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पाषाण काल

  • जिस काल का कोई लिखित साक्ष्य नही मिलता है, उसे “प्रागैतिहासिक काल” कहते हैं। ‘आद्य-ऐतिहासिक काल” में लिपि के साक्ष्य तो हैं किंतु उनके अपठ्य या दुर्बोध होने के कारण उनसे कोई निष्कर्ष नही निकलता। जब से लिखित विवरण मिलते हैं वह “ऐतिहासिक काल” है।
  • प्रागैतिहास के अंतर्गत पाषाण कालीन सभ्यता तथा आद्य-इतिहास के अंतर्गत सिंधु घाटी सभ्यता एवं वैदिक सभ्यता आती है, जबकि छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ऐतिहासिक काल का आरंभ होता है। सर्वप्रथम 1863 ई. में भारत में पाषाण कालीन सभ्यता का अनुसंधान  प्रारंभ हुआ।
  • उपकरणों की भिन्नता के आधार पर संपूर्ण पाषाण युगीन संस्कृति को तीन मुख्य चरणों में विभाजित किया गया। ये हैं –
  1. पुरापाषाण काल
  2. मध्यपाषाण काल
  3. नवपाषाण काल
  • उपकरणों की भिन्नता के आधार पर पुरापाषाण काल को तीन कालों में विभाजित किया जात है –
  1. पूर्व पुरापाषाण काल – कोड उपकरण (हस्तकुठार खंडक विदारिणी)
  2. मध्य पुरापाषाण काल – फलक उपकरण
  3. उच्च पुरापाषाण काल – तक्षिणी एवं खुरचनी उपकरण
  • सर्वप्रथम पंजाब की सोहन नदी घाटी (पाकिस्तान) से चापर-चापिंग पेबुल संस्कृति के उपकरण प्राप्त हुए। सर्वप्रथम मद्रास के समीप बदमदुरै तथा आत्तिरपक्कम से हैंडऐक्स संस्कृति के उपकरण प्राप्त किए गए। इस संस्कृति के  अन्य उपकरण क्लीवर, स्क्रेपर आदि हैं।
  • रॉबर्ट ब्रूस फुट ब्रिटिश भूगर्भ- वैज्ञानिक और पुरातत्वविद थे। 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने मद्रास के पास पल्लवरम नामक स्थान से पहला हैंडऐक्स प्राप्त किया था। उनके मित्र किंग ने अत्तिरमपक्कम से पूर्व पाषाण काल के उपकरण खोज निकाले।
  • वर्ष 1935 में डी. टेरा के नेतृत्व में एल कैम्ब्रिज अभियान दल ने सोहन घाटी में सबसे महत्वपूर्ण अनुसंधान किए। बेलन घाटी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जी.आर. वर्मा के निर्देशन में अनुसंधान किया गया। पूर्व पुरापाषाण काल से संबंधित यहां 44 पुरास्थल प्राप्त हुए हैं।
  • उपकरणों के अतिरिक्त बेलन के लोंहदा नाला क्षेत्र से इस काल की अस्थि निर्मित मातृदेवी की एक प्रतिमा मिली है, जो संप्रति कौशाम्ब संग्रहालय में सुरक्षित है। फलकों की अधिकता के कारण मध्य पुरापाषाण काल को फलक संस्कृति भी कहा जाता है। इन उपकरणों का निर्माण क्वार्टजाइट पत्थरों से किया गया है।
  • पुरापाषाण कालीन मानव का जीवन पूर्णतया प्राकृतिक था। वे प्रधानतः शिकार पर निर्भर रहते थे तथा उनका भोजन मांस अथवा कंदमूल हुआ करता था। अग्नि के प्रयोग से अपरिचित रहने के कारण वे मांस कच्चा खाते ते। इस युग का मानव शिकारी एवं खाद्य संग्राहक था। इस काल के मानव को पशुपालन तथा कृषि का ज्ञान नहीं था।
  • भारत में मध्यपाषाण काल के विषय में जानकारी सर्वप्रथम 1867 ई . में हुई जब सी.एल. कार्लाइल ने विंध्य क्षेत्र से लघु पाषाणोपकरण खोज निकाले। मध्यपाषाण काल के विशिष्ट औजार सूक्ष्म पाषाण का पत्थर के बहुत छोटे औजार हैं।
  • भारत में मानव अस्थि पंजर सर्वप्रथम मध्यपाषाण काल से ही प्राप्त होने लगता है।  गुजरात स्थित लंघनाज सबसे महत्वपूर्ण पुरास्थल है। यहां से लघु पाषाणोपकरणों के अतिरिक्त पशुओं की हड्डियां, कब्रिस्तान तथा कुछ मिट्टी के बर्तन भी प्राप्त हुए हैं। यहां से 14 मानव कंकाल भी मिले हैं।
  • मध्यपाषाण कालीन महदहा (प्रतापगढ़, उ.प्र.) से हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। जी.आर. शर्मा ने महदहा के तीन क्षेत्रों का उल्लेख किया है, जो झील क्षेत्र, बूचड़खाना संकुल क्षेत्र एवं कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंटा था। बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं।
  • डॉ. जयनारायण पाण्डेय द्वारा लिखित पुस्तक पुरातत्व विमर्श में महदहा, सराय नाहर राय एवं दमदमा तीनों ही स्थलों से हड्डी के उपकरण एवं आभूषण पाए जाने का उल्लेख है। दमदमा में किए गए उत्खनन के फलस्वरुप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों में कुल मिलाकर 41 मानव शवाघान ज्ञात हुए हैं। इन शवाघानों में से 5 शवाघान युग्म-शवाघान हैं और एक शवाघान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। शेष शवाघानों में एक-एक कंकाल मिले हैं।
  • सराय नाहर राय से ऐसी समाधि मिली है जिसमें चार मानव कंकाल एक साथ दफनाए गए थे। वहां की कब्रें (समाधियां) आवास क्षेत्र के अंदर स्थित थी। कब्रें छिछली तथा अंडाकार थी। विंध्य क्षेत्र के लेखहिया के शिलाश्रय संख्या 1 से मध्य पाषाणिक लघु पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त सत्रह मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं जिनमें से कुछ सुरक्षित हालत में हैं तथा अधिकांश क्षत-विक्षत हैं।
  • अमेरिका के ओरेगॉन विश्वविद्यालय के जॉन आर. लुकास के अनुसार, लेखहिया में कुल 27 मानव कंकालों की अस्थियाँ मिली हैं। पशुपालन का प्रारंभ मध्यपाषाण काल में हुआ। पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ (होशंगाबाद, म.प्र.) तथा बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से प्राप्त हुए हैं। मध्यपाषाण काल के मानव शिकार करके, मछली पकड़कर और खाद्य वस्तुओं का संग्रह कर पेट भरते थे।
  • मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। भारत मे यही से चित्रकारी से युक्त सर्वाधिक 500 शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं। यूनस्कों ने भीमबेटका शैलचित्रों को विश्व विरासत सूची में सम्मिलित किया है।

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  • सर्वप्रथम खाद्यान्नों का उत्पादन नवपाषाण काल में प्रारंभ हुआ। इसी काल में गेहूँ की कृषि प्रारंभ हुई। नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है। यहाँ से 9000 ई.पू. से 8000 ई.पू. मध्य के चाल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • उल्लेखनीय है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित, यहां से 7000 ई.पू. में गेहूं के साक्ष्य मिले हैं), जबकि प्राचीनतम चावल के साक्ष्य वाला स्थल कोलहिहवा (इलाहाबाद जिलमें बेलन नदी के तट पर स्थित, यहां से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था।
  • चीन याग्त्जी नगी घाटी क्षेत्र में लगभग 7000 ई.पू. चावल उगाया गया। मक्का (लगभग 6000 ई.पू.) का प्रथम साक्ष्य मेक्सिको में पाया गया। बाजरा 5500 ई.पू. चीन में, सोरघम 5000 ई.पू. पूर्वी अफ्रीका में, राई 5000 ई.पू. में दक्षिण-पूर्व एशिया में तथा जई 2300 ई.पू. में यूरोप में सर्वप्रथम उगाया गया।
  • मेहरगढ़ से पाषाण संस्कृति से लेकर हड़प्पा सभ्यता तक के सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) से प्राप्त हुआ। गर्त आवास के साक्ष्य भी यही से प्राप्त हुए। इस पुरास्थल की खोज वर्ष 1935 में डी-टेरा एवं पीटरसन ने की थी।
  • गुफकराल कश्मीर में स्थित नवपाषाणिक स्थल है। गुफकराल का अर्थ होता है – कुलाल अर्थात कुम्हार की गुहा। यहां के लोग कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे। चिरांद बिहार के सारण जिले में स्थित है। यहां से नवपाषाणिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) के पश्चात चिरांद से सर्वाधिक मात्रा में नवपाषाणिक उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहां से हड्डी के अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहां से प्राप्त उपकरण हिरण के सींगों से निर्मित हैं। नवपाषाण युगीन दक्षिण भारत में मृतक को दफनाने के स्थल के रुप में वृहत्पाषाण स्मारकों की पहचान की गई।
  • नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले कर्नाटक में मैसूर के पास वेल्लारी जनपद में स्थित संगनकल्लू नामक स्थान से प्राप्त हुए। पिकलीहल में भी राख के टीले मिले हैं। ये राख के टीले नवपाषाण युगीन पशुपालक समुदायों के मौसमी शिविरों के जले अवशेष हैं। आग का उपयोग नवपाषाण काल की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
  • धातुओ मे सबसे पहले तांबे का प्रयोग हुआ। इस चरण में पत्थर एवं तांबे के उपकरणों का साथ-साथ प्रयोग जारी रहा। इसी कारण इसे ताम्रपाषाणिक संस्कृति (कैल्कोलिथिक कल्चर) कहा जाता है। ताम्रपाषाणिक का अर्थ है – पत्थर एवं तांबे के प्रायोग की अवस्था।
  • भारत में ताम्रपाषाण युग की बस्तियां दक्षिण-पूवी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में पाई जाती हैं।
  • दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में दो पुरास्थलों की खुदाई हुई है, ये हैं – अहाड़ एवं लिलुंद। ये पुरास्थल बनास घाटी में स्थित हैं। बनास घाटी में स्थित होने के कारण इस बनास संस्कृति भी कहते हैं।
  • अहाड़ का प्राचीन नाम तांबवती अर्थात तांबा वाली जगह है। यहां के मकान पत्थर की चहारदीवारी से घिरे मिले हैं। अहाड़ के पास गिलुंद में मिट्टी की  इमारत बनी है, पर कहीं-कहीं पक्की ईंट भी लगी है। गिलुंद में तांबे के टुकड़े  मिलते हैं। अहाड़ संस्कृति अन्य ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों से भिन्न है क्योंकि जहां दूसरें केन्द्रों पर लाल व काले लेप के मृदभांड बने हैं, वहीं यहां पर इस लेप के ऊपर सफेद रंग से चित्रकारी की गई है।
  • पश्चिमी मध्य प्रदेश में मालवा, कायथा, एरण और नवदाटोली प्रमुख स्थल हैं। नवदाटोली, मध्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण ताम्रपाषाणिक पुरास्थल है, जो इंदौर के निकट स्थित है। इसका उत्खनन एच.डी. संकालिया ने कराया था। यहां से मिट्टी, बांस एवं फूस के बने चौकोर एवं वृत्ताकार घर मिले हैं। यहां के मूल मृदभांड लाल-काले रंग के हैं जिन पर ज्यामितीय आरेख उत्कीर्ण हैं।
  • कायथा संस्कृति, जो हड़प्पा संस्कृति की कनिष्ठ समकालीन है। इसके मृदभांडो में कुछ प्राक् हड़प्पीय लक्षण हैं, पर साथ ही इस पर हड़प्पाई प्रभाव भी दिखाई देता है। इस संस्कृति की लगभग 40 बस्तियां मालवा क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं, जो अत्यंत छोटी-छोटी हैं।

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  • मालवा संस्कृति अपनी मृदभांडो की उत्कृष्टता के लिए मानी जाती है। मध्य प्रदेश में कायथा और एरण की तथा पश्चिमी महाराष्ट्र में इनामगांव की बस्तियां किलाबंद हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र के प्रमुख पुरास्थल हैं – अहमदनगर जिले में जोर्वे, नेवासा और दैमाबाद, पुणे जिले में चंदोली, सोनगांव, इनामगांव, प्रकाश और नासिक।
  • ये सभी पुरास्थल जोर्वे संस्कृति के हैं। अब तक ज्ञात 200 जोर्वे स्थलों में गोदावरी का दैमाबाद सबसे बड़ा है। यह लगभग 20 हेक्टेयर मे फैला है जिसमें लगभग 4000 लोग रह सकते थे। नेवासा (जोर्वे संस्कृति स्थल) से पटसन का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
  • महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति (जोर्वे संस्कृति) ने नेवासा, दैमाबाद, चंदोली, इनामगांव आदि पुरास्थलों में घरों में मृतकों को अस्थि कलश में रखकर उत्तर से दक्षिण दिशा में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने का साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। आरंभिक ताम्रपाषाण अवस्था के इनामगांव स्थल पर चूल्हों-सहित बड़े-बड़े कच्ची मिट्टी के मकान और गोलाकार गड्डों वाले मकान मिले हैं। पश्चात की अवस्था (1300-1000 ई.पू.) में  पांच कमरों वाला एक मकान मिला है, जिसमें चार कमरे आयताकार हैं  और एक वृत्ताकार। इनामगांव में सौ से अधिक घर और अनेक कब्रें पाई गई हैं। यह बस्ती किलाबंद है और खाई से घिरी हुई है। यहां शिल्पी या पंसारी लोग पश्चिम छोर पर रहते थे, जबकि सरदार प्रायः केन्द्र स्थल पर रहता था।
  • पूर्वी भारत में गंगातटवर्ती चिरांद के अलावा, बर्दमान जिले के पांडु राजार ढिबि और पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में बहिषदल उल्लेखनीय ताम्रकालीन स्थल है। कुछ अन्य पुरास्थल जहां खुदाई हुई, वे हैं – बिहार में सेनुवार, सोनपुर और ताराडीह तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में खैराडीह और नरहन।
  • बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में रहने वाले लोग टोंटी वाले जलपात्र, गोड़ीदार पश्तरियां और गोड़ीदार कटोरे बनाते थे।
  • दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, पश्चिमी मध्य प्रदेश, पश्चिमी महाराष्ट्र और अन्यत्र रहने वाले ताम्रपाषाण युग के लोग मवेशी पालते और खेती करते थे। वे गाय, भेड़, बकरी और भैंस रखते थे और हिरण का शिकार भी करते थे। ऊंट के भी अवशेष मिले हैं। मुख्य अनाज गेहूँ और चावल के अतिरिक्त वे बाजरे की भी खेती करते थे।
  • ताम्रपाषाण युग के लोग शिल्प-कर्म में निःसंदेह बड़े दक्ष थे और पत्थर का काम भी अच्छा करते थे। वे कार्नेलियन, स्टेटाइट और क्वार्ट्ज क्रिस्टल जैसे अच्छे पत्थरों के मनके या गुटिकाएं भी बनाते थे। वे लोग कताई और बुनाई जानते थे क्योंकि मालवा में चरखे और तकलियां मिली हैं।
  • महाराष्ट्र में कपास, सन और सेमल की रुई के बने धागे भी मिले हैं। इनामगांव में कुंभकार, धातुकार, हाथी-दांत के शिल्पी, चूना बनाने वाले और खिलौने की मिट्टी की मूर्ति (टेराकोटा) बनाने वाले कारीगर भी दिखाई देते हैं। इनामगांव में मातृ-देवी की प्रतिमा मिली है, जो पश्चिमी एशिया में पाई जाने वाली ऐसी प्रतिमा से मिलती है। मालवा और रास्थान में मिली रूढ़ शैली में बनी मिट्टी की वृषभ-मूर्तिकाएँ यह सूचित करती हैं कि वृषभ (सांड) धार्मिक पंथ का प्रतीक था।
  • पश्चिमी महाराष्ठ्र की चंदोली और नेवासा बस्तियों में कुछ बच्चें के गलो में तांबे के मनकों का हार पहनाकर उन्हें दफनाया गया है, जबकि अन्य बच्चों की कब्रों में समान के तौर पर कुछ बर्तन मात्र हैं। महाराष्ट्र में मृतक को उत्तर-दक्षिण की दिशा में रखा जाता था किंतु दक्षिण भारत में पूर्व-पश्चिम की दिशा में। पश्चिमी भारत में लगभग संपूर्ण (एक्सटेंडेड बरिअल) शवाधान प्रचलित था, जबकि पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान (फ्रैक्शनल बरिअल) चलता था। सबसे बड़ी निधि मध्य प्रदेश के गुंगेरिया से प्राप्त हुई है। इसमें  424 तांबे के औजार एवं हथियार तथा 102 चांदी के पतले पत्तर हैं।
  • कायथा के एक घर में तांबे के 29 कंगन और दो अद्वितीय ढंग की कुल्हाड़ियां पाई गई हैं। इसी स्थान में स्टेटाइट और कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों की गोलियों के हार पात्रों में जमा पाए गए हैं। गणेश्वर स्थल राजस्थान में खेत्री ताम्र-पट्टी के सीकर-झुंझनू क्षेत्र के तांबे की समृध्द खानों के निकट पड़ता है। दक्षिण भारत में ब्रह्मगिरि, पिकलीहल, संगलकल्लू, मस्की, हल्लूर आदि से ताम्रपाषाण युगीन बस्तियों के साक्ष्य मिले  हैं। दक्षिण भारत में कृषक की अपेक्षा चरवाहा संस्कृति क  अधिक प्रमाण मिला है।
  • भारत में सर्वप्रथम 1861 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम को पुरातत्व सर्वेक्षक के रुप में नियुक्त किया गया था। 1871  ई. में पुरातत्व सर्वेक्षण को सरकार के एक विभाग के रुप में गठित किया गया था। लॉर्ड कर्जन के समय वर्ष 1902 में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रुप में केन्द्रीकृत कर जॉन मार्शल को इसका प्रथम महानिदेशक बनाया गया था।
  • इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिया के अनुसार, रॉबर्ट ब्रूस फुट ब्रिटिश भूगर्भ-वैज्ञानिक और पुरतत्वविद् थे। जियोलॉजिकल सर्वे से संबंध्द रॉबर्ट ब्रूस फुट ने 1863 ई. में भारत में पाषाणकालीन बस्तियों के अन्वेषण की शुरुआत की।

 

  • डेनमार्क के कोपेनहेगन संग्रहालय की सामग्री के आधार पर पाषाण, कांस्य और लौह युग का त्रियुगीन विभाजन 1820 ई. में पुरातात्विक क्रिश्चियन जर्गेनसन थॉमसन ने किया था।
  • मध्यपाषाण के अंतिम चरण में पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त होने लगते हैं। ऐसे पशुपालन के साक्ष्य भारत में आदमगढ़ (होशंगाबाद, म.प्र.) तथा बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान) से मिले है।
  • मध्यपाषाण कालीन महदहा (उ.प्र. के प्रतापगढ़ जिले में स्थित) से बड़ी मात्रा मे हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। जी.आर. शर्मा महदहा में तीन क्षेत्रों का उल्लेख करते हैं, जो झील क्षेत्र, बूचड़खाना संकुल क्षेत्र का कब्रिस्तान निवास क्षेत्र में बंचा था। बूचड़खाना संकुल क्षेत्र से ही हड्डी एवं सींग निर्मित उपकरण एवं आभूषण बड़े पैमाने पर पाए गए हैं।

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  • मध्य गंगा घाटी के प्रतापगढ़ जिले में स्थित सराय नाहर राय, महदहा तथा दमदमा का उत्खनन हुआ है। दमदमा मे लगातार पांच वर्षों तक किए गए उत्खनन के फलस्वरुप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों से कुल मिलाकर 41 मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं। इन शवाधानों मे से 5 शवाधान युग्म-शवाधान हैं और एक शवाधान में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। शेष शवाधानों मे एक-एक कंकाल मिले हैं।
  • खाद्यान्नों का उत्पादन सर्वप्रथम नवपाषाण काल में हुआ। यही वह समय है, जब मनुष्य कृषि कर्म से परिचित हुआ।
  • भारत में मानव का सर्वप्रथम साक्ष्य मध्य प्रदेश में पश्चिमी नर्मदा क्षेत्र में मिला है। इसकी खोज वर्ष 1982 में की गई थी।
  • आधुनिक मानव समाज द्वारा मुख्य रुप से 8 खाद्य अनाजों का उपभोग किया गया है – जौ, गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा सोरघम, राई एवं जई। अनाजों के पौधे विभिन्न क्षेत्रों में जंगली घासे के रुप में विद्यमान थे जिन्हें बीजों के रुप में मानव ने उगाया, अलग-अलग क्षेत्र में, अलग-अलग समय पर। वैश्विक दृष्टि से देखा जाए, तो सर्वप्रथम जौ 8000 ई.पू. में निकट पूर्व (Near-East भूमध्य सागर एवं ईरान के मध्य स्थित पश्चिमी एशिया के देश) में मानव द्वारा उगाया गया। बाद में लगभग इन्हीं क्षेत्रों में 8000 ई.पू. के आस-पास ही गेहूँ मानव द्वारा उगाया जाने लगा।

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  • नवीनतम खोजों के आधार पर भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में स्थित लहुरादेव है। यहां से 8000 ई.पू. से 9000 ई.पू. मध्य के चावल के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। उल्लेखनीय है कि इस नवीनतम खोज के पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप का प्राचीनतम कृषि साक्ष्य वाला स्थल मेहरगढ़ (पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित, यहां से 7000 ई.पू. के गेहूँ के साक्ष्य स्थल कोलडिहवा ( इलाहाबाद जिले में बेलन नदी तट पर स्थित, यहां से 6500 ई.पू. के चावल की भूसी के साक्ष्य मिले हैं) माना जाता था।
  • ताम्रपाषाण युग को चालकोलिथिक युग भी कहा जाता है।
  • बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में स्थित पुरास्थल मेहरगढ़ से पाषाण संस्कृति से लेकर हड़प्पा सभ्यता तक को सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • नवदाटोली (मध्य प्रदेश) का उत्खनन दक्कन कॉलेज, पूना के प्रोफेसर एच.डी. सांकलिया ने कराया था। ये स्थल इस महाद्पीव का सबसे विस्तृत उत्खनित ताम्रपाषाणिक ग्राम स्थल है जिसकी तिथि ई.पू. 1600 से 1300 के बीच निर्धारित की गई है।
  • नवपाषाणयुगीन दक्षिण भारत में शवों को विभिन्न प्रकार की समाधियों में दफनाने की परंपरा रही है। इन समाधियों को जो विशाल पाषाण खंडों से निर्मित हैं बृहत्पाषाण या मेगालिथ (Megalith) के नाम से जना जाता है। इनके विभिन्न प्रकार हैं, जैसे – सिस्ट-समाधि, पिट सर्किल, कैर्न-सर्किल, डोल्मेन, अंब्रेला-स्टोन, हुड-स्टोन, कंदराएं, मेहिर। ये वृहत्पाषाण स्मारक मृतकों की समाधियां थी।
  • कर्नाटक में मैंसूर के पास वेल्लारी जनपद मे स्थित संकलनकल्लू नामक नवपाषाण कालीन पुरास्थल से राख के टीले प्राप्त हुए हैं।
  • मध्य प्रदेश रायसेन जिले में स्थित भीमबेटका प्रागैतिहासिक शैल चित्रकला का श्रेष्ठ उदाहरण है। इन गुफाओं में जीवन के विविध रंगो को पेंटिंग के रुप में उकेरा गया, जिनमें हाथी, सांभर, हिरन आदि के चित्र हैं। अब तक लगभग 700 शरणस्थलियों की पहचान की जा चुकी है, इनमें 243 भीमबेटका समूह में तथा 178 लाखा जुआर समूह मे स्थित है।
  • म.प्र. के पाषाणकालीन स्थल भीमबेटका से चित्रकारी से युक्त 500 शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं।
  • गंगा-यमुना दोआब की सांस्कृतिक परंपरा संभवतः उस संस्कृति के साथ शुरु होती है जिसे अपने अत्यंत मृद्भांड के नमूने के कारण गेरुवर्णी गैरिक मृद्भांड संस्कृति कहा गया है। इसके साक्ष्य विशेषतः हस्तिनापुर एवं अतरंजीखेड़ा से प्राप्त होते हैं।
  • महाराष्ट्र की ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति (जोर्वे संस्कृति) के नेवासा, दायमाबाद, कौठे, चंदोली, इनामगांव आदि पुरास्थलों में घरों से मृतकों को अस्थिकलश में रखकर उत्तर से दक्षिण स्थिति में घरों के फर्श के नीचे दफनाए जाने के साक्ष्य मिले हैं। कब्र में मिट्टी की हंडियाँ और तांबे की कुछ वस्तुएं भी रखी जाती थी।

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  • जम्मू एवं कश्मीर में श्रीनगर के निकट उत्तर-पश्चिम में स्थित बुर्जहोम से नव पाषाणिक अवस्था में मानव कंकाल के साथ कुत्ते का कंकाल भी शवाधान से प्राप्त हुआ है। गर्तावास (गड्डो वाले घर) भी यहां की प्रमुख विशेषता है।
  • अलेक्जेंडर कनिंघम (1814-1893 ई.) को एक ब्रिटिश सेनाधिकारी की रुप में बंगाल इंजीनियर्स के साथ काम करने के लिए तैनात किया गया था। उन्हें ही भारतीय पुरातत्व के जनक के रुप में जाना जाता है। 1861 ई. में सेना से सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्हें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का पहला महानिदेशक नियुक्त किया गया था।
  • राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, जिसका नाम बदलकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय कर दिया गया है, भोपाल (म.प्र.) में स्थित है। यह भारत सरकार के संस्कृति विभाग के अंतर्गत स्वायत्तकारी संगठन है।

सैंधव सभ्यता एवं संस्कृति

  • सैंधव सभ्यता के लिए साधारणतः तीन नामों का प्रयोग होता है –
  1. सिंधु-सभ्यता
  2. सिंधु-घाटी सभ्यता
  3. हड़प्पा सभ्यता
  • हड़प्पा सभ्यता की खोज वर्ष 1921 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देशन में रायबहादुर दयाराम साहनी ने किया था।
  • हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब के प्रांत के मांटगोमरी जिले (वर्तमान शाहीवाल) में स्थित है, जबकि मोहनजोदड़ों सिंध के लरकाना जिले में स्थित है। पिग्गट महोदय ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ों को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वां राजधानियां कहा है। हड़प्पा रावी नदी के बाएं तट पर जबकि मोहनजोदड़ों सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित है। जॉन मार्शल ने सर्वप्रथम इस सभ्यता को सिंधु सभ्यता का नाम दिया।
  • रेडियो कार्बन-14 (C-14) जैसी नवीन विश्लेषण पध्दति के द्वारा हड़प्पा सभ्यता की तिथि 2500 ई.पू.-1700 ई.पू. मानी गई है, जो सर्वाधिक मान्य है। लगभग 2300 ई.पू. से 2000 ई.पू. तक यह सभ्यता अपने विकास की पराकाष्ठा पर थी। यह सभ्यता मेसोपोटामिया तथा मिस्त्र की सभ्यताओं की समकालीन थी।
  • विभिन्न विद्वानों ने सैंधव सभ्यता की तिथि का निर्धारण निम्नवत किया है –

विद्वान

निर्धारित तिथि

जॉन मार्शल

3250 ई.पू.-2750 ई.पू.

अर्नेस्ट मैके

2800 ई.पू.-2500  ई.पू.

माधवस्वरुप वत्स

2700 ई.पू.-2500 ई.पू. सी.जे.

गैड

2350 ई.पू.-1700 ई.पू.

मार्टीमर  ह्वीलर

2500 ई.पू.-1700 ई.पू.

फेयर सर्विस

2000 ई.पू.-1500 ई.पू.

 

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  • अब तक इस सभ्यता के अवशेष पाकिस्तान में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और भारत में पंजाब, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिमी उ.प्र., जम्मू कश्मीर, पश्चिमी महाराष्ट्र के भागों में पाए जा चुके हैं। इस सभ्यता का सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुत्कागेनडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल आलमगीर पुर (पश्चिमी उ.प्र.), उत्तरी पुरास्थल मांडा (जम्मू-कश्मीर) तथा दक्षिणी पुरास्थल दायमाबाद (महाराष्ट्र) है। इसका आकार त्रिभुजाकार है तथा वर्तमान में लगभग 13 लाख वर्ग किमी. क्षेत्रफल में है।
  • प्राप्त साक्ष्यों से पता चलता है कि मोहनजोदड़ों की जनसंख्या एक मिश्रित प्रजाति की थी जिसमें कम-से-कम चार प्रजातियां थी –
  1. प्रोटो ऑस्ट्रेलायड (काकेशियन)
  2. भूमध्य सागरीय
  3. अल्पाइन
  4. मंगोलायड
  • मोहनजोदड़ों के निवासी अधिकांशतः भूमध्य सागरीय थे।
  • सिंधु सभ्यता के संस्थापकों के संबंध में विभिन्न विद्वानों के विचार –

विद्वान

सिंधु सभ्यता के निर्माता

डॉ. लक्ष्मण स्वरुप

आर्य और रामचन्द्र

गार्डन चाइल्ड एवं ह्वीलर

सुमेरियन

राखालदास बनर्जी

द्रविड़

 

  • सिंधु घाटी के जिन नगरों की खुदाई की गई है उन्हें निम्नलिखित वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है –
  1. केन्द्रीय नगर
  2. तटीय नगर और पत्तन
  3. अन्य नगर एवं कस्बें
  • सिंधु सभ्यता के तीन केन्द्रीय नगर हड़प्पा, मोहनजोदड़ों और धौलावीरा समकालीन बड़ी बस्तियाँ था।
  • हड़प्पा की टीले या ध्वंसावशेषों के विषय में सर्वप्रथम जानकारी 1826 ई. में चार्ल्स मेसन ने दी। वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने पंजाब (पाकिस्तान) ते तत्कालीन मांटगोमरी सम्प्रति शाहीवाल जिले में रावी नदी के बाएं तट पर स्थित हड़प्पा का सर्वेक्षण किया और वर्ष 1923 से इसका नियमित उत्खनन आरंभ हुआ। वर्ष 1926 में माधवस्वरुप वत्स ने तथा वर्ष 1946 में मार्टीमर ह्वीलर ने व्यापक स्तर पर उत्खनन कराया।
  • हड़प्पा से प्राप्त दो टीलों में पूर्वी टीले को नगर टीला तथा पश्चिमी टीले को दुर्ग टीला के नाम से संबोधित किया गया है। यहां पर 6-6 कक्षों की दो पंक्तियों में निर्मित कुल बारह कक्षों वाले एक अन्नागार के अवशेष प्राप्त हैं। हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान है जिसे समाधि R-37 नाम दिया गया है।
  • सिंधु सभ्यता में अभिलेख युक्त मुहरें सर्वाधिक हड़प्पा से मिले हैं। नगर की रक्षा के लिए पश्चिम की ओर स्थित दुर्ग टीले को ह्वीलर ने माउंड A-B की संज्ञा दी है। इसके अतिरिक्त यहां से प्राप्त कुछ अन्य महत्वपूर्ण अवशेषों में एक बर्तन पर बना मछुवारे का चित्र, शंख का बना बैल, स्त्री के गर्भ से निकला हुआ पौधा (जिसे उर्वरता की देवी माना गया है), पीतल का बना इक्का, ईंटों के वृत्ताकार चबुतरे, गेहूँ तथा जौ के दानों के अवशेष प्रमुख हैं।
  • सिंधी भाषा में मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ ‘ मृतकों का टीला ‘ है | सिंध प्रांत के लरकाना  जिले में सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित मोहनजोदड़ो की सर्वप्रथम खोज राखालदास बनर्जी ने वर्ष 1922 में किया था। मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक वृहत स्नानागार है। इसकी लंबाई उत्तर से दक्षिण की और लगभग 55 मीटर और चौड़ाई पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर लगभग 33 मीटर है | इसके मध्य निर्मित स्नानकुंड की लंबाई 8 मीटर चौड़ाई , 7.01  मीटर और गहराई 2.43 मीटर है | यह विशाल स्नानागार धर्मानुष्ठान के लिए था | मार्शल ने इसे तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण कहा है |

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  • मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत विशाल अन्नागार है जो 72 मीटर लंबा तथा 22.86 मीटर चौड़ा है। स्नानागार के उत्तर-पूर्व में 70.1´23.77 मीटर के आकार का एक विशाल भवन के अवशेष मिले हैं | संभवतः यह पुरोहितवास था तथा यहां पुरोहितों का विद्यालय स्थित रहा हो | मोहनजोदड़ो की प्रमुख विशेषता उसकी सड़के थी। मुख्य सड़क 9.15 मी चौड़ी थी जिसे राजपथ कहा जाता था | सड़के सीधी  दिशा में एक दूसरे को समकोण पर काटती हुई नगर को अनेक वर्गाकार अथवा चतुर्भुज आकार खंडों में विभाजित करती थी | सड़कों के एक दूसरे को समकोण पर काटने को ऑक्सफोर्ड सर्कस नाम दिया गया है | मोहनजोदड़ो के पश्चिमी भाग में स्थित दुर्ग जिले को ‘ स्तूपटीला ‘ भी कहा जाता है क्योंकि  यहां पर कुषाण शासकों ने स्तूप का निर्माण कराया था | मोहनजोदड़ो से  प्राप्त अन्य अवशेषों  में कांसे की नृत्यरत नारी की मूर्ति , पुजारी (योगी) की मूर्ति , मुद्रा पर अंकित पशुपतिनाथ (शिव) की मूर्ति  ,  कुंभकारों के छः भठ्ठे, सूती कपड़े , हाथी का कपाल खंड, गले हुए तांबे के ढेर , सीपी  की बनी हुई पटरी, अंतिम स्तर पर बिखरे हुए कुएं से प्राप्त नर कंकाल, घोड़े के दांत एवं गीली मिट्टी पर कपड़े के साक्ष्य मिले हैं |
  • मोहनजोदड़ो से 130 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित चन्हूदड़ों की सर्वप्रथम खोज वर्ष 1931 में एम जी. मजूमदार ने की थी | वर्ष 1935 में इसका उत्खनन मैके ने किया | यहां सैंधव संस्कृति के अतिरिक्त  प्राक् हड़प्पा संस्कृति जिसे झूकर और झांगर संस्कृति कहते हैं , के अवशेष मिले हैं |  संभवतः यह एक औद्योगिक केंद्र था  जहां माणिकारी , मुहर बनाने , भार-माप के बटखरे बनाने का काम होता था। मैके को यहां से मनके बनाने  का कारखाना (bead factory) तथा भट्ठी प्राप्त हुई थी। यहां से प्राप्त अवशेषों में प्रमुख है – अलंकृत हाथी , खिलौना एवं कुत्ते बिल्ली का पीछे करते पदचिन्ह सैंदर्य प्रसाधनों में प्रयुक्त लिपस्टिक आदि।  चन्हूदड़ों एकमात्र पुरास्थल है जहाँ से व्रकाकार ईंटें मिली है। यहां किसी दुर्ग का अवशेष नहीं मिला है
  • गुजरात में अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर स्थित लोथल की खोज सर्वप्रथम डॉ. एस. आर. राव ने वर्ष 1954 में की थी। सागर तट पर स्थित यह स्थल पश्चिमी एशिया से व्यापार का एक प्रमुख बंदरगाह था। लोथल नगर योजना तथा अन्य भौतिक वस्तुओं के आधार पर एक ‘ लघु हड़प्पा ‘ या ‘ लघु मोहनजोदड़ों ‘ नगर प्रतीत होता है। यहां से फारस की मुद्रा/सील और पक्के रंग में रंगे हुए पात्र प्राप्त हुए हैं। लोथल में गढ़ी तथा नगर दोनों एक रक्षा प्राचीर से घिरे हैं। लोथल की सबसे प्रमुख विशेषता ‘ जहाजों की गोदी (डॉक-यार्ड) ‘ है। यहाँ से प्राप्त अन्य महत्वपूर्ण अवशेष है- धान (चावल) और बाजरे का साक्ष्य , फारस की मुहर  , घोड़े की लघु मृण्मूर्ति , तीन युगल समाधियां आदि।

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  • कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित है। इस स्थल की खोज अमलानंद घोष ने की थी। यहां पर पश्चिम दिशा में स्थित दुर्ग वाले टीले पर सैंधव सभ्यता के नीचे प्राक-सैंधव संस्कृति के पुरावशेष मिले हैं। मोहनजोदड़ों के भवन पक्की ईटों के बने थे , जबकि कालीबंगा के भवन कच्ची ईटों के बने थे। पक्की इटों का प्रयोग केवल नालियों , कुंओ एवं स्नानागार बनाने में ही किया गया है। यहां से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। जिसकी जुताई आड़ी-तिरछी की गई है। मोहनजोदड़ों एवं हड़प्पा के समान यहां से दो टीले मिले हैं , जो सुरक्षा दीवारों से घिरे हैं। पूर्व की ओर स्थित टीला बड़ा जबकि पश्चिम की तरफ स्थित टीला छोटा था। पश्चिमी टीले को ‘ कालीबंगा प्रथम ‘ नाम दिया गया है।  यहां से भूकंप का साक्ष्य मिला है। दुर्ग या गढ़ी वाले टीले के दक्षिणी अर्धभाग में पांच या छः कच्ची ईटों के चबूतरे बने थे। एक चबूतरे पर अग्निकुंड , कुंआ तथा पक्की ईटों का बना एक आयातकार गर्त था। जिसमें पशुओं की हड्डियां थी। दूसरे चबूतरे पर सात  अग्निकुंड या वेदिकाएं एक पंक्ति में बनी थी। यहां से सेलखड़ी तथा मिट्टी की मुहरें एवं मृदभांड के टुकड़े मिले हैं।
  • धौलावीरा गुजरात के कच्छ के रन में अवस्थित है। सर्वप्रथम वर्ष 1967 -1968 में इसकी खोज जे पी जोशी ने की। वर्ष 1990-1991 के दौरान आर एस बिष्ट द्वारा व्यापक पैमाने पर उत्खनन कार्य प्रारंभ किया गया। यह नगर आयातकार बना था।  इस  नगर को तीन भागों – किला, मध्य नगर तथा निचला नगर में विभाजित किया गया था। यहां से एक विशाल जलाशय मिला है जिसका आकार 4 ´12 मीटर और गहराई 7.5 मीटर थी। यहां के निवासी एक उन्नत जल प्रबंधन व्यवस्था से परिचित थे।  यहां पर हड़प्पा लिपि के बड़े आकार के 10 चिन्हों वाला एक शिलालेख मिला है।
  • सुरकोटडा गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। अन्य नगरों के विपरीत यह नगर दो दुर्गीकृत भागों-गढ़ी तथा आवास क्षेत्र में विभाजित था। यहां के कब्रिस्तान से कलश शवाधान के साक्ष्य मिले हैं। यहां घोड़े की कुछ हड्डियों के साक्ष्य मिले हैं।
  • दैमाबाद महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में प्रवर नदी के बाएं किनारे पर स्थित है। यह सैंधव सभ्यता का सबसे दक्षिणी स्थल है। यहाँ से रथ चलाते हुए मनुष्य, सांड, गैंडे की आकृतियाँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ से कुछ मृदभांड, सैंधव लिपि की मुहर, तश्तरी, प्याले आदि के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार जिले में घग्गर नदी के किनारे स्थित है। इस स्थल की खोज वर्ष 1969 में सूरजभान ने की थी। यह 224 हेक्टेयर में  है, जो भारत का सबसे बड़ा सैंधव स्थल है।
  • रोपड़ (पंजाब) सतलज नदी के बाएं तट पर स्थित है। इसका आधुनिक नाम रूपनगर है। वर्ष 1950 में इसकी खोज बी.बी. लाल ने तथा वर्ष 1953-55 के दौरान यज्ञदत्त शर्मा ने इसकी खुदाई करवाई। यहाँ से मृदभांड , सेलखड़ी की मुहर , चर्ट के बटखरे , एक छुरा , तांबे के बाणाग्र , तथा कुल्हाड़ी आदि प्राप्त हुए हैं। यहां से मनुष्य के साथ पालतू कुत्ता के दफनाए जाने के साक्ष्य मिला हैं।
  • रंगपुर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में है | यहां पर प्राक्- हड़प्पा, हड़प्पा और उत्तर हड़प्पा कालीन सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं | यहां से प्राप्त वनस्पति अवशेष के आधार पर कहा जा सकता है कि वे लोग चावल, बाजरा और ज्वार की खेती करते थे |

सैंधव  सभ्यता के प्रमुख स्थल एवं उनसे संबंधित नदी

स्थल

नदी

हड़प्पा

रावी

मोहनजोदड़ो

सिंधु

कालीबंगा

घग्गर

लोथल

भोगवा

रोपड़

सतलज

माण्डा

चेनाब

दैमाबाद

प्रवरा

आलमगीरपुर

हिंडन

सुत्कागेनडोर

दाश्त

भगवानपुरा

सरस्वती

 

 

 

  • आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे स्थित है | यहां पर खुदाई में मृदभांड एवं मनके मिले हैं | कुछ बर्तनों पर त्रिभुज , मोर , गिलहरी आदि की चित्रकारियां मिली है।
  • हुलास, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है | यहां से कांचली मिट्टी के मनके, चूड़ियां, खिलौना-गाड़ी आदि मिले हैं | सैंधव लिपियुक्त एक ठप्पा का भी साक्ष्य मिला है। देसलपुर से एक रक्षा प्राचीर मिला है।
  • सुल्कागेनडोर स्थल दक्षिण बलूचिस्तान में दाश्त नदी के किनारे मिला है। इसकी खोज वर्ष 1927 में आरेल स्टीन ने की थी। इसका दुर्ग एक प्राकृतिक चट्टान के ऊपर है | यहां से मृदभांड , एक ताम्रानिर्मित बाणाग्र , ताम्रानिर्मित ब्लेड के टुकड़े , तिकोने ठीकरे तथा मिट्टी की चूड़ियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • सोत्काकोह सुत्कागेनडोर के पूर्व में स्थित है। वर्ष 1962 में इसकी खोज डेल्स द्वारा की गई। यहां से दो टीले मिले हैं। जिसका आकार सुल्कागेनडोर जैसा ही है।

·      बलूचिस्तान के दक्षिणी तटवर्ती पट्टी पर स्थित बालाकोट एक बंदरगाह के रूप में कार्य करता था। यहां से हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसकी नगर योजना सुनिश्चित थी। भवनों के निर्माण में कच्ची ईंटों की जबकि नालियों के निर्माण में पक्की ईटों का प्रयोग किया जाता था। यहां का सबसे समृद्ध उद्योग सीप उद्योग था | यहां से हजारों की संख्या में सीप की बनी चूड़ियों के टुकड़े मिले हैं।

·      बनावली हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। वर्ष 1973-74 में आर. एस. बिष्ट द्वारा इस स्थल का उत्खनन करवाया गया।  यहाँ से संस्कृति के तीन स्तर प्रकाश में आए हैं – प्राक् सैंधव , विकसित सैंधव एंव उत्तर सैंधव | यहाँ की सड़के नगर को तारांकित ( star shaped ) भागों में विभाजित करती है। यहां से मुहरे , बटखरे , लाजवर्द तथा कार्नेलियन के मनके , हल की आकृति  के खिलौने , तांबे.के बाणाग्र आदि के साक्ष्य मिले है। भगवानपुरा हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में सरस्वती नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। जे पी जोशी ने इसका उत्खनन कराया था। यहां के प्रमुख अवशेषों में सफेद , काले तथा आसमानी रंग की कांच की चूड़ियां , तांबे की चूड़ियां, कांच की मिट्टी के चित्रित मनके आदि हैं।

  • माण्डा जम्मू-कश्मीर के चेनाब नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। वर्ष 1982 में इसका उत्खनन जे पी जोशी तथा मधुबाला द्वारा करवाया गया था | उत्खनन से प्राप्त यहां से तीन संस्कृति स्तर हैं – प्राक् सैंधव , विकसित सैंधव एंव उत्तर कालीन सैंधव | यहां से मिट्टी के ठीकरे , हड्डी के नुकीले बाणाग्र चर्ट ब्लेड , कांस्य निर्मित पंचदार पिन तथा एक आधी-अधूरी मुहर आदि के अवशेष प्राप्त हुए है। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में बारोट तहसील के सनौली नामक हड़प्पा पुरास्थल से क्रमबद्ध रूप से 125 मानव शवाधान प्राप्त हुए हैं जिनकी दिशा उत्तर से दक्षिण है। मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी की द्रोणी में हुआ | मिस्र को नील नदी का उपहार कहा जाता है क्योंकि इस नदी के अभाव में यह भू-भाग  रेगिस्तान होता | सुमेरिया सभ्यता के लोग प्राचीन विश्व के प्रथम लिपिआविष्कर्ता थे|
  • खुदाई से प्राप्त बहुसंख्यक नारी मूर्तियों से अनुमान लगाया जाता है कि सैंधव सभ्यता मातृसत्तात्मक थी | सैंधव लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों भोजन करते थे | उनके वस्त्र ऊनी और सूती दोनों प्रकार के होते थे | कंठहार , कर्णफूल , कड़ा , भुज बंद , अंगूठी , हंसुली ,  करघनी आदि आभूषण पहने जाते थे | नौसारों से स्त्रियों की मांग में सिंदूर के प्रमाण मिले हैं जो हिंदू धर्म में सुहाग का प्रतीक है | सैंधव काल में प्रमुख खेल पासा था |
  • सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का मुख्य खाद्यान्न गेहूं और जौ थे | रंगपुर से धान की भूसी तथा लोथल से चावल के अवशेष मिले हैं | लोथल से वृत्ताकार चक्की के दो पाट मिले हैं | सूती वस्त्रों के अवशेषों से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि यहां के निवासी कपास उगाना जानते थे |  सर्वप्रथम  सैंधव निवासियों ने कपास की खेती प्रारंभ किया था। भारत से कपास यूनान गई जिसे यूनानी हिंडन के नाम से पुकारते थे | भारत में कपास की खेती का प्रारंभ 3000 ईसा पूर्व किया गया, जबकि मिस्र में इसकी खेती 2500 ईसा पूर्व के लगभग शुरू की गई |  हड़प्पा , मोहनजोदड़ो , कालीबंगन , सुरकोटडा के स्थलों से कूबड़दार ऊंट का जीवाश्म मिला है | सुरकोटडा , लोथल , कालीबंगन से घोड़े की मृण्मूर्तियां , हड्डियां , जबड़े आदि के अवशेष प्राप्त हुए हैं |
  • सिंधु सभ्यता का प्रमुख उद्योग वस्त्र उद्योग था | मोहनजोदड़ो से तांबे के दो उपकरणों से लिपटा हुआ सूती धागा एवं कपड़ा प्राप्त हुआ है | लोथल तथा चन्दूदड़ों में मनके का कार्य होता था। * लोथल तथा बालाकोट सीप उद्योग के लिए प्रसिद्ध था |

प्रमुख धातु एवं प्राप्ति स्थल

कच्चा माल

प्राप्त स्थल

तांबा

खेतड़ी (राजस्थान) एवं ब्लूचिस्तान

लाजवर्द

बदख्शां (अफगानिस्तान)

फिरोजा, टिन

ईरान

चांदी

राजस्थान की जावर एवं अजमेर खानों से, अफगानिस्तान एवं ईरान

सीसा

अफगानिस्तान

शिलाजीत

हिमालय

गोमेद

गुजरात

 

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  • सैंधव निवासियों का आंतरिक एवं बाह्य व्यापार उन्नत अवस्था में था।* सिक्कों का प्रचलन नहीं था तथा क्रय-विक्रय वस्तु विनिमय द्वारा किया जाता था | लोथल एवं  मोहनजोदड़ो से हाथी दांत के बने तराजू के पलड़े मिले हैं। उनके बाट मुख्यतः घनाकार होते थे। कुछ बाट बेलनाकार , ढोलाकार , वर्तुलाकार प्रकार के भी मिले हैं | सारगोन  युगीन सुमेरियन लेख से ज्ञात होता है कि मेलुहा , दिलमुन तथा मगन के साथ मेसोपोटामिया के व्यापारिक संबंध थे | मेलुहा की पहचान सिंध क्षेत्र से की गई है | दिलमुन की पहचान फारस की खाड़ी के बहरीन से की गई है | सुमेरी  अभिलेखों में दिलमुन को ‘ साफ सुथरे नगरों का स्थान या ‘ सूर्योदय का क्षेत्र ‘ और ‘ हाथियों का देश ‘ कहा गया है | मिस्र के साथ व्यापारिक संबंध का पता लोथल से प्राप्त ‘ ममी’ की एक आकृति से चलता है |

·      सैंधव सभ्यता में मूर्ति कला , वास्तुकला , उत्कीर्ण कला , मृदभांड कला आदि के उन्नत होने का प्रमाण मिलता है | हड़प्पा से दो पाषाण मूर्तियां तथा मोहनजोदड़ो से लगभग एक दर्जन पाषाण मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। मोहनजोदड़ो से एक संयुक्त पशु मूर्ति प्राप्त हुई है जिसमें शरीर भेड़  का तथा मस्तक सूंडदार हाथी का है | हड़प्पा की पाषाण मूर्तियों में दो सिर रहित मानव  मूर्तियां उल्लेखनीय हैं | धातु मूर्तियां लुप्त मोम  या मधुच्छिष्ट विधि ( lost wax ) से बनाई गई थी | मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की कांस्य मूर्ति अत्यंत प्रसिद्ध है | लोथल से कुत्ते तथा कालीबंगन से ताम्र मूर्ति प्राप्त हुई है | चन्हूदड़ों से इक्का गाड़ी एवं बैलगाड़ी की मूर्तियां उल्लेखनीय है | मृण्मूर्तियां पुरुषों , स्त्रियों और पशु पक्षियों की प्राप्त हुई है | मूर्तियां अधिकतर स्त्रियों की हैं। सर्वाधिक मृण्मूर्तियां पशु पक्षियों की प्राप्त हुई है |

  • सैंधव काल में सर्वाधिक मुहरे सेलखड़ी की बनी है। इसके अतिरिक्त कांचली मिट्टी , चर्ट , गोमेद मिट्टी आदि की बनी मोहरे भी है ।अधिकांश मुहरें वर्गाकार या चौकोर है किंतु कुछ मुहरे घनाकार , गोलाकार , अथवा बेलनाकार भी है | सिंधु सभ्यता की मुहरों  पर सर्वाधिक अंकन एक श्रृंगी बैलों का है | उसके बाद कूबड़ वाले बैल का |  पशुपति शिव का प्रमाण मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर  है जिस पर योगी की आकृति बनी है | उस  योगी के दाई और चीता और हाथी तथा बाई ओर गैंडा एवं भैसा  चित्रित किए गए हैं | योगी के सिर पर एक त्रिशूल जैसा आभूषण है तथा इसके तीन मुख है। मार्शल  महोदय ने इसे रूद्र शिव ‘ से संबंधित किया है।
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  • सैंधव मृदभांड मुख्यता लाल या गुलाबी रंग के है। कुछ मृदभांडों पर लाल रंग से रंगकर काली रेखाओं से चित्र बनाए गए हैं। कुछ बर्तनों पर मोर , हिरन , कछुआ , मछली , गाय , बकरा पीपल , नीम , खजूर केला आदि का अंकन है। सैंधव मृदभांडो में मर्तबान , कटोरे , तशतारियाँ , थालियाँ प्रमुख हैं। स्त्री-पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे | सोने चांदी के अतिरिक्त हाथी दांत , शंख आदि के भी आभूषण तैयार किए जाते थे |
  • सैंधव सभ्यता में मातृ देवी की पूजा प्रमुख थी |  हड़प्पा के प्राप्त एक स्त्री की मूर्ति में उसके गर्भ से निकलता एक पौधा दिखाया गया है संभवत यह देवी धरती की मूर्ति थी जिसे लोग उर्वरता की देवी समझते थे तथा इसकी पूजा उसी तरह करते थे जिस प्रकार मिस्र के लोग नील नदी की देवी आइसिस की। मातृदेवी एवं  शिव की पूजा के अतिरिक्त सैंधव निवासी पशु पक्षियों , वृक्षों आदि की उपासना करते थे | लोथल तथा कालीबंगन के पुरास्थलों से अग्निकुंड अथवा यज्ञ वेदियों  के साक्ष्य  मिलते हैं | उत्तर-दक्षिण दिशा में शव दफनाने की प्रथा प्रचलित थी किंतु इसके अपवाद भी मिलते हैं | कालीबंगन में शव दक्षिण-उत्तर , रोपड़ में पश्चिम-पूर्व तथा लोथल में पूर्व पश्चिम दिशा में प्राप्त हुए हैं | आंशिक समाधिकरण के उदाहरण बहावलपुर से मिले हैं |

सैंधव सभ्यता के विनाश के कारणों पर विभिन्न इतिहासकारों एवं विद्वानों का मत

विनाश का कारण

इतिहासकार/विद्वान

बाढ़

मार्शल, मैके, एस.आर.राव

आर्यों का आक्रमण

गार्डेन चाइल्ड, मार्टीमर ह्वीलर, स्टुटवर्ट पिग्गट

जलवायु परिवर्तन

आरेल स्टाइन, अमलानंद घोष

भू-तात्विक परिवर्तन

एम.आर. साहनी, एच.टी. लैम्ब्रिक, जी.एफ. डेल्स

महामारी

के.यू. कनेडी

अदृश्य गाज

एम.दिमित्रियेव

 

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  • मानव समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक स्थिति के कारण विलक्षण होता है। संस्कृति ही मानव की धारणाओं एवं रहन-सहन का निर्धारण करती है और उसे प्राणीजगत मे विशिष्ट बनाती है।
  • हड़प्पा नामक पुरास्थल सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित है। इस सभ्यता का प्रथम पुरातात्विक प्रमाण हड़प्पा से प्राप्त होने के कारण सैंधव सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। कालानुक्रम की दृष्टि से यह सभ्यता मिस्र एवं मेसोपोटामिया की प्राचीन सभ्यताओं के समकालिक थी।
  • लेखन कला के ज्ञान से पहले का कालखंड आद्य-ऐतिहासिक कालखंड होता है। भारतीय इतिहास में 2500 C. से 6000 B.C. का कालखंड आद्य-ऐतिहासिक कालखंड माना गया है। सैंधव सभ्यता आद्य-ऐतिहासिक काल की सभ्यता है, क्योंकि यहां पर लेखन कला का ज्ञान तो हैं किंतु इतिहास निर्माण में इसका प्रयोग नही किया जा सकता है।
  • सिंधु घाटी की सभ्यता गैर-आर्य मुख्य रुप से इसलिए थी, क्योंकि यह नगरीय सभ्यता थी, जबकि आर्य सभ्यता ग्रामीण थी।
  • सिंधु घाटी सभ्यता लिपि ज्ञान और नगर नियोजन आदि के संदर्भ में प्रारंभिक आर्यों से अधिक विकसित थी। पुरातात्विक साक्ष्यों में अलग-अलग कालों में पाए गए मृदभांड ही सिंधु घाटी सभ्यता को आर्यों से पूर्व का सिध्द करते हैं। काले रंग की आकृतियों से चित्रित लाल मृदभांड जहां हड़प्पा सभ्यता की विशेषता है, वही धूसर एवं चित्रित धूसर मृदभांड (जो बाद के हैं) आर्यों से संबंधित माने गए हैं।
  • सिंधु घाटी संस्कृति वैदिक सभ्यता से अनेक बातों में भिन्न थी। सिंधु घाटी सभ्यता नगरीय थी, जबकि वैदिक सभ्यता ग्रामीण थी। सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक थी। वैदिक सभ्यता के लोग लोहे तथा रक्षा शस्त्रों के ज्ञान से युक्त थे। जबकि सिंधु घाटी की सभ्यता में लोहे के ज्ञान का अभाव था।
  • हड़प्पा सभ्यता की लिपि का वाचन अभी नही हो सका है, अतः सभ्यता से संबंध्द अनकों पुरास्थलों से प्राप्त पुरावशेष ही हड़प्पा संस्कृति के विशिष्ट तत्वों पर प्रकाश डालते हैं।
  • सैंधव सभ्यता के संबध्द विभिन्न पुरास्थलों की खुदाई के फलस्वरुप कहां से प्राप्त पुरावशेष यथा- बर्तन, जेवर, हथियार तथा औजार आदि सैंधव घाटी के निवासियों की सभ्यता को जानने के मूल स्रोत हैं, क्योंकि सैंधव लिपि का अभी तक वाचन नही हो सका है।
  • हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के संदर्भ में अनेकों विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। ई.जे. एच. मैके का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति सुमेर (दक्षिणी मेसोपोटामिया) से लोगें के प्रवसन के कारण हुआ। इन्हीं के समरुप प्रवसन के सिध्दांत के इतिहासविद् डी.एच. गार्डेन, मार्टीमर ह्वीलर का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति पश्चिमी एशिया से सभ्यता के विचार के प्रवसन के कारण हुआ। इस संदर्भ में अमलनंदा घोष का विचार है कि हड़प्पा सभ्यता का उद्भव पूर्व हड़प्पा सभ्यता की परिपक्वता के परिणामस्वरुप हुआ। जबकि एम. रफीक मुगल का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता का विकास रावी नदी क्षेत्र में हड़प्पा में हुआ। इन्होंने इस पुरानी मान्यता का खंडन किया है कि हड़प्पा सभ्यता ने पश्चिमी, मेसोपोटामिया सभ्यता से प्रेरणा ली।
  • हड़प्पावासियों को चांदी की जानकारी थी। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के निवासियों के मध्य इसके विधिवत प्रयोग के साक्ष्य मिलते हैं। ये लोग राजस्थान की जावर और अजमेर खानों से चांदी प्राप्त करते रहे होंगे।
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  • प्रारंभिक हड़प्पा सभ्यता मे पैर से चालित चाक का प्रयोग किया जाता था। परिपक्व हड़प्पा के दौर में हाथ से चालित चाको का प्रयोग किया जाने लगा था। डिजाइन के आधार पर इन बर्तनों की दो श्रेणियाँ थी – एक तो बिना डिजाइन वाले बर्तन तथा दूसरे चित्रित मृदभांड। मृदभांडों को बनाने वाली मिट्टी मे रेत का मिश्रण किया जाता था, जिनको पकाने पर यह हल्के भूरे लाल रंग का रुप ग्रहण कर लेती थी। इन मृदभांडों के ऊपरी हिस्सों में लाल रंग की पुताई कर दी जाती थी तथा निचले हिस्से में काले रंग से विभिन्न प्रकार की चित्रकारी की जाती थी।
  • मूर्ति पूजा का प्रारंभ पूर्व आर्य काल से माना जाता है। सैंधव सभ्यता में मूर्ति पूजा प्रचलित थी, इसके उदाहरण अनेक सैंधव पुरास्थलों से प्राप्त मातृ देवी की मृण्मूर्तियाँ हैं।
  • हड़प्पा संस्कृति की मुहरों एवं टेराकोटा कलाकृतियों मे गाय का चित्रण नही मिलता जबकि हाथी, गैंडा, बाघ, हिरण, भेड़ा आदि का अंकन मिलता है। गाय को महत्व वैदिक काल से प्राप्त हुआ।
  • हड़प्पा सभ्यता के स्थलों मे से खम्भात की खाड़ी के निकट स्थित लोथल से गोदीबाड़ा के साक्ष्य मिले हैं। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्गर नदी के किनारे स्थित कालीबंगा से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं। गुजरात के धौलावीरा से हड़प्पा लिपि के बड़े आकार के 10 चिन्हों वाला एक शिलालेख मिला है। हरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित बनावली से पकी मिट्टी की बनी हुई हल की प्रतिकृति मिली है।
  • हड़प्पा रावी नदी, हस्तिनापुर, गंगा नदी, नागार्जनु कोंडा-कृष्णा नदी तथा पैठन-गोदावरी नदी से संबंधित स्थल हैं।
  • सैंधव सभ्यता के महान स्नानागर के साक्ष्य मोहनजोदड़ों से प्राप्त हुए हैं. इसकी लंबाई उत्तर से दक्षिण की ओर 55 मीटर और चौड़ाई पूर्व से पश्चिम दिशा की और 33 मीटर है।
  • सैंधव सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता थी तथा यहां के लोग लोहे से परिचित नही थे, जबकि सैंधव नगरों में नालियों की सुदृढ़ व्यवस्था थी और व्यापार एवं वाणिज्य उन्नत दशा में था। मातृदेवी की उपासना के ढेर सारे साक्ष्य सैंधव नगरों से मिलते हैं, जिससे प्रमाणित होता है कि मतृदेवी की उपासना का जाती रही होगी।
  • सिंधु घाटी सभ्यता की प्रमुख विशेषता नगर नियोजना माना जाता है। साथ ही हड़प्पा और मोहनजोदड़ों, सिंधु घाटी सभ्यता के दो प्रमुख नगर थे। हड़प्पा नामक पुरास्थल सर्वप्रथम ज्ञात होने के कारण इसको हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। कालीबंगा से कृषि संबंधी साक्ष्य तथा लोथल से उद्योग संबंधी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित है। इसकी खोज वर्ष 1951 में अमलानंद घोष ने की थी।
  • राखी गढ़ी हरियाणा के हिसार जिले में घग्गर नदी पर स्थित है। इस स्थल की खोज वर्ष 1969 में सूरजभान ने की थी।
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  • हड़प्पीय स्थल एवं उनकी स्थिति

हड़प्पीय स्थल            स्थिति

माण्डा                  महाराष्ट्र

दायमाबाद               महाराष्ट्र

कालीबंगा               राजस्थान

राखीगढ़ी                हरियाणा

  • मोहनजोदड़ों से लगभग 130 किमी. दक्षिण-पूर्व मे स्थित चन्हूदड़ों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1931 में एन.जी. मजूमदार ने किया तथा वर्ष 1935 मे मैके ने यहां उत्खनन करवाया।
  • हड़प्पा के अवशेष आधुनिक पाकिस्तान में मांटगोमरी (वर्तमान शाहीवाल) जिले में स्थित है, यह स्थल रावी नदी के तट पर स्थित था। जबकि कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में, लोथल गुजरात प्रांत में तथा आलमगीरपुर उत्तर प्रदेश में स्थित है।
  • रंगपुर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में हैं, यहाँ से प्राक्-हड़प्पा, हड़प्पा और उत्तर-हड़प्पाकालीन सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं।
  • दधेरी एक परवर्ती पुरास्थल है, जो पंजाब प्रांत के लुधियाना जिले में गोविंदगढ़ के पास स्थित है। दधेरी स्थल चित्रित धूसर मृदभांड काल से संबंधित है, जो कि आर्यों के आगमन का काल भी है।
  • सिंधु सभ्यता से संबंधित लोथल नामक पुरास्थल गुजरात के अहमदाबाद चिले में भोगवा नामक नदी के तट पर सरगवल गांव से 2 किमी. उत्तर में स्थित है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ों पाकिस्तान मे स्थित है।
  • हरियाणा के फतेहाबाद जिले में स्थित बनावली से हल का टेराकोटा प्राप्त हुआ है।
  • कालीबंगन, रोपड़ तथा लोथल सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित स्थल है, जबकि पाटलिपुत्र महाजनपद कालीन एक प्रमुख नगर है।
  • हरियाणा के हिसार जिले में अवस्थित राखीगढ़ी भारत में हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल है। मोहनजोदड़ों, हड़प्पा और गनवेरीवाला (पाकिस्तान) तथा राखागढ़ी एवं धौलावीरा (भारत हड़प्पा सभ्यता के पांच वृहद स्थलों की श्रेणी में आते हैं।
  • राखी गढ़ी हडप्पा सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा (मोहनजोदड़ों के बाद) स्थल है। भारत मे सिंधु घाटी का दूसरा बड़ा स्थल धौलावीरा है।
  • स्थापित सिंधु घाटी की सभ्यता का विस्तार उत्तर में झेलम नदी के पूर्वी तट से दक्षिण में यमुना की सहायक नदी हिंडन के तट तक माना जाता है। इसमें झेलम, सिंधु एवं चेनाब नदियाँ तो शामिल हैं परंतु गंगा नदी इसमे शामिल नही है।
  • हड़प्पा सभ्यता में ऐसे प्रचुर साक्ष्य मिलते हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि मातृदेवी की उपासना वहां व्यापक रुप से प्रचलित थी। विभिन्न मृण्मूर्तियाँ, मुद्राओं आदि पर अंकित आकृतियों आदि से जो चित्र उभरता है उससे नारी (शक्ति) उपासना के प्रचलन के साक्ष्य मिलते हैं।
  • सिंधु घाटी के लोग पशुपति शिव की पूजा भी करते थे। इसका प्रमाण मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक मोहर है जिस पर योगी की आकृति बनी है।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल के निर्देश पर वर्ष 1921 मे दयाराम साहनी ने हड़प्पा के तथा वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ों के टीलों का पता लगाया।
  • हड़प्पा का उत्खनन दयाराम साहनी, लोथल का उत्खनन एस.आर. राव तथा सुरकोटडा का उत्खनन जे.पी. जोशी ने कराया था, जबकि धौलावीरा का उत्खनन वी.के. थापड़ ने नही बल्कि आर.एस. बिष्ट ने कराया था।
  • ए. कनिंघम महोदय ने भारतीय उपमहाद्वीप के ऐतिहासिक महत्व के टीलों की खोज की थी किंतु वह हड़प्पा के टीलों के महत्व को नही जान सके थे।
  • वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का सर्वेक्षण किया। वर्ष 1926 में माधोस्वरुप वत्स हड़प्पा के सर्वेक्षण से संबंधित रहे। मोहनजोदड़ों की खोज सर्वप्रथम वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी ने की तथा इसके पुरातात्विक महत्व की ओर ध्यान आकर्षित किया। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य विदवान के.एन. दीक्षित, अर्नेस्ट मैके, आरेल स्टीन, ए.घोष, जे.पी. जोशी आदि ने भी इस सभ्यता की खोज में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अतः स्पष्ट है कि स्मिथ हड़प्पा सभ्यता की खोज से संबंधित नही रहे बल्कि ये भारतविद एवं कला इतिहासकार के रुप में प्रसिध्द थे।
  • मोहनजोदड़ों के ध्वंसावशेष पाकिस्तान के सिंध प्रातं के लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाहिने तट पर स्थित है। यहां लगभग प्रत्येक घर मे निजी कुएं एवं स्नानागार होते थे। और पानी के निकास के लिए नालियोँ की व्यवस्था थी।
  • भारत में सबसे प्राचीन सभ्यता हड़प्पा सभ्यता अपनी नगर योजना के लिए विख्यात है। हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना की आधार-सामग्री मोहनजोदड़ों, हड़प्पा, चन्हूदड़ों, कालीबंगा, लोथल, सुरकोटदा तथा बनावली से प्राप्त होती है। सिंधु घाटी की सभ्यता कांस्य कालीन है। लोहे का ज्ञान कांसे के बाद वैदिक काल में लगभग 1000 ई.पू. में हुआ। भारत में सबसे प्राचीन सिक्के आहत मुद्रा के रुप में छठी शताब्दी ई.पू. में अस्तित्व में आएं। सबसे पहले भारत में सोने के सिक्के हिंद-यवन शासकों (द्वीतीय शताब्दी ई.पू.) ने जारी किए जिनकी संख्या कुषाण काल में बढ़ी।
  • सर्वप्रथम मानव द्वारा तांबा धातु का प्रयोग किया गया। इसके शिव के विभिन्न भागों में प्रयोग की तिथि में अंतर है।
  • हड़प्पा सभ्यता भारत की प्राचीनतम सभ्यता थी। हड़प्पायी संदर्भ में हाथी दांत का पैमाना लोथल से मिला है। यह गुजरात में है।
  • हड़प्पा सभ्यता एक कांस्ययुगीन सभ्यता थी। यहां से तांबा, कांसा, स्वर्ण और चांदी आदि धातुए तो मिली हैं परंतु लोहे की प्राप्ति नही हुई है। वस्तुतः हड़प्पा कालीन लोग लोहे से परिचित थे। भारत में लौह युग का प्रारंभ उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ई.पू.) से माना जाता है।
  • हरियाणा में स्थित बनावली नामक हड़प्पा स्थल घग्गर एवं उसकी सहायक नदियों की घाटी में स्थित है।
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  • हड़प्पा, मोहनजोदड़ों, रोपड़, लोथल एवं कालीबंगा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख स्थल है। सैंधव सभ्यता में सड़के एक-दूसरे को समकोण पर काटती (ऑक्सफोर्ड प्रणाली) थी। सड़कों के दोनों किनारों पर पक्की नालियाँ बनाई जाती थी, जिन्हें बड़ी ईटों अथवा पत्थर के टुकड़ों से ढंका जाता था। इस समय सोने तथा चांदी के आभूषण बनाए जाते थे। तांबे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार किया जाता था।
  • मोहनजोदड़ों (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले मे सिंधु नदी के दाएँ तट पर) तथा हड़प्पा (वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के शाहीवाल (मांटगोमरी) जिले में रावी नदी के बाएँ तट पर ) नगर सैंधव सभ्यता के दो प्रमुख नगर थे जिनकी खोज उत्खननों के दौर क्रमशः राखालादास  बनर्जी तथा दयाराम साहनी ने की थी। वर्तमान मे ये नगर मृतप्राय (विलुप्त) स्थिति मे है।
  • धौलावीरा हड़प्पा की भारत मे स्थित दूसरी सबसे बड़ी (प्रथम राखीगढ़ी) बस्ती है। यह गुजरात के कच्छ के रन में अवस्थित है। यहां से उत्खनन के परिणामस्वरुप हड़प्पा सभ्यता की अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त की गई। इन खोजों में 7 मीटर गहरा तथा 79 मीटर लंबा शैलकृत जलकुंड महत्वपूर्ण है।
  • धौलावीरा नगर आयताकार बना था। इस नगर को तीन भागों-किला, मध्य नगर एवं निचला नगर में विभाजित किया गया था।
  • धौलावीरा के निवासी एक उन्नत जल प्रबंधन व्यवस्था से परिचित थे। ये लोग बांध बनाकर जलाशयों में पानी संग्रहीत करते थे, जो इस तरह का प्राचीनतम साक्ष्य है।
  • उ.प्र. के बागपत जिले में बारोट तहसील के सनौली नामक हड़प्पन पुरास्थल से क्रमबध्द रुप से 125 मानव शवाधान प्राप्त हुए हैं जिनकी दिसा उत्तर से दक्षिण है। इन शवाधानों के साथ दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी मिली हैं जिनमें गहने प्रमुख हैं। इनके साथ ही इनमे कुछ जानवरों की हड़डियाँ भी प्राप्त हुई हैं।
  • वस्त्रों के लिए कपास का उत्पादन सर्वप्रथम भारत में किया गया। वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी के नेतृत्व मे सिंधु नदी के किनारे स्थित मोहनजोदडों (वर्तमान पाकिस्तान के लरकाना जिले मे स्थित) उत्खनन के कपास के सूत की प्राप्ति की गई थी।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के संदर्भ में सामान्यतः माना जाता है कि यह प्रधानतया लौकिक सभ्यता थी, इसमें धार्मिक तत्व यद्यपि उपस्थित था, वर्चस्वशाली नही। सिंधु सभ्यता मे अनेक स्थलों से कपास के वस्त्र के साक्ष्य मिल हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि वहां के लोग इसका निर्माण करते थे।
  • आज तक सिंधु घाटी सभ्यता के स्थलों की खुदाई में किसी मंदिर अथवा पूजा स्थल का साक्ष्य नही मिला है। अतः इस सभ्यता के धार्मिक जीवन का एकमात्र स्रोत यहां पाई गई मिट्टी और पत्थर की मूर्तियाँ एवं मुहरे हैं। इनसे यह ज्ञात होता है कि मातृदेवी, पशुपति तथा उनके लिंग की पूजा और पीपल, नीम आदि पेडों एवं नाग आदि जीव-जंतुओं की उपासना प्रचलित थी। पशुओं में हाथी, बाघ, भैंसा, गैंडा और घड़ियाल के चित्र मिले हैं लेकिन  घोड़े के चित्र का अभाव है। हालांकि घोड़े की अस्थियां लोथल, सुरकोटडा एवं कालीबंगा इत्यादि स्थलों से प्राप्त हुई हैं, फिर भी घोड़े का उपयोग युध्द के रख को खींचने में किया जाता था, ऐसे साक्ष्य का अभाव है।
  • मोहनजोदड़ों में अनेक वस्तुएँ प्राप्त हुई, जिसमें कूबड़ वाले बैल (ककुदमान वृषभ) की आकृति वाली मुहर भी शामिल थी।
  • सिंधु घाटी सभ्यता के निवासी अश्व से परिचित थे लेकिन उसका अंकन हड़प्पा की मुहरों पर नही मिलता है।

 

 

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  • मिस्र की सभ्यता का विकास नील नदी की द्रोणी में हुआ। नील नदी विश्व की इस प्राचीन सभ्यता का आधार थी। मिस्र को नील नदी का उपहार कहा जाता है क्योंकि इस नदी के अभाव में यह भू-भाग रेगिस्तान होता। मिस्र अफ्रीका महाद्वीप में स्थित है। इसकी समकालीन सभ्यताएँ सिंधु घाटी सभ्यता (भारत) तथा मेसोपोटामिया की सभ्यता (इराक) थी।
  • एजटेक सभ्यता का विस्तार मेसोअमेरिका के उत्तरी भाग पर था। मेसोअमेरिका के अंतर्गत मध्य मेक्सिकों से लेकर बेलिज, ग्वाटेमाला, अलसल्वाडोर, होंडुरास, निकारागुआ तथा उत्तरी कोस्टारिका तक का क्षेत्र शामिल है। इस प्रकार एजटेक सभ्यता का विस्तार मध्य मेक्सिकों में, माया सभ्यता का विस्तार मोसोअमेरिका के दक्षिणी भाग अर्थात दक्षिणी मेक्सिकों से लेकर दक्षिणी ग्वाटेमाला, बेलिज, अलसल्वाडोर एवं होंडुरास तक था। इसके अलावा मुइस्का सभ्यता दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के कोलम्बिया के पूर्वी भाग मे विस्तृत थी, जबकि इंका सभ्यता का विस्तार दक्षिणी अमेरिका  के पश्चिमी भा में उत्तर मे क्वीटों से लेकर दक्षिण में सेंटियागों तक था।
  • सुमेरिया सभ्यता के लोग प्राचीन विश्व के प्रथम लिपि-आविष्कर्ता थे। इनकी प्रारांभिक लिपि का स्वरुप अत्यंत सरल एवं आदिम था। सुमेरिया की क्यूनीफार्म लिपि को सामान्यतः प्राचीनतम लिपि माना जाता है।

 

 

वैदिक काल

  • वैदिक शब्द वेद से बना है। वेद का अर्थ ज्ञान होता है। भारत में सैंधव संस्कृति के पश्चात जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ, उसे वैदिक सभ्यता या आर्य सभ्यता के नाम से जाना जाता है।
  • आर्य शब्द भाषा सूचक है जिसका अर्थ है श्रेष्ठ या कुलीन। क्लासिकीय संस्कृति में आर्य शब्द का अर्थ है – एक उत्तम व्यक्ति। आर्यों का इतिहास मुख्यतः वेदो से ज्ञात होता है। सामान्यतः वैदिक साहित्य की रचना का श्रेय आर्यों को दिया जाता है। आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर मतभेद है। प्रमुख इतिहासकारों ने इस पर अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं –

आर्यों का मूल निवास स्थान                            विद्वान

कश्मीर अथवा हिमालय क्षेत्र

एल.डी. कल्ल

ब्रह्मार्षि देश

पं. गंगानाथ झा

सप्त-सैंधव प्रदेश

डॉ. अविनाश चंद्र दास

देविका प्रदेश

डी.एस. त्रिवेदी

दक्षिणी रुस

गार्डन चाइल्ड एवं नेहरिंग

मध्य एशिया

मैक्स मूलर

उत्तरी ध्रुव

पं. बाल गंगाधर तिलक

तिब्बत

स्वामी दयानंद सरस्वती

जर्मनी

हर्ट एवं पेन्का

हंगरी

गाइल्स

 

  • वैदिक काल को दो भागों में विभाजित किया जाता है – ऋग्वैदिक अथवा पूर्ववैदिक काल (1500 ई.पू.-1000 ई.पू.)। उत्तर वैदिक काल (1000 ई.पू.-600 ई.पू.)
  • ऋग्वैदिक काल का इतिहास पूर्णतया ऋग्वेद से ज्ञात होता है। ऋग्वेद में लोहे का उल्लेख नही है। उत्तर वैदिक ग्रंथों में लोहे का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में अफगानिस्तान की चार नदियों क्रुमु, कुभा, गोमती और सुवास्तु का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सप्त सैंधव प्रदेश की सात नदियों का उल्लेख मिलता है। ये नदियाँ हैं – सरस्वती, विपासा, परुष्णी, वितस्ता, सिंधु, शुतुद्री तथा अस्किनी।
  • ऋग्वेद में यमुना नदी का तीन बार जबकि गंगा नदी का एक बार उल्लेख हुआ है। इसमें कश्मीर की एक नदी मरुद्वृधा का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में सिंधु नदी का सर्वाधिक बार उल्लेख हुआ है, जबकि ऋग्वैदिक आर्यों की सबसे पवित्र नदी सरस्वसती थी जिसे मातेतमा, देवीतमा एवं नदीतमा (नदियों में प्रमुख) कहा गया है।
  • सिंधु नदी को उसके आर्थिक महत्व के कारण ‘ हिरण्यनी‘ कहा गया है। तथा इसके गिरने की जगह ‘ परावत अर्थात् अरब सागर बताई गई है। गंगा-यमुना के दोआब एवं उसके समीपवर्ती क्षेत्रों को आर्यों ने ‘ ब्रहार्षि देश ‘ कहा है। आर्यों ने हिमालय और विंध्याचल पर्वतों के बीच का नाम ‘ मध्य देश ‘ रखा। कालांतर में आर्यों ने संपूर्ण उत्तर भारत पर अधिकार कर लिया | जिसे ‘ आर्यावर्त ‘ कहा जाता था। 1400 ई. पू. के बोगजकाई ( एशिया माइनर ) के अभिलेख में ऋग्वैदिक काल के देवताओं का उल्लेख मिलता है।
  • ऋग्वैदिक काल की नदियाँ

प्राचीन नाम         

आधुनिक नाम

अस्किनी

चिनाब

विपासा

व्यास

परुष्णी

रावी

वितस्ता

झेलम

कुभा

काबुल

क्रुमु

कुर्रम

गोमती

गोमल

सुवास्तु

स्वात

सदानीरा

गंडक

शुतुद्री

सतलज

दृशाद्ती

घग्घर

 

  • वैदिक साहित्य को श्रुति भी कहा जाता है। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है सुना हुआ। भारतीय साहित्य में वेद सर्वाधिक प्राचीन है। यह चार हैं –
  1. ऋग्वेद
  2. सामवेद
  3. यजुर्वेद
  4. अथर्ववेद
  • ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को वेदत्रयी या त्रयी कहा जाता है। प्रत्येक वेद के चार भाग होते हैं –
  1. संहिता
  2. ब्राह्मण ग्रंथ
  3. आरण्यक
  4. उपनिषद
  • ऋग्वेद में कुल 10 मंडल तथा 1028 सूक्त हैं। 1017 सूक्त काकल में तथा 11 सूक्त बालखिल्य में हैं। ऋग्वेद के 2 से 7 तक के मंडल प्राचीन माने जाते हैं।
  • ऋग्वेद के मंडल एवं उसके रचयिता

ऋग्वेद के मंडल

रचयिता

प्रथम मंडल

मधुच्छन्दा, दीर्घतमा आदि

द्वीतीय मंडल

गृत्समद

तृतीय मंडल

विश्वामित्र

चतुर्त मंडल

वामदेव

पंचम मंडल

अत्रि

षष्ठम मंडल

भारद्वाज

सप्तम् मंडल

वशिष्ठ

अष्ट्म मंडल

कण्व एवं आंगिरस

नवम् मंडल

आंगिरस, काश्यप आदि

दशम् मंडल

त्रित, इंद्राणी, शची, श्रध्दा आदि

 

  • ऋग्वेद के तृतीय मंडल में गायत्री मंत्र का उल्लेख है। इसके रचनाकार विश्वामित्र हैं। यह सविता (सूर्य देवता) को समर्पित है। यह मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में वर्णित है। ऋग्वेद के नौवें मंडल के सभी 114 मंत्र सोम को समर्पित हैं। प्रारंभ में हम तीन वर्णों का उल्लेख पाते हैं – ब्रह्म, छत्र तथा विश।
  • शुद्र शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में हुआ है। ऋग्वेद के मंत्रों का उच्चारण करके यज्ञ संपन्न कराने वाले पुरोहित को होता कहा जाता था। ऐतरेव तथा कौषीतकी ऋग्वेद के दो ब्राह्मण ग्रंथ है। पतंजलि के अनुसार, ऋग्वेद की 21 शाखाएँ हैं। ऐतरेय ब्राह्मण में शुनः शेप आख्यान का वर्णन मिलता है।
  • यजुर्वेद में स्तोत्र एवं कर्मकांड वर्णित है। यह वेद गद्य एवं पद्य दोनों में है। यजुर्वेद के कर्मकांडो को संपन्न कराने वाले पुरोहित को ‘ अर्ध्वयु ‘ कहा जाता था। यजुर्वेद की दो शाखाएं है- कृष्ण यजुर्वेद जो गद्य एवं पद्य दोनों में है। और शुक्ल यजुर्वेद जो केवल पद्य में है। यजुर्वेद का अंतिम भाग ईशोपनिषद है , जिसका संबंध याज्ञिक अनुष्ठान से न होकर अध्यात्मिक चिंतन से है | शुक्ल यजुर्वेद की मुख्य संहिताओं को ‘ वाजसनेय ‘ भी कहा गया है। क्योंकि वाजसनी के पुत्र याज्ञवल्क्य इसके द्रष्टा थे। कृष्ण यजुर्वेद की मुख्य शाखाएं है – तैत्तिरीय, मैत्रायणी तथा कपिष्ठल | शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद का ब्राह्मण ग्रंथ है | इसमें पुनर्जन्म का सिद्धांत , जल प्लावन तथा पुरुरवा -उर्वशी आख्यान तथा पुरुषमेध का वर्णन है | साम का अर्थ संगीत अथवा गान होता है | सामवेद में यज्ञों के अवसर पर गाए जाने वाले मंत्रों का संग्रह है जो व्यक्ति इन मंत्रों को गाता था उसे ‘ उदगाता ‘  कहा जाता था | सामवेद में कुल 1810 छंद है ,  जिनमें से 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में भी उपलब्ध है | सामवेद की प्रमुख  शाखाएं हैं – कौथुमीय ,  राणायनीय  एवं जैमिनीय |

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  • अथर्ववेद के मंत्रों का उच्चारण करने वाले पुरोहित को ब्रह्मा कहा जाता था | अथर्ववेद में मगध तथा अंग दोनों को दूरस्थ प्रदेश कहा गया है |इसमें सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है | इसमें सामान्य मनुष्य के विचारों विश्वासों तथा अंधविश्वासों का वर्णन मिलता है | अथर्ववेद की दो शाखाएं उपलब्ध है – पिप्पलाद तथा शौनक |याज्ञवल्क्य -गार्गी के प्रसिद्ध संवाद का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद में है। कठोपनिषद में यम और नचिकेता का संवाद उल्लिखित है। कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद का उपनिषद है। सत्यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिया गया है। अर्थववेद का एकमात्र ब्राह्मण ग्रंथ गोपथ ब्राह्मण है। इसका कोई आरण्यक नहीं है। उपनिषद दर्शन पर आधारित पुस्तकें हैं जिन्हें वेदांत भी कहा जाता है। उपनिषद का अर्थ शिष्य द्वारा ज्ञान प्राप्ति हेतु गुरू के समीप बैठना है। उपनिषद में प्रथम बार मोक्ष की चर्चा की गई है। यह शब्द श्वेताश्वर उपनिषद में पहली बार आया है।
  • वेदांग की संख्या 6 है यह है –
  1. शिक्षा
  2. कल्प
  3. व्याकरण
  4. निरुक्त
  5. छंद एवं
  6. ज्योतिष
  • शुल्व सूत्र में यज्ञीय वेदियों  को मापने , उनके स्थान चयन तथा निर्माण आदि का वर्णन है |
  • पुराणों की संख्या 18 है | यह है –
  1. मत्स्य पुराण
  2. मार्कंडेय पुराण
  3. भविष्य पुराण
  4. भागवत पुराण
  5. ब्रह्मांड पुराण
  6. ब्रह्मपुराण
  7. वामन पुराण
  8. वराह पुराण
  9. विष्णु पुराण
  10. अग्नि पुराण
  11. नारद पुराण
  12. लिंग पुराण
  13. गरुड़ पुराण
  14. स्कंद पुराण
  15. शिव पुराण
  16. पद्म पुराण
  17. कूर्म
  18. ब्रह्मवैवर्त
  • इनकी रचना लोमहर्ष ऋषि तथा उनके पुत्र उग्रश्र्वा  ने की थी | इनमें भविष्यत काल शैली में कलयुग के राजाओं का वर्णन मिलता है | हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन हेतु मथानी के रूप में मंदराचल पर्वत तथा रस्सी  के रूप में सर्पों के राजा वासुकी का प्रयोग किया गया था | इसमें विष्णु ने कूर्मा अवतार धारण कर मंद्राचल पर्वत को अपने ऊपर रखा था |
  • अनु , द्रहु , पुरु , यदु तथा तुर्वस को ‘ पंचजन ‘ कहा गया है |  जन के अधिपति को ‘ राजा ‘ कहा गया है | कुलप ,  परिवार का स्वामी पिता अथवा बड़ा भाई होता है | ग्राम का मुखिया  ‘ ग्रामणि ‘ तथा विश का प्रमुख विशपति कहलाता था। दशराज्ञ युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद  7वें मंडल में मिलता है इस युद्ध में प्रत्येक पक्ष में आर्य अनार्य थे | यह  युद्ध परुष्णी  नदी ( आधुनिक रावी नदी ) के तट पर लड़ा गया | दशराज्ञ युद्ध  भरतों के राजा सुदास ( त्रित्सु राजवंश) तथा 10 राजाओं का एक संघ  ( इसमें पंचजन  तथा पांच लघु जनजातियों – अनिल , पक्थ , भलानस  शिव तथा विषाणिन के राजा सम्मिलित थे ) के मध्य हुआ था | इस युद्ध में सुदास  की विजय हुई | सुदास  के पुरोहित वशिष्ठ थे | ऋग वैदिक युग में राजा भूमि का स्वामी नहीं था वह प्रधानतः युद्ध में जन का नेता होता था | विदथ आर्यों की प्राचीन संस्था थी |  ऋग्वेद में पुरोहित सेनानी तथा ग्रामीणों का उल्लेख मिलता है | पुरोहित युद्ध के समय राजा के साथ जाता था | स्पश ( गुप्तचर ) तथा दूत नामक कर्मचारियों का भी उल्लेख मिलता है।
  • ऋग्वैदिक समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल होती थी। परिवार के लिए ‘ गृह ‘ शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऋगवैदिक समाज पितृसत्तामक समाज था। वरुण सूक्त के शुनःशेप आख्यान से ज्ञात होता है कि पिता अपनी संतान को बेच सकता था।
  • ऋग्वैदिक कालीन समाज प्रारंभ में वर्ग- विभेद से रहित था। ऋगवेद में ‘ वर्ण ‘ शब्द रंग के अर्थ में तथा कही कही व्यवसाय चयन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। ऋगवेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त के सर्वप्रथम ‘ शुद्र ‘ शब्द मिलता है। इसमें विराट पुरुष के विभिन्न अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है। विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण , भुजाओं से राजन्य ( श्रत्रिय ) , ऊरू ( जंघा ) से वैश्य और पैरों से शुद्र उत्पन्न हुए। गोत्र शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में हुआ था। गोत्र शब्द का मूल अर्थ है- गोष्ठ अथवा वह स्थान जहां समूचे कुल का गोधन पाला जाता था। परंतु बाद में इसका अर्थ एक ही मूल पुरुष से उत्पन्न लोगों का समुदाय हो गया। गोत्र प्रथा की स्थापना उत्तर वैदिक काल में हुई थी। आर्यों द्वारा अनार्यों को दिए गए विभिन्न नाम है – अब्रहमन ( वेदों को न मानने वाले ) , अयज्वन् (यज्ञ न करने वाले ) , अनासः (बिना नाक वाले) , अदेवयु (देवों को न मानने वाले) ,अव्रत ( वैदिक व्रतों का पालन न करने वाले) तथा मृधवाक् (कटु वाणी वाले)।
  • शतपथ ब्राह्मण में पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा गया है। ऋग्वेद में जायेदस्तम अर्थात् पत्नी ही गृह है, कह कर उसके महत्व को स्वीकार किया गया है | कन्या के विदाई के समय जो उपहार दिए जाते थे उसे ‘ वहतु ‘ कहा जाता था | स्त्रियों में पुनर्विवाह , नियोग प्रथा प्रचलित थी | नियोग प्रथा से उत्पन्न संतान ‘ क्षेत्रज ‘ कहलाती थी | समाज में सती प्रथा के प्रचलन का उदाहरण नहीं मिलता है| जो कन्याएं जीवन भर कुंवारी रहती थी  उन्हें अमाजू  कहा जाता था | ऋगवेद में घोषा , लोपामुद्रा , विश्ववारा , अपाला आदि स्त्रियां शिक्षित थी। तथा जिन्होंने कुछ मंत्रों की रचना भी की थी |  लोपामुद्रा अगस्त ऋषि की पत्नी थी |
  • आर्य मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे | भोजन में दूध , घी , दही आदि का विशेष महत्व था। दूध में पकी हुई खीर (क्षीरपाकौदन) का उल्लेख मिलता है। जो की सत्तू को दही में मिलाकर ‘ करंभ ‘ नामक खाद्य पदार्थ बनाया जाता था। ऋग्वैदिक काल में तीन प्रकार का वस्त्र प्रचलित था। ये था – नीवी , वासस् एवं अधिवासस् | स्त्री-पुरुष दोनों आभूषण पहनते थे। 
  • ऋग्वैदिक आर्य आमोद प्रमोद का जीवन व्यतीत करते थे | रथदौड़, घुड़दौड़ तथा पासा खेलना भी उनके मनोरंजन के साधन थे | वाद्यों में झांझ मंजीरे , दुंदुभि , कर्करि, वीणा , बांसुरी आदि का उल्लेख मिलता है |

·      आर्यों की संस्कृति मूलतः ग्रामीण थी। कृषि और पशुपालन उनके आर्थिक जीवन का मूल आधार था | ऋग्वेद में पशुपालन की तुलना में कृषि का उल्लेख बहुत कम मिलता है | ऋग्वेद के मात्र 24 मंत्रों में ही कृषि का उल्लेख प्राप्त होता है | ‘ उर्वरा ‘ या क्षेत्र कृषि योग्य भूमि को कहा जाता था | बुआई , कटाई  , मड़ाई आदि क्रियाओं से लोग परिचित थे | ऋग्वेद में  कुल्या ( नहर) , कूप  तथा अवट ( खोदकर बनाए गए गड्ढे ) , अश्मचक्र ( रहट की चरखी ) आदि का उल्लेख है | ऋग वैदिक समाज में व्यवसाय अनुवांशिक नहीं थे | ऋग्वेद में तक्षा (बढ़ई) ,  स्वर्णकार, चर्मकार , वाय ( जुलाहे ) , कर्मा ( धातु कर्म करने वाला ) , कुंभकार  आदि का उल्लेख मिलता है | कताई – बुनाई , का कार्य स्त्री पुरुष दोनों करते थे | ऋग्वेद से पता चलता है कि सिंध तथा गंधार प्रदेश सुंदर ऊनी वस्त्रों के लिए विख्यात थे। व्यापार अदल-बदल प्रणाली पर आधारित था। विनिमय के माध्यम के रूप में ‘ निष्क ‘ का उल्लेख हुआ है | व्यापार वाणिज्य  प्रधानतः ‘ पणि ‘ वर्ग के लोग करते थे |  ऋगवैदिक आर्य लोहे से परिचित नही थे।

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ऋग्वैदिक कालीन शब्दावली एवं अर्थ

नीवी

कमर के नीचे पहना जाने वाला वस्त्र

वासस्

कमर के ऊपर पहना जाने वाल वस्त्र

अधिवासम्

ऊपर से धारण किया जाने वाला चादर या ओढ़नी

तक्षा

बढ़ई

कर्मा

धातु कर्मे करने वाले

वेकनाट

सूदखोर

अरित्र

पतवार

अरितृ

नाविक

 

  • वैदिक साहित्य में ऋग्वेद प्राचीनतम ग्रंथ है जिसमें हमें सर्वप्रथम बहूदेववाद के दर्शन प्राप्त होते हैं | यास्क के निरुक्त के अनुसार ऋग्वैदिक देवताओं की संख्या मात्र 3 बताई गई है | ऋग्वेद में एक अन्य स्थल पर प्रत्येक लोक में 11 देवताओं का निवास मानकर उनकी संख्या 33 बताई गई है | ऋग्वैदिक देवताओं का वर्गीकरण तीन वर्गों में किया गया है |  पृथ्वी के देवता — पृथ्वी , अग्नि , बृहस्पति , सोम आदि |  आकाश के देवता — सूर्य , मित्र , पूषन , विष्णु , द्यौ , अश्विन आदि। अंतरिक्ष के देवता — इंद्र , पर्जन्य , रुद्र  , आप  , वायु  , वात  आदि  | * इंद्र को विश्व का स्वामी बताया गया है| * इन्हें पुरंदर अर्थात्  ‘ किलों को तोड़ने वाला ‘ कहा गया है।
  • ऋगवेद में सर्वाधिक सूक्त (250) इंद्र को समर्पित है। * इंद्र को आर्यों का युद्ध नेता तथा वर्षा का देवता माना जाता है। * ऋगवेद में अग्नि को 200 सूक्त समर्पित है। और वह इस काल के दूसरे सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता है। ऋग्वैदिक देवताओं में वरुण को तीसरा स्थान प्राप्त था | वरुण को समुंद्र का देवता एवं ऋतु का नियामक कहा जाता है | * वरुण को वैदिक सभ्यता में नैतिक व्यवस्था का प्रधान माना जाता था। इसी कारण उन्हें ‘ ऋतस्यगोपा ‘ भी कहा जाता था |ईरान में वरुण को अहुरमज़्दा ‘  तथा यूनान में वरुण को ओरनोज़ नाम से जाना जाता है |  ऋग्वेद के नौवें मंडल के सभी 114 मंत्र ‘ सोम ‘ को समर्पित हैं | वनस्पतियों एवं औषधियों का देवता पूषन है | इनके रथ को बकरे द्वारा खींचते हुए प्रदर्शित किया गया है | जंगल की देवी ‘ अरण्यानी ‘  जबकि ज्ञान की देवी ‘ सरस्वती ‘ थी।
  • उत्तर वैदिक काल में अनु ,द्रुह्य, तुर्वश , क्रिवि , पुरु तथा भरत आदि जनों का लोप हो गया | शतपथ ब्राह्मण में कुरू और पांचाल को वैदिक सभ्यता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि माना गया | छंदोंग्योपनिषद से ज्ञात होता है कि कुरु जनपद में कभी ओले नहीं पड़े न ही टिड्डीयों  के उपद्रव के कारण अकाल ही पड़ा | उत्तर वैदिक काल में काशी , कोशल , कुरु , पांचाल वैदेही आदि प्रमुख राज्य थे | विदेह के जनक , पांचाल के राजा  प्रवाहणजाबालि  , केकय के राजा अश्वपति , और काशी के राजा अजातशत्रु प्रमुख थे।

विभिन्न दिशाओं में राजा के विभिन्न नाम

पूर्व

सम्राट

पश्चिम

स्वराट्

उत्तर

विराट

दक्षिण

भोज

मध्य

राजा

 

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  • ऐतरेय ब्राह्मण में सर्वप्रथम राजा की उत्पत्ति का सिद्धांत मिलता है | *ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि समुद्रपर्यंत पृथ्वी का शासक एकराट होता है |अथर्ववेद में एकराट सर्वोच्च शासक को कहा गया है | * अथर्ववेद में परीक्षित को ‘ मृत्युलोक का देवता ‘ कहा गया है |
  • छांदोग्योपनिषद में उद्दालक आरुणि एन उनके पुत्र श्वेतकेतु के बीच ब्रह्म एवं आत्मा की अभिन्नता के विषय में संवाद है। अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है | वैदिक काल में सभा और समिति नामक दो संस्थाएं राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण रखती थी | * संभवतः सभा कुलीन या वृद्ध मनुष्यों की संस्था थी जिसमें उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति ही भाग ले सकते थे इसके विपरीत समिति सर्वसाधारण की सभा थी जिसमें जनों के सभी व्यक्ति अथवा परिवारों के प्रमुख भाग ले सकते थे| सभा का ऋग्वेद में 8 बार उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में समिति का 9 बार उल्लेख मिलता है | उत्तर वैदिक काल में सभा में महिलाओं की भागीदारी बंद कर दी गई |संहिता एवं ब्राह्मण काल तक समिति का प्रभाव कम हो गया और यह केवल परामर्शदायिनी परिषद ही रह गई।

शतपथ ब्राह्मण मे सर्वाधिक 12 रत्नियों का उल्लेख है।

पुरोहित

राजा का प्रमुख परामर्शदाता

सेनानी

सेना का प्रमुख

ग्रामीण

ग्राम का मुखिया

महिषी

राजा की पत्नी

सूत

रथ सेना का नायक

संग्रहीता

कोषाध्यक्ष

भागदुध

कर एकत्र करने वाला अधिकारी

अक्षावाप

लेखाधिकारी

पालागल

विदूषक

क्षता

प्रतिहारी या दौवारिक

 

  • शतपथ ब्राह्मण तथा काठक संहिता में गोविकर्तन ( गवाध्यक्ष ) , तक्षा (बढ़ई) , रथकार (रथ बनाने वाला) का नाम भी रत्नियों की सूची में मिलता है। * शतपथ ब्राह्मण में राजसूय यज्ञ का विस्तृत वर्णन है। * राजसूय यज्ञ में राजा का अभिशेक 17 प्रकार के जल से किया जाता था।
  • पारिवारिक जीवन ऋग्वैदिक काल के समान था। समाज पितृसत्तामक था। ऐतरेय ब्राह्मण से पता चलता है कि अजीगर्त ने अपने पुत्र शुनः शेप को 100 गाये लेकर बलि के लिए बेच दिया था। उत्तर वैदिक काल में समाज चार वर्णों में विभक्त था – ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ऐतरेय ब्राह्मण में चार वर्णों के कर्त्तव्यों का वर्णन मिलता है। श्रत्रिय या राजा भूमि का स्वामी होता था। वैश्य दूसरों को कर देते थे (अन्यस्यबलिकृत) शूद्र को तीनों वर्णों का सेवक (अन्यस्य प्रेष्यः) कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण में कन्या को चिंता का कारण माना गया है। मैत्रायणी संहिता में स्त्री को घूत और मदिरा की श्रेणी में रखा गया है। *वृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य गार्गी संवाद का उल्लेख है। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की  दशा में गिरावट आई।
  • छांदोग्योपनिषद में केवल तीन आश्रमों का उल्लेख है , जबकि सर्वप्रथम चार आश्रमों का उल्लेख जाबालोपनिषद में मिलता है। ये है – ब्रह्मचर्य (25 वर्ष ) , गृहस्थ ( 25-50 ) , वान प्रस्थ ( 50-75 वर्ष ) तथा संन्यास ( 75-100 वर्ष ) | मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानकर प्रत्येक आश्रम के लिए 25-25 वर्ष आयु निर्धारित की गई।  
  • बौधायन धर्मसूत्र के अनुसार , गायत्री मंत्र द्वारा ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार वसंत ऋतु में 8 वर्ष की अवस्था में किया जाता था | त्रिष्टुप  मंत्र द्वारा छत्रिय बालक का उपनयन संस्कार ग्रीष्म ऋतु में 11 वर्ष की अवस्था में होता था | जगती मंत्र द्वारा वैश्य बालक का उपनयन संस्कार शरद ऋतु में 12 वर्ष की अवस्था में होता था | वैदिक काल में जीविकोपार्जन हेतु वेद वेदांग पढ़ाने वाला अध्यापक ‘ उपाध्याय ‘ कहलाता था | ब्रह्मवादिनी वे कन्याएं थी  जो जीवन भर आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करती थी। जबकि साधोवधू विवाह पूर्व तक शिक्षा प्राप्त करने वाली कन्याए थी | गृहस्थ आश्रम  में मनुष्य को पांच महा यज्ञ का अनुष्ठान करना पड़ता था | यह पांच महायज्ञ है – *ब्रह्म यज्ञ – प्राचीन ऋषियों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना ।देवयज्ञ –  देवताओं का सम्मान * भूतयज्ञ   सभी प्राणियों के कल्याणर्थ  पितृ यज्ञ पितरों के तर्पण हेतु * मनुष्य यज्ञ मानव मात्र के कल्याण हेतु
  • शतपथ ब्राह्मण में कृषि की चारों क्रियाओं का उल्लेख हुआ है यह है जुताई , बुवाई , कटाई तथा मड़ाई | काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा हलों को खींचने का उल्लेख मिलता है | उत्तर वैदिक काल में उत्तर भारत में लोहे का प्रचार हुआ उत्तर वैदिक साहित्य में लोहे को ‘ कृष्ण अयस ‘ कहा गया है | तैत्तिरीय संहिता में ऋण के लिए ‘ कुसीद ‘ तथा शतपथ ब्राह्मण में उधार देने वाले के लिए ‘ कुसीदिन ‘ शब्द मिलता है।  माप की विभिन्न इकाइयां थी – निष्क , शतमान , कृष्णल , पाद आदि |  ‘ कृष्णल ‘ संभवतः बाट की मूलभूत इकाई थी | गुंजा तथा रत्तिका भी उसी के समान थे। रत्तिका को साहित्य में ‘ तुलीबाज ‘ कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण में पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रों का उल्लेख हुआ। *वाजसनेयी संहिता एवं तैत्तिरेय ब्राह्मण में विभिन्न व्यवसायों की लंबी सूची मिलती है। इनमें प्रमुख है -रथकार , स्वर्णकार , लोहार , सूत ,  कुंभकार , चर्मकार , रज्जुकार आदि | स्त्रियां रंगाई , सूईकारी  आदि में निपुण थी |   उत्तर वैदिक काल के लोगों में लाल मृदभांड अधिक प्रचलित था | उत्तर वैदिक काल में व्यापार वस्तु विनिमय पर आधारित था |
  • उत्तर वैदिक काल में धर्म और दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए| ऋग्वैदिक काल के वरुण , इंद्र आदि का स्थान प्रजापति , विष्णु  एवं रुद्र शिव ने ले लिया | यज्ञ में पशुबलि  को प्राथमिकता दी गई तथा अन्य आहुतियां गौण होने लगी। | राजसूय , अश्वमेध तथा वाजपेय जैसे विशाल यज्ञों का अनुष्ठान किया जाने लगा ! अग्निष्टोम यज्ञ पांच दिनों तक चलता था। पहली बार शतपथ ब्राह्मण में पुनर्जन्म के सिद्धांत का उल्लेख मिलता है। उपनिषदों में  ब्रह्म एवं आत्मा के संबंधों की व्याख्या की गई। पुरुषार्थ की संख्या चार है – धर्म , अर्थ , काम तथा मोक्ष | धर्म , अर्थ तथा काम को त्रिवर्ग कहा गया है। गृह्य सूत्रों में 16 प्रकार के संस्कारों का  उल्लेख है। ये हैं – गर्भाधान , पुंसवन , सीमंतोन्नयन , जातकर्म , नामकरण , निष्क्रमण , अन्नप्राशन , चूड़ाकर्म , कर्णवेध , विधारम्भ, उपनयन , वेदारम्भ , केशांत , समावर्तन  , विवाह एवं अंत्येष्टि | गृह्य सूत्र में आठ प्रकार के विवाहों का  उल्लेख है।  ये हैं-. – ब्रह्मा , दैव , आर्ष , प्रजापत्य , गंधर्व , असुर , राक्षस , पैशाच विवाह |
  • आर्य प्राचीन भारत-यूरोपीय एवं प्राचीन ईरानी भाषा बोलने वालों के लिए प्रयुक्त शब्द है। वैदिक संस्कृति मे आर्य शब्द श्रेष्ठ, शिष्ट अथवा सज्जन तथा नैतिक अर्थ में महाकुल, कुलीन सभ्य, साधू आदि के लिए प्रयुक्त हुआ है। सायणाचार्य ने अपने ऋग्भाष्य में आर्य का अर्थ विज्ञ, यज्ञ का अनुष्ठाता, विज्ञ स्रोता, विज्ञान आदरणीय अथवा सर्वत्र गंतव्य, उत्तम वर्ष, मनु, कर्मयुक्त और कर्मानुष्ठान से श्रेष्ठ आदि बताया है। अतः आर्य संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ श्रेष्ठ या कुलीन है।
  • क्लासिकीय संस्कृति में आर्य शब्द का अर्थ है – एक उत्तम व्यक्ति। वैदिक साहित्य में कही भी आर्य का एक जाति अथवा विशेष भाषा-भाषी के रुप में उल्लेख नही हुआ है।
  • भारतीय साहित्य में चार वेद हैं – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद। इनमे से ऋग्वेद सर्वाधित प्राचीन माना जाता है।
  • ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद को वेदत्रयी या त्रयी कहा जाता है।
  • वर्ण शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद में वर्ण शब्द रंग के अर्थ में तथा कहीं-कहीं व्यवसाय-चयन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आर्यों को गौर वर्ण तथा दासों को कृष्ण वर्ण का कहा गया है। ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुषयुक्त में सर्वप्रथम शूद्र शब्द मिलता है।
  • अथर्ववेद औषधियों से संबंधित है। ऋग्वेद में ईश्वर महिमा (देवताओं की स्तुति), यजुर्वेद में कर्मकांड (बलिदान विधि) एवं सामवेद में संगीत का विस्तृत उल्लेख है।
  • ऋग्वेद मे स्तोत्र एवं प्रार्थनाएँ हैं, इसमें कुल 1028 सूक्त या ऋचाएँ है। यजुर्वेद में स्तोत्र एवं कर्मकांड वर्णित हैं। सामवेद के पद गेय रुप में (संगीतमय स्तोत्र) हैं, जिनको उद्गाता पुरोहित गाता था। अथर्ववेद में कुल 20 अध्यायों एवं 731 सूक्तों में तंत्र-मंत्र एवं वशीकरण के संदर्भ में साक्ष्य हैं।
  • सही सुमेलित हैं –

ऋग्वेद    – ऐतरेय

सामवेद   – पंचवीश

अथर्ववेद   – गोपथ

यजुर्वेद    – शतपथ

  • ब्राह्मण ग्रंथ तथा यज्ञों तथा उनके अनुष्ठान के विधि-विधानों के संबंध में जानकारी देते हैं। ऐतरेय ब्रह्मण तथा कौशीतकी ब्राह्मण ऋग्वेद से, ताण्डव ब्राह्मण, पंचविश ब्राह्मण तथा जैमिनीय ब्राह्मण सामवेद से, शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद से, जबकि गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद से संबंध्द है।
  • ऋग्वेद में कुल 10 मंडल हैं। इसके नौवें मंडल के सभी 114 सूक्त सोम को समर्पित हैं।
  • यज्ञ संबंधी विधि-विधानों का पता यजुर्वेद से चलता है। यजुर्वेद के दो भाग हैं – शुक्ल यजुर्वेद तथा कृष्ण यजुर्वेद।
  • सामवेद में कुल 1810 छंद हैं, जिनमें से 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद मे भी उपलब्ध है। अतः सामवेद का संकलन ऋग्वेद पर आधारित है।
  • अहिच्छत्र, अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, मथुरा, रोपड़, श्रावस्ती, काम्पिल्य आदि स्थानों की खुदाइयों से लौह युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। अतरंजीखेड़ा से लौह धातु मल तथा धातु शोधन में प्रयुक्त होने वाली भठ्ठियाँ मिली हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि यहां लौह धातु को गलाने का कार्य स्थानीय रुप से होता था।
  • उपनिषद दर्शन पर आधारित पुस्तकें हैं। इन्हें वेदांत भी कहा जाता है।
  • वेदो में मोक्ष शब्द प्रयुक्त नही हुआ है। उपनिषदों में प्रथम बार मोक्ष की चर्चा मिलती है। यह शब्द श्वेताश्वर उपनिषद में पहली बार आया है।
  • कठोपनिषद में यम और नचिकेता का संवाद उल्लिखित है, जिसमें आचार्य यम ने नचिकेता को उपदेश दिया है – न इस आत्मा का कभी जन्म होता है और न इसकी कभी मृत्यु होती है। यह अजन्मा, नित्य तथा शाश्वत है। कठोपनिषद कृष्ण यजुर्वेद का उपनिषद है।
  • उपनिषदों में वर्णित राजाओं में – विदेह के राजा जनक, पांचाल के राजा प्रवाहणजाबालि, केकय के राजा अश्वपति और काशी के राजा अजातशत्रु प्रमुख थे।
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  • वैदिक संहिताओं का सही क्रम है – वैदिक संहिताएँ, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद।
  • सिंधु नदी का ऋग्वैदिक काल में सर्वाधिक महत्व था। इसी कारण इसका उल्लेख ऋग्वेद में सर्वाधिक हुआ है। सिंधु नदी को उसके आर्थिक महत्व के कारण हिरण्यनी कहा गया है।
  • वैदिक नदी अस्किनी की पहचान चेनाब नदी से की गई है।
  • ऋग्वेद में उल्लिखित कुंभा (काबुल), क्रमु (कुर्रम), गोमती (गोमल) एवं सुवालु (स्वात) नदियाँ अफगानिस्तान में बहती थी। इन नदियों का उल्लेख से स्पष्ट होता है कि आर्यों का अफगानिस्तान के साथ गहन संबंध था।
  • ऋग्वेद में हमें धर्म के अतिरिक्त दूसरा शब्द ऋत मिलता है। सभी देवताओं का संबंध ऋत (विश्व की नैतिक एवं भौतिक व्यवस्था) से माना गया है। ऋग्वेद में इसका वर्णन है। सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम ऋत की उत्पत्ति हुई थी। ऋत के द्वारा विश्व में सुव्यवस्था तथा प्रतिष्ठा स्थापित होती है। यह विश्व की व्यवस्था का नियामक है।
  • बृहस्पति जी को वैदिक देवताओं का पुरोहित मान जाता था।
  • वैदिक साहित्य में कई ऐसी विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने वेद मंत्रों की रचना की थी। यथा- आपाला, घोषा, विश्वावारा, लोपामुद्रा आदि। मुद्रा अगस्त्य ऋषि की पत्नी थी।
  • वैदिक काल में सोने के हार को निष्क कहा जाता था। निष्क के प्रयोग ने आगे आने वाले सिक्कों के व्यवहार के मार्ग को प्रशस्त कर दिया।
  • बौध्द जातक में तीन प्रकार के स्वर्ण सिक्कों का उल्लेख मिलता है। प्रथम क्रम में निशाका, दूसरे क्रम में सुवर्ण और तीसरे क्रम में मशाका। मशाका मूल्य की दृष्टि से सबसे निम्न और निशाका उच्च मूल्य वाली मुद्रा थी।
  • एशिया माइनर स्थित बोगजकोई से चौदहवी शताब्दी ई.पू. के अभिलेख में ऋग्वैदिक काल में देवताओं (इंद्र, वरुण, मित्र तथा नासत्य) का उल्लेख मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि वैदिक आर्य ईरान से होकर ही भारत में आए होंगे।
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  • बाल गंगाधर तिलक ने आर्यों के आदि देश के बारे में लिखा था। तिलक ने यह मत व्यक्त किया था कि आर्यों का आदि देश उत्तरी ध्रुव था। किंतु तिलक का यह मत इतिहासकारों में मान्य नही है।
  • शतपथ ब्राह्मण यजुर्वेद का ब्राह्मण है। पुरुष मेध का उल्लेख शतपथ ब्रह्मण में ही हुआ है।
  • आर्यों के पूर्व दिशा की ओर प्रसार के विषय मे शतपथ ब्रह्मण में वर्णित निदेघ माधव की आख्यायिक उल्लेखनीय है। इसके अनुसार राजा विदेघ माधव में संबंधित ऋषि गौतम रहुगण थे।
  • अंग तथा मगध को आर्य संस्कृति का धुर माना जाता है। ये लोग प्राकृत भाषा बोलते थे। और आर्य संस्कृति के प्रभाव से बाहर थे। इनके प्रति तिरस्कार पूर्ण भाव प्रकट किए गए हैं। तथा यहाँ के लोगों के ज्वर ग्रसित होने की भावना भी व्यक्त की गई है। अथर्ववेद में मगध तथा अंग दोनो को दूरस्थ प्रदेश कहा गया है।
  • गोत्र शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद मे हुआ था। गोत्र शब्द का मूल अर्थ है – गोष्ठ अथवा वह स्थान जहाँ समूचे कुल का गोधन पाला जाता था।
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  • पूर्व वैदिक आर्यों का धर्म मुख्यतः प्रकृति पूजा और यज्ञ पर आधारित था। भक्ति का उदय मौर्योत्तर काल में हुआ था, जबकि वैदिक काल में मूर्ति पूजा का प्रचलन नही था।
  • ऋग्वैदिक काल में यज्ञ की प्रधानता थी। यज्ञ हिंसात्मक और अहिंसात्मक दोनों ही होता था। देव-पूजा के साथ-साथ पितरों की पूजा भी होती थी।
  • दशराज युध्द (दस राजाओं का युध्द) परुष्णी नदी (आधुनिक रावी नदी) के तट पर लड़ा गया, जिसमें भरतों के राजा सुदास विजय हुई।
  • ऋग्वेद में सरस्वती को मातेतमा, देवीतमा एवं नदीतमा कहा गया है अर्थात् सबसे अच्छी मां, सबसे अच्छी देवी तथा सबसे अच्छी नदी।
  • ऋग्वैदिक आर्यों की पंचजनों में यद्, द्रुह्यु, पुरु, अनु, तुर्वसु शामिल थे।
  • प्रारंभ में आर्य खानाबदोश एवं शिकारी थे, प्रायः अस्थायी जीवन जीते थे और इनके जीवन में कृषि का महत्व नगण्य था। उत्तर वैदिक काल में ही आर्यों के स्थायी आवास का साक्ष्य मिलता है।
  • वैदिक काल में प्रचलित लोकप्रिय शासन प्रणाली-वंश परंपरागत राजतंत्र थी। यद्यपि जनता द्वारा चुनाव के उदाहरण भी मिलते हैं।
  • वैदिक काल में समिति नामक दो संस्थाएँ राजा की निरंकुशता पर नियंत्रण रखती थी। संभवतः सभा कुलीन या वृध्द मनुष्यों की संस्था थी, जिसमें उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति ही भाग ले सकते थे।
  • अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।
  • अथर्ववेद में सामान्य मनुष्यों के विचारों तथा अंधविश्वासों का विवरण मिलता है। इसमें विविध विषयों यथा – रोग निवारण, समन्वय, राजभक्ति, विवाह तथा प्रणय-गीतों आदि के विवरण सुरक्षित हैं।
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  • ऋग्वेद में सर्वप्रथम बहुदेववाद के दर्शन होते हैं। आर्य विभिन्न देवताओँ के अस्तित्व में विश्वास करते थे। मुख्यतः वैदिक देवताओं के तीन वर्ग हैं –
  1. द्युस्थान (आकाश) के देवता
  2. अंतरिक्ष के देवता
  3. पृथ्वी के देवता
  • ऋग्वेद में इंद्र का वर्णन सर्वाधिक प्रतापी देवता के रुप में किया जाता है, जिसे 250 सूक्त समर्पित है। यह ऋग्वैदिक काल में सर्वाधिक लोकप्रिय देवता था। इन्द्र को आर्यों का युध्द नेता तथा वर्षा, आंधी, तूफान का देवता माना जाता है।
  • 800 से 600 ईसा पूर्व का काल ब्राह्मण युग से जुड़ा है। प्रायः सातवी या छठी शताब्दी ई.पू. से लेकर तीसरी शताब्दी ई.पू. तक का समय सूत्र काल कहा जाता है।
  • गायत्री मंत्र ऋग्वेद में उल्लिखित है। इसमें रचनाकार विश्वामित्र हैं। यह साविता (सूर्य देवता) को समर्पित है। यह मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल में वर्णित है।
  • पुराणों में पांच प्रकार के विषयों का वर्णन सिध्दांततः इस प्रकार है – सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित। सर्ग बीज या आदि सृष्टि का पुराण है, प्रतिसर्ग प्रलय के बाद ही पुनर्सृष्टि को कहते हैं, वंश में देवताओं या ऋषियों के वंश वृक्षों का वर्णन है, मन्वन्तर में कल्प के महायुगें का वर्णन है और वंशानुचरित पुराणों के वे अंग हैं, जिनमें राजवंशों की तालिकाएँ दी हुई हैं और राजनीतिक अवस्थाओं, कक्षाओं तथा घटनाओं के वर्णन हैं।
  • पुराणों की संख्या 18 है। इनकी रचना लोमहर्ष ऋषि तथा उनके पुत्र उग्रश्रवा द्वारा की गई थी।
  • श्रीमद्भागवतगीता मौलिक रुप से संस्कृत भाषा में लिखी गई थी। यह प्राचीन धार्मिक ग्रंथ महाभारत का एक भाग है।
  • महाभारत के प्रारंभिक रचना काल में 8800 श्लोक थे और इसे जयसंहिता के नाम से जाना जाता था। महाभारत का दूसरा संस्करण भारत था जिसमें श्लोकों की संख्या 24000 थी। वर्तमान महाभारत में एक लाख श्लोक प्राप्त हैं। यह इसका अंतिम संस्करण है, जिसे शतसहस्त्री संहिता या महाभारत कहा गया।
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  • हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन हेतु मथानी के रुप में मंद्राचल पर्वत तथा रस्सी के रुप में सर्पो के राजा वासुकी का प्रयोग किया गया था।
  • धर्मशास्त्रों के समय में (सूत्र काल में) चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) के अतिरिक्त समाज में अन्य अनेक जातियों यथा – अम्बष्ठ, उग्र, निषाद, मागध, वैदेहक, रथकार आदि का आविर्भाव अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाहों के फलस्वरुप हो गया। पाणिनि ने दो प्रकार के शूद्रों का उल्लेख किया है – निरवसित एवं अनिरवसित। इनमें पहले प्रकार के शूद्र ही अस्पृश्य माने जाते थे।
  • सत्यमेव जयते शब्द मुंडकोपनिषद से लिया गया है, न कि मंडूकोपनिषद से, जिसका अर्थ है – सत्य की ही विजय होती है। यह भारत के राजचिन्ह पर भी अंकित है।
  • तमसो मा ज्योर्तिर्गमय कथन वृहदारण्यक उपनिषद से लिया गया है। इस कथन का अर्थ है – अंधकार से प्रकाश की ओर।
  • सत्यकाम जाबाल महर्षि गौतम के शिष्य थे, जिनकी माता का नाम जबाला था। सत्यकाम जाबाल की कथा जो अनब्याही मां होने के लांछन को चुनौती देती है, इनकी कथा छांदोग्य उपनिषद् में उल्लिखित है।
  • अवेस्ता और ऋग्वेद दोनों भाषिक समानताओं के कारण आर्यों की सभ्यता से संबंधित माना जाते हैं। अवेस्ता ईरान के क्षेत्र से संबंधित हैं।
  • वैदिक काल में गाय को अघन्या (न मारे जाने योग्य) माना गया है। गाय की हत्या अथवा उसे घायल करने वाले व्यक्ति को मृत्युदंड तथा देश निकाला की व्यवस्था वेदों में दी गई है।
  • ऋग्वैदिक काल के प्रारंभ में गाय को महत्वपूर्ण संपत्ति समझा जाता था। इस काल में गायें मुख्यतः विनिमय का माध्यम होती थी। ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में गाय को देवता के रुप में कल्पित किया गया है।
  • प्राचीन भारतीय समाज के संदर्भ में कुल, वंश तथा गोत्र परिवार से संबंधित हैं, जबकि कोश परिवार से संबंधित न होकर भंडार से संबंधित है।
  • संस्कार का शाब्दिक अर्थ है – परिष्कार, शुध्दता अथवा पवित्रता। गौतम धर्मसूत्र मे इसकी संख्या अड़तालीस मिलती है। मनु ने गर्भाधान से मृत्यु-पर्यंत तेरह संस्कारों का उल्लेख किया है। बाद की स्मृतियों में इनकी संख्या सोलह स्वीकार किया गया। आज यही सर्वप्रचलित है।
  • वैदिक काल में जीविकोपार्जन हेतु – वेद-वेदांग पढ़ाने वाला अध्यापक उपाध्याय कहलाता था, आचार्य गुरुकुल की स्थापना करके अपने शिष्यों को पढ़ाता था तथा कोई फीस नही लेता था, किंतु शिष्य के द्वारा दी गई दक्षिणा स्वीकार कर लेता था।

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बौध्द धर्म

  • गौतम बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व में हुआ था | उनके पिता शुद्धोधन शाक्यगण के प्रधान थे तथा माता माया देवी अथवा महामाया कोलिय गणराज्य ( कोलिय वंश ) गणराज्य की कन्या थी। गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इन के जन्म के कुछ दिनों बाद इनकी माता का देहांत हो गया | अतः इनका लालन-पालन इनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया था | इनका विवाह 16 वर्ष की अल्पायु में  शाक्य कुल की कन्या यशोधरा के साथ हुआ | उत्तर कालीन बौद्ध ग्रंथों में यशोधरा के अन्य नाम गोपा , बिंबा , भदकच्छना आदि मिलते हैं |इनके पुत्र का नाम राहुल था।  बुद्ध के जीवन में चार दृश्यों का अत्याधिक प्रभाव पड़ा। ये थे – वृध्द व्यक्ति, बीमार व्यक्ति, मृतक तथा प्रसन्नचित संन्यासी| सिद्धार्थ ने पत्नी और बच्चों को सोते हुए छोड़कर गृह त्याग दिया |  गृह त्याग के समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष थी | बौद्ध ग्रंथों में गृह त्याग को ‘ महाभिनिष्क्रमण ‘ की संज्ञा दी गई है | सांख्य दर्शन के आचार्य आलार कालाम  से वैशाली के समीप उनकी मुलाकात हुई | जहां से सिद्धार्थ राजगृह के समीप निवास करने वाले रूद्रक रामपुत्त नामक  एक दूसरे धर्म आचार्य के पास पहुंचे | इसके पश्चात सिद्धार्थ उरूवेला (बोधगया) पहुंचे | 6 वर्षों  की कठिन साधना के पश्चात 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात्रि को एक पीपल के वृक्ष के नीचे गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ | ज्ञान प्राप्ति के बाद वह बुद्ध कहलाए |  बुद्ध का एक अन्य नाम तथागत मिलता है जिसका अर्थ है – सत्य है ज्ञान जिसका |  शाक्य कुल में जन्म लेने के कारण उन्हें ‘ शाक्यमुनि’ भी कहा गया|
  • ज्ञान प्राप्ति के पश्चात गौतम बुद्ध ने अपने मत का प्रचार प्रारंभ किया | उरूवेला से वे सबसे पहले ऋषिपत्तन ( वर्तमान सारनाथ, वाराणसी) पहुंचे | यहां उन्होंने 5 ब्राह्मण संन्यासियों को प्रथम उपदेश दिया | *इस प्रथम उपदेश को ‘ धर्मचक्रप्रवर्तन ‘ कहा जाता है |

बुध्द के जीवन से संबंधित बौध्द धर्म के प्रतीक

घटना

प्रतीक

जन्म

कमल एवं सांड

गृह त्याग

घोड़ा

ज्ञान

पीपल (बोधि वृक्ष)

निर्वाण

पद चिन्ह

 

  • राजगृह में उन्होंने द्वितीय , तृतीय तथा चतुर्थ वर्षाकाल व्यतीत किया | मगध के राजा बिंबिसार ने उनके निवास के लिए ‘ वेलुवन ‘ नामक महाविहार बनवाया।
  • राजगृह से चलकर बुद्ध लिच्छवियों की राजधानी वैशाली पहुंचे जहां उन्होंने पांचवा वर्षाकाल व्यतीत किया | लिच्छवियों ने उनके निवास के लिए महावन में प्रसिद्ध ‘ कुटाग्रशाला ‘ का  निर्माण करवाया | वैशाली की प्रसिध्द नगर-वधू आम्रपाली उनकी शिष्या बनी तथा भिक्षु-संघ के निवास के लिए अपनी आम्रवाटिका  प्रदान कर दी |ज्ञान प्राप्ति के आठवे वर्ष गौतम बुद्ध ने वैशाली में अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर महिलाओं की संघ में प्रवेश की अनुमति दी। बुद्ध की मौसी तथा विमाता संघ में प्रवेश करने वाली प्रथम महिला थी। देवदत्त , बुद्ध का चचेरा भाई था। * यह पहले उनका अनुगत बना और फिर उनका विरोधी बन गया। वह बौद्ध संघ से बुद्ध को हटाकर स्वंय संघ का प्रधान बनना चाहता था , किंतु इसमें उसे सफलता नहीं मिली।*
  • बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार कौशल राज्य में हुआ | जहां उन्होंने 21 वास किए | कोशल राज्य के अनाथपिण्डक नामक धनी व्यापारी ने उनकी शिष्यता ग्रहण की तथा संघ के लिए ‘ जेतवन ‘ विहार प्रदान किए | भरहुत से प्राप्त एक शिल्प के ऊपर इस दान का उल्लेख है |  इसमें ‘ जेतवन अनाथपेण्डिकों देति कोटिसम्थतेनकेता ‘ लेख उत्कीर्ण है। कौशल नरेश प्रसेनजीत ने भी अपने परिवार के साथ बुद्ध की शिष्यता ग्रहण की तथा  संघ के लिए ‘ पुब्बाराम ‘  (पूर्वा राम) नामक विहार बनवाया |
  • बुद्ध ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु वैशाली में बिताई थी | अपने मत का प्रचार करते हुए वे मल्लों की राजधानी पावा पहुंचे , जहां वे चुंद नामक लुहार की आम्रवाटिका में ठहरे | उसने बुद्ध को सूकरमद्दव खाने को दिया इससे उन्हें ‘ रक्तातिसार ‘ को गया। फिर ये पावा में कुशीनारा चले गए और यही पर सुभद्द को उन्होंने अपना अंतिम उपदेश दिया। कुशीनारा ( मल्ल गणराज्य की राजधानी ) में 483 ई. पू . में 80 वर्ष की अवस्था में उन्होंने शरीर त्याग दिया | बौद्ध ग्रंथों में इसे ‘ महापरिनिर्वाण ‘ कहा जाता है। महापरिनिर्वाण सूत्र में बुद्ध की शरीर धातु के दावेदारों के नाम है – मगध नरेश अजातशत्रु , वैशाली के लिच्छवि , पावा के मल्ल , कपिलवस्तु के शाक्य , रामगाम के कोलिय , अलकप्प के बुलि , पिप्पलिवन के मोरिय , तथा वेठद्वीप के ब्राह्मण |
  • बुद्ध के प्रथम उपदेश को धर्मचक्रप्रवर्तन की संज्ञा दी जाती है | उनका यह उपदेश  दुख , दुख के कारण तथा उसके समाधान  से संबंधित था | इसे चार आर्य सत्य कहा जाता है | ये हैं
  1. दुख
  2. दुख समुदाय
  3. दुख निरोध तथा
  4. दुख निरोधगामिनी प्रतिपदा |
  • बुद्ध के अनुसार दुख का मूल कारण अविद्या के विनाश का उपाय अष्टांगिक मार्ग है | * अष्टांगिक मार्ग आठ है जो इस प्रकार हैं –
  1. सम्यक दृष्टि
  2. सम्यक संकल्प
  3. सम्यक वाक्
  4. सम्यक कर्मांत
  5. सम्यक आजीव
  6. सम्यक व्यायाम
  7. सम्यक स्मृति
  8. सम्यक समाधि |
  • बुद्ध अपने मत को ‘ मध्यमा प्रतिपदा ‘ या मध्यम मार्ग कहते हैं | बौद्ध धर्म के अनुयायी दो वर्गों में बंटे हुए थे – भिक्षु, भिक्षुणी  तथा उपासक उपासिकाएं | सामान्य मनुष्य के लिए बुद्ध ने जिस धर्म का उपदेश दिया उसे ‘ उपासक धर्म ‘ कहा गया | बौद्ध धर्म के त्रिरत्न है –
  1. बुद्ध
  2. धम्म
  3. संघ।

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बौध्द संगीतियाँ

क्रम

वर्ष

स्थान

अध्यक्ष

शासक

प्रथम

483 ई.पू.

राजगृह

महाकस्यप

अजातशत्रु

द्वीतीय

383 ई.पू.

वैशाली

सुबुकामी

कालाशोक

तृतीय

247 ई.पू.

पाटलिपुत्र

मोग्गलिपुत्त तिस्स

अशोक

चतुर्थ

102 ई.पू.

कुंडलवन (कश्मीर)

वसुमित्र अश्वघोष  (उपाध्यक्ष)

कनिष्क

 

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  • परंपरागत नियम में आस्था रखने वालों का संप्रदाय ‘ स्थविर ‘ या ‘ थेरावादी ‘ कहलाया | इनका नेतृत्व महाकच्चायन ने किया | परिवर्तन के साथ नियम को स्वीकार करने वाले को संप्रदाय ‘ महासांघिक ‘ अथवा ‘ सर्वास्तिवादी ‘ कहलाया | इनका नेतृत्व महाकस्सप ने किया | चतुर्थ बौद्ध संगीति में महासांघिकों का बोलबाला था | चतुर्थ बौद्ध संगीति के समय में बौद्धों ने भाषा के रूप में संस्कृत को अपनाया। इस संगीति के समय बौद्ध धर्म स्पष्ट रूप से हीनयान और महायान नाम दो संप्रदायों में विभाजित हो गया।
  • वैभाषिक मत की उत्पत्ति मुख्य रूप से कश्मीर में हुई | वैभाषिक मत के प्रमुख आचार्य है – धर्मत्रात , घोषक , बुद्धदेव , कसुमित्र आदि | सौत्रान्तिक संप्रदाय सुत्तपिटक पर आधारित है। शून्यवाद ( माध्यमिक ) के प्रवर्तक नागार्जुन है , जिसकी प्रसिद्ध रचना माध्यमिककारिका है।* नागार्जुन के अतिरिक्त इस मत के अन्य विद्वान थे – चन्द्रकीर्ति , शान्तिदेव , शन्तिरक्षित , आर्यदेव आदि | नागार्जुन की तुलना ‘ मार्टिन लूथर ‘ से की जाती है। ह्वेनसांग ने उसे ‘ संसार की चार मार्गदर्शक शक्तियों में से एक ‘ कहा है। उसे ‘ भारत का आइंस्टीन ‘ भी कहा जाता है। चीनी मान्यता के अनुसार , नागार्जुन ने चीन की यात्रा कर वहां बौद्ध शिक्षा प्रदान की थी |
  • विज्ञानवाद अथवा योगाचार संप्रदाय की स्थापना मैत्रेय अथवा मैत्रेयनाथ ने किया था। असंग तथा वसुबंधु ने इसका विकास किया | वज्रयान का सर्वाधिक विकास आठवी शताब्दी में हुआ। इसके सिद्धांत मंजुश्रीमूलकल्प तथा गुह्समाज नामक ग्रंथों में मिलते है। इसने भारत में बौद्ध धर्म के पतन का मार्ग प्रशस्त किया। बौद्ध दर्शन में क्षणिकवाद को स्वीकार किया गया। बुध्द ने स्वयं अनित्यवाद के सिध्दांत का प्रतिपादन किया था।
  • मैत्रेय को बौद्ध परंपरा में ‘ भावी बुद्ध ‘ कहा गया है। अवलोकितेश्वर प्रधान बोधिसत्व है इन्हें ‘ पद्मपाणि ‘(हाथ में कमल लिए हुए) भी कहते है। इनका प्रधान गुण दया है। मंजुश्री के एक हाथ में खड्ग तथा दूसरे हाथ में पुस्तक रहती है। इसका कार्य बुद्धि को प्रखर करना है।
  • बौद्ध साहित्य को ‘ त्रिपिटक ‘ कहा जाता है। यह पाली भाषा में रचित है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में बाटा गया। इन्ही को त्रिपिटक कहते हैं। यह है –
  1. विनयपिटक
  2. सुत्तपिटक
  3. अभिधम्मपिटक
  • विनयपिटक में संघ संबंधी नियम , तथा दैनिक जीवन संबंधी आचार-विचारों, विधि-निषेधो आदि का संग्रह है। सुत्तपिटिक में बौद्ध धर्म के सिद्धांत तथा उपदेशों का संग्रह है। अभिधम्मपिटक में बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों का संग्रह मिलता है। अठ्ठ कथाएँ त्रिपिटकों के भाष्य के रुप में लिखी गई हैं। सुत्तपिटक की अठ्ठ कथा महा अठ्ठक तथा विनयपिटक की अठ्ठ कथा कुरुन्दी है। अभिधम्मपिटक की अठ्ठ तथा मूल रुप से सिंहली भाषा में पच्चरी है। बौध्दों का वह धर्म ग्रंथ, जिसमें गौतम बुध्द के पूर्ववर्ती जन्म की कथाएं संकलित हैं, जातक कहलाता है। यह पालि भाषा में है।

बौध्द ग्रंथ एवं उनके रचनाकार

ग्रंथ

रचनाकार

मिलिन्दपण्हों

नागसेन

बुध्दचरित, सौन्दरानन्द, शारिपुत्र प्रकरण

अश्वघोष

माध्यमिकाकरिका

नागार्जुन

विशुध्दिमग्ग

बुध्दघोष

अभिधम्म कोश

वसुबन्धु

  • बुद्ध की ‘ भूमिस्पर्श मुद्रा ‘ से तात्पर्य अपने तप की शुचिता और निरंतरता बनाए रखने से है। भूमिस्पर्श मुद्रा की सारनाथ की बुद्ध मूर्ति गुप्तकाल से संबंधित है।
  • प्राचीन काल में बौद्ध शिक्षा के तीन प्रमुख केंद्र थे –
  1. नालंदा
  2. वल्लभी
  3. विक्रमशिला
  • नालंदा महायान बौद्ध धर्म की तथा वल्लभी हीनयान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। विक्रमशिला महाविहार की स्थापना पाल नरेश धर्मपाल ने की थी। उसने यहां मंदिर तथा मठ भी बनवाएं थे। पांचवी शताब्दी के मध्य , गुप्तों के समय में नालंदा विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया। सर्वप्रथम कुमारगुप्त – I ने नालंदा बौद्ध विहार को दान दिया। और बाद में बुधगुप्त , तथागतगुप्त , बालादित्य नामक गुप्त शासकों ने भी इस विहार को दान दिए। नवनालंदा महाविहार बौद्ध अध्ययन का आधुनिक केंद्र है। जिसे बिहार सरकार ने वर्ष 1951 में नालंदा में स्थापित किया था।
  • चैत्य का शाब्दिक अर्थ है – चिता संबंधी। शवदाह के पश्चात बचे हुए अवशेषों को भूमि में गाड़कर उनके ऊपर जो समाधियाँ बनाई गई, उन्हीं को प्रारंभ में चैत्य या स्तूप कहा गया। इन समाधियों में महापुरुषों के धातु अवशेष सुरक्षित थे, अतः चैत्य उपासना के केन्द्र बन गए। चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के रहने के लिए आवास बनाए गए, जिन्हें विहार कहा गया।
  • सर्वप्रथम स्तूप शब्द का वर्णन ऋग्वेद में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अर्थववेद, वाजसनयी संहिता, तैतिरीय ब्राह्मण संहिता, पंचविश ब्राह्मण आदि ग्रंथों से स्तूप के संबंध में जानकारी मिलती है।* स्तूप का शाब्दिक अर्थ है – ‘  किसी वस्तु का ढेर ‘ | स्तूप का विकास ही संभवतः मिट्टी के ऐसे चबूतरे से हुआ, जिसका निर्माण मृतक की चिता के ऊपर अथवा मृतक की चुनी हुई अस्थियों में रखने के लिए किया जाता था | * कालांतर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ पद्धति मे अपना लिया | *   इन स्तूपो में बुद्ध तथा उनके प्रमुख शिष्यों  की धातु रखी जाती थी अतः वह बौद्धों की श्रद्धा व उपासना के प्रमुख केंद्र बन गए | * स्तूप के चार भेद हैं –
  1. शारीरिक स्तूप
  2. पारिभौगिक स्तूप
  3. उद्देशिका स्तूप
  4. पूजार्थक स्तूप
  • गौतम बुद्ध को ‘ एशिया के ज्योति पुंज ‘ के तौर पर जाना जाता है। गौतम बुद्ध के जीवन पर एडविन अर्नोल्ड ने ‘ Light of Aisa ‘ नामक काव्य पुस्तक की रचना की थी।
  • महापरिनिर्वाण मंदिर ‘ उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। मंदिर में स्थापित भगवान बुद्ध की मूर्ति 1876 ई. में उत्खनन के द्वारा प्राप्त की गई थी। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की 10 मी लंबी ऊची मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में रखी है। यह मूर्ति उस काल को दर्शाती है जब 80 वर्ष की आयु में भगवान बुद्ध ने अपने पार्थिव शरीर को छोड़ दिया  और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गए अर्थात् निर्वाण की प्राप्ति हो गई।

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हीनयान और महायान में अंतर

हीनयान

महायान

हीनयान का शाब्दिक अर्थ है – निम्न मार्ग

महायान का शाब्दिक अर्थ है – उत्कृष्ट मार्ग।

इसमें महात्मा बुध्द को एक महापुरुष माना जाता था।

इसमें उन्हें देवता माना जाता था।

यह व्यक्तिवादी धर्म है। इसके अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नों से ही मोक्ष प्राप्त करना चाहिए।

इसमें परोपकार एवं परसेवा पर बल दिया गया। इसका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण है।

यह मूर्तिपूजा एवं भक्ति में विश्वास नही करता है।

यह आत्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास करता है।

इसकी साधन पध्दति अत्यंत कठोर है तथा यह भिक्षु  जीवन का समर्थक है।

इनके सिध्दांक सरल एवं सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं। इसमें भिक्षु के साथ-साथ सामान्य उपासकों को भी महत्व दिया गया है।

इसका आदर्श अर्हत् पद को प्राप्त करना है।

इसका आदर्श बोधिसत्व है।

इसके प्रमुख संप्रदाय है – वैभाषिक तथा सौत्रान्तिका।

इसके प्रमुख संप्रदाय हैं – शून्यवाद (माध्यमिक)तथा विज्ञानवाद (योगाचार)।

 

  • गौतम बुध्द का जन्म कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी में 563 ई.पू. में हुआ था। उनके पिता शुध्दोधन शाक्यगण के प्रधान थे तथा माता माया देवी कोलिय गणराज्य (कोलिय वंश) की कन्या थी। 29 वर्ष की अवस्था में उन्होंने गृह त्याग दिया, जिसे बौध्द ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण की संज्ञा दी गई।
  • गौतम के बचपन का नाम सिध्दार्थ था। इन्हें शाक्यमुनि, तथागत आदि नामों से जाना जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य को प्रच्छन्न बौध्द या छिपा हुआ बुध्दमार्गी कहा जाता था। अतः पार्त, प्रछन्न, मिहिर, गुडाकेश भगवान बुध्द के अन्य नाम नही हैं।
  • मौर्य वंशीय शासक अशोक के रुम्मिनदेई अभिलेख से सूचना मिलती है कि शाक्यमुनि बुध्द का जन्म लुंबिनी में हुआ था। इस अभिलेख के अनुसार, अशोक राज्यभिषेक के 20 वर्ष बाद यहां आया था और उसने उस स्थान की पूजा की थी। जहां शाक्यमुनि बुध्द का जन्म हुआ था। साथ ही इस अभिलेख मे लुंबिनी के बुध्द का जन्म स्थल होने का कारण इसे कर छूट प्रदान करने की घोषणा का भी उल्लेख है।
  • बौध्द धर्म का प्रचार करते हुए महात्मा बुध्द मल्लों की राजधानी पावा पहुंचे, जहां से चुंद नामक लुहार की आम्रवाटिका मे ठहरे। उसने बुध्द को सूकरमद्दव खाने को दिया, इससे उन्हें रक्तातिसार हो गया और भयानक पीड़ा उत्पन्न हुई। इस वेदना के बाद भी वे कुशीनारा (मल्ल गणराज्य की राजधानी) पहुचे। यहीं 483 ई.पू. में 80 वर्ष की अवस्था में उन्होंने शरीर त्याग दिया। बौध्द ग्रंथों में इसे महापरिनिर्वाण कहा जाता था।
  • महापरिनिर्वाण मंदिर उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में स्थित है। मंदिर में स्थापित भगवान बुध्द की मूर्ति 1876 ई. में उत्खनन के द्वारा प्राप्त की गई थी। महापरिनिर्वाण मंदिर विश्व में बौध्द धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक माना जाता है।
  • अपने जीवन के अंतिम वर्ष गौतम बुध्द अपने शिष्य चुंद के यहां पावा पहुंचे। यहां सूकरमाद्दव भोज्य सामग्री खाने से ये अतिसार रोग से पीड़ित हो गए। फिर ये पावा से कुशीनगर चले गए और यही पर सुभद्द को उन्होंने अपना अंतिम उपदेश दिया।
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  • महापरिनिब्बान सूक्त से उनके जीवन के विविध आयामों एवं काल का निर्धारण किया जाता है जिसके अनुसार बुध्द ने अपने जीवन की अंतिम वर्षा ऋतु में बिताई थी।
  • महाभिनिष्क्रमण के बाद ज्ञान की खोज में महात्मा बुध्द, आलार कालाम के आश्रम में पहुंचे तथा उनसे दीक्षा ली। कालाम के आश्रम में उन्होंने तपस्या की किंतु इससे बुध्द संतुष्ट नही हुए। आलार कलाम सांख्य दर्शन के आचार्य थे तथा अपनी साधना शक्ति के लिए विख्यात थे।
  • बुध्द के सबसे अधिक शिष्य कोसल राज्य में हुए थे तथा यहां की राजधानी श्रावस्ती में ही उन्होने सर्वाधिक उपदेश दिए थे।
  • महात्मा बुध्द वत्सराज उदयन के शासनकाल में कौशांबी आए थे। वहां उन्होंने नवां विश्राम किया। उद्यन ने पिंडोला भारद्वाज के प्रभाव से बौध्द बनने के बाद घोषितराम विहार भिक्षु संघ को दान किया।
  • प्रथम बौध्द संगीति (प्रथम बौध्द परिषद) बुध्द की मृत्यु तत्काल बाद राजगृह की सप्तपर्णि गुफा में हुई। इस समय मगध का शासक अजातशत्रु था। इस संगीति के अध्यक्षता महाकस्सप ने की तथा इसमें बुध्द प्रमुख शिष्य आनंद और उपालि भी उपस्थित थे। इसमें बुध्द की शिक्षाओँ का संकलन हुआ तथा उन्हें सुत्त विनय नामक दो पिटकों में विभाजित किया गया। आनंद तथा उपालि क्रमशः धर्म और विनय के प्रमाण माने गए।
  • राजगीर (राजगृह) बिहार के नालंदा जिले में स्थित एक शहर है। राजगीर की वैभरा पहाड़ियों पर सप्तपर्णी गुफा स्थित है।
  • भारतीय कला में बुध्द के जीवन के प्रथम उपदेश का चित्रण मृग सहित चक्र द्वारा हुआ है। बुध्द ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में मृगदाव (हरिण वन) में दिया था।
  • करमापा लामा तिब्बत के बौध्द संप्रदाय कंग्यूपा वर्ग से संबधित है।
  • बोधगया में 6 वर्ष की साधना के पश्चात 35 वर्ष की आयु में महात्मा बुध्द को वैशाख पूर्णिमा की रात को एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ।
  • महाबोधि मंदिर स्थित वर्तमान बोधि वृक्ष वही नही है, जिसके नीचे बैठकर महात्मा बुध्द ने ज्ञान प्राप्त किया था। ह्वेनसांग के अनुसार, उस मूल वृक्ष को सातवीं शताब्दी में सम्राट शशांक ने नष्ट करा दिया था। इसके बाद इस स्थान पर 2 और वृक्ष रोपित हुए और नष्ट हुए। वर्तमान वृक्ष जिसे हम देख रहे हैं वह चौथी पीढ़ी का वृक्ष है, जिसे अलेक्जेंडर कनिंघम ने लगवाया था। यह वृक्ष पूरी तरह संरक्षित है और केवल इससे गिरी हुई पत्तियों की ही छूने एवं उठाने का अधिकार है।
  • पवित्र बौध्द स्थल बोधगया जहाँ गौतम बुध्द को सर्वप्रथम ज्ञान प्राप्त हुआ था, निरंजना नदी पर स्थित है। आधुनिक नदी को ही पूर्व में निरंजना के नाम से जाना जाता था। यह नदी दो छोटी धाराओं निरंजना एवं मोहना के मिलने के बाद बनती है।
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  • महात्मा बुध्द के उपदेश आचरण की पवित्रता एवं शुध्दता से संबंधित थे। बुध्द के उपदेशों में आत्मा संबंधी विवाद नही हैं। धार्मिक कर्मकांडों की बुध्द ने आलोचना की है।
  • देवदत्त, बुध्द का चचेरा भाई था। यह पहले उनका अनुगत बना और फिर उनका विरोधी बन गया। वह बौध्द संघ से बुध्द को हटाकर स्वयं संघ का प्रधान बनना चाहता था, किंतु उसे इसमें सफलता नही मिली। वस्तुतः देवदत्त उसी दिन संघ का प्रधान बनने की सोचने लगा था, जब वह पहले-पहले भिक्षु बना था।
  • अपने प्रिय शिष्य आनंद के कहने पर बुध्द ने वैशाली में स्त्रियों को बौध्द संघ में  भिक्षुणी  के रुप में प्रवेश की अनुमति प्रदान की थी। बौध्द संघ में सर्वप्रथम शामिल होने वाली स्त्री महाप्रजापति गौतमी थी।
  • त्रिपिटक बौध्द ग्रंथों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। बुध्द की मृत्यु के बाद उनकी शिक्षाओं को संकलित कर तीन भागों में बांटा गया, उन्हीं को त्रिपिटक कहते हैं। ये हैं – विनय पिटक (संघ संबंधी नियम तथा आचार की शिक्षाएँ) सुत्त पिटक (धार्मिक सिध्दांत) तथा अभिधम्म पिटक (दार्शनिक सिध्दांत)।
  • सुत्त पिटक में महात्मा बुध्द के नैतिक एवं सिध्दांत संबंधित प्रवचन संकलित हैं। अर्थात् इसमें बौध्द धर्म के सिध्दांत एवं उपदेश संग्रह हैं, जबकि विनय पिटक में संघ संबंधी नियम तथा दैनिक जीवन संबंधी आचार-विचारों, विधि निषेधों आदि का संग्रह है। जातकों में बुध्द के पूर्व जन्मों की कहानियाँ संग्रहीत हैं.
  • वर्षा ऋतु के समय चार महीने बौध्द भिक्षु बौध्द महाविहारों में निवास करते थे। इस समय धर्म प्रचार का कार्य स्थगित रहता था। वर्षा ऋतु की समाप्ति पर जब पुनः धर्म प्रचार कार्य प्रारंभ होता था, तो बौध्द भिक्षु पवरन नामक समारोह का आयोजन करते थे जिसमे पीछे किए गए कार्यों पर विचार करते हुए आगे की कार्ययोजना बनाई जाती थी। इसके अतिरिक्त भिक्षु इस समारोह में अपने द्वारा किए गए अपराधों को स्वीकार करते थे।
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  • प्रसिध्द बौध्द ग्रंथ महावंश के अनुसार, मौर्य शासक अशोक ने पाटलिपुत्र में अशोकाराम विहार को निर्मित करवाया था। इस विहार का निरीक्षण इद्रगुप्त नामस थेर भिक्षु के निरीक्षण मे हुआ था। तीसरी बौध्द संगीति (सभ) भी अशोक के समय में हुई थी।
  • बिहार में राजगीर की पहाड़ियों (400मी. की ऊंचाई) पर स्थित शांति स्तूप विश्व का सबसे ऊंचा कहा जाने वाला विश्व शांति स्तूप है। वैशाली स्थित शांति स्तूप की ऊंचाई 38 मी. (125 फीट) एवं चौड़ाई 36 मी. (118 फीट) तथा  गुंबद का व्यास 20 मी. (65 फीट) है।
  • बुध्द की 80 फुट ऊंची बोधगया में स्थित प्रतिमा लाल गेनाइट एवं बलुई पत्थर से निर्मित है, जिसके निर्माण में 7 वर्ष का समय लग। यह प्रतिमा जापान के दाईजोकियों संप्रदाय के सहयोग द्वारा निर्मित की गई थी।
  • सर्वप्रथम स्तूप शब्द का वर्णन ऋग्वेद में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अथर्ववेद, वाजसनयी संहिता, तैतिरीय ब्राह्मण संहिता, पंचविश ब्राह्मण आदि ग्रंथों से स्तूप के संबंध में जानकारी मिलती है। स्तूप का शाब्दिक अर्थ है – किस वस्तु का ढेर।
  • बोधगया का स्तूप स्थल बुध्द की ज्ञान प्राप्ति से, सारनाथ धर्मचक्रप्रवर्तन से तथा कुशीनगर या कुशीनारा बुध्द की मृत्यु से संबंधित हैं, जबकि सांची बुध्द के जीवन की किसी विशेष घटना से संबंधित नही है।
  • भरहुत एवं सांची के स्तूप की स्थापना मौर्य शासक अशोक के शासन-काल में हुई थी। कुछ ऐतिहासिक स्रोत धमेख स्तूप का निर्माण काल भी अशोक के शासनकाल को ही मानते हैं। अमरावती स्तूप का निर्माण सातवाहन के समय मे हुआ था। भरहुत, सांची एवं धमेख स्तूप के निर्माण क्रम निर्धारित करना संभव नही है।
  • बौध्द दर्शन में क्षणिकवाद को स्वीकार किया गया है। बुध्द ने स्वयं अनित्यवाद के सिध्दांत का प्रतिपादन किया था। क्षणिकवाद अनित्यतावाद का तार्किक विकास है, जो बुध्दोत्तर दर्शन में अस्तित्व में आया। क्षणिकवाद के अनुसार विश्व की प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व क्षणमात्र के लिए ही रहता है।
  • गौतम बुध्द को एशिया के ज्योति पुंज के तौर पर जाना जाता है। गौतम बुध्द के जीवन पर एडविन अर्नाल्ड ने Light of Asia नामक काव्य पुस्तक की रचना की थी।
  • सर एडविन एर्नाल्ड की पुस्तक द लाइट ऑफ दी एशिया ललितविस्तार के विषय-वस्तु पर आधारित है। इस पुस्तक का प्रकाशन 1879 ई. में लंदन मे किया गया।
  • भारत में सबसे पहले बुध्द की प्रतिमाओं की पूजा की गई। बौध्द धर्म के महायान शाखा के अनुयायियों ने सर्वप्रथम बुध्द मूर्तियाँ स्थापित करके उनकी पूजा प्रारंभ की।
  • सर्वप्रथम मूर्ति पूजा की नींव बौध्दों के द्वारा रखी गई। महायानियों ने सर्वप्रथम बुध्द की प्रतिमा स्थापित करके पूजा आरंभ की।
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  • गांधार कला की उत्पत्ति का स्रोत एशिया माइनर तथा हैलेनिस्टिक कला थी। इस शैली की कला का प्रमुख विषय महात्मा बुध्द का जीवन चरित है। इसके अंतर्गत बुध्द की धर्मचक्र मुद्रा, ध्यान मुद्रा, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा आद मूर्तियों का निर्माम किया गया है।
  • कुषाण काल में ही गांधार एवं मथुरा कला शैली के तहत बुध्द एवं बोधिसत्वों के बहुसंख्यक मूर्तियों का (बैठी एवं खड़ी स्थित में) निर्माण हुआ। वी.एस. अग्रवाल के मतानुसार, सर्वपर्थम मथुरा में ही बुध्द मूर्तियों का निर्माण किया गया, जहां इनके लिए पर्याप्त आधार था।
  • बुध्द की भूमिस्पर्श मुद्रा से तात्पर्य अपने तक की शुचिता और निरंतरता को बनाए रखने से है। बुध्द की भूमिस्पर्श मुद्रा मार (कामदेव) के प्रलोभनों के बावजूद अपनी शुचिता और शुध्दता का साक्षी होने के लिए बुध्द का धरती का आह्वान को प्रदर्शित करती है।
  • बौध्द ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में वर्णित षोडश महाजनपदों मे से मल्ल एक महाजनपद था, यह एक संघ राज्य था, जिसमें पावा (पडरौना) तथा कुशीनारा (कसया) के मल्लों के शाखाएँ सम्मिलित थी। महात्मा बुध्द को महापरिनिर्वाण कुशीनगर में प्राप्त हुआ।
  • सैंधव पुरास्थल लोथल (गुजरात) में गोदीबाड़ा के अवशेष मिले हैं। सारनाथ (वाराणसी) मे महात्मा बुध्द ने अपना प्रथम उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया था। नालंदा बौध्द अधिगम का महान पीठ था, यहां कुमारगुप्त प्रथम के शासकनकाल में विश्वविद्यालय की स्थापना हुई । अशोक का सिंह स्तंभ शीर्ष राजगीर में नही बल्कि सारनाथ में स्थित है।
  • बौध्द दर्शन में यह माना गया है कि बोधिसत्वों मे अवलोकितेश्वर की स्थिति महिमामंडित है। उन लोगों ने यह निश्चय किया था कि वे तब तक बुध्द नही बनेंगे जब तक कि सभी मनुष्यों को निर्वाण नही प्राप्त हो जाता। वस्तुतः बौध्द धर्म हिंदू धर्म का प्रभाव परिलक्षित होता है। बोधिसत्व अवलोकितेश्वर या पदमाणि वैदिकयुगीन देवता विष्णु हैं. सप्त तथा गत हिंदू धर्म के सप्तर्षि हैं।
  • हीनयान अवस्था का विशालतम एवं सर्वाधिक विकसित शैलकृत चैत्यगृह कार्ले मे स्थित है। यह पुणे (महाराष्ट्र) के मावल तालुका मे स्थित है।
  • सलसेती द्वीप में स्थित कन्हेंरी गुफाएँ महाराष्ट्र में मुंबई शहर का एक प्रमुख पर्यटन स्थल हैं। यह गुफाएँ संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान परिसर में स्थित है। प्राचीन अभिलेखों मे कान्हाशैल, कृष्णागिरी, कान्हगिरी के नाम से उल्लिखित कन्हेरी बौध्दो का प्रमुख केन्द्र था। कन्हेरी मे एक ही पहाड़ी मे सर्वाधिक संख्या (90) मे गुफाओं का निर्माण हुआ है। कन्हेरी की गुफाओं का निर्माण तीसरी शताब्दी ई.पू. के मध्य में किया गया था और ये 11वीं शताब्दी ईस्वी तक इस्तेमाल मे रही. गुफा संख्या 41 में अवलोकितेश्वर की एक रोचक मूर्ति स्थित है, जिसकी चार भुजाएं और ग्यारह मुख हैं। यह अपनी किस्म की भारत में स्थित एकमात्र मूर्ति है। इस रुप की उपासना चीन, चीनी तुर्किस्तान,कंबोडिया तथा जापान् में 7वीं-8वीं सदी में लोकप्रिय थी।

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  • नागार्जुन कनिष्क के दरबार की एक महान विभूति था। उसने अपनी पुस्तक माध्यमिक कारिका में सापेक्षता सिध्दांत को प्रस्तुत किया। चीनी मान्यता के अनुसार, नागार्जुन ने चीन की यात्रा कर वहां बौध्द शिक्षा प्रदान की थी।
  • प्राचीन काल में बौध्द शिक्षा के तीन प्रमुख केन्द्र थे
  1. नालंदा
  2. वल्लभी
  3. विक्रमशिला

नालंदा बिहार में आधुनिक पटना में दक्षिण मे लगभग 40 मील की दूरी पर आधुनिक बडगांव नामक ग्राम के समीप स्थित था। यह  महायान बौध्द धर्म की शिक्षा  का प्रमुख केन्द्र था। वल्लभी गुजरात के कठियावाड़ क्षेत्र में आधुनिक वल नामक स्थान पर स्थित पश्चिम भारत मे शिक्षा एवं संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था।  यह हीनयान बौध्द धर्म की शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। विक्रमशिला बिहार में आधुनिक भागलपुर से 24 मील पूर्व की ओर पथरघाट नामक पहाड़ी पर स्थित था। विक्रमशिला के महाविहार की स्थापना पाल नरेश धर्मपाल (775-800 ई.) ने की थी। उसने यहां मंदिर तथा मठ भी बनवाएँ थे।

  • ह्वेनसांग के अनुसार, नालंदा विश्वविद्यालय का संस्थापक शक्रादित्य था। जिसने बौध्द धर्म के त्रिरत्नों की प्रति महती श्रध्दा के कारण इसकी स्थापना करवाई थी। शक्रादित्य की पहचान कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ई.) से की जाती है। जिसकी प्रसिध्द उपाधि महेन्द्रादित्य थी।
  • नालंदा विश्वविद्यालय बौध्द दर्शन के अध्ययन के लिए विश्वप्रसिध्द था। उसी के अध्ययन के लिए चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था।
  • नव नालंदा महाविहार बौध्द अध्ययन का आधुनिक केन्द्र है, जिसे बिहार सरकार ने 1951 में नालंदा में स्थापित किया था। इस केन्द्र मे बौध्द एवं पाली अनुसंधान संस्थान हैं। यहां बड़ी संख्या में श्रीलंका, जापान, कोरिया, तिब्बत, भूटान आदि देशों से पाली एवं बौध्द अध्ययन पर अनुसंधान हेतु विद्यार्थी आते हैं।
  • तप (आत्मदमन) और भोग की अति का परिहार एवं मध्यम मार्ग का अनुसरण केवल बौध्द धर्म मे किया गया था, जैन धर्म में नही। जबकि वेदों की प्रामाण्यता के प्रति अनास्था, कर्मकांडों की फलवत्ता का निषेध एवं प्राणियों की हिंसा का निषेध दोनों धर्मों मे किया गया है।
  • संबोधि मे गौतम बुध्द को प्रतीत्यसमुत्पाद के सिध्दांत का बोध हुआ था। इस कार्य-कारण सिध्दांत को उन्होंने संपूर्ण जगत पर लागू किया। सर्वप्रथम उन्होने जिन चार आर्यसत्यों का उपदेश दिया, वे इस प्रकार हैं –

दुःख  – संसार में सर्वत्र दुःख है। जीवन दुःखों एवं कष्टों से पूर्ण है।

दुःख समुदाय – प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई कारण अवश्य  होता है।

अतः दुःख  का  भी कारण है।

दुःख निरोध – दुःख का अंत संभव है।

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दुःख निरोधगामिनी  प्रतिपदा – दुःख के मूल अविद्या के विनाश का उपाय अष्टांगिक मार्ग है।

  • बुध्द तथा महावीर दोनों ही छठी शताब्दी ई.पू. की धार्मिक क्रांति के अग्रदूत थे। इन दोनों ने वैदिक कर्मकांडों तथा वेदों की अपौरुषेयता का समान रुप से विरोध किया। अहिंसा तथा सदाचार पर दोनों ने बल दिया तथा दोनों ही कर्मवाद, पुनर्जन्म तथा मोक्ष मे विश्वास रखते थे।
  • बौध्द धर्म मे वर्णव्यवस्था को स्वीकार तो किया गया लेकिन उसने ब्राह्मण वर्ण की सर्वोच्च सामाजिक स्थिति को स्वीकार नही किया। बौध्द धर्म में कुछ शिल्पों को निम्न माना गया है।
  • बौध्द धर्म की सादगी, दलितों के लिए विशेष अपील, मिशनरी भावना तथा स्थानीय भाषा का प्रयोग बौध्द धर्म को विस्तार के प्रमुख कारणों में सम्मिलित थे, जबकि दार्शनिकों द्वारा वैदिक भावना की सुदृढ़ता इसमे शामिल नही थी।
  • आरंभिक मध्ययुगीन समय में भारत में बौध्द धर्म का पतन इसलिए हुआ कि उस समय बुध्द, विष्णु के अवतार समझे जाने लगे और वैष्णव धर्म का हिस्सा बन गए।
  • चैत्य का शाब्दिक अर्थ है – चिंता संबंधी। शवदाह के पश्चात बचे हुए अवशोषों को भूमि में गाड़कर उनके ऊपर जो समाधियाँ बनाई गई, उन्हीं को प्रारंभ मे चैत्य या स्तूप कहा गया। इन समाधियों मे महापुरुषों के धातु अवशेष सुरक्षित थे, अतः चैत्य उपासना के केन्द्र बन गए। कालांतर में बौध्दों ने इन्हें अपनी उपासना का केन्द्र बना लिया। चैत्यगृहों के समीप ही भिक्षुओं के रहने के लिए आवास बनाए गए जिन्हें विहार कहा गया।
  • मध्यकाल में बौध्दों की वज्रयान शाखा सबसे अधिक प्रभावशाली थी। वज्रयान का सबसे अधिक विकास आठवीं शताब्दी मे हुआ था तथा इसके सिध्दांत मंजुश्रीमूलकल्प तथा गुह्यसमाज नामक ग्रंथों में मिलते हैं।

 

जैन धर्म

  • जैन शब्द संस्कृत के जिन शब्द से बना है जिसका अर्थ विजेता है। जैन संस्थापकों को तीर्थंकर जबकि जैन महात्माओं को निर्ग्रंथ कहा गया। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर माने जाते हैं, जिन्होंने सयम-समय पर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। यह हैं –
  1. ऋषभदेव
  2. अजितनाथ
  3. संभवनाथ
  4. अभिनंदन
  5. सुमतिनाथ
  6. पद्मप्रभु
  7. सुपार्श्वनाथ
  8. चंद्रप्रभु
  9. पुष्पदंत ( सुविधिनाथ )
  10. शीतलनाथ
  11. श्रेयांसनाथ
  12. वासुपूज्य
  13. विमलनाथ
  14. अनंतनाग
  15. धर्मनाथ
  16. शांतिनाथ
  17. कुंथुनाथ
  18. अरनाथ
  19. मल्लिनाथ
  20. मुनिसुव्रत
  21. नमिनाथ
  22. नेमिनाथ या अरिष्टनेमि
  23. पार्श्वनाथ
  24. महावीर स्वामी |
  • जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे। इनके अन्य नाम ऋषभनाथ , आदिनाथ , वृषभनाथ भी है। ऋषभदेव एवं अरिष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23 वे तीर्थंकर माने जाते है। इनका जन्म काशी ( वाराणसी ) में हुआ था। इनके पिता अश्वसेन कासी के राजा थे। पार्श्वनाथ को सम्मेद पर्वत पर ज्ञान प्राप्त हुआ था। पार्श्वनाथ ने अपने अनुयायियों को चातुर्याम शिक्षा का पालन करने को कहा था।

 

 

ये चार शिक्षाएं थी –

  1. सत्य
  2. अहिंसा
  3. अस्तेय
  4. अपरिग्रह
  • महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में लगभग 599 ई पू में हुआ था। * इनके पिता सिद्धार्थ ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ के प्रधान थे | इनकी माता त्रिशला अथवा विदेहदत्ता वैशाली के लिच्छवि गणराज्य के प्रमुख चेटक की बहन थी | महावीर स्वामी के बचपन का नाम वर्द्धमान था। इनकी पत्नी का नाम यशोदा (कुंडिन्य गोत्र की कन्या) था। इससे उन्हें अजोज्या ( प्रियदर्शना ) नामक पुत्री उत्पन्न हुई | इसका विवाह जामालि के साथ हुआ था।
  • जैन धर्म में पूर्ण ज्ञान के लिए ‘ कैवल्य ‘ शब्द का प्रयोग किया गया है | महावीर स्वामी को 12 वर्षों की कठोर तपस्या तथा साधना के पश्चात ‘ जृम्भिक ग्राम ‘  के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे कैवल्य ( पूर्ण ज्ञान ) प्राप्त हुआ था | ज्ञान प्राप्ति के पश्चात वे केवलिन , अर्हत् (  योग्य  ) , जिन ( विजेता )  तथा निर्ग्रंथ (  बंधन रहित) कहलाए |  कैवल्य प्राप्ति के पश्चात महावीर स्वामी ने अपने सिद्धांतों का प्रचार प्रारंभ किया | वैशाली के लिच्छवी सरदार चेटक जो उनके मामा थे , जैन धर्म के प्रचार में मुख्य योगदान दिया |
  • महावीर स्वामी को उनके प्रथम शिष्य जामालि से मतभेद हो गया , मतभेद का कारण क्रियमाणकृत  सिद्धांत ( कार्य करते ही पूर्ण हो जाना ) था | इस मतभेद के कारण जामालि ने संघ छोड़ दिया और एक नए सिद्धांत बहुतरवाद (  कार्य पूर्ण होने पर ही पूर्ण माना जाएगा ) का प्रतिपादन किया | जैन धर्म में दूसरा विद्रोह जामालि  के विद्रोह के 2 वर्ष के पश्चात तीसगुप्त ने किया | मक्खलिगोसाल ने आजीवक संप्रदाय की स्थापना की | इनका मत नियतिवाद कहा गया है जिनके अनुसार संसार की प्रत्येक वस्तु भाग्य द्वारा नियंत्रित एवं संचालित की जाती है | 527 ईसा पूर्व के लगभग 72 वर्ष की आयु में राजगृह ( राजगीर ) के समीप स्थित पावापुरी नामक स्थान पर महावीर स्वामी ने शरीर त्याग दिया

महावीर स्वामी ने पंच महाव्रत की शिक्षा दी  जो इस प्रकार है –

  1. अहिंसा
  2. सत्य
  3. अस्तेय
  4. अपरिग्रह एंव
  5. ब्रह्मचर्य |
  • प्रथम चार व्रत पार्श्वनाथ के समय से ही प्रचलित थे। महावीर ने इसमें पांचवा व्रत ब्रह्मचर्य को जोड़ा था। जैन धर्म में गृहस्थों के लिए पंच महाव्रत अणुव्रत के रूप में व्यवहृत हुआ है , क्योंकि संसार में रहते हुए इन महाव्रतों का पूर्णतः पालन करना संभव नही इसलिए आंशिक रूप से इनके पालन के लिए कहा गया।

ये पंच अणुव्रत है

  1. अहिंसाणुव्रत
  2. सत्याणुव्रत
  3. अस्तेयाणुव्रत
  4. ब्रह्मचर्याणुवत और
  5. अपरिग्रहाणुव्रत |
  • महावीर स्वामी ने वेदों की अपौरूषेयता स्वीकार करने से इंकार किया तथा धार्मिक सामाजिक रूढ़ियों एवं पाखंडो का विरोध किया। उन्होंने आत्मवादियों तथा नास्तिकों के एकांतिक मतों को छोड़कर बीच का मार्ग अपनाया जिसे अनेकांतवाद अथवा स्यादवाद कहा गया | स्यादवाद को सप्तभंगी नय के नाम से भी जाना जाता है | यह ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धांत है |

प्रमुख जैन तीर्थंकर एवं उनके प्रतीक चिन्ह

तीर्थंकर

प्रतीक चिन्ह

ऋषभदेव

बैल

अजितनाथ

हाथी

संभवनाथ

अश्व

पद्मप्रभु

कमल

सुपार्श्वनाथ

साथिया (स्वास्तिक)

मल्लिनाथ

कलश

नमिनाथ

नीलकमल

नेमिनाथ

शंख

पार्श्वनाथ

सर्प

महावीर स्वामी

सिंह

 

  • जैन धर्म में मोक्ष के लिए तीन साधन आवश्यक बताए गए हैं। * ये है –
  1. सम्यक दर्शन ,
  2. सम्यक ज्ञान एवं
  3. सम्यक चरित्र
  • इन तीनों को जैन धर्म में ‘ त्रिरत्न ‘ की संज्ञा दी गई है। त्रिरत्नों का अनुसरण करने से कर्मों का जीव की ओर प्रवाह रुक जाता है। जिसे संवर कहते हैं। इसके बाद जीव में पहले से व्याप्त कर्म समाप्त होने लगते हैं। इसे ‘ निर्जरा ‘ कहा गया है। जब जीव में कर्म का अवशेष पूर्ण समाप्त हो जाता है तब वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जैन धर्म में ‘ अनंत चतुष्ट्य ‘ है – अनंत ज्ञान , अनंत दर्शन , अनंत वीर्य तथा अनंत सुख |
  • महावीर स्वामी ने अपने जीवकाल में एक संघ की स्थापना की | इस संघ में 11 प्रमुख अनुयायी सम्मिलित थे।ये ‘ गणधर ‘ कहे गए। इनके नाम है – इंद्रभूति , अग्निभूति , वायुभूति ( तीनों भाई ) , व्यक्त , सुधर्मन , मंडित , मोरियपुत्र ,अकंपित , अचलभ्राता , मेतार्थ तथा प्रभास | महावीर की मृत्यु के पश्चात् सुधर्मन जैन संघ का प्रथम अध्यक्ष बना | सुधर्मन की मृत्यु के पश्चात् जम्बू 44 वर्ष तक संघ का अध्यक्ष रहा। * अंतिम नंद राजा के समय सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु संघ के अध्यक्ष थे। महावीर द्वारा प्रदत्त 14 पूव्वो (प्राचीनतम जैन ग्रंथों) के विषय में जानने वाले ये दोनों अंतिम व्यक्ति थे।* कालांतर में जैन संप्रदाय दो संप्रदायों में विभक्त हो गया। * ये संप्रदाय थे श्वेतांबर तथा दिगंबर| * स्थूलभद्र के अनुयायी ‘ श्वेतांबर ‘ कहलाए जबकि भद्रबाहु के अनुयायी ‘ दिगंबर ‘ कहलाए | यापनीय ‘ जैन धर्म का एक संप्रदाय है।
  • प्रथम जैन सभा चतुर्थ शताब्दी ई.पू में पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में संपन्न हुई। इस सभा में जैन धर्म के 12 अंगों का संकलन किया गया। इससे भद्रबाहु के अनुयायियों ने भाग नही लिया।द्वितीय जैन सभा छठी शताब्दी में वल्लभी में देवर्धिगण या क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में संपन्न हुई। द्वितीय जैन सभा के समय 12 अंग , 12 उपांग , 10 प्रकीर्ण , 6 छेदसूत्र , 4 मूलसूत्र , अनुयोग सूत्र का संकलन हुआ।
  • जैन साहित्य को ‘ आगम ‘ ( सिद्धांत ) कहा जाता है। इसके अंतर्गत 12 अंग , 12 उपांग , 10 प्रकीर्ण , 6 छेदसूत्र , 4 मूलसूत्र , अनुयोग सूत्र तथा नन्दिसूत्र की गणना की जाती है। * जैन आगम में 12 अंगों का प्रमुख स्थान है – आचारांग सुत्त , सूयग दंग ( सूत्र कृतांग ) , ठाणंग ( स्थानांग ) , समवायंग सुत्त , भगवती सुत्त , नायाधम्मकहा ( ज्ञाताधर्मकथा ) सुत्त , उवासगदसाओं ( उपासकदशा ) सुत्त , अंतर्गद्रदसाओं , अणुत्तरोववाइयदसाओं , पण्हावागरणाइ ( प्रश्न व्याकरण ) , विवागसुयम् तथा दिट्टिवाय ( दृष्टिवाद )इनमें ब्रह्मांड का वर्णन , प्राणियों का वर्गीकरण , खगोल विद्या , काल विभाजन , मरणोत्तर जीवनका वर्णन आदि का उल्लेख प्राप्त होता है। बारह उपांग है –
  1. औपपातिक
  2. जीवाभिगम
  3. राजप्रश्नीय
  4. प्रज्ञापना
  5. चंद्र प्रज्ञाप्ति
  6. जम्बूद्वीप प्रज्ञाप्ति
  7. सूर्य प्रज्ञाप्ति
  8. निर्यावलि
  9. कल्पावसंतिका
  10. पुष्पिका
  11. पुष्प चूलिका तथा
  12. वृष्णि दशा।
  • दस ‘ प्रकीर्ण ‘ प्रमुख ग्रंथों के परिशिष्ठ है। ये है –
  1. चतु:शरण
  2. देवेंद्रस्तव
  3. आतुर
  4. प्रत्याख्यान
  5. वीरस्तव
  6. भक्तिपरिज्ञा
  7. तंदुल वैतालिका
  8. चंद्रवैध्यक
  9. गणितविद्या
  10. संस्तार तथा महाप्रत्याख्यान
  • ‘ छेदसूत्र ‘ की छह संख्या है। इसमें जैन भिक्षुओं के लिए विधिनियमों का संकलन है। छः छेदसूत्र हैं –
  1. कल्प
  2. पंचकल्प
  3. निशीथ
  4. महानिशिथ
  5. व्यवहार तथा
  6. आचार दशा
  • मूलसूत्र की संख्या चार है। * इसमें जैन धर्म के उपदेश , विहार के जीवन , भिक्षुओं के कर्तव्य , यम नियम आदि का वर्णन है। * चार मूलसूत्र है –
  1. दशवैकालिक
  2. उत्तराध्ययन
  3. षडावशयक तथा
  4. पिंडनिर्युक्ति या पाक्षिक सूत्र
  • अनुयोग सूत्र तथा नन्दिसूत्र जैनियों के स्वतंत्र ग्रंथ है | जो एक प्रकार का विश्वकोश है। इनमें भिक्षुओं के लिए आचरणीय बाते लिखी गई है। उपर्युक्त सभी ग्रंथ श्वेतांबर संप्रदाय के लिए हैं। दिगंबर संप्रदाय के अनुयायी इनकी प्रमाणिकता को स्वीकार नही करते हैं.

अन्य जैन ग्रंथ एवं उनके रचनाकार

जैन ग्रंथ

रचनाकार

कल्पसूत्र

भद्रबाहू

परिशिष्ट  पर्वन

हेमचंद्र

स्यादवादमंजरी

मल्लिसेन

द्रव्य संग्रह

नेमिचन्द्र

न्यायावतार

सिध्दसेन दिवाकर

तत्वार्थ सूत्र

उमास्वामी

न्याय दीपिका

धर्मभूषण

श्लोक वार्तिक

विद्यानंद स्वामी

प्रवचनसार

कुन्दकुन्द

 

  • जैन साहित्य में अशोक के पौत्र संप्रति को जैन मत का संरक्षक बताया गया है। इसे उज्जैन में शासन करने के कारण यह जैन धर्म का एक प्रमुख केंद्र बन गया। जैनियों का दूसरा प्रमुख केंद्र मथुरा था। यहां से अनेक मंदिर , प्रतिमाएं , अभिलेख आदि प्राप्त हुए है। कलिंग का चेदि शासक खारवेल जैन धर्म का महान संरक्षक था। इसने भुवनेश्वर के नजदीक उदयगिरि तथा खंडगिरि की पहाड़ियों को कटवा कर जैन भिक्षुओं के निवास के लिए गुहा विहार बनवाए थे।
  • राष्ट्रकूट राजाओं के शासनकाल (9वीं शताब्दी) में तथा गुजरात एंव राजस्थान में जैन धर्म 11 वी तथा 12वी शताब्दियों में अधिक लोकप्रिय रहा। खजुराहो के मंदिर हिंदू धर्म और जैन धर्म से संबंधित थे। माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं। इसका निर्माण गुजरात के चालुक्य ( सोलंकी ) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमलशाह ने करवाया था। श्रवणबेलगेला कर्नाटक राज्य में स्थित है। यह गंग शासक रचमल्ल के शासनकाल में चामुंडराय नामक मंत्री ने लगभग 983 ई. में बाहुबली (गोमतेश्वर) की विशालकाय जैन मूर्ति का निर्माण कराया। * बाहुबली , प्रथम जैन तीर्थकर ऋषभदेव के पुत्र माने जाते हैं। महामस्ताभिषेक , जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण उत्सव है , जो 12 वर्ष के अंतराल पर कर्नाटक राज्य के श्रवणबेलगोला में आयोजित किया जाता है।

श्वेतांबर एवं दिगंबर संप्रदाय में अंतर

श्वेतांबर

दिगंबर

इस संप्रदाय के लोग श्वेत  वस्त्र धारण करते हैं।

इस संप्रदाय के लोग पूर्णतया नग्न रहकर  तपस्या करते हैं।

इस मत के अनुसार, स्त्री के लिए मोक्ष प्राप्ति संभव है।

इस मत के अनुसार, स्त्री के लिए मोक्ष संभव नही है।

इस संप्रदाय के लोग ज्ञान प्राप्ति के बाद भोजन ग्रहण करने में विश्वास करते हैं।

जबकि  दिगंबर मत इसके विरुध्द है।

इस मत के अनुसार, महावीर  स्वामी विवाहित  थे।

दिगंबर मतानुसार महावीर स्वामी अविवाहित थे।

इस मत के अनुसार, 19वें मल्लिनाथ स्त्री थे।

दिगंबर मतानुसार वे पुरुष थे।

 

  • जैन धर्म के मूल संस्थापक या प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ माने जाते हैं। महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे, जिन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. के जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया।
  • 527 ई.पू. के लगभग 72 वर्ष की आयु में राजगृह (राजगीर) के समीप स्थित पावापुरी नामक स्थान पर महावीर स्वामी ने शरीर त्याग दिया।
  • तीर्थंकर शब्द जैन धर्म से संबंधित है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए माने जाते हैं, जिन्होने समय-समय पर जैन धर्म का प्रचार-प्रसार किया। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे तथा अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।
  • प्रभासगिरि उ.प्र. के कौशांबी में स्थित जैन तीर्थ स्थल है। कौशांबी का प्रभासगिरि स्थल छठवें जैन तीर्थकर पद्मप्रभु से संबंधित है।
  • जैन धर्म में पूर्ण ज्ञान के लिए कैवल्य शब्द का प्रयोग किया गया है। महावीर स्वामी को 12 वर्षों की कठोर तपस्या तथा साधन के पश्चात जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे कैवल्य (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त हुआ था, फलतः वे केवलिन कहलाएं।
  • जैन धर्म में मोक्ष के लिए तीन साधन आवश्यक बताए गएं हैं – सम्यक धारण, सम्यक चरित्र एवं सम्यक ज्ञान-इन तीनों को जैन धर्म में त्रिरत्न की संज्ञा दी गई है।
  • जैन धर्म में पंच महाव्रत – अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय एवं अपरिग्रह की व्यवस्था की गई है। जैन धर्म में गृहस्थों क लिए मंच महाव्रत  अणुव्रत के रुप में व्यवह्र्त  हुआ है। क्योकि संसार में रहते हुए इन महाव्रतों का पूर्णतः  पालन  करना संभव नही, इसलिए  आंशिक रुप से इनके पालन के लिए कहा गया –
  1. अहिंसाणुव्रत
  2. सत्याणु व्रत
  3. अस्तेयाणुव्रत
  4. ब्रह्मचर्याणुव्रत
  5. अपरिग्रहाणुव्रत
  • जैन दर्शन के अनुसार, समस्त विश्व जीव तथा अजीव नामक दो नित्य एवं स्वतंत्र तत्वों से मिलकर बना है। जीव चेतन तत्व है, जबकि अजीव अचेतन जड़ तत्व है। यहां जीवन से तात्पर्य उपनिषदों की सार्वभौमिक आत्मा से न होकर व्यक्तिगत आत्मा से है। जैन मतानुसार, आत्माएं अनेक होती हैं तथा सृष्टि के कण-कण में जीवों का वास है।
  • अनेकांतवाद जैन धर्म का क्रोड सिध्दांत एवं दर्शन है।
  • जैन धर्म में ईश्वर की कल्पना नही की गई है। जगत की सृष्टि नही की गई है, उनके अनुसार संसार नित्य और शाश्वत है। इसमें किसी समय प्रलय नही होता है।
  • अहिंसा जैन धर्म का आधारभूत बिंदु है। जैन धर्म में सम्यक चरित्र के अंतर्गत परिव्राजकों अथवा तापसों के लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह नामक पंच महाव्रत की व्यवस्था की गई है।
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  • यापनीय जैन धर्म का एक संप्रदाय था। जिसकी उत्पत्ति यद्यपि दिगंबर संप्रदाय से हुई थी तथापि ये कतिपय श्वेतांबर मान्यताओं का भी पालन करते थे।
  • चौदह पूर्व प्राचीनतम जैन ग्रंथ हैं। अंतिम नंद राजा के समय में सम्भूतविजय तथा भद्रबाहु जैन संघ के अध्यक्ष थे तथा ये ही महावीर द्वारा प्रदत्त चौदह पूर्वों के विषय मे जानने वाले अंतिम व्यक्ति थे।
  • प्रायः सभी प्रारंभिक धार्मिक जैन साहित्य प्राकृत की विशिष्ट शाखा अर्ध- मागधी में लिखा गया है। इसके बारह अंग अर्ध-मागधी में ही है। बाद में जैन धर्म ने प्राकृत भाषा को अपनाया। ये ग्रंथ ईसा की छठी शताब्दी में गुजरात में वल्लभी नामक स्थान पर अंतिम रुप से संकलित किए गए। आज जैन साहित्य लगभग सभी भाषाओं मे अनूदित है।
  • थेरीगाथा बौध्द साहित्य है, इसमें 32 बौध्द कवयित्रियों की कविताएं संकलित है। कुल थेरीगाथाएं 522 हैं। आचारांगसूत्र, सूत्रकृतांग और बृहत्कल्पसूत्र आरंभिक जैन साहित्य के भाग हैं।
  • मौर्य काल में मगध में अत्यंत भीषण दुर्भिक्ष पड़ा, फलतः वहां रहने वाले जैन संघ के भद्रबाहु श्रुतकेवली अपने अनुयायिंयों को लेकर दक्षिण चले गए। जैन संघ का यह भाग दक्षिण मैसूर के पुण्णाट प्रदेश मे बस गया। अकाल समाप्त होने के बाद भद्रभाहु अपने अनुनायियों के साथ पुनः यहां लौट आए। किंतु जैन संघ के नियमों को लेकर भद्रभाहु और स्थूलभद्र के बीच मत-वैभिन्य हो गया। स्थूलभद्र आकाल के समय मगध में ही रहे और उनके अनुयायी भी वही थे। उन्होने अपने अनुयायिंयों को सफेद वस्त्र धारण करने के लिए निर्देश दिया। इस प्रकार जैन संघ में  दो संप्रदाय विकसित हुए –
  1. श्वेतांबर
  2. दिगंबर

 

शैव, भागवत धर्म

  • भागवत धर्म से वैष्णव धर्म का विकास हुआ। परंपरानुसार इसके प्रवर्तक वृष्णि (सात्वत) वंशी कृष्ण थे। छांदोग्य उपनिषद में उन्हें देवकी पुत्र कहा गया है। इन्हें घोर अंगिरस का शिष्य बताया गया है।
  • ऋग्वेद में विष्णु का उल्लेख आकाश के देवता के रूप में हुआ है | उत्तर वैदिक काल में तीन प्रमुख देवता – प्रजापति , रूद्र व विष्णु थे | विष्णु को लोग पालक व रक्षक मानने लगे | पतंजलि ने वासुदेव को विष्णु का रूप बताया है। विष्णु पुराण में भी वासुदेव को विष्णु का एक नाम बताया गया है | इस प्रकार जब कृष्ण विष्णु का तादात्मय  नारायण से स्थापित हुआ तब वैष्णव धर्म के संज्ञा  ‘ पांचरात्र धर्म ‘ हो गया | भागवत धर्म तथा वासुदेव की पूजा का उल्लेख महर्षि पाणिनि ने किया है | उन्होंने वासुदेव के उपासको को ‘ वासुदेवक ‘ कहा है |  यह धर्म प्रारंभ में मथुरा उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित था |यूनानी राजदूत मेगास्थनीज के अनुसार , शूरसेन ( मथुरा )  के लोग ‘ हेराक्लीज ‘  के उपासक थे | हेराक्लीज  से तात्पर्य वासुदेव कृष्ण से ही है | मथुरा से इस धर्म का प्रसार धीरे-धीरे भारत के अन्य भागों में हुआ | भागवत धर्म से संबंध प्रथम उपलब्ध प्रस्तर स्मारक विदिशा ( बेसनगर ) का गरुण स्तंभ है | इससे पता चलता है कि तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा इस स्तंभ की स्थापना करवाकर पूजा की |  इस पर उत्कीर्ण लेख में हेलिओडोरस को ‘  भागवत ‘ तथा वासुदेव को ‘ देवदेवस ‘ अर्थात्  देवताओं का देवता कहा गया था | महाक्षत्रप शोडासकालीन मोरा ( मथुरा )  पाषाण लेख में पंचवीरों ( संकर्षण ,  वासुदेव , प्रघुम्न , साम्ब तथा अनिरुद्ध ) की पाषाण प्रतिमाओं को मंदिर में स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है |
  • कुषाण शासक हुविष्क तथा वासुदेव द्वारा विष्णु पूजा का पता चलता है | गुप्त नरेश वैष्णव मत अनुयायी थे तथा उन्होंने इसे अपना राजधर्म बनाया था | अधिकांश गुप्त शासक ‘ परम भागवत ‘ की उपाधि धारण करते थे | विष्णु का वाहन ‘ गरुड़ ‘ गुप्त शासकों का राजचिन्ह था | मेहरौली स्तंभ लेख में उल्लेख मिलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय ने विष्णुपद पर्वत पर विष्णु ध्वज की स्थापना कराई थी | स्कंद गुप्त के भीतरी स्तंभ लेख में विष्णु की मूर्ति स्थापित किए जाने का उल्लेख है |  अमर सिंह ने अपने ग्रंथ अमरकोश में विष्णु के 39 नामों का उल्लेख किया है | वेंगी के पूर्वी चालुक्य शासक वैष्णव मतानुयाई थे। गुप्तों के समान उनका राजचिन्ह गरुड़ था | राष्ट्रकूट नरेश दंतिदुर्ग ने एलोरा में दशावतार का प्रसिद्ध मंदिर बनवाया था | इस मंदिर में विष्णु के 10 अवतारों की कथा मूर्तियों में अंकित है | क्षेमेंद्र रचित ‘ दशावतार रचित ‘ में विष्णु के 10 अवतारों का वर्णन मिलता है | अलवार संतों द्वारा दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार किया गया | अलवार शब्द का अर्थ होता है – ज्ञानी व्यक्ति | अलवार संतो की संख्या 12 बताई गई है। इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय है – पोयगई , पूडम , पेय , तिरुमंगई , आण्डाल नम्मालवार आदि |  अलवार संतों में एकमात्र महिला साध्वी आण्डाल  थी | चोल काल में वैष्णव धर्म के प्रचार का कार्य अलवारो के स्थानों पर आचार्यो ने किया | आचार्य परंपरा में प्रथम नाम नाथमुनि का लिया जाता है | इन्हें मधुरकवि का शिष्य बताया जाता है | उन्होंने ‘ न्यायतत्व ‘ की रचना की | पुराणों में विष्णु के 10 अवतारों का विवरण प्राप्त होता है |  वे हैं मत्स्य , कूर्म अथवा कच्छप , वराह नृसिंह वामन , परशुराम , राम , कृष्ण , बुद्ध व कल्कि ( कलि) | कल्कि अवतार भविष्य में होने वाला है | भगवान विष्णु ने दैत्यराज हिरणाक्ष का वध करने के लिए  वाराह रूप धारण किया था तथा उसके चंगुल से धरती को छुड़ाया था | ऐसी कल्पना की गई है कि भगवान विष्णु हाथ में तलवार लेकर श्वेत अश्व  पर सवार होकर पृथ्वी पर अवतरित होंगे।

·      भागवत अथवा पांचरात्र धर्म में वासुदेव (कृष्ण) की उपासना के साथ ही तीन अन्य व्यक्तियों की उपासना की जाती थी | इनके नाम है –

1.    संकर्षण (बलराम) – वसुदेव और रोहिणी के पुत्र 

2.    प्रद्युम्न – कृष्ण और रुक्मणी से उत्पन्न पुत्र

3.    अनिरुद्ध – प्रद्युम्न के पुत्र |

·      इन चारों को चतुर्व्यूह ‘  की संज्ञा दी जाती है | वायु पुराण में इन चारों के साथ ‘ साम्ब ‘ –  ( कृष्ण और जाम्बवंती से उत्पन्न पुत्र ) को मिलाकर ‘ पंचवीर ‘ कहा गया है | भागवत संप्रदाय में नवधा भक्ति का विशेष महत्व है | वैष्णव धर्म के प्रमुख आचार्य हैं – रामानुज , मध्व ,   वल्लभ व चैतन्य आदि |

वैष्णव धर्म से संबधित प्रमुख मंदिर

मंदिर

स्थान

जगन्नाथ मंदिर

पुरी (ओड़िशा)

दशावतार मंदिर

देवगढ़ (उत्तर प्रदेश)

विष्णु मंदिर

तिगवां (म.प्र.)

विष्णु मंदिर

एरण (म.प्र.)

द्वारिकाधीश मंदिर

मथुरा (उ.प्र.)

द्वारिकाधीश मंदिर

द्वारिका (गुजरात)

  • शिव से संबंधित धर्म को ‘ शैव ‘ धर्म कहा जाता है | शिव के उपासक को ‘ शैव ‘ कहा जाता है | शैव धर्म भारत का प्राचीनतम धर्म है | इसका संबंध प्रागैतिहासिक युग तक है | सिंधु घाटी के लोग शिव की पूजा करते थे | इसका प्रमाण मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर है जिस पर योगी की आकृति बनी है | योगी के सिर पर एक त्रिशूल जैसा आभूषण है तथा इसके तीन मुख हैं। मार्शल महोदय ने इसे रूद्र शिव से संबोधित किया है |
  • ऋग्वेद में शिव को रुद्र कहा गया है जो अपनी उग्रता के लिए प्रसिद्ध है | रूद्र को समस्त लोको का स्वामी वाजसनेयी संहिता के शतरुद्रीय मंत्र में कहा गया है | अथर्ववेद में उन्हें पशुपति , भव , भूपति  आदि कहा गया है | पतंजलि के महाभाष्य से पता चलता है कि दूसरी सदी ईसा पूर्व में शिव की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती थी | महाभाष्य में शिव के अनेक नामों का उल्लेख मिलता है।यह प्रमुख नाम है – रुद्र, महादेव ,  गिरीश ,  भव , सर्व , त्र्यंबक आदि |
  • कुषाण शासकों के सिक्कों पर शिव , वृषभ और त्रिशूल की आकृतियां मिलती है | उदयगिरि गुहालेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त द्वितीय का प्रधानमंत्री वीरसेन ने उदयगिरि पहाड़ी पर एक शैव गुफा का निर्माण करवाया था | कुमारगुप्त के समय में खोह तथा करमदंडा में शिवलिंग की स्थापना करवाई गई थी | गुप्तकाल में नचनाकुठार में पार्वती मंदिर तथा भूमरा में शिव मंदिर का निर्माण करवाया गया था | कालिदास ने कुमारसंभवम् में शिव की महिमा का गुणगान किया है | चंदेल शासकों द्वारा खजुराहो का प्रसिद्ध मंदिर कंदारिया महादेव मंदिर निर्मित कराया गया था|
  • राष्ट्रकूटों के समय में एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर निर्मित कराया गया था | शैव धर्म का प्रचार-प्रसार दक्षिण भारत में नयनारों द्वारा किया गया था। नयनार संतो की संख्या 63 है | इसमें तिरूज्ञान , सुंदर मूर्ति , सम्बन्दर , अप्पार , मणिक्कवाचगर आदि का नाम उल्लेखनीय है | * दक्षिण भारत में चोल शासक शिव के अनन्य उपासक थे | चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर निर्मित करवाया था | कुलोतुंग प्रथम एक कट्टर शैव था। इसने शिव के प्रति अतिशय श्रद्धा के कारण चिदंबरम मंदिर में स्थापित विष्णु की मूर्ति को उखाड़कर समुद्र में फेंकवा दिया था | शैव धर्म से संबंधित देश के विभिन्न भागों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग है –
  1. सोमनाथ
  2. नागेश्वर ( द्वारका के समीप )
  3. केदारनाथ
  4. विश्वनाथ ( काशी )
  5. वैद्यनाथ
  6. महाकालेश्वर ( उज्जैन)
  7. ओम्कारेश्वर ( मध्य प्रदेश )
  8. भीमेश्वर ( नासिक )
  9. त्र्यम्बेकेश्वर ( नासिक )
  10. घुश्मेश्वर
  11. मल्लिकार्जुन ( आंध्र प्रदेश )
  12. रामेश्वरम।
  • वामन पुराण में शैव संप्रदाय की संख्या 4 बताई गई है | ये हैं –
  1. शैव
  2. पाशुपत
  3. कापालिक एवं
  4. कालामुख
  • पाशुपत संप्रदाय की उत्पत्ति ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हुई थी। पुराणों के अनुसार , इस संप्रदाय की स्थापना लकुलीश अथवा लकुली नामक ब्रह्मचारी ने की थी। इस संप्रदाय के अनुयायी लकुलीश को शिव का अवतार मानते हैं। कापालिक संप्रदाय के उपासक भैरव को शिव का अवतार मानकर उनकी उपासना करते थे। इस मत के अनुयायी सुरा सुंदरी का सेवन करते थे एवं मांस खाते थे , शरीर पर श्मशान की भस्म लगाते हैं तथा हाथ में नरमुंड धारण करते हैं।
  • भवभूति के ‘ मालतीमाधव ‘ नाटक से पता चलता है कि ‘ श्रीशैल ‘ नामक स्थान कापालिकों का प्रमुख केंद्र था। कालामुख संप्रदाय अतिमार्गी होने के कारण शिवपुराण में इसके अनुयायियों को महाव्रतधर कहा गया है। शैव धर्म का ही एक संप्रदाय लिंगायत अथवा वीर शैव था। इसका प्रचार बारहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में व्यापक रूप से हुआ। वसव को इस संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है | शैव धर्म का एक नया संप्रदाय कश्मीर में विकसित हुआ। यह संप्रदाय शुद्ध रूप से दार्शनिक या ज्ञानमार्गी था। नाथपंथ संप्रदाय दसवी सदी के अंत में मत्स्येन्द्रनाथ ने चलाया।* इसमें शिव को आदिनाथ मानते हुए नौ नाथो को दिव्य पुरुष के रूप में मान्यता प्राप्त की गई है |  बाबा गोरखनाथ ने 10वीं 11वीं शताब्दी में इस मत का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार किया |

शैव धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर

मंदिर

स्थान

राजराजेश्वर मंदिर

तंजौर (तमिलनाडु)

शिव मंदिर

भूमरा (म.प्र.)

नटराज मंदिर

चिदंबरम (तमिलनाडु)

विरुपाक्ष मंदिर

हम्पी (कर्नाटक)

विश्वनाथ मंदिर

वाराणसी (उ.प्र.)

 

  • शाक्त संप्रदाय के लोग शक्ति को इष्टदेवी मानकर पूजा करते थे। शैव धर्म के साथ शाक्त धर्म का घनिष्ठ संबंध रहा है | शक्त धर्म की प्राचीनता भी शैव धर्म के समान प्रागैतिहासिक युग तक जाती है | सैंधव  सभ्यता में मातृ देवी की उपासना व्यापक रूप से प्रचलित थी | मातृ देवी की बहुसंख्यक मूर्तियां खुदाई में प्राप्त हुई है | वैदिक साहित्य से सरस्वती , अदिती ,  उषा , लक्ष्मी आदि देवियों के विषय में सूचना मिलती है |  देवी महात्मय का विस्तृत वर्णन महाभारत तथा पुराणों से प्राप्त होता है। देवी की उपासना तीन रूपों में की जाती है | यह रूप है – शांत या सौम्य रूप , उग्र या प्रचंड रूप और काम प्रधान रूप |  सौम्य रूप के प्रतीक उमा , पार्वती , लक्ष्मी आदि हैं|
  • उग्र रूप के प्रतीक चंडी , दुर्गा , भैरवी , कपाली आदि। कापालिक एवं कालमुख संप्रदाय के लोग देवी के उग्र रूप की आराधना करते हैं। वैष्णों देवी का मंदिर देवी के सौम्य रूप का मंदिर है।कोलकाता स्थित काली देवी मंदिर देवी के उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करता है। असम का कामाख्या मंदिर देवी के काम प्रधान रूप का प्रतिनिधित्व करता है। प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल के लेखों मे दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी, कांचनदेवी,अम्बा आदि नामों की स्तुति मिलती है। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष महालक्ष्मी का अनन्य भक्त था। संजन लेख से ज्ञात होता है कि उसने एक बार अपने बाएं हाथ की उंगली काटकर देवी को चढ़ा दिया था। श्रीहर्ष ने अपने ग्रंथ ‘ नैषधीयचरित ‘ में सरस्वती मंत्र की महत्ता का प्रतिपादन किया। संप्रति शाक्त उपासना के तीन प्रमुख केंद्र है। ये हैं –
  1. कश्मीर
  2. कांची तथा
  3. असम स्थित कामाख्या असम स्थित कामाख्या कौल मत का प्रसिध्द केन्द्र है।

शाक्त धर्म से संबंधित प्रमुख मंदिर

मंदिर

स्थान

वैष्णों देवी का मंदिर

जम्मू

विंध्यावासिनी देवी का मंदिर

विंध्याचल

चौसठ योगिनी का मंदिर

भेड़ाघाट (म.प्र.)

पार्वती मंदिर

नाचना-कुठार (म.प्र.)

कामाख्या मंदिर

असम

दक्षिणेश्वर काली मंदिर

कोलकाता

  • प्राचीन भारत की विश्वोत्पत्ति विषयक धारणाओं के अनुसार, चार युगों के चक्र का क्रम इस प्रकार है – कृत (सतयुग), त्रेता, द्वापर एवं कलियुग।
  • चेदि राजवंश के अभिलेखों में मत्तमयूर नामक शैव संप्रदाय का उल्लेख मिलता है।
  • वैष्णव धर्म का प्रारंभिक रुप भागवत धर्म के अंतर्गत देवकी-पुत्र भगवान वासुदेव कृष्ण के पूजन में दर्शित होता है, जो संभवतः छठी सदी ई.पू. के पहले स्थापित हो चुका था। वासुदेव, जो कृष्ण का प्रारंभिक नाम था, पाणिनि के युग में प्रचलित था। उस युग में वासुदेव की उपासना करने वाले वासुदेवक (भागवत) कहे जाते थे।
  • भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के अनुरुप कला में हल लिए कृष्ण के भाई बलराम को प्रदर्शित किया गया है। उन्हें हलधर के नाम से जाना जाता है।
  • भागवत संप्रदाय में मोक्ष के लिए नवधा भक्ति को मान्यता दी गई है।
  • भागवत धर्म से संबंध्द प्रथम उपलब्ध प्रस्तर स्मारक विदिशा (बेसनगर) का गरुड़ स्तंभ है। इससे पता चलता है कि तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा इस स्तंभ की स्थापना करवाकर उसकी पूजा की थी। इस पर उत्कीर्ण लेख में हेलियोडोरस को भागवत तथा वासुदेव को देवदेवस अर्थात देवताओं का देवता कहा गया है।
  • छठी शताब्दी ई.पू. के संदर्भ में आस्तिक संप्रदाय वे होते थे, जो वेदों की प्रमाणिकता को मानते थे तथा नास्तिक संप्रदाय वे थे, जो वेदों की प्रमाणिकता को नही मानते थे।
  • उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवदगीता को वेदांत की प्रस्थानत्रयी कहा जाता है, क्योकि वे वेदांत के सर्वप्रमुख ग्रंथ हैं। इनमें भी उपनिषद मूल प्रस्थान है और शेष दो उन पर आधारित माने जाते हैं। वेदांत के आचार्यों में, जिन्होंने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखकर, अपने-अपने वेदांत संप्रदायों की प्रतिष्ठा की है, उनमें शंकराचार्य सबसे प्राचीन हैं।
  • उ.प्र. के सीतापुर जनपद के नैमिषारण्य में 60000 मुनियों का निवास माना जाता है। यही पर सुत गोस्वामी ने सौनक एवं अन्य मुनियों के समक्ष संपूर्ण महाभारत कथा का वाचन तब किया था जब वे यज्ञ संपन्न पर रहे थे। इसके पूर्व महाभारत कथा का वाचन वैषम्पायन ने राजा जनमेजय के लिए किया था।
  • रामायण के रचयिता बाल्मीकि थे। संस्कृत भाषा में रचित इस आदि काव्य में कुल 7 कांड (अध्याय) हैं। इसका चौथा कांड किष्किन्धा कांड है जिसमें राम और हनुमान की भेंट तथा बालि-वध एवं सुग्रीव के वानर शासक बनने का वर्णन है।
  • प्रतिवर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में ओड़िशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ (कृष्ण), बलराम और सुभद्रा के सम्मान में रथयात्रा निकाली जाती है।
  • नासिक में प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर कुंभ मेला गोदावरी नदी के तट पर लगता है। यह नासिक के अतिरिक्त हरिद्वार में गंगा तट पर, प्रयाग में गंगा और यमुना (एवं विलुप्त सरस्वती) के संगम स्थल पर तथा उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर लगता है।
  • मदीना पश्चिमी सऊदी अरब के हेजाज क्षेत्र में स्थित शहर है। यह मक्का के बाद इस्लाम धर्म का दूसरा पवित्रतम शहर है।

 

छठी शती .पू. – राजनीतिक दशा

  • बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तरनिकाय से ज्ञात होता है कि गौतम बुद्ध के जन्म के पूर्व समस्त उत्तर भारत 16 बड़े राज्यों में विभाजित था | इन्हें ‘ सोलह महाजनपद ‘ कहा गया है | इन 16 महाजनपदों के नाम है –
  1. कौशल
  2. काशी
  3. मगध
  4. अंग
  5. वज्जि
  6. चेदि
  7. मल्ल
  8. वत्स
  9. कुरु
  10. पांचाल
  11. मत्स्य
  12. शूरसेन
  13. कम्बोज
  14. अवंती
  15. अस्सक ( अश्मक )
  16. गांधार |
  • जैन ग्रंथ ‘ भगवतीसूत्र ‘ में भी इन 16 महाजनपदों के नाम मिलते हैं किंतु, इसमें कुछ नाम भिन्न दिए गए हैं | इसमें प्राप्त 16 महाजनपदों के नाम हैं –
  1. अंग
  2. बंग
  3. मलय
  4. अच्छ
  5. वच्छ (वत्स)
  6. मगह (मगध)
  7. मालव
  8. कोच्छ
  9. लाढ़
  10. मोलि (मल्ल)
  11. कोशल
  12. काशी
  13. पाठ्य
  14. सम्मुतर
  15. अवध
  16. वज्जि
  • पाणिनी के अष्टाध्यायी में 22 महाजनपदों की उल्लेख मिलता है।उत्तरी बिहार के वर्तमान भागलपुर तथा मुंगेर के जिले अंग महाजनपद के अंतर्गत थे |  इसकी राजधानी चंपा थी | महाभारत तथा पुराणों में इसका प्राचीन नाम ‘ मालिनी ‘ प्राप्त होता है | बुद्ध के समय भारत के 6 महानगरों में चंपा की गणना की जाती थी | महापरिनिर्वाणसूत्र में इन 6 महानगरों के नाम प्राप्त होते हैं | ये है –
  1. चंपा
  2. राजगृह
  3. बनारस
  4. साकेत
  5. कौशांबी
  6. श्रावस्ती
  • दीर्घनिकाय के अनुसार चंपा नगर निर्माण की योजना वास्तुकार महागोविंद ने की थी | वैशाली के लिच्छवियों ने विश्व का पहला गणतंत्र स्थापित किया था | सुत्तनिपात में वैशाली को ‘ मगधम् पुरम ‘ कहा गया है।

महाजनपद

आधुनिक स्थल

राजधानी

कुरु

मेरठ, दिल्ली और थानेश्वर

इन्द्रप्रस्थ

पांचाल

बरेली, बदांयू तथा फर्रुखाबाद

अहिछत्र तथा कांपिल्य

शूरसेन

मथुरा के आस-पास का क्षेत्र

मथुरा

वत्स

इलाहाबाद तथा  बांदा

कौशांबी

कोशल

अवध का क्षेत्र (फैजाबाद मंडल)

साकेत तथा श्रावस्ती

मल्ल

देवरिया जिला

कुशीनगर और पावा

काशी

 वाराणसी

वाराणसी

अंग

भागलपुर तथा मुंगेर

चम्पा

मगध

दक्षिणी  बिहार (पटना व गया जिला)

गिरिव्रज अथवा राजगृह

वज्जि

मुजफ्फरपुर तथा दरभंगा

मिथिला, वैशाली व जनकपुरी

चेदि

बुंदेलखंड

सोत्थिवती

मत्स्य

जयपुर

विराटनगर

अश्मक

गोवादवरी घाटी (आंध्र प्रदेश)

पोतन/पोटिल

अवंति

पश्चिमी तथा मध्य मालवा क्षेत्र

उज्जयिनी तथा माहिष्मती

गांधार

पेशावर तथा रावलपिंडी (पाकिस्तान)

तक्षशिला

कम्बोज

दक्षिणी पश्चिमी कश्मीर तथा

राजपुर/हाटक अफगानिस्तान का कुछ भाग

 

  • वैशाली बुद्ध काल का सबसे बड़ा तथा शक्तिशाली गणराज्य था | पुराणों के अनुसार मगध पर शासन करने वाला पहला राजवंश बृहद्रथ वंश था | इस वंश के पहले राजा बृहद्रथ का पुत्र जरासंध था , जिसने गिरिव्रज (राजगृह) को अपनी राजधानी बनाया | महाभारत के वनपर्व में राजगृह को जरासंध की राजधानी बताया गया है | बौद्ध ग्रंथों के अनुसार , मगध का प्रथम प्रतापी शासक बिंबिसार था | यह हर्यंक से संबंधित था।
  • सोननंद जातक से पता चलता है कि मगध और कौशल पर काशी का अधिकार था | काशी का सबसे शक्तिशाली शासक ब्रह्मदत्त था |इसने कोशल पर विजय प्राप्त की थी | अंततोगत्वा कोशल के राजा कंस ने काशी को जीतकर अपने राज्य में शामिल कर लिया। प्रसेनजित के समय कोशल का काशी के अतिरिक्त कपिलवस्तु के शाक्य , केसपुत्त के कालाम , रामगाम के कोलिय , पावा और कुशीनारा के मल्ल , पिप्पलिवन के मोरिय आदि गणराज्यों पर भी अधिकार था। संयुक्त निकाय के अनुसार , प्रसेनजित ‘ पांच राजाओं के एकगुट ‘ का नेतृत्व करता था। रामायणकालीन कोशल राज्य की राजधानी अयोध्या थी। कौशल के प्रमुख नगर श्रावस्ती , अयोध्या और साकेत थे। बुद्ध काल में कोशल के दो भाग हो गए थे। उत्तरी भाग की राजधानी साकेत तथा दक्षिणी भाग की राजधानी श्रावस्ती थी।
  • उत्खननों के आधार पर ज्ञात हुआ है कि प्राचीन श्रावस्ती का नगर विन्यास अर्ध्दचंद्राकार था। * पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में मल्ल महाजनपद स्थित था | * इसके दो भाग थे – एक की राजधानी पावा ( पडरौना ) तथा दूसरे की कुशीनारा ( कसया ) थी। छठी शताब्दी ई.पू. में आधुनिक बुंदेलखंड के पूर्वी तथा उसके समीपवर्त्ती भागों में चेदि महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी ‘ सोत्थिवती ‘ थी | जिसकी पहचान महाभारत में शुक्तिमती से की जाती है। महाभारत काल में चेदि के शासक शिशुपाल था जिसका वध श्रीकृष्ण द्वारा किया गया था। इलाहाबाद के आस-पास के क्षेत्रों में वत्स महाजनपद स्थित था। * विष्णु पुराण से ज्ञात होता है कि हस्तिनापुर के राजा निचक्षु ने हस्तिनापुर के गंगा के प्रवाह में बह जाने के बाद कौशाम्बी को अपनी राजधानी बनाई थी। बुद्ध काल में यहां पौरव वंश का शासन था। * यहां का शासक उदयन था। * बौद्ध भिक्षु पिण्डोला ने उदयन को बौद्ध मत में दीक्षित किया था। * उदयन-वासवदत्ता की दंतकथा उज्जैन से संबंधित थी। * इस कथा को महाकवि भास ने अपने नाटक स्वपन्नवासवदतम् में वर्णित किया है।
  • कुरु महाजनपद मेरठ, दिल्ली तथा थानेश्वर के भू-भागों मे स्थित था। महाभारतकालीन हस्तिनापुर नगर इसी राज्य में स्थित था। बुध्द के समय यहां का राजा कोरव्य था। पंचाल महाजनपद आधुनिक रुहेलखंड के बरेली, बदायूं तथा फर्रूखाबाद के जिलों से मिलकर बनता था। प्रारंभ में  इसके दो भाग थे – उत्तरी पंचाल की राजधानी अहिछत्र तथ  दक्षिणी पंचाल की राजधानी काम्पिल्य थी। पंचाल महाजनपद के अंतर्गत कान्यकुब्ज का प्रसिध्द नगर स्थित था। पंचाल जनपद की सीमाएं हिमालय की तलहटी से लेकर दक्षिण मे चंबल नदी तक तथा पूर्व मे कोसल तथा पश्चिम में कुरु जनपद थी। पंचाल मूलतः एक राजतंत्र था,  किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि कौटिल्य के समय तक वह एक गणराज्य हो गया था। मत्स्य महाजनपद राजस्थान के जयपुर क्षेत्र में  बसा हुआ था। इसके अंतर्गत वर्तमान अलवर एवं भरतपुर का एक भाग भी सम्मिलित था। इसकी राजधानी विराट की स्थापना विराट नामक राजा द्वारा की गई थी।
  • शूरसेन महाजनपद आधुनिक ब्रजमंडल क्षेत्र में बसा हुआ था। इसकी राजधानी मथुरा थी। प्राचीन यूनानी लेखक इस राज्य को शूरसेनोई तथा इसकी राजधानी को मेथोरा कहते थे। अश्मक महाजनपद गोदावरी नदी (आंध्र प्रदेश) के तट पर स्थित था। महाजनपदों में केवल अश्मक ही दक्षिण भारत में स्थित था। अवंति महाजनपद पश्चिमी तथा मध्य मालवा के क्षेत्र में बस था। इस महाजनपद के दो भाग थे –
  1. उत्तरी अवंति की राजधानी उज्जयिनी तथा
  2. दक्षिणी अवंति की राजधानी माहिष्मती थी।
  • बुध्द काल मे अवंति की राजधानी उज्जयिनी थी। गौतम बुध्द के समय यहां का राजा प्रद्योत था।बिंबिसार के समय में मगध के साथ प्रद्योत के संबंध मैत्रीपूर्ण थे।* प्रद्योत को पांडुरोग से ग्रसित हो जाने पर बिंबिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को उसके उपचार के लिए भेजा | * बौद्ध पुरोहित महाकच्चायान के प्रभाव से प्रघोत बौद्ध बन गया। प्राचीन भारत के  उत्तरी भाग में, जिसे उत्तरापथ भी कहा जाता था, दो जनपद थे। ये जनपद थे – गंधार और कम्बोज। गंधार महाजनपद वर्तमान पाकिस्तान के पेशावर तथा रावलपिंडी जिलों में स्थित था।* रामायण से ज्ञात होता है कि तक्षशिला नगर की स्थापना भरत के पुत्र तक्ष ने की थी। * गंधार महाजनपद का दूसरा प्रमुख नगर पुष्कलावती था। * कौटिल्य ने कम्बोजो को ‘ वार्ताशास्त्रोपजीवी संघ ‘ अर्थात् पशुपालन , कृषि , वाणिज्य तथा शस्त्र द्वारा जीविका चलाने वाला कहा है। * प्राचीन समय में कम्बोज अपने श्रेष्ठ घोड़ों के लिए विख्यात था। *16 महाजनपदों में से चार – कोशल , मगध , वत्स तथा अवंती अत्यंत शक्तिशाली थे |
  • 16 महाजनपदों में से 8 वर्तमान उत्तर प्रदेश में स्थित है यह महाजनपद है – काशी , कोशल , वत्स , मल्ल , कुरू , पांचाल , शूरसेन तथा चेदी | * बुद्ध काल में गंगा घाटी के कई गणराज्यों के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है। ये गणराज्य – कपिलवस्तु के शाक्य , सुमसुमारगिरि के भग्ग , अलकप्प के बुलि , केस पुत्त के कालाम , रगगाम के कोलिय , कुशीनारा के मल्ल , पिपलिवन के मोरिय , वैशाली के लिच्छवि , पावा के मल्ल तथा मिथिला के विदेह | * सिक्को के अध्ययन को ‘ न्यूमिस्मेटिक्स ‘ कहा जाता है। * भारत के प्राचीनतम सिक्कों को आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के कहा जाता है। * से सिक्के छठी शताब्दी ईपू से मौर्यकाल के मध्य प्राप्त होते हैं। * बुद्धधोष की टीका ‘ सुमंगलविलासिनी ‘ से वज्जि संघ की न्याय व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। * इससे ज्ञात होता है कि वज्जि संघ में आठ न्यायालय थे।

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  • मगध की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिंबिसार (लगभग 544-492 ई.पू.) था | * यह हर्यंक वंश से संबंधित था | जैन साहित्य में बिंबिसार को ‘ श्रेणिक ‘ कहा गया है | * महावंश के अनुसार , बिंबिसार 15 वर्ष की आयु में मगध का नरेश बना था | * सर्वप्रथम इसने प्रमुख राजवंशों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपनी स्थिति सुदृढ़ की | * इसने लिच्छवी गणराज्य के शासक चेटक की पुत्री चेलना ( छलना ) के साथ विवाह किया और मगध की उत्तरी सीमा को सुरक्षित किया | * दूसरा प्रमुख वैवाहिक संबंध कोशल नरेश प्रसेनजीत की बहन महाकोसला के साथ किया | * इस वैवाहिक संबंध से उसे काशी का प्रांत (अथवा उसके कुछ ग्राम) प्राप्त हुए | * अन्य प्रमुख वैवाहिक संबंध मद्र देश की राजकुमारी क्षेमा के साथ करके मद्रो का सहयोग प्राप्त किया | * अंग के शासक ब्रह्मदत्त को पराजित कर अपने राज्य में मिला लिया |
  • विनयपिटक से ज्ञात होता है कि इसने वेलुवन नामक उद्यान बुद्ध एवं संघ के निमित्त प्रदान कर दिया | * दीघनिकाय से ज्ञात होता है कि बिंबिसार ने चंपा के ब्राह्मण को वहां की संपूर्ण आमदनी दान में दे दिया | * बिंबिसार को अपने पुत्र अजातशत्रु द्वारा बंदी बनाकर कारागार में डालने का उल्लेख बौद्ध  एवं जैन ग्रंथों में मिलता है | * बिंबिसार की मृत्यु 492 ई पू के लगभग हो गई | * बिंबिसार  के पश्चात इसका पुत्र ‘कुणिक ‘ अजातशत्रु ( लगभग 492 – 460 ई पू ) मगध का शासक हुआ। * अपने पिता के समान ही वह साम्राज्यवादी था | * इसके शासन के प्रारंभिक वर्षों में मगध व कोशल के बीच संघर्ष शुरू हो गया | * किंतु बाद में मगध के शासक अजातशत्रु तथा कोशल के शासक प्रसेनजीत के बीच संधि हो गई | * प्रसेनजित ने अपने पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु से कर दिया तथा पुनः काशी के ऊपर उसका अधिकार स्वीकार कर लिया | * पाटलिपुत्र की स्थापना अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदायिन ने गंगा और सोन नदी के संगम पर एक किला बनाकर की थी की | * इसने मगध की  राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित की |
  • शैसुनाग वंश की स्थापना शिशुनाग द्वारा की गई | महावंश टीका में शिशुनाग को एक लिच्छवि राजा की वेश्या पत्नी से उत्पन्न कहा गया है। * पुराणों के अनुसार वह क्षत्रिय था। * अवंति की विजय शिशुनाग के लिए लाभदायक सिद्ध हुई। * इससे मगध साम्राज्य की पश्चिमी सीमा मालवा तक पहुंच गई। इस विजय के पश्चात् शिशुनाग का वत्स के ऊपर भी अधिकार हो गया। क्योंकि वह अवंति के अधीन था। अवंति और वत्स पर अधिकार हो जाने से पश्चिमी विश्व के साथ पाटलिपुत्र को व्यापार – वाणिज्य के लिए एक नया मार्ग प्राप्त हो गया। * शिशुनाग ने गिरिब्रज के अतिरिक्त वैशाली नगर को अपनी दूसरी राजधानी बनाई थी,  जो बाद में उसकी प्रधान राजधानी बन गई।*शिशुनाग ने लगभग 412-394 ई. पू तक शासन किया।
  • महावंश के अनुसार , शिशुनाग की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र कालाशोक राजा बना। पुराणों में कालाशोक को ‘काकवर्ण ‘ कहा गया है। कालाशोक ने अपनी राजधानी पुनः पाटलिपुत्र स्थानांतरित कर दिया। * इसके शासनकाल में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में हुआ। इस संगीति में बौद्ध संघ दो संप्रदायों स्थविर तथा महासंघिक में विभाजित हो गए। * बाणभट् के हर्षचरित से ज्ञात होता है कि राजधानी के समीप घूमते किसी व्यक्ति ने काकवर्ण की छूरा भोंककर हत्या कर दी। * महाबोधि वंश के अनुसार , कालाशोक के 10 पुत्रों ने सम्मिलित रूप से लगभग 22 वर्षों तक शासन किया। * कालाशोक के उत्तराधिकारियों का शासन 344 ई. पू के लगभग समाप्त हो गया।
  • शैशुनाग वंश का अंत कर नंद वंश की स्थापना जिस व्यक्ति ने की , वह निम्न वर्ण से संबंधित था। विभिन्न ग्रंथों में उसका नाम भिन्न-भिन्न दिया गया है। पुराण में उसे ‘ महापद्म ‘ जबकि महाबोधिवंश में उसे ‘ उग्रसेन ‘ कहा गया है। * पुराणों के अनुसार , महापदमनंद शैशुनाग वंश का अंतिम राजा महानंदिन की शुद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। * जैन ग्रंथ परिशिष्टपर्वन् के अनुसार , वह नापित पिता और वैश्या माता का पुत्र था। नंद वंश में कुल 9 राजा होने के कारण उन्हें ‘ नवनंद ‘ कहा जाता है। महाबोधिवंश के अनुसार , इनके नाम है – उग्रसेन , पण्डुक , पण्डुगति , भूतपाल , राष्ट्रपाल , गोविषाणक , दशसिद्धक , कैवर्त तथा धनानंद |

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बौध्द साहित्य के अनुसार, बिंबिसार से नंदो तक के राजाओं के शासनकाल

वंश का नाम

राजा का नाम

शासनकाल

हर्यंक वंश (544-412 ई.पू.)

बिंबिसार

544-492 ई.पू.

 

अजातशत्रु

492-460 ई.पू.

 

उदायिन तथा

 
 

उसके उत्तराधिकारी

460-412 ई.पू.

शैशुनाग वंश (412-344 ई.पू.)

शिशुनाग

काकवर्ण

412-394 ई.पू.

394-366 ई.पू.

 

काकवर्ण के 10 पुत्र

366-344 ई.पू.

नंद वंश (344-323 ई.पू.)

उग्रसेन, महापद्म नंद

344-323 ई.पू.

 

तथा उसके आठ पुत्र

 

·      महापद्मनंद को ‘ कलि का अंश ‘ सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला, दूसरे परशुराम का अवतार कहा गया। उसने एकछत्र शासन की स्थापना की। * तथा ‘ एकराट् ‘ की उपाधि ग्रहण की | * इसके द्वारा उन्मूलित राजवंशो के जो नाम मिलते हैं , वे हैं – इक्ष्वाकु , कलिंग , अश्मक , पांचाल , काशेय , हैहेय ,कुरु , मैथिल , शूरसेन , वीतिहोत्र | * मत्स्यपुराण के अनुसार , इक्ष्वाकु ने 24 वर्ष , कलिंग ने 32 वर्ष , अश्मक ने 25 वर्ष , पांचाल ने 27 वर्ष , काशी ने 24 वर्ष , हैहय ने 28 वर्ष , कुरु ने 36 वर्ष , मैथिल ने 28 वर्ष , शूरसेन ने 23 वर्ष , तथा वीतिहोत्र ने 20 वर्ष तक शासन किया। * खारवेल के हाथी गुम्फा  अभिलेख से उसके कलिंग विजय की सूचना प्राप्त होती है। * नंदवंश का अंतिम राजा धनानंद था जो सिकंदर का समकालीन था। यूनानी लेखकों ने उसे ‘ अग्रमीज ‘ ( अग्रसेन का पुत्र ) कहा है। * जेनोफोन ने इसे बहुत धनाढ्य व्यक्ति बताया है।

·       तमिल और सिंहली ग्रंथों से भी उसकी अतुल संपत्ति की सूचना मिलती है । * भद्यशाल उसका सेनापति था | * धनानंद द्वारा जनता से बलपूर्वक धन वसूलने तथा छोटी-छोटी वस्तुओं पर भारी कर लगाने के कारण जनता उसके विरुद्ध हो गई और चारों ओर घृणा एवं असंतोष का वातावरण व्याप्त हो गया।* इस स्थिति का लाभ उठाकर चंद्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य के सहयोग से धनानंद की हत्या कर नंद वंश का अंत किया। * व्याकरणाचार्य पाणिनी महापद्मानंद के मित्र थे। * वर्ष , उपवर्ष , वररूचि , कात्यायन जैसे विद्वानों का जन्म नंद काल में ही हुआ था। * नंद शासक जैन मत के पोषक थे। * कल्पक नामक व्यक्ति जैन था , इसकी सहायता से महापदमानंद ने क्षत्रियों का विनाश किया। * धनांनंद के जैन अमात्य शाकटाल तथा स्थूलभद्र थे। * मुद्राराक्षस से भी नंदो के जैन मतानुयायी होने की सूचना मिलती है।

 

पुराणों, के अनुसार, बिंबिसार से नंदो तक के राजाओं का शासनकाल

राजा का नाम

शासनकाल (वर्ष में)

शिशुनाग

40

काकवर्ण

26

क्षेमवर्धन

36

क्षेमजित् अथवा क्षत्रोजस

24

बिंबिसार

28

अजातशत्रु

27

दर्शक

24

उदायिन

33

नंदिवर्ध्दन

40

महानंदिन

43

महापद्म तथा उसके आठ पुत्र

100 (कुछ विद्वानों के अनुसार 40 वर्ष)

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  • भारत के प्राचीनतम प्राप्त सिक्के आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के थे, जो चांदी के बने होते थे। इनके ऊपर ठप्पा देकर निशान बनाए जाते थे इसीलिए इन्हें आहत सिक्के या पंचमार्क सिक्के कहा जाता है।
  • पाली धर्मग्रंथों से पता चलता है कि बुध्दकाल में प्रद्येत अवंति का राजा था। उदयन, वत्स महाजनपद का राजा था। प्रसेनजित कोसल का एवं अजातुशत्रु मगध का शासक था।
  • खारवेल हाथी गुम्फा अभिलेख से नंद राजा महापद्मनंद की कलिंग विजय सूची होती है। इसके अनुसार, नंद राजा जिनसेन की एक प्रतिमा उठा ले गया तथा उसने कलिंग में एक नहर निर्माण करवाया था।
  • मध्य प्रदेश के मालवा में स्थित उज्जैन को भारत के प्राचीन ऐतिहासिक नगरो में गिना जाता है। यह पोषश महाजनपदों में से एक अवंति की दो राजधानियों मे से एक थी। इसको अवंतिका भी कहा जाता था।
  • पाटलिपुत्र की स्थापना अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदयिन ने गंगा और सोन नदी के संगम पर एक किला बनाकर की थी। इसने मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित की। यह नगर शिशुनाग वंश, नंद वंश और मौर्य वंश की भी राजधानी रहा।
  • उदयन-वासवदत्ता की दंतकथा उज्जैन सें संबंधित है। इस कथा को महाकवि भास ने अपने नाटक स्वप्नवासवदत्तम में वर्णित किया है। इस नाटक में वत्स नरेश उदयन तथा अवंति नरेश प्रद्योत की पुत्री वासवदत्ता की प्रेम कथा का वर्णन है। ये कथा उस समय की है जब उदयन, उज्जयिनी के कारागार में कैद थे।
  • प्रथम मगध साम्राज्य का उत्कर्ष ई.पू. छठवी शताब्दी में हुआ था। इस साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिंबिसार (लगभग 544-492 ई.पू.) था। वह हर्यंक कुल से संबंध्द था।
  • ईसा पूर्व छठी शताब्दी के प्रारंभ में काशी भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली नगर राज्य था। कई जातकों में इसके समकालीन शहरों की अपेक्षा इसकी समृध्दि एवं संपन्नता का साक्ष्य मिलता है। की कोशल, अंग और मगध के साथ लंबी प्रतिद्वंध्तिता थी। इनमें सर्वोच्चता के लिए लंबा संघर्ष चला था।

 

  • बुध्दकाल में गंगाघाटी में कई गणराज्यों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं, जो इस प्रकार हैं –
  1. कपिलवस्तु के शाक्य
  2. सुमसुमारगिरि के भग्ग
  3. अलकप्प के बुलि
  4. केसपुत्त के कालाम
  5. रामगाम के कोलिय
  6. कुशीनारा के मल्ल
  7. पावा के मल्ल
  8. पिप्पलिवन के मोरिय
  9. वैशाली के लिच्छवि
  10. मिथिला के विदेह
  • वैशाली के लिच्छवियों ने विश्व का पहला गणतंत्र स्थापित किया था। वैशाली बुध्द काल का सबसे बड़ा तथा शक्तिशाली गणराज्य था। लिच्छवी वज्जि संघ में सर्वप्रमुख थे।
  • प्रथम मगध साम्राज्य का उत्कर्ष ई.पू. छठवीं शताब्दी मे हुआ था। इस साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक राजा बिंबिसार (लगभग 544-492 ई.पू.) था। वह हर्यंक कुल से संबंध्द था।
  • राजा चेतक, लिच्छवी गणराज्य के राजा थे, इनकी पुत्री चेलना का विवाह मगध नरेश बिंबिसार से हुआ था। लिच्छवी, वज्जि संघ के प्रधान वंशों में से एक था।
  • बौध्द अंगुत्तर निकाय में छठी शताब्दी ई.पू. के 16 महाजनपदों की सूचना मिलती है, जो इस प्रकार हैं – अंग, मगध, काशी, कोसल, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अस्मक, अवंति, गंधार, कम्बोज। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी 16 महाजनपदों का सूची मिलती है।
  • पाणिनि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर-पश्चिम भारत के गंधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है। अष्टाध्यायी मे आठ अध्याय तथा लगभग 4000 सूत्र है। पाणिनि ने अपने अष्टाध्यायी में 22 जनपदों का उल्लेख किया है। इनमें प्रमुख हैं – मगध अश्मक, कम्बोज, गंधार शूरसेन आदि। बौध्द ग्रंथ अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में 16 महाजनपदों की सूची मिलती है।
  • उत्तरी बिहार के वर्तमान भागलपुर तथा मुंगेर के जिले अंग महाजनपद के अंतर्गत थे। इसकी राजधानी चंपा थी। महाभारत और पुराणों में चंपा का प्राचीन नाम मालिनी प्राप्त होता है। दीर्घनिकाय के अनुसार, इस नगर निर्माण की योजना वास्तुकार महागोविंद ने की थी।
  • छठी शताब्दी ई.पू. मे आधुनिक बुंदेलखण्ड के पूर्वी तथा उसके समीपवर्ती भागों में चेदि महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी सोत्थिवती थी। जिसकी पहचान महाभारत के शुक्तिमती से की जाती थी।
  • बौध्द ग्रंथ अंगुत्तर निकाय तथा जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में छठी शताब्दी ई.पू. में वर्णित 16 महाजनपदों अस्मक या अश्मक नर्मदा तथा गोदावरी नदियों के मध्य स्थित था, जिसकी राजधानी पैठन या पोतन अथवा पोटलि (प्राचीन नाम प्रतिष्ठान) थी।
  • गिरिव्रज या राजगृह और पाटलिपुत्र प्राचीन काल में क्रमशः मगध साम्राज्य की राजधानी रहे थे, जबकि कौशाम्बी पर वत्स राज्य का शासन था। हर्यंक वंश के शासन के दौरान मगध की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र लाई गई थी।
  • प्राचीन श्रावस्ती की पहचान अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1861 ई. में उ.प्र. के गोंडा के निकट सहेत-महेत (वर्तमान श्रावस्ती) नामक स्थान से की थी। उत्खननों के आधार पर ज्ञात हुआ है कि प्राचीन श्रावस्ती का नगर विन्यास अर्धचन्द्राकार था।
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  • मगध का शासक अजातशत्रु (492-460 ई.पू.) अपने पिता हर्यंक वंश के संस्थापक बिंबिसार की हत्या कर राजगद्दी पर बैठा था। इसकी हत्या भी इसके पुत्र उदयिन (कौशांबी के वत्स राजा उदयन से भिन्न) ने कर दी थी।
  • पुराणों के अनुसार, मगध नरेश शिशुनाग ने अवंति नरेश प्रद्येत को पराजित कर अवंति (मालवा) को मगध साम्राज्य में मिला लिया।
  • मगध पर शिशुनाग वंश के पश्चात नंद वंश का वर्चस्व स्थापित हुआ। नंद वंश का संस्थापक महापद्मनंद अथवा उग्रसेन था। पुराणों में महापद्मनंद को सर्वक्षत्रांतक और अपरोपरशुराम कहा गया है।
  • कलिंग के चेदि वंश का सबसे प्रतापी शासक खारवेल था। इसके विषय में जानकारी का प्रमुख स्रोत इसका हाथीगुम्फा अभिलेख है। नंद वंशीय शासक महापद्मनंद द्वारा कलिंग में नहर खुदवाए जाने का उल्लेख इस अभिलेख मे किया गया है अर्थात् यह नहरों की जानकारी देने वाला प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है।
  • राजवंशों का क्रम –

हर्यंक वंश  – 544 ई.पू. से 412 ई.पू.

नंद वंश   – 344 ई.पू. से 323 ई.पू.

मौर्य वंश   – 323 ई.पू. से 184 ई.पू.

शुंग वंश   – 184 ई.पू. से 75 ई.पू.

  • गौतम बुध्द के समय का प्रसिध्द वैद्य जीवक बिंबिसार के दरबार से संबंधित था। बिंबिसार ने अपने राजवैद्य जीवक को अवंति नरेश चंड प्रद्योत के राज्य में चिकित्सा सेवा के लिए भेजा था।
  • काल्पी नगर उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित एक नगर (स्थान) है। यह यमुना नदी के तट पर स्थित है। प्राचीनकाल में यह कालप्रिया के नाम से विख्यात थी, समय के साथ नाम संक्षिप्त होकर काल्पी हो गया। चौथी सदी में राजा वसुदेव द्वारा बसाया गया था।

 

यूनानी आक्रमण

·      छठी शताब्दी ई. पू. के मध्य ईरान में कुरुष अथवा साइरस द्वितीय (558-529 ईपू ) नामक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने हखामनी साम्राज्य की स्थापना की |

·      बेहिस्तून , पर्सिपोलिस तथा नक्श – ए-रुस्तम अभिलेख दारा प्रथम (522-486 ई पू) के शासनकाल का है। इस अभिलेख से भारत-पारसिक संबंधों के विषय में महत्वपूर्ण सूचना प्राप्त होती है। दारा प्रथम के साम्राज्य के 23 प्रांतो का उल्लेख उसके बेहिस्तून अभिलेख में हुआ है।

·      हेरोडोटस के विवरण से ज्ञात होता है कि भारत दारा के साम्राज्य का 20वां प्रांत था। दारा को इस प्रांत से 360 टैलेण्ट स्वर्ण धूलि की आय प्राप्त होती थी। टेसियस , अर्तजरक्सीन का राजवैद्य था। पारसिक संपर्क के परिणामस्वरूप भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेशों में खरोष्ठी नामक नई लिपि का जन्म हुआ , जो ईरानी अरामेइक लिपि से उत्पन्न हुई थी। फारसी स्वर्ण मुद्रा ‘ डेरिक ‘ तथा रजत मुद्रा ‘ सिग्लोई ‘ कहलाती थी। ईरानी सिक्के सिग्लोई पश्चिमोत्तर प्रांतो में प्रचलित थे।

 

  • महापद्मनंद के उत्तराधिकारियों की संख्या पुराणों तथा बौद्ध ग्रंथों में 8 मिलती है। इस वंश का अंतिम शासक धनांनद था। जो सिकंदर का समकालीन था। उसे यूनानी लेखकों ने अग्रमीज कहा है। जेनोफोन उसे ‘ बहुत धनाड्य व्यक्ति ‘ बताता है। भद्दशाल उसका सेनापति था।
  • सिकंदर मैसीडोन का क्षत्रप फिलीप द्वितीय का पुत्र था। बचपन से उसकी इच्छा विश्व सम्राट बनने की थी। हखामनी साम्राज्य को ध्वस्त करने के पश्चात 327 ई पू के बसंत के अंत में एक विशाल सेना के साथ सिकंदर भारतीय विजय के लिए चला | लगभग दो वर्ष के अभियान के पश्चात 325 ई पू के सितंबर माह में सिकंदर ने पाटल से यूनान को प्रस्थान वापस किया। डॉ हेमचंद्र रायचौधरी ने 28 स्वतंत्र शक्तियों का उल्लेख किया है , जो उस समय पंजाब तथा सिंध के प्रदेशों में विद्यमान थी।
  • सिकंदर के आक्रमण के समय अश्वक एक सीमांत गणराज्य था। जिसकी राजधानी मस्सग थी। यूनानी लेखकों के अनुसार , सिकंदर के विरुद्ध हुए युद्ध में बड़ी संख्या में पुरुष सैनिकों के मारे जाने के पश्चात् यहां की स्त्रियों ने शस्त्र धारण किया। इसी विवरण से पता चलता है कि सिकंदर ने इस नगर की समस्त स्त्रियों को मौत के घाट उतार दिया था। पुरु ( पोरस ) का राज्य झेलम और चिनाब नदी के बीच बसा हुआ था।
  • सिकंदर ने झेलम के तट पर पुरू को पराजित किया। परंतु उसकी वीरता से प्रभावित होकर सिकंदर ने उसे अपना मित्र बना लिया तथा उसे अपना राज्य और कुछ अन्य इलाके प्रदान किए |सिकंदर ने दो नगरों ‘ निकैया ‘ और ‘ बडकेफला ‘ की स्थापना की |  व्यास नदी सिकंदर के उत्कर्ष का चरम बिंदु सिद्ध हुई |  
  • इसके सैनिकों द्वारा आगे बढ़ने से इंकार के पश्चात उसने स्वदेश लौटने का फैसला किया | 323 ई पू के लगभग सिकंदर की मृत्यु हो गई। सिंकदर के आक्रमण के परिणामस्वरूप पश्चिमोत्तर भारत में अनेक यूनानी उपनिवेश ( निकैया , बाउकेफला , सिकंदरिया ) स्थापित हो गए। व्यापारिक संपर्क के फलस्वरूप यूनानी मुद्राओं के अनुकरण पर भारत में ‘ उलूक ‘ शैली के सिक्के ढाले गए।

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  • नंद वंश का अंतिम शासक घनानंद था, जो सिकंदर का समकालीन था। उसे यूनानी लेखकों ने अग्रमीज कहा है। जेनोफोन उसे बहुत धनाढ्य व्यक्ति बताता है। भद्दशाल उसका सेनापति था।
  • हखामनी साम्राज्य को ध्वस्त करने के पश्चात 327 ई.पू. के बसंत के अंत में एक विशाल सेना के साथ सिकंदर भारतीय विजय के लिए चला। लगभग दो वर्ष के अभियान के पश्चात 325 ई.पू. के सितंबर माह में सिकंदर ने पाटल से यूनान को प्रस्थान वापस किया, किंतु वह चन्द्रगुप्त मौर्य से पराजित नही हुआ था।
  • सिकंदर के आक्रमण के समय अश्वक एक सीमांत गणराज्य था। जिसकी राजधानी मस्सग थी। यूनानी लेखकों के अनुसार सिकंदर के विरुध्द हुए युध्द में बड़ी संख्या में पुरुष सैनिकों के बारे मारे जाने के पश्चात यहां की स्त्रियों ने शस्त्र धारण किया था।
  • सिकंदर झेलम नदी के तट पर पुरु को पराजित किया, परंतु उसकी वीरता से प्रभावित होकर सिकंदर ने उस अपना मित्र बना लिया यथा उसे अपना राज्य और कुछ नए इलाके प्रदान किए।
  • डाइमेकस सिकंदर के साथ भारत नही आया था। स्ट्रैबो के अनुसार, सीरिया के राजा एंटियोकस ने डाइमेकस नामक अपना एक राजदूत बिंदुसार की राज्य सभा में भेजा था।

 

मौर्य साम्राज्य

  • मौर्य राजवंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी। वह भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट था। वह ऐसा पहला सम्राट था, जिसने वृहत्तर भारत पर अपना शासन स्थापित किया और जिसका विस्तार ब्रिटिश साम्राज्य से बड़ा था। * उसके साम्राज्य की सीमा ईरान से मिलती थी। उसने ही भारत को सर्वप्रथम राजनीतिक रूप से एकबद्ध किया।
  • विशाखदत्त कृत ‘ मुद्राराक्षस ‘ में चंद्रगुप्त को नंदराज का पुत्र माना गया है। मुद्राराक्षस में चंद्रगुप्त को ‘ वृषल ‘ तथा ‘ कुलहीन ‘ भी कहा गया है। धुंडिराज ने मुद्राराक्षस पर टीका लिखी थी। मुद्राराक्षस के अतिरिक्त विशाखदत्त के नाम से दो अन्य रचनाओं का भी उल्लेख प्राप्त होता है – (1) देवी चंद्रगुप्तम तथा (2) अभिसारिका वंचितक या अभिसारिका बंधितक ( अप्राप्य ) |
  • क्षेमेंद्र कृत ‘ बृहत्कथामंजरी ‘ तथा सोमदेव कृत ‘ कथासरित्सागर ‘ में चंद्रगुप्त के शुद्र उत्पत्ति के विषय में विवरण मिलता है। बौद्धग्रंथ का महाबोधिवंश के अनुसार , चंद्रगुप्त राजकुल से संबंधित था तथा वह मोरिय नगर में उत्पन्न हुआ था। हेमचंद्र के ‘ परिशिष्टपर्वन ‘ में चंद्रगुप्त को ‘ मयूर पोषकों के ग्राम के मुखिया के पुत्री का पुत्र ‘ बताया गया है।
  • विलियम जोंस पहले विद्वान थे , जिन्होने ‘ सैंड्रोकोट्स ‘ की पहचान मौर्य शासक चंद्रगुप्त मौर्य से की। * एरियन तथा प्लूटार्क ने चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रोकोट्स के रूप में वर्णित किया है। जस्टिन ने ‘ सैंड्रोकोट्स ‘ ( चंद्रगुप्त मौर्य ) और सिंकदर महान की भेंट का उल्लेख किया है।
  • ऋषि चानक ने अपने पुत्र का नाम चाणक्य रखा था। ‘ अर्थशास्त्र ‘ के लेखक के रूप में इसी पुस्तक में उल्लिखित ‘ कौटिल्य ‘ तथा एक पद्खंड में उल्लेखित ‘ विष्णुगुप्त ‘ नाम की साम्यता चाणक्य से की जाती है। अंशुल , अंशु , अंगुल , वात्सायन , कात्यायन आदि नाम भी इन्ही में से हैं। पुराणों में इसे ‘ द्विजर्षभ ‘ ( श्रेष्ठ ब्राह्मण ) कहा गया है। कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा मौर्य काल में रचित अर्थशास्त्र शासन के सिद्धांतों की पुस्तक है। * इसमें राज्य के सप्तांग सिद्धांत – राजा , अमात्य , जनपद , दुर्ग , कोष , दंड एवं मित्र की सर्वप्रथम व्याख्या मिलती है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र ऐतिहासिक ग्रंथ नही अपितु राजनीतिशास्त्र की अद्वितीय ग्रंथ है। इसकी तुलना ‘ मैक्यावेली ‘ के ‘ प्रिंस ‘ से की जाती है।
  • चंद्रगुप्त मौर्य ने दक्षिण भारत की विजय प्राप्त की थी। जैन एवं तमिल साक्ष्य भी चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण विजय की पुष्टि करते हैं।
  • राजनैतिक तौर पर समस्त भारत का एकीकरण चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में संभव हुआ। प्रारंभिक विजयों के फलस्वरूप चंद्रगुप्त का साम्राज्य व्यास नदी से लेकर सिंधु नदी तक के प्रदेशों पर हो गया। रूद्रदामन के अभिलेख से पश्चिमी भारत पर उसका अधिकार प्रमाणित होता है। जैन ग्रंथों के अनुसार , सौराष्ट्र के साथ-साथ अवंति पर भी चंद्रगुप्त मौर्य का अधिकार था। उसकी मृत्यु के समय उसके साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में हिंदुकुश पर्वत से पूरब मे बंगाल की खाड़ी तक तथा उत्तर में हिमालय की श्रृंखलाओं से दक्षिण में मैसूर तक था।
  • 150 ई के रूद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख में आनर्त और सौराष्ट्र ( गुजरात ) प्रदेश में चंद्रगुप्त मौर्य के प्रांतीय राज्यपाल ‘ पुष्यगत ‘ द्वारा सिंचाई के बांध के निर्माण का उल्लेख मिलता है। जिससे यह सिद्ध होता है कि पश्चिम भारत का यह भाग मौर्य साम्राज्य में शामिल था। चंद्रगुप्त मौर्य ने सिंकदर के साम्राज्य के पूर्वी भाग के शासक सेल्यूक्स की आक्रमणकारी सेना को 305 ई. पू. में परास्त किया था।
  • यूनानी लेखक ने बिंदुसार को अमित्रचेट कहा है ,  विद्वानों के अनुसार अमित्रचेट का संस्कृत रूप है अमित्रघात या अमित्रखाद ( शत्रु का नाश करने वाला ) | जैन ग्रंथों में उसे  ‘ सिंहसेन ‘ कहते हैं | जैन ग्रंथ में बिंदुसार की माता का नाम ‘ दुर्धरा ‘  मिलता है | दिव्यावदान के अनुसार , बिंदुसार के समय में तक्षशिला में विद्रोह हुआ था जिसको दबाने के लिए उसने अपने पुत्र अशोक को भेजा था |
  • स्ट्रैबो के अनुसार , बिंदुसार के समय में मिस्र के राजा एंटीओकस ने डाइमेक्स नामक राजदूत भेजा | प्लिनी के अनुसार मौर्य राजदरबार में मिस्र के राजा टालमी द्वितीय फिलाडेल्फ्स ने डायनोसिस नामक राजदूत भेजा | बिंदुसार ने सीरिया के शासक एंटियोकस से 3 वस्तुओं की मांग की थी | ये वस्तुएं थी – मीठी मदिरा , सूखी अंजीर तथा दार्शनिक |
  • एंटियोकस ने दार्शनिक को छोड़कर शेष सभी वस्तुएं बिंदुसार के पास भेजवा दी। बौद्ध साक्ष्यों के अनुसार , अशोक अपने पिता के शासनकाल में अवंति ( उज्जयिनी) का उपराजा ( वाइसराय ) था। असम और सुदूर दक्षिण को छोड़कर संपूर्ण भारतवर्ष अशोक के साम्राज्य के अंतर्गत था। अशोक ने अपनी प्रजा के विशाल समूह को ध्यान में रखकर एक ऐसे व्यवहारिक धम्म की प्रतिपादन किया, जिसका पालन आसानी से सब कर सके।* सहिष्णुता , उदारता एवं करुणा उनके त्रिविध आयाम थे। अशोक 269 ई पू के लगभग मगध के राