संपूर्ण भारतीय राज्यव्यवस्था का सार FULL INDIAN POLITY SUMMARY COMPLETE GENERAL KNOWLEDGE GK GS REVISION NOTES GIST NCERT laxmikant polity UPSC IAS PCS UPPSC UPSSSC SSC BPSC MPPSC CGPSC RAS OPSC PPSC HAS KAS APPSC UKPSC GD UPP UP POLICE BSSC LOWER PCS ALLAHABAD ARO RO AHC ARO MANDI PARISHAD VDO VYAPAM SSC CGL CHSL GD RPF POLICE SI CONSTABLE CLERK


भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

 

 

STUDY FOR CIVIL SERVICES-GYAN

MOST IMPORTANT POLITY POLITICAL SCIENCE  SAMANYA GYAN  GK SUMMARY GENERAL KNOWLEDGE NOTES  FOR ALL COMPETITIVE EXAMS INCLUDING  UPSC STATE PCS SSC UPSSSC AND OTHER ONE DAY GOVERNMENT EXAMS

 

भारत का संवैधानिक विकास

भारत का संवैधानिक विकास

  • ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत पारित अधिनियम (1773-1853)

  • ब्रिटिश ताज के अंतर्गत पारित अधिनियम (1858-1947)

कंपनी के अंतर्गत पारित अधिनियम

  • 1773 का रेग्युलेटिंग एक्ट के द्वारा

  • बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल पद का नाम दिया  गया एवं उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया।

  • सपरिषद गवर्नर जनरल को बंगाल में फोर्ट विलियम की प्रेसिडेन्सी के सैनिक एवं असैनिक शासन का अधिकार दिया गया तथा कुछ विशेष मामलों में मद्रास और बम्बई की प्रेसिडेन्सियों का अधीक्षण भी करना था।

  • इसी एक्ट के तहत कलकत्ता में 1774 ई. में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीश थे।

  • कंपनी के कर्मचारियों पर निजी व्यापार करने तथा भारतीयों से उपहार लेने पर प्रतिबंध था।

  • ब्रिटिश सरकार ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (कंपनी की गवर्निंग बॉडी) के माध्यम से कंपनी पर नियंत्रण स्थापित किया।

  • पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा

  • कंपनी के राजनीतिक और व्यापारिक कार्यों का पृथक्करण किया गया।

  • इस एक्ट में निदेशक मंडल को कंपनी के व्यापारिक मामलों के अधीक्षक की अनुमति तो दी गई, परंतु राजनैतिक मामलों के प्रबंधन के लिए नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) का गठन किया गया।

  • 1786 के अधिनियम के द्वारा

  • गवर्नर जनरल को विशेष पारिस्थितियों में अपने परिषद के निर्णय को निरस्त करने अथवा लागू करने का अधिकार प्रदान किया गया।

  • गवर्नर जनरल को प्रधान सेनापति की शक्तियां भी प्रदान की गई। ये दोनों अधिकार सर्वप्रथम लॉर्ड कॉर्नवालिस ने प्राप्त किया।

  • 1793 के चार्टर एक्ट के द्वारा

  • कंपनी के अधिकारों को 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।

  • 1813 के चार्टर एक्ट द्वारा

  • पहली बार भारतीयों की शिक्षा पर प्रति वर्ष 1 लाख रुपये खर्च करने का उपबंध किया गया।

  • कंपनी के भारतीय व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया। यद्यपि चीन के साथ तथा चाय के व्यापार पर एकाधिकार बना रहा।

  • 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा

  • बंगाल के गवर्नर जनरल को संपूर्ण भारत का गवर्नर जनरल बना दिया गया। देश की शासन प्रणाली का केद्रीकरण कर दिया गया।

  • लॉर्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे।

  • कंपनी के समस्त व्यापारिक कार्य समाप्त कर दिए गए तथा भविष्य में उसे केवल राजनैतिक कार्य ही करने थे।

  • गवर्नर जनरल की परिषद में एक कानूनी सदस्य (चौथा सदस्य) को सम्मिलित किया गया।

  • सर्वप्रथम मैकाले को कानूनी सदस्य के रुप में शामिल किया गया।

  • इस एक्ट के तहत सपरिषद गवर्नर जनरल को पूरे भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया था।

  • इसी एक्ट में नियुक्तियों के लिए योग्यता संबंधी मानदंड अपनाकर भेदभाव को समाप्त किया गया।

  • 1853 के चार्टर द्वारा

  • विधायी शक्तियों को कार्यपालिका शक्तियों से पृथक करने की व्यवस्था की गई।

  • विधि निर्माण हेतु भारतीय (केन्द्रीय) विधान परिषद की स्थापना की गई।

  • सिविल सेवकों की भर्ती एवं चयन हेतु खुली प्रतियोगिता का शुभारंभ किया गया।

  • 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट में कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया था। सर एलिजा इम्पे इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश थे।

  • नियामक अधिनियम (Regulatin Act) 1773 – सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना से संबंधित है।

  • पिट्स का भारतीय अधिनियम, 1784 – नियंत्रण परिषद की स्थापना से संबंधित है।

  • चार्टर अधिनियम, 1813 – इंग्लिश मिशनरियों को भारत मे कार्य करने की अनुमति से संबंधित है।

  • चार्टर अधिनियम, 1833 –  गवर्नर जनरल-परिषद मे कानूनी सदस्य की नियुक्ति से संबंधित है।

  • चार्टर एक्ट, 1833 की धाराओं में सबसे महत्वपूर्ण धारा संख्या 87 थी, जिसमें यह कहा गया था कि “किसी भी भारतीय अथवा क्राउन की देशज प्रजा को अपने धर्म, जन्म स्थान, वंशानुक्रम, वर्ग अथवा इनमें से किसी एक कारणवश कंपनी के अधीन किसी स्थान, पद अथवा सेवा के अयोग्य नही माना जा सकेगा” कालांतर में राजनैतिक आंदोलन में 1833 एक्ट की यह धारा प्रशासन में भागीदारी हेतु मुख्य आधार बनी।

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ब्रिटिश ताज के शासनाधीन पारित अधिनियम

  • भारत शासन अधिनियम, 1858 के द्वारा

  • भारत का शासन ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया के अधीन कर दिया गया।

  • गवर्नर जनरल के पदनाम को बदलकर भारत का वायसराय कर दिया गया, जो ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया।

  • लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।

  • नियंत्रण बोर्ड और निदेशक बोर्ड को समाप्त कर दिया गया।

  • इस अधिनियम द्वारा “भारत के राज्य सचिव पद” का सृजन किया गया, जिसमें भारतीय प्रशासन पर संपूर्ण नियंत्रण की शक्ति निहित थी।

  • भारत परिषद अधिनियम, 1861 द्वारा

  • कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुई।

  • अधिनियम द्वारा मद्रास एवं बंबई प्रेसीडेंसियों को पुनः विधायी शक्तियां देकर विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत की गई।

  • इसने वायसराय को आपातकाल में परिषद की संस्तुति के बिना अध्यादेश जारी करने के लिए अधिकृत किया।

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  • भारत परिषद अधिनियम, 1892 के माध्यम से

  • केन्द्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई।

  • केन्द्रीय विधान परिषद के भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने तथा सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार भी दिया गया।

  • निर्वाचन पध्दति का आरंभ किया जाना इस अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषता थी।

  • भारत परिषद अधिनियम, 1909 को मार्ले-मिंटो सुधार के नाम से भी जानते हैं।

  • इस अधिनियम द्वारा भारतीयों को विधि निर्माण तथा प्रशासन दोनों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया।

  • इस अधिनियम ने केन्द्रीय तथा प्रांतीय विधायिनी शक्ति को बढ़ा दिया।

  • परिषद के सदस्यों को बजट की विवेचना करने तथा उस पर प्रश्न करने का अधिकार दिया गयाथ।

  • पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमो के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया था।

  • भारत शासन अधिनियम, 1919 को मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के नाम से जाना जाता है।

  • इस अधिनियम द्वारा पहली बार प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली अपनाई गई।

  • सांप्रदायिक आधार पर निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करते हुए इसमें सिक्खो, ईसाइयों, आंग्ल-भारतीयों तथा यूरोपीय पर भी लागू कर दिया गया।

  • इस अधिनियम द्वारा पहली बार केन्द्र मे द्ववीसदनीय व्यवस्था स्थापिक की गई।

  • इस अधिनियम द्वारा सभी विषयों को केन्द्र तथा प्रांतों में  बांट दिया गया।

  • द्वीसदनीय केन्द्रीय विधानमंडल समस्त ब्रिटिश भारत के लिए कानून बना सकती थी। इस अधिनियम के तहत प्रांतो में द्वैध शासन प्रणाली लागू की गई।

  • प्रांतीय विषयों को दो भागों – आरक्षित तथा हस्तांतरित विषयों में  बांटा गया।

  • इस अधिनियम में पहली बार उत्तरदायी शासन शब्द का प्रयोग किया गया। इसके अंतर्गत एक आयोग का गठन किया जाना था, जिसका कार्य दस वर्ष बाद इस अधिनियम की समीक्षा करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था।

  • भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा

  • सर्वप्रथम भारत में संघात्मक सरकार की स्थापना की गई।

  • इस अधिनियम द्वारा प्रांतो में द्वैध शासन समाप्त करके केन्द्र मे द्वैध शासन प्रणाली लागू की गई।

  • भारत मुद्रा एवं साख पर नियंत्रण के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गई।

  • सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करते हुए दलित जातियों, महिलाओं और मजदूरों को इसमें सम्मिलित किया गया।

  • इसी अधिनियम के तहत वर्ष 1937 में संघीय न्यायालय की स्थापना की गई।

  • इस अधिनियम द्वारा बर्मा को ब्रिटिश भारत से अलग कर दिया गया तथा दो नए प्रांत सिंध और उड़ीसा का निर्माण हुआ।

  • इसके तहत कुछ प्रांतों मे द्वीसदनात्मक व्यवस्था की गई।

  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने 15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र घोषित किया।

  • इसने वायसराय का पद समाप्त कर दोनों डोमिनयन राज्यों में गवर्नर-जनरल का पद सृजित किया।

  • इसके अंतर्गत शाही उपाधि से भारत का सम्राट शब्द समाप्त कर दिया।

  • 1892 के भारतीय परिषद अधिनियम ने विधान परिषद के कार्यों में वृध्दि की। इसके तहत बजट पर बहस करने की शक्ति दी गई परंतु मतदान का अधिकार नही था। इस अधिनियम के तहत कार्यपालिका से प्रश्न पूछने की अनुमति दी गई।

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  • भारत में संघीय न्यायालय की स्थापना 1 अक्टूबर, 1937 को भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत की गई थी। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर मौरिस ग्वेयर थे।

  • 1919 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा केन्द्र में द्वीसदनीय विधानपालिका की स्थापना की गई। ऊपरी सदन, राज्य परिषद (Council of State) कहलाता था, जो 5 वर्ष के लिए होता था और उसके 60 सदस्यों मे से 34 निर्वाचित तथा 26 मनोनीत होते थे। निचला सदन केन्द्रीनय विधानसभा (Central Legistaltive Assembly) कहलात था, जो 3 वर्ष  के लिए होता था और उसके 144 सदस्यों मे से 104 निर्वाचित तथा 40 मनोनीत होते थे।

  • यद्यपि ब्रिटिश भारत में गवर्नर जनरल को 1861 के भारत परिषद अधिनियम से ही विधान परिषद की अनुमति के बिना अध्यादेश जारी करने की शक्ति थी तथापि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्गत करने की शक्ति (अनु. 123) भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 42 से प्रेरित है।

  • संवैधानिक निरंकुशता का सिध्दांत, भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा प्रवृत्त किया गया। यह अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा सर्वाधिक विस्तृत अधिनियम था। साथ ही यह भारत के लिए तैयार संवैधानिक प्रस्तावों में से सबसे जटिल दस्तावेज था। इसी अधिनियम में भारत संघ की स्थापना, संघीय न्यायपालिका, केन्द्र और राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन आदि की व्यवस्था की गई थी।

  • ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1935 का भारत शासन अधिनियम पारित किया गया जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा किया गया था तथा राज्य में द्वैध शासन समाप्त कर केन्द्र में द्वैध शासन लागू किया गया था। इसमें एक अखिल भारतीय महासंघ स्थापित करने का प्रावधान शामिल किया गया था। इस संघ का निर्माण तत्कालीन ब्रिटिश भारत के प्रांतो, चीफ कमिश्नर प्रांतों एवं देशी रिसायतों से मिलाकर होना था, परंतु यह व्यवस्था लागू नही की जा सकी। 1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा स्थापित होने वाले संघ में अवशिष्ट शक्तियाँ गवर्नर जनरल को प्रदान की गई थी।

  • भारत के लिए संविधान का सर्वप्रथम उल्लेख क्रिप्स मिशन में किया गया था।

  • भारत का वर्तमान संवैधानिक ढांचा बहुत कुछ 1935 के अधिनियम पर आधारित है। 1935 के मुख्य उपबंध इस प्रकार हैं –

  1. संघात्मक सरकार की स्थापना

  2. केन्द्र मे द्वैध शासन की स्थापना

  3. प्रांतो में द्वैध शासन के स्थान पर स्वायत्त शासन की स्थापना

  4. द्वीसदनीय केन्द्रीय विधानमंडल

  5. प्रांतीय शासन की व्यवस्था

  6. प्रांतीय विधानमंडल

  7. केन्द्र एवं प्रांतों में शक्तियों का विभाजन

  8. फेडरल न्यायालय की स्थापना

  • गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के प्रावधानों के अनुरुप वर्ष 1937 में बर्मा को भारत से अलग किया गया था।

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संविधान सभा एवं संविधान निर्माण प्रक्रिया

  • भारतीयों की ओर से संविधान सभा की सर्वप्रथम मांग मई, 1934 में रांची में गठित स्वराज पार्टी ने की थी। वर्ष 1934 में ही भारत में संविधान सभा के गठन का विचार एम.एन.राय ने दिया।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्तर पर पहली बार वर्ष 1935 में संविधान निर्माण के लिए आधिकारिक रुप से संविधान सभा की मांग की गई।

  • एक निर्वाचित संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान का निर्माण करने का प्रस्ताव सर्वप्रथम वर्ष 1942 में क्रिप्स मिशन द्वारा किया गया था।

  • कैबिनेट मिशन योजना, 1946 द्वारा –

  • भारतीय संविधान सभा का प्रतिनिधित्व निर्वाचन के आधार पर गठन किया गया था।

  • कैबिनेट मिशन की रिपोर्ट के अनुसार, संविधान सभा निर्वाचित होनी थी और प्रांतों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर होना था।

  • इसके तहत मोटे तौर पर प्रति दस लाख व्यक्तियों पर एक प्रतिनिधि के निर्वाचन की व्यवस्था प्रस्तावित थी।

  • संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 निर्धारित थी। इनमें से 296 सीटें ब्रिटिश भारत को तथा 93 सींटे देशी रियासतों को आवंटित की जानी थी।

  • ब्रिटिश भारत को आवंटित 296 सीटो में से 292 सदस्यों का चयन 11 गवर्नरों के प्रांतों और 4 का चयन मुख्य आयुक्तों के प्रांतों (प्रत्येक में से एक) से किया जाना था।

  • देशी रियासतों के प्रतिनिधित्व का चयन रियासतों के प्रमुखों द्वारा किया जाना था।

  • संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त, 1946 में संपन्न हुआ।

  • 296 सीटों (ब्रिटिश भारत को आवंटित) में से कांग्रेस को 208, मुस्लिम लीग को 73 तथा छोटे समूह व स्वतंत्र सदस्यों को 15 सीटें मिली।

  • देशी रियासतों ने संविधान सभा में भाग नहीं लिया। संविधान सभा अप्रत्यक्ष निर्वाचन का परिणाम थी।

  • राज्यों की विधानसभाओं का उपयोग निर्वाचक मंडल के रुप मे किया गया। यह निर्वचान वयस्क मताधिकार पर आधारित था।

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  • 1935 के अधिनियम के अनुसार –

  • मताधिकार कर, शिक्षा एवं संपत्ति के आधार पर सीमित था।

  • 20 नवंबर, 1946 को वायसराय ने निर्वाचित प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया कि वे 9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक में उपस्थित हो।

  • 9 दिसंबर, 1946 को सभा की पहली बैठक में कुल 207 सदस्यों ने हिस्सा लिया।

  • 9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की प्रथम बैठक की अध्यक्षता अस्थायी डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा ने की थी।

  • 11 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा ने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को निर्विरोध संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष के रुप में निर्वाचित किया।

  • भारतीय संविधान के निर्माण में संविधान सभा को 2 वर्ष 11 माह एवं 18 दिन का समय लगा था।

  • इसके लिए कुल 11 अधिवेशन (कुल अवधि 165 दिन) हुए थे।

  • इन 11 अधिवेशनों के अतिरिक्त संविधान सभा पुनः 24 जनवरी, 1950 को समवेत हुई, जब सदस्यों द्वारा भारत के संविधान पर हस्ताक्षर किए गए थे।

  • भारतीय संविधान के निर्माण के समय बेनेगल नरसिंह राव (बी.एन.राव) को सांविधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था।

  • 26 नवंबर, 1949 को भारत के लोगों द्वारा संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया।

  • संविधान पूर्ण रुप से 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।

  • संविधान सभा में कुल महिलाओं की संख्या 15 थी। उनके नाम इस प्रकार हैं –

  1. विजयलक्ष्मी पंडित

  2. राजकुमारी अमृत कौर

  3. सरोजिनी नायडू

  4. सुचेता कृपलानी

  5. पूर्णिमा बनर्जी

  6. लीला राय

  7. जी. दुर्गाबाई

  8. हंसा मेहता

  9. कमला चौधरी

  10. रेणुका राय

  11. मालती चौधरी

  12. दक्षयानी

  13. वेलायुदन

  14. बेगम एजाज रसूल

  15. ऐनी मस्करीनी

  16. अम्मु स्वामीनाथन

  • ग्रेनविले ऑस्टिन ने कहा था कि संविधान सभा कांग्रेस थी और कांग्रेस भारत।

  • 2 सितंबर, 1946 को अंतरिम सरकार का गठन किया गया इसमें मुस्लिम लीग के सदस्य शामिल नही हुए हालांकि उनके शामिल होने के लिए विकल्प खुला रखा गया था। अंतत 26 अक्टूबर, 1946 को जब सरकार का पुनर्गठन किया गया तब मुस्लिम लीग के पांच प्रतिनिधियों को कैबिनेट में शामिल किया गया।

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प्रथम अंतरिम कैबिनेट – 1946

विभाग

प्रभारी का नाम

उप सभापति, विदेश एवं राष्ट्रमंडल संबंध

जवाहर लाल नेहरु

गृह, सूचना एवं ब्राडकॉस्टिंग

सरदार वल्लभ भाई पटेल

कृषि एवं खाद्य

राजेन्द्र प्रसाद

कला, शिक्षा एवं स्वास्थ्य 

शफात अहमद खान

वाणिज्य

सी.एच.भाभा

रक्षा

बलदेव सिंह

वित्त

जान मथाई

उद्योग एवं आपूर्ति

सी. राजगोपालचारी

श्रम

जगजीवन राम

रेलवे, संचार, डाक एवं वायु परिवहन

आसफ अली

कारखाना, खान एवं विद्युत

शरत चन्द्र बोस

 

 

पुनर्गठित अंतरिम कैबिनेट – 1946

विभाग

प्रभारी का नाम

उप सभापति, विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल संबंध

जवाहर लाल नेहरु

कृषि एवं खाद्य

राजेन्द्र प्रसाद

वाणिज्य

इब्राहिम इस्माइल चुंदरीगर

रक्षा

बलदेव सिंह

वित्त

लियाकल अली खान

गृह, सूचना एवं ब्राडकास्टिंग

वल्लभ भाई पटेल

श्रम

जगजीवन राम

रेलवे, संचार, डाक एवं वायु परिवहन कारखाना, खान एवं विद्युत

अब्दुल रब निश्तर

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  • एक निर्वाचित संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान का निर्माण करने (द्वितीय विश्व युध्द के समाप्त होने के पश्चात) का प्रस्ताव सर्वप्रथम क्रिप्स मिशन (1942) द्वारा किया गया था।

  • कैबिनेट मिशन वर्ष 1946 में भारत आया था। मिशन ने अपनी रिपोर्ट में संविधान सभा के गठन का सूत्र प्रस्तुत किया था जिसके आधार पर संविधान सभा निर्वाचित होनी थी और प्रांतों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर होना था। इसके तहत मोटे तौर पर प्रति दस लाख व्यक्तियों के ऊपर एक प्रतिनिधि के निर्वाचन की व्यवस्था प्रस्तावित थी।

  • कैबिनेट मिशन मार्च, 1946 में भारत पहुंचा। इस मिशन के सदस्य स्टैफोर्ड क्रिप्स (अध्यक्ष बोर्ड ऑफ ट्रेड), पेथिक लॉरेंस (भारत सचिव) और ए.बी. अलेक्जेंडर (नौसेना मंत्री) थे।

  • 24 अगस्त, 1946 को अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की घोषणा इस व्यवस्था के साथ की गई कि अंतरिम सरकार 2 सितंबर, 1946 को कार्यभार संभालेगी। वायसराय इसमें कार्यपालिका परिषद का पदेन अध्यक्ष था तथा जवाहरलाल नेहरु को उपाध्यक्ष या उपसभापति बनाया गया।

  • अक्टूबर, 1943 में लॉर्ड लिनलिथगो के स्थान पर बिस्काउंट वेवेल वायसराय तथा गवर्नर जनरल नियुक्त किए गए। वे भारतीय सांविधानिक गतिरोध को दूर करने के उद्देश्य से मई, 1945 में लंदन गए। वहां उन्होंने भारतीय प्रशासन के संबंध में ब्रिटिश सरकार से विस्तार से बात की तथा कुछ प्रस्ताव रखे। जून, 1945 में उन प्रस्तावों को वेवेल योजना के नाम से सार्वजनिक सदस्यों की संख्या हिन्दुओं के  बराबर होना, परिषद में वायसराय तथा कमांडर इन चीफ को  छोड़कर सभी सदस्यों का भारतीय होना, शीघ्र ही शिमला में एक सम्मेलन का बुलाया जाना तथा युध्द समाप्ति के पश्चात भारतीयों के द्वारा खुद का  संविधान बनाया जाना इत्यादि प्रावधान शामिल थे।

  • वेवेल योजना का उद्देश्य राजनीतिक गतिरोध दूर करना, भारत को पूर्ण स्वशासन की दिशा में आगे बढ़ाना और सांविधानिक गतिरोध दूर करना था। इसका उद्देश्य कही से भी हिंदु-मुस्लिम एकता को दृढ़ करना नही था, जिससे भारत का विभाजन रुक सके।

  • मई, 1934 में रांची में गठित स्वराज पार्टी ने आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग की और एक प्रस्ताव पारित किया जिसमे कहा गया कि वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों की एक संविधान सभा होगी, जो संविधान का निर्माण करेगी। भारतीयों की ओर से संविधान सभा की मांग करने का यह प्रथम अवसर था।

  • संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन के द्वारा हुआ था।

  • भारतीय संविधान सभा की स्थापना 9 दिसंबर, 1946 को उसकी प्रथम बैठक के आरंभ होने के साथ हुई थी।

  • 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा द्वारा भारत को एक संविधान देने का उद्देश्य प्रस्ताव पारित किया गया। उद्देश्य प्रस्ताव को 13 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा में जवाहर लाल नेहरु द्वारा पेश किया गया था। आगे चल कर यही उद्देश्य प्रस्ताव का प्रारुप बना।

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संविधान सभा के पहले उपाध्यक्ष

एच.सी. मुखर्जी

प्रारुप समिति के मूलतः एकमात्र कांग्रेसी सदस्य

के.एम. मुंशी

राजस्थान की रियासतों का प्रतिनिधित्व करने वाले संविधान सभा के सदस्य

वी.टी. कृष्णमाचारी

संघ-संविधान समिति के अध्यक्ष

जवाहरलाल नेहरु

 

  • भारतीय संविधान के निर्माण के समय बेनेगल नरसिंह राव (बी.एन.राव) को सांविधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था।

  • संविधान सभा के सांविधानिक सलाहकार बी.एन. राव द्वारा संविधान का पहला प्रारुप तैयार किया गया था जिस पर विचार एवं परिर्वतन करके प्रारुप समिति का संविधान सभा के समक्ष संविधान का मसौदा प्रस्तुत किया गया। बी.एन. राव के मूल  प्रारुप में 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियाँ थी।

  • संविधान सभा में भारतीय संविधान का तृतीय वाचन 17 नवंबर, 1949 से प्रारंभ हुआ और 26 नवंबर, 1949 तक चला।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (दिसंबर, 1929) में पूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई तथा 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाए जाने का संकल्प लिया गया और आजादी के पूर्व तक 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रुप में मनाया जाता रहा। परंतु भारत 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हो गया और तब से प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को स्वाधीनता  दिवस के रुप में मनाया जाने लगा। जबकि स्वतंत्रता प्राप्त कि पश्चात 26 जनवरी की तिथि को अविस्मरणीय बनाने हेतु भारतीय संविधान को पूर्णतः 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया और तब से प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रुप में मनाया जाने लगा।

  • संविधान सभा के गयारहवें अधिवेशन में 26 नवंबर, 1949 को भारतीय संविधान, संविधान सभा द्वारा अपनाया गया।

  • वर्ष 1946 में संपन्न संविधान सभा के प्रारंभिक चुनाव में डॉ. भीमराव अम्बेडकर अविभाजित भारत के बंगाल प्रांत के पूर्वी भाग से निर्वाचित हुए थे। बाद में यह क्षेत्र पाकिस्तान मे चले जाने के कारण डॉ. अम्बेडकर भारतीय गणराज्य के बंबई प्रेसीडेंसी के पूना संसदीय क्षेत्र से उपचुनाव में निर्वाचित होकर भारतीय संविधान सभा में सम्मिलित हुए। पूना सीट उनके लिए कांग्रेस के एम. आर. जयकर ने त्यागपत्र देकर रिक्त की थी।

  • नवंबर-दिसंबर, 1932 में लंदन मे आयोजित तीसरे और अंतिम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस ने भाग नहीं लिया था। इस सम्मेलन में भारत सरकार अधिनियम, 1935 के लिए एक ठोस योजना को अंतिम रुप में पेश किया गया था। इसमे ब्रिटिश भारत के सूबों और भारतीय रियासतों के एक संघ पर आधारित आल इंडिया फेडरेशन के गठन का प्रावधान किया गया था।

  • भारत का संविधान देश की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में पूर्णतः सक्षम है। तथा भावी आवश्यकताओं के मद्देनजर इसमें संशोधन संबंधी प्रावधान भी हैं। दूसरे ओर इसमें विभिन्न देशों के संविधानों से तथ्य एवं विचार ग्रहण किए गए हैं, अतः इसे एक गृहीत संविधान भी कहा जाता है।

  • संविधान सभा में वयस्क मताधिकार विषय पर बहस के दौरान मौलाना अबुल कलाम आजाद ने वयस्क मताधिकार को 15 वर्षों के लिए स्थगित करने की वकालत की थी, किंतु डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं पं. जवाहर लाल नेहरु ने जोरदार ढंग से इसे अपनाने के लिए इसका समर्थन किया था।

  • भारत की स्वतंत्रता के उपरांत महात्मा गांधी ने यह सुझाव दिया था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को अब एक राजनैतिक दल के रुप में भंग कर दिया जाना चाहिए।

  • अपनी राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया में भारतीय संविधान के निर्माताओं अल्पसंख्यकों के हितों तथा भावनाओं के महत्व को कम करके आंका है – यह कथन आइवर जोनिंग्स (Ivor Jennings) का है। उनका मानना था कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारतीय संघ में अल्पसंख्यक हितों और भावनाओं के महत्व को न्यूनतम रखने का प्रयास किया है।

  • संविधान सभा कांग्रेस थी और कांग्रेस भारत था” यह वक्तव्य पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त इतिहासकार ग्रैनविले ऑस्टिन का था। यह वक्तव्य उनकी पुस्तक द इंडियन कांस्टीट्यूशन (The Indian Constitution) में वर्णित है।

  • भारतीय संविधान सभा में कुल महिलाओं की संख्या 15 थी।

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संविधान सभा की प्रमुख समितियां

  • संविधान सभा द्वारा अपने विभिन्न कार्यों को संपादित करने के लिए अनेक समितियों का गठन किया गया था।

  • प्रमुख समितियां एवं उनके अध्यक्ष का विवरण इस प्रकार है –

समिति

अध्यक्ष

संघ संविधान समिति

जवाहर लाल नेहरु

नियम समिति

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

संचालन समिति

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

प्रारुप समिति

डॉ. भीमराव अम्बेडकर

1.  मूल अधिकार उपसमिति

जे.बी. कृपलानी

2.  अल्पसंख्यक उपसमिति

एच.सी. मुखर्जी

संघ शक्ति समिति

जवाहरलाल नेहरु

प्रांतीय संविधान समिति

सरदार वल्लभभाई पटेल

सलाहकार समिति

सरदार बल्लभभाई पटेल

 

  • प्रारुप समिति में अध्यक्ष भीमराव अम्बेडकर समेत कुल 7 सदस्य थे।

  • जिनमें एन. गोपालस्वामी आयंगर, अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी, मोहम्मद सादुल्लाह, बी.एल. मित्र एवं डी.पी. खेतान शामिल थे।

  • बाद में इनमें बी.एल. मित्र के स्थान पर एन. माधव राव तथ डी.पी. खेतान की वर्ष 1948 में मृत्यु हो जाने पर टी.टी. कृष्णामाचारी को इस समिति में शामिल किया गया। तदर्थ झंडा समिति का गठन संविधान निर्मात्री परिषद 23 जून, 1947 को किया था जिसके अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे तथा अन्य सदस्य थे – अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू, सी. राजगोपालचारी, के.एम. मुंशी एवं डॉ. बी.आर. अम्बेडकर।

  • संविधान के प्रारुप पर विचार करने हेतु संविधान सभा द्वारा 29 अगस्त, 1947 को संकल्प पारित करके डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में प्रारुप समिति का गठन किया गया था।

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संविधान का स्रोत

  • भारतीय संविधान का अधिकांश भाग भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है।

  • ब्रिटेन के संविधान द्वारा संसदीय शासन पध्दति, विधि का शासन, मंत्रिमंडलीय प्रणाली, एकल नागरिकता, द्विसदनीय प्रणाली, विधायी प्रक्रिया और संसदीय विशेषाधिकार, परमाधिकार लेख आदि उपबंध लिए गए हैं।

  • अमेरिकी संविधान से उद्देशिका का विचार, न्यायिक पुनर्विलोकन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मूल अधिकार, उपराष्ट्रपति का पद, राष्ट्रपति पर महाभियोग और उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाए जाने के उपबंध ग्रहण किए जाने हैं।

  • आयरलैंड के संविधान से प्रेरणा लेकर नीति-निदेशक तत्व, राष्ट्रपति की निर्वाचन पध्दति, राज्य सभा में कुछ सदस्यों का नामांकन सम्मिलित किए गए हैं।

  • कनाडा के संविधान से सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, केन्द्र द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति, उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना आदि ग्रहण की गई हैं।

  • संसद के दोनों सदनों की बैठक, उद्देशिका की भाषा, व्यापार-वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता तथा समवर्ती सूची की व्यवस्था ऑस्ट्रेलिया के संविधान से ग्रहण की गई है।

  • जर्मनी के संविधान से आपातकालीन उपबंध का (वित्तीय आपात को छोड़कर) प्रावधान किया गया है।

  • जापान से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया तथा दक्षिण अफ्रीका के संविधान से संविधान संशोधन की व्यवस्था तथा राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन ग्रहण किया गया।

  • मूल कर्तव्य तथा प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) के आदर्श को सोवियत संघ के संविधान से लिया गया है।

  • भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में संविधान सर्वोच्च है। यही राजव्यवस्था के स्वरुप और उद्देश्य का निर्धारण करता है एवं विभिन्न इकाइयों के सृजन का प्रावनधान करता है। संविधान से ही शासन के सभी अंग अधिकार एवं शक्ति प्राप्त करते हैं।

  • भारत में न्यायिक पुनरीक्षण की संकल्पना संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से ली गई है। इसका आशय है कि सर्वोच्च न्यायालय विधानों एवं आदेशों न्यायिक पुनर्विलोकन कर सकता है तथा उन विधानों एवं आदेशों को शून्य घोषित कर सकता है, जो संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।

  • भारतीय संविधान में राज्यों का संघ की संकल्पना ब्रिटिश नॉर्थ अमेरिका एक्ट (कनाडा) से प्रेरित हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1(1) के अनुसार भारत राज्यों का संघ है।

  • भारतीय संसदीय प्रणाली में न्यायिक पुनर्विलोकन की प्रणाली है, जबकि ब्रिटेन में यह प्रणाली नही लागू है। इस अर्थ में भारतीय संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से भिन्न है। इसके अतिरिक्त वास्तविक एवं नाममात्र की कार्यपालिका, सामूहिक उत्तरदायित्व तथा द्विसदनीय विधायिका भारत एवं ब्रिटेन दोनों की संसदीय प्रणालियों में लागू हैं।

  • अमेरिका के संविधान में संघीय प्रणाली का स्पष्ट उल्लेख है। भारत के संविधान में भारत को राज्यो का संघ बताया गया है, किंतु संविधान के कतिपय प्रावधान राज्यों की अपेक्षा केन्द्र को ज्यादा शक्तिशाली बनाने पर जोर देते हैं। इससे कुछ विद्वान भारत के संविधान को संघात्मक एवं प्रणालियों का मिश्रण मानते हैं, किंतु भारतीय संविधान एकात्मक प्रणाली का लक्षण लिए हुए मूल रुप से संघीय संविधान है, ऐसा मानना ज्यादा उचित है।

  • भारत के संविधान में समवर्ती सूची को ऑस्ट्रेलिया के संविधान से लिया गया है। इस सूची में ऐसे विषय शामिल हैं, जिन पर केन्द्र एवं राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है। दोनों  द्वारा निर्मित कानूनों में टकराव की स्थिति में केन्द्र द्वारा निर्मित कानून की मान्य होगा। इसे सातवीं अनूसूची में शामिल किया गया है।

  • राज्य के गठन में प्रतिभा, अनुभव एवं सेवा को प्रतिनिधित्व देने में भारतीय संविधान निर्माता आयरिश (आयरलैंड) गणतंत्र से प्रभावित हुए थे।

  • मूल कर्तव्य (अनु. 51-क) मूलतः अंगीकृत संविधान के भाग नही थे। इन्हें 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा सम्मिलित किया गया। ये मूल कर्तव्य पूर्व सोवियत संघ के संविधान से लिए गए हैं।

  • भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा संविधान है। इसमें 22 भाग, 395 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं। इसमें मौलिक अधिकारों का अध्याय अमेरिका के संविधान के मॉडल से लिया गया है। परंतु मौलिक अधिकार की वजह से ही भारतीय संविधान लंबा नही हुआ।

  • संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रथम पूर्ण लिखित संविधान है। यह विश्व का सबसे छोटा लिखित संविधान है। जिसमें मात्र 7 अनुच्छेद शामिल हैं। वहीं भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें 395 अनुच्छेद शामिल हैं।

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संविधान में अनुच्छेद

  • भारतीय संविधान में 400 से अधिक आर्टिकिल (अनुच्छेद) हैं तथा आज इनकी संख्या लगभग 450 पहुंच गई है, परंतु यह सभी मूल अनुच्छेदों के साथ उपखंड अर्थात क, ख,  ग आदि के रुप में  जुड़े हुए हैं।

  • संविधान के मूल पाठ में 22 भाग, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थी। संशोधनों के द्वारा कुछ नए अनुच्छेद जोड़े गए और कुछ अनुच्छेद निकाले भी गए। नई अनसूचियां भी जोड़ी गई हैं और उनकी संख्या 8 से बढ़कर 12 हो गई है।

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  • विधानतः नए राज्य को शामिल करना – अनुच्छेद 2

  • नए राज्यों का गठन–भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3

  • विधि के सम्मुख समानता-अनुच्छेद 14

  • अपृश्यता का अंत-अनुच्छेद 17

  • गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण -अनुच्छेद 22

  • नीति निदेशत तत्व-अनुच्छेद 36

  • भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्वों के तहत समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता -अनु. 36 A

  • ग्राम पंचायतों का गठन-अनु. 40

  • कार्य करने का अधिकार-अनु. 41

  • कार्य करने के लिए सही और मानवीय स्थितियां-अनु. 42

  • समान नागरिक संहिता-अनु. 44

  • बच्चों के लिए मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा-अनु. 45

  • कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण – अनु. 50

  • कृषि एवं पशुपालन का संगठन-अनु. 48

  • भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन-अनु. 54

  • प्रधानमंत्री व मंत्रि परिषद का गठन-अनु. 75

  • भारत का महान्यायवादी- अनु. 76

  • राष्ट्रपति को जानकारी देने के संबंध में प्रधानमंत्री के कर्तव्य-अनु. 78

  • राष्ट्रपति का विधेयक को अनुमति देने का अधिकार -अनु. 111

  • अनुच्छेद 117 में प्रावधान है कि अनुच्छेद 110(1)(क) में उल्लिखित कर संबंधी प्रावधान अर्थात कर अधिरोपण करने वाले विधेयक या संशोधन राष्ट्रपति की सिफारिश से ही पुनःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा, अन्यथा नही और ऐसा उपबंध करने वाला विधेयक राज्य सभा में पुनःस्थापित नही किया जाएगा।

  • अनु. 119 में संसद में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन,

  • अनु. 121 में उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के संबंध में चर्चा निर्बंधन तथा अनु. 123 मे संसद के विश्रांति काल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति का उल्लेख है।

  • अनुच्छेद 125 में सर्वोच्च न्यायालय के गठन का प्रावधान है।

  • अनुच्छेद 131 – सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

  • भारत का नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक-अनुच्छेद 148

  • अनुच्छेद 155- राज्यपाल की नियुक्त

  • अनुच्छेद-164 मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रिपरिषद की नियुक्ति।

  • राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति संबंधी प्रावधान अनुच्छेद 165 में है।

  • राज्य विधानसभाओं की संरचना अनुच्छेद 170 में वर्णित है।

  • अनु. 215 – उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना।

  • अनु. 222- किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में अंतरण।

  • अनु. 226 – विशेष रिट जारी करने की उच्च न्यायालय की शक्ति।

  • अनु. 227 – सभी न्यायालयों के अधीक्षण की उच्च न्यायालय की शक्ति,

  • अनुच्छेद – 245 संसद द्वारा और राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई विधियों का विस्तार (विधायी शक्तियों का वितरण)

  • वित्त आयोग – अनुच्छेद 280

  • अखिल भारतीय सेवाएं – अनु. 312

  • संघ लोक सेवा आयोग अनुच्छेद – 315

  • अनुच्छेद 318 में लोक सेवा आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा की सर्तों के बारे में विनियमन बनाने की शक्ति निहित है।

  • अनुच्छेद – 320 लोक सेवा आयोग के कार्य

  • अनुच्छेद 323-A प्रशासनिक अधिकरण

  • भारतीय संविधान के अनु. 324 में निर्वाचन आयोग के गठन का प्रावधान है।

  • अनु. 330 लोक सभा के लिए अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सदस्यों के आरक्षण।

  • अनुच्छेद 332 राज्यों की विधानसभाओं में अनूसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण से संबंधित है।

  • अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश दिए गए हैं।

  • अनुच्छेद 352 आपात की उद्घोषणा (आकस्मिक प्रावधान)।

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अनुच्छेद एक दृष्टि मेः

अनुच्छेद-1             –      संघ का नाम एवं राज्य क्षेत्र।

अनुच्छेद-2             –      नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना।

अनुच्छेद-3             –      नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन

अनुच्छेद-5             –      संविधान के प्रारंभ के समय नागरिकता।

अनुच्छेद-14            –      विधि के समक्ष समानता का अधिकार।

अनुच्छेद-15            –      धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध।

अनुच्छेद-16            –      लोक नियोजन के विषयों में अवसर की समानता।

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अनुच्छेद-17            –      अस्पृश्यता का अंत।

अनुच्छेद-18            –      उपाधियों का अंत

अनुच्छेद-19            –      वाक्-स्वातंत्र आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण।

अनुच्छेद-20            –      अपराधों के लिए दोष सिध्दि के संबंध में संरक्षण।

अनुच्छेद-21            –      प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।

अनुच्छेद-21(क)       –      6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।

अनुच्छेद-22            –      कुछ  दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण।

अनुच्छेद-23            –      मानव दुर्व्यापार एवं बलातश्रम का प्रतिषेध।

अनुच्छेद-24            –      कारखानों आदि में  बालकों के नियोजन का प्रतिषेध।

अनुच्छेद-25           –      अंतःकरण की और धर्म के अबाध रुप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्व.

अनुच्छेद-29            –      अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण।

अनुच्छेद-32            –      संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

अनुच्छेद-39            –      प्रत्येक नागरिक को चाहे वह  स्त्री हो या पुरुष समान कार्य के लिए समान वेतन।

अनुच्छेत-39(क)      –      समान न्याय तथा निःशुल्क विधिक सहायता।

अनुच्छेद-40            –      ग्राम पंचायत की स्थापना का प्रावधान।

अनुच्छेद-41            –      कुछ दशाओं मे काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार।

अनुच्छेद-44            –      नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता का प्रावधान

अनुच्छेद-45            –      छः वर्ष से कम आयु के बच्चों की बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा के लिए प्राव.

अनुच्छेद-48(क)       –      पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा।

अनुच्छेद-50            –      कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।

अनुच्छेद-51            –      अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि।

अनुच्छेद-51(क)       –      मूल कर्तव्य।

अनुच्छेद-52            –      भारत का राष्ट्रपति

अनुच्छेद-55            –      राष्ट्रपति के निर्वाचन की पध्दति।

अनुच्छेद-57            –      पुनर्निर्वाचन के ले पात्रता।

 

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अनुच्छेद-58            –      राष्ट्रपति पद की योग्यता।

अनुच्छेद-60            –      राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान।

अनुच्छेद-61            –      राष्ट्रपति पर चलाई जाने वाली महाभियोग की प्रक्रिया।

अनुच्छेद-66            –      उपराष्ट्रपति का निर्वाचन

अनुच्छेद-70            –      अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन।

अनुच्छेद-72            –      राष्ट्रपति को क्षमादान  (Pardons) की शक्ति।

अनुच्छेद-74            –      राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद

अनुच्छेद-75(1)       –      प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति

                                    प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा।

अनुच्छेद-76            –      भारत का महान्यायवादी

अनुच्छेद-79            –      संसद के गठन का प्रावधान।

अनुच्छेद-80            –      राज्य सभा की संरचना।

अनुच्छेद-81            –      लोक सभा की संरचना।

अनुच्छेद-83(1)       –      राज्य सभा एक स्थायी सदन।

अनुच्छेद-84            –      संसद की सदस्यता के लिए अर्हता।

अनुच्छेद-85            –      संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन।

अनुच्छेद-100(1)      –      लोक सभा अध्यक्ष द्वारा अपने निर्णायक मत का प्रयोग (पक्ष  एवं विपक्ष के मत

                                    बराबर (Tie) होने पर)

अनुच्छेद-108          –      कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।

अनुच्छेद-109          –      धन विधेयकों के संबंध में विशेष प्रक्रिया।

अनुच्छेद-110          –      धन विधेयक की परिभाषा।

अनुच्छेद-111          –      संसद के सदनों द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति।

अनुच्छेद-112          –      वार्षिक वित्तीय, विवरण।

अनुच्छेद-117          –      वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध।

अनुच्छेद-122          –      न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना।

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अनुच्छेद-123          –      संसद के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राष्ट्रपति की शक्ति।

अनुच्छेद-124          –      उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन।

अनुच्छेद-129          –      उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना।

अनुच्छेद-137          –      उच्चतम न्यायालय की पुनर्विलोकन (Review) की शक्ति।

अनुच्छेद-143          –      उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति।

अनुच्छेद-148          –      भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक।

अनुच्छेद-155          –      राज्यपाल की नियुक्ति।

अनुच्छेद-161          –      क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की

                                    राज्यपाल की शक्ति।

अनुच्छेद-164(1)      –      राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की नियुक्ति और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों

                                    की नियुक्ति।

अनुच्छेद-165          –      राज्य का महाधिवक्ता।

अनुच्छेद-169          –      राज्यों मे विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन।

अनुच्छेद-174          –      राज्यपाल द्वारा राज्य विधानमंडल के समय-समय पर सत्र बुलाने, उसका

                                    सत्रावसान करने तथा विधानसभा को विघटित करने का अधिकार।

अनुच्छेद-200          –      राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर अनुमति।

अनुच्छेद-201          –      राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित विधेयक।

अनुच्छेद-213          –      विधानमंडल के विश्रांतिकाल में राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति।

अनुच्छेद-214          –      राज्यो के लिए उच्च न्यायालय।

अनुच्छेद-215          –      उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना।

अनुच्छेद-216          –      उच्च न्यायालयों का गठन

अनुच्छेद-217          –      उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्तें।

अनुच्छेद-226          –      उच्च न्यायालय को कुछ रिट (Writs) जारी करने की शक्ति।

अनुच्छेद-231          –      दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना।

अनुच्छेद-233          –      जिलाधीशों की नियुक्ति।

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अनुच्छेद-239(क)(क)       –      दिल्ली के संबंध में विशेष उपबंध।

अनुच्छेद-241          –      संघ राज्य क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय।

अनुच्छेद-243(ख)    –      पंचायतो का गठन।

अनुच्छेद-243(झ)    –      पंचायतों के वित्तीय मामलों पर सिफारिश करने के लिए राज्यों द्वारा वित्त आयोग

                                    गठित करने का प्रावधान।

अनुच्छेद-243(ट)     –      पंचायतों के लिए निर्वाचन।

अनुच्छेद-243(थ)     –      नगरपालिकाओं का गठन

अनुच्छेद-243(य)(क)       –      नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन।

अनुच्छेद-243(य)(घ) –      जिला योजना के लिए समिति।

अनुच्छेद-243(य)(झ)       –      सहकारी समितियों का निगमन।

अनुच्छेद-249          –      राज्य सूची के विषय के संबंध में राष्ट्रीय हित में विधि बनाने की संसद की  शक्ति।

अनुच्छेद-253          –      अंतरराष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधान।

अनुच्छेद-262          –      अंतरराज्यिक नदियों के  जल संबंधी विवादों का न्यायनिर्णयन।

अनुच्छेद-263          –      अतंरराज्यपरिषद के संबंध में उपबंध।

अनुच्छेद-266          –      भारत और राज्यों की संचित निधियां और लोक लेखो के बारे में प्रावधान।

अनुच्छेद-267          –      भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund)

अनुच्छेद-280          –      वित्त आयोग (Finance Commission)

अनुच्छेद-300(क)     –      विधि के प्राधिकार के बिना व्यक्तियों को संपत्ति से वंचित न किया जाना।

अनुच्छेद-312          –      अखिल भारतीय सेवाएं

अनुच्छेद-315          –      संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग।

अनुच्छेद-324          –      निर्वाचनों के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण का निर्वाचन आयोग में निहित

                                    होना।

अनुच्छेद-326          –      लोक सभा और राज्यों की विधानसभाओं के लिए निर्वाचनों का वयस्क

                                    मताधिकार के आधार पर होना।

अनुच्छेद-330          –      लोक सभा में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों को लिए  सीटों का

                                    आरक्षण।

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अनुच्छेद-331          –      लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व।

अनुच्छेद-332          –      राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के

                                    लिए स्थानों का आरक्षण।

अनुच्छेद-333          –      राज्यों की विधानसभाओं मे आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व।

अनुच्छेद-338          –      राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग

अनुच्छेद-338(क)     –      राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग।

अनुच्छेद-340          –      राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग का गठन।

अनुच्छेद-343          –      संघ की राजभाषा हिंदी और  लिपि देवनागरी घोषित।

अनुच्छेद-344          –      राजभाषा आयोग।

अनुच्छेद-350(क)     –      प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएं।

अनुच्छेद-352          –      राष्ट्रीय आपात की घोषणा युध्द या बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में।

अनुच्छेद-356          –      राज्यों सांविधानिक तंत्र में विफल हो जाने की दशा मे उपबंध।

अनुच्छेद-360          –      वित्तीय आपातकाल घोषित करने का प्रावधान।

अनुच्छेद-368          –      संसद को संविधान में संशोधन करने का अधिकार

अनुच्छेद-370          –      जम्मू कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध।

 

अनुसूचियां

  • भारत के मूल संविधान में 8 अनुसूचियां थी। वर्तमान में 12 अनुसूचियां हैं –

  • पहली अनुसूची – राज्य व संघ राज्य क्षेत्र।

  • दूसरी अनुसूची – भारतीय संघ के पदाधिकारियों को मिलने वाले वेतन, भत्ते तथा पेंशन आदि का उल्लेख।

  • तीसरी अनुसूची – भारतीय संघ के कुछ पदाधिकारियों के शपथ और प्रतिज्ञान के प्रारुप।

  • चौथी अनुसूची – भारत के राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों (दिल्ली व पुडुचेरी) के राज्य सभा में प्रतिनिधित्व का विवरण।

  • पांचवी अनुसूची – अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन व नियंत्रण के बारे में उपबंध।

  • छठवीं अनुसूची – असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में उपबंध।

  • सातवीं अनुसूची – केन्द्र व राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन। इसमें तीन सूचियां हैं –

  1. संघ सूची

  2. राज्य सूची

  3. समवर्ती सूची

  4. संघ सूची में कुल 97 विषयों (वर्तमान में 100) का उल्लेख है, जिस पर कानून बनाने का अधिकार केवल संघ को है।

  5. राज्य सूची में कुल 66 विषय (वर्तमान में 61) हैं, जिन पर कानून राज्य  द्वारा बनाई जाती है।

  6. समवर्ती सूची में कुल 47 विषयों (वर्तमान में 52) का उल्लेख है, जिन पर कानून बनाने का अधिकार संघ तथा राज्य दोनों को है।

  • पुलिस, लोक स्वास्थ्य और स्वच्छता, प्रति व्यक्ति कर, गैस, कृषि, रेलवे पुलिस, कारागार, पंचायती राज एवं भूमि सुधार राज्य सूची के विषय हैं।

  • रेडियों और टेलीविजन, शेयर बाजार, डाक घर, बचत बैंक, जनगणना, बैंकिंग, बीमा, रक्षा, रेलवे एवं निगमकर संघ सूची के विषय हैं।

  • आर्तिक योजना, आपराधिक मामले, जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन, शिक्षा, वन, दंड प्रक्रिया, विवाह विच्छेद (तलाक) एवं गोद लेना समवर्ती सूची के विषय हैं।

  • आठवी अनुसूची – इसमें भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं का उल्लेख किया गया है। मूलतः इसमें 14 भाषाएं थी।

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  • वर्ष 1967 में सिंधी को 21वें संविधान संशोधन द्वारा 1992 कोकणी, नेपाली तथा मणिपुरी को 71वें संविधान संशोधन द्वारा वर्ष 2004 में संथाली, डोगरी, मैथिली तथा बोडो को 92वें संविधान संशोधन द्वारा आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है।

  • नौवी अनुसूची – विशिष्ट अधिनियमों और विनियमों का सत्यापन। प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा संविधान में शामिल। वर्तमान में इस अनुसूची में लगभग 284 अधिनियम हैं।

  • दसवी अनुसूची – दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता के बारे में अपबंध। 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में शामिल।

  • ग्यारहवीं अनूसूची – पंचायतों के अधिकार, प्राधिकार तथ दायित्व आदि के  बारे में उपबंध। 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में शामिल। इस अनुसूची में पंचायती राज सें संबंधी 29 विषय हैं।

  • बारहवीं अनुसूची – नगरपालिकाओं के अधिकार, प्राधिकार तथ दायित्व आदि। 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में शामिल। इसमें शहरी स्थानीय निकाय से संबंधित 18 विषय हैं।

  • भारतीय संविधान की तृतीय अनसूची शपथ या प्रतिज्ञान के प्रारुप से संबंधित है। इस अनुसूची में निम्न के द्वारा ली जाने वाली पद तथा गोपनीयता की शपथ का प्रारुप दिया गया है –

  1. संघ के मंत्री

  2. संसद के निर्वाचन के अभ्यर्थी

  3. संसद के सदस्य

  4. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक

  5. किसी राज्य के मंत्री

  6. राज्य विधानमंडल के निर्वाचन के अभ्यर्थी

  7. राज्य विधानमंडल के सदस्य

  8. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश

इस प्रकार तृतीय अनुसूची में कुल 8 प्रारुप दिए गए हैं। भारत के राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान का प्रारुप संविधान के अनुच्छेद 60 में  दिया गया है।

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  • राज्य भूमि सुधार अधिनियमों को, संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु उन्हें प्रथम संविधान संशोधन, 1951 द्वारा संविधान में 9वीं अनुसूची जोड़कर उसके तहत सम्मिलित किया गया है।

  • समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 20 आर्थिक आयोजना का उल्लेख करती है। ध्यातव्य है कि इसी उपबंध के आधार पर भारत सरकार ने योजना आयोग का गठन किया था।

  • भारतीय संविधान में संघीय ढांचे मजबूती प्रदान करने के लिए विषयों को केन्द्र और राज्यों के लिए निश्चित कर दिया गया है। इन्हें महत्व के आधार पर संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची में विभाजित किया गया है। शिक्षा प्रारंभ में राज्य सूची में शामिल थी, किंतु संघ एवं राज्यों दोनों के लिए इसके समन महत्व को देखते हुए, संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम, 1976 की धारा 57 द्वारा इसे समवर्ती सूची में डाल दिया गया।

  • भातीय संविधान में अनु. 245 से अनु. 248 के अधीन केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है तथा इस संदर्भ में सातवीं अनुसूची में संघीय सूची, राज्य तथा समवर्ती सूची का प्रावधान है। इसमें वन समवर्ती सूची में, जन स्वास्थ्य राज्य सूची में तथा शेयर बाजार एवं डाकघर बचत बैंक संघीय सूची में हैं.

  • केन्द्र सूची –      जनगणना

राज्य सूची       –      पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था

समवर्ती सूची    –      जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन

अवशिष्ट विषय (केन्द्र के अधीन)      –                      अंतरिक्ष अनुसंधान

  • संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून विषयक प्रावधान हैं। यह अनुसूची 52वें संविधान संशोधन, 1985 के द्वारा जोड़ी गई। ध्यातव्य है कि दसवी अनुसूची में 91वें संशोधन, 2003 द्वारा संशोधन किया गया है। इस संशोधन उद्देश्य दल-बदल पर रोक लगाने के साथ-साथ केन्द्र एवं राज्यों मे मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करना था।

  • संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची की प्रविष्टि 5 के तहत स्थानीय शासन (पंचायती राज) राज्य सूची का विषय है।

  • विवाह, विवाह-विच्छेद और गोद लेना संविदान की सातवीं अनुसूची के तहत सची-III समवर्ती सूची (प्रविष्टि 5 के अंतर्गत) में सम्मिलित किए गए हैं।

  • केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा करों एवं शुल्कों के अधिरोपण के संबंध में विभिन्न मदें संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत उल्लिखित हैं।

  • भूमि सुधार राज्य सूची का विषय है। राज्य भूमि सुधार अधिनियमों को संवैधानिक सुऱक्षा प्रदान करने हेतु नवी अनुसूची में प्रावधान किये हैं।

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भारतीय संविधान के प्रमुख भाग

  • भारतीय संविधान को 22 भागों में विभाजित किया गया है।

  • भारतीय संविधान के प्रमुख भाग एवं संबंधित विषय इस प्रकार हैं –

भाग             विषय

1              –  संघ और उसका राज्य क्षेत्र

2              –  नागरिकता

3              –  मौलिक अधिकार

4              –  राज्य के नीति निदेशक तत्व

4(क)         –  मौलिक कर्तव्य

5              –  संघ सरकार

6              –  राज्य सरकारें

7              –  निरसित

8              –  संघ राज्य क्षेत्र

9              –  पंचायतें

9(क)         –  नगरपालिकाएं

9(ख)        –  सहकारी समितियां

10            –  अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र

11            –  संघ एवं राज्यों के  बीच संबंध

12            –  वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद

13            –  भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य एवं समागम

14            –  संघ और राज्यो के अधीन सेवाएं

14(क)       –  अधिकरण

15            –  निर्वाचन

16            –  कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध

17            –  राजभाषा

18            –  आपात उपबंध

19            –  प्रकीर्ण

20            –  संविधान का संशोधन

21            –  अस्थायी, संक्रमणशील और विशेष उपबंध

22            –  संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन

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  • नागरिकता संबंधी प्रावधान का भारतीय संविधान के भाग 2 अनुच्छेद 5 से 11 तक उल्लेख है।

  • संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा 24 अप्रैल, 1993 से अंतः स्थापित संविधान के भाग IX मे तीन सोपानों  में पंचायतें बनाने की परिकल्पना की गई है। इस भाग के अनु. 243  ख के खंड (1) में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर इस भाग के उपबंधों के अनुसार, पंचायतों का गठन किया जाएगा तथापि इसी अनु. के खंड (2) के अनुसार, मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का उस राज्य में गठन नही किया जा सकेगा जिसकी जनसंख्या बीस लाख से अनधिक है।

  • भारतीय संविधान के भाग 11 का अध्याय 1 (अनुच्छेद 245-255) संघ और राज्यों के बीच विधायी संबंधों, जबकि अध्याय 2 (अनुच्छेद 256-263) प्रशासनिक संबंधो के बारे में है।

  • भारतीय संविधान के भाग 9 के अंतर्गत पंचायतों की व्यवस्था की गई है। 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान में भाग-9क जोड़ा गया जो कि नगरपालिकाओं से संबंधित है। 97वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 के द्वारा संविधान में भाग 9-ख जोड़ा गया, जो सहकारी समितियों से संबंधित है। जबकि संविधान के भाग 10 के अंतर्गत अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति क्षेत्र का उल्लेख है। भाग 14-क में अधिकरणों की व्यवस्था है।

उद्देशिका

  • पं. जवाहर लाल नेहरु द्वारा संविधान सभा में 13 दिसंबर, 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया था।

  • 22 जनवरी, 1947 को उद्देश्य प्रस्ताव को ही उद्देशिका के रुप में संविधान सभा द्वारा स्वीकार किया गया।

  • 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़ा गया।

  • भारतीय संविधान की उद्देशिका ने भारत को संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य के रुप में घोषित किया है।

  • संविधान की उद्देशिका अपने नागरिकों को तीन प्रकार के न्याय – सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सुनिश्चित कराती है।

  • उद्देशिका संविधान के विधिक विर्वचन में सहायका है।

  • सर अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर के अनुसार, उद्देशिका हमारे स्वप्नों और विचारों का प्रतिनिधित्व करती है।

  • के.एम. मुंशी के अनुसार, उद्देशिका हमारे प्रभुत्वसंपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य की जन्म कुंडली है।

  • बोम्मई बनाम यूनियन ऑफ इंडिया वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारण प्रस्तुत की कि उद्देशिका संविधान का भाग है।

  • प्रस्तावना (उद्देशिका) को संविधान का भाग केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में स्वीकार किया गया है।

  • इससे पूर्व बेरुबारी वाद (1960) में उद्देशिका को संविधान का अंग नही माना गया था।

  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के प्रकरण में उद्देशिका को संविधान की मूल आत्मा कहा गया है।

  • उद्देशिका की प्रकृति न्याययोग्य नही है।

  • प्रस्तावना में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की बात की गई है। इसमें प्रतिष्ठा और अवसर की समानता उल्लिखित है।

  • प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा जाता है।

  • बी.आर. अम्बेडकर ने सांविधानिक उपचारों के अधिकार को सांविधान की आत्मा और हृदय माना है।

  • के.एम. मुंशी ने इसे राजनीतिक जन्मपत्री कहा है।

  • सुभाष कश्यप ने कहा है कि संविधान शरीर है, तो प्रस्तावना उसकी आत्मा, प्रस्तावना आधारशिला है, तो संविधान उस पर खड़ी अट्टालिका।

  • बी.आर. अम्बेडकर ने संविधान को एक पवित्र दस्तावेज कहा है।

  • संविधान में हमारें राष्ट्र का उल्लेख दो नामों भारत तथा  इंडिया के रुप में किया गया है।अनुच्छेद 1 (1) उल्लेख करता है कि भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा (India, that is Bharat, Shall be a Union of States)

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  • भारत के संविधान के आमुख लक्ष्य उसके सभी नागरिकों को (1) सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, (2) विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, (3) प्रतिष्ठा (Status) और अवसर की समानता तथा (4) व्यक्ति की गरिमा (dignity) सुनिश्चित करना है।

  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग (We, The People of India) शब्दों से शुरु होती है, अतः भारत में लौकिक सार्वभौमिकता है। इसका अर्थ है – जनता सर्वशक्तिमान है और किसी बाह्य सत्ता के अधीन नही है।

  • सभी व्यक्ति पूर्णतः और समान रुप से मानव हैं यह सिध्दांत सार्वभौमिकतावाद के नाम से जाना जाता है। इस सिध्दांत के अनुसार, सभी व्यक्तियों को उनके मानव अधिकार समान रुप से बिना किसी विभेद के उपलब्ध होने चाहिए।

  • भारत के पंथनिरपेक्ष/धर्मनिरपेक्ष राज्य होने का सही भाव यह है कि भारत में राज्य का कोई धर्म नही है, तद्नुसार सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान प्रश्रय अपेक्षित है।

  • भारतीय संविधान की उद्देशिका/प्रस्तावना में लोक कल्याण शब्द का उल्लेख नही है। प्रस्तावना में प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य शब्द हैं।

  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता का वर्णन तो है, परंतु आर्थिक स्वतंत्रता का इसमें उल्लेख नही है।

  • के.एम. मुंशी ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना को हमारे संप्रभु, प्रजातांत्रिक गणतंत्र की जन्मकुंडली कहा।

  • बी.आर. अम्बेडकर ने भारतीय संविधान को एक पवित्र दस्तावेज कहा है। 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा ने बी.आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय प्रारुप समिति का गठन किया।

  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के मामले मे सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावना (उद्देशिका) को भारतीय संविधान की मौलिक संरचना का भाग स्वीकार किया। सर्वोच्च न्यायालय के शब्दों में हमारे संविधान का प्रासाद उद्देशिका में वर्णित बुनियादी तत्वों पर खड़ा है। यदि इनमें से किसी  भी तत्व को हटा दिया जाए, तो सारा ढांचा ही ढह जाएगा अर्थात संविधान  वही नही रह  जाएगा अर्थात अपना व्यक्तित्व व पहचान खो देगा।

  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना, संविधान के उद्देश्यों को प्रतिबिंबित करती है। संविधान का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय तथा विचार, मत, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता एवं प्रतिष्ठा और अवसर की समानता का अधिकार  दिलाना है। व्यक्ति का उत्कर्ष कहीं संपूर्ण राष्ट्र के उत्कर्ष में बाधक न बन जाए इसलिए संविधान में बंधुत्व की भावना पर भी  बल दिया गया है।

  • संविधान के अनु. 14-18 के तहत प्रदत्त समता के अधिकार के विभिन्न प्रावधानों के तहत सामाजिक समानता प्रत्याभूत की गई है। प्रस्तावना में भी सामाजिक न्याय प्राप्त कराने की बात कही गई है।

  • भारतीय संविधान में दिया गया आमुख न्यायालय में प्रवर्तनीय नही है। अर्थात इसे न्यायालय में लागू नहीं किया जा सकता है।

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शासन प्रणाली

  • राज्य तंत्र – यह शासन का प्राचीनतम रुप है, जिसमें शासन की शक्ति एक व्यक्ति में समाहित होती है, जो राजमुकुट धारण करता है। वह आनुवांशिक उत्तराधिकार के आधार पर पद ग्रहण करता है।

  • कुलीन तंत्र – इसे अरिस्टोक्रेसी भी कहा जाता है। यह शासन का वह रुप है जिसमें राजनीतिक सत्ता का निवास थोड़े से लोगों में होता है तथा वह इसका प्रयोग करते हैं।

  • तानाशाही – इसे अधिनायक तंत्र (Dictatorship) भी कहा जाता है। यह एक ऐसे शासन का रुप है, जिसमें एक ही व्यक्ति का निरंकुश शासन होता है, जो बल प्रयोग के माध्यम से अपने पद पर आसीन रहता होता है तथा किसी के भी प्रति  उत्तरदायी नही होता है।

  • प्रजा तंत्र – वर्तमान समय में शासन का सबसे अधिक लोकप्रिय रुप प्रजातंत्र (Democracy) है। ध्यातव्य  है कि प्रजातंत्र वहां विद्यामान होता है, जहां जनता में सत्ता का वास  होता है अर्थात लोगों को संप्रभुता प्राप्त होती है।

  • प्रजातांत्रिक या लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के की रुप हैं, जिनमें प्रमुख हैं – संघात्मक शासन व्यवस्था तथा अध्यक्षीय शासन व्यवस्ता के रुप में जाना जाता है।

  • राज्य के महत्वपूर्ण तत्व हैं – संप्रभुता, जनसंख्या, भू-भाग तथा सरकार या सत्ता। किसी भी राज्य का अनिवार्य तत्व संप्रभुता होती है, इसके बिना कोई भी राज्य राज्य की श्रेणी में नही आता है।

  • वर्ष 1947 के पहले एक राज्य के रुप में  हमारा देश भारत संप्रभु नही था, क्योंकि उस समय भारत पर, भारत की जनता का शासन नही था बल्कि ब्रिटिश क्राउन का शासन था।

  • भारतीय संविधान के अनुसार, देश में संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है, जिसमें जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि ही शासन व्यवस्था का संचालन करते हैं।

  • संसदीय शासन प्रणाली को मंत्रिमंडलीय शासन प्रणाली भी कहा जाता है। इस प्रणाली में संसद विधि निर्माण की सर्वोच्च संस्था होती है एवं कार्यपालिका अपने समस्त कृत्यों के लिए संसद के प्रति जवाबदेह होती है।

  • संसदीय शासन प्रणाली मे कार्यपालिका का अस्तित्व, विधायिका में उसके विश्वास प्राप्ति (बहुमत) तक रहता है।

  • भारत की राजनीतिक व्यवस्था में संपूर्ण सत्ता को केन्द्र एवं राज्यों में विधिक रुप में बांटा गया है।

  • यहां सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है और भारतीय प्रशासनिक, राजनीतिक व्यवस्था विशुध्द रुप में एक लोकतांत्रिक गणतंत्र है।

  • अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली जिसे हम राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली के नाम से भी जानते हैं, में समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है। शासन प्रणाली का सर्वोत्तम उदाहरण – अमेरिका की राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था है।

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  • अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में राष्ट्रपति विधायिका को भंग नही कर सकती है।

  • राष्ट्रपतीय शासन प्रणाली में सत्ता केन्द्रीकृत होती है।

  • राष्ट्रपति ही कार्यपालिका का प्रमुख होता है।

  • अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली में, राष्ट्रपति अपने मंत्रियों के चुनाव में स्वतंत्र होता है और मंत्रियों के चयन में व्यवस्थापिका की भूमिका नाम मात्र ही होती है।

  • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त वाक्य हम भारत के लोग…….यह स्पष्ट करता है कि, भारत में सत्ता का एकमात्र स्रोत जनता है, जो प्रतिनिधियों का निर्वाचन सत्ता संचालन हेतु करती है। अतः भारतीय लोकतंत्र में जन-प्रतिनिधियों को जनता के सेवक का दर्जा प्राप्त है।

  • भारतीय संविधान में संघ एवं राज्यों की शक्तियों को विधिक रुप से स्पष्टतः विभाजित किया गया है, इसलिए भारतीय संविधान को परिसंघीय भी कहा जाता है।

  • ब्रिटिश संसद को संसदों की जननी कहा जाता है।

  • ब्रिटेन में परंपराओं के अनुरुप आवश्यक कानून बनाते हुए प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन किया जाता है, क्योंकि ब्रिटेन में लिखित संविधान का अस्तित्व नही है।

  • भारतीय संविधान में एकात्मक शासन के प्रमुख लक्षणों में राज्यपाल का पद, अखिल भारतीय सेवाएं, एकल नागरिकता, आपातकालीन प्रावधान तथा राज्य सभा में असमान प्रतिनिधित्व शामिल है।

  • भारत एक लोकतांत्रिक गणतंत्र है, इसका आशय है कि भारतीय राजनीतिक/प्रशासनिक व्यवस्था का सर्वोच्च पद (राष्ट्रपति) पर निर्वाचित व्यक्ति आसीन होता है।

  • भारतीय संविधान में संघात्मक एवं एकात्मक दोनों व्यवस्थाओं के तत्व पाए जाते हैं, इसीलिए भारतीय संविधान को अर्ध्द-संघात्मक भी कहा जाता है।

  • के.सी. व्हीयर ने भारत को अर्ध्द संघात्मक कहा है।

  • भारतीय संघवाद को सहकारी संघवाद जी. ऑस्टिन ने कहा है।

  • भारतीय संविधान अधिक कठोर तथा अधिक लचीले के मध्य एक संतुलन स्थापित करता है। यह कथन के.सी. व्हीयर का है।

  • बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार, संविधान को संघात्मकता के तंग ढांचे में नही ढाला गया है।

  • राज्य के चार आवश्यक तत्व होते हैं – जनसंख्या, भूभाग, सरकार (शासन या सत्ता) और संप्रभुता। राज्य के इन चारों तत्वों मे संप्रभुता सबसे महत्वपूर्ण तत्व  है। संप्रभुता के  बिना कोई राज्य (अन्य तीनों तत्वों के होते हुए भी) अंतरराष्ट्रीय  दृष्टि से राज्य नही कहा जा सकता। जैसा कि वर्ष 1947 से पहले  भारत राज्य नहीं था, क्योंकि भारत संप्रभु नही था (अंग्रेजों का भारत पर आधिपत्य था)।

  • शासन प्रणाली की सामान्यतः दो पध्दतियां होती हैं – संसदीय और अध्यक्षीय। भारत में ग्रेट ब्रिटेन का अनुसरण करते हुए संसदीय शासन व्यवस्था को अपनाया गया है। संसदीय शासन व्यवस्था में व्यवस्थापिका के सदस्य ही कार्यपालिका का गठन करते हैं तथा कार्यपालिका, व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी होती है। संसदात्मक शासन व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका द्वारा नियंत्रित होती है।

  • भारत में संसदीय प्रणाली की सरकार है, क्योकि मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है। (अनु. 75(3)) संसदीय शासन प्रणाली को मंत्रिमंडलीय व्यवस्था भी कहा जाता है। इस शासन व्यवस्था में संसद विधि निर्माण की सर्वोच्च संस्था होती है तथा कार्य़पालिका अपने सभी कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। कार्यपालिका के सदस्य संसद के सदस्य होते हैं और कार्यपालिका तभी तक सत्तारुढ़ या कार्यरत रहती है। जब तक उसे संसद (लोकसभा) का विश्वास प्राप्त रहता है।

  • अनुच्छेद 75(5) मे उल्लेख है कि मंत्री बिना संसद सदस्य बने छः माह से अधिक पद पर नही रहेगा, अर्थात मंत्रिमंडल के सदस्य संसद के सदस्य होते हैं। मंत्रिपरिषद सामूहिक रुप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होगी। (अनु. 75(3) )।

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  • भारत में विधि का शासन है। यहां गणतंत्र है न कि राजतंत्र। प्रत्येक 5 वर्ष के उपरांत जनता अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन कर संविधान संगत लोकतांत्रिक सरकार का गठन करती है। यहां सत्तावादी सरकार नही है।

  • हिस्सेदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता, कानून का नियम, सर्वसम्मति से निर्णय लेना, दक्षता एवं प्रभावशीलता आदि सुशासन की विशेषताएं हैं।

  • कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का आशय है कि राज्य द्वारा देश की अधिकतम जनसंख्या का अधिकतम कल्याण सुनिश्चित करना। कल्याणकारी राज्य में उदारवाद (स्वतंत्रता) और समाजवाद (समानता) को अंतर्निहित करने का प्रयास किया जाता है। जैसा कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है। ध्यातव्य है कि अधिकतम लोगो का अधिकतम कल्याण उपयोगितावाद की विशेषता/लक्षण है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भारतीय संविधान के भाग-4 में प्रदत्त राज्य के नीति निदेशक तत्वों में निहित है। इसके अनुसार, राज्य लोगों के कल्याण के लिए एक सामाजिक, व्यवस्था का संवर्धन करेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक एवं  राजनैतिक न्याय शामिल हैं।

  • राज्य हर जगह हैः यह अंतराल शायद ही कोई छोड़ता है यह वक्तव्य कल्याणकारी धारणा की व्याख्या करता है।

  • भारत में संसदात्मक प्रजातंत्र को अपनाया गया है। संसदात्मक प्रजातंत्र का आशय है शासन की संसदीय प्रणाली वला प्रजातंत्र जिसमें राजसत्ता मूलतः जनता में निहित होती है। संसद में जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि शासन सत्ता का संचालन करते हैं।

  • गणतंत्र का आशय है कि राष्ट्र का प्रधान निर्वाचित (प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष) होता है। वह वंशानुगत नहीं हो सकता है। भारत में राष्ट्र का प्रधान अर्थात राष्ट्रपति निर्वाचित होता है। इस प्रकार भारत एक गणतंत्र है।

  • राज्य और केन्द्रीय सरकार को भारत के संविधान से प्राधिकार प्राप्त होता है, क्योंकि भारतीय प्रणाली का स्रोत उसका संविधान है।

  • कोई राज्य संघात्मक है अथवा एकात्मक, यह संविधान द्वारा संघ और राज्यों के मध्य शक्तियों के विभाजन के आधार पर जाना जाता है। यदि संघ एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन है, तो उस राज्य को संघीय राज्य कहा जाता है। भारत का संविधान परिसंघीय है, क्योकि केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण किया जाता है।

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  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के प्रतिवेदन संख्या 12 नागरिक केन्द्रित प्रशासनः शासन का केन्द्र बिंदु में भारत में सुशासन की  बाधाओं की पहचान की गई है तथा सुशासन के लिए आवश्यक पूर्व-शर्तो का उल्लेख है।

  • संवैधानिक सरकार में सरकार की शक्ति का स्रोत संविधान होता है। संवैधानिक सरकार व्यक्ति की स्वतंत्रता के हित में राज्य की सत्ता पर प्रभावकारी प्रतिबंध लगाती है। वस्तुतः राज्य की निरंकुश सत्ता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हित में सुरक्षित रखने के उद्देश्य से ही ब्रिटेन और अमेरिका में संविधानवाद का उदय हुआ। एक संवैधानिक सरकार में नागरिकों की स्वतंत्रताओं के संरक्षण हेतु संस्थागत क्रियाविधियां भी विद्यमान रहती हैं।

  • हर्बर्ट ए. साइमन ने मिथकों और कहावतों के रुप में प्रशासन के सिध्दांतों को अस्वीकार किया है, जबकि ड्वाइट वाल्डो, फ्रैंक मेरिनी और एफ. डब्ल्यू. रिग्स ने मिथकों और कहावतों के  रुप में प्रशासन के सिध्दांतों को स्वीकार किया है।

  • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने यह स्वीकार किया था कि संविधान को संघात्मकता के ढांचे में नही ढाला गया है तथा  यह  एकीकृत और संघात्मक दोनों ही हैं।

  • भारतीय संविधान अधिक कठोर तथा अधिक लचीले के मध्य एक अच्छा संतुलन स्थापित करता है – यह कथन के.सी. व्हीयर का है।

  • भारतीय संविधान की प्रकृति संघात्मक है या एकात्मक , इसके संबंध में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान इसे संघात्मक संविधान की संज्ञा देते हैं, जबकि कुछ विद्वान इस एकात्मक संविधान मानते हैं। जी. आस्टिन के अनुसार, भारत का संविधान परिसंघीय संविधान है, जबकि के.सी. व्हीयर के अनुसार, भारत का संविधान अर्ध्द-संघीय है।

  • भारतीय संविधान विश्व का सबसे वृहद संविधान है। इसके वृहद होने का प्रमुख कारण यह है कि इसमें संघ एवं राज्यों से संबंधित सारे प्रावधान शामिल कर दिए गए हैं। जबकि सं. राज्य अमेरिका जैसे देशों में राज्यों एवं संघ के अपने-अपने अलग संविधान हैं।

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राष्ट्रीय प्रतीक

  • भारतीय झंडा संहिता में उल्लेख है कि – राष्ट्रीय झंडे के रंगो और उसके मध्य मे चक्र के महत्व का यथेष्ट वर्णन डॉ. राधाकृष्णन द्वारा संविधान सभा में किया गया था। इस संविधान सभा ने सर्वसम्मति से राष्ट्रीय झंडे को स्वीकार किया था।

  • डॉ. एस. राधाकृष्णन ने स्पष्ट किया है कि भगवा या केसरिया रंग त्याग या निःस्वार्थ भावना का प्रतीक है। हमारे झंडे के मध्य में सफेद रंग हमें सच्चाई के पथ पर चलने और अच्छे आचरण की प्रेरणा देता है। हरा रंग मिट्टी और वनस्पतियों के साथ हमारे संबंधों को उजागर करता है जिन पर सभी प्राणियों का जीवन आश्रित है।

  • सफेद रंग के मध्य में अशोक चक्र धर्म के राज का प्रतीक है। चक्र प्रगति का प्रतीक है, जड़ता प्राणहीनता का प्रतीक है। चक्र शांतिपूर्ण परिवर्तन की गतिशीलता का प्रतीक है।

  • भारत की राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा, तीन रंगों की पट्टी में विभाजित आयताकार है। ध्वज की लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है।

  • सबसे ऊपरी पट्टी गहरे केसरिया रंग (साहस का प्रदर्शन), बीच मे श्वेत (शांति  और  सच्चाई का प्रदर्शन) और सबसे नीचे हरी पट्टी (उर्वरता तथा समृध्दि का प्रदर्शन) है।

  • ध्वज के बीच की पट्टी में एक नीला चक्र है। जिसमें 24 तीलियां हैं। जिसका प्रारुप सारनाथ में अशोक के सिंह स्तंभ पर बने चक्र से लिया गया है। यह न्याय का प्रतीक है।

  • पिंगली वेंकैया द्वारा भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को तैयार किया गया।

  • संविधान सभा द्वारा 22 जुलाई, 1947 को राष्ट्रीय ध्वज का वर्तमान स्वरुप स्वीकृत।

  • भारत का राजचिन्ह सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तंभ की अनुकृति है। भार सरकार द्वारा इसे 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया।

  • इस पर नीचे देवनागरी लिपि में सत्यमेव जयते लिखा है, जो मुंडकोपनिषद से लिया गया है।

  • भारत का राष्ट्रगान जन गण मन 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा द्वारा आधिकारिक रुप में अंगीकृत किया गया था। इसके गायन की अवधि 52 सेकंड है।

  • 27 दिसंबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे पहली बार गाया गय था। यह रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वार रचित गीतांजलि से लिया गया है।

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  • वंदे मातरम वर्ष 1950 में भारत के राष्ट्रीय गीत के रुप में अंगीकृत किया गया था। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा लिखित उपन्यास आनंदमठ से लिया गया है। इसे 1896 ई. में भारती राष्ठ्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया था।

  • भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर (शक संवत् पर आधारित) 22 मार्च, 1957 को अपनाया गया चैत्र माह से इसकी शुरुआत होती है और अंतिम माह फाल्गुन होता है। इसे ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ अपनाया गया है। सामान्यतः चैत्र माह की शुरुआत 22 मार्च को, जबकि लीप वर्ष में 21 मार्च को होती है।

  • भारत का राष्ट्रीय पुष्प कमल ((वानस्पतिक नाम नेलम्बो न्यूसिफेरा) है।

  • भारत का राष्ट्रीय फल आम (वानस्पतिक नाम मैनजीफेरा इंडिका) है।

  • भारत का राष्ट्रीय वृक्ष बरगद (वैज्ञानिक नाम फिकस बेंगालेंसिस)  है।

  • भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ (वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस) है।

  • गंगा की डॉल्फिन (वैज्ञानिक नाम प्लैटानिस्ता गैंगेरिका) को भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव के रुप में स्वीकार किया गया है।

  • भारतीय मोर (वैज्ञानिक नाम पावो क्रिस्टेसस) को भारत के राष्ट्रीय पक्षी के रुप में स्वीकार किया  गया है।

  • वर्ष 2008 में भारत सरकार द्वारा गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया।

  • भारत सरकार द्वारा स्वाधीनता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) और गांधी जयंती ( 2 अक्टूबर) को राष्ट्रीय दिवस के रुप में घोषित किया गया है।

राज्य एवं संघ राज्य क्षेत्र

  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के द्वारा दो स्वतंत्र एवं पृथक प्रभुत्व वाले देश- भारत तथा पाकिस्तान का निर्माण किया गया।

  • देशी रियासतों के समक्ष तीन विकल्प प्रस्तुत किए गए – भारत में शामिल हो, पाकिस्तान मे शामिल हो या स्वतंत्र रहें।

  • भारतीय सीमा के अंतर्गत 552 देशी रियासतें थी। जिनमें से 549 भारत में शामिल हो गई, जबकि शेष तीन (हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर) ने भारत में शामिल होने से मना कर दिया। कालांतर में हैदराबाद को पुलिस कार्यवाही द्वारा, जूनागढ़ को जनमत संग्रह के द्वारा तथा कश्मीर को विलय-पत्र के द्वारा भारतीय संघ में शामिल किया गया।

  • संविधान के तहत भारतीय संघ के राज्यों को चार भागों में वर्गीकृत किया गया था।

  • भाग क में वे राज्य थे, जहां ब्रिटिश भारत में गवर्नर का शासन था।

  • भाग ख में 9 राज्य विधानमंडल के साथ शाही शासन।

  • भाग ग में ब्रिटिश भारत के मुख्य आयुक्त का शासन।

  • भाग घ में अकेले अंडमान निकोबार द्वीप को रखा गया था।

  • संविधान के अनुच्छेद 1(1) के अनुसार, भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा।

  • अनुच्छेद 2 के तहत भारतीय संघ में नए राज्यों के प्रवेश या स्थापना का संसद का अधिकार।

  • अनुच्छेद 3 में नए राज्यो का निर्माण और वर्तमान  राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने का संसद का अधिकार।

  • संसद साधारण बहुमत से ने राज्यों का  निर्माण कर सकती है। भारतीय संविधान संसद को यह अधिकार देता है कि वह नए राज्य बनाने, उसमें परिवर्तन करने, नाम बदलने  या सीमा में परिवर्तन के संबंध में  बिना राज्यों की  अनुमति से कदम कदम उठा सकती है।

  • इस हेतु संविधान संशोधन को अनु. 368 के तहत संशोधन नही माना जाएगा। वर्तमान में भारतीय संघ में 29 राज्य और 7 केन्द्रशासित प्रदेश हैं।

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  • स्वतंत्रता के पश्चात नए राज्यों के निर्माण के लिए फजल अली की अध्यक्षता में एक राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन 1953 में हुआ। इस आयोग के दो अन्य सदस्य थे – के.एम. पानिक्कर  एवं एच.एन. कुजरु। इसी आयोग की कुछ अनुशंसा को राज्य पुनर्गठन  अधिनियम, 1956 में लागू किया गया।

  • संसद, संविधान मे संशोधन करके किसी भारतीय भू-भाग को किसी अन्य देश को सौंप सकती है।

  • जून, 1948 में भारत सरकार ने एस.के. धर की अध्यक्षता में भाषायी प्रांत आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट दिसंबर, 1948 में पेश की। आयोग ने राज्यों का पुनर्गठन भाषायी आधार की बजाए प्रशासनिक सुविधा के अनुसार किए जाने की सिफारिश की।

  • दिसंबर, 1948 में कांग्रेस द्वारा एस.के. धर कमीशन की अनुशंसाओं का अध्ययन करने हेतु जेवीपी समिति का गठन किया गया। इसमें जवाहर लाल नेहरु, वल्लभभाई पटेल  और पट्टाभि सीतारमैया शामिल थे।

  • अप्रैल 1949 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में इस समिति ने औपचारिक रुप से स्वीकार किया कि, राज्यों के पुनर्गठन का आधार भाषा होनी चाहिए। हालांकि पोट्टी श्रीरामुलु की 56 दिनों की भूख हड़ताल के बाद मृत्यु के कारण अक्टूबर, 1953 में भारत सरकार को भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश राज्य का गठन करना पड़ा।

  • आंध्र प्रदेश, भाषा के आधार पर गठित होने वाला देश का पहला राज्य है।

 

नए राज्यो का गठन

क्र.सं.

राज्य

गठन वर्ष

1.   

आंध्र प्रदेश

1 अक्टूबर, 1953

2.   

गुजरात

1 मई, 1960

3.   

नगालैंड

1 दिसंबर, 1963

4.   

हरियाणा

1 नवंबर, 1966

5.   

हिमाचल प्रदेश

25 जनवरी, 1971

6.   

मेघालय

21 जनवरी, 1972

7.   

मणिपुर

21 जनवरी, 1972

8.   

त्रिपुरा

21 जनवरी, 1972

9.   

सिक्किम

16 मई, 1975

10.                          

मिजोरम

20 फरवरी, 1987

11.                          

अरुणाचल प्रदेश

20 फरवरी, 1987

12.                          

गोवा

30  मई, 1987

13.                          

छत्तीसगढ़

1 नवंबर, 2000

14.                          

उत्तराखंड

9 नवंबर, 2000

15.                          

झारखंड

15 नवंबर, 2000

16.                          

तेलंगाना

2 जून, 2014

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  • संविधान के अनुच्छेद 239(1) के अनुसार, संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय प्रत्येक राज्य क्षेत्र का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

  • भारतीय संघ के अंतर्गत किसी राज्य को मिलाने का अधिकार संसद को है। अनुच्छेद 2 अनुसार, वह नए राज्यो का भारतीय संघ मे प्रवेश कर सकती है।

  • संविधान के अनु. 81 (31वें संशोधन, 1973 तथा गोवा, दमन एवं दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 द्वारा यथा संशोधित) के अनुसार, लोक सभा के अधिकतम 530 सदस्य राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों से तथा अधिकतम 20 सदस्य केन्द्रशासित प्रदेशों से निर्वाचित हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त अनु. 331 के अधीन राष्ट्रपति आंग्ल-भारतीय समुदाय का लो सभा में समुचित प्रतिनिधित्व न होने पर दो सदस्यों का मनोनयन कर सकता है। इस प्रकार लोक सभा की सदस्य संख्या 552 (530+20+2) हो सकती है। वर्तमान में केन्द्रशासित प्रदेशों की लोक सभा सीटों की संख्या 13 (दिल्ली 7, अंडमान-निकोबार-1, चंडीगढ़-1, दादरा व नगर हवेली-1, दमन व दीव-1, लक्षद्वीप-1 तथा पुडुचेरी-1) है। जबकि राज्य सभा में यह संख्या 4 (दिल्ली-3, पुडुचेरी-1) है।

  • स्वतंत्रता के पश्चात नए राज्यों के निर्माण के लिए फजल अली की अध्यक्षता में एक राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ, जिसकी सिफारिश पर 14 राज्य एवं 6 केन्द्रशासित प्रदेश स्थापित किये गए। आंध्र प्रदेश, स्वतंत्रता के पश्चात भाषा के आधार पर गठित (1 अक्टूबर, 1953)प्रथम राज्य है।

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद का नाम अभी तक नही बदला गया है, हालांकि तेलंगाना राज्य के निर्माण के बाद अगले 10 वर्षों तक हैदराबाद, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की संयुक्त राजधानी होगी, इसके बाद आंध्र प्रदेश की नई राजधानी अमरावाती होगी, जबकि तमिलनाडु की राजधानी मद्रास का अद्यतन नाम चेन्नई, पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता का अद्यतन नाम कोलकाता एवं केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम का अद्यतन नाम तिरुवनंतपुरम हो गया है।

  • 69 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1991 के द्वारा देश की राजधानी दिल्ली को संघ राज्य की श्रेणी में कायम रखते हुए इसके लिए एक विधान सभा और मंत्रिपरिषद का उपबंध किया गया। साथ ही (संविधान की अनुच्छेद 239 (क, क) में) संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) का दर्जा दिया गया।

  • दादरा और नगर हवेली वर्ष 1954 तक पुर्तगाली शासन के अधीन थे न कि फ्रांसीसी। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के भारत के पक्ष में निर्णय के पश्चात दादरा और नगर हवेली को भारत में मिला लिया गया था।

  • 35वें संशोधन, 1974 के द्वारा सिक्किम को भारत में सहयुक्त राज्य के रुप में शामिल किया गया था। 36वें संविधान संशोधन, 1975 द्वारा सिक्किम को (22वां राज्य) पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान किया गया।

  • निम्नलिखित राज्यो के Province और State बनने की सूची –

राज्य                Province                         State

पश्चिम बंगाल    15 अगस्त, 1947       26 जनवरी, 1950

असम               15 अगस्त, 1947       26 जनवरी, 1950

पंजाब                15 अगस्त, 1947       26 जनवरी, 1950   

हिमाचल प्रदेश   15 अप्रैल, 1948         25 जनवरी, 1971

  • मैसूर राज्य (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 1973 के द्वारा इसका नाम कर्नाटक किया गया। गोवा, दमन और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 के द्वारा गोवा को अलग किया गया, बंबई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 के द्वारा बंबई को गुजरात एवं महाराष्ट्र में विभाजित किया गया तथा हिमालच प्रदेश अधिनियम, 1970 के द्वारा हिमाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा दिया गया।

  • उल्फा (ULFA) उग्रवादी संगठन असम राज्य से संबंधित है। इसका पुरा नाम यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम है। इस संगठन का उद्देश्य सैन्य संघर्ष के जरिए संप्रभु समाजवादी असम स्थापित करना है। परेश  बरुआ तथा अन्य  द्वारा वर्ष 1979 में इसकी स्थापना की गई थी।

  • पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) नामक आतंकवादी संगठन की स्थापना 22 अप्रैल, 1980 को आंध्र प्रदेश में कोंडापाली सीतारमैया नामक नक्सली नेता ने की थी।

  • कावेरी जल विवाद के अंतर्गत कर्नाटक-तमिलनाडु-पुडुचेरी-केरल राज्य शामिल हैं।

  • भाषायी आधार पर राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना 29 दिसंबर, 1953 की की गई, जिसने अपनी रिपोर्ट 30 दिसंबर, 1955 को दी। आयोग के अध्यक्ष फजल अली थे तथा अन्य दो सदस्य थे –  हृदयनाथ कुंजरु और के.एम. पणिक्कर।

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नागरिकता

  • भारतीय संविधान के भाग 2 के अंतर्गत अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता का उल्लेख किया गया है।

  • भारत में ब्रिटेन के समान एकल नागरिकता का प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद को नागरिकता के संबंध में विधि बनाने की शक्ति दी गई है।

  • संसद द्वारा भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 पारित किया गया है।

  • भारतीय नागरिकता पांच प्रकार से प्राप्त की जा सकती है –

  1. जन्म से (By Birth)

  2. वंश परंपरा से (By Descent)

  3. पंजीकरण से (Registration)

  4. देशीकरण से (By Naturalisation)

  5. भूमि के अर्जन द्वारा (By Acquisition of Land)

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  • भारतीय नागरिकता का अंत (लोप) तीन प्रकार से हो सकता है –

  1. किसी अन्य देश की  नागरिकता ग्रहण करने पर

  2. नागरिकता त्यागने पर

  3. सरकार द्वारा वंचित करने पर

  • अनुच्छेद 6 में पाकिस्तान से भारत को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार के बार में उपबंध है।

  • अनुच्छेद 7 में पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों की नागरिकता के अधिकार के बारे में उपबंध है।

  • अनुच्छेद 8 में भारत के बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार के बारे  में उपबंध है।

  • अनुच्छेद 9 के अनुसार, जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य का नागरिक हो जाता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।

  • प्रवासी के रुप में रहने वाले विदेशी व्यक्ति के लिए देशीकरण के आधार पर नागरिकता प्राप्त करने के लिए 10 वर्षों तक निवास करना अनिवार्य है।

  • नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 5(1)(a) के तहत पंजीकरण द्वारा भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के लिए भारतीय मूल के व्यक्ति को भारत में सात वर्ष बिताने होंगे।

  • संसद, नागरिकता के अर्जन हेतु शर्तों को नियत करने के लिए सक्षम हैं।

  • जम्मू और कश्मीर, भारत का एकमात्र राज्य है जिसके नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त है।

  • वर्ष 2015 के ने संशोधित अधिनियम में व्यवस्था की गई की पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के नागरिकों को छोड़कर सभी देशों के नागरिकों को दोहरी नागरिकता दी गई है।

  • नागरिकता अधिनियम, 2015 के अंतर्गत भारतीय कार्डधारक प्रवासी नागरिक के रुप में पंजीकृत होने के लिए निम्नलिखित लोग अर्ह हैं –

  1. एक वयस्क बच्चा जिसके माता-पिता में से दोनों या कोई एक भारतीय नागरिक हैं,

  2. भारतीय नागरिक की विदेशी मूल की पत्नी अथवा भारतीय कार्ड धारक विदेशी नागरिक की विदेशी मूल की पत्नी तथा

