आर्सेनिक से गंभीर बीमारियां

  • पादपों के अंदर प्रदूषकों का प्रवेश खाद्य श्रृंखला द्वारा – जीव-जंतुओं व मनुष्यों में प्रवेश

  • अतः मृदा प्रदूषण औद्योगीकरण प्रदूषण से भी अधिक खतरनाक होता है।

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प्लास्टिक प्रदूषण

  • पॉलीथीन मूलतः कार्बन एवं हाइड्रोजन के अणुओं के मिलने से बनता है।

  • यह एथिलीन C2H4 का पॉलीमर (बहुलक) होता है। पॉलीथीन में एथिलीन के अणु आपस में इस प्रकार जुड़े होते हैं कि उनका जैविक रुप से अपक्षय नहीं हो पाता है। यही कारण है कि प्लास्टिक की थैलियाँ उपयोग के बाद फेंके जाने पर स्वतः नष्ट नहीं होती और पर्यावरण प्रदूषण का कारण बनती हैं। इसकी खोज वर्ष 1953 में इटली के रसायनशास्त्री गिलियो नत्ता और कार्ल जिगलर (जर्मनी) ने की। इन्होंने सर्वप्रथम देखा कि कार्बन एवं हाइड्रोजन के कण आपस में एक  श्रृंखला बनाते हैं तथा एकल  बंध एवं द्वीबंध के रुप में स्थापित हो जाते हैं। इस खोज के लिए गिलियो नत्ता एवं कार्ल जिगलर को वर्ष 1963 में रसायन का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

  • प्लास्टिक के थैले के क्षय होने में अत्यधिक समय लगता है। प्लास्टिक का थैला एक थर्मोप्लास्टिक है जिसे एथिलीन के बहुलकीकरण से प्राप्त किया जाता है। यह अक्षयकारी प्रदूषक पदार्थ हैं, जो कि मृदा के साथ-साथ वातावरण को भी प्रदूषित करने का कार्य करते हैं।

  • प्लास्टिक, लोहा, सीसा इत्यादि पदार्थ अक्षयकारी प्रदूषक हैं, जो कि जीवाणुओं द्वारा नष्ट नहीं होते हैं या इनकी विघटन की क्रिया कम होती है। अतः वातावरण में ये एकत्र रहकर इसे प्रदूषित करते हैं।

 

 

रेडियोधर्मी व अन्य गैसीय प्रदूषण

  • 26 अप्रैल, 1986 को रुस में चेर्नोबिल (Chernobyl) स्थित परमाणु केंद्र में नाभिकीय दुर्घटना हुई थी। माननीय भूल के कारण घातक रेडियोधर्मी कण वातावरण मे प्रविष्ट हो गए थे जिसके कारण अनेक व्यक्ति हताहत हुए थे।

  • ध्यातव्य है कि विघटित होते रेडियोएक्टिव न्यूक्लाइड्स से उत्पन्न होने वाला विकिरण रेडियोएक्टिव प्रदूषण का स्रोत है। यह विकिरण जीवों के ऊतकों एवं अंगो को क्षति पहुंचाकर उनकी कार्यप्रणाली में बाधा उत्पन्न करते हैं। विकिरणों के प्रभाव से जीवों के आनुवांशिकी गुणों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

  • रेडियोधर्मी प्रदूषण सभी जीवित प्राणियों (मानव, पशु एवं पौधों) में आनुवांशिक परिवर्तन ला सकता है, रक्त संचार में व्यवधान पैदा करता है। तथा अनेक प्रकार के कैंसर भी उत्पन्न कर सकता है, तथापि यह मृदा में विद्यमान विभिन्न खनिजों को असंतुलित नहीं करता है।

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रेडियोएक्टिव प्रदूषण के प्रभाव

कायिक –

  • ऊतकों व अंगो को क्षति पहुंचाकर उनकी कार्य प्रणाली में बाधा उत्पन्न करना।

  • एनीमिया व रक्तस्त्राव आदि के कारण मृत्यु

आनुवंशिक –

  • ड्रोसोफिला पर अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि इससे उत्परिवर्तन दर में वृध्दि होती है।

  • आनुवंशिक गुणों पर व्यापक प्रभाव

  • भोपाल के यूनियन कार्बाइड  कीटनाशक संयंत्र के टैंक 610 में 2 दिसंबर, 1984 की रात 10 बजे जल प्रवेश कर गया जिसमें 42 टन मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस भरी थी। जल से रासायनिक क्रिया के बाद टैंक का तापमान 200 डिग्री सेंटीग्रेट हो गया। उच्च तापमान सहन क्षमता इतनी न होने के कारण गैस टॉवरों को खोलना पड़ा।

  • विषाक्त गैस हवा में घुलने लगी। 3 दिसंबर, की सुबह 2 बजकर 10 मिनट पर खतरे का सायरन बजाया गया और सुबह 4 बजे गैसो के रिसाव पर काबू पा लिया गया। राज्य सरकार के अनुसार, इस त्रासदी में 3787 लोग मारे गए और बाद में  गैस जनित  रोगो से लगभग 25 हजार लोग मारे गए।

  • मिथाइल आइसोसाइनेट (Methyl Isocyanate-MIC) CH3 NCO एक रंगहीन, आंसू उत्प्रेरक ज्वलनशील गैंसे हैं। यह गैस बहुत विषैली होती हैं। इस गैस का प्रयोग कार्बोनेट कीटनाशकों के उत्पादन में किया जाता है।

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जैव उपचार

  • सूक्ष्म जीवों के प्रयोग द्वारा पर्यावरण से विषैले प्रदूषक पदार्थों के निष्कासन की प्रक्रिया जैव-उपचारण (Bio-remediation) कहलाती है। इसके द्वारा किसी विशेष स्थान पर पर्यावरणीय प्रदूषकों के हानिकारक प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। यह जैव रासायनिक चक्र के माध्यम से कार्य करता है। यह प्रकृति मे घटित होने वाली जैव निम्नीकरण प्रक्रिया का ही संवर्धन कर प्रदूषण को स्वच्छ करने की तकनीक हैं।

  • जैवोपचार का प्रयोग सतही जल, भूमिगत जल व मृदा आदि को साफ करने में होता है। यह पारिस्थितिकी तंत्र की पुनः स्थापना में उपयोगी सिध्द होता है। जैवोपचार यदि प्रदूषण प्रभावित क्षेत्र मे किया जाता है तो इसे स्व-स्थाने जैवोपचार (In-Situ-Bio-Remetiation) कहा जाता है तथा यदि प्रदूषित पदार्थ को किसी अन्य जगह पर ले जाकर इस तकनीक का प्रयोग किया जाता है, तो इसे बाह्य-स्थाने जैवोपचार (Ex-Situ-Bio-Remediation) कहते हैं। 

  • जैवोपचारण के लिए विशेषतः अभिकल्पित सूक्ष्म जीवों को सृजित करने के लिए आनुवंशिक इंजीनियरिंग (जेनेटिक इंजीनियरिंग) का उपयोग किया जा सकता है।

