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भौतिक विज्ञान

 

 

 

STUDY FOR CIVIL SERVICES – GYAN

MOST IMPORTANT GENERAL SCIENCE VIGYAN  SAMANYA GYAN  GK SUMMARY GENERAL KNOWLEDGE NOTES  FOR ALL COMPETITIVE EXAMS INCLUDING  UPSC STATE PCS SSC UPSSSC AND OTHER ONE DAY GOVERNMENT EXAMS

 

मात्रक / इकाई

  • किसी भी भौतिक राशि को मापने के लिए उस राशि के एक निश्चित परिमाण को मानक मान लेते हैं तथा इस मानक को कोई नाम दे देते हैं, इसी को उस राशि का मात्रक (Unit) कहते हैं।

  • भौतिक राशियों के मापन के लिए निम्नलिखित चार पध्दतियां प्रचलित हैं –

  1. G.S. पध्दति – इस पध्दति में लंबाई, द्रव्यमान तथा समय के मात्रक क्रमशः सेंटीमीटर, ग्राम तथा सेकंड होते हैं, इसलिए इसे Centimeter-Gram-Second या C.G.S. पध्दति कहते हैं। इसे फ्रेंच या मीट्रिक पध्दति भी कहते हैं।

नोटः यांत्रिकी में आने वाली सभी भौतिक राशियों को लंबाई (Length), द्रव्यमान (Mass), तथा समय (Time) के मात्रकों में व्यक्त किया जाता है। इन तीनों राशियों के मात्रक एक-दूसरे से पूर्णतया स्वतंत्र हैं तथा इनमें से किसी एक को किसी अन्य मात्रक में बदला अथवा उससे संबंधित नहीं किया जा सकता। अतः इन राशियों को मूल राशियां कहते हैं तथा इनके मात्रकों को मूल मात्रक कहते हैं।

  1. F.S. पध्दति – इसे ब्रिटिश पध्दति भी कहते हैं। इस पध्दति में लंबाई, द्रव्यमान और समय के मात्रक क्रमशः फुट, पाउंड और सेकंड होते हैं।

  2. K.S. पध्दति – इस पध्दति में लंबाई, द्रव्यमान और समय के मात्रक क्रमशः मीटर, किलोग्राम एवं सेकंड होते हैं।

  3. I. पध्दति – वर्ष 1967 में जेनेवा में अंतरराष्ट्रीय माप-तौल के महाधिवेशन में इस पध्दति को स्वीकार किया गया। आजकल इसी पध्दति का प्रयोग किया जाता है। इस पध्दति में सात मूल मात्रक और दो संपूरक (सहायक) मात्रक होते हैं।

भौतिक राशि

S.I. के मूल मात्रक

संकेत

लंबाई

मीटर

m (मी.)

द्रव्यमान

किलोग्राम

Kg. (किग्रा.)

समय

सेकंड

S (से.)

ताप

केल्विन

K (के.)

विद्युत धारा

एम्पियर

A (ऐ.)

ज्योति तीव्रता

कैण्डेला

Cd (कैण्ड.)

पदार्थ का परिमाण

मोल

Mol (मोल)

भौतिक राशि

S.I. के संपूरक मात्रक

संकेत

समतल कोण

रेडियन

rad (रेड)

धन कोण

स्टेरिडियन

Sr (स्टे.)

  • स्पष्ट है कि उपरोक्त सात मूल राशियों (लंबाई, द्रव्यमान, समय, ताप, विद्युत धारा, ज्योति तीव्रता तथा पदार्थ का परिमाण) के मात्रकों पर आधारित मात्रक पध्दति को अंतरराष्ट्रीय पध्दति (International System of Units अथवा SI Units) कहते हैं।

  • मीटर की परिभाषा – 1 मीटर वह दूरी है, जिसमें शुध्द क्रिप्टन-86 से उत्सर्जित होने वाले नारंगी प्रकाश की 1,650,763.73 तरंगे आती हैं।

  • किलोग्राम की परिभाषा – 1 किलोग्राम, पेरिस में रखे प्लेटिनम-इरेडियम के एक विशेष टुकड़े का द्रव्यमान माना गया है। व्यवहार में, 1 किलोग्राम 40 C के 1 लीटर जल का द्रव्यमान होता है।

  • सेकंड की परिभाषा – 1 सेकंड वह समयांतराल है, जिसमें परमाणुक घड़ी में सीजियम-133 परमाणु 9,192,631,770 कंपन करता है।

  • एम्पियर की परिभाषा – 1 एम्पियर वैद्युत धारा वह धारा है, जो निर्यात में 1 मीटर की दूरी पर स्थित दो सीधे, अनंत लंबाई के समांतर तारों में प्रवाहित होने पर, प्रत्येक तार की प्रति मीटर लंबाई पर तारों के बीच 2´10-7 न्यूटन का बल उत्पन्न करती है।

  • केल्विन की परिभाषा – 1 केल्विन जल के त्रिक बिंदु (Triple Point) के ऊष्मागतिक ताप का 1/273.16 वां भाग है।

  • कैण्डेला की परिभाषा – 1 कैण्डेला, कृष्णिका के पृष्ठ के (1/600,000) मीटर2 क्षेत्रफल की, पृष्ठ के लंबवत दिशा में, ज्योति तीव्रता है, जब कृष्णिका का ताप प्लेटिनम के गलनांक के बराबर हो।

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भौतिक राशि

व्युत्पन्न मात्रक

1.   आयतन (लंबाई ´ चौड़ाई ´ ऊंचाई)

मीटर ´ मीटर ´ मीटर = मी3

2.   घनत्व (द्रव्यमान/आयतन)

किग्रा./मीटर3 = किग्रा.मीटर -3

3.   वेग (विस्थापन/समय)

मीटर/सेकंड = मी.से -1

4.   त्वरण (वेग परिवर्तन/समय)

मीटर/सेकंड/सेकंड = मी.से2

5.   बल (द्रव्यमान´त्वरण)

किग्रा.´मीटर/सेकंड2 (इसे न्यूटन भी कहते हैं)

6.   कार्य (बल ´ विस्थापन)

न्यूटन ´ मीटर (इसे जूल भी कहते हैं)

7.   शक्ति (कार्य/समय)

जूल/सेकंड = जूल-सेकंड -1

 

  • मोल की परिभाषा – 1 मोल किसी पदार्थ की वह मात्रा है, जिसमें उस पदार्थ के अवयवों की संख्या C-12 के 0.012 किग्रा. में परमाणुओं की संख्या के बराबर है।

  • व्युत्पन्न मात्रक – लंबाई, द्रव्यमान, समय, विद्युत धारा, ताप, ज्योति तीव्रता तथा पदार्थ के परिमाण के अतिरिक्त अन्य सभी भौतिक राशियों के मात्रक एक अथवा अधिक मूल मात्रकों पर उपयुक्त घातें लगाकर प्राप्त किए जाते हैं। ऐसे मात्रकों को व्युत्पन्न मात्रक कहते हैं।

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  • भौतिकी में शक्ति या विद्युत शक्ति वह दर है जिस पर कोई कार्य किया जाता है या ऊर्जा संचरित होती है। शक्ति का I. मात्रक वॉट है, जो जूल प्रति सेकंड के बराबर होता है।

       शक्ति (P) = कार्य (w) / समय (t)

  • बल (Force) का SI मात्रक न्यूटन या किलोग्राम मी./से2 होता है। किसी वस्तु पर लगा बल, वस्तु के द्रव्यमान तथा उसमें उत्पन्न त्वरण के गुणनफल के बराबर होता है।

       बल (Force) = द्रव्यमान ´ त्वरण

  • जब किसी वस्तु पर बल लगाकर विस्थापन उत्पन्न किया जाता है, तो बल द्वारा किया गया कार्य, बल तथा बल की दिशा में विस्थापन के गुणनफल के बराबर होता है। कार्य एक अदिश राशि (Scalar quantity) है। इसका मात्रक न्यूटन मीटर है, जिसे जूल (Joule) कहते हैं। जूल ऊर्जा का भी मात्रक है।

  • किसी पदार्थ की वैद्युत प्रतिरोधकता (Electrical Resistivity) से उस पदार्थ द्वारा विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करने की क्षमता का पता चलता है। कम प्रतिरोधकता वाले पदार्थ आसानी से विद्युत आवेश को चलने देते हैं। इसकी SI इकाई ओम-मीटर (Wm) है।

  • प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गई दूरी को एक प्रकाश वर्ष (Light Year) कहते हैं।

       1 प्रकाश वर्ष = 9.46 ´ 1015 मीटर

  • पारसेक (PARSEC) Parallactic Second का संक्षिप्त रुप है। इसका प्रयोग लंबी खगोलीय दूरी को व्यक्त करने के संदर्भ में होता है।

       1 पारसेक = 3 ´ 1016 मीटर

       1 प्रकाश वर्ष = 9.46 ´ 1015 मीटर

अतः   1 पारसेक – 3.262 प्रकाश वर्ष

  • नैनोमीटर लंबाई का एक सूक्ष्म मात्रक है। इसे nm संकेत द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 1 नैनोमीटर, मीटर का 1 अरबवां भाग होता है। इसका मान 10 एंग्स्ट्रॉम के बराबर होता है।

       1 नैनोमीटर (nm) = 1/1,00,00,00,000 मीटर = 10-9 मीटर

  • एम्पियर विद्युत धारा मापने की इकाई है। यदि किसी चालक तार में एक एम्पियर की धारा प्रवाहित हो रही है, तो इसका अर्थ है कि उस तार में प्रति सेकंड 6.25´1018 इलेक्ट्रॉन एक सिरे से प्रविष्ट होते हैं तथा इतने ही इलेक्ट्रॉन एक सिरे से प्रविष्ट होते हैं तथा इतने ही इलेट्रॉन प्रति सेकंड दूसरे सिरे से बाहर निकल जाते हैं।

  • मेगावॉट बिजली के मापने की इकाई है, जो विद्युत उत्पादन केन्द्र में उत्पन्न की जाती है। एक मेगावॉट, 106 (मिलियन) वॉट के बराबर होता है।

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  • त्वरण किसी गतिमान वस्तु के वेग में प्रति एकांक समयान्तराल में होने वाला परिवर्तन है। इसका मात्रक मीटर/सेकंड2 होता है। आवेग का मात्रक न्यूटन-सेकंड होता है।

  • दाब का एस.आई. मात्रक पास्कल है। सीजीएस (CGS) प्रणाली में बल का मात्रक डाइन है।

  • नॉट, समुद्री जहाज की गति मापने की इकाई है। नौसंचालन में प्रयुक्त दूरी को नॉटिकल मील में मापते हैं। कैलोरी ऊष्मा की मात्रा मापने की इकाई है।

  • जूल, कार्य एवं ऊर्जा का मात्रक है। एम्पियर, वॉट, वोल्ट एवं कैलोरी क्रमशः धारा, सामर्थ्य, विभवांतर और ऊष्मा के मात्रक हैं।

  • किसी कर्ता द्वारा कार्य करने की दर को उसकी शक्ति या सामर्थ्य (Power) कहते हैं। शक्ति का मात्रक जूल/सेकंड होता है, जिसे वॉट (Watt) कहते हैं।

       1 वॉट = 1 जूल/सेकंड

       1 अश्व शक्ति (Horse Power) = 746 वॉट

  • द्रव्य यांत्रिकी (Fluid Mechanics) के संदर्भ में मैक संख्या किसी माध्यम के सापेक्ष वस्तु के वेग (v) तथा उस माध्यम मे ध्वनि की चाल (a) का अनुपात है। अतः मैक उच्च वेग को प्रदर्शित करने हेतु प्रयुक्त होता है। तरंगदैर्ध्य का मापन एग्स्ट्रॉम में किया जाता है, जबकि दाब का मात्रक पास्कल तथा ऊर्जा का मात्रक जूल होता है।

  • 1 माइक्रॉन 10-6 मीटर लंबाई प्रदर्शित करता है। इसे m से प्रदर्शित करते हैं।

       1 माइक्रॉन = 0.000001 = मी.= 0.0001 सेमी

       = 1/10000 सेमी. = 1/104 सेमी. = 10-4 सेमी.

  • ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है, जो पदार्थों के मध्य तापांतर को व्यक्त करती है। ऊष्मा एक स्थान से दूसरे स्थान को स्थानांतरित होती है और यह स्थानांतरण हमेशा अधिक ताप वाले पदार्थ से कम ताप वाले पदार्थ के मध्य होता है। ऊष्मा का मापन कैलोरी, किलो कैलोरी, जूल, किलो जूल में किया जाता है। वॉट (W) के मापन के लिए प्रयुक्त की जाती है। वॉट = 1 जूल/सेकंड। कैलोरी, जूल एवं अर्ग ऊष्मा की इकाई हैं।

  • दूरी को मापने का एस.आई. मात्रक मीटर होता है। 1 किमी. 1000 मीटर के बराबर होता है। 1 मीटर, 100 सेमी. के बराबर होता है।

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  • द्रव्यमान मापने की लघु इकाइयां – मिलीग्राम, माइक्रोग्राम, नैनोग्राम, पिकोग्राम तथा फेम्टोग्राम होती हैं।

       1 पिकोग्राम    = 10-12 ग्राम

       1 माइक्रोग्राम   = 10-6 ग्राम

               1 फेम्टोग्राम    = 10-15 ग्राम

               1 मिलीग्राम     = 10-3 ग्राम

               1 नैनोग्राम     = 10-9 ग्राम

  • किसी तल के इकाई क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब (Pressure) कहते हैं। दाब एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है। दाब का मात्रक न्यूटन/मीटर2 होता है जिसे पास्कल (Pascal) कहते हैं।

       1 पास्कल = 1 न्यूटन/मीटर2

  • वायुमंडलीय दाब का गैर-SI मात्रक बार है, जो 105 न्यूटन/मी2 के समतुल्य होता है। इसे SI मात्रक के रुप में पास्कल द्वारा परिभाषित किया जाता है।

       1 बार = 105 पास्कल

  • पूर्व में तेल की मात्रा बैरेल में नापी जाती थी, अब इसे घन मीटर (Cubic Meters) में नापा जाता है।

       1 बैरेल    = 158.9873 लीटर

       1 बैरेल    = 0.158987 घन मीटर

       1 बैरेल    = 42 यू.एस.गैलन

       1 बैरेल    = 34.9723 यू.के. गैलन

  • 1 माइक्रॉन = 10-6 मीटर

1 नैनोमीटर   = 10-9 मीटर

1 एंग्स्ट्रॉम   = 10-10 मीटर

1 फर्मीमीटर  = 10-15 मीटर

  • जल प्रवाह की दर को मापने के लिए क्यूबिक फीट प्रति सेकंड (क्यूसेक) का प्रयोग किया जाता है। कम्प्यूटर के संदर्भ में बाइट डिजिटल सूचना की एक इकाई है। रिक्टर भूकंप की तरंगों की तीव्रता मापने का एक गणितीय पैमाना है। बार दाब की एक इकाई है, यह 100 किलो (105) पास्कल के बराबर होता है।

  • क्यूसेक (Cusec-Cubic Feet Per Second) जल बहाव की दर मापने की इकाई है।

  • वायुमंडल में ओजोन परत की मोटाई डॉब्सन में मापी जाती है। एक डॉब्सन इकाई मानक ताप और दाब पर 10 माइक्रो मीटर (mm) ओजोन परत को व्यक्त करती है। एक डॉब्सन इकाई (DU)69´1020 ओजोन अणु प्रति वर्ग मी. के समतुल्य होती है।

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मापक यंत्र एवं पैमाने

विभिन्न वैज्ञानिक उपकरण एवं उनके अनुप्रयोग

उपकरण

प्रयोग

अल्टीमीटर

ऊंचाई मापक यंत्र (मुख्यतः विमानों में प्रयोग होता है)

एमीटर

विद्युत धारा मापक यंत्र

एनीमोमीटर

वायु वेग मापी

एंटीनोमीटर (Antinometer)

सौर्य विकिरण मापक

एटमोमीटर (Atmometer)

वाष्पीकरण मापक

ऑडियोमीटर

ध्वनि की तीव्रता मापी यंत्र

बैरोग्राफ

वायुमंडलीय दाब का निरंतर मापन (Continuous Recording) करने  वाला यंत्र

बैरोमीटर

वायुमंडली  दाबमापी यंत्र

बोलोमीटर (Bolometer)

ऊष्मीय या विद्युत चुंबकीय विकिरण संसूचक यंत्र

कैलिपर्स

वस्तुओं के आंतरिक एवं बाह्य व्यास को मापने वाला यंत्र

कैलोरीमीटर

पदार्थ द्वारा अवशोषित या मुक्त की गई ऊष्मा की मात्रा को मापने वाला यंत्र

कार्डियोग्राफ

हृदय गति को रिकॉर्ड करने वाला उपकरण

क्रोनोमीटर

समय का पूर्ण परिशुध्दता के साथ मापन करने वाली घड़ी, जिसका प्रयोग मुख्यतः नाविकों द्वारा समुद्र में किया जाता है।

कोलोरीमीटर

रंगों की तीव्रता के मापन द्वारा पदार्थों की सांद्रता का पता लगाने में प्रयोग किया जाने वाला उपकरण

कैथेटोमीटर

ऊर्ध्वाधर दूरी/ऊंचाई मापक यंत्र

क्रायोमीटर (Cryometer)

एक प्रकार का थर्मामीटर, जिसका प्रयोग अति निम्न ताप को मापने के लिए किया जाता है।

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साइक्लोट्रॉन

एक प्रकार का कण त्वरक, जो आवेशित कणों की गति को बढ़ाने में प्रयुक्त होता है।

क्रेस्कोग्राफ

पौधों की वृध्दि को मापने वाला उपकरण

डिलैटोमीटर (Dilatometer)

पदार्थों के आयतन में होने वाले परिवर्तनों की मापने वाला उपकरण

डिप सर्किल (Dip Circle)

इस यंत्र की मदद से किसी स्थान के नतिकोण (Dip Angle) का मान ज्ञात किया जाता है।

डायनेमो

यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने वाला उपकरण

डायनेमोमीटर

बल, बल-आघूर्ण (Torque) या शक्ति को मापने वाला उपकरण

इलेक्ट्रोइनसिफलोग्राफ (E.E.G.)

मस्तिष्क की विद्युतीय गतिविधि को मापने वाला यंत्र

इलेक्ट्रोमीटर

विद्युत आवेश या विद्युत विभवांतर का मापन करने वाला उपकरण

इलेक्ट्रोस्कोप

किसी निकाय में विद्युत आवेश की उपस्थिति का पता लगाने वाला उपकरण

इवैपोरिमीटर (Evaporimeter)

वायुमंडल में जल के वाष्पीकरण की  दर का मापन करने वाला उपकरण

एंडोस्कोप

शरीर के आंतरिक  अंगो का निरीक्षण करने वाला यंत्र

फैदोमीटर

सागर की गहराई मापने की युक्ति

फ्लक्स मीटर

चुंबकीय प्रवाह मापक यंत्र

गैल्वेनोमीटर (Galvanometer)

विद्तुयत धारा मापी यंत्र

ग्रेवीमीटर (Gravimeter)

गुरुत्वीय त्वरण मापक यंत्र

जायरोस्कोप

कोणीय वेग मापक यंत्र

हाइड्रोमीटर

द्रवों/जल के तुलनात्मक घनत्व का मापन करने वाला यंत्र

हाइग्रोमीटर

वायुमंडल की सापेक्षिक आर्द्रता का मापन करने वाला यंत्र

हाइड्रोफोन

अंतर्जलीय ध्वनि को रिकॉर्ड करने वाला उपकरण

हाइग्रोस्कोप

वातावरण में उपस्थित आर्द्रता के परिवर्तन को दर्शाता है।

हिप्सोमीटर

दी गई ऊंचाई पर  जल के क्वथनांक को ज्ञात कर ऊंचाई का मापन करने वाला उपकरण

काइमोग्राफ

विभिन्न शीरीरिक गतिविधियों (जैसे रक्तचाप, मांसपेशियों का संकुचन आदि) के परिवर्तन का ग्राफ में रेखांकन करने वाला उपकरण

लैक्टोमीटर

दूध की गुणवत्ता का पता लगाने के लिए उसके आपेक्षिक घनत्व का मापन करने वाला उपकरण

लक्सीमीटर

प्रकाश की तीव्रता नापने का उपकरण

लिसीमीटर (Lysimeter)

वास्तविक वाष्पोत्सर्जन मापक यंत्र 

मैग्नेटोमीटर

किसी चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता तथा दिशा का मापन करने वाला उपकरण।

मैनोमीटर

द्रवों या गैसों के  दाब का मापन करने वाला उपकरण

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माइक्रोफोन

यह यंत्र ध्वनि तरंगो को विद्युत स्पंदनों में परिवर्तित करता है।

माइक्रोटोम

ऐसा यंत्र,  जो अणुवीक्षणीय निरीक्षण के लिए   किसी वस्तु को छोटे-छोटे भागो में विभाजित कर देता है।

नेफोस्कोप (Nephoscope)

बादलों की ऊंचाई, वेग तथा गति की दिशा का मापन करने वाला यंत्र।

ओडोमीटर

किसी वाहन द्वारा तय की गई दूरी का मापन करने वाला उपकरण।

पेरिस्कोप

ओट या आवरण में रहते हुए प्रेक्षक को अपने आस-पास की वस्तुओं को  देखने में समर्थ बनाने वाला उपकरण।

इस ऑप्टिकल यंत्र के द्वारा ऐसी वस्तुओं को भी देखा ज  सकता है,  जो प्रत्यक्ष दृष्टि-रेखा में नहीं है। इसके द्वारा जलमग्न अवस्था में पनडुब्बी से पानी  की सतह का अवलोकन किया जा सकता है।

फोनोग्राफ (Phonograph)

ध्वनि की यांत्रिक रिकॉर्डिंग एवं पुनरुत्पादन करने वाला  उपकरण।

फोटोमीटर

प्रकाश-तीव्रता मापक यंत्र

पोटेंशियोमीटर (Potentiometer)

किसी सेल के ईएमएफ (Electromotive Force) का मापन करने वाला उपकरण

पिक्नोमीटर

द्रवों के विशिष्ट गुरुत्व का मापन करने वाला यंत्र

पाइरहिलियोमीटर

सौर विकिरण का मापन करने वाला यंत्र

पाइरोमीटर

उच्च तापमान के मापन में प्रयुक्त होने वाला उपकरण

साइक्रोमीटर (Psychrometer)

सापेक्षिक आर्द्रता का मापन करने वाला उपकरण

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रेन गेज (Rain Gauge)

वर्षण (वर्षा, बर्फ, ओला इत्यादि) की मात्रा का मापन करने वाला  उपकरण।

इसे यूडोमीटर, प्लूवियोमीटर या  ओम्ब्रोमीटर भी कहते हैं।

रेडियोमीटर

विकिरण द्वारा प्राप्त ऊर्जा मापने का यंत्र

रिफ्रैक्टोमीटर (Refractometer)

अपवर्तनांक (Index of Refraction) का मापन करने वाला यंत्र

सैलीनोमीटर (Salinometer)

किसी विलयन की लवणता का मापन करने वाला यंत्र

सोलेरिमीटर (Solarimeter)

सौर विकिरण की तीव्रता मापक यंत्र

सैक्रीमीटर (Saccharimeter)

किसी शर्करा-युक्त विलयन की सांद्रता का मापन करने वाला उपकरण।

सेक्सटेंट (Sextant)

दो वस्तुओं के बीच कोणीय दूरी का मापन करने वाला उपकरण।

इसका उपयोग खगोलीय पिण्डों की ऊंचाई का पता लगाने के लिए किया जाता है।

स्फिग्नोमैनोमीटर

रक्तचाप का मापन करने वाला उपकरण

स्टेथोस्कोप

हृदय गति सुनने में प्रयुक यंत्र

स्पीडोमीटर

किसी वाहन की गति प्रदर्शित करने वाला उपकरण।

टैकोमीटर (Tachometer)

वस्तुओं जैसे इंजन या शॉफ्ट आदि की घूर्णन गति का मापन करने वाला उपकरण।

इसका प्रयोग व्यापक रुप से ऑटोमोबाइल, विमान आदि में किया जाता है।

विस्कोमीटर (Viscometer)

किसी तरल की श्यानता का मापन करने वाला यंत्र

विण्ड-वेन (Wind-Vane)

पवन की दिशा मापक यंत्र

पोलीग्राफ

झूठ का पता लगाने वाला यंत्र

गाइरोस्कोप

घूमती हुई वस्तुओँ की गति नापने का यंत्र

काइमोग्राफ

शरीर की क्रियाओँ को ग्राफ द्वारा निरुपित करने वाला यंत्र (जैसे रक्तचाप, हृदय की धड़कन आदि)

सीस्मोग्राफ

भूकंप की तीव्रता मापक यंत्र

रिक्टर स्केल

भूकंप की तीव्रता मापने का एक पैमाना

लक्समीटर

प्रकाश की तीव्रता नापने का यंत्र

ब्यूटिरोमीटर (Butyrometer)

दूध या दुग्ध उत्पादों में वसा की मात्रा को मापने का उपकरण

 

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  • समुद्र के भीतर छिपी हुई वस्तु, पनडुब्बी अथवा आइसबर्ग का पता लगाने के लिए सोनार (SONAR) का प्रयोग करते हैं। SONAR का पूर्ण रुप है – Sound Navigation And Ranging। इसमें पराश्रव्य तरंगों को समुद्र के भीतर भेजा जाता है। परावर्तित होकर लौटने पर तरंगों से वस्तु की स्थिति का पता लगाते हैं। सोनार का प्रयोग नौसंचालकों द्वारा किया जाता है।

  • टैकियोमीटर (Tacheometer) एक प्रकार का सर्वेक्षण उपकरण है जिसे क्षैतिज दूरियों, लंबवत उन्नयनों एवं दिशाओं के त्वरित मापन हेतु डिजाइन किया गया है।

  • पाइरोमीटर या पूर्ण विकिरण उत्तापमापी (Total Radiation Pyromete) की सहायता से अत्यधिक उच्च तापों की माप की जाती है। यह तापमापी स्टीफेन के नियम पर आधारित है, जिसके अनुसार उच्च ताप पर किसी वस्तु से उत्सर्जित विकिरण की मात्रा इसके परमताप के चतुर्थ घात के अनुक्रमानुपाती (EaT4) होती है। इसकी सहायता से दूर की वस्तुओं यथा- सूर्य आदि के ताप का मापन किया जाता है। इस तापमापी से लगभग 8000 C से नीचे का ताप नहीं मापते क्योंकि इससे कम ताप पर वस्तुएं ऊष्मीय विकिरण का उत्सर्जन नहीं करती हैं।

  • 15000 C से अधिक ताप मापन हेतु पायरोमीटर प्रयोग में लाया जाता है।

  • थर्मोरिस्टर (Thermoresister) एक उपकरण है, जो इलेक्ट्रॉनिक थर्मामीटर की भांति कार्य करता है। यह उपकरण तापमान में परिवर्तन के साथ अपने प्रतिरोध को बदलता है।

  • रडार (RADAR) शब्द मूलतः एक संक्षिप्त रुप है जिसका पूर्ण रुप है Radio Detection & Ranging यह वस्तुओं का पता लगाने वाली एक प्रणाली है, जो सूक्ष्म तरंगों का उपयोग करती है। इसके द्वारा रेडियो तरंगों के माध्यम से दूर की वस्तुओं की स्थिति, ऊंचाई,  दिशा या गति ज्ञात की जाती है।

  • क्रैस्कोग्राफ पौधों में वृध्दि मापने का एक यंत्र है, जिसका आविष्कार भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस ने वर्ष 1900 में किया था।

  • गीगर काउंटर एक प्रकार का कण अनुवेदक (Particle Detector) है, जो आयनित विकिरण को मापता है।

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यांत्रिकी

(द्रव्यमान, बल, त्वरण, कार्य, ऊर्जा, संवेग, गति)

  • यांत्रिकी (Mechanics) – भौतिक विज्ञान की वह शाखा है, जिसमें पिण्डों पर बल लगाने या उन्हें विस्थापित करने पर उनके व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।

  • भार (Weight) – किसी वस्तु पर पृथ्वी द्वारा लगाया गया आकर्षक बल, उस वस्तु का भार कहलाता है।

  • द्रव्यमान (Mass) – किसी वस्तु या पदार्थ के परिमाण को उस वस्तु/पदार्थ का द्रव्यमान कहते हैं। किसी वस्तु का द्रव्यमान प्रत्येक स्थान पर स्थिर रहता है। इसे m व्यक्त करते हैं।

क्र.सं.

भार (W)

द्रव्यमान (m)

1.    

पृथ्वी का आकर्षण बल

वस्तु या पदार्थ का परिमाण

2.    

इसका मात्रक न्यूटन होता है।

इसका मात्रक ग्राम या किग्रा. होता है।

3.    

यह एक सदिश राशि है।

यह एक अदिश राशि है।

4.    

वस्तु का भार भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न हो सकता है।

किसी वस्तु का द्रव्यमान प्रत्येक स्थान पर अचर रहता है।

 

दूरी एवं विस्थापन

  • प्रतिदिन की भाषा में दूरी (Distance) और विस्थापन (Displacement) एक ही अर्थ में प्रयोग किए जाते हैं, परंतु भौतिकी में इन दोनों शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं।

  • जब एक वस्तु एक बिंदु से दूसरे बिंदु की ओर चलती हैं, तो चली गई दूरी वस्तु द्वारा तय किए गए अप्रत्यक्ष मार्ग की वास्तविक लंबाई होती है, जबकि विस्थापन, प्रारंभिक और अंतिम स्थितियों के बीच सीधी रेखा मार्ग को बतलाता है। इसलिए, गतिशील वस्तु द्वारा चला गई दूरी जो भी हो, वस्तु का विस्थापन सदैव वस्तु की प्रारंभिक और अंतिम स्थितियों के बीच सबसे कम दूरी द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

  • चली गई दूरी में केवल परिमाण (Magnitude) होता है, जबकि विस्थापन में परिमाण के साथ-साथ दिशा भी होती है। स्पष्ट है कि दूरी एक अदिश राशि है, जबकि विस्थापन एक सदिश राशि है। गतिशील वस्तु द्वारा चली गई दूरी शून्य नहीं हो सकती है, परंतु वस्तु का अंतिम विस्थापन शून्य हो सकता है। किसी गतिशील वस्तु का विस्थापन शून्य  तब होगा जब एक निश्चित दूरी चलने के बाद अंततः अपने प्रारंभिक बिंदु पर वापस आ जाती है।

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चाल एवं वेग

  • किसी वस्तु की चाल, उसके द्वारा प्रति इकाई समय में चली गई दूरी है।

अतः   चाल = चली गई दूरी / समय

  • चाल एक अदिश राशि है और इसका एस.आई. मात्रक मीटर/सेकंड होता है। किसी वस्तु का वेग उसमें प्रति इकाई समय मे उत्पन्न विस्थापन होता है।

  • वेग = विस्थापन/समय

  • चाल एवं वेग में अंतर यह है कि चाल में केवल परिमाण होता है, उसमें कोई विशिष्ट दिशा नहीं होती है। जबकि वेग परिमाण के साथ-साथ दिशा भी होती है। अतः वेग एक सदिश राशि है।

  • त्वरण – किसी वस्तु के त्वरण को समय के साथ उसके वेग में परिवर्तन की दर के रुप में परिभाषित किया गया है।

  • त्वरण = वेग परिवर्तन/समय

Þ = अंतिम वेग – प्रारंभिक वेग/समय

  • यदि वस्तु का प्रारंभिक वेग u हो तथा t समय पश्चात अंतिम वेग v हो, तो ,

       त्वरण(a) = v-u/t

  • त्वरण का SI मात्रक मीटर/सेकंड2

न्यूटन के गति के नियम

  • पिण्डों (अथवा वस्तुओं) की गति का वर्णन करने के लिए न्यूटन ने तीन नियम परिभाषित किए हैं। इन नियमों को न्यूटन की गति का नियम कहा जाता है। न्यूटन के गति के नियम बल की परिशुध्द परिभाषा देते हैं और वस्तु पर लगाए गए बल तथा उसके प्राप्त की गई गति की अवस्था के बीच संबंध स्थापित करते हैं।

  1. न्यूटन का गति का प्रथम नियम

  • प्रथम नियम के अनुसार, कोई विरामस्थ वस्तु, विरामस्थ ही बनी रहेगी और गतिमान वस्तु निरंतर एकसमान चाल से सीधी रेखा में गतिमान रहेगी, जब तक कि उसकी विरामावस्था अथवा एकसमान गति की अवस्था में परिवर्तन के लिए बाहरी बल के द्वारा उसे बाध्य नहीं किया जाता।

  • उल्लेखनीय है कि किसी वस्तु के विरामस्थ रहने की अथवा यदि गतिमान है, तो एक सीधी रेखा में निरंतर गतिमान रहने की प्रवृत्ति जड़त्व (Inertia) कहलाती है।

  • वास्तव में द्रव्यमान किसी वस्तु के जड़त्व की माप है। वस्तु में यदि अधिक द्रव्यमान होता है, तो उसमें जड़त्व भी अधिक होता है अर्थात हल्की वस्तुओं की अपेक्षा भारी वस्तुओं में अधिक जड़त्व होता है।

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  1. न्यूटन का गति का द्वीतीय नियम

  • न्यूटन के गति के प्रथम नियम से यह स्पष्ट है कि किसी वस्तु पर बाह्य बल लगाने में उसकी गति में परिवर्तन होता है। गति में परिवर्तन होने का अर्थ वस्तु में त्वरण के उपस्थित होने से है। अतः किसी वस्तु पर बल लगाने से उसमें त्वरण उत्पन्न होता है।

  • प्रयोगों द्वारा यह देखा गया है कि किसी वस्तु पर आरोपित बल F उस वस्तु के द्रव्यमान m तथा वस्तु में बल की दिशा में उत्पन्न त्वरण a के गुणनफल के बराबर होता है।

  • बल = द्रव्यमान ´ त्वरण

   F = m x a

  • इस समीकरण को ही न्यूटन का गति का द्वीतीय नियम कहते हैं। बल का SI मात्रक न्यूटन है। 1 न्यूटन वह बल है, जो 1 किग्रा. द्रव्यमान की वस्तु पर लगाए जाने पर उसमें 1 मी/सेकंड2 का त्वरण उत्पन्न करत है।

  1. न्यूटन का गति का तृतीय नियम

  • गति के तृतीय नियम के अनुसार, जब कभी एक वस्तु किसी दूसरी वस्तु पर लगाती है, तो दूसरी वस्तु भी पहली वस्तु पर बराबर और विपरीत दिशा में लगाती है।

  • पहली वस्तु द्वारा दूसरी वस्तु पर लगाए गए बल को क्रिया कहते हैं और दूसरी वस्तु द्वारा पहली वस्तु पर लगाए गए बल को प्रतिक्रिया कहते हैं। क्रिया एवं प्रतिक्रिया परिमाण में बराबर तथा दिशा में एक-दूसरे के विपरीत होती हैं। अतः न्यूटन के तृतीय नियम को क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम भी कहते हैं।

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संवेग (Momentum)

  • किसी वस्तु के संवेग को उस वस्तु के द्रव्यमान और वेग के गुणनफल के रुप में परिभाषित किया जाता है।

       \      संवेग (P) = द्रव्यमान (m) ´ वेग (v)

  • संवेग एक सदिश राशि है, जिसकी दिशा वेग की दिशा में ही होती है। प्रत्येक गतिमान वस्तु में संवेग होता है। संवेग का SI मात्रक किग्रा. मीटर/सेकंड होता है।

संवेग परिवर्तन

  • किसी वस्तु के संवेग-परिवर्तन की दर वस्तु पर लगे बाह्य बल के अनुक्रमानुपाती होती है। संवेग में परिवर्तन सदैब बल की दिशा में ही होती है। यह न्यूटन के गति के द्वीतीय नियम का ही एक अन्य रुप है।

स्पष्ट  है कि बल a संवेग में परिवर्तन / समय

  • यदि किसी m द्रव्यमान की वस्तु का प्रारंभिक वेग u हो, तो इसका प्रारंभिक संवेग = mu , t समय तक इस पर बल F के कार्य करने पर इसका अंतिम वेग v हो जाता है। अतः वस्तु का अंतिम संवेग = mv

\  संवेग में परिवर्तन = mv-mu

अतः F a mv-mu/t

Þ      F a m (v-u)/t

Þ      F a ma

अतः F =  Kma

SI मात्रकों में स्थिरांक K का मान 1 होता है,

\   F = 1xmxa

Þ      F = ma

जो कि न्यूटन का गति का द्वीतीय नियम है।

संवेग संरक्षण का नियम

  • यदि दो अथवा दो से अधिक पिण्डों के समुदाय पर कोई बाह्य बल कार्य न करे, तो समुदाय का संयुक्त संवेग स्थिर (अथवा संरक्षित) बना रहता है। इसे ही संवेग संरक्षण का नियम कहते हैं।

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कार्य

  • यदि किसी वस्तु पर बल लगाकर उसकी स्थिति में परिवर्तन किया जाता है, तो इसमें जो क्रिया संपन्न होती है उसे कार्य कहते हैं। यदि बल लगाने पर वस्तु की स्थिति में परिवर्तन न हो, तो कार्य किया हुआ नहीं माना जाएगा।

  • किसी वस्तु पर किए गए कार्य का मान, लगाए गए बल तथा बल की दिशा में वस्तु के विस्थापन के गुणनफल के बराबर होता है।

\  कार्य = बल ´ बल की दिशा में विस्थापन

  • यदि किए गए कार्य, प्रयुक्त बल और बल की दिशा में विस्थापन को क्रमशः W, F तथा s से निर्दिष्ट किया जाए, तो W =  F ´ s

  • यदि बल F, पिण्ड के विस्थापन की दिशा में न होकर उससे q कोण बना रहा है, तो किया गया कार्य W =  F cos q ´ s जहां F cos q विस्थापन की दिशा में बल का घटक है।

  • कार्य एक अदिश राशि है। कार्य का मात्रक जूल (Joule) होता है, यदि 1 न्यूटन का बल किसी पिण्ड को बल की दिशा में 1 मीटर विस्थापित कर दे, तो किया गया कार्य 1 जूल होगा।

1 जूल  = 1 न्यूटन ´ 1 मीटर

शक्ति अथवा सामर्थ्य (Power)

  • किसी मशीन अथवा कर्ता के द्वारा कार्य करने की दर को सामर्थ्य कहते हैं।

\   शक्ति = कार्य / समय

  • यदि कोई कर्ता t समय में w कार्य करता है, तो उसकी

शक्ति (P) = कार्य (W)/समय (t)

  • शक्ति का मात्रक जूल/सेकंड होता है। इसे वॉट कहते हैं। शक्ति का एक अन्य मात्रक अश्व-सामर्थ्य (Horse Power) भी कहते हैं।

1 अश्व-सामर्थ्य = 746 वॉट

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ऊर्जा (Energy)

  • किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता उसकी ऊर्जा कहलाती है। ऊर्जा के अनेक रुप हैः जैसे यांत्रिक ऊर्जा, ऊष्मा ऊर्जा, प्रकाश ऊर्जा, ध्वनि ऊर्जा इत्यादि। ऊर्जा एक अदिश राशि है। इसका मात्रक जूल होता है।

यांत्रिक  ऊर्जा –

यह किसी पिण्ड को कुछ यांत्रिक कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है। यह दो प्रकार की होती हैः –

  1. गति ऊर्जा

  2. स्थितिज ऊर्जा

एक पिण्ड की स्थितिज एवं गतिज ऊर्जाओं का कुल योग इसकी यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है।

यांत्रिक ऊर्जा = गतिज ऊर्जा +  स्थितिज ऊर्जा

गतिज ऊर्जा

यह वह ऊर्जा है, जो किसी वस्तु में उसकी गति के कारण होती है। यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान m किग्रा. तथा चाल v मी./से. हो,  तो उस वस्तु की गतिज ऊर्जा

KE = ½ mv2

स्थितिज ऊर्जा

यह वह ऊर्जा है, जो किसी वस्तु या निकाय की स्थिति अथवा दशा के कारण होती है। स्पष्ट है कि यदि कोई वस्तु किसी बल के अंतर्गत एक स्थिति से दूसरी स्थिति में लाई जाए, तो इस दौरान किया गया कार्य ही वस्तु की स्थितिज ऊर्जा के रुप में संचित होता है। स्थितिज ऊर्जा के कई रुप होते हैं जैसे – प्रत्यास्थ ऊर्जा, गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा, वैद्युत स्थितिज ऊर्जा इत्यादि।

  • साधारण यंत्र किसी व्यक्ति द्वारा कम बल प्रयोग करके भी उतनी ही मात्रा में काम करने में सहायता करते हैं।

  • व्यक्ति के गहरी सांस लेने (Inhale) या सांस बाहर छोड़ने (Exhale) दोनो ही परिस्थितियों में तराजू की रीडिंग घटेगी अर्थात तराजू द्वारा व्यक्ति का वजन कम दर्शाया जाएगा।

  • वह प्रतिक्रिया बल जो परिमाण में अभिकेन्द्रीय बल के बराबर होता है परंतु जिसकी दिशा अभिकेन्द्रीय बल के विपरीत (अर्थात केन्द्र से बाहर की ओर) होती है, अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Face) कहलाता है। कपड़ा साफ करने की मशीन, दूध से मक्खन निकालने की मशीन आदि अपकेन्द्रीय बल के सिध्दांत पर कार्य करते हैं।

  • वे राशियां जिनको व्यक्त करने के लिए दिशा एवं परिमाण दोनों की आवश्यकता होती है, सदिश राशियां कहलाती हैं। जिन राशियों को व्यक्त करने के लिए केवल परिमाण की आवश्यकता होती है दिशा की नहीं, उन्हें अदिश राशियां कहते हैं। अतः बल, वेग, विस्थापन, त्वरण, संवेग, आवेग आदि सदिश राशियां हैं, जबकि आयतन अदिश राशि है।

  • ऊर्जा संरक्षण के मूल सिध्दांत के अनुसार, ऊर्जा का न तो सृजन हो सकता है और न ही ऊर्जा का विनाश हो सकता है।

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  • बहती हुई हवा (Wind) मे केवल गतिज ऊर्जा होती है। हवाओं की गतिज ऊर्जा को ऊर्जा के अन्य रुप जैसें विद्युत या यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है।

  • बहती वायु से उत्पन्न की गई ऊर्जा को पवन ऊर्जा कहते हैं। पवन ऊर्जा के उत्पादन के लिए हवादार जगहों पर पवन चक्कियों का लगाया जाता है, जिनके द्वारा वायु की गतिज ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। इस यांत्रिक ऊर्जा को जनित्र की मदद से विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है।

  • यात्री ट्रेन के एकाएक चल देने से पीछे की ओर गिर जाता है। इसका कारण यह है कि यात्री के शरीर का निचला हिस्सा जो गाड़ी के संपर्क में है, यह हिस्सा गाड़ी के साथ-साथ चलने लगता है परंतु ऊपरी हिस्सा स्थिरता के जड़त्व के कारण विरामावस्था में ही बने रहने का प्रयत्न करता है। फलतः यात्री के शरीर का ऊपरी हिस्सा पीछे की ओर झुक जाता है।

  • घर्षणहीन पृष्ठ पर कोई भी व्यक्ति गति नहीं कर सकता क्योंकि किसी भी प्रकार की गति के लिए घर्षण आवश्यक है। हालांकि पूर्णतः घर्षणरहित सतह पर कोई व्यक्ति सीटी बजाकर अपने की गति में ला सकता है। सीटी बजाने के लिए व्यक्ति एक दिशा में हवा छोड़ेगा जिसके परिणामस्वरुप विपरीत दिशा में वह गति करने लगेगा।

  • भरी हुई गाड़ी को चलाने में उसे चलायमान रखने के लिए आवश्यक बल से अपेक्षाकृत अधिक बल लगाना पड़ता है क्योंकि एक बार गाड़ी चल देने के बाद घर्षण कम होता है।

  • यदि किन्हीं वस्तुओं की गतिज ऊर्जा समान हैं और उन पर समान अवरोधक बल लगाए जाएं, तो वे समान दूरी पर ही रुकेंगी।

  • समतल सड़क पर समान त्वरण से गति करने के कारण टैंकर में उपस्थित तेल का मुक्त पृष्ठ तनाव के कारण परवलयी वक्र का आकार ग्रहण कर लेगा।

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गुरुत्व के अधीन गति

  • ग्रहों की गति – सूर्य के चारों ओर कुछ पिंड अपनी-अपनी कक्षाओं (Orbits) में परिक्रमण करते रहते हैं, जिन्हें ग्रह (Planets) कहते हैं। किसी ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करते पिंडों को उस ग्रह का उपग्रह कहा जाता है। पृथ्वी का एक मंगल के दो उपग्रह हैं। शनि के 61 एवं बृहस्पति के सर्वाधिक 69 उपग्रह हैं।

  • ग्रहों की गति संबंधी केपलर के नियम

  • जर्मन खगोलशास्त्री जोहानेस केपलर ने सूर्य के चारों ओर ग्रहों की गति संबंध में निम्न तीन नियम प्रतिपादित किए हैं –

प्रथम नियम – सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षाओं में परिक्रमण करते हैं तथा सूर्य के एक फोकस पर होता है।

द्वीतीय नियम – सूर्य से किसी ग्रह को मिलाने वाली रेखा समान समयांतरालों मे समान क्षेत्रफल पार (Sweep) करती है।

द्वीतीय नियम यह स्पष्ट करता है कि जब ग्रह सूर्य से दूरस्थ होता है, तो उसकी चाल न्यूनतम प्रतीत होती है तथा जब वह सूर्य के समीपस्थ होता है, तो उसकी चाल अधिकतम होती है।

तृतीय नियम – किसी ग्रह के परिक्रमणकाल का वर्ग, उसकी दीर्घवृत्ताकार कक्षा के अर्ध्द-दीर्घ कक्ष (Semi-Major-Axis) की तृतीय घात (घन) के अनुक्रमानुपाती होता है।

  • न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम

  • न्यूटन का मत था कि इस विश्व में प्रत्येक पिंड प्रत्येक दूसरे पिंड को एक बल द्वारा अपनी ओर आकर्षित करता है। इस सर्वव्यापी आकर्षण-बल को गुरुत्वाकर्षण कहते हैं। इस आधार पर न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण संबंधी निम्न नियम प्रतिपादित किएः-

“दो पिण्डों के मध्य लगने वाले आकर्षण बल का परिमाण दोनों पिण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनकी बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।”

  • गणितीय रुप में न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियम को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता हैः-

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यदि दो पिण्ड जिनके द्रव्यमान क्रमशः m1 तथा m2 हैं, एक-दूसरे से r दूरी पर स्थित हों, तो उनके बीच कार्य करने वाला आकर्षण बल

   F a m1m2/r2

Þ F = G´ m1m2/r2

जहां G अनुक्रमानुपाती स्थिरांक है, जिसे न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक कहते हैं। यदि बल न्यूटन में, दूरी (r) मीटर में तथा द्रव्यमान (m1 व m2) किग्रा. में हों, तो G का मात्रक न्यूटन.मीटर2/किग्रा.2 होगा। प्रयोगों द्वारा G का मान 6.67´10-11 न्यटून.मीटर2/किग्रा.2 ज्ञात किया गया है।

गुरुत्व एवं पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण

  • गुरुत्व (Gravity) वह आकर्षण बल है, जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केन्द्र की ओर खींचती है। स्पष्ट है कि गुरुत्व, गुरुत्वाकर्षण का एक विशिष्ट उदाहरण है। जब कोई वस्तु मुक्त रुप से फेंकी/छोड़ी जाती है, तो वह पृथ्वी के गुरुत्व के कारण पृथ्वी की ओर गिरने लगती है तथा उसके गिरने का वेग बराबर बढ़ता रहता है। अतः उसकी गति में त्वरण उत्पन्न हो जाता है। इसी त्वरण को पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण कहते हैं। इसे g से प्रदर्शित करते हैं। गुरुत्वीय त्वरण का मात्रक मीटर/सेकंड2 होता है।

  • g तथा G में संबंध

पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण

               g = G Me/Re2

जहां   G = गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक

       Me = पृथ्वी का द्रव्यमान

       Re = पृथ्वी की त्रिज्या

स्पष्ट है कि g का मान वस्तु के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है। अतः यदि भिन्न-भिन्न द्रव्यमानों की दो वस्तुएं मुक्त रुप से (वायु की अनुपस्थिति में) ऊपर से गिराई जाएं, तो उनमें समान त्वरण उत्पन्न होगा। यदि वे एक ही ऊंचाई से गिराई गई हैं, तो एक-साथ ही पृथ्वी पर पहुंचेंगी। हालांकि वायु की उपस्थिति में उत्प्लावन प्रभाव व श्यान कर्षण के कारण वस्तुओँ के त्वरण भिन्न-भिन्न होंगे। इस दशा में भारी वस्तु पृथ्वी पर पहले पहुंचेगी। पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण g का मान पृथ्वी तल पर विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होता है। पृथ्वी तल से ऊपर अथवा नीचे जाने पर भी g के मान में परिवर्तन होता है।

पृथ्वी तल पर g का मान विषुवत रेखा पर सबसे कम तथा ध्रुवों पर सबसे अधिक होता है।

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  • उपग्रह की कक्षीय चाल

जब कोई उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर वृत्तीय कक्षा में परिक्रमण करता है, तो उस पर एक अभिकेन्द्र बल कार्य करता है। यह बल पृथ्वी द्वारा उपग्रह पर लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल होता है।

यदि m द्रव्यमान का एक उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर r त्रिज्या की वृत्तीय कक्षा में v0 चाल से परिक्रमण कर रहा है, तो उपग्रह पर अभिकेन्द्र बल

       = mv02/r

चूंकि गुरुत्वाकर्षण बल ही अभिकेन्द्र बल है, अतः

       GMem/r2  =mv02/r

Þ   v0 = ÖGMe/r       ………………………. (1)

जहां G गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक तथा Me पृथ्वी का द्रव्यमान है।

हमें ज्ञात है कि

g = GMe/Re2

ÞGMe = gRe2                           …………………………… (2)

समी. (2) एवं समी. (1) से

v0 = ÖgRe2/r

\  v0 = Re Ög/r

  • पलायन वेग

सामान्यतः यदि हम किसी पिण्ड को ऊपर की ओर फेंकते हैं, तो वह पिण्ड कुछ ऊंचाई तक जाकर पुनः पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण वापस लौट आता है। लेकिन पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है, जिससे किसी पिण्ड को ऊर्ध्वाधर ऊपर की ओर फेंकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र से बाहर निकल जाता है और पृथ्वी पर कभी वापस नहीं लौटता है। पलायन वेग से फेंकने के लिए पिण्ड को दी गई गतिज ऊर्जा पलायन ऊर्जा कहलाती है।

यदि पृथ्वी का द्रव्यमान = Me

पृथ्वी की त्रिज्या = Re

तो पलायन वेग

ve = Ö2GMe/Re

जहां G गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक है।

स्पष्ट है कि पलायन वेग पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है।

यदि पृथ्वी पर गुरुत्वीय त्वरण g है, तो 

               g = GMe/Re2

Þ         GMe = gRe2

\           ve = Ö2gRe2/Re

               = Ö2gRe

गुरुत्वीय त्वरण (g) = 9.8 मीटर/सेकंड2

तथा पृथ्वी की त्रिज्या (Re) = 6.37 ´ 106 मीटर का मान रखने पर

Ve = Ö2×9.8×6.37×106

= 11.2 x 103  मीटर/सेकंड

ve = 11.2 किमी./सेकंड

स्पष्ट है कि यदि किसी पिण्ड को 11.2 किमी./सेकंड के वेग से ऊपर की ओर फेंका जाए, तो वह पिण्ड पृथ्वी पर कभी भी लौटकर नहीं आएगा।

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  • कक्षीय चाल एवं पलायन वेग में संबंध

पृथ्वी के समीप किसी उपग्रह की कक्षीय चाल v0 तथा पृथ्वी तल से फेंकी गई किसी वस्तु का पलायन वेग ve हो, तो

ve = Ö2 v0

स्पष्ट है कि यदि पृथ्वी के समीप चलकर काटते किसी उपग्रह की कक्षीय चाल किसी कारणवश बढ़कर Ö2 गुनी हो जाए, तो वह उपग्रह अपनी कक्षा को छोड़कर पलायन कर जाएगा।

  • सरल आवर्त गति

जब कोई कण अपनी माध्य स्थिति के दोनों ओर सरल रेखा में दोलन गति करता है, तो उस गति को सरल आवर्त गति कहते हैं।

स्प्रिंग से लटके किसी पिण्ड का दोलन तथा किसी सरल लोलक (Simple Pendulum) का  दोलन आदि, सरल आवर्त गति की ही उदाहरण हैं।

  • सरल लोलक

यदि लंबाई में न बढ़ने वाली, ऐंठन रहित भारहीन डोरी के एक सिरे पर पदार्थ के अत्यंत सूक्ष्म किंतु भारी कण को लटकाकर, डोरी के दूसरे सिरे को घर्षण रहित दृढ़ आधार से बांध दें, तो इस प्रकार बना हुआ निकाय सरल लोलक कहलाता है।

प्रयोगशाला में धातु के किसी ठोस गोले को एक हल्के व पतले धागे से बांधकर किसी द़ृढ़ आधार से लटका देते हैं। यही व्यवहारिक सरल लोलक है।

धातु के गोले को गोलक (bob) कहते हैं तथा निलंबन बिंदु (Point of Suspension) से गोलक के गुरुत्व केन्द्र तक की दूरी को प्रभावी लंबाई (Effective Length) कहते हैं।

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  • सरल लोलक का आवर्तकाल

किसी सरल लोलक का आवर्तकाल (Time Period) निम्न सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता हैः-

T = 2pÖl/g

जहां, l = सरल लोलक की लंबाई

g = गुरुत्वीय त्वरण

  • स्पष्ट है कि लोलक का आवर्तकाल गोलक के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता।

  • लोलक का आवर्तकाल T, लोलक की प्रभावी लंबाई l के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती होता है। अतः यदि लोलक की प्रभावी लंबाई बढ़ाकर चार गुनी कर दें, तो आवर्तकाल दोगुना हो जाएगा।

  • लोलक का आवर्तकाल गुरुत्वीय त्वरण g के वर्गमूल के व्युत्क्रमानुपाती होता है। उदाहरणस्वरुप जब किसी लोलक घड़ी को पहाड़ पर अथवा खान पर ले जाया जाता है, तो g का मान घटने से इसका आवर्तकाल बढ़ जाता है अर्थात घड़ी सुस्त हो जाती है।

  • अनंत लंबाई के सरल लोलक का आवर्तकाल 84.6 मिनट होता है (अनंत नही)। यह सरल लोलक के आवर्तकाल की अधिकतम सीमा है।

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  • सेकंड लोलक (Second’s Pendulum)

यदि किसी लोलक का आवर्तकाल 2 सेकंड हो, तो उसे सेकंड लोलक कहते हैं।

  • ब्रह्मगुप्त गुप्तोत्तर कालीन गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। इन्होंने ब्रह्म सिध्दांत की रचना की तथा सर्वप्रथम यह बताया कि पृथ्वी सभी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।

  • गुरुत्वाकर्षण पदार्थों द्वारा एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होने की प्रवृत्ति है। सर आइजैक न्यूटन के तीन नियमों एवं गुरुत्वाकर्षण के सिध्दांत का प्रतिपादन किया। न्यूटन ने अपनी मौलिक खोजों के आधार पर बताया कि केवल पृथ्वी की नहीं, अपितु विश्व का प्रत्येक कण दूसरे कण को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है। कणों के बीच कार्य करने वाले पारस्परिक आकर्षण को गुरुत्वाकर्षण था उससे उत्पन्न बल को गुरुत्वाकर्षण बल कहा जाता है।

  • अंतरिक्ष में कम गुरुत्व के चलते अंतरिक्ष यात्री सीधे खड़े नहीं रह पाते। कम गुरुत्व में लंबे अंतरिक्ष अभियानों में अंतरिक्ष यात्रियों को पेशीय क्षय और अस्थियों के घनत्व में कमी का सामना करना पड़ता है। अस्थि घनत्व कम होने से अस्थियां कमजोर हो जाती है।

  • आदर्श परिस्थितियों में (वायु प्रतिरोध को नगण्य मानते हुए) किसी वस्तु को ऊपर से गिराने पर उसके भार में कोई परिवर्तन नहीं होता है क्योंकि उसका द्रव्यमान और उस पर लगने वाला गुरुत्वीय त्वरण अपरिवर्तित रहता है।

  • चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है। चन्द्रमा के गुरुत्वीय त्वरण का मान पृथ्वी पर g के मान का 1/6 वां भाग है। इसलिए  चन्द्रमा पर व्यक्ति का भार पृथ्वी पर उसके भार का 1/6 वां भाग होगा।

  • विरामावस्था (शून्य) से गुरुत्व बल के साथ स्वतंत्रतापूर्वक गिरते हुए पिण्ड के लिए S=1/2gt2 समीकरण उपयुक्त है, जो परवलय (Parabola) क समीकरण है।

  • किसी वस्तु के द्रव्यमान पर गुरुत्वीय त्वरण में परिवर्तन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है तथा वह स्थिर रहता है। गुरुत्वीय त्वरण में परिवर्तन से वस्तु के भार में परिवर्तन होता है।

  • पृथ्वी की सतह के निकट किसी पिंड पर लगने वाला पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल यदि अचानक लुप्त हो जाए, तो वस्तु का भार शून्य हो जाएगा। परंतु द्रव्यमान वही रहेगा।

  • रेडियम की खोज पियरे क्यूरी और मैडम क्यूरी ने 1898 ई. में की। पेनसिलीन की खोज अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने वर्ष 1928 मे की। एक्स-किरणों की खोज 1895 ई. में विलहेल्म के. रॉन्टजेन ने की थी। एडवर्ड जेनर ने 1796 ई. में चेचक के टीके की खोज की।

  • पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करते हुए कृत्रिम उपग्रह पर दो प्रकर के बल कार्य करते हैं। एक है – केन्द्रीय बल और दूसरा – प्रक्षोभ बल। केन्द्रीय बल गोलाकार पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल है जिसके कारण उपग्रह अपनी गति के लिए आवश्यक अपकेन्द्री त्वरण प्राप्त कर पृथ्वी की वृत्तीय अथवा दीर्घवृत्तीय कक्षा में परिक्रमा करता है और पृथ्वी पर नीचे नहीं गिरता। प्रक्षोभ बल के अंतर्गत वायुमंडलीय कर्षण, पृथ्वी की गोलाई में त्रुटि, चंद एवं सौर के गुरुत्वाकर्षण, खिंचाव, सौर विकिरण, दाब आदि से उत्पन्न बल आते  हैं। इन बलो का योग  यद्यपि कम है किंतु इनके कारण उपग्रह के पथ में विचलन आ जाता है। अधिक ऊंचाई वाली कक्षा (भूस्थिर कक्षा 36000 किमी. या अधिक) में स्थापित उपग्रह तो वायुमंडलीय कर्षण से अप्रभावित रहते हैं, परंतु निम्न कक्षा वाले उपग्रहों की कक्षीय त्रिज्या वायुमंडलीय कर्षण से प्रभावित होकर धीरे-धीरे कम होती जाती है, और अंततः  ऐसे उपग्रह पृथ्वी के सघन वावुयमंडल में पहुंचकर भस्म हो जाते हैं।

  • कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी से डॉप्लर ट्रैकिंग द्वारा सुपस्पष्टता से ट्रैक किया जा सकता है। यह ट्रैकिंग ट्रांसमीटर व रिसीवर की सहायता से की जाती है। डॉप्लर प्रभाव की मदद से सुपस्पष्टता से यह ट्रैकिंग संभव होती है।

  • उपग्रह अपने कक्ष में अभिकेन्द्र बल के कारण पृथ्वी का चक्कर लगाता रहता है।

  • चार आधारभूत बलों में गुरुत्वीय बल सबसे क्षीण बल है, जबकि प्रबल नाभिकीय बल समस्त मूलभूत बलों में प्रबलतम है।

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  • सरल आवर्त गति करने वाला पिण्ड जब अपनी मध्यमान स्थिति से गुजरता है, तो –

  1. उस पर कोई बल कार्य नहीं करता है।

  2. उसका त्वरण शून्य होता है।

  3. वेग अधिकतम होता है।

  4. गतिज ऊर्जा अधिकतम होती है।

  5. स्थितिज ऊर्जा शून्य होती है।

  • जब पिण्ड गति के अंतः बिंदुओं (चरम स्थिति) पर पहुंता है तो –

  1. उसका त्वरण अधिकतम होता है।

  2. उस पर कार्य करने वाल प्रत्यानयन बल अधिकतम होता है।

  3. गतिज ऊर्जा शून्य होती है।

  4. स्थितिज ऊर्जा अधिकतम होती है।

  5. वेग शून्य होता है।

  • चन्द्रमा पर वायुमंडल नहीं पाया जाता। वायुमंडल अनेक गैसों का मिश्रण है। चंन्द्रमा पर पलायन वेग का मान लगभग 2.4 किमी./से होता है तथा धरती पर पलायन वेग 11.2 किमी/से होता है। चन्द्रमा पर पलायन वेग से गैस के अणुओं का वेग ज्यादा होने का कारण वे वहां से पलायन कर जाते हैं, इसी कारण चन्द्रमा पर वायुमंडल संभव नहीं है।

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स्थूल पदार्थों के गुण

  • सामान्यतः द्रव्य (Matter) की तीन अवस्थाएं होती हैः-

  1. ठोस

  2. द्रव

  3. गैस

  • द्रव्य के तीनों रुपों में कुछ विशेष गुण पाए जाते हैं, जो इस प्रकार हैं –

  1. ठोस में –   प्रत्यास्थता

  2. द्रव में –   दाब, पृष्ठ तनाव, श्यानता, केशिकात्व एवं प्लवन

  3. गैस में –   वायुमंडलीय दाब

  • प्रत्यास्थता (Elasticity)

  • साधारण दृढ़ पिण्ड का आशय किसी ऐसे कठोर ठोस पदार्थ से है, जिसकी कोई निश्चित आकृति तथा आकार हो। परंतु वास्त में पिण्डों को तनित, संपीडित अथवा बंकिम किया जा सकता है। यहां तक कि किसी दृढ़ इस्पात की छड़ को भी पर्याप्त बाह्य बल लगाकर विरुपित किया जा सकता है।

  • जब किसी वस्तु पर कोई बाह्य बल लगाया जाता है, तो उसका आकार अथवा आकृति अथवा दोनों ही बदल जाते हैं, परंतु इस बल को हटा लेने पर वस्तु पुनः अपना प्रारंभिक आकार या आकृति प्राप्त कर लेती है। वस्तु के इस गुण को जिसके कारण वह अपना प्रारंभिक आकार एवं आकृति पाने का प्रयास करती है, प्रत्यास्थता कहते हैं।

  • प्रत्यास्थता के गुण के आधार पर वस्तुएं दो प्रकार की होती हैः-

  1. पूर्ण प्रत्यास्थ वस्तुए – जो वस्तुएं बाह्य बल को हटा लिए जाने पर अपनी पूर्व अवस्था को पूर्णतः प्राप्त कर लेती हैं, वे पूर्ण प्रत्यास्थ (Perfectly Elastic) कहलाती हैं।

  2. पूर्ण प्लास्टिक वस्तुएं – जो वस्तुएं बाह्य बल को हटा लिए जाने पर अपनी पूर्व अवस्था में नहीं लौटती, बल्कि सदैव के लिए विरुपित हो जाती हैं, वे पूर्ण सुघट्य (Perfectly Plastic) कहलाती हैं।

  • वास्तव में कोई वस्तु न तो पूर्ण प्रत्यास्थ होती है ओर न ही पूर्ण सुघट्य बल्कि सभी वस्तुएं इन दोनों सीमाओं के भीतर ही होती हैं। मोटे तौर पर क्वाटर्ज (Quartz) को पूर्ण प्रत्यास्थ वस्तु तथा मोम को पूर्ण सुघट्य माना जा सकता है।

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  • प्रतिबल (Stress)

  • जब किसी वस्तु पर कोई बाह्य बल लगाकर उसके आकार या आकृति में परिवर्तन किया जाता है, तो उस वस्तु की प्रत्येक काट (Section) पर बाह्य बल के बराबर परंतु विपरीत दिशा में कुछ आंतरिक प्रतिक्रिया बल उत्पन्न हो जाते हैं, जो यह प्रयास करते हैं कि वस्तु अपने पुराने आकार को प्राप्त कर ले। इस प्रकार के बलों को प्रतिबल कहते हैं।

  • यदि किसी वस्तु के क्षेत्रफल A वाले किसी अनुप्रस्थ काट की लंबवत दिशा में लगाए गए बल का मान F हो, तो

      प्रतिबल = F/A

      प्रतिबल का SI मात्रक न्यूटन/मीटर2 है।

  • विकृति (Strain)

  • यदि किसी वस्तु पर बाह्य बल लगाने पर वस्तु के आकार या आकृति में परिवर्तन हो जाता है, तो इस विकृति कहते हैं। चूंकि विकृति एक अनुपात है, अतः इसका कोई मात्रक नहीं होता है।

  • हुक का नियम

  • वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक के अनुसार, यदि वस्तु की विकृति अधिक नहीं है, तो पदार्थ पर कार्यरत प्रतिबल उसमे उत्पन्न विकृति के अनुक्रमानुपाती होता है।

  • प्रतिबल तथा विकृति का अनुपात एक नियतांक होता है, जिसे प्रत्यास्थता गुणांक E कहते हैं।

      E = प्रतिबल/विकृति

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  • पृष्ठ तनाव (Surface Tension)

  • किसी द्रव की वह प्रकृति जिसके कारण इसका स्वतंत्र पृष्ठ (Free Surface) न्यूनतम क्षेत्रफल घेरने की प्रवृत्ति रखता है तथा एक तनी हुई प्रत्यास्थ झिल्ली की भांति व्यवहार करता है, पृष्ठ तनाव कहलाता है। इसका SI मात्रक न्यूटन/मीटर है।

  • किसी द्रव के लिए पृष्ठ तनाव का मान द्रव की प्रकृति, द्रव के ताप तथा उस माध्यम पर निर्भर करता है, जो द्रव के पृष्ठ के दूसरी ओर होता है। ताप बढ़ाने पर पृष्ठ तनाव घटता है। क्रांति ताप पर पृष्ठ तनाव शून्य होता है।

  • यदि किसी द्रव का भार नगण्य है, तो उसकी आकृति पूर्ण गोलाकार होगी। उदाहरण के लिए वर्षा की बूंदे तथा साबुन के बुलबुले पूर्ण गोलाकार होते हैं। इसका कारण यह है कि बूंद वह आकृति धारण करती है, जिसमें उसकी स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम होती है। यदि बूंद के ऊपर केवल पृष्ठ तनाव की कार्य कर रहा है, तो उसकी स्थितज ऊर्जा तब न्यूनतम होगी जब उसका क्षेत्रफल कम-से-कम हो। अतः गोलाकार हो जाएगी।

  • ससंजक तथा आसंजक बल

  • आणविक सिध्दांत के अनुसार, प्रत्येक पदार्थ छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है, जिन्हें अणु कहते हैं। ये अणु एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। एक ही पदार्थ के अणुओं के  बीच जो आकर्षण बल कार्य करता है, उसे ससंजक बल (Cohesive Force) कहते हैं।

  • भिन्न-भिन्न पदार्थों के अणुओं के बीच कार्य करने वाले आकर्षण बल को आसंजक बल (Adhesive Force) कहते हैं।

  • तेल तथा जल के बीच आसंजक बल, जल के ससंजक बल से कम, परंतु तेल के ससंजक बल से अधिक होता है। यही कारण है कि तेल के पृष्ठ पर डाली गई जल की बूंद सिकड़कर गोल आकार धारण कर लेती है, परंतु जल के पृष्ठ पर डाली गई तेल की बूंद एक पतली फिल्म के रुप में अधिक क्षेत्र मे फैल जाती है।

  • केशिकात्व (Capillarity)

  • कांच की बहुत कम त्रिज्या की दोनों ओर से खुली नली को केशनली या केशिका नली कहते हैं। केशनली में किसी द्रव के ऊपर चढ़ने अथवा नीचे उतरने की घटना को केशिकात्व कहते हैं।

  • किसी द्रव के केशनली में ऊपर चढ़ने अथवा गिरने का कारण द्रव का पृष्ठ तनाव है।

  • ऐसे द्रव जो कांच को भिगोते हैं, वे कांच की केशनली में ऊपर चढ़ते हैं, जबकि जो द्रव कांच को नहीं भिगोते, वे केशनली में नीचे उतर आते हैं। उदाहरणस्वरुप किसी केशनली को जल में सीधी खड़ी करने पर उसमें जल, नली के बाहर वाले जल के तल से ऊपर कुछ ऊंचाई तक चढ़ जाता है, जबकि केशनली को पारे मे खड़ा करने पर नली के भीतर पार का तल बाहरी तल की अपेक्षा नीचे उतर आता है।

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  • केशिकात्व के उदाहरणः-

  1. जल का पौधों के तनों में बनी असंख्य केशनलियों में चढ़कर टहनियों तक पहुंचाना।

  2. लालटेन में मिट्टी के तेल का बत्ती में ऊपर चढ़ना।

  3. मोमबत्ती में धागे से मोम का पिघलकर ऊपर चढ़ना।

  4. फाउंटेन पेन की निब की नोंक बीच से चिरी होती है, जिससे इसमें छोटी-सी बारीक केशनली बन जाती है। जब इसे स्याही में डुबोते हैं, तो कुछ स्याही केशनली में चढ़ जाती है।

हालांकि रिफिल वाले पेन से लिखाई गुरुत्व के कारण संभव होती है, यह पृष्ठ तनाव पर आधारित नहीं है।

  1. स्याही सोखने का कार्य़ भी केशिकात्व क्रिया पर निर्भर करता है।

  • श्यानता (Viscocity)

  • द्रवों का का वह गुण जिसके कारण वह अपनी विभिन्न परतों के मध्य सापेक्ष गति का विरोध करता है, श्यानता कहलाता है।

  • गाढ़े द्रव जैसे ग्लिसरीन, शहद इत्यादि में अधिक श्यानता होता है, अतः गाढ़े द्रव, पतले द्रवों की अपेक्षा शीघ्र ठहर जाते हैं।

  • द्रवों की श्यानता ताप के बढ़ने पर घट जाती है। इसके विपरीत गैसों की श्यानता ताप बढ़ने पर बढ़ जाती है। ठोंसो में श्यानता नहीं होती है।

  • दाब

  • एकांक क्षेत्रफल पर लंबवत् लगने वाले बल को दाब कहते हैं।

    दाब = बल/क्षेत्रफल

    दाब का मात्रक न्यूटन/मीटर2 है।

  • द्रव के स्वतंत्र तल से h गहराई पर स्थित किसी बिंदु पर द्रव के कारण दाब

    P = h x d x g

         जहां, d = द्रव का घनत्व

    g = गुरुत्वीय त्वरण

  • उत्प्लावन बल

  • जब कोई ठोस वस्तु द्रव में डुबाई जाती है, तो उसके भार में कुछ कमी का अनुभव होता है। भार में यह आभासी कमी द्रव द्वारा वस्तु पर ऊपर की ओर लगाए गए एक बल के कारण होती है। इस बल को उत्प्लावन बल या उत्क्षेप (Upthrust) कहते हैं। उत्क्षेप वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के गुरुत्व केन्द्र पर कार्य करता है, जिसे उत्प्लावन केन्द्र कहते हैं।

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  • आर्किमिडीज का सिध्दांत

  • जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूर्ण आंशिक रुप से डुबोई जाती है, तो उसके भार में कमी प्रतीत होती है। भार में यह आभासी कमी वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होती है।

  • प्लवन का सिध्दांत

  • किसी द्रव में स्थित ठोस वस्तु पर निम्न दो बल कार्य करते हैं –

  1. वस्तु का भार W, जो ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर कार्य करती है।

  2. द्रव का वस्तु पर उत्क्षेप F, जो ऊर्ध्वाधर दिशा में ऊपर की ओर कार्य करत है। उत्क्षेप (F) का मान वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है। किस द्रव में वस्तु का डूबना या तैरना इन दोनों बलो के आपेक्षिक मान पर निर्भर करता है, जिसकी निम्न आवस्थाएं संभव हैं –

  3. यदि W>F, तो इस दशा में परिणामी बल (W-F) नीचे की ओर कार्य करेगा। अतः वस्तु द्रव में डूब जाएगी।

  4. यदि W=F, तो इस दशा में वस्तु द्रव में जहां होगी, वहीं तैरती रहेगी।

  5. यदि W<F, इस दशा में वस्तु स्वतंत्र छोड़ देने पर ऊपर की ओर उठने लगेगी।

  • किसी ठोस का कितना भाग किसी द्रव में डूबेगा, यह द्रव तथा ठोस के आपेक्षिक घनत्व पर निर्भर करता है। इसकी गणना निम्न संबंध द्वारा की जा सकती है –

   ठोस के डूबे भाग का आयतन/ठोस का कुल आयतन = ठोस का घनत्व/द्रव का घनत्व

  • स्पष्ट है कि अधिक घनत्व वाले द्रव में ठोस का कम भाग डूबेगा तथा कम घनत्व वाले द्रव में अधिक भाग डूबेगा। यदि ठोस का घनत्व द्रव के घनत्व के बराबर हो, तो ठोस द्रव में तैरेगा।

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  • किसी बुलबुले का आकार उसमें भरी गैस के दबाव तथा पानी की फिल्म की त्रिज्या तथा मोटाई पर निर्भर करता है। छोटे बुलबुले में गैस का दबाव बड़े बुलबुले की अपेक्षा अधिक होता है, अतः नली में एक दूसरे के संपर्क में लाए जाने पर छोटा बुलबुला और छोटा, जबकि बड़ा बुलबुला और बड़ा हो जाएगा।

  • हाइड्रॉलिक ब्रेग, हाइड्रॉलिक प्रेस तथा हाइड्रॉलिक लिफ्ट, पास्कल के नियम पर आधारित हैं। पास्कल के नियम के अनुसार, यदि गुरुत्वीय प्रभाव नगण्य माना जाए, तो संतुलन के अवस्था में किसी द्रव के भीतर प्रत्येक स्थान पर समान दाब रहता है।

  • जब वायु का बुलबुला झील की तली से उठकर ऊपर की ओर आने लगता है, तो तली की अपेक्षा ऊपर की ओर दाब घटने लगता है जिसके कारण वायु के बुलबुले का आयतन बढ़ जाता है।

  • अपरिष्कृत पेट्रोलियम के निरंतर प्रभाजी आसवन द्वारा औद्योगिक उपोयग के विभिन्न उत्पाद प्राप्त किए जाते हैं। यह प्रक्रिया परिष्करण कहलाती है। एस्फाल्ट पेट्रोलियम का परिशोधन करने के दौरान उत्पन्न होता है।

  • 40 C पर जल का आयतन न्यूनतम तथा घनत्व अधिकतम होता है। झीलों एवं नदियों की केवल ऊपरी सतह के जमने में पानी के अनियमित प्रसार (Anomalous Expansion) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

  • शीतकाल में झील की ऊपरी परत 00 C तक ठंडा होने पर बर्फ बन जाती है, परंतु नीचे का जल 40 C पर द्रव अवस्था में रहता है। इससे झीलों या तालाबों में  बर्फ के नीचे 40 C पर पानी रहता है, जिसमें मछलियां एवं अन्य जलीय जंतु जीवित रहते हैं।

  • अधिकांशतः द्रवों को गर्म करने पर उनके आयतन में वृध्दि परंतु घनत्व में कमी होती है लेकिन पानी का व्यवहार 0 डिग्री. से. से 4 डिग्री. से. के बीच ठीक उल्टा होता है। यदि किसी पात्र में 0 डिग्री. से. पर पानी को लेकर गर्म किया जाए, तो  0 डिग्री. से. से 4 डिग्री. से. तक आयतन घटता है एवं घनत्व बढ़ता है। अतः 4 डिग्री. से. पर पानी का आयतन न्यूनतम तथा घनत्व अधिकतम होता है।

  • लोहे का गोला पारद (Mercury) पर तैरता है, किंतु पानी में डूब जाता है, इसका कारण यह है कि पारद (Mercury) का आपेक्षिक घनत्व (Relative Density) लोहे के आपेक्षिक घनत्व से अधिक होता है, जबकि पानी का लोहे से कम होता है।

  • स्थित विज्ञान (Statics) यांत्रिकी की वह शाखा है, जो विश्राम की स्थिति से संबंधित है।

  • नदी के जल के घनत्व की अपेक्षा समुद्र के खारे पानी का घनत्व अधिक होता है। इसलिए समुद्र के जल में सहाज के प्रवेश करने पर अधिक प्लावन बल लगने लगता है, जिससे जहाज कुछ ऊपर उठ जाता है।

  • सोडियम क्लोराइड तथा अन्य लवणों की अधिकता के कारण समुद्री जल नमकीन होता है। फलतः समुद्री जल का घनत्व अधिक होता है तथा उसमें उत्प्लावकता भी अधिक होती है। इसलिए समुद्र के जल में तैरना आसान होता है।

  • टेक्नीशियन एक रासायनिक तत्व है है जिसका परमाणु क्रमांक 43 है। टेक्नीशियन कृत्रिम रुप से उत्पादित प्रथम तत्व है। वर्ष 1937 में इस तत्व का सर्वप्रथम निर्माण किया गया था।

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  • मथने के बाद क्रीम का दूध से पृथक हो जाने का कारण अपकेन्द्रीय बल है।

प्रकाश

  • प्रकाश, विद्युत या ऊष्मा की तरह ऊर्जा का ही एक रुप है। यह वह ऊर्जा है, जो विकिरण ऊर्जा के रुप में गतिमान है। प्रकाश अपने आप में अदृश्य होता है किंतु अन्य वस्तुओं को दृश्यमान बनाता है।

  • प्रकाश एक सीधी रेखा में संचरित होता है। प्रकाश तरंगे निर्वात से होकर गुजर सकती हैं, किंतु ध्वनि तरंगे ऐसा नहीं कर पातीं।

  • प्रकाश की द्वैत प्रकृति

  • वास्तव में प्रकाश द्वैत प्रकृति वाला है –

  1. तरंग प्रकृति

  2. कण प्रकृत

  • स्पष्ट है कि प्रकाश दोहरी विशेषता रखता है। कभी-कभी यह कणों के रुप में और कभी-कभी तरंगों के रुप में व्यवहार करता है।

  • प्रकाश तरंगे अनुप्रस्थ होती हैं, जबकि ध्वनि तरंगे अनुदैर्ध्य तरंगे होती हैं।

विभिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल

माध्यम

प्रकाश की चाल (m/s)

निर्वात

3´108

जल

2.25´108

कांच

2´108

हीरा

1.24´108

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  • स्पष्ट है कि भिन्न-भिन्न माध्यमों में प्रकाश की चाल भिन्न-भिन्न होती है। प्रकाश की चाल सबसे अधिक निर्वात में होती है।

  • जिस माध्यम का अपवर्तनांक जितना अधिक होता है, उसमें प्रकाश की चाल उतनी ही कम होती है।

  • यदि किसी माध्यम का अपवर्तनांक m हो, तो

       u = c/m

स्पष्ट है कि निर्वात में प्रकाश के वेग और माध्यम में प्रकाश के वेग के अनुपात को माध्यम का अपवर्तनांक कहते हैं।

  • पानी का अपवर्तनांक 1.33 तथा कांच का अपवर्तनांक 1.50 होता है। अपवर्तनांक को सामान्यतः ग्रीग अक्षर m (म्यू) से प्रदर्शित किया जाता है।

  • चूंकि प्रकाश का वेग निर्वात में अधिकतम होता है, अतः किसी माध्यम का निर्वात के सापेक्ष अपवर्तनांक सदैव 1 से अधिक होगा। माध्यम जितना ही अधिक सघन होगा, उसमें प्रकाश का वेग उतना ही कम होगा।

  • प्रकाश का अपवर्तन (Refraction of Light)

  • एक समांग माध्यम में प्रकाश किरण सीधी रेखा में चलती है। परंतु जब प्रकाश की किरण एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में प्रवेश करती है, तो वह अपने मूल पथ से विचलित हो जाती है। इस घटना को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।

  • पहले माध्यम में चलने वाल किरण को आपाती किरण तथा दूसरे माध्यम मे चली जाने वाली किरण को अपवर्तित किरण कहते हैं।

  • आपाती किरण दो माध्यमों के तलों को पृथक करने वाले तल को जिस बिंदु पर स्पर्श करती है, उसे आपतन बिंदु कहते हैं। आपत बिंदु पर खींचा गया लंब, अभिलंब कहलाता है। आपाती किरण तथा अभिलंब के बीच बने कोण को आपतन कोण और अपवर्तित किरण एवं अभिलंब के बीच बने कोण को अपवर्तन कोण कहते हैं।

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  • अपवर्तन की कुछ घटनाएं

  1. यदि जल में डूबी हुई छड़ को बाहर से देखा जाए, तो वह छोटी और सतह पर मुड़ी हुई प्रतीत होती है।

  2. पानी से भरे बर्तन में पड़ा एक सिक्का अपने यथार्थ स्थान से उठा हुआ प्रतीत होता है।

  3. तारों का टिमटिमाना।

  • वर्ण विक्षेपण

  • सूर्य का श्वेत प्रकाश सात विभिन्न रंगो का मिश्रित प्रकाश है। ये सात रंग बैंगनी, जामुनी (Indigo), नीला, हरा, पीला, नारंगी एवं लाल है। जब सूर्य का श्वेत प्रकाश किसी प्रिज्म से होकर गुजरता है, तो य़ह अपवर्तन के पश्चात प्रिज्म के आधार की ओर झुकने के साथ-साथ प्रकाश के अवयवी वर्णों में विभाजित हो जाता है। इस प्रक्रिया को प्रकाश का वर्ण विक्षेपण कहते हैं। प्रिज्म से निकलते समय हर प्रकाश किरण का मार्ग अलग-अलग होता है और इस प्रकार वे पृथक और स्पष्ट दिखाई देती है। सूर्य के प्रकाश से प्राप्त रंगों में बैंगनी रंग आधार की ओर सबसे नीचे व लाल रंग सबसे ऊपर होता है अर्थात बैंगनी रंग का विक्षेपण सबसे अधिक तथा लाल रंग का विक्षेपण सबसे कम होता है।

  • उल्लेखनीय है कि निर्वात अथवा वायु में विभिन्न रंगो के प्रकाश का वेग एक समान किंतु किसी अन्य पदार्थिक मे भिन्न-भिन्न होता है। अतः किसी पदार्थ का अपवर्तनांक विभिन्न रंगो के प्रकाश के लिए भिन्न-भिन्न होता है। कांच में बैंगनी प्रकाश का वेग सबसे कम तथा लाल प्रकाश का वेग सर्वाधिक होता है। इस कारण बैंगनी प्रकाश के लिए कांच का अपवर्तनांक सर्वाधिक तथा लाल प्रकाश के लिए सबसे कम होता है।

  • बैंगनी रंग का तरंगदैर्ध्य सबसे कम व आवृत्ति सबसे अधिक, जबकि लाल रंग तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक तथा आवृत्ति न्यूनतम होती है।

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  • क्रांति कोण तथा पूर्ण आंतरिक परावर्तन

  • जब कोई प्रकाश किरण किसी सघन माध्यम से विरल माध्यम से जाती है, तो एक विशेष आपतन कोण के लिए अपवर्तन कोण का मान 900 हो जाता है। इसी आपतन कोण को क्रांतिक कोण कहते हैं। इसका मान दोनों माध्यमों की प्रकृति तथा प्रकाश के रंग पर निर्भर करता है। कांच-वायु अंतरापृष्ठ पर दृश्य प्रकाश के लिए क्रांतिक कोण लगभग 420 है।

  • जब सघन माध्यम में आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से थोड़ा-सा ही बढ़ाया जाता है, तो संपूर्ण आपतित प्रकाश किरण अपवर्तित न होकर परावर्तन के नियमों के अनुसार, परावर्तित होकर सघन माध्यम में ही वापस लौट आती है। इस घटना को प्रकाश का पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहते हैं।

  • पूर्ण आंतरिक परावर्तन का एक उपयोगी प्रयोग प्रकाशीय रेशों (Optical Fibres) में होता है।

  • परावर्तन

  • प्रकाश जब किसी वस्तु पर पड़ता है, तो वह अवशोषित, संचारित या परावर्तित हो सकता है। प्रकाश किरणें जब किसी वस्तु की सतह पर पड़ती हैं, तो उन्हें वापस प्रेषित करने का प्रक्रम प्रकाश का परावर्तन (Reflection of Light) कहलाता है। पॉलिशदार, चमकीली सतहों वाली वस्तुएं पॉलिश रहित, धुंधली सतहों वाली वस्तुओं की अपेक्षा अधिक प्रकाश परावर्तित करती हैं।

  • रजत धातु प्रकाश की एक उत्तम परावर्तक है।

  • दर्पण

  • एक चिकनी उच्च पॉलिशयुक्त परावर्तक सतह दर्पण कहलाती है।

  • दर्पण मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं –

  1. समतल दर्पण

  2. गोलीय दर्पण

  • समतल दर्पण

  • समतल दर्पण एक तरफ रजत धातु की चमकीली तह वाली कांच की पतली, चपटी और चिकनी शीट होती है। हमारी श्रृंगार मेंज पर प्रयुक्त दर्पण जिसमें हम अपने चेहरे को देखते हैं, एक समतल दर्पण होता है। समतल दर्पण द्वारा बना हमारे चेहरे का प्रतिबिंब पर्दे पर प्राप्त नहीं किया जा सकता है, उसे केवल दर्पण में अवलोकन करके ही देखा जा सकता है। इसलिए, समतल दर्पण में हमारे चेहरे का प्रतिबिंब आभासी प्रतिबिम्ब का एक उदाहरण है। आभासी प्रतिबिम्ब काल्पनिक या अवास्तविक प्रतिबिम्ब भी कहलाते हैं।

  • स्पष्ट है कि समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिम्ब की प्रकृति आभासी एवं सीधी होती है।

  • समतल दर्पण द्वारा बने प्रतिबिम्ब का आकार वस्तु के आकार के बराबर होता है।

  • समतल दर्पण से बना वस्तु का प्रतिबिम्ब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है, जितनी दूरी पर वस्तु दर्पण के सामने रखी होती है। दूसरे शब्दों में प्रतिबिम्ब और वस्तु समतल दर्पण से बराबर दूरी पर होते हैं, परंतु वे समतल दर्पण की विपरीत सतहों पर होते हैं।

  • समतल दर्पण में बने प्रतिबिम्ब में पार्श्व उत्क्रमण होता है, अर्थात दर्पण के सामने खड़ा व्यक्ति यदि अपना बायां हाथ उठाता है, तो प्रतिबिम्ब में उसका दायां हाठ उठता दिखेगा।

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  • गोलीय दर्पण

  • गोलीय दर्पण वह दर्पण है, जिसकी परावर्तक सतह कांच के खोखले गोले का काटा गया भाग होता है।

  • गोलीय दर्पण दो प्रकार के होते हैं –

  1. अवतल दर्पण (Concave Mirrors)

  2. उत्तर दर्पण (Convex Mirrors)

  • अवतल दर्पण (Concave Mirrors)

  • वह गोलीय दर्पण, जिसमें प्रकाश का परावर्तन अवतल सतह (अथवा अंदर की ओर मुड़ी सतह) पर होता है, अवतल दर्पण कहलाता है।

  • व्यक्ति के दांतों की परीक्षा करने हेतु दंत चिकित्स दांतों का बड़ा प्रतिबिम्ब देखने के लिए अवतल दर्पणों का उपयोग करते हैं।

  • अवतल दर्पणों के प्रकाश की तेज किरणपुंजों को पाने के लिए टॉर्चों, वाहन की हेडलाइटों और सर्चलाइटों में परावर्तकों के रुप में प्रयोग किया जाता है।

  • अवतल दर्पणों का हजामती दर्पणों (दाढ़ी बनाने के काम में प्रयोग होने वाला) के रुप में प्रयोग किया जाता है।

  • उत्तल दर्पण (Convex Mirrors)

  • यह वह गोलीय दर्पण होता है, जिसमें प्रकाश का परावर्तन उत्तल सहत (या उभरी सतह) पर होता है।

  • उत्तल दर्पणों का उपयोग पीछे से आ रहे यातायात को देखने के लिए वाहनों में पश्च-दृष्टि दर्पणों के रुप में किया जाता है।

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  • लेंस

  • लेंस दो वक्र पृष्ठों अथवा एक वक्र पृष्ठ तथा एक समतल पृष्ठ से घिरा एक समांग पारदर्शी माध्यम होता है। वक्र पृष्ठ गोलीय, बेलनाकार अथवा परवलयाकार हो सकते हैं, परंतु अधिकतर पृष्ठ गोलीय ही होते हैं।

  • लेंस मुख्यतया दो प्रकार के होते हैं –

  1. उत्तल लेंस

  2. अवतल लेंस

  • उत्तल लेंस

  • उत्तल लेंस केंद्र पर मोटा, परंतु किनारों पर पतला होता है।

  • उत्तल लेंस को अभिसारी लेंस (Converging Lens) भी कहते हैं, क्योंकि यह उससे होकर गुजरने वाले प्रकाश किरणों के समांतर पुंज को अभिसारित (एक बिंदु पर लाना) करता है।

  • अवतल लेंस

  • यह लेंस बीच में पतला परंतु किनारों पर मोटा होता है। अवतल लेंस को अपसारी लेंस भी कहा जाता है, क्योकि यह प्रकाश किरणों के समानांतर पुंज को अपसारित करता है।

  • आंखो की रोशनी से जब दूर की वस्तुएं स्पष्ट रुप से दिखाई नहीं देती हैं (निकट दृष्टिदोष की स्थिति), तो उसके निवारण के लिए अवतल लेंस का प्रयोग किया जाता है।

  • जब कोई नजदीक की वस्तु स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ती है (दूर दृष्टि दोष की स्थिति में), तो इस दोष के निवारण के लिए उत्तल लेंस का प्रयोग किया जाता है।

  • 320-400 nm विकिरण में ऊर्जा प्रति क्वांटम सर्वाधिक होगी।

  • पृथ्वी पर आने वाले सौर विकिरण का परास 100 नैनोमीटर से 106 nm तक विस्तृत है। इस सौर विकिरण को पराबैंगनी विकिरण (परासः-100 nm से 400 nm), दृश्य प्रकाश (परासः- 400 nm से 700 nm) तथा अवरक्त विकिरण (परासः- 700 nm से 106 nm) में विभाजित किया जा सकता है।

  • प्रकाश दोहरी प्रकृति प्रदर्शित करता है – कभी कण के समान तथा कभी तरंग के समान। प्रकाश के कुछ गुणों जैसे व्यतिकरण, विवर्तन, ध्रुवण आदि की व्याख्या प्रकाश की प्रकृति को तरंग मनकर की जाती है, जबकि कुछ अन्य गुणों जैसे प्रकाश विद्युत प्रभाव, कॉम्पटन प्रभाव आदि की व्याख्या यह मानकर की जाती है कि प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेटों से मिलकर बना है।

  • प्रकाश का तरंगदैर्ध्य बहुत छोटा होता है तथा उसका विवर्तन भी बहुत छोटा होता है, जो हमारी आंखे नहीं देख सकती हैं। इसलिए प्रकाश हमें सीधी रेखा में चलता हुआ प्रतीत होता है।

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  • दृश्य प्रकाश विद्युत चुंबकीय विकिरण का वह भाग है, जो मानवीय आंख द्वारा देखा जा सकता है। एक सामान्य मानवीय आंख 390 nm से 750 nm तरंगदैर्ध्य के बीच के विद्युत चुंबकीय विकिरण को स्पष्ट रुप से देख सकती है।

  • मानव आंख दृश्य प्रकाश के लगभग 5500 A0 या 555 nm (नैनोमीटर) तरंगदैर्ध्य के लिए सर्वाधिक सुग्राही होती है।

  • जब कोई प्रकाश तरंग वायु से कांच या एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाती है, तो प्रकाश की आवृत्ति वही रहती है लेकिन उसका तरंगदैर्ध्य तथा वेग बदल जाता है।

  • जिस वस्तु या पदार्थ का अपवर्तनांक ज्यादा होता है, उसमें प्रकाश की गति न्यूनतम होती है। कांच, निर्वात, जल तथा वायु में से कांच का अपवर्तनांक सबसे ज्यादा होता है इसलिए प्रकाश की गति कांच में न्यूनतम होता है।

  • सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने में 500 सेकंड लगते हैं जिसे मिनट में बदले के पर लगभग 8.5 मिनट होगा।

  • निऑन गैस विसर्जन लैंपो (Discharge Lapms) एवं ट्यूबों तथा प्रतिदीप्ति बल्बों में भरी जाती है।

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  • साबुन के पतले झाग में चमकदार रंगो का बनना बहुलित परावर्तन और व्यतिकरण का परिणाम है। जब किसी पारदर्शक पतली परत (पानी की सतह पर तेल की पतली परत या साबुन के घोल के बुलबुले) पर श्वेत प्रकाश आपतित किया जाता है, तो परत के दोनों पृष्ठो से परावर्तित तथा अपवर्तित प्रकाश किरणों में व्यतिकरण होता है। इस परिघटना के परिणामतः वह परत चमकदार दिखाई पड़ती है।

  • तंतु प्रकाशिकी संचार एक प्रणाली है जिसमें सूचनाओं की जानकारी एक स्थान से दूसरे स्थान तक ऑप्टिकल फाइबर के माध्यम से प्रकाश बिंदुओं के रुप मे भेजी जाती है।

  • प्रकाश ततु (Optical Fibre) कांच (सिलिका) या प्लास्टिक से निर्मित अत्यधिक पतली बेलनाकार खोखली नलिकाएं होती हैं, जो प्रकाश के पूर्ण आंतरिक परावर्तन के सिध्दांत पर कार्य करती है। इनमें प्रकाश ऊर्जा का किसी प्रकार का क्षय नहीं होता है।

  • हीरे के चमकने का प्रमुख कारण उसका पूर्ण आंतरिक परावर्तन ही है। चूंकि हीरे का अपवर्तनांक बहुत अधिक 2.42 होने के कारण इसका क्रांतिक कोण केवल 240 होता है। अतः जब विशेष रुप से काटे गए हीरे के अंदर प्रकाश पड़ता है तो हीरे के पृष्ठों पर बार-बार पूर्ण आंतरिक परावर्तन होता रहता है।

  • होलोग्राफी वह तकनीक है जिसमें लेसर किरणों द्वारा की गई फोटोग्राफी से किसी वस्तु का त्रिआयामी चित्र बनाया जाता है। होलोग्राफी (Holography) ध्वनि, प्रकाश या किसी भी तरंग के साथ कार्य कर सकती है। होलोग्राफी का बहुधा उपयोग अभिलेखों को संचित करने तथा माइक्रोफिश (Microfiche)  में किया जाता है। इसका उपयोग करके वास्तविक त्रिआयामी चलचित्र भी तैयार किए गए हैं।

  • रोस्टर स्कैन का प्रयोग CRT (Cathode Ray Tube) मॉनीटरों में होता है, इसमें इलेक्ट्रॉन गन के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक पुंज को प्रक्षेपित किया जाता है।

  • रमन प्रभाव के अनुसार, एकल तरंगदैर्ध्य प्रकाश किरणें जब किसी भी पारदर्शक माध्य़म, जैसे ठोस, द्रव या गैस में से गुजरती हैं, तब इसकी प्रकीर्णित किरणों का अध्ययन किया जाए, तो उसमें मूल प्रकाश की किरणों के अतिरिक्त स्थिर अंतर पर बहुत कम तीव्रता की किरणें भी उपस्थित होती हैं। इन किरणों को रमन किरणें कहते हैं।

  • सी.डी. प्लेयर में प्रयुक्त लेंस पराबैंगनी लेसर प्रकाश को उत्सर्जित करता है, जो सी.डी. की चमकदार सतह से परावर्तित होकर ध्वनि उत्पन्न करता है।

  • ऑडियो एवं वीडियो प्रणालियों में प्रयुक्त होने वाली कॉम्पैक्ट डिस्क में सतह पर सुरक्षात्मक लैकर कोटिंग (Protective Lacquer Coating) होती है, जो कि Thin-Film की भांति कार्य करती है और परावर्तन एवं विवर्तन की परिघटना के लिए जिम्मेदार होती है। यही CD को सूर्य के प्रकाश में देखने पर इन्द्रधनुषी रंग दिखाई देने का कारण होता है।

  • श्रव्य संकेतों के प्रेषण हेतु आवृत्ति माडुलन (Frequency Modulation) तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक से प्रसारित संकेत किसी भी प्रकार के शोर तथा विकृति से मुक्त होते हैं।

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  • जब श्वेत प्रकाश को किसी प्रिज्म से होकर पार कराया जाता है, तो यह सात रंगो VIBGYOR (Voilet, Indigo, Blue, Green, Yellow, Orange, Red) में टूट जाते हैं। इस घटना को प्रका का विक्षेपण अथवा वर्ण विक्षेप कहते हैं। इन्द्रधनुष का निर्माण इसी घटना के परिणामस्वरुप होता है।

  • रंगीन टेलीविजन में प्रयुक्त होने वाली कैथोड किरण नलिका (Cathode Ray Tube) मे तीन विभिन्न फॉस्फर (Phosphor) का प्रयोग होता है जो लाल, हरे तथा नीले रंग को उत्सर्जित करते है।

  • प्रकाश में तीन मूल या प्राथमिक रंग होते हैं – लाल, हरा और नीला। इनको मिलाने से द्वीतीयक रंगो (पीला, मैजेंटा) का निर्माण हो सकता है। एक प्राथमिक और एक द्वीतीयक रंग के जोड़े को एक-दूसरे का पूरक रंग कहते हैं। सभी प्राथमिक रंग अथवा सभी द्वीतीयक रंगों को मिलाने पर सफेद रंग के प्रकाश की उत्पत्ति होती  है।

  • आंख का रेटिना परंपरागत कैमरे की फिल्म की तरह कार्य करता है। रेटिना अपने से टकराने वाली प्रकाश किरणों को विद्युतीय सिग्नलों में परिवर्तित कर देता है जिन्हें दृश्य शिराएं मस्तिष्क तक ले जाती हैं।

  • कैमरे का उद्भासन कैमरे के द्वारक के क्षेत्रफल तथा समय पर निर्भर करता है। अतः उद्भासन d2´t के अनुक्रमानुपाती होगा।

  • सिलियरी मांसपेशियों के शिथिलन-संकुचन से आंख के लेंस की मोटाई में परिवर्तन होता है जिसके फलस्वरुप आंख के लेंस की फोकस दूरी परिवर्तित हो जाती है।

  • हेड मिरर (Head Mirror) का प्रयोग डॉक्टरों द्वारा कान, नाक एवं गले की जांच करने के लिए किया जाता है। यह एक छोटे छिद्र वाला अवतल दर्पण होता है।

  • जब दर्पण पर आपतित प्रकाश किरण की दिशा परिवर्तित नहीं होती है, तब परावर्तित किरण का घूर्णन कोण दर्पण के घूर्णित कोण से दोगुना होता है।

  • श्वेत रंग प्रकाश का पूर्णतया परावर्तक है, जिससे बहुत कम मात्रा में ऊष्मा अवशोषित हो पाती है। अतः छाते की ऊपरी सतह सफेद होने से ही गर्मी में धूप से बचा जा सकेगा।

  • गहरे समुद्र में सतह से 400 से 8000 फीट तक की गहराई में पाए जाने वाले जीवाणु जैसे ग्रीन सल्फर बैक्टीरिया अवरक्त विकिरण में प्रयोग द्वारा प्रकाश संश्लेषण कर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।

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ऊष्मा एवं ऊष्मा गतिकी

  • ऊष्मा (Heat)– वह ऊर्जा है, जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में केवल तापांतर के कारण स्थानांतरित होती है। ऊष्मा का SI मात्रक जूल है। सामान्यतः ऊष्मा के लिए एक अन्य मात्रक कैलोरी प्रयोग में लाया जाता है।

  • ताप – ताप वस्तु की वह ऊष्मीय अवस्था है, जिससे ऊष्मा के प्रवाह की दिशा का बोध होता है। ऊष्मा सदैव अधिक ताप वाली वस्तु से कम ताप वाली वस्तु की ओर स्थानांतरित होती है।

  • ताप मापन – ताप की माप तापमापी से की जाती है। विभिन्न तापमापियों में निम्नलिखित पैमाने उपयोग में आते हैं

  1. सेल्सियस पैमाना – ताप के सेल्सियस स्केल का बर्फ का गलनांक 00 C और जल का क्वथनांक 1000 C होता है।

  2. केल्विन पैमाना – केल्विन पैमाने पर बर्फ का गलनांक 273 K तथा जल का क्वथनांक 373 K अंकित होता है। उपर्युक्त से स्पष्ट है कि सेल्सियस पैमाने पर 00 ता ताप, केल्विन पैमाने पर 273 के बराबर होता है।

अतः केल्विन पर ताप = सेल्सियस पैमाने पर ताप +273

Þ K = C+273

  1. फॉरेनहाइट पैमाना – इस पैमाने पर बर्फ का गलनांक 320 F तथा जल का क्वथनांक 2120  F अंकित होता है।

  • सेल्सियस एवं फॉरेनहाइट पैमानों में संबंध

यदि कोई ताप सेल्सियस पैमाने पर C तथा फॉरेनहाइट पैमाने पर F है,

       तब C/5=F-32/9

  • ताप परिवर्तन के प्रभाव

  • ताप बढ़ाकर ठोस को द्रव अवस्था में और द्रव को गैसीय अवस्था में परिवर्तित किया जा सकता है। जबकि ताप घटा कर गैसे को द्रव अवस्था में और द्रव को ठोस अवस्था में परिवर्तित किया जा सकता है।

  1. गलन –

  • वह प्रक्रम जिसमें गर्म करने पर ठोस पदार्थ द्रव में परिवर्तित होता है, गलन कहलाता है।

  • वह ताप जिस पर ठोस पदार्थ गलता है और वायुमंडलीय दाब पर द्रव में परिवर्तित होता है, पदार्थ का गलनांक कहलाता है। जैसे 00 C ताप पर बर्फ पिघलकर जल बनाता है, इसलिए बर्फ का गलनांक 00 C है।

  • भिन्न-भिन्न ठोंसों के भिन्न-भिन्न गलनांक होते हैं। जैसे – बर्फ का गलनांक 00 C है, मोम का गलनांक 630 C है, जबकि लोहे का गलनांक 15350 C है।

  • किसी ठोस का गलनांक, उसके कणों (परमाणुओं अथवा अणुओं) के बीच आकर्षण बल की माप है। ठोस पदार्थ का गलनांक जितना अधिक होगा, उसके कणों के बीच आकर्षण बल उतना ही अधिक होगा।

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  1. क्वथन

  • वह प्रक्रम, जिसमें गर्म करने पर द्रव पदार्थ तीव्रता से गैस में परिवर्तित होता है, क्वथन कहलाता है।

  • वह ताप जिस पर द्रव उबलता है और वायुमंडलीय दाब पर तीव्रता से गैस में परिवर्तित होता है, क्वथन कहलाता है।

  • भिन्न-भिन्न द्रवों के भिन्न-भिन्न क्वथनांक होते हैं। जैसे एल्कोहल का क्वथनांक 780 C है, जल का क्वथनांक 1000 C है, जबकि पारे का क्वथनांक 3570 C है।

  1. संघनन या द्रवण

  • शीतलन द्वारा गैस या वाष्प को द्रव मे परिवर्तित करने का प्रक्रम संघनन या द्रवण कहलाता है। संघनन, क्वथन अथवा वाष्पन का विपरीत प्रक्रम है।

  1. हिमीकरण

  • शीतलन द्वारा द्रव को ठोस में परिवर्तित करने का प्रक्रम, हिमीकरण कहलाता है।

  • हिमीकरण, गलन का विपरीत प्रक्रम है, इसलिए द्रव का हिमांक वही होता है, जो उसके ठोस का गलनांक होता है। जैसे, बर्फ का गलनांक 00 C है, इसलिए जल का हिमांक भी 00 C है।

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  • गुप्त ऊष्मा

  • सामान्यतः जब किसी पदार्थ को ऊष्मा दी जाती है, तो उसके ताप में वृध्दि होती है। हालांकि पदार्थ की भौतिक अवस्था परिवर्तित करने के लिए जब ऊष्मा दी जाती है, तो पदार्थ के ताप में वृध्दि नही होती है। अतः पदार्थ की अवस्था परिवर्तित करने के लिए उसे दी गई ऊष्मा ऊर्जा, उसकी गुप्त ऊष्मा कहलाती है।

  • गुप्त उष्मा दो प्रकार की होती है –

  1. संगलन की गुप्त ऊष्मा

  2. वाष्पन की गुप्त उष्मा

  • ठोस को द्रव अवस्था में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक ऊष्मा संगलन अथवा गलन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है। बर्फ से संगलन की गुप्त ऊष्मा 3.34´105 जूल प्रति किग्रा. होती है।

  • द्रव को वाष्प में परिवर्तित करने के लिए आवश्यक ऊष्मा, वाष्पन की गुप्त ऊष्मा कहलाती है। जल के वाष्पन की गुप्त ऊष्मा 22.5´105 जूल प्रति किग्रा. है।

  • पदार्थ के शीतलन के लिए 00 C पर जल की अपेक्षा 00 C पर बर्फ अधिक प्रभावी होता है। इसका कारण यह है कि गलन के लिए बर्फ का प्रत्येक किग्रा. पदार्थ से 3.34´105 जूल गुप्त ऊष्मा लेता है और इस कारण पदार्थ को अधिक प्रभावी ढंग से ठंडा करता है।

  • जब जल, भाप में परिवर्तित होता है, तो वह गुप्त ऊष्मा अवशोषित करता है। प्रयोगों द्वारा यह देखा गया है कि उबलते हुए जल की अपेक्षा भाप द्वारा जलना अधिक असहनीय होता है, यद्यपि ये दोनों ही 1000 C के समान ताप पर होते हैं। इसका कारण यह है कि उबलते जल की अपेक्षा भाप में गुप्त ऊष्मा के रुप में अधिक ऊष्मा होती है। इसलिए जब भाप हमारी त्वचा पर पड़ती है और संघनित होकर जल बनाती है, तो वह क्वथनशील जल की अपेक्षा 22.5´105 जूल प्रति किग्रा. अधिक ऊष्मा निकालती है। उबलते हुए जल की अपेक्षा अधिक ऊष्मा उत्सर्जित करने के कारण भाप अधिक असहनीय जलन उत्पन्न करती है।

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  • उर्ध्वपातन

  • गर्म करने पर ठोस पदार्थों का सीधे वाष्प में और ठंडा करने पर वाष्प का सीधे ठोस में परिवर्तन ऊर्ध्वपातन कहलाता है।

  • ऊर्ध्वपातन करने वाले पदार्थ हैं – अमोनियम क्लोराइड, आयोडीन, कपूर, नैफ्थलीन इत्यादि।

  • वाष्पन (Evaporation)

  • अपने क्वथनांक के नीचे ही किसी द्रव के वाष्प में परिवर्तित होने का प्रक्रम वाष्पन कहलाता है। किसी द्रव का वाष्पन कमरे के ताप पर भी हो सकता है। गीले कपड़े उनमें उपस्थित जल के वाष्पन के कारण ही सूख जाते हैं। पोखरों का जल भी वाष्पन के कारण ही सूख जाता है।

  • द्रव का ताप बढ़ाने पर वाष्पन की दर में वृध्दि होती है। किसी द्रव के वाष्पन की दर उसके क्वथनांक पर अधिकतम होती है।

  • वायु की आर्द्रता जब निम्न होती है, तो वाष्पन की दर उच्च होती है और जल अत्यंत शीघ्र वाष्पित होता है, जबकि वायु की आर्द्रता उच्च होने पर वाष्पन की दर धीमी हो जाती है।

  • वाष्पन के कारण शीतलन

  • किसी पात्र में भरा द्रव जब वाष्पित होता है, तो वह उस पात्र से वाष्पन की गुप्त ऊष्मा प्राप्त करता है। ऊष्मा खोने के कारण वह पात्र ठंडा हो जाता है।

  • वाष्पन के कारण शीतलन का एक अच्छा उदाहरण मिट्टी के बर्तनों में जल का ठंडा होना है। मिट्टी के दीवारों में बड़ी संख्या में अत्यंत सूक्ष्म छिद्र होते हैं। कुछ जल लगातार इन छिद्रों से घड़ों के बाहर रिसकर वाष्पित होता रहता है। वाष्पन के लिए आवश्यक गुप्त ऊष्मा मिट्टी के बर्तन तथा शेष जल से प्राप्त होती है। इस प्रकार घड़ों में शेष जल ऊष्मा खो देता है और ठंडा हो जाता है।

  • ग्रीष्म ऋतु में हमारे शरीर से काफी मात्रा में पसीना निकलता है। सूती कपड़े जल के उत्तम अवशोषक होते हैं और हमारे शरीर से निकले हुए पसीने को अवशोषित कर लेते हैं। इस पसीने का वाष्पन हमारे शरीर को शीतलता प्रदान करता है। पॉलीएस्टर इत्यादि से बने वस्त्र पसीने को अधिक अवशोषित नहीं करते हैं, इससे वे ग्रीष्म ऋतु में हमारे शरीर को ठंडा रखने में असमर्थ होते हैं। अतः ग्रीष्म ऋतु में सूती वस्त्रों को वरीयता दी जाती है।

  • पंखा हमारी त्वचा से निकलने वाले पसीने के वाष्पन की दर को बढ़ाता है, जिससे हमें शीतलता की अनुभूति होती है।

  • डेजर्ट रुम कूलर शीतलन जल के वाष्पन के कारण होता है। डेजर्ट कूलर गर्म तथा शुष्क दिनों में अधिक शीतलन करता है, क्योंकि गर्म दिन में उच्चताप, जल के वाष्पन की दर को बढ़ाता है।

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  • संवहन (Convection) द्वारा ऊष्मा का स्थानांतरण केवल द्रवों तथा गैसों में होता है। संवहन की प्रक्रिया में पदार्थ के कण स्वयं स्थानांतरित होते हैं। उदाहरणार्थ – आग पर रखी पतीली का जल संवहन द्वारा गर्म होता है।

  • एक स्वस्थ मनुष्य के शरीर का तापमान 36.9 डिग्री सेल्सियस या 98.6 डिग्री फॉरेनहाइट होता है। यदि शरीर का तापमान इससे कम या ज्यादा होता है, तो आदमी बीमार पड़ जाता है। यदि शरीर के तापमान अर्थात 37 डिग्री सेल्सियस को केल्विन में बदलेंगे तो इसका मान 273+37=310 केल्विन होगा।

  • अल्कोहल का द्रवांक निम्नतर होने के कारण ठंडे स्थानों पर इसका हिमांक काफी नीचे होता है, जिससे शून्य से काफी म तापमान हो जाने पर भी यह द्रव अवस्था में ही बना रहता है। यही कारण है कि ठंडे देशों के लिए पार की अपेक्षा अल्कोहल तापमापी बेहतर साबित होते हैं।

  • स्वचालित इंजनों में एथिलीन ग्लाइकॉल का प्रयोग हिमरोधी के रुप में किया जाता है। जब जल के साथ एथिलीन ग्लाइकॉल को मिलाया जाता है, तो मिश्रण का हिमांक 00 C से घट जाता है, जिससे ठंडे देशों में स्वचालित इंजनों में पानी नहीं जमता है।

  • परम शून्य सैध्दांतिक रुप से न्यूनतम संभव तापमान है। इस ताप पर आणविक ऊर्जा न्यूनतम होती है। परम शून्य तापमान केल्विन स्केल पर 00 K जबकि सेल्सियस स्केल पर -273.150 C परिभाषित किया गया है।

  • ढला हुआ लोहा, बर्फ, एन्टिमोनी, बिस्मथ, पीतल आदि गलने पर आयतन में सिकुड़ते हैं। इस प्रकार के ठोस अपने ही गले द्रव में प्लवन करते रहते हैं।

  • थर्मोस्टेट किसी निकाय का तापक्रम नियंत्रित करने वाला यंत्र है। इसकी सहायता से किसी निकाय का तापक्रम वांछित स्तर पर रखा जा सकता है।

  • आधुनिक फ्रास्ट-फ्री फ्रिजों में आर्द्रता-नाशक (Dehumidification) प्रक्रिया होती है जिससे फ्रिज के भीतर की अतिरिक्त आर्द्रता अवशोषित होकर बर्फ बनकर तथा पुनः पिघलकर द्रव रुप में फ्रिज से बाहर हो जाती है। यही कारण है कि सीले बिस्कुटों को थोड़ी देर के लिए फ्रिज में रखने पर वे कुरकुरे हो जाते हैं।

  • कृष्ण छिद्र (Black Hole) एक असीमित घनत्व का द्रव्ययुक्त पिण्ड है, जो प्रकाश को परावर्तित करने में अक्षम होने के कारण ही अदृश्य है। इसका गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र इतना प्रबल होता है कि कोई भी द्रव्य यहां तक कि प्रकाश भी यहां नहीं कर पता है। यही कारण है कि कृष्ण छिद्र को दूरबीन से नहीं देखा जा सकता है।

  • किसी धातु को गर्म करने पर यह फैलता है तथा तापन से उसका प्रसार बढ़ जाता है। किसी धातु वलय को गर्म करने पर उसके बाह्य व्यास के साथ-साथ भीतरी व्यास में भी वृध्दि होती है। अतः उसे गर्म करने पर गोलक निकल सकेगा।

  • शीशे की छड़ को भाप में रखने पर इसकी लंबाई के साथ-साथ इसकी चौड़ाई (व्यास) में भी वृध्दि होती है।

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  • एयरकंडीशनर में संपीडित गैस ही प्रयुक्त होती है जिससे कमरे या अन्य स्थान को ठंडा किया जाता है।

  • तेज हवा वाली रात्रि में ओस नहीं बनती है, क्योकि तेज हवा के कारण वाष्पन की दर तेज हो जाती है, इसलिए ओस के कण वाष्पित हो जाते हैं।

  • थर्मस में प्रयुक्त कांच या स्टील पर रजत परत (Silver Plating) लगा कर पेय पदार्थों को गर्म रखा जाता है।

  • जल में नमक जैसी कोई  अशुध्दि मिलाने पर उसका क्वथनांक बढ़ जाता है। दूसरी ओर, उपद्रव्यों (Impurities) को मिलाने से सामान्यतः गलनांक कम हो जाता है। 00  C पर पिघलती बर्फ में कुछ नमक, शोरा आदि मिलाने से  बर्फ का गलनांक 00 C से घटकर -220 C हो जाता  है।

  • अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर वायुमंडलीय ताब कम होता है, इसलिए पानी 1000 C से कम तापमान पर उबलने लगता है। जल में नमक मिलाने से जल का क्वथनांक बढ़ जाता है। जिससे भोजन शीघ्रता से पक जाता है।

  • मिट्टी के घड़े की दीवारों में असंख्य सूक्ष्म छिद्र होते हैं। इन छिद्रों से पानी रिसता रहता है जिस कारण घड़े की सतह पर हमेशा, गीलापन रहता है। छिद्रो से निकले पानी का वाष्पोत्सर्जन होता रहता है। जिस सतह पर वाष्पोत्सर्जन होता है वह सतह ठंडी हो जाती है यानी उस सतह का तापमान गिर जाता है।

  • मानवों में पसीने का मुख्य उपयोग शरीर का ताप नियंत्रित (Thermoregulation) रखने में होता है। एक वयस्क व्यक्ति में पसीना निकलने की दर अधिकतम 2-4 लीटर प्रति घंटे या 10-14 लीटर प्रतिदिन हो सकती है। त्वचा से पसीने के वाष्पित होने से ठंडक का अनुभव होता है।

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  • किसी वस्तु की ऊष्मा हानि की दर को शीतलन की दर कहते हैं।

  • ग्रीष्मकाल में जब मौसम उमस भरा होता है, तब आर्द्र ऊष्मा का अनुभव होता है।

  • शुष्कता दशा से निम्न आर्द्रता का बोध होता है।

  • आर्द्रता के बढ़ने पर वायु में ध्वनि का वेग बढ़ जाता है क्योंकि आर्द्रता बढ़ने के साथ वायु के घनत्व में कमी आती है।

  • यद्यपि ऊनी रेशे एक विशेष प्रकार के प्रोटीन से निर्मित होते हैं, किंतु ऊष्मा का कुचालन इन रेशों के मध्य स्थित हवा के कारण होता है।

  • हाइड्रोजन से भरा हुआ पॉलीथीन का गुब्बारा जब पृथ्वी के स्थल से छोड़ा जाता है, तो वायुमंडल में ऊंचाई पर जाने पर वायु का घनत्व कम हो जाता है इसलिए गुब्बारे में आमाप में वृध्दि होगी।

  • रेफ्रिजरेटर का दरवाजा खुला रखने पर उसमें से अनेक प्रकार की गैसें निकलती हैं, जो कमरे के तापमान को बढ़ा देती हैं।

  • खाना बनाने के बर्तनों जैसे प्रेशर कुकर आदि में लकड़ी या एबोनाइट के हैंडिल लगाए जाते हैं क्योंकि लकड़ी या एबोनाइट ऊष्मा के कुचालक होते हैं। एबोनाइट मजबूत पदार्थ होता है।

तरंग गति

  • तरंग गति किसी माध्यम में उत्पन्न विक्षोभ है, जो उद्गम बिंदु से माध्यम के कणों के वास्तविक स्थानांतरण के बिना सभी दिशाओं में संचरित होता है।

  • तरंगो को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है –

  1. यांत्रिक तरंगे एवं

  2. विद्युत चुंबकीय तरंगे।

  • यांत्रिक तरंगे –

  • यांत्रिक तरंग किसी भौतिक माध्यम में उत्पन्न वह विक्षोभ है, जो बिना अपना स्वरुप बदले माध्यम में एक निश्चित चाल से आगे बढ़ता है।

  • यांत्रिक तरंगे किसी भौतिक माध्यम में ही संचरित होती हैं।

  • यांत्रिक तरंगों द्वारा केवल ऊर्जा तथा संगेव का संचरण होता है, द्रव्य का नहीं।

  • जल की तरंगे, ध्वनि की तरंगे, स्प्रिंग की तरंगे इत्यादि यांत्रिक तरंगो के उदाहरण हैं।

  • यांत्रिक तरंगो के प्रकार –

  • ­जब किसी माध्यम में कोई यांत्रिक तरंग संचरित होती है, तो माध्यम के कण कंपन्न करने लगते हैं। कणों के कंपन की दिशा के अनुसार, यांत्रिक तरंगे दो प्रकार की होती हैं –

  1. अनुप्रस्थ तरंगे

  2. अनुदैर्ध्य तरंगे

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  1. अनुप्रस्थ तरंगे (Transverse Waves)

  • किसी माध्यम में यांत्रिक तरंग के संचरित होने पर माध्यम के कण तरंग के चलने की दिशा के लंबवत कंपन करते हैं, तो ऐसी तरंगो को अनुप्रस्थ तरंगे कहते हैं।

  • उदाहरण

  • तनी हुई डोरी या रस्सी में कंपन

तनी हुई डोरी या रस्सी के एक सिरे को हुक से  बांध कर उसके दूसरे मुक्त सिरे को ऊपर-नीचे हिलाते हैं, तो रस्सी में इसके कणों के कंपन तरंग की गति की दिशा के लंबवत होते हैं। स्पष्ट है कि रस्सी में अनुप्रस्थ तरंगे हैं।

  • पानी की सतह पर उत्पन्न तरंगे भी अनुप्रस्थ तरंगे हैं।

  • अनुप्रस्थ तरंगे केवल ठोसों में उत्पन्न की जा सकती हैं, जिनमें दृढ़ता होती है।

  • गैसो में अनुप्रस्थ तरंगे उत्पन्न नहीं की जा सकती हैं।

  • द्रवों में अनुप्रस्थ तरंगे अनके भीतर नहीं बन सकती, केवल उनके तल पर ही बन सकती हैं।

  • अनुप्रस्थ तरंगे वैद्युत चुंबकीय हो सकती हैं, जैसे प्रकाश तरंगे।

  • अनुप्रस्थ तरंग में माध्य स्थिति में से ऊपर की ओर अधिकतम विस्थापन की स्थिति को श्रृंग (Crest) तथा नीचे की ओर अधिकतम विस्थापन की स्थिति को गर्त (Trough) कहते हैं।

  • किसी तरंग के लिए दो लगातार श्रृंगों या गर्तों के बीच की दूरी नियत होती है, जिसे अनुप्रस्थ तरंग की तरंगदैर्ध्य कहते हैं। इसके ग्रीक अक्षर l से प्रदर्शित करते हैं।

  • अनुदैर्ध्य तरंगे (Longitudinal Waves)

  • किसी माध्यम में यांत्रिक तरंग के संचरित होने पर यदि माध्यम के कण के संचरण की दिशा के समानांतर कंपन करते हैं, तो उस तरंग को अनुदैर्ध्य तरंग कहते हैं।

  • किसी स्प्रिंग को खींचकर छोड़ देने पर उसमें उत्पन्न अनुदैर्ध्य तरंगे ही होती है।

  • जिन स्थानों पर स्प्रिंग के चक्कर पास-पास हैं, वे स्थान संपीडन (Compression) की दशा में कहे जाते हैं तथा जिन स्थानों पर चक्कर दूर-दूस हैं वे स्थान विरलन (Rarefaction) की दशा में कहे जाते हैं। एक संपीडन से दूसरे समीवर्ती संपीडन की दूरी अथवा एक विरलन से दूसरे समीपवर्ती विरलन की दूरी अनुदैर्ध्य तरंग की तरंगदैर्ध्य कहलाती है।

  • अनुदैर्ध्य तरंगे सभी प्रकार के माध्यमों (ठोस, द्रव अथवा गैस) में उत्पन्न की जा सकती है।

  • वायु में उत्पन्न ध्वनि तरंगे अनुदैर्ध्य तरंगे ही होती हैं।

  • अनुदैर्ध्य तरंग हमेशा यांत्रिक होती हैं।

  • द्रवों की सतह पर अनुप्रस्थ तरंगों का संचरण होते हुए भी उनके भीतर केवल अनुदैर्ध्य तरंग ही संचरित हो सकती है।

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  • आवर्तकाल

  • किसी माध्यम में तरंग संचरण की स्थिति में माध्यम का कोई कण अपना 1 कंपन पूरा करने में जितना समय लेता है, उसे तरंग का आवर्तकाल कहते हैं। इसे T से प्रदर्शित करते हैं।

  • आवृत्ति

  • किसी माध्यम में तरंग संचरित होने पर माध्यम को कोई कण 1 सेकंड में जिनते कंपन करता है, उस संख्या को तरंग की आवृत्ति कहते हैं। उसे n से प्रदर्शित करते हैं।

  • आवृत्ति, चाल तथा तरंगदैर्ध्य में संबंध

  • यदि कंपन करती हुई किसी वस्तु का आवर्तकाल T, आवृत्ति n तथा तरंगदैर्ध्य l हो, तो

   तरंग की चाल v = nl

      चाल = आवृत्ति ´ तरंगदैर्ध्य

   चूंकि आवृत्ति = 1/आवर्तकाल

   \  v = l/T

  • विद्युत चुंबकीय तरंगे

  • यांत्रिक तरंगों के अतिरिक्त ऐसी तरंगे भी होती है, जिसके संचरण के लिए माध्यम की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसी तरंगो को विद्युत चुंबकीय तरंगे कहते हैं। प्रकाश, एक्स किरणें, रेडियो तरंगे इत्यादि विद्युत चुंबकीय तरंगो के उदाहरण हैं।

  • सभी विद्युत चुंबकीय तरंगे एक ही चाल से चलती हैं तथा इनकी चाल प्रकाश की चाल के बराबर होती है।

  • विद्युत चुंबकीय तरंगो का तरंगदैर्ध्य परिसर बहुत विस्तृत होता है। इनका परिसर 10-14 मीटर से लेकर 104 मीटर तक होता है। विद्युत चुंबकीय तरंगो का विवरण निम्नवत है –

  1. गामा किरणें

  • ये अत्यंत लघु तरंगदैर्ध्य की विद्युत चुंबकीय तरंगे होती हैं। इनका तरंगदैर्ध्य परिसर 10-14 मीटर से 10-10 मीटर तक होता है। तरंगदैर्ध्य बहुत कम होने के कारण इन किरणों में अत्यधिक ऊर्जा होती है, जिससे ये लोहे की चादरों को पार कर जाती हैं।

  1. एक्स किरणें

  • इन किरणों की खोज जर्मन वैज्ञानिक विल्हेम रॉएन्टजेन द्वारा की गई थी। इनकी तरंगदैर्ध्य 10-10 मीटर से 3´10-8 मीटर तक होती है। इन किरणों का चिकित्सा व औद्योगिक क्षेत्र में बहुत प्रयोग होता है।

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  1. पराबैंगनी विकिरण

  • इस विकिरण की खोज जर्मन भौतिकविद जोहान रिटर ने की थी। इन तरंगो की तरंगदैर्ध्य 10-8 मीटर से 4´10-7 मीटर तक होती है। ये तरंगे सूर्य के प्रकाश, वैद्युत विसर्जन, निर्वात, स्पार्क आदि से उत्पन्न होती है। अदृश्य लिखाई, अंगुली के निशानों का पता लगाने तथा खाद्य पदार्थों के संरक्षण में इनका प्रयोग होता है।

  1. दृश्य विकिरण

  • इस विकिरण को हम अपनी आंखो में देख सकते हैं। इनका तरंगदैर्ध्य परिसर 4´10-7 मीटर से 7.8´10-7 मीटर तक होता है। दृश्य विकिरण में परावर्तन, अपवर्तन, व्यतिकरण, विवर्तन, ध्रुवण, दृष्टि संवेदन इत्यादि गुण पाए जाते हैं।

  1. अवरक्त किरणें

  • इन किरणों की खोज खगोलशास्त्री विलियम हर्शेल ने की थी। इनका तरंगदैर्ध्य परिसर 7.8´10-7 मीटर से 10-3 मीटर तक होता है। इन किरणों की वेधन-शक्ति अधिक होने के कारण ये घने कोहरे तथा धुंध से पार निकल जाती हैं। युध्दकाल में इनका प्रयोग दूर-दूर तक सिग्नल भेजने में किया जाता है।

  1. सूक्ष्म तरंगे (Microwaves)

  • इनका तरंगदैर्ध्य 1´10-3 मीटर से 10-1 मीटर तक होता है। रडार, उपग्रहों, लंबी दूरी के बेतार संचार तथा माइक्रोवेव ओवन में इनका प्रयोग होता है।

  1. रेडियो तरंगे

  • इनका तरंगदैर्ध्य परिसर 1´10-1 मीटर से 1´104 मीटर तक होता है। रेडियो तथा टीवी प्रसारण में इनका प्रयोग होता है।

  • दीर्घ रेडियो तरंगे पृथ्वी के आयनमंडल (Ionosphere) से परावर्तित होती हैं। यह मंडल 80 से 400 किलोमीटर की ऊंचाई के मध्य स्थित होता है। यहं की हवा विद्युत आवेशित होती है।

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  • ध्वनि तरंगो के संचरण के लिए किसी-न-किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। ध्वनि तरंगे निर्वात या शून्य में गति नहीं कर सकती हैं। यही कारण है कि चन्द्रमा पर ध्वनि तरंगो का संचरण नही होता तथा वहां दो व्यक्ति एक दूसरे की बातों को नहीं सुन सकते हैं। तरंग संचरण दो प्रकार से होता है – 1. अनुप्रस्थ ,2. अनुदैर्ध्य। ध्वनि तरंग अनुदैर्ध्य होती है।

  • क्रिस्टलकी (Crystallography) या मणि विज्ञान एक प्रायोगिक विज्ञान है जिसमें क्रिस्टलों में परमाणुओं के विन्यास का अध्ययन किया जाता है। एक्स-किरणों के विवर्तन द्वारा क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया जाता है।

  • अवरक्त तरंग (Infrared Waves) विद्युत चुंबकीय तरंगो का एक प्रकार है। इनकी तरंगदैर्ध्य (Wavelength) दृश्य प्रकाश से अधिक होती है। इनका प्रयोग लक्ष्य ढूंढने, निरीक्षण, रात्रि आदि के लिए सैनिको द्वारा किया जाता है।

  • पराबैंगनी विकिरण को उसकी तरंगदैर्ध्य के आधार पर तीन प्रमुख प्रवर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. UV-A विकिरण – इन विकिरणों की तरंगदैर्ध्य 320-400 nm तक होती है। यह विकिरण सुरक्षात्मक ओजोन परत से लगभग अप्रभावित रहता है तथा पृथ्वी की सतह तक आसानी से पहुंच जाता है।

  2. UV-B विकिरण – 280-320 nm की तरंगदैर्ध्य रेंज वाला यह विकिरण आंशिक रुप से ओजोन परत द्वारा अवशोषित किया जाता है परंतु इसकी कुछ मात्रा पृथ्वी तक पहुचती है।

  3. UV-C विकिरण – 100-280 nm की तरंगदैर्ध्य रेंज वाला यह विकिरण ओजोन परत द्वारा सर्वाधिक प्रभावित होता है।

  • दूर संचार में सूक्ष्म तरंगो (Microwave) का प्रयोग होता है।

  • एफ.एम. प्रसारण सेवा में प्रयुक्त होने वाले आवृत्ति बैंड का परास 88 से 108 मेगाहर्टज के मध्य होता है। एफ.एम. बैंड के लिए यह परास मानक के रुप में प्रयोग किया जाता है।

  • X-किरण एक प्रकार का विद्युत चुंबकीय विकिरण है। यह चिकित्सा में आंतो के रोगो के निदान के लिए प्रयोग की जाती है।

  • सी.टी. स्कैन या कम्प्यूटेड टोमोग्रॉफी विशेष प्रकार का एक्स-रे परीक्षण है। जिसके द्वारा शरीर में अंदरूनी अंगो को देखा एवं रोगो का पता लगाया जाता है।

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ध्वनि

  • ध्वनि ऊर्जा का वह रुप है जो श्रवण की संवेदना पैदा करती है।

  • ध्वनि तरंगो के रुप में गमन करती है। ध्वनि कम्पायमान वस्तुओं से उत्पन्न होती है। पदार्थ जिसमें होकर ध्वनि गमन करती है, माध्यम कहलाता है।

  • ध्वनि तरंगें यांत्रिक तरंगे कहलाती हैं, क्योंकि उनके संचरण के लिए द्रव्यमान माध्यम (ठोस, द्रव या गैस) आवश्यक होता है।

  • ध्वनि की चाल

  • ध्वनि की चाल उस माध्यम की प्रकृति पर निर्भर करती है जिसमें होकर वह गमन करती है। ध्वनि की चाल भिन्न-भिन्न माध्यमो में भिन्न-भिन्न होती है। गैसो में ध्वनि उत्यन्त धीमी गति से, द्रवों में तीव्र गति से और ठोसों में तीव्रतम गति से गमन करती है। ध्वनि निर्वात में गमन नहीं कर सकती। ध्वनि वायु की अपेक्षा स्टील में लगभग 15 गुना तीव्र गति से गमन कर सकती है।

  • ध्वनि की चाल तापमान पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे वायु का तापमान बढ़ता है उसमें ध्वनि की चाल भी बढ़ती है। अतः वायु में ध्वनि की चाल ठण्डे दिनों की अपेक्षा गर्म दिनों में अधिक होगी।

  • ध्वनि की चाल वायु की आर्द्रता पर निर्भर करती है। जैसे-जैसे वायु की आर्द्रता बढ़ती है, उसमें ध्वनि की चाल भी बढ़ती है। स्पष्ट है कि ध्वनि शुष्क वायु में धीमी गति से परंतु आर्द्र वायु में तीव्र गति से गमन करती है।

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विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की चाल

माध्यम

ध्वनि की चाल

शुष्क वायु (00C पर)

332 मीटर/सेकंड

शुष्क वायु (200 C पर)

344 मीटर/सेकंड

हाइड्रोजन (00 C पर)

1284 मीटर/सेकंड

समुद्री जल (00 C पर))

1531 मीटर/सेकंड

तांबा (200 C पर)

3750 मीटर/सेकंड

एल्युमीनियम(200 C पर)

5100 मीटर/सेकंड

लोहा (या स्टील) (200 C पर)

5130 मीटर/सेकंड

 

  • ध्वनि का आवृत्ति परिसर

  • ध्वनि तरंगो को उनके आवृत्ति परिसर के आधार पर निम्न तीन भागों में विभाजित किया जाता है –

  1. श्रव्य तरंगे (Audible Waves)

  • मनुष्यों में ध्वनि की श्रव्यता का परिसर लगभग 20Hz से 20,000Hz तक होता है। मनुष्य 20Hz से कम आवृत्ति की तरंगे नहीं सुन सकता क्योंकि ये तरंगें कान के पर्दे को संवेदित नहीं कर पाती।

  • 20,000 Hz से अधिक आवृत्ति की तरंगो की आवृत्ति इतन अधिक होती है कि कान के पर्दे का दोलन इतना अधिक नहीं हो पाता कि वह इन तरंगो को ग्रहण कर सके।

  1. अवश्रव्य तरंगे (Infrasonic Waves)

  • 20 Hz से कम आवृत्ति की ध्वनियों को अवश्रव्य ध्वनि कहते हैं। ह्वेल, गैडा तथा हाथी अवश्रव्य ध्वनि परिसर की ध्वनियां उत्पन्न करते हैं।

  • प्रायः देखा गया है कि कुछ जंतु भूकंप से पूर्व परेशान हो जाते हैं। वास्तव में भूकंप मुख्य प्रघाती तरंगो (Main Shock Waves) से पहले निम्न आवृत्ति की अवश्रव्य ध्वनि उत्पन्न करते है, जो संभवतः जंतुओं को सावधान कर देती है।

  1. पराश्रव्य तरंगे (Ultrasonic Waves)

  • 20,000 Hz या 20 KHz से अधिक आवृत्ति की ध्वनियों को पराश्रव्य ध्वनि या पराध्वनि कहते हैं डॉलफिन, चमगादड़ जैसे जंतु पराध्वनि उत्पन्न करते हैं।

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पराध्वनि के अनुप्रयोग

  • पराध्वनि उच्च आवृत्ति की तरंगे हैं। ये अवऱोधों की उपस्थिति में भी एक निश्चित पथ पर गमन कर  सकती हैं।

  • उद्योगो तथा चिकित्सा के क्षेत्र में पराध्वनियों का व्यापक उपयोग किया जाता है।

  • पराध्वनि को हृदय के विभिन्न भागो से परावर्तित करा कर हृदय का प्रतिबिम्ब बनाया जाता है। इस तकनीक को इकोकॉर्डियोग्राफी (ECG) कहते हैं।

  • पराध्वनि का उपयोग गुर्दे की छोटी पथरी को बारीक कणों में तोड़ने के लिए भी किया जाता है। ये कण बाद में मूत्र के साथ बाहर निकल जाते हैं।

  • सोनार (SONAR: Sound Navigation and Ranging) एक ऐसी युक्ति है जिसमें जल में स्थित पिण्डों की दूरी, दिशा तथा चाल मापने के लिए पराध्वनि तरंगो का उपयोग किया जाता है।

मात्रक

  • डेसीबल ध्वनि के स्तर का मात्रक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 45 डेसीबल तक की ध्वनि को कर्णप्रिय मानवीय स्वास्थ्य के लिए सर्वाधिक सुरक्षित बताया है।

प्रतिध्वनि

  • किसी परावर्तक वस्तु जैसे किसी इमारत अथवा किसी पहड़ के निकट जोर से चिल्लाने या ताली बजाने पर कुछ समय पश्चात वही ध्वनि फिर से सुनाई देती है। अतः सुनाई देने वाली इस ध्वनि को प्रतिध्वनि कहते  हैं।

  • हमारे मस्तिष्क में ध्वनि की संवेदना लगभग 0.1 सेकंड तक बनी रहती है। अतः स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनने के लिए ध्वनि परावर्तित ध्वनि के बीच कम से कम 0.1 सेकंड का समयांतराल अवश्य होना चाहिए।

  • जब कोई ध्वनि होती है, तो उसकी संवेदना हमारे दिमाग मे 1/10 सेकंड तक बनी रहती है। मुष्य का काम केवल उन्हीं दो ध्वनियों के बीच विभेद कर सकता है, जो उसे न्यूनतम 1/10 सेकंड के समयांतराल पर सुनाए दे। अतः प्रतिध्वनि सुनाई देने के लिए यह आवश्यक है कि किसी स्रोत से उत्पन्न ध्वनि आगे जाकर किसी वस्तु से टकराकर कम से कम 1/10 सेकंड में स्रोत के पास वापस लौटे।

  • ध्वनि के संचरण के लिए किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। निर्वात (Vacuum) मे माध्यम की अनुपस्थिति के कारण ध्वनि तरंगे संचरण नहीं कर  पाती हैं।

  • हृदय अपश्रव्य आवृत्ति पर कंपन करता है जिसे सुनने के लिए स्टेथोस्कोप का प्रयोग किया जाता है।

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  • पराध्वनिक पिण्डों (Supersonci Bodies) की चाल को मैक संख्या (Mach Number) में व्यक्त किया जाता है। किसी पराध्वनिक यान की मैक संख्या पराध्वनिक यान की चाल तथा वातावरण के तापमान पर ध्वनि की चाल के अनुपात के बराबर होती है।

  • ध्वनि की तीव्रता मापने की इकाई डेसीबल है। एक डेसीबल बेल का दसवां भाग होता है।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वार किसी नगर के लिए निर्धारित किया गया सुरक्षित ध्वनि प्रदूषण स्तर 45 डेसीबल (db) है।

  • ध्वनि की तीव्रता को डेसीबल (Decibel) में मापते हैं –

ध्वनि के स्रोत             तीव्रता (डेसीबल में)

फुसफुसाहट               15-20

साधारण बातचीत          30-60

गुस्से में बातचीत          70-80

ट्रक-मोटरसाइकिल          90-95

यंत्र कारखाने              100-110

ऑर्केस्ट्रा                  110-120

जेट विमान               140-150

  • जब किसी बंद हॉल में ध्वनि उत्पन्न की जाती है, तो हॉल की दीवारों तथा छत से क्रमिक परार्वतन के फलस्वरुप स्रोत के बंद हो जाने पर भी हाल में कुछ समय तक ध्वनि बनी रहती है, इसे अनुरणन कहते हैं।

  • टीवी के रिमोट नियंत्रण इकाइयों में अधिकतर अवरक्त विकिरण का प्रयोग करते हैं किंतु कुछ में रेडियो तरंगो का प्रयोग करते हैं। अवरक्त एक विद्युत चुंबकीय विकिरण है।

  • विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम में शामिल विभिन्न विकिरणों का तरंगदैर्ध्य के संदर्भ में अवरोही क्रम इस प्रकार है – रेडियो तरंगे>माइक्रोवेव>अवरक्त विकिरण>दृश्य प्रकाश>पराबैंगनी विकिरण>एक्स किरण>गामा किरण। स्पष्ट है कि रेडियो तरंगो की तरंगदैर्ध्य सर्वाधिक तथा गामा किरणों की तरंगदैर्ध्य न्यूनतम होती है।

  • टी.वी. का स्विच ऑन करने पर श्रव्य एवं दृश्य दोनों एक साथ शुरु होते हैं। ध्वनि के प्रकाश की अपेक्षा कम वेग से चलने के कारण ध्वनि बाद में सुनाई पड़नी चाहिए किंतु टेलीविजन में ऑडियो सिंक्रोनाइर लगाकर इस त्रुटि को दूर किया जाता है।

  • दूरदर्शन प्रसारण में ध्वनि संचरण के लिए आवृत्ति माडुलन तथा चित्र-संदेशों के संचरण के लिए आयाम माडुलन का प्रयोग किया जाता है।

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विद्युत धारा

  • किसी चालक में विद्युत आवेश के प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते हैं। धनात्मक आवेश के प्रवाह की दिशा ही विद्युत धारा की दिशा मानी जाती है। स्पष्ट है कि विद्युत धारा की दिशा ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन की दिशा में विपरीत होती है।

  • विद्युत धारा का मात्रक एम्पियर होता है। 1 एम्पियर = 1 कूलॉम/सेकंड

  • विद्युत धारा के प्रकार – विद्युत धारा दो प्रकार की होती है –

  1. दिष्ट धारा (Direct Current)

  2. प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current)

  • दिष्ट धारा – यदि किसी परिपथ में धारा एक ही दिशा में पहती है तो उसे दिष्ट धारा कहते हैं। बैटरी इत्यादि से प्राप्त धारा दिष्ट धारा कहलाती है।

  • प्रत्यावर्ती धारा – ऐसी धारा जिसके मान एवं दिशा समय के साथ आवर्ती रुप से परिवर्तित होते रहते हैं, प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है। आल्टरनेटर, दोलित्र (Socillator) आदि से प्राप्त होने वाली विद्युत धारा प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है।

दिष्ट धारा की अपेक्षा प्रत्यावर्ती धारा का प्रमुख लाभ यह है कि प्रत्यावर्ती धारा को वैद्युत ऊर्जा की अधिक हानिक के बिना लंबी दूरियों तक संप्रेषित किया जा सकता है।

  • विद्युत वाहक बल (Electromotive Force)

  • किसी विद्युत ऊर्जा उत्पादक उपकरण द्वारा उत्पन्न किया गया वह बल जिसके कारण किसी चालक या परिपथ में इलेक्ट्रॉन का प्रवाह स्थापित किया जाता है, विद्युत वाहक बल कहलाता है।

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  • विभव

  • किसी इकाई धनावेश को अनन्त से विद्युत क्षेत्र के किसी बिंदु तक लाने मे किए गए कार्य को को उस बिंदु का विद्युत विभव कहा जाता है। विद्युत विभव का SI मात्रक वोल्ट होता है।

  • विभवांतर

  • इकाई धनावेश को विद्युत क्षेत्र में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किए गए कार्य को उन बिंदुओं के मध्य विभावन्तर कहते हैं। विभवान्तर का मात्रक भी वोल्ट होता है।

विभवांतर (v) = w/q वोल्ट

  • प्रतिरोध

  • किसी चालक का प्रतिरोध वह भौतिक राशि है जिसके कारण चालक से धारा के प्रवाह मे रुकावट होती है। इसका मात्रक ओम (W) होता है। प्रतिरोध को R द्वारा सूचित किया जाता है।

  • ओम का नियम

  • जब किसी चालक के सिरो पर विभवान्तर लगाया जाता है तो उसमें होकर विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है। जर्मन वैज्ञानिक जॉर्ज साइमन ओम ने आरोपित विभवांतर तथा उसके फलस्वरुप प्रवाहित विद्युत धारा में प्रयोग द्वारा एक संबंध स्थापित किया, यह संबंध ओम का नियम कहलाता है। इस नियम के अनुसार, यदि किसी चालक की भौतिक अवस्था, जैसे- ताप आदि में कोई परिवर्तन न हो तो चालक में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा उसके सिंरों पर लगाए गए विभवान्तर के अनुक्रमानुपाती होती है। V=RI जहां नियतांक R को चालक का प्रतिरोध कहते हैं।

  • विद्युत जनित्र (Electric Generator)

  • विद्युत जनित्र विद्युत धारा अथवा बिजली उत्पन्न करने का एक उपकरण है। वैद्युत जनित्र यांत्रिक ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में स्थानांतरित करता है। विद्युत जनित्र, विद्युत चुम्बकीय प्रेरण का एक अनुप्रयोग है।

  • ट्रांसफॉर्मर (Transformer)

  • विद्युत चुम्बकीय प्रेरण पर आधारित ट्रांसफॉर्मर एक ऐसा यंत्र है। जो प्रत्यावर्ती वोल्टेज को घटाने या बढ़ाने का कार्य करता है।

  • ट्रांसफॉर्मर दो प्रकार के होते हैं –

  1. उच्चायी ट्रांसफॉर्मर (Step-up-Transformer)

  • यह उच्च विभव की प्रत्यावर्ती धारा को उच्च विभव की प्रत्यावर्ती धारा में बदलने का काम करता है।

  1. अपचायी ट्रांसफॉर्मर (Step-down-Transformer)

  • यह उच्च विभव की प्रत्यावर्ती धारा को निम्न विभव की प्रत्यावर्ती धारा में बदलने में काम आता है।

  • ट्रांसफॉर्मर उन विद्युत उपकरणों के साथ काम करता है, जो मेन्स के वोल्टेज से निम्न वोल्टेज पर कार्य करते हैं। अपचायी ट्रांसफॉर्मर पॉवर सब-स्टेशनों पर वोल्टेज को स्टेप-डाउन करके उपभोक्ताओं को वितरित करने में काम आते हैं।

  • उच्चायी ट्रांसफॉर्मर पॉवर उत्पादक स्टेशनों, X-किरणों ट्यूबों इत्यादि में काम आते हैं।

  • विद्युत मोटर

  • विद्युत मोटर एक ऐसी युक्ति है जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है। विद्युत मोटर धारा के चुम्बकीय प्रभाव के सिध्दांत पर कार्य करती है। विद्युत मोटर का उपयोग विद्युत पंखों, वाशिंग मशीनों, मिक्सर एवं ग्राइंडर आदि अनेकानेक युक्तियों में किया जाता है।

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  • विद्युत का बिल किलोवॉट/घंटे (kw/h) के मापन पर आधारित होता है। किलोवॉट/घंटा एक घंटा में 1000 वाट व्यय की गई विद्युत ऊर्जा है।

  • डायनेमो विद्युत चुंबकीय प्रेरण द्वारा यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने वाला उपकरण है।

  • कम वोल्टेज पर कार्य करने पर विद्युत मोटर प्रायः जल जाते हैं क्योंकि वे अधिक विद्युत धारा खींचते हैं, जो वोल्टेज के प्रतिलोमानुपाती होती है।

  • निकेल कैडमियम (Ni-Cd) बैटरी एक प्रकार की रिचार्जेबल बैटरी है, जिसमें निकेल हाइड्रॉक्साइड तथा कैडमियम इलेक्ट्रोड के रुप में प्रयुक्त होता है, जबकि पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड (क्षारीय) विद्युत अपघट्य होता है। इसका उपयोग कैलकुलेटर, कॉर्डलेस, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, ट्राजिस्टर सभी में होता है।

  • टंगस्टन नामक धातु का प्रयोग विद्युत बल्बों में रोशनी उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। इसकी खोज टॉरबर्न बर्गमेन ने 1781 ई. में की थी। इसका गलनांक 34220 C तथा क्वथनांक 55550 C होता है।

  • तड़ित चालक एक धातु की चालक छड़ होती है जिस ऊंचे भवनों की आकाशीय विद्युत से रक्षा के लिए लगाया जाता है। तड़ित चालक का ऊपरी सिरा नुकीला होता है और उसे भवनों के सबसे ऊपरी हिस्से में जड़ दिया जाता है।

  • तीन पिन प्लग में सजीव या फेज (Live or Phase), उदासीन (Neutral) एवं आधार (Earth or Ground) सिरे होते हैं। दोनों एक साथ रहने वाले सिरो में फेज एवं उदासीन तारो को जोड़ते हैं। तीसरी एवं लंबी पिन में अर्थ जोड़ते  हैं।