  3. एक व्यक्ति का परपोत/परपोती, जो दूसरे देश का नागरिक है किंतु पितामह/पितामही, मातामह/मातामही संविधान लागू होने के समय अथवा बाद में किसी समय भारतीय नागरिक थे।

  4. एक व्यक्ति का एक अवयस्क बच्चा कुछ शर्तों (खंड क में उल्लेखित) के साथ। इसके अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अन्य देशों (जिसे केन्द्र सरकार निर्धारित करें) के नागरिकों को इससे वंचित रखा गया है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371 A से लेकर 371 I में नगालैंड (371 A), असम (371 B), मणिपुर (371 C), आंध्र प्रदेश (371 D), सिक्किम (371F), मिजोरम (371 G), अरुणाचल प्रदेश (371 H) तथा गोवा (371 I) राज्यों के संबंध मे विशेष उपबंध अंतर्विष्ट किए गए हैं।

  • दोहरी नागरिकता का सिध्दांत संयुक्त राज्य अमेरिका में स्वीकार किया गया है। वहां प्रत्येक नागरिक दोहरी नागरिकता प्राप्त करता है। प्रथम, संयुक्त राज्य अमेरिका की और दूसरी उस राज्य की जहां वह निवास करता है। इसके विपरीत भारत में एकल नागरिकता की व्यवस्था की गई है।

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मूल अधिकार

  • नेहरु रिपोर्ट (1928) द्वारा मूल अधिकारों को भारत के संविधान मे सम्मिलित करने की आकांक्षा प्रकट की गई थी।

  • भारतीय संविधान में भाग 3 के अंतर्गत अनुच्छेद 12-35 में मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है, जो निम्नलिखित हैं –

  1. समानता का अधिकार

  2. स्वतंत्रता का अधिकार

  3. शोषण के विरुध्द अधिकार

  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार

  5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार

  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

  • भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को राज्य के कृत्यों के विरुध्द एक गारंटी के रुप में मौलिक अधिकारों को राज्य के कृत्यों के विरुध्द एक गारंटी के रुप में स्थान दिया गया है।

  • मौलिक अधिकार पूर्णतया नैसर्गिक एवं अप्रतिदेय की श्रेणी में आते हैं।

  • आपातकालीन स्थिति में ही अनुच्छेद 358 एवं 359 के प्रावधानों के अंतर्गत ही मूल अधिकारों का निलंबन किया जा सकता है।

  • मौलिक अधिकारों को न्याय योग्य (वाद योग्य) के रुप में संविधान मे रखा गया है।

  • वर्तमान में कुल 6 मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जबकि मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे।

  • भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की तुलना अमेरिका के अधिकार बिल से की जाती है।

  • भारतीय संविधान मे मौलिक अधिकारों के संरक्षण का दायित्व न्यायपालिका के पास है।

  • संविधान का अनुच्छेद 14 यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नही किया जाएगा। इस रुप में अनुच्छेद 14  विधायन सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण लगाता है।

  • भारतीय संविधान में समानता के अधिकार को अनुच्छेद 14 से 18 तक कुल पांच अनुच्छेदों में वर्णित किया गया है, जो कि अग्रलिखित है –

  • विधि के समक्ष समता – अनुच्छेद 14

  • धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध – अनुच्छेद 15

  • लोक नियोजन के विषयों में अवसर की समता – अनच्छेद 16

  • अपृश्यता (छुआछूत) का अंत – अनुच्छेद 17

  • उपाधियों का अंत – अनुच्छेद 18

  • अनुच्छेद 19 से 22 तक स्वतंत्रता के अधिकार वर्णित हैं।

  • अनुच्छेद 19 के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित कुल 6 प्रकार की स्वतंत्रताएं प्रदान की गई हैं।

  • अनुच्छेद 19(1)(क) में निहित वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत ही समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता भी निहित मानी जाती है।

  • संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ख) में शांतिपूर्वक एवं निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(1)(ग) में संगम क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 19(1)(ङ) के तहत भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(छ) के तहत कोई वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता का प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 20 का संबंध अपराधों के लिए दोषसिध्दि के संबंध में संरक्षण से, अनुच्छेद 21 का संबंध प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण से एवं अनुच्छेद 21(क) का संबंध प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण से एवं अनुच्छेद 21(क) शिक्षा के अधिकार से संबंधित है।

  • अनुच्छेद 22 में गिरफ्तारी और निरोध (कुछ दशाओं) से संरक्षण का प्रावधान किया गया है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 24, चौदह वर्ष से कम आयु के बालकों को कारखानों, खनन इत्यादि परिसंकटमय क्षेत्रों में नियोजन को निषिध्द करता  है, जबकि अनुच्छेद 23 मानव के दुर्व्यावहार और बलातश्रम का प्रतिषेध करता है।

  • भारतीय संसद द्वारा निर्मित सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अंतर्गत भारतीय समाज मे अपृश्यता को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रयुक्त दैहिक स्वतंत्रता शब्दावली में संचरण अर्थात कहीं भी जाने का अधिकार यानी विदेश भ्रमण भी शामिल है।

  • धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनु. 25) के अंतर्गत, प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का प्रचार करने, सिक्खो को कृपाण धारण करने एवं रखने का अधिकार समाहित है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता से संबँधित, जबकि अनुच्छेद 29 का संबंध अल्पसंख्यक वर्ग के हितों के संरक्षण से व अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शिक्षा संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन से संबंधित है।

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  • भारतीय संविधान के 44वें संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के श्रेणी से हटाकर अनुच्छेद 300(क) विधिक अधिकार की श्रेणी में डाल दिया गया।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत संवैधानिक उपचारों का अधिकार उल्लिखित है।

  • मूल अधिकारों के न्यायिक संरक्षण हेतु 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को शक्ति प्रदान की गई है।

  • सर्वोच्च अथवा उच्च न्यायालय कई प्रकार के विशेष आदेश जारी करते हैं जिन्हें प्रादेश या रिट कहते हैं।

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण – इसके द्वारा न्यायालय किसी गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश देता है। यदि गिरफ्तारी का तरीका या कारण गैर कानूनी या असंतोषजनक हो, तो न्यायालय बंदी को छोड़ने का आदेश दे सकता है।

  • परमादेश – यह आदेश तब जारी किया जाता है जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का पालन नही कर रहा है और इससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा है।

  • निषेध – जब कोई निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके किसी मुकदमें की सुनवाई करती है तो ऊपर की अदालतें (उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायलय) उसे ऐसे करने से रोकने के लिए निषेध आदेश जारी करती है।

  • अधिकार पृच्छा- जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोई कानूनी हक नही है तब न्यायालय अधिकार पृच्छा आदेश के द्वारा उस पद पर कार्य करने से रोक दिया जाता है।

  • उत्प्रेषण – जब कोई निचली अदालत या सरकारी अधिकारी बिना अधिकार के कोई कार्य करता है, तो न्यायालय उसके समक्ष विचाराधीन मामले को उससे लेकर उत्प्रेषण द्वारा उसे ऊपर की अदालत या अधिकारी को हस्तांतरित कर देता है।

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  • संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा किए जाने पर अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 में वर्णित मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं।

  • अनुच्छेद 20 एवं 21 को छोड़कर अन्य मूल अधिकारों को निलंबित करने की शक्ति राष्ट्रपति को अनुच्छेद 359 के तहत प्राप्त है।

  • भारतीय संविधान में 44वें सशोधन के पश्चात अनुच्छेद 20 एवं 21 के अंतर्गत प्राप्त मूल अधिकारों को निलंबित नही किया जा सकता है।

  • बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय के बहुमत के निर्णय से यह अभिनिर्धारित किया है कि मृत्युकारिता करने के लिए मृत्युदंड का वैकल्पिक दंड अनुच्छेद 14, 19 और 21 का अतिक्रमण नही करता है और सांविधानिक है।

  • उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय विधानमंडलों द्वारा पारित ऐसे किसी भी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर सकते हैं, जो संविधान के भाग तीन (मूल अधिकार) मे दिए किसी भी उपबंध की असंगति में  है।

  • भारतीय संविधान में सामाजिक-आर्थिक एजेंडे को साकारित करने के लिए वाद योग्य और अ-वाद दोनों तरह की व्यवस्थाएं समाहित हैं। जिसमें मौलिक अधिकार वाद योग्य हैं और नीति-निदेशक तत्व अ-वाद योग्य हैं।

  • मौलिक अधिकार नैसर्गिक एवं अप्रतिदेय अधिकार हैं, जो राज्य कृत्य के विरुध्द एक गारंटी के रुप मे हैं। इन्हें केवल आपातकालीन स्थिति में ही निलंबित किया जा सकता है। अनुच्छेद 358 एवं 359 के मूल अधिकारों के निलंबन संबंधी प्रावधानों का वर्णन किया गया है।

  • भारतीय संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। वर्तमान में कुल 6 मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं।

  • संविधान का अनुच्छेद 14 विधायन सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण लगाता है। यह अपबंध कहता है कि किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित किया जाएगा।

  • आई.सी.सी.पी.आर. (यानी इंटरनेशनल कन्वेनैंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स) के अनुच्छेद 24 द्वारा बाल अधिकार को सुरक्षित किया गया है। उल्लेखनीय है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 24 के द्वारा भी बाल अधिकार का संरक्षण किया गया  है।

  • अर्नेस्ट बार्कर का कथन है कि अधिकार बिना कर्तव्य के उसी प्रकार है जैसे मनुष्य बिना परछाई के।

  • बंधुआ मजदूर (उन्मूलन) अधिनियम संसद में 1976 मे पारित किया जिसका उद्देश्य (अनुच्छेद 23 के परिप्रेक्ष्य में) केवल बंधुआ श्रमिकों को मुक्त करना नही अपितु उनके पुनर्वास की व्यवस्था भी करना है।

  • अधिकार मानव व्यक्ति के समग्र विकास की अनिवार्य अपेक्षाएं हैं। इनके अभाव में मानव का बौध्दिक, नैतिक आध्यात्मिक तथा लौकिक उत्थान बाधित हो जाएगा एवं मानव जीवन पशुवत हो जाएगा। अधिकार, राज्य शक्ति पर सीमाएं हैं। यह राज्य कार्यवाही के विरुध्द प्रत्याभूति है। अतः अधिकार राज्य के विरुध्द नागरिकों के दावें हैं।

  • सेवा के अधिकार की अवधारणा वर्ष 1991 में ग्रेट ब्रिटेन ( यूनाइटेड किंगडम) मे प्रारंभ हुई। इसका तात्पर्य उस अधिकार से है जिसके तहत राज्य एक निश्चित अवधि के अंदर लोक सेवाएं देने की गारंटी देता है। इसे सिटिजन चार्टर भी कहा जाता है। भारत में केन्द्रीय स्तर ऐसा कानून बनाने का प्रयास  द राइट ऑफ सिटिजन फॉर टाइम बाउंड डिलीवरी ऑफ गुड्स एंड सर्विसेज एंड रिड्रेसल ऑफ देयर ग्रीवान्सेज बिल, 2011 के माध्यम से किया गया, किंतु वह पारित नही हो सका। हालांकि मध्य प्रदेश सेवा का अधिकार अधिनियम लागू करने वाला देश का पहल राज्य बना। इसने यह कानून 18 अगस्त, 2010 को लागू किया। दूसरा स्थान बिहार राज्य का है जहां यह 25 जुलाई, 2011 को लागू किया गया।

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राज्य की नीति के निदेशक तत्व

  • भारतीय संविधान के भाग 4 (अनुच्छेद 36-51) के तहत राज्य की नीति निदेशक तत्व का प्रावधान किया गया है।

  • भारतीय संविधान में नीति निदेशक तत्व आयरलैंड के संविधान से प्रेरित हैं।

  • नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति अनुच्छेद 37 से स्पष्ट होती है। इसके मुख्य पक्ष निम्नलिखित हैं –

  1. नीति निदेशक तत्वो के उपबंध न्यायालयों द्वारा लागू (Enforceable) नही हैं।

  2. तथापि इसके सिध्दांत देश के संचालन में मूलभूत (Fundamental) हैं,

  3. राज्य का यह कर्तव्य है कि वह इन सिध्दांतों को कानून बनाकर लागू करे।

  • अनुच्छेद 38 के अनुसार, राज्य, लोक कल्याण की अभिवृध्दि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा।

  • अनुच्छेद 39 में राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति निदेशक तत्व हैं, जैसे पुरुष और स्त्री को समान रुप से आजीविका प्राप्त हो, भौतिक संसाधनों का वितरणकारी न्याय उपलब्ध हो, आर्थिक विकेन्द्रीकरण हो, पुरुष और स्त्री को समान कार्य के लिए समान वेतन हो, बालकों हेतु कल्याणपरक कार्य आदि।

  • अनुच्छेद 39 क में समान न्याय तथा निःशुल्क विधिक सहायता का प्रावधान है। इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया।

  • अनुच्छेद 40 के अनुसार, राज्य ग्राम पंचायतों के गठन का प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 41 के अनुसार, राज्य कुछ दशाओं में काम, शिक्षा तथा लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।

  • अनुच्छेद 42 के अनुसार, राज्य की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता के लिए प्रावधान करेगा।

  • अनुच्छेद 43 के अनुसार, राज्य कर्मकारों को उचित मजदूरी तथा कुटीर उद्योगों के संवर्धन करने का प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 43 क के अनुसार, राज्य, उद्योगों के प्रबंधन के कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करेगा।

  • अनुच्छेद 44 के अनुसार, राज्य, भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र मे नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता लागू करने का प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 45 के अनुसार, राज्य, छह वर्ष से कम आयु के बालको के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा का प्रबंध करेगा।

  • अनुच्छेद 46 के अंतर्गत, राज्य, अनूसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य दुर्बल वर्गों हेतु शिक्षा तथा आर्थिक हितों में वृध्दि के लिए प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 47 के अंतर्गत राज्य, लोगो के पोषाहार स्तर, जीवन स्तर ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य आदि सुधारने का प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 48 के अंतर्गत राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक तथा वैज्ञानिक ढंग से संगठित करने का प्रयास करेगा  और गाय, बछड़ों तथा अन्य दुधारु और वाहक मवेशियों के वध का प्रतिषेध करने के लिए प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 48 क के अनुसार, राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन का तथा वन एवं अन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 49 के अंतर्गत राज्य, राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों तथ वस्तुओं को संरक्षण प्रदान करेगा।

  • अनुच्छेद 50 के अंतर्गत राज्य की लोक सेवाओ में, न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए राज्य प्रयास करेगा।

  • अनुच्छेद 51 के अनुसार, राज्य, अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि का प्रयास करेगा।

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मौलिक अधिकार एवं नीति निदेशक तत्व में अंतर

मौलिक अधिकार

नीति निदेशक तत्व

भारतीय संविधान के भाग 3 में उल्लिखित।

भारतीय संविधान के भाग 4 में उल्लिखित।

अमेरिका के संविधान से प्रेरित।

आयरलैंड के संविधान से प्रेरित।

इसकी प्रवृत्ति नकारात्मक है।

इसकी प्रवृत्ति सकारात्मक है।

यह न्यायोचित है, इसके उल्लंघन पर न्यायालय द्वारा इसे लागू कराया जाना।

यह गैर-न्यायोचित है, इसे न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता।

कानूनी रुप से मान्य

नैतिक एवं राजनीतिक मान्यता।

उद्देश्य-देश मे लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना।

उद्देश्य-देश में सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना।

लागू करने के लिए विधान की आवश्यकता नही

लागू करने के लिए विधान  बनाने की आवश्यकता।

व्यक्तिगत कल्याण को प्रोत्साहन

सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए।

नागरिकों को स्वतः प्राप्त

सरकार द्वारा लागू करने के  बाद ही नागरिकों को प्राप्त।

 

  • भारतीय संविधान मे सम्मिलित नीति निदेशक तत्वों की प्रेरणा हमें वर्ष 1937 के आयरलैंड के संविधान से प्राप्त हुई। आयरलैंड के संविधान से अनुसरणीय इस भाग पर फेबियनवाद, समाजवाद, उदार लोकतांत्रिक विचारधाराओं, गांधीवाद, मानवाधिकारों की सार्वत्रिक घोषणाओं आदि का व्यापक प्रभाव पड़ा है।

  • समान कार्य के लिए समान वेतन भारत के संविधान मे सुनिश्चित किया गया राज्य के नीति निदेशक सिध्दांतों का एक अंग है। अनुच्छेद 39(घ) यह प्रावधान करता है कि पुरुष और स्त्री दोनों का समान कार्य के लिए समान वेतन होना चाहिए। ज्ञातव्य है कि संविधान के अनुच्छेद 39(घ) के अनुसरण मे संसद ने वर्ष 1976 मे समान पारिश्रमिक अधिनियम पारित किया है।

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) भारत में लागू एक रोजगार गारंटी योजना है, जिसे वर्ष 2005 में लोक सभा द्वारा अधिनियमित किया गया। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है, जो सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-संबंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार है। यह काम पाने का अधिकार के तहत भाग-IV के अनुच्छेद 41 के अंतर्गत है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के अंतर्गत राज्य के नीति निदेशक तत्वों में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि का उल्लेख है। इसके अनुसार राज्य –

  1. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृध्दि का

  2. राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का

  3. संगठित लोगों के एक-दूसरे से व्यवहारों मे अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का और

  4. अंतरराष्ट्रीय विवादों के माध्यम (Arbitration) द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 43 (क) अर्थात उद्योगों के प्रबंधन में सहभागिता 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया। अनुच्छेद 43 (क) के अनुसार, राज्य किसी उद्योग में लगे हुए उपक्रमों, स्थापनों या अन्य संगठनों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त विधान द्वारा या किसी अन्य रीती से कदम उठाएगा।

  • संविधान में बच्चों, स्त्रियों एवं जनाजातियों के शोषण के विरुध्द अधिकार को स्वीकृति प्रदान की गई है, जबकि दलित शब्द का संविधान में उल्लेख नही है।

  • राज्य के नीति निदेशक सिध्दांत मौलिक अधिकारों से भिन्न हैं, क्योकि निदेशक सिध्दांत प्रवर्तनीय नही है, जबकि मौलिक अधिकार न्यायलय द्वारा प्रवर्तनीय हैं। निदेशक सिध्दांत संविधान के भाग 4 में वर्णित हैं और 3 में वर्णित मौलिक अधिकार व्यक्तियों को राज्य कृत के विरुध्द दिए गए सुरक्षा की गारंटी है।

  • नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद, 47 के तहत मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न उपभोग का प्रतिषेध किया गया है। मानव के दुर्व्यापार और बालातश्रम का प्रतिषेध मूलाधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 23(1) के तहत किया गया है।

  • भारतीय संविधान में सामाजिक आर्थिक एजेंडे को साकारित करने के लिए वाद योग्य और अ-वाद योग्य दोनों तरह की व्यस्थाएं समाहित हैं। जिसमें मौलिक अधिकार वाद योग्य और नीति निदेशक तत्व अ-वाद योग्य हैं।

  • के.टी. शाह ने कहा था कि राज्य के नीति निदेशक सिध्दांत एक ऐसा चेक है, जो  बैंक की सुविधानुसार अदा किया जाता है।

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  • 15 अगस्त, 1995 से प्रारंभ राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम संविधान में प्रदत्त राज्य के नीति निदेशक तत्वों अर्थात राज्य कें संवैधानिक लक्ष्यों (विशेषकर अनुच्छेद 41 के तहत बेरोजगारी, वृध्दावस्था आदि की स्थिति में लोक सहायता संबंधी निदेश) की प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रारंभ में इस कार्यक्रम के तहत शामिल थे – राष्ट्रीय वृध्दावस्था पेंशन योजना (NOAPS), राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (NFBS) एवं राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (NMBS)। 1 अप्रैल, 2001 से NMBS को जनसंख्या स्थिरीकरण कार्यक्रम का भाग  बना दिया गया है।

  • अनुच्छेद 350(क) – प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने का विशेष निर्देश देता है।

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मूल कर्तव्य

  • भारतीय संविधान में मूल कर्तव्य, पूर्व सोवियत संघ के संविधान से लिए गए हैं।

  • इन्हें सरदार स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति के आधार पर 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया है।

  • वर्तमान में अनुच्छेद 51(क) के तहत मौलिक कर्तव्यों की कुल संख्या 11 है। जबकि मूल संविधान में इनकी संख्या 10 थी।

  • 11वां मूल कर्तव्य, 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया।

  • मौलिक कर्तव्यों को प्रभावी बनाने के लिए वर्ष 1999 में जे.एस. वर्मा समिति का गठन किया गया।

  • 51(क) मूल कर्तव्य – भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह –

  • – संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें।

  • – स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करें।

  • – भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे उसे अक्षुण्ण रखे।

  • – देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।

  • – भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुध्द है।

  • – हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करें।

  • – प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे।

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।

  • सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे।

  • व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रो में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले।

  • यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथावस्थित, बालक या प्रतिपात्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे।

  • भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करने और अक्षुण्ण रखने के मूल कर्तव्य को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51(क) के तीसरे स्थान पर रखा गया है।

  • मौलिक कर्तव्यों को परमादेश द्वारा प्रभावी नही बनाया जा सकता है। परमादेश एक रिट है जिसे न्यायालय मूल अधिकारों का उल्लंघन होने पर जारी करता है। मौलिक कर्तव्य लोगो पर नैतिक जिम्मेदारी आरोपित करते हैं। प्रशासन इसके लिए जिम्मेदार नही हो सकता है, जबकि रिटें प्रशासनिक अधिकारी के विरुध्द जारी की जाती है।

  • भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा – प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण एवं सुधार यह संविधान में मौलिक कर्तव्यों मे शामिल किया गया है। जिसका वर्णन अनुच्छेद 51 क(छ) में किया गया है।

  • वैज्ञानिक प्रवृत्ति विकसित करना अनु. 51-क (ज) के तहत, सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा करना अनु.-क (झ) के तहत तथा संविधान के प्रति निष्ठावान रहना और उसके आदर्शों का सम्मान करना अनु.-51- (क) के तहत मूल कर्तव्यों में शामिल है।

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राष्ट्रपति

  • भारत का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है।

  • अनुच्छेद 52 के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति होगा।

  • अनुच्छेद 53 के तहत संघ की समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। इस शक्ति का प्रयोग वह संविधान के अनुसार, स्वतः या अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करेगा।

  • अनुच्छेद 54 – के अनुसार, राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा होता है। राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल मे संसद के दोनों सदनों (राज्य सभा एवं लोक सभा) के निर्वाचित सदस्य और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं।

  • 70वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा दिल्ली और पुडुचेरी विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों को भी निर्वाचक मंडल मे शामिल किया गया।

  • राष्ट्रपति के चुनाव में मनोनीत सदस्य एवं विधान परिषद के सदस्य भाग नही लेते हैं।

  • राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार, एकल संक्रमणीय मत और गुप्त मतदान द्वारा होता है।

  • राष्ट्रपति चुनाव से संबंधित सभी विवादों की जांच व फैसले उच्चतम न्यायालय में होते हैं तथा उसका फैसला अंतिम होता है।

  • राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती नही दी जा सकती है कि निर्वाचक मंडल अपूर्ण है।

  • अनुच्छेद 58 में राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं (भारत का नागरिक हो, 35 वर्ष की आयु पूरा कर चुका हो तथा लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता) बताई गई है।

  • राष्ट्रपति के चुनाव में नामांकन के लिए उम्मीदवार के कम-से-कम 50 प्रस्तावक व 50 अनुमोदक होने चाहिए।

  • जमानत राशि के रुप में 15000 रु. जमा करना होगा।

  • यदि उम्मीदवार कुल डाले गए मतो का 1/6 भाग प्राप्त करने में असमर्थ रहता है तो जमानत राशि जब्त कर ली जाती है।

  • अनुच्छेद 56 में राष्ट्रपति की पदावधि (पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष तक) का उल्लेख है।

  • अनुचछेद 56(1)(क) के अनुसार, भारत का राष्ट्रपति अपना त्याग-पत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित करके देता है। उपराष्ट्रपति इसकी सूचना लोक सभा अध्यक्ष को तुरंत देता है (अनु. 56(2)।

  • भारतीय संविधान का अनु. 57 राष्ट्रपति पद के लिए किसी व्यक्ति को पुनः निर्वाचन की पात्रता निर्धारित करता है।

  • 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के अनुसार, राष्ट्रपति के निर्वाचन मे जनसंख्या से तात्पर्य वर्ष 1971 की जनगणना द्वारा निर्धारित जनसंख्या से है।

  • 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इसे वर्ष 2026 तक के लिए निर्धारित किया गया है।

  • अनुच्छेद 59(1) के अनुसार, यदि संसद के किसी सदन का या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन को कोई सदस्य राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाता है, तो यह समझ जाएगा कि उसने उस सदन में अपना स्थान राष्ट्रपति के रुप में अपने पद ग्रहण की तारीख से रिक्त कर दिया है।

  • अनुच्छेद 60 के तहत भारत के राष्ट्रपति को शपथ भारत का मुख्य न्यायाधीश दिलाता है।

  • वर्तमान में राष्ट्रपति का वेतन 5 लाख रुपये है। राष्ट्रपति का वेतन भारत की संचित निधि से दिया जाता है।

  • अनुच्छेद 56(1)(ख) के अनुसार, राष्ट्रपति पर महाभियोग संविधान के अतिक्रमण के आधार पर चलाया जा सकता है।

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  • अनुच्छेद 61 मे राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया का उल्लेख है।

  • अनु. 61(2) के अनुसार, महाभियोग का आरोप तब तक नही लगाया जाएगा, जब तक कि ऐसा आरोप लगाने की प्रस्थापना किसी ऐसे संकल्प में अंतर्विष्ट नही है, जो कम-से-कम 14 दिन की ऐसी लिखित सूचना को दिए जाने का प्रस्ताव  प्रस्तावित न किया गया हो।

  • इस प्रकार 14 दिन की अग्रिम सूचना के साथ ही संकल्प पर सदन की कुल सदस्य संख्या के कम-से-कम एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर भी होने चाहिए।

  • अनुच्छेद 62(2) के अनुसार, यदि राष्ट्रपति पद की रिक्ति राष्ट्रपति की मृत्यु, पदत्याग या पद से हटाए जाने के कारण हुई है तो पद रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन, रिक्ति होने की तारीख के पश्चात यथाशीघ्र और प्रत्येक दशा में 6 माह बीतने से पहले किया जाएगा।

  • यदि मृत्यु त्याग-पत्र अथवा हटाए जाने की स्थिति में राष्ट्रपति का पद रिक्त हो, तो पद का कार्यभार उपराष्ट्रपति संभालेगा।

  • यदि किन्ही कारणों से उपराष्ट्रपति भी उपलब्ध नही हो, तो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या उसके न रहने पर वरिष्ठतम न्यायाधीश राष्ट्रपति के कार्यों को संपादिक करेगा।

  • अनुच्छेद 77 के अनुसार, भारत सरकार के समस्त कार्यपालिका कृत्य राष्ट्रपति के नाम से किए जाते हैं।

  • अनुच्छेद 78 के तहत राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री से सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है।

  • अनुच्छेद 108 के तहत राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है।

  • अनुच्छेद 111 को तहत प्रावधान है कि राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक पर स्वीकृति प्रदान करेगा या अपनी स्वीकृति रोक लेगा अथवा विधेयक (धन विधेयक के अलावा) को पुनर्विचार हेतु सदन को लौटा सकेगा।

  • यदि विधेयक सदनों द्वारा संशोधन सहित या उसके बिना फिर से पारित कर दिया जाता है और राष्ट्रपति के समक्ष पुनः प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति नही रोकेगा।

  • राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नही लौटा सकता। वस्तुतः धन विधेयक सदन में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही प्रस्तुत किए जाते हैं।

  • राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही विधेयक कानून बनते हैं।

  • अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की क्षमादान की शक्ति प्रदान की गई है।

  • अनुच्छेद 72 के तहत भारत के राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्रदान की गई है।

  • अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श का अधिकार दिया गया है।

  • भारत का राष्ट्रपति तीनों सेनाओं (थल सेना, वायु सेना तथा नौसेना) का प्रधान सेनापति होता है।

  • राष्ट्रपति राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है परंतु राष्ट्र का नेतृत्व नही करती है।

  • किसी भौगोलिक क्षेत्र को अनूसूचित क्षेत्र घोषित करने का संवैधानिक अधिकार राष्ट्रपति के पास है।

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भारत के राष्ट्रपति

नाम

पद धारण

अवधि

कार्यकाल अनुसार क्रम

व्यक्ति अनुसार क्रम

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद

26 जनवरी, 1950-13 मई, 1962

1-3

1

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन

13 मई, 1962-13मई, 1967

4

2

डॉ. जाकिर हुसैन

13 मई, 1967-3 मई, 1969

5

3

वराहगिरी वेंकट गिरि (कार्यवाहक)

3 मई, 1969-20 जुलाई, 1969

न्यायमूर्ति मुहम्मद हिदायतुल्लाह (कार्यवाहक)

20 जुलाई, 1969-24 अगस्त, 1969

वराहगिरि वेंकट गिरि

24 अगस्त, 1969-24 अगस्त, 1974

6

4

डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद

24 अगस्त, 1974-11 फरवरी, 1977

7

5

बी.डी. जत्ती (कार्यवाहक)

11 फरवरी, 1977-25 जुलाई, 1977

नीलम संजीव रेड्डी

25 जुलाई, 1977-25 जुलाई, 1982

8

6

ज्ञानी जैल सिंह

25 जुलाई, 1982-25 जुलाई 1987

9

7

आर. वेंकटरमण

25 जुलाई, 1987-25 जुलाई, 1992

10

8

डॉ. शंकर दयाल शर्मा

25 जुलाई, 1992-25 जुलाई, 1997

11

9

डॉ. के.आर. नारायणन

25 जुलाई, 1997 -25 जुलाई, 2002

12

10

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम

25 जुलाई, 2002-25 जुलाई, 2007

13

11

प्रतिभा पाटिल

25 जुलाई, 2007-25 जुलाई, 2012

14

12

प्रणब मुखर्जी

25 जुलाई, 2012-25 जुलाई, 2017

15

13

रामनाथ कोविंद

25 जुलाई, 2017 – अब तक

16

14

 

  • राष्ट्रपति के चुनाव का तरीका (सूत्र) अनुच्छेद 55 में वर्णित है।

विधानसभ के निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्यांकन = राज्य की जनसंख्या / राज्य की विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या  ´ 100

 

संसद के निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्य  = सभी निर्वाचित विधानसभा सदस्यों के मतो का कुल मान / निर्वाचित संसद सदस्यों की कुल संख्या

टिप्पणी – उपर्युक्त सूत्र में यदि शेषफल आधे से कम है तो नही गिना जएगा और यदि ज्यादा है तो उस एक गिना जाएगा। 12वें राष्ट्रपति चुनाव में (तथा जुलाई 2012 में संपन्न 14वें राष्ट्रपति चुनाव में भी) 4896 मतदाता थे।

  • अनुच्छेद 54 के अनुसार, राष्ट्रपति के चुनाव मे राज्य विधानमंडल के उच्च सदन अर्थात विधान परिषद के सदस्य नहीं कर सकते हैं अतः यदि मुख्यमंत्री इस सदन का सदस्य है, तो वह राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान करने के लिए पात्र नही होता है।

  • अगर भारत के राष्ट्रपति के चुनाव में कोई विवाद है तो उस विवाद को अनुच्छेद 71(1) के अनुसार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय को सौंपा जाएगा और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया गया वनिश्चय अंतिम होगा।

  • अनुच्छेद 56(1) के अनुसार, राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण के दिन से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है।

  • अनुच्छेद 65 के अनुसार, यदि मृत्यु, त्याग-पत्र अथवा हटाए जाने की स्थिति में राष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो पद का कार्यभार उपराष्ट्रपति संभालेगा तथा यदि किन्हीं कारणों से उपराष्ट्रपति भी उपलब्ध नही है तो उच्चतम न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश या उसके न रहने पर उसी न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश, जो उस समय उपलब्ध है, राष्ट्रपति के कृत्यों को सम्पादित करेगा (राष्ट्रपति उत्तराधिकार अधिनियम, 1969)

  • अनुच्छेद 53(1) के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा। इस प्रकार भारतीय संघ का कार्य़पालिका अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है।

  • अनुच्छेद 74(1) के तहत प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का प्रधान होता है। अनुच्छेद 75(1) के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। कोई भी व्यक्ति यदि संसद सदस्य नही है तो भी वह प्रधानमंत्री बन सकता है या मंत्रिपरिषद में सम्मिलित हो सकता है लेकिन छः माह के भीतर उसे सदन की सदस्यता अवश्य लेनी होगी।

  • भारत एक गणराज्य है। इसका तात्पर्य़ है कि भारत का राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित होगा न कि वंशानुगत। अतः भारतीय गणतंत्र का प्रमुख या राष्ट्राध्यक्ष होता है जिसका चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली द्वारा किया जाता है।

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  • 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा अनुच्छेद 74(1) में एक परांतक जोड़ा गया, जिसके तहत राष्ट्रपति को कोई भी मामला मंत्रिपरिषद द्वारा  पुनर्विचार किए जाने के लिए  वापस भेजने का अधिकार दिया गया।

  • अनुच्छेद 85(2) (ख) के अनुसार राष्ट्रपति लोक सभा भंग कर सकता है, किंतु राष्ट्रपति की यह शक्ति अनुच्छेद 74(1) के अधीन है अर्थात वह ऐसा केन्द्रीय मंत्रिमंडल की अनुशंसा पर ही कर सकता है। उल्लेखनीय है कि मंत्रिमंडल में कैबिनेट स्तर के मंत्री शामिल होते हैं, जबकि मंत्रिपरिषद में सभी (कैबिनेट, राज्य, उपमंत्री) मंत्री शामिल होते हैं।

  • संविधान के अनु. 108 के तहत किसी विधेयक पर दोनों सदनों के मध्य गतिरोध की स्थिति मे लोक सभा और राज्य सभा की संयुक्त बैठक राष्ट्रपति द्वारा आहूत की जा सकती है। अनु. 118 (4) के तहत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अंतर्गत भारत का राष्ट्रपति संसद का एक संघटक भाग है, वह प्रत्येक वर्ष दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करता है तथा वह संविधान के अनु. 123 के तहत विशेष पारिस्थितियों मे अध्यादेश जारी कर सकता है परंतु वह दोनों सदनों में चर्चा में भाग नही लेता है।

  • पेप्सू विनियोग विधेयक के मामले में 1954 में राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने आत्यांतिक वीटो का प्रयोग किया था, जबकि 1986 में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भारतीय डाक घर (संशोधन) विधेयक पर पॉकेट वीटो का प्रयोग किया। आत्यांतिक वीटो मंत्रिमंडल की इच्छाधीन होता है, अतः पॉकट वीटो ही स्वेच्छा से किया गया माना जाएगा।

  • वर्ष 1986 में भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भारतीय पोस्ट ऑफिस संशोधन अधिनियम के संबंध में जेबी निषेधाधिकार का प्रयोग किया था। उल्लेखनीय है कि जब राष्ट्रपति दोनों सदनों द्वारा पारित बिल को अपने पास असीमित समय-सीमा के लिए लंबित रखता है अर्थात वह इस पर सहमति नही देता और न ही इसे पुनर्विचार के लिए लौटाता है, तो इसे संविधानिक शब्दावली में जेबी निषेधाधिकार कहा जाता है।

  • अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने संबंधी शक्तियों का वर्णन करता है।

  • अनुच्छेद 280(1) के अनुसार, वित्त आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। अनुच्छेद 239 क (5) के तहत संघ राज्य क्षेत्र के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेंगे। योजना आयोग के उपाध्यक्ष की नियुक्ति प्रधानमंत्री  द्वारा की जाती  है।

  • राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार महान्यायवादी, अनुच्छेद 148 के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यों के राज्यपाल की नियुक्ति करता है।

  • संविधान के अनु. 160 के अनुसार राष्ट्रपति आकस्मिक या असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन हेतु उपबंध कर सकता है।

  • अनुच्छेद 164(1) के अनुसार, राज्यो के मुख्यमंत्री की नियुक्ति का अधिकार राज्यों के राज्यपाल को है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को विधि या तथ्य के व्यापक महत्व के प्रश्न के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय से परामर्श की शक्ति प्रदान करता है।

  • संसद के सदनों को संदेश भेजना अनुच्छेद 86 के अंतर्गत राष्ट्रपति का अधिकार है, जबकि अनुच्छेद 72 क्षमादान की राष्ट्रपति की शक्ति, अनुच्छेद 123 अध्यादेश निर्गत करने की राष्ट्रपति की शक्ति और अनुच्छेद 143 उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति शब्दशः शक्ति के रुप में उल्लेखन करते हैं।

  • अनुच्छेद 124 के खंड (4) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नही हटाया जाएगा, जब तब साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए  संसद के प्रत्येक सदन  द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन, राष्ट्रपति के समक्ष उसी सत्र मे रखे जाने पर राष्ट्रपति ने उसे हटाने का आदेश नही दे दिया  है।

  • भारत के राष्ट्रपति को संविधान के तहत प्राप्त प्राधिकार औपचारिक एवं विधिक तथा संवैधानिक और नाममात्र हैं।

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  • संघ वित्त आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की स्थापना और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। जबकि लोक लेखा समिति की स्थापना लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों को मिलाकर की जाती है। इसके अध्यक्ष की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष के द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति द्वारा संघ वित्त आयोग की सिफारिशों, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन तथा राष्ट्री अनूसूचित जाति आयोग के प्रतिवेदन को क्रमशः संविधान के अनु. 281, 151(1) एवं 338(6) के तहत संसद के पटल पर रखवाया जाता है।

  • संसद के लिए राष्ट्रपति का अभिभाषण केन्द्रीय मंत्रिमंडल तैयार करता है, क्योंकि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति केन्द्रीय मंत्रिमंडल मे निहित है।

  • स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। वह संविधान सभा के अध्यक्ष भी थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बिहार राज्य से थे।

  • भारत के व्यक्ति अनुसार, चौथे राष्ट्रपति श्री वी.वी. गिरि थे तथापि कार्यकाल-अनुसार उनका क्रम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (तीन बार), डॉ. एस. राधाकृष्णन एवं डॉ. जाकिर हुसैन के बाद छठां  है।

  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद लगातार तीन अवधि तक (1950-1952, 1952-1957 तथा 1957-1962) भारत के राष्ट्रपति रहे थे। जिसमें से 26 जनवरी, 1950 को वे संविधान के अध्यक्ष होने के कारण भारत के राष्ट्रपति बने थे तथा 1952 एवं 1957 मे वे क्रमशः प्रथम एवं द्वितीय राष्ट्रपति चुनावों में राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे।

  • एन. संजीव रेड्डी सर्वसम्मति से (निर्विरोध) भारत के राष्ट्रपति चुने जाने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। उनका कार्यकाल वर्ष 1977-82 था।

  • भारत के दूसरे राष्ट्रपति (13 मई, 1962 से 13 मई, 1967) डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को दार्शनिक राजा तथा दार्शनिक शासक के रुप में जाना जाता है।

  • भारत के चौथे राष्ट्रपति वी.वी. गिरि (1969-1974) ट्रेड यूनियन आंदोलन से संबध्द रहे थे। वे दो बार अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहे थे।

  • भारत के व्यक्ति के अनुसार 11वें राष्ट्रपति (2002-2007) डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को मिसाइल मैन की संज्ञा दी जाती है क्योंकि उन्हीं के निर्देशन मे प्रारंभ एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के द्वारा इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सका है।

  • जस्टिस एम. हिदायतुल्ला ने 20 जुलाई, 1969 से 24 अगस्त 1969 के दौरान कार्यवाहक राष्ट्रपति के रुप में कार्य किया था।

  • 19 जुलाई, 2007 को भारतीय गणतंत्र के 13वें राष्ट्रपतीय चुनाव संपन्न हुए थे। 25 जुलाई, 2007 को प्रतिभा पाटिल ने व्यक्ति के अनुसार, देश के 12वें राष्ट्रपति के रुप में शपथ ग्रहण किया तथापि कार्यकाल-अनुसार उनका क्रम 14वां था। प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के प्रत्याशी भैरो सिंह शेखावत को पराजित किया। वे भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति थी।

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  • संविधान की पांचवी अनुसूची के पैराग्राफ 6 में अनूसूचित क्षेत्रों से संबंधित निम्न प्रावधान है –

  1. राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किसी भौगोलिक क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित अथवा विस्तारित किया जा सकता है।

  2. किसी भी समय राष्ट्रपति के आदेश अनुसूचित क्षेत्र के संपूर्ण अथवा किसी विशिष्ट भाग को प्राप्त किया जा सकता है।

  3. राज्य के राज्यपाल की सहमति से राज्य के अनुसूचित क्षेत्र के क्षेत्रफल को बढ़ाया जा सकता है।

  • डॉ. जाकिर हुसैन 6 जुलाई, 1957 से 11 मई, 1962 तक बिहार के राज्यपाल, 13 मई, 1962 से 12 मई, 1967 तक भारत के उपराष्ट्रपति और 13 मई, 1967 से 3 मई, 1969 (जब उनकी मृत्यु हुई) तक भारत के राष्ट्रपति रहे थे।

  • राष्ट्रपति वी.वी. गिरि, राष्ट्रपति निर्वाचन में भ्रष्ट आचरण के आरोप में विवाद की सुनवाई के समय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एस. एम. सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ के सम्मुख उपस्थित हुए थे। ध्यातव्य है कि 1969 के राष्ट्रपतीय चुनाव में वी.वी. गिरि स्वतंत्र उम्मीदवार तथा नीलम संजीव रेड्डी कांग्रेस पार्टी के घोषित उम्मीदवार थे। वी.वी. गिरि के निर्वाचन के समय दूसरे चक्र की मतगणना भी की गई थी, जिसमें वी.वी. गिरी ने विजय प्राप्त की थी।

  • ब्रिटिश वास्तुकार एडविन ल्यूटियन्स द्वारा राष्ट्रपति भवन को डिजाइन किया गया था। यह भवन भारत के राष्ट्रपति का सरकारी आवास है। वर्ष 1950 तक इसे वाइसरॉय हाउस कहा जाता था।

 

उपराष्ट्रपति

  • भारत में उपराष्ट्रपति का पद अमेरिका के उपराष्ट्रपति की तर्ज पर बनाया गया है।

  • आधिकारिक क्रम में यह पद राष्ट्रपति के बाद आता है।

  • संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।

  • अनुच्छेद 64 के तहत उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति (Ex-Officio Chairman) होता है।

  • जिस अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनु. 65 के अधीन राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नही करेगा तथा अनु. 97 के अधीन सभापति के वेतन –भत्ते का हकदार नही होगा।

  • भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्यों द्वारा किया जाता है।

  • अनु. 66(1) के अनुसार, उपराष्ट्रपति का निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पध्दति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है तथा ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होता है।

  • अनुच्छेद 66(3) के तहत उपराष्ट्रपति पद के लिए योग्यता (भारत का नागरिक हो, 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो तथा राज्य सभा सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता) का उल्लेख किया गया है।

  • भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा के सभापति पद के लिए 4 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है।

  • उपराष्ट्रपति को, उपराष्ट्रपति पद के लिए वेतन नही प्राप्त होता है, बल्कि राज्य सभा के सभापति के रुप में प्राप्त होता है।

  • अनुच्छेद 67 (क) के अनुसार, उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष है।

  • अनुच्छेद 67(ख) के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्य सभा के ऐसे संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा, जिसे राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत ने पारित किया है और जिससे लोक सभा सहमत है।

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  • भारत के उपराष्ट्रपति एवं उनका कार्यकाल इस प्रकार है –

  1. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन –      1952-1962

  2. डॉ. जाकिर हुसैन –      1962-1967

  3. वी.वी. गिरि –      1967-1969

  4. गोपाल स्वरुप पाठक –      1969-1974

  5. बी.डी. जत्ती –      1974-1979

  6. एम. हिदायतुल्ला –      1979-1984

  7. आर. वेंकट रमण –      1984-1987

  8. शंकर दयाल शर्मा –      1987-1992

  9. के.आर. नारायणन –      1992-1997

  10. डॉ. के. कृष्णकांत –      1997-2002

  11. भैरो सिंह शेखावत –      2002-2007

  12. मोहम्मद हामिद अंसारी –      2007-2017

  13. वेंकैया नायडू –      2017 से अब तक

  • भारत का उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के पश्चात भारत का द्वितीय उच्चतम प्रतिष्ठित पदधारी है। वह राज्य सभा का पदेन सभापति होता है परंतु उसके पास उपराष्ट्रपति पद से संबध्द कोई औपचारिक दायित्व नही है। वह राष्ट्रपति के पद-त्याग, अपदस्थीकरण अथवा मृत्यु की स्थिति या राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके कार्यों का निर्वहन करता है।

  • जाकिर हुसैन जामिया मिलिया कालेज के प्रिंसीपल एवं शिक्षा मंत्री थे। डॉ. एस. राधाकृष्णन 1949 से 1952 तक यू.एस.एस.आर. (S.S.R.) में भारत के राजदूत थे। वी.वी. गिरि 1947 से 1951 तक सिलोन (श्रीलंका) मे भारतीय उच्चायुक्त के पद पर थे। के.आर. नारायणन भी चीन में राजदूत (1976-78) रहे।

  • श्री मोहम्मद हामिद अंसारी का भारत के उपराष्ट्रपति के रुप में व्यक्ति के अनुसार क्रमांक 12वां है।

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केन्द्रीय मंत्रिपरिषद

  • केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री तथा उपमंत्री शामिल होते हैं।

  • अनुच्छेद 74(1) के अनुसार, राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा।

  • राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करेगा परंतु राष्ट्रति ऐसी सलाह पर साधारतया या अन्यथा पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकेगा और राष्ट्रपति ऐसे पुनर्विचार के पश्चात दी गी सलाह के अनुसार, कार्य करेगा (44वें संविधान संशोधन द्वारा शामिल)।

  • अनुच्छेद 74(2) के अनुसार, इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जांच नही की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने राष्ठ्रपति को कोई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी।

  • अनुच्छेद 75(1) के अनुसार, प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह से करेगा।

  • अनुच्छेद 75(1) (क) के अनुसार, मंत्रिपरिषद मे प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नही होगी।

  • राज्यों में जहां पर सीटों की संख्या 40 होगी वहां अधिकतम 12 मंत्री बनाए जा सकते हैं।

  • संविधान (91वां संशोधन) अधिनियम, 2003 के द्वारा उपर्युक्त प्रावधान को संविधान मे शामिल किया गया।

  • मंत्री, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करते हैं। मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रुप से उत्तरदायी होती है।

  • संविधान में मंत्रिमंडल शब्द का प्रयोग केवल एक बार अनु. 352 के खंड (3) में किया गया है।

  • कैबिनेट या मंत्रिंडल, प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट स्तर के मंत्रियों की परिषद होती है।

  • मंत्रीय उत्तरदायित्व के कारण अधिकारी अनामता के सिध्दांत से संरक्षित रहते हैं और अधिकारियों के द्वारा किए गए कार्यान्वयन की जिम्मेदारी अंतिम रुप से मंत्री की होती है।

  • केन्द्रीय कैबिनेट सचिवालय सीधे प्रधानमंत्री के अधीन होता है। इसका प्रशासनिक प्रमुख कैबिनेट सचिव होता है, जो सिविल सर्विसेज बोर्ड का पदेन अध्यक्ष भी होता है।

  • कोई मंत्री जो निरंतर 6 माह की किसी अवधि तक संसद के किसी सदन का सदस्य नही है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नही रहेगा।

  • प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों को शपथ राष्ट्रपति दिलाता है।

  • प्रधानमंत्री अपना त्याग-पत्र राष्ट्रपति को देता है।

  • संघीय मंत्रिमंडल के बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है।

  • अनुच्छेद 78 के अनुसार, प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को ऐसी कानूनी सूचना देगा जो संघीय प्रशासन तथा विधान के बारे में उसके द्वारा मांगी जाए।

  • 15 अगस्त, 1947 को केन्द्र में मंत्रालयों की संख्या 18 थी।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 78 में प्रधानमंत्री के दायित्वों का प्रावधान है, जिसके तहत प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि वह –

  • संघ के कार्यकलाप के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करे।

  • संघ के कार्यकलाप के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी जो जानकारी राष्ट्रपति मांगे, वह दे, और

  • किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नही किया है, राष्ट्रपति द्वारा अपेक्षा किए जाने पर परिषद के समक्ष विचार के लिए रखे।

  • कैबिनेट या मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट स्तर के मंत्रियों की परिषद होती है , जबकि मंत्रिपरिषद में  प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट स्तर के मंत्रियों सहित राज्यमंत्री एवं उपमंत्री भी शामिल होते हैं। मंत्रिमंडल का उल्लेख मात्र अनु. 352 में (44वें संशोधन से ) है।

  • भारतीय संविधान के अनुसार, प्रधानमंत्री का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि संसदीय शासन में वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद के पास होती है। प्रधानमंत्री के चयन तथा नियुक्ति के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 75 में उल्लेख है।

  • प्रधानमंत्री या मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य जो किसी भी सदन का सदस्य है वह वहां बोल सकता है, मतदान कर सकता है किंतु वह जिस सदन का सदस्य नही है, वहां बोल तो सकता है किंतु मतदान मे  भाग नहीं ले सकता है।

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  • वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष भारत के प्रधानमंत्री होते हैं।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रधान या अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।

  • राष्ट्रपति द्वारा उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है जिसे लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल के द्वारा अपना नेता चुना जाता है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति के समय उसका किसी सदन का सदस्य होना आवश्यक नही है किंतु प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त किए जाने के 6 माह के भीतर उसे किसी एक सदन (लोक सभा या राज्य सभा) का सदस्य बन जाना आवश्यक होगा। अन्यथा 6 माह बाद वह अपने पद पर नही बना रह पाएगा।

  • उपप्रधानमंत्री पद का उल्लेख संविधान में नही है तथा राजनीतिक बाध्यताओं के कारण संविधान के प्रावधानों से हटकर इस पद का सृजन किया जाता है, जो पूर्णतः गैर-संवैधानिक पद है।

  • राजीव गांधी की समाधि स्थल वीर भूमि है, कर्मभूमि समाधि स्थल भारत के पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की है।

  • जय किसान जय किसान का नारा भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री (1964-66) लाल बहादुर  शास्त्री ने भारत-पाक युध्द के समय 1965 मे दिया था।

  • भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 में मंत्रिमंडल सचिवालय को नियमों की प्रथम अनुसूची मे स्थान दिया गया है। इस सचिवालय को आवंटित विषय है –

  1. मंत्रिमंडल तथा मंत्रिमंडलीय समितियों को सचिवीय सहायता, और

  2. कार्य के नियम।

  • मंत्रिमंडल सचिवालय द्वारा मंत्रिमंडल और मंत्रिमंडलीय समितियों को उपलब्ध कराई  जाने वाली सचिवीय सहायता में शामिल है –

  1. प्रधानमंत्री के आदेश पर मंत्रिमंडल की बैठकें आयोजित करना।

  2. मंत्रिमंडलीय बैठकें के लिए कार्यसूची तैयार और वितरित करना।

  3. कार्यसूची से संबंधित दस्तावेजों का वितरण करना।

  4. किए गए विचार-विमर्श का रिकॉर्ड तैयार करना।

  5. प्रधानमंत्री की अनुमति प्राप्त होने के बाद रिकॉर्ड का वितरण।

  6. मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णयों के क्रियान्वयन की निगरानी।

  • एन. गोपालस्वामी आयंगर ने वर्ष 1949 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में अनुशंसा की थी कि केन्द्रीय मंत्रालय ब्यूरो ऑफ नेचुरल रिसोर्सेस एंड एग्रीकल्चर, ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स, ब्यूरो ऑफ ट्रांसपोर्ट एवं कम्युनिकेशन तथा ब्यूरों ऑफ लेबर एंड सोशल सर्विसेज में संयुक्त किए जाने चाहिए।

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 257 (1) के अनुसार, प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में कोई उड़चन न हो या उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निदेश देने तक होगा, जो भारत सरकार को इस प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो।

  • भारत में सरकार द्वारा द्वारा अथवा उसके किसी मंत्रालय द्वारा किसी विषय पर विस्तृत एवं आधिकारिक विवरण श्वेत पत्र (White Paper) के रुप में जारी किया जाता है।

 

  • 15 अगस्त, 1947 को केन्द्र में मंत्रालयों की संख्या 18 थी। वर्तमान में केन्द्र में मंत्रालयों की संख्या 52 है।

  • 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 75 में धारा (1) के बाद निम्नलिखित धाराएं जोड़ी गई –

(1ए) मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या  सदन के कुल सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत  से अधिक नही होनी चाहिए।

  • 24 जुलाई, 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने नई औद्योगिक नीति की घोषणा की। इनके द्वारा किए गए आर्थिक सुधारों मे उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण तथा बाजारीकरण की नीति अपनाई गई।

  • चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। उनके पूरे कार्यकाल के दौरान लोक सभा की बैठक ही नहीं हुई। लोक सभा की निर्धारित बैठक से एक दिन पूर्व ही कांग्रेस द्वारा समर्थन वापसी के कारण  चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

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महान्यायवादी और सी.ए.जी.

  • भारतीय संविधान के तहत भारत के महान्यायवादी (Attorney General of India) के पद का प्रावधान किया गया है।

  • महान्यायवादी, देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है।

  • अनु. 76 (1) के अनुसार, राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त करेगा।

  • अनु. 76 (2) के अनुसार, महान्यायवादी का यह कर्तव्य होगा कि वह भारत सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरुप के ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करें, जो राष्ट्रपति उसको समय-समय पर निर्देशित करे या सौंपे।

  • अनु. 76(3) के अनुसार, इसे अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्य क्षेत्र में सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार होगा।

  • अनु. 76(4) के अनुसार महान्यायवादी, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा और ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राष्ट्रपति अवधारित करे।

  • इसे संसद के दोनों सदनों की कार्य़वाही में शामिल होने का अधिकार है लेकिन मतदान का अधिकार नही है.।

  • इसे एक संसद सदस्य की तरह सभी भत्ते एवं विशेषाधिकार मिलते हैं।

  • अनुच्छेद 165(1) के अनुसार, प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता धारण करने वाले किसी व्यक्ति को महाधिवक्ता (Advocate General) नियुक्त करता है।

  • वह राज्य सरकार को कानूनी विषयों पर परामर्श देता है। वह राज्य सरकार का प्रथम विधिक सलाहकार होता है। वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।

  • अनुच्छेद 148(1) के अनुसार, भारत का एक नियंत्रक-महालेखापरीक्षक होगा, जिसको राष्ट्रपति नियुक्त करेगा तथा यह अपने पद से केवल उसी रीति एवं आधारों से हटाया जाएगा, जिस रीति एवं आधारों से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

  • अनु. 148(4) के अनुसार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अपने पद पर न रह जाने के पश्चात, भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी और पद का पात्र नही होगा।

  • यह अपनी नियुक्ति से 6 वर्ष या 65 वर्ष की उम्र तक पद धारण करेगा।

  • संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत के साथ उसके दुर्व्यवहार या अयोग्यता पर प्रस्ताव पारित कर इसे पद से हटाया जा सकता है।

  • इसको लोक लेखा समिति का आंख व कान कहा जाता  है।

  • अनु. 151 (1) के अनुसार, भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक के संघ के लेखाओं संबंधी प्रदिवेदनों को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा जो उनको संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।

  • अनु. 151(2) के अनुसार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के किसी राज्य के लेखाओं संबंधी प्रतिवेदनों को उस राज्य के राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाएगा।

  • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने कहा था कि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक भारतीय परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियां एवं सेवा शर्ते) अधिनियम, 1971 को प्रभावी बनाया गया है। इस अधिनियम को 1976 मे केन्द्र सरकार के लेखा परीक्षा से लेखा को अलग करने हेतु संशोधित किया गया।

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  • नियंत्रक एवं महालेखा  परीक्षक (CAG) राष्ट्रपति को तीन लेखा परीक्षा प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है – विनियोग लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट, वित्त लेखाओं पर परीक्षा रिपोर्ट और सरकारी उपक्रमों पर लेखा रिपोर्ट।

  • राष्ट्रपति इनको संसद के दोनो सदनों के सभापटल पर रखवाता है। इसके उपरांत लोक लेखा समिति इनकी जांच करती है और इसके निष्कर्षों से संसद को अवगत कराती है।

  • संविधान के अनुच्छेद 88 में अभिकथित है कि, प्रत्येक मंत्री और भारत के महान्यायवादी को यह अधिकार होगा कि वह किसी भी सदन में, सदनों की संयुक्त बैठक में और संसद की किसी समिति में, जिसमें उसका नाम सदस्य के रुप में दिया गया है, बोले और उसकी कार्य़वाहियों मे अन्यथा भाग ले, किंतु इस अनुच्छेद के आधार पर वह मत देने का हकदार नही होगा।

  • अटॉर्नी जनरल के अतिरिक्त भारत सरकार के कानूनी सलाहकार के रुप में अन्य विधि अधिकारी भी होते हैं। इन्हें सॉलिसिटर जनरल कहा जाता है। ये अटॉर्नी जनरल को उसके दायित्वों के निर्वहन में सहायता प्रदान करते हैं।

  • एडवोकेट जनरल (महाधिवक्ता) राज्य सरकार को कानूनी विषयों पर परामर्श देता है। (अनु. 165(2))। प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च  न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता धारण करने वाले किसी व्यक्ति को एडवोकेट जनरल नियुक्त करता है। (अनु. 165(1))। वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। (अनु. 165(3))। यह राज्य सरकार का प्रथम विधिक सलाहकार होता है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148(3) के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सी.ए.जी.) के वेतन एवं सेवा शर्तों के निर्धारण का अधिकार संसद को दिया गया है। अतः संसद ने सी.ए.जी.  के वेतन एवं सेवा शर्तों से संबंधित प्रावधानों को वर्ष 1971 में अधिनियमित किया जिसके अनुसार, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। या वह अधिकतम 65 वर्ष की उम्र तक सेवारत रह सकता है, इनमें से जो पहले हो।

  • भारत में नियंत्रक महालेखा परीक्षक सार्वजनिक धन की प्राप्ति और निर्गम पर नियंत्रण का कार्य नही करता है, बल्कि इसकी लेखा परीक्षा करता है।

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  • नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के निम्नलिखित कर्तव्य हैं –

  1. वह केन्द्र तथा राज्य सरकारों के राजस्व से भारत के अंदर तथा बाहर किए गए व्ययों एवं लेन-देन की लेखा परीक्षा करता है।

  2. वह व्यापारिक, निर्माण संबंधी लाभ तथा हानि के लेखों की लेखा परीक्षा करता है।

  3. वह भंडारगृहों की लेखा परीक्षा करता है।

  4. राष्ट्रपति के आदेश पर वह स्थानीय निकायों की लेखा परीक्षा करता है।

  5. वह सरकारी कंपनियों एवं निगमों की लेखा परीक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  • नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक अपने नाम के अनुरुप भारत के वित्त पर नियंत्रक का कार्य न करके, केवल उसकी परीक्षा का कार्य करता है। जबकि ब्रिटेन का नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक दोनों प्रकार के अधिकार रखता है।

  • भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक संसद के लोक लेखा समिति की बैठकों मे भाग ले सकता है। संविधान के अनुच्छेद 149 में नियंत्रक महालेखा परीक्षक के कर्तव्य एवं शक्तियां वर्णित हैं।

  • संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि नियंत्रक-महालेखा परीक्षक भारत के संविधान के अधीन सर्वाधिक महत्व का अधिकारी होगा। वह सार्वजनिक धन का संरक्षक होगा और उसका यह कर्तव्य होगा कि वह यह देखे कि भारत की या किसी राज्य की संचित निधि में से समुचित विधानमंडल के प्राधिकार के बिना एक पैसा भी खर्च नही किया जाए।

  • लोक वित्त (Public Finance) सरकार के वित्तीय क्रियाकलापों का अध्ययन है, जिसके अंतर्गत सार्वजनिक व्यय, लोक राजस्व, सार्वजनिक ऋण, वित्तीय प्रशासन तथा संघीय वित्त आते हैं। लोक वित्त का संबंध व्यावसायिक बैंकों के कार्य निष्पादन से नहीं है।

  • लोक लेखा समिति की कार्यवाही मध्यस्थता नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) करते हैं। इस प्रकार वे इस समिति के मित्र एवं मार्गदर्शक होते हैं।

  • भारतीय संविधान के तहत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक संघ एवं राज्यों की लोक निधियों से सभी व्ययों की लेखा-परीक्षा करता है, अतः उसे लोक निधि का अभिभावक कहा जाता है।

वरीयता अनुक्रम

  • वरीयता अनुक्रम केन्द्र एवं राज्य सरकारों में विभिन्न पदाधिकारियों के पद क्रम से संबंधित है। इसका प्रयोग राजनीतिक समारोहों के अवसर पर किया जाता है तथा सरकार के दैनिक कार्य में इसका कोई प्रयोग नही होता है।

  • 26 जुलाई, 1979 को इससे संबंधित अधिसूचना जारी की गई थी।

  • वर्तमान वरीयता अनुक्रम इस प्रकार है –

  1. राष्ट्रपति

  2. उपराष्ट्रपति

  3. प्रधानमंत्री

  4. राज्यों के राज्यपाल (अपने राज्य में)

  5. भूतपूर्व राष्ट्रपति, 5. क उप प्रधानमंत्री

  6. भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोक सभा अध्यक्ष

  7. केन्द्र के कैबिनेट मंत्री, राज्य सभा एवं लोक सभा में विपक्ष के नेता, नीति आयोग के उपाध्यक्ष, भूतपूर्व प्रधानमंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री (अपने राज्य में) 7 (क) भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति

  8. भारत स्थित विदेशों के असाधारण तथा पूर्णाधिकारी राजदूत तथा राष्टमंडल देशों के उच्चायुक्त, राज्यों के राज्यपाल (अपने राज्य के बाहर), राज्यों के मुख्यमंत्री (अपने राज्य के  बाहर)

  9. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, 9(क) संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त

  10. राज्य सभा के उप सभापति, लोक सभा का उपाध्यक्ष, योजना आयोग के सदस्य, राज्यो के उपमुख्यमंत्री, केन्द्र के राज्य मंत्री (और रक्षा मंत्रालय में रक्षा मामलो के लिए कोई अन्य मंत्री)

  11. भारत के महान्यायवादी, कैबिनेट सचिव, उपराज्यपाल (अपने संघ शासित क्षेत्र में)

  12. जनरल अथवा उनके समान रैंक वाले सेनाध्यक्ष।

  • भारत सरकार में सबसे ऊंचे पद का सिविलियन अधिकारी मंत्रिमंडल सचिव होता है। वह मंत्रिमंडल सचिवालय का प्रमुख है। वह देश का परिष्ठतम लोक सेवक होता है।

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संसद (1)

  • संसद, केन्द्र सरकार का विधायी अंग होता है।

  • केन्द्र स्तर पर विधि निर्माण का कार्य संसद द्वारा किया जाता है।

  • संविधान के भाग 5 के अंतर्गत अनुच्छेद 79 से 122 में संसद से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।

  • अनुच्छेद 79 के अनुसार, संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम राज्य सभा और लोक सभा होंगे।

  • लो सभा, राज्यों से 530 और संघ राज्य क्षेत्रो से 20 प्रतिनिधि सदस्यों से मिलकर बनेगी। यदि राष्ट्रपति की राय मे लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं हो तो, वह लोक सभा में उस समुदाय से 3 सदस्य मनोनीत कर सकते हैं।

  • लोक सभा में सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 तक हो सकती है।

  • लोक सभा में राज्यवार सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना पर आधारित है।

  • 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 के अनुसार, यह निर्धारण वर्ष 2026 तक यथावत रहेगा।

  • लोक सभा में राज्यों को जनसंख्या के आधार पर सीटें आवंटित होती हैं।

  • लोक सभा की अवधि प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीख से 5 वर्ष तक की होगी। हालांकि राष्ट्रपति को पांच वर्ष से पूर्व किसी भी समय लोक सभा को विघटित करने का अधिकार है।

  • आपातकाल में संसद की अवधि एक बार मे एक वर्ष तक बढ़ायी जा सकती है।  आपातकाल की उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रह जाने के पश्चात उसका विस्तार किसी भी दशा में 6 माह की अवधि से अधिक नही होगा।

  • लोक सभा सदस्य बनने के लिए  व्यक्ति की आयु कम से कम 25 वर्ष होनी चाहिए। लोक सभा का स्थगन अध्यक्ष करता है, जबकि सत्रावसान और विघटन राष्ट्रपति करता है।

  • अनु. 93 के अनुसार, लोक सभा के सभी सदस्यों द्वारा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव लोक सभा के सदस्यों मे से ही किया जाता है।

  • अनु. 94(ख) के अनुसार, लोक सभा का अध्यक्ष अपना त्याग-पत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्याग-पत्र अध्यक्ष को सौंपता है।

  • लोक सभा के अध्यक्ष को लोक सभा के सभी सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है। जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने को कोई संकल्प विचाराधीन हो, तब वे सदन में उपस्थित रहते हुए भी पीठासीन नही होंगे।

  • जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प लोक सभा में विचाराधीन हो, तब वह प्रथमतः मत का तो हकदार होगा, किंतु मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत नहीं दे सकेगा।

  • लोक सभा का अध्यक्ष अपने निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग केवल तब करते हैं, जब किसी विषय के संदर्भ में हुए मतदान में सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों के वोट बराबर अर्थात टाई (Tie) हो जाते हैं।

  • लोक सभा सचिवालय प्रत्यक्ष रुप से लोक सभा अध्यक्ष के अंतर्गत कार्य करता है।

  • प्रो-टेम स्पीकर (Pro-tem Speaker) आम चुनाव के बाद नव-निर्वाचित लोक सभा सदस्यों को शपथ  दिलाते हैं।

  • नव-निर्वाचित सदन में लोक सभा अध्यक्ष (Speaker) के चुनाव से पहले लोक सभा के सामान्यतः सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रो-टेम स्पीकर के रुप में चुना जाता है।

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  • अनु. 85(1) के अनुसार, लोक सभा में एक सत्र की अंतिम बैठक और आगामी सत्र की प्रथम बैठक के बीच 6 माह से अधिक का अंतर नही होगा।

  • इस प्रकार लोक सभा के कम से कम वर्ष  मे दो बार सत्र  बुलाए जाते हैं।

  • अनु. 100(3) के अनुसार, लोक सभा या राज्य सभा का कोरम (गणपूर्ति) कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग होता है।

  • मुख्य विपक्षी दल की मान्यता हेतु भी यही सदस्य संख्या आवश्यक है।

  • उत्तर प्रदेश राज्य लोक सभा में सर्वाधिक प्रतिनिधि (80) भेजता है। इसके बाद क्रमशः महाराष्ट्र (48) तथ पश्चिम बंगाल (42) का स्थान है।

  • वर्तमान में लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनाव व्यय की अधिकतम सीमा 70 लाख रु. तथ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए 28 लाख रु. कर दिया गया है।

  • लोक सभा का प्रथम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से 21 फरवरी, 1952 तक चला था। यह चुनाव 489 सीटों के लिए हुआ था।

  • प्रथम लोक सभा का पहला अधिवेशन 13 मई, 1952 को हुआ था।

  • 15 मई, 1952 को गणेश वासुदेव मावलंकर लोक सभा के प्रथम अध्यक्ष बने तथा 27 फरवरी, 1956 तक अपनी मृत्यु तक इस पद पर बने रहे।

  • पहली लोक सभा के शेष कार्यकाल के लिए एम. अनंतशयनम आयंगर लोक सभा अध्यक्ष रहे थे।

  • वर्ष 1954 में जे.बी. कृपलानी सहित विपक्ष के 21 सांसदों द्वारा लोक सभा के प्रथम अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के विरुध्द अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, जिसे लोक सभा द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया था।

  • लोक सभा की प्रथम महिला अध्यक्ष मीरा कुमार थी।

  • वर्तमान लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन हैं।

  • संविधान के अनुच्छेद 84(ख) के अनुसार, लोकसभा में निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 25 वर्ष है तथा राज्य सभा में निर्वाचित होने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 30 वर्ष है।

  • भारत में मतदाता सूची का निर्माण केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के निदेशन और नियंत्रण में किया जाता है। (अनु. 324(1)) ।

  • जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के अनुसार, लोक सभा सदस्य के निर्वाचन के लिए नामांकन-पत्र दाखिल करने के लिए किसी नागरिक को राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के उस निर्वाचन क्षेत्र का पंजीकृत मतदाता होना चाहिए अर्थात उस क्षेत्र की समतदाता सूची में उसका नाम दर्ज होना चाहिए। वर्ष 2003 मे सरकार द्वारा राज्य सभा के निर्वाचन के लिए ऐसी बाध्यता को समाप्त कर दिया गया था।

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  • 31वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1973 द्वारा लोक सभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व की अधिकतम संख्या 500 से बढ़ाकर 525 तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के सदस्यों की अधिकतम संख्या 25 से घटाकर 20 की गई। (अनु. 81(1) में संशोधन द्वारा)। इस प्रकार लोक सभा में कुल सदस्यों की अधिकतम संख्या 525 से बढ़ाकर 545 की गई। वर्तमान में 530 सदस्य राज्यों से एवं 13 सदस्य केन्द्रशासित प्रदेशों से निर्वाचित होते हैं, जबकि 2 एंग्लो-इंडियन सदस्यों का मनोनयन राष्ठ्रपति करता है। ज्ञातव्य है कि वर्तमान में लोक सभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो सकती है, जिसमें 530 से अनधिक हो सकते हैं (गोवा, दमन एवं दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 से), जबकि दो एंग्लो-इंडियन सदस्यों का मनोनयन राष्ट्रपति कर सकता है। वर्तमान में 543 लोक सभा निर्वाचन क्षेत्रों में 530 निर्वाचन क्षेत्र राज्यों के हैं, जबकि शेष 13 निर्वाचन क्षेत्र केन्द्र शासित प्रदेशों के (दिल्ली-7, अंडमान एवं निकोबार-1, दादरा व नगर हवेली-1, दमन एवं दीव-1, लक्षद्वीप-1 पुडुचेरी-1, चंडीगढ़-1) हैं। इनके अतिरिक्त दो एंग्लो-इडियन सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।

  • संविधान के अनु. 82 के अनुसार, लोक सभा की सीटों का राज्यों के मध्य आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर है। यह व्यवस्था पहले वर्ष 2000 तक के लिए थी, परंतु 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इसे 2026 तक संशोधित ने किए जाने का प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 330(2) के अधीन किसी राज्य (या संघ राज्य क्षेत्र) में अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या का अनुपात, लोक सभा में उस राज्य (या संघ राज्य क्षेत्र) को आवंटित स्थानों की कुल संख्या से वही होगा, जो उस राज्य (या संघ राज्य क्षेत्र) के भाग की अनूसूचित जनजातियों की, जिनके संबंध में स्थान इस प्रकार आरक्षित हैं। जनसंख्या का अनुपात उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र की कुल जनसंख्या से है। उदाहरणार्थ, वर्ष 1996 में पश्चिम बंगाल एवं तत्कालीन आंध्र प्रदेश मे लोक सभा सदस्यों की संख्या 42 थी, जिसमें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सींटे क्रमशः 8 एवं 6 थी। वर्ष 2008 में परिसीमन के  बाद इन दोनों राज्यों में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित स्थान क्रमशः 10 एवं 7 हैं।

  • परिसीमन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद (2008 से) लोक सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए सर्वाधिक आरक्षित सीटें मध्य प्रदेश (6) हैं। उत्तर प्रदेश एवं बिहार में ऐसी सीटों की संख्या शून्य है, जबकि गुजरात में ऐसी सीटें 4 है।

  • अनुच्छेद 331 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति की राय मे लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, तो वह इस समुदाय के अधिकतम 2 सदस्यों को लोक सभा में नामित कर सकता है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 333 के अनुसार यदि किसी राज्य के राज्यपाल की राय में कि उस राज्य की विधान सभा मे आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व आवश्यक है और उसमें उसका प्रतिनिधित्व प्रर्याप्त नही है, तो वह उस विधान सभा में उस समुदाय का एक सदस्य नाम निर्देशित कर सकेगा।

  • अनु. 85(2)(ख) के अनुसार, लोक सभा को कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग किया जा सकता है। ऐसा प्रधानमंत्री (मंत्रिपरिषद) की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा किया जा सकता है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 101(4) के तहत संसद तथा अनु. 190 (4) के तहत राज्य विधान मंडल के किसी सदस्य की सदस्यता तब समाप्त हो समझी जाती है, जब वह 60 दिन की अवधि तक सदन की अनुज्ञा के बिना उसके सभी अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है। परंतु इस अवधि मे सदन के सत्रावसान या निरतंर चार से अधिक दिनों के लिए स्थगित समय नही जोड़ा जाएगा।

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  • राज्य लोकसभा सीटें

उत्तर प्रदेश                               80

महाराष्ट्र                                 48

प. बंगाल                                 42

बिहार                                      40

मध्य प्रदेश                              29

तमिलनाडु                               39

  • लोक सभा में राजस्थान हेतु 25 सींटे निर्धारित हैं, जिनमें 4 अनुसूचित जातियों और 3 सींटे अनु. जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।

  • राज्य लोक सभा में स्थान

पंजाब                                      13

असम                                       14

गुजरात                                   26

राजस्थान                                25

मध्य प्रदेश                              29

तमिलनाडु                               39

आंध्र प्रदेश                               25

पश्चिम बंगाल                          42

छत्तीसगढ़                                11

महाराष्ठ्र                                 4

अविभाजित आंध्र प्रदेश में 42 लोक सभा सीटें थी। आंध्र प्रदेश के विभाजन के पश्चात वहां कुल 25 लोक सभा सीटें ही उपलब्ध हैं। शेष 17 सीटें तेलंगाना राज्य को प्राप्त हुई हैं।

  • चंडीगढ़, सिक्किम, मिजोरम, नगालैंड, पुडुचेरी तथा दादरा और नगर हवेली मे लोक सभा की मात्र एक-एक सींटे हैं। त्रिपुरा, गोवा, मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश मे लोक सभा की 2-2 सींटे हैं।

  • 2008 मे लागू परिसीमन के बाद उत्तर प्रदेश में निर्वाचकों की संख्या के अनुसार, सबसे  बड़ा लोक सभा संसदीय क्षेत्र उन्नाव है।

  • पांचवी लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष है, जिसने 19 मार्च, 1971 से 18 मार्च, 1977 तक कार्य किया।

  • नवीं लोकसभा का गठन 2 दिसंबर, 1989 को हुआ था और यह 13 मार्च, 1991 को भंग की गई।

  • 12वीं लोक सभा के लिए निर्वाचन फरवरी, 1998 में हुए थे। 12वीं लोक सभा का गठन 10 मार्च, 1998 को हुआ था और इसका विघटन 26 अप्रैल, 1999 को हुआ।

  • क्षेत्रफल के आधार पर 5 बड़े लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र क्रमशः लद्दाख (173266.37 वर्ग किमी.), बाड़मेर (55074 वर्ग किमी.), कच्छ (41414 वर्ग किमी), अरुणाचल पूर्व (39704 वर्ग किमी.) तथा अरुणाचल पश्चिम (39613 वर्ग किमी.) है। क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र चांदनी चौक (दिल्ली) (10.59 वर्ग किमी.) है।

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  • भारत मे लोक सभा अथवा राज्य विधान सभाओं के चुनाव फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (First Past the Post) पध्दति के आधार पर कराए जाते हैं। इसके तहत देश तथा राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों को अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में बांट दिया जाता है। क्षेत्र विशेष के मतदाता एक उम्मीदवार के लिए एक मत देते हैं और सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित किया जाता है। जीतने वाले उम्मीदवार के लिए 50 प्रतिशत मत प्राप्त करना अनिवार्य नही है। इसके अलावा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 93 के प्रावधानों के तहत, लोक सभा, यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अपना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनती है। ऐसी परंपरा रही है कि अध्यक्ष सत्तारुढ़ पार्टी या गठबंधन का सदस्य तथा उपाध्यक्ष विपक्षी पार्टी का सदस्य होता है।

  • लोक सभा के स्पीकर का चयन लोक सभा के सभी सदस्यों द्वारा किया जाता है।

  • पी.ए. संगमा वर्ष 1995 में प्रथम जनजातीय केन्द्रीय मंत्री बने थे। वर्ष 1996 मे वह लोक सभा के पहले जनजातीय अध्यक्ष बने थे।

  • 15वीं लोक सभा की अध्यक्ष मीरा कुमार ही लोक सभा की प्रथम महिला अध्यक्ष थी, जो  जून, 2009 में इस पद के लिए चुनी गई थी। वर्तमान में 16वीं लोक सभा की अध्यक्षा सुमित्रा महाजन हैं।

  • विधेयक को पुरःस्थापित करने का प्रक्रम उसका प्रथम वाचन होता है। द्वितीय वाचन में विधेयक पर विचार-विमर्श होता है। सभा के सदस्य उसी स्तर पर आम बहस करते हैं। द्वितीय वाचन में ही सभा विधेयक को प्रवर समिति या दोनों सभाओँ की संयुक्त समिति को सौंप सकती है। द्वितीय वाचन में ही विधेयक पर खंडशः विचार भी होता है। प्रभारी सदस्य का यह प्रस्ताव कि विधेयक या यथासंशोधित विधेयक पारित किया जाए विधेयक का तृतीय वाचन कहलाता है।

  • वर्तमान में जारी 16वं लोकसभा में कुल महिला सदस्यों की संख्या 11% से अधिक है। इस समय लोकसभा में नामंकित महिला सदस्य को लेकर कुल 63 महिला सदस्य हैं। कांग्रेस पार्टी से 55 तथा भारतीय जनता पार्टी से 32 महिला सदस्य हैं।राजस्थान से एक महिला सदस्य निर्वाचित हैं। अधिकतम 13 महिला सदस्य उत्तर प्रदेश में निर्वाचित हैं।

संसद (2)

  • संसद के उच्च सदन को राज्य सभा कहते हैं। इस सदन की अधिकतम सदस्य संख्या 250 निर्धारित की गई है।

  • अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्य सभा, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के 238 निर्वाचित (अप्रत्यक्ष रुप से) तथा राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 12 सदस्यों से मिलकर बनेगी।

  • राष्ट्रपति द्वारा नामांकित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो।

  • राज्य सभा में प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधियों का निर्वाचन उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है।

  • राज्य सभा के लिए निर्वाचन आनुपातिक प्रतिनिधित्व पध्दति के अनुसार, एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है.

  • राज्य सभा का विघटन नही होता है। यह एक स्थायी सदन है।

  • राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इस प्रकार इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है।

  • राज्य सभा सदस्य होने के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।

  • राज्य सभा का सभापति राज्य सभा का सदस्य नही होता है।

  • भारत का उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होता है।

  • जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रुप में कार्य करता है, तो उसे राज्य सभा के सभापति के रुप में कोई वेतन या भत्ता नही मिलता है। इस अवधि में वह राष्ट्रपति को मिलने वाले वेतन एवं भत्ते प्राप्त करता है।

  • राज्य सभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति चुनती है।

  • उपसभापति अपना त्याग-पत्र सभापति को देता है।

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  • उपसभापति को राज्य सभा बहुमत से पद से हटा सकती है। जब सभापति का पद रिक्त हो तो उपसभापति उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा। जब उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन हो, तब वह सभापति के रुप में पीठासीन नही होंगे।

  • जब उपसभापति को उसके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो, तब उपसभापति पीठासीन नहीं होंगे।

  • राज्य सभा मे राज्यों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में दिया गया है।

  • वर्ष 2003 में जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन के माध्यम से यह व्यवस्था की गई है कि कोई भी व्यक्ति राज्य सभा के लिए कही  भी चुनाव लड़ सकता है, चाहे वह किसी भी राज्य का निवासी है।

  • अखिल भारतीय सेवाओं सृजन राज्य सभा की एकांतिक शक्ति है।

  • भारत के संघ राज्य क्षेत्रों से मात्र 2 (दिल्ली तथा पुडुचेरी) संघ राज्य क्षेत्र के प्रतिनिधित्व राज्य सभा मे शामिल होते हैं।

  • भारतीय संविधान की चौथी में राज्य सभा के लिए राज्यों व संघ राज्य क्षेत्रों में सीटों के आवंटन का प्रावधान उल्लिखित है। संविधान के अनुच्छेद 249 के तहत यदि राज्य सभा अपने उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत में ऐसा संकल्प पारित करे कि राज्य सूची के किसी विषय पर विधि बनाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक है, तो संसद उस विषय पर विधि बना सकती है। परंतु यह प्रस्ताव एक वर्ष  से अधिक समय तक अस्तित्व में नही रहता है।

  • अनुच्छेद 250 के अनुसार, आपात काल की स्थिति में केन्द्रीय संसद को राज्य सूची में अंकित किसी विषय के संबंध में  भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी  भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति होती है परंतु आपातकाल की समाप्ति के 6 माही की अवधि से अधिक यह प्रावधान प्रभावी नही रहता है।

  • अनुच्छेद 252 के तहत, दो या दो से अधिक राज्यों के विधान मंडल एक प्रस्ताव पारित किया, यदि संसद से अनुरोध करे कि राज्य-सूची के विषयों पर संसद द्वारा कानून बनाया जाए, तो संसद उन विषयों पर कानून बना सकती है।

  • अनुच्छेद 253 के अनुसार, संसद को किसी अन्य देश या देशों के साथ संधि अथवा समझौते को लागू करने के उद्देश्य से किसी भी विषय का कानून बनाने का अधिकार है।

  • संविधान के अनुच्छेद 80(1)(क)(ख) में कहा गया है कि राज्यों के और संघ राज्य क्षेत्रों के 238 से अनधिक प्रतिनिधियों तथा राष्ट्रपति द्वारा नाम निर्देशित किए जाने वाले 12 सदस्यों से मिलकर राज्य सभा बनेगी।

  • राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में दिया गया है। इस प्रकार किस राज्य में राज्य सभा में किटनी सीटें होंगी, इसका निर्धारण संविधान की चौथी अनूसुची मे कर दिया गया है।

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  • भारत की पहली अभिनेत्री जिन्हें राज्य सभा के नामांकित किया गया नरगिस दत्त थी। उनका कार्यकाल 3 अप्रैल, 1980 से 3 मई, 1981 तक रहा। जयललिता जयराम, AIDMK की राज्य सभा सदस्या थी, जो 3 अप्रैल, 1984 से 28 जनवरी, 1989 तक अपने पद पर रही। वैजंती माला बाली (27 अगस्त, 1993 से 26 अगस्त, 1999) राज्य सभा के लिए नामांकित सदस्यों में थी। देविका रानी चौधरी वर्ष 1969 में प्रथम दादा साहेब फाल्के पुरस्कार प्राप्त करने वाली अभिनेत्री थी।

  • संविधान के. अनु. 249 के तहत यदि राज्य सभा अपने उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई बहुमत से ऐसा संकल्प पारित करे कि राज्य सूची के विषय पर विधि बनाना राष्ठ्र हित में आवश्यक है, तो संसद उस विषय  पर विधि बना सकती है। साथ ही ऐसी विधि संपूर्ण भारत या उसके किसी  भाग के लिए बनाई जा सकती है। राज्य सूची में सम्मिलित विषय पर राष्ट्रीय हित में विधि राज्य सभा द्वारा प्रस्ताव पारित होने के उपरांत संसद  बनाती है, न कि केवल राज्य सभा।

  • चौथी अनुसूची में राज्य सभा मे राज्यों के लिए अलग-अलग स्थानों का आवंटन है। संघ एवं राज्यों के बीच शक्तियों का विवरण सातवीं अनुसूची मे है। भाषाएं आठवी अनुसूची में हैं। जनजाति क्षेत्रो के प्रशासन संबंधी प्रावधान पांचवी और छठी  अनुसूची में हैं।

  • राज्य राज्य सभा के सदस्यों  की संख्या

गुजरात                                   11

कर्नाटक                                  12

केरल                                      9

ओडिशा                                   10

  • वह मंत्री जो राज्य सभा का सदस्य हो, राज्य सभा का सदस्य होते हुए भी लोक सभा की कार्यवाही में भाग ले सकता है।

संसद (3)

  • संसद उच्चतम विधायी संस्था है। संविधान मे संशोधन का अधिकार संसद को प्राप्त है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद संविधान के किसी भाग में संशोधन कर सकती है।

  • संसद के दो सत्रों के बीच अधिकाधिक अंतराल छः महीने का होता है।

  • लोक सभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव, राज्य सभा के सभापति, उपसभापति आदि संसद के अधिकारी कहलाते हैं।

  • कोई संसद सदस्य जब 60 दिन तक सदन में बिना सूचि किए अनुपस्थित रहता है तो, उनकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार एवं अन्मुक्तियों को निर्धारित करता है।

  • अनु. 253 के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संधियों को संपूर्ण भारत मे या उसके किसी भाग में लागू करने के लिए संसद राज्य सूची के विषयों पर कोई भी कानून बिना किसी राज्य की सहमति से बना सकती है।

  • अंतरराष्ट्रीय समझौते को प्रभावी बनाने के लिए संसद राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है।

  • सदन का अध्यक्ष किसी सदस्य को बोलने से रोककर अन्य को बोलने के लिए कह सकता है। यह बैठ जाना कहलाता है।

  • सदन के किसी सदस्य द्वारा, वह जिल दल से चुनकर आता है, उसका त्याग कर दूसरे दल मे शामिल होना पक्षत्याग (Crossing the floor) कहलाता है।

  • शून्य काल (Zero Hour), भारत के संसदीय व्यवस्था की देन है। यह अधिकतम एक घंटे का हो सकता है। लोक सभा में इसका समय दोपहर 12 बजे से अपराह्न 1 बजे तक होता है।

  • अनु. 109(1) के अनुसार, धन विधेयक लोक सभा में पुरः स्थापित किया जाता है, राज्य सभा में नही है।

  • कोई विधेयक जिसमें केवल व्यय उल्लिखित है और अनु. 110(धन विधेयक) में विनिर्दिष्ट कोई विषय उसमें सम्मिलित नही है, तो उसे संसद के किसी भी सदन में प्रारंभ किया जा सकता है। इसे साधारण विधेयक की तरह पेश किया जाता है।

  • लोक सभा द्वारा पारित धन विधेयक राज्य सभा द्वारा भी पारित मान लिया जाता है, यदि उस राज्य सभा द्वारा  14 दिन तक कोई कार्यवाही नही की जाती है।

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  • लोक सभा द्वारा विचार के लिए भेजे गए धन विधेयक को राज्य सभा 14 दिन तक रोक सकती है।

  • अनु. 108 के अनुसार, संसद के दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन तब आयोजित किया जाता है, जब किसी विधेयक पर विचार करने और उसे पारित करने में दोनों सदनों में मतभेद हो।

  • अनु. 118(4) के अनुसार, लोक सभा का अध्यक्ष संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करता  है।

  • संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक साधारण विधेयक और वित्त विधेयक के संबंध में होती है।

  • अब तक तीन बार दोनो सदनों की संयुक्त बैठक बुलाई जा चुकी है।

  • वर्ष 1961 मे प्रथम संयुक्त बैठक दहेज निरोधक विधेयक पर, वर्ष 1978 में द्वितीय संयुक्त बैठक बैंक सेवा आयोग (निरसन) निधेयक पर तथा वर्ष 2002 में तृतीय संयुक्त बैठक पोटा के लिए बुलाई गई थी।

  • कोई कानूनी विधेयक संसद के दोनों में से किसी एक पटल पर रखा जा सकता है। कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका निर्णय लोक सभा अध्यक्ष करता है।

  • भारत के लोक वित्त पर संसद के नियंत्रण के लिए संसद के समक्ष वार्षिक वित्तीय विवरण प्रस्तुत किया जाता है।

  • भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए विनियोग विधेयक पारित करना पड़ता है।

  • संविधान के अनु. 116 के अनुसार, विनियोग विधेयक के पारित ने होने की स्थिति मे जब संघ सरकार को धन की आवश्यकता होती है, तो लोक सभा को लेखानुदान के माध्यम से निश्चित अवधि के लिए भारतीय संचित निधि से अग्रिम निधि प्रदान करने की शक्ति प्राप्त है।

  • प्राक्कलन समिति सबसे बड़ी संसदीय समिति है। इसमें 30 सदस्य होते हैं।

  • भारतीय संसद का सचिवालय सरकार से स्वतंत्र होता है।

  • भारतीय संसद संसदीय समितियों के माध्यम से प्रशासन पर नियंत्रण करती है।

  • अनुच्छेद 368 के अनुसार, इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद अपनी संविधायी शक्ति का प्रयोग करते हुए इस संविधान के किसी उपबंध का परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रुप में संशोधन इस अनुच्छेद में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार कर सकेगी। संसद, भारत की जनता द्वारा निर्वाचित उच्चतम विधायी संस्था है, इसी कारण संविधान में संशोधन का यह अधिकार संसद को प्राप्त है।

  • लोक सभा के 552 से अनधिक सदस्यों मे से 530 से अनधिक राज्यों के प्रतिनिधि, 20 से अनधिक संघ राज्यों के प्रतिनिधि (अनु. 81) और 2 से अनधिक एंग्लो-एडियन हो सकते हैं। (अनु. 331)।

  • संविधान के अनुसार, संसद के अधिकारियों मे सम्मिलित हैं – राज्य सभा का सभापति एवं उपसभापति (अनु. 89), लोक सभा का अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष (अनु. 93) तथा संसद का सचिवालय (अनु. 98) ।

  • सर्वप्रथम नवंबर, 2000 में पंजाब में निर्दलीय राज्य सभा सांसद बरजिंदर सिंह हमदर्द को इस आधार पर सदस्यता से अयोग्य घोषित किया गया था, कि वह सदन की अनुमति के बिना उसकी लगातार साठ बैठको में अनुपस्थित रहे थे।

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  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों की शक्तियां, विशेषाधिकार तथा उन्मुक्तियों को निर्धारित करता है।

  • संसदीय नियमों एवं प्रक्रिया के तहत किसी मंत्री के विरुध्द विशेषाधिकार प्रस्ताव उठाया  जा सकता है, यदि वह किसी मामले के तथ्यों को रोकता है अथवा तथ्यों का बिगड़ा हुआ वर्णन देता है।

  • संसदीय विशेषाधिकार संसद के दोनों सदनों, उसकी समितियों तथा सदस्यों को प्राप्त विशिष्ट अधिकार, उन्मुक्तियां व छूट होते हैं। इन विशेषाधिकारों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है –

  1. वे, जो संसद के प्रत्येक सदन द्वारा सामूहिक रुप में प्रयोग किए जाते हैं,

  2. वे, जो व्यक्तिगत रुप से संसद सदस्यों द्वारा उपभोग्य होते हैं।

  • संसद के प्रत्येक सदन द्वारा सामूहिक रुप से प्रयोग किए जाने वाले विशेषाधिकार निम्न हैं –

  1. अपनी बहस और कार्यवाही के प्रकाशन को रोकने का विशेषाधिकार

  2. सदन से अपरिचितों को बाहर रखने का तथा विशिष्ट विषयों पर चर्चा हुते गुप्त बैठक करने का विशेषाधिकार

  3. अपनी स्वयं की प्रक्रिया व आंतरिक विषयो-व्यवसाय के संचालन तथा उन्हें विनियमित करने का विशेषाधिकार,

  4. सदन के सदस्य और साथ ही साथ बाहरी व्यक्तियों को भी, भर्त्सना चेतावनी या निलंबन (सदस्यों हेतु) या निश्चित अवधि हेतु कारावास से सदन की अवमानना हेतु दंडित करने का विशेषाधिकार,

  5. किसी सदस्य की गिरफ्तारी, निरोध, सजा, कारावास या रिहाई की तत्काल सूचना प्राप्त करने का विशेषाधिकार,

  6. संसदीय समितियों द्वारा जांच के प्रयोजन के लिए, प्रासंगिक व्यक्तियों, पत्रो व अभिलेखो को बुलाने-मंगाने का विशेषाधिकार

  7. सदन के परिसर मे किसी (सदस्य या अन्य) व्यक्ति की गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया किए जाने से पूर्व पीठासीन अधिकारी की अनुमति लिए जाने का विशेषाधिकार।

  • राज्य विधानमंडल के निम्न सदन (विधानसभा) के निर्वाचित सदस्यो को लोक सभा (एक नागरिक अधिकार से) और राज्य सभा (अनुच्छेद 80 मे खंड 4 में वर्णित) दोनो के निर्वाचनों में मतदान का अधिकार है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 248 संसद की अवशिष्ट विधायी शक्ति के बारे में प्रावधान करता है। इसक अनुसार, संसद को किसी ऐसे विषय के संबंध में जो समतवर्ती सूची या राज्य सूची में वर्णित (उल्लेखित) नही है, विधि बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त है।

  • मर्यादा – विनम्र एवं स्वीकार्य व्यवहार बनाये रखना।

  • पक्ष त्याग – सदन के किसी सदस्य द्वारा, वह जिस सदन दल से चुनकर आया है, उसका त्याग कर दूसरे दल मे शामिल होना पक्ष त्याग कहलाता है।

  • अंतर्प्रदन – किसी सरकारी अधिकारी से किसी नीति या कार्य के विवरण की मांग  हेतु संसदीय प्रक्रिया अंतर्प्रदन कहलाती है।

  • बैठ जाना – अध्यक्ष किसी भी सदस्य को बोलने से रोककर अन्य को बोलने के लिए कह सकता  है।

  • यदि दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनु. 108) मे कोई विधेयक (संशोधन सहित) दोनों सदनों के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों की कुल संख्या के साधारण बहुमत से पारित होता है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है। ज्ञात हो कि अनु. 108 के तहत संयुक्त बैठक की प्रक्रिया सामान्य विधेयन तक ही सीमित है, संविधान संशोधन हेतु यह लागू नही होती है।

  • कोई कानूनी विधेयक संसद सदनों मे से एक के पटल पर रखा जा सकता है, जबकि धन विधेयक केवल लोकसभा में और अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन संबंधी विधेयक मात्र राज्य सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

  • अनुच्छेद 89(1) के अनुसार, राज्य सभा का सभापति, उपराष्ट्रपति होता है। साथ ही अनुच्छेद 89(2) के अनुसार, राज्य सभा का उपसभापति सदस्यों में से चुना जाता है। अनुच्छेद 54(क) के अनुसार, राष्ट्रपति के निर्वाचन मे संसद के दोनो सदनों के निर्वाचित सदस्य निर्वाचक गण होते हैं न कि मनोनीत सदस्य जबकि अनुच्छेद 66(1) के अनुसार, उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य भाग लेते हैं।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 के अनुसार, भारत की संचित निधि भारत सरकार को प्राप्त सभी राजस्व, उस सरकार द्वारा राजहुंडियां निर्गमित करके, उधार द्वारा या अग्रिम अर्थोपाय द्वारा लिए गए सभी उधार और उधारो के प्रतिसंदाय में उस सरकार को प्राप्त सभी धनरासियों से मिलकर बनती  है। यह संसद के नियंत्रणाधीन होती है। संचित निधि से कोई भी धनराशि तब तक निर्गमित नही की जा सकती, जबतक संसद की अनुमति प्राप्त न कर ली जाए। इसी बजट प्रावधानों के अनुरुप कार्यपालिका को संचित निधि से धन निकालने का अधिकार तभी प्राप्त होता है, जब संसद अनु. 114 के तहत विनियोग अधिनियम के माध्यम से इस  हेतु अनुमति प्रदान करती है।

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  • संविधान के अनुच्छेद 112(3) के अनुसार, भारत की संचित निधि पर भारित व्यय इस प्रकार है –

  1. राष्ट्रपति की उपलब्धियां और भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय

  2. राज्य सभा के सभापति और उपसभापति के तथा लोक सभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते,

  3. ऐस ऋण भार जिनका दायित्व भारत सरकार पर है, जिनके अंतर्गत ब्याज, निक्षेप निधि भार और मोचन भार तथा उधार लेने और ऋण सेवा तथा ऋण मोचन से संबंधित अन्य व्यय हैं.