  • जेनेटिक इंजीनीयरिंग के दृष्टिकोण से भी जैवोपचार के कई तरीके हैं जिनमें फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation)प्रदूषकों को पादपों की मदद से हटाना,  फाइटोनिष्कर्षण (Phytoextraction) – प्रदूषकों को जड़ों व पत्तियों में संगृहीत कर जैवोपचार की  क्रिया करना, फाइटो स्टेबलाइजेशन (Phytostablization), फाइटोट्रांसफॉर्मेशन (Phytotransformation) ऑयल  जैपर (Oilzapper) तकनीक शामिल हैँ।

  • ऑयलजैपर (Oilzapper) जीवाणु आधारित जैव-उपचार (Bio-Remediation) तकनीक है। यह तैलीय पंक तथा बिखरे हुए तेल के उपचार हेतु पारिस्थितिकी के अनुकूल विकसित प्रौद्योगिकी है, जिसका विकास द एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट (TERI) द्वारा किया गया है। अगस्त, 2010 में मुंबई के तटीय क्षेत्र में एम.वी. खलीजिया और एमएससी चित्रा नामक पोतो की टक्कर में बिखरे तेल को साफ करने के लिए  इस तकनीक का प्रयोग किया गया था।

  • ध्यातव्य है कि ऑयलजैपर एक बैक्टीरिया संकाय है। यह पांच बैक्टीरिया को मिलाकर विकसित किया गया है। इसमें उपस्थित बैक्टीरिया तेल में मौजूद हाइड्रोकार्बन यौगिकों को अपना भोजना बनाते हैं तथा उनको हानिरहित CO2 एवं जल में परिवर्तित कर देते हैं।

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यूरो मानक

  • यूरोपीय उत्सर्जन मानक प्रदूषण संबंधी नियामक है, जो यूरोप में सभी वाहनों पर लागू किए जाते हैं। वर्तमान समय में नाइट्रोजन ऑक्साइड, सभी हाइड्रोकार्बन, कार्बन मोनोऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर (PM) संबंधी उत्सर्जनों पर यह नियामक लागू होते हैं।

  • ध्यातव्य है कि मोटर वाहनों से प्रदूषक गैसे उत्सर्जित होती हैं। इन गैसों व कणकीय पदार्थों पर नियंत्रण रखने के लिए यूरोपीय संघ ने जो उत्सर्जन मानक निर्धारित किया है उसे यूरो मानक कहते हैं। ध्यात्वय है कि यूरोपीय देशों में वर्ष 1992 में यूरो मानक I तथा वर्ष 1977 में यूरो मानक II लागू कर दिया था। यूरो-I मानक, यूरो-II मानक से सर्वाधिक उदार है।

  • यूरो-II मानकों को पूरा करने के लिए अति अल्प सल्फर डीजल में सल्फर की मात्रा 0.05 प्रतिशत या इससे कम होनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय ऑटो फ्यूल नीति के लिए  गठित माशेलकर समिति ने वाहनों से निकलने वाल प्रदूषकों को नियंत्रित करने के लिए चरणबध्द रुप से यूरो मानकों को भारत में क्रियान्वित करने की संस्तुति की थी।

  • ध्यातव्य है कि स्वच्छ परिवहन पर अंतरराष्ट्रीय परिषद (The International Council on Clean Transporatin: ICCT) ने भारत को इस बात की छूट दी है कि वह वर्ष 2020 में यूरो V के बदले सीधे यूरो VI को अपना सकता है। उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में प्रदूषण पर नियंत्रण करने लिए नई दिल्ली में ऑड-ईवन फॉर्मूला लागू किया गया था। ध्यातव्य है कि है कि 1 अप्रैल, 2017 से BS-IV नामक भारत में लागू कर दिया गया है।

  • यूरो उत्सर्जन मानक प्रदूषण संबंधी नियामक है, जो यूरोप में सभी स्वचालित वाहनों पर लागू किए जाते हैं। वर्तमान समय में नाइट्रोजन के ऑक्साइडों (NOx) सभी हाइड्रोकार्बन (THC), गैर-मीथेन हाइड्रोकार्बन (NMHC), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और निलंबित धूल कण (SPM)  संबंधी उत्सर्जन पर कारों, ट्रेनों, ट्रैक्टरों, लॉरियों और इनसे संबंधित मशीनरी पर ये कड़े नियामक लागू होते हैं।

 

प्रदूषण एवं रोग

  • प्रदूषण से मानव व पेड़-पौधों दोनों विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। मानव जनित प्रदूषण भी इस समस्या के लिए उत्तरदायी है। स्वचालित वाहन वायु प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।

  • स्वचालित वाहनों में एन्टीनॉकिंग एजेंट के रुप में लेड (सीसा) का प्रयोग किया जाता है। धुएं के साथ विमुक्त ये लेड सबसे अविषालु धातु प्रदूषक होते हैं। लेड के कारण केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र, मस्तिष्क, पाचन तंत्र इत्यादि प्रभावित होते हैं। कैडमियम श्वसन विष की तरह कार्य करता है। यह रक्त दाब (Blood Pressure) बढ़ाकर हृदय संबंधी बहुत से रोगों का मूल कारण बनता है।

  • ध्यातव्य है कि पेयजल में कैडमियम की अधिकता से इटाई-इटाई रोग हो जाता है। इस रोग में हड्डियों व जोड़ों में तीव्र दर्द होता है। वहीं दूसरी ओर पारा (मरकरी) युक्त जल पीने से मिनामाटा रोग हो जाता है। अपशिष्ट जल में उपस्थित पारा मिश्रण, सूक्ष्म जैविक क्रियाओं द्वारा विषैले पदार्थ मिथाइल पारा (Methyl Mercury) में बदल जाता है। इससे बहरापन,  आंखों का धुंधलापन एवं मानसिक  असंतुलन तथा होंठ, जीभ व कई अंगों में शून्यता जैसी बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं।

  • ध्यातव्य है कि वायु (प्रदूषण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के तहत मोटर गाड़ियों और अन्य कारखानों से निकलने वाले धुएं और गंदगी का स्तर निर्धारित करने तथा उसे नियंत्रित करने का प्रावधान है। वर्ष 1987 से इस अधिनियम में ध्वनि प्रदूषण को भी शामिल कर लिया गया है।

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  • सीसे की विषाक्तता उत्पन्न करने वाले स्रोत प्रगलन इकाइयां एवं पेंट है।

  • घरों में पुताई के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पेंट में सीसे की मात्रा असुरक्षित स्तर तक हो सकती है। दीवारों को छूने, पेंट की हुई अन्य चीजों से संपर्क में आने आदि से लोग सीसे के संपर्क में आ जाते हैं। सीसे की अधिक मात्रा से मनुष्य के केन्द्रित तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क को नुकसान पहुंच सकता है। पेंट के अतिरिक्त वेल्डिंग, रबर-निर्माण प्रक्रिया, जिंक एवं कॉपर को गलाने वाली इकाइयां आदि सीसे की विषाक्तता उत्पन्न करने वाले स्रोत हैं।