  • एक साधाराण बिजली के बल्ब का अपेक्षाकृत अल्प जीवन होता है क्योंकि –

  1. फिलामेंट का तार एक समान नहीं होता

  2. बल्ब पूर्णरुप से निर्वतित नही किया जा सकता है

  3. फिलामेंट के सहायक तार उच्च ताप पर पिघल जाते हैं।

  • पावर ग्रिड के सामान्य संचालन के लिए हमारे देश में 50 हर्ट्ज आवृत्ति पर विद्युत ट्रांसमिशन निर्धारित है। इसमें 0.5 हर्ट्ज तक की कमी या वृध्दि मान्य है। इससे कम या ज्यादा होने पर ग्रिड फेल हो जाता है।

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  • भूक्रोड के अंदर की चक्रक धाराओं के कारण ही पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण होता है। इसी को भू-चुंबकीय क्षेत्र भी कहते हैं।

  • रेक्टीफायर (Rectifier) एक वैद्युत युक्ति (Electrical Device) है, जो प्रत्यावर्ती धारा या ऑल्टरनेटिंग करेंट (AC) को दिष्ट धारा या डायरेक्ट करेंट (DC) मे परिवर्तित करती है।

  • बैटरी को चॉर्ज करने के लिए C. धारा का प्रयोग किया जाता है, इसके लिए प्रयुक्त चार्जर में Rectifier, A.C. को D.C. में बदल देता है।

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चालकता

  • किसी पदार्थ के परमाणु में जो इलेक्ट्रॉन नाभिक के समीप की कक्षाओं में होते हैं वे नाभिक के धन आवेश द्वारा प्रबल आकर्षण-बल से बंधे रहते हैं। परंतु नाभिक से दूरी वाली कक्षाओं के इलेक्ट्रॉनों पर यह बल बहुत कम होता है।

  • अतः इन बाह्य (Outer) इलेक्ट्रॉनों को इनके स्थान से आसानी से हटाया जा सकता है। इनमें से अनेक इलेक्ट्रॉन तो अपने परमाणुओं से अलग होकर पूरे पदार्थ में (परमाणुओं के बीच के रिक्त स्थानों) में यादृच्छिक (अनियमित) गति करते रहते हैं। इन्हें मुक्त इलेक्ट्रॉन (Free Electrons) अथवा चालक इलेक्ट्रॉन (Conduction Electrons) कहते हैं।

  • ये इलेक्ट्रॉन ही आवेश को पदार्थ में एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं। अतः किसी ठोस पदार्थ की विद्युत-चालकता उसमें मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। धातुओं में यह संख्या बहुत अधिक होती है। इसी कारण धातुयें विद्युत की अच्छी चालक होती है। चांदी विद्युत का सबसे अच्छा चालक है, उसके बाद क्रमशः तांबा, सोना, और एल्युमीनियम हैं।

  • वैद्युत चालन धातुओं के अतिरिक्त कुछ द्रवों व गैसों में भी होता है। धातुओं में वैद्युत चालन इलेक्ट्रॉनों के चलने से होता है।

  • गैसो में वैद्युत चालन एक निश्चित दाब परास (लगभग 10 मिमी. से 10-3 मिमी. पारा) में ही होता है।

  • दाब की उच्च सीमा (10 मिमी.) से ऊपर तथा निम्न सीमा (10-3 मिमी.)से नीचे गैसें विद्युत की कुचालक होती हैं।

  • अचालक

  • जिन पदार्थों में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या बहुत ही कम अथवा शून्य होती है उनमें आवेश का प्रवाह संभव नही होता। अतः वे पदार्थ विद्युत के अचालक (Bad Conductors or Insulators) होते हैं।

  • अर्ध्दचालक

  • कुछ पदार्थ ऐसे हैं, जिनकी वैद्युत चालकता अचालकों की अपेक्षा बहुत अधिक, परंतु चालकों की अपेक्षा बहुम कम होती है। इन्हें अर्ध्दचालक कहते हैं, जैसे सिलिकॉन, जर्मेनियम, सेलीनियम, कार्बन आदि। इन पदार्थों की विशेषता यह है कि इनका ताप बढ़ाने पर इनकी प्रतिरोधकता घटती है। अर्थात इनका प्रतिरोध ताप-गुणांक ऋणात्मक होता है। इस प्रकार, अर्ध्द चालको की चालकता पर ताप का प्रभाव, चालकों के विपरीत होता है।

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  • अतिचालकता

  • कुछ पदार्थों में ताप का प्रतिरोधकता के बीच एक असामान्य संबंध देखा जाता है। जैसे-जैसे पदार्थ को ठण्डा किया जाता है, पदार्थ की प्रतिरोधकता, शुध्द धातुओं की भांति, धीरे-धीरे घटती जाती है, परंतु एक विशेष ताप के नीचे ठण्ड होने पर प्रतिरोधकता बहुत तेजी से घटकर शून्य हो जाती है।

  • उदाहरणार्थ, पारे की प्रतिरोधकता 4.2 K ताप पर अचानक शून्य हो जाती है। इस घटना को अतिचालकता कहते हैं, तथा ठण्डा किए गए पदार्थ को अतिचालक (Superconductor) कहते हैं। यह घटना अति निम्न तापों पर (10 K से 0.1 K तक) ही होती है।

  • वह ताप जिस पर प्रतिरोधकता अचानक शून्य हो जाती है, संक्रमण ताप (Transition Temperature) कहलाता है, जो विभिन्न पदार्थों के लिए भिन्न-भिन्न होता है।

  • अतिचालकता का गुण सभी पदार्थों में नहीं पाया जाता है। जो पदार्थ सामान्यतः सुचालक हैं जैसे तांबा, चांदी, सोना, लिथियम तथा सोडियम, उनमें 1 K से भी छोटी भिन्न तक के नीचे ताप पर  भी अतिचालकता का गुण नहीं पाया जाता है। इसके विपरीत, कुछ धातुएं तथा मिश्र धातुएं, जैसे कि टंगस्टन, कैडमियम, एल्युमीनियम, टिन तथा सीसा क्रमशः 0.01 K, 0.56 K, 1.19 K, 3.7 K तथा 2 K तापों पर अतिचालक अवस्था में होते हैं।

अतिचालक पदार्थों के कई उपयोग हैं –

  1. ऊर्जा को वैद्युत तारों में बिना किसी प्रतिरोधात्मक ह्रास के भेजा जा सकता है तथा संग्रहित किया जा सकता है। पावर कंपनी जब मांग कम होती है तब वैद्युत उत्पादित करके अतिचालक रिंगो में संग्रहित कर सकती है। जिसे अधिकतम मांग के दौरान दे सकते हैं।

  2. अतिचालक वैद्युत चुंबकों से प्रबल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न किया जा सकता है जिसे साधारण वैद्युत चुंबक उत्पन्न नहीं कर सकते।

  • विद्युत चुंबकत्व के संदर्भ में पारगम्यता किसी पदार्थ का वह गुण है, जो उस पदार्थ में चुंबकीय क्षेत्र स्थापित किए जाने में उस पदार्थ का प्रदर्शित सहायता की मात्रा बताता है। इसे ग्रीक वर्ण m (म्यू) से प्रदर्शित किया जाता है। पूर्ण (Perfect) अतिचालक की पारगाम्यता शून्य होती है।

 

  • वाय़ुमंडलीय दाब पर किसी अतिचालक द्वारा प्राप्य अधिकतम ताप 133 केल्विन होता है। अधिकतम ताप वाला अतिचालक एक सेरेमिक पदार्थ है जिसमें मरकरी, बेरियम, कैल्शियम, कॉपर तथा ऑक्सीजन शामिल हैं।

  • अतिचालकता की दिशा में हो रहे खोज और अनुसंधान मे सिरेमिक ऑक्साइड बहुत ही उपयोगी सिध्द हुई है। मृतिका-युक्त धातुओं पर ही अतिचालकता के प्रयोग किए जा रहे हैं और इसमें सफलता भी मिली है। अतिचालकता युक्त मृत्तिकाएं थैलियम (Ti), बेरियम (Ba), कैल्शियम (Ca) तथा कॉपर ऑक्साइड (CuO) से युक्त होती हैं।

  • अर्ध्दचालक (Semiconductor) दो प्रकार के होते हैं – तात्विक या प्राकृतिक (Intrinsic) अर्ध्दचालक तथा बाह्य (Extrinsic) अर्ध्दचालक। एक शुध्द अर्ध्दचालक जिसमें कोई अपद्रव्य न मिला हो, निज अर्ध्दचालक कहलाता है। इस प्रकार शुध्द जर्मेनियम एवं सिलिकॉन अपनी प्राकृतिक अवस्था में निज अर्ध्दचालक हैं। इनमें वैद्युत चालन इलेक्ट्रॉनों एवं कोटरों अर्थात होल्स दोनो की गति के कारण होता है।

  • परम शून्य ताप (00 K) पर अर्ध्दचालक की चालकता शून्य हो जाती है और वे एक आदर्श अचालक की भांति व्यवहार करते हैं। इस ताप पर अर्ध्दचालकों में विद्युत प्रतिरोध अनंत हो जाता है।

  • झामा (जला हुआ कोयला) से जर्मेनियम तत्व निकाले जाते हैं जिनका उपयोग ट्रांजिस्टर निर्माण में होता है।

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नाभिकीय भौतिकी

नाभिकीय विखण्डन (Nuclear Fission)

  • जब किसी तत्व के परमाणुओं पर न्यूट्रॉनों की बमबारी की जाती है, तो साधारणतः परमाणुओं के नाभिकों का कृत्रिम विघटन (Artificial Disintegration) होकर, उनसे हल्के कण (जैसे अल्फा कण, बीटा कण, प्रोटॉन, इत्यादि) उत्सर्जित होते हैं। कभी-कभी न्यूट्रॉन नाभिक द्वारा अवशोषित होकर नाभिक को उसके एक भारी आइसोटोप में बदल देता है तथा g-फोटानों के रुप में ऊर्जा उत्सर्जित होती है।

  • नाभिकीय विखण्डन वह प्रक्रिया है जिसमें एक भारी नाभिक एक न्यूट्रॉन का प्रग्रहण करके तुलनीय द्रव्यमानों के दो हल्के नाभिको में टूट जाता है। इस प्रक्रिया को कुछ तीव्र न्यूट्रॉन तथा विखण्डन खण्डों की गतिज ऊर्जा व g-करिणों के रुप में ऊर्जा की विशाल मात्रा विमोचित (Release) होती है। यह प्रक्रिया ही परमाणु बम तथा नाभिकीय रिएक्टर का आधार है।

  • नाभिकी विखण्डन का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अत्यधिक ऊर्जा मुक्त होती है। इसे नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं।

  • 1 ग्राम यूरेनियम का विखण्डन होने पर 5´1023 MeV ऊर्जा उत्पन्न होगी। इतनी ऊर्जा 20 टन N.T. (Tri-nitro-tolune) में विस्फोट करने से उत्पन्न होता है।

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  • परमाणु बम (Atom Bomb)

  • परमाणु बम का अधिक उपयुक्त नाम नाभिकीय बम (Nuclear Bomb) है। यह एक ऐसी युक्ति है जिसमें तीव्रगामी न्यूट्रॉनों के द्वार विखण्डनीय पदार्थ में अनियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया को बनाए रखा जाता है। तब, उस पदार्थ से अति अल्प समय में ऊर्जा की विशाल मात्रा  मुक्त होती है।

  • परमाणु बम में यूरेनियम (U235) अथवा प्लूटोनियम (Pu239) के दो टुकड़े एक सघन (Dense) आवरण में पृथक-पृथक रखे जाते हैं। बम के विस्फोट से 1070 C की कोटि का ताप तथा लाखों वायुमंडलीय दाबों के बराबर दाब उत्पन्न हो जाता है।

  • नाभिकीय रिएक्टर (Nuclear Reactor) अथवा परमाणु भठ्ठी (Atomic Pile)

  • नाभिकीय रिएक्टर एक ऐसा संयंत्र है जिसमें विखंडनीय पदार्थ में स्पोषित नियंत्रित श्रृंखला अभिक्रिया चलाई जाती है तथा उससे नियत दर पर ऊर्जा प्राप्त की जाती है। इस ऊर्जा को अनेक उपयोगी कार्यों में प्रयुक्त किया जाता है। एक आधुनिक रिएक्टर में निम्न मुख्य भाग होते है –

  1. ईंधन (Fuel) – यह रिएक्टर का सबसे प्रमुख भाग है। यही वह पदार्थ है जिसका विखण्डन किया जाता है। इस कार्य के लिए U235 अथवा Pu239 प्रयुक्त किए जाते हैं।

  2. मन्दक (Moderator) – इसका कार्य न्यूट्रॉनों की गति को मन्द करना है, क्योंकि मन्दित न्यूट्रॉनों की U235 अथवा Pu239 नाभिकों में विखण्डन करने की प्रायिकता अधिक होती  है। इसके लिए भारी जल, ग्रेफाइट अथवा बेरीलियम ऑक्साइड प्रयुक्त किए जाते हैं। भारी जल सबसे अच्छा मन्दक है।

  3. शीतलक (Coolant) – विखण्डन होने पर अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न होती है जिसको शीतलक द्वारा हटाया जाता है। इसके लिए वायु, जल अथवा CO2 रिएक्टर में प्रवाहित करते हैं।

  4. नियंत्रक छड़े (Control Rods) – ये कैडमियम (अथवा बोरॉन) की छड़े होती हैं, जो कि रिएक्टर में विखण्डन दर को नियंत्रित करने में प्रयुक्त होती हैं। कैडमियम व बोरॉन मन्द न्यूट्रॉनों के अच्छ अवशोषक होते हैं। अतः जब इन छड को रिएक्टर के भीतर धकेला जाता है, तो विखण्डन की दर कम हो जाती है तथा जब वे बाहर खींच जाती हैं, तो विखण्डन की दर बढ़ जाती है।

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  • नाभिकीय संलयन (Neclear Fusion)

  • जब दो अथवा अधिक हल्के नाभिक अति उच्च चाल से गति करते हुए परस्पर संयुक्त होकर एक भारी नाभिक बनाते हैं, तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते  हैं। संलयन से प्राप्त नाभिक का द्रव्यमान संलयन करने वाले मूल नाभिकों के द्रव्यमानों के योग से कम होता है तथा द्रव्यमान की यह क्षति ऊर्जा के रुप में प्राप्त होती है।

  • उदाहरणार्थ, दो ड्यूट्रॉनों (1H2, भारी-हाइड्रोजन नाभिक) को संलयित करके एक ट्राइटॉन (ट्राइटियम का नाभिक) बनाया जा सकता है।

  • भारी हाइड्रोजन के नाभिकों के सलयन से प्राप्त ऊर्जा, उतने ही द्रव्यमान के U235 के विखण्डन से प्राप्त ऊर्जा से कहीं अधिक होती है।

  • हाइड्रोजन बम (Hydrogen Bomb)

  • यह नाभिकीय संलयन बम है जो कि भारी-हाइड्रोजन नाभिकों के संलयन पर आधारित है। चूंकि संलयन अति उच्च दाब तथा अति उच्च ताप पर होता है, अतः संलयन बम के साथ एक विखण्डन (परमाणु) बम को प्रज्वलक (Igniter) के रुप में प्रयुक्त करना पड़ता है।

  • हाइड्रोजन बम में संलयन के प्रक्रिया एक अभिनियंत्रित प्रक्रिया है। जिसका उपयोग केवल विध्वंसकारी ही हो सकता है। वास्तव में सूर्य की अपार ऊर्जा का स्रोत हल्के नाभिकों का संलयन है।

  • वर्ष 1938 में अमेरिकी वैज्ञानिक एच.ए. बेथे ने बताया कि सूर्य तथा ब्राह्मांड के अन्य तारों की ऊर्जा का स्रोत वहां होने वाला नाभिकीय संलयन है। मेसान मूल कणो की खोज वर्ष 1935 में वैज्ञानिक हिडेकी युकावा ने की थी। पाजीट्रॉन नामक धनावेशित मूल कण की खोज वर्ष 1932 में सी.डी. एंडरसन तथा यू.एफ.हेस ने की थी। परायूरेनियम तत्वो के संश्लेषण में जी.टी. सीबोर्ग का महत्वपूर्ण योगदान है।

  • कोबेन्ज विश्वविद्यालय के भौतिकविदो गुन्टूर तथा अल्फांस स्टाहलोफन ने आइंस्टाइन के सापेक्षवाद सिध्दांत को गलत साबित करने का दावा किया है। उन्होने माइक्रोवेव फोटॉनों के वेग से अधिक वेग से संचारित करने का दावा किया है।

  • साइक्लोट्रॉन एक ऐसा त्वरक-उपकरण है जिसके द्वारा प्रोटॉन, अल्फा कण तथा ड्यूट्रॉन आदि में उच्च वेग उत्पन्न किया जाता है।

  • पेयजल में गामा उत्सर्जक समस्थानिक की उपस्थिति का पता प्रस्फुरण गणक से लगाया जाता है।

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  • सौर सेल द्वारा प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में रुपांतरित किया जाता है। सिलिकॉन का उपयोग सौर सेल में किया जाता है।

  • सौर सेल या प्रकाशवोल्टीय सेल एक विद्युतीय उपकरण है, जो प्रकाशवोल्टीय प्रभाव द्वारा प्रकाश ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में बदल देता है।

  • थोरियम एक ऐसा महत्वपूर्ण नाभिकीय ईंधन है, जो भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। थोरियम का मुख्य स्रोत मोनाजाइट है। थोरियम, केरल, झारखं, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा राजस्थान में पाया जाता है। भारत में थोरियम के अनुमानतः भंडार 4.5 लाख टन हैं।

  • वर्ष 1908 में हंगरी में जन्में अमेरिकी वैज्ञानिक एडवर्ड टेलर को हाइड्रोजन बम के जनक यानी फादर ऑफ हाइड्रोजन बम कहा जाता है। नवंबर, 1952 में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रथम हाइड्रोजन बम का परीक्षण प्रशांत महासागर स्थित मार्शल द्वीप में किया गया था।

  • यूरेनियम के रेडियोधर्मी विघटन का अंतिम उत्पाद लेड (सीसा) है।

  • हरिशचन्द्र रिसर्च इन्स्टीट्यूट उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है।

  • भारत के परमाणु परीक्षणों का स्थल पोखरण राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित है।

  • एक ब्रीडर रिएक्टर एक ऐसा नाभिकीय रिएक्टर है, जो ईंधन के रुप में जितना विखण्डनीय पदार्थ व्यय करता है उससे अधिक उत्पन्न करता है।

  • भारतीय परमाणु आयोग ने पोखरण में अपना पहला भूमिगत नाभिकीय परीक्षण 18 मई, 1974 को किया था। यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों के अलावा किसी अन्य राष्ट्र द्वारा किया गया पहला पुष्ट नाभिकीय परीक्षण था। इस परमाणु परीक्षण को स्माइलिंग बुध्दा कोड नाम दिया गया था।

  • शीघ्रोत्पादी रिएक्टर (Fast Breeder Reactor) बिजली पैदा करने वाला एक नाभिकीय रिएक्टर है जो विगलन प्रक्रिया के द्वारा बिजली उत्पन्न करता है।

  • महाराष्ट्र के तारापुर स्थित तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र की कुल स्थापित क्षमता 1400 मेगावॉट है और यह भारत का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंक्ष है।

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कंप्यूटर एवं सूचना प्रौद्योगिकी

  • कंप्यूटर शब्द कंप्यूट (Compute) शब्द से बना है, जिसका अर्थ है – गणना। सामान्यतः कंप्यूटर को आंकड़ों को प्रोसेस करने का यंत्र कहा जाता है।

  • डाटा –असिध्द तथ्य, अंक और सांख्यिकी का समूह, जिस पर प्रक्रिया करने से अर्थपूर्ण सूचना प्राप्त होती है।

  • सूचना – जिस डाटा पर प्रक्रिया हो चुकी हो, वह सूचना कहलता है। अर्थपूर्ण तथ्य, अंक या सांख्यिकी सूचना होती है। दूसरे शब्दों में, डाटा पर प्रक्रिया होने के बाद जो अर्थपूर्ण डाटा प्राप्त होता है, उसे सूचना कहते हैं।

  • बिट – यह कंप्यूटर की स्मृति की सबसे छोटी इकाई है। यह स्मृति में एक बाइनरी अंक 0 अथवा 1 को संचित किया जाना प्रदर्शित करती है। यह बाइनरी डिजिट का छोटा रुप है।

  • बाइट – यह कंप्यूटर की स्मतृति की मानक इकाई है। कंप्यूटर की स्मृति में की-बोर्ड से दबाया गया प्रत्येक अक्षर, अंक अथवा विशेष चिन्ह ASCII कोण में संचित होते हैं। प्रत्येक ASCII कोड 8 बिट का होता है। इस प्रकार किसी भी अक्षर की स्मृति में संचित करने के लिए 8 बिट मिलकर 1 बाइट बनती है।

भारत में कंप्यूटर का विकास

  • HEC-2M: विश्व में कंप्यूटर प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव तो 1940 के दशक के अंतिम वर्षों में ही हो गया था लेकिन भारत ने अपना पहला कंप्यूटर वर्ष 1956 में 10 लाख रुपये में खरीदा। इस कंप्यूटर का नाम HEC-2M था तथा इसे कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकीय संस्थान (Indian Statistical Institute) में स्थापित किया गया।

  • TIFRAC: यह भारत का पहला स्वदेश निर्मित कंप्यूटर था जिसका विकास वर्ष 1962 में किया गया था। इसका पूरा नाम है – टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ऑटोमेटिक कंप्यूटर

  • परम – अमेरिका द्वारा भारत को क्रे सुपरकंप्यूटर देने से इंकार करने के बाद 1980 के दशक के अंत में भारत के सुपरकंप्यूटर कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। सुपरकंप्यूटिंग के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से वर्ष 1988 में प्रगत संगणन विकास केन्द्र (C-D-DAC: Centre for Development of Advanced Computing) की स्थापना की गई। परम पुणे स्थित सी-डैक द्वारा डिजाइन एवं निर्मित सुपरकंप्यूटरों की एक श्रृंखला है। परम 8000 परम श्रृंखला का पहला कंप्यूटर था। इसका विकास वर्ष 1991 में किया गया था। इसे भारत का पहला स्वदेश-निर्मित सुपरकंप्यूटर माना जाता है। परम श्रृंखला का नवीनतम सुपरकंप्यूटर परम ईशान है।

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कंप्यूटर का वर्गीकरण

  • आकार एवं कार्य करने के आधार पर कंप्यूटर को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. माइक्रो कंप्यूटर (Micro Computer)

  2. मिनी कंप्यूटर (Mini Computer)

  3. मेनफ्रेम कंप्यूटर (Mainframe Computer)

  4. सुपर कंप्यूटर (Super Computer)

  • माइक्रो कंप्यूटर (Micro Computer) – ये कंप्यूटर आकार में छोटे होते हैं। इन कंप्यूटरों में माइक्रोप्रोसेसर का प्रयोग किया जाता था, इसलिए इन्हें माइक्रो कंप्यूटर कहते हैं। इन कंप्यूटर्स को पी.सी. (Personal Computer) भी कहा जाता है। पी.सी. (PC) को निम्न भागों में बांटा गया है –

माइक्रो कंप्यूटर

  1. डेस्कटॉप कंप्यूटर (Desktop Computer)

  2. लैपटॉप कंप्यूटर (Laptop Computer)

  • पामटॉप कंप्यूटर (Palmtop Computer)

  1. टैबलेट कंप्यूटर (Tablet Computer)

  • मिनी कंप्यूटर (Mini Computer) – मिनी कंप्यूटर आकार में बड़े होते हैं। मिनी कंप्यूटर की वर्ड लेंथ (Word Length) 32 बिट (Bit) या इससे अधिकत होती है। मिनी कंप्यूटर का प्रयोग पेरोल, एकाउंटिंग, वैज्ञानिक प्रयोगो आदि के लिए किया जाता है।

  • मेनफ्रेम कंप्यूटर – ये कंप्यूटर बड़ी कंपनियों एवं ऑफिसो में सर्वर (Server) कंप्यूटर के लिए प्रयोग किये जाते हैं। इस कंप्यूटर पर एक साथ की प्रयोक्ता (User) लॉग-इन (Login) कर सकते हैं। इनकी मेमोरी बहुत अधिक होती है।

  • सुपर कंप्यूटर (Super Computer) – सुपर कंप्यूटर शब्द का प्रयोग पहली बार जब अमेरिका में वर्ष 1929 में हुआ था, तब बाइनरी डिजिटल तकनीक वाले आज के कंप्यूटरों का जन्म भी नहीं हुआ था। इस समय यह शब्द गणना यंत्र बनाने वाली अमेरिका कंपनी आईबीएम (IBM) के एक ऐसे  भारी-भरकम और जटिल गणना यंत्र की प्रशंसा में गढ़ा गया था, जिसे अपने समय की सबसे तेज गणना मशीन माना जा रहा था।

  • आज कल के सुपर कंप्यूटर इस्पात की ऊंची-ऊंची अलमारियों जैसे लगने वाले उच्च कोटि के कंप्यूटरों का एक ऐसा सुसंबध्द समूह होते हैं, जिनमें कई माइक्रोप्रोसेसर एक साथ काम करते हुए किसी भी जटिलतम समस्या का तुरंत हल निकाल लेते हैं। सुपर कंप्यूटर की कार्य निष्पादन क्षमता बताने के लिए गीगाफ्लॉप, टेराफ्लॉप और पेटाफ्लॉप जैसी इकाईयों का प्रयोग होता है। प्रति सेकंड अरबो-खरबो गणनाएं कर देने वाले सुपरकंप्यूटरों का उपयोग खासकर ऐसे क्षेत्रों में किया जाता है जिनमें कुछ ही क्षणों में बड़े पैमाने पर गणनाएं करने की जरुरत पड़ती है। मसलन मौसम संबंधी अनुसंधान, नाभिकीय हथियारों, क्वांटम फिजिक्स और रासायनिक यौगिकों के अध्ययन आदि में सुपर कंप्यूटरों का प्रयोग किया जाता है।

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कंप्यूटर के मुख्य भाग

  • कंप्यूटर सिस्टम (Computer System) में 4 प्रमुख इकाईयां (Units) होती है –

  1. सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (CPU: Central Processing Unit)

  2. मेमोरी यूनिट (Memory Unit)

  3. इनपुट यूनिट (Input Unit)

  4. आउटपुट यूनिट (Output Unit)

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कंप्यूटर की पीढ़ियां

  • कंप्यूटर के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आधार पर कंप्यूटर के पीढ़ियों को पांच श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया हैः

पीढ़ी

हार्डवेयर

सॉफ्टवेयर

विशेषताएं

उदाहरण

प्रथम (1940-1956)

वैक्यूम ट्यूब, मैग्नेटिक ड्रम मेमोरी का प्रयोग

मशीन भाषा का प्रयोग

बड़ा आकार, खर्चीला, सीमित अनुप्रयोग

ENIAC (एनिएक), EDSAC (Electronic  Delay Storage Automatic Calculator), UNIVAC (Universal Automatic Computer)

दूसरी (1956-1963)

वैक्यूम ट्यूब की जगह ट्रांजिस्टर  का प्रयोग, Memory के लिए Magnetic  Core का प्रयोग, Magnetic Tape, Disk का प्रयोग

असेंबली भाषा, FORTRAN, COBOL का प्रयोग

आकार में छोटे, संग्रह क्षमता व  गति काफी अधिक

IBM 1620,  IBM 7094, UNIVAC 1108

तीसरी (1964-1971)

Integrated Circuit का प्रयोग

O.S. (Operating System) का प्रयोग, हाई लेवल लैंग्वेज

बहुत छोटा  आकार,  डॉक्यूमेंटेशन तथा प्रोसेसिंग में अनुप्रयोग

मिनी कंप्यूटर्स

चौथी (1971-वर्तमान)

Very Large  Scale Integrated Circuit का प्रयोग, माइक्रोप्रोसेसर, सेमी कंडक्टर पदार्थ की मेमोरी

स्प्रेडशीट सॉफ्टवेयर,  डाटा बेस सॉफ्टवेयर, ग्राफिकल यूजर इंटरफेस

तेज गति, कम मूल्य

माइक्रो कंप्यूटर्स

पांचवी पीढ़ी वर्तमान एवं उससे आगे

मल्टीमीडिया, इंटरनेट ऑप्टिकल  डिस्क, समानांतर प्रोसेसिंग (Parallel Processing) हार्डवेयर

इंटरनेट तथा मल्टीमीडिया, कृत्रिम बौध्दिकता (Artificial Intelligence) सॉफ्टवेयर, सभी हाई लेवल भाषाओं जैसे C, C++, JAVA, डॉट Net का प्रयोग

अत्यंत छोटा, तीव्र गति, उपयोग में आसान, बहुआयामी (ध्वनि दृश्य व Text) अनुप्रयोग

नोटबुक, पामटॉप सुपर  कंप्यूटर

 

सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (Central Processing Unit: CPU)

  • सिस्टम यूनिट (System Unit) में सी.पी.यू. एक मुख्य हार्डवेयर होता है। इसे कंप्यूटर का दिमाग (Brain) भी कहा जाता है। सी.पी.यू. के दो प्रमुख भाग होते हैं –

  1. कंट्रोल यूनिट (Control Unit)

  2. एरिथमेटिक व लॉजिक यूनिट (ए.एल.यू.) (Arithmetic & Logic Unit-ALU)

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मेमोरी यूनिट (Memory Unit)

  • स्मृति या मेमोरी कंप्यूटर का वह भाग है जिसके द्वारा सूचनाओं एवं अनुदेशों के भंडारण एवं पुनरुध्दरण (Storage and retrieval of data & instructions) का कार्य किया जाता है। सामान्यतः कंप्यूटर में दो प्रकार की मेमोरी होती है –

  1. आंतरिक स्मृति (Internal Memory)

  2. बाह्य स्मृति (External Memory)

  • मेमोरी (Memory) की क्षमता को बाइट (Byte), मेगाबाइट (Mega-byte), किलोबाइट (Kilobyte), गीगाबाइट (Gigabyte) या टेराबाइट (Terabyte) में पाया जाता है।

आंतरिक  स्मृति या प्राइमरी मेमोरी (Primary Memory)

  • एक कंप्यूटर की आंतरिक स्मृति उसके मदरबोर्ड में चिप्स (Chips) के रुप में पाई जाती है। आंतरिक स्मृति को प्राथमिक स्मृति या मुख्य स्मृति (Main Memory) के नाम से भी जाना जाता है। कंप्यूटर द्वारा जिन दो प्रकार की आंतरिक स्मृतियों का उपयोग किया जाता है, वे हैं –

  1. रैम (RAM- Random Access Memory)

  2. रोम (ROM- Read Only Memory)

  3. रैम (RAM- Random Access Memory)

  • रैम या रैंडम एक्सेस मेमोरी को कंप्यूटर की प्रमुख मेमोरी कहा जाता है।

  • जिन प्रोग्रामों और सूचनाओं की प्रोसेसिंग का कार्य कंप्यूटर कर रहा होता है, उन्हें कंप्यूटर की स्मृति में धारण करने के लिए रैम का उपयोग किया जाताहै।

  • यह अस्थायी (Volatile) मेमोरी होती है, अर्थात इसमें संग्रहीत डाटा कंप्यूटर बंद होने पर नष्ट हो जाता है तथा उसको पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

  • यह मेमोरी कंप्यूटर में स्थायी (Non-Volatile) रुप से रहती है। कंप्यूटर के बंद होने पर भी रोम में सूचनाएं संग्रहीत रहती हें, नष्ट नहीं होती। सामान्यतः बेसिक इनपुट आउटपुट सिस्ट (BIOS) नाम का एक प्रोग्राम रोम चिप में संग्रहीत होता है।

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बाह्य स्मृति या सेकेंडरी मेमोरी (Secondary Memory)

  • बाह्य स्मृति को द्वीतीयक स्मृति (Secondary Memory) भी कहते हैं। सेकंडरी मेमोरी के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं –

  • हार्ड डिस्क (Hard Disk)

  • फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk)

  • सीडी रोम (CD ROM)

  • डी वी डी (DVD)

  • पेन ड्राइव ( Pen Drive)

  • ब्लू रे डिस्क (Blue Ray Disk)

हार्ड डिस्क (Hard Disk)

  • एक हार्ड डिस्क में एक से अधिक डिस्क होती हैं। प्रत्येक डिस्क (Disk), ट्रैक (Track) में विभाजित होती है और प्रत्येक ट्रैक, सेक्टर (Sector) में विभाजित होता है।

डी.वी.डी. (DVD: Digital Versatile Disk or Digital Video Disk)

  • डी.वी.डी. (DVD) एक ऑप्टिकल स्टोरेज डिवाइस (Optical Storage Device) है, जो सी.डी. (CD) की तरह ही होती है परंतु इसकी संग्रहण क्षमता (Storage Capacity) सी.डी. से 15 गुना तक होती है।

डी.वी.डी. भी दो प्रकार की होती है –

  1. डी.वी.डी. – आर (DVD-R)

  2. डी.वी.डी. आर डब्ल्यू (DVD-RW)

  • पेन ड्राइव (Pen Drive) को यू.एस.बी. फ्लैश ड्राइव (USB Flash Drive) भी कहते हैं।

  • पेन ड्राइव वर्तमान डाटा संग्रहण युक्तियों (Data Storage Devices) में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

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ब्लू-रे डिस्क (Blu-Ray Disk)

  • ब्लू-रे डिस्क (Blu-Ray Disk) एक ऑप्टिकल डिस्क (Optical Disk) है जिसे डी.वी.डी. (DVD) का उन्नत (Advanced) संस्करण कहा जा सकता है।

  • ब्लू-रे डिस्क में (Blu-Ray Disk) में ब्लू (Blue) लेजर (Laser) के रंग (Colour) को तथा रे (Ray) ऑप्टिकल किरण (Optical Ray) को प्रदर्शित करता है।

इनपुट युक्तियां (Input Units)

  • जिन युक्तियों का प्रयोग डाटा और निर्देशों को कंप्यूटर में प्रविष्ट करने के लिए किया जाता है, वे सभी युक्तियां आगम अथवा इनपुट युक्तियां कहलाती हैं। कुछ इनपुट युक्तियां हैं – की- बोर्ड, माउस, स्कैनर, ट्रैक, बॉल, लाइट पेन आदि।

आउटपुट यूनिट (Output Unit)

  • आउटपुट युक्तियां या निर्गम उपकरण से तात्पर्य ऐसे उपकरणों से होता है, जो किसी संगणना के परिणामों को प्रयोक्ता तक पहुंचाते हैं। ये परिणाम दृश्य प्रदर्शन इकाई द्वारा दिखलाए जा सकते हैं, प्रिंटर द्वारा मुद्रित कराए जा सकते हैं, चुंबकीय माध्यमों पर संग्रहीत किए जा सकते हैं अथवा अन्य किसी विधि द्वारा यह निर्गम प्राप्त किए जा सकते हैं। जैसे – प्रिंटर, प्लॉटर, मॉनीटर, एल.सी.डी.

  • कंप्यूटर सॉफ्टवेयर (Computer Software) को मुख्य रुप से दो भागों में बांटा जा सकता है –

  1. सिस्टम सॉफ्टवेयर

  2. एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर

  3. सिस्टम सॉफ्टवेयर (System Software)

  • यह कंप्यूटर का मुख्य प्रोग्राम (Program) होता है। इसके बिना कंप्यूटर को स्टार्ट (Start) नहीं किया जा सकता है।

  • यह सॉफ्टवेयर कंप्यूटर की आंतरिक कार्य-प्रणाली (Internal Operations) को नियंत्रित (Control) करता है।

  1. एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर (Application Software)

  • ये एक या अधिक प्रोग्राम का वह समूह है जिसे प्रोग्रामर्स (Programmers) द्वारा एक विशेष कार्य को करने के लिए डिजाइन किया जाता है।

  • आवश्यकतानुसार भिन्न-भिन्न उपयोगों के लिए भिन्न-भिन्न एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर होते हैं, जैसे- लिखने के लिए, आंकड़ों को रखने के लिए, गाना रिकॉर्ड करने के लिए, वेतन की गणना, लेन-देन का हिसाब आदि के लिए।

  • उदाहरणार्थ – वर्ड प्रोसेसिंग सॉफ्टवेयर (Word Processing Software), डाटाबेस सॉफ्टवेयर (Database Software), ग्राफिक सॉफ्टवेयर (Graphic Software) आदि।

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कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा (Computer Programming Language)

  • कंप्यूटर किसी कार्य को करने के लिए प्रोग्रामर द्वारा दिए गए निर्देशों का अनुसरण करता है।

  • कंप्यूटर केवल एक भाषा समझता है, जिसे मशीन भाषा कहते हैं। यह भाषा 1s एवं 0s (Ones & Zeroes) पर आधारित होती है, इसलिए इसे बाइनरी भाषा भी कहा जाता है।

  • उच्च स्तरीय भाषा के उदाहरण हैं – कोबोल (COBOL), लोगो (LOGO), बेसिक (BASIC), एल्गोल (Algol), सी (C), सी प्लस प्लस (C++), कोमल (COMAL), प्रोलॉग (PROLOG), पास्कल (PASCAL), जावा (JAVA), सी-शार्प (C-Sharp), आरपीजी (RPG- Report Program Generator), लिप्स (LIPS) तथा स्नोबॉल (SNOBOL) आदि।

  • कंप्यूटर नेटवर्क आपस में जुड़े स्वतंत्र कंप्यूटर का समू है, जो एक-दूसरे से संचार स्थापित करने तथा सूचनाओं, संसाधनों को साझा इस्तेमाल करने में सक्षम होते हैं।

नेटवर्क के प्रकार (Types of Network)

  • नेटवर्क के निम्नलिखित प्रकार होते हैं –

  1. लोकल एरिया नेटवर्क (LAN- Local Area Network)यह एक कंप्यूटर नेटवर्क है, जो एक भौगोलिक परिधि में सीमित होता है जैसे- घर, ऑफिस, भवनों का छोटा समूह आदि का कंप्यूटर नेटवर्क।

  2. वाइड एरिया नेटवर्क (WAN- Wide Area Network) – इस नेटवर्क में कंप्यूटर आपस में लीज्ड लाइन या स्विच्ड सर्किट के द्वारा जुड़े रहते हैं। इस नेटवर्क की भौगोलिक परिधि बड़ी होती है, जैसे – पूरे शहर, देश या महादेश में फैला नेटवर्क का जाल। इंटरनेट इसका एक अच्छा उदाहरण है। बैंको द्वारा प्रदत्त ATM सुविधा वाइड एरिया नेटवर्क का उदाहरण है।

  3. मेट्रोपॉलिटन एरिया नेटवर्क (MAN- Metropolitan Area  Network) – इसके अंतर्गत दो या दो से अधिक लोकल एरिया नेटवर्क एक साथ जुड़े होते हैं। यह एक शहर की सीमाओं की भीतर स्थित कंप्यूटर नेटवर्क होता है। राउटर, स्विच और हब्स मिलकर एक मेट्रापॉलिटन एरिया नेटवर्क का निर्माण करते हैं।

  4. वर्ल्ड वाइड वेब (www) – इस अनुप्रयोग का आविष्कार ब्रिटिश कंप्यूटर विज्ञानी टिम बर्नर्स-ली (Tim Berners Lee) ने फ्रेंच-स्विस सीमा पर जेनेवा के पास यूरोपियन लेबोरेटरी फॉर पार्टिकल फिजिक्स (CERN) में किया था। किसी वेबसाइट पर टेक्सट, चित्र, ध्वनि और वीडियो के साथ सूचना को अनेक पेजो (वेब पेज) में www की सहायता से इंटरनेट पर प्रदर्शित करना सुगम हो जाता है। इस सेवा की विशेषता यह है कि इसके द्वारा वेबसाइटों में लिंक (Link) के जरिए अन्य वेबसाइटों पर एक माउस के क्लिक करने भर से लाया जा सकता है।

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ई-मेल (E-Mail)

  • ई-मेल वर्तमान में संदेशों के आदान-प्रदान का तीव्रतम साधन है। इसकी सहायता से दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हुए अपने मित्र या सहपाठी अथवा व्यापारिक सौंदो के लिए कंपनी या व्यापारी को हम संदेश भेज सकते हैं, जो उसे कुछ ही क्षणों मे मिल जाता है।

  • 1837 ई. में सर्वप्रथम चार्ल्स बैबेज ने कंप्यूटर की अवधारणा को मूर्त रुप प्रदान किया। श्री बैबेज ने प्रोग्राम योग्य निर्मित अपनी यांत्रिक मशीन को द एनालिटिकल इंजन (The Analytical Engine) की संज्ञा दी थी। उन्हें कंप्यूटर का जनक या पिता कहा जाता है।

  • द्वीतीय विश्व युध्द के दौरान ब्रिटिश वैज्ञानिक डॉ. एलन एम. टूरिंग ने कॉलोसस नामक प्रथम इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल कंप्यूटर को डिजाइन किया था।

  • 2G एक दूसरी पीढी की बेतार टेलिफोन प्रौद्योगिकी है। G शब्द जेनरेशन अर्थात पीढ़ी के लिए प्रयुक्त है।

  • कंप्यूटरों में वर्तमान में सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाली इनपुट डिवाइस की-बोर्ड एवं माउस हैं।

  • अमेरिकी वैज्ञानिक डग एंजेलबर्ट ने वर्ष 1968 में पहली बार कंप्यूटर माउस को दुनिया के सामने पेश किया था।

  • तकनीकी दृष्टि से कंप्यूटर के चार कार्य हैं –

  1. डाटा का संकलन या निवेशन

  2. डाटा का संचलन

  3. डाटा संसाधन

  4. डाटा का निर्गम या पुनर्निर्गमन

  • माउस को डबल क्लिक करने पर सूचना CPU में जाती है।

  • सामान्यतः नेटवर्को का नेटवर्क इंटरनेट को कहा जाता है। यह पारस्परिक रुप से जुडे नेटवर्कों की वैश्विक प्रणाली है। इसमें करोड़ो निजी, सार्वजनिक, शैक्षिक, व्यावसायिक तथा सरकारी नेटवर्क एक-दूसरे से जुड़े हैं जो कि मानक इंटरनेट प्रोटोकॉल सूट (Internet Protocol Suite, TCP/IP) का प्रयोग किया करते हैं।

  • एम.एस. डॉस एक ऑपरेटिंग सिस्ट है। यह सर्वप्रथम अगस्त, 1981 में जारी किया गया था।

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  • डायल-अप सर्विस सबसे धीमी इंटरनेट कनेक्शन सेवा है। यह अधिकतम 56 kbps तक इंटरनेट गति प्रदान करता है।

  • किसी वेबसाइट का प्रथम पेज होम पेज कहलाता है। होम पेज से उस वेबसाइट के अन्य पेजों के बारे में जानकारी मिल जाती है।

  • ब्लूटूथ वायरलेस संचार के लिए एक प्रोटोकॉल है। ब्लूटूथ उपकरण रेडियो संचार प्रणाली का प्रयोग करते हैं। इसलिए इन्हें लाइन-ऑफ-साइट में रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। ब्लूटूथ  402 GHz से 2.480 GHz  की रेंज में रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम का प्रयोग करता है।

  • इंटरनेट सिस्ट में ट्री टोपोलॉजी का प्रयोग होता है।

  • गूगल भारत में पहली बार मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर मुफ्त पब्लिक वाई-फाई सेवा आरंभ की गई। इस हेतु गूगल ने सरकारी कंपनी रेलटेल कॉर्प से समझौता किया है।

  • निकनेट (NICNET) विश्व का सबसे बड़ा उपग्रह आधारित कंप्यूटर संचार नेटवर्क है।

  • लाई-फाई तथा वाई-फाई दोनों ही तकनीकों में डाटा का प्रसारण विद्युत-चुंबकीय रुप से होता है।

  • वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) किसी संगठन के दूरस्थ स्थान पर स्थित निजी लोकल एरिया नेटवर्क से जुड़ने का एक सुरक्षित तरीक है। जिसमें कूटलेखन तकनीक द्वारा निजी सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए इंटरनेट या किसी सार्वजनिक नेटवर्क का प्रयोग किया जाता है।

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  • तलाश इंटरनेट पर एक मल्टीमीडिया पोर्टल तथा एक ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन है। इसका संचालन सी-डैक द्वारा देवनागरी में किया जाता है।

  • पुणे स्थित सी-डैक – सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग द्वारा परम नामक सुपर कंप्यूटरों की श्रृंखला का विकास किया गया।

  • नयन (NAYAN: Network Abhigham Niyantran) सी-डैक द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर है। साइबर आक्रमण एवं डाटा चोरी जैसी घटनाओं से बचने के लिए इसका विकास किया गया है।

  • विजय भाटकर को भारतीय सुपरकंप्यूटर का जनक कहा जाता है। उन्होंने वर्ष 1991 में भारत के पहले सुपर कंप्यूटर परम 8000 के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

  • पर्सनल कंप्यूटर के लिए शब्द लंबाई की परास 32 बिट या 4 बाइट होती है। सुपर कंप्यूटर के लिए शब्द लंबाई की परास 64 बिट या 8 बिट होती है।

  • डब्ल्यू.एल.एल. (WLL) का पूरा नाम वायरलेस इन लोकल लूप है। यह एक संचार प्रणाली है, जिसके माध्यम से बी.एन.एन.एल. भारत के विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में बेतार फोन सुविधा उपलब्ध करा रहा है।

  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग देहरादून में स्थित है।

  • चुंबकीय स्याही गुण पहचान (MICR: Magnetic Ink Character Recognition) तकनीक का प्रयोग बैंकिंग उद्योग में चेको की कंप्यूटर के माध्यम से प्रोसेसिंग हेतु किया जाता है।

  • डिजिटल घड़ी इम्बेडेड कंप्यूटर प्रणाली द्वारा होती है।

  • साइबर कानून की शब्दावली में DOS का अर्थ डिनायल ऑफ सर्विस है।

  • स्पैम को जंक ई-मेल या अनसोलिसिटेड बल्क मेल (Unsolicited Bulk Mail) के नाम से भी जाना जाता है।

  • याहू, गूगल एवं एम.एस.एन. इंटरनेट वेब साइट्स हैं।

  • किसी निश्चित पते पर एक ही ई-मेल संदेश बार-बार भेजना ई-मेल बाम्बिंग कहलाता है। जबकि ई-मेल स्पेमिंग के अंतर्गत एक ही ई-मेल संदेश को सैंकड़ो या हजारों प्रयोक्ताओं को भेजा जाता है।

  • वेब पोर्टल DACNET ई-एग्रीकल्चर से संबंधित है। कृषि एवं सहाकारिता विभाग की यह एक ई-गवर्नेंस परियोजना है, जिसे कृषि ऑनलाइन की सुविधा के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (NIC) द्वारा निष्पादित किया जा रहा है।

  • विद्या वाहिनी परियोजना कंप्यूटर शिक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी पर बल देती है।

  • विश्व कंप्यूटर साक्षरता दिवस प्रतिवर्ष 2 दिसंबर को मनाया जाता है।

  • MS –DOS को 6 मार्च, 1992 को संक्रमित करने वाला वायरस माइकल एंजिलो था। माइकल एंजिलो वायरस की सर्वप्रथम खोज ऑस्ट्रेलिया में वर्ष 1991 में हुई थी।

  • एफ.टी.पी. का पूर्ण रुप फाइल ट्रांसफर प्रोटोकाल है। यह इंटरनेट पर फाइलों के आदान-प्रदान की सुविधा प्रदान करता है।

  • प्रत्येक वेबपेज एक निश्चित अलग और अद्वीतीय एड्रेस होता है। यह एड्रेस यूनिफार्म रिसोर्स लोकेटर या छोटे रुप में URL के नाम से जाना जाता है।

  • HTML का पूर्ण रुप है – हाइपर टेक्स्ट मार्कअप लैंग्वेज।

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  • आई.बी.एम. (IBM: International Business Machine) एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी है, जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र से संबंधित है।

  • यू.पी.एस. का विस्तृत रुप अनइन्टरप्टेड पावर सप्लाई है। यह एक हार्डवेयर डिवाइस (Hardware Device) है, जो कंप्यूटरों का आवश्यक विद्युत-आपूर्ति (Power Supply) बनाए रखता है ताकि अचानक विद्युत कटौती होने पर सही तरीके से कंप्यूटर को शट डाउन किया जा सके।

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अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी

प्रथम कृत्रिम उपग्रह

  • 4 अक्टूबर, 1957 को रुस ने स्पुतनिक-1 नामक कृत्रिम उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया। अंतरिक्ष विज्ञान के समूचे इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण घटना थी। यह 96 मिनट में धरती की एक परिक्रमा कर लेता था। 92 दिनों तक यह धरती की कक्षा में घूमता रहा और इसने धरती की 1400 परिक्रमाएं पूरी कीं।

  • 3 नवंबर, 1957 को रुप ने अपना दूसरा उपग्रह स्पुतनिक-2 अंतरिक्ष में भेजा। इस उपग्रह में लाइका नामक  एक  कुतिया  भी भेजी गई थी।  इन कुछेक प्रारंभिक प्रयासों के  बाद मानव सहित यान  भेजने की चेष्टाएं की गई। रुसी यान वोस्तोक धरती की परिक्रमा के लिए 12 अप्रैल, 1961 को प्रक्षेपित किया गया। इसमें मेजर यूरी गागरिन भी सवार थे। पृथ्वी की एक परिक्रमा करके वह सकुशल धरती पर वापस लौट आए। इस प्रकार गागरिन को संसार के प्रथम अंतरिक्ष यात्री होने का श्रेय मिला। गागरिन इस यात्रा में कुल 1 घंटे, 48 मिनट तक आंतरिक्ष में रहे।

प्रथम चंद्र अवतरण

  • इसी क्रम में आदमी चांद पर भी यह कामयाबी अमेरिका के अपोलो अभियान के दौरान हासिल हुई। अपोलो अभियान अपोलो-7 (1968) से आरंभ हुआ और अपोलो-17 (1972) से  अवसान को प्राप्त हुआ।

  • अपोलो-11 इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण चरण था, जिसके तहत आदमी ने चांद पर कदम रख लिया। चन्द्र अवतरण की यह ऐतिहासिक उड़ान 16 जुलाई, 1969 को प्रारंभ हुई एवं 24 जुलाई, 1969 को रात 9 बजकर 30 मिनट पर समाप्त। यात्री थे- नील आर्म  स्ट्रांग, एडविन एल्ड्रिन जूनियर और माइकेल कौलिंस। पहले दोनों यात्रियों ने सबसे पहले चंद्र तल पर अपने पैर रखे। तीसरे यात्री कौलिंस यान में चन्द्रमा की परिक्रमा करते रहे हैं।

भारत का प्रक्षेपण यान

  • भारत के आरंभिक रॉकेट एसएलवी-3 ने अपनी चौथी और आखिरी उड़ान में 17 अप्रैल, 1983 को भारतीय उपग्रह रोहिणी-आरएस-डी2 को सफलतापूर्वक उसकी कक्षा में स्थापित कर दिया। इसी के साथ भारत अंतरिक्ष क्लब का छठां सदस्य राष्ट्र बन गया। भारत के इस प्रथम रॉकेट की अपनी सीमाएं थी। अपने साथ मात्र 35-41.5 किग्रो. वजनी रोहिणी श्रृंखला के उपग्रहें को धरती की 400-500 किलोमीटर की ऊंचाई वाली निचली कक्षा में स्थापित करने में सक्षम था। इसमें थोड़ा-सा सुधार-परिवर्तन करके इसे संवर्धित (Augment) कर दिया गया और फलस्वरुप  देश का अगला रॉकेट एएसएलवी (Augmented  Satellite Lauching Vehcle) अस्तित्व में आ गया जो अपने साथ 100-150 किग्रा. वजनी उपग्रह को  पृथ्वी की 400-500 किलोमीटर की ऊंचाई  वाली निचली कक्षा में स्थापित करने में सक्षम था। फिलहाल  एसएलवी-3 और एएसएलवी दोनों रॉकेट श्रृंखलाएं समाप्त घोषित कर दी गई हैं। इसके बाद भारत ने ध्रुवीय रॉकेट (Poral Satellite Launching Vehicle) बनाया  जो 900 किलोमीटर की ऊंचाई पर उत्तर-दक्षिण दिशा में 1000-1200 किलोग्राम वजनी उपग्रहों की स्थापना कर सकता है।

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पीएसएलवी

  • भारत का ध्रुवीय रॉकेट (PSLV) 44 मीटर लंबा और 295 टन भारी है। यह चार चरणीय रॉकेट है। इसके प्रथम और तीसरे चरण में ठोस प्रणोदक तथा दूसरे और चौथे चरण में द्रव प्रणोदक प्रयुक्त किए जाते हैं। प्रणोदक के  दो  भाग होते हैं – जो हिस्सा जलता है, उसे ईंधन कहते हैं और जो जलने में सहायक है, उसे ऑक्सीकारी कहते हैं। ध्रुवीय रॉकेट के प्रथम चरण के साथ 6 बूस्टर्स संलग्न रहते हैं और उनमें भी ठोस प्रणोदक इस्तेमाल होते हैं। इनमें प्रणोदकों की मात्रा भी आवश्यकतानुसार कम-अधिक की जा सकती है।

  • प्रथम चरण की मुख्य मोटर (Core Motor) और उससे संलग्न बूस्टरों में ठोस प्रणोदक एच.टी.पी.बी. (Hydroxyl Terminated Poly Butadine-HTPB) प्रयुक्त होता है। ध्रुवीय रॉकेट का दूसरा चरण द्रव प्रणोदक संचालित है जिसमें ईंधन के रुप मे यूडीएमएच (Unsymmetrical Di Methyl Hydrazine-UDMH) और ऑक्सीजन के रुप में नाइट्रोजन ट्रेट्रा ऑक्साइड (N2O4) का इस्तेमाल किया जाता है।

  • तीसरा चरण ठोस प्रणोदक संचालित है और इसमें भी वही HTPB का इस्तेमाल किया जाता है।

  • चौथे और आखिरी चरण में (द्रव प्रणोदक संचालित) ईंधन के रुप में एमएमएच (Mono Methyl Hydrazine-MMH) और ऑक्सीकारी के रुप में एमओएन-3 (Mixed Oxides of Nitrgen –MON- 3) का इस्तेमाल किया जाता है।

  • जब ध्रुवीय रॉकेट अपने साथ हल्के नीतिभार (500-700 किग्रा. भार के  उपग्रह) के उपग्रह ले जाता है, तब बूस्टर मोटरों की जरुरत नहीं होती है। ध्रुवीय रॉकेट के इस संस्करण को कोर –एलोन-वर्जन कहते  हैं।

  • जब उससे अधिक भार के (1500 किग्रा. के आस-पास) नीतिभार (उपग्रह) की स्थापना करनी होती है, तब इसके प्रथम चरण के साथ संलग्न बूस्टरों का इस्तेमाल किया जाता है। इस संस्करण को स्टैंडर्ड वर्जन कहते हैं और इसके बूस्टरों में 9 टन प्रणोदक इस्तेमाल किए जाते हैं। जब ध्रुवीय रॉकेट से किसी नीतिभार (Payload) की स्थापना भू-स्थिर कक्षा (ऊंचाई 36000 किमी.) में करनी हो तो इसे और शक्ति समर्थन की  आवश्यकता होती है।  इसके लिए  PSLV का नया मॉडल बनाया गया, जिसे PSLV-XL (Extra Large) कहते हैं और इसके बूस्टरों में 12 टन प्रणोदक प्रयुक्त होते हैं।

  • PSLV-XL का इस्तेमाल पहली बार चंद्रयान-1 को उसकी कक्षा में डालने के लिए किय गया था।

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जीएसएलवी

  • ध्रुवीय रॉकेट 2500-3000 किग्रो वजनी उपग्रहों को ले जाने में अक्षम है। इससे अधिक वजनी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए भारत ने अपने सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट जीएसएलवी का विकास किया है।

  • जीएसएलवी के तीन मॉडल हैं। जीएसएलवी-मार्क-I की भार वहन क्षमता ( Payload Capacity) मात्र 1.8 टन है।

  • जीएसएलवी-मार्क II की भार वहन क्षमता 2500 किग्रा है।

  • जीएसएलवी-मार्क III की भार वहन क्षमता 4000 किग्रा. है।

  • भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली रॉकेट जीएसएलवी की लंबाई 49.1 मीटर और भार 401 टन है। इसका तीसरा और ऊपरी चरण यानी क्रायोजेनिक स्टेज 17 टन भारी है।

  • भारत के अत्याधुनिक एवं सबसे भारी रॉकेट जीएसएलवी मार्क III का नामकरण काफी दिलचस्प तरीके से किया गया है। भारतीय वैज्ञानिकों के अनुसार, इसका वजन पांच पूरी तरह से भरे बोइंग जम्बो विमान या 200 वयस्क हाथियों के  बराबर है, इसलिए  इसे उन्होंने फैट ब्वॉय (मोटा लड़का) उपनाम दिया है। उल्लेखनीय है कि, इससे पहले इसरो के वैज्ञानिकों ने PSLV को वर्क हॉर्स (मेहनती घोड़ा), तो जीएसएलवी मार्क II को उसकी  अस्थिरता की वजह से नॉटी ब्वॉय (शैतान लड़का) की संज्ञा दी थी।

क्रायोजेनिक तकनीक

  • क्रायोजेनिक्स (Crogenics) भौतिकी की वह शाखा है जिसमें अत्यधिक निम्न ताप उत्पन्न करने व उसके अनुप्रयोगो का अध्ययन किया जाता है। वास्तव में, क्रायोजेनिक्स शब्द का उद्भव यूनानी शब्दो क्रायोस (Kryos) तथा जेनिक से हुआ है। क्रायोस का अर्थ है – बर्फ जैसा ठंडा जबकि जेनिक का अर्थ है – पैदा करना (To produce)। इस शब्द का सर्वप्रथम  उपयोग नीदरलैंड्स के प्रोफेसर केमर्लिंग ओन्नस (Kamerlingh Onnes) ने 1894 ई. में ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन एवं हीलियम जैसी स्थायी गैसों के शीतलन द्वारा तरलीकरण के संदर्भ में किया था। दरअसल, क्रायोजेनिक तकनीक का विकास 19वीं शताब्दी के वैज्ञानिकों द्वारा स्थायी गैसो के द्रवीकरण के लिए किए गए प्रयासों का ही परिणाम है। क्रायोजेनिक तकनीक शून्य से 238  डिग्री फॉरेनहाइट कम ताप पर कार्य करती है। 238 डिग्री F (-1500 C) से नीचे के तापमानों के संदर्भ में ही सामान्यतः क्रायोजेनिक्स शब्द का प्रयोग किया जाता है।

  • क्रायोजेनिक तकनीक का मुख्य उपयोग रॉकेटों में किया जाता है, जहां गैसीय ईंधनों को क्रायोजेनिक तकनीक से तरल अवस्था में परिवर्तित कर लिया जाता है। रॉकेटो के क्रायोजेनिक चरण को ऊर्जा प्रदान करने वाले इंजन में अत्यधिक ठंडी और द्रवीकृत गैसो को ईंधन और ऑक्सीकारक के रुप में प्रयोग किया जाता है। प्रायः इस इंजन में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन क्रमशः ईंधन और ऑक्सीकारक का कार्य करते हैं।

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रैमजेट (Ramjet)

  • रैमजेट एक प्रकार का जेट इंजन है जो किसी वायुयान की अग्र दिशा में गति का उपयोग करके जेट इंजन के दहन कक्ष में आने वाली हवा को संपीडित करता है। वायुयान में उपलब्ध ईंधन के दहन से यह हवा गर्म होकर विमान को गति प्रदान करती है। रैमजेट में किसी भी प्रकार के गतिमान पुर्जे नहीं होते हैं। इस प्रकार के जेट इंजन केवल गति प्राप्त करने के उद्देश्य से ही निर्मित किए जाते हैं। रैमजेट इंजन 5 मैक तक की अधिकतम गति तक परिचालित किए जा सकते हैं।

स्क्रैमजेट (Scramjet)

  • स्क्रैमजेट इंजन, सुपरसोनिक दहन रैमजेट के नाम से भी जाने जाते हैं तथा इस प्रकार के इंजन से युक्त विमान में तरल ऑक्सीजन साथ ले जाने की आवश्यकता नहीं होती है। यह इंजन वायुमंडल की ऑक्सीजन को ग्रहण एवं तत्पश्चात संपीडित करके उसे विमान में उपलब्ध ईंधन तक पहुंचाकर विमान को गति प्रदान करते हैं। स्क्रैमजेट इंजन, रैमजेट में नवप्रवर्तन का ही परिणाम है तथा इसका दहन कक्ष सुपरसोनिक वायुप्रवाह के साथ परिचालन के लिए विशेष रुप से डिजाइन किय गया है।

साउंडिंग रॉकेट (Sounding Rocket)

  • इन्हें अनुसंधान रॉकेट (Research Rocket) के नाम से भी जाना जाता है। ये रॉकेट अंतरिक्ष यात्रा के दौरान मुख्यतः मापन एवं अन्य वैज्ञानिक प्रयोगो का कार्यान्वित करने हेतु डिजाइन किए गए हैं। रॉकेट के संदर्भ में साउंडिंग शब्द का अर्थ मूल रुप से मापन करना ही है। एवं अनुसंधान कार्यो हेतु यह पृथ्वी की सतह से 50 से 1500 किमी. की ऊंचाई तक अनुसंधान उपकरणों के वहन में सक्षम हैं।

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स्पित्जर अंतरिक्ष दूरबीन (Spitzer Space Telescope)

  • यह सौर प्रणाली से लेकर अंतरिक्ष में दूरस्थ स्थित पिण्डों के अध्ययन के लिए प्रक्षेपित नासा की पराबैंगनी दूरबीन है। स्पित्जर, जिसे पूर्व में अंतरिक्ष पराबैंगनी दूरबीन सुविधा (SIRTF: Space Infrared Telescope  Facility) के नाम से जाना जाता था, नासा की ग्रेट वेधशाला कार्यक्रम (Great Observatories Program) का चौथा तथा अंतिम अभियान था। प्रत्येक वेधशाला अंतरिक्ष में विभिन्न प्रकार के प्रकाश (दृश्य, गामा किरण, एक्स किरणें तथा पराबैंगनी) के सर्वेक्षण के लिए प्रक्षेपित की गई थी। इस कार्यक्रम के अन्य अभियानों में हबल अंतरिक्ष दूरबीन (HST: Hubble Space Telescope), काम्पटन गामा-किरण वेधशाला (CGRO: Compton Gamma-Ray Observatory) तथा चन्द्रा एक्स-किरण वेधशाला (CXO:  Chandra X-Ray Observatory) सम्मिलित हैं। स्पित्जर खगोलीय उद्भव तथा आकाशगंगाओं, तारों तथा ग्रहो के विकास तथा निर्माण की प्रक्रिया के अध्ययन के लिए रुपांतरित (Designed) नासा के खगोलीय उद्भव की खोज कार्यक्रम (Astronomical Search For Origins  Program) का भी हिस्सा है।

  • इसे फ्लोरिडा स्थित केप कैनेवेरल (Cape Cavaveral) से डेल्टा रॉकेट द्वारा 25 अगस्त, 2003 को प्रक्षेपित किया गया था। यह मिशन अभी भी कार्यरत है।

हर्शेल अंतरिक्ष वेधशाला मिशन (Herschel Space Observatory)

  • यह यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) की अंतरिक्ष वेधशाला है। अवरक्त स्पेक्ट्रम (Infrared Spectrum) तथा वरुण ग्रह (Uranus) की खोज करने वाले वैज्ञानिक सर विलियम हर्शेल के नाम से इस मिशन का नामकरण किया गया है।

  • इस मिशन को फ्रेंच गुआना स्थित गुयाना अंतरिक्ष केन्द्र से एरियन 5 रॉकेट द्वारा प्लैंक अंतरिक्षयान के साथ 14 मई, 2009 को प्रक्षेपित किया गया था।

  • इस मिशन के तीन उपकरणों मे से दो विकास में नासा का महत्वपूर्ण योगदान था। हर्शेल दूरबीन ब्रह्माण्ड के सबसे ठंडे तथा दूरस्थ पिण्डों से करेगी।

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मंगल अन्वेषण

  • मंगल यानी सौरमंडल में दूरी की दृष्टि से सूर्य से चौथा ग्रह, जिसे लाल ग्रह भी कहा जाता है। मंगल ग्रह का धरातल स्थलीय और वातावरण विरल है। इसकी सतह चन्द्रमा के गर्त और पृथ्वी के ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तानों और ध्रुवीय बर्फीली चोटियों की याद दिलाती है। यह स्थान है ओलंपस मोंस का जो हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊंचा पर्वत है, साथ ही विशालतम घाटी वैलेस मैरीनेरिस भी यहां पर स्थित है।

  • मंगल ग्रह पर जीवन की खोज की शुरुआत सर्वप्रथम तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा की गई थी। सोवियत संघ के मंगल अन्वेषण कार्यक्रम के तहत अंतरिक्ष यान मार्स-1 को प्रथम मंगल मिशन के तौर पर 1 नवंबर, 1962 को प्रक्षेपित किया गया था। इसके बाद अमेरिका ने भी वर्ष 1964 में मैरीनर-4 प्रक्षेपित किया जिसने जुलाई, 1965 में मंगल के पास से गुजरते हुए उसके कुछ चित्र खींचे। इन मिशनों के बाद कई मंगल अभियान संपन्न हुए लेकिन सबसे अधिक सुर्खियों में रहे अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजे गए जुड़वां रोवर स्पिरिट और ऑपरच्युनिटी।

रोवर

  • रोवर (Rover) शब्द का अर्थ घुमक्कड़ या घूमने-फिरने वाला होता है। खगोलीय संदर्भ में रोवर ऐसे वाहन को कहते हैं जो किसी अन्य ग्रह या खगोलीय वस्तु पर घूमने-फिरने की क्षमता रखता हो। कुछ रोवर रोबोट होते हैं और बिना किसी व्यक्ति की मौजूदगी के चलते हैं और कुछ मनुष्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए बने होते हैं। आमतौर पर रोवर किसी ग्रह पर किसी अन्य अंतरिक्ष यान द्वारा ले जाए जाते हैं।

स्पिरिट और ऑपरच्युनिटी

  • जून एवं जुलाई, 2003 में नासा ने क्रमशः स्पिरिट और फिर ऑपरच्युनिटी नामक दो रोवरो को मार्स एक्सप्लोरेशन रोवर मिशन के  तहत मंगल की ओर रवाना किया था। स्पिरिट वर्ष 2004 से वर्ष 2010 तक सक्रिय रहा जबकि ऑपरच्युनिटी अभी भी सक्रिय है। हालांकि स्पिरिट और ऑपरच्युनिटी से पूर्व नासा के मार्स पाथफाइंडर मिशन के तहत वर्ष 1997 में सोजर्नर (Sojourner) रोवर भी मंगल ग्रह पर पहुंचा था जो करीब तीन माह तक सक्रिया रहा।

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मंगलयान

  • भारत का मंगलयान (Mars Orbiter Mission-MOM) भी 24 सितंबर, 2014 को मंगल की कक्षा में प्रविष्ट हो गया और इसका भी निमित्त मंगल पर पानी, मीथेन और जीवन का अन्वेषण करना है।

  • भारत ऐसा पहला राष्ट्र बन गया है, जिसने अपने पहले ही प्रयास में 24 सितंबर, 2014 को मंगल की कक्षा में अपने मंगलयान की सफल स्थापना करके एक विश्व कीर्तिमान बनाया है। इसी के साथ भारत मार्शियन इलीट क्लब (अमेरिका, रुस और यूरोपीय संघ) में प्रवेश कर चुका है और ऐसी उपलब्धि अर्जित करने वाला पहला एशियाई देश भी बन चुका है।

  • भारत का अंतरिक्ष में प्रक्षेपित प्रथम उपग्रह आर्यभठ्ठ है। इसका प्रक्षेपण तत्कालीन सोवियत संघ के कापुस्तिन यार प्रक्षेपण केन्द्र से कॉस्मॉस-3M प्रक्षेपण यान द्वारा 19 अप्रैल, 1975 को किया गया।

  • कोलंबिया, चैलेंजर, डिस्कवरी, अटलांटिस तथा एंडेवर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नामा के स्पेस शटल हैं। नासा द्वारा इन सभी का परिचालन अब बंद किया जा चुका है।

  • इनसैट-3 सी का प्रक्षेपण दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना के कौरु प्रक्षेपण स्थल से किया गया था। इनसैट श्रृंखला के नवीतनत उपग्रह GSAT-10 का प्रक्षेपण फ्रेच गुयाना के कौरु से ही 29 सितंबर, 2012 को किया गया था।

  • क्यूरिओसिटी – नासा के मार्स साइंस लैबोरेटरी मिशन के तहत नवंबर, 2011 में फ्लोरिडा से एटलस-V रॉकेट  द्वारा प्रक्षेपित मंगल ग्रह अन्वेषी अंतरिक्षयान।

  • मेसेंजर – बुध ग्रह की सतह, भू-रसायन और अंतरिक्ष पर्यावरण के अध्ययन हेतु वर्ष 2004 में नासा द्वारा प्रक्षेपित अंतरिक्ष यान।

  • रुस्तमI – डीआरडीओ की बंगलुरु स्थित एयरोनॉटिक्स डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट द्वारा विकसित मानवरहित विमान।

  • आकाश-2 – विश्व के सबसे सस्ते टेबलेट कंप्यूटर आकाश का नव-संस्करण।

  • कैसिनी (Cassini) नासा द्वारा शनि एवं उसके उपग्रहों के अध्ययन हेतु प्रक्षेपित एक रोबोटिक अंतरिक्षयान है।

  • इवेंट होराइजन – यह एक ऐसी सीमा है, जो अंतरिक्ष में ब्लैक-होल के चारों ओर के क्षेत्र को परिभाषित करती है। इसी सीमा के अंदर किसी भी घटना का प्रेक्षण संभवन नही है।

  • सिंगुलैरिटी – यह अंतरिक्ष-काल में एक ऐसा स्थल है, जहां किसी खगोलीय पिंड का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र अनंत हो जाता है।

  • स्ट्रिंग थियरी – इसमे सभी पदार्थों एवं बलो को एकल सैध्दांतिक रुपरेखा मे सम्मिलित कर ब्रह्मांड के मूल स्तर की व्याख्या कणों के स्थान पर कंपायमान स्ट्रिंग के पदों मे की जाती है। 

  • स्टैंडर्ड मॉडल – कण भौतिकी का स्टैंडर्ड मॉडल एक ऐसा सिध्दात है, जिसमें ब्रह्मांड मे ज्ञात चार मूल कणों में से तीन (विद्युत चुंबकीय, दुर्बल एवं प्रबल) की व्याख्या की जाती है तथा सभी ज्ञात मूल कणों का वर्गीकरण किया जाता है।

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रक्षा प्रौद्योगिकी

  • भारतीय रॉकेटों के जनक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के निर्देशन में जुलाई, 1983 में एकीकृत निर्देशित प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम (Integrated Guided Missiles Development Programme-IGMDP) का गठन हो गया। भारत के रक्षा विशेषज्ञों ने 6 वर्षों की लघु अवधि में भारत की पाच प्रक्षेपास्त्र प्रणालियों-पृथ्वी, अग्नि, नाग, आकाश और त्रिशूल का सफस परीक्षण और विकास संपन्न कर दिया। इनमें से पृथ्वी, अग्नि और आकाश की सैन्य तैनाती भी हो चुकी है।

  • आईजीएमडीपी मूलतः 12 वर्षों के लिए प्रायोजित था लेकिन नाग और त्रिशूल को लेकर की बाधाएं थी, फलतः डीआरडीओ ने 25 वर्षों के उपरांत वर्ष 2008 में इस कार्यक्रम का औपचारिक समापन कर दिया। लेकिन इस अवधि में भारत ने कई और उन्नत, श्रेष्ठ प्रणालियां विकसित कर ली हैं। समलन, हवा-से-हवा में मारक (AAM) अस्त्र, भारत और  रुस के संयुक्त उपक्रम की उत्पाद सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस जिसकी मारक दूरी 290 किमी. है। यह अपने साथ 300 किग्रा. का पारंपरिक युध्द शीर्ष ले जा सकती है। इसकी मारक दूरी और भी बढ़ाई जा सकती है।

पृथ्वी मिसाइल

  • पृथ्वी सतह-से-सतह पर मारक प्रक्षेपास्त्र (Surface to Surface Missile-SSM) है जिसका पहला परीक्षण शार केन्द्र (Shreeharikota High Altitude Range-SHAR), श्रीहरिकोटा से 27 फरवरी, 1988 को किया गया था।

  • पृथ्वी के कई प्रारुप हैं। पृथ्वी-I थल-सेना को सौंपी जा चुकी है जो 1000 किग्रा. युध्द सामग्री के साथ 150 किमी. तक प्रहार कर सकती है। पृथ्वी-II की मारक दूरी 250-350 किमी. है। यह अपने साथ 500 किग्रा. की युध्द सामग्री ले जा सकती है और यह वायु सेना को सौंपी जा चुकी है। पृथ्वी-III इसका नौसैनिक संस्करण है। पृथ्वी मिसाइलें द्रव प्रणोदक संचालित हैं।

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प्रहार मिसाइल

  • 2 टन भारी और 7.8 मीटर लंबी प्रहार एक चरणीय ठोस प्रणोदक संचालित प्रक्षेपास्त्र है। प्रहार को बिना किसी पूर्व तैयारी के 2-3 मिटनों की नोटिस पर दागा जा सकता है जबकि पृथ्वी मिसाइलों के लिए अपेक्षाकृत अधिक समय लगता है। त्वरित जवाबी कार्यवाही के लिए ही प्रहार बनाई गई है। त्वरित और तीव्र प्रतिक्रिया ही प्रहार की विशिष्टता है। 200 किग्रा. भार का पारंपरिक और नाभिकीय शीर्ष ले जाने में सक्षम यह प्रक्षेपास्त्र 250 सेकंड में 150 किमी. की दूरी तक अपने लक्ष्य को ध्वस्त कर सकता है।