  4. – उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को या उनके संबंध में संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन

  • फेडरल न्यायालय के न्यायाधीशों को या उनके संबंध में संदेय पेंशन

  • उस उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को या उनके संबंधी में दी जाने वाली पेंशन, जो  भारत के राज्य क्षेत्र के अंतर्गत किसी क्षेत्र के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करता है या जो  भारत डोमिनियन के राज्यपाल वाले प्रांत के अंतर्गत किसी  क्षेत्र के संबंध में इस संविधान के प्रारंभ  से पहले किसी भी समय अधिकारिता का प्रयोग करता था।

  1. किसी न्यायालय या माध्यस्थम, अधिकरण के निर्णय की तुष्टि हेतु अपेक्षित राशियां

  2. भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक को या उनके संबंध में संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन

  3. कोई अन्य व्यय ज इस संविधान  द्वारा या संसद की विधि द्वारा इस प्रकार भारित घोषित किया जाता है।

नोट) भारत के उपराष्ट्रपति राज्य सभा के सभापति के रुप में वेतन व भत्ते प्राप्त करते हैं। राज्य सभा के सभापति एवं उपसभापति का वेतन व भत्ता भारत की संचित निधि पर भारित है।

  • बजट तैयार करने की प्रमुख जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय की होती  है, न कि केवल राजस्व विभाग की। वित्त मंत्रालय का राजस्व विभाग, विगत वर्षों में राजस्व संबंधी आंकड़ों के संदर्भ में आने वाले वर्ष के लिए राजस्व का अनुमान तैयार करता है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266(1) मे संचित निधि का प्रावधान है। संसद की अनुमति के बिना संचित निधि मे कोई धन नही निकाला जा सकता है।

  • अनुच्छेद 266(2) में सार्वजनिक लेखा का प्रावधान किया गया है। इसमे संचित निधि मे जमा के अतिरिक्त अन्य सार्वजनिक धन जमा किए जाते हैं। इसे भविष्य निधि, न्यायिक जमा आदि धन शामिल किए जाते हैं।

  • सार्वजनिक लेखा से धनराशि निकालने के लिए संसद की अनुमति आवश्यक नही है। इस निधि का नियंत्रण कार्यपालिका के पास होता  है।

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  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 267 एक आकस्मिकता निधि की स्थापना का प्रावधान करता है। यह राष्ठ्रपति के नियंत्रणाणीन होती है। इसका गठन किसी अत्यावश्यक, आकस्मिक प्रकृति के व्ययों हेतु किया गया है, जबकि विनियोग विधेयक में उक्त प्रावधान न हो तथा अनु. 115 एवं 116 के अधीन अपलब्ध अनुदानों को प्राप्त किया जा सकना संभव न हो। आकस्मिकता निधि पूर्णतः राष्ट्रपति के नियंत्रण मे होती  है और इससे धन निकासी के लिए संसद की स्वीकृति नही लेनी पड़ती है।

  • निंदा प्रस्ताव – सरकार की दोष पूर्ण नीतियों के सुधार के लिए लाया जाता है।

  • ध्यानाकर्षण प्रस्ताव – किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के विषय पर मंत्री का ध्यान आकृष्ट करने और उससे पद एवं सत्ता के अनुरुप औपचारिक कथन की प्राप्ति के लिए लाया जाता है।

  • कटौती प्रस्ताव – बजट पेश होने पर अनुदान मांगो पर बहस के दौरान संसद सदस्यों को धनराशि मे वृध्दि का अधिकार नही है, वे मात्र कमी कर  सकते हैं और ऐसा वे कटौती प्रस्ताव के द्वारा करते हैं, जो तीन प्रकार का होता है – प्रतीक कटौती, नीति कटौती  एवं मितव्ययिता कटोती।

  • स्थगन प्रस्ताव – किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के विषय पर सदन के सदस्यों का ध्यान आकृष्ट करने हेतु लाया जाता है।

  • प्रश्न काल – प्रत्यक सदन की पहली बैठक का पहला घंटा प्रश्न काल कहलाता है। दोनों सदनों मे प्रत्येक बैठक के प्रारंभ में एक घंटे तक प्रश्न किए जाते हैं और उसके उत्तर दिए जाते हैं।

  • अनुपूरक प्रश्न – संसद के प्रत्येक सदन मे प्रश्न सामान्यतया मंत्रियों से पूछे जाते हैं और वे प्रश्न तीन श्रेणियों के होते हैं – तारांकित, अतारांकित एवं अल्पसूचना प्रश्न।

  • 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1989 के द्वार जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन कर मताधिकार की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। यह संशोधन 28 मार्च, 1989 से प्रभावी हुआ।

  • संसदीय कार्य मंत्रालय रेलवे के प्रत्येक जोन के लिए सलाहकारी समिति का गठन करता है। इसमें संबंधित जोन की सीमा से चुने गए सांसद सदस्य होते हैं।

  • ध्यानाकर्षण की संकल्पना भारत की देन है। यह आधुनिक संसदीय प्रक्रिया की एक नवीन संकल्पना है और इसमें प्रश्न तथा अनुपूरक प्रश्न पूछे जाते हैं। इसमें सदस्यों को अविलंबनीय लोक महत्व के विषय में सरकार की विफलता अथवा उसके द्वारा की गई अपर्याप्त कार्यवाही को सामने लाने का अवसर मिलता है। यह स्थगन प्रस्ताव के सदृश है, परंतु इसमें निंदा का पक्ष नही होता है।

  • कैबिनेट सचिव, कैबिनेट सचिवालय का प्रमुख होता है, जो सिविल सर्विसेज बोर्ड का पदेन अध्यक्ष भी होता है। मंत्रालयों की विभिन्न गतिविधियों के बारे में एवं कार्य संचालन संबंधी नियमों के  बारे में   जानकारी प्राप्त करना इसका कार्य होता है।

  • प्रधानमंत्री की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा किसी मंत्री को नियुक्त किया जाता है तथा मंत्रालयों/विभागों का बंटवारा भी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है।

  • स्वतंत्रता से पूर्व भारतीय विधानमंडल के लिए भारत सरकार से स्वतंत्र एवं असंबध्द पृथक सचिवालय का विचार जनवरी, 1926 मे प्रभावी रुप से सामने आया। स्वतंत्रता के बाद भी इस विचार को अपना लिया गया। संविधान के अनुच्छेद 98 के तहत भारतीय संसद के प्रत्येक सदन के लिए एक पृथक सचिवालय की व्यवस्था है, जो कि सरकार से स्वतंत्र  होते हैं।

  • भारतीय संविधान के तहत संसद सर्वोच्च विधि निर्मात्री संस्था है, परंतु उसके द्वारा निर्मित विधि संविधान के मौलिक ढांचे का अतिक्रमण न करे, इस हेतु सर्वोच्च न्यायालय उसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है।

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संसद (4)

  • खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम (Prevention of Food Adulteration Act) सर्वप्रथम वर्ष 1954 मे लागू हुआ था।

  • सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अधीन सभी दंडनीय अपराध संज्ञेय एवं संक्षिप्ततः विचारणीय होते हैं।

  • सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अंतर्गत अपराध का विचारण प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा महानगरों के मामलें में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता है।

  • घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005, 26 अक्टूबर, 2006 से लागू है।

  • क्रिमिनल ट्राइव्स एक्ट सर्वप्रथम 1871 में अधिनियमित हुआ था।

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 भारत में 30 जनवरी, 1990 से लागू है।

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के लिए केन्द्र सरकार के पास नियम बनाने की शक्ति है।

  • यह अधिनियम संरक्षा विभेद के सिध्दांत पर आधारित है। इस अधिनियम के तहत गिरफ्तारी पूर्व जमानत पूर्णतः निषिध्द है।

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन किए गए अपराध का अन्वेषण पुलिस उपाधीक्षक से नीचे रैंक के अधिकारी द्वारा नही किया जाएगा। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अधीन अपराधों का विचारण करने के लिए सेशन न्यायालय को विशेष न्यायालय के रुप में निर्दिष्ट करने का उद्देश्य शीघ्र विचारणीय है।

  • हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में तथा सती (निरोध) अधिनियम, 1987 में लागू हुआ था।

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005, 12 अक्टूबर, 2005 से लागू है।

  • सूचना का अधिकार एक विधिक अधिकार है। सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य सार्वजनिक अधिकारियों से सूचना प्राप्त करना है।

  • नमित शर्मा बनाम भारत संघ वाद, सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 से संबंधित है।

  • राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम, 2010 के द्वारा देश में एक राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) का गठन किया गया है।

  • पंचायत विस्तार अधिनियम, 1966 का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन स्थापित करना है, जिससे पारंपरिक अधिकारों की रक्षा हो सके तथा जनजातीय लोगो को शोषण से मुक्त किया जा सके।

  • सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 15 के अनुसार, सभी अपराध संज्ञेय तथा संक्षेपतः विचारणीय प्रकृति के होंगे। इस अधिनियम 1955 के अंतर्गत अपराध का विचारण प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा महानगरों के मामलें में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता है।

  • सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 15 (1) के तहत दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के अधीन दंडनीय पर अपराध संज्ञेय होगा। इस अधिनियम की धारा 10(1) में सामूहिक जुर्माना लगाने के लिए राज्य सरकार की शक्ति का उल्लेख है।साथ ही दोषी व्यक्तियों पर जुर्माने और सजा दोनों का प्रावधान है।

  • सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 1(2) के अनुसार, इस अधिनियम का विस्तार संपूर्ण भारत पर है।

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  • सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के अंतर्गत कंपनियों द्वारा अपराध किए जाने की दशा में वे सभी व्यक्ति उत्तरदायी होंगे, जो अपराध घटित होते समय कंपनी का कार्यभार संभाल रहे हो तथा जो कंपनी के कार्य-व्यवहार के प्रति उत्तरदायी हो। यदि कोई अपराध कंपनी के निदेशक प्रबंधक तथा मैनेजर की सहमति से हो तो सभी उत्तरदायी होंगे।

  • महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण प्रदान करने के लिए घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, 2005 संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित किया गया, जिसे राष्ट्रपति की सहमति 13 सितंबर, 2005 को मिली तथा 26 अक्टूबर, 2006 से संपूर्ण भारत (जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर) लागू किया गया।

  • मीसा (MISA) आंतरिक सुरक्षा अधिनियम वर्ष 1971 में बना तथा 1977 में निरस्त कर दिया गया। यह आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में बनाया गया अधिनियम था। अतः यह सामाजिक अधिनियम नही है।

  • सन 1986 में भारत सरकार के द्वारा उपभोक्ता के अधिकारों के संरक्षण के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 पारित किया गया। इसके तहत उपभोक्ता को खाद्य की जांच करने के लिए नमूने लेने का अधिका है। उपभोक्ता गड़बड़ी पाए जाने पर उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है। इसके लिए उसे मामूली सी फीस देनी पड़ती है। यदि वाद के दौरान उपभोक्ता की मृत्यु हो जाती है। तो उसके वैधानिक उत्तराधिकारी को यह अधिकार है कि वह उपभोक्ता मंच में अपनी शिकायत दर्ज करा सके।

  • वनों के संरक्षण तथा उससे संबंधित अथवा उससे आनुवंषिग या प्रासंगिक विषयों का उपबंध करने के लिए इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 है। इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के अतिरिक्त संपूर्ण भारत पर है। यह 25 अक्टूबर, 1980 से यह प्रभावी है।

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संसदीय समितियां

  • संसद, विभिन्न समितियों के माध्यम से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती है।

  • ये समितियां सदन द्वारा नियुक्त अथवा निर्वाचित की जाती हैं या अध्यक्ष/सभापति द्वारा नाम निर्देशित की जाती हैं।

  • ये अध्यक्ष/सभापति के निर्देशानुसार कार्य करती हैं तथा अपना प्रतिवेदन सदन को या लोकसभाध्यक्ष/सभापति को सौंपती हैं।

  • संसदीय समतियों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है –

  1. संसदीय समितियां

  2. तदर्थ समितियां

  • स्थायी समितियां, स्थायी प्रकृति की होती हैं, जो निरंतरता के आधार पर कार्य करती हैं। इनका गठन प्रत्येक वर्ष अथवा समय-समय किया जाता है।

  • तदर्थ समितियों की प्रकृति अस्थायी होती है। जिस उद्देश्य के लिए गठन किया जाता है, उसके पूरा होते ही इनका कार्यकाल भी समाप्त हो जाता है ।

  • स्थायी समितियां हैं –

  1. वित्त समितियां

  2. विभागीय समिति

  3. जांच समिति

  4. परीक्षण एवं नियंत्रण के लिए गठित समिति

  5. सदन के दैनिक कार्यों से संबधित समितियां

  6. सदन समिति अथवा सेवा समिति

  • वित्त समितियो के अंतर्गत लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति तथा सार्वजनिक उपक्रम समिति शामिल हैं।

  • अपवादस्वरुप कुछ समितियों को छोड़कर लगभग सभी स्थायी समितियों मे लोक सभा एवं राज्य सभा के सदस्यों का अनुपात क्रमशः 2:1 का होता है।

  • लोक लेखा समिति में कुल 22 सदस्य होते हैं, जिनमें 15 सदस्य लोक सभा से और 7 सदस्य राज्य सभा से होते हैं। यह समिति भारत सरकार के विनियोग लेखा और उन पर नियंत्रण तथा महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन की जांच करती है। इस समिति का कार्यकाल एक वर्ष होता है।

  • प्राक्कलन समिति में सदस्यों की संख्या 30 होती है। इसके सदस्य केवल लोकसभा से निर्वाचित होते हैं। यह समिति यह बताती है कि प्राक्कलनों में निहित नीति के अनुरुप क्या मितव्ययिता बरती जा सकती है तथा संगठन, कार्यकुशलता और प्रशासन में क्या-क्या सुधार किए जा सकते हैं।

  • सरकारी उपक्रम समिति में 22 सदस्य (15 लोक सभा 7 राज्य सभा) होते हैं। यह समिति सरकारी उपक्रमों के प्रतिवेदनों ओर लेखकों की जांच करती है।

  • याचिका समिति के सदस्यों की संख्या 15 होती है।

  • लोक लेखा समिति अपनी रिपोर्ट लोक सभा के अध्यक्ष को सौंपती है।

  • सामान्यतया लोक सभा के विपक्ष के किसी सदस्य को इसका अध्यक्ष नियुक्त किए जाने की परंपरा है।

  • इस समिति के अध्य की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।

  • लोक लेखा समिति (Public Account Committee) लोक व्ययों पर नियंत्रण रखने वाली एक संसदीय समिति है। इनमें लोक सभा के 15 और राज्य सभा के 7 सदस्यों समेत कुल 22 सदस्य होते हैं। इसका उद्देश्य लोक व्यय के दुरुपयोग एवं अनियमितताओं को सदन के समक्ष उजागर करना होता है। यह उन लोक प्राधिकारियों के विरुध्द कार्यवाही की भी सिफारिश करती है, जो व्यय के दुरुपयोग  हेतु उत्तरदायी पाए जाते  हैं। समिति नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट को आधार मानकर लोक व्ययों का प्रतिपरीक्षण करती है। सामान्यतः विपक्ष  के लोक सभा सदस्य को इसका अध्यक्ष नियुक्ति किये जाने की प्रथा (1967-68) है। लोक लेखा समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती  है। लोक लेखा समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट लोस सभा के स्पीकर को प्रस्तुत की जाती  है।

  • लोक लेखा समिति – वित्तीय समिति

याचिका समिति                       – कार्यकारी समिति

स्टॉक बाजार-स्कैम संयुक्त समिति      –     तदर्थ समिति

विभागीय समितिंयां                 – स्टैंडिंग समिति

  • सार्वजनिक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजनिक उपक्रम समिति, ये तीनों भारतीय संसद की वित्तीय समितियां हैं।

  • 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच हेतु संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के प्रस्ताव को लोक सभा द्वारा 24 फरवरी, 2011 को एवं राज्य सभा द्वारा 1 मार्च, 2011 को पारित किया गया। इस संयुक्त संसदीय समिति में कुल 30 सदस्य शामिल किए गए हैं, जिसमें 20 लोक सभा से तथा 10 राज्य सभा से हैं।

  • 2-जी स्पेक्ट्रम कांड की जांच करने हेतु संयुक्त संसदीय समिति का अध्यक्ष पी.सी. चाकों को बनाया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट (तत्कालीन) लोक सभा अध्यक्षा मीरा कुमार को सौंपी।

  • भारतीय संसद संसदीय समितियों के माध्यम से प्रशासन पर नियंत्रण करती है। उदाहरणार्थ लोक वित्त पर नियंत्रण वह तीन समितियों के माध्यम से करती है – लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति एवं लोक उपक्रमों पर समिति। ध्यातव्य है कि भारतीय संविधान मे संसदीय समितियों के बारे में विशेष रुप से कोई उपबंध नही किया गया है।

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सर्वोच्च न्यायालय

  • भारतीय संविधान के तहत एकीकृत न्याय व्यवस्था की स्थापना की गई है, जिसमें शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय व उसके अधीन उच्च न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालयों की श्रेणियाँ हैं।

  • न्यायपालिका की यह एकल प्रणाली, भारत सरकार अधिनियम, 1935 से ली गई है।

  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी, 1950 को किया गया था।

  • भारतीय संविधान के भाग 5 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित प्रावधान अनुच्छेद 124 से 147 में उल्लिखित हैं।

  • सर्वोच्च न्यायालय मे न्यायाधीशों की कुल संख्या मुख्य न्यायाधीश सहित 31 है।

  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।

  • मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति अन्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सलाह के बाद करता है।

  • इसी तरह अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भी  होती है। अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए किसी व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए। उसे किसी  उच्च न्यायालय का कम-से-कम पांच वर्ष के लिए न्यायाधीश होना चाहिए, या उसे उच्च न्यायालय या विभिन्न न्यायालयों में मिलाकर 10 वर्ष तक वकील होना चाहिए था। राष्ट्रपति के विचार में वह कानून का ज्ञाता हो।

  • सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए संविधान में न्यूनतम आयु का उल्लेख नही है।

  • सर्वोच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या में वृध्दि संसद कर सकती है।

  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति शपथ दिलाते हैं।

  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति को संबोधित कर अपना पद त्याग सकते हैं।

  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाए जा सकते हैं। जब इस प्रकार हटाए जाने हेतु संसद द्वारा उसी सत्र में ऐसा संबोधन किया गया हो।

  • इस आदेश को संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत (यानि सदन की कुल सदस्यता का  बहुमत तथा सदन के उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों का दो-तिहाई) का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।

  • न्यायाधीशों को हटाने का आधार उनका दुर्व्यवहार या सिध्द कदाचार होना चाहिए। इस शक्ति के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केन्द्र व राज्य दोनों स्तरों पर विधायी व कार्यकारी आदेशों की सांविधानिकता की जांच की जाती है।

  • अधिकारातीत पाए जाने की स्थिति में इन्हें अविधिक, असंवैधानिक और अवैध घोषित किया जा सकता है।

  • उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है।

  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का वेतन संसद द्वारा निर्धारित होता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के बाद भारत के किसी भी न्यायालय में वकालत नही कर सकते हैं।

  • अनु. 127 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के किसी सत्र के लिए न्यायाधीशों का कोरम पूरा करने हेतु तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है।

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  • सर्वोच्च न्यायालय मे संविधान के निर्वाचन से संबंधित मामले की सुनवाई के लिए न्यायाधीशों की संख्या कम-से-कम पांच होनी चाहिए। इसे संविधान के पीठ के रुप में अभिहीत किया जाता है।

  • संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार, उच्चतम न्यायालय अभिलेख न्यायालय है। इसे अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति है।

  • अभिलेख न्यायालय का अर्थ है कि इसके सभी निर्णयों का साक्ष्यात्मक मूल्य होता है।

  • अनुच्छेद 131 मे केन्द्र और राज्यों के बीच, दो या अधिक राज्यों के बीच तथा भारत सरकार और किसी राज्य या राज्यों और दूसरी ओर एक या अधिक अन्य राज्यों की बीच होने वाले विवादों का निर्णय करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति मूल अधिकारिता के अंतर्गत आती है।

  • अनु. 132-136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार का उल्लेख किया गया है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत है। अनुच्छेद 137 के  अंतर्गत निर्णयों या आदेशों का उच्चतम  न्यायालय  द्वारा पुनर्विलोकन (Review) किया जाता  है।

  • भारतीय संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन का आधार विधि का शासन है।

  • संविधान की व्याख्या करने का अंतिम अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है।

  • सर्वोच्च न्यायालय को भारतीय संविधान का संरक्षक तथा अभिभावह कहा जाता है।

  • अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति विधि या तथ्य के व्यापक महत्व के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श ले सकते हैं।

  • सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने का अधिकार संसद को है।

  • देश की किसी न्यायालय मे चल रहे मामला/वाद को अन्यत्र भेजने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है।

  • भारतीय संविधान के आधारित संरचना के सिध्दांत का स्रोत न्यायिक व्याख्या है। संविधान के अनु. 141 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर आबध्दकर होती है।

  • केशवानन्द भारती (1973) मामले मे सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के मूल ढांचे का सिध्दांत प्रतिपादित किया।

  • भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना भारतीय संविधान के अनु. 124 के तहत की गई है। अनु. 124 में न्यायाधीशों की संख्या का भी उल्लेख है। जब संविधान प्रारंभ हुआ तब उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त सात थी। संसद ने उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश संख्या अधि. 1956 अधिनियमित करके इस संख्या को ग्यारह कर दिया, 1960 में बढ़ाकर चौदह, 1978 में अठारह और 1986 में इसे 26 (मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दिया गया। 2008 के अधिनियम के तहत मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायलय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 31 रखने का प्रावधान किया गया है।

  • भारतीय संविधान के अनु.124(2)(क) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय को कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकता है। राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति भी करती है।

  • सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष है, जबकि उच्च न्यायालयों में यह 62 वर्ष है।

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  • संविधान के अनु. 125 (1) के तहत उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन का निर्धारण संसद द्वारा बनाई गई विधि के तहत किया जाता है।

  • उच्चतम न्यायालय को देश का प्रहरी माना जाता है, अतः उसकी स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए संविधान में कई उपबंध मौजूद है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना आवश्यक होगा। न्यायाधीशों को राजनीति के प्रभाव से दूर रखने के लिए उनका वेतन भारत की संचित निधि पर भारित होता  है, जिसके लिए संसद में मतदान ही होता है।

  • संविधान के अनु. 124(7) के अनुसार, सेवानिवृत्त होने के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश किसी भी न्यायालय में वकालत नही कर सकते हैं, जबकि अनु. 220 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने के  बाद उच्चतम न्यायालय में एवं अन्य उच्च न्यायालयों (जिस उच्च न्यायालय मे स्थायी न्यायाधीश रहा हो, उसमें नही) मे वकालत कर सकते हैं।

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राज्यपाल

  • भारतीय राज्यों मे सरकार की व्यवस्था उसी प्रकार की है, जैसी कि केन्द्र स्तर पर संविधान के भाग 6 के अंतर्गत अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका के संबंध्द में उल्लेख है।

  • राज्यपाल, राज्य का कार्यकारी प्रमुख होता है।

  • सामान्यतः प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होता है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के अनुसार, एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्ति किया जा सकता है।

  • संविधान के अनुच्छेद 155 के तहत राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति द्वा की जाती है।

  • सामान्यतया, राज्यपाल का कार्यकाल पदग्रहण से पांच वर्ष की अवधि के लिए होता है।

  • अनुच्छेद 156(1) के तहत राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपना पद धारण करता है।

  • अनुच्छेद 156(2) के तह राज्यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग कर सकता है।

  • अनुच्छेद 157 के अनुसार, राज्यपाल पद के लिए अर्हताएं हैं –

  1. वह भारत का नागरिक हो

  2. वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो

  • जम्मू और कश्मीर के राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति करता है।

  • राज्य सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रुप से राज्यपाल के नाम पर होते हैं।

  • अनुच्छेद 239 क क(5) – संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी।

  • अनुच्छेद 202(3)(क) के अनुसार, राज्यपाल की नियुक्ति उपलब्धियां भत्ते तथा उसके पद से संबंधित अन्य व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं।

  • संविधान के अनुच्छेद 164(1) के अनुसार, मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा तथा, मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा।

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  • राज्यपाल, राज्य विधानसभा का अभिन्न अंग होता है। वह राज्य विधानसभा के सत्र को बुलाने या सत्रावसान करने तथा विघटित करने की शक्ति रखता है।

  • राज्यपाल, राज्य विधान परिषद के कुल सदस्यों के 1/6वें भाग को नामित करता है। वह राज्य विधानसभा के लिए आंग्ल-भारतीय समुदाय से एक सदस्य की नियुक्ति कर सकता है।

  • अनु. 165 के तहत राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए योग्य  किसी व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा।

  • राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राज्यपाल स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है या वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखता है। वह विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस कर सकता है (धन विधेयक न होने पर)।

  • राज्य विधानमंडल द्वारा पुनः भेजे जाने पर राज्यपाल को अपनी स्वीकृति देनी होती है।

  • अनु. 201 के अनुसार, जब कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख लिया जाता है, तब राष्ट्रपति यह घोषित करेगा कि वह विधेयक पर अनुमति देता है या रोक लेता है।

  • अनु. 213 के अनुसार, जब राज्य विधानमंडल का सत्र न चल रहा हो तो राज्यपाल अध्यादेश की घोषणा कर सकता है।

  • अनुच्छेद 161 के अनुसार, किसी राज्य के राज्यपाल को उस राज्य की कार्यपालिका विधि के विरुध्द किसी अपराध के लिए दंड को क्षमा, उसका प्रतिलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडावेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी।

  • सरोजिनी नायडू भारत की प्रथम महिला थी, जिन्हें राज्यपाल पद पर मनोनीत किया गया था।

  • वह 15 अगस्त, 1947 से  1 मार्च, 1949 तक उत्तर प्रदेश की राज्यपाल थी।

  • संविधान सभा में इस बात पर काफी बहस हुई कि राज्य का राज्यपाल नियुक्त हो या निर्वाचित। कृष्णामचारी, बी.जी.खेर, जी.बी. पंत जैसे नेता निर्वाचित राज्यपाल के पक्ष मे थे, जबकि अम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरु जैसे नेता नामित राज्यपाल के पक्ष मे थे। अंततः देश की परिस्थितियों एवं आम सहमति के आधार पर नामित राज्यपाल का प्रावधान किया गया और निर्वाचित प्रावधान की मूल योजना को छोड़ दिया गया क्योकि –

  1. अनावश्यक निर्वाचन व्यय बढ़ेगा

  2. निर्वाचन के दुष्परिणामों से बचा जा सकेगा

  3. राजनैतिक महत्वकांक्षाएं द्वंध्द एवं संघर्ष को जन्म देंगी

  4. केन्द्र का राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण न हो सकेगा।

  5. अलगाववाद को बढ़ावा मिलेगा।

  • राज्य का राज्यपाल निम्नलिखित संदर्भों में अपने विवेकानुसार कार्य कर सकता है –

  1. विधानसभा मे सरकार को बहुमत सिध्द करने को कहने के लिए।

  2. अल्पमत मे आए मुख्यमंत्री को बर्खास्त करने के लिए।

  3. किसी विधेयक पर अनुमति देने, अनुमति रोकने अथवा भारत के राष्ट्रपति के विचारार्थ उस विधेयक को आरक्षित करने के लिए (अनु. 200)।

  4. विधायिका द्वारा पारित किसी विधेयक को पुनर्विचार हेतु वापस करने के लिए (अनु. 200 का परंतुक)।

इसके अतिरिक्त राज्य मे राष्ट्रपति शासन लगाने तथा विधानसभा के समय पूर्व विघटन जैसे कुछ अन्य संदर्भों में भी वह अपने विवेक का पर्योग कर सकता है तथापि उसे उच्च न्यायालय से परामर्श मांगने के लिए अधिकृत नही किया गया है।

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  • अनुच्छेद 200 के अनुसार राज्य विधान मण्डल के दोनों सदनों से पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किए जाने पर राज्यपाल उस पर अपनी सहमति देने या रोकने के अतिरिक्त विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है।

  • अनुच्छेद 201 मे राष्ट्रपति ऐसे आरक्षित विधेयक पर विचार करता है तथा अपनी अनुमति देता है या रोक लेता है ।

  • संविधान के अनुच्छेद 154(1) के अनुसार, राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी, जिसका प्रयोग वह इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।

  • जम्मू एवं कश्मीर राज्य को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत भारत के अन्य राज्यों से अलग विशेष राज्य का दर्जा प्रदान किया गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में वहां की कार्यपालिका के प्रधान का चुनाव भारत के राष्ट्रपति द्वारा न होकर, जम्मू एवं कश्मीर की विधानसभा द्वारा किया जाता था किंतु इस विषमता को 1965 में समाप्त कर दिया गया, फलस्वरुप जम्मू एवं कश्मीर के कार्यपालिका प्रमुख को सदर-ए-रियासत के स्थान पर राज्यपाल नाम से जाना जाने लगा तथा उसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की  जाने लगी।

  • भारतीय संविधान के भाग 6 के तहत अनुच्छेद 158(3A) के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि जब एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यो का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, तो उसे संदेय उपलब्धियां और भत्ते उन राज्यों के बीच ऐसे अनुपात में आवंटित किया जाएगा जैसा राष्ट्रपति  आदेश द्वारा अवधारित करें।

  • संविधान के अनुच्छेद 213(2)(क) के तहत राज्यपाल द्वारा जारी अध्यादेश का विधायिका के सत्र प्रारंभ होने से छह सप्ताह की अवधि मे विधायिका द्वारा अनुमोदन आवश्यक है, अन्यथा वह प्रवर्तन में नही रहेगा।

  • संविधान के अनुच्छेद 356(1) के अनुसार, किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा भेजी गई राज्य में संविधान के उपबंधों के अनुसार शासन नही चलाए जा सकने की रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा राष्ट्रपति द्वारा उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। यह रिपोर्ट भेजना राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति के अंतर्गत आता है।

  • राज्यपाल अनु. 168 के तहत राज्य की विधायिका का अंग होता है, राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति अनु. 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा राज्यपाल के पास राष्ट्रपति की तरह आपातकालीन शक्तियां नही हैं।

  • अनु. 161 के तहत राज्य की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार वाले विषयों पर किसी अपराध के लिए दोषसिध्द ठहराए गए व्यक्ति के दंड का राज्यपाल निलंबन, परिहार लघुकरण अथवा क्षमा कर सकता है परंतु मृत्युदंड को क्षमा नही कर सकता है।

  • पश्चिम बंगाल की प्रथम महिला राज्यपाल पद्मजा नायडू (1956-1967) थी। जबकि प्रथम राज्यपाल चक्रवती राजगोपालाचारी थे। वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी (24 जुलाई, 2014 से) हैं।

  • प्रतिवर्ष 13 फरवरी को सरोजिनी नायडू की स्मृति में महिला दिवस मनाया जाता है। सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 को हुआ था।

  • भारत में सर्वप्रथम बर्खास्त किए गए राज्यपाल तमिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी थे जिन्हें अक्टूबर, 1980 में बर्खास्त किया गया था। अगस्ता, 1981 में राजस्थान के राज्यपाल रघुकुल तिलक को बर्खास्त किया गया था, जो कि राजस्थान के ऐसे पहले राज्यपाल थे।

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राज्य विधानमंडल

विधान परिषद

  • अनुच्छेद 171 के तहत विधान परिषदों के गठन का प्रावधान किया गया है। वर्तमान में सात राज्यों (आंध्र प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश) मे विधान परिषदों का अस्तित्व है।

  • विधान परिषद एक स्थायी सदन है, इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष तक रहता है।

  • अनुच्छेद 171(1) के अनुसार, विधान परिषद वाले राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नही होगी।

  • किसी विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या भी किसी दशा में 40 से कम नही होगी।

  • जम्मू-कश्मीर राज्य अपवाद है, जिसके विधान परिषद सदस्यों की संख्या 36 है।

  • उत्तर प्रदेश की विधान परिषद में सर्वाधिक (100) सदस्य हैं।

  • अनुच्छेद 171(4) के अनुसार, विधान परिषद के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रुप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पध्दति के तहत एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है।

  • अनुच्छेद 173 के अनुसार, विधान परिषद सदस्यों की अर्हताएं निहित हैं।

  • विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित होने के लिए 30 वर्ष की आयु आवश्यक है।

  • अनुच्छेद 192 के अनुसार, विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य किसी अयोग्यता से ग्रस्त है या नही, इस प्रश्न का विनिश्चय राज्यपाल, निर्वाचन आयोग के परामर्श से करता है।

  • विधान परिषद के 5/6 सदस्यों का निर्वाचन होता है तथा शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।

  • विधान परिषद अपने सभापति या उपसभापति को साधारण बहुमत से संकल्प पारित कर उनके पद से हटा सकती है।

  • अनुच्छेद 191 राज्य विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता के लिए निरर्हताएं से संबंधित है।

  • राज्य विधानमंडल का कोई सदस्य सदन की बैठकों से बिना अनुमति के लगातार 60 दिनों तक अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है.

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विधानसभा (Legislative Assembly)

  • संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 168-212 तक राज्यों के विधानमंडल के बारे में उल्लेख है।

  • अनुच्छेद 168 के अनुसार, राज्य विधानमंडल का गठन विधान परिषद, विधानसभा और राज्यपाल को मिलाकर होगा।

  • प्रत्येक राज्य में विधायी कार्यों के संपादन के लिए विधानसभा का प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 170 के अनुसार, प्रत्येक राज्य की विधानसभा उस राज्य में प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए अधिक से अधिक 500 और कम से कम 60 सदस्यों से मिलाकर बनेगी।

  • वर्तमान में सबसे छोटी विधानसभा केन्द्रशासित प्रदेश पुडुचेरी की (30) है, राज्यों मे सिक्किम की (32) है।

  • सबसे बड़ी विधानसभा उत्तर प्रदेश की (403) है।

  • अनुच्छेद 169 के अनुसार, विधान परिषद की स्थापना और उन्मूलन का अधिकार संसद को है।

  • राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन का संचालन भारत का निर्वाचन आयोग करता है।

  • अनुच्छेद 170(2) के अनुसार, किसी राज्य विधानसभा की सदस्य संख्या उस राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करती है।

  • विधानसभा अध्यक्ष यदि किसी प्रश्न पर पक्ष और विपक्ष में बराबर मत आए, तो वह निर्णायक मत का प्रयोग करता है।

  • सदन तथा राज्यपाल के बीच अध्यक्ष ही संपर्क स्थापित करता है।

  • अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसके कार्यों का संपादन उपाध्यक्ष करता है।

  • 84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 2002 के अनुसार, राज्य विधानसभाओं की संख्या वर्ष 2026 तक यही रहेगी।

  • जम्मू कश्मीर में विधानसभा सदस्यों की कुल संख्या 111 है, जबकि 24 चुनाव क्षेत्र पाकिस्तान द्वारा अधिग्रहित क्षेत्र (POK) में है।

  • वर्तमान में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या 87 है।

  • दिल्ली तथा पुडुचेरी दो ऐसे संघ शासित प्रदेश है, जहां विधानसभाएं हैं।

  • अनुच्छेद 173 के तहत विधानसभा की सदस्यता के लिए योग्यताएं हैं – वह भारत का नागरिक हो तथा उसकी आयु कम-से-कम 25 वर्ष हो।

  • अनुच्छेद 332 के तहत विधानसभाओँ में जनसंख्या के आधार पर अनुसूचित  जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान है।

  • विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार तथा कार्य लोक सभा अध्यक्ष के समान ही है.

  • राज्य में धन विधेयक (Money Bill) केवल विधानसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 198(1) के अनुसार, धन विधेयक विधान परिषद में पुरःस्थापित नही किया जाएगा।

  • अनुच्छेद 168 के अनुसार, राज्यो की विधायिका मे शामिल हैं –

  1. राज्यपाल

  2. विधानसभा, तथा

  3. विधान परिषद, जहां इसका अस्तित्व है।

  • राज्य के बजट को तैयार करने का कार्य वित्त मंत्री और संबंधित मंत्रालय के अधिकारी करते हैं। मंत्री अपने पद पर नियुक्त होने से पूर्व पद एवं गोपनीयता की शपथ लेता है। यदि बजट विधानमंडल में प्रस्तुत करने से पूर्व खुल जाए तो वित्त मंत्री को व्यक्तिगत जिम्मेदारी लेते हुए पद से त्याग-पत्र  दे देना होगा। अधिकारिक गोपनीय अधिनियम, 1923 मे दंड का प्रावधान दिया गया है।

  • संविधान के अनु. 207(1) के तहत अनु. 199(1) के भाग (a) से (f) तक के प्रावधानों वाला कोई भी धन विधेयक राज्य विधानसभा में बगैर संबंधित राज्य के राज्यपाल की संस्तुति के पुरःस्थापित नही किया जा सकता है।

  • संविधान के अनु. 197 के तहत धन विधेयक से भिन्न विधेयक (साधारण विधेयक) को विधान परिषद प्रथम बार में 3 माह तक तथा विधानसभा द्वार पुनः पारित किए जाने पर 1 माह तक (इस प्रकार कुल 4 माह तक) ही रोक सकती है। धन विधेयकों को विधान परिषदों को 14 दिन की अवधि के भीतर लौटाना होता है।

  • सातवें संविधान संशोधन 1956 के द्वारा मध्यप्रदेश के लिए भी विधान परिषद की व्यवस्था की गई थी, किंतु इसे अस्तित्व में लाया नही जा सका है।

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  • लोक सभा एवं राज्य विधानसभाओं को भंग तो किया जा सकता है, परंतु समाप्त नही किया जा सकता है। राज्य सभा को न तो भंग किया जा सकता है और न ही समाप्त किया जा सकता है। जबकि राज्य विधान परिषदों को यद्यपि भंग नही किया जा सकता तथापि अनु. 169 के तहत इन्हें संसद द्वारा (संबंधित राज्य की विधानसभा द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करने पर) समाप्त किया जा सकता है।

  • फरवरी, 2015 तक संविधान के अनुच्छेद 168(क) के अनुसार देश के सात राज्यों – आध्र प्रदेश, बिहार, जम्मू व कश्मीर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना (2 जून, 2015) और उ.प्र. में द्विसदनात्मक विधायिका (विधानसभा और विधान परिषद) अस्तित्व में है। तमिलनाडु में विधान परिषद की स्थापना संबंधी विधेयक यद्यपि संसद द्वारा वर्ष 2010 में पारित किया गया था, तथापि वर्ष 2012 में इसे वापस ले लिया गया।

  • अनुच्छेद 171 के प्रावधानों के अनुसार, विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन निम्न प्रकार से होता है –

  1. एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों द्वारा चुने जाते हैं।

  2. 1/12 सदस्य 3 वर्ष से स्नातकों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं।

  3. 1/12 सदस्यों को 3 वर्ष से अध्यापन कर रहे लोग चुनते हैं, जो माध्यमिक स्तर से निम्न स्तर के नही होने चाहिए।

  4. 1/3 सदस्य विधानसभा के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।

  5. शेष 1/6 सदस्यों का नामांकन राज्यपाल द्वारा किया जाता है जो कला, साहित्य, विज्ञान, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा से जुड़े होते हैं।

  • अनुच्छेद 170- विधानसभाओं की संरचना (अनु. 170(1)) के अनुसार, प्रत्येक राज्य की विधानसभा उस राज्य में प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने हुए पांच सौ से अनधिक और साठ से अन्यून सदस्यों से मिलकर बनेगी।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 170 में यह प्रावधान है कि राज्य के विधानसभा के गठन में न्यूनतम 60 तथा अधिकतम 500 सदस्य हो सकते हैं। सिक्किम राज्य इसका अपवाद है, यहां विधानसभा सीटों की संख्या 32 है जबकि जम्मू-कश्मीर में 87, हरियाणा में 90 तथा उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) में 70 सीटें है।

  • गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां सामान्य सिविल कोड (Common Civil Code) लागू है। वस्तुतः यहां सभी नागरिकों के लिए 19वीं शताब्दी से ही पुर्तगीज सिविल कोड चला आ रहा है, जिसे परिवर्तित नही किया गया है।

  • वर्ष 1956 में मात्र 5 राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर तथा कर्नाटक राज्यों में विधान परिषदें थी। वर्तमान में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित कुल सात राज्यों में द्विसदनीय विधायिकाएं हैं।

  • केन्द्र के साथ-साथ राज्यों के वित्तीय लेखों पर नियंत्रण का कार्य भी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा ही किया जाता है।

  • सुचेता कृपलानी भारत के किसी भी राज्य की मुख्यमंत्री बनने वाली पहली महिला थी। वे 1963 में उ.प्र. राज्य की मुख्यमंत्री बनी थी।

  • संविधान के अनुच्छेद 167 में उल्लिखित है कि मुख्यमंत्री का कर्तव्य होगा कि वह राज्य के कार्यों के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे तथा किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किंतु मंत्रिपरिषद ने विचार नही किया है, राज्यपाल द्वारा अपेक्षा किए जाने पर मंत्रिपरिषद के समक्ष विचार के लिए रखे। मुख्यमंत्री का राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक मे भाग लेना संवैधानिक कर्तव्य न होकर प्रशासनिक कर्तव्य है।

  • जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष होता है और विधानसभा में बहुमत दल का नेता ही मुख्यमंत्री बनता है वह तब तक पद पर रहता है, जब तक उसे विधानसभा में  बहुमत का समर्थन प्राप्त रहता है। अतः मुख्यमंत्री का कार्यकाल निश्चित नही होता परंतु इसे सामान्यतः विधानसभा के कार्यकाल तक माना जा सकता है जो कि 6 वर्ष है।

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उच्च न्यायालय

  • भारतीय संविधान के तहत राज्यों के न्यायिक प्रशासन में उच्च न्यायालय की स्थिति शीर्ष पर होती है।

  • प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है, लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह दो या दो से अधिक राज्यों एवं एक संघ राज्य क्षेत्र के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।

  • भारतीय संविधान में राज्यों के लिए उच्च न्यायालय हेतु अनुच्छेद 214 से 231 में प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।

  • अनुच्छेद 215 के अनुसार, उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा।

  • अनुच्छेद 216 के अनुसार, प्रत्येक उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा, जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।

  • अभिलेख न्यायालय होने का तात्पर्य उच्च न्यायालय के निर्णय, आदेश आदि अधीनस्थ न्यायालय के लिए बाध्यकर होंगे।

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित कर अपना पद त्याग सकते हैं।

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को राष्ट्रपति के आदेश से पद से हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति ऐसा आदेश संसद द्वारा सत्र में पारित प्रस्ताव के आधार पर जारी कर सकता है।

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के समान प्रक्रिया तथा सिध्द कदाचार और अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है।

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए वही योग्य हैं जो भारत के नागरिक हैं और –

  1. ऐसे व्यक्ति जो उच्च न्यायालय मे लगातार 10 वर्ष तक अधिकवक्ता रहे हों, या

  2. ऐसे व्यक्ति जो 10 वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुके हो।

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का वेतन राज्य के संचित निधि से दिया जाता है।

  • अनु. 223 के अनुसार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त रहने पर या अनुपस्थितरहने पर कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।

  • अनु. 226 के तहत मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए रिट जारी करने की शक्ति उच्च न्यायालय को है।

  • अनुच्छेद 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय उस राज्य के सभी न्यायालयों पर अधीक्षण करने की शक्ति रखता है।

  • वर्तमान में उच्च न्यायालयों की संख्या 24 है। उनमें से 7 का क्षेत्राधिकार एक से अधिक राज्यों पर है।

  • दिल्ली एकमात्र केन्द्रशासित प्रदेश है, जिसका अपना उच्च न्यायालय है, जबकि अन्य केन्द्रशासित प्रदेश विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायिक क्षेत्र में आते हैं।

  • संसद उच्च न्यायालयों के न्यायिक क्षेत्र में विस्तार कर सकती है।

  • सर्वप्रथम 1862 ई. में कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालयों की स्थापना की गई थी।

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना 1866 ई. में हुई थी।

  • अनु. 233(1) के अनुसार, किसी राज्य मे जिला न्यायाधीश नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति तथा जिला न्यायाधीश की पद स्थापना और प्रोन्नति उस राज्य का राज्यपाल,ऐसे राज्य के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके करेगा।

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  • अनु. 235 के तहत उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण रखता है।

  • भारत में निवारक निरोध के अंतर्गत एक व्यक्ति को बिना  मुकदमा चलाए अधिकतम तीन माह बंदी बनाकर रखा जा सकता है।

  • लोक अदालतों के माध्यम से सामान्य न्यायालयों में लंबित मामलों का दोनों पक्षों के मध्य समझौते के आधार पर निपटारा किया जाता है।

  • इसमें दीवानी मामलों के साथ-साथ कतिपय आपराधिक मामलो पर भी विचार किया जाता है।

  • लोक अदालतों में वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी अथवा विधिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति पीठासीन अधिकारी होता है।

  • ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत ग्राम न्यायालय को सिविल तथा आपराधिक दोनों ही मामलों की सुनवाई का अधिकार है.

  • संविधान के अनुच्छेद 202(3)(घ) के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते राज्य का संचित (समेकित) निधि से दिए जाते हैं, किंतु अनु. 112(3)(घ) के तहत इन्हें पेशन भारत सरकार की संचित निधि से दी जाती है।

  • उच्च न्यायालय के न्यायामूर्ति की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है। संविधान के अनुच्छेद 217(1) में 15वें संविधान संशोधन, 1963 (तब 60वर्ष थी) द्वारा यह उम्र सीमा निर्धारित की गई है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष करने हेतु 114वां संविधान संशोधन विधेयक संसद के विचाराधीन है।

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रहमतुल्ला बनाम स्टेट ऑफ यू.पी., 1994 के मामले में यह निर्णय दिया कि यदि विधि के उपबंधों को विफल करने के उद्देश्य से तीन बार तलाक कहकर तलाक लिया जाता है, तो ऐसा तलाक गैर-कानूनी होगा।

  • अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह पर कोलकाता उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार है, जिसकी सर्किट बेंच (पीठ) पोर्ट ब्लेयर में है। वर्तमान में 7 उच्च न्यायालय ऐसे हैं जिनकी अधिकारिता एक से अधिक  राज्यों/संघ क्षेत्रों पर है जैसे – मुंबई उच्च न्यायालय, कोलकाता उच्च न्यायालय, गुवाहाटी उच्च न्यायालय, केरल उच्च न्यायालय, मद्रास उच्च न्यायालय और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय तथा आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना उच्च न्यायालय।

  • बंबई उच्च न्यायलय का क्षेत्राधिकार महाराष्ट्र, दादरा एवं नगर हवेली गोवा तथा दमन व दीव तक है।

  • संघ राज्य क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो 4 ऐसे उच्च न्यायालय हैं, जिनके अधिकारिता क्षेत्र में एक से अधिक राज्य हैं –

  1. गुवाहाटी उच्च न्यायालय – अरुणाचल प्रदेश, असोम, नगालैंड, मिजोरम।

  2. मुंबई उच्च न्यायालय – महाराष्ट्र और गोवा।

  3. पंजाब एवं हरियाणा – पंजाब और  हरियाणा

  4. तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय – आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना।

  • मूल अधिकारों का संरक्षण उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय दोनों की अधिकारिता में आते हैं। अतः इस हेतु उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 के अंतर्गत एवं उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी करने की शक्ति दी गई है।

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  • मैंडमस (परमादेश) का आशय है – हम आदेश देते हैं। इस प्रकार इस याचिका द्वारा कार्यपालिका से उसे कार्य करने के लिए कहा जाता है, जो उसे प्रदत्त शक्तियों के अंतर्गत करना चाहिए।

  • भारतीय संविधान के अनुसार, परामर्श संबंधी क्षेत्राधिकार अनु. 143 के तहत मात्र सर्वोच्च न्यायालय का है। ज्ञातव्य है कि संघ तथा राज्यें या राज्यों के बीच विवादों के निर्णय का प्रारंभिक एवं एकमेव क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास है परंतु मूल अधिकारों को लागू करने के संबंध में प्रारंभिक क्षेत्राधिकार उच्च न्यायलयों का भी है (अनु. 226 के तहत)।

  • उत्प्रेषण एवं प्रतिषेध याचिकाएं अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यपध्दति का परीक्षण करती हैं। जब अधीनस्थ न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर किसी विषय पर सुनवाई करता है तो ऊपरी न्यायालय प्रतिषेध याचिका द्वारा मामले को अपने पास मंगा लेता है।

  • प्रतिषेध (Prohibition) रिट न्यायालय मे कार्यवाही लंबित रहने की दशा में लागू की जाती है। जब निचला न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर किसी विषय पर सुनवाई करता है तो ऊपरी न्यायालय प्रतिषेध रिट जारी करके मामले को अपने पास मंगा लेता है।

  • जनहित याचिका के माध्यम से नागरिक समाज का कोई व्यक्ति या समूह किसी व्यक्ति, समूह या समाज के हित संबंधी मामलों में न्यायिक उपचार की प्राप्ति हेतु न्यायालय जा सकता है।

  • केशवानंद भारतीय मामले (1973) के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मूल ढांचे के अवधारणा के तहत किसी भी मामले का पुनरीक्षण किया जा सकता है।

  • बाबरी मस्जिद/राम जन्मभूमि का विवाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष स्वत्वाधिकार मुकदमें (Title suit) के रुप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें दो समुदायों ने  बाबरी मस्जिद/राम जन्म भूमि की जमीन एवं संपत्ति पर अपने-अपने दावे पेश किए हैं।

  • भारतीय संविधान के भाग VI के अध्याय 6 के अच्छेद 233 में जिला न्यायाधीश शब्द का उल्लेख किया गया है, जिसके अंतर्गत जिला न्यायालयों की नियुक्ति का प्रावधान है।

  • अनुच्छेद 236(क) के अंतर्गत जिला न्यायाधीश अभिव्यक्ति के अंतर्गत शामिल हैं – नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, अपर मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश, अपर सेशन न्यायाधीश, सहायक सेशन न्यायाधीश।

  • अनु. 217(1)(ख) में उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अनु. 124 के खण्ड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकेगा। इन्हें संविधान के अनुच्छेद 124(4) में विहित प्रक्रिया से साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर  संसद द्वारा अधिनियमित न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत संसद में हटाने संबंधी प्रस्ताव पारित करके हटाया जा सकता है।

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  • अनु. 220 के अनुसार, उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के पश्चात जिस उच्च न्यायालय में वह स्थायी न्यायाधीश रहा हो, उससे भिन्न उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में अभिवचन कार्य कर सकता है, जबकि उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्ति न्यायाधीश भारत के किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन का कार्य नही कर सकता है। (अनु. 124)

  • भारत में निवारक निरोध (Preventive Detention) के अंतर्गत एक व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए अधिकतम 3 माह तक (संविधान के अनु. 22(4) के अनुसार) बंदी बनाकर रखा जा सकता है।

  • आठवें विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश एच.आर. खन्ना ने आयोग की 80वीं रिपोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति के तरीकें में उपबंध 5(VI) के अंतर्गत उच्च न्यायालय के एत-तिहाई न्यायाधीश दूसरे राज्य से होने की सिफारिश की थी।

  • लोक अदालतों मे सामान्य न्यायालयों मे लंबित मामलों का दोनों पक्षों के मध्य समझौते के आधार पर निपटारा किया जाता है। इनमें दीवानी मामलों के साथ-साथ कतिपय आपराधिक मामलों पर भी विचार किया जाता है। लोक अदालतों मे वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी अथवा विधिक ज्ञान रखने वाला सम्माननीय व्यक्ति पीठासीन अधिकारी होता है तथा सामान्यतः एक वकील एवं एक सामाजिक कार्यकर्ता इसके सदस्य होते हैं।

  • ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के अंतर्गत धारा-11 के अंतर्गत ग्राम न्यायालय को सिविल तथा आपराधिक, दोनों ही मामलों की सुनवाई का अधिकार है। अधिनियम की  धारा-27 के अनुसार, स्थानीय सामाजिक सक्रियतावादियों को मध्यस्थ/सुलहकर्ता के रुप में स्वीकार किया गया है।

केन्द्र-राज्य संबंध

विधायी संबंध

  • केन्द्र और राज्यों के मध्य बेहतर संबंधों की स्थापना के लिए उनके मध्य विधायी, प्रशासनिक एवं वित्तीय संबंधों का वर्णन संविधान के भाग 11 एवं 12 में किया गया है।

  • संविधान के भाग XI में अनुच्छेद 245 से 255 तक केन्द्र-राज्य विधायी के प्रावधान उल्लिखित हैं।

  • अनु. 245(1) के अनुसार, संसद भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी  भाग के लिए विधि बना सकेगी और किसी राज्य का विधानमंडल संपूर्ण राज्य या उसके किसी  भाग के लिए विधि बना सकेगा।

  • अनु. 247 के तहत संसद को अधिकार है कि वह कुछ अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना कर सकती है।

  • संविधान के अनुच्छेद 248 के अनुसार अवशिष्ट विधायी शक्तियां संघीय संसद को सौंपी गई हैं।

  • संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत केन्द्र एवं राज्यों के विधायी शक्तियों के बंटवारे के लिए तीन सूचियों को संविधान की 7वीं अनुसूची में वर्णित किया गया है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 249 राज्य सूची के विषयों के संबंध में संसद की विधायी शक्तियों की संबंधित है। यदि राज्य सभा ने उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों मे से कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित संकल्प द्वारा घोषित किया है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है कि संसद राज्य सूची के विषय पर विधि बनाए, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है।

  • अनु. 250(1) के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल घोषित किए जाने की स्थिति में संसद को राज्य सूची में वर्णित विषयों पर विधि बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

  • अनु. 251 के अनुसार, यदि संसद द्वारा अनु. 249 और अनु. 250 के अधीन बनाई गई विधियों और राज्यों के विधानमंडलों  द्वारा बनाई गई विधियों में असंगति पाई जाती है, तो संसद द्वारा निर्मित विधि प्रभावी होगी।

  • अनु. 252 के तहत दो या अधिक राज्यों के लिए उनकी सहमति से विधि बनाने की संसद की शक्ति और ऐसी विधि का किसी अन्य राज्य द्वारा अंगीकार किया जाना उल्लिखित है।

  • अनु. 253 के तहत संसद को किसी अन्य देश या देशों के साथ की गई किसी संधि, करार या अभिसमय अथवा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, संगम या अन्य निकाय में किए गए किसी विनिश्चय के कार्यान्वयन के लिए भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कोई विधि बनाने की शक्ति है।

  • संविधान के भाग 11 के अंतर्गत अनु. 256-263 के तहत केन्द्र और राज्यों के मध्य प्रशासनिक संबंधों का उल्लेख किया गया है।

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  • अनु. 256 के तहत प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग किया जाएगा, जिससे संसद द्वारा निर्मित विधियों की सुनिश्चितता बनी रहे।

  • अनु. 257 के तहत संघ सरकार कुछ दशाओं मे राज्यों पर नियंत्रण रखती है।

  • अनु. 258 के अनुसार, राष्ट्रपति, किसी राज्य सरकार की सहमति से उस सरकार को या उसके अधिकारियों को ऐसे किसी विषय से संबंधित कृत्य, जिन पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, सौंप सकेगा।

  • अनु. 262(j) के अनुसार, संसद विधि द्वारा, किसी अंतरराज्यिक नदी या नदी-दून के या उसमें जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी विवाद या परिवाद के न्यायनिर्णयन के लिए उपबंध कर सकेगी।

  • अनु. 263 के अनुसार, राज्यों के बीच विवादों की जांच करने और उन पर सलाह देने तथा कुछ या सभी राज्यों के अथवा संघ और एक या अधिक राज्यों के सामान्य हित से संबंधित विषयों के अन्वेषण और उन पर विचार-विमर्श करने हेतु राष्ट्रपति आदेश द्वारा अंतरराज्य परिषद की स्थापना करेगा।

  • अनु. 264 से 281 के तहत केन्द्र तथा राज्य सरकारों के मध्य वित्तीय संबंधों का प्रावधान किया गया है।

  • अनु. 265 के अनुसार, कोई कर विधि के प्राधिकार से ही अधिरोपित या संगृहीत किया जाएगा, अन्यथा नही।

  • अनु. 266 के तहत भारत और राज्यों की संचित निधियों और लोक लेखे का उल्लेख किया गया है।

  • अनु. 267(1) के तहत संसद, भारत की आकस्मिकता निधि की स्थापना कर सकेगी।

  • अनु. 267(2) के तहत राज्य विधानमंडल, विधि द्वारा राज्य की आकस्मिकता निधि की स्थापना कर सकेगी।

  • अनु. 275 के तहत कुछ राज्यों कों संघ से अनुदान की व्यवस्था की गई है।

  • अनु. 280(1) के अनुसार, राष्ट्रपति, संविधान के प्रारंभ के दो वर्ष के भीतर और तत्पश्चात  प्रत्येक वर्ष की समाप्ति पर या पूर्वतर समय पर, जिसे राष्ट्रपति आवश्यक समझता है, आदेश द्वारा वित्त आयोग का गठन करेगा।

  • अनु. 281 के तहत राष्ट्रपति, वित्त आयोग द्वारा की गई प्रत्येक सिफारिश को ,संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।

  • केन्द्र-राज्य संबंधों पर विचार करने के लिए न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया की अध्यक्षता में जून, 1983 में एक आयोग का गठन किया गया था।

  • बी. शिवरामन तथा एस.आर.सेन इसके अन्य दो सदस्य थे।

  • इस आयोग ने जनवरी, 1988 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। केन्द्र-राज्य से संबंधित अन्य आयोगों मे राजमन्नार समिति तथा पुंछी आयोग हैं।

  • भारत में केन्द्र-राज्य संबंध- संवैधानिक प्रावधानों, परंपराओं और व्यवहारों, न्यायिक व्याख्याओं तथा बातचीत के लिए यंत्र विन्यास इन चारों पर निर्भर करता है।

  • संघीय राज व्यवस्था में संघ और राज्यों के  बीच संबध, राज्यों के मध्य आपस में संबंध, पारस्परिक समन्वय के लिए तंत्र और विवादों को सुलझाने के लिए तंत्र ये चारों ही सम्मिलित हैं।

  • संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत केन्द्र एवं राज्यों के मध्य विधायी शक्तियों के बंटवारें के लिए तीन सूचियों- संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची की व्यवस्था है, जिन्हें संविधान की 7वीं अनुसूची में वर्णित किया गया है।

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  • अनु. 268 के अनुसार, स्टाम्प शुल्क संघ  द्वारा लगाया जाता है। किंतु उसे राज्य सरकार द्वारा संगृहीत और विनियोजित किया जाता है।

  • नदी बोर्ड्स एक्ट 1956 मे लागू हुआ था।

  • झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद का गठन 8 अगस्त, 1995 को संथाल परगना और छोटानागपुर क्षेत्र के 18 जिलों को शामिल करते हुए किया गया था तथा शिबू सोरेन इस परिषद के अध्यक्ष नामिक किए गए थे।

  • 1956 के संसद के अधिनियम के माध्यम से पांच क्षेत्रीय परिषदों- उत्तर, दक्षिण, केन्द्रीय, पूर्वी और पश्चिमी का गठन किया गया। 1971 छठीं क्षेत्रीय परिषद (उत्तर-पूर्व) का गठन किया गया। गृह मंत्री प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद का अध्यक्ष होता है।

  • क्षेत्रीय परिषद एक सांविधिक (Statutory) निकाय है (न कि संवैधानिक संस्था), जिनका गठन राज्यों की बीच अंतर-राज्य सहयोग और समन्वय बढ़ाने के लिए राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था। इनकी संख्या 5 है। यथा – उत्तरी क्षेत्रीय परिषद, मध्य क्षेत्रीय परिषद, पूर्वी क्षेत्रीय परिषद, पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद तथा दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद। चंडीगढ़ राज्य ने होते हुए भी उत्तरी क्षेत्रीय परिषद मे शामिल है। इसके अतिरिक्त दिल्ली, दादरा एवं नगर हवेली, दमन व द्वीप  तथा पुडुचेरी संघ राज्य क्षेत्र होते हुए भी क्षेत्रीय परिषद में शामिल किए गए हैं । इन क्षेत्रीय परिषदों का कार्य विभिन्न क्षेत्रों में आपसी हित के मामलों पर चर्चा तथा सिफारिशें करना है। यह  एक परामर्शदात्री संस्था है।

  • भारतीय संघ मे केन्द्र की स्थिति और भूमिका शक्तिशाली है, इस संबंध में राज्यों पर केन्द्र का वर्चस्व है। यद्यपि वित्तीय विषयों का बंटवारा दोनो के मध्य  किया गया है किंतु वित्तीय स्त्रोतो का आवंटन केन्द्र के पक्ष में अधिक है। राज्यों के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन नही हैं। यही कारण है कि केन्द्र-राज्य संबंधें पर पुनर्विचार की मांगे बढ़ती जा रही हैं। इसलिए आलोचकों ने राज्यों की स्थिति की तुलना नगरपालिकाओं से की है।

  • सरकारिया आयोग ने रिपोर्ट में स्थायी रुप से अंतर-राज्यीय परिषद की स्थापना का समर्थन किया।

  • संविधान के अनु. 274 के अनुसार, कृषि आय कर या ऐसे कराधान जिनमें राज्य हितबध्द है, हेतु प्रावधान नियत किए गए हैं।

  • इन्द्रजीत गुप्ता समिति का गठन वर्ष 1998 में चुनाव सुधार एवं जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 में संशोधन के लिए सुझाव देने के लिए किया गया था। इस समिति का मुख्य उद्देश्य चुनाव कार्यों में राज्य की ओर से धन उपलब्ध कराए जाने की व्यवहार्यता का विशेष अध्ययन करना और उस पर  अपना निष्कर्ष देना था।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 270 में कृषि आय के अतिरिक्त अन्य आय पर लगने वाला कर केन्द्र सरकार द्वारा लगाया और वसूला जाता है, लेकिन इससे प्राप्त आय केन्द्र राज्यो के  बीच वितरित की जाती  है।

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आपात उपबंध

  • भारतीय संविधान के भाग 18 में आपात से संबंधित उपबंध निहित हैं।

  • ये आपातकालीन उपबंध को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी तरीके से निपटने में समक्ष बनाते हैं।

  • संविधान में तीन स्थितियो में आपातकाल की व्यवस्था की गई है –

  1. युध्द, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के कारण

  2. राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण

  3. वित्तीय आपात

  • आपातकाल के दौरान सभी राज्य केन्द्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं।

  • अनुच्छेद 352 के तहत भारत का राष्ट्रपति युध्द, बाह्य  आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति उत्तन्न होने पर राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है।

  • आपातकाल की उद्घोषणा का अनुमोदन संसद के दोनों सदनों द्वारा एक माह के भीतर होना आवश्यक है।

  • लोक सभा के विघटन की स्थिति में आपातकाल की उद्घोषणा, लोक सभा के पुनर्गठन के बाद पहली बैठक से 30 दिनों तक जारी रहेगी, यदी इस दौरान राज्य सभा द्वारा इसका अनुमोदन कर दिया गया हो।

  • संसद को दोनों सदनों से अनुमोदन के पश्चात आपातकाल 6 माह तक जारी रहेगा तथा प्रत्येक 6 माह मे संसद के अनुमोदन से इसे आगे भी जारी रखा जा सकता है।

  • राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद को राज्य सूची में वर्णित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

  • आपाताकाल के दौरान संसद द्वारा राज्य सूची के विषयों पर बनाए गए कानून आपातकाल की समाप्ति के बाद 6 माह तक प्रभावी रहते हैं।

  • आपातकाल के दौरान संसद सत्र न चल रहा हो, तो राष्ट्रपति, राज्य सूची के विषयों पर भी अध्यादेश जारी कर सकता है।

  • जब वित्तीय आपाताकाल की उद्घोषणा लागू हो तब राष्ट्रपति, केन्द्र तथा राज्यों के मध्य करो के संवैधानिक वितरण को संशोधित कर सकता है।

  • राष्ट्रीय आपाताकाल की उद्घोषणा के दौरान लोक सभा का कार्यकाल (5 वर्ष), संसद द्वारा विधि बनाकर एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। किंतु आपाताकाल की समाप्ति के बाद 6 माह से ज्यादा नही हो सकता।

  • संविधान के अनु. 358 तथा 359 राष्ट्रीय आपातकाल का मूल अधिकारों पर प्रभाव का उल्लेख करते हैं।

  • अनु. 358 के तहत जब राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा की जाती है, तो अनु. 19 द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता के 6 मूल  अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं। इसके लिए अलग से आदेश जारी करने की आवश्यकता नही होती।

  • अनु. 359 के तहत अन्य मूल अधिकारों (अनु. 20 एवं 21 को छोड़कर) के निलंबन से संबंधित प्रावधान है। यह राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वह मूल अधिकारों के निलंबन को लागू करे।

  • अनु. 352 के तहत आपातकाल अब तक तीन बार (1962, 1971 और 1975) घोषित किया गया है।

  • अनु. 356 के अनुसार, राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता का राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जा सकती है। इस व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति को राज्य सरकार की समस्त शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं।

  • राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को भंग कर देता है। इस दौरान संसद, राज्य के बजट प्रस्ताव को पारित करती है। इस प्रकार की उद्घोषणा जारी ह ने के बाद दो माह के भीतर इसका संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदन हो जाना चाहिए।

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  • यदि उद्घोषणा दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत हो, तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता है।

  • प्रत्येक 6 माह पर संसद की स्वीकृति से इसे अधिकतम तीन वर्ष की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है।

  • राष्ट्रपति शासन का प्रस्ताव सदन द्वारा सामान्य बहुमत से पारित किया जा सकता है।

  • जम्मू-कश्मीर राज्य में राज्यपाल शासन का प्रावधान है।

  • अनु. 360 के तहत वित्तीय आपात से संबंधित प्रावधान उल्लिखित हैं।

  • राष्ट्रपति यदि संतुष्ट हो कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि भारत या उसके किसी क्षेत्र की वित्तीय स्थिति खतरे में है तो वह वित्तीय आपात की घोषणा कर सकता है।इस उद्घोषणा, को घोषित तिथि के दो माह  के अंदर संसद के स्वीकृति मिलना अनिवार्य है।

  • संसद की सामान्य बहुमत से प्राप्त स्वीकृति के उपरांत वित्तीय आपात अनिश्चितता के लिए तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक इसे वापन न लिया  जाए।

  • वित्तीय आपात की अवधि में राज्य के सभी वित्तीय मामलों पर केन्द्र का नियंत्रण हो जाता है। हालांकि अभी तक वित्तीय आपातकाल लागू नही हुआ है।

  • के.एम. नाम्बियार के अनुसार, राष्ट्रपति का आपातकालीन अधिकार संविधान के साथ धोखा है।

  • मूल संविधान के अनु. 352 के आंतरिक अशांति के स्थान पर 44वें संविधान संशोधन (1978) से सशस्त्र विद्रोह प्रतिस्थापित किया गया है।

  • अनु. 355 संघ का यह कर्तव्य है कि बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे।

  • अनु. 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन का प्रावधान करता है।

  • किसी राज्य के राज्यपाल को राज्य में संवैधानिक विफलता दिखाई दे तो वह इसके तहत राष्ट्रपति के उस राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर सकता है।

  • भारतीय संविधान के अनु. 360 के तहत वित्तीय आपातकाल का प्रावधान किया गया है।

  • भारत में वित्तीय आपातकाल (अनु. 360 के तहत) अब तक लागू नही किया गया है।

  • संसद द्वारा संकटकाल की घोषणा का अनुमोदन 1 माह की अवधि के  भीतर होना आवश्यक है।

  • एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994 द्वारा उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि अनु. 356 से संबंधित उद्घोषणा का न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है तथा उद्घोषणा के साथ ही, राज्य विधानमंडल भंग नही किया जा सकती है, जब तक कि ऐसी उद्घोषणाओ का  संसद के दोनों सदनों द्वारा दो माह के अंदर अनुमोदन नही कर दिया जाता  है। इसमें यह  भी निर्धारित किया गया है  कि संवैधानिक तंभ की विफलता यथार्थ में होनी चाहिए न  कि कल्पित आधारों पर।

  • अनु. 352 के तहत लगाए गए राष्ट्रीय आपातकाल में लोक सभा की अवधि अनु. 83(2) के परंतुक के अनुसार, संसद विधि द्वारा, ऐसी अवधि के लिए बढ़ा सकेगी, जो एक बार में एक वर्ष से अधिक नही होगी तथा आपात उद्घोषणआ के प्रवर्तन में न रह जाने के पश्चात उसका विस्तार किसी भी दशा में छह माह की अवधि से अधिक नही होगा।

  • भारतीय संविधान के अनु. 356 के तहत राष्ट्रपति शासन सर्वप्रथम 1951 तत्कालीन पंजाब और पटियाला एवं ईस्ट पंजाब स्टेट यूनियन (PEPSU) राज्य मे लागू किया गया था।

  • संविधान के अनु. 172(1) के परंतुक के अनुसार आपात उद्घोषणा प्रवर्तन की अवस्था मे संसद विधि द्वारा, किसी राज्य विधानसभा की अवधि एक बार एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है कितु आपात उद्घोषणा के प्रवर्तन की स्थिति में न रह जाने पर किसी भी दशा में उसका विस्तार छः मास की अवधि से अधिक नही होगा।

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वित्त आयोग

  • संविधान का अनुच्छेद 280, राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पांच वर्ष के अंतराल पर या आवश्यकतानुसार उससे पहले एक वित्त आयोग के गठन का प्रावधान करता है।

  • यह केन्द्र सरकार के कुल कर संग्रह मे राज्य सरकार की हिस्सेदारी का फैसला करता है।

  • पहले वित्त आयोग का गठन के.सी. नियोगी की अध्यक्षता में 22 नवंबर, 1951 को किया गया था।

  • 14वें वित्त आयोग के अध्यक्ष श्री. वाई.वी. रेड्डी थे।

  • 14वें वित्त आयोग का कार्यकाल वर्ष 2015 से 2020 तक है।

  • 14वें वित्त आयोग ने केन्द्र के विभाज्य कर पूल मे राज्यों की हिस्सेदारी को वर्तमान के 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने की अनुशंसा की।

  • 15वें वित्त आयोग का गठन एन. के. सिंह की अध्यक्षता में किया गया है। इसकी सिफारिशें वर्ष 2020 से 2025 कार्यकाल के लिए लागू होंगी।

  • राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है।

  • संविधान के अनु. 280(1) के तहत वित्त आयोग राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने वाले एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों से मिलकर बनता है।

  • संविधान की सातवी अनुसूची मे केन्द्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों के बंटवारे के बारे मे दिया गया है। इसके अंतर्गत तीन सूचियां हैं – संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची। शेय़र बाजार तथा फ्यचर्स बाजार में लेन देन पर कर संघ सूची के अंतर्गत आता है। तथापि संविधान के अनु. 268 के तहत ऐसे कर केन्द्र द्वार लगाए जाते हैं, परंतु राज्यों द्वारा संगृहीत और विनियोजित किए जाते  हैं।

  • संविधान के अनु. 280(3) के अनुसार वित्त आयोग के कार्य हैं –

  1. केन्द्र व राज्यों में राजस्व बंटवारे के लिए मापदण्डों/सिध्दांतों की अनुशंसा करना।

  2. संघ द्वारा राज्यों के दिए जाने वाले सहायता अनुदानों के संबंध में सिध्दांत निश्चित करना।

  3. राज्यों के वित्त आयोगो द्वारा दी गई सिफारिशों के आधार पर पंचायतों के विकास के लिए राज्य की निधि मे वृध्दि के लिए आवश्यक उपाय सुझाना।

  4. कोई अन्य विषय जिसके बारे में राष्ट्रपति आयोग से सिफारिशे करेगा। भारत की संचित निधि से धन निकालने की अनुमति देना संसद का कार्य है। संघ सरकार तथा राज्य सरकारें बजट के प्रावधानों के अनुसार करों की उगाही कर रही हैं या नही इसका देख-रेख करना वित्त मंत्रालय का कार्य है।

  • भारतीय संविधान के अनु. 280(3) के तहत भारत का वित्त आयोग निम्नलिखित मामलों में सुझाव देता है –

  1. संघ और राज्यों के बीच संघीय करों की प्राप्तियों का वितरण

  2. अनु. 275 के तहत राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान, तथा

  3. अन्य कोई विषय जो  राष्ट्रपति आयोग को निर्दिष्ट करें।

  • अनु. 270 के तहत भारत में वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर केन्द्र एवं राज्यों के मध्य आय कर का एवं अनु. 272 के तहत केन्द्रीय उत्पाद शुल्क का विभाजन किया जाना था। ध्यातव्य है कि 80वां संशोधन  अधिनियम, 2000 की धारा 4 द्वारा अनु. 272 को विलोपित कर दिया गया है। साथ ही वित्त आयोग राज्यों को अनु. 275 के तहत सहायतार्थ अनुदान निर्धारण भी करता है। परंतु व्यापार कर राज्यों द्वारा लगाया एवं संगृहीत किया जाता है, जिसका विभाजन वित्त आयोग का कार्य नही है।

  • केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय विवादों के निपटारें में वित्त आयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह केन्द्र और राज्य के बीच वित्त के न्यायपूर्ण वितरण हेतु उपाय सुझाता है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243(1) के तहत यह प्रावधान है कि राज्यपाल, 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के लागू होने के एक वर्ष के अंदर तथा उसके बाद प्रत्येक पांच साल बाद एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा। इस प्रकार राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है। वही अनु. 280(3)(bb) के तहत संघीय वित्त आयोग, राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्यो की पंचायतों को संसाधन की उपलब्धता के लिए राज्य की संचित निधि में वृध्दि के लिए आवश्यक उपाय करेगा।

  • संघ एवं राज्यों के बीच करों के विभाजन संबंधी अनु. 268 से अनु. 279 तक के प्रावधानों को संविधान के राष्ट्रीय आपात की स्थिति में अनु. 354 (1) के तहत राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा निलंबित या उस आदेश में विनिर्दिष्ट उपांतरणों के अधीन प्रभावी किया जा सकता है।

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  • भारतीय संविधान में अनुच्छेद 280 के तहत प्रत्येक 5 वर्ष के बाद वित्त आयोग के गठन का प्रावधान है। 12वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं की संदर्भ अवधि वर्ष 2005 से वर्ष 2010 तक की थी। इसका अध्यक्ष रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ.सी. रंगराजन को बनाया गया था। वित्त आयोग में एक अध्यक्ष के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है। 13वें वित्त आयोग के अध्यक्ष विजय केलकर थे। 14वें वित्त आयोग का गठन डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता मे किया गया है। जिसने अपनी रिपोर्ट 15 दिसंबर, 2014 को सौंपी। 15वें वित्त आयोग के गठन की घोषणा 27 नवंबर, 2017 को की गई जिसके अध्यक्ष डॉ. एन. के. सिंह हैं।

  • राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है। इसका गठन राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 243झ के तहत किया  जाता है, जो प्रत्येक पांचवे वर्ष पंचायत की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करता है। अनु. 243(म) के तहत राज्य वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का  भी पुनर्विलोकन करता  है।

  • संविधान के अनु. 280(1) के तहत वित्त आयोग राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने वाले एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों से मिलकर बनता है।

योजना आयोग/नीति आयोग

  • योजना आयोग एक संविधानेत्तर संस्था थी। इसका संविधान में कोई उल्लेख नही है। इसे परामर्शदात्री संस्था भी कहते हैं।

  • योजना आयोग का गठन केन्द्रीय मंत्रिमंडल के एक संकल्प द्वारा 15 मार्च, 1950 को किया गया। प्रधानमंत्री इसका पदेन अध्यक्ष होता है।

  • योजना आयोग के प्रथम उपाध्यक्ष गुलजारी लाल नंदा थे। इसका मुख्य कार्य केन्द्र की पंचवर्षीय योजना का निर्माण करना था।

  • योजना आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर 1 जनवरी, 2015 को नया संस्थान नीति आयोग अस्तित्व में आया।

  • नीति (NITI) से आशयः National  Institution for Transforming India है।

  • वर्तमान में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार हैं, इनसे पहले इस पद पर अरविन्द पनगड़िया थे।

  • नीति आयोग के उपाध्यक्ष का दर्जा भारत सरकार के कैबिनेट मंत्री के समान है।

  • नीति आयोग सहकारी संघवाद के सिध्दांत पर आधारित है।

  • राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन 6 अगस्त, 1952 को हुआ था।

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  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को  लाल किले की प्राचीर से स्पष्ट उद्घोषित किया था कि योजना आयोग के स्थान पर नया संस्थान अस्तित्व में आएगा। आब योजना आयोग को समाप्त कर उसके स्थान पर 1 जनवरी, 2015 को नीति  आयोग (NITI: National Institution for transforming India  Aayog) स्थापित कर दिया गया है। वर्तमान में इसके उपाध्यक्ष राजीव कुमार हैं।

  • योजना आयोग के प्रथम अध्यक्ष तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु थे, क्योकि प्रधानमंत्री इसका पदेन अध्यक्ष होता है। योजना आयोग के स्थान पर स्थापित नवीनतम नीति आयोग के पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री ही हैं।

  • डॉ. मनमोहन सिंह 15 जनवरी, 1985 से 31 अगस्त, 1987 तक, प्रमब मुखर्जी 24 जून, 1991 से 15 मई, 1996 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे हैं।

  • राष्ट्रीय विकास परिषद के प्रमुख कार्य निम्नवत हैं –

  1. राष्ट्रीय योजना निर्माण हेतु दिशा-निर्देश प्रदान करना साथ ही साथ योजना के संसाधनों का मूल्यांकन करना।

  2. योजना आयोग द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय योजना पर विचार करना।

  3. राष्ठ्रीय विकास को प्रभावित करने वाले सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर विचार करना।

  4. समय-समय पर योजना के कार्यों की समीक्षा करना तथा राष्ठ्रीय योजना के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सलाह प्रदान करना।

  • योजना में धन आवंटन सुझाने का कार्य योजना आयोग द्वारा किया जाता है।

  • राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन अगस्त, 1952 में किया गया था। राष्ट्रीय विकास परिषद की रचना में निम्नलिखित सदस्य  होते हैं –

  1. प्रधानमंत्री (इसके अध्यक्ष या प्रमुख के रुप में)

  2. संभी संघीय मंत्रिमंडल के मंत्रिगण

  3. सभी राज्यों के मुख्यमंत्री

  4. सभी केन्द्रशासित राज्यों के मुख्यमंत्री/प्रशासक

  5. योजना आयोग के सदस्य।

  • पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन 6 अगस्त, 1952 को किया गया था। राष्ट्रीय विकास परिषद का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है तथा सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य हैं। योजना आयोग का सचिव इसका भी पदेन सचिव होता  है। योजना आयोग तथा राज्य सरकारों के बीच समन्वयकर्ता का कार्य राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा किया जाता है।

  • राष्ट्रीय विकास परिषद एक संविधानेत्तर संस्था है। यह संस्था योजना तैयार करने में राज्यों से सहयोग लेने एवं उनकी राय  जानने के लिए बनाई गई है। पंचवर्षीय योजनाओ को अंतिम स्वीकृति राष्ट्रीय विकास परिषद ही देती है।

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लोकपाल और महत्वपूर्ण आयोग

  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नागरिकों की शिकायतों के निवारण हेतु बनाई गई संस्था को ओमबुड्समैन के नाम से जाना जाता है। एक स्वतंत्र पर्यवेक्षी एजेंसी के रुप में इसकी स्थापना 1809 ई. में स्वीडन मे हुई थी।

  • भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत, जन शिकायतों के निवारणार्थ ओमबुड्समैन के समकक्ष, केन्द्रीय स्तर पर लोकपाल एवं राज्यों के स्तर पर लोकायुक्त की नियुक्ति का प्रावधान है।

  • 5 जनवरी, 1966 को मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित प्रशासनिक सुधार आयोग ने भारत में लोकपाल एवं लोकायुक्त की स्थापना का सुझाव दिया था।

  • ध्यातव्य है कि बाद में वर्ष 1967 मे के. हनुमन्तैया को इसका अध्यक्ष बनाया गया।

  • भारतीय संसद में लोकपाल विधेयक सर्वप्रथम वर्ष 1968 में चौथी लोक सभा मे प्रस्तुत किया गया था। परंतु यह विधेयक पारित नही हो सका।

  • भारत में महाराष्ट्र ऐसा पहला राज्य है, जहां लोकायुक्त कार्यालय की स्थापना (1971) हुई।

  • ध्यातव्य है कि ओड़िशा पहला ऐसा राज्य था जिसने लोकायुक्त से संबंधित विधेयक पारित किया था मगर वर्ष 1983 तक उस पर आगे कोई कार्यवाही नही हुई।

  • उत्तर प्रदेश लोक आयुक्त अधिनियम, 1975 के तहत लोकायुक्त अपना प्रतिवेदन राज्यपाल को सौंपता है, जो उसे विधानमंडल के दोनों सदनों में प्रस्तुत करवाता है।

  • वर्ष 1993 में गठित वोहरा समिति का संबंध राजनेताओं और अपराधियों के बीच गठजोड़ की जांच करने से था।

  • राजमन्नार आयोग ने भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा को समाप्त करने की सिफारिश की थी।

  • वर्ष 1993 में अनु. 123 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति ने मानवाधिकार संरक्षण अध्यादेश जारी किया था।

  • ध्यातव्य है कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 28 सितंबर 1993 को लागू हुआ था।

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक गैर-संवैधानिक निकाय है, इसका गठन 12 अक्टूबर, 1993 को किया गया। इसके अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिए गठित समिति में शामिल हें – प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, लोक सभा एवं राज्य सभा में विपक्ष के नेता, लोक सभा अध्यक्ष तथा राज्य सभा उपाध्यक्ष।

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की शक्ति मात्र सलाहकारी प्रकृति की होती है। इसमें एक महिला को सदस्य के रुप में नियुक्त करना अनिवार्य है।

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष अनिवार्यतः उच्चतम न्यायलय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए।

  • राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है।

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में वर्णित है कि केन्द्रीय सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है।

  • विंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में वर्ष 1979 में मंडल आयोग का गठन किया गया था। मंडल आयोग का प्रमुख कार्य था – सामाजिक और शैक्षिक रुप से पिछड़े लोगों की पहचान कराने के लिए  गठित किया गया था।

  • संविधान के अनु. 315 के द्वारा संघ के लिए एक लोक सेवा आयोग और प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग की व्यवस्था की गई है।

  • संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति का प्राधिकार संबंधित राज्य के राज्यपाल के पास सुरक्षित होता है।

  • संविधान के अनु. 323 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राज्यपाल को सौंपता है।

  • संविधान के अनु. 322 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग के व्यय भारत की संचित निधि पर, जबकि राज्य लोक सेवा आयोगों के व्यय संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं।

  • संसद मे पहला लोकपाल विधेयक वर्ष 1968 मे चौथी लोक सभा में प्रस्तुत किया गया था जहां यह 1969 में पारित भी हुआ, परंतु राज्य सभा मे लंबित रहने की स्थिति में ही चौथी लोक सभा के विघटित होने के कारण यह विधेयक समाप्त हो गया था।

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  • द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति मे कार्यपालिका, विधायिका एवं मुख्य न्यायाधीश की भागीदारी की अनुशंसा की गई है।

  • लोकसभा मे लोकपाल विधेयक 4 अगस्त, 2011 को संसदीय कार्य मंत्री वी. नारायणसामी द्वारा प्रस्तुत किया गया। तत्पश्चात इसे संसद की कार्मिक, लोक शिकायत तथा विधि एवं न्याय कर स्थायी समिति के पास भेजा गया। सिविल सोसायटी के सदस्यों द्वारा इसे कमजोर माना गया।

  • उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त की पदधारण अवधि वर्तमान में 8 वर्ष है। उत्तर प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1975 के तहत लोकायुक्त अथवा उप-लोकायुक्त की पदधारण अवधि, उसके पदधारण करने की तिथि से 6 वर्ष निर्धारित थी। लेकिन वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त (संशोधन) अधिनियम, 2012 के द्वारा इसकी पदधारण अवधि को 6 वर्ष से बढ़ाकर 8 वर्ष कर दिया गया।

  • वर्ष 2011 में 1 नवंबर को लोकायुक्त विधेयक पारित करने वाला प्रथम भारतीय राज्य उत्तराखंड है।

  • नागरिक समाज की ओर से लोकपाल बिल का मसविदा (आलेख) तैयार करने वाली समिति मे पांच सदस्य थे – अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, शांति भूषण, एन. संतोष हेगड़े एवं प्रशांत भूषण।

  • केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरों की स्थापना वर्ष 1963 में केन्द्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना वर्ष 1964 में हुई  थी। जबकि भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 में निर्मित हुआ था और प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी।

  • भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) को समाप्त करने की सिफारिश राजमन्नार आयोग ने की थी।

  • सभी प्रकार के सामाजिक विभेद (आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक) का उन्मूलन मानवाधिकार की दूसरी पीढ़ी के अंतर्गत आता है। जबकि पहली पीढ़ी में नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता का अधिकार तथा तीसरी पीढ़ी में एकजुटता का अधिकार तथा समूह में शामिल होने के अधिकारों आदि का उल्लेख है।

  • भारत में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 28 सितंबर, 1993 को लागू हुआ। इसका उद्देश्य मानव अधिकारों का बेहतर संरक्षण, राष्ठ्रीय मानव अधिकार सुरक्षा आयोग का गठन और राज्य में मानव अधिकार सुऱक्षा आयोग का गठन करना है।

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक समिति गठित की जाती है। जिसके सदस्य निम्नवत हैं –

  1. प्रधानमंत्री

  2. गृह मंत्री

  3. लोकसभा में विपक्ष के नेता

  4. राज्य सभा में विपक्ष के नेता

  5. लोक सभा अध्यक्ष

  6. राज्य सभा के उपाध्यक्ष

  • मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 6(1) के अनुसार, अध्यक्ष के रुप में नियुक्त किया गया व्यक्ति  अपने पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक अथवा 70 वर्ष की आयु (में से जो पहले हो) प्राप्त कर लेने तक अपना पद धारण करेगा। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 3 में राष्ठ्रीय मानवाधिकार  आयोग के गठन का प्रावधान है। इसके अनुसार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष वही व्यक्ति होगा, जो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश रह चुका हो।

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  • मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2 परिभाषाओं से संबंधित है। धारा 2(M) मे लोक सेवक को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार, आई.पी.सी. की धारा 21 में शामिल लोग सरकारी सेवक माने जाएंगे।

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार, केन्द्रीय सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है। उसकी पुनर्नियुक्ति नही हो सकती ।

  • जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अनुसार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का एक पूर्णकालिक अध्यक्ष होगा। केन्द्र सरकार द्वारा पर्यावरण से संबंधित मामलों मे विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव वाले व्यक्ति को अथवा पर्यावरण से संबंधित संस्थानों के प्रशासन के ज्ञान और अनुभव वाले व्यक्ति को अध्यक्ष नामित किया जाएगा।

  • 1976 मे कांग्रेस ने सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इसे तत्समय संविधान संशोधन समिति के नाम से जाना गया। 42वां संविधान संशोधन, 1976 इसी समिति की सिफारिशों का परिणाम है। इसने भारत के लिए राष्ट्रपतीय प्रणाली पर विचार करते हुए इसे अनुपयुक्त बताया था, तथापि इसने मुख्य रुप से जिस प्रश्न पर विचार किया, वह था – मूल अधिकारों की तुलना में निदेशक तत्वों की अग्रता।

  • वर्ष 1990 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अत्याचार का कारण है – भूमि निर्वसन, बंधुआ मजदूरी और ऋणग्रस्तता, जबकि धार्मिक कारण इसमें शामिल नही है।

  • भारतीय संविधान के अनु. 316(1) के अनुसार, संघ आयोग या संयुक्त आयोग (दो या दो से अधिक राज्यों के लिए) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।  जबकि राज्य लोक सेवा  आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 310 प्रसाद का सिध्दांत उल्लिखित करता है। इसके तहत प्रत्येक व्यक्ति, जो रक्षा सेवा या संघ की सिविल सेवा का कोई पद अथवा अखिल भारतीय सेवा का सदस्य राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और प्रत्येक व्यक्ति, जो किसी राज्य की सिविल सेवा का सदस्य है अथवा सिविल पद राज्य के प्रसादपर्यंत धारण करता है।

  • 1919 के भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत भारत में प्रथम लोक सेवा आयोग, 1926 ई. मे स्थापित किया गया। उस समय इसमें एक अध्यक्ष तथा चार सदस्य थे। 1935 के अधिनियम के द्वारा इसका नाम संघीय लोक सेवा आयोग रखा गया।

  • श्री मती रोज एम. बैथ्यू संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) की प्रथम महिला अध्यक्ष थी, जो वर्ष 1992 से 1996 के दौरान इस पद पर रही।

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अस्थायी विशेष प्रावधान

  • भारतीय संविधान के भाग-21 के तहत अनु. 369 से 392 तक अस्थायी, संक्रमणकालीन तथा विशेष उपबंधों का प्रावधान है।

  • अनुच्छेद 370 का संबंध जम्मू-कश्मीर राज्य के अस्थायी उपबंधों से है।

  • जम्मू-कश्मीर को छोड़कर, भारत मे एक ही संविधान के अंतर्गत केन्द्र एवं समस्त राज्यों की संपूर्ण व्यवस्था का संचालन किया जाता है।

  • ध्यातव्य है कि जम्मू-कश्मीर राज्य का अपना अलग संविधान है।

  • जम्मू-कश्मीर का संविधान 17 नवंबर, 1957 को अंगीकार किया गया तथा 26 जनवरी, 1957 को प्रभाव में आया।

  • संविधान के भाग-6 (राज्य के बारे में उपबंध) के अध्याय 1 के अनुच्छेद 152 में  राज्य को परिभाषित करते हुए, जम्मू-कश्मीर राज्य को इसमें शामिल नही किया गया है।

  • अनु. 371 के अंतर्गत महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्यों के संबंध में विशेष उपबंध हैं।

  • अनु. 371 क में नगालैंड राज्य के संबंध में विशेष उपबंध किया गया है।

  • अनु. 371 ख में असम, अनु. 371-ग में मणिपुर, अनु. 371-घ में आंध्र प्रदेश या तेलंगाना के संबंध में विशेष उपबंध, अनु. 371-च में सिक्किम, अनु. 371-छ में मिजोरम, अनु. 371-ज में अरुणाचल प्रदेश, अनु. 371-झ मे गोवा तथा अनु. 371-ञ में कर्नाटक राज्य के संबंध में विशेष उपबंध किया गया है।

  • भारत में एक ही संविधान प्रत्येक राज्य और केन्द्र के लिए है, परंतु जम्मू-कश्मीर राज्य इसका अपवाद है, क्योकि अनु. 370 के द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध मे कुछ विशेष  अस्थायी उपबंध किए गए हैं।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 एवं अनुच्छेद 370, जम्मू-कश्मीर राज्य में स्वयमेव लागू होते हैं। अनुच्छेद 1, जहां जम्मू-कश्मीर राज्य को भारतीय क्षेत्र का अभिन्न भू-भाग घोषित करता है, वहीं अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करता है।

  • जम्मू एवं कश्मीर की संविधान सभा ने महाराजा के आनुवांशिक शासन को समाप्त कर सर्वप्रथम कर्ण सिंह को 1951 में सदर-ए-रियासत के रुप में निर्वाचित किया। आगे चलकर जम्मू एवं कश्मीर संविधान मे  छठें संविधान संशोधन अधिनियम, 1965 द्वारा सदर- ए-रियासत नाम बदलकर राज्यपाल तथा वजीर-ए-आजम का नाम बदलकर मुख्यमंत्री कर दिया गया।

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चुनाव आयोग

  • संविधान के भाग 15 के तहत अनु. 324 से 329 तक निर्वाचन से संबंधित प्रावधान उल्लिखित हैं।

  • अनु. 324 के तहत एक निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई है। यह एक स्थायी एवं स्वतंत्र निकाय है।

  • यह आयोग, संसद, राज्य विधानमंडल,राष्ट्रपति व उपराष्ठ्रपति के पदों के निर्वाचन के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने, निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन तथा नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होता है।

  • अनु. 324(2) के अनुसार, निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्तों से (जितने समय-समय पर राष्ट्रपति नियत करे) मिलकर बनेगा।

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

  • 16 अक्टूबर, 1989 तक सर्वप्रथम निर्वाचन आयुक्त ही होता था। 16 अक्टूबर, 1989 को सर्वप्रथम निर्वाचन आयोग में दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई। परंतु 1 जनवरी, 1990 कत ही ये पद पर रहे। 1 अक्टूबर, 1993 को पुनः दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई और तब से यह आयोग तीन-सदस्यीय है।

  • राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की सलाह पर प्रादेशिक आयुक्तों की नियुक्त कर सकता है।

  • वर्तमान में निर्वाचन आयोग में तीन निर्वाचन आयुक्त हैं। इनके पास समान शक्तियां होती हैं तथा उनके वेतन, भत्ते व दूसरे अनुलाभ भी  समान ही होते हैं, जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समतुल्य होता है।

  • निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो) होता है।

  • अनु. 324(5) के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्ही आधारों पर ही हटाया जाएगा, जिससे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को  मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही पद से हटाया जाएगा।

  • चुनाव की अधिसूचना लोक सभा एवं राज्य सभा के लिए राष्ट्रपति तथा विधानसभा एवं विधान परिषद के लिए संबंधित राज्य का राज्यपाल जारी करता है।

  • अनु. 326 के तहत वयस्क मताधिकार का प्रावधान किया गया है। भारत में मत देने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार (Statutory Right) है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भारत में मताधिकार और निर्वाचित होने का अधिकार मिलता है।

  • 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा मताधिकार की आयु को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया, जो कि 28 मार्च, 1989 से प्रभावी है।

  • स्थानीय निकायों (पंचायतों एवं नगरपालिकाओं) का चुनाव राज्य निर्वाचन आयोगों द्वारा कराया जाता है।

  • परिसीमन आयोग का कार्य विगत जनगणना के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की सीमा निर्धारित करना होता है।

  • अब तक चार बार (1952, 1963, 1973 एवं 2002) परिसीमन आयोग का गठन किया गया है।

  • मुख्य चुनाव आयुक्त को उन्ही तरीकों से हटाया जा सकता है, जो अनु. 124(4) में उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीशों को हटाने के लिए वर्णित हैं। साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर हटाये जाने के लिए संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहूमत द्वारा समर्थिक समावेदन जो उसी सत्र में राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित कर दिया गया हो द्वारा ही हटाया जा सकता है। जबकि निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।

  • भारत का निर्वाचन आयोग भारत में राजनीतिक दलो को मान्यता प्रदान करता है। चुनाव चिन्ह् (आरक्षण व आवंटन) आदेश,1968 मे संशोधन के अनुसार, किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय स्तर, राज्य सत्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त करता है और उन्हें चुनाव चिन्ह भी आवंटित करता है।  भारतीय संविधान के अनु. 324 के तहत निर्वाचन का अधीक्षण, निदेशन और निंयंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित है।

  • सदन के पीठासीन अधिकारियों का निर्वाचन सदन के सदस्य करते हैं। निर्वाचन से उत्पन्न विवादों का निर्णयन न्यायपालिका करती है। नगरपालिकाओं एवं नगर निगमों के निर्वाचन राज्य निर्वाचन आयोग करवाता है।

  • राष्ट्रीय मतदाता दिवस (नेशनल वोटर्स डे) 25 जनवरी को मनाया जाता है। भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना के उपलक्ष्य में और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाताओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए यह दिवस 25 जनवरी, 2011 से शुरु किया गया था।

  • आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था, निर्वाचन क्रियाप्रणाली के रुप में अल्पसंख्यक समूहों को उनकी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करती है। इस प्रणाली से सभी वर्गों का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।

  • राज्य निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक प्राधिकरण है। संविधान (73 वां एवं 74वां संशोधन) अधिनियम, 1992 के तहत इसकी व्यवस्था की गई है, वहीं राज्यों में पंचायतों तथा शहरी निकायों के चुनावो में भारत के निर्वाचन आयोग की कोई भूमिका नही होती है।

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राजनीतिक दल

  • दलीय व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था का अंग है।

  • दलीय व्यवस्था द्वारा ही लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं मे सरकार का गठन और संचालन होता है।

  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 राजनीतिक दलों के पंजीकरण का प्रावधान करता है।

  • राजनीतिक दलों का पंजीकरण निर्वाचन आयोग करता है।

  • 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा राजनीतिक दलो को प्रथम बार वर्ष 1985 में संवैधानिक मान्यता मिली। यह अधिनियम 1 मार्च, 1985 से लागू है।

  • 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा भारतीय संविधान में दसवीं अनुसूची को जोड़कर दल-बदल को रोकने का प्रावधान किया गया। आंतरिक दलीय लोकतंत्र राजनीतिक दलो के आंतरिक चुनाव के लिए प्रयुक्त होता है, जो दल के पदाधिकारियों के चुनाव हेतु समय-समय पर होता है।

  • भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों को राष्ट्रयी, राज्य स्तरीय या क्षेत्रीय स्तर का दर्जा देने का अधिकार निर्वाचन आयोग को है।

  • वर्तमान में देश मे कुल सात (7) राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर का  दर्जा प्राप्त है।

  • जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस शामिल हैं।

  • भारत मे वयस्क मताधिकार के आधार पर मतदान होता है।

  • राजनीतिक दलों को अपने स्वयं के मानक स्थापित करने की स्वतंत्रता होती है।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में राष्ट्रीय शब्द ब्रिटिश शासन के विरुध्द प्रतिक्रिया से प्रभावित था।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्द्र बनर्जी थे।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 मे हुई थी।

  • भारतीय जनता पार्टी के प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे।

  • भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में हुआ था।

  • इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना बी.आर. अंबेडकर 1936 में किया था।

  • भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना 1920 मे तथा सी.पी.एम. की स्थापना 1964 में हुई थी।

  • किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल के रुप में निर्वाचन आयोग द्वारा तभी स्वीकृति प्रदान की जाती है, जबकि निम्नलिखित तीन शर्तों मे से कोई एक पूरी होती हो –

  1. उस राजनीतिक दल द्वारा खड़े किए गए प्रत्याशियों को किन्हीं चार या अधिक राज्यों में गत लोक सभा चुनावों या उन राज्यों के विधानसभा चुनावों में पड़े कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत और साथ ही कम से कम चार लोक सभा सीटे प्राप्त हों।

  2. उस दल को लोक सभा की कुल सदस्य संख्या की कम-से-कम 2 प्रतिशत सीटें प्राप्त तथा ये सदस्य कम से कम 3 राज्यों से चुने गए हों।

  3. वह दल कम-से-कम 4 राज्यो में राज्य स्तरीय दल की मान्यता प्राप्त हो।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में राष्टीय शब्द ब्रिटिश शासन के विरुध्द प्रतिक्रिया से प्रभावित था।

  • चुनाव चिन्ह (आरक्षण व आवंटन) आदेश, 1968 में संशोधन के अनुसार, किसी राजनीतिक दल को राज्य स्तरीय या क्षेत्रीय दल की मान्यता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि

  • उसे उस राज्य विशेष मे हुए गत विधानसभा आम चुनाव में न्यूनतम 6% वैध मत एवं राज्य की न्यूनतम 2 सीटें प्राप्त हो। या

  • गत लोक सभा आम चुनाव में न्यूनतम 6% वैध मत एवं राज्य की न्यूनतम 1 लोक सभा सीट प्राप्त हो। या

  • गत विधानसभा आम चुनाव में राज्य विधानसभा की न्यूनतम 3% सीटें (2.51% से अधिक को 3% मान लिया जाएग) अथवा न्यूनतम 3 सीटों मे से जो ज्यादा हो प्राप्त हो, या

  • गत लोक सभा आम चुनाव में प्रत्येक 25 सदस्यों के लिए कम-से –कम 1 सीट अथवा राज्य के लिए निर्धारित संख्या का कोई भाग,

  • गत लोक सभा अथवा विधानसभा आम चुनाव में न्यूनतम 8% वैध मत।

  • वर्ष 1999 मे कांग्रेस पार्टी से शरद पवार, पी.ए. संगमा तथा तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने के कारण अलग होकर, राष्टीयतावादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया।

  • संविधान के संशोधन के अनुसार, 18 वर्ष की आयु के सभी वयस्कों को मत देने का अधिकार प्राप्त है। धर्म, प्रजाति, लिंग आदि के आधार पर कोई विभेद नही है। प्रत्येक क्षेत्र के लिए केवल एक निर्वाचक सूची होगी। राजनीतिक दल अपने मानक स्वयं निर्धारित कर सकते हैं।

  • डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने समता सैनिक दल, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी एवं सिड्यूल्ड कॉस्ट फेडरेशन की स्थापना की थी। पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया की स्थापना महाराष्ट्र में 1947 मे की गई थी। यह एक मार्क्सवादी राजनीतिक पार्टी थी। जबकि वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी की स्थापना बंगाल में 1 नवंबर, 1925 को की गई। काजी नजरुल इस्लाम, हेमंत सरकार, कुतुबुद्दीन अहमद और शमुशुद्दीन हुसैन इसके संस्थापक सदस्य थे। इस पार्टी ने 1925 से 1929 के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंतर्गत कार्य किया।

  • कांग्रेस, भाजपा एवं सीपीआई राष्ट्रीय दल है, जबकि अकाली दल पंजाब राज्य में क्षेत्रीय राजनीतिक दल के रुप में मान्यता प्राप्त है। इस दल की स्थापना 14 दिसंबर, 1920 को हुई। वर्तमान अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल हैं।

  • तेलगूदेशम आंध्र प्रदेश में क्षेत्रीय राजनीतिक दल के रुप में मान्यता प्राप्त है। संस्थापक एनटी रामाराव व वर्तमान अध्यक्ष एन.  चंद्रबाबू नायडू हैं।

  • राजनैतिक दल गठन वर्ष

सी.पी.आई.                               1920

सी.पी.एम.                                1964

ए.आई.ए.डी.एम.के.                    1972

तेलगूदेशम                              1982

  • भारतीय साम्यवादी दल का विभाजन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (CPIM) में 30 अक्टूबर से 7 नवंबर, 1964 को कोलकाता में हुए सातवें पार्टी सम्मेलन में हुआ। सी.पी.आई.एम. साम्राज्यवाद के विरुध्द संघर्ष और विभक्त कम्युनिस्ट पार्टी की क्रांतिकारी विरासत की प्रतिनिधि हैं, जिसका गठन वर्ष 1920 में हुआ  था।

  • दलीय व्यवस्था,राजनीतिक व्यवस्था का अंग है। दलीय व्यवस्था द्वारा ही लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्थाओं मे सत्ता का गठन एवं सरकार का संचालन किया जाता है।

  • आदर्श आचार संहिता राजनैतिक दलो तथा उम्मीदवारों के मार्गदर्शन हेतु उन मानदंडों का एक दस्तावेज है, जो उनके आचरण और व्यवहार को नियंत्रित करता है। यह राजनीतिक दलों की सहमति से विकसित किया जाता है तथा उन पर  बाध्यकारी होता है। आदर्श आचार संहिता निर्वाचन आयोग द्वारा निर्मित किया जाता है। यह निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव की तिथियों की घोषणा संबंधी प्रेस  विज्ञप्ति जारी होने के समय से लागू होती है तथा चुनाव पूरे होने तक प्रभावी रहती है (भारत संघ बनाम हरबंस सिंह जलाल व अन्य SC)।

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  • दल-बदल निरोधक अधिनियम 15 फरवरी, 1985 को पारित किया गया। यह अधिनियम 1 मार्च, 1985 से लागू है। इसके द्वारा संविधान के अनुच्छेद 101, 102, 190 तथा 192 मे संशोधन करके तथा संविधान मे दसवीं अनूसूची को जोडकर दल-बदल को रोकने का प्रावधान किया गया।

  • भारतीय संविधान में 52वें संविधान संशोधन (1985) द्वारा दसवी अनुसूची के तहत दल-बदल के आधार पर निरर्हता संबंधी उपबंध किए गए हैं। इसमें किसी दल में एक साथ पूर्ण दल-बदल, एक साथ लघु दल-बदल एवं दल के प्राधिकृत व्यक्ति के निर्देश के विरुध्द मतदान करने संबंधी प्रावधान हैं। इसके तहत भारत में प्रथम बार राजनीतिक दलों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इस कानून के तहत किसी दल में विभिन्न चरणों में बड़े पैमाने पर दल-बदल की परिस्थिति का उल्लेख नही है।

  • वह पध्दति जिसमें सर्वाधिक प्राप्त मतो के आधार पर निर्वाचित माना जाता है अर्थात कुल वैध मतों के प्रतिशत मत का महत्व नही होता उसे फर्स्ट पास्ट-द-पोस्ट सिस्टम कहते हैं। भारत में राज्य विधानमंडलों एवं लोक सभा में ये  पध्दति प्रचलित है।

  • आंध्र प्रदेश में साम्यवादी दलो ने संयुक्त रुप से भृ-पोर्तम आंदोलन चलाया। साम्यवादी दलें का आरोप था कि कांग्रेस ने सरकार में आने से पहले गरीबों को भूमि तथा घर देने का अपना वादा नही निभाया। साम्यवादी दलों ने भूमि के लिए अपने इस संघर्ष को  भू-पोर्टल का नाम दिया।

  • 1963 में कामराज योजना, कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष के. कामराज द्वारा तैयार की गई थी। यह योजना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जीवन्त बनाने एवं राष्ट्रीय विकास के योगदान में वृध्दि हेतु तैयार की गई।

  • समाजवादी पार्टी को राष्ट्रीय दल के रुप में मान्यता नही प्राप्त है। यह राज्य स्तरीय पार्टी है। इस दल की स्थापना मुलायम सिंह यादव ने की है। वर्तमान में अखिलेश सिह यादव इस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

  • लोकसभा अध्यक्ष द्वारा विपक्ष के नेता की मान्यता हेतु लोकसभा की सदस्य संख्या 545 का न्यूनतम 10% अर्थात 54.5 या 55 सदस्य संबंधित पार्टी या गठबंधन का होना चाहिए।

  • रजनी कोठारी ने स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों की भारत दलीय व्यवस्था को एकदलीय प्रभुत्ववाली व्यवस्था के रुप में वर्ण किया है। रजनी कोठारी प्रसिध्द शिक्षाविद, लेखक और राजनीतिक सिध्दांतकार थे। इन्होंने सी.एस.डी.एस. (विकासशील समाज अध्ययन पीठ) और लोकायन संस्था की स्थापना की थी।

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संविधान संशोधन

  • कोई भी संविधान कितना भी सोच समझकर क्यों न बनाया जाए, उसमें समय, काल एवं परिस्थितियों के अनुसार संशोधन करना ही पड़ता है।

  • भारतीय संविधान नम्यता एवं अनम्यता का मिश्रण है, इसमें संशोधन का प्रावधान किया गया है।

  • भारतीय संविधान के भाग 20 के अंतर्गत अनुच्छेद 368 मे संसद को संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान की गई है।

  • भारतीय संविधान में तीन प्रकार से संशोधन किया जा सकता है –

  1. साधारण बहुमत द्वारा

  2. विशेष बहुमत द्वारा

  3. विशेष बहुमत तथा राज्यों के अनुमोदन से

  • संविधान में संशोधन के लिए विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।

  • संविधान संशोधन विधेयक भारतीय संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है।

  • राष्ट्रपति का निर्वाचन, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्ययालय के अधिकार, संविधान संशोधन की संसद की शक्ति आदि ऐसे विषय हैं, जिन पर संवैधानिक संशोधन के लिए संसद के विशेष बहुमत कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडल द्वारा संपुष्टि आवश्यक है।

  • संविधान के अनेक उपबंधों में ससंद, दोनों सदनों के साधारण बहुमत से संशोधन कर सकती है।

  • इनमें नए राज्यों का प्रवेश या गठन, नए राज्यों का निर्माण और उसके क्षेत्र, सीमाओं या संबंधित राज्यो के नाम से परिवर्तन आदि शामिल हैं।

  • ये व्यवस्थाएं अनु. 368 की सीमा से बाहर हैं।

  • भारतीय संविधान के प्रथम संशोधन, 1951 द्वारा संविधान में दो नए अनुच्छेद 31(क) और 31(ख) तथा 9वीं अनुसूची को जोड़ गया। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम को लघु संविधान कहा जाता है।

  • संविधान के 52वें संशोधन अधिनियम द्वारा किसी दल के निर्वाचित सदस्यों के दल-बदल पर रोक लगाई गई।

  • 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा मतदाता की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई।

  • 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा अनुच्छेद 21 क में 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चो के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार उपबंधित किया गया है।

  • 91वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा मंत्रिपरिषद के आकार को केन्द्र में प्रधानमंत्री एवं राज्यों मे मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा अथवा विधानसभा की सदस्य संख्या के अधिकतम 15 प्रतिशत तक निर्धारित किया गया है।

  • 69वें संशोधन अधिनियम, 1991 द्वारा दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी का दर्जा दिया गया।

  • 97वें संशोधन अधिनियम द्वारा सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है।

  • 100वां संविधान संशोधन अधिनियम, भारत-बांग्लादेश सीमा,समझौते से संबंधित है।

  • 101वां संविधान संशोधन अधिनियम, जी.एस.टी. से संबंधित है।

  • आधारभूत संरचना के सिध्दांत का अर्थ है कि संविधान में कुछ लक्षण ऐसे अनिवार्य हैं, जिन्हें संशोधन द्वारा परिवर्तित नही किया जा सकता।

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  • आधारभूत संरचना के सिध्दांत का प्रतिपादन केशवानन्द भारतीय के वाद में किया गया।

  • 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) में निदेशक तत्वों की प्राथमिकता एवं सर्वोच्चता को मूल अधिकारों पर प्रभावी बनाया गया। उन अधिकारों पर, जिनका उल्लेख अनु. 14, 19 एव 31 में है। हालांकि इस विस्तार को उच्चतम न्यायालय द्वारा मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में असंवैधानिक एवं अवैध घोषित कर दिया गया। लेकिन अनु. 14 एव  19  द्वारा स्थापित मूल अधिकारों को 39(ख) और (ग) में बताए गए निदेशक तत्व के अधीनस्थ माना गया। अनुच्छेद 31 (संपत्ति का अधिकार) को 44वें संशोधन अधिनियम (1978) द्वारा समाप्त कर दिया गया।

  • 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा अनुच्छेद 74 में उपबंध किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से अपनी मंत्रणा पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकेगा और ऐसे पुनर्विचार के पश्चात दी गई मंत्रणा पर उसे सहमति देनी होगी।

  • भारत के संविधान में संशोधन की प्रक्रिया को संसद के किसी भी एक सदन में आरंभ किया जा सकता है। इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 368(2) मे किया गया किंतु संशोधन की प्रक्रिया के लिए दोनों सदनों के सदस्यों के  बहुमत की आवश्यकता होती है। मतदान की दशा में प्रत्येक सदन में उपस्थित सदस्यों की संख्या के दो-तिहाई द्वारा संशोधन प्रस्ताव की स्वीकृति अनिवार्य  होती है।भारत के संविधान मे संशोधन की प्रक्रिया को दक्षिण अफ्रीका के संविधान से लिया गया है।

  • अनु. 368(2) के तहत संविधान के संशोधन हेतु विधेयक संसद के दोनों सदनों में से किसी एक (लोक सभा या राज्य सभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है।

  • भारतीय संविधान में कोई संशोधन लाने का उपक्रमण लोक सभा द्वारा या राज्य सभा द्वारा किया जा सकता है। अर्थात संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।

  • भारतीय संविधान नम्य एवं परिर्वतनशील है। इसमें आवश्यकतानुसार संविधान के अनुच्छेद 368 में दी गई प्रक्रिया के अनुसार संशोधन किया जा सकता है।

  • भारतीय संविधान में तीन प्रकार से संशोधन किया जा सकता है –

  1. साधारण बहुमत द्वारासंविधान में कुछ ऐसे अनुच्छेद हैं, जिन्हें संसद साधारण बहुमत से संशोधित कर सकती है। इस प्रकार के संशोधन को संविधान संशोधन नही माना जाता। यथा – राज्यों के नामों तथा सीमाओं में परिवर्तन करने अथवा नए राज्यों का निर्माण करने, राज्यों में विधान परिषदों को गठित करने या समाप्त करने, राष्ट्रपति, राज्यपालों, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतनों मे वृध्दि या कमी करने वाले संशोधन साधारण बहुमत से किए जाते हैं।

  2. विशेष बहुमत द्वार – संसद के विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्य, संख्या के 50 प्रतिशत तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई से कम न हो) द्वारा किए जाने वाले संवैधानिक परिवर्तन को संविधान संशोधन कहा जाता है।

  3. विशेष बहुमत तथा राज्यों के अनुमोदन से – संविधान मे कुछ अनुच्छेद ऐसे हैं, जिसमें संशोधन करने के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ आधे से अधिक राज्यो की विधानसभाओं का अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है। यथा – राष्ट्रपति के निर्वाचन के प्रक्रिया, संघ तथा राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय का गठन तथा क्षेत्राधिकार, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, संविधान संशोधन प्रक्रिया, सातवीं सूची में वर्णित सूचियों की प्रविष्टि।

  • संविधान संशोधन विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा अलग-अलग विशेष बहुमत से स्वीकृत किया जाना आवश्यक है। दोनो सदनों में असहमति की स्थिति में विधेयक अंतिम रुप से समाप्त हो जाएगा। क्योंकि संविधान संशोधन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए संसद के दोनों सदनों की संयुक्त  बैठक की संविधान में कोई व्यवस्था नही है।

  • भारतीय संविधान के लिए प्रथम संशोधन विधेयक, 1951 द्वारा अनुच्छेद 15, 19, 85, 87, 174, 176, 341, 342, 372, 376 में संशोधन किया गया तथा दो नए अनुच्छेद 31(क) एवं 31(ख) नवीं अनुसूची को संविधान में जोड़ा गया।

  • 69वां संविधान संशोधन – दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी का दर्जा

  • 75वां संविधान संशोधन – राज्य स्तरीय किराया अधिकरणों की स्थापना

  • 80वां संविधान संशोधन – दसवें वित्त आयोग कि सिफारिशों को स्वीकारना

  • 83वां संविधान संशोधन – अरुणाचल प्रदेश में पंचायतों में अनु. जातियों हेतु कोई आरक्षण नही है, क्योंकि वहां इनकी प्रभावकारी संख्या नही है। यहां का समाज आदिवासी समाज है।

  • न्यायिक पुनरीक्षण शक्ति का परिसीमन                                               – 38वां संविधान संशोधन (1975)

  • संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाया जाना –                                    44वां संविधान संशोधन (1978)

  • मताधिकार की आयु 21 से 18 वर्ष घटाया जाना      – 61वां संविधान संशोधन (1988)

  • उद्देशिका में पंथ निरपेक्ष शब्द का जोडा जाना         –                                    42वां संविधान संशोधन (1976)

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संवैधानिक संशोधन का प्रावधान

संवैधानिक संशोधन का क्रमांक

अनुच्छेद 19(1) (ग) के अंतर्गत सहकारी समितियां बनाने का अधिकार

97वां संशोधन, 2012 (2011)

रिक्तियों के बैकलॉग को भरने में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का संरक्षण

81वां संशोधन, 2000

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का निर्माण

99वां संशोधन, 2015 (2014)

मंत्रिपरिषद के आकार को परिमित करना

91वां संशोधन, 2004 (2003)

 

  • संविधान का 98वां संशोधन विधेयक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण के संबंध में प्रक्रिया हेतु प्रस्तुत किया गया था। यह संशोधन राजग सरकार के कार्यकाल में (तत्कालीन विधि एवं कानून मंत्री अरुण जेटली द्वारा) प्रस्तुत हुआ।

  • संविधान के पैंतीसवें संशोधन, 1975 के द्वारा सिक्किम को भारतीय संघ में सह-राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। छत्तीसवें संविधान संशोधन, 1975 द्वारा सिक्किम को भारतीय संघ में 22वें राज्य के रुप में प्रवेश दिया गया।

  • 53वां संविधान संशोधन, 1986 द्वारा अनुच्छेद 371 में खंड जी जोडकर मिजोरम को  भारतीय संघ में राज्य का दर्जा प्रदान किया गया। 20 फरवरी, 1987 को मिजोरम भारतीय संघ का 23वां राज्य बना।

  • 13वां संशोधन – नगालैंड

  • 18वां संशोधन – राज्य को पुनर्परिभाषित किया गया।

  • 39वां संशोधन – राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति स्पीकर और प्रधानमंत्री के चुनाव को चुनौती नही दी जा सकती

  • 52वां संविधान संशोधन – दल-बदल अधिनियम

  • वर्ष 2003 तक मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या के संबंध में संविधान में कोई उल्लेख नही था। यह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के विवेक पर निर्भर था। किंतु वर्ष 2003 में पारित 91वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 75, अनु. 164 और दसवीं अनुसूची में संशोधन करके केन्द्र में प्रधानमंत्री एवं राज्यों में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा अथवा विधानसभा की सदस्य संख्या के अधिकतम 15% तक निर्धारित की गई है।

  • सर्वप्रथम गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य मामले (1967) मे सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की संविधान संशोधन शक्ति पर सीमाएं आरोपित की थी।

  • भारतीय संविधान की आधारभूत संरचना के सिध्दांत का तात्पर्य है कि संविधान के कुछ लक्षण ऐसे अनिवार्य हैं, जिन्हें समाप्त नही किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने सर्वप्रथम केशवानंद भारतीय बनाम केरल राज्य 1973 के अपने फैसले मे यह स्पष्ट कर दिया कि संविधान के कुछ आधारित लक्षण हैं, जिनका किसी भी स्थिति में संशोधन नही किया जा सकता है।

  • 79वें संविधान संशोधन (1999) द्वारा लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा एंग्लो इंडियंस के लिए आरक्षण की अवधि को दस वर्षों के लिए बढ़ाया गया था जिसे 87वें संविधान संशोधन (2003) द्वारा पुनः दस वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया है।

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राजभाषा

  • भारतीय संविधान के भाग 17 के अंतर्गत अनुच्छेद 343-351 में राजभाषा के बारे में उल्लेख है।

  • अनुच्छेद 343 के तहत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी तथा संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रुप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रुप होगा।

  • अनुच्छेद 344 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह राजभाषा के संबंध में आयोग गठित कर सकता है।

  • प्रथम राजकीय भाषा आयोग का गठन 1955 में, बी.जी. खेर की अध्यक्षता में हुआ था। अनु. 344(4) के तहत राजभाषा पर 30 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के गठन का प्रावधान है। इस समिति में लोक सभा से 20 सदस्य तथा राज्य सभा से 10 सदस्य शामिल होंगे।

  • भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को आठवीं अनूसूची के अंतर्गत शामलि किया जाता है।

  • संविधान के प्रारंभ में 14 भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था।

  • 21वें संविधान संशोधन अधिनियम 1967 द्वारा सिंधी भाषा को तथा 71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया।

  • 92वें संविधान संशोधन द्वारा वर्ष 2003 में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को भी इसमें जोड़ा गया।

  • इस प्रकार वर्तमान में आठवीं अनुसूची में कुल 22 भाषाएं शामिल हैं। इसमें राज्य विधानमंडल, उस राज्य में प्रयोग होने वाली भाषाओं में से किसी एक का राजभाषा के रुप में प्रयोग कर सकेगा।

  • अनुच्छेद 346 के तहत एक राज्य दूसरे राज्य के बीच या किसी राज्य और संघ के बीच पत्रादि की राजभाषा का उल्लेख है।

  • अनुच्छेद 347 के अनुसार, किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली  जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध का प्रावधान है।

  • 14 सितंबर, 1949 को हिंदी संवैधानिक रुप से राजभाषा घोषित की गई।

  • 14 सितंबर, को हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है।

  • अनुच्छेद 348(1)(क) के तहत प्रावधान किया गया है कि, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी।

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  • अनु. 350(क) के तहत प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा मे शिक्षा की सुविधा का प्रावधान उल्लिखित है।

  • भाषा शास्त्रीय दृष्टि से द्रविड़ परिवार की भाषा ब्राहुई है, जो बलूचिस्तान की भाषा है।

  • संविधान के अनुच्छेद 350 (क) में यह प्रावधान है कि प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी भाषायी अल्पसंख्यक वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा और राष्ट्रपति किसी राज्य को ऐसे निर्देश दे सकेगा, जो वह ऐसी सुविधाओं का उपबंध सुनिश्चित कराने के लिए आवश्यक या उचित समझता है।

  • 7 जून, 1955 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने बी.जी.खेर की अध्यक्षता में प्रथम राजकीय भाषा आयोग का गठन किया, जिसने 1956 में अपना प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंप दिया। 1957 में एक संसदीय समिति द्वारा इस रिपोर्ट का परीक्षण किया गया,  जिसके अध्यक्ष पं. गोविन्द  बल्लभ पंत ते।

  • अभी तक 22 भाषाओं को संविधान में अनुच्छेद 344 के तहत मान्यता प्राप्त है, यथा –

  1. असमिया

  2. बंगला

  3. गुजराती

  4. हिंदी

  5. कन्नड़

  6. कश्मीरी

  7. कोंकणी

  8. मणिपुरी

  9. मलयालम

  10. मराठी

  11. नेपाली

  12. ओड़िया

  13. पंजाबी

  14. संस्कृत

  15. सिंधी

  16. तमिल

  17. तेलुगू

  18. उर्दू

  19. बोडो

  20. डोगरी

  21. संथाली

  22. मैथिली

  • उत्तराखंड राज्य ने जनवरी, 2010 में संस्कृत भाषा को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्रदान किया था। इसके कुछ दिनों बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने उत्तराखंड के ऋषिकेश को संस्कृत नगरी भी घोषित किया था।

  • वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार, सर्वाधिक लोगो द्वारा (भारत) में बंगाली बोली जाती है। वर्तमान में वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 22 अनुसूचित भाषाओं में सर्वाधिक लोगों द्वारा हिंदी, दूसरे क्रम पर बंगाली तथा तीसरे क्रम पर मराठी भाषा बोली  जाती है।

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स्थानीय स्वशासन

  • पंचायती राज लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य जनभागीदारी को बढ़ाकर विकास को निचले स्तर तक ले जाना है।

  • संविधान के भाग 9 के अंतर्गत अनु. 243 से 243 ण के तहत पंचायत से संबंधित प्रावधान उल्लिखित हैं।

  • 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान के भाग 9 में 16 नए अनुच्छेद तथा ग्यारहवीं अनुसूची में जोड़ी गई।

  • ग्यारहवीं अनुसूची में कुल 29 विषयें का उल्लेख किया गया है, जिन पर पंचायतों को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई है।

  • पंचायती राज राज्य सूची का विषय है।

  • पंचायतों की संरचना से संबंधित प्रावधान राज्य का विधानमंडल तैयार करता है। पंचायत का चुनाव कराने के लिए निर्णय राज्य सरकार द्वारा लिया जाता है।

  • प्रत्येक पांच वर्ष पर पंचायत चुनाव होता है।

  • पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करने के लिए वित्त आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है।

  • ग्राम स्तर के पंचायत क्षेत्र के निर्वाचक नामावली में पंजीकृत लोगो से  मिलकर ग्राम सभा का गठन  होता है।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश देता है।

  • बलवंत राय मेहता समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली का सुझाव दिया था – ग्राम स्तर, ब्लॉक स्तर तथा जिला स्तर।

  • पंचायती राज व्यवस्था का शिल्पी (वास्तुकार) बलवंत राय मेहता को कहा जाता है।

  • पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन पं. जवाहरलाल नेहरु ने 2 अक्टूबर, 1959 को नागौर (राजस्थान) में किया था।

  • 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ था।

  • पंचायती राज को संवैधानिक स्थिति प्रदान करने की प्रथम स्पष्ट संस्तुति 1986 में लक्ष्मी मल सिंघवी समिति ने दी थी।

  • 1988 में पी.के. थुंगन समिति ने भी पंचायती राज संस्थाओं को संविधान में सम्मिलित करने की संस्तुति प्रदान की थी।  पूर्व में 1977 में गठित अशोक मेहता समिति ने यह सहमति व्यक्ति की थी कि पंचायती राज के कुछ  प्रावधान भारतीय संविधान मे शामिल किए जाने की योग्यता रखते हैं अतः भारत सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। इस सहमति को स्पष्ट अनुशंसा नही माना गया  है। अतः लक्ष्मीमल सिंघवी एवं पी.के. थुंगन की अनुशंसाओं को ही स्पष्ट संस्तुति माना जाता है।

  • 73वें संविधान संशोधन का अभिपालन करने वाला प्रथम राज्य मध्य प्रदेश है।

  • अनुच्छेद 243घ (3) के अनुसार, पंचायतों में सभी स्तरों पर महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण प्रदान किया गया है।

  • तृण मूल लोकतंत्र (Grass Root Democracy) अर्थात जमीनी स्तर पर लोकतंत्र का संबंध लोकतंत्र के विकेन्द्रीकरण से है।

  • किसी व्यक्ति के लिए पंचायत सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।

  • शहरी स्थानीय स्वशासन प्रणाली को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।

  • इस अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग, 9(क), 18 नए अनुच्छेद तथा 12वीं अनुसूची को शामिल किया गया।

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  • शहरी स्थानीय शासन 8 प्रकार के हैं, जिनमें –

  1. नगरपालिका परिषद

  2. नगरपालिका

  3. अधिसूचित क्षेत्र समिति

  4. शहरी क्षेत्र समिति

  5. छावनी बोर्ड

  6. शहरी क्षेत्र समिति

  7. पत्तन न्यास

  8. विशेष उद्देश्य के लिए गठित एजेंसी शामिल हैं।

  • 74वें संशोधन अधिनियम के द्वारा तीन प्रकार की नगरपालिकाओं का प्रावधान है, जिनमें –

  1. नगर निगम

  2. नगरपालिका परिषद

  3. नगर पंचायतें शामिल हैं।

  • नगरपालिका के सभी सदस्य प्रत्यक्ष रुप से उस क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं।

  • नगरपालिकाओं की कार्यकाल अवधि 5 वर्ष निर्धारित है।

  • हालांकि इसे समय से पूर्व भी समाप्त किया जा सकता है।

  • नगरपालिकाओं के चुनाव का निर्देशन, नियंत्रण और प्रबंधन राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकार मे होता है।

  • राज्य विधानमंडल नगरपालिकाओं से संबंधित मामलों पर उपबंध बना सकता है।

  • अनु. 243(झ) के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का भी पुनर्विलोकन करेगा।

  • अनु. 243 य घ (1) के अनुसार, प्रत्येक राज्य में जिला स्तर पर, जिले में पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं का समेकन करने और संपूर्ण जिले के  लिए एक विकास योजना प्रारुप तैयार करने के लिए, एक जिला योजना समिति का गठन किया जाएगा।

  • अनु. 243 य ङ के अनुसार, प्रत्येक महानगर क्षेत्र में, संपूर्ण महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना प्रारुप तैयार करने के लिए, एक महानगर योजना समिति का गठन किया जाएगा।

  • भारत में सर्वप्रथम नगर निगम वर्ष 1687-88 में मद्रास में स्थापित हुआ था।

  • लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का पिता कहा जाता है।

  • संविधान के अनुच्छेद 243 ग (1) के अनुसार, राज्य का विधानमंडल पंचायतों की संरचना के बाबत उपबंध करने को अधिकृत है।

  • ग्राम पंचायत ग्रामीण स्तर पर स्थानीय स्वशासन की सबसे छोटी इकाई होती है। प्रत्येक ग्राम पंचायत क्षेत्र को कम-से-कम 10 और अधिक से अधिक 20 वार्डों में बांटा जाता है और प्रत्येक वार्ड से एक पंच चुना जाता है। प्रत्येक ग्राम पंचायत में निर्वाचित पंच और एक सरपंच होता है, जो कि ग्राम का मुखिया होता है।

  • पंचायतों की 7वीं अनुसूची में राज्य सूची की प्रविष्टि 5 का विषय माना गया है। इस प्रकार पंचायत राज्य सरकार का विषय है। इसके गठन तथा चुनाव कराने का अधिकार राज्यों को ही है।

  • 73वें संविधान संशोधन, 1992 के द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है। इसमें अनुच्छेद 243-घ के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की  महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। साथ ही प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन से  भरे जाने वाले कुल स्थानों मे से 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। इस आरक्षण से स्थानीय स्वशासन के स्तर पर महिलाओ में काफी जागरुकता आई है। भारत में ग्रामीण स्वशासन संस्थाओं में महिला आरक्षण की मांग, महिलाओं  द्वारा किसी आंदोलन से नही हुई।

  • पंचायती राज स्थानीय स्तर पर स्वशासन की एक व्यवस्था है। बलवंत राय मेहता ने इसे लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था कहा है। यह एक प्रकार से त्रि-स्तरीय जैविकीय संबंधों की अभिशासन संरचना है।

  • पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 के अंतर्गत समाविष्ट क्षेत्रों में ग्राम सभा को लघु वन उपजों पर स्वामित्व प्रदान करने के साथ-साथ अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति होती है। अनुसूचित क्षेत्रों में लघु खनिजों के लिए खनन का पट्टा अथवा लाइसेंस प्रदान करने के लिए ग्राम सभा की अनुमति आवश्यक होती है, परन्तु अन्य खनिजों के खनन के संदर्भ में ग्राम सभा की अनुशंसा आवश्यक नही है।

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  • छत्तीसगढ़ पंचायत अधिनियम के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में जिला पंचायत की निम्न शक्तियां दी गई हैं –

  1. लघु जलाशयों की योजना बनाना

  2. समस्त सामाजिक सेक्टरों पर नियंत्रण रखना

  3. जनजातीय उपयोजनाओं पर नियंत्रण रखना

  4. राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त कार्य करना।

  • छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम, 1993 में वर्ष 2004 मे किए गए संशोधन के अनुसार, ग्राम सभा की बैठक में 1/10 गणपूर्ति तथा 1/3 महिलाओं की उपस्थिति आवश्यक है। छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम, 1993 में वर्ष 1994 में किए गए संशोधन के अनुसार, गणपूर्ति के लिए पंच एवं सरपंच उत्तरदायी हैं और यदि ग्राम सभा की लगातार पांच बैठकों में गणपुर्ति न हो, तो सरपंच को पदच्युत किया जा सकता है।

  • अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम के सम्मिलन की अध्यक्षता उपस्थित अनुसूचित जनजाति सदस्य, जो कि ग्राम सभा द्वारा चुना जाए, द्वारा किया जाता है। पेसा (PESA) नियमो के अनुसार, यह सदस्य एक वर्ष के लिए आम सहमति से अध्यक्ष चुना जाता है। उपस्थित सदस्यों मे यदि आम सहमति नही बन पाती है, तो अनुसूचित की सबसे उम्र दराज महिला सदस्य को अध्यक्ष बनाया  जाता  है।

  • पंचायती राज का प्रधान लक्ष्य ग्रामवासियों मे शक्ति का विकेन्द्रीकरण है, जिससे वे अपनी आवश्यकताओं के अनुरुप नीतियां बना सकें एवं लागू कर सकें।

  • पंचायती राज को सफलतापूर्वक कार्य करने के लिए स्थानीय जनता के पूर्ण सहयोग की आवश्यकता होती है। बिना जन भागीदारी के पंचायती राज का स्वप्न साकार नही हो सकता है।

  • भारत में पंचायती राज की स्थापना ग्रामीण जनता के सर्वांगीण विकास के लिए की गई है। यह शक्तियों के विकेन्द्रीकरण, लोगो की भागीदारी एवं सामुदायिक विकास इन तीनों का प्रतिनिधित्व करता  है।

  • 1952 मे प्रारंभ सामुदायिक विकास कार्यक्रम (CDP) और 1953 में प्रारंभ राष्ट्रीय विस्तार योजना (NES) के पुनर्गठन के लिए राष्ठ्रीय विकास परिषद द्वारा बलवंत राय मेहता समिति का गठन 1957 मे किया गया था। इस समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में त्रि-स्तरीय पंचायत प्रणाली की अनुशंसा की थी।

  • अशोक मेहता समिति ने न्याय पंचायतों के गठन की सिफारिश की थी। वर्ष 1977 मे पंचायती राज व्यवस्था पर सुझाव देने के लिए गठित अशोक मेहता समिति ने वर्ष 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें पंचायती राज के लिए त्रि-स्तरीय प्रणाली के स्थान पर द्वि-स्तरीय प्रणाली को संस्तुत किया।

  • समितियां सुझाव

बलवंत राय मेहता                    त्रि-स्तरीय पध्दति

अशोक मेहता                           द्वि-स्तरीय पध्दति

एल.एम. सिंघवी                        स्थानीय स्वशासन पध्दति

जी.वी.आर. राव                         प्रतिनिधित्व के तरीकें में सुधार

दिनेश गोस्वामी                       चुनाव सुधारों

सादिक अली समिति                 पंचायती राज व्यवस्था

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  • 1977 में गठित अशोक मेहता समिति ने अगस्त, 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसमें पंचायती राज के लिए त्रि-स्तरीय प्रतिमान के स्थान पर द्वि-स्तरीय प्रतिमान की संस्तुति की  गई थी। इसमें जनपद स्तर पर जिला परिषद तथा 15000 से 20000 जनसंख्या (गांवो के समुह) पर मंडल पंचायत के गठन का सुझाव था।

  • 73वें संवैधानिक संशोधन, 1992 (24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी) द्वारा संविधान में  भाग  IX एवं 11वीं अनुसूची जोड़कर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक स्तर प्रदान किया गया। 73वें संविधान संशोधन 1992 के समय प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हाराव थे।

  • पंचायती राज को संवैधानिक स्थिति प्रदान करने की संस्तुति एल.एम. सिंघवी समिति (1986) द्वारा की गई थी। साथ ही सिंघवी समिति ने पंचायत चुनावों को गैर-दलीय आधार पर कराने की भी अनुशंसा की थी।

  • पंचायतों के लिए संविधान के अनु. 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा निम्न के प्रावधान हैं –

  • राज्य निर्वाचन आयोग अनु. 243 (K)

  • राज्य वित्त आयोग अनु. 243 (I)

  • जबकि नगरपालिकाओं के लिए 74वें संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा निम्न प्रावधान किए गए हैं –

  • राज्य निर्वाचन आयोग अनु. 243 (ZA)

  • राज्य वित्त आयोग अनु. 243 (Y)

  • जिला नियोजन समिति अनु. 243 (ZD)

  • उत्तर प्रदेश जिला योजना समिति अधिनियम, 1999 के अनुसार, जिला योजना के अंतर्गत ऐसे विषय समाविष्ट होंगे जो यथास्थिति, ग्रामीण क्षेत्रों के लिए संयुक्त प्रांत पंचायती राज अधिनियम, 1947 और उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत तथ  जिला पंचायत अधिनियम, 1961 और नगरीय क्षेत्र के लिए  उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916  या उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 मे प्रमाणित किए गए हों।

  • 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992, 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ। इसका अभिपालन करने वाला पहला राज्य मध्य प्रदेश है। इस संशोधन अधिनियम के लागू होने के  बाद वर्ष 1994 में मध्य प्रदेश में चुनाव आयोजित किया गया।

  • 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 देश में मजबूत एवं जीवंत पंचायती राज संस्थाओं की बुनियाद रखता है। संविधान के भाग 9 के अनु. 243 से 243 (ण) तक में इसका उल्लेख किया गया है।

  • महिलाओं को पंचायतों में आरक्षण संविधिन का 73वां संशोधन करके दिया गया है। अनु. 243 घ (3) के अनुसार पंचायतों में सभी स्तरों पर महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया गया है।

  • अनुच्छेद 243D(1) के अंतर्गत प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान उस-पंचायत क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात मे आरक्षित रहेंगे।

  • संविधान के अनुच्छेद 243 (ख) के अनुसार पंचायती राजव्यवस्था में स्थानीय स्वशासन त्रि-स्तरीय है – ग्राम स्तर, मध्यवर्ती (खंड) स्तर एवं जिला स्तर पर, किंतु मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का उस राज्य में गठन नही किया जा सकेगा, जिसकी जनसंख्या 20 लाख से कम है।

  • छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 के अंतर्गत धारा-127 में खंड एवं जिला पंचायतों की सीमा में परिवर्तन के विषय में वर्णन किया गया है। जिसके अनुसार, राज्यपाल खंड एवं जिला पंचायतों की सीमा मे परिवर्तन की अधिसूचना जारी करता है।

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  • संविधान के प्रावधानों के तहत पंचायत चुनाव कराने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। अनु. 243-K के तहत किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, पंचायतों के निर्वाचनों से संबंधित या संसक्त सभी विषयों के संबंध में उपबंध कर सकता है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 च (1) के अनुसार, कोई व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ सकता है यदि उसने 21 वर्ष का आयु पूर्ण कर ली है।

  • बिहार पंचायती राज अधिनियम के तहत ग्राम न्यायलयों की व्यवस्था है जिन्हें 3 माह तक की जेल एवं 1000 रु. तक जुर्माने की सजा सुनाने की शक्ति प्राप्त है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243 च के अनुसार, किसी व्यक्ति के लिए पंचायत सदस्य बनने की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है। वहीं अनुच्छेद 243 ङ के खंड (4) के अनुसार, किसी पंचायत की अवधि की समाप्ति के पूर्व उस पंचायत के विघटन पर गठित की गई कोई  पंचायत उस अवधि के केवल शेष भाग के लिए बनी रहेगी, जिसके लिए विघटित पंचायत बनी रहती  यदि वह विघटित नही की जाती ।

  • नगर परिषद में चुने जाने के लिए वह तभी योग्य होगा जब वह उस नगर की मतदाता सूची में सम्मिलित हो।

  • संविधान के अनुच्छेद 243(झ)(I) के तहत राज्यपाल द्वारा गठित राज्य वित्त आयोग सरकार तथा स्थानीय शासन के बीच राजस्व बंटवारें के लिए मार्गदर्शक सिध्दांत सुझाने हेतु उत्तरदायी  है।

  • संविधान के अनुच्छेद 243-I के अनुसार, राज्य की पंचायतों द्वारा निवियोजित हो सकने वाले करों और शुल्कों आदि के निर्धारण हेतु संस्तुति के लिए एक वित्त आयोग होगा जिसका गठन राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष पर किया जाता है।

  • स्थानीय इकाइयों पर नागरिकों की शिकायतों के मामलों मे राज्य सरकार का नियंत्रण नही होता है।

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243(ZJ) के अनुसार, सहकारी समिति के बोर्ड में उतनी संख्या में निदेशक होंगे, जितने राज्य विधानमंडल द्वारा विधि बनाकर उपबंधित किया जाए। परंतु सहकारी सोसाइटी के निदेशकों की अधिकतम संख्या 21 से अधिक नही होगी।

  • भारतीय संविधान के अनुसार, स्थानीय शासन के लिए उपबंध अनुच्छेद 40 एवं भाग 9 तथा भाग 9-क में किए गए हैं। अतः स्वतंत्र स्थानीय शासन का वर्णन किया गया है।

  • 74वें सविधान संशोधन, 1992 के अनुसार, अनुच्छेद 243(प) में नगर पालिकाओं की अवधि 5 वर्ष नियत की गई है। अतः मेयर का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

  • उप-प्रभाग स्तर पर जिला परिषद –    असम

मंडल प्रजा परिषद                     –      आंध्र प्रदेश

जनजातीय परिषद                     –      मेघालय

ग्राम पंचायतों का अभाव             –      मिजोरम

  • ऐसे सभी स्थान जहां नगर पालिका, नगर निगम, छावनी बोर्ड या अधिसूचित नगर क्षेत्र समिति आदि शामिल हो, नगरीय क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जो निम्नलिखित सभी तीन शर्तें एक साथ पूरी करते हों –

  1. न्यूनतम जनसंख्या 5000 हो।

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  1. कार्यशील पुरुषों का न्यूनतम 75% गैर कृषि कार्यो में संलग्न हो।

  2. जनसंख्या घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. हो।

  • जिला फोरम उन्हीं शिकायतों की सुनवाई करता है, जिनमें माल या सेवाओं का कुल मूल्य 20 लाख रुपये से  अधिक न हो। बीस लाख  से एक करोड़ तक के माल या सेवाओं के कुल मूल्य की सुनवाई स्टेट कमीशन, जबकि एक करोड़ से ऊपर तक के माल या सेवाओं के कुल मूल्य की सुनवाई नेशनल कमीशन करता है।

  • भारत में वर्तमान मे मिजोरम, दिल्ली एवं नगलैंड  राज्यों में पंचायती राज संस्था नही है।

  • छत्तीसगढ़ नगरपालिका परिषद अधिनियम, 1961 की धारा 79 (2) के अंतर्गत पंचायत और छावनी बोर्ड के मध्य विवाद की स्थिति में अंतिम निर्णय के संबंध में वर्णन किया किया गया है। जिसके अनुसार, यदि पंचायत और छावनी बोर्ड के मध्य विवाद हो, तो अंतिम निर्णय राज्य सरकार, केन्द्र सरकार के अनुमोदन के अधीन करेगा।

  • छत्तीसगढ़ नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा-47 के अंतर्गत नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष के प्रत्यावर्तन के विषय में वर्णन किया गया है। इसके अनुसार –

  1. सामान्य मतदाताओं द्वारा जिन्होंने प्रत्यावर्तन मे भाग लिया है, उनकी आधी से अधिक की संख्या ने प्रत्यावर्तन के पक्ष में मत दिया है तो अध्यक्ष को प्रत्यावर्तित किया जा सकता है। (47(1))

  2. इसके (47(1) अंतर्गत ही परिषद के ¾ निर्वाचित सदस्यों के हस्ताक्षरित प्रस्ताव के द्वारा प्रत्यावर्तन की कार्यवाही प्रारंभ की जा सकेगी।

  3. अध्यक्ष के निर्वाचित होने (अध्यक्ष के रुप में) के 2 वर्षों के पश्चात ही प्रत्यावर्तन की कार्यवाही प्रारंभ की जा सकती है। (47(1)(i))

  4. यदि टाई निर्वाचन में आधे से अधिक समय शेष है, तो अध्यक्ष के कार्यकाल में एक बार ही प्रत्यावर्तन की कार्यवाही की जा सकती है। 47(1) (ii)

  • छत्तीसगढ़ नगरपालिका परिषद अधिनियम, 1961 की धारा-34 के अंतर्गत नगरपालिका परिषद के चुनाव के लिए अर्हता दी गई हैं, जिसके अनुसार –

  1. जिस व्यक्ति का नाम नगरपालिका मतदाता सूची में है, वह चुनाव लड़ने की अर्हता रखता है। (34(1))

  2. अध्यक्ष पद हेतु उसकी आयु 25 वर्ष से कम नही होनी चाहिए। (34(1)(a))

  3. पार्षद हेतु आयु 21 वर्ष से कम नही होनी चाहिए (34(1)(b))

  4. कोई व्यक्ति दो वार्ड से पार्षद का चुनाव एक साथ नही लड़ सकता है (34(2)।

  5. कोई भी व्यक्ति यदि अध्यक्ष और पार्षद चुना जाता है, तो ऐसी स्थिति में 7 दिनों के अंदर एक पद से इस्तीफा  देना होगा (34(4))

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  • भारतीय संविधान के अनु. 243-ZE (74वें संविधान संशोधन से) के तहत देश के प्रत्येक महानगर क्षेत्र के लिए विकास योजना प्रारुप तैयार करने के लिए, महानगर योजना समिति के गठन का  प्रावधान किया गया है। तथापि इसका कार्य विकास योजना का प्रारुप तैयार कर संबंधित सरकार को भेजने तक सीमित  है।

  • झारखंड में पंचायत समिति का गठन झारखंड पंचायत राज अधिनियम, 2001 (2010 में यथा संशोधित) के अनु. 32 के तहत किया गया है। इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रुप से चुने जाते हैं।

  • उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा 19 के अंतर्गत प्रत्येक  जिला पंचायतों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से ही एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुने जाएंगे। हालांकि धारा 19(क) के अनुसार, राज्य में जिला पंचायतों के अध्यक्षों के पद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गो के लिए चक्रानुक्रम मे आरक्षित रहेंगे, परंतु इनके चयन में सभी सदस्य भाग लेते हैं।

  • वर्तमान में उत्तर प्रदेश में किसी नगरपालिका के अध्यक्ष का निर्वाचन अपने नगर क्षेत्र की निर्वाचन सूची में सम्मिलित सभी निर्वाचकों द्वारा (जो कि प्रायः उस नगर क्षेत्र के वार्डों के निर्वाचक भी होते हैं) किया जाता है।

  • ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति एक प्रशासनिक प्राधिकरण के रुप में कार्य करती है। यह ग्राम पंचायत और जिला प्रशासन के मध्य संपर्क स्थापित करती है। क्षेत्र पंचायत में निर्वाचित सदस्यों द्वारा अपने में से एक प्रमुख, एक ज्येष्ठ उपप्रमुख तथा एक कनिष्ठ उप्रमुख चुने जाएंगे। क्षेत्र पंचायतों को सौंपे गए कार्य समितियों के माध्यम से संचालित किए जाएंगे तथा इसके लिए निम्न समितियां गठित की जाएंगी –

  • शिक्षा समिति

  • निर्माण कार्य समिति

  • नियोजन एवं विकास समिति

  • स्वास्थ्य एवं कल्याण समिति

  • प्रशासनिक समिति

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में प्रत्येक ग्राम पंचायत, ग्राम सभा की सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात एक विकास योजना तैयार करेगी तथा मांग के अनुसार, कार्यों के क्रियान्वयन एवं निष्पादन के लिए स्वयं उत्तरदायी होगी।

  • सामुदायिक विकास कार्यक्रम देश मे पर्याप्त वृध्दि प्रदान करने के लिए वर्ष 1952 में पायलट आधार पर शुरु किया गया था। सामुदायिक विकास का पहला स्थापित कार्यक्रम राष्ट्रीय प्रसार सेवा था जो वर्ष 1953 मे शुरु किया गया था। भारत सरकार ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) और राष्ट्रीय प्रसार सेवा (1953) के कामकाज की जांच के लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन 1957 में किया था।

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कुछ वर्गों के लिए विशेष उपबंध

  • भारतीय संविधान के भाग 16 के अंतर्गत अनु. 330 से 342 कुछ वर्गों के लिए विशेष उपबंध की व्यवस्था की गई है।

  • अनु. 330 के अनुसार, लोक सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 331 के तहत लोक सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 81 में किसी बात के होते हुए भी यदि राष्ट्रपति की यह राय है कि लोक सभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नही है, तो वह लोक सभा में उस समुदाय के दो से अनधिक सदस्य नाम निर्देशित कर सकेगा।

  • अनुच्छेद 332 के तहत राज्यो की विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण की व्यवस्था है।

  • अनुच्छेद 333 के तहत, राज्यो की विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रतिनिधित्व का प्रावधान निहित है।

  • अनुच्छेद 338 के अनुसार, अनुसूचित जातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है।

  • अनुच्छेद 338क के अनुसार अनूसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग (89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा शामिल) के गठन का प्रावधान है।

  • वर्तमान में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रामशंकर कठेरिया हैं।

  • अनुच्छेद 340 के तहत राष्ट्रपति, पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण के लिए आयोगी की नियुक्ति कर सकेगा।

  • अनुच्छेद 341(1) के तहत राष्ट्रपति किसी राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में संबंधित राज्यपाल से परामर्श के बाद उस राज्य/संघ राज्य क्षेत्र की किसी जाति को अनुसूचित जाति के रुप में विनिर्दिष्ट कर सकता है।

  • अनुच्छेद 342 के अनुसार, राष्ट्रपति को संबंधित राज्य के राज्यपालों से परामर्श के बाद किसी जाति को अनसूचित जनजाति के रुप में विनिर्दिष्ट करने का अधिकार है।

  • राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग एक्ट वर्ष 1993 में आया। बाल मजदूर (निषेध संघ  नियामक अधिनियम) वर्ष 1986 मे बना। निःशक्तजन (समान अधिकारिता अधिकार संरक्षण एवं पूर्ण सहभागिता) अधिनियम वर्ष 1995 में आया, जबकि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम वर्ष 1992 में आया।

  • जातियों के लिए आरक्षण के प्रावधान लोक सभा एवं राज्यों की विधान सभाओं मे किए गए हैं। परंतु राज्य सभा, राज्य विधान परिषदों और जम्मू एवं कश्मीर विधानमंडल मे किसी भी जाति के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान नही है।

  • संवैधानिक (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 के तहत अनुसूचित जनजाति का दर्जा धर्मनिष्ठा से स्वतंत्र है तथा इसमे किसी  भी धर्म को मानने वाली जनजाति को शामिल किया जा सकता है। जबकि संवैधानिक (अनुसूचित  जाति) आदेश, 1950 के पैरा-3 के अनुसार, अनुसूचित जातियों मे केवल हिंदू (जिसमें बौध्द एवं सिक्ख भी शामिल  हैं) धर्म के व्यक्ति ही आ सकते हैं, अन्य के नही। रंगनाथ  मिश्र के अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय धार्मिक औ र भाषायी अल्पसंख्यक आयोग (NCRLM) ने इस पैरा को निरस्त किए जाने की संस्तुति की है।

  • अल्पसंख्यक शब्द भारतीय संविधान में परिभाषित नही है। तथा अल्पसंख्यक आयोग एक संविधानिक निकाय है, न कि संवैधानिक क्यो कि इसका गठन संसद द्वारा पारित राष्ट्रपति अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के द्वारा किया गया है।

  • सर्वाधिक अनुसूचित जनजातियों वाला प्रदेश, मध्य प्रदेश है। चार राज्यो का घटता हुआ क्रम है – म.प्र., राजस्थान, आंध्र प्रदेश , बिहार।

  • भारतीय संविधान मे लोक सभा में अनुसूचित जातियो और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था अनुच्छेद 330 मे की गई है जबकि ऐसा ही राज्यों की विधानसभाओं के संदर्भ में अनुच्छेद 332 द्वारा किया गया है।

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विविध

  • सैन फ्रांसिस्को (अमेरिका) में अप्रैल से जून, 1945 तक चले सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर को अंतिम रुप दिया गया तथा 26 जून, 1945 को 50 राष्ट्रों ने इस पर हस्ताक्षर किए। पोलैंड इस सम्मेलन मे उपस्थित नही हुआ था तथा बाद में 51वें सदस्य  के रुप में उसने इस पर हस्ताक्षर किए। यह चार्टर 24 अक्टूबर, 1945 से प्रभावी हुआ। इसी कारण इस दिन संयुक्त राष्ट्र महासंघ दिवस मनाया जाता  है।

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद मे कुल 15 सदस्य होते हैं जिनमें 5 स्थायी सदस्य हैं –

  • संयुक्त राज्य अमेरिका

  • ब्रिटेन

  • रुस

  • फ्रांस

  • चीन

  • शेष 10 अस्थायी सदस्य दो वर्ष के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा चुने जाते हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रजातंत्रीकरण की मांग का संबंध मुख्यतया सुरक्षा परिषद से है।

  • संयुक्त राष्ट्र संघ के 5 स्थायी सदस्यो को निषेधाधिकार (वीटो) शक्ति प्राप्त है जिसके प्रयोग से वे किसी निर्णय की स्वीकृति को रोक सकते हैं।

  • बुतरोस-बुतरोस घाली संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रथम अफ्रीकी महासचिव थे। इन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के 6वें महासचिव के रुप में 1 जनवरी, 1992 से 31 दिसंबर, 1996 तक कार्य किया।

  • संयुक्त राष्ट्र महासचिव के रुप में यू थांट का कार्यकाल सर्वाधिक (1961-71) रहा है।

  • संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिवों का कार्यकाल का क्रम निम्न है –

  • त्रिगवे ली (नॉर्वे) – 2 फरवरी, 1946-10 नवंबर, 1952

  • डॉग हैमरशोल्ड (स्वीडेन) – 10 अप्रैल, 1953 – 18 सितंबर, 1961

  • यू थांट (म्यांमार) – 30 नवंबर, 1961- 31 दिसंबर, 1971

  • कुर्त वाल्दीहीम (ऑस्ट्रिया) – 1 जनवरी, 1972 – 31 दिसंबर, 1981

  • जेवियर पेरेज डी कुइयार (पेरु) – 1 जनवरी, 1982-31 दिसंबर, 1991

  • बुतरस-बुतरस घाली (मिस्त्र) – 1 जनवरी, 1992 – 31 दिसंबर, 1996

  • कोफी-अन्नान (घाना) – 1 जनवरी, 1997-31 दिसंबर, 2006

  • बान-की मून (द. कोरिया) – 1 जनवरी, 2007 –   31 दिसंबर, 2016

  • एंटोनियो गुटेरेस (पुर्तगाल) – 1 जनवरी, 2017 से वर्तमान तक।

  • संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्य करने वाली केवल दो भाषाएं – अंग्रेजी तथा फ्रेंच हैं, जबकि मान्यता प्राप्त (अधिकृत) भाषाओं में रुसी, अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच तथा स्पेनी हैं।

  • 8 दिसंबर, 1977 को तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सयुक्त राष्ट्र संघ के अंग, संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार हिंदी में भाषण दिया था तथा इन्होंने वर्ष 2000 मे प्रधानमंत्री के रुप मे भी इस सत्र को हिंदी में संबोधित किया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें उद्घाटन सत्र के दौरान 27 सितंबर, 2014 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया। नरेन्द्र मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा के उद्घाटन सत्र को हिंदी मे संबोधित करने वाले दूसरे प्रधानमंत्री और तीसरे नेता बन गए। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1988 में पी.वी. नरसिम्हा राव (तत्कालीन विदेश मंत्री) ने संयुक्त राष्ट्र के उद्घाटन सत्र को हिंदी में संबोधित किया था।

  • यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमैन राइट्स अर्थात मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय घोषणा में कुल 30 अनुच्छेद  हैं।

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  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय हेग नीदरलैंड्स (हॉलैंड) मे स्थापित है। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र  घोषणा पत्र द्वारा जून, 1945 में की गई थी। इसने अप्रैल, 1946 से कार्य करना प्रारंभ किया। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र संघ के छह प्रधान अंगो में पांचवा है, जो न्यूयॉर्क के बाहर स्थित है।

  • एमनेस्टी इंटरनेशनल एक विश्वव्यापी मानव अधिकार आंदोलन है। इसकी स्थापना वर्ष 1961 में लंदन के एक बैरिस्टर पीटर बेनेन्सन ने की थी। वर्ष 1961 मे पीटर बेनेन्सन ने विश्व में हो रही अनैतिक गिरफ्तारी के विरोध में द फॉरगाटेन प्रिजनर्स नामक एक लेख लिखा। एमनेस्टी इंटरनेशनल इन्हीं के विचारों का एक मूर्त रुप है। इसका मुख्यालय लंदन में है।

  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में निर्वाचित हुए भारतीय न्यायमूर्ति हैं – बी.आर. राउ (1952-53), नगेन्द्र सिंह (1973-88), आर.एन. पाठक (1989-91) एवं वर्तमान मे दलवीर भंडारी (2012-2018)। 20 नवंबर, 2017 को संयुक्त महासभा एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने न्यायाधीश दलवीर भंडारी को 9 वर्षीय कार्यकाल (2018-2027) के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का सदस्य पुनर्निर्वाचित किया।

  • डॉक्टर्स विदाउट बार्डर्स एक गैर-सरकारी अंतरराष्ट्रीय संगठन है। इसकी स्थापना 20 दिसंबर, 1971 को फ्रांस में की गई थी। इसका मुख्यालय जेनेवा, स्वीट्जरलैंड मे है। इस संस्था का उद्देश्य जाति, धर्म, पंथ या राजनीतिक प्रथिबध्दता के बिना प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं एवं सशस्त्र संघर्ष से पीड़ितों की सहायता करना है। इस संस्था को वर्ष 1999 में शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।

  • 10 दिसंबर मानवाधिकार दिवस के रुप में मनाया  जाता है। इसी दिन 1948 मे संयुक्त राष्ट्र  महासभा द्वारा मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) स्वीकार की गई थी। इस दिवस की औपचारिक स्थापना महासभा द्वारा वर्ष 1950 में की गई थी। विश्व स्वास्थ्य दिवस 7 अप्रैल को, यू.एन. दिवस 24 अक्टूबर को तथा मजदूर  दिवस 1 मई को मनाया जाता है।

  • संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्टूबर, 1945 को हुई थी, इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क मे स्थित है। संयुक्त राष्ट्र घोषणा-पत्र के अनुसार, इसके अंग हैं  –

  • महासभा (General Assembly)

  • सुरक्षा परिषद (Security Council)

  • आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (Economic and Social Council)

  • न्यास परिषद (Trusteeship)

  • अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice)

  • सचिवालय (Secretriate)

  • एमनेस्टी इंटरनेशनल विश्व के प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों में से एक है, जिसका मुख्यालय लंदन में है।

  • भारतीय संविधान दिवस 26 नवंबर को मनाया जाता है। भारतीय संविधान 26 नवंबर, 1949 को बन कर तैयार हुआ और इसके कुछ प्रावधान इसी दिन लागू हुए किए गए थे। जिनके फलस्वरुप इस दिन को संविधान दिवस के रुप में मनाया जाता है। जबकि  भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 को पूर्णरुप से लागू किया गया और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रुप में मनाया जाता है।

  • मानव अधिकारों की सर्वव्यापी घोषणा की प्रस्तावना में मानव जाति की जन्मजात गरिमा और सम्मान तथा अधिकारों पर बल दिया गया है। अतः मानव अधिकारों की अवधारण का प्रमुख बल मानव होने के नाते मानव-गरिमा पर है।

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  • अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस 2 अक्टूबर को मनाया जाता है 15 जून, 2007 के दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 2 अक्टूबर के दिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रुप में मनाने का निर्णय लिया था।

  • अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था का उदय सर्वप्रथम संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ। इस शासन प्रणाली में प्रमुख कार्यकारी शक्ति राष्ट्रपति के पास होती है। वह लोगों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से निश्चित अवधि के लिए चुना जाता  है।

  • CIA World Fact Book के अनुसार, वर्तमान में 22 देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू है। ये 22 देश हैं –

  1. अर्जेंटीना

  2. ऑस्ट्रेलिया

  3. बेल्जियम

  4. बोलिविया

  5. ब्राजील

  6. कांगो

  7. कोस्टारिका

  8. डोमिनिकन रिपब्लिक

  9. इक्वाडोर

  10. मिस्त्र

  11. ग्रीस

  12. होंडुरास

  13. लेबनान

  14. लक्जमबर्ग

  15. मेक्सिको

  16. नौरु

  17. पनामा

  18. पराग्वे

  19. पेरु

  20. सिंगापुर

  21. थाईलैंड

  22. उरुग्वे

  • लिखित संविधान की अवधारणा का जन्म संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ। इस प्रकार संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान विश्व का प्रथम लिखित संविधान है।

  • अमेरिकी राष्ट्रपति सीधे जनता द्वारा नही चुना जाता है। इसके लिए निर्वाचक मतो का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक राज्य में निर्वाचक मत होते हैं, जो इस राज्य के सीनेटरों ( सदैव 2) तथा प्रतिनिधि सभा के सदस्यों के योग के बराबर होते हैं। साथ ही डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलम्बिया (वाशिंगटन डीसी) से 3 सदस्य होते  हैं। इलेक्टोरल कॉलेज अमेरिकी कांग्रेस (प्रतिनिधि सभा + सीनेट) से भिन्न हैं। वर्तमान में अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए कुल निर्वाचकों की संख्या 538 है।

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  • लैरी प्रेसलर अमेरिका के प्रमुख सीनेटर (संसद सदस्य) थे जिन्होंने अमेरिका द्वारा दी जाने वाली सहायता को परमाणु अप्रसार से जोड़ने के लिए प्रेसलर संशोधन प्रस्तुत किया था। उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन द्वारा पाकिस्तान को प्रस्तावित सैन्य सहायता की आलोचना इसी आधार पर की थी कि पाकिस्तान परमाणु विकास एवं प्रसार में संलग्न  है।

  • अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनाव प्रक्रिया में पहली प्राइमरी न्यू हैम्पशायर एवं लोवा राज्य से होती है। जिसके लिए चुनाव राष्ट्रपति चुनाव से लगभग एक वर्ष पूर्व ही हो जाते हैं। पारंपरिक रुप से यहीं से अमेरिकी राष्ट्रपति की  चुनाव प्रक्रिया का प्रारंभ होता है।

  • रुसी संसद का नाम फेडरल असेंबली है। रुसी संसद के निचले सदन को ड्यूमा कहते हैं, जबकि उच्च सदन को फेडरेशन काउंसिल/काउंसिल ऑफ दि फेडरेशन कहते  हैं।

  • CIA – Central Intelligence Agency संयुक्त राज्य अमेरिका (S.A.) की आसूचना ( गुप्तचर) एजेंसी है।

  • तास पूर्व सोवियत संघ रुस की समाचार एजेंसी थी। सोवियत संघ के विघटन के पश्चात इस वर्ष 1992 में इनफॉर्मेशन टेलीग्राफ एजेंसी ऑफ रुस (ITAR-TASS) मे समाहित कर दिया गया.

  • संसदीय शासन प्रणाली सर्वप्रथम ब्रिटेन में विकसित हुई। भारत की संसदीय शासन पध्दति ब्रिटेन के संविधान से ली गई है। इस व्यवस्ता मे राजा या राष्ट्रपति की नाममात्र की सत्ता होती है तथा प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के पास वास्तविक कार्यकारी शक्तियां होती हैं।

  • फ्लीट स्ट्रीट, फ्लीट नदी के नाम पर लंदन की एक गली है, जहां से 1980 के दशक तक अधिकांश ब्रिटिश समाचार-पत्र छपते रहे थे। वर्ष 2005 मे यहां से हटने वाला ब्रिटिश समाचार एजेंसी रायटर्स का ऑफिस आखिरी प्रमुख समाचार ऑफिस था।

  • चीन की संसद नेशनल पीपुल्स कांग्रेस के नाम से जाना जाता है। इसमें वर्तमान में 2987 सदस्य हैं तथा यह विश्व की सबसे बड़ी संसद है। परंतु वास्तव में यह लगभग रबर स्टांप विधायिका  है, जो कि सामान्यतः चीन की काम्युनिस्ट पार्टी के निर्णयों पर मुहर लगाती है।

  • विदेश में सर्वप्रथम भारत महोत्सव वर्ष 1982 में ब्रिटेन में आयोजित हुआ था।

  • चीन के राजनैतिक नेतृत्व को प्रिंसलिंग नाम से जाना जाता है क्योकि शासक कम्युनिस्ट पार्टी में पदानुक्रम में सर्वोच्चता निर्धारित होती  है।

  • न्यू चाइना न्यूज एजेंसी चीन की समाचार एजेंसी है।

  • ISI – Inter Services Intelligence पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था है।

  • प्रेसलर संशोधन के द्वारा अमेरिकी सहायता को आणविक क्षमता के विकास से जोड़ा गया, चकमा शरणार्थी भार में बांग्लादेशी शरणार्थी  हैं, पेरेस्त्रोइका पूर्व सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव की आर्तिक पुनर्निर्माण की नीति थी तथा 13 सितंबर, 1993 को  इस्त्राइल – फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन के बीच समझौता हुआ था।

  • डॉन पाकिस्तान का प्रमुख समाचार पत्र है।

  • भारत, श्रीलंका एवं संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विश्व के कई देशों ने लिट्टे (LTTE) को प्रतिबंधित किया था। वर्ष 2009 में श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के विरुध्द भारी अभियान चलाया जिसमें लिट्टे प्रमुख बी. प्रभाकरण की मृत्यु हो गई।

  • मोसाद इस्त्राइल का सरकारी गुप्तचर संगठन है जिसे फिलीस्तीन तथात खाड़ी देशों मे अत्यंत खतरनाक संगठन माना जाता है।

  • सर्वप्रथम सितंबर, 1959 में पं. जवाहरलाल नेहरु ने अफगानिस्तान की यात्रा की थी। इसके पश्चात इंदिरा गांधी ने वर्ष 1976 में तथ मनमोहन सिंह ने अगस्त, 2005 तथा पुनः मई 2011 मे इस देश की यात्रा की।

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  • संसद का नाम देश

डायट                                      जापान

रिक्सडेग                                 स्वीडन

कोर्टेज                                     स्पेन

सेजिम                                    पोलैंड

  • येलो बुक फ्रांस सरकार की सरकारी रिपोर्ट है।

  • पंचशील का अर्थ है – व्यवहार या आचरण के पांच नियम। पंचशील के पांच सिद्दांत निम्न हैं –

  1. एक-दूसरे के भू-क्षेत्रीय अखंडता तथा प्रभुसता का पारस्परिक सम्मान

  2. अनाक्रमण

  3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना

  4. परस्पर लाभ तथा समानता एवं

  5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

गुट निरपेक्षता स्वयं में पंचशील का सिध्दांत नही है। बल्कि गुटनिरपेक्षता की  नीति पंचशील के सिध्दांतों पर आधारित हैं।

  • आत्महत्या ऐसा अपराध है, जिसके पूर्ण होने पर अपराधी दंडित नही किया जा सकता, क्योकि उसका जीवित अस्तित्व नही रहता है, जबकि इसका प्रयास  दंडनीय अपराध है (भारतीय दंड संहिता की धारा 309 मे वर्णित)।

  • भारत का राष्ट्रपति- निष्ठापूर्वक कर्तव्य एवं संविधान के परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण की शपथ लेता है।

  • सर्वोच्च न्यायालय का जज – संविधान एवं विधि की मर्यादा बनाए रखने एवं संविधान के प्रति श्रध्दा एवं निष्ठा की शपथ लेता है।

  • संसद सदस्य – कर्तव्य के निष्ठापूर्वक निर्वहन की शपथ लेते हैं।

  • संघ का मंत्री – सूचना की गोपनीयता की शपथ लेता है। राष्ट्रपति की शपथ का वर्णन अनुच्छेद 60 में किया गया है। जबकि अन्य तीनों की शपथ का उल्लेख तीसरी अनुसूची में किया गया है।

  • प्रेस (मीडिया) राष्ठ्र निर्माण मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, अतः इसे लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ की संज्ञा दी जाने लगी है।

  • वे अधिकार जिनका संविधान के प्रावधानों में वर्णन नही है तथा अन्य रुप से वर्णित होते हैं, संविधानेत्तर अधिकार कहलाते हैं। यथा योजना आयोग का संविधान में कोई वर्णन नही मिलता अपितु मंत्रिमंडल के संकल्प द्वारा इसे बनाया गया है, फिर भी यह केन्द्र तथा राज्यों के मध्य अनुदानों के वितरण एवं योजनाओं के निर्माण मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  • जिला दंडनायक के रुप में जिला कलेक्टर की शक्तियों के अंतर्गत कानून व्यवस्था बनाए रखना, पुलिस पर नियंत्रण रखना एवं विदेशियों के पारपत्रों की जांच करना आदि कार्य निहित है। जबकि भू-राजस्व एकत्र करने की शक्ति का प्रयोग जिलाधिकारी जिला कलेक्टर की हैसियत से करता है।

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  • इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आरबिट्रेशन के पूर्व सदस्य सरोश जईवाला प्रख्य़ात विधि विशषज्ञ हैं। श्री जई वाला लंदन स्थित, 1982 में स्थापित अंतरराष्ट्रीय विधि कंपनी जईवाला एंड कंपनी के मुख्य साझेदार हैं।

  • अंतरराष्ट्रीय युध्द प्रतिरोधक एक अंतरराष्ट्रीय युध्द विरोधी संगठन है, जिसमें 30 से अधिक देश संबध्द हैं। इसका मुख्यालय लंदन, यू.के. में है। इसकी स्थापना वर्ष 1921 में बिल्थोवेन नीदरलैंस मे हुई। इस संगठन के अध्यक्ष के रुप में नारायण देसाई को (1989-1991) नियुक्त किया गया था। इस संगठन ने वर्ष 1931 में Broken Rifle को प्रतीक चिन्ह के रुप में अपनाया। इसके वर्तमान अध्यक्ष क्रिस्टीन स्वीट्जर वर्ष 2014 से हैं।

  • भारत का उपराष्ट्रपति           –      राज्य सभा

भारत का नियंत्रक  एवं महालेखापरीक्षक       –     लोक लेखा समिति

भारत का महाधिवक्ता                        –      उच्चतम न्यायालय

भारत का महान्यायवादी                      –     लोक सभा की  बैठक

  • नगेन्द्र सिंह फरवरी, 1985 से फरवरी, 1988 के मध्य अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अध्यक्ष रहे थे। ए.एन. राय 26 अप्रैल, 1973 को भारत के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए थे। आर. के. त्रिवेदी 18 जून, 1982 से  31 दिसंबर, 1985 तक भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे, अशोक देसाई भारत के महान्यायवादी रह चुके हैं।

  • सीमा प्रबंधन विभाग गृह मंत्रालय के अधीन है।

  • जून, 2009 में सृजित भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के प्रथम महानिदेशक श्री नंदन नीलेकनी नियुक्त किए गए थे। वर्तमान में आर.एस. शर्मा अध्यक्ष हैं।

  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत वर्तमान में 2 विभाग हैं –

  1. स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग

  2. उच्चतर शिक्षा विभाग

  • उच्चतर शिक्षा विभाग के अंतर्गत ही तकनीकी शिक्षा विभाग उपविभाग के रुप में शामिल है। महिला और बाल विकास विभाग वर्ष 1985 में मानव संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत ही स्थापित किया गया था किंतु 30 जनवरी, 2006 से यह  स्वतंत्र मंत्रालय के रुप में अस्तित्व मे है।

  • खाद्य और पोषण मंडल (Food and Nutrition Board- FNB) जिसकी स्थापना वर्ष 1964 में की गई थी, प्रारंभ में खाद्य एवं कृषि मंत्रालय के अधीन था। वर्ष 1993 में यह महिला एवं बाल विकास विभाग (2006 से मंत्रालय) के अधीन कर दिया गया  जो कि तब मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन था।

  • 36वें संविधान संशोधन, 1975 के द्वारा सिक्किम को भारत का अभिन्न अंग बना लिया गया। इसे वनस्पति शास्त्रियों का स्वर्ग माना जाता है, क्योंकि यह पूर्वी हिमालय के  हाटस्पाट क्षेत्र में आता है, जो जैव विविधता से परिपूर्ण है यहां के मुख्य निवासी लेप्चा, भूटिया और नेपाली लोग हैं।

  • भारत के संविधान के स्वरुप का वर्णन विभिन्न प्रकास से किया गया है। इसे अर्ध्द परिसंघीय तथा एकात्मक परिसंघीय का अद्भुत समन्वय तथा संघात्मक कहा जाता  है।

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  • राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी की स्थापना जुलाई, 1982 मे की गई थी। इसका उद्देश्य जल संसाधनों के अनुकूलतम उपयोग के लिए जल स्थानांतरण संपर्कों का विकास करना है। सितंबर, 1990 में राष्ट्रीय जल बोर्ड का गठन किया गया।

  • भारतीय प्रेस काउंसिल एक अर्ध्दन्यायिक-वैधानिक संस्था है जिसकी स्थापना वर्ष 1966 मे संसद द्वारा की गई थी।

  • शिमला समझौता भारत और पाकिस्तान के मध्य 2 जुलाई, 1972 को, शांति, मित्रता एवं सहयोग की भारत-सोवियत संधि 9 अगस्त, 1971 को, फरक्का समझौता भारत और बांग्लादेश के मध्य अंतरिम रुप से वर्ष 1975 में तथा अंतिम रुप से 12 दिसंबर, 1996 को और  ताशकंद समझौता भारत और पाकिस्तान के मध्य 10 जनवरी, 1966 को हस्ताक्षरित हुआ था।

  • यू.एन. द्वारा वर्ष 1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष के रुप में मनाया गया।

  • 9 जुलाई, 2011 को विश्व के नवीनतम एवं 193वें देश के रुप में दक्षिणी सूडान का जन्म हुआ। इसकी वर्तमान राजधानी जुबा है।

  • अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस 3 दिसंबर को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1981 को अंतरराष्ट्रीय विकलांग वर्ष के रुप में घोषित किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 13 दिसंबर 1992 से प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय विकलांग दिवस को मनाने की स्वीकृति प्रदान की थी। वर्तमान में विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत जनसंख्या विकलांगता से ग्रसित है।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष एनी बेसेंट थी। इन्होंने वर्ष 1917 में कलकत्ता में हुए कांग्रेस के 32वें अधिवेशन की अध्यक्षता की थी, जबकि मैडम कामा जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में 22 अगस्त, 1907 को हुई अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में तिरंगा फहराने के लिए प्रसिध्द है।

  • यूरोपियन यूनियन देशों में से फिलीस्तीन राज्य को अधिकारिक मान्यता प्रदान करने वाला प्रथम देश स्वीडन है। अक्टूबर, 2014 में स्वीडन द्वारा फिलीस्तीन राज्य को आधिकारिक मान्यता प्रदान की गई।  30 सितंबर, 2015 को पहली बार  न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ मुख्यालय पर फिलीस्तीन का ध्वज लगाया  गया।

  • जवाहर लाल नेहरु ने अंतरिम प्रधानमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद जिस विदेश नीति की घोषणा की थी वह तटस्थता पर आधारित थी, अर्थात गुटो की राजनीति से दूर रहना और स्वतंत्र नीति का विकास करना।

  • सिरिमाओ भंडारनायके किसी देश की सर्वप्रथम महिला प्रधानमंत्री थी। सिरीमाओ भंडारनायके वर्ष 1960 में श्रीलंका की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनने के साथ ही विश्व की किसी भी देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनीं थी। श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के सदस्य के रुप में श्रीलंका के प्रधानमंत्री के तौर पर इनके तीन कार्यकाल क्रमशः 1960-65, 1970-77, 1994-2000 रहे।

  • लक्ष्मीमल सिंघवी समिति की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 8 जनवरी, 2002 को यह घोषणा की कि प्रति वर्ष 9 जनवरी (महात्मा गांधी के द. अफ्रीका से  भारत वापस आने का दिन) को प्रवासी  भारतीय दिवस (PBD) मनाया जाएग। इसके बाद वर्ष 2003 से प्रति वर्ष यह सम्मेलन  आयोजित किया जा रहा है।

  • आर्कटिक परिषद एक उच्चस्तरीय अंतर्सरकारी फोरम है, जिसका गठन वर्ष 1996 में ओट्टावा घोषणा-पत्र मे अमेरिका, रुस, आइसलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड और कनाडा जैसे आठ देशों की सदस्यता के साथ किया गया था। यह परिषद आर्कटिक क्षेत्र में नीति-निर्धारण और समन्वय का महत्वपूर्ण कार्य करती है, जो इकोसिस्टम को सुरक्षित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस परिषद के स्थायी पर्यवेक्षक 12 राष्ट्रों में भारत और जापान भी शामिल हैं। इसकी चेयरमैनशिप, जो प्रत्येक दो वर्ष पर परिवर्तित होती  है। वर्ष 2015 से 2017 तक अमेरिका इसका चेयरमैन है।

  • संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार की सार्वभौम घोषणा, 1948 के अनुच्छेद 1 से 21 तक के उल्लिखित अधिकारों को प्रथम पीढ़ी के मानव अधिकार समझा जाता है, जबकि अनुच्छेद 22 से 27 तक उल्लिखित अधिकारों को द्वितीय पीढ़ी के मानवाधिकार माना जाता है। अनुच्छेद 23 मे काम का अधिकार एवं  अनुच्छेद 26 में शिक्षा का अधिकार, मानवाधिकार कहा गया है।

  • राज्य सचिवालय के प्रशासन मे मंत्रिमंडल को जाने वाली सभी नस्तियां मुख्य सचिव के माध्यम से भेजी जानी आवश्यक हैं क्योकि वह मंत्रिमंडल के समक्ष आने वाले कार्यों का प्रभारी होता है। इसके अतिरिक्त वह सामान्य प्रशासन विभाग में शासन का सचिव है तथा शासन के समस्त सचिवों का प्रमुख होता है।

  • चेचन्या रुस का एक गणतंत्र है। यह उत्तरी कॉकेशस मे पूर्वी यूरोप के दक्षिणी भाग में कैस्पियन सागर से 100 किमी. दूरी पर स्थित है।

  • रजनी कोठारी ने अपनी पुस्तक पॉलिटिक्स इन इंडिया में जिलाधीश को संस्थागत करिश्मा का था।

  • वैज्ञानिक समाजवाद का श्रेय कार्ल मार्क्स को  जाता है। कार्ल मार्क्स ने समाजवाद को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। कार्ल मार्क्स को वैज्ञानिक समाजवाद के साथ-साथ साम्यवाद का जनक भी कहा जाता है।

  • वर्ष 2003 के अंत में उत्तराखंड सरकार ने गोरखाओं सहित दो अन्य समुदायों को अन्य पिछड़े वर्ग का दर्जा प्रदान किया था।

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  • बिहार में वर्ष 1967 से 1971 के मध्य नौ बार गठबंधन सरकारों का गठन हुआ, जो निम्नवत है –

मुख्यमंत्री                        कार्यकाल

  1. महामाया प्रसाद सिन्हा 5 मार्च, 1967 से 28 जनवरी, 1968 तक

  2. एस.पी. सिंह 28 जनवरी, 1968 से 31 जनवरी, 1968 तक

  3. बी.पी. मण्डल 31 जनवरी, 1968 से 22 मार्च, 1968 तक

  4. भोला पासवान शास्त्री 22 मार्च , 1968 से 25 जून, 1968 तक

  5. सरदार हरिहर सिंह 26 फरवरी से 12 जून, 1969 तक

  6. भोला पासवान शास्त्री 22 जून से 4 जुलाई, 1969 तक

  7. दारोगा प्रसाद राय 16 फरवरी से 22 दिसंबर, 1970 तक

  8. कर्पूरी ठाकुर 22 दिसंबर, 1970 से 1 जून, 1971 तक

  9. भोला पासवान शास्त्री 2 जून, 1971 से 9 जनवरी, 1972 तक

  • उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार संसद में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले सांसदों को दिया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1994 से की गई। मुरली मनोहर जोशी (2009), अरुण जेटली (2010), कर्ण सिंह (2011) तथा शरद यादव (2012) को यह पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

  • वाद           विषय

ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य                –     निवारक अवरोध की प्रक्रिया

रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य   –      स्वतंत्र भाषण पर रोक

शंकरी प्रसाद बनाम भारतीय संघ          –     संविधान संशोधन की संसद की शक्ति

चम्पकम दोराइराजन बनाम मद्रास संघ -शिक्षण संस्थानों मे  प्रवेश हेतु समानता

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण समाज के कमजोर वर्गों को निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सेवाएं उपलब्ध कराता है साथ ही यह राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को निर्देश एवं वित्तीय अनुदान प्रदान करता  है।

  • एशियाई विकास बैंक का इंडिया रेजिडेंट मिशन, नई दिल्ली में अवस्थित है।

  • भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अंतर्गत आंतरिक सुरक्षा अकादमी माउंट आबू में स्थापित की गई है।

  • सीमा सुरक्षा बल का गठन 1 दिसंबर, 1965 में किया गया, जो भारत तथा पडोसी देशो के सीमाओं पर तैनात किए जाते हैं। इसका मुख्यालय नई दिल्ली है।

  • बंगलुरु में प्रथम विधि विश्वविद्यालय नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, केरल के कोच्चि में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज स्थित है,  जबकि त्रिवेंद्रम  (तिरुवनंतपुरम) में विधि विश्वविद्यालय स्थि नही है।

  • भारत के प्रथम विधि विश्वविद्यालय नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया की स्थापना अगस्त, 1887 में बंगल्रुरु में की गई थी।

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  • भारतीय थल सेना की ऑपरेशनल कमांड्स को जून, 1999 के अनुसार, 5 भागों में बांटा गया था, जो वर्तमान में 6 हैं। ये इस प्रकार हैं –

कमान/क्षेत्र                              मुख्यालय

उत्तरी                                       ऊधमपुर (जम्मू एवं कश्मीर)

दक्षिणी                                    पुणे

मध्यवर्ती                                 लखनऊ

पूर्वी                                         कोलकाता

पश्चिमी                                  चंडी मंदिर, चंडीगढ़

दक्षिणी-पश्चिमी                      जयपुर, (15 अगस्त, 2005 से क्रियाशील)

इसके अतिरिक्त प्रशिक्षण कमांड का मुख्यालय शिमला में है।

  • भारतीय सेना में विभिन्न पदों की श्रेणियां इस प्रकार है –

थल सेना

वायु सेना

नौ सेना

जनरल

एयर चीफ मार्शल

एडमिरल

लेफ्टिनेंट जनरल

एयर मार्शल

वाइस एडमिरल

मेजर जनरल

एयर वाइस  मार्शल

रियर एडमिरल

ब्रिगेडियर

एयर कमोडोर

कमोडोर

कर्नल

ग्रुप कैप्टन

कैप्टन

लेफ्टिनेंट कर्नल

विंग कमांडर

कमांडर

मेजर

स्क्वाड्रन लीडर

लेफ्टिनेंट कमांडर

कैप्टन

फ्लाइट लेफ्टिनेंट

लेफ्टिनेंट

लेफ्टिनेंट

फ्लाइंग ऑफिसर

सब लेफ्टिनेंट

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  • दक्षिणी वायु सेना का कमान तिरुवनंतपुरम, केरल में स्थित है। पूर्वी नौसेना कमान आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में अवस्थित है। आरमर्ड कोर सेंटर एंड स्कूल अहमदनगर, महाराष्ठ्र में स्थित है। आर्मी मेडिकल कोर सेंटर एंड स्कूल लखनऊ, उत्तर प्रदेश में स्थित है।

  • बाबा आम्टे वन्य-जीव संरक्षण तथा नर्मदा बचाओं आंदोलन से जुड़ थे। शांत घाटी आंदोलन के संदर्भ में डॉ. सलीम अली का नाम चर्चित रहा था।

  • लश्कर –ए-तैयबा दक्षिण एशिया में एक सक्रिय आतंकवादी संगठन है। यह हाफिज मुहम्मद सईद और जफर इकबाल द्वारा वर्ष 1990 में अफगानिस्तान के कुनार राज्य में स्थापित किया गया था।

  • ऑपरेशन चेकमेट – श्रीलंका

ऑपरेशन कैक्टस – मालदीव

ऑपरेशन ब्लू स्टार – पंजाब

ऑपरेशन सिध्दार्थ – बिहार

  • भारत-श्रीलंका समझौते (1987) में श्रीलंका की अखंडता को बनाए रखने की बात की गई थी। तमिल राज्य की पूर्ण स्वतंत्रता का इसमे कोई उल्लेख नही था।

  • बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय आदर्श वाक्य  आल इंडिया रेडियो का  है।

  • शेख मुजीबुर्रहमान की पश्चिमी पाकिस्तान में गिरफ्तारी के फलस्वरुप पूर्वी पाकिस्तान में हुए भारी विरोध प्रदर्शनों को दबाने से भारत में लाखों शरणार्थी आ गए। इस कारण 3 दिसंबर, 1971 को भारत ने  बांग्लादेश की जनता की ओर से हस्तक्षेप किया। 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तानी सेना ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया और पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश के रुप में स्थापित हुआ। शेख मुजीबुर्रहमान इसके पहले प्रधानमंत्री बने।

 

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