  • लिपिस्टिक मोम, तेल, प्रति-ऑक्सीकारक तथा प्रशामक (Emollients) इत्यादि से युक्त होती है। इसमे लेड की भी कुछ मात्रा पाई जाती हैं जो मनुष्य के बौध्दिक स्तर (IQ) को प्रतिकूल रुप से प्रभावित कर सकती  है। ब्रोमीनित वनस्पति तेल (BVO) एक प्रसंस्कृत वनस्पति तेल है जिसे ब्रोमीन से उचारित किया जाता है। शीतल पेय में इसका उपयोग किया जाता है। मोनोसोडियम ग्लूटामेट, ग्लूटामिक अम्ल का सोडियम लवण है। इसे चाइनीज फास्ट फूड में स्वाद बढ़ाने वाले कारक के रुप में प्रयोग किया जाता है।

  • ऐस्बेस्टस जहरीला पदार्थ है, इसकी धूल से फेफड़े का कैंसर हो सकती है। सीसा मानव शरीर में केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र एवं मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकता है। पारे कि विषाक्तता से उदर संबंधी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

  • वात्या भठ्ठी (Blast Furnace) में ऑक्सीजन की सीमित आपूर्ति में कार्बन के ऑक्सीकरण से कार्बन मोनोऑक्साइड उत्पन्न होती है। कार्बन मोनोऑक्साइड गैस पीड़ित व्यक्ति के रक्त के हीमोग्लोबिन से प्राथमिक रुप से संयोजित होकर ऑक्सीजन अणुओं को प्रतिस्थापित करके और क्रमशः रक्त को ऑक्सीजन रहित करके क्रिया करती है जिसके परिणामस्वरुप कोशिकीय श्वसन असफल हो सकता है और फलस्वरुप मृत्यु हो सकती है।

  • कार्बन मोनोऑक्साइड रक्त में घुलकर कोशिकीय श्वसन को बाधित करती है तथा यह हृदय को क्षति पहुंचाती है। नाइट्रोजन के ऑक्साइड मानव शरीर में कैंसर  उत्पन्न कर सकते हैं। धूल कणों के  श्वास संबंधी  रोग होते हैं, जबकि सीसा मानव मस्तिष्क और केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को  प्रभावित करता है।

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  • भारत में इस्पात उद्योग द्वारा मुक्त किए जाने वाले प्रदूषकों में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), सल्फर के ऑक्साइड (SOx), नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx) तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) चारों ही शामिल हैं। इस्पात उत्पादन प्रक्रिया के दौरान सिंटरिंग मशीनों, कोक ओवन तथा भठ्ठियों से सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड मुक्त होते हैं।

  • एफ्लाटॉक्सिन फफूंदी के द्वारा उत्पादित होते हैं। एफ्लाटॉक्सिन मुख्यतया, एस्पर्जिलस फ्लेवस के द्वारा उत्पन्न होता है। एस्पर्जिलस फ्लेवस प्रायः मूंगफली, डबलरोटी, डेरी उत्पादों व संग्रहित बीजों पर उगता है। इसके द्वारा उत्पन्न एफ्लाटॉक्सिन मे एक कैंसर जनक पदार्थ (CARCINOGEN) होता है, जो यकृत कैंसर उत्पन्न करता है। एफ्लाटॉक्सिन  कम आणविक भार वाले य़ौगिक हैं। ये अधिक ऊष्मा से खाना पकाने से भी नष्ट नही होते हैं।

  • रासायनिक, जैविक तथा फोटोलिटिक प्रक्रियाओं द्वारा पर्यावरण में निम्नीकरण के प्रति प्रतिरोधी कार्बनिक यौगिको को पॉप्स (PoPs: Persistent Organic Pollutants) अर्थात चिरस्थायी कार्बनिक प्रदूषक कहते हैं। इनका सबसे बड़ा  दुर्गुण यह होता है कि ये काफी समय तक वायुमंडल में मौजूद रहते हैं। हवा, पानी, भूमि और भोजन के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने वाले ये यौगिक हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा है।  इनमें मानव एवं पशु ऊतकों में संचित होने की क्षमता होती है। स्थायी जैव  प्रदूषकों पर स्टॉकहोम अभिसमय द्वारा कुछ ब्रोमीन युक्त ज्वाला मंदकों को चिरस्थायी कार्बनिक  प्रदूषकों की सूची में शामिल किया है।

  • नैनो कण उत्सर्जित होने पर जल, मृदा और वायु को संदूषित कर सकते हैं। पर्यावरण में खाद्य श्रृंखला में नैनो पदार्थ आदि जीवाणुओं द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं, तो पूरी की पूरी खाद्य श्रृंखला के घटक इससे प्रभावित  हुए बिना नहीं रह सकते। जिंक ऑक्साइड तथा टाइटेनियम डाइऑक्साइड के नैनो कण पराबैंगनी प्रकाश की उपस्थिति में मुक्त मूलक उत्पन्न करते हैं, जो नुकसानदेह साबित हो सकती है।

  • श्वसनीय सूक्ष्म कण वे कण होते हैं, जो कम-से-कम इतने छोटे हों कि श्वसन के दौरान फेफड़े में प्रवेश कर सकें। 5 माइक्रोन से छोटे (लगभग 2.5 माइक्रोन आकार वाले) हवा में तैरते सूक्ष्म कण नासिक झिल्ली द्वारा रोके नहीं जा सकते और परिणाम स्वरुप यह श्वसन द्वारा फेफड़े में पहुंच जाते हैं और विभिन्न रोगों का कारण बनते हैं। जबकि 5 माइक्रोन से बड़े निलंबित कण नासिका झिल्ली द्वारा रोक लिए जाते हैं तथा वे फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाते।

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प्रदूषण विविध

  • उल्लेखनीय है कि एस्बेस्टस फाइवर से घिरे वातावरण में ज्यादा देर रहने से एस्बेस्टोसिस नामक रोग हो जाता है। इससे फेफड़ों से संबंधित बीमारियां होती हैं। इससे मीसोथेलिओमा (Mesothelioma) नामक कैंसर उत्पन्न हो सकता है।

  • एस्बेस्टस, डीडीटी एवं प्लास्टिक ऐसे प्रदूषण कारक हैं, जो जैवीय रुप से अपघटित नहीं होते, जबकि मल  जैवीय रुप से अपघटित होता है।

  • ला नीना वे हवाएं हैं, जो प्रशांत महासागर में हवाओं को बर्फीला बना देती हैं। ला नीना हवाओं के कारण ही जनवरी, 2012 में उत्तर भारत में असाधारण ठंड पड़ी थी।

  • सरसों के बीच के अपमिश्रक के रुप में सामान्यतः आर्जीमोन के बीज का प्रयोग किया जाता है। आर्जीमोन मैक्सिकाना  मेक्सिको में पाई जाने वाली पोस्ते की एक प्रजाति है। सरसों के तेल में इसकी मिलावट से ड्रॉप्सी नामक महामारी फैल सकती है।

  • ऊष्मीय शक्ति संयंत्रों में कोयला दहन के फलस्वरुप कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइडों, सल्फर के ऑक्साइडों, क्लोरोफ्लोरोकार्बन तथा वायुजनित अकार्बनिक कणों जैसे फ्लाई ऐश, कालिख इत्यादि का उत्सर्जन होता है।

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जल संरक्षण

जल संसाधन

  • जैविक संसाधन जीवमंडल (किसी जीव या जैविक पदार्थ) से प्राप्त किए जाते हैं, जैसे-वन तथा पशु एवं उनसे प्राप्त हो सकने वाले पदार्थ।