  • 21 जुलाई, 2011 की प्रातः 8.20 बजे अंतरिम परीक्षण केन्द्र, चांदीपुर के लांच लॉम्पलैक्स-III से प्रहार का प्रथम परीक्षण किया गया।

अग्नि मिसाइल

  • पृथ्वी मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद अग्नि वजूद में आई जिसके तीन परीक्षण क्रमशः 22 मई, 1989, 29 मई, 1992 और 19 फरवरी, 1994 को आई.टी.आर., चांदीपुर से किए गए।

  • अग्नि दो चरणीय प्रक्षेपास्त्र थी जिसके प्रथम चरण में ठोस और दूसरे चरण में प्रणोदक का इस्तेमाल किया गया था, अतः सेना में इसकी तैनाती नहीं हो सकती थी। यह अग्नि का तकनीकी प्रदर्शक मात्र था।

  • 11 अप्रैल, 1999 को इसके उन्नत अग्नि-II का सफल परीक्षण अंतरिम परीक्षण केन्द्र, चांदीपुर से किया गया जो 100 किग्रा. युध्द सामग्री के साथ 2500 किमी. तक मार कर सकती है। 20 मीटर लंबी, 16 टन भारी अग्नि-II ठोस प्रणोदक संचालित दो चरणीय प्रक्षेपास्त्र है। सैन्य तैनाती की दृष्टि से ठोस प्रणोदक प्रणालियां उपयुक्त होती हैं क्योकि ठोस प्रणोदकों को महीनों पूर्व भरकर रखा जा सकता है और ऐसी मिसाइलों को क्षण भर की नोटिस पर दागा जा सकता है।

  • सतह-से-सतह पर मारक अग्नि-I की ऊंचाई 15 मीटर और उड़ान भार 12 टन है। एक चरणीय ठोस प्रणोदक संचालित यह प्रक्षेपास्त्र 1000 किग्रा. की युध्द  सामग्री के साथ 700 किमी. तक प्रहार कर सकता है। इसका पहला परीक्षण 25 जनवरी, 2002 को आई.टी.आर. , चांदीपुर से किया गया था। यह  सेना में तैनात भी हो चुका है। अग्नि-II की भी सैन्य तैनाती हो चुकी है। अग्नि-II की प्रौद्योगिकी परिपक्व हो जाने के बाद अग्नि-III के विकास का मार्ग प्रशस्त हो गया। इसका पहला सफल परीक्षण 12 अप्रैल, 2007 को संपन्न हुआ। अग्नि-III 1500 किग्रा. युध्द सामग्री के साथ 3000 किमी. तक प्रहार कर सकती है।

  • डी.आर.डी.ओ. ने अग्नि-II और अग्नि-III के बीच की दूरियों के सेतबंधन के लिए अग्नि-II के नव संस्करण अग्नि-II प्राइम का विकास किया। आगे चलकर इसे अग्नि-II प्लस की संज्ञा दी गई लेकिन अपनी पहली सफल उड़ान (15 नवंबर, 2011) में ही इसने 3500 किमी. से भी अधिक दूर स्थित लक्ष्य के भेदन कर दिया। अतः डी.आर.डी.ओ. ने इसे अग्नि-IV की संज्ञा दी।

  • 17 टन वजनी, 20 मीटर लंबी अग्नि-IV ठोस प्रणोदक संचालित द्वीचरणीय प्रक्षेपास्त्र है और यह अपने साथ 1000 किग्रा. की युध्द सामग्री ले जाने में सक्षम है।

  • अग्नि-V का पहला विकासात्मक परीक्षण 19 अप्रैल, 2012 को जबकि दूसरा परीक्षण 15 सितंबर, 2013 को संपन्न हुआ था। उल्लेखनीय है कि 17.50 मीटर लंबा एवं 50 टन वजनी अग्नि-V  एक त्रिवरणीय प्रक्षेपास्त्र है। यह ठोस प्रणोदक संचालित प्रक्षेपास्त्र अपने साथ एक से लेकर 1.5 टन पारंपरिक और नाभिकीय दोनों युध्दशीर्ष ला जाने में सक्षम हैं। यद्यपि  इसकी आरंभिक मारक दूरी 5000 किमी. है लेकिन इसे 8000 से लेकर 10,000 किमी. तक बढ़ाया जा सकता है।

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प्रगति  प्रक्षेपास्त्र

  • भारत ने सतह-से-सतह (Surface to Surface) मार करने वाली लघु दूरी (Short Range) की एक नई मिसाइल प्रगति (Pragati) का विकास किया है। सामरिक दृष्टि से अहम इस मिसाइल की मारक क्षमता 60-170 किमी. तक है। यह नई मिसाइल प्रहार प्रक्षेपास्त्र पर आधारित है जिसका विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा भारतीय थल एवं वायु सेना के लिए किया गया था। मामूली बदलावों के साथ प्रहार प्रक्षेपास्त्र के निर्यात संस्करण के स्वरुप को प्रगति संज्ञा दी गई है।

  • 4 मीटर लंबी और 0.42 मीटर व्यास वाली यह मिसाइल लगभग 200 किग्रा. भार का पारंपरिक युध्दशीर्ष (Conventional Warhead) वहन करने में सक्षम है। 1280 किग्रा. वजनी यह मिसाइल प्रक्षेपण के पश्चात 35 किमी. तक की ऊंचाई पर पहुंचकर वायुमंडल में पुनर्प्रवेश कर 250 सेकंड में 170 किमी. की दूरी तक अपने लक्ष्य को ध्वस्त कर सकती है।

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निर्भय क्रूज मिसाइल

  • निर्भय भारत द्वारा विकसित एक सबसोनिक क्रूज मिसाइल है। सबसोनिक मिसाइल ऐसी मिसाइल को कहते हैं जो ध्वनि के वेग (1 मैक) से कम गति से गतिमान होती है जबकि सुपरसोनिक मिसाइलें वे होती हैं जो ध्वनि के वेग से 1.2 से लेकर 5 गुना तक  तीव्र वेग से गतिमान होती हैं। हाइपरसोनिक मिसाइलें 5 से लेकर 10 मैक की गति से   उड़ान भरती हैं। निर्भय सतह-से-सतह पर मारक प्रक्षेपास्त्र है। यह लंबी दूरी का एक द्वीचरणीय प्रक्षेपास्त्र है। यह 1000 किमी. की दूरी तक मार करने में सक्षम है।

  • उल्लेखनीय है कि निर्भय मिसाइल एक रॉकेट की तरह लांच की जाती है लेकिन एक निर्धारित ऊंचाई तक पहुंचने के बाद इसमें लगे पंख खुल जाते हैं और फिर यह एक विमान की तरह काम करने लगती है। ठोस रॉकेट मोटर बूस्टर के अलग हो जाने के पश्चात इसमें लगा टबोफैन इंजन मिसाइल को आगे ले जाने में सक्षम होता है। निर्भय निम्न उन्नतांशो पर भी उड़ान भर सकती है। समलन यह पहाड़ियों और उनके चारों ओर चक्कर लगा सकती है और यह रडारों की पकड़ में भी नहीं आ सकती है,  इसलिए इसे ट्री –टॉप मिसाइल (Tree-Top Missile) भी कहते हैं। रक्षा विशेषज्ञ इसे अमेरिकी टोमाहॉक के समतुल्य मानते हैं।

अमोघ-I  प्रक्षेपास्त्र

  • अमोघ-I स्वदेश विकसित द्वीतीय पीढ़ी की एक टैंक-रोध निर्देशित मिसाइल है। भारत डायनामिक्स लिमिटेड द्वारा डिजाइन एवं विकसित यह पहली मिसाइल है। उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व तक बीडीएल डीआरडीओ आदि द्वारा डिजाइन एवं विकसित मिसाइलों का उत्पादन ही करती आई है। अमोघ –I मिसाइल अधिकतम 2.8 किमी. की दूरी तक मार करने में सक्षम है। 10 सितंबर, 2015 को अमोघ-I मिसाइल का परीक्षण मध्य प्रदेश में स्थित बबीना सैन्य रेंज (Babina  Army  Range) से सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

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के-मिसाइल श्रृंखला

  • भारत ने स्थल एवं वायु से प्रक्षेपित किए जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों की एक मजबूत श्रृंखला विकसित कर ली है जबकि जल के अंदर से प्रक्षेपित किए जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों के विकास की दिशा में अग्रसर है।  जलमग्न पनडुब्बी से प्रक्षेपित की जाने वाली के (K) मिसाइलों की श्रृंखला का विकास भारत द्वारा किया जा रहा है। इस परियोजना का कोड नाम मिसाइल मैन एवं  दिवंगत भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखा गया है।  के-श्रृंखला की मिसाइलों को स्वदेशी परमाणु सक्षम पनडुब्बी अरिहंत पर स्थापित किया जाएगा। इस  श्रृंखला की प्रथम मिसाइल सागरिका है जिसका कोड नाम के-15 है।

  • सागरिका के कई सफल परीक्षण किए जा चुके हैं। सागरिका परमाणु सक्षम मिसाइल है जिसकी मारक क्षमता 750 किमी. है। जल के अंदर से प्रक्षेपित किए जाने वाले प्रक्षेपास्त्रों की मारक क्षमता के विस्तार के लिए के-4 मिसाइल का विकास किया गया है। के-4 की मारक क्षमता 3500 किमी. तक है। के-4 एक परमाणु सक्षम, पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल (Submarine-Lauhched Balistic Missile -SLBM) है। इसका विकास  रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा ब्लैक परियोजना (Black Project) के तहत गोपनीय रुप से किया गया है। के-4, 17 टन वजनी मिसाइल है तथा अपने साथ 200 किग्रा. तक परमाणु आयुध ले जाने मे सक्षम है।

भारतीय प्रक्षेपास्त्र रोधी प्रणाली

  • भारत का प्राक्षेपिक प्रक्षेपास्त्र प्रतिरक्षा कार्यक्रम (Indian Ballistic Missile Defence Programme) एक बहुराष्ट्रीय बैलिस्टिक मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली के विकास एवं उसकी तैनाती की दिशा में एक पहल है। इस कार्यक्रम के तहत एक द्वी –स्तरीय प्रणाली का विकास किया गया है, जिसमें दो इंटरसेप्टर मिसाइलें यथा पीएडी (PAD: Prithvi Air Defence) तथा एएडी शामिल हैं। यह कार्यक्रम मुख्यतः बैलिस्टिक मिसाइल के हमलों से सुरक्षा प्रदान करने पर केन्द्रित है।

एएडी मिसाइल

  • एएडी मिसाइल एकल चरणीय ठोस ईंधन चालित मिसाइल है। इस मिसाइल को निम्न ऊंचाइयों पर शत्रु मिसाइलों के अवरोधन (Interception) हेतु डिजाइन किया गया है। दूसरे शब्दों में यह मिसाइल अंतः वायुमंडल (endo-atmosphere) में 30 किमी. की ऊंचाई तक बैलिस्टिक मिसाइलों के अवरोधन मे सक्षम है। इस मिसाइल का पहला सफल परीक्षण 6 दिसंबर, 2007 मे संपन्न हुआ था।

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पीएडी मिसाइल

  • पीएडी मिसाइल एक द्वी-चरणीय मिसाइल है। इसका प्रथम चरण ठोस-ईंधन, जबकि द्वीतीय चरण तरल-ईंधन चालित है। इस मिसाइल को अधिक ऊंचाईयों पर शत्रु के अवरोधन हेतु डिजाइन किया गया है। दूसरे शब्दों में यह मिसाइल बाह्य वायुमंडल (Exo-atmosphere) में 50-80 किमी. की ऊंचाई तक बैलिस्टिक मिसाइलों के अवरोधन में सक्षम है। इस मिसाइल का पहला सफल परीक्षण 27 नवंबर, 2006 को संपन्न हुआ था।

  • नाग भारत की एक टैंक प्रतिरोधी मिसाइल है, इसके भूमि संस्करण की मारक रेंज 500 मीटर से 4 किमी. तक है। इसका मूलमंत्र दागों और भूल जाओ है। इसका प्रथम सफल परीक्षण 24 नवंबर, 1990 को किया गया था। इसमें ठोस प्रणोदक के रुप में धूम्ररहित उच्च ऊर्जस्वित नाइट्रोमीन का प्रयोग होता है।

  • अस्त्र दृश्य सीमा से परे हवा-से-हवा में मार करने वाला प्रक्षेपास्त्र है जिसका विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वार किया गया है। यह उन्नत प्रक्षेपास्त्र लड़ाकू विमान चालकों को अधिकतम 80 किमी. की दूरी से दुश्मन के विमानों पर निशाना लगाने और मार गिराने की क्षमता है। चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज से 20 मई, 2011 को  इस मिसाइल का उड़ान परीक्षण किया गया।

  • 29 अक्टूबर, 2003 को भारतीय नौसेना में शामिल INFACT-82 भारतीय नौसेना में तेज आक्रामक पोत है, जिसके निर्माण मे इस्राइल से सहायता प्राप्त हुई थी।

  • अक्टूबर, 2006 में भारत द्वारा तमिलनाड के महेन्द्रगिरि में स्वदेश विकसित क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन का सफल परीक्षण किया गया था। भारत पूर्ण रुप से विकसित निम्न ताप अवस्था का परीक्षण करने वाला विश्व का छठवां देश था।

  • इल्यूशिन IL-78 विमान हवा-से-हवा में ईंधन भरने का कार्य करता है।

  • INS अरिहंत भारत की नाभिकीय सक्षम पनडुब्बी है। अत्याधुनिक तकनीक पोत (ATV) परियोजना के अन्तर्गत इसका निर्माण हुआ है।

  • धनुष मिसाइल पृथ्वी प्रक्षेपास्त्र का नौसैनिक संस्करण है। इस मिसाइल की मारक क्षमता 350 किलोमीटर है। इसका नवीनतम परीक्षण 23 फरवरी, 2018 को ओड़िशा तट के निकट बंगाल की खाड़ी में किया गया।

  • आईएनएस चक्र 8140 टन वजनी अकुला श्रेणी की नाभिकीय ऊर्जा संचालित पनडुब्बी है। इसे भारतीय नौसेना में अप्रैल, 2012 में शामिल किया गया था।

  • आई.एन.एस. सिंधुरक्षक भारतीय नौसेना की पनडुब्बी है। यह सिंधुघोष श्रेणी की पनडुब्बी है। अगस्त, 2013 में आई.एन.एस. सिंधुरक्षक मुंबई हार्बर के पास आग लगने से दुर्घटनाग्रस्त हो गई।

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  • हंसा भारत के नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) द्वारा डिजाइन एवं तनेजा एयरोस्पेस एंड एविएशन लिमिटेड) द्वारा निर्मित  एक सामान्य विमान है जिसका प्रयोग उड़ान परीक्षणों हेतु किया जाता है। हंसा-2,  हंसा-2RE, हंसा-3, हंसा—S तथा हंसा यूएवी आदि इसके विभिन्न संस्करण हैं।

  • फाल्कॉन इस्त्राइल द्वारा विनिर्मित एक आदेश एवं नियंत्रण आधारित हवाई पूर्व चेतावनी (Airborne Early Warning Command and Control-AEWC&C) युक्त विश्व का अतिशक्तिशाली राडार है। भारत इस राडार को रुस से आयातित विमानों में संलग्न कर कम दूरी पर उड़ने वाले विमानों को चिन्हित करने, प्रक्षेपास्त्र एवं सचार आदि से संबंधित चेतावनी के लिए  प्रयोग मे ला रहा है।

  • अक्टूबर, 1987 में भारतीय शांति रक्षक सेना (IPKF- Indian Peace Keeping Force) द्वारा  भारत-श्रीलंका समझौते के तहत लिट्टे के नियंत्रण वाले जाफना में चलाए गए अभियान को ऑपरेशन पवन का कोड नाम दिया गया था। तीन हफ्तो तक चले इस अभियान में IPKF ने जाफना को तो लिट्टे से मुक्त करा लिया परंतु इसकी कीमत 214 भारतीय सैनिकों की  जान से चुकानी पड़ी।

  • न्यू स्टार्ट संधि (New START- Strategic Arms Reduction Treaty ) संयुक्त राज्य अमेरिका और रुसी संघ के मध्य नाभिकीय शस्त्रों पर कटौती करनी की द्वीपक्षीय सामरिक महत्व की संधि है।

  • फ्रेंडशिप-2016 रुस और पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा किया गया संयुक्त युध्दाभ्यास था। यह संयुक्त युध्दाभ्यास 24 सितंबर से 10 अक्टूबर, 2016 के मध्य पाकिस्तान के शेरात इकाई के रत्तू बेस पर किया गया। इसमें करीब 70 रुसी व 130 पाकिस्तानी सैनिको ने भाग लिया।

  • 11 एवं 13 मई, 1998 को भारत द्वारा राजस्थान के पोखरन में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए थे। इस परमाणु परीक्षण अभियान को ऑपरेशन शक्ति-98 नाम प्रदान किया गय़ा था।

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प्रमुख वैज्ञानिक एवं आविष्कार

अल्बर्ट आइंस्टाइन (1879-1955)

  • 1879 ई. में उल्म, जर्मनी में जन्में अल्बर्ट आइंस्टाइन को आज तक के सार्वत्रिक रुप से महानतम माने जाने वाले भौतिक विज्ञानियों में से एक माना जाता है। उनका विस्मयकारी वैज्ञानिक जीवन उनके द्वारा वर्ष 1905 में प्रकाशित तीन क्रांतिकारी शोधपत्रों से आरंभ हुआ। उन्होने अपने प्रथम शोधपत्र में प्रकाश क्वांटा (जिसे  अब फोटॉन कहते हैं) की धारणा को प्रस्तावित किया तथा इस धारणा का उपयोग प्रकाश वैद्युत प्रभाव के उस लक्षण की व्याख्या करने में किया, जिसे विकिरणों के चिरसम्मत तरंग सिध्दांत  द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सका था। अपने दूसरे शोधपत्र में उन्होंने ब्राउनी गति का सिध्दांत विकसित किया जिसकी प्रायोगिक पुष्टि कुछ वर्ष पश्चात हुई। इस सिध्दांत ने द्रव्य के परमाण्विक चित्रण के विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत किए। उनके तीसरे शोधपत्र ने आपेक्षिकता के विशिष्ट सिध्दांत को जन्म दिया, जिसने आइंस्टाइन को उनके ही जीवन काल में किंवदंती बना दिया। अगले दशक में उन्होंने अपने ने सिध्दांतों के परिणामों का अन्वेषण किया जिसमें अन्य तथ्यों के साथ-साथ द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता को एक सुप्रचलित समीकरण E =mc2 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। उन्होंने आपेक्षिकता की व्यापक व्याख्या (आपेक्षिकता का व्यापक सिध्दांत) की रचना भी की, जो कि गुरुत्वाकर्षण का आधुनिक सिध्दांत है।

सत्येंन्द्रनाथ बोस (1894-1974)

  • 1894 ई. में कोलकाता में जन्में सत्येन्द्रनाथ बोस उन महान भारतीय भौतिक विज्ञानियों में से एक है, जिन्होंने बीसवीं शताब्दी में विज्ञान की उन्नति में मौलिक योगदान दिया था। भौतिकी के आद्योपांत उत्कृष्ट विद्यार्थी रहकर बोस ने वर्ष 1916 मे कोलकाता विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रुप में अपना सेवाकाल आरंभ किया। इसके पांच वर्ष पश्चात वे ढाका विश्वविद्यालय चल गए। यहां वर्ष 1924 में अपनी प्रतिभाशाली अंतर्दृष्टि से प्लांक नियम की एक नवीन व्युत्पत्ति प्रस्तुत की, जिसमें उन्होंने विकिरणों को फोटॉन की गैस के रुप में माना तथा फोटॉन अवस्थाओं की गणना की नवीन सांख्यिकीय विधियां अपनाई। उन्होंने इस विषय पर एक शोधपत्र लिखकर उसे आइंस्टाइन को भेजा, जिन्हों ने तुरंत इसके विशाल महत्व को पहचानते हुए इसका जर्मन  भाषा में अनुवाद करके प्रकाशन के लिए अग्रसारित कर दिया। फिर आइंस्टाइन ने इसी विधि का अनुप्रयोग अणुओं की गैस पर किया। बोस के कार्य में नवीन संकल्पनात्मक अवयव का मूल भाव य़ह था कि कणों को अविभेद्य माना गया, जो कि उन कल्पनाओं से मूल रुप से भिन्न थी, जिन्हें चिरसम्मत मैक्सवेल-बोल्ट्जमान सांख्यिकी के आधार के रुप में जाना जाता है। शीघ्र ही यह अनुभव किया गया है कि बोस-आइंस्टाइन सांख्यिकी को केवल पूर्णांक प्रचक्रण वाले कणों पर ही लागू किया जा सकता है और अर्ध्द पूर्णांक प्रचक्रण वाले कणों के लिए जो पाउली अपवर्जन सिध्दांत को संतुष्ट करते हैं, एक नवीन क्वांटम सांख्यिकी (फर्मी डिरैक सांख्यिकी) की आवश्यकता है। पूर्णांक प्रचक्रण वाले कणों को बोस को सम्मान देने के लिए बोसान कहते हैं।

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सर सी.वी. रामन (1888-1970)

  • चंद्रशेखर वेंकटरामन का जन्म 7 नवंबर, 1888 ई. को थिरुवंनाईकवल में हुआ था। उन्होने अपनी स्कूली शिक्षा ग्यारह वर्ष की आयु में पूरी करके प्रेसिडेंसी कॉलेज मद्रास से स्नातक की उपाधि ग्रहण की। शिक्षा समाप्त करने के पश्चात उन्होंने भारत सरकार की वित्तीय सेवाओं में कार्यभार संभाला।

  • कोलकाता में रहते हुए, सांध्यकाल में उन्होंने डॉ. महेंन्द्र लाल सरकार द्वारा स्थापित इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन ऑफ साइंस (Indian Association for Cultivation of Science) में अपनी रुचि के क्षेत्र में कार्य करना आरंभ कर दिया। उनकी रुचि के क्षेत्र में कंपन, वाद्य यंत्रों की विविधता, पराश्रव्य तरंगे, विवर्तन आदि सम्मिलित थे।

  • वर्ष 1917 में उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा प्रोफेसर का पद दिया गया। वर्ष 1924 में लंदन की रॉयल सोसाइटी ने इनका सोसाइटी के फैलो के लिए निर्वाचन किया तथा वर्ष 1930 में इनके कार्य, जिसे अब रामन-प्रभाव कहते हैं, के लिए इन्हें नोबेल पुरस्कार से विभूषित किया गया।

वैज्ञानिक

प्रमुख योगदान/आविष्कार

मूल  देश

आर्किमिडीज

उत्प्लावकता का नियम,

उत्तोलक का नियम

यूनान

गैलिलियो गैलिली

जड़त्व का नियम

इटली

क्रिश्चियन हाइगेंस

प्रकाश का तरंग सिध्दांत

हॉलैंड

आइजक न्यूटन

गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम,

गति के नियम, परावर्तित दूरदर्शक

इंग्लैंड

माइकल फैराडे

विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के नियम

इंग्लैंड

जैम्स क्लार्क मैक्सवेल

विद्युत-चुंबकीय सिध्दांत

प्रकाश-एक विद्युत-चुंबकीय तरंग

इंग्लैंड

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हैनरिक रुडोल्फ हटर्ज

विद्युत चुंबकीय तरंगे

जर्मनी

जगदीश चन्द्र बोस

अतिलघु रेडियो तरंगे

भारत

डब्ल्यू.के.रोंजन

एक्स-किरणें

जर्मनी

जे.जे. टॉमसन

इलेक्ट्रॉन

इंग्लैंड

मैरी स्क्लोडोस्का क्यूरी

रेडियम तथा पोलोनियम की खोज, प्राकृतिक रेडियोएक्टिवता का अध्ययन

पोलैंड

अल्बर्ट आइंस्टाइन

प्रकाश-वैद्युत नियम,

आपेक्षिकता का सिध्दांत

जर्मनी

विक्टर फ्रांसिस हैस

कॉस्मिक विकिरण

ऑस्ट्रिया

आर.ए. मिलिकन

इलेक्ट्रॉन आवेश की माप

अमेरिका

अर्नस्ट रदरफोर्ड

परमाणु का नाभिकीय निदर्श

न्यूजीलैंड

नील बोर

हाइड्रोजन परमाणु का क्वाण्टम निदर्श

डेनमार्क

चन्द्रशेखर वेंकटरामन

अणुओं द्वारा प्रकाश का अप्रत्यास्थ प्रकीर्णन

भारत

लुइस विक्टर द-ब्राग्ली

द्रव्य  तरंग प्रकृति

फ्रांस

मेघनाथ साहा

तापिक आयनन

भारत

सत्येन्द्र नाथ बोस

क्वान्टम सांख्यिकी

भारत

वॉल्फगेंग पॉली

अपवर्जन नियम

ऑस्ट्रिया

एनरिको फर्मो

नियंत्रित नाभिकीय विखंडन

इटली

वर्नर हेजेनबर्ग

क्वान्टम यांत्रिकी,

अनिश्चितता-सिध्दांत

जर्मनी

पॉल डिरैक

आपेक्षिकीय इलेक्ट्रॉन-सिध्दांत,

क्वान्टम सांख्यिकी

इंग्लैंड

एडविन ह्यूबल

प्रसारी विश्व

अमेरिका

अर्नस्ट औरलैन्डो लॉरेन्स

साइक्लोट्रॉन

अमेरिका

जेम्स चैडविक

न्यूट्रॉन

इंग्लैंड

हिडेकी युकावा

नाभिकीय बलो का सिध्दांत

जापान

होमी जहांगीर भाभा

कॉस्मिक विकिरण का सोपानी प्रक्रम

भारत

लेव डेवीडोविक लैन्डो

संघनित द्रव्य सिध्दांत, द्रव हीलियम

रुस

एस. चन्द्रशेखर

चन्द्रशेखर-सीमा, तारों की संरचना तथा विकास

भारत

जॉन बारडीन

ट्रांजिस्टर, अतिचालकता सिध्दांत

अमेरिका

सी.एच. टाउन्स

मेसर, लेसर

अमेरिका

अब्दुल सलाम

दुर्बल तथा विद्युत-चुंबकीय अन्योन्य क्रियाओं का एकीकरण

पाकिस्तान

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प्रौद्योगिकी

वैज्ञानिक सिध्दांत

भाप इंजन

ऊष्मागतिकी के नियम

नाभिकीय रिएक्टर

नियंत्रित नाभिकीय विखंडन

रेडियो तथा टेलीविजन

विद्युत-चुंबकीय तरंगो का उत्पादन संचरण संसूचण

कंप्यूटर

अंकीय तर्क

अतिउच्च चुंबकीय क्षेत्रो का उत्पादन

अतिचालकता

लेसर

विकिरणों के उद्दीपित उत्सर्जन द्वारा प्रकाश प्रवर्धन (समष्टि प्रतिलोमन)

रॉकेट नोदन

न्यूटन  के गति के नियम

विद्युत जनित्र

फैराडे के विद्युत-चुंबकीय प्रेरण के सिध्दांत

जलविद्युत शक्ति

गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का विद्युत ऊर्जा में रुपांतरण

वायुयान

तरलगतिकी में बर्नोली का सिध्दांत

कण त्वरित्र

विद्युत-चुंबकीय क्षेत्रो में  आवेशित कणों की गति

सोनार

पराश्रव्य तरंगो का परावर्तन

प्रकाशिक रेशे

प्रकाश का पूर्ण आंतरिक परावर्तन

अपरावर्ती आवरण

तनुफिल्म प्रकाशीय व्यतिकरण

इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी

इलेक्ट्रॉन की तरंग प्रकृति

प्रकाश-विद्युत सेल

प्रकाश-विद्युत प्रभाव

संलयन परीक्षण रिएक्टर (टोकामैक)

प्लाज्मा का चुंबकीय परिरोध

वृहत मीटर वेब रेडियो टेलीस्कोप (GMRT)

कॉस्मिक रेडियो किरणों का संसूचन

बोस आइंस्टाइन दाब

लेसर पुन्जों तथा चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा परमाणुओं का प्रग्रहण तथा शीतलन

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  • जेम्स पकल (1667-1724 ई.) एक अंग्रेज आविष्कारक, वकील और लेखक थे। 1718 ई. में इन्होंने एक बहुशाट गन का आविष्कार किया जिसे मशीन गन कहा जाता है, इसलिए इन्हें मशीन-गन का पिता कहते हैं। जे.एल. बेयर्ड ने टेलीविजन और कार्ल बेंज ने पेट्रोल चालित कार का आविष्कार किया था।

  • थर्मामीटर या थर्मोस्कोप का आविष्कार इट्ली के प्रसिध्द भौतिकविद गैलिलियो ने किया था।

  • टाइपराइटर का आविष्कार शोल्स ने 1867 ई. में किया था। एक्स-किरण (एक्स-रे) का आविष्कार विल्हेल्म रोएंटजन ने 1895 ई. में रेडियो का जी. मारकोनी ने वर्ष 1901 में और लैम्प का डेवी ने किया था।

  • ब्रिटिश भौतिक एवं रसायन विज्ञानी विलियम हेनरी ब्रैग ने वर्ष 1915 का भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार अपने पुत्र विलियम लारेन्स ब्रैग के साथ संयुक्त रुप से प्राप्त किया। अपने पुत्र के सहयोग से इन्होंने एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर का विकास किया तथा  इस यंत्र की सहायता से परमाणुओ और क्रिस्टलों के विन्यासों को स्पष्ट किया।

  • टेलीफोन का आविष्कार वर्ष 1876 में एलेक्जेंडर ग्राहमबेल ने किया था।

  • आविष्कारक आविष्कार

जॉन गुटेन बर्ग    –   प्रिंटिंग प्रेस

डब्ल्यू. के. रोएंटजन –   एक्स-रे

माइकल फैराडे     –   डायनमों

एलेक्जेंडर ग्रहमबेल –   टेलीफोन

  • डीजल इंजन की खोज रुडोल्फ डीजल ने 1895 ई. में की। सेफ्टी लैम्प की खोज डेवी ने की। कारबुरेटर की खोज के जी. डेम्लर ने 1876 ई. में की। गैस इंजन की खोज भी डेम्लर ने की थी।

  • स्कॉटिश भौतिकविद रॉबर्ट वाटसन-वॉट ने वर्ष 1930 में पहली प्रायोगिक राडार (RADAR- Radio Detection and Ranging) व्यवस्था का विकास किया था। द्वीतीय विश्वयुध्द में इस व्यवस्था का उपयोग हवाई हमलों से पूर्व सचेत करने के लिए किया गया।

  • लेजर Light Amplification by the Stimulated Emission of Radiation का संक्षिप्त रुप है। इसके आविष्कारक थियोडोर मेमैन हैं। हालांकि कुछ लोग गार्डन गूड को भी लेसर के प्रथम आविष्कारक की संज्ञा देते हैं, लेकिन गूड को मेमैन से पेटेंट बाद में मिलने के कारण थियोडोर मेमैन को ही लेसर का आधिकारिक आविष्कारक माना जाता है

  • स्वीडिश वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल ने डायनामाइट का आविष्कार किया था। विश्व प्रसिध्द नोबेल पुरस्कार इनके ही द्वारा स्तापित न्यास (Trust) द्वारा दिया जाता है।

  • पेनिसिलीन की खोज स्काटिश वैज्ञानिक एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने वर्ष 1928 में की थी।

  • टेलीविजन का आविष्कार जे.एल. बेयर्ड ने वर्ष 1926 में ब्रिटेन में किया था। एडिसन ने विद्युत बल्ब और फ्रैंकलिन ने तड़ित चालक की खोज की थी।

  • रेडियम तत्व की खोज पियरे क्यूरी और मैडम क्यूरी ने 1898 ई. में की।

  • व्हाइट ड्वार्फ खगोलशास्त्र से संबंधित है। व्हाइट ड्वार्फ यानी सफेद बौने तारों को डिजनरेट स्टार (क्षय तारा) के नाम से भी जाना जाता है।

  • प्रख्यात अंतरिक्ष विज्ञानी सुब्रह्माण्यम चन्द्रशेखर ने कृष्ण विवर सिध्दांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने अपने अनुसंधान से यह सिध्द किया  कि सूर्य के द्रव्यमान से 1.44 गुना कम द्रव्यमान वाले तारे मृत होकर श्वेत वामन तारे (White Dwarf) बन जाते हैं।

  • प्रसिध्द वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन पियानों एवं वायलिन बजाने में निपुण थे।

  • हर गोविंद खुराना को वर्ष 1968 में चिकित्सा के क्षेत्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। रमन को वर्ष 1930 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सुब्रह्मण्यन चन्द्रशेखर को वर्ष 1983 में भौतिकी के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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  • भौतिकी विज्ञानी डॉ. रमन्ना 1974 ई. में भारत के प्रथम परमाणु परीक्षण के मुख्य सूत्राधार रहे। वे विखंडन भौतिकी के विकास से संबंधित थे। वे भाभा एटॉमिक रिसर्च सेन्टर (बार्क) के निदेशक एवं परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष भी थे। इनका 24 सितंबर, 2004 को मुम्बई में निधन हो गया।

  • होमी जहांगीर भाभा भारतीय नाभिकीय भौतिकशास्त्री थे। इन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्हें भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का जनक माना जाता है।

  • जे.बी. नार्लीकर ने नवीन सापेक्षता सिध्दांत का प्रतिपादन किया। उन्होंने वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. फ्रेड होयले के साथ मिलकर आइंस्टीन के सापेक्षता सिध्दांत में संशोधन कर यह सिध्दांत प्रतिपादित किया।

  • जगदीश चन्द्र बोस भारत के प्रख्यात भौतिकविद, जीव एवं वनस्पति विज्ञानी थे। इन्होंने रेडियो एवं माइक्रोवेव सिग्नलों के विषय में अनुसंधान के साथ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्होने विभिन्न उद्दीपनों के विरुध्द पौधी की प्रतिक्रिया मापने के लिए क्रेस्कोग्राफ नामक यंत्र का आविष्कार किया था।

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विविध

भारतीय विज्ञान कांग्रेस

  • भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन (Indian Science Congress Association: ISCA) देश में वैज्ञानिक अनुसंधानों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित एक प्रमुख वैज्ञानिक संगठन है। इसके तत्वावधान में वैज्ञानिक विषय-वस्तुओं के अन्वेषण, विश्लेषण एवं पारस्परिक आदान-प्रदान के उद्देश्य से प्रति वर्ष भारतीय विज्ञान कांग्रेस का आयोजन किया जाता है।

  • वर्ष 1914 से लगातार प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाला यह विज्ञान सम्मेलन देश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय विज्ञान समारोह है। 3-7 जनवरी, 2017 के मध्य श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति आंध्र प्रदेश में 104वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस का आयोजन किया गया था।

  • 16-20 मार्च, 2018 के मध्य मणिपुर विश्वविद्यालय (इम्फाल) में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 105वें संस्करण का आयोजन किया गया। 105वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस का केन्द्रीय विषय था – विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से अगम्य तक पहुंच (Reaching the Unreached Through Science & Technology)

ऑस्ट्रेलिया समूह

  • ऑस्ट्रेलिया समूह विश्व के देशों का एक अनौपचारिक मंच है, जिसका उद्देश्य रासायनिक एवं जैविक हथियारों के प्रसार पर रोक लगाना है।

  • यह समूह अपने सदस्य देशो को उन निर्यातों (Exports) की पहचान करने में मदद करता है,  जिन्हें नियंत्रित किए जाने की आवश्यकता है, ताकि रासायनिक एवं जैविक हथियारों के प्रसार को रोका जा सके। दूसरे शब्दों में, यह समूह निर्यात नियंत्रण में समन्वय स्थापित करने के माध्यम से सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि देशों द्वारा किए जाने वाले निर्यात रासायनिक या जैविक हथियारों के विकास में योगदान ने दें।

  • वर्ष 1984 में इराक द्वारा रासायनिक हथियारों के प्रयोग के बाद इस समूह की स्थापना वर्ष 1985 में की गई थी। इस संगठन का नाम ऑस्ट्रेलिया समूह इसलिए पड़ा, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ने ही इस समूह के गठन की पहल की थी। स्थापना के समय ऑस्ट्रेलिया समूह में सदस्यों की संख्या 15 थी, जो वर्तमान में बढ़कर 43 तक पहुंच चुकी है। ऑस्ट्रेलिया के अतिरिक्त इस समूह में फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, नीदरलैंड्स, दक्षिण कोरिया, स्पेन, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, यूनाइटेड किंगडम एवं अमेरिका जैसे देश शामिल हैं।

  • ऑस्ट्रेलिया समूह के सभी सदस्य रासायनिक हथियार अभिसमय (CWC: Chemical Weapons Convention) तथा जैविक हथियार अभिसमय (BWC: Biological Weapons  Convention) के पक्षकार हैं। 19 जनवरी, 2018 को भारत औपचारिक रुप से ऑस्ट्रेलिया समूह का 43वां सदस्य बन गया।

  • मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR) एवं वासेनार व्यवस्था के बाद अब ऑस्ट्रेलिया समूह में भारत की सदस्यता परमाणु अप्रसार तथा वैश्विक शांति एवं सुरक्षा के प्रति देश की प्रतिबध्दता को प्रमाणित करती है।

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नैनोप्रौद्योगिकी

  • परमाणविक एवं आणविक स्तर पर किसी पदार्थ को प्रवर्तित करने की क्षमता ही नैनोप्रौद्योगिकी है। सामान्यतः नैनोप्रौद्योगिकी का संबंध 1-100 नैनोमीटर के आकार की संरचनाओं तथा इसी पैमाने के अन्तर्गत वस्तुओं एवं उपकरणों के विकास से है।

  • नैनोमीटर लम्बाई की इकाई है। (1 नैनोमीटर=10-9 मीटर)। नैनो पैमाने पर वस्तुएं इतनी छोटी होती हैं कि उन्हें सामान्य आंख से  देख पाना सम्भव नहीं है, यहां तक कि उन्हें सूक्ष्मदर्शी के द्वारा भी नहीं देखा जा सकता है। नैनो पैमाने पर किसी भी वस्तु को देखने के लिए वैज्ञानिक स्कैनिंग टनलिंग सूक्ष्मदर्शी (Scanning Tunneling Microscope) या परमाणु बल सूक्ष्मदर्शी (Atomic Force Microscopes) का प्रयोग करते हैं।

  • सर्वप्रथम प्रसिध्द भौतिकविद रिचर्ड फेनमैन ने 29 दिसंबर, 1959 को कैलीफोर्निया प्रौद्योगिकी संस्थान में इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कर नैनोप्रौद्योगिकी के युग का सूत्रपात किय था। उन्होंने एक-एक परमाणु को जोड़कर उपकरणों को निर्मित करने की एक नई प्रौद्योगिकी का प्रस्ताव दिया था जिसे आज आणविक नैनोप्रौद्योगिकी के नाम से जाना जाता है।

  • टोक्यो विज्ञान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नोरियो तानीगूची ने सर्वप्रथम वर्ष 1974 में नैनोप्रौद्योगिकी शब्द को परिभाषित किया था। वर्ष 1986 में डॉ. के एरिक ड्रोक्सलर ने नैनोप्रौद्योगिकी विषय पर इंजन्स ऑफ क्रिएशनः द कमिंग एरा ऑफ नैनोटेक्नोलॉजी नामक पुस्तक लिखी थी जो इस विषय पर लिखी गई सर्वप्रथम पुस्तक है।

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लेजर

  • लेजर शब्द का पूर्ण रुप है – Light Amplification by Stimulated  Emission of Radiation.

  • यह एक प्रकार का विद्युत-चुम्बकीय विकिरण है। लेजर किरणों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये एक जैसी आवृत्ति, एक जैसे आयाम और एक जैसे ध्रुवीकरण वाली अत्यंत सुसंगठित किरणें होती हैं। यह बहुत ही कम छितराती हैं, इसलिए इनकी सारी ऊर्जा एक ही बिंदु पर संकेन्द्रित की जा सकती हैं।

  • जर्मनी में म्यूनिख के निकट गार्शिंग (Garching) में स्थित क्वांटम ऑप्टिक्स मैक्स प्लांक संस्थान (Max Planc Institute of Quantum Optics) लेजर किरणों संबंधी मूलभूत अनुसंधान में विश्व में अग्रणी है।

  • क्वांटम मेकेनिक्स विज्ञान की वह शाखा है जिसमें अति-सूक्ष्म कणों की गति तथा उनके अन्तर्सबंधों का  अध्ययन किया जाता है।

  • साइबरनेटिक्स (Cybernatics) विज्ञान की आधुनिकतम शाखाओं में से एक है। इसके अन्तर्गत विभिन्न तंत्रों में हो रही प्रक्रियाओं की नियंत्रण क्रियाविधि का अध्ययन किया जाता है। इसकी सर्वप्रथम परिकल्पना नॉरबर्ट वीनर (Norbert Wiener) नेकी थी। इसे नियंत्रण का विज्ञान (Science of Control) भी कहते हैं।

  • हिग्स बोसॉन एक मूल कण है जिसकी प्रथम परिकल्पना वर्ष 1964 में की गई और इसका प्रायोगिक सत्यापन 14 मार्च, 2013 को किया गया। वैज्ञानिक समुदाय के बाहर और मीडिया द्वारा अक्सर इस कण को ईश्वरीय कण (God Particle) उपनाम से संदर्भित किया जाता है। हिग्स बोसॉन कण की खोज करने वाले वैज्ञानिकों की जोड़ी ब्रिटेन के पीटर हिग्स बेल्जियम के फ्रांस्वा एंगलर्ट को वर्ष 2013 के भौतिक विज्ञान के  क्षेत्र का नोबेल  पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है।

  • हॉरोलॉजी के अन्तर्गत समय मापन का अध्ययन किया जाता है।

  • राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला नई दिल्ली में स्थित है।

  • वर्तमान में विश्व की सबसे ऊंची खगोलीय वेधशाला उत्तरी चिली के अटाकामा मरुस्थल में सेरो चैंजनेंटर (Cerro Chajnantor) ज्वालामुखी की चोटी पर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो अटाकामा वेधशाला है। यह समुद्र तल से 5640 मी. की  ऊंचाई पर स्थित है।

  • राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला की स्थापना वर्ष 1950 में हुई थी। यह पुणे में स्तित है। यह वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक संघटक प्रयोगशाला है।

  • 1 जून, 1945 को बम्बई (मुंबई) में उच्च शिक्षा एवं शोध के लिए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (The Tata Institute of Fundamental Research-TIFR) की स्थापना की गई थी।

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  • चन्द्रा एक्स-रे दूरबीन का प्रक्षेपण अंतरिक्षय़ान कोलम्बिया से 23 जुलाई, 1999 को किया गया था। इसका नामकरण भारतीय मूल के प्रख्यात अमेरिकी खगोलविद सुब्रमण्यम चन्द्रशेखर के नाम पर किया गया था। यह मिशन वर्तमान में अंतरिक्ष में सक्रिय है।

  • 14 अप्रैल, 1961 को तत्कालीन सोवियत संघ ने वोस्टोक-I नामक अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष में पहली बार मनुष्य को भेजने का श्रेय हासिल किया था। यूरी गागरिन प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने मानव की अंतरिक्ष यात्रा का श्रीगणेश किया।

  • प्रथम अंतरिक्ष यात्री रुस के यूरी गागरिन है जबकि प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री रुस की वैलेन्टीना तेरेश्कोवा हैं। वोस्टोक-6 मिशन (1963) के द्वारा सोवयित संघ (रुस) की वैलेन्टीना तेरेश्कोवा ने प्रथम महिला अंतरिक्ष यात्री होने का गौरव प्राप्त किय था।

  • चन्द्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। यह हमारी सौर प्रणाली का पांचवा सबसे बड़ा उपग्रह है।

  • टार्च में सामान्यतः शुष्क सेल का प्रयोग किया जाता है, इसका एनोड जिंक का जबकि कैथोड कार्बन का होता है।

  • न्यूक्लियर रिएक्टर टाइम बम जापानी परमाणु ऊर्जा विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ता तकाशी हिरोज द्वारा वर्ष 2010 में लिखी गई पुस्तक है।

  • इन्डआर्क आर्कटिक यंत्र के वैज्ञानिक अध्ययन हेतु भारत की अंतर्जलीय वेधशाला है।

  • परमाणु आपूर्ति समूह (NSG) के सदस्यों की संख्या 48 है।

  • विश्व में कणीय भौतिक शास्त्र (Particle Physics) की सबसे बड़ी प्रयोगशाला- यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (फ्रेंच परिवर्णी शब्द- CERN) की स्थापना फ्रांस – स्विट्जरलैंड की सीमा पर,  जेनेवा के पास वर्ष 1952 में प्राविधिक निकाय के रुप में की गई। इसकी औपचारिक स्थापना वर्ष 1954 में की गई।

  • स्वचालित कलाई घड़ियों को चलने के लिए ऊर्जा हेतु बैटरी की आवश्यकता नहीं होती है। ये घड़ी पहनने वाले के हाथ के संचलन के लिए ऊर्जा प्राप्त कर लेती हैं। यदि 2-3 दिन ये घड़ियां हाथ में न पहनी जाएं तो ये बंद हो जाएंगी।

  • नैनो हमिंग बर्ड या नैनो वायु वाहन (NAV: Nano Air Vehicle) एक छोटा, रिमोट  द्वारा संचालित विमान है जिसका विकास संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किया गया है।

  • परमाणु अप्रसार संधि की मान्यता के अनुसार, पांच परमाणु शस्त्र संपन्न राज्य चीन, फ्रांस, रुस, यूके तथा संयुक्त राज्य अमेरिका हैं।

  • हाइड्रोकार्बन-2025 भारत में पेट्रोलियम उत्पादों (हाइड्रोकार्बन) के संरक्षण से संबंधित है। यह भविष्य में भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं के संदर्भ में ऊर्जा दक्षता के विस्तार पर जोर देता है।

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  • महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में डाभोल में डाभोल शक्ति परियोजना स्थित है। इस शक्ति परियोजना का निर्माण डाभोल पावर कंपनी (DPC) ने किया है, जो एनरॉन, जनरल इलेक्ट्रिक, बेचटेल कॉर्पोरेशन तथा महाराष्ट्र पावर डेवलपमेंट कार्पोरेशन का संयुक्त उपक्रम है।

  • अतिसूक्ष्म गुरुत्वीय अथवा (Microgravity) या भारहीनता की अवस्था में किसी मोमबत्ती की ज्वाला का आकार गोलाकार हो जाएगा।

  • नोरियो टानिगुची टोक्यो विश्वविद्यालय में विज्ञान के प्रोफेसर थे। इन्होंने नैनो टेक्नोलॉजी (Nano Technology) शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वर्ष 1974 में प्रकाशित अपने एक शोध-पत्र में किया था।

  • नैनो तकनीक की चार पीढ़ियों –

  1. प्रथम पीढ़ी के उत्पाद – एयरोसोल, कोलॉयड, पॉलीमर

  2. द्वीतीय पीढ़ी के उत्पाद – लक्षित दवाएं, 3-D ट्रांजिस्टर, एंप्लीफायर

  3. तृतीय पीढ़ी के उत्पाद – रोबोटिक्स, 3-D नेटवर्किंग

  4. चतुर्थ पीढ़ी के उत्पाद – आण्विक विनिर्माण

  • वर्ष 2012 में जर्मनी के म्यूनिख विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विश्व के सबसे छोटे कान नैनो कान का आविष्कार किय था। नैनो-कर्ण स्वर्ण के केवल एक नैनो कण का बना होता है। नैनो-कर्ण द्वारा 60 dB तक की ध्वनि सुनी जा सकती  है।

  • अत्यधिक घनत्व वाले नक्षत्र न्यूट्रॉन तारे कहलाते हैं।

  • नैनो प्लग एक अत्यंत छोटा सुनने का यंत्र (Hearing Aid) है। इसका आकार इतना छोटा है कि यह आसानी से नजर भी नही आता, साथ ही उपयोगकर्ता की सुनने की क्षमता और आवश्यकता के अनुरुप इसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के जरिए प्रोग्राम किया जा सकता है।

  • सौरमंडल छोर पर विद्यमान छोटे-छोटे अरबों पिंड धूमकेतु या पुच्छल तारे कहलाते हैं। यह गैस एवं धूल का संग्रह हैं। इनकी पूंछ हमेशा सूर्य से दूर दिखाई देती है।

  • 1 नैनोमीटर से 100 नैनोमीटर के मध्य के आधार वाले कण नैनो-कण कहलाते हैं।

  • श्याम विवर (Black Hole) एक अत्यधिक घनत्व वाला पिंड है। जहां गुरुत्वीय क्षेत्र इतना प्रबल है कि ये अपने नजदीक से प्रवाहित होने वाले सारे विकिरणों को अवशोषित कर लेता है।

  • ए.टी.एम. का पूर्ण रुप ऑटोमेटेड टेलर मशीन है। यह मशीन एक ऐसा दूरसंचार नियंत्रित व कंप्यूटरीकृत उपकरण है जो ग्राहकों को वित्तीय हस्तांतरण से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध कराता है।

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  • श्वेत महादेश के नाम से प्रसिध्द दक्षिणी गोलार्ध्द में स्थित, अंटार्कटिका में स्थापित भारत का पहला अनुसंधान केन्द्र दक्षिण गंगोत्री था जिसे वर्ष 1984 में स्थापित किय गया था। अंटार्कटिका में स्थापित भारत का दूसरा स्थायी शोध केन्द्र मैत्री है। अंटार्कटिका के लार्समैनहिल क्षेत्र में भारत का तीसरा अनुसंधान केन्द्र स्थापित किय गया है, जिसका नाम भारती है।

  • आइसोहेलाइन समुद्र में समान लवणता वाले बिंदुओं को जोड़ने वाली रेखा को प्रदर्शित करता है। आइसोबार समान वायुदाब वाले, आइसोहाइट समान ऊंचाई वाले तथा आइसोबाथ समान गहराई वाले बिंदुओ को जोड़ने वाली रेखा दिखाता है।

  • पिक्नोक्लाइन किसी जल निकाय में घनत्व प्रवणता को दर्शाती है। हैलोक्लाइन किसी जल निकाय में लवणता प्रवणता को प्रदर्शित करती है जबकि थर्मोक्लाइन किसी जल या वायु निकाय में गहराई के साथ तीव्र तापमान परिवर्तन को दर्शाती है।

  • रेडियेटर, मोटरगाड़ियों के इंजन को ठंडा करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। पॉलीग्राफ, झूठ का पता लगाने वाला यंत्र है। टरबाइन के द्वारा बहते हुए द्रव की गतिज ऊर्जा का घूर्णन ऊर्जा में परिवर्तित करके यांत्रिक कार्य प्राप्त किया जाता है। क्वाड्रैंट नौसंचालन तथा खगोल विज्ञान में  ऊंचाई और कोणों को मापने वाला यंत्र है।

  • ऑस्ट्रेलिया समूह 1985 में स्थापित एक अनौपाचारिक समूह है जिसका लक्ष्य निर्यातक देशों द्वारा रासायनिक तथा जैविक हथियारों के प्रगुणन में सहायक होने के जोखिम को न्यूनीकृत करना है। वर्तमान में इसके 43 सदस्य हैं, जिसमें यूरोपीय संघ के सभी 28 सदस्य शामिल हैं। एशिया से भारत एवं जापान इस समूह के सदस्य हैं तथा आफ्रीका का कोई भी देश इसा सदस्य नही है।

  • बॉल-बेयरिंग के प्रयोग से पहिये और धूरी के बीच संस्पर्श का प्रभावी क्षेत्र घट जाता है। संस्पर्श क्षेत्र के घटने से घर्षण बल कम लगता है।

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  • ऊर्जा का रुपांतरण युक्त/प्रक्रम

ऊष्मा से वैद्युत       –   सौर सेल

वैद्युत से ध्वनि       –   लाउडस्पीकर

द्रव्यमान से ऊष्मा      –   नाभिकीय रिएक्टर

रासायनिक से ऊष्मा एवं प्रकाश   –       ईंधन दहन

  • ऑटो हॉन ने अणुबम की खोज नाभिक विखण्डन सिध्दांत पर की। वर्ष 1939 में जर्मन वैज्ञानिक ऑटो हॉन तथा एफ. स्ट्रॉसमैन ने ज्ञात किय कि जब यूरेनियम-235 पर मंद गति के न्यूट्रानों की बौछार की जाती है, तो यूरेनियम-235 का भारी नाभिक लगभग दो बराबर खण्डो में विभक्त हो जाता है। इसके साथ बहुत अधिक ऊर्जा उत्सर्जित होती है। इस अभिक्रिया को नाभिकीय विखण्डन कहते हैं।

  • 9 अगस्त, 1945 को फैट मैन नामक बम नागासाकी (जापान) पर गिराया गय था, इसमें प्लूटोनियम का प्रयोग विस्फोटक के रुप में किय गया था। वहीं दूसरी ओर हिरोशिमा पर गिराए बम लिटिल बॉय में विस्फोटक के रुप में यूरेनियम का प्रयोग किया गया था।

  • एडोब सिस्टम्स कैलिफोर्निया में स्थित एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी है। यह कंपनी मुख्य रुप से मल्टीमीडिया और रचनात्मक सॉफ्टवेयर उत्पादों के निर्माण पर ध्यान केन्द्रित करती है।

  • भू-गर्भशास्त्रियों के अनुसार, खनिज (मिनरल) प्राकृतिक रुप में पाया जाने वाला अकार्बनिक ठोस है जिसकी संरचना रवाकृत होती है।

  • टेलीफैक्स की सहायता से ग्राफिक तथा टेक्स्ट सूचनाओं का एक स्थान से दूसरे स्थान तक टेलीफोन लाइन द्वारा आदान-प्रदान होता है। फैक्स का आविष्कार स्टॉटलैंड के विज्ञानी एलेक्जेंडर बेन ने 1842 ई. में किया था।

  • वाटरजेट प्रणाली में पतली पाइप के द्वारा पानी की धार को तेज गाति से छोड़ा जाता है। इसका अनुप्रयोग खदान उद्योग से लेकर वैमानिकी तक में किया जाता है। इन उद्योगों में यह काटने, में आकार देने में तथा वेधन कार्य में उपयोगी है।

  • राजा रमन्ना एक भारतीय परमाणु वैज्ञानिक थे इन्होंने वर्ष 1974 में भारत का पहला परमाणु परीक्षण (स्माइलिंग बुध्दा) करने वाले वैज्ञानिक दल का नेतृत्व किय था। वर्ष 1976 में इन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

  • चिकित्सा के क्षेत्र में लेसर बीम का सर्वाधिक उपयोग संवेदनशील शल्य चिकित्सा जैसे कार्निया के प्रत्यारोपण में किया जाता है। यह किडनी स्टोन, कैंसर,  ट्यूमर तथा मस्तिष्क के ऑपरेशन में भी इस्तेमाल की  जाती है।

  • साइटोट्रान ऐसा यंत्र है जिससे कृत्रिम मौसम उत्पन्न किया जाता है।

  • टैकियान ग्रीक भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है ऐसे परिकल्पनात्मक कण जो प्रकाश की गति से तीव्र गति से चलते हैं।

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  • केन्द्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान –       लखनऊ

रॉकेट प्रक्षेपण  केन्द्र               –       थुम्बा (तिरुवनंतपुरम)

साइन्स सिटी                      –       कोलकाता

हाइटेक सिटी                      –       हैदराबाद

  • MRI अर्थात मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग में चुंबकीय क्षेत्र और रेडियो तरंगो का प्रयोग करके शरीर के विभिन्न अंगो एवं उनकी कार्यप्रणालियों के बारे में अत्यन्त उपयोगी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। MRI तकनीक नाभिकीय चुंबकीय अनुनाद परिघटना पर आधारित है।

  • इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ नेचुरोपैथी एंड यौगिक साइंस बंगलुरु में स्थित है।

  • केन्द्रीय उच्च तिब्बतन अध्ययन संस्थान         –   वाराणसी

इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान संस्थान             –   मुंबई

राष्ट्रीय मनोस्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान  –   बंगलुरु

केन्द्रीय अंग्रेजी तथा विदेशी भाषा संस्थान          –   हैदराबाद

  • द्रव क्रिस्टलों का प्रयोग कलाई घड़ियों में तथा प्रदर्शन युक्तियों में तथा शक्तिशाली पॉकेट कैलकुलेटरों में होता है।

  • स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद में ही है जबकि विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र तिरुवनंतपुरम में है, जबकि इसरो (ISRO) उपग्रह केन्द्र बंगलुरु में तथा एस.एच.ए.आर. (H.A.R.) केन्द्र श्रीहरिकोटा में स्थित है।

  • इलेक्ट्रानिक घड़ी में प्रयुक्त क्रिस्टलीय दोलित्र घड़ी में कंपन उत्पन्न करता है। इसके परिणामस्वरुप इलेक्ट्रानिक घड़ी समय निर्देशित करती है। यही कार्य लोलक घड़ी में लोलक करता है।

  • घड़ी में प्रयुक्त स्फटिक क्रिस्टल का कार्य, दाब विद्युत प्रभाव पर आधारित है। कुछ पदार्थों में यांत्रिक दबाव के कारण विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता होती है जिसे दाब विद्युत प्रभाव कहा जाता है।

  • भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा देश का पहला भारी जल संयंत्र पंजाब के रुपनगर जिले के नांगल कस्बे में राष्ट्रीय उर्वरक लिमिटेड के परिसर में वर्ष 1962 में स्थापित किया गया था।

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  • अनुचुम्बकीय पदार्थ वे पदार्थ हैं जो किसी चुम्बकीय क्षेत्र में रखे जाने पर क्षेत्र की दिशा में आंशिक रुप से ही चुम्बकित होते हैं तथा किसी अति-चुम्बक के समीप लाए जाने पर ही आकर्षित होते हैं। इनके उदाहरण हैं – ऑक्सीजन, प्लैटिनम, सोडियम, एल्युमीनियम, मैंगनीज, पोटैशियम, क्रोमियम।

  • कल्पना चावला एक भारतीय-अमेरिकी अंतरिक्षयात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे कोलंबिया अंतरिक्ष यान दुर्घटना में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थी। मैं आकाश गंगा का नागरिक हूँ यह कल्पना चावला का ही कथन है।

  • बीएमपी-II 1980 के दशक मे तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा विकसित पैदल सेना द्वारा युध्द में प्रयोग में लाया जाने वाला वाहन है।  इसके भारतीय संस्करण के सारथ नाम से जाना जाता है।

  • JILA (Joint Institute of Laboratory Astrophysics) अमेरिका के प्रतिष्ठित भौतिक विज्ञान अनुसंधान संस्थानों में से एक है। यहां के वैज्ञानिकों ने कुछ हजार स्ट्रॉन्शियम (चांदी के समान चमकीला सफेद धातु) परमाणुओं पर आधारित एक घड़ी का निर्माण किया है। यह ऐसी आणविक घड़ी है, जो सबसे ज्यादा सटीक समय बताएगी। यह घड़ी सीजियम पर आधारित अमेरिकी समय मानक से ज्यादा सटी है।

 

 

 

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रसायन विज्ञान

 

 

                 

परमाणु संरचना

  • किसी तत्व के सूक्ष्मतम कण जिनसे अणु बनते हैं तथा जो रासायनिक अभिक्रियाओं में बिना अपघटित हुए भाग लेते हैं- परमाणु (Atoms) कहलाते हैं। परमाणु रासायनिक रुप से अविभाज्य होते हैं। उनका आकार अति सूक्ष्म और भार बहुत ही कम होता है।

परमाणुओं का आकार (Size of Atoms)

  • परमाणुओं में सबसे छोटा परमाणु हाइड्रोजन का है। हाइड्रोजन परमाणु की त्रिज्या 0.28 A0 के लगभग है। अन्य तत्वों की परमाणु त्रिज्याएं 0.7A0 से 2.5A0 के मध्य हैं। (1 A0 = 1.0´10-8 सेमी.)।

परमाणुओं का भार

  • परमाणुओं में सबसे हल्का परमाणु हाइड्रोजन का है। हाइड्रोजन परमाणु का द्रव्यमान 1.008 amu है। अन्य तत्वों के परमाणुओं के द्रव्यमान 2 से 260 amu के मध्य हैं।

परमाणु की संरचना

  • उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक परमाणु (atoms) द्रव्य के सूक्ष्मतम अविभाज्य कण माने जाते थे, परंतु 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक व उसके बाद में हुई वैज्ञानिक खोजो में से यह ज्ञात हुआ कि परमाणु स्वयं विभिन्न प्रकार के अतिसूक्ष्म कणों से बने हुए हैं, जिनको मूल कण (Sub-Atomic or Elementary Particles) कहते हैं। मूल कणों में कुछ कण स्थायी (Stable) कण हैं, शेष कण अस्थायी (unstable) कण हैं। स्थायी कण परमाणु के बाहर  स्वतंत्र अवस्था में रह सकते हैं। अस्थायी कणों का परमाणु के अंदर और परमाणु के बाहर  क्षणिक अस्तित्व होता है।

  • इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन स्थायी मूल कण है। पॉजिट्रॉन, न्यूट्रिनो, एन्टी-न्यूट्रिनों और मेसान अस्थायी कणों में आते हैं। इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन परमाणु संरचना के प्रमुख मूल कण हैं।

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इलेट्रॉन

  • इलेक्ट्रॉन अति सूक्ष्म ऋणावेशित कण हैं। एक इलेक्ट्रॉन पर यूनिट ऋणावेश होता है। इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु (H) के द्रव्यमान (mH=1.008 amu) का लगभग 1/1837 है। इलेक्ट्रॉन की खोज 1897 ई. में इंगलिश वैज्ञानिक जे.जे. टॉमसन ने कैथोड किरणों में की।

प्रोटॉन

  • प्रोटॉन अति सूक्ष्म धनावेशित कण हैं। एक प्रोटॉन पर यूनिट धनावेश होता है। प्रोटॉन का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान के लगभग बराबर है। हाइड्रोजन परमाणु में से इलेक्ट्रॉन बाहर निकल जाने पर जो यूनिट धनावेशित कण (H+) शेष रह जाता है, उसे हाइड्रोजन परमाणु का नाभिक या प्रोटॉन कहते हैं। इंगलिश भौतिक विज्ञानी कर्नेस्ट रदरफोर्ड (1919) ने प्रोटॉन की खोज की और सिध्द किया कि सभी परमाणुओं मे प्रोटॉन होते हैं।

न्यूट्रॉन

  • न्यूट्रॉन विद्युत उदासीन कण हैं। न्यूट्रॉन का द्रव्यमान हाइड्रोजन परमाणु के द्रव्यमान के लगभग बराबर हैं। न्यूट्रॉन की खोज वर्ष 1932 में इंगलिश वैज्ञानिक जे. चैडविक ने की।

परमाणु नाभिक का संघटन

  • परमाणु नाभिक की रचना प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों से होती है। नाभिक का द्रव्यमान प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों के कारण तथा नाभिक का धनावेश केवल प्रोटॉनों के कारण होता है। प्रोटॉनों और न्यूटॉनों को सामूहिक रुप से न्यूक्लिऑन (Nucleons) कहते हैं, क्योंकि ये कण परमाणु न्यूक्लिअस (नाभिक) के घटक हैं।

  • परमाणु में इलेक्ट्रॉन नाभिक के बाहर रहते हैं और नाभिक के चारों ओर अपेक्षाकृत कुछ दूरी पर विभिन्न कक्षाओं में घूमते रहते हैं। परमाणु मे इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है, इसलिए परमाणु विद्युत उदासीन होते हैं।

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परमाणु क्रमांक (Atomic Number)

  • किसी तत्व के परमाणु नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या उस तत्व का परमाणु क्रमांक (Z) होता है। प्रत्येक तत्व का क्रमांक निश्चित और स्थिर होता है। भिन्न-भिन्न तत्वो के परमाणु क्रमांक भिन्न-भिन्न होते हैं।

  • हाइड्रोजन तत्व का परमाणु क्रमांक 1 है, इस कथन से यह अभिप्राय है कि हाइड्रोजन परमाणु के नाभिक में एक प्रोटॉन है।

द्रव्यमान संख्य (Mass Number)

  • किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की संख्याओं का योग उस परमाणु की द्रव्यमान संख्या (A) कहलाती है।

  • परमाणु की द्रव्यमान संख्य (A) = नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या (Z) + नाभिक में न्यूट्रॉनों की संख्या (N)

  • किसी परमाणु की द्रव्यमान संख्या उस परमाणु के नाभिक में उपस्थित न्यक्लिऑनों की कुल संख्या को प्रदर्शित करती है। द्रव्यमान संख्या तत्व का मूल लक्षण नही है। किसी तत्व के भिन्न-भिन्न परमाणुओं की द्रव्यमान संख्याएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं।

परमाणु भार

  • किसी परमाणु का परमाणु द्रव्यमान (या परमाणु भार) उसकी द्रव्यमान संख्या के लगभग बराबर होता है।

समइलेक्ट्रॉनिक

  • जिन आयनों और परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या बराबर होती है, उन्हें समइलेक्ट्रॉनिक (Isoelectronic) कहते हैं। समइलेक्ट्रॉनिक आयनों ओर परमाणुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास एक जैसे होते हैं।

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समस्थानिक (Isopotes)

  • समान परमाणु क्रमांक परंतु भिन्न परमाणु द्रव्यमानों (या द्रव्यमान संख्याओं) के परमाणुओं को समस्थानिक कहते हैं। आवर्त सारणी में किसी तत्व के समस्थानिकों का स्थान अलग-अलग न होकर एक ही होता है, क्योंकि उनका परमाणु क्रमांक समान होता है।

  • हाइड्रोजन तत्व के तीन समस्थानिक ज्ञात हैं जिनका परमाणु क्रमांक 1 है, परंतु उनकी द्रव्यमान संख्याएं 1, 2 और 3 हैं। इन समस्थानिकों को हाइड्रोजन-1, हाइड्रोजन-2 (ड्यूटीरियम या D) और हाइड्रोजन-3 (ट्राइटियम या T) कहते हैं।

  • ऑक्सीजन तत्व के तीन समस्थानिक हैं जिनका परमाणु क्रमांक 8 है, परंतु उनकी द्रव्यमान संख्याएं क्रमशः 16, 17 और 18 है। इन समस्थानिकों को ऑक्सीजन-16, ऑक्सीजन-17 और ऑक्सीजन-18 कहते हैं।

  • किसी तत्व के समस्थानिकों में प्रोटॉनों की संख्या समान होती है, परंतु न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है।

समभारिक (Isobars)

  • समान परमाणु द्रव्यमान (या द्रव्यमान संख्या) परंतु भिन्न परमाणु क्रमांक के परमाणुओं को समभारिक कहते हैं। आवर्त सारणी में समभारिकों का स्थान अलग-अलग होता है, क्योंकि उनके परमाणु क्रमांक भिन्न होते हैं।

रेडियोएक्टिवता (Radioactivity)

  • कुछ पदार्थ, जैसे यूरेनियम, थोरियम, रेडियम आदि स्वतः एक प्रकार की बेधी किरणें उत्सर्जित करते हैं। ऐसे पदार्थों को रेडियोएक्टिव पदार्थ कहते हैं और पदार्थों का स्वतः बेधी किरणें उत्सर्जित करने का गुण रेडियोएक्टिवता कहलाता है।

  • रेडियोएक्टिवता परमाणु नाभिक का गुण है। रेडियोऐक्टिव तत्वों के नाभिक अस्थायी होते हैं। उनमें स्वतः विघटन का गुण होता है। परमाणु नाभिक के स्वतः विघटन को रेडियोएक्टिव विघटन कहते हैं। परमाणु नाभिकों से बेधी किरणें (a, b,g किरणें) उत्सर्जित होती हैं। ये किरणें रेडियोएक्टिव किरणें कहलाती हैं।

  • रेडियोएक्टिव विघटन एक नाभिकीय प्रक्रिया है न कि रासायनिक अभिक्रिया।

  • रेडियोएक्टिवता का गुण प्रयाः भारी नाभिकों में पाया जाता है, क्योंकि भारी नाभिक अस्थायी होते हैं।

  • परमाणु क्रमांक 83 से आगे के सभी तत्व रेडियोएक्टिव हैं।

  • बेक्रेल द्वारा यूरेनियम की रेडियोएक्टिवता की खोज हो जाने के कुछ समय बाद मैरी क्यूरी द्वारा थोरियम के रेडियोएक्टिव गुणों की खोज हुई। 1898 ई. में मैरी क्यूरी और उनके पति पियरे क्यूरी ने रेडियोएक्टिव तत्व पोलोनियम की खोज की। मैरी क्यूरी ने वर्ष 1902 में यूरेनियम के अयस्क पिचब्लैण्ड (U3O8) में एक नए तत्व रेडियम की खोज की जो यूरेनियम की अपेक्षा लगभग 30 लाख गुना अधिक रेडियोएक्टिव है।

  • वर्तमान शताब्दी में कई नए रेडियोऐक्टिव तत्वों की खो हुई है, जिनमें रेडॉन (Rn), प्रोटोएक्टिनियम (Pa), ऐक्टिनियम (Ac), फ्रॉन्सियम (Fr) और ऐस्टैटीन (At) प्रमुख हैं।

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a, b, g – किरणों के गुणों की तुलना

गुण

a-किरणें

b-किरणें

g-किरणें

1.   प्रकृति

a-किरणें धनावेशित a-कणों से  बनी हैं। a-कण पर 2 यूनिट धनावेश  होता है। a-कण का  द्रव्यमान हीलियम-4 परमाणु के नाभिक के द्रव्यमान के  बराबर अर्थात 4 amu होता है। a-कण हीलियम परमाणु का नाभिक होता है। इसे 42He या 42a-संकेत द्वारा प्रदर्शित करते हैं।

b-किरणें ऋणावेशित b-कणों से बनी हैं। b-कण इलेक्ट्रॉन होते हैं। b-कण अर्थात इलेक्ट्रॉन पर यूनिट ऋणावेश होता है तथा –कण का द्रव्यमान 0.0005486 amu होता है। b-कण को

g-किरणें g-किरणों के सदृश्य विद्युत चुंबकीय विकिरण हैं। g-किरणों का तरंगदैर्ध्य 1A0 के लगभग होता है।

2.   वेग

a-किरणों का वेग लगभग प्रकाश के वेग का 1/15 होता है।

b-किरणों का वेग प्रकाश के वेग के लगभग बराबर होता है।

g-किरणें का वेग प्रकाश के वेग के बराबर होता है।

3.   बेधन क्षमता (Penetrating Power)

a-किरणें 0.002 सेमी. मोटी ऐल्युमीनियम की चादर को बेध सकती है।

b-किरणें उच्च वेग के कारण 0.2 सेमी. मोटी ऐल्युमीनियम की चादर को बेध सकती है।

g-किरणें 100 सेमी. मोटी  ऐल्युमीनियम की चादर को  बेध सकती है।

4.   आयनकारी क्षमता (Ionising Power)

a-किरणें गैसों को आयनित करती हैं। इनकी आयनकारी क्षमता a-किरणों की अपेक्षा 100 गुनी तथा g-किरणों की अपेक्षा 10000 गुनी होती है।

b-किरणें गैसों को आयनित करती हैं। इनकी आयनकारी क्षमता g-किरणों की अपेक्षा 100 गुनी होती है।

gकिरणे गैसों को आयनित करती हैं। इनकी आयनकारी क्षमता a-किरणों की 1/10000 गुनी और b-किरणों की 1/100 गुनी होती है।

5.   विद्युत और चुम्बकीय  क्षेत्रों का प्रभाव

aकिरणें विद्युत क्षेत्र में  ऋण  आवेशित प्लेट की ओर विक्षेपित हो जाती हैं। a-किरणें चुम्बकीय क्षेत्र में भी विक्षेपित हैं।

b-किरणें विद्युत क्षेत्र में धन आवेशित प्लेट की ओर मुड़ जाती हैं। b-किरणें विद्युत क्षेत्र में a-किरणों की अपेक्षा अधिक विक्षेपित  होती हैं क्योंकि अति अल्प द्रव्यमान के कारण-b कणों के आवेश और द्रव्यमान का अनुपात (e/m) बहुत उच्च होता है। b-किरणें चुम्बकीय क्षेत्र में भी विक्षेपित होती हैं।

gकिरणें विद्युत उदासीन होती हैं।  इन किरणों पर विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्रों का कोई प्रभाव नहीं प़ड़ती है।

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6.   फोटोग्राफिक प्लेट पर प्रभाव

aकिरणें फोटोग्राफिक प्लेट को काला कर देती हैं।

bकिरणें फोटोग्राफिक प्लेट को काला कर देती हैं।

gकिरणें फोटोग्राफिक प्लेट को काला कर देती हैं।

7.   बेरियम प्लेटीनोसाइनाइड और जिंक सल्फाइड पर प्रभाव

aकिरणें प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।

bकिरणें  प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती है।

g-किरणें प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।

 

  • परमाणु (Atom) के नाभिक की खोज अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने वर्ष 1911 में की थी।

  • रदरफोर्ड ने एक परमाणु में न्यूट्रॉन के अस्तित्व को प्रस्तावित किय था किंतु न्यूट्रॉन की खोज 1932 में चैडविक ने की थी। उन्होंने पता लगाया कि बेरिलियम (Be) तथा अन्य परमाणुओं पर यदि तीव्र गति वाले कण की बम वर्षा की जाए तो उसमें से विद्युत उदासीन कण निकलते हैं, जिन्हें न्यूट्रॉन कहते हैं।

  • पॉजिट्रॉन (Positron) – एक धनावेशित मूल कण होते हैं, जिसका द्रव्यमान एवं आवेश इलेक्ट्रॉन के बराबर होता है। इसलिए इसे इलेक्ट्रॉन का विरोधी-कण (Anti-Particle) कहते हैं। इसका प्रचक्रण (Spin) ½ होता है।

  • न्यूट्रिनो (Neutrino) – ये द्रव्यमान एवं आवेश रहित मूल कण हैं। इनकी खोज पाउली ने की थी।

  • क्वार्क (Quark) – क्वार्क पदार्थ का मूल कण है, जिससे अधिकांश पदार्थ बने हैं। क्वार्क मिलकर हैड्रान बनाते हैं। क्वार्क का  आंशिक आवेश (मूल कण का – 1/3 या +2/3) होता है।

  • फोनान (Phonon) – फोनॉन ध्वनि के लघुत्तम कण हैं। दृढ़ क्रिस्टल विभा के कंपन्न में फोनॉन को पाया जाता  है।

  • गाइगर काउंटर को गाइगर-मुलर काउंटर के नाम से भी जाना जाता है। यह एक प्रकार का कण संसूचक है, जिसका प्रयोग आयनित विकिरण को मापने में किया जाता है। इस उपकरण के द्वारा नाभिकीय विकिरण के उत्सर्जनों का पता लगाया जाता है।

  • अंटोइन हेनरी बैकुरेल एक फ्रांसीसी भौतिकशास्त्री थे। सर्वप्रथम 1896 ई. में इन्होंने रेडियोएक्टिविटी की खोज की थी। यह खोज इन्होंने स्फुरदीप्ति पदार्थों के अध्ययन के दौरान की थी।

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रासायनिक एवं भौतिक परिवर्तन, विलयन आदि

  • कुछ परिवर्तन हैं जिनके दौरान कोई नए पदार्थ नहीं बनते हैं। इसके विपरीत, कुछ अन्य परिवर्तनन हैं जिनके दौरान नए पदार्थ बनते हैं। इसलिए, इसके आधार पर किए नए पदार्थ बनते हैं अथवा नहीं, हम सभी परिवर्तनों को दो समूहों में वर्गीकृत कर सकते हैं – भौतिक परिवर्तन (Physical Changes) और रासायनिक परिवर्तन (Chemical Changes)।

भौतिक परिवर्तन (Physical Changes)

  • वे परिवर्तन जिनमें कोई ने पदार्थ नहीं बनते हैं, भौतिक परिवर्तन (Physical Changes) कहलाते हैं। भौतिक परिवर्तन में, शामिल पदार्थों में उनके व्यष्टित्व में परिवर्तन नहीं होता है। वे कुछ भौतिक प्रक्रमों द्वारा अपने मूल रुप में आसानी से पुरानी स्थिति में लौट सकता है। इसका अर्थ है कि भौतिक परिवर्तनों को आसानी से उत्क्रमित (या उल्टा) किया जा सकता है। भौतिक अवस्था, आकार और बाह्य आकृति में परिवर्तन, भौतिक परिवर्तन होते हैं। भौतिक परिवर्तनों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं – बर्फ का गलन (जल बनना), जल का हिमीकरण (बर्फ बनना), जल का क्वथन (भाप बनना), भाप का संघनन या द्रवण (जल बनना), विलयन का बनाना, विद्युत बल्ब का चमकना, और कांच के गिलास का टूटना।

  1. जब बर्फ को गर्म किया जाता है, वह गलकर जल बनता है। यद्यपि बर्फ और जल भिन्न दिखाई देते हैं, वे दोनों जल के अणुओं के बने हैं। अतः बर्फ के गलन से जल का बनना एक भौतिक परिवर्तन है।

  2. जब जल को गर्म किया जाता है, वह क्वथन कर (उबल कर) भाप बनाता है। यद्यपि भाप और जल भिन्न दिखाई देते हैं, वे दोनों जल के अणुओं के बने हैं। अतः जल के क्वथन के दौरान कोई नया रासायनिक पदार्थ नहीं बनता है। इसलिए जल के क्वथन से भाप का बनना एक भौतिक परिवर्तन है। जब भाप को ठंडा किया जाता है, वह संघनित (द्रवित) होकर जल बनाती है। भाप के संघनन (या द्रवण) से जल का बनना भी एक भौतिक परिवर्तन है।

  • भौतिक परिवर्तन, अस्थायी परिवर्तन हैं जिन्हें मूल पदार्थ में उत्क्रमित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, बर्फ के गलन से जल का बनना एक अस्थायी परिवर्तन है। जल के शीतलन दावारा, मूल पदार्थ बर्फ में हम इस परिवर्तन को आसानी से उत्क्रमित कर सकते हैं।

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रासायनिक परिवर्तन (Chemical  Changes)

  • वे परिवर्तन जिनमें नए पदार्थ बनते हैं, रासायनिक परिवर्तन कहलाते हैं। रासायनिक परिवर्तित में शामिल पदार्थों में उनका व्यष्टित्व परिवर्तित हो जाता है। वे पूर्णतः नए पदार्थों में रुपांतरित हो जाते हैं। नए पदार्थों प्रायः उनके मूल रुप में वापस नहीं लाया जा सकता है। इसका अर्थ है कि रासायनिक परिवर्तन प्रायः अनुत्क्रमणीय होते हैं। रासायनिक परिवर्तनों के कुछ सामान्य उदाहरण हैं – मैग्नीशियम तार का जलना, कागज का जलना, लोहे का जंगन, दूध से दही का बनना और भोजन का पकना।

  • यदि हम जलती हुई माचिस की तीली से कागज के टुकड़े को जलाते हैं, तो पूर्णतः नए पदार्थ जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, जल वाष्प, धुंआ और राख उत्पन्न होते हैं। इसलिए, कागज का जलना एक रासायनिक परिवर्तन है।

  • रासायनिक परिवर्तन एक स्थायी परिवर्तन हैं, जो प्रायः अनुत्क्रमणीय होते हैं। उदाहरणार्थ, कागज का जलना एक स्थायी परिवर्तन है, जिसे उत्क्रमित नहीं किया जा सकता है। कारण यह है कि कागज के दहन-उत्पादों को संयोग करके हम एक बार फिर मूल कागज नहीं बना सकते हैं।

भौतिक परिवर्तन

रासायनिक परिवर्तन

1.   भौतिक परिवर्तन में कोई नया पदार्थ नहीं  बनता है।

1.   रासायनिक परिवर्तन में नया पदार्थ बनता है।

2.   भौतिक परिवर्तन एक अस्थायी परिवर्तन है।

2 रासानयिक परिवर्तन एक स्थायी परिवर्तन है।

3.   भौतिक परिवर्तन आसानी से उत्क्रमणीय होता है।

3 रासायनिक परिवर्तन प्रायः अनुत्क्रमणीय होता है।

4.   भौतिक परिवर्तन में प्रायः अत्यंत अल्प मात्र में ऊष्मा (या प्रकाश) ऊर्जा अवशोषित होती है या निकलती है।

4 रासनयिक परिवर्तन में अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा (या प्रकाश)  ऊर्जा अवशोषित होती है या निकलती है।

5.   भौतिक परिवर्तन में पदार्थ नहीं परिवर्तित  होता है।

5 रासायनिक परिवर्तन में पदार्थ का द्रव्यमान परिवर्तित होता है।

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विलयन (Solution)

  • दो या दो से अधिक पदार्थों के समांगी मिश्रण (Homogeneous Mixture) को विलयन कहते हैं। उदाहरण के लिए जल में थोड़ी चीनी डालकर उसे हिलाने पर चीनी जल में अदृश्य हो जाती है, अर्थात विलीन (Dissolve) हो जाती है तथा चीनी और जल का एक पारदर्शक समांगी मिश्रण अर्थात विलयन बन जाता है। इसी प्रकार जल में सोडियम क्लोराइड, ऐल्कोहॉल या अमोनिया के समांग मिश्रण विलयन हैं।

  • विलयन के प्रत्येक भाग के गुण समान होते हैं और प्रत्येक भाग विलयन के घटकों (Components) के रासायनिक गुण प्रदर्शित करता है। विलयन बनने के साधारणतः उसके घटकों की रासायनिक प्रकृति परिवर्तित नहीं होती है।

विलायक और विलेय (Solvent and Solute)

  • विलयन के जिस घटक (Component) की मूल भौतिक अवस्था विलयन जैसी होती है, उसे विलायक (Solvent) कहते हैं और दूसरे घटक को अर्थात विलीन (Dissolved) हुए पदार्थ को विलेय (Solute) कहते हैं। उदाहरण के लिए चीनी के जलीय विलयन में जल विलायक और चीनी विलेय है।

  • विलयन की भौतिक अवस्था ठोस, द्रव या गैस हो सकती है। जैसे, जल में नमक, ऐल्कोहॉल या कार्बन डाइऑक्साइड का विलयन द्रव विलयन (Liquid Solution) है। वायु एक गैसीय विलयन (Gaseous Solution) है। कई मिश्र धातुएं ठोस विलयन (Solid  Solutions) हैं, जैसे पीतल (Brass), कॉपर (70%) और जिंक (30%)  धातुओं का ठोस विलयन है।

  • ठोस, द्रव और गैसीय विलयनों में द्रव विलयन प्रमुख हैं। साधारण विलयन द्रव विलयन होते हैं।

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तनु विलयन (Dilute Solution)

  • जिस विलयन में विलेय की सान्द्रता कम होती है, उसे तनु विलयन कहते हैं। विलयन में विलेय की सान्द्रता आधिक होने पर उसे सान्द्र विलयन कहते हैं।

संतृप्त विलयन (Saturated  Solution)

  • किसी ताप पर जल की एक निश्चित मात्रा में थोड़ी चीनी डालकर उसे हिलाने पर चीनी जल में विलीन हो जाती है। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में चीनी को जल में डालकर विलयन को हिलाते रहने पर चीनी धीरे-धीरे जल में घुलती रहती है और अन्त में एक ऐसी अवस्था आ जाती है, जब चीनी का घुलना रुक जाता है और ठोस चीनी विलयन के नीचे पेंदी में बैठने लगती है। इस अवस्था में विलयन संतृप्त विलयन कहलाता है।

विलेयता (Solubility)

  • किसी पदार्थ की वह मात्रा जो निश्चित ताप पर 100 ग्राम विलायक को संतृप्त करने के लिए आवश्यक होती है, पदार्थ की विलेयता कहलाती है।

  • किसी विलायक में, निश्चित ताप पर, किसी पदार्थ की विलेयता निश्चित और स्थिर होती है। विलेयता विलयन के ताप, विलेय तथा विलायक की प्रकृति और विलेय के कणों के आकार पर निर्भर करती है। अल्प विलेय लवणों की विलेयता सम-आयनों की उपस्थिति से प्रभावित होती है।

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परासरण (Osmosis)

  • विलायक के अणुओं का अर्धपारगम्य झिल्ली में होकर शुध्द विलायक से विलयन की ओर या तनु विलयन से सान्द्र विलयन की ओर स्वतः प्रवाह (Spontaneous Flow) परासरण कहलाता है।

अर्धपारगम्य झिल्लियां (Semipermeable Membranes)

  • वे झिल्लियां जो केवल विलायक के अणुओं (Solvent Molecules) को अपने में से होकर आर-पार आने-जाने देती हैं परंतु विलेय (Solute) के अणुओं को नहीं, अर्धपारगम्य झिल्लियां (Semipermeable Membranes) कहलाती हैं।

  • भौतिक प्रक्रिया वह प्रक्रिया है, जिसमें कारक को हटा देने पर भौतिक प्रक्रिया में भाग लेने वाला पदार्थ पुनः अपनी पूर्ववर्ती अवस्था में आ जाता है। भौतिक प्रक्रिया अस्थायी एवं उत्क्रमणीय होती है। पानी में चीनी का घुलना एक भौतिक परिवर्तन, क्योंकि वाष्पन द्वारा चीनी को पुनः प्राप्त किया जा सकता है।

  • रासायनिक प्रक्रिया वह प्रक्रिया है जिसमें कारक को हटा देने पर रासायनिक प्रक्रिया में भाग लेने वाला पदार्थ पूर्ववर्ती अवस्था में नहीं आ सकता अर्थात रासायनिक प्रक्रिया स्थायी एवं सामान्यतः अनुत्क्रमणीय होती है। अतः सब्जियों को पकाने पर उनका मुलायम हो जाना एक रासायनिक प्रक्रिया है।

  • वायु अथवा रासायनिक पदार्थों द्वारा धातुओं का शनैः-शनैः क्षय (Destruction) होना संक्षारण कहलाता है। लोहे पर जंग लगना अर्थात लोहे पर भूरे रंग की परत बनना, तांबे पर हरे रंग की परत बनना तथा सिल्वर पर काले रंग की परत बनना संक्षारण के  उदाहरण हैं।

  • जल अपघटन (Hydrolysis) वह प्रतिक्रिया है, जिसमें लवण के आयन और जल के आयन या परस्पर संयोग करके अम्लीय या क्षारीय घोल बनाते हैं। इसमें ऊर्जा, ऊष्मा के रुप में निकलती है।

  • पास्चुरीकरण (Pasteurization) द्रव खाद्य सामग्री के संरक्षण की विधि है। इस विधि की खोज लुई पाश्चर ने की थी इसीलिए उन्हीं के नाम पर इसका नाम पास्चुरीकरण पड़ा। इसमें दूध को 1450 F से 1500 F  तक ठंडा कर लिया जाता है। इस पास्चुरीकरण प्रक्रिया से दूध में उपस्थित हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।

  • ऊंचाई पर जाने पर वायुमण्डलीय दबाव कम हो जाता है, अतः जल का क्वथनांक घट जाता है और जल कम ताप पर ही उबलने लगता है। इसी कारण ऊंचाई पर जाने पर खाना भी देर से पकता है।

  • अपद्रव्यों को मिलाने से द्रव का क्वथनांक बढ़ जाता है। जबकि गलनांक सामान्यतः कम हो जाता है।

  • कुछ ठोस पदार्थ ऐसे होते हैं जिन्हें गर्म किए जाने पर वे द्रव अवस्था में आने की बजाए सीधे वाष्प में बदल जाते हैं और वाष्प को ठंडा करने पर पुनः सीधे ठोस अवस्था में आ जाते हैं। ऐसे पदार्थ को ऊर्ध्वपातज (Sublimate) तथा इस क्रिया को ऊर्ध्वपातन (Sublimation) कहते हैं। इस विधि के द्वारा कपूर, नेफ्थलीन, अमोनियम क्लोराइड आदि पदार्थ शुध्द किए जाते हैं।

  • क्रोमेटाग्राफी रंगीन रसायनों के मिश्रण को पृथक करने की एक रासायनिक तकनीक है।

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अकार्बनिक रसायन

तत्वों का वर्गीकरण

  • आवर्त सारणी प्रमाणित तौर पर रसायन शास्त्र का अत्यंत महत्वपूर्ण विचार है। यह इस बात का अद्भुत उदाहरण है कि रसायनिक तत्व अव्यवस्थित समूह में बिखरी हुई इकाई नहीं होते, अपितु वे व्यवस्थित समूहों में समानता प्रदर्शित करते हैं।

  • तत्व सभी प्रकार के पदार्थों की मूल इकाई होते हैं। सन 1800 में केवल 31 तत्व ज्ञात थे सन 1865 तक 63 तत्वो की जानकारी हो गई थी। आजकल हमें 118 तत्वों के बारे में पता है। इनमें से हाल में खोजे गए तत्व मानव-निर्मित हैं।

  • तत्वों का वर्गीकरण समूहों में और आवर्तिता नियम एवं आवर्त सारणी का विकास वैज्ञानिकों द्वारा अनेक अवलोकनों तथा प्रयोगों का परिणाम है।

  • रूसी रसायनज्ञ दमित्री मेंडलीव (1834-1907) तथा जर्मन रसायनज्ञ लोथर मेयर (1830-1895) के सतत प्रयासों के फलस्वरुप आवर्त सारणी के विकास में सफलता प्राप्त हुई। स्वतंत्र रुप से कार्य करते हुए दोनों रसानज्ञों ने सन 1869 में प्रस्तावित किया कि जब तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु-भारों के क्रम में व्यवस्थित किया जाता है, तब नियमित अंतराल के पश्चात उनके भौतिक तथा रासायनिक गुणों में समानता पाई जाती है। लोथर मेयर ने भौतिक गुणों (जैसे- परमाण्वीय आयतन, गलनांक एवं क्वथनांक और परमाणु-भार) के मध्य वक्र आलेखित (Curve Ploting) किया, जो एक निश्चित समुच्चय वाले तत्वों में समानता दर्शाता था।

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  • आधुनिक आवर्त सारणी के विकास में योगदान का श्रेय दमित्री मेंडलीव को दिया गया है।

  • हालांकि आवर्ती संबंधों के अध्ययन का आरंभ डॉबराइनर ने किया था, किंतु मेंडलीव ने आवर्त नियम को पहली बार प्रकाशित किया। यह नियम इस प्रकार है – तत्वों के गुणधर्म उनके परमाणु भारों के आवर्ती फलन होते हैं।

  • मेंडलीव ने तत्वों को क्षैतिज पंक्तियों एवं ऊर्ध्वाधर स्तंभों में उनके बढ़ते पहुए परमाणु-भार के अनुसार सारणी में इस तरह क्रम में रखा कि समान गुणधर्मों वाले तत्व एक ही ऊर्ध्वाधर-स्तंभ या समूहों में स्थान पाएं। मेंडलीव द्वारा तत्वों का वर्गीकरण निश्चित तौर पर लोथर मेयर के वर्गीकरण से अधिक विस्तृत था।

आधुनिक आवर्त-नियम

  • अंग्रेज भौतिकी वैज्ञानिक हेनरी मोजले ने दर्शाया कि परमाणु-द्रव्यमान की तुलना में किसी तत्व का परमाणु-क्रमांक उस तत्व के गुणों को दर्शाने में अधिक सक्षम है। इसी के अनुसार मेंडलीव के आवर्त नियम का संशोधन किया गया। इसे आधुनिक आवर्त नियम कहते हैं। यह इस प्रकार है –

तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु-क्रमांकों के आवर्ती फलन होते हैं।

  • समय-समय पर आवर्त सारणी के विभिन्न रुप प्रस्तुत किए गए हैं। कुछ रुप तत्वों की रासायनिक अभिक्रियाओं तथा संयोजकता पर बल देते हैं, जबकि कुछ अन्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर। इसका आधुनिक स्वरुप (जिसे आवर्त सारणी का दीर्घ स्वरुप कहते हैं) बहुत सरल  तथा अत्यंत उपयोगी है।

  • क्षैतिज पंक्तियों (जिन्हें मेंडलीव ने श्रेणी कहा है) को आवर्त (Periods) कहा जाता है और ऊर्ध्वाधर स्तंभों को वर्ग (Group) कहते हैं। समान बाह्य इलेक्ट्रॉन विन्यास वाले तत्वों को ऊर्ध्वाधर स्तंभों में रखा जाता है, जिन्हें वर्ग या परिवार कहा जाता है। IUPAC के अनुमोदन के अनुसार, वर्गों को पुरानी पध्दति …VIIA, VIII, IB……VIIB, के स्थान पर उन्हें 1 से 18 तक की संख्याओं में अंकित करके निरुपित किया गया है।

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परमाणु-क्रमांक

नाम

प्रतीक

IUPAC अधिकृत नाम

IUPAC प्रतीक

101

Unnilunium

Unu

Mendelevium

Md

102

Unnilbium

Unb

Nobelium

No

103

Unniltrium

Unt

Lawrencium

Lr

104

Unnilquadium

Unq

Rutherfordium

Rf

105

Unnilpentium

Unp

Dubnium

Db

106

Unnilhexium

Unh

Seaborgium

Sg

107

Unnilseptium

Uns

Bohrium

Bh

108

Unniloctium

Uno

Hassium

Hs

109

Unnilennium

Une

Meitnerium

Mt

110

Ununnilium

Uun

Darmstadtium

Ds

111

Unununnium

Uuu

Rontgenium

Rg

112

Ununbium

Uub

Copemicium

Cn

113

Ununtrium

Uut

nihonium

Nh

114

Ununquadium

Uuq

Flerovium

Fl

115

Ununpentium

Uup

Moscovium

Mc

116

Ununhexium

Uuh

Livemorium

Lv

117

Ununseptium

Uus

Tennessine

Ts

118

Ununoctium

Uuo

Oganesson

Og

 

  • रासायनिक तत्वो की आवर्त-सारणी में किसी वर्ग मे नीचे की ओर जाने पर तत्वों की इलेक्ट्रॉन बंधुताएं सामान्यतः घटती हैं, जबकि परमाणु त्रिज्याएं बढ़ती हैं।

  • भूपर्पटी पर द्रव्यमान प्रतिशत के रुप में ऑक्सीजन 46.8%, सिलिकॉन 27.72%, कैल्शियम 3.65% तथा कार्बन 0.6% पाया जाता है।

  • धरती की सतह पर ऑक्सीजन के बाद सबसे अधिक उपलब्ध मूल तत्व सिलिकॉन है। इसकी खोज 1824 ई. में जे.जे. बर्जेलियस द्वारा की गई थी। यह लैटिन भाषा के सिलिकस शब्द से बना है। सिलिकॉन चिप का प्रयोग कंप्यूटर के सेमीकंडक्टरों मे होता है।

  • किसी आवर्त के अनुदिश आयनन विभव धीरे-धीरे बढ़ता है।

  • किसी वर्ग (समूह) में परमाणु भार की वृध्दि के साथ-साथ इलेक्ट्रॉन बंधुता कम होती है।

  • आवर्त में परमाणु संख्या की वृध्दि के साथ-साथ सामान्यतः विद्युत ऋणात्मकता बढ़ती है।

  • आवर्त सारणी के तीसरे और चौथे समूह के ऑक्साइड का समान्य गुणधर्म बेसिक और एसिडिक होता है। ये ऑक्साइड उभयधर्मी हैं।

  • हीरा रासायनिक रुप से कार्बन का शुध्दतम रुप (क्रिस्टलीय अपररुप) है, अतः यह एक मूल तत्व है। रेत मुख्यतः सिलिकॉन एवं ऑक्सीजन, संगमरमर कैल्शियम, कार्बन तथा ऑक्सीजन और शक्कर मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का मिश्रण होती है।

  • रासायनिक तत्व (या केवल तत्व) ऐसे उन शुध्द पदार्थों को कहते हैं, जो केवल एक ही तरह के परमाणुओं से बने होते हैं अथवा जो ऐसे परमाणुओं से बने होते हें जिनके नाभिक मे समान संख्या में प्रोटॉन होते हैं। वर्ष 2014 तक 118 तत्वों की पहचान की गई है। नवीनतम तत्व ununseptium वर्ष 2010 में खोजा गया था।

  • महाविस्फोट के पश्चात जब ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ, तो इसमें तीन-चौथाई से अधिक हाइड्रोजन तथा एक-चौथाई से कम हीलियम था। अद्यतन स्थिति तक कुछ प्रतिशत हाइड्रोजन का ही ज्वलन हो सकता है। अधिकांश हाइड्रोजन आज भी विद्यमान है। अतः स्पष्ट है कि ब्रह्माण्ड में सर्वाधिक पाया जाने वाला तत्व हाइड्रोजन है। जबकि भूपर्पटी पर सर्वाधिक पाया जाने वाला तत्व ऑक्सीजन है।

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धातुएं, खनिज, आयस्कः गुणधर्म, उपयोग

  • भूपर्पटी (Earth Crust) तत्वों का मुख्य भाग उदगम है। इसमे अधातुओं में ऑक्सीजन और धातुओं में एल्युमीनियम सर्वाधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

  • प्रकृति में धातुएं दो रुपों में मिलती हैं –

  1. मुक्त अवस्था में अर्थात सरल पदार्थों (तत्वों) के रुप में (Native of Elemental State)।

  2. संयुक्त अवस्था में अर्थात यौगिकों के रुप में (Combined State)।

  • प्रकृति में किसी धातु की प्राप्ति उसकी रासायनिक प्रकृति पर निर्भर करती है। जो धातु बहुत कम सक्रिय होते हैं, जैसे गोल्ड, प्लैटिनम आदि, वे मुक्त अवस्था में मिलते हैं। अधिकांश धातु, सक्रिय होने के कारण संयुक्त अवस्था में पाए जाते हैं। कुछ धातुएं,  जैसे कॉपर, सिल्वर और आयरन मुक्त और संयुक्त दोनो रुपों में मिलती है।

  • खनिज (Minerals): धातु तथा उनके यौगिक पृथ्वी में जिस रुप में मिलते हैं, खनिज कहलाते हैं।

  • अयस्क (Ores): उन खनिजों को जिनसे धातु निकालना आर्थिक दृष्टि से लाभदायक होता है, अयस्क कहलाते हैं।

  • धातु प्रायः ऑक्साइड, सल्फाइड, कार्बोनेट, हैलाइड और सल्फेट के रुप में पाये जाते हैं।

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कुछ धातुओं के खनिज एवं अयस्क

धातु

खनिज/अयस्क

खनिज/अयस्क का संघटन

Na

रॉक साल्ट (Rock Salt)

ट्रोना (Trona)

चिली शोरा (Chile Saltpetre)

बोरेक्स (Borex)

ग्लॉबराइट (Glauberite)

क्रायोलाइट (Cryolite)

NaCl

Na2CO3NaHCO3.2H2O

NaNO3

Na2B4O7.10H2O (Tincal)

Na2SO4.10H2O (Glauber’s Salt)

 

 

Na3AlF6

 

K

सिल्वाइन (Sylvine)

कार्नेलाइट

शोनाइट (Schonite)

KCl

KCl.MgCl2.6H2O

K2SO4

Mg

मैग्नेसाइट (Magnesite)

डोलोमाइट (Dolomite)

कार्नेलाइट (Carnalite)

किजेराइट (Kieserite)

ऐप्सम साल्ट (Epsom Salt)

(ऐप्सोमाइट)

MgCO3

MgCO3CaCO3

KCl.MgCl2.6H2O

MgSO4.H2O

MgSO4.7H2O

Ca

लाइमस्टोन (Limestone)

कैल्साइट (Calcite)

जिप्सम (Gypsum)

फ्लुओरस्पार (Fluorspar)

फॉस्फोराइट

CaCO3a

CaCO3a

CaSO4.2H2O

CaF2

Ca3(PO4)2

 

Al

बॉक्साइट (Buxite)

क्रायोलाइट (Cryolite)

कोरंडम (Corundum)

डायस्पोर (Diaspore)

Al2O3.2H2O

Na3AlF6

Al2O3

Al2O3.H2O

 

Sn

कैसिटेराइट (Cassiterite)

SnO2 (Tinstone)

Pb

गैलेना (Galena)

सीरुसाइट (Cerussite)

मैट्लोकाइट (Matlockite)

PbS

PbCO3

PbCl2

Cu

कैल्कोपाइराइट (Chalcopyrite)

कैल्कोसाइट (Chalcocite)

क्यूप्राइट (Cuptrite)

मैलेकाइट (Malachite)

ऐजुराइट (Azurite)

CuFeS2 (Copper pyrites)

Cu2S (Copper glance)

Cu2O

CuCO3.Cu(OH)2

2CuCO3.Cu(OH)2

Ag

नेटिव सिल्वर (Native Silver)

अर्जेन्टाइट (Argentite)

केरार्जीराइट (Keragyrite)

Ag

Ag2S (Silver glance)

AgCl (Horn Silver)

 

Zn

जिंक ब्लैन्ड (Zinc Blende)

फ्रेंकलिनाइट (Franklinite)

कैलामीन (Calamine)

जिंकाइट (Zincite)

ZnS (Black Jack)

(ZnFe)OFe2O3

ZnCO3

ZnO (Red zinc)

Hg

सिनबार (Cinnabar)

HgS

Mg

पाइरोलुसाइट (Pyrolusite)

MnO2

Mn

मैंगनाइट (Manganite)

हौसमैनाइट (Hausmanite)

Mn2O3.H2O

Mn3O4

Fe

मैग्नेटाइट (Magnetite)

हेमाटाइट (Haematite)

लाइमोनाइट (Limonite)

सिडेराइट (Siderite)

आयरन पाइराइट (Iron pyrites)

Fe3O4 (Load Stone or magnetic oxide of iron)

Fe2O3 (Red haematite)

Fe2O3.3H2O (Brown Haematite)

FeCO3 (Spathic Iron haematite)

 

FeS2

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  • इलेक्ट्रॉनिक संलयन 2, 8 निऑन एवं 2, 8, 8 (ऑर्गन) अक्रिय गैसें के लिए तथा 2, 8, 7 क्लोरीन के लिए होती है। इलेक्ट्रॉनिक संरुपण 2, 8,  8, 2 कैल्शियम के लिए प्रयुक्त होता है।

  • अधातु हीरा सभी प्राकृतिक वस्तुओं में सर्वाधिक कठोर होता है, जबकि प्लेटिनम सबसे कठोर धातु है।

धातु

परमाणु क्रमांक

परमाणु भार (amu)

घनत्व (g/cc)

1.   लिथियम

3

6.941

0.534

2.   पारा

80

200.59

13.534

3.   ऑस्मियम

76

190.23

22.61

4.   एल्युमीनियम

13

26.982

2.70

 

  • लिथियम सबसे हल्की और ऑस्मियम सबसे भारी धातु है। ऑस्मियम सर्वाधिक घनत्व वाली प्राकृतिक धातु है।

  • सबसे भारी प्राकृतिक तत्व यूरेनियम है, जिसका परमाणु भार 238.03 तथा इसका घनत्व 19.05 ग्राम प्रति घन सेमी. होता है।

  • मोती में 85% कैल्सियम कार्बोनेट (एरागोनाइट), 2-4% जल तथा 0-10% कांचियोलिन पाया जाता है। कांचियोलिन एक प्रोटीन है।

  • माणिक्य एवं नीलम कोरण्डम के जवाहरात रुप हैं। कोरण्डम प्राकृतिक रुप से एल्युमीनियम ऑक्साइड के क्रिस्टलीय रुप में पाया जाता है।

  • सामान्यतः तीन तरह के रंग स्रोतों का प्रयोग किया जाता है  –

  1. सोडियम लैम्प (Sodium Lamp) – इससे पीली रोशनी निकलती है।

  2. मरकरी लैम्प (Mercury Lamp) – इससे श्वेत-नीलाभ रोशनी निकलती है।

  3. प्रतिदीप्त लैम्प (Fluorescent Lamp) – इससे एक ऐसी मिश्रित रोशनी निकलती है, जो लगभग सूर्य के प्रकाश के समान होती है।

  • सोडियम लैम्प प्रायः सड़क प्रकाश के लिए प्रयुक्त होते हैं क्योकि इनका प्रकाश एकवर्णी है और पानी की बूंदों से गुजरने पर विभक्त नहीं होता है।

  • स्वर्ण की शुध्दता डिग्री अथवा कैरेट में मापी जाती है। विशुध्द स्वर्ण 1000 डिग्री अथवा 24 कैरेट का होता है। चूंकि यह बहुत ही मुलायम होता है इसलिए इसका उपयोग आभूषण बनाने के लिए नहीं किया जाता है। साधारणतः आभूषण बनाने के लिए 10 से 22 कैरेट तक का सोना अच्छा माना जाता है।

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  • स्वर्ण नाइट्रिक, सल्फ्यूरिक और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से प्रभावित नहीं होता है परंतु अम्लराज ( Aqua regia) (3 भाग सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा 1 भाग सान्द्र नाइट्रिक अम्ल का सम्मिश्रण) में घुलकर क्लोरोऑरिक अम्ल (HAuCl4) बनाता है।

  • धातुओं में सोना (Gold) की रासायनिक सक्रियता सबसे कम होती है जिसके कारण यह स्वतंत्र अवस्था में पाई जाती है।

  • प्रतिदीप्ति नली में सर्वाधिक सामान्यतः निम्नदाब युक्त पारा-वाष्प और ऑर्गन गैस भरी जाती है। कभी-कभी जीनॉन, नियॉन अथवा क्रिप्टॉन का भी प्रयोग किया जाता है।

  • सोडियम का अपेक्षिक घनत्व 0.97 होता है। जल से हल्का होने के कारण यह जल पर तैरने लगता है।

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  • भंजन (Cracking) की क्रिया में उच्च तापमान पर कार्बन के बड़े अणु छोटे अणुओं में टूट जाते हैं। इस प्रक्रिया से पेट्रोलियम प्राप्त किया जाता है।

  • प्रगलन (Smelting) तांबे के अयस्क से शुध्द तांबा प्राप्त करने की रासायनिक विधि में प्रयुक्त एक प्रक्रिया है।

  • हाइड्रोजनीकरण प्रक्रिया में (Hydrogenation) खाद्य तेलों पर निकिल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन प्रवाहित करने पर वह वनस्पति घी में परिवर्तित हो जाता है।

  • वल्कनीकरण एक रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें गंधक या इसी प्रकार का कोई दूसरा पदार्थ मिला देने से रबर या संबंधित बहुलकों को अपेक्षाकृत अधिक टिकाऊ पदार्थ में बदल दिया जाता है।

  • एल्युमीनियम –   बॉक्साइट

कॉपर (तांबा)      –   क्यूप्राइट

पारा (मरकरी)     –   सिनेबार

जिंक (जस्ता)     –   कैलामाइन

आयरन (लोहा)    –   हेमेटाइट

  • पिच ब्लैंड से –   यूरेनियम

ग्रेफाइट से        –   कार्बन

बॉक्साइट से      –   एल्युमीनियम

अर्जेन्टाइट से     –   चांदी

  • चांदी ऊष्मा तथा विद्युत का सर्वोत्तम संचालक होती है। भूपर्पटी में सबसे अधिक मात्रा में पाई जाने वाली धातु एल्युमीनियम है। 

मिश्रधातुएं

मिश्रधातु

  • मिश्रधातु दो या अधिक धातुओं की रचना होती है, इनमें कार्बन जैसे कुछ अधात्विक तत्व भी हो सकते हैं, मिश्रधातुएं उन धातुओं के गुणों का भी प्रदर्शन करती हैं जिनसे मिलकर ये बनी होती हैं। अपने पिघले हुए अपघटकों को मिश्रित कर देने से मिश्रधातुएं बनती हैं। इस्पात एक ऐसी मिश्रधातु है जिसमें एक बहुत बड़ा अनुपात लोहे का होता है तथा अल्प परिमाण में कार्बन व अन्य तत्व होते हैं। पीतल और कांसा दोनों पुरानी जानी पहचानी धातुएं हैं। पीतल, तांबे  और जिंक की मिश्रधातु हैं, कांसा, तांबा और टिन का मिश्रधातु है। स्टेनलेस स्टी, लोहा, क्रोमियम और निकेल का मिश्रधातु है। चांदी के उपकरणों और जड़ाऊ के कामों में प्रयुक्त चांदी को खरी चांदी (स्टर्लिंग सिल्वर) कहते हैं, यह चांदी और तांबे की एक मिश्रधातु ही है।

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  • ड्रयूरालुमिन वायुयान के अवयवों को बनाने के लिए प्रयुक्त होती है और यह तांबे और ऐल्यूमीनियम की एक मिश्रधातु है। अन्य उपयोगी मिश्रधातुएं हैं – रांगा (सीसा+टिन), एलनिको (लोहा +ऐल्युमीनियम + निकेल + कोबाल्ट) और नाइक्रोम (निकेल + लोहा + क्रोमियम + मैंगनीज), धातुएं अपुनर्नव्य संसाधन हैं। स्वर्ण आभूषण प्रायः 22 कैरेट के होते हैं, इसका अभिप्राय यह है कि इसमें 22 भाग शुध्द सोना और 2 भाग तांबा और चांदी होते हैं, एकदम शुध्द सोना 24 कैरेट का होता है।

मिश्रधातुएं अत्यंत उपयोगी होती हैं। कुछ प्रमुख मिश्रधातुएं उनके अवयव तथा उपयोग इस प्रकार हैं –

 

मिश्रधातु

अवयव

उपयोग

1.    

पीतल

तांबा, जिंक (Cu+Zn)

बर्तन तथा सजावटी सामान बनाने में।

2.    

स्टील

लोहा, कार्बन (Fe+C)

परिवहन के साधनों, भवनों  तथा कई अन्य वस्तुओं के निर्माण में।

3.    

स्टेनलेस स्टील

लोहा, निकेल, क्रोमियम (Fe+Ni+Cr)

खेल का सामान, बर्तन एवं दैनिक उपयोग की चीजे बनाने में।

4.    

टांका (सोल्डर)

सीसा, टिन (Pb+Sn)

जोड़ों में टांका लगाने में।

5.    

कांसा

तांबा, टिन (Cu+Sn)

मूर्तियों, जहाजों तथा सिक्कों के निर्माण में।

6.    

ड्यूरालुमिन

एल्युमीनियम, तांबा, मैग्नीशियम, मैंगनीज (Al+Cu+Mg+Mn)

वायुयान तथा रसोई  के सामान बनाने में।

7.    

जर्मन सिल्वर

तांबा, निकेल,  जिंक (Cu +Ni+Zn)

बर्तन तथा अन्य चीजें बनाने में.

 

  • तांबा तत्व मुक्त एवं संयुक्त दोनों अवस्थाओं में प्राप्त किया जाता है। यह संयुक्त अवस्था में अयस्कों के रुप में पाया जाता है। इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार की मिश्रधातुओं के निर्माण में होता है। जबकि पीतल, ब्रॉन्ज तथा स्टील मिश्रधातुएं हैं।

  • एनोडाइजिंग एक वैद्युत रासायनिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा एक धातु का पृष्ठ टिकाऊ एवं जंग-रोधी बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में एल्युमीनियम पर एल्युमीनियम ऑक्साइड की परत का विक्षेपण होता है।

  • जस्तेदार लोहें में जंग इसलिए नहीं लगता है क्योकि जस्तेदार लोहे में ऑक्सीकरण की क्षमता पाई जाती है।

  • जस्ता अथवा यशद (Zinc) एक तत्व है, जिसका उपयोग लोहे के प्रतिरक्षण में किया जाता है। जस्तीकृत लोहा पानी, साबुन के विलयन, पेट्रोल और खनिज तेलों के प्रभाव को सह सकता है। लोहे को जंगरोधी बनाने हेतु उस पर जस्ते की पॉलिश की जाती है। इसे गैल्वेनाइजेशन कहते हैं।

  • जब पारा किसी धातु से मिलकर मिश्रधातु बनाता है, तो उसे अमलगम कहते हैं। चांदी के पारद मिश्रण को दांत के छेदों में भरा जाता है।

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  • स्टेनलेस स्टील (धब्बा रहित लोहा) एक मिश्र धातु है, जिसके संघटक तत्व इस प्रकार हैं –

आयरन      –   89.4%

क्रोमियम     –   10.0%

मैंगनीज      –   0.35%

कार्बन       –   0.25%

  • जंग लगने पर लोहे का भार बढ़ता है क्योंकि लोहे में जंग उस समय लगता है जबकि आर्द्रता की उपस्थिति में लोहा, ऑक्सीजन से रासायनिक अभिक्रिया करके लौह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। इस अभिक्रिया के दौरान लोहे के साथ ऑक्सीजन की मात्रा भी ज़ुड़ जाती है, अतः लोहे का भार बढ़ जाती है। इस दौरान लोहे का भार उतना ही बढ़ता है, जितनी कि ऑक्सीजन वह ग्रहण करता है।

  • स्टील में कार्बन की मात्रा 0.1-2% तक होती है। इसमें आयरन की प्रतिशतता अधित होती है।

  • जंग रहित लोहा बनाने के लिए क्रोमियम को लोहे में मिश्रित किया जाता है, जिससे एक मिश्र धातु स्टेनलेस स्टील बनती है जो जंग रहित होती है।

  • हवा में हाइड्रोजन सल्फाइड की उपस्थिति के कारण पीतल का रंग फीका पड़ जाता है।

  • कांसे में 88% तांबा, जबकि 12% टिन उपस्थित होता है।

  • टांका या सोल्डर मिश्रधातु में सीसा 68% और टिन 32% होता है।

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अधातुएं

कार्बन और उसके भिन्न रुप

  • आक्सोकार्बन, कार्बन का अपररुप नही है। आक्सोकार्बन एक अकार्बनिक यौगिक है जो केवल कार्बन और ऑक्सीजन से युक्त होता है।

  • ग्रेफाइट एवं हीरा दोनों ही कार्बन के अपररुप हैं। हीरा सबसे कठोर होता है जबकि ग्रेफाइट हीरे से मुलायम होता है। ग्रेफाइट का प्रयोग पेंसिल के लेड बनाने में किया जाता है।

  • बकमिन्स्टर फुलरीन एक गोलीय फुलरीन अणु (कार्बन का अपररुप) है। इसका सूत्र C60 है। 20 षटभुजों तथा 12 पंचभुजों से निर्मित इस यौगिक की संरचना में कार्बन परमाणु बहुफलकीय संरचना से आबध्द होते हैं।

  • कोयले के खनिजों को कार्बन की प्रतिशत मात्रा के आधार पर मुख्यतः चार प्रकारों में बांटा गया है –

  1. लिग्नाइट 25-35%

  2. पीट – 50-60%

  3. बिटुमिनस – 45-85%

  4. एन्थ्रासाइट – 85% से अधिक

  • हीरे का उपयोग कांच को काटने तथा उस पर उत्कीर्ण करने या खरोंचने में होता है।

  • हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल (HF) का प्रयोग भी कांच पर उत्कीर्ण करने एवं खरोंचने में होता है। कांच हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल (HF) में घुलनशील सिलिकेट बनाता है, जिसके कारण HF का भंडारण कांच के बर्तनों में नहीं किया जाता है।

  • कैरेट का उपयोग किसी हीरे का वजन बताने में किया जाता है।

1 कैरेट = 0.2 ग्राम

0.2 ग्राम = 200 मिली ग्राम

  • ग्रेफाइट स्लेटी काले रंग का चिकना चमकदार कार्बनिक पदार्थ होता है। ग्रेफाइट चूर्ण का उपयोग भारी मशीनों में स्नेहक के रुप में किया जाता है।

  • ठोस कार्बन डाइऑक्साइड को शुष्क बर्फ या शुष्क हिम कहा जाता है। यह गर्म करने पर सीधे ही गैस में परिवर्तित हो जाती है। इसका उपयोग आइसक्रीम के निर्माण में तथा प्रभावकारी शीतलक के रुप में किया जाता है।

  • हीरा कार्बन का अपररुप है। इसका आपेक्षिक घनत्व 3.5 है। ग्रेफाइट सलेटी काले रंग का चिकना चमकदार कार्बनिक पदार्थ होता है इसका आपेक्षिक घनत्व 2.25 होता है, जबकि कोयला एक ठोस कार्बनिक पदार्थ है जिसको ईंधन के रुप में प्रयोग में लाया जाता है।

  • ग्रैफीन कार्बन का एक द्वी-आयामी अपररुप है।

  • 1996 में राबर्ट एफ. कर्ल (अमेरिका), सर हैराल्ड डब्ल्यू क्रोटो (ब्रिटेन) तथा रिचर्ड ई. स्माले को फुलरीन्स (Fullerenes), जो कि कार्बन का अपररुप था, की खोज को लिए रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फुलरीन कार्बन का अपररुप होता है।

  • ढलवां लौह (Pig Iron) मे कार्बन की मात्रा लगभग 3.5-4.5% तक होती है।

  • विद्युत का चालन धात्विक गुण है। किसी वर्ग में नीचे की ओर जाने पर धात्विक प्रकृति बढ़ती है तथा किसी आवर्त में बाए से दाएं जाने पर धात्विक गुण घटता है।

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हाइड्रोजन और उसके यौगिक

  • हाइड्रोजन का परमाणु क्रमांक 1 और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s है।

  • हाइड्रोजन क्षार धातुओं (Li, Na, K आदि) और हैलोजनों (F, Cl, Br आदि) दोनों से गुणों में समानताएं प्रदर्शित करती हैं। अतः हाइड्रोजन को आवर्त सारणी के प्रथम वर्ग में क्षार धातुओं के ऊपर और सातवें वर्ग में हैलोजनों के ऊपर दोनों जगह स्थान दिया गया है।

  • हाइड्रोजन के तीन समस्थानिक ज्ञात हैं, जिनकी द्रव्यमान संख्याएं क्रमशः 1, 2 और 3 हैं। इन समस्थानिकों को हल्की हाइड्रोजन या प्रोटियम (11H या H) , ड्यूटीरियम (21H या D) और ट्राइटियम (31H या T) कहते हैं।

  • प्रोटियम और ड्यूटीरियम हाइड्रोजन के स्थायी समस्थानिक हैं, परंतु ट्राइटियम रेडियोएक्टिव हैं। प्रकृति में ट्राइटियम अति अल्प मात्रा में पाई जाती है। इसे कृत्रि विधियों द्वारा न्यूक्लीय रिएक्टर में बनाया जाता है। ड्यूटीरियम की खोज वर्ष 1931 में यूरे, ब्रिकवैड और मर्फी ने की तथा ट्राइटियम की खोज वर्ष 1934 में लोजिअर, ब्लीकने और स्मिथ द्वारा की गई।

ड्यूटीरियम के गुण

  • ड्यूटीरियम रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन और जल में अविलेय गैस हैं।

  • ड्यूटीरियम के अणु द्वी-परमाणुक हैं।

भारी जल

  • भारी हाइड्रोजन (ड्यूटीरियम) के ऑक्साइड D2O को भारी जल कहते हैं। भारी जल की खोज वर्ष 1932 में यूरे और वाशबर्न (C. Urey and E.W. Washburn) ने की थी।

भारी जल के उपयोग

  • भारी जल एक कीमती पदार्थ है। इसके मुख्य उपयोग निम्नलिखित हैः

  1. न्यूट्रॉन मंदक के रुप में- न्यूक्लीय रिएक्टरों मे जो पदार्थ तीव्रगामी न्यूट्रॉनों की चाल को मंद करता है, उसे मंदक कहते हैं। भारी जल न्यूक्लीय रिएक्टरों में न्यूट्रॉन मंदक (Moderator) के रुप में प्रयुक्त किया जाता है।

  2. ड्यूटीरियम तथा ड्यूटीरियम के यौगिक बनाने में-

  • सान्द्र भारी जल शरीर के लिए हानिकारक है। भारी जल साधारण जल की तुलना में मंद वेग से अभिक्रिया करता है, जिससे शरीर मे होने वाली सामान्य अभिक्रियाएं  असंतुलित हो जाती हैं।

  • भारी जल पौधों के विकास को रोकता है। भारी जल में बीजों का अंकुरण रुक जाता है।

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मृदु और कठोर जल

  • वह जल जो साबुन के साथ आसानी से झाग देता है, म़ृदु जल (Soft Water) कहलाता है और जो कठिनाई से झाग देता है, कठोर जल (Hard Water) कहलाता है।

  • जल की कठोरता उसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम के बाइकार्बोनेट, क्लोराइड, सल्फेट, नाइट्रेट आदि लवणों के घुले होने के कारण होती है।

  • साधारण साबुन, स्टिऐरिक अम्ल (C17H35COOH) का सोडियम लवण होता है। सोडियम स्टिऐरेट (साबुन) जल में विलेय है।

हाइड्रोजन परॉक्साइड

  • सन 1818 में थीनार्ड (Thenard) ने हाइड्रोजन परॉक्साइड की खोज की। हाइड्रोजन परॉक्साइड का सूत्र H2O2 है।

हाइड्रोजन परॉक्साइड के गुण

  • शुध्द हाइड्रोजन परॉक्साइड फीका नीला (Pale Blue) गाढ़ा द्रव है।

  • यह जल, एल्कोहॉल और ईथर में विलेय है। 00 C पर इसका आपेक्षिक घनत्व 1.47 है। इसका क्वथनांक 1520 C  और हिमांक -0.890 C है।

हाइड्रोजन परॉक्साइड के उपयोग

  1. हाइड्रोजन परॉक्साइड का तनु विलयन कीटनाशी (Germicide) और प्रतिरोधी (Antiseptic) के रुप में घाव धोने, गरारे करने, दांत और कान साफ करने में काम में आता है।

  2. हाइड्रोजन परॉक्साइड रेशम, ऊन, पंख, बाल, तिनके, हाथी दांत आदि कोमल वस्तुओं का विरंजन करने में प्रयुक्त होता है।

  3. दूध, शराब आदि का परिरक्षण (Preservation) करने में हाइड्रोजन परॉक्साइड प्रयुक्त होता है।

  4. हाइड्रोजन परॉक्साइड का उपयोग रॉकेट, जेट, पनडुब्बियों और टारपीडो के नोदन में होता है। यह स्वयं ईंधन के रुप में या किसी अन्य ईंधन के ऑक्सीकारक के रुप में प्रयुक्त होता है, क्योंकि इससे ऑक्सीजन प्राप्त होती है।

  • हाइड्रोजन बिना हवा की उपस्थिति में नहीं जल सकती। यदि हवा की उपस्थिति हाइड्रोजन को जलाया जाएगा, तो वह ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया कर जल का निर्माण करेगी।

  • हाइड्रोजन एक स्वच्छतम दहन ईंधन है जिसके जलने से केवल जल उत्पन्न होता है जबकि कोयला, मिट्टी का तेल और डीजल आदि जीवाश्म ईंधन या कार्बनिक ईंधन कहलाते हैं, जिनके जलने से वायुमंडल में CO2 आदि हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है।

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  • वर्षा का पानी जल का शुध्द रुप है। इसका pH मान 7 होता है। पृथ्वी पर पाए जाने वाले पानी में अम्लीय तथा क्षारीय पदार्थ घुले होते हैं, जिससे पानी अशुध्द हो जाता है।

  • जल की स्थायी कठोरता कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट के कारण होती है। कठोर जल पीने में लवणीय लगते हैं। कपड़ा धोने पर इनसे झाग उत्पन्न नहीं होता।

  • निर्लवणीकरण द्वारा अशुध्द जल से  बड़ी मात्रा में पेयजल तैयार किया जाता है।

  • क्लोरीन का प्रयोग ब्लीचिंग पाउडर बनाने में, विसंक्रामक बनाने में तथा पीने के पानी में रोगाणुनाशक की तरह होता है।

  • उत्क्रम परासरण (Reverse Osmosis) छनन विधि द्वारा जलशोधन की एक विशिष्ट प्रक्रिया है। इस विधि से समुद्री जल को शुध्द किया जाता है।

  • शुध्द जल को उदासीन माना जाता है, जिसका pH मान लगभग 7 होता है।

  • रासायनिक स्कंदन की प्रक्रिया द्वारा गंदे जल को स्वच्छ जल में परिवर्तित किया जाता है। फिटकरी को गंदे जल में मिलाने पर जलशोधन क्रमशः स्कंदन, ऊर्णन तथा अवसादन के द्वारा होता है। परिणामतः स्वच्छ जल प्राप्त होता है।

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सल्फर, नाइट्रोजन, हैलोजन अक्रिय गैसें

  • हीलियम और ऑक्सीजन का मिश्रण गहरे समुद्रों में गोताखोरों द्वारा वायु के स्थान पर सांस लेने के लिए प्रयोग किया जाता है क्योंकि अधिक दाब पर हीलियम रक्त में कम विलेय होता है।

  • सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF6) रंगहीन, गंधहीन, अज्वलनशील अकार्बनिक यौगिक है। इस अणु का आकार अष्टफलकीय (Octahedral) होता है।

  • नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) को हास्य गैस (Laughing Gas) कहते हैं। इसे सूंघने पर हंसी आती है।  इसे शल्य क्रिया के समय निश्चेतक (Anaesthesia) के रुप में भी प्रयोग किया जाता है।

  • हवा से भारी जीनॉन (Xe) गैस को स्ट्रैंजर गैस कहते हैं। परमाणु क्रमांक 54 वाली इस गैस की खोज विलियम रामसे एवं मॉरिस ट्रैवर्स ने वर्ष 1898 मे की थी। इसकी वायुमंडल में मात्रा कम होती है।

  • वायुयान के टायरों में भरने के लिए नाइट्रोजन गैस का प्रयोग किया जाता है। वायुयान के टायरों का दबाव एवं तापमान बहुत उच्च होता है जिससे वायुयान के उतरते एवं रुकते समय टायरों में विस्फोट होने की संभावना प्रबल हो जाती है। नाइट्रोजन गैस का दबाव कम होने के कारण टायरों में विस्फोट की संभावना कम रहती है।

  • नाइट्रोजन पौधों की वृध्दि के लिए आवश्यक तत्व है। टीकभक्षी पौधे प्रायः ऐसे स्थानों पर पाए जाते हैं जहां कि भूमि में नाइट्रोजन की कमी होती है। इसलिए ये कीटों को मारकर उनके शरीर में नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं। कीटभक्षी पौधों की लगभग 440 जातियों का पता लगाया जा चुका है। भारत में ये दार्जिलिंग, नैनीताल, कश्मीर आदि स्थानों पर पाए जाते हैं।

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  • अश्रु गैस का प्रयोग कभी-कभी अनियंत्रित भीड़ को तितर-वितर करने के लिए किया जाता है। इसके मानव नेत्र के संपर्क में आने से आंखों में जलन होती है तथा अश्रु टपकने लगते हैं। एल्फा क्लोरो एसीटोफिनॉन, एक्रोलिन आदि कुछ प्रमुख गैसे (Tear Gases) हैं। अश्रु गैस में अमोनिया का प्रयोग किया जाता है।

  • क्लोरीन, ब्रोमीन एवं फ्लोरीन हैलोजन समूह की गैसें हैं जबकि आयोडीन एक नीले-काले रंग का अपारदर्शी क्रिस्टलीय ठोस होता है।

  • आयोडीन सामान्य ताप पर ठोस अवस्था में रहता है।

  • हैलोजन अत्यधिक अभिक्रियाशील अधात्विक तत्वों की श्रृंखला है। इसमें फ्लोरीन, क्लोरीन, ब्रोमीन, आयोडीन, एस्टेटीन हैं। इनमें सर्वाधिक अभिक्रियाशील फ्लोरीन होती है। ब्रोमीन के यौगिकों का उपयोग पीड़ानाशक के रुप में किया जाता है।

  • हीलियम (He), निऑन (Ne), ऑर्गन (Ar), क्रिप्टॉन (Kr), जीनॉन (Xe) तथा रेडॉन अक्रिय गैसें हैं। अक्रिय गैस (Inert Gas) को उत्कृष्ट गैसे (Noble Gas) या दुर्लभ गैस भी कहा जाता है।

  • ट्यूब लाइट में कम दाब पर पारे की वाष्प तथा एक अक्रिय गैस मुख्यतः ऑर्गन भरी होती है। साथ ही ट्यूब लाइट में प्रयुक्त कांच की आंतरिक सतह फॉस्फर पाउडर से लेपित रहती है।

अम्ल, क्षार तथा लवण

  • दही, नींबू का रस, संतरे का रस और सिरके का स्वाद खट्टा होता है। इन पदार्थों का स्वाद खट्टा इसलिए होता है, क्योंकि इनमें अम्ल (एसिड) होते हैं। ऐसे पदार्थों की रासायनिक प्रकृति अम्लीय होती है। एसिड शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द एसियर से हुई है, जिसका अर्थ है खट्टा। इन पदार्थों में पाए जाने वाले अम्ल प्रकृतिक अम्ल होते हैं।

  • सामान्यतः ऐसे पदार्थ, जिनका स्वाद कड़वा होता है और जो स्पर्श करने पर साबुन जैसे लगते हैं, क्षारक कहलाते हैं। इन पदार्थों की प्रकृति क्षारकीय कहलाती है।

  • भार- सभी क्षारक जल में घुलनशील नहीं होते हैं। जल में घुलनशील क्षारक को क्षार कहते हैं।

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  • कुछ आम क्षार हैं –

NaOH                –        सोडियम हाइड्रॉक्साइड

KOH                   –        पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड

Ca (OH)2            –        कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड

NH4OH      –   अमोनियम हाइड्रॉक्साइड

  • नोटः सभी क्षार, क्षारक होते हैं परंतु सभी क्षारक, भार नहीं होते।

क्षार तथा अम्ल की प्रबलता

  • किसी क्षार या अम्ल की प्रबलता उसके द्वारा उत्पन्न H+ आयन या OH आयनों की संख्या पर निर्भर करती है।

  • किसी अम्ल या क्षारक की प्रबलता हम एक सार्वभौमिक सूचक द्वारा ज्ञात कर सकते हैं। इस सूचक को PH स्केल कहते हैं।

  • यह स्केल 0(अति अम्लीय) से 14 (अति क्षारीय) तक ph ज्ञात करने के लिए उपयोग में लाया जाता है।

  • शुध्द जल उदासीन है, इसका pH 7 है।

  • प्रबल अम्ल अधिक मात्रा में H+ आयन उत्पन्न करते हैं। उदाहरण – HCL, H2SO4, और HNO3

  • दुर्बल अम्ल कम मात्रा में आयन उत्पन्न करते हैं। उदाहरण – CH3COOH, H2CO3 (कार्बोनिक अम्ल)

  • प्रबल क्षार – प्रबल क्षार अधिक मात्रा में OH आयन उत्पन्न करते हैं। उदाहरण – सोडियम हाइड्रॉक्साइड, पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड, कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड

  • दुर्बल क्षार – ये कम OH आयन उत्पन्न करते हैं। उदाहरण – NH4OH

  • कोई पदार्थ अम्लीय है अथवा क्षारकीय, इसका परीक्षण करने के लिए विशेष प्रकार के पदार्थों का उपयोग किया जाता है। ये पदार्थ सूचक कहलाते हैं। सूचकों को जब अम्लीय अथवा क्षारकीय पदार्थयुक्त विलयन में मिलाया जाता है, तो उनका रंग बदल जाता है। हल्दी, लिटमस, गुड़हल की पंखुड़ियां आदि कुछ प्राकृतिक रुप से पाए जाने वाले सूचक हैं।

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अम्ल का नाम

किसमें पाया जाता है

ऐसीटिक अम्ल

सिरका

फॉर्मिक अम्ल

चींटी का डंक

साइट्रिक अम्ल

नींबू कुल के (सिट्रस) फल जैसे संतरा, नींबू आदि

लैक्टिक अम्ल

दही

ऑक्जेलिक अम्ल

पालक

एस्कॉर्बिक अम्ल (विटामिन C)

आंवा, सिट्र्स फल

टार्टरिक अम्ल

इमली, अंगूर, कच्चे आम आदि

ऊपर बताए गए सभी अम्ल प्रकृति में पाए जाते हैं।

क्षारक का नाम

किसमें पाया जाता है

कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड

चूने का पानी

अमोनियम हाइड्रॉक्साइड

खिड़की के कांच आदि साफ करने के लिए उपयुक्त मार्जक

सोडियम हाइड्रॉक्साइड/पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड

साबुन

मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड

दूधिया मैग्नीशियम (मिल्क ऑफ मैग्नीशिया

 

अम्ल

क्षारक

स्वाद में खट्टे होते हैं।

स्वाद में कड़वे

नीले लिटमस को लाल में बदल देते हैं।

लाल लिटमस को नीले में बदल देते हैं।

उदाहरण –

हाइड्रोकलोरिक अम्ल HCL

सल्फ्यूरिक अम्ल H2SO4

नाइट्रिक अम्ल HNO3

एसीटिक अम्ल CH3COOH

उदाहरण –

सोडियम हाइड्रॉक्साइड NaOH

पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड KOH

कैल्शियम हाइरड्रॉक्साइड Ca(OH)2

अमोनियम हाइड्रॉक्साइड NH4OH

प्राकृतिक सूचक लिटमसः एक प्राकृतिक रंजक

  • सबसे सामान्य रुप से उपयोग किया जाने वाला प्राकृतिक सूचक लिटमस है। इसे लाइकेनों (शैक) से निष्कर्षित किया जाता है। आसुत जल में इसका रंग मॉव (नीलशोण) होता है। जब इसे अम्लीय लिलयन में मिलाय जाता है, तो यह लाल हो जाता है और जब क्षारीय विलयन में मिलाया जाता है, तो यह नीला हो जाता है।  यह विलयन के रुप में अथवा कागज की पट्टियों के रुप में उपलब्ध होता है, जिन्हें लिटमस पत्र कहते हैं। सामान्यतः यह लाल और नीले लिटमस पत्र के रुप में उपलब्ध होता है। ऐसे विलयन, जो लाल  अथवा नीले लिटमस पत्र के रंग को परिवर्तित नहीं करते हैं, उदासीन विलयन कहलाते हैं। ऐसे पदार्थ न तो अम्लीय होते हैं और न ही क्षारकीय।

  • गुड़हल के पुष्प का सूचक अम्लीय विलयनों को गहरा गुलाबी (मैजेन्टा) और क्षारकीय विलयनों को हरा कर देता है। अम्ल नीले निटमस को लाल कर देते हैं और क्षारक लाल लिटमस को नीला कर देते हैं।

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अम्ल-क्षार सूचक

सूचक का नाम

अम्ल के साथ रंग में क्षार के साथ रंग में

परिवर्तन

परिवर्तन

नीला लिटमस विलयन

लाल रंग परिवर्तन

रंग परिवर्तन नहीं होता

लाल लिटमस विलयन

कोई परिवर्तन नहीं

नीले रंग में  बदल जाता है

हल्दी

कोई परिवर्तन नहीं

लाल रंग में बदल जाता है।

मिथाइल आरेंज

लाल रंग में बदल जाता है

पीले रंग में बदल जाता है।

फिनोफ्थलीन (रंगहीन)

कोई परिवर्तन नही

गुलाबी रंग में बदल जाता है।

 

  • किसी अम्ल और किसी क्षारक के बीच होने वाली अभिक्रिया उदासीनीकरण कहलाती है। इस प्रक्रम में ऊष्मा के निर्मुक्त होने के साथ-साथ लवण और जल निर्मित होते हैं।

उदासीन लवण

प्रबल अम्ल+प्रबल क्षार

pH मान = 7

उदाहरण – NaCl, CaSO4

अम्लीय लवण

प्रबल अम्ल+दुर्बल क्षार

pH का मान 7 से कम

उदाहरण – NH4, Cl, NH4NO3

क्षारीय लवण

प्रबल क्षार+दुर्बल अम्ल

pH का मान 7 से अधिक

उदाहरण – CaCO3, CH3COONa

  • सोडियम क्लोराइड (NaCl) को साधारण नमक कहा जाता है, जिसे हम भोजन में इस्तेमाल करते हैं। इसे समुद्री जल से बनाया जाता है।

  • रॉक Salt एक भूरे रंग की क्रिस्टल के रुप में पाया जाने वाला पदार्थ है। इसे कोयले की तरह निष्कर्षण करके प्राप्त किया जाता है।

  • एंटासिड भस्म (Base) होते हैं। ये एल्युमीनियम हाइड्रॉक्साइड, मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड, मैग्नीशियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम ट्राईसिलिकेट, कैल्शियम कार्बोनेट आदि अवयवों से मिलकर बने होते हैं। इसका उपयोग औषधि के रुप में पेट में बने ज्यादा एसिड को कम करने या उसे बनने से रोकने में किया जाता है।

  • अम्लराज या एक्वारेजिया या नाइट्रो हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल (HNO3) और  हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) का मिश्रण है। यह अत्यंत संक्षारक अम्ल है। इसे अम्लराज  या एक्वारेजिया नाम इसलिए दिया गया क्योंकि यह स्वर्ण और प्लेटिनम आदि नोबल धातुओं को  भी गला देता है। इसका उपयोग स्वर्णकारों द्वारा आभूषणों को बनाते समय किया जाता है।

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  • वाशिंग सोडा –   सोडियम कार्बोनेट

कास्टिक सोडा     –   सोडियम हाइड्रॉक्साइड

नीला थोथा       –   कॉपर सल्फेट

हाइपो            –   सोडियम थायो सल्फेट

एपसम साल्ट     –   मैग्नीशियम सल्फेट

बेकिंग सोडा       –   सोडियम बाइकार्बोनेट

  • नीला थोथा कॉपर एवं सल्फेट का एक यौगिक है। इसका सूत्र CuSO4.5H2O है।

  • अमोनिया के जलीय घोल में लाल लिटमस नीला हो जाता है। अमोनिया हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की प्रतिक्रिया से सफेद धूम्र उत्पन्न करती है।

  • वाशिंग सोडा या धोने के सोडा (सोडियम कार्बोनेट) का प्रयोग कपड़ा धोने के साबुन में होता है। इसका सूत्र Na2CO3

  • आयनिक यौगिक विद्युत अपघट्य होते हैं, जो जल में डालने पर अपने धनायन एवं ऋणायनों में टूट जाते हैं। ये कार्बनिक विलायकों मे विघटित नहीं होते हैं, क्योंकि ये  अध्रुवीय होते हैं। अतः ये एल्कोहॉल में अविलेय होते हैं। जैसे – NaCl, KCl ठोस अवस्था में आयनी यौगिकों में मुक्त या गतिशील इलेक्ट्रॉन नहीं होने की वजह से विद्युत का चालन नहीं होता है।

  • फोटोग्राफी की प्लेट पर सिल्वर ब्रोमाइड की परत चढ़ायी जाती है।

  • फोटोग्राफी में स्थायीकरण के लिए उसमें सोडियम थायोसल्फेट (हाइपो) का उपचायक की भांति उपयोग किया जाता है।

  • इनो लवण को जल में डालने पर उत्पन्न होने वाली कार्बन डाइऑक्साइड गैस बुलबुले बनाती है।

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कार्बनिक रसायन

हाइड्रोकार्बन

  • हाइड्रोकार्बन केवल कार्बन तथा हाइड्रोजन के यौगिक होते हैं। हाइड्रोकार्बन मुख्यतः कोल तथा पेट्रोलियम से प्राप्त होते हैं, जो ऊर्जा के मुख्य स्रोत हैं।

  • शैल रसायन (Petrochemicals) अनेक महत्वपूर्ण व्यावसायिक उत्पादों के निर्माण के लिए मुख्य प्रारंभिक पदार्थ हैं। घरेलू ईंधन तथा स्वचालित वाहनों के प्रमुख ऊर्जा स्रोत द्रवित पेट्रोलियम गैस, एल.पी.जी. (Liquified Petroleum Gas) तथा संपीडित प्राकृतिक गैस सी.एन.जी. (Compressed Natural Gas) हैं, जो पेट्रोलियम से प्राप्त किये जाते हैं।

  • संरचना के आधार पर हाइड्रोकार्बन को विवृत श्रृंखला संतृप्त (ऐल्केन), असंतृप्त (एल्कीन तथा एल्काइन), चक्रीय (ऐलिसाइक्लिक) तथा ऐरोमैटिक वर्गों में वर्गीकृत किया गया है।

  • हाइड्रोकार्बन का उपयोग पॉलिथीन, पॉलिप्रोपेन, पॉलिस्टाइरीन आदि बहुलकों के निर्माण मे किया जाता है। उच्च अणुभार वाले हाइड्रोकार्बनों का उपयोग पेन्ट में विलायक के रुप में और रंजक तथा औषधियों के निर्माण में प्रारंभिक पदार्थ के रुप भी किया जाता है।

  • संतृप्त हाइड्रोकार्बन में कार्बन-कार्बन तथा कार्बन-हाइड्रोकार्बन एकल आबंध होते हैं। यदि विभिन्न कार्बन परमाणु आपस में एकल आबंध से जुड़कर विवृत श्रृंखला बनाते हैं, तो उन्हें ऐल्केन कहते हैं।

  • यदि कार्बन परमाणु संवृत्त श्रृंखला या वलय का निर्माण करते हैं, तो उन्हें साइक्लोऐल्केन कहा जाता है। असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों में कार्बन-कार्बन बहुआबंध जैसे द्वीआबंध, त्रिआबंध या दोनों अपस्थित होते हैं।

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ऐल्केन

  • ऐल्केन कार्बन-कार्बन एकल आबंधयुक्त संतृप्त विवृत श्रृंखला वाले हाइड्रोकार्बन हैं। मेथेन (CH4) इस परिवार का प्रथम सदस्य है। मेथेन एक गैस है, जो कोयले की खानों तथा दलदली क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

  • वह हाइड्रोकार्बन, जिसका अणुसूत्र C2H6 है, एथेन कहलाती है।

  • ये हाइड्रोकार्बन सामान्य अवस्थाओं में निष्क्रिय होते हैं, क्योंकि ये अम्लों और अन्य अभिकर्मकों से अभिक्रिया नहीं करते। अतः प्रारंभ में इन्हें पैराफिन (Parum=कम, Affins= क्रियाशील) कहते थे।

कुछ एल्केन एवं उनके अणुसूत्र

आण्विक सूत्र

नाम

CH4

मेथेन

C2H6

एथेन

C3H8

प्रोपेन

C4H10

ब्यूटेन

C5H12

पेन्टेन

C5H12

2.मेथिलब्यूटेन

C5H12

2,2-डाइमेथिलप्रोपेन

C6H14

हेक्सेन

C7H16

हेप्टेन

C8H18

ऑक्टेन

C9H20

नोनेन

C10H22

डेकेन

C20H42

आइकोसेन

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गुणधर्म

  • एल्केन अणुओं में C-C तथा C-H आबंध के सहसंयोजक गुण तथा कार्बन एवं हाइड्रोजन परमाणुओं की विद्युत ऋणात्मकता मे बहुत कम अंतर के कारण लगभग सभी ऐल्केन अध्रुवीय होते हैं। इसके मध्य दुर्बल वान्डरवाल्स बल पाए जाते हैं। दुर्बल बलों के कारण ऐल्केन श्रेणी के प्रथम चार सदस्य C1 से C4 तक गैस, C5 से C17 तक द्रव तथा C18 या उससे अधिक कार्बन युक्त ऐल्केन 298K पर ठोस होते हैं। ये रंगहीन तथा गंधहीन होते हैं।

  • अम्ल, क्षारक, ऑक्सीकारक (ऑक्सीकरण कर्मक) एवं अपचायक (अपचयन कर्मक) पदार्थों के प्रति ऐल्केन सामान्यतः निष्क्रिय होते हैं।

ऐल्कीन (Alkens)

  • ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें एक कार्बन-कार्बन युग्म बन्ध, >C=C<, उपस्थित होता है, ओलिफिन (Olefins) या ऐल्कीन (Alkenes)  कहलाते हैं। ऐल्कीनों का सामान्य सूत्र CnH2n है। एथिलीन (एथीन), C2H4 सबसे सरल ऐल्कीन हैं।

ऐल्कीनों  सूत्र और नाम

अणु सूत्र

साधारण नाम

C2H4

एथिलीन (ethylene)

C3H6

प्रोपिलीन (propylene)

C4H8

a-ब्यूटिलीन (a-butylene)

 

एथिलीन (Ethylene)

  • एथिल ऐल्कोहॉल को सान्द्र सलफ्यूरिक अम्ल के आधिक्य के साथ 170-1800 C ताप पर गर्म करने से एथिलीन बनती है।

  • अभिक्रिया में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल निर्जलीकारक का कार्य करता है।

  • एथिलीन रंगहीन, मीठी गंध की जल में अल्प विलेय गैस है। इसे संघने से बेहोशी आ जाती है।

  • एथिलीन का अणु भार 28 है। T.P. पर इसका घनत्व 1.25 ग्राम प्रति लीटर है।

  • एथिलीन का क्वथनांक – 1050 C है।

एथिलीन के उपयोग

  • एथिलीन का उपयोग फलों को कृत्रिम विधि से पकाने में होता है।

  • एथिलीन निश्चेतक के रुप में प्रयुक्त होती है।

  • एथिलीन का उपयोग पॉलिथीन बनाने में होता है।

  • एथिलीन मस्टर्ड गैस बनाने में प्रयुक्त होती है।

  • मस्टर्ड गैस एक तेल जैसा द्रव है। इसमें सरसों जैसी गंध होती है। इसकी वाष्प चमड़ी पर फफोले डाल देती है तथा फेफड़ों और शरीर के अन्य अंगों पर घातक प्रभाव डालती है। इस गैस का उपयोग युध्द में किया जाता है।

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ऐल्काइन (Alkynes)

  • ऐलिफैटिक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें एक कार्बन-कार्बन त्रिक बन्ध (-C=C-) होता है, ऐल्काइन या ऐसिटिलीन कहलाते हैं। ऐल्काइन श्रेणी का सामान्य सूत्र (CnH2n-2) है। इस श्रेणी का प्रथम सदस्य ऐसीलिलीन (एथाइन), H-C=C-H है।

ऐसीटिलीन (Acetylene)

  • कैल्शियम कार्बाइड की जल से क्रिया कराने पर ऐसीटिलीन बनती है।

ऐसीटिलीन के गुण

  • ऐसीटिलीन रंगहीन, गंधहीन, जल में अल्प विलेय गैस (p.- 840C) है। अशुध्द ऐसीटिलीन से लहसुन जैसी गंध आती  है।

  • ऐसीटिलीन वायु से कुछ हल्की होती है।

  • संपीडित एवं द्रवित ऐसीटिलीन भयंकर विस्फोटक है।

  • ऐसीटिलीन और वायु या ऑक्सीजन के मिश्रण को प्रज्वलित करने पर अति प्रचंड विस्फोट होता है।

ऐसीटिलीन के उपयोग

  • ऐसीटिलीन को वायु में जलाने पर बहुत चमकीला चौंधाने वाला प्रकाश उत्पन्न होता है। ऐसीटिलीन ज्वाला की प्रदीपन क्षमता बहुत अधिक होने के कारण ऐसीटिलीन का उपयोग कार्बाइड लैम्पों में प्रदीपक गैसों के रुप में किया जाता है।

  • ऐसीटिलीन को शुध्द ऑक्सीजन में जलाने पर अति उच्च ताप उत्पन्न होता है। ऑक्सी-ऐसीटिलीन ज्वाला का ताप लगभग 30000 C होता है। इस गुण के कारण ऐसीटिलीन का उपयोग ऑक्सी-ऐसीटिलीन ब्लो-पाइप में धातुओं के वेल्डन और उनके काटने में किया जाता है।