  • जीवाश्म ईंधन जैसे – कोयला एवं पेट्रोलियम आदि इसी वर्ग मे शामिल किए जाते हैं क्योंकि ये विघटित जैविक पदार्थों से बनते हैं। शुध्द जल जैविक संसाधन नही है। यह प्राकृतिक रुप से पृथ्वी पर पाया जाता है। क्योंकि पीने योग्य जल पृथ्वी पर बहुत कम मात्रा में पाया जाता है अतः इसे संरक्षित करने के कई उपाय किए जाते हैं। जल दिवस मनाना  उन उपायों मे से एक उपाय है।

  • विश्व जल संरक्षण दिवस 22 मार्च को मनाया जाता है। वर्ष 2016 में इस दिवस का मुख्य विषय था – जल एवं नौकरियां (Water & Jobs)

  • ध्यातव्य है कि वर्ष 1992 मे रियो-डी जनेरियों में आयोजित संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण व विकास (UNCED) की बैठक में स्वच्छ जल हेतु एक अंतरराष्ट्रीय दिवस मनान का निर्णय लिया गया। इसी तत्वावधान में 22 मार्च, 1993 को पहला विश्व जल दिवस मनाया गया। ध्यातव्य है कि वर्ष 2003 से यूएन-वाट (UN-Water) नामक एक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम के तहत स्वच्छ संसाधनों, सफाई व जल से संबंधित आपदाओं के मुद्दों पर कार्य कि या जाता है।

  • वर्ष 2017 में विश्व जल संरक्षण दिवस का मुख्य विषय था – अपशिष्ट जल (Waste Water)

  • वर्ष 2018 विश्व जल दिवस का मुख्य विषय था – जल हेतु प्रकृति (Nature for Water)इस थीम के तहत प्रकृति के उपयोग के द्वारा 21वीं सदी में जल से संबंधित चुनौतियों से निपटने की रणनीति बनाई जाएगी। इस थीम के तहत अपशिष्ट जल को कम करने तथा इस जल का पुनर्चक्रण कर उसे उपयोग में लाने हेतु बनाने के लिए बल दिया गया। इसके अलावा जल संरक्षण एवं पर्यावरण संरक्षण में कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों का भी योगदान है।

  • राजेन्द्र सिंह को भारत के जल पुरुष के लोकप्रिय नाम से जाना जाता है। राजेन्द्र सिंह तरुण भारत संघ नामक गैर-सरकारी संगठन के चेयरमैन हैं। वर्ष 2001 में इन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार एवं वर्ष 2015 में स्टॉकहोम वाटर प्राइज दिया गया।

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जल प्रदूषण एवं रोकथाम

  • आधुनिक युग में जल प्रदूषण एक विकट समस्या है। जल को कई विधियों से जीवाणु रहित किया जा सकता है – जैसे –

  1. ताप तथा अन्य भौतिक कारक द्वारा

  2. पराबैंगनी किरणों तथा रेडियोधर्मी आयन के द्वारा

  3. रसायनों द्वारा ऑक्सीकरण करके जैसे – ओजोन, आयोडीन एवं क्लोरीन के यौगिको द्वारा।

  • क्लोरैमीन (NH2Cl) तथा क्लोरीन डाइऑक्साइड (ClO2) भी जल को जीवाणु मुक्त करने हेतु प्रयुक्त किए जाते हैं।

  • पेयजल को जीवाणुरहित करने के लिए क्लोरीन गैसे एवं ब्लीचिंग पाउडर का उपयोग किया जाता है। ध्यातव्य है कि क्लोरीन गैस जल शोधन के प्राथमिक चरण में जीवाणुओं को निष्क्रिय करने का कार्य करती है।

  • पराबैंगनी विकिरण के द्वारा भी जल का शोध न किया जाता है। पराबैंगनी विकिरण एक प्रकार का विद्युत चुंबकीय विकिरण है। पराबैंगनी विकिरण युक्त जल शोधन प्रणालियों में बिना  किसी खतरनाक रसायन (जैसे – क्लोरीन) के प्रयोग से जल को कीटाणुमुक्त किया जाता है। यूवी किरणों के प्रयोग से जल के स्वाद, महक एवं रंग मे कोई परिवर्तन नहीं होता है।

  • ध्यातव्य है कि कोलकाता में पेयजल में संखिया ( Arsenic) प्रदूषण सर्वाधिक है। जादवपुर विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार, यहां के 141 वार्डों में से 77 में भूमिगत जल में संखिया की मात्रा  उच्च स्तर पर है।

  • उल्लेखनीय है कि शहरी क्षेत्रों की जल संबंधी जरुरतें अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण से पूरी की जा सकती हैं। इससे जल का संरक्षण तो संभव होगा ही साथ में अपशिष्ट जल को प्रयोग में भी लाया जा सकेगा।

  • अपशिष्ट जल के प्रबंधन में राष्ट्रीय जल मिशन की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। साथ ही राष्ट्रीय जल मिशन के तहत ऐसे समुद्रतटीय शहर जिनके पास जल के अपर्याप्त वैकल्पिक स्रोत हैं, उनकी जल आवश्यकताओं की आपूर्ति ऐसी समुचित प्रौद्योगिकी को व्यवहार में लाकर की जा सकेगी, जो समुद्री जल को प्रयोग लायक बना सके।

  • ध्यातव्य है कि नदियो को जोड़ने की योजना राष्ट्रीय जल मिशन में शामिल नही है। साथ ही सरकार द्वारा भौम जल निकालने के लिए किसानों को प्रतिपूर्ति प्रदान करना भी इसमें शामिल नही है।

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  • ध्यातव्य है कि 30 जून, 2008 को जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य-योजना (National Action Plan on Climate Change: NAPCC) आरंभ की गई थी। राष्ट्रीय जल मिशन इसी कार्ययोजना का एक भाग है। यह मिशन एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Water Resource Management) को सुनिश्चित करने में सहायता  करेगा। इससे जल संरक्षण, जल के न्यायसंगत वितरण तथा जल के अपव्यय को कम-से-कम करने में सहायता मिलेगी। राष्ट्रीय जल मिशन पांच प्रमुख लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु रणनीति बनाने पर बल देगा।

राष्ट्रीय जल मिशन के प्रमुख लक्ष्य

  • बेसिन स्तरीय समेकित जल प्रबंधन

  • पब्लिक डोमेन में व्यापक जल आंकड़ा आधार

  • जल उपयोग कुशलता में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी

  • अति दोहित क्षेत्रों पर ध्यान

  • जल संरक्षण, संवर्धन हेतु नागरिकों व राज्य कार्रवाई को बढ़ावा देना

  • यह मिशन राष्ट्रीय जल नीति के प्रावधानों का ध्यान रखेगा और विभिन्न पात्रता और मूल्य के साथ नियामक तंत्रों के माध्यम से, जल उपयोग कुशलता 20 प्रतिशत तक बढ़ाकर जल के अनुकूलतम प्रयोग हेतु एक  ढांचा तैयार करेगा।

  • जल (प्रदूषण निवारक तथा नियंत्रण) अधिनियम, वर्ष 1974 में अधिनियमित किया गया, इसे वर्ष 1988 में संशोधित किया गया।

  • ध्यातव्य है कि वाटर (प्रिवेन्शन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) सेस एक्ट वर्ष 1977 में लागू किया गया। इसे जम्मू और कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया।

जल संरक्षण

  • जल संरक्षण की आवश्यकता केवल मनुष्यों की ही नहीं पड़ती है वातावरण में अनूकूलन हेतु पौधें भी जल संरक्षण की प्रक्रिया अपनाते हैं।

  • रेगिस्तान में पाए जाने वाले पौधों की पत्तियां जल-हानि को रोकने के लिए प्रायः कांटो में बदल जाती हैं। पत्तियों मे बहुत  छोटे-छोटे असंख्य छिद्र (रंध्र) होते हैं, जो पौधे की जड़ों द्वारा अवशोषित जल की अतिरिक्त मात्रा को धीरे-धीरे वातावरण में छोड़ते रहते हैं। यदि पत्तियां कांटों को नहीं बदलती हैं, तो रंध्र पत्ती के नीचे की सतह पर बहुत अंदर की ओर चले जाते हैं ताकि जल हानि न हो सके।

  • रेगिस्तान पौधों की पत्तियां पतली, मोमी उपत्वचा और रेजिन सतह वाली होती हैं। बहुत अधिक संख्या में कांटेदार सतह वाष्पोत्सर्जन को कम करने में सहायक होती है। पत्तियों पर बाल जैसे रेशे हवा की हलचल और सूर्य की गर्मी से होने वाले वाष्पोत्सर्जन में कमी करते हैं। अधिकतर रेगिस्तानी पौधे छोटे और मुड़ी  हुई पत्तियों वाले होते हैं जिससे सतही क्षेत्रफल कम होने से वाष्पोत्सर्जन द्वारा होने वाली जल की हानि कम होती है।

  • पृथ्वी पर जल प्रचुर मात्रा में झीलों व नदियों में पाया जाता है। इनसे प्राप्त जल मानव सभ्यता व जीव-जंतुओं के लिए उपयोगी होता है। अतः इनके जल का संरक्षण भी अति आवश्यक है। इसी परिप्रेक्ष्य में केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने जून, 2001 में केन्द्र प्रायोजित योजना के रुप में राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना की शुरु आत की थी।

  • 31 दिसंबर, 2009 तक इस परियोजना में 14 राज्यों की कुल 58 झीलों के संरक्षण हेतु स्वीकृति प्रदान की गई थी जिसमें भीमताल और ऊटी शामिल हैं। इन दोनों में ऊटी इस परियोजना के प्रारंभिक चरण से ही शामिल थी, अतः स्पष्ट है कि हाल ही में इसमें भीमताल झील को शामिल किया गया है।

  • फरवरी, 2013 में राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना, और राष्ट्रीय नम भूमि संरक्षण कार्यक्रम को समन्वित कर नई राष्ट्री जलीय पारिस्थितिक-तंत्र संरक्षण योजना को  आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय  समिति द्वारा स्वीकृत प्रदान की गई। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय झील संरक्षण परियोजना के अंतर्गत 1 फरवरी, 2017 तक की अद्यतन स्थिति  के अनुसार, निम्न प्रमुख झीलों को भी शामिल किया गया है –

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झील

संबंधित स्थल व उनके राज्य

डल झील

श्रीनगर,  जम्मू व कश्मीर

चन्ना पटना झील

हासन कर्नाटक

सागर,  रानी तालाब, शिवपुरी झील

मध्य प्रदेश

पोवई झील

महाराष्ट्र

पुष्कर  झील

अजमेर

 

राजस्थान

पिछोला झील

उदयपुर

नक्की झील

माउंट आबू

ऊटी, कोडइकनाल

तमिलनाडु

 

भीमताल, खुरपाताल, नैनीताल

उत्तराखंड

 

मानसी गंगा झील

गोवर्धन

उत्तर प्रदेश

रामगढ़ ताल

गोरखपुर

लक्ष्मी ताल

झांसी

 

  • झीलों में प्रदूषण नियंत्रण के उद्देश्य से राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना (National Lake Conservati on Plan – NLCP) के तहत चुनी गई शहरी क्षेत्रों में पड़ने वाली जलमग्न भूमियां  इन झीलों की हैं – भोज (म.प्र.), सुखना (चंडीगढ़) एवं पिछोला (राजस्थान)।

  • ओडिशा की चिल्का झील इसमे सम्मिलित नही है। ध्यातव्य है कि NLCP के अंतर्गत ओडिशा की बिंदुसागर झील शामिल हैं।

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गंगा संरक्षण

  • गंगा भारत की एक महत्वपूर्ण नदी है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए समय-समय पर प्रयास किए जाते रहे हैं।

  • भारत में केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की स्थापना वर्ष 1985 में की गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसका गठन किया था। वर्तमान में इसे राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण (NRCA) के नाम से जाना जाता है। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।

  • ध्यातव्य है कि NRCP का उद्देश्य प्रदूषित नदियों के किनारे वाले विभिन्न शहरों में प्रदूषण उपशमन कार्यों के लिए नदियों के जल की गुणवत्ता में सुधार करना है। इसके तहत निम्नलिखित कार्य किए जाएंगे –

  1. खुले नालों से नदियों में आ रहे कचरे को रोकने के लिए मल व्यवस्था प्रणाली बनाना।

  2. नदी किनारे शौच पर प्रतिबंध

  3. नदी तट पर स्नान घाटों का सुधार

  4. गंदे जल के शोधन के लिए संयंत्र लगाना।

  5. सहभागिता

  6. जागरुकता फैलाना आदि।

  • उल्लेखनीय है कि गंगा नदी को स्वच्छ करने में इन योजनाओं को अपेक्षित सफलता नही प्राप्त हो पाई है।

  • उल्लेखनीय है कि स्वच्छ गंगा के लिए 20 फरवरी, 2009 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा नदी तलहटी (Basin) प्राधिकरण का गठन किया गया। ध्यातव्य है कि 22 जुलाई, 2016 को गंगा नदी के गाद को हटाने के लिए गाइडलाइन  बनाने हेतु  माधव चिताले की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है।

  • ध्यातव्य है कि पर्यावरण (संरक्षण), कानून, 1986 के तहत राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन फरवरी, 2009 में हुआ था। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। उन राज्यों के मुख्यमंत्री जिनसे गंगा होकर बहती है, इस प्राधिकरण के सदस्य होते हैं। इस प्राधिकरण का उद्देश्य गंगा नदी के संरक्षण को सुनिश्चित करना है। यह राष्ट्रीय स्तर पर नदी संरक्षण प्रयासों की अगुवाई करता है। यह प्राधिकरण गंगा नदी के लिए योजना, वित्त, निगरानी और नियामक के संदर्भ में कार्य करता है।

  • इस प्राधिकरण का लक्ष्य है कि वर्ष 2020 तक गंगा को उसमें प्रवाहित होने वाले औद्योगिक अपशिष्ट व अशोधित सीवेज जल से मुक्ति दिला दी जाए।

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विविध

एजेंडा 21 व अन्य अभिसमय

  • एजेंडा 21 सतत विकास के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की गैरबध्द स्वैच्छिक कार्ययोजना है। इसका उद्देश्य 21वीं सदी में विश्व पर्यावरण को संरक्षित करना है। यह कार्ययोजना वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में संपन्न पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED) के दौरान सृजित की गई थी।

  • ध्यातव्य है कि रासायनिक आयुध निषेध संगठन रासायनिक आयुध अभिसमय की कार्यान्वयन संस्था है। यह वर्ष 1997 में लागू हुआ था। इस समय OPCW में 192 सदस्य देश हैं, जो विश्व को रासायनिक हथियारों से मुक्त करने हेतु प्रतिबध्द हैं। यह नए शस्त्रों के प्रादुर्भाव को रोकने के लिए रासायनिक उद्योग का अनुवीक्षण करता है। यह राज्यों (पार्टियों) को रासायनिक आयुध के खतरे के विरुध्द सहायता व संरक्षण प्रदान करता है।

  • ध्यातव्य है कि OPCW के सदस्य देश विश्व की 98 प्रतिशत जनसंख्या, भू-भाग व रासायनिक कारखांनों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • उल्लेखनीय है कि एकमार्क (AGMARK) एक्ट या Agricultural Produce (Grading and Marking)  Act वैधानिक रुप से वर्ष 1937 से अस्तित्व में आया।

  • भारतीय मानव ब्यूरों (Bureau of Indian Standards: BIS) भारत का राष्ट्रीय मानक संस्थान है। भारत औद्योगिक विकास, उपभोक्ता संरक्षण  तथा दैनिक  जीवन में मानकों के निर्धारण की संगठित प्रक्रिया जनवरी, 1947 मे भारतीय मानक  संस्था (Indian Standards Institution-ISI) की स्थापना के साथ शुरु हुई थी। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) 1 अप्रैल, 1987 को संसदीय  अधिनियम, 1986 के द्वारा अस्तित्व में  आया जिसने भारतीय मानक संस्था (BIS) के कर्मचारियों, संपत्तियों एवं देनदारियों तथा कार्यों को ग्रहण करते हुए विस्तृत  कार्यक्षेत्र और अधिक शक्तियों के साथ अस्तित्व में आया। इस संस्था का उद्देश्य वस्तुओं का मानकीकरण, चिन्हीकरण और उन्हें गुणवत्ता प्रमाण-पत्र देना तथा इन कार्यों से संबंध्द तथा अनुषंगी मामलों से संबंधित गतिविधियों का  सामंजस्यपूर्ण विकास करना है। वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मानक ब्यूरो ने विभिन्न प्रकार के उत्पादों के लिए लगभ ग 14000 से अधिक लाइसेंस  जारी किए हुए हैं। आई.एस.आई (ISI) का निशान भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा प्रदान किया जाने वाला प्रमुख मानक चिन्ह है। यह अधिकांशतः सभी संसाधित किए गए खाद्य उत्पादों सहित आम उपभोग की अधिकांश वस्तुओं जैसे विद्युत उपकरण, सीमेंट, लोहो के पाइप आदि पर लगाया जाता है। AGMARK (एगमार्क) भारत सरकार के विपणन एवं निरीक्षण निदेशालय (DMI) द्वारा जारी एक गुणवत्ता प्रमाणन चिन्ह् है।

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  • विपणन एवं निरीक्षण निदेशालय खाद्य पदार्थों का श्रेणीकरण एवं चिन्हांकन करता है। इस विभाग की स्थापना वर्ष 1935 में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के तहत  कृषि  सहयोग  और किसान कल्याण विभाग के संलग्न कार्यालय के रुप में की गई थी।

 

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संस्थान एवं संगठन

  • दक्षिण गंगोत्री अंटार्कटिका में भारत का पहला अनुसंधान केन्द्र है। इसकी स्थापना वर्ष 1983-84 में की गई।

  • भारत ने अपने दूसरे अनुसंधान केन्द्र मैत्री की स्थापना वर्ष 1988-89 में की।

  • अंटार्कटिका में भारत का तृतीय अनुसंधान केन्द्र भारती है। भारती की स्थापना वर्ष 2012 में की गई थी।

  • पोषण का राष्ट्रीय संस्थान (National Institute of Nutrition), हैदराबाद में स्थित है। भारत का वन्य जीव संस्थान देहरादून में स्थित है। आयुर्वेद का राष्ट्रीय संस्थान जयपुर में स्थित है। नेशनल इंस्टीट्युट ऑफ नैचुरोपैथी पुणे में स्थित है।

  • भारतीय वन प्रबंधन संस्थान, भोपाल में अवस्थित है।

  • केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) जोधपुर, राजस्थान में स्थित है.

  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट नई दिल्ली में अवस्थित है। इसकी स्थापना विश्व पर्यावरण दिवस ( World Environment Day) के अवसर पर 5 जून, 1980 में हुई थी।

विभिन्न पुरस्कार

  • नागरिकों में पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने हेतु समय-समय पर विभिन्न पुरस्कार दिए जाते हैं।

  • केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा वर्ष 1987 में स्थापित इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार पर्य़ावरण के क्षेत्र में सार्थक योगदान देने वाले संगठनों एवं व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है।

  • हरित क्रांति में विशेष योगदान देने के कारण नार्मन बोरलॉग के नाम से कृषि क्षेत्र में बोरलॉग पुरस्कार दिया जाता है।

  • टायलर पुरस्कार पर्य़ावरण सुरक्षा एवं पारिस्थितिकी क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु प्रदान किया जाता है। अप्रैल, 2015 में यह पुरस्कार भारतीय पर्यावरणविद माधव गाडगिल और ऑरेगन स्टेट विश्वविद्यालय की जेन लूबचेंको को लॉस एंजेल्स, कैलिफोर्निया (अमेरिका) मे प्रदान किया गया। वर्ष 2016 का यह पुरस्कार कैंब्रिज विश्वविद्यालय के पार्थ दासगुप्ता को प्रदान किया गया।

  • वर्ष 2017 में टायलर पुरस्कार मेक्सिको के पारिस्थितिकी विज्ञान प्रोफेसर जोस सारुखान करमेज को दिया गया। वर्ष 2018 का टायलर पुरस्कार अमेरिका के दो वैज्ञानिकों जेम्स जे. मैककार्टी और पॉल फाल्कोवस्की को प्रदान किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर अध्ययन के लिए दिया गया है।

  • राजीव गांधी पर्यावरण पुरस्कार केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा स्वच्छ प्रौद्योगिकी एवं विकास के क्षेत्र मे कार्य करने के लिए प्रदान किया जाता है।

  • ग्लोबल-500 (Global-500 Roll of Honour) पुरस्कार वर्ष 1987 में संयुक्त राष्ट्र पर्य़ावरण कार्यक्रम (UNEP ) द्वारा स्थापित किया गया था और यह पर्यावरण उपलब्धियों के लिए व्यक्तियों एवं संगठनों को वर्ष 2003 तक प्रदान किया गया। 2003 में भारत में डॉ.  बिंदेश्वर पाठक (सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक) को यह पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद इसके स्थान पर वर्ष 2005 से UNEP द्वारा चैंपियंस ऑफ द अर्थ नामक पुरस्कार दिया जाने लगा।

  • वर्ष 2013 के चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं में भारतीय मूल के अमेरिकी वीरभद्रन रामानाथन भी शामिल थे। वर्ष 2016 के चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार प्राप्त कर्ताओं में मुंबई के अफरोज शाह भी शामिल थे। जबकि जोस सारुखान कमरेज को लाइफटाइम अजीवमेट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।

  • वर्ष 2017 में चीन के वांग वेनबिआओ को लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार तथा मोबाइक तथा साईहांबा  एफारेस्टेशन कम्युनिटी को यह पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त चिली की राष्ट्रपति मिशेल बाचेलेत को एवं डा. पॉल ए. न्यूमैन को भी यह पुरस्कार प्रदान किया गया।

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दिवस एवं तिथियां

  • विश्व परिवेश दिवस 5 अक्टूबर (अक्टूबर के प्रथम सोमवार) को मनाया जाता है।

  • विश्व तंबाकू निरोध दिवस (World No Tobacco Day) संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 31 मई को मनाया जाता है।

  • 19 नवंबर प्रतिवर्ष विश्व शौचालय दिवस के रुप में मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि जुलाई, 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सभी के लिए स्वच्छता संकल्प (A/RES/67/291) के माध्यम से 19 नवंबर को विश्व शौचालय दिवस के रुप में मनाने का निर्णय लिया था। वर्ष 2017 के विश्व शौचालय दिवस का केन्द्रीय विषय अपशिष्ट जल (Waste Water) था।

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महत्वपूर्ण दिवस

दिनांक

विश्व पर्यावरण दिवस

5 जून

विश्व वानिकी दिवस

21 मार्च

विश्व पर्यावास दिवस

अक्टूबर का प्रथम सोमवार

विश्व ओजोन दिवस

16 सितंबर

पृथ्वी दिवस

22 अप्रैल

  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2 अक्टूबर, 2014 को गांधी जयंती के अवसर पर स्वच्छ भारत अभियान को आधिकारिक तौर पर लांच किया। इस अभियान का उद्देश्य वर्ष 2019 में गांधीजी के जन्म की 150वीं वर्षगांठ तक स्वच्छ भारत के उनके सपने को पूरा करना है।

  • सिएरा लियोन में प्रत्येक माह के अंतिम शनिवार को राष्ट्रीय स्वच्छता दिवस मनाया जाता है।

  • ध्यातव्य है कि प्रतिवर्ष 5 जून को आयोजित होने वाले विश्व पर्यावरण दिवस का वर्ष 2018 में मुख्य विषय – प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करो (Beat Plastic Pollution) था।

 

 

 

पर्य़ावरण से संबंधित विभिन्न तथ्य

  • ध्यातव्य है कि कोणार्क सूर्य मंदिर वर्ष 1984 में तथा महाबोधि मंदिर वर्ष 2002 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किए गए हैं।

  • वर्ष 2010 में यूनेस्को द्वारा जंतर-मंतर (जयपुर) को शामिल करने पर भारत में विश्व धरोहर स्थलों की संख्या 28 पर पहुंच गई थी और वर्ष 2012 में पश्चिमी घाट को इसमें शामिल करने पर यह 29 हो गई।

  • राजस्थान की अरावली पहाडियों पर निर्मित छः पहाड़ी किलों, चित्तौड़गढ़ किला, कुंभलगढ़ किला, रणथम्भौर किला, जैसलमेर किला, आमेर किला तथा गागरोन किला को वर्ष 2013 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के बाद इनकी संख्या 30 हो गई। वर्ष 2014 में रानी की वाव (गुजरात) तथा ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क को विश्व धरोहर का दर्जा दियए जाने के बाद भारत में धरोहर स्थलों की संख्या 32  हो गई।

  • इसके पश्चात नालंदा महाविहार, कंचनजंगा नेशनल पार्क तथा ली कार्बूजिए के वास्तुशिल्प कार्य (कैपिटल कॉम्प्लेक्स, चंडीगढ़) वर्ष 2016 मे इस सूची में जोड़े गए हैं। वर्ष 2017 में ऐतिहासिक शहर अहमदाबाद को भी शामिल किया गया है। अतः वर्तमान में भारत में विश्व धरोहर स्थलों की संख्या 36 हो गई है।

  • उल्लेखनीय है कि मेधा पाटेकर नर्मदा बचाओं आंदोलन से संबध्द हैं।

  • रैली फॉर वैली प्रोग्राम का आयोजन नर्मदा नदी घाटी में विस्थापन की समस्या से जूझ रहे विस्थापितों के पुनर्वास से संबंधित था।

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  • बाबा आम्टे वन्य जीव संरक्षण तथा नर्मदा बचाओं आंदोलन से जुड़े थे। शांत घाटी आंदोलन के संदर्भ में डॉ. सलीम अली का नाम चर्चित रहा था।

  • मध्य प्रदेश वन्य जीव बोर्ड की अनुशंसा के आधार पर मध्य प्रदेश सरकार प्रदेश के धार जिले में जीवश्म राष्ट्रीय पार्क डायनासोर की स्थापना कर रही है। यह पार्क धार वन  डिवीजन में स्थित  बाग गुफाओं के निकट 89.740 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत होगा। उल्लेखनीय है कि धार  जिले के  बाग  के निकट वर्ष 2006 में डायनासोर  के 100 से अधिक अंडे प्राप्त हुए थे, जिनके 6.5 करोड़ से 7 वर्ष पुराने होने का अनुमान है।

  • विभिन्न राज्य तथा उनसे संबंधित राष्ट्रीय उद्यानों का सुमेलन निम्नानुसार है –

राज्य            राष्ट्रीय उद्यान

असम            काजीरंगा

गुजरात          गिर

मध्य प्रदेश       कान्हा

उत्तरांचल         कॉर्बेट

  • महुआ, पॉपलर, नीम तथा सीता अशोक में से सीता अशोक का पेड़ सर्वाधिक उत्तम धूल नियंत्रक है।

  • पेरियार वन्यजीव अभ्यारण्य केरल में स्थित है।

  • ग्रीन इंडिया मिशन (जी.आई.एम.) के प्रमुख उद्देश्यों में वन आच्छादन की पुनर्प्राप्ति और संवर्धन करना है। यह अनुकूलन (अडैप्टेशन) तथा न्यूनीकरण (मिटिगेशन) के संयुक्त उपायों से जलवायु परिवर्तन का प्रत्युत्तर देता है। इसकी प्रमुख बाते निम्नलिखित हैं –

  1. वन/गैर-वन वाली भूमि पर 50 लाख हेक्टेयर के वनों/पेड़ों को बढ़ाना तथा अन्य 50 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र की गुणवत्ता को सुधारना।

  2. जैव विविधता, हाइड्रोलॉजिकल सेवाएं तथा कार्बन में कमी समेत पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं को सुधारना।

  3. वनों पर निर्भर रहने वाले 30 लाख परिवारों की कमाई को बढ़ाना।

  4. वर्ष 2020 तक 5-6 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड की कटौती करना।

  • ध्यातव्य है कि द्वीतीय हरित क्रांति, कृषि उत्पादन के संवर्धन में सहायक होगी जिससे भविष्य में सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगा।

  • हरित लेखाकरण (ग्रीन अकाउंटिंग) का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों  द्वारा पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का व्यापक आकलन करना है। इसके अंतर्गत जीवन के लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों, प्रदूषकों व आर्थिक गतिविधियों द्वारा हासिल जी.डी.पी.  को माप कर उनके आंकड़े प्रस्तुत करने का कार्य किया जाता है।

  • प्राकृतिक आपदा ह्रासीकरण का अंतरराष्ट्रीय दशक 1990-1999 को माना जाता है।

  • मेगा-डाइवर्स ऐसे देशों का समूह है जहां पृथ्वी की अधिकांश प्रजातियां पाई जाती हैं, इसलिए इन देशों को अत्यधिक  जैव विविध माना जाता है। पर्यावरण से संबंधित अमेरिकी गैर-लाभकारी संस्था कंजर्वेशन इंटरनेशनल ने वर्ष 1998 में 17 मेगा-डाइवर्श देशों की पहचान की  थी। जिनमें ऑस्ट्रेलिया, चीन, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका एवं  भारत  जैसे देश शामिल हैं।

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  • लोकाट एक सदाबहार फल वृक्ष है। जापान में लोकाट का अत्यधिक उत्पादन होता है।

  • देश में विंटर लाइन की प्राकृतिक परिघटना मसूरी में दृश्यमान होती है। इसके अलावा स्विट्जरलैंड के कुछ क्षेत्रों में विंटर लाइन दृश्यमान होती है। यह परिघटना मध्य अक्टूबर से जनवरी तक घटित होती है। यह परिघटना शाम के समय सूर्य के अस्त होने पर दृश्यमान होती है। विंटर लाइन में पीला, लाल, नारंगी, बैंगनी एवं चमकीले  लाले रंगों का  सम्मिश्रण होता है।

  • भारत के प्रथम राष्ट्रीय सामुद्रिक पार्क की स्थापना वर्ष 1982 में गुजरात के जामनगर जिले में कच्छ की खाड़ी में की गई।

  • समुद्री राष्ट्रीय पार्क गुजरात के कच्छ की खाड़ी में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1982 में की गई थी। इसका क्षेत्रफल 162.89 वर्ग किमी. है।

  • नामदफा, बांदीपुर, पेरियार तथा लामजाओ अभ्यारण्य क्रमशः अरुणाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तथा मणिपुर में स्थित हैं। भारत में मौसम अनुश्रवण मुक्ति सोडार, कैगा, कलपक्कम, तारापुर और ट्राम्बे में स्थापित है।

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विविध तथ्य

  • उ.प्र. में बायोटेक्नोलॉजी पार्क की स्थापना लखनऊ में की गई है। इसकी नींव 21 मई, 2003 को रखी गई थी। इसके द्वारा निम्न क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाएगा- स्वास्थ्य देखभाल, कृषि बागवानी, पर्यावरण औद्योगिक अनुप्रयोग एवं ऊर्जा।

  • सुनामी तरंग नही बल्कि तरंगो की श्रृंखला होती है, जो महासागरीय नितल के निकट अथवा उसके नीचे भूगर्भिक परिवर्तनों के कारण पैदा होती है। सुनामी महासागरीय नितल पर भूकंप, भूस्खलन अथवा ज्वालामुखी उद्गम से पैदा होती है।

  • 18 मई, 2010 को केन्द्रीय पर्य़ावरण एवं वन मंत्रालय ने गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय प्राणी के रुप में अधिसूचित किया था।

  • हीलियम एक अक्रिय तथा अज्वलनशील गैस है, इसलिए इसका उपयोग मौसम विज्ञान संबंधी प्रेक्षण के लिए गुब्बारों को भरने में करते हैं।

  • मानव के श्रेष्ठतर जीवन यापन के लिए शुध्द वातावरण एवं जलवायु पहली प्राथमिकता है। अतः शुध्द वातावरण के लिए वनारोपण अत्यावश्यक है।

  • लैंडसैट उपग्रह से यदि किसी क्षेत्र का आंकड़ा आज मिलता है, तो उसके पश्चिम में स्थित क्षेत्र का आंकड़ा एक सप्ताह बाद उपलब्ध होगा।

  • हरिकेन कैटरीना, हरिकेन विल्मा एवं हरिकेन रीटा तीनों ही वर्ष 2005 में आए हरिकेन हैं, जबकि हरिकेन सैण्डी ने वर्ष 2012 में अमेरिका के उत्तर-पूर्व एवं पूर्वी तटीय प्रांतो को दुष्प्रभावित किया।

  • पश्चिमी अमेरिका में स्थित राज्य मोन्टाना को डाइनासोर का कब्रिस्तान कहा जाता है। इसके अतिरिक्त कनाडा के नार्दर्न अल्बर्टा क्षेत्र में भी बड़ी संख्या मे डाइनासोरो के अवशेष दबे पाए गए हैं।

  • इको मार्क योजना 1991 के तहत साबुन, अपमार्जक, कागज, प्लास्टिक, सौंदर्य प्रसाधन एवं ऐरोसॉल अधिसूचित हैं। इन उत्पादों में औषधियां एवं प्रतिजैविकी अधिसूचित नहीं हैं।

  • भारत में पूर्व संवेष्टित (प्रीपैकेज्ड) वस्तुओं के संदर्भ में खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग और लेबलिंग) विनियम, 2011 के अनुसार, किसी निर्माता को मुख्य लेबल पर मुख्यतया निम्न सूचनाएं अंकित करना अनिवार्य है – 

  1. संघटकों की सूची जिसमें संयोजी शामिल हैं।

  2. पोषण-विषय सूचना

  3. शाकाहारी/मांसाहारी इत्यादि।

  • प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन को संयुक्त राष्ट्र पर्य़ावरण कार्यक्रम द्वारा फादर ऑफ इकोनॉमिक इकोलॉजी की उपाधि दी गई है।

  • STUDY FOR CIVIL SERVICES-GYAN

 

  • प्लीस्टोसीन युग के विभिन्न समयों में स्थल का अधिकांश भाग हिमचादर द्वारा आच्छादित हुआ था। परिणामस्वरुप हिमनद के अपरदन तथा निक्षेप द्वारा कई नए-नए स्थलरुपों का विकास हुआ। इसके अतिरिक्त पूर्व निर्मित स्थलरुपों में पर परिवर्तन तथा सुधार हुए, सागर तल में महान परिवर्तन हुए, स्थल भागों में अवतलन उत्थान हुए तथा सागरीय जीव भी पर्याप्त रुप में प्रभावित हुए।

  • सही सुमेलन

त्वचा कैंसर       –   पराबैंगनी प्रकाश

ध्वनि  प्रदूषण     –   डेसीबल

वैश्विक तापन     –   कार्बन डाइऑक्साइड

ओजोन छिद्र      –   क्लोरोफ्लोरोकार्बन

  • बंबई नेचुरल हिस्ट्री सोराइटी (BNHS) वर्ष 1883 में स्थापित एक गैर-सरकारी संगठन है जो भारत में संरक्षण और जैव-विविधता संबंधी शोध में संलग्न है। यह क्रिया-आधारित अनुसंधान, शिक्षा एवं लोक जागरुकता के माध्यम से प्रकृति को बचाने का प्रयास करता है, साथ ही यह आम जनता के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति खोज-यात्राओं एवं शिविरों का आयोजन एवं संचालन भी करती है।

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