  • अनुकारित आदिम भूमि परिस्थितियों (Stimulated Primitive Earth Conditions) में निम्न रसायनों के प्रादुर्भाव का सही क्रम है – मेथेन, हाइड्रोजन सायनाइड, नाइट्राइल, एमीनों अम्ल।

  • संसार के सभी जैव पदार्थ कार्बनिक यौगिकों से बने होते हैं। कार्बनिक यौगिकों में कार्बन अनिवार्यतः पाया जाता है।

  • ब्यूटेन एक ज्वलनशील हाइड्रोकार्बन है, जिसका आणविक सूत्र C4H10 होता है। इसका उपयोग सिगरेट लाइटरों में किया जाता है।

  • जीवविज्ञानी जीवन के लिए जिन छः पदार्थों को जरुरी मानते हैं, वे हैं – कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, फॉस्फोरस और सल्फर। जीवन से जुड़े सभी आधारभूत रसायन (प्रोटीन, न्यक्लिक अम्ल, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, हॉर्मोन इत्यादि) इन्हीं मूल तत्वों से बने होते  हैं।

  • प्रथम विश्वयुध्द में मस्टर्ड गैस को रासायनिक आयुध के रुप में प्रयोग किया गया था। इसका रासायनिक नाम डाइक्लोरो डाइ एथिल सल्फाइड है। यह एक जहरीली गैस है। यह खुली त्वचा पर फफोले डाल सकती है। शुध्द मस्टर्ड गैस कमरे के तापमान पर एक रंगहीन, गाढ़ा चिपचिपा द्रव है।

  • धान के खेत, कोयले की खतानें एवं घरेलू पशु वातावरण में मेथेन उत्सर्जन के मानवीय स्रोत हैं जबकि आर्द्रभूमि तथा समुद्र, मेथेन उत्सर्जन के प्राकृतिक स्रोत हैं।

  • फुलरीन कार्बन का एक उपयोगी अपररुप है। इसकी खोज वर्ष 1985 में प्रोफेसर आर.ई. स्मैली, सर हेरोल्ड डब्ल्यू. क्रोटो एवं रॉबर्ट एफ. कर्ल द्वारा की गई थी जिसके लिए इन्हें वर्ष 1996 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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ऐल्कोहॉल

  • ऐलिफैटिक हाइड्रोकार्बनों के हाइड्रॉक्सी व्युत्पन्न (जैसे CH3OH, C2H5OH आदि) ऐल्कोहॉल कहलाते हैं।

ऐल्कोहॉलों के सूत्र और नाम

ऐल्कोहॉल का सूत्र

साधारण नाम

CH3OH

मेथिल ऐल्कोहॉल

CH3CH2OH

एथिल ऐल्कोहॉल

CH3CH2CH2OH

n-प्रोपिल ऐल्कोहॉल

(CH3)2CHOH

आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल

CH3(CH2)2CH2OH

n-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल आइसोब्यूटिल ऐल्कोहॉल

(CH3CH2CH(OH)CH3

s-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल

(CH3)3COH

t-ब्यूटिल ऐल्कोहॉल

CH3(CH2)3CH2OH

n-पेन्टिल ऐल्कोहॉल या n-ऐमिल ऐल्कोहॉल

 

मेथिल ऐल्कोहॉल (मेथेनॉल या कार्बिनॉल)

  • मेथिल ऐल्कोहॉल पहले लकड़ी के भंजक आसवन द्वारा प्राप्त किया गया था, अतः उसे काष्ठज-स्प्रिट (wood spirti) या काष्ठजा-नैफ्था (Wood Naphtha) भी कहते हैं। मेथिल ऐल्कोहॉल विन्टर ग्रीन के तेल (Oil of winter green) व कुछ अन्य सुगंध तेलों (essential oils) में एस्टरों के रुप में पाया जाता है। यह विन्टर ग्रीन के तेल में मेथिल सैलिसिलेट (एस्टर) के रुप में उपस्थित होता है।

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मेथिल ऐल्कोहॉल के गुण

  • मेथिल ऐल्कोहॉल रंगहीन, ज्वलनशील (Inflammable), उदासीन द्रव है। इसका क्वथनांक 64.70C है। इसकी स्पिरिट जैसी गंध होती है।

  • मेथिल ऐल्कोहॉल बहुत विषैला होता है। इसको पीने से व्यक्ति अंधा या पागल हो जाता है और अधिक पीने से मृत्यु हो जाती है। विषैले गुण के कारम मेथिल ऐल्कोहॉल का उपयोग एथिल ऐल्कोहॉल के विकृतीकरण में किया जाता है। एथिल ऐल्कोहॉल में मेथिल ऐल्कोहॉल मिला देने से वह विषैला हो जाता है और पीने के योग्य नहीं रहता है।

  • मेथिल ऐल्कोहॉल जल में एवं अधिकांश कार्बनिक विलायकों में मिश्रणीय है।

  • मेथिल ऐल्कोहॉल निर्जल कैल्शियम क्लोराइड से संयोग करके क्रिस्टलीय यौगिक CaCl2.4CH3OH बनाता है, अतः इसे निर्जल कैल्शियम क्लोराइड द्वारा सुखाया नहीं जा सकता है।

  • मेथिल ऐल्कोहॉल, ऐल्कोहॉलों के सामान्य गुण प्रदर्शित करता है। यह वायु और ऑक्सीजन में हल्की दीप्तज्वाला के साथ जलकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाता है। इसकी वाष्प वायु या ऑक्सीजन के साथ प्रज्वलित करने पर विस्फोटक मिश्रण बनाती है।

मेथिल ऐल्कोहॉल के उपयोग

  1. पेन्ट, वार्निश, सेलूलाइड (Celluloid), चपड़ा (Shellac) आदि को घोलने के लिए विलायक के रुप में।

  2. पेट्रोल और मेथिल ऐल्कोहॉल का मिश्रण मोटर-इंजन के ईंधन के रुप में प्रयुक्त किया जाता है।

  3. रंजक (Dyes), परफ्यूम (Perfumes), औषधियां (Medicines) आदि को औद्योगिक निर्माण में।

  4. फार्मेल्डिहाइड, फार्मिक अम्ल, ऐसीटिक अम्ल, मेथिल क्लोराइड मेथिल सैलिसिलेट आदि यौगिकों के निर्माण में।

  5. मेथिल ऐल्कोहॉल का उपयोग मेथिलित स्पिरिट बनाने में होता है। मेथिल ऐल्कोहॉल युक्त एथिल ऐल्कोहॉल मेथिलित स्पिरित या विकृतीकृत स्पिरिट कहलाता है। एथिल ऐल्कोहॉल में विषैला मेथिल ऐल्कोहॉल मिला देने से वह पीने के योग्य नहीं रहता है।

  6. मेथिल ऐल्कोहॉल (40%) और जल (60%) का मिश्रण ऑटोमोबाइल्स के रेडियेटर के लिए ऐन्टिफ्रीज के रुप में प्रयुक्त किया जाता है।

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एथिल ऐल्कोहॉल (या एथेनॉल) C2H5OH

  • एथिल ऐल्कोहॉल को साधरणतः ऐल्कोहॉल कहते हैं। एथिल एल्कोहॉल कार्बनिक अम्लों के एथिल एस्टरों के रुप में फलो, वनस्पतिंयों और सुगंध तेलों में पाया जाता है। एथिल ऐल्कोहॉल सभी प्रकार की शराब (wines) का मुख्य अवयव होता है, अतः इसे स्पिरिट ऑफ वाइन भी कहते हैं। इसका निर्माण युक्त पदार्थों से किण्वन विधि द्वारा किया जाता है, अतः ग्रेन ऐल्कोहॉल भी कहलाता है।

परिशुध्द ऐल्कोहॉल (Absolute Alcohol)

  • 100 प्रतिशत एथिल ऐल्कोहॉल (निर्जल एथिल ऐल्कोहॉल) परिशुध्द ऐल्कोहॉल कहलाता है। परशुध्द ऐल्कोहॉल परिशोधित स्प्रिट के प्रभाजी आसवन द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि परिशोधित स्प्रिट का प्रभाजी आसवन करने पर एक स्थिर-क्वाथी मिश्रण बन जाता है, जिसमें 95.6 प्रतिशत एथिल ऐल्कोहॉल और 4.4 प्रतिशत जल होता है।

पावर-ऐल्कोहॉल (Power-Alcohol)

  • औद्योगिक ऐल्कोहॉल (परिशोधित स्प्रिट) बेन्जीन की उपस्थिति में पेट्रोल में मिश्रित हो जाता है। पेट्रोल, औद्योगिक ऐल्कोहॉल और बेन्जीन का मिश्रण मोटर ईंधन के रुप में प्रयुक्त किया गया है। यह मिश्रण पावर ऐल्कोहॉल कहलाता है, क्योंकि इसका उपयोग मोटर ईंधन के रुप में होता  है।

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एथिल ऐल्कोहॉल के गुण

  1. एथिल ऐल्कोहॉल रंगहीन, ज्वलनशील द्रव है। इसका क्वथनांक 78.10C है। इसकी एक विशेष गंध (ऐल्कोहॉली गंध) होती है तथा इसका स्वाद तीखा होता है ।

  2. एथिल ऐल्कोहॉल जल में तथा अधिकांश कार्बनिक विलायकों में मिश्रणीय है। यह जल के साथ एक स्थिरक्वाथी मिश्रण बनाता है जिसमें 95.6 प्रतिशत ऐल्कोहॉल और 4.4 प्रतिशत जल होता है।

  3. एथिल ऐल्कोहॉल उदासीन यौगिक है। यह जल की pH को प्रभावित नहीं करता है। य अम्ल क्षार सूचकों ( जैसे, लिटमस) के प्रति उदासीन होता है।

  4. एथिल ऐल्कोहॉल निर्जल कैल्शियम क्लोराइड के साथ क्रिस्टलीय ठोस CaCl2.3C2H5OH (ऐल्कोहॉलेट) बनाता है, अतः एथिलत ऐल्कोहॉल को निर्जल कैल्शियम क्लोराइड द्वारा शुष्क नहीं किया जा सकता।

एथिल ऐल्कोहॉल के उपयोग

  1. मेथिलित स्प्रिट बनाने में।

  2. पेन्ट, वार्निश, गोंद, सल्फर, आयोडीन आदि के विलायक के रुप में।

  3. क्लोरल, क्लोरोफार्म, आयोडोफार्म, ईथर, एथिलीन, ऐसीटेल्डिहाइड, ऐसीटिक अम्ल आदि को निर्माण में।

  4. औषधियां, टिन्चर, परफ्यूम, स्याही, वार्निश आदि के बनाने में।

  5. अन्तर्दहन इंजनों के ईंधन के रुप में (पावर ऐल्कोहॉल)

  6. कार रेडियेटरों में ऐन्टि-फ्रीज के रुप में।

  7. जैव नमूनों के परिरक्षण में।

  8. स्पिरिट-लेविल, ऐल्कोहॉल-थर्मामीटर आदि में।

  9. स्पिरिट, लैम्प, स्टोव आदि के ईंधन के रुप में।

  10. मदिरा व अन्य  ऐल्कोहॉली पेय बनाने में।

नाम

ऐल्कोहॉल-प्रतिशत

कच्चा माल

रम (Rum)

45 से 55 %

शीरा

ब्राण्डी (Brandy)

40 से 50 %

अंगूर

ह्विस्की (Whisky)

40 से 50%

जौ

बीयर (Beer)

3 से 6%

जौ

शौम्पेन (Champange)

10 से 15%

अंगूर

साइडर(Cider)

2 से 6%

सेब

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बहुलक

  • वह प्रक्रम जिसमें बड़ी संख्या में सरल अणु एक-दूसरे से संयोग करके उच्च अणु भार का एक बृहत अणु (large molecule) बनाते हैं, बहुलकीकरण (polymerisation) कहलाता है तथा इस प्रक्रम के फलस्वरुप बने उच्च अणु भार के यौगिक को बहुलक (polymer) कहते हैं। जिन सरल अणुओं के संयोजन से बहुलक बनता है, एकलक (monomers) कहलाते हैं।

  • कुछ असंतृप्त हाइड्रोकार्बनों के मुख्य बहुलक निम्नलिखित हैं –

  • पॉलिएथिलीन (पॉलीथीन) – पॉलीथीन (polythene) एथिलीन का उच्च बहुलक है।

  • पॉलिएथिलीन ताप-सुनम्य प्लास्टिक (thermoplastic) है। यह विद्युत अचालक, नम्य व जल प्रतिरोधी है। इसका उपयोग पैकिंग के लिए तथा जल से बचाव के लिए फिल्में व शीटें बनाने में किया जाता है।

  • टेफ्लॉन (पॉलीटेट्राफ्लुओरो एथिलीन, PTFE)- टेफ्लॉन (Teflon) या PTFE टेट्राफ्लुरओरो एथिलीन का उच्च बहुलक है।

  • टेफ्लॉन रासायनिक रुप से निष्क्रिय एवं ऊष्मा प्रतिरोधी बहुलक है। इसका गलनांक 3300 C है। टेफ्लॉन पर सान्द्र नाइट्रिक अम्ल, सल्फ्यूरिक अम्ल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, ऐक्वारेजिया, सान्द्र सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन आदि का उच्च ताप पर भी कोई प्रभाव नहीं होता है। टेफ्लान का उपयोग सान्द्र अम्लों व दाहक द्रव्यों के भरने की केन बनाने तथा उष्मा व रासायनिक पदार्थों के प्रति स्थायी वस्तुयें जैसे –  गैस-कट (gaskets), सील आदि बनाने में होता है। इसका उपयोग इन्सूलेटिंग पदार्थ के रुप में भी होता है। टेफ्लॉन का पृष्ठ बहुत चिकना होता है। उससे कोई वस्तु चिपकती नहीं है।  इस गुण के कारण कुकिंग के बर्तनों पर टेफ्लान का लेप किया जाता है।

  • पॉलीवाइनिल क्लोराइड (पी.वी.सी.) – पी.वी.सी. (V.C.) वाइनिल क्लोराइड का उच्च बहुलक है।

  • पॉलीवाइनिल क्लोराइड विद्युत अचालक, नम्य व जल प्रतिरोधी है। इसका उपयोग प्लास्टिक के पाइप, ग्रामोफोन रेकार्ड, हैण्ड बैग, रेन कोट, जलरोधी पर्दे व अन्य वाटर प्रूफ वस्तुएं, चप्पलें, खिलौने, डिब्बे, बाल्टियां आदि अनेक वस्तुओं के बनाने में होता  है।

  • नीओप्रीन (पॉलीक्लोरोप्रीन) – नीओप्रीन (Neoprene) क्लोरोप्रीन का उच्च बहुलक है। यह एक प्रकार का कृत्रिम रबर है। इसका उपयोग पाइप बैल्ट आदि के बनाने में होता है।

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कार्बनिक अम्ल

  • कार्बनिक यौगिक जिनमें कार्बोक्सिल समूह क्रियात्मक समूह के रुप में उपस्थित होता है, कार्बोक्सिलिक अम्ल (एसिड) कहलाते हैं। कार्बोक्सिलिक अम्लों कों हाइड्रोकार्बनों का कार्बोक्सिलिक व्युत्पन्न मान सकते हैं, जैसे CH4 (मेथेन) अणु से एक हाइड्रोजन परमाणु को कार्बोक्सिल समूह (-COOH) द्वारा विस्थापित करके CH3COOH (ऐसीटिक अम्ल) व्युत्पन्न किया जा सकता है। अम्ल के अणु में कार्बोक्सिल समूहों की संख्या 1, 2 या 3 होने के अनुसार अम्ल मोनोकार्बोक्सिलिक , डाइकार्बोक्सिलिक या ट्राइकार्बोक्सिलिक अम्ल कहलाते हैं।

संतृप्त मोनोकार्बोक्सिलिक अम्ल (वसा अम्ल)

(Saturated Monocarboxylic Acids or Fatty Acids)

  • मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों के अणु में एक कार्बोक्सिलिक समूह उपस्थित होता है। ऐलिफैटिक संतृप्त मोनोकार्बोक्सिलिक अम्ल RCOOH, प्रायः वसा अम्ल कहलाते हैं, क्योंकि इस श्रेणी के उच्च सदस्य, जैसे पामिटिक अम्ल (C15H31COOH), स्टिऐरिक अम्ल (C12H35COOH) आदि, सर्वप्रथम वसा से प्राप्त किए गए थे।

  • फॉर्मिक अम्ल (HCOOH) सबसे सरल मोनोकार्बोक्सिलिक अम्ल है।

  • फॉर्मिक अम्ल सर्वप्रथम चींटियों (formica=ants) से, आसवन द्वारा प्राप्त किया था, अतः उसका नाम फॉर्मिक अम्ल पड़ा। ऐसीटिक अम्ल सिरके (Latin, aceto=vinegar) का मुख्य अवयव होता है, अतः उसका नाम ऐसीटिक अम्ल रखा गया था।

 

संतृप्त मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों के सूत्र और नाम

अम्ल का सूत्र

साधारण नाम

आई.यू.पी.ए.सी. नाम

HCOOH

फॉर्मिक अम्ल

मेथेनोइक अम्ल (methanoic acid)

CH3COOH

ऐसीटिक अम्ल

एथेनोइक अम्ल (ethanoic acid)

CH3CH2COOH

प्रोपिऑनिक अम्ल

प्रोपेनोइक अम्ल (propanoic acid)

CH3CH2CH2COOH

ब्यूटिरिक अम्ल

ब्यूटेनोइक अम्ल (butanoic acid)

(CH3)2CHCOOH

आइसोब्यूटिरिक अम्ल

2- मेथिलप्रोपेनोइक अम्ल (2-methylpropanoic acid)

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  • भौतिक गुणः मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों (वास अम्लों) की श्रेणी के प्रथम तीन सदस्य फॉर्मिक, ऐसीटिक और प्रोपिओनिक अम्ल तीखी गन्ध के रंगहीन द्रव हैं। ब्यूटीरिक अम्ल (C3H7COOH) से नोनोइक अम्ल तक के वसा अम्ल तेल जैसे द्रव हैं,  जिनमें दुर्गन्धी मक्खन जैसी गन्ध आती है। डेकेनोइक अम्ल से उच्च सदस्य गन्धहीन ठोस हैं।

  • मोनोकार्बोक्सिलिक अम्ल नीले लिटमस को लाल करते हैं।

फॉर्मिक अम्ल (मेथोनोइक अम्ल)

  • फॉर्मिक अम्ल संतृप्त मोनोकार्बोक्सिलिक अम्लों की श्रेणी का प्रथम सदस्य है। यह लाल चींटियों में तथा मधुमक्खी, बर्रे, बिच्छू बूटी आदि के डंक में तथा कुछ अन्य जीवों में पाया जाता है। चींटी, मधुमक्खी या बर्र आदि के काटने या डंक मारने पर शरीर में खुजली, ज लन व चिड़चिड़ापन मुख्य रुप से फॉर्मिक अम्ल की उपस्थिति के कारण होती है।

फॉर्मिक अम्ल के गुण

  • भौतिक गुणः फॉर्मिक अम्ल तीखी गन्ध का एक रंगहीन द्रव है। इसका गलनांक 8.40 C और क्वथनांक 100.50 C है। यह एक संक्षारक द्रव है। यह त्वचा पर फफोले डाल देता है। यह जल, ऐल्कोहॉल और ईथर में पूर्ण रुप से मिश्रणीय हैं।

ऐसीटिक अम्ल (एथेनोइक अम्ल) CH3COOH

(ACETIC ACID or ETHANOIC ACID)

  • कार्बनिक अम्लों में ऐसीटिक अम्ल प्रमुख है। ऐसीटिक अम्ल सिरके का मुख्य अवयव होता है और इसीलिए यह अम्ल ऐसीटिक अम्ल कहलाता है। सिरके का खट्टा स्वाद ऐसीटिक अम्ल की उपस्थिति के कारण होता है। ऐसीटिक अम्ल वाष्पशील एस्टरों के रुप में कई वनस्पतियों के सुगन्ध तेलों में पाया जाता है।

ऐसीटिक अम्ल के गुण

  • निर्जल ऐसीटिक अम्ल तीखी गंध का रंगहीन द्रव है। इसका क्वथनांक 1180 C है। यह ठंडा करने पर बर्फ जैसे क्रिस्टलीय ठोस (p. 16.60 C) में जम जाता है, अतः इसे ग्लैशल ऐसीटिक अम्ल भी कहते हैं। यह एक संक्षारक द्रव है। यह जल, ऐल्कोहॉल और ईथर में पूर्ण रुप में मिश्रणीय है।

ऐसीटिक अम्ल के गुण

डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल (Dicarboxylic Acids)

  • डाइकार्बोक्सिलिक अम्लों में दो कार्बोक्सिल समूह (-COOH) उपस्थित होते हैं। ऑक्सेलिक अम्ल सबसे सरल संतृप्त डाइकार्बोक्सिलिक अम्ल हैं।

  • लम्बे समय तक कठोर शारीरिक कार्य के पश्चात मांसपेशियों में लैक्टिक अम्ल के संचय हो जाने के कारण शरीर में थकान का अनुभव होता है।

  • अचार –   एसीटिक अम्ल

खट्टा दूध    –   लैक्टिक अम्ल

सेब         –   मैलिक अम्ल

शीतल पेय एवं सोडा वाटर   –   कार्बोनिल अम्ल

  • अंगूर, इमली तथा केला में प्रचुर मात्रा में टारटेरिक अम्ल विद्यमान होता है। यह अम्लता नियामक और खाद्य पदार्थों में एंटीऑक्सींडेंट के रुप में  उपयोग किया जाता है।

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विस्फोटक पदार्थ

विस्फोटक (Explosives)

  • वे पदार्थ जो ताप, घर्षण या उचित प्रहार के फलस्वरुप अपघटित होकर प्रकाश, ध्वनि तथा अत्यंत तेजी से फैलने वाली गैसों को उत्पन्न कर तीव्र विस्फोट उत्पन्न करते हैं, विस्फोटक कहलाते हैं। एक अच्छे विस्फोटक पदार्थ में निम्न गुण होते हैं –

  1. विस्फोटक पदार्थ वाष्पशील नहीं होने चाहिए।

  2. यह आर्द्रताग्राही नहीं होना चाहिए।

  3. यह सस्ता तथा स्थायी होना चाहिए।

  4. यह तीव्र विघटित होना चाहिए।

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कुछ विस्फोटक निम्न हैं  –

  • ट्राइनाइट्रो टॉलुईन (Trinitrotoluene: TNT) : इसे टॉलूईन पर सांद्र नाइट्रिक अम्ल व साद्र सल्फ्यूरिक अम्ल की अभिक्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है। यह हल्का पीला क्रिस्टलीय ठोस है। यह अत्यंत उच्चकोटि का विस्फोट है। TNT का उपयोग बम तथा तारपिंडो को बनाने में करते हैं। इसका उपयोग अमोनियम नाइट्रेट के साथ मिलाकर ऐमेटॉल विस्फोटक बनाने में करते हैं।

  • ट्राइनाइट्रो ग्लिसरीन (Trinitroglycerine: TNG) : यह एक रंगहीन तैलीय द्रव है। इसे नोबल तेल भी कहा जाता है। यह ग्लिसरीन पर सान्द्र नाइट्रिक अम्ल एवं सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल की अभिक्रिया द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसकी सहायता से डायनामाइट जैसे महत्वपूर्ण विस्फोटक बनाए जाते हैं। यह स्वयं भी एक महत्वपूर्ण विस्फोटक है।

  • ट्राइनाइट्रो फीनॉल (Trinitrophenol: TNP): इसे पिक्रिक अम्ल भी कहा जाता है। यह फीनॉल व सांद्र नाइट्रिक अम्ल की अभिक्रिया द्वारा बनाया जाता है। यह हल्का पीला, क्रिस्टलीय ठोस होता है। यह भी एक प्रचण्ड विस्फोटक है।

  • डायनामाइट (Dynamite): इसका आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल ने 1860 के दशक में किया था। इसे अक्रिय पदार्थ जैसे – लकड़ी के बुरादे या कीजेलगूर ने नाइट्रोग्लिसरीन को अवशोषित कराकर प्राप्त किया जाता है। इसका प्रयोग कुएं खोदने, सड़क  बनाने, बांध बनाने, सुरंग बनाने, चट्टानें तोड़ने आदि के लिए होता है। आधुनिक डायनामाइट में नाइट्रोग्लिसरीन के स्थान पर सोडियम नाइट्रेट का प्रयोग किया जाता है।

  • ब्लास्टिंग जिलेटिन (Blasting Gelatin): यह 7% नाइट्रोसेलुलोस तथा 93% नाइट्रोग्लिसरीन का मिश्रण है। इसका प्रयोग खान खोदने व सुरंग बनाने में किया जाता है।

  • आर डी एक्स (RDX): इसका रासायनिक नाम साइक्लोनाइट या साइक्लो ट्राइमेथिलीन ट्राइनाइट्रेमीन है। इसमें प्लास्टिक पदार्थ, जैसे – पॉलीब्यूटाइन, एक्रिलिक अम्ल या पॉलीयूरेथेन को मिलाकर प्लास्टिक बाण्डेड विस्फोटक बनाया जाता है। यह एक प्रचण्ड विस्फोटक है। इसके तापमान व आग फैलाने की गति को बढ़ाने के लिए इसमें एल्यूमीनियम चूर्ण मिलाया जाता है। इसकी विस्फोटक ऊष्मा 1510 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम होती है।

  • इस विस्फोटक को जर्मनी में हेक्सोजन, इट्ली में टी-4 तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में साइक्लोनाइट के नाम से जाना जाता है। इसके एक रुप को सी-4 भी कहते हैं।

  • गन कॉटन (Gun Cotton): रुई या लकड़ी के रेशों पर सांन्द्र नाइट्रिक अम्ल की अभिक्रिया द्वारा नाइट्रोसेलूलोस (गन-कॉटन) प्राप्त होता है, जो एक महत्वपूर्ण विस्फोटक पदार्थ है।

  • खानों में सामान्यतः कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, मेथेन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन आदि गैंसे पाई जाती हैं। इन्हीं में वायु की मात्रा मिश्रित होकर विस्फोट का कारण बनती है।

  • नाइट्रो क्लोरोफार्म का प्रयोग निश्चेतक के रुप में ऑपरेशन के पूर्व मरीज को बेहोश करने में किया जाता है।

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ईंधन

  • घरेलू और औद्योगिक उपयोगों से संबंधित ऊष्मा ऊर्जा के प्रमुख स्रोत लकड़ी, काष्ठ-कोयला, पेट्रोल, मिट्टी का तेल आदि हैं। ये पदार्थ ईंधन कहलाते हैं। अच्छा ईंधन वह है जो सहज उपलब्ध हो जाता है। यह सस्ता होता है और वायु में सामान्य दर से सुगमतापूर्वक जलता है। यह अधिक मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न करता है। यह जलने के उपरांत कोई अवांछनीय पदार्थ नहीं छोड़ता।

  • संभवतः ऐसा कोई भी ईंधन नहीं है जिसे एक आदर्श ईंधन माना जा सके।

ईंधन दक्षता

  • किसी ईंधन के 1 किलोग्राम के पूर्ण दहन से प्राप्त ऊष्मा की मात्रा, उसका उष्मीय मान कहलाती है। ईंधन के ऊष्मीय मान को किलोजूल प्रति किलोग्राम (kJ/kg) मात्रक द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

विभिन्न ईंधनों के ऊष्मीय मान

ईंधन

ऊष्मीय मान (kJ/kg)

गोबर के उपले

6000-8000

लकड़ी

17000-22000

कोयला

25000-33000

पेट्रोल

45000

मिट्टी का तेल

45000

डीजल

45000

मेथेन

50000

सीएनजी

50000

एलपीजी

55000

जैव गैस

35000-40000

हाइड्रोजन

150000

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  • ईंधन का बढ़ता हुआ उपभोग पर्य़ावरण पर हानिकारक प्रभाव डालता है –

  1. लकड़ी, कोयले और पेट्रोल जैसे कार्बन ईंधन, बिना जले कार्बन कण छोड़ते हैं। यह सूक्ष्म कण खतरनाक प्रदूषक होते हैं, जो दमा जैसे श्वास रोग उत्पन्न करते हैं।

  2. इन ईंधनों का महत्वपूर्ण दहन, कार्बन मोनोऑक्साइड गैस देता है। यह अत्यंत विषैली गैस है। बंद कमरे में कोयला जलाना खतरनाक होता है। उत्पन्न कार्बन मोनोक्साइड गैस से कमरे में सो रहे व्यक्तियों की मृत्यु भी हो सकती है।

  3. अधिकांश ईंधनों के दहन से पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलती है। वायु में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की अधिक मात्रा संभवतः विश्व ऊष्णन (ग्लोबल वार्मिंग) का कारण बनती है।

  4. कोयले और डीजल के दहन से सल्फर डाइऑक्साइड गैस निकलती है। यह अत्यंत दमाघोंटू और संक्षारक गैस है। इसके अतिरिक्त पेट्रोल इंजन नाइट्रोजन के गैसीय ऑक्साइड छोड़ते हैं। सल्फर और नाइट्रोजन के ऑक्साइड वर्षा जल में घुल जाते हैं तथा अम्ल बनाते हैं। ऐसी वर्षा अम्ल वर्षा कहलाती है जो फसलों, भवनों और मृदा के लिए बहुत हानिकारक होती है। मोट वाहनों में ईंधन के रुप में डीजल और पेट्रोल का स्थान अब सीएनजी (संपीडित प्राकृतिक गैस) ले रही है क्योंकि सीएनजी सल्फर और नाइट्रोजन के ऑक्साइडों का उत्पादन अल्प मात्रा में करती है। सीएनजी एक अधिक स्वच्छ ईंधन है।

जीवाश्म ईंधन

  • कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैसों जैसे कुछ समाप्त होने वाले प्राकृतिक संसाधनों का निर्माण सजीव प्राणियों के मृत अवशेषों (जीवाश्मों) से होता है। अतः इन्हें जीवाश्मी ईंधन कहते हैं।

कोयला

  • कोयले में मुख्य रुप से कार्बन होता है। मृत वनस्पति के, धीमे प्रक्रम द्वारा कोयले में परिवर्तन को कार्बनीकरण कहते हैं। क्योंकि यह वनस्पति के अवशेषों से बना है, अतः कोयले को जीवाश्म ईंधन भी कहते हैं।

  • वायु में गर्म करने पर कोयला जलता है और मुख्य रुप से कार्बन डाइऑक्साइड गैस उत्पन्न करता है।

  • उद्योग में कोयले के प्रक्रमण द्वार कुछ उपयोगी उत्पाद प्राप्त किए जाते हैं, जैसे – कोक, कोलतार और कोयला-गैस।

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कोक

  • यह एक कठोर, सरंध्र और काला पदार्थ है। यह कार्बन का लगभग शुध्द रुप है। कोक का उपयोग इस्पात के औद्योगिक निर्माण और बहुत से धातुओं के निष्कर्षण में किया जाता है।

कोलतार

  • यह एक अप्रिय गंध वाला गाढ़ा द्रव होता है। यह लगभग 200 पदार्थों का मिश्रण होता है। कोलतार से प्राप्त उत्पादों का उपयोग प्रारंभिक पदार्थों के रुप में दैनिक जीवन में काम आने वाले विभिन्न पदार्थों के औद्योगिक निर्माण में तथा उद्योगों, जैसे – संश्लेषित रंग, औषधि, विस्फोटक, सुगंध, प्लास्टिक, पेंट, फोटोग्रैफिक सामग्री, छत-निर्माण सामग्री आदि में होता है।

कोयला-गैस

  • कोयले के प्रक्रमण द्वारा कोक बनाते समय कोयला-गैस प्राप्त होती है। यह कोयला प्रक्रमण संयंत्रों के निकट स्थापित बहुत से उद्योगों में ईंधन के रुप में उपयोग की जाती है।

  • कोयला ठोस जीवश्मी ईंधन है एवं प्राथमिक रुप से कार्बन की अवसादी चट्टानों से बना होता है। कोयले का चार मूलभूत श्रेणियां हैं –

  1. पीट कोयला

  2. लिग्नाइट (भूरा कोयला)

  3. बिटूमिनस (सॉफ्ट कोयला)

  4. एन्थ्रासाइट (कठोर कोयला)

  • पीट कोयले में पानी की मात्रा अधिक होती है, इसलिए निम्न-श्रेणी का ईंधन बन जाता है।

  • तलछटों के भार द्वारा पीट संपीडित होकर सहस्त्रों वर्षों के बाद लिग्नाइट (भूरा कोयला) में परिवर्तित हो जाता है।

  • पीट की तुलना में लिग्नाइट में कार्बन का प्रतिशत अधिक होता है। पृथ्वी से लगातार दबाव एवं ऊष्मा के मिलने से लिग्नाइट बिटूमिनस-मृदु कोयले में बदल जाता है। यदि दाब एवं ऊष्मा पर्याप्त मात्रा में मिले तो एन्थ्रासाइट कोयला (कठोर कोयला) निर्मित होगा, जिसमें अत्यधिक ऊष्मा एवं कार्बन तत्व पाया जाता है। ऊष्मा की मात्रा की आधार पर एन्थ्रेसाइट कोयले में सर्वाधिक ऊष्मा एवं लिग्नाइट से सबसे कम ऊष्मा होती है। कोयले में सल्फर की मात्रा भी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि कम सल्फर की मात्रा वाले कोयले को जलाने से कम सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) उत्सर्जित होती है, इसलिए यह विद्युत संयंत्रों में ईंधन के लिए सबसे अधिक वांछनीय (उपयुक्त) ईंधन है।

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पेट्रोलियम

  • पेट्रोलियम या कच्चा तेल (ऐसा तेल जो जमीन से निकलता है) एक गाढ़ा गहरे रंग का तरल होता है जिसमें हजारों दहनकारी हाइड्रोकार्बनों के मिश्रण के साथ-साथ थोड़ी मात्रा में सल्फर, ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन की अशुध्दियां मिली रहती है। इस तेल को पारम्परिक तेल या हल्के तेल के नाम से भी जाना जाता है। कच्चे तेल एवं प्राकृतिक गैस के भंडार अक्सर समुद्र की तली (समुद्री अधस्थल) के नीचे या भूमि पर पृथ्वी की पर्पटी पर एक साथ पाए जाते हैं। इसके निष्कर्षण के बाद कच्चे तेल को पाइप लाइनों, ट्रकों या जहाजों (तेल टैंकरो) के द्वारा रिफाइनरी में भेज दिया जाता है। रिफाइनरियों में तेल को गर्म करते हैं एवं उसको उसके विभिन्न घटकों में पृथक करने के लिए विभिन्न क्वथनांक बिंदुओं पर आसवित करते हैं। इसके महत्वपूर्ण घट हैं – गैस, गोसोलीन,  हवाई जहाज में काम आने वाला ईंधन, केरोसीन, डीजल तेल, नेफ्था, ग्रीस एवं मोम एवं एस्फाल्ट। तेल के आसवन से प्राप्त कुछ उत्पादों को पेट्रो-रसायन कहते हैं, जिससे पीड़कनाशकों, प्लास्टिक, कृत्रिम रेशों, पेन्ट एवं औषधियां बनाने के लिए कच्चे माल के रुप में उपयोग किया जाता है।

प्राकृतिक गैस (Natural Gas)

  • प्राकृतिक गैस गैसीय हाइड्रोकार्बनों एवं अन्य गैसों का मिश्रण है, जो प्रायः पेट्रोलियम के साथ तेल-कूपों से निकलती है। पृथ्वी पर कुछ क्षेत्रों में प्राकृतिक गैस, प्राकृतिक दरारों से या अप्रवेश्य चट्टानों मे छेद करने पर उच्च दाब के साथ निकलती है। प्राकृतिक गैस में साधारणतः गैसीय हाइड्रकार्बनों में मेथेन, एथेन, प्रोपेन और ब्यूटेन होती है तथा अन्य गैसों मे नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड होती हैं। कुछ क्षेत्रों की प्राकृतिक गैसों में हीलियम भी होती है। प्राकृतिक गैस का  उपयोग ईंधन के रुप में तथा लैम्पब्लैक, हाइड्रोजन, गैसोलीन व कार्बनिक यौगिकों के निर्माण में होता है।

  • प्रायः प्राकृतिक गैस से प्रोपेन और ब्यूटेनों को पृथक करके उन्हें उच्च दाप पर द्रवित करते हैं और द्रव मिश्रण को स्टील के सिलिंडरों में रखते हैं। यह द्रव मिश्रण LPG (Liquified Petroleum Gas) कहलाता है। दाब हटाने पर यह द्रव पुनः गैसीय अवस्था में बदल जाता है। LPG का उपयोग प्रायः घरों में तथा होटलों में ईंधन के रुप में किया जाता है।

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  • ऑक्टेन संख्या से पेट्रोल के प्रत्यापस्फोटन गुण का पता लगता है।

  • बायोगैस संयंत्र से उत्पादित बायोगैस का मुख्य घटक मेथेन गैस होती है जिसे जीवाश्म ईंधन के स्थान पर ऊर्जा उत्पादन के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है।

  • भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिक डॉ. एस. वी. देसाई ने वर्ष 1941-42 में गोबर गैस प्रणाली का आविष्कार किया था।

  • सीएनजी –   मेथेन, इथेन

एलपीजी         –   ब्यूटेन, प्रोपेन

कोल गैस        –   हाइड्रोजन, मेथेन, कार्बन मोनोक्साइड

वाटर गैस       –   कार्बन मोनोक्साइड, हाइड्रोजन

खाद्य संरक्षण, पोषण, औषधि आदि

खाद्य संरक्षण

  • वह प्रक्रिया जिसके द्वारा भोजन की छोटी या लंबी समयावधि के लिए खराब होने से सुरक्षा प्रदान की जाती है। इसके द्वारा भोजन के रंग, स्वाद तथा पोषक तत्वों को भी यथासंभव संरक्षित रखा जाता है।

खाद्य संरक्षण के सिध्दांत

  • भोजन संरक्षण के सिध्दांत निम्नवत हैं –

  1. सूक्ष्म-जीवाणुओं को नष्ट करना।

  2. सूक्ष्म-जीवाणुओं की अभिक्रिया को रोकना या उसमें विलंब उत्पन्न करना।

  3. एंजाइमों की अभिक्रिया को रोकना।

  • दूध को उबाल कर उसके सूक्ष्म-जीवाणुओं को नष्ट किया जाता है। कई बार केवल अल्प अवधि के लिए ताप देकर उन सूक्ष्म-जीवाणुओं को नष्ट किया जाता है, जो उस खाद्य पदार्थ को खराब कर सकते हैं। डिब्बा बंद करने की प्रक्रिया में डिब्बे के अंदर डाले जाने वाले भोज्य पदार्थ को उच्च तापमान में गर्म किया जाता है ताकि उसमें सूक्ष्म जीवाणु विकसित न हो।

  • छिला हुआ सेब छिलका युक्त सेब की तुलना में जल्दी खराब होता है। ऐसा इसलिए होता  है, क्योंकि सेब का छिलका उसका सुरक्षा आवरण है, जो सूक्ष्म-जीवाणुओं को सेब के भीतर प्रवेश करने से बचाता है। इसी प्रकार अखरोट तथा अंडो के छिलके, फलों और सब्जियों के छिलके सुरक्षा आवरण का काम करते हैं और ये सूक्ष्म-जीवाणुओं की अभिक्रिया में विलंब  उत्पन्न करते हैं।

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  • तापमान को कम करने या भोजन को जमाने के द्वारा भी सूक्ष्म-जीवाणुओं की अभिक्रिया को लंबित किया जा सकता है और इससे भोजन का संरक्षण संभव हो पाता है। जमा हुआ भोजन ताजे भोजन की तुलना में अधिक समय तक खाने योग्य रह सकता है। यह इसलिए क्योंकि सूक्ष्म-जीवाणु कम तापमान पर अभिक्रिया नहीं कर पाते हैं। कुछ रसायन जैसे सोडियम बेंजोइट तथा पोटैशियम मेटाबाइसल्फर भी सूक्ष्म-जीवाणुओं के विकास को रोकने में सहायक होते हैं। इन रसायनों को परिरक्षक कहते हैं।

  • एंजाइमों के कारण भी भोजन खराब होता है। ये भोजन में प्राकृतिक रुप से विद्यमान होते हैं। एक कच्चे केले को कुछ दिनों के लिए रखने पर केला पक जाएगा और पीला हो जाएगा और फिर सड़ने लगेगा। यह सब एंजाइमों के कारण होता है। यदि एंजाइमों की अभिक्रिया को रोक दिया जाए तो खाद्य पदार्थ सड़ने से बच जाएगा।

औषधियां

  • रासायनिक पदार्थ जिनका प्रयोग रोगो के निदान, दर्द निवारण आदि में प्रयोग किय जाता है, औषधियां (Medicines or drugs) कहलाती हैं।

  • रसायन (औषध) को चिकित्सा विज्ञान में उनकी क्रिया के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

  1. ज्वारनाशक (Antipyretics) – वह रासायनिक पदार्थ जिसका प्रयोग उच्च ज्वर (Fever) में ताप कम करने के लिए किया जाता है, ज्वरनाशक कहलाता है। उदाहरण – ऐस्प्रिन (ऐसीटिल सैलिसिलिक अम्ल), पैरासीटामोल तथा फिनऐसीटिन।

  2. पीड़ाहारी या दर्दनाशक (Analgesics) – औषध जो बिना बेहोशी, मनसिक उलझन या अन्य तंत्रिकीय कुप्रभाव के दर्द को कम करती है, दर्दनाशक कहलाती है। इन्हें दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है –

  3. अनिद्राकारी औषध

  4. निद्राकारी औषध

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  • अनिद्राकारी दर्दनाशक (Non-Narcotic Analgesics) – ऐस्प्रिन (  2-ऐसीटॉक्सी बेन्जोइक अम्ल) तथा पैरासीटामोल (2-ऐसीटामिडोफीनॉल) अति लोकप्रिय अनिद्राकारी दर्दनाशक है।

  • निद्राकारी पीड़ाहारी (Narcotic Analgesics) – औषध जो जब सूक्ष्म मात्रा में प्रविष्ट करायी जाती है तथा दर्द कम करती है तथा निद्रा उत्पन्न करती है, निद्राकारी कहलाती है, जबकि अधिक मात्रा में वह आलसीपन (Laxiness), कोमा (Coma) तथा मृत्युकारक हो सकती है।

  • निद्राकारी पीड़ानाशक मुख्यतः अफीम (Opium) उत्पाद जैसे  – मार्फीन, कोकीन तथा हेरोइन होते हैं तथा ये आदत निर्माणक (Habit Forming) होते हैं। यह निद्राकारी ओषिएट (Opiates) कहलाते हैं, क्योकि ये अफीम से प्राप्त होते हैं।

  • पूतिरोधी (Antiseptic) – वे रसायन जो सूक्ष्म जीवों को मारते हैं या उनकी वृध्दि को रोकते हैं, पूरतिरोधी कहलाते हैं। पूतिरोधी जीवित ऊतकों को हानि नहीं पहुंचाते हैं तथा इनका प्रयोग कटने तथा घावों पर किया जाता है। पूतिरोधियों के सामान्य उदाहरण मरक्यूरोक्रोम, योरिक अम्ल, आयोडोफॉर्म, पोटैशियम परमैंगनेट आदि हैं।

विसंक्रामक (Disinfectants) – वे रसायन जो जीवाणुओं या सूक्ष्म-जीवों को शीघ्रता से नष्ट कर देते हैं, विसंक्रामक कलहलाते हैं। इनका  प्रयोग उपकरणों, बर्तनों, फर्श, सेनेटरी फिटिंग आदि के विसंक्रमण में किया जाता है। यह जीवित ऊतकों के लिए हानिप्रद होते हैं तथा त्वचा पर प्रयुक्त नहीं किए जाते हैं। उदाहरण – फीनॉल, मेथिल फीनॉल, हाइड्रोजन परॉक्साइड, क्लोरीन, ब्लीचिंग पॉउडर, सल्फर डाइऑक्साइड आदि।

प्रशांतक (Tranquillizer) – वे रसायन जिनका प्रयोग मानसिक तनाव कम करने तथा अवसाद दूर करने में किया जाता है, प्रशांतक कहलाते हैं। ये औषध केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र पर कार्य करते हैं तथा उन मरीजों को दिए जाते हैं जिनमें  अतितनाव (Hypertension), अवसादित तथा हिंसक गुण होते हैं। रेजरपाइन (Reserpine)  एक प्रबल प्रशांतक है, जिसे राउवोल्फिया सर्पेन्टाइना (Rauwolfia Serpentina) पौधे से पृथक किया जाता है। बार्बिट्यूरिक अम्ल तथा इसके व्युत्पन्न जैसे ल्यूमिनल, सेकोनल आदि अन्य प्रशांतक औषध हैं।

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प्रतिजैविक (Antibiotics) – प्रतिजैविक वे रसायनिक पदार्थ होते हैं, जो जीवित कोशिकाओं से प्राप्त या निर्मित होते हैं तथा सूक्ष्म-जीवों की जीवन प्रक्रियाओं को बाधित करते हैं तथा उन्हें नष्ट कर देते हैं। प्रथम प्रतिजैविक पेनिसिलीन की खोज एलेक्जेण्डर फ्लेमिंग (Alexander Flemming) ने वर्ष 1929 में कवक पेनिसिलियम नोटेटम (Penicilium Notatum) से की थी।

सल्फा ड्रग्स (Sulpha Drugs) – औषधों का वह समूह जो कि सल्फैनिलामाइड से व्युत्पन्न होते हैं, सल्फा ड्रग्स कहलाते हैं।

सल्फाडाइजीन – यह सबसे अधिक प्रयोग की जाने वाली सल्फ ड्रग है। यह लगभग सभी प्रकार के कॉक्सस (Coccus) संक्रमणों में प्रभावकारी है। इसका प्रयोग पेचिस, मूत्र व श्वसन संक्रमणों के उपचार हेतु किया जाता है।

बेहोशीकारक (Anaesthetics) – वे औषध जो सभी प्रकार की कोशिकाओं प्रमुखतः तंत्रिका तंत्र  के जैव  कार्यों के प्रति अचेतना उत्पन्न करते हैं, बेहोशीकारक कहलाते हैं। बेहोशीकारकों का प्रभाव उत्क्रमणीय होता है अर्थात प्रभावित अंग बेहोशीकारक की सान्द्रता के कम हो जाने पर शीघ्र ही सामान्य अवस्था में आ जाते हैं।

खाद्य परिरक्षक (Food Preservatives) – ये वे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जिनका प्रयोग भोजन की रक्षा जीवाणुओं, यीस्ट तथा कवक से करने में किया जाता है। कुछ सामान्य प्रयुक्त खाद्य परिरक्षक निम्नलिखित हैं –

  1. सोडियम मेटा बाइसल्फाइड (Sodium Meta Bisulphide, Na2S2O5)इसका प्रयोग जेम, सॉस तथा अचारों के परिरक्षण में किया जाता है।

  2. सोडियम बेन्जोएट (Sodium Benzoate) – यह सर्वाधिक प्रयुक्त परिरक्षक है जिसका प्रयोग मृदु पेय तथा अम्लीय भोजन अचार में किया जाता है।

  3. सॉर्बिक अम्ल तथा इसके लवण (Sorbic Acid and its Salts) –  सोडियम तथा पोटैशियम सॉबेट का अत्यधिक प्रयोग कुछ भोज्य पदार्थों में यीस्ट तथा फंफूदी की वृध्दि को रोकने के लिए किया जाता है। जैसे – चीज, पका खाना, अचार तथा कुछ मांस एवं मछली उत्पाद।

  4. एपोक्साइड (Epoxides) – एथिलीन तथा प्रोपिलीन एपोक्साइड कम नमी युक्त खाद्य पदार्थों के लिए बहुत बढ़िया परिरक्षक हैं तथा शुष्क फल, मसालों आदि के परिरक्षण में काम आते हैं।

  • एनीमल चारकोल (जन्तु चारकोल) का उपयोग कार्बनिक पादार्थों के विरंजन में किया जाता है। कच्ची चीनी को रंगविहीन करने में प्रयुक्त होता है ।

  • एस्पिरिन पेड़ के लैटेक्स से प्राप्त होता है, जो एण्टीपायरेटिक के रुप में ज्वर होने पर दी जाती  है, यह वेदना निवारक का भी कार्य करती है। एस्पिरिन को एसिटिल सैलिसिलक एसिड के नाम से भी जाना जाता है।

  • शहद के प्रमुख घटको में फ्रक्टोज – 38.2%, ग्लूकोज –31.3%, सुक्रोज – 1.3%, माल्टोज – 7.1% तथा जल – 17.2% शामिल हैं।

  • पोटैशियम ब्रोमाइड (KBr) एक लवण है, जिसका शान्तिकारक औषधि के रुप में भी प्रयोग होता है। इसका प्रयोग व्यापक रुप से मिर्गी रोग के उपचार में भी होता है।

  • ऐस्परटेम एक कृत्रिम मधुरक है। यह सुक्रोज या सामान्य चीनी की तुलना में लगभग 200 गुना अधिक मीठा होता है।

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  • दूध एक पायस (इमल्सन) का उदाहरण है। इससे विटामिन-सी के अलावा सभी पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।

  • कार्बनिक खाद्य हमारे लिए बेहतर माने जाते हैं, क्योंकि वे कृत्रिम खादों एवं कीटनाशकों के उपयोग के बिना उगाए जाते हैं।

  • पपीते में पपाइन नामक तत्व पाया जाता है, जो जेलेटिन को सेट नहीं होने देता अतः यह जेली बनाने हेतु श्रेष्ठ फल नहीं है। आम और कैथ में पेक्टीन की उपस्थिति क्रमशः कच्चे और पूर्णतः परिपक्व होने पर निर्भर करती है। जबकि अमरुद में पेक्टीन की उपस्थिति के लिए ये शर्त अनिवार्य नहीं है।

  • लौंग के तेल (Cloves Oil) का प्रमुख घटक यूजेनाल (Eugenol) है। यह एक प्राकृतिक दर्द निवारक (Analgesic) तथा एन्टिसेप्टिक्स है। इसका उपयोग दांतो के दर्द को दूर करने में बखूबी रुप से किया जाता है। लौंग के तेल का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन, साबुन तथा टूथपेस्ट निर्माण में भी किया जाता है। मेडागास्कर तथा इंडोनेशिया मुख्य लौग तेल उत्पादक देश  हैं।

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अपमार्जक

  • अपमार्जक (डिटरजैण्ट) एक विशेष प्रकार के कार्बनिक पदार्थ हैं, जिनमें साबु की तरह मैल (Dirt) साफ करने का गुण है होता है। अपमार्जक साबुन के स्थान पर कपड़े धोने तथा बर्तन व अन्य घरेलू वस्तुएं साफ करने में प्रयुक्त किए जाते हैं। साबुन का उपयोग केवल मृदु जल (Soft Water) में किया जाता है कठोर जल (Hard Water) मे नहीं, परंतु इसके विपरीत अपमार्जक मृदु और कठोर दोनों प्रकार के जल में उपयोग किए जा सकते हैं, क्योंकि अपमार्जक कठोर जल में उपस्थित  कैल्शियम और मैग्नीशियम आयनों के साथ जल में अविलेय लवण नहीं बनाते हैं।

  • रासायनिक संरचना की दृष्टि से अपमार्जक प्रबल अम्ल और प्रबल क्षार से बने अति उच्च अणु भार के लवण होते हैं, जिनके धनायन या ऋणायन में 12 से 18 कार्बन परमाणुओं की लंबी श्रृंखला होती है। उदाहरण के लिए –

  1. सोडियम लौरिल सल्फेटः यह एक प्रमुख ऋणायनी अपमार्जक हैं, जिसके ऋणायन में 12 कार्बन परमाणुओं की लंबी श्रृंखला होती है।

  2. अपमार्जक का जलीय विलयन  उदासीन होता है, अतः अपमार्जक बिना किसी हानि के कोमल रेशों से बने वस्त्रों को साफ करने में प्रयुक्त किये जा सकते हैं। साबुन का विलयन जल-अपघटन के कारण क्षारीय होता है, जो कोमल वस्त्रों को धोने के लिए हानिकारक  हैं।

साबुन (SOAP)

  • उच्च वसा अम्लों (जैसे पामिटिक अम्ल, C15H31COOH स्टिऐरिक अम्ल, C17H35COOH आदि) के धातु लवण साबुन (SOAP) कहलाते हैं। साधारणतः उच्च वसा अम्लों के जल में विलेय सोडियम या पोटैशियम लवणों को साबुन कहते हैं, क्योंकि मैल साफ करने का गुण होता है। उदाहरण के लिए सोडियम स्टिऐरिट, C14H35COONa, एक साबुन है। साधारण साबुन तेल या वसा के क्षा द्वारा जल-अपघटन से बनाए जाते हैं।

  • तेल या वसा या कॉस्टिक सोडा विलयन (या अन्य क्षार) द्वारा जल-अपघटन करने पर साबुन और ग्लिसरॉल बनते हैं। यह क्रिया तेल या वसा का साबुनीकरण (saponification) कहलाती है।

  • तेल या वसा के साबुनीकरण द्वारा प्राप्त साधारण साबुन उच्च वसा अम्लो (C8 से C18) के सोडियम लवणों का मिश्रण होता है।

  • संतृप्त वसा कठोर साबुन और तेल (असंतृप्त वसा) मृदु साबुन देते हैं।

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साबुन बनाने के लिए आवश्यक कच्चे पदार्थ

  1. वनस्पति तेल (Vegetable Oil) या वसाः साबुन बनाने में मूंगफली, महुए, अरण्डी, नारियल आदि का तेल प्रयुक्त किया जाता है।

  2. कास्टिक सोडा या कास्टिक पोटाशः तेल या वसा का साबुनीकरण कॉस्टिक सोडा या कॉस्टिक पोटाश विलयन द्वारा कराया जाता है।

  3. पूरक (Fillers): साबुन में प्रायः कुछ ऐसे पदार्थ मिलाए जाते हैं, जिनको मिलाने से साबुन का भार और आयतन बढ़ जाता है और साबुन सुगमता से ठोस के रुप में जम जाता है। इन पदार्थों को पूरक कहते हैं। सोडियम सिलिकेट, सोप स्टोन आदि साबुन बनाने में पूरक के रुप में प्रयुक्त किए जाते हैं। कपड़े धोने के साबु में थोड़ा रोजिन (बिरोजा) भी मिलाया जाता है जिसकी उपस्थिति से साबुन अधिक झाग देता है और उसकी मैल साफ करने की क्षमता बढ़ जाती है।

  • साबुनीकरण की क्रिया में वनस्पति तेल या वसा एवं कास्टिक सोडा या कास्टिक पोटाश के जलीय विलयन को गर्म करके रासायनिक प्रतिक्रिया के द्वारा साबुन का निर्माण होता है तथा ग्लिसरॉल मुक्त होता है।

उर्वरक

  • उर्वरक वे साधन हैं जिनका प्रयोग पौधों की आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से मिट्टी में किया जाता है। उर्वरक का सीधा अर्थ है उर्वरता प्रदान करने वाला। उर्वरक डालने से अनुर्वर मिट्टी भी उर्वर हो जाती है। इन्हें अकार्बनिक खाद कहा जाता है।

  • खाद (Manure) शब्द उर्वरक का ही पर्याय है, किंतु पारंपरिक रुप से इसका प्रयोग गोबर या खर-पतवार जैसे कार्बनिक पदार्थों से बने काले-कलूटे पदार्थ के लिए होता आया है, जिसे कंपोस्ट भी कहते हैं। ये खादें कार्बनिक खादें हैं। खादों में N, P , K  तथा खनिजों की मात्रा कम रहती है,  जबकि उर्वरकों में ये सान्द्र रुप में रहते हैं।

  • इन खादों की प्रचुर मात्रा मिट्टी में डालनी पड़ती है और इनका बनाया जाना गोबर तथा वानस्पतिक पदार्थों पर निर्भर करता है, किंतु उर्वरकों को कृत्रिम रुप से कारखाने में तैयार किया जाता है और विभिन्न तत्वों की सान्द्रता इच्छानुसार रखी जा सकती है।

  • उर्वरकों के लगातार प्रयोग से मिट्टी की भौतिक दशा खराब हो सकती है, मिट्टी के सूक्ष्म जीवाणु घट सकते हैं और सूक्ष्मात्रिक तत्वों तथा कार्बनिक पदार्थ की कमी हो सकती है। इसलिए आजकल उर्वरकों के साथ कार्बनिक खादों का भी इस्तेमाल संस्तुत किया जाता है। अब तो उर्वरकों के विकल्प के रुप में जैव उर्वरक भी तैयार किए जा रहे हैं ।

  • खाद के स्थान पर वर्मीकंपोस्ट (केंचुए द्वारा निर्मित खाद) भी इस्तेमाल की जा सकती है। कुछेक दलहनीत फसलों को उगाकर भी मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी पूरी की जा सकती है। यह भूमि-उर्वरता के संरक्षण का प्राकृतिक उपाय है।

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उर्वरक एवं खाद में अंतर

क्र.सं.

उर्वरक

खाद

1.    

उर्वरक एक अकार्बनिक लवण है।

खाद एक प्राकृतिक पदार्थ है जो गोबर, मानव अपशिष्ट एवं पौधों के अवशेष के विघटन से प्राप्त होता है।

2.    

उर्वरक का उत्पादन फैक्ट्रियों में होता  है।

खाद खेतों में बनाई जा सकती है।

3.    

उर्वरक से मिट्टी को ह्यूमस प्राप्त नहीं होती।

खाद से मिट्टी को ह्यूमस प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है।

4.    

उर्वरक में पादप पोषक, जैसे कि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस  तथा पोटैशियम प्रचुरता में  होते हैं।

खाद में पादप पोषक तुलनात्मक रुप से कम होते हैं।

 

उर्वरक के प्रकार

  • मुख्यतः उर्वरक तीन कोटियों में रखे जाते हैं  –

  1. नाइट्रोजनी उर्वरक – इसमें अमोनिया युक्त उर्वरक, नाइट्रेट उर्वरक, अमोनिया-नाइट्रेट का संयुक्त रुप तथा ऐमाइड युक्त उर्वरक आते हैं। अमोनिया युक्त उर्वरकों में अमोनियम-सल्फेट, नाइट्रेट उर्वरकों में पोटैशियम तथा सोडियम-नाइट्रेट और अमोनिया-नाइट्रेट संयुक्त रुप में अमोनियम-नाइट्रेट कैल्शियम-अमोनियम नाइट्रेट मुख्य हैं। ऐमाइड युक्त  उर्वरक में यूरिया प्रमुख है। हमारे देश में समस्त नाइट्रोजनी उर्वरकों का उत्पादन होता है किंतु, यूरिया का उत्पादन सर्वोपरि है। नाइट्रोजनी उर्वरकों में यूरिया में 45 प्रतिशत नाइट्रोजन रहता है और  द्रव अमोनिया में 82 प्रतिशत (किंतु  इसका प्रयोग  उर्वरक के रुप में नहीं होता)।

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नाइट्रोजनी उर्वरकें में नाइट्रोजन

अमोनियम सल्फेट

21%

अमोनियम क्लोराइड

25%

अमोनियम नाइट्रेट

35%

कैल्शियम नाइट्रेट

17%

सोडियम नाइट्रेट

16%

कैल्शियम सायनामाइड

21%

यूरिया

45%

 

  1. फॉस्फेटी उर्वरकः इसमें मोनोफॉस्फेट, डाइफॉस्फेट, ट्राइफॉस्फेट तथा पालीफॉस्फेट मुख्य हैं। इनमें  से सिंग सुपर, डाइ-अमोनियम फॉस्फेट मुख्य रुप से प्रयुक्त होते हैं। हड्डी का चूरा, चूर्णित राकफॉस्फेट  तथा बेसिक स्लैग अन्य फॉस्फेट स्रोत हैं।

जब फॉस्फेट उर्वरकों को मिट्टी में डाला जाता है, तो उनका बहुत-सा अंश अविलेय बन जाता है। यदि कार्बनिक पदार्थ (खाद) के साथ मिलाकर फॉस्फेटी उर्वरक डाले जाएं तो वे पौधों के लिए उपलब्ध बने रहते हैं। रॉकफास्फेट तथा  बेसिक स्लैग ऐसे फॉस्फेटी पदार्थ हैं, जिन्हें महीन चूर्ण के रुप में मिट्टी में डालने से धीरे-धीरे लाभ मिलता है।

 

 

फॉस्फेटी उर्वरकों में प्राप्य फॉस्पेट

सुपर फॉस्फेट

16-47%

ऐमोफॉस

48%

बेसिक स्लैग

15-25%

हड्डी का चूरा

20-35%

रॉक फॉस्फेट

25-30%

कैल्शियम फॉस्पेट (मोनो)

50%

मेटा फॉस्फेट

64%

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  1. पोटैशियम उर्वरकः

  • इसमें कैनिट तथा म्यूरिएट ऑफ पोटाश मुख्य हैं। यह दोनों प्रकृति में पाए जाने वाले खनिज पदार्थ हैं। कैनिट में पोटैशियम क्लोराइड के साथ-साथ मैग्नीशियम सल्फेट अशुध्दि के रुप में रहता है। म्यूरिएट ऑफ पोटाश पोटैशियम क्लोराइड का व्यापारिक नाम है। पोटैशियम सल्फेट को म्यूरिएट ऑफ पोटाश से तैयार किया जाता है।

  • वैसे तो मिट्टी में पोटैशियम की मात्रा अधि होने से पोटैशीय उर्वरक डाले जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, किंतु इस उर्वरक को लगातार डालने से मिट्टी में पर्याप्त पोटैशियम स्थिरीकृत रुप में परिणत हो जाता है।

पोटैशियम उर्वरकों में पोटाश

पोटैशियम क्लोराइड

48-60%

पोटैशियम सल्फेट

48-50%

कैनिट

12-16%

पोटैशियम नाइट्रेट

44%

लकड़ी की राख

3-7%

तंबाकू के डंठल

4-9%

 

जैव उर्वरक

  • कतिपय सूक्ष्म जीवाणु मिट्टी में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करने की क्षमता रखते हैं, यथा ऐजोटोबैक्टर, क्लास्ट्रीडियम तथा राइजोबिया। कुछ ऐल्गी (शैवाल) भी भूमि उर्वरता बढ़ाने वाले हैं। फलतः जीवाणु कल्चर प्रविधि द्वारा जैव उर्वरक तैयार किए जाते हैं। इनकी थोड़ी-सी मात्रा से किसी फसल के लिए आवश्यक नाइट्रोजन की मात्रा की पूर्ति हो जाती है।

  • पौधो के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस पोटैशियम को प्रमुख आवश्यक तत्वों के रुप में जाना जाता है, इसलिए इनकी आवश्यक मात्रा को उर्वरक के रुप में दिया जाता है । एक मीट्रिक टन जैव खाद में मात्र 1.5 से 3 किलो फॉस्फोरस प्राप्त होता है अतः इसकी पूर्ति हेतु रासायनिक उर्वरक आवश्यक हो जाते हैं।

  • उर्वरक ऐसे रसायन होते हैं जो पेड़-पौधों की वृध्दि में सहायक होते हैं। उर्वरक में मुख्यतः उपस्थित होते हैं –

स्थूल पोषक तत्व –

  1. नत्रट्रोजन या नाइट्रोजन

  2. फॉस्फोरस

  3. पोटैशियम

  4. कैल्शियम

  5. मैग्नीशियम

  6. सल्फर

सूक्ष्म पोषक तत्व –

  1. बोरॉन

  2. क्लोरीन

  3. कॉपर

  4. आयरन

  5. मैंगनीज

  6. मॉलीब्डेनम

  7. जस्ता

  • एजोला, एनाबिना, नानस्टॉक, नील-हरित शैवाल आदि धान की फसल में नत्रजन स्थिरीकरण को बढ़ावा देते हैं। ये जैव उर्वरकों की तरह कार्य करते हैं।

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विविध

  • एलिथ्रिन संश्लेषित पाइरेथ्रोयड कीटनाशक है जो मच्छर भगाने वाली दवाओं में प्रयुक्त किया जाता है।

  • आग बुझाने वाले संयंत्र में कार्बन डाइऑक्साइड, सोडियम बाइकार्बोनेट तथा तनु सल्फ्यूरिक अम्ल की अभिक्रिया से उत्पन्न होती है।

  • चूहे को मारने के विष का निर्माण पोटैशियम सायनाइड या जिंक फॉस्फाइड नाम रसायन से किया जाता है। यह अत्यंत ही जहरीला रसायन है।

  • रोडेन्टीसाइड एक प्रकार का कीट नियंत्रक रसायन है जिसका प्रयोग चूहा, गिलहरी आदि कुतरने वाल जानवरों के नियंत्रण हेतु किय जाता है।

  • एल्युमीनियम फॉस्फाइड एक अकार्बनिक यौगिक है। इसका प्रयोग कीटनाशक एवं धूमक के में खाद्यान्नों के संग्रहण में किया जाता है।

  • मस्टर्ड गैस (Mustard Gas) को शक्तिशाली रासायनिक हथियार के रुप में प्रयोग किया जाता है। इसका रासायनिक नाम डाइक्लोरो डाइइथाइल सल्फाइड है। इस प्राणघातक रसायन से त्वचा, आंख, फेफड़े एवं डी.एन.ए. कोशिकाएं सर्वाधिक प्रभावित होती हैं। प्रथम विश्व युध्द में इसका प्रयोग हुआ था।

  • पृथ्वी, पुरानी चट्टानों आदि की आयु ज्ञात करने के लिए यूरेनियम का प्रयोग किया जाता है। इसे यूरेनियम द्वारा आयु अंकन कहते हैं। कार्बन डेटिंग विधि द्वारा कार्बनिक पदार्थों की आयु ज्ञात की जाती है।

  • सेरियम तथा दूसरी दुर्लभ मृदा धातुओं को मिलाकर क्रुक्स कांच का निर्माण किया जाता है। कुक्स कांच में पराबैंगनी किरणों के अवशोषण की क्षमता होती है। धूप के चश्मों में क्रुक्स कांच उपयोग किया जाता है।

  • जिंक ऑक्साइड (ZnO) यशद पुष्प के नाम से भी जाना जाता है। यह सफेद पाउडर है जिसका उपयोग सौंदर्य़ प्रसाधन, स्याही तथा मलहम आदि के निर्माण में किया जाता है।

  • क्लाउड सीडिंग मौसम में बदलाव लाने की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बादलों से इच्छानुसार वर्षा कराई जा सकती है। क्लाउड सीडिंग प्रक्रिया में सिल्वर आयोडाइड और शुष्क बर्फ जैसे तत्व प्रयोग किए जाते हैं। इन रसायनों का हवाई जहाज के जरिए बादलों पर छिड़काव किया जाता है। इसके अतिरिक्त पृथ्वी से जनरेटरों या एंटी एयरक्रॉफ्ट बंदूकों से भी इन्हें बादलों पर छोड़ा जाता है।

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  • माचिस की ज्वलनशीलता के लिए फॉस्फोरस का ऑक्साइड उत्तरदायी होता है। इसकी तीलियों के सिरे पर फॉस्फोरस युक्त पदार्थ का लेप करने के लिए जिलेटिन का उपयोग किया जाता है।

  • टॉर्टलाइट, विद्युत क्षुरक (शेवर) आदि साधनों मे सामान्यतः प्रयुक्त आवेश्य बैटरियों में निकेल और कैडमियम इलेक्ट्रोड के रुप में प्रयुक्त होते हैं। इसमें निकेल हाइड्रॉक्साइड की कैथोड तथा कैडमियम की एनोड होती है। इसमें पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड, इलेक्ट्रोलाइट के रुप में प्रयुक्त किया जाता है।

  • फेनिल (Phenyl) एक फिनॉल व्युत्पन्न रसायन है। जिसका प्रयोग घरो, दफ्तरों इत्यादि में रोगाणुनाशी के रुप में व्यापक स्तर पर किया जाता है।

  • एलिथ्रिन संश्लेषित पाइरेथ्रोयड कीटनाशक है, जो मच्छर भगाने वाली दवाओं में प्रयुक्त किया जाता  है।

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  • पदार्थ उपयोग

ऐस्पार्टेम         कृत्रिम मधुरक

फ्रेयॉन           प्रशीतक

निओप्रीन         संश्लेषित रबर

बेनाड्रिल          प्रतिहिस्टेमीन

  • सल्फर डाइऑक्साइड –   अम्ल वर्षा

फ्लोराइड प्रदूषण       –   दांत

मिथाइल आइसोसायनेट  –   भोपाल गैस त्रासदी

ओजोन रिक्तता       –   चर्म कैंसर

  • विभिन्न गैसों का वैश्विक तापन के प्रति आपेक्षिक योगदान –

  1. जल वाष्प – लगभग 60 प्रतिशत

  2. CO2 – लगभग 26 प्रतिशत

  3. O3 (ओजोन) – लगभग 8 प्रतिशत

  4. मीथेन – लगभग 4 प्रतिशत

  5. नाइट्रस ऑक्साइड – लगभग 1.5 प्रतिशत

  6. अन्य –   1 प्रतिशत

  • भोपाल गैस त्रासदी 2-3 दिसंबर, 1984 की रात को हुई थी।

  • बिस्फेनॉल A(BPA) एक औद्योगिक रसायन (Industrial Chemical) है जो मुख्यतः पॉलिकार्बोनेट नामक कठोर एवं पारदर्शी प्लास्टिक के निर्माण में प्रयुक्त होता है। पालॉलिर्बोनेट का प्रयोग पुनर्प्रयोग में आने वाली पानी एवं दूध की बोतलों तथा अन्य उपभोक्ता उत्पादों के निर्माण हेतु किया जाता है। बिस्फेनॉल A इपोक्सी रेसिन्स मे भी होता है, जो खाद्य एवं पेयों के धातु के डिब्बों के अंदर सुरक्षा लेप के रुप में  इस्तेमाल किया जाता है।

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जीव विज्ञान

जीव विज्ञान की उपशाखाएं

  • सामान्यतः विज्ञान शब्द प्रत्येक “सुव्यवस्थित एवं क्रमबध्द ज्ञान या अनुभव” के लिए प्रयुक्त होता है। इसे मुख्यतः दो भागों- प्रकृति विज्ञान (Natural Science) तथा सामाजिक विज्ञान (Social Science) में विभाजित किया जा सकता है। प्रकृति विज्ञान दो प्रमुख शाखाओं-फिजिकल साइंस (Physical Science) तथा लाइफ या बायोलॉजिकल साइंस (Life or Biological Science) में विभाजित होता है, जो पुनः कई शाखाओं व उपशाखाओं मे विभाजित होता है।

  • लैमार्क तथा ट्रैविरेनस नामक वैज्ञानिकों ने सर्वप्रथम जीव विज्ञान (Biology) शब्द का प्रयोग किया था।

जीव विज्ञान की शाखाएं एवं उपशाखाएं

जंतु विज्ञान (Zoology)

विभिन्न प्रकार के जीवित एवं मृत जंतुओ का विस्तृत अध्ययन

वनस्पति (Botany)

विभिन्न प्रकार के पादपों व उनके क्रियाकलापों का अध्ययन

पैलियोबॉयोलॉजी/जीवाश्मिकी (Palaeobiology/Palaeontology)

जीवों (जंतु एवं पादप) के जीवश्मों का अध्ययन

पैलियोवनस्पति (Palaeobotany)

पादप जीवश्मों का अध्ययन

पारिस्थितिक विज्ञान (Ecology)

सजीवों पर उनके चारों ओर के पर्य़ावरण के प्रभाव का अध्ययन

आनुवंशिकी (Genetics)

जींवों के आनुवंशिक लक्षणों तथा इनकी वंशागति का अध्ययन

फिजियोलॉजी (Physiology)

शरीर के विभिन्न भागों के कार्य तथा कार्य विधियों का अध्ययन

पैडोलॉजी (Pedology)

मृदा, मृदा निर्माण, मृदा के प्रकार इत्यादि का अध्ययन

जेरेन्टोलॉजी (Gerontology)

मनुष्य में वृध्दावस्था एवं काल प्रभावन के सामाजिक, संज्ञानात्मक, मनोवैज्ञानिक तथा जैविक पहलुओं का अध्ययन

इथोलॉजी (Ethology)

मानव सहित सभी जंतुओं के व्यवहार का अध्ययन

बायोनिक्स (Bionics)

जैविक जगत के गुणों, सिध्दांतों के प्रयोग द्वारा आधुनिक उपकरणों व अभियांत्रिकी तंत्रों का निर्माण करना।

बायोनोमिक्स (Bionomics)

जीवधारियों का उनके वातावरण के साथ संबंध का अध्ययन

बायोनोमी (Bionomy)

जीवन के नियमों से संबंधित अध्ययन

बायोमेट्री (Biometry)

गणित एवं सांख्यिकी की तकनीकों द्वारा जीव विज्ञान का अध्ययन

फ्रेनोलॉजी (Phrenology)

मस्तिष्क के विभिन्न भागों की क्रियाशीलता तथा विक्षिप्तता का अध्ययन

एन्थोलॉजी (Anthology)

फूलो का अध्ययन

एग्रोस्टोलॉजी (Agrostology)

घास से संबंधित अध्ययन

पैलीनोलॉजी (Palynology)

विभिन्न प्रकार के  परागकणों का अध्ययन

आंकोलॉजी (Oncology)

कैंसर व संबंधित ट्यूमर का अध्ययन

टेरैटोलॉजी (Teratology)

शारीरिक विकास में  आने वाली असमानताओं का अध्ययन

ऑस्टियोलॉजी (Osteology)

अस्थियों का अध्ययन

सेरोलॉजी (Serology)

रुधिर सीरम का वैज्ञानिक अध्ययन

लीथोट्रिप्सी (Lithotripsy)

एक चिकित्सीय प्रक्रिया जिसमें किरणों की सहायता से गुर्दे, पित्ताशय, मूत्राशय की थैली में स्थित पथरी को तोड़कर मरीज का इलाज किया जाता है।

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पैथोलॉजी (Pathology)

रोगो की प्रकृति, लक्षणों व कारकों का अध्ययन 

पैरासिटोलॉजी (Parasitology)

परजीवी जीवों का अध्ययन

वाइरस विज्ञान (Virology)

विषाणुओं का अध्ययन

बैक्टिरियोलॉजी (Bacteriology)

जीवाणुओं का अध्ययन

एंटोमोलॉजी (Entomology)

कीटों का अध्ययन

मैलेकोलॉजी (Malacology)

मोलस्का और इनके खोलो का अध्ययन

इक्थियोलॉजी (Ichthyology)

मत्स्य की संरचना, कार्यिकी इत्यादि का  अध्ययन

सर्पेंटोलॉजी (Serpentology)

सर्पों का अध्ययन

हर्पेंटोलॉजी (Herpetology)

उभयचरों तथा सरीसृपों का अध्ययन

आर्निथोलॉजी (Ornithology)

पक्षियों का अध्ययन

डर्मेटोलॉजी (Dermatology)

त्वचा तथा इसके रोगो का अध्ययन

ट्रोफोलॉजी (Trophology)

पोषण एवं पोषण विधियों का अध्ययन

टेटोलॉजी (Tetology)

उपार्जित लक्षणों का अध्ययन

 

प्रमुख शब्दावलियां एवं संबंधित उत्पाद

एपीकल्चर (Apiculture)

व्यापारिक स्तर पर शहद उत्पादन तथा फसलों में परागण हेतु मधुमक्खी पालन

एवीकल्चर (Aviculture)

पक्षी पालन

एक्वाकल्चर (Aquaculture)

जलीय जीवों (जंतु एवं वनस्पतियों) का संवर्धन

एल्गाकल्चर (Algaculture)

एक्वाकल्चर का एक प्रकार, जिसके अंतर्गत शैवालों की कृषि की जाती है।

पिसीकल्चर (Pisciculture)

मत्स्य (मछली) पालन

एग्रीकल्चर (Agriculture)

फसल संवर्धन,  पशुपालन तथा कृषि से संबंधित विज्ञान

सेरीकल्चर (Sericulture)

कच्चे रेशम के उत्पादन हेतु रेशम कीट का पालन

सिल्वीकल्चर (Silviculture)

वन संवर्धन

स्पांजीकल्चर (Spongiculture)

स्पंज संवर्धन

फ्लोरीकल्चर (Floriculture)

फूलों की खेती या पुष्प कृषि

ओलेरीकल्चर (Olericulture)

सब्जियों की कृषि

अरबोरीकल्चर (Arboriculture)

वृक्षों तथा झाड़ियों की कृषि

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हॉर्टीकल्चर (Horticulture)

फूलों, फलों, सब्जियों व मसालों की खेती

पोमोलॉजी (Pomology)

फलों की कृषि

एग्रोनॉमी (Agronomy)

फसलों की खेती

वर्मीकल्चर (Vermiculture)

कृषि उत्पादन में वृध्दि हेतु केंचुआ पालन

ओस्ट्रोकल्चर (Ostriculture)

व्यापार हेतु सीपों (Oysters) में कृत्रिम प्रजनन

ओलीकल्चर (Oleiculture)

जैतून (Olives) का उत्पादन, संरक्षण तथा व्यापार

हेलीकल्चर (Heliculture)

घोंघे (Snails) का संवर्धन

विटीकल्चर (Viticulture)

अंगूर उत्पादन

मेरीकल्चर (Mericulture)

मानव उपभोग हेतु समुद्री जीवों (जंतु व वनस्पति) का संवर्धन

मोरीकल्चर (Moriculture)

शहतूत की खेती

सिट्रीकल्चर (Citriculture)

खट्टे फलों व फल उत्पादों का संवर्धन

हाइड्रोपोनिक्स (Hydroponics)/एयरोपोनिक्स (Aeroponics)/एयरोकल्चर (Aeroculture)

मृदा विहीन पादप संवर्धन

वेजीकल्चर (Vegeculture)

सब्जियों एवं  पौधों की कृषि (मुख्यतः जड़ वाले फसलों की कृषि जिनमें कायिक प्रवर्धन होता है।

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जैव विकास

जैव की उत्पत्ति

  • पृथ्वी की उत्पत्ति अनुमानतः 4.6 अरब वर्ष पूर्व हुई तथा कालांतर में इस पर जीवन की उत्पत्ति हुई। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के संदर्भ में कई वैज्ञानिकों द्वार विभिन्न सिध्दांत/परिकल्पना प्रस्तुत किए गए जिसमें रासायनिक उध्दिकास के फलस्वरुप जीवन की उत्पत्ति सबसे आधुनिक है।

  • इससे संबंधित विस्तृत और सर्वमान्य परिकल्पना रुसी जीव-रसायनशास्त्री ए.आई. ओपैरिन ने भौतिकवाद या पदार्थवाद (Materialistic Theory ) के नाम से प्रस्तुत की, जो उनकी पुस्तक जीवन की उत्पत्ति (Origin Of Life) में छपी। इसके प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं –

  1. जीवन अर्थात प्रारंभिक जीवों की उत्पत्ति आज से लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व, आदिसार के जल में न्यूक्लिओप्रोटीन्स के (वाइरस जैसे) कणों के रुप हुई, जो परपोषी (Heterotropic) एवं अवायुवीय (Anaerobic) थे।

  2. 8 अरब वर्ष पूर्व कलायुक्त प्रोकैरियोटिक कोशिकारुपी आदिजीव बने जिनमें पहले परपोषण तथा बाद में स्वतः पोषण का प्रारंभ हुआ।

  3. स्पोषी आदि जीव वर्तमान में नीले-हरे शैवालों जैसे थे।

  4. लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व यूकैरियोटिक कोशिकाओं की उत्पत्ति हुई, जिनसे वर्तमान जीव जगत के सारे जीव (जीवाणु के अलावा)  बने।

जैव विकास की मौलिक परिकल्पना एवं सिध्दांत

  • जैव विकास की मौलिक परिकल्पना है – परिवर्तन के साथ अवतरण (Descent with change or modification)अर्थात निम्नकोटि के सरल जीवों से, क्रमिक परिवर्तनों द्वारा, अधिक विकसित एवंज जटिल जीवों की उत्पत्ति ही जैव विकास कहलाता है।

  • लैमार्क, चार्ल्स डार्विन, ह्यूगो डी ब्रीज आदि वैज्ञानिकों ने ठोस प्रमाण के आधार पर  जैव विकास की विस्तृत व्याखाएं प्रस्तुत कर अपने सिध्दांत दिए।

लैमार्कवाद (Lamarckism)

  • जैव विकास परिकल्पना पर पहला तर्कसंगत सिध्दांत फ्रांसीसी जीव वैज्ञानिक, जीन बैप्टिस्टे डी लैमार्क ने प्रस्तुत किया, जो 1809 ई., में उनकी पुस्तक फिलॉसफी जूलोगीक (Philosphic Zoologique) में छापा। इसे लैमार्क का सिध्दांत या लैमार्कवाद कहते हैं। यह निम्नलिखित मूल धारणाओं पर आधारित है –

  1. बड़े होने की प्रवृत्ति

  2. वातावरण का सीधा प्रभाव

  3. अंगो के उपयोग या अनुपयोग का प्रभाव

  4. उपार्जित लक्षणों की वंशागति

  • लैमार्कवाद को उपार्जित लक्षणों की वंशागति की सिध्दांत भी कहते हैं। अंगो के उपयोग एवं अनुपयोग की धारणा के अनुसार, अधिक प्रयोग किए जाने वाले अंग सुदृढ़ एवं सुविकसित हो जाते है तथा वे अंग जिनका प्रयोग कम होता है वे निष्क्रिय तथा धीरे-धीरे करके लुप्त हो जाते हैं। उदाहरणार्थ – जिराफ की गर्दन का लंब होना तथा सर्पों में टांगो का अभाव।

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डार्विनवाद (Darwinism)

  • चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) इंग्लैंड के जैव विकासविद थे। इनके द्वारा प्रस्तुत विकासवाद को डार्विनवाद या प्राकृतिक वरणवाद (Theory of Natural Selection) कहते हैं। इसकी विस्तृत व्याख्या इनकी पुस्तक प्राकृतिक चुनाव द्वारा जातियों की उत्पत्ति (1859) में छपी।

  • यह सिध्दांत निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है –

  1. जीवों में प्रचुर संतानोत्पत्ति (ओवरप्रोडक्शन) की क्षमता।

  2. जीवन संघर्ष (स्ट्रगल फॉर एक्जिस्टेन्स)

  3. विभिन्नताएं और इसकी वंशागति (वेरएशन्स एंड देयर इनहेरिटेंस)

  4. योग्यतम की अतिजीविता (सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट) या प्राकृतिक चयन।

उत्परिवर्तनवाद (Mutation Theory)

  • जैव विकास का उत्परिवर्तन सिध्दांत हॉलैंड के पादपशास्त्री (Botanist) ह्यूगो डी ब्रीज ने दिया। इन्होंने अपना प्रयोग सांध्य प्रिमरोज अर्थात आइनोथेरा लैमार्किआना नामक पौधे पर किया। इनके अनुसार, की  जाति (Species) की उत्पत्ति एक ही बार में स्पष्ट एवं स्थायी (वंशागत) आकस्मिक उत्परिवर्तनों के फलस्वरुप होती है।

  • जाति का पहला सदस्य जिसमें उत्परिवर्तित लक्षण दिखाई देता है उत्परिवर्ती (Mutant) कहलाता है। जाति के विभिन्न सदस्यो में भिन्न-भिन्न प्रकार के उत्परिवर्तन हो सकते हैं।

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महत्वपूर्ण तथ्य

  • आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) जुरैसिक युग का एक सर्वपुरातन पक्षी था जिसके जीवश्म लगभग 15 करोड़ वर्ष पुरानी जुरैसिक चट्टानों से मिले हैं। यह सरीसृपों तथा पक्षियों के  बीच का संयोजक कड़ी था, जिसमें सरीसृपों की भांत  लंबी पूंछ, चोंच में दांत तथा अग्रपादों की अंगुलियों पर पंजे थे। इसके बावजूद यह  पक्षी था क्योंकि इसके अग्रपाद उड़ने के लिए पंखों में रुपांतरित हो चुके थे।

  • डाइनोसोर (Dinosaurs) विशालकाय सरीसृप थे, जो कि मध्यजीवी या मेसोजोइक महाकल्प (Mesozoic Era) में थे। मध्यजीवी महाकल्प को तीन कल्पों- ट्रायसिक कल्प, जुरैसिक कल्प तथा क्रिटेशियस कल्प में बांटा गया है।

  • क्रो-मैगनॉन (Cro-Magnon) मनुष्य को आधुनिक मानव होमो सैपियंस का अंतिम सीधा पूर्वज तथा आधुनिक मानव की एक उपजाति होमो सैपियंस फॉसिलिस मानते हैं। क्रो मैगनन का शरीर गठा हुआ  और लगभग 180 सेमी. (60 फीट) लंबा तथा  कपालगुहा 1600 क्यूबिक सेमी. थी।

  • वर्तमान प्रमाण के अनुसार, पृथ्वी पर जीव का उदगम लगभग 2,000,000,000 वर्ष पूर्व हुआ। प्रारम्भ में जीव साधारण तथा एककोशिकीय थे, फिर बाद में बहुकोशिकीय जीवों का विकास हुआ, जो कि यूकैरियोटिक कोशिका वाले होते हैं। जबकि जीवाणु तथा नीले हरे शैवाल साधारण किस्म के प्रोकैरियाटिक कोशिका वाले होते हैं।

  • पृथ्वी पर सबसे पुरना जीव नील हरित शैवाल है। ऐसे प्रथम जीव हैं जिन्होंने सूर्य के प्रकाश एव जल के प्रयोग से भोजन का निर्माण करना प्रारम्भ किया। इस प्रक्रिया से उत्पन्न हुई ऑक्सीजन गैस वायुमंडल में फैलने लग , जो अन्य जीवों के विकास में सहायक हुई।

  • चार्ल्स डार्विन का मत था कि प्रकृति क्रमिक परिवर्तन द्वारा अपना विकास करती है। विकासवाद कहलाने वाला यही सिध्दांत आधुनिक जीव विज्ञान की नींव बना।

  • उत्परिवर्तन (Mutation) का सिध्दांत     –    ह्यूगो डी ब्रीज

विकास की सिध्दांत                    –    डार्विन

एक जीन एक एन्जाइम की परिकल्पना     –    बीडल और टैटम

ओपेरॉन अवधारणा                     –    जैकब और मोनोड

  • मैमथ (Mammoth) प्रजाति वर्तमान समय में विलुप्त है। यह हाथी का पूर्वज माना जाता है।

  • सैलामैंडर का विकास काल सबसे पहले लगभग 360 मिलियन वर्ष पूर्व तथा कंगारू का सबसे बाद में लगभग 145 मिलियन वर्ष पूर्व का  है।

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वर्गिकी

  • जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत जीव-जातियों का उनकी समानताओं एवं असमानताओं के आधार पर छोटे-बड़े समूहों में बांटा जाता है, वर्गीकरण विज्ञान या वर्गिकी (Taxonomy) कहते हैं।

  • कैरोलस लिनियस ने जीव-जातियों के नामकरण हेतु द्वीपद नामकरण (Bionomial Nomenclature) की एक पध्दति बनाई। उन्हें आधुनिक वर्गीकरण का पिता (Father of  Modern Taxonomy) कहते हैं।

  • जीवों के वर्गीकरण के संबंध में विभिन्न वैज्ञानिकों ने अपने मत दिए किंतु वर्तमान में व्हीटेकर (Whittaker, 1969) के पांच-जगत प्रणाली को मान्यता दी गई है। इन्होंने समस्त जीवों को पांच जगत – मोनेरा, प्रोटिस्टा, कवक, पादप तथा जंतु में विभाजित किया है।

जंतु जगत

  • जंतु जगत के अंतर्गत समस्त कशेरुकी तथा अकशेरुकी जीवों को शामिल किया गया है। जीव वैज्ञानिकों के अनुसार, जीव जगत में सबसे अधिक संख्या कीटों की है। कीट आर्थ्रोपोडा संघ के अंतर्गत आते हैं। कुल ज्ञात जंतु जातियों ( लगभग 15 लाख) में से लगभग 60 प्रतिशत (9लाख) आर्थ्रोपोडा संघ के हैं।

  • पादप जातियो की संख्या लगभग 4 लाख है। सभी एककोशिकीय जीवों में अलैंगिक विधि द्वारा जनन होता है।  अमीबा एककोशिकीय, प्रोटोजोआ जंतु  है, जो कि प्रायः द्वीखंडन विधि द्वारा जनन करता है।

  • केकड़ा मैलेकोस्ट्रेका (Malacostraca) वर्ग, जबकि बरुथी, बिच्छू तथा मकड़ी ऐरैक्निडा (Arachnida) वर्ग से संबंधित आर्थ्रोपोडा संघ के अकशेरुकी जंतु हैं। टिक (Ticks) तथा माइट (Mites) वास्तव में मकड़ीवंश होते हैं, जो कि एरैनी गण (Order- Araneae) के अंतर्गत आते हैं।  इनके उपांग संधुयुक्त तथा शरीर द्वीपार्श्वीय (Bilateral) एवं त्रिस्तरीय (Triplo –  blastic) होते हैं। कीट वर्ग (Class- Insecta) के अंतर्गत आने वाले जंतुओं मे छः (तीन जोड़ी) पैर पाए जाते हैं।

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  • जुगनू या खद्योत कीटो का एक परिवार है । इनमें चमक ल्युसिफरेज (Luciferase) नामक एंजाइम के कारण होती है। मादा मच्छऱ के मुख उपांग पक्षियों एवं स्तनियों की त्वचा में चुभकर रक्त चूसने के लिए (Piercing & Sucking Type) उपायोजित होते हैं, जबकि नर मच्छर के फल-फूलों का रस चूसने (Sucking Type) के लिए। कीटों में ट्रैकी द्वारा श्वसन हेतु वातक तंत्र (Tracheal System) तथा उत्सर्जन मैल्पीधी नलिकाओं द्वारा होता है।

  • इकाइनोडर्म (Echinoderm) समुद्र में पाए जाने वाले पंचतयी अरीय सममित (Pentamerous Radial Symmetry) वाले ड्यूटरोस्टोमी यूसीलोमेट यूमेटाजोआ होते हैं। इनके शिशु प्रावस्था शरीर की सममिति द्वीपार्श्वीय होती है। इकाइनोडर्म प्रायः अण्डज होते हैं। किंतु कुछ पिण्डज या सजीव प्रजक होते हैं।

  • ऑक्टोपस (Octopus) सिफैलोपोडा वर्ग का एक मृदुकवची (Molusc) जंतु है, जिसे डेविड फिश के नाम से भी जाना जाता है। इसके सिर पर आठ भुजाएं पाई जाती हैं। विशाल स्किवड्स (Architeuthisdux) तथा कोलोसल स्किवड्स सबसे बड़े अकशेरुकी  हैं। कोलोसल स्क्विड्स की लंबाई अपेक्षाकृत कम, किंतु वजन अधिक  होती है।

  • समतापी (Homeothermal) अर्थात गर्म रुधिर वाले (Warm Blooded) वे जंतु होते हैं, जिनके शरीर का ताप वातावरण के ताप से प्रभावित न होकर सदैव एक-सा रहता है। इसके अंतर्गत पक्षी तथा स्तनधारी आते हैं।

  • असमतापी (Heterothermal) अर्थात ठंडे रुधिर वाले (Cold Blooded) वे जंतु होते हैं, जिनके शरीर का ताप वातावरण के ताप के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है। इसके अंतर्गत मत्स्य, उभयचर, सरीसृप इत्यादि जंतु आते हैं।

  • रात्रिचर जंतु (Nocturnal Animal) दिन में आराम करते हैं किंतु रात्रि में सक्रिय रहते हैं। इन जंतुओं में प्रायः श्रवण तथा घ्राणकेन्द्रियां अत्यधिक विकसित होती है एवं दृष्टि क्षमता विशेष अनुकूलित होती हैं। मच्छर, चमगादड़, उल्लू, किवी इत्यादि जंतु प्रायः रात्रिचर होते हैं। कुछ जंतुओं के नाम मछलियों के नाम से मिलते-जुलते हैं परंतु ये  वास्तविक मछलियाँ नही हैं, जैसे – जेलीफिश (नीडेरिया), सितारा मछली या स्टार फिश (मोलस्क), हेग फिश (साइक्लोस्टोमेटा),डेविल फिश (मोलस्क), क्रेफिश (आर्थ्रोपोडा) आदि। कुछ वास्तविक मछलियां हैं – फ्लाइंग फिश, कैट फिश, पाइप फिश, पैडल  फिश, गोल्ड फिश, ग्लोब फिश, कैट फिश आदि।

  • डॉग फिश स्कोलियोडॉन (Scoliodon) को कहते हैं, जो कि एक उपास्थि मीन (Cartilagineous Fish) है। समुद्री घोड़ा या अश्वमीन हिप्पोकैम्पस को कहते हैं, जो कि एक वास्तविक मीन है।

  • मछलियों (मत्स्य) में श्वसन के लिए गलफड़े (Gills) पाए जाते हैं, जो कि पूर्णतया जल में घुली ऑक्सीजन (O2) को ही ग्रहण करने के लिए अनुकूलित (Adapted) होती है। सर्दियों के मौसम में झीलों तथा नदियो की केवल ऊपरी परत ही जमती है, जबकि नीचे की परत का जल अपने तरल में ही विद्यमान होता है। इसलिए मछलियां तथा अन्य जलीय प्राणी  जमी हुई झीलों व नदियों में भी जीवित रह सकते हैं।

  • एम्फीबिया (Amphibia) अर्थात उभयचर वर्ग के अंतर्गत ऐसे जंतु आते हैं जिनका शरीर जलीय एवं स्थलीय दोनों प्रकार के जीवन के लिए उपयोजित होता है।

  • सरीसृप (Reptilia) वर्ग के अंतर्गत कछुआ, मगरमच्छ, सर्प इत्यादि जंतुओं को  शामिल किया जाता है। अधिकांश सर्प, विषहीन होते हैं जबकि कुछ प्रजातियां जैसे – करैत,  कोबरा वाइपर आदि विषैले होते  हैं। विषैले सर्पों में ऊपरी जबड़े की मैक्सिली हड्डियों के 1 से 3 जोड़ी (प्रायः 1 जोड़ी) बड़े व पीछे की ओर मुड़े विषदंत (Poison Fangs) तालु से मुखग्रासन गुहिका में उभरे होते हैं। यह  मैक्सिलरी दंत (जंभिका दंत) ऊपरी जबड़े में ही स्थित विष ग्रंथियों से संबध्द होते हैं। विष ग्रंथियां कशेरुकी प्राणियों की लार ग्रंथियों के समांग होती  हैं। चमगादड़ आकाश में  उड़ने वाला एक रात्रिचर स्तनधारी प्राणी है,  पक्षी वर्ग में नहीं आता।

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  • ब्लू व्हेल (Balaenoptera Musculus) पृथ्वी पर पाया जाने वाला सबसो बड़ा स्तनपायी जलीय जीव है। इसकी लंबाई लगभग 33 मीटर तथा वजन 180 मीट्रिक टन से भी  अधिक होता है। स्पर्म व्हेल (Physester Macrocephalus) विशालतम दांत वाली मांसाहारी व्हेल है। इसकी लंबाई अनुमानतः 50 से 55 फीट एवं वजन 35 से 45 टन होता है।

  • समुद्री शेर (SeaLion), सील (Seal), या फोका (Phoca) वालरस (Walrus) तथा डॉल्फिन (Dolphin) भी जलीय स्तनधारी हैं, जिसमें डॉल्फिन सिटेसिया गण, जबकि अन्य तीनों कार्नीवोरा गण के अंतर्गत आते हैं। डॉल्फिन अत्यंत ही बुध्दिमान जंतु है । गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है। समुद्री गाय एक विशाल शाकाहारी जलीय स्तनधारी जीव है।

  • एकिडना एवं प्लेटिपस एकमात्र अंडे देने वाली (Oviparous) स्तनायी जीव है। नील गाय भारत में पाई जाने वाली विशालतम मृग प्रजाति है।

  • कपि प्राणि जगत में होमिनोइडिया (Hominoidea) महापरिवार की सदस्य जातियों को कहा जाता है। इनकी दो मुख्य शाखाएं हैं –

  1. हीनकपि – ये छोटे आकार के कपि होते हैं, जैसे गिबन।

  2. महाकपि – ये बड़े आकार के मानवनुमा कपि होते हैं, जैसे चिंपैंजी, गोरिल्ला, ओरंगउटान तथा मनुष्य। लंगूर कपि वर्ग में नहीं बल्कि वानर वर्ग में शामिल होता है।

  • वर्तमान मानव (Homo Sapiens Sapiens) बुध्दि में सर्वोच्च जंतु है। इनमें चिंतन, जानने की इच्छा प्रकट करना, तर्कसंगत तथा अक्षरबध्द वाणी और भौतिक मुद्राओं द्वारा भावनाओं की अभिव्यक्ति इत्यादि की क्षमताएं होती हैं। इनके कपालगुहा का आयतन 1350-1500 क्यूबिक सेमी. होता है।

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मोनेरा जगत

  • मोनेरा जगत के अंतर्गत एककोशिकीय प्रोकैरियोटिक जीवों को रखा गया है। इसमें माइकोप्लाज्मा, जीवाणु सायनोबैक्टीरिया आदि जीवों को शामिल किया गया है। माइकोप्लाज्मा स्वतंत्र जीवन यापन करने वाले सूक्ष्तम जीव हैं। सायनोबैक्टीरिया को नील हरित शैवाल भी कहते हैं।

  • जीवाणु सरल, अतिसूक्ष्म तथा एककोशिकीय आद्य जीव हैं। इन्हें मोनेरा जगत में रखा जाता है। प्रायः इनकी लंबाई 2 से 4 माइक्रॉन तक होती है। इन्हें कंपाउंड माइक्रोस्कोप द्वारा देखा जा सकता है। ये मानव के लिए लाभदायक एवं हानिकारक दोनों हो सकते हैं।

  • पोषण के आधार पर जीवाणु परपोषी (Heterotrophic) तथा स्वपोषी (Autotrophic) होते हैं।

  • स्वपोषी जीवाणु दो प्रकार के होते हैं –

  1. प्रकाश संश्लेषी

  2. रसायन संश्लेषी

  • आर्किबैक्टीरिया (Archaebacteria) के लक्षण सामान्य जीवाणुओं से भिन्न होते हैं। इसके मीथोनोजोंस (Methanogens) समूह अवायवीय होते हैं तथा ये दलदल वाले स्थानों एवं पशुओं के रुमेन में पाए जाते हैं। इनका उपयोग मीथेन के उत्पादन में होता है। फलीदार पादपों की जड़ों में मौजूद गांठों (Nodules) में पाए जाने वाले जीवाणु राइजोबियम (Rhizobium) सहजीविता (Symbiosis) प्रदर्शित करते हैं।

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प्रोटिस्टा जगत

  • प्रटिस्टा जगत के अंतर्गत एक कोशिकीय यूकैरियोटिक जीवों को रखा गया है। इसमें शैवाल तथा संघ प्रोटोजोआ के जीव शामिल हैं। शैवाल पर्णहरिमयुक्त, संवहन ऊतक रहित थैलोफाइट्स हैं। इसमें वास्तविक जड़, तना तथा पत्तियों का अभाव होता है। ये प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं, अर्थात स्वपोषी (Autotrophic) होते हैं। ये अधिकांशतः जलीय होते हैं। शैवालों में उपस्थित वर्णकों के आधार पर इन्हें तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया गया है –

  1. क्लोरोफाइसी (Chlorophyceae) – हरा शैवाल (हरे वर्णक के कारण)

  2. रोडोफाइसी (Rhodophyceae) – लाल शैवाल (लाल वर्णक के कारण)

  3. फीयोफाइसी (Pheophyceae) – भूरा शैवाल (भूरे वर्णक के कारण)

  • उल्लेखनीय है कि शैवालों के अध्ययन को फाइकोलॉजी (Phycology) कहते हैं।

कवक (Fungi)

  • कवक पर्णहरिम रहित, संवहन ऊतक रहित थैलोफाइट्स हैं। ये परपोषी होते हैं। कवक का अध्ययन माइकोलॉजी (Mycology) कहलाता है।

  • खमीर (Yeast) और कुकुरमुत्ता या मशरुप (Mushrooms) एक प्रकार के कवक हैं। खमीर एस्कोमाइसिटीज (Ascomycetes) कुल का सदस्य है। कवकमूल (Mycorrhiza) कवकों तथा उच्चतर पादपों की जड़ों के मध्य सहजीवी साहचर्य प्रदर्शित करता  है।

  • लाइकेन मिश्रित जीव हैं, जो कवक एवं शैवाल के साहचर्य से बने होते हैं।

पादप जगत

  • इसके अंतर्गत सभी बहुकोशिकीय, प्रकाश संश्लेषी, उत्पादक एवं स्वपोषी जीवों को शामिल किया गया है।

  • उत्पादक (Producer) स्वजीवी होते हैं, जो कि अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं अतः इन्हें उत्पादक कहते हैं। घटपर्णी या नेपेंथीस का पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाने में सक्षम होता है। ये कीटभक्षी पौधे होते हैं। यह प्रायः ऐसी मृदा में उगते हैं जहां नाइट्रोजन की कमी होती है। नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने के लिए ये कीटों को अपना आहार  बनाते हैं।

  • उपभोक्ता (Consumer) परोपजीवी होते हैं अर्थात  दूसरे जीवों से अपना भोज्य पदार्थ ग्रहण  करते हैं। तृणभक्षी या शाकाहारी (Herbivorous)  जंतु प्राथमिक उपभोक्ता (Primary  Consumer) होते हैं। प्राथमिक उपभोक्ता को भोज्य  पदार्थ के रुप में ग्रहण करने वाले जंतु गौण उपभोक्ता (Secondary  Consumer)  कहलाते हैं।

  • बिबन्धक या अपघटक (Decomposer) मृतोपजीवी होते हैं, जो कि अपना भोज्य पदार्थ मृत जीवों से ग्रहण करते हैं।

  • मरुस्थलीय या मरुदभिद पौधों के अंतर्गत कैक्टस, मदार, ब्रायोफिलम, घीक्वार (Aloe) इत्यादि पौधे आते हैं, जो कि शुष्क वातावरण के प्रति अनुकूलित होते हैं। मरुदभिद पौधों के जड़ प्रायः लंबे होते हैं, जबकि तने छोटे, रुपांतरित एवं कभी-कभी भूमिगत होते हैं। इनकी बाह्य त्वचा मोटी, उपचर्म (Cuticle) की परत से ढकी रहती है तथा पत्तियां कांटो में परिवर्तित हो जाती  हैं। इनके कुछ भाग जल संचय हेतु अधिक मांसल हो जाते हैं। फिएटोफाइट्स मरुस्थल में पाए जाने वाले  पौधे होते हैं, जिनकी जड़ें प्रायः 25-30 मीटर तक  लंबी होकर भूमिगत जल सतह तक पहुंच जाती हैं।

  • हाइड्रोफाइट्स या जलोदभिद पौधे बहुत जल वाले स्थान पर पाए जाते हैं। इनमें बड़े-बड़े अंतराकोशीय स्थान होते हैं,  जो वायु से भरे होते हैं तथा पौधों के तैरने में सहायक होते  हैं।

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  • लवणमृदोदभिद (Halophytes) उन पौधों को कहते हैं, जो उच्च लवणयुक्त जल में उत्पन्न होते हैं।

  • अधिपादप (Epiphytes) वे पौधे हैं, जो दूसरे जीवित पौधे पर यांत्रिक अवलंब के लिए लगे रहते हैं ना कि पोषण हेतु। उदाहरण – आर्किड इत्यादि।

  • जीवन चक्र की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण भाग पुष्प है। यह पौधे के प्रजनन मे सहायक होता है।

  • आदरक प्रकंद का, आलू स्तंभकंद का, लहसुन शल्ककंद का तथा सूरन या जिमीकंद घनकंद का उदाहरण है। शकरकंद कॉनवोलवुलेसी कुल का पौधा है। इसका खाने योग्य भाग रुपांतरित जड़ है। गन्ना,  आलू एवं अदरक तने के रुपांतरण हैं, अर्थात इनकातक संग्रह  अंग तना है। शलजम, गाजर एवं शकरकंद जड़ों के रुपांतरण हैं अर्थात  इनका संग्रह अंग जड़ है।

  • मटर लेग्युमिनेसी कुल का द्वीबीजपत्रीय (Dicotyledonous), शाकीय (Herbaceous) तथा एकवर्षीय पौधा है। इसमें सहारे के लिए प्रतान (Tendri) पाए जाते हैं।

  • गन्ना ग्रेमिनी या पोएसी कुल के अंतर्गत आता है, जिसका तना काट आमतौर से कायिक प्रवर्धन के लिए प्रयुक्त किया जाता है। इसका तना ठोस एवं संधिबध्द होता है जिसमें पर्व तथा पर्व संधियां पाई जाती हैं।

  • लौंग (Clove) मिर्टेसी (Myrtaceae) कुल के शाइजिजियम एरोमेटिकम या यूजीनिया कैरियोफाइलेटा नामक मध्यम कद वाले सदाबहार वृक्ष की सूखी हुई पुष्प कलिका से प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग भोज्य पदार्थों तथा दंतशूल निवारक  इत्यादि में किया जाता है। इसका जन्मस्थल  इडोनेशिया को माना जाता है तथा इसका उपयोग समस्त विश्व में होता है।

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  • केसर एक मसाला है, जिसे इरीडेसी कुल के क्रोकस सेटाइवस नामक पौधों के पुष्प की वर्तिका (Style) तथा वार्तिकाग्र से प्राप्त किया जाता है। इसका उपयोग  औषधि तथा भोज्य पदार्थ को स्वादिष्ट तथा सुनहला  बनाने में किया जाता है। केसर में सैफ्रानाल एवं पिक्रोक्रोसीन नामक रसायन पाया जाता है।

  • भिंडी के पौधे का वानस्पतिक नाम एबेलमोस्कस एस्कुलेंटस (Abelmosculus Esculentus) है। इसका फल कैप्सूल प्रकार का होता है, जिसका संपूर्ण भाग खाया जाता है।

  • हल्दी के पौधे का खाने योग्य भाग प्रकंद (Rhizome) है, जो कि एक भूमिगत रुपांतरित तने का प्रकार है। इसका वानस्पतिक नाम कुरकुमा लौंगा (Curcuma Longe) है। यह जिंजिबरेसी (Zingiberaceae) कुल का सदस्य है। इसका उपयोग औषधि, मसाले तथा रंगकारक इत्यादि के रुप में होता है।

  • शहतूत, अनानास तथा कटहल का फल सोरोसिस (Sorosis) कहलाता है। काजू व सिंघाड़ा का फल नट (Nut) कहलाता है। सिंघाड़ा का बीज जबकि लीची का मांसल बीजचोल (Fleshy Aril) खाया जाता है। सेब व नाशपाती का फल पोम (Pome), जबकि खीरा, तरबूजा व लौकी का फल पीपो (Pepo) कहलाता है।

  • कुनैन (Quinine) मलेरिया के उपचार के लिए एक प्रमुख औषधि है जिसे सिनकोना नामक आवृतबीजी पौधे की छाल से प्राप्त किया जाता है।

  • मलेरिया निदान हेतु आरटीथर नामक औषधि बीजीय पादप से तैयार की जाती है। कुकीन, एट्रेवीन, क्लोरोक्वीन  इत्यादि औषधियां  भी मलेरिया निदान हेतु प्रयुक्त की जाती हैं।

  • सन (Sunn), पटसन (Hemp) तथा जूट (Jute) के तनों (Stems) की रेटिंग से रेशा प्राप्त किया जाता है, जबकि कपास को फलों में स्थित बीज की बीजावरण से लगी रेशों से प्राप्त करते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं –

  1. बड़ी लिंट रेशा

  2. छोटी फज रेशा

  • लिंट रेशे (Lint Fibres) व्यापारिक तौर पर अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। कपास के रासायनिक संगठन में सेलुलोज (91.00%), जल (7.85%) ,प्रोटोप्लाज्म (0.55%), वसीय तत्व (0.40%) तथा खनिज लवण (0.20%) होते हैं।

  • पपीता का वानस्पतिक कैरिका पपाया (Carica Papaya) है। इसमें उपस्थित पपैन एंजाइम प्रोटीन के पाचन में सहायक होता है। इसका पीला रंग इसमें उपस्थित कैरिकाजैन्थिन (Caricaxanthin) नामक वर्णक के कारण होता है। सेव के फल में लाली का कारण एंथोसायनिन नामक वर्णी लवक है। लाल, नारंगी रंग के वर्णक जैसे कैरोटिन गाजर में, टमाटर में लाइकोपिन वर्णक, पीले रंग के वर्णक  जैसे जैन्थोफिल  हल्दी में तथा  चुकंदर में वीटरनीन वर्णक होते हैं।

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  • अफीम के पौधे का वानस्पतिक नाम पैपावर सोमनिफेरम है। इसे सामान्यतः ओपियम पॉपी कहते हैं। इससे नोस्कापीन, पैपावरीन, कोडीन, हेरोइन, अफीम, मॉर्फीन, आदि औषधियां प्राप्त की जाती हैं। मॉर्फीन पौधे के अपरिपक्व फलों से प्राप्त की जाती है।

  • लहसुन तथा प्याज की अभिलाक्षणिक गंध का कारण उसमें उपस्थित सल्फर यौगिक है। प्याज के छिलके उतारने पर आंसू आने का कारण प्याज से निष्कासित सल्फेनिक अम्ल है।

  • मिर्च का तीक्ष्ण या तीखा स्वाद उसमें उपस्थित कैप्सैइसिन नामक पदार्थ के कारण होता है। इसका रासनयिक सूत्र C18H27NO3 है।

  • वनस्पति विज्ञान में किसी प्ररोह (Embryonic Shoot) को कलीय या कलिका कहते हैं। यह किसी पत्ती के कक्ष (Axil) पर या तने के अंतिम छोर पर उत्पन्न होती है।

  • कॉर्क (Cork), ओक (Oak) नामक वृक्ष की छाल से प्राप्त किया जाता है, जिसका वानस्पतिक नाम क्वेर्कस सुबर है। इस पौधे का उत्पत्ति स्थल भूमध्य-सागरीय क्षेत्र (Mediterranean Region) है।

  • रजत मीन (Silver Fish) एक छोटा, पंखहीन कीट है। क्रे फिश ( Cray Fish) एक कड़े खोल वाला जानवर है। जेली फिश कशेरुकी जंतु नही है तथा यह मछली की श्रेणी में नहीं आता कैट फिश वास्तविक मीन है।

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  • कपास का रासायनिक संगठन निम्न प्रकार है –

सैलुलोस          –   91.00%

जल             –   7.85%

प्रोटोप्लाज्म       –   0.55%

वसीय तत्व       –   0.40%

खनिज लवण      –   0.20%

  • हेरोइन अफीम पोस्ता से प्राप्त की जाती है। यह सफेद रंग का पाउडर है, जो अफीम पोस्ता से प्राप्त मार्फीन के संश्लेषण से बनाया जाता है।

  • पैपेवर सोमनीफेरम (Papaver Somniferum) पैपेवरेसी (Papaveraseae) कुल का प्रमुख पौधा है। इसका फल अनेक बीजयुक्त कैप्सूल होता है जो छिद्र अथवा कपाट द्वारा स्फुटित होता है।

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कोशिका

  • कोशिका जीवधारियों की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है। इसमें प्रायः स्वतः जनन की क्षमता होती है। कोशिका सिध्दांत ( Cell Theory) श्लाइडेन तथा श्वान (Schleiden & Schwann) नामक वैज्ञानिकों ने प्रतिपादित किया था। जीवधारियों में दो प्रकार की कोशिकाएं यथा 1. प्रोकैरियोटिक कोशिकाएं तथा 2. यूकैरियोटिक कोशिकाएं पाई जाती हैं।

  • प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में केन्द्रक, केन्द्रक कला, केन्द्रिका, कलायुक्त कोशिकांग इत्यादि नहीं पाए जाते हैं। इनमें आनुवांशिक पदार्थ पाया जाता है, परंतु इससे हिस्टोन प्रोटीन संयुक्त नहीं होती है। इसमें राइबोसोम उपस्थित होता है। इस प्रकार की कोशिकाएं जीवाणुओं एवं नील हरित शैवालों में पाई जाती हैं।

  • यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पूर्ण विकसित केन्द्र, केन्द्रिका तथा कलायुक्त कोशिकांग इत्यादि उपस्थित होते हैं। इन कोशिकाओं में हिस्टोन प्रोटीन पाया जाता है। इस प्रकार की कोशिकाएं पेड़-पौधों, जंतुओं, कुछ शैवालों इत्यादि में पाई जाती हैं। पादप कोशिका जंतु कोशिका से भिन्न होती है क्योंकि इसकी कोशिका में बाह्य आवरण कोशिका भित्ति (Cell Wall) कहलाता है जो कि हरे पौधो में मुख्यतया सेलुलोज से निर्मित होता है।

  • जंतु कोशिका में कोशिका भित्ति का अभाव होता है। इसके अलावा जंतु कोशिका में हरितलवक अनुपस्थित होता है, जो कि पादप कोशिकाओं में पाया जाता है।

  • प्लाज्मा झिल्ली या कोशिका झिल्ली एक अर्ध्द पारगम्य झिल्ली है, जो प्रत्येक सजीव कोशिका के जीवद्रव्य को घेरे रहती है। कोशिका झिल्ली का निर्माण तीन परतों से मिलकर होता है, इसमें से बाहरी एवं भीतरी परतें प्रोटीन द्वारा तथा मध्य परत लिपिड द्वारा निर्मित होती हैं।

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  • कोशिका में प्रोटीन संश्लेषण में अंतःद्रव्यी जालिका और राइबोसोम की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। एक अंतःद्रव्यी जालिका की कला से राइबोसोम लगे रहते हैं तथा ये राइबोसोम प्रोटीन संश्लेषण के निर्माण स्थल होते हैं।

  • राइबोसोम को प्रोटीन का फैक्टी भी कहा जाता है।

  • माइटोकॉन्ड्रिया जीवाणु एवं नील हरित शैवाल को छोड़कर शेष सभी सजीव पादप एवं जंतु कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य में बिखरे हुए कलायुक्त कोशिकांग हैं। श्वसन की क्रिया प्रत्येक जीवित कोशिका के कोशिकाद्रव्य एवं माइटोकॉण्ड्रिया मे संपन्न होती है। श्वसन से संबंधित प्रारंभिक क्रियाएं कोशिका द्रव्य मे तथा शेष क्रियाएं माइटोकांड्रिया में होती हैं। चूंकि क्रिया के अंतिम चरण में ही अधिकांश ऊर्जा उत्पन्न होती है इसलिए माइट्रोकॉन्ड्रिया को कोशिका का श्वसनांग या पॉवर हाउस कहा जाता है।

  • कोशिकीय श्वसन में अधिकतम ATP (एडिनोसीन ट्राई फॉस्फेट) अणुओं को उत्पन्न करने वाला पद क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) है। यह चक्र कोशिका के माइट्रोकांड्रिया मे संपन्न होता है। इस चक्र की खोज हैन्स क्रैब्स ने वर्ष 1937 में की थी।

  • गॉल्जीबॉडी को गॉल्जी कॉम्पलेक्स या गॉल्जी उपकरण के नाम से भी जाना जाता है। इसका सर्वप्रथम अन्वेषण कैमिलोगॉल्जी ने 1898 ई. में किया था। इसके क्रियात्मक  इकाई को सिस्टर्नी कहते हैं।

  • लाइसोसोम को कोशिका की आत्मघाती थैली (सुसाइडल बैग) कहते हैं। इसमें बहुत से जल-अपघटनीय एंजाइम पाए जाते हैं, जो अम्लीय माध्यम में कार्य करते हैं। ये एंजाइम लाइसोसोम की कला के फट जाने पर बाहर आ जाते हैं तथा कोशिका के सभी घटकों को जल अपघटन क्रिया द्वारा पचा  डालते हैं।

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  • केन्द्रक की खोज सर्वप्रथम रॉबर्ट ब्राउन (Robert Brown) ने वर्ष 1931 में की थी। एक कोशिका में प्रायः एक केन्द्रण होता है, किंतु कुछ पौधों (वाउचेरिया एवं क्लेडोफोरा) की कोशिकाओं में एक से अधिक केन्द्रक पाए जाते हैं। इसमें आनुवंशिक पदार्थ (DNA) पाए जाने के कारण इसका प्रमुख कार्य जीवों के पैतृक लक्षणों को संतान में भेजना है।

  • DNA की खोज फ्रिडरिक मिशर (1869) ने की थी तथा DNA का डबल हेलिक्स मॉडल जेम्स वाटसन तथा फ्रांसिस क्रिक ने दिया।

  • DNA एक आनुवंशिक पदार्थ होता है तथा जीवों के लक्षणों की संकेत सूचनाओं को जन्मपत्री की भांति जनकों से संतानों मे ले जाता है। यह नाभिक के अलावा माइटोकॉन्ड्रिया तथा हरित लवक कोशिकांग में भी पाया जाता है। मनुष्य एकलिंगी प्राणी है जिसमें गुणसूत्रों की कुल संख्या 23 जोड़ी (46) पाई जाती है। पुरुषों में 44+XY, जबकि स्त्रियों में 44+XX गुणसूत्र होते हैं। पुरुष तथा स्त्री में 22 जोड़े (44) गुणसूत्र ऑटोसोम्स होते हैं, जबकि 23वां जोड़ा गुणसूत्र पुरुष में XY तथा महिला में  XX होता है जिन्हें लिंग गुणसूत्र कहते हैं। जनक से जिस संतान को XY गुणसूत्र मिलते हैं वह पुत्र बनता है और जिसे XX गुणसूत्र मिलते हैं वह पुत्री।

  • प्रक्रमित कोशिका मृत्यु में कोशिकीय और आणविक नियंत्रण को एपॉप्टसिस कहते हैं। यह भ्रूणीय विकास तथा अंगो के प्रतिविकास के समय होता है।

  • छिपकली की अनेक प्रजातियों सहित अनेक सरीसृपों में लिंग गुणसूत्र नहीं होते हैं। इनमें  लिंग निर्धारण पर्यावरणीय ताप से होता है।

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आनुवंशिकता

  • सजीवों के वे लक्षण जो एक पीढ़ी ( Generation) से दूसरी पीढ़ी में प्रसारित होते हैं, वंशागत या आनुवंशिक लक्षण कहलाते हैं।

  • आनुवंशिक लक्षणो के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने अर्थात प्रसारित होने की प्रक्रिया आनुवंशिकता (Heredity ) कहलाती है।

  • आनुवंशिकता की खोज ग्रेगर जॉन मेंडल ने की थी। ये ऑस्ट्रिया देश के ब्रून्न नामक शहर में पादरी थे। इन्हें आधुनिक आनुवंशिकी का पिता (Fathe of Modern Genetics) कहते हैं। इन्होंने ने उद्यान मटर के पौधे में सात लक्षणों की तुलनात्मक विभिन्नताओं की वंशागति के लिए संकरण प्रयोग किए तथा उसका विस्तृत अध्ययन किया।

  • इनके प्रयोग से संबंधित निम्नलिखित नियम हैं –

  1. प्रभाविता का नियम (Law of Dominance)

  2. पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)

  3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)

  • जीवों में आनुवंशिक लक्षण क्रोमोसोम द्वारा संतान में ले जाए जाते हैं। ये न्यूक्लियोप्रोटीन के बने होते हैं। क्रोमोसोम नाम सर्वप्रथम वाल्डेयर (1888) ने प्रस्तुत किया था। क्रोमोसोम पर स्थित डीएनए की  बनी ऐसी अति सूक्ष्म संरचनाएं, जो आनुवंशिक लक्षणों का धारण  एवं  उनका एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण करती हैं, जीन कहलाती हैं।  जीन जीवों के शरीर में आनुवशिकता की मूलभूत इकाई है।

  • किसी भी जीव के डीएनए में विद्यमान समस्त जीनों का अनुक्रम जीनो कहलाता है। जीनोम के सभी गुणसूत्रों का संरचनात्मक एवं प्रकार्यात्मक संगठन जीनोम चित्रण कहलाता है।

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  • प्लवमान जीन या जंपिंग जीन के सिध्दांत का प्रतिपादन बारबरा मैक्लिंटॉक ने किया था। इस खोज के लिए इन्हें चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इन्होंने मक्का के पौधे पर अपना अनुसंधान किय था। अध्ययन के तौर पर इन्होंने देखा कि जंपिंग जीन्स द्वारा, जो आनुवंशिक परिवर्तन होते हैं उससे मक्का के दाने पर कुछ धब्बे पड़ जाते हैं। नए प्रयोग के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल गया कि सभी कोशिकाओं में DNA के खंड होते हैं, जिन्हें ट्रांसपोजेबल तत्व या ट्रांसपोजोन कहते हैं, जिनका विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान है।

  • जीव कोशिकाओं में दो प्रकार के न्यूक्लिक अम्ल – DNA व RNA होते है। ये न्यूक्लियोटाइड के बहुलक हैं अर्थात ये बहुत से न्यूक्लियोटाइड से मिलकर बनते हैं। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड  तीन अणुओं से मिलकर बनता है – 

  1. नाइट्रोजनी बेस (प्यूरीन एवं पिरिमिडीन)

  2. पेन्टोज शुगर

  3. फॉस्फेट

  • प्यूरीन बेस (एडिनीन तथा ग्वानीन) DNA तथा RNA दोनों में समान होते हैं। पिरिमिडीन बेस RNA में साइटोसीन तथा यूरेसिल जबकि DNA में साइटोसीन तथा थाइमीन होते हैं। DNA में डिऑक्सीराइबोज तथा RNA में राइबोज शर्करा होती है।

  • सामान्यतः DNA से RNA का कॉपी बनती है। यह प्रक्रिया अनुलेखन कहलाती है। कुछ वायरस में RNA से DNA की कॉपी बनती है। यह प्रक्रिया रिवर्स ट्रांसक्रिप्सन कहलाती है। इस प्रक्रिया में रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज एंजाइम भाग लेता है।

  • एक्स-रे तकनीक (X-Ray Technique) व्यवसाय में लगे व्यक्तियों को अपनी कोशिकाओं में डीएनए में स्थायी परिवर्तन का खतरा रहता है।    

  • ध्यातव्य है कि DNA एक न्यूक्लिक अम्ल है, जो आनुवंशिक पदार्थ के रुप में कार्य करता है।

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जैव उर्वरक

  • जैव उर्वरक (Bio Fertilizer) सूक्ष्म जीवों व जीवाणुओं से युक्त खाद है। इस खाद में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु वायुमंडल में पहले से विद्यमान नाइट्रोजन को फसलों को उपलब्ध कराते हैं।

  • ये मिट्टी में मौजूद अघुलनशील फॉस्फोरस को जल में घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराने का भी कार्य करते हैं।

  • वैज्ञानिको द्वारा यह सिध्द हो चुका है कि जैविक खाद के प्रयोग से 30-40 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर भूमि को प्राप्त हो जाती है तथा उपज 10-20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।

  • फॉस्फोबैक्टीरिया तथा माइकोराइजा नाम जैव उर्वरकों के प्रयोग से खेत में फॉस्फोरस की उपलब्धता में 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होती है।

  • जैविक खाद के प्रयोग से पर्यावरण सुरक्षित रहता है। इससे फसलों में मृदाजन्य रोग नहीं होते तथा खेत में लाभकारी सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है।

  • अध्ययन की सुविधा हेतु, जैव उर्वरकों को वृहत रुप से चार भागों में बांटा जा सकता है –

  1. नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जैव उर्वरक – राइजोबियम, एजोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, एसेटोबैक्टर, नील हरित शैवाल (BGA) तथा एजोला।

  2. फॉस्फोरस घुलाने वाले उर्वरक – बैसिलस, स्यूटोमोनास, एस्परजिलस।

  3. कम्पोस्टिंग एक्सीलेरेटर – सेलुलोलिटिक (ट्राइकोडर्मा), लिग्नोलिटिक (ह्यूमीकोला)।

  4. पौधों की वृध्दि को प्रोत्साहित करने वाले राइजोबैक्टीरिया – स्युडोमोनास की प्रजाति।

  • नील हरित शैवाल (सानोबैक्टीरिया) एजोला का सहचारी है और इसे साथ में मिलाने से अच्छी उर्वरता प्राप्त होती है। नील हरित शैवाल एक सूक्ष्म प्रोकैरियोटिक शैवाल होते हैं, जबकि एजोला (Azolla) एक जलीय फर्न है जिसकी पत्तियों की पृष्ठीय सतह पर पाई जाने वाली गुहिकाओं में रहने वाले जीवाणु एनाबीना एजोली की मदद से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर उपज क्षमता की वृध्दि मे सहायक होते हैं।

  • विभिन्न फसलों में अलग-अलग तरह के बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो नत्रजन या नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिए उत्तरदायी होते हैं –

  • सोयाबीन (Soyabeans) – राइजोबियम जैपोनिकम (Rhizobium Japonicum)

  • तिनतिया घास (Clover) – राइजोबियम ट्राइफोली (Rhizobium Trifolii)

  • लुसर्न (Lucerne) – राइजोबियम मेलिलोती (Rhizobium Meliloti)

  • जलीय फर्न (Aquatic Fern) – एनाबीना एजोली (Anabaena Azollae)

  • गुन्नेरा मैक्रोफाइला (Gunnera Macrohylla) – नोस्टोक मस्कोरम (Nostoc Muscorum)

  • दुधारु पशुओं पर किए गए प्रयोगों से ज्ञात हुआ है कि जब इन पशुओं को उनके  दैनिक आहार के साथ 1.5 से 2 किग्रा. एजोला प्रतिदिन दिया जाता है, तो दुग्ध उत्पादन में 15-20 प्रतिशत वृध्दि दर्ज की जाती है।

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मानव शारीरिकी एवं क्रिया विज्ञान

कंकाल व मांसपेशीय तंत्र

  • ककाल व मांसपेशीय तंत्र मानव सहित सभी कशेरुकियों को एक आकृति प्रदान करती है तथा शरीर को सहारा, दृढ़ता व गति प्रदान करने में सहायक होती है।

  • मानव कंकाल मुख्यतः दो भागों में बंटा होता है –

  1. बाह्य कंकाल (Exoskelton)

  2. अंतःकंकाल (Endoskelton)

  • बाह्य कंकाल के अंतर्गत बाल, रोग नाखून आदि आते हैं। अंतःकंकाल के अंतर्गत शरीर के भीतर का अस्थि पंजर (Skelton Frame) आता है। अंतः कंकाल मुख्यतः दो भागों में बंटा होता है।

  1. अक्षीय कंकाल

  2. उपांगीय कंकाल

  • वयस्क मानव में 206 अस्थियां (Bones) पाई जाती हैं, जो कि कंकाल तंत्र का निर्माण करती हैं। कंकाल के अक्षीय (Axial) तथा उपांगीय (Appendicular) भागों में अस्थियों की संख्या पृथक होती है। अक्षीय भाग में 80, जबकि उपांगीय भाग में 126 अस्थियां होती हैं।

  • मानव शरीर में की सबसे छोटी हड्डी स्टेपीज (Stapes) है, जो मनुष्य के कान में पाई जाती है, जबकि सबसे बड़ी हड्डी फीमर (Femur) है, जो जांघ में पाई जाती है।

  • मनुष्य की खोपड़ी (Skull) में कुल अस्थियों की संख्या 28 होती है, जिनमें से 8 मस्तिष्क के चारों ओर का मस्तिष्क खोल (Brain Case) अर्थात कपाल (Cranium) बनाती हैं। शेष हड्डियों में से 14 हड्डियां चेहरे का कंकाल बनती हैं तथा शेष 6 मध्य कर्णों में कर्ण अस्थियां होती हैं। हाइऔइड (Hyoid) नामक एक और अस्थि मैंडिबल तथा कंठ के बीच जिह्वा के नीचे स्थित रहती है।

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  • मनुष्य का कशेरुक दंड (Vertebral Column) या रीढ़ की हड्डी 26 (शिशुओ में 33) छोटी-छोटी हड्डियों की बनी होती हैं, जिन्हें कशेरुकाएं कहते हैं। गर्दन का पहला कशेरुक एटलस कशेरुक कहलाता है, जो गर्दन को साधे रहता है।

  • मनुष्य के शरीर में पसलियों (Ribs) की कुल संख्या 12 जोड़ी अर्थात 24 होती हैं। प्रत्येक पसली वक्ष के सामने की ओर उरोस्थि से तथा पीछे की ओर वक्षीय कशेरुकाओं से संधित रहती है। सभी पसलियां मिलाकर लगभग बेलनाकार पिंजड़ा बनाती हैं, जिसमें, फेफड़े, हृदय व अन्य अंतरांग स्थित होते हैं।

  • मानव शरीर विभिन्न प्रकार के ऊतकों, अंगो तथा अंग तंत्रों में व्यवस्थित लगभग 200 प्रकार की खरबों कोशिकाओं का बना होता है तथा इन सबके सम्मिलित कार्यिकी के फलस्वरुप शरीर का अस्तित्व बना रहता है।

  • हमारे शरीर का अधिकतम भार जल से बना है, जिसमें इसकी मात्रा लगभग 60-70 प्रतिशत होती है। जीव तंत्रों के अन्य अधिकांश पदार्थ जल में घुले रहते हैं। इस प्रकार कोशिका द्रव्य, ऊतक द्रव्य, रुधिर प्लाज्मा, मूत्र, स्वेद आदि का आधारभूत तरल जल ही होता है।

  • मानव शरीर में प्रधान रुप से 6 तत्व पाए जाते हैं, जो ऑक्सीजन, कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कैल्शियम तथा फॉस्फोरस हैंश मानव शरीर के भार का 65 प्रतिशत ऑक्सीजन, 18 प्रतिशत कार्बन, 10 प्रतिशत हाइड्रोजन, 3 प्रतिशत नाइट्रोजन, 1.4 प्रतिशत कैल्शियम तथा 1.1 प्रतिशत फॉस्फोरस होता है। मानव हड्डियों में सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला लवण कैल्शियम फॉस्फेट है।

  • शल्य क्रिया (Operation) में आर्थोप्लास्टी कूल्हे के जोड़ का प्रतिस्थापन है। अर्थराइटिस या अन्य कारणों से निष्क्रिय हो चुके जोड़ो का प्रतिस्थापन या पुनर्संयोजन इस शल्य क्रिया में किया जाता है।

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  • लिगामेंट वह संयोजी ऊतक है, जो एक हड्डी को दूसरे हड्डी से जोड़ता है।

  • कंडरा (Tendon) मांसपेशी को हड्डी से जोड़ने वाला संयोजी ऊतक है।

  • नाखून बाह्य कंकाल के अंतर्गत आता है, जो कि अल्फा किरैटिन के बने होते हैं। ये मृत कोशिकाओं के द्रव्य द्वारा निर्मित होते हैं, जिनमें रक्त का संचरण नही होता है। यही कारण है कि इन्हें काटे जाने पर दर्द का आभास नही होता है।

  • कैल्शियम, फॉस्फोरस और फ्लोरीन अस्थि एवं दंत निर्माण तथा इसकी मजबूती के लिए आवश्यक हैं। इनकी कमी से अस्थि एवं दंत संबधी बीमारियां हो जाती हैं।

  • मनुष्य के जीवनकाल में 20 दांत दो बार विकसित होते हैं। मानव सहित अधिकांश वयस्क स्तनी द्वीदंती होते हैं अर्थात चवर्ण दंतो के अलावा, अन्य दांत जीवन में दो बार विकसित होते हैं। इस प्रकार व्यक्ति के 12 स्थायी चवर्ण दंत एकदंतीय होते हैं।

  • मनुष्य सहित स्तनियों में आदर्श रुप से चार प्रकार के दांत होते हैं –

  1. कृंतक (Incisors)

  2. रदनक (Canines)

  3. प्रचवर्ण (Premolars)

  4. चवर्ण (Molars)

  • मनुष्य का दंत-सूत्र (Dental Foumula) है –

i2/2, c1/1, pm2/2, m3/3=8/8=16×2=32

  • मानव शरीर का सबसे दृढ़ भाग दंतवल्क (Enamel) है। यह दांत के शिखर (Crown) पर अत्यधिक कठोर, सफेद-सा एवं चमकीला होता है। यह मुख्यतया कैल्शियम फॉस्फेट और कैल्शियम कार्बोनेट का बना होता है। किसी भारी वस्तु को उठाने की क्षमता के संदर्भ में जबड़े की मांशपेशियां सबसे समजबूत समझी जाती हैं। जबड़े की मांशपेशियों द्वारा 975 पाउंड वजन 2 सेकंड तक उठाने का रिकार्ड गिनीज बुक में दर्ज है।

  • स्टर्नम, क्वेविकल, पैटेला तथा स्कैपुला क्रमशः उरोस्थि (Breast Bone), जत्रुक या हंसुली (Collar Bone), जानुफलक (Knee-Cap) तथा संबंध फलक (Shoulder Blade) से संबंधित अस्थियां हैं।

  • हमारा शरीर का अधिकतम भार जल (Water) से बना है, जिसमें इसकी मात्रा लगभग दो तिहाई तक पाई जाती है। एक नवजात बच्चे के शरीर में उसके भार का लगभग 75% भाग जल होता है। एक वयस्क पुरुष के शरीर में उसके भार का 60-65% जबकि वयस्क स्त्री के शरीर में उसके भार का लगभग 55-60% भाग जल होता है। यह प्रकृति का सबसे उत्तम विलायक होता है। जीव-तंत्रों के  अन्य अधिकांश पदार्थ जल में घुले रहते हैं। इस प्रकार कोशिका द्रव्य, ऊतक द्रव्य, रुधिर प्लाज्मा,मूत्र, स्वेद आदि का आधारभूत तरल जल ही होता है।

  • उरोस्थि (Breast Bone) –        स्टर्नम (Sternum)

जत्रुक (Collar Bone)                –      क्लेविकल (Clavicle)

जानुफलक (Knee-Cap)     –   पैटेला (Patella)

स्कंध फलक (Shoulder Blade)      स्कैपुला (Scapula)

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पाचन तंत्र

  • विभिन्न भौतिक व रासायनिक क्रियाओं और एंजाइम की सहायता से भोज्य पदार्थों को सरल, छोटे व घुलनशील अणुओं में बदलना पाचन कहलाता है।

  • भोजन करने के पश्चात, पचाने, पचे हुए पदार्थों का अवशोषण करके इन्हें रुधिर में पहुंचाने तक शेष निरर्थक पदार्थ का मल के रुप में परित्याग करने में शामिल सभी अंग पाचन तंत्र (Digestive System) के भाग हैं। पाचन तंत्र में मुख्य रुप से गुदा तक फैली एक लंबी आहारनाल (Alimentary Canal) होती है तथा इससे संबंधित कुछ सहायक अंग भी होते हैं। मनुष्य के आहारनाल की लंबाई औसतन 10-14 मीटर तक होती है। मुख ग्रासन गुहिका (Bucco Pharyngeal Cavity), ग्रासनली (Oesophagus), अमाशय (Stomach) तथा आंत (Intestine) आहारनाल के प्रमुख भाग हैं।

  • ताल का स्त्रावण लार ग्रंथियों द्वारा होता है। यह हल्की अम्लीय (pH=6.8) होती है तथा इसमें लगभग 99.5 प्रतिशत जल होता है। मनुष्य के मुखगुहा में लगभग 1 से 1.5 लीटर लार का स्राव प्रतिदिन होता है। लार, भोजन को गीला करने तथा उसकी लुग्दी बनाने में सहायक होती है, जिससे उसे आसानी से निगला जा सके। लार में टायलिन (लारीय एमाइलेज) होता है, जो स्टॉर्च को सर्करा में तोड़ता है।

  • एमाइलेज (Amylase) नामक एंजाइम का स्राव लार ग्रंथियों (लारीय एमाइलेज) तथा अग्न्याशय (अग्न्याशयी एमाइलेज) द्वारा किया जाता है, जो कि भोजन में उपस्थित स्टॉर्च (मंड) को जल-अपघटन द्वार माल्टोज मे परिवर्तित करता है, जो बाद में ग्लूकोज अणुओं में टूट जाता है।

  • यकृत (Liver) मानव शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह उदर गुहा में, तंतुपट अर्थात डायाफ्राम के ठीक नीचे, आंत्रयोजनी अर्थात मीसेंट्री से संयुक्त गहरे लाल-भूरे रंग का होता है। इसका भार लगभग 1.5 किग्रा. होता है। यह लगभग 500 क्रियाओं का संपादन करता है। इसकी कुछ मुख्य क्रियाएं हैं – पित्त का उत्पादन, ग्लाइकोजेनेसिस क्रिया द्वारा ग्लूकोज का ग्लाइकोजन में परिवर्तन, रक्त प्लाज्मा के कुछ प्रोटीनों का उत्पादन, रक्त में अमीनो अम्ल का नियमन तथा विषाक्त अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित करना अर्थात यूरिया का संश्लेषण आदि।

  • पित्त (Bile) पीले-हरे या हरे-नीले रंग का क्षारीय (pH=7.6 से 8) तरल होता है। इसका भंडारण पित्ताशय (Gall Bladder) में होता है। मानव में प्रतिदिन लगभग 800-1000 मिली. पित्त का स्त्रावण होता है। पित्त में कोई पाचक एंजाइम नहीं होता है, फिर भी लिपिड्स के पाचन एवं अवशोषण में सहायक होता है। यह वसा का पायसीकरण अर्थात इमल्सीकरण करता है।

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  • लिपिड्स के पाचन में लाइपेज नामक एंजाइम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह लिपिड्स को वसीय अम्लों तथा मोनोग्लिसराइड्स मे विखंडित करते हैं। पेप्सिन, ट्रिप्सिन तथा काइमेट्रिप्सिन नामक एंजाइम प्रोटीन के पाचन में सहायक होते हैं। ये प्रोटीन को छोटी पेप्टाइड श्रृंखलाओं व एमीनों एसिड्स में विखंडित करते हैं।

  • अग्न्याशय (Pancreas) मानव शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह एक मिश्रित ग्रंथि है, जिसमें एक साथ अंतःस्त्रावी (Endocrine) एवं बहिस्त्रावी (Exocrine) दोनों प्रकार के भाग पाए जाते हैं। इससे हॉर्मोन तथा पाचक रस का स्त्राव होता है। इसके पाचक रस को अग्न्याशयी रस भी कहते हैं तथा यह क्षारीय होता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन को पचाने के लिए एंजाइम होते हैं, इसलिए इसे पूर्ण पाचक रस कहा जाता है। ट्रिप्सिन नामक एंजाइम का स्त्राव अग्न्याशय द्वारा किया जाता है, जो कि प्रोटीन को पॉलीपेप्टाइड में परिवर्तित कर देता है।

  • मानव शरीर में क्षुद्रांत या छोटी आंत आहारनाल का एक भाग होती है, जो कि अमाशय  तथा बड़ी आंत के मध्य स्थित है। इसमें अधिकांश भोजन का पाचन होता है तथा पचे भोजन का अवशोषण किया जाता है। यह ग्रहणी (Duodenum), मध्यांत्र (Jejunum) तथा शेषांत्र (Ileum) में विभेदित होता है जिनकी लंबाई क्रमशः 25 सेमी., 2.5 मीटर तथा 3.5 मीटर  होती है।

  • छोटी आंत अत्यधिक कुंडलित नलिका होती है, जिसकी कुल लंबाई लगभ ग 6-7 मीटर होती है। मनुष्य की बड़ी आंत क्रमशः सीकम, कोलन व मलाशय में विभाजित होती है।

  • मानव शरीर में स्थित पुच्छ (Appendix) या कृमिरुप परिशेषिका (Vermiform Appendix) की लंबाई लगभग 4 इंच होती है , जो कि एक अवशेषी अंग (Vestigial Organ) है। इसका आकार छोटे कृमि की तरह होता है तथा बड़ी आंत (वृहदांत्र) से सीकम द्वारा जुड़ा होता है।

  • एंजाइम मूलतः प्रोटीन होते हैं, जो बायो-उत्प्रेरक के रुप में जैव रासायनिक क्रियाओं को उत्प्रेरित या उनकी गति बढ़ाने का कार्य करते हैं। जैव क्रिया में एक विशेष प्रकार के एंजाइम एक विशेष कार्यो को संपादित करते हैं। ये उसी प्रकार कार्य करते हैं, जिस प्रकार एक ताले को खोलने के लिए विशेष चाभी होती है। जाइमेज नामक एंजाइम ग्लूकोज को इथेनॉल में परिवर्तित करता है।

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  • मानव शरीर में पाचन (Digetion) का अधिकांश भाग छोटी आंत (Small Intestine) में संपन्न होता  है। इसके अलावा पचे हुए पदार्थों का अवशोषण (Absorption) मुख्यतः छोटी आंत में ही होता है। हालांकि भोजन का पाचन मनुष्य में मुंह से प्रारंभ होकर बड़ी आंत (Large Intestine) तक चलता रहता है।

  • विटामिन –   कैरोटिन

एंजाइम      –   पेप्सिन

हॉर्मोन       –   टेस्टोस्टेरोन/प्रोजेस्टेरोन

प्रोटीन       –   केरेटिन

  • टायलिन –   स्टार्च के को पचाता है   

पेप्सिन       –   प्रोटीन को पचाता है

रेनिन        –   रक्त में ऐंजिओटेंसिनोजेन को ऐंजिओटेंसिन में बदलता है

ऑक्सीटोसिन  –   मसृण पेशियों (Smooth Muscles) में सिकुड़न प्रेरित करता है

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विटामिन एवं पोषण

  • कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन्स, लिपिड्स, न्यक्लिक अम्ल, जल, खनिज लवण तथा विटामिन सात प्रकार के प्रमुख पोषक पदार्थ हैं। मानव सहित सभी जंतु सामान्यतः इन्हें भोजन से प्राप्त करते हैं। इन पदार्थों में से जल व खनिज लवण अकार्बनिक पदार्थ हैं और शेष कार्बनिक पदार्थ।

  • कार्बोहाइड्रेट एवं वसाएं ऊर्जा उत्पादक पदार्थ हैं। प्रोटीन शरीर का निर्माणात्मक पदार्थ है। विटामिन, जल एवं खनिज लवण उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण व नियमन करते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स में 1 : 2 : 1 के अनुपात में कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के यौगिक (CH2O) होते हैं।

  • वर्ष 1912 में पोलैंड को वैज्ञानिक कैसिमिर फंक ने पहली बार विटामिनों की अवधारणा का निरुपण किया तथा विटामिन शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। अब तक लगभग 20 प्रकार के विटामिन ज्ञात हो चुके हैं, जिनकी दो श्रेणियां –

  1. जल में घुलनशील (विटामिन B एवं C)

  2. वसा में घुलनशील (विटामिन A, D, E एवं K)

  • विटामिन को सहायक आहार कारक भी कहा जाता है। इस विचार को स्पष्ट करने वाले पहले वैज्ञानिक फ्रेडरिक गोलैंड हॉपकिंस थे।

  • लैक्टोज (Lactose) प्राकृतिक शर्करा है। यह एक कार्बोहाइड्रेट है, जो दूध में पाया जाता है और इसकी हल्की मिठास का कारण है।

  • कैसीन एक फॉस्फोप्रोटीन है, जो कि दूध में पाया जाता है। इसकी उपस्थिति के कारण दूध सफेद रंग का होता है। गाय के  दूध का हल्का पीला रंग बीटा कैरोटिन की  उपस्थिति के कारण होता है। दुग्ध प्रोटीन को पचाने वाला एंजाइम रेनिन (Renin) होता है, जो  दूध की घुलनशील प्रोटीन केसीन को ठोस एवं घुलनशील कैल्शियम पैराकैसीनेट में परिवर्तित कर दूध को दही के रुप में जमा देता है। शिशुओं में जठर रस में यह पाचक एंजाइम होता है, किंतु वयस्कों में इसका अभाव होता है।

  • दूध लेक्टोबैसिलस बैक्टीरिया के कारण खराब होता है। यह एक अति महत्वपूर्ण जीवाणु होता है, जो कि पाचक नाल में पाया जाता है। ये मिल्क शुगर को लैक्टिक अम्ल में बदल देते हैं, जिसके कारण दूध खट्टा हो जाता है। दूध से दही, छाछ तथा पनीर निर्माण का कार्य इन जीवाणुओं द्वारा किया जाता है।

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  • प्रोटीन एक जटिल नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक पदार्थ है, जिसका गठन कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन तत्वों के अणुओं से मिलकर होता है। इसमें आंशिक रुप से गंधक, फॉस्फोरस आदि भी उपस्थित होते हैं। प्रोटीन ऊतकों, के निर्माण, मरम्मत तथा शारीरिक वृध्दि के लिए आवश्यक होते हैं। अमीनो अम्ल प्रोटीन की संयोजक इकाइयां या एकलक होते हैं। प्रकृति में लगभग 300 प्रकार के अमीनों अम्ल पाए जाते हैं। जीवद्रव्य में उपस्थित विभिन्न प्रकार के अमीनों अम्ल में केवल 20 प्रकार के अमीनों अम्ल ही प्रोटीन्स के एकलक होते हैं।

  • इनमें से 10 प्रकार के अमीनों अम्ल भोजन से भी प्राप्त हो सकते हैं और शरीर को कोशिकाओं में भी बन सकते हैं। ये अनिवार्य अमीनों अम्ल कहलाते हैं। शेष 10 प्रकार के अमीनों अम्ल मानव केवल भोजन से ही प्राप्त करता है। इसलिए ये अनिवार्य अमीनों अम्ल कहलाते हैं। हिस्टीडीन, आइसोल्यूसिन, ल्यूसिन, लाइसिन, मेथिओनिन, फेनिलएलैनिन, ट्रिप्टोफैन, वेलिन आदि अनिवार्य अमीनो अम्ल है। ग्लाइसिन, सेरीन, टाइरोसीन, एलैनिन, ग्लूटैमिक अम्ल, प्रोलीन आदि अनिवार्य अमीनो अम्ल हैं।

  • एल्फा किरैटिन एक प्रोटीन है, जो कि सींग, बाल, नाखून, खुर, त्वचा आदि में उपस्थित होता है। यह किरैटिन का एक प्रकार है।

  • टाइरोसीन मस्तिष्क में एड्रीनेलीन, नॉट-एड्रीनेलीन और डोपामाइन आदि न्यूरोट्रांसमीटर्स का निर्माण करता है। दूध में लगभग 87 प्रतिशत जल पाया जाता है इसके अतिरिक्त इसमें वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम (Ca), पोटैशियम (K) इत्यादि भी पाए जाते हैं। दूध को पूर्ण आहार कहा गया है, जो कि सभी अवस्थाओं के लिए सर्वमान्य भोजन  है।

  • सामान्य क्रियाशील महिला के लिए प्रोटीन की उपयुक्त दैनिक मात्रा 45-46 ग्राम, जबकि गर्भवती महिला और बच्चे को दूध पिलाने वाली महिला को इससे अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है। दूध पिलाने वाली मां को प्रतिदिन 65-70 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है।

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प्रमुख विटामिन, स्रोत व उनके कमी से होने वाले रोग

विटामिन

कमी से उत्पन्न रोग

स्रोत

विटामिन A

(रेटिनॉल)

रतौंधी, जीरोप्थैलमिया, संक्रमण,  त्वचा की कोशिका में परिवर्तन

गाजर, हरि सब्जियां,  दूध, मक्खन, अंडा, यकृत, मछली का तेल

विटामिन B2

(राइबोफ्लेविन)

कीलोसिस

पनीर, अंडे, यीस्ट, मांस,  हरी पत्तेदार सब्जियां

विटामिन B3

(नियासिन या निकोटिनिक अम्ल)

पेलाग्रा

यीस्ट, मांस, मछली, अंडे,  दूध, फलियां आदि

विटामिन B5

(पैंटोथीनिक अम्ल)

चर्म रोग, वृध्दि कम, बाल सफेद

अंडे, दूध, मांस, मूंगफली

विटामिन B6

(पाइरीडॉक्सिन)

रक्तक्षीणता, चर्म रोग, पेशीय ऐंठन

दूध, यीस्ट, अनाज, मांस

विटामिन B7

(बायोटिन)

चर्म रोग, बालो का झड़ना

मांस, गेहूं, अंडा, सब्जी, फल

विटामिन B9

(फोलिक अम्ल)

रक्तक्षीणता, कुंठित वृध्दि

हरी सब्जियां, फलियां, यीस्ट, मांस, अंडे

विटामिन B12

(सायनोकोबालैमिन)

घातक रक्तक्षीणता (Pernicious Anaemia) तंत्रिका तंत्र की गड़बड़ियां

मांस, मछली, अंडा, दूध, आंत्र की जीवाणु

विटामिन C

(एस्कॉर्बिक अम्ल)

स्कर्वी रोग

आंवला, नींबू वंश के फल, टमाटर, सब्जियां

विटामिन D

(कैल्सीफेरॉल)

सूखा रोग (रिकेट्स), ऑस्टियोमैलेसिया

मक्खन, मछली का तेल, अंडा आदि तथा सूर्य –प्रकाश में संश्लेषण

विटामिन E

(टोकोफेरॉल)

जनन क्षमता की कमी, जननांग तथा पेशियां कमजोर

तेल, गेहूं, अंडे की जर्दी, सोयाबीन

विटामिन K

(नैफ्थेक्विनोन)

चोट पर रक्त का थक्का न जमना

हरी सब्जियां, अंडा,  सोयाबीन, आंत्र के बैक्टीरिया

 

  • मंड या स्टार्च तथा सेल्युलोज दोनो का वानस्पतिक उद्भव है। यह ग्लूकोज अणु से निर्मित बहुलक (Polymers) है। स्टार्च, आयोडीन घोल के साथ क्रिया करके नीला-काला रंग देता है, जबकि सेलुलोज इस प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करता है। पादपों के बीजों और फलियों में स्टार्च एमाइलेज या एमाइलोप्सिन के रुप में उपस्थित होता है।

  • मानव शरीर की कोशिकाएं आवश्यक वसीय अम्लों का संश्लेषण नहीं कर सकती हैं। लिनोलेइक अम्ल तथा लिनोलेनिक अम्ल मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक वसीय अम्ल है। तिलहनी फसलों में अधिकतम अल्फा- लिनोलेनिक अम्ल अलसी या तीसी में पाया जाता है। अल्फा – लिनोलेनिक अम्ल एक ओमेगा-3 वसीय अम्ल है, जो रक्त नलिकाओं में वसा के जमाव को रोकने में सक्षम होता है।

  • असंतृप्त वसा संतृप्त वसाओं की तुलना में अधिक अभिक्रियाशील होते हैं। इनके अणुओं में किन्हीं कार्बन परमाणुओं के मध्य दोहरे बंध होते हैं। संतृप्त वसाओं में दोहरे बंध नहीं होते हैं। बहुअसंतृप्त वसा अम्ल में अपघटन की  दर काफी तीव्र होती है, जिसके कारण संवहनीय क्रिया में ऑक्सीजन (O2) के अधिकतम अणु ग्रहण कर लिए जाते हैं। इसके परिणामस्वरुप मनुष्य में संवहनीय क्रिया बढ़ जाती है। बहुअसंतृप्त वसा अम्ल मछली में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो मानव के लिए एक अच्छा पोषक तत्व है।

  • ट्रांस-वसा (Trans- Fat) का उपयोग शरीर में खराब LDL कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाता और अच्छे HDL कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, जो कि हृदयवाहिका के स्वास्थ्य को क्षति पहुंचा सकता है। प्रायः पशु उत्पन्न वसा / तेल तथा हाइड्रोजनीकृत तेल दोनों ही ट्रांस वसा होते हैं।

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  • पनीर मानव शरीर में ने ऊतकों की वृध्दि के लिए पोषक तत्व प्रदान करता है। यह झागदार, मुलायम एवं भिन्न स्वाद वाला पदार्थ है, जिसे दुग्ध से विरोध जीवाणुओं लैक्टोबैसिलस लैक्टिस तथा ल्यूकोनोस्टोक सिट्रोवोरम द्वारा किण्वन कर  तैयार किया जाता है।

  • जेम्स लिंग (James Lind) ने 1747 ई. में बताया कि खट्टे फलों के प्रयोग से स्कर्वी रोग से बचाव किया जा सकता है। खट्टे फलों में विटामिन C पाया जाता है।

  • रेटिनॉल –   नेत्र सूख कर लाल होना

टोकोफेरॉल        –   बन्ध्यता

सायनोकोबालएमीन –   घातक रक्ताल्पता

पायरीडॉक्सिन     –   मानसिक व्याधि

  • बाल किरेटिन नामक प्रोटीन का बना होता है। यह प्राणियों में नाखून और बालों का प्रमुख संरचनात्मक घटक है।

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श्वसन तंत्र

  • श्वसन तंत्र के अंतर्गत वे सभी अंग आते हैं, जिनसे होकर वायु का आदान-प्रदान होता है, जैसे-नासिका (Nose) एवं नासामार्ग (Nasal Passages), ग्रसनी (Pharynx), लैरिंक्स या स्वर यंत्र, ट्रैकिया, ब्रांकाई, ब्रांकियोल्स तथा फेफड़े।

  • मनुष्य के वक्ष गुहा में दो फेफड़े (Lungs) होते हैं, जो फुफ्फुसावरण या प्ल्यूरल मेम्ब्रेन द्वारा घिरा होता है। मनुष्य का दायां फेफड़ा, बाएं फेफड़े से कुछ बड़ा और चौड़ा परंतु लंबाई में कुछ छोटा होता है। फेफड़ों में रुधिर कोशिकाओं का जाल फैला होता है। प्रत्येक फेफड़े में लगभग 15 करोड़ वायुकोष्ठक (Alveoli) होते हैं, जिसमें श्वास की वायु तथा रुधिर के  बीच गैसीय विनिमय होता है।

  • फेफड़ों या फुफ्फुस (Lungs) द्वारा गैसों का आदान- प्रदान होता है। यह मानव रहित समस्त स्तनधारियों के श्वसन तंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग होता है इसलिए इसे फुफ्फुसीय श्वसन (Pulmonary Respiration) कहते हैं।

  • श्वसन एक जैविक क्रिया है, जिसमें अंतःश्वास (Inspiration) तथा उच्छ्वास (Expiration) क्रियाओं के दौरान वायुमंडल मे उपस्थित प्रमुख गैसें यथा नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, जववाष्प आदि प्रयुक्त होते हैं। इन क्रियाओं (अंतः श्वास तथा उच्छ्वास) के दौरान सामान्यतः नाइट्रोजन की मात्रा अपरिवर्रित होती है।

  • मानव शरीर में ऑक्सीजन अंतः श्वसन द्वारा फेफड़ों तक पहुचती है। फेफड़ों में ही वायुकोष्ठक पाए जाते हैं, जो कि रुधिर कोशिकाओं द्वारा घिरे रहते हैं। इन कोशिकाओं में ऑक्सीजन वायुकोष्ठक से प्रवेश कर जाती है तथा CO2 विपरीत दिशा में गति कर जाती है। लाल  रुधिर कणिकाओं (B.Cs.) में मौजूद हीमोग्लोबिन प्रोटीन ऑक्सीजन के वाहक का कार्य करके शरीर में विभिन्न अंगों के ऊतकों तक पहुंचाने का कार्य करता है।

  • सामान्यतया एक स्वस्थ मनुष्य में हीमोग्लोबिन की मात्रा औसतन 15 ग्राम प्रति 100 मिली. रुधिर होती है। एक ग्राम हीमोग्लोबिन में लगभग 34 मिली. ऑक्सीजन बंधी होती है। इस प्रकार 100 मिली. रुधिर की हीमोग्लोबिन में लगभग 20 मिली. ऑक्सीजन बंधी होती है।

  • कार्बन मोनोऑक्साइड का हीमोग्लोबिन के प्रति आकर्षण ऑक्सीजन की तुलना में 250 गुना अधिक होता है। यह रक्त के हीमोग्लोबिन से जुड़कर कार्बाक्सी-हीमोग्लोबिन (HbCO) बनाती है। इससे रक्त की ऑक्सीजन परिवहन क्षमता कम हो जाती है।

  • रक्त में ऑक्सीजन (O2) की सांन्द्रता में कमी आने से श्वास की गति में क्रमशः बढ़ोत्तरी होती जाती है। समुद्र सतह से ज्यों-ज्यों ऊपर चलते जाते हैं, वायुमंडल की वायु का संयोजन अर्थात इसमें विभिन्न गैसों की प्रतिशत मात्राएं तो वही रहती हैं किंतु वायु का घनत्व कम होता जाता है। अतः पहाड़ों पर शरीर में ऑक्सीजन की कमी अर्थात हाइपाक्सिया के कारण मनुष्य की सांस फूलने लगती है, अर्थात श्वास दर बढ़ती जाती है।

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परिसंचरण तंत्र

  • विलियम हार्वे (William Harvey) नामक वैज्ञानिक द्वारा रक्त परिसंचरण की खोज की गई थी। रक्त परिसंचरण तंत्र को मुख्य रुप से तीन भागो यथा हृदय, रुधिर तथा रूधिर वाहिनियों में बांटा जा सकता है।

  • मानव हृदय छाती के मध्य थोड़ी-सा बाई ओर स्थित होता है। पेशीय ऊतकों का बना यह अंग एक आवरण द्वारा घिरा होता है, जिसे हृदयावरण कहते हैं। इसमें पेरीकार्डियल द्रव भर होता है, जो हृदय की बाह्य आघातों से रक्षा करता है। हृदय चार प्रमुख कक्षों में विभाजित होता है।  दो ऊपरी कक्षों को दायां तथा बायां अलिंद कहते हैं, जबकि दो निचले कक्षों को दायां एवं बायां निलय कहते हैं।

  • एक सामान्य मनुष्य के हृदय का वजन लगभग 250-300 ग्राम होता है। सामान्यतया मनुष्य का हृदय प्रति मिनट 72-75 बार धड़कता है। हृदय में एक स्पंदन (Beat) की समाप्ति से लेकर अगेल स्पंदन की समाप्ति तक एक हृदयी चक्र (Cardiac Cycle) होता है।

  • हृदय एक पंप की तरह कार्य करता है। इसका प्रमुख कार्य शरीर कि विभिन्न भागों को रक्त पहुचाना है। हृदय से रक्त  धमनियों द्वारा शरीर के विभिन्न भागों को जाता है तथा वहां से शिराओं के द्वारा वापस आता है।

  • शुध्द या ऑक्सीजनयुक्त (Oxygenated) रक्त फेफड़ों से हृदय में आता है। हृदय इस रक्त को धमनियों के द्वारा पूरे शरीर शरीर में पहुंचाता है। शरीर के रक्त में मिला ऑक्सीजन प्रयुक्त हो जाता है और अशुध्द या ऑक्सीजन रहित रक्त शिराओं द्वारा फिर हृदय की ओर आता है। हृदय इस रक्त को ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए पुनः फेफड़ों में भेजता है। इस प्रकार यह चक्र निरंतर चलता रहता है।

  • रक्त (Blood) एक तरल संयोजी ऊतक है। यह एक क्षारीय विलयन है, जिसका pH मान 7.4 होता है। वयस्क मनुष्य में सामान्यतः 5-6 लीटर रक्त होता है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में लगभग 1 लीटर रक्त कम होता है।

  • रक्त के दो प्रमुख भाग होते हैं –

  1. प्लाज्मा

  2. रक्त कणिकाएं या रुधिराणु

  • कुल रक्त का लगभग 55 प्रतिशत भाग प्लाज्मा तथा शेष 45 प्रतिशत भाग रुधिराणु होता है।

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  • रुधिराणु तीन प्रकार के होते हैं –

  1. लाल रक्त कणिकाएं

  2. श्वेत रुधिराणु

  3. प्लेटलेट्स

  • प्लाज्मा में लगभग 91 प्रतिशत जल तथा शेष 9 प्रतिशत भाग में विभिन्न प्रकार के अकार्बनिक और कार्बनिक पदार्थ होते हैं। लाल रुधिराणु केवल कशेरुकियों के रूधिर में पाए जाते हैं और कुल रुधिर का लगभग 40 प्रतिशत भाग बनाते हैं। रुधिराणु का लगभग 90 प्रतिशत लाल रुधिराणु होते हैं। इनमें हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन पाई जाती है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन का परिवहन करता है, इसमें हीम (Haem) नामक लाल रंग का पदार्थ पाया जाता है, जो इसे लाल रंग प्रदान करता है।

  • रोगो के प्रति प्रतिरक्षा प्रदान करने का कार्य श्वेत रक्त कणिकाएं करती हैं। प्लेटलेट्स का प्रमुख योगदान रक्त का थक्का बनाने में होता है।

  • एक सामान्य मनुष्य में लाल रक्त कणिकाएं (R.B.C.) लगभग 54 लाख प्रति घन मिलीमीटर रक्त (स्त्रियों में कुछ कम) होती है। श्वेत रक्त कणिकाएं (B.C.) लगभग 5 हजार से 11 हजार प्रति घन मिलीमीटर रक्त होती है। इसमें सर्वाधिक संख्या में न्यूट्रिफिल्स (कुल W.B.C. का 60-70%) तथा सबसे कम बेसोफिल्स होती हैं। आकार में सबसे बड़ी W.B.C.  मोनोसाइट्स हैं। प्लेटलेट्स की संख्या 1.5 लाख प्रति घन मिलीमीटर रक्त होती है।

  • लाल रक्त कणिकाएं अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में विकसित होती है। इनका जीवनकाल लगभग 120 दिनों का होता है। तिल्ली या प्लीहा (Spleen) पुरानी रक्त कणिकाओं को नष्ट करने का कार्य करती है।

  • श्वेत रक्त कणिकाएं मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं –

  1. कणिकामय

  2. कणिकाविहीन

  • एसिडोफिल्स, बेसोफिल्स तथा न्यूट्रोफिल्स कणिकामय श्वेत रुधिराणु हैं। लिम्फोसाइट्स का निर्माण प्लीहा, लसिका ग्रंथि तथा थाइमस ग्रंथि आदि में होता है। रुधिर में श्वेत रक्त कणिकाओं की अत्यधिक मात्रा में उपस्थिति ल्यूकेमिया कहलाती है। इसे रक्त कैसर (Blood Cancer) भी कहते हैं।

  • रक्त ग्लूकोज स्तर मिलीग्राम प्रति डेसीमीटर में व्यक्त किया जाता है। रक्त में ग्लूकोज की सामान्य मात्रा 100 मिग्रा. प्रति डेसीलीटर होती है। रक्त ग्लूकोज के नियमन के लिए अग्न्याशय से इंसुलिन (Insulin) नामक हॉर्मोन का स्त्राव होता है। इस हॉर्मोन की कमी के कारण रक्त में ग्लूकोज की मात्रा अत्यधिक हो जाती है, जिससे मधुमेह रोग  होने की संभावना बढ़ जाती है।

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  • उम्र बढ़ने के साथ-साथ मानव का रक्त दाब बढ़ जाता है। मनुष्य का औसत रक्तचाप 120/80 होता है। धमनियों में रक्त दाब की दो अवस्थाएं होती हैं। पहले को प्रकुंचन दाब तथा दूसरे को प्रसारण दाब कहते हैं। सामान्य तौर पर प्रकुंचन दाब 120 मिली. Hg तथा प्रसारण दाब 80 मिली. Hg होता है। रक्त दाब को डॉक्टर स्फिग्मोमैनोमीटर यंत्र द्वारा मापा जाता है। 1900 ई. में ऑस्ट्रिया के जीव वैज्ञानिक एवं चिकित्सक कार्ल लैंडस्टीनर ने चार रक्त समूहों (A, B, AB तथा O) की खोज की। बाद में लैंडस्टीनर एवं वीनर द्वारा रीसस बंदर के रक्त में Rh फैक्टर की खोज की गई। लाल रक्त कणों में उपस्थित ग्लाइकोप्रोटीन के कारण रक्त में विभिन्नता पाई जाती है, जिसे एंटीजन या प्रतिजन कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है  –

  1. एंटीजन-A

  2. एंटीजन-B

  • एंटीजन की अनुपस्थिति में एक विशेष प्रकार की प्रोटीन प्लाज्मा में पाई जाती है, जिसे एंटीबॉडी या प्रतिरक्षी कहते हैं। यह दो प्रकार का होता है –

  1. एंटीबॉडी-a

  2. एंटीबॉडी-b

  • रुधिर वर्ग A में एंटीजन-A व एंटीबॉडी-b उपस्थित होता है, जबकि रुधिर वर्ग B में एंटीजन-B व एंटीबॉडी-a उपस्थित होता है।

  • रुधिर वर्ग AB में एंटीजन-A B दोनों उपस्थित होते हैं, परंतु एंटीबॉडी अनुपस्थित होता है जबकि रुधिर वर्ग O में एंटीजन अनुपस्थित, परंतु एंटीबॉडी-a व b दोनों उपस्थित होते हैं। रुधिर वर्ग AB को सर्वग्राही तथा रुधिर वर्ग O को सर्वदाता कहते हैं।

  • किसी शरीर में बाहर के रक्त चढ़ाने में रक्त समूह का विशेष महत्व होता है, जिसे निम्न चार्ट के अनुसार चढ़ाया जा सकता है –

रक्तदाता समूह

प्राप्तकर्ता रक्त समूह

A

B

AB

O

A

हां

नहीं

हां

नहीं

B

नहीं

हां

हां

नहीं

AB

नहीं

नहीं

हां

नहीं

O

हां

हां

हां

हां

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  • बर्नस्टीन (Bernstein, 1924) के अनुसार, A, B, O रुधिर वर्ग मनुष्य का एक आनुवंशिक लक्षण है। जनक (माता-पिता) रुधिर वर्ग का उनके संतानों में प्रकटन निम्न चार्ट के अनुसार होता है –

माता-पिता     के रुधिर वर्ग

संतानों में रुधिर वर्ग

संभव

असंभव

OxO

O

A, B, AB

OxA

AxA

O, A

B, AB

OxB

BxB

O, B

A, AB

AxB

O, A, B, AB

OxB

A, B

O, AB

AxAB

BxAB

ABxAB

A, B, AB

O

 

  • हृदय में ऐसी कोशिकाएं होती हैं, जो विद्युतीय तरंग उत्पन्न करती हैं। इन्हें पेस मेकर कोशिकाएं कहते हैं। हृदय स्पंदन इन्हीं विद्युतीय तरंगो द्वारा निष्पादित होता है।

  • रक्त में लाल रंग ऑक्सी-हीमोग्लोबिन युक्त रुधिर कणिकाओं (B.C.) के कारण होता है।

  • ल्यूकेमिया को रक्त कैंसर भी कहते हैं। जिसमें रुधिर में श्वेत रक्त कणिकाओं की संख्या आवश्यकता से अधिक बढ़ जाती हैं।

  • ब्रिटेन के शेफील्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम प्लास्टिक रक्त तैयार किया है, जिसे आपात स्थिति में खून के विकल्प के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह कृत्रिम रक्त हल्का है और इसे ठंडी जगह में भी रखने की जरुरत नही है। साथ ही यह लम्बे समय तक खराब नहीं होता। इस रक्त को प्लास्टिक कणिकाओं से तैयार किया गया है।

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उत्सर्जन तंत्र

  • शरीर की कोशिकाओं में उपापचय के फलस्वरुप, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), जल, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल आदि कई ऐसे अपशिष्ट (Waste) पदार्थ बनते रहते हैं, जो शरीर के लिए अनावश्यक व हानिकारक होते हैं।

  • अतः इन अपशिष्ट पदार्थों को शरीर के बाहरी वातावरण में विसर्जित कर दिया जाता है। इन अपशिष्ट पदार्थों को उत्सर्जी पदार्थ तथा वातावरण में इनके विसर्जन को उत्सर्जन कहते हैं। रूधिर को छानकर इसमें से अनावश्यक और अपशिष्ट पदार्थों को हटाना वृक्कों का मुख्य कार्य होता है। वृक्क शरीर के तरल को छानकर इसमें उपस्थित हानिकारक, अपशिष्ट एवं निरर्थक पदार्थों को मूत्र के रुप में शरीर से लगातार बाहर निकालते रहने के अतिरिक्त, शरीर में लवणों एवं जल की मात्रा का नियंत्रण भी करता है। यह रक्त के परासरणीयदाब (P.) एवं उसकी मात्रा का नियमन करता है।

  • मनुष्य सहित दूसरे स्तनियों में मुख्य उत्सर्जी अंग एक जोड़ी वृक्क पाए जाते हैं। वृक्क में नलिकाएं या नेफ्रॉन पाई जाती हैं, जो कि उत्सर्जन की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई हैं। प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख नेफ्रॉन पाए जाते हैं।

  • मनुष्य़ के शरीर में रक्त की शुध्दिकरण (Purification) की प्रक्रिया डायलिसिस (Dialysis) कहलाती है। जब किन्हीं कारणवश वृक्क क्षतिग्रस्त हो जाता है तथा रुधिर को साफ नहीं कर पाता है, तो ऐसी स्थिति में अपोहक (Dialyzer) का प्रयोग किया जाता है, जो कृत्रिम वृक्क (Artificial Kedney) के रुप में कार्य करता है।

  • अपोहन या डायलिसिस क्रिया के अंतर्गत घुलनशील पदार्थ का अर्धपारगम्य झिल्ली द्वारा आर-पार होना विसरण (Diffusion) सिध्दांत के अनुसार कार्य करता है। इसमें रुधिर अर्धपारगम्य झिल्ली द्वारा एक तरफ से प्रवाहित होता है तथा डायलिसिस घोल विपरीत दिशा से प्रवाहित होती है।

  • यूरिया यकृत में बनती है परंतु अतिसूक्ष्म निस्यंदन क्रिया द्वारा इस रुधिर से गुर्दे द्वारा पृथक कर दिया जाता है। परिसंचरण तंत्र द्वारा यूरिया यकृत से वृक्क में पहुंचता है, जहां मूत्र का निर्माण होता है।

  • सामान्यतः मनुष्य दिनभर में लगभग 1.45 मीटर मूत्र का उत्सर्जन करता है। मूत्र हल्का अम्लीय (pH मान 6) होता है तथा यूरोक्रोम की उपस्थिति के कारण इसका रंग हल्का पीला होता है। मूत्र में 95 प्रतिशत जल, 2.6 प्रतिशत यूरिया, 2 प्रतिशत अनावश्यक लवणों के आयन, 0.3 प्रतिशत क्रीटिनीन तथा सूक्ष्म मात्रा में यूरिक अम्ल व अन्य अपशिष्ट पदार्थ होते हैं।

  • कैल्शियम ऑक्जेलेट के कारण वृक्क में पथरी या अशमरी (Stones) बनती है। यह खनिज लवण प्रायः वृक्क की पेल्विस (Pelvis) में एक पिण्ड के रुप में एकत्र हो जाते हैं, जिससे मूत्र के रास्ते में रुकावट आती है।

  • यकृत एल्कोहॉल के निराविषन के लिए उत्तरदायी है। यह जटिल रासायनिक अभिक्रियाओं के माध्यम से हानिकारक तत्वों का निराविषन करता है।

  • त्वचा से अनावश्यक लवण व यूरिया आदि पसीने के रुप में बाहर निकलते हैं। यकृत, त्वचा तथा फेफड़े उत्सर्जन में सहायक अंग हैं।

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तंत्रिका तंत्र

  • तंत्रिका ऊतक की इकाई को न्यूरॉन या तंत्रिका कोशिका कहते हैं। ये शरीर की सबसे लंबी कोशिकाएं हैं। विविध तंत्रिका कोशिकाओं के अक्ष तंतुओं अर्थात एक्सांन्स एवं डेंड्राइट्स के बीच संपर्क बिंदु होते हैं, जिन्हें युग्मानुबंध या सिनैप्सेस कहते हैं। संवेदी या अभिवाही तंत्रिका कोशिकाएं (Sensory or Afferent Neurons) संवेदांगों से चेता प्रेरणाओं को प्राप्त करके इन्हें केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र में पहुंचाती हैं। चालक या अपवाही तंत्रिका कोशिकाएं (Motor or Efferent Neurons) केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र क्रियान्वयक या अपवाही अंगो (पेशियों व ग्रंथियों आदि) से जोड़ती हैं।

  • केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र के अंतर्गत मस्तिष्क (Brain) तथा मेरुरज्जु या सुषुम्ना आते हैं। यह तंत्र शरीर की सभी क्रियाओं का नियमन और नियंत्रण करता है। परिघीय तंत्रिका तंत्र के अंतर्गत शाखान्वित तंत्रिकाएं आती हैं, जो पूरी शरीर में जालवत फैली होती हैं। इसके अंतर्गत क्रैनियल तथा स्पाइनल तंत्रिकाएं आती हैं। क्रैनियल तंत्रिकाएं मस्तिष्क से जुड़ी होती हैं। सुषुम्नीय या स्पाइनल तंत्रिकाएं मेरुरज्जु से जुड़ी होती हैं।

  • मनुष्य में बारह जोड़ी क्रैनियल तंत्रिकाएं होती हैं। इनमें से पहली, दूसरी तथा आठवीं जोड़ी संवेदी (Sensory) होती हैं तथा शेष मिश्रित (संवेदी तथा चालक) होती हैं।

  • मनुष्य में 31 जोड़ी सुषुम्नीय अर्थात स्पाइनल तंत्रिकाएं पाई जाती हैं। ये हाथ-पैरों की पेशियों, त्वचा ग्रंथियों, त्वचा ज्ञानेन्द्रियों आदि को सुषुम्ना या मेरुरज्जु से जोड़ती हैं।

  • मानव मस्तिष्क के विभिन्न भागों के द्वारा सभी गतिविधियों का संचालन तथा नियमन किया जाता है। मानव के पश्च मस्तिष्क (Hind Brain) या रॉम्बेनसेफैलॉन (Rhombencephalon) के अंतर्गत मस्तिष्क पुच्छ या मेड्यूला ऑब्लांन्गाटा आता है, जिसे प्रायः मेड्यूला कहा जाता है। इसकी लंबाई लगभग तीन सेमी. होती है तथा यह ऊपर की ओर पोन्स (Pons) तथा नीचे की ओर सुषुम्ना (Spinal Cord) से जुड़ा होता है।

  • मेड्यूला में भोजन निगरण (Swallowing), उल्टी (Vomiting), हृदय स्पंदन (Heart Beat) की दर एवं प्रबलता, खांचने (Coughing), छींकने (Sneezing) इत्यादि का नियमन केन्द्र होता है।

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  • मस्तिष्क सोचने, हृदय गति नियंत्रण तथा शरीर के संतुलन तीनों के लिए उत्तरदायी होता है। सेरीब्रम मस्तिष्क का सबसे बड़ा भाग होता है तथा यह ऐच्छिक क्रियाओं, स्मरण क्षमता आदि को नियंत्रित करता है। अन्य जंतुओं की तुलना में मनुष्य यह बहुत बड़ा (पूरी मस्तिष्क का लगभग 80% भाग) होता है।

  • शरीर में प्रतिवर्ती क्रियाओं (Reflex Actions) का नियंत्रण मेरुरज्जु य कशेरुक रज्जु द्वारा होता है। स्वभाव के आधार पर प्रतिवर्ती क्रिया की दो प्रमुख श्रेणियां

  1. अबंधित (Unconditioned)

  2. अनुबंधित (Conditioned) हैं।

  • प्रतिवर्ती क्रिया के द्वारा ही हमारा पैर कांटे पर पड़ने पर हम तुरंत पैर को पीछे की ओर खींच लेते हैं।

  • मानव सहित अधिकांश स्तनधारी तथा पक्षी नियततापी होते हैं अर्थात इनके शरीर का ताप सर्दी या गर्मी में एक समान रहता है। मनुष्य के शरीर का तापमान औसतन 98.6 फॉरेनहाइट अथवा 370 सेंटीग्रेड होता है। केल्विन पैमाने पर शरीर का ताप 310 K होता है।

  • हाइपोथैलेमस अग्र मस्तिष्क का भाग है तथा यह भूख-प्यास, प्यार, घृणा, परितृप्ति तथा ताप को नियंत्रित करता है। यह अंतःस्रावी ग्रंथियों से स्रावित होने वाले हॉर्मोन्स का भी नियंत्रण करता है।

  • सुई चुभाने पर मस्तिष्क दर्द महसूस नहीं करेगा। मस्तिष्क में दर्द ग्राहिकाओं का अभाव होता है।

  • 1861 में जर्मन चिकित्सक कार्ल रीनहोल्ड आगस्त वुण्डरलिच ने एक लाख व्यक्तियों के तापमान रिकॉर्ड के बाद घोषित किय था कि सामान्य मनुष्य के शरीर का तापक्रम  औसतन 98.6 फॉरेनहाइट अथवा 370 सेंटीग्रड होता है। केल्विन पैमाने पर शरीर का ताप 310 K होता है।

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अंतःस्त्रावी तंत्र

  • ग्रंथि (Gland) कुछ ऐसी कोशिकाओं, ऊतकों अथवा अंगो को कहते हैं, जिसकी कोशिकाएं किसी पदार्थ का संश्लेषण करके उन्हें स्त्रावित (Secretion) करती हैं। मानव सहित अन्य कशेरुकी जंतुओं में इनकी तीन स्पष्ट श्रेणियां होती हैं –

  1. बहिःस्त्रावी ग्रंथियां (Exocrine Gland) – जोकि नलिकायुक्त होती हैं। इनसे स्त्रावित पदार्थ इनकी नलिकाओं (Ducts) में बहकर संबंधित एपिथीलियमी स्तर की सतह पर मुक्त होता है,  जैसे – दुग्ध ग्रंथि, स्वेद ग्रंथि, अश्रु ग्रंथि, लार ग्रंथि आदि।

  2. अंतःस्त्रावी ग्रंथियां (Endocrine Glands) जो कि नलिकाविहीन (Ductless) होती हैं। इनसे स्त्रावित पदार्थ या हॉर्मोन ऊतक द्रव्य में मुक्त होते हैं और रुधिर कोशिकाओं में पहुंचकर सारे शरीर में संचरित होते  हैं, जैसे- पीयूष अर्थात पिट्यूटरी ग्रंथि, थायराइड, पैराथायरॉइड, एड्रीनल, पीनियल, थाणस ग्रंथि आदि।

  3. मिश्रित ग्रथियां (Mixed Glands) जिनमें  बहिःस्त्रावी तथा अंतः स्त्रावी दोनों प्रकार के ऊतक या कोशिकाएं होती हैं, जैसे अग्न्याशय।

  • अग्न्याशय एक मिश्रित ग्रंथि है। जिससे पाचक एंजाइम तथा इसकी लैंगरहैंस की द्वीपकाओं की बीटा कोशिकाओं से इंसुलिन, एल्फा कोशाओं से ग्लूकैगॉन तथ डेल्टा कोशाओं से सोमैटोस्टैटिन नामक हॉर्मोन्स का स्त्रावण होता है। यदि अग्न्याशय में किन्हीं कारणों से खराबी आ जाए, तो इस हॉर्मोन्स का निर्माण सुचारू रुप से नहीं हो सकेगा।

  • अग्न्याशय को पाचक रस के उत्पादन के लिए प्रेरित या उत्तेजित करने वाला हार्मोन सिक्रिटिन है । छोटी  आंत के ग्रहणी से उत्पन्न यह हॉर्मोन जठर रस के स्त्रावण को भी कम करता है तथा संभवतः पित्ताशय के संकुचन को भी प्रेरित करता है। रासायनिक संरचना की दृष्टि से  इंसुलिन एक पेप्टाइड हॉर्मोन  है, जिसकी रचना 51 अमीनों  अम्लों से होती है। यह शरीर में ग्लूकोज के उपापचय को नियंत्रित करता है। इसकी कमी से मधुमेह का रोग हो जाता है तथा अधिकता से रुधिर में ग्लूकोज की मात्रा कम रहने लगती है। उदकमेह (डायबिटीज इन्सीपीडस) वाले शरीर को प्रायः  अत्यधिक प्यास लगती है क्योंकि इसमें शरीर का निर्जलीकरण हो जाता है,  जिसके उपचार हेतु  कृत्रिम ADH या वेसोप्रेसिन का उपयोग करते  हैं, जिसे पिट्रेसिन कहते हैं।

  • कॉफी. चाय या ह्वीस्की (मदिरा) के सेवन के शरीर में ADH हॉर्मोन की मात्रा घट जाती है, जिससे मूत्र की मात्रा बढ़ने से बार-बार मूत्र त्याग की इच्छा होती है तथा शरीर का निर्जलीकरण हो जाता है।

  • वेसोप्रीसिन या ADH की अधिकता होने पर मूत्र गाढ़ा तथा रुधिर तनु हो जाता है, जिससे रुधिर दाब बढ़ जाता है। वेसोप्रोसिन का स्त्रावण पीयूष ग्रंथि से होता है। इसका प्रमुख  कार्य वृक्क में वृक्क नलिकाओं के दूरस्थ कुंडलित भाग तथा संग्रह नलिकाओं से जल में रुधिर में पुनरावशोषण  को बढ़ाना  होती है,  इसीलिए  इसे मूत्ररोधी हॉर्मोन या ADH कहते हैं।

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  • मानव शरीर की सबसे छोटी अंतःस्त्रावी ग्रंथि पिट्यूटरी या पीयूष ग्रंथि होती  है,  जो कि गोल तथा भूरी लाल होती है। इसका  भार लगभग 0.5 से 1.0 ग्राम तथा व्यास 1-1.5 सेमी. होता है। इसे हाइपोफाइसिस सेरीब्राई भी कहते हैं, जो कि मास्टर ग्रंथि के नाम से   प्रसिध्द है। हाइपोथैलेमस को पीयूष ग्रंथि का भी मास्टर माना जात है क्योंकि               मस्तिष्क का यह भाग तंत्रिका तंत्र तथा अंतःस्त्रावी तंत्र के प्रमुख संयोजक की भूमिका निभाता  है।

  • सोमैटोट्रोफिन या वृध्दि हॉर्मोन का शरीर में संबंध वृध्दि से है, जिसकी  अधिकता में भीमकायिता की अवस्था उत्पन्न होती है,  जबकि कमी से बौनापन।

  • थायरॉक्सिन हॉर्मोन का स्त्रावण गले में स्थित थायराइड ग्रंथि द्वारा किया जाता है। शरीर में यह उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण करता है और वृध्दि उत्प्रेरक के रुप में  भी कार्य करता है। इस हॉर्मोन की कमी से बच्चों में जड़मानवता तथा वयस्कों में मिक्सिडीमा नामक रोग हो जाता है।

  • सामान्य घेंघा या गलगंड तथा हाशीमोटो का रोग भी इसकी कमी से होता है। नेत्रोत्सेंधी गलगंड या एक्जोप्थैल्मिक ग्वायटर तथा प्लूमर का रोग थायरॉइड ग्रंथि के अतिस्त्रावण के कारण होता है।

  • आयोडीन युक्त हॉर्मोन थायारॉक्सिन एक अमीनों अम्ल है, जिसे थायरॉइड ग्रंथि से स्त्रावित करने के लिए प्रेरित करने वाला हॉर्मोन्स थाइरोट्रोपिन या TSH है। TSH (Thyroid Stimulating Hormone) पीयूष ग्रंथि से स्त्रावित होता है। शरीर में  आयोडीन की कमी से घेंघा रोग हो जाता है।

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  • पैराथायरॉइड या परावटु ग्रंथियां भ्रूण से एण्डोडर्म से व्यत्पन्न ग्रंथि है, जो कि पीयूष ग्रंथि से स्वतंत्र कार्य कर सकती है। यह गले में थायरॉइड ग्रंथि के ठीक पीछे स्थित होती है। इसके द्वारा पैरथार्मोन (Parathormone- PTH) नाम  हार्मोन का स्त्राव होता है, जो कि रुधिर में कैल्शियम आयन की आदर्श मात्रा को बनाए रखता है।

  • एड्रीनेलीन या एपिनेफ्रीन नामक हॉर्मोन एड्रीनल मेड्यूला से स्त्रावित होता है, जिसके स्त्राव से हृदय गति में वृध्दि होती है तथा शरीर में उत्तेजना का अनुभव होता है। इसके प्रभाव से वाहिकाविस्तारण के कारण मस्तिष्क, कंकाल पेशियों, हृदय, फेफड़ों यकृत आदि अंगों में रुधिर संचार बढ़ जाता है। इससे नॉरएपिनेफ्रीन के प्रभाव से बढ़ा हुआ रुधिर दाब कुछ कम  हो जाता है।

  • एड्रीनल मेड्यूला से स्त्रावित नॉरएपिनेफ्रीन के प्रभाव से वाहिकांसकीरण के कारण त्वचा, पाचन, उत्सर्जन, जनन आदि तंत्रों के अंगो में रुधिर संचार कम हो जाता है। इससे इन अंगो की क्रियाशीलता कम हो जाती है और रुधिर दाब  बढ़ जाता है।

  • एड्रीनल ग्रंथि से स्त्रावित हॉर्मोन को लड़ो एवं उड़ो (Fisht and Flight) हॉर्मोन भी कहा जाता है। ये हॉर्मोन शरीर मे संकटावस्था का सामना करने हेतु उग्र विपत्ति प्रतिक्रिया करने हेतु तैयार रहते हैं। अर्थात संकटकाल एवं विशेष परिस्थितियों में उचित  निर्णय लेने में सहयोग प्रदान करते हैं।

  • एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन तथा रिलैक्सिन प्रमुख मादा हॉर्मोन्स हैं। एस्ट्रोजन का उत्पादन स्त्रियो में अंडाशय की ग्राफियन पुटिकाओं की थीका इन्टरना की कोशिकाओं द्वारा यौवनारम्भ से  लेकर रजोनिवृत्ति की आयु (लगभग 45 से 52 वर्ष) तक होता है। प्रमुख एस्ट्रोजन ईस्ट्रैडिऑल होता है,  जिसे नारी-विकास हॉर्मोन कहते हैं। यह मादा के द्वीतीयक लैंगिक लक्षणों जैसे – लड़कियों मे स्तनों, दुग्ध ग्रंथियों, गर्भाशय तथा योनि इत्यादि के समुचित विकास में सहायक है। एस्ट्रोजेंस का स्त्रवण पीयूष ग्रंथि के पुटिका प्रेरक हॉर्मोन (FSH) तथा  लूटीनाइजिंग हॉर्मोन (LH) के नियंत्रण में होता है।

  • प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) का स्त्रावण कॉर्पस लूटियम से होता है तथा यह हॉर्मोन गर्भधारण के लिए आवश्यक लक्षणों के विकास को प्रेरित करता है। इसके प्रभाव में गर्भाशय की एंडोमीट्रियम का मोटा होना, इसमें रुधिर संचरण का बढ़ना, इसकी कोशिकाओं में वसाओं एवं ग्लाइकोजन का संचय होना तथा अंडाशयों में नई पुटिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया बंद होना शामिल है।

  • रिलैक्सिन (Relaxin) हॉर्मोन का स्त्रावण गर्भावस्था में कॉर्पस लुटियम तथा आंवल द्वारा होता है। यह एक पॉलीपेटाइड होता है। यह हॉर्मोन श्रोणि मेखला के प्यूबिक सिम्फाइसिस नामक जोड़ को लचकदार बनाकर फैलाता है, जिससे गर्भाशय ग्रीवा चौड़ी होती है और शिशु जन्म में सुगमता होती है।

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  • पुरुषों में वृषणों (Testes) की लेडिग की कोशिकाओं (Cells of Leydig) से नर हॉर्मोन्स अर्थात एंड्रोजेंस का स्त्रावण होता है। प्रमुख एंड्रोजन टेस्टोस्टेरॉन होता है। इसे पौरुष विकास हॉर्मोन भी कहते हैं। यह पुरुषोचित लैंगिक लक्षणों के परिवर्तन एवं यौन आचरण को प्रेरित करता है।

  • मां और शिशु के बीच गले लगना या चूमना तथा शिशु की देखभाल अर्थात वात्सल्य की तथा मैथुन के समय भोग विलास की भावनाओं को ऑक्सीटोसिन नामक  हॉर्मोन बढ़ाता है। ऑक्सीटोसिन के दो लक्ष्य ऊतक होते हैं – स्त्रियों के गर्भाशय तथा स्तन ग्रंथियां। यह हॉर्मोन शिशु द्वारा दुग्धपान के समय स्तनों की पेशियो को सिकोड़कर दुग्ध उत्क्षेपण को बढ़ाने का कार्य करता है।

  • प्रोलैक्टिन या लूटिओट्रोपिक हॉर्मोन का स्त्रावण अग्र पिट्यूटरी की लैप्टोट्रोफ कोशिकाएं करती हैं। इसका प्रमुख कार्य शिशु जन्म के बाद दुग्ध के स्त्रावण को प्रेरित करना है।

  • पीनियल ग्लैंड मस्तिष्क के प्रमस्तिष्क गोलार्ध्दों के बीच स्थित होता है। इसे एपीफाइसिस सेरेब्राई भी कहते हैं। इससे मेलाटोनिन नामक हॉर्मोन स्त्रावित होता है, जो निद्रा व जागने की क्रिया को नियंत्रित करता है। मंद प्रकाश तथा रात में इसका स्त्रावण अधिक, जबकि तीव्र प्रकाश तथा दिन में इसका स्त्रावण कम होता है।

  • जन ग्रंथि –   प्रोजेस्टेरॉन

पीयूष ग्रंथि   –   वृध्दि हॉर्मोन

अग्न्याशय    –   इंसुलिन

अधिवृक्क    –   कार्टीसोन

  • एड्रिनेलीन –   क्रोध, भय,  खतरा

एस्ट्रोजन     –   स्त्रियां

इन्सुलिन     –   ग्लकोज

फेरोमोन      –   गंध के बोध से साथी को आकर्षित करना

  • हॉर्मोन –   टेस्टोस्टेरॉन

एंजाइम      –   लाइपेस

फॉस्फोलिपिड  –   लेसिथिन

बहुलक       –   पालीइथीन

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जनन एवं भ्रूणीय विकास

  • वह प्रक्रम जिसके माध्यम से जीव अपनी संख्या में वृध्दि करता है, प्रजनन (Reproduction) कहलाता है। प्रजनन में भाग लेने वाले अंगों को प्रजनन अंग तथा जीव विशेष की सभी प्रजनन अंगो को सम्मिलित रुप से प्रजनन तंत्र (Reproductive System) कहते हैं।

  • प्रजनन के माध्यम से प्रत्येक जीवधारी अपने समान जीवों को पैदा करता है। मानव भी अन्य कशेरुकियों का तरह, एकलिंगी (Unisexual) होता है। अर्थात इनमें नर तथा मादा के जननांगों और लैंगिक लक्षणों में भिन्नता होती है। पुरुषों में एक जोड़ी वृषण (Testes) तथा स्त्रियों में एक जोड़ी अंडाशय (Ovaries) प्रमुख जननांग होते हैं।

  • मानव में निषेचन (Fertilization) की क्रिया अंडवाहिनी (Oviduct) या फैलोपियन नली (Fallaopain Tube) में संपन्न होती हैं। यहां नर युग्मक (शुक्राणु) तथा मादा युग्मक (अंडाणु) में निषेचन क्रिया के द्वारा युग्मनज (Zygote) का निर्माण होता है, जो द्वीगणित (Diploid) होता है है और विकास कर शिशु का निर्माण करता है। मनुष्य में जन्म का समय निषेचन के बाद आदर्श रुप से 266 दिन या 38 सप्ताह का होता है।

  • मादा जनन पथ में पहुंचने के पश्चात शुक्राणु की निषेचन क्षमता सामान्यतः 48 घंटों तक तथा कभी-कभी 72 घंटों तक सुरक्षित रहती है। जबकि अंडोत्सर्ग के बाद, अंडक कोशिका  लगभग 12 से 24 घंटो तक निषेचन के योग्य बने रहते हैं।

  • निषेचन क्रिया के बाद युग्मनज अर्थात जाइगोट में विभाजन प्रारंभ हो जाता है तथा क्रमशः मॉरुला, ब्लास्टुला व गैस्टुला का निर्माण होता है। गैस्टुला के निर्माण की प्रक्रिया तीसरे सप्ताह में होती है तथा इसके दौरान तीन प्रारंभिक अंकुरण स्तरों की स्थापना होती है। मानव भ्रूण का हृदय  अपने परिवर्तन के चतुर्थ-पंचम सप्ताह में स्पंदन करने लगता है। भ्रूणीय विकास के तीसरे से आठवें सप्ताह को भ्रूण विकास काल कहते हैं क्योंकि यह अंग विकास का मुख्य समय होता है। तीसरे महीने से जन्म तक के सय को भ्रूणकाल कहते हैं जिसमें ऊतकों तथा अंगों का परिपक्वन तथा शारीरिक वृध्दि होती है।

  • उल्व या ऐम्नियॉन की उल्वी तरल भरा होता है, जो कि भ्रूण को नम बनाए रखने, बाहरी  दबाव तथा धक्कों इत्यादि से इसकी सुरक्षा करने का कार्य करता है। जरायु यो कोरिओन नामक कला गैसीय विनिमय का नियंत्रण करती है। जबकि अपरोपोषिका या ऐलेंटाइक कला भ्रूण के  उपापचयी अपशिष्ट पदार्थ का एकत्रण व गैसीय विनिमय में सहयोग करता है।

  • पुरुष का शुक्राणु महिला के डिम्ब (Ovum) को डिम्बवाहिनी नली (Fallopian Tube) में निषेचित करता है।

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पादप कार्यिकी

प्रकाश संश्लेषण

  • प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) वह क्रिया है, जिसमें पौधों के हरे भाग सूर्य से प्रकाश ऊर्जा को ग्रहण कर वायु से ली गई कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा मृदा से शोषित जल (H2O) द्वारा कार्बोहाइड्रेट्स का निर्माण करते हैं एवं ऑक्सीजन (O2) को अप्रधान रचना के रुप में बाहर निकलते हैं।

  • पृथ्वी पर कुल प्रकाश संश्लेषण का लगभग 90 प्रथिशत भाग जलीय पौधे व शैवालों द्वारा होता है। इसमें लगभग 85 प्रतिशत भाग समुद्र में (मुख्यतः शैवालों द्वारा) तथा शेष 5 प्रतिशत भाग नदी, तालाब आदि में होता है। पौधों की प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से उत्पन्न समस्त ऑक्सीजन जल से प्राप्त होती है।

  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा हरे पौधें भोज्य पदार्थ (कार्बोहाइड्रेट) का निर्माण करते हैं। इस क्रिया मे पौधे प्राकृतिक रुप से सूर्य प्रकाश से ही ऊर्जा ग्रहण करते हैं। इस क्रिया में पौधे प्राकृतिक रुप से सूर्य के प्रकाश से ही ऊर्जा ग्रहण करते हैं, किंतु समुद्रीय शैवाल चन्द्रमा के प्रकाश में यह क्रिया करते हैं तथा विद्युत प्रकाश में भी पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है।

  • प्रकाश अवशोषित करने वाले अणुओं को प्रकाशसंश्लेषी वर्णक कहते हैं, जो क्लोरोप्लास्ट (हरितलवक) के ग्रेना भाग में पाए जाते हैं। ये मुख्यतः नीला, बैंगनी, लाल व नारंगी किरणों का अवशोषण करते हैं।

  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया क्लोरोप्लास्ट नामक कोशिकांग में संपन्न होती है। क्लोरोप्लास्ट मे हरे रंग का वर्णक क्लोरोफिल (पर्णहरिम) पाया जाता है। मैग्नीशियम क्लोरोफिल का प्रमुख तत्व है।

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  • प्रकाश, तापक्रम, कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल संश्लेषण की क्रिया को नियंत्रित करने वाले बाह्य कारक हैं। प्रकाश संश्लेषण पर प्रकाश का प्रभाव तीन प्रकार से होता है। यह प्रखरता, प्रकाश का प्रकार (Quality) तथा उसके अंतराल तीनों से प्रभावित होता है। दुर्बल प्रखरता के प्रकाश में संभवतः पर्णरंध्रों के न खुलने से तथा गैसीय विसरण बहुत धीमी दर से होने के कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं होती है। जैसे-जैसे प्रकाश की तीव्रता बढ़ती है, प्रकाश संश्लेषण की क्रिया आरंभ हो जाती है तथा गति प्राप्त करती है। विभिन्न तरंग दैर्ध्यों के प्रभाव के संबंध में, अधिकतम प्रकाश संश्लेषण लाल प्रकाश (650 नैनोमीटर) में तथा द्वीतीय अधिकतम नीले प्रकाश (475 नैनोमीटर) में पाया जाता है। हालांकि पर्णहरित लाल प्रकाश की अपेक्षा नीला प्रकाश अधिक अवशोषित करता है, परंतु प्रकाश संश्लेषण में सर्वाधिक प्रयोग लाल प्रकाश का ही होता है।

  • प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में हरे पौधे प्रकाश ऊर्जा (Light Energy) को रासायनिक ऊर्जा (Chemical Energy) में रुपांतरित कर देते हैं, जो कि पौधों में कार्बनिक पदार्थ के रुप में संचित हो जाती है। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया दो चरणों में संपन्न होती है। पहले चरण में प्रकाश पर निर्भर प्रतिक्रियाओं के द्वारा प्रकाश ऊर्जा ATP और NADPH के ऊर्जा-संचित करने वाले अणुओं के निर्माण में प्रयुक्त होती है। दूसरे चरण में प्रकाश से स्वतंत्र प्रतिक्रियाओं द्वारा इन उत्पादों का प्रयोग कार्बन डाइऑक्साइड के संग्रहण और न्यूनीकरण में किया जाता है।

  • क्लोरेला क्लोरोफाइटा से संबंधित एक कोशिकीय हरित शैवाल की एक प्रजाति है। सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलने की क्लोरेला की दक्षता सर्वाधिक 8 प्रतिशत होती है।

  • सूर्य का प्रकाश, प्रकाश-संश्लेषण के लिए आवश्यक है। बल्ब आदि के तीव्र कृत्रिम प्रकाश में भी प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया होती है।

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पादप पोषण

  • हरे पौधे स्वपोषी (Autotrophic) होते हैं, अर्थात ये कार्बनिक पदार्थों (भोजन) का निर्माण स्वयं करते हैं। पौधों द्वारा जब जल व अकार्बनिक तत्व भूमि से प्राप्त किया जाता है तथा अकार्बनिक तत्व भूमि में खनिजों के रुप में उपस्थित होते हैं। ये खनिज तत्व या पोषक तत्व (Nutrient Elements) कहलाते हैं तथा इनका पोषण खनिज पोषण (Mineral Nutrition) कहलाता है।

  • पौधों को अपना जीवन-चक्र नियमित रुप से पूरा करने, विकार रहित रहने तथा समुचित विकास के लिए सत्रह अनिवार्य तत्वों को चिन्हांकित किया गया है। इनमें से नौ तत्वों की आवश्यकता वृहद मात्रा में होती है तथा ये दीर्घ मात्रा पोषक तत्व कहलाते हैं। जबकि आठ तत्वों की आवश्यकता लघु मात्रा में होती है, जिन्हें सूक्ष्मपोषक या लघु मात्रा पोषक तत्व  कहते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों की सांद्रता प्रायः 1 ppm से कम होती है।

  • कार्बन (C), हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O), नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटैशियम (K), सल्फर (S), कैल्शियम (Ca), मैग्नीशियम (Mg) दीर्घ मात्रा पोषक तत्व हैं।

  • बोरॉन (B), क्लरीन (Cl), कॉपर या तांबा (Cu), लौह (Fe), मैंगनीज (Mn), मॉलीब्डेनम (Mo), निकेल (Ni), जिंक (Zn) सूक्ष्म पोषक तत्व की श्रेणी में आते हैं।

  • जाइलम (Xylem) को जल संवाहक ऊतक (Water Conducting Tissue) भी कहते हैं। इसका प्रमुख कार्य अवशोषित जल तथा खनिज लवणों को पौधे के विभिन्न भागों तक पहुंचाना है। यह चार प्रकार की कोशाओं यथा – वाहिनिकाएं, वाहिकाएं, काष्ठ मृदूतक तथा काष्ठ तंतु से निर्मित होता है।

  • फ्लोएम को बास्ट (Bast) ऊतक भी कहते हैं। इसका प्रमुख कार्य पौधे के हरे भागों में निर्मित भोज्य पदार्थों को दूसरे भागों में स्थानांतरित करना है। यह चार प्रकार की कोशाओ यथा – चालनी  अवयव , सखि कोशाएं, फ्लोएम मूदूतक एवं फ्लोएम तंतु से निर्मित होता है।

  • अमरबेल (Cuscuta) एक पूर्ण स्तंभ परजीवी (Total Stem Parasite) आबृत्तबीजी पौधा है, जिसका तना पतला, दुर्बल तथा पीले रंग का होता है। इसका तना पोषक के चारों ओर लिपट कर परजीवी मूल (Haustorium) द्वारा भोजन, खनिज लवण और जल (H2O) प्राप्त करता है।

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पादप  हॉर्मोन

  • पादप हॉर्मोन (Phytohormones) वे कार्बनिक पदार्थ हैं, जो पौधे के एक भाग में प्राकृतिक रुप से बनते हैं तथा दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होते हैं। ये वृध्दि, प्रजनन एवं अनेक उपापचयी क्रियाओं को प्रभावित व नियमित करते हैं। ध्यातव्य है कि हॉर्मोन शब्द का प्रयोग उत्तेजित करने वाला पदार्थ के रुप में सर्वप्रथम स्टर्लिंग ने वर्ष 1906 में किया था। उनके अनुसार, ये पदार्थ जंतुओं में नलिकाविहीन ग्रंथियों द्वारा स्त्रावित होते हैं तथा शरीर के विभिन्न भागों में फैलकर कुछ विशेष क्रियाओं को क्रियान्वित करते है।

  • सामान्यतः पादप हॉर्मोनों के पांच प्रमुख वर्ग होते हैं –

  1. ऑक्सिन

  2. जिबरेलिन

  3. साइटोकाइनिन

  4. एबसिसिक अम्ल

  5. एथिलीन

  • ध्यातव्य है कि पादप हॉर्मोन को वृध्दि नियमाक पदार्थ (Growth Regulators) भी कहते हैं, जो वृध्दिवर्धक (Growth Promotors) तथा वृध्दिरोधक (Growth Inhibitors) दोनों रुप में होते हैं। सामान्यतः ऑक्सिन, जिबरेलिन तथा साइटोकइनिन कम सांद्रता पर वृध्दिवर्धक का कार्य करते हैं। किंतु एबसिसिक अम्ल एवं एथिलीन कम सांद्रता पर वृध्दिरोधक का कार्य करते हैं तथा इन्हें वृध्दिरोधक पदार्थ भी कहा जाता है।

  • ऑक्सिन के प्रयोग से संतरा, नींबू, अंगूर, केला, टमाटर आदि के फलों में बिना परागण (Pollination) व निषेचन (Fertilization) के भी फल का विकास होता  है। यह फल बीजरहित होते हैं। इनके पुष्पकली से पुंकेसर निकालकर, वर्तिकाग्र के ऊपर ऑक्सिन का लेपन करने से बीजरहित फल बन जाते हैं। बिना निषेचन के फलों का विकास अनिषेकफलन कहलाता है। ऑक्सिन का उपयोग अपतृण निवारण तथा फसलों को गिरने से बचाने में भी होता है।

  • जिबरेलिन का उपयोग बौनी प्रजातियों की लंबाई में वृध्दि, पुष्पन, अनिषेकफलन तथा बीजों के अंकुरण में होता है।

  • साइटोकाइनिन को फाइटोकाइनिन भी कहते हैं, जिसका प्रमुख कार्य कोशा-विभाजन है। यह पदार्थ जीर्णता (Senescence) को रोकता है तथा क्लोरोफिल को काफी समय तक नष्ट होने से बचाता है।

  • एबसिसिक अम्ल पुष्पन, कोशा विभाजन तथा बीजों के अंकुरण को अवरुध्द करता है।

  • एथिलीन को फल पकाने वाला हॉर्मोन (Repening Hormone) कहते हैं। यह पौधे के तने के अग्र भाग में बनता है और विसरित होकर फलों को पकाने में सहायता प्रदान करता है। एथिलीन पत्तियों, फलों व पुष्पों के विलगन (पौधे से विलग होने की क्रिया) को तीव्र करता है।

  • इंसुलिन अग्न्याशय या पैक्रियाज के अन्तःस्त्रावी भाग लैंगरहैंस द्वीपिकाओं की बीटा कोशिकाओं से स्त्रावित होने वाला जंतु हॉर्मोन है। इसकी कमी से मधुमेह रोग हो जाता है।

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पादप जनन

  • पादप जनन वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से पौधे अपने जैसे नए संतति उत्पन्न करते हैं। यह मुख्यतः दो प्रकार से होता है –

  1. लैंगिक जनन

  2. अलैंगिक जनन

  • जीवन-चक्र की दृष्टि से पौधे का सबसे महत्वपूर्ण भाग पुष्प है। यह पौधे के प्रजनन में सहायक होता है। एक पुष्प में पुंकेसर (Stamens) और स्त्रीकेसर (Carpels) मिलकर प्रजनन अंगो का निर्माण करते हैं।

  • परागकणों के परागकोश (Anther) से वर्तिकाग्र (Stigma) तक पहुंचने की क्रिया को परागण (Pollination) कहते हैं, जो लैंगिक जनन के लिए आवश्यक होता है। परागण की क्रिया दो प्रकार से होती है –

  1. स्व-परागण

  2. पर-परागण

  • उभयलिंगी पुष्प में, पुमंग (Androecium) तथा जायांग (Gynoecium) के अलग-अलग समय पर परिपक्व होने की घटना पृथकपक्वता या भिन्नकालपक्वता कहलाती है, जो कि दो प्रकार की होती है –

  1. पूर्वपुंपक्वता (Protandry )

  2. पूर्वस्त्रीपक्वता (Protogamy)

  • पूर्वपुंपक्वता में परागकोश अंडाशय से पूर्व पकते हैं, जबकि पूर्वस्त्रीपक्वता में अंडाशय परागकोश से पहले पकता है। इन पुष्पों में स्वपरागण संपन्न नहीं हो पाता है।

  • कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation), प्रजनन की एक अलैंगिक विधि है। इसमें नए पौधे किसी भी जनन अंग की सहायता के बिना, पुराने पौधों के भागों (जैसे तना, जड़ एवं पत्तियों) से प्राप्त किए जाते हैं। स्तंभ कर्तन या तना काट, दाब लगाना तथा कलम बांधना आदि इसकी विधियां हैं।

  • अलैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न नए पौधे अपने जनक के आकारिकीय तथा आनुवांशिकीय रुप से समरुप होते हैं। इसके विपरीत लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न (बीजों से) पौधे आकारिकीय तथा आनुवंशिकीय रुप से अपने जनकों के समरुप नहीं होते, उनमें विभिन्नताएं पाई जाती हैं।

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  • बोगेनविलिया, कार्नेशन, गुलाब तथा अंगूर में स्तंभ कर्तन द्वारा प्रवर्धन होता है, जबकि कोको के स्तंभ कर्तन द्वारा प्रवर्धन के साथ ही बीजों द्वार प्रवर्धन भी होता है। इसके  बीजों को सर्वप्रथम नर्सरी में उगाते हैं, तत्पश्चात इन नवजात पौधों को मृदा में चार फीट की दूरी पर प्रत्यारोपित कर देते हैं।

  • दाब तकनीक में पौधे की तना शाका को दबाकर भूमि से संपर्क कराया जाता है, कुछ दिनों में तना शाखा में जड़े उग आती हैं। इसे अलग कर नए पौधे के रूप में उगा लिया जाता है। चमेली के पौधे का प्रवर्धन इसी प्रकारत किया जाता है, जबकि मुसम्बी के पौधे का प्रवर्धन कलम बंध तकनीक से किया जाता है।

  • गन्ने का तना ठोस एवं संधिबध्द होता है, जिसमें पर्व (Nodes) तथा पर्वसंधियां (Intemodes) पाई जाती हैं। इसमें आमतौर पर स्तंभ कर्तन या तना काट विधि द्वारा कायिक प्रवर्धन होता है।

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आर्थिक महत्व

  • मानव के जीवन-यापन व सुख-समृध्दि हेतु पौधे एवं उनके उत्पाद की आवश्यकता होती है। विभिन्न प्रकार के भोज्य पदार्थ यथा – अनाज, दालें, चीनी, तेल इत्यादि तथा रेशों से कपड़ा एवं लकड़ी से मकान व फर्नीचर आदि की सुविधाएं पौधों से ही प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त कोयला, पेट्रोल, दवाइयां व अन्य लाभदायक पदार्थों के स्त्रोत पौधे ही होते हैं.

  • सूरजमुखी का तेल हृदय रोगियों के लिए उपयोगी होता है, क्योंकि इसमें वसा की मात्रा बहुत ही कम होती है। सूरजमुखी एस्टरेसी (Asteraceae) कुल के अंतर्गत आता है तथा यह आवृत्तबीजी पौधा होता है जिसका उपयोग तेल बनाने में किया जाता है।

  • चंदन (Santalum album), कपूर (Cinnamomum camphora), लौंग (Syzygium aromaticum) तथा पिपरमिंट (Mentha piperita) आदि पौधों से वाष्पशील सुगंधित तेल प्राप्त किए जाते हैं।

  • आंवला (Indian Gooseberry) के फल औषधीय गुणों से युक्त होते हैं। इसमें विटामिन C की प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। कंचन (Kanchan), कृष्णा (Krishna), बनारसी (Banarasi) आदि इनकी उन्नत किस्में हैं।

  • आम, केला, सेब, अंगूर, नींबू एवं अमरुद भी दैनिक जीवन में अच्छे स्वास्थ्य व पोषण हेतु उपयोगी फल हैं। अंगूर का उपयोग शराब बनाने में भी होता है।

  • नीम में एजाडिरैक्टीन नामक रसायन पाया जाता है। इस रसायन में कीटनाशक एवं कवकनाशक गुण होता है। फसल सुरक्षा के दृष्टिकोण से कीटों में वृध्दि को नियंत्रित करने के लिए नीम का प्रयोग किया जाता है। नीम के विभिन्न भागों में चर्म रोग, परजीवी रोग, गर्भनिरोधक, मलेरिया, चेचक दमा आदि की दवा तथा, सर्प, बिच्छू आदि के विषैले  प्रभाव को कम करने की दवा भी बनाई  जाती है।

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  • जैट्रोफा, करंजा, नागचंपा, नीम आदि बायो-डीजल के उत्पादन में प्रयुक्त प्रमुख वनस्पति प्रजातियां हैं। जैट्रोफा या रतनजोत के बीजों से बायो-डीजल प्राप्त करते हैं, जो कि ऊर्जा के रुप में प्रयुक्त किए जाते है। ईंथन का महत्वपूर्ण स्त्रोत होने के कारण इसकी कृषि की तरफ अत्यधिक ध्यान दिया जा रहा है। यह आवृत्तबीजी पादप है, जिसके जीवनकाल में अन्य नकदी फसलों की अपेक्षा कम जल की आवश्यकता पड़ती है।

  • करंज या करंजा का वानस्पतिक नाम पोंगैमिया पिन्नेटा है। यह भी एक प्रमुख पेट्रो पादप है, जो कि जैट्रोफा के विकल्प के रुप में प्रयुक्त होता है। इसके बीज से पोंगैमिया तेल प्राप्त होता है, जो कि बायो-डीजल की एक स्रोत है। पेट्रो क्रॉप्स में मुख्यतः हाइड्रोकार्बन एवं लिपिड (मोम) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

  • देश का पहला बायो-डीजल संयंत्र काकीनाड़ा, आंध्र प्रदेश में स्थापित किया गया है।

  • गन्ना और मक्का से व्यवहार्य जैव-ईंधन एथेनॉल प्राप्त किया जा सकता है। सामान्यतया गन्ना व चुकंदर का उपयोग शक्कर बनाने में किया जाता है।

  • पाइनस जिरार्डियाना चिलगोजा पाइन का वानस्पतिक नाम है। चिलगोजा में कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन की अधिकता होती है तथा पाइन के बीज से प्राप्त होता है।

  • मुख्य मच्छर विकर्षक नीम से प्राप्त होता है। नीम मे औषधीय गुण होते हैं। तुलसी एवं हल्दी में प्रतिजैविक गुण पाए जाते हैं। नींब  विटामिन C का मुख्य स्रोत है, जिसमें प्रतिरोधक क्षमता होती है।

  • ब्राह्मी (Brahmi) को जलनिम्ब भी कहते हैं, क्योंकि यह प्रधानतः जलासन्न भूमि में पाई जाती है। ब्राह्मी का प्रभाव मुख्यतः मस्तिष्क पर पड़ता है। ब्राह्मी स्नायुकोषो का पोषण कर उन्हें उत्तेजित कर देती है और हम स्फूर्ति का अनुभव करने लगता है। पुदीना पाचक होता है तथा वायुविकार, पेट का दर्द, अपच आदि को ठीक करता है। तुलसी एक द्वीबीजपत्री, शाकीय,  औषधीय पौधा है, जो कफोत्सारक है। सदाबहार या सदाफूली बारहों महीने खिलने वाले फूलो का पौधा है, यह मधुमेह उपचार में उपयोगी पाया जाता है।

  • चाय (Tea), कॉफी (Coffee) तथा कोको (Coco) प्रमुख पेय पदार्थ (Beverages) हैं। कैफीन क्षाराभ एक मनोस्फूर्तिदायक या मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली उत्तजक औषधि है, जो मुख्यतः कॉफी के बीजों एवं चाय की पत्तियों से प्राप्त की जाती है।

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  • समुद्री खर-पतवार समुद्र के नितल में स्थित बहुकोशिकीय शैवाल हैं। ये आयोडीन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं

  • कपूर सिनामोमम कैम्फोरा नामक सदाबहार वृक्ष की लकड़ी से बनाया जाता है। कासनी (चिकोरी) एक जंगली हर्बल पौधे से प्राप्त होता है, जो यूरोप, उत्तरी अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया में प्राकृतिक रुप में सड़कों के किनारे उगा हुआ पाया जाता है। वनीला, वनीला आर्चिड फैमिली के पेड़ों से प्राप्त होता है।

  • टमाटर में मुख्य रुप से साइट्रिक अम्ल एवं मैलिक अम्ल पाया जाता है, जिसके कारण यह प्रत्याम्ल का कार्य करता है। इसमें ऑक्जेलिक अम्ल भी उपस्थित होता है, परंतु इसकी मात्रा बहुत कम होती है। कुट्टू का आटा फैगोपाइरम एसक्यूलेन्टम नामक पौधे से प्राप्त होता है। यह कार्बोहाइड्रेट एवं प्रोटीन से भरपूर होता है।

  • पुदीना अर्क या मेन्थॉल तेल मुख्यतः पुदीने की पत्तियों के भाप आसवन द्वारा प्राप्त किया जाता है। पुदीना का वानस्पतिक नाम मेंथा अर्वेंसिस (Mentha arvensis) है।

  • क्रिकेट के बल्ले विलो की लकड़ी से बनाए जाते  हैं, जिसका वानस्पतिक नाम सैलिक्स अल्बा (Salix alba) है।

  • हॉकी-स्टिक (Hockey Stick) व क्रिकेट स्टम्स बनाने में शहतूत (Mulberry) की लकड़ी प्रयुक्त होती है। शहतूत का वैज्ञानिक नाम मोरस अल्बा (Morus alba) है।

  • लिटमस जल में घुलनशील विभिन्न रंजकों का एक मिश्रण होता है, जो थैलोफाइटा समूह के लाइकेन नामक पौधे से निकाला जाता है।

  • पार्थीनियम पौधे की पत्ती के निचोड़ का उपयोग नैनो कणों के जैव संश्लेषण में किया  जाता है। यह कैंसर उपचार में लाभकारी है।

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  • उत्पाद स्रोत

अफीम   –   फल

हींग     –   जड़

रबर     –   तना

कुनैन    –   छाल

  • सैफ्रॉन क्रोकस (Saffron Crocus) नामक पौधे के फूल के वर्तिकाग्र (स्टिग्मा- Stigma) से केसर (Saffron) मसाला निर्मित किया जाता है।

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रोग एवं उपचार

विषाणु जनित रोग

  • विषाणु शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द वायरस (Virus) से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ विष-अणु है। ये अकोशिकीय अतिसूक्ष्म जीव हैं, जो केवल जीवित कोशिका में ही वंश वृध्दि कर सकते हैं। रासायनिक दृष्टि से ये प्रोटीन आवरण से घिरे न्यूक्लिक अम्ल (Nuclic-Acid) के खंड हैं।

  • जीव विज्ञान की वह शाखा, जिसके अंतर्गत विषाणुओं का अध्ययन किया जाता है, विषाणु विज्ञान (Virology) कहलाता है।

  • विषाणु जीवित कोशिका से युक्त किसी भी जीव को संक्रमित कर सकते हैं, जैसे – पशु, पौधे, कवक, जीवाणु, मनुष्य आदि।

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से अब तक भारत में तीन रोगो यथा- चेचक, गिनी वर्म रोग तथा पोलियो का उन्मूलन हो चुका है।

  • अप्रैल, 1977 में भारत को चेचक मुक्त घोषित किया गया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा फरवरी, 2000 में भारत को गिनी वर्म रोग मुक्त देश घोषित किया गया था। 27 मार्च, 2014 को भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो मुक्त देश का दर्जा प्रदान किया गया।

  • पोलियो (Polio) एक संक्रामक रोग है, जो कि पोलियोमेलाइटिस विषाणु द्वारा होता है। इसमें रोगकारक जीव का संचारण दूषित भोजन तथा  जल द्वारा होता है इससे प्रभावित होने वाला अंग तंत्रिका तंत्र (Nervous System) है। पोलियोमेलाइटिस या पोलियो विषाणु मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु में पहुंचकर तंत्रिका ऊतकों को नष्ट कर  देता है, परिणामस्वरुप मस्तिष्क पेशियों को कार्य करने का जो निर्देश देता है, उसे तंत्रिकाएं उन तक पहुंचाने मे अक्षम हो जाती हैं और पक्षाघात (Paralysis) हो जाता है।

  • पोलियो के टीके (Polio Vaccines) को खोज सर्वप्रथम जोनॉस साल्क ने वर्ष 1952 में की, बाद में अल्बर्ट सॉबिन (Albert Sabin) ने ओरल पोलियो वैक्सीन विकसित किया जो पोलियो रोग के रोकथाम में सहायक सिध्द हुआ। पोलियो बच्चों में होने वाला एक घातक संक्रामक रोग है, जिसमें ये विकलांग हो जाते हैं।

  • भारत सरकार ने हाल ही में ट्राइवैलेंट ओरल पोलियो वैक्सीन के स्तान पर देश में वाईवैलेंट वैक्सीन प्रयोग करने का निर्णय लिया है। ट्राइवैलेंट वैक्सीन में तीन प्रकार के पोलियो विषाणुओं (टाइप- 01, 02, एवं 03) से लड़ने की क्षमता थी। चूंकि वर्ष 1999 के बाद विश्व में कहीं भी टाइप- 02 विषाणु नहीं पाया गया, इसलिए अब यह वैक्सीन दना  जरूरी नहीं रह गया।

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  • रिनो वायरस (Rhino Virus) रोगाणु सामान्य जुकाम के लिए उत्तरदायी है। जुकाम एक संक्रामक रोग है, जो छींक, वायु इत्यादि के माध्यम से फैलता है तथा इसमें रोगी को सिरदर्द, हल्का ज्वर एवं आंख व नाक से पानी गिरता है।

  • हैपेटाइटिस-बी वायरस हेपाडीएनए वायरस परिवार का एक सदस्य है। इसके कारण लीवर में सूजन एवं जलन होती है।

  • मम्स या कंठमाला रोग एक विषाणु जनित रोग है, जिसे गलसुआ भी कहते हैं। इसमें पैरोटिड ग्रंथि कष्टदायक रुप से बड़ी हो जाती  है।

  • रेबीज एवं हर्पीस रोग भी विषाणु के कारण होता है। रेबीज विषाणु प्रायः कुत्ता, बिल्ली, चमगादड़ तथा जंगली जानवरों जैसे लोमड़ी, रैकून आदि में पाया जाता है तथा इनके द्वारा मानवों में पहुंचता है। रेबीज रोग को हाइड्रोफोबिया भी कहते हैं, क्योंकि इससे संक्रमित व्यक्ति को जलाशय के पास जाने से डर लगता है। रेबीज का विषाणु केन्द्रीय नाड़ी तंत्र को प्रभावित करता है।

  • मेनेन्जाइटिस वायरस, बैक्टीरिया तथा अन्य सूक्ष्मजीवों के संक्रमण से मस्तिष्क तथा मेरुरज्जु पर चढ़ी झिल्ली में सूजन आ जाने से होने वाला रोग है।

  • डेंगू ( Dengue) ज्वर में हड्डियों और जोड़ों (Joints) में भयंकर पीड़ा तथा तेज ज्वर होता है। इस रोग को हड्डी तोड़ ज्वर भी कहते हैं। यह एक प्रकार के विषाणु के संक्रमण से होता है, जिसे एडीज इजिप्टि व क्यूलेक्स फैटिगेंस नामक मच्छर फैलाते हैं। डेंगू ज्वर सी पीड़ित रोगी के रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या बहुत कम हो जाती है।

  • पीत ज्वर या यलो फीवर एक संक्रामक रोग है। इस रोग का कारक एक सूक्ष्म विषाणु होता है, जिसका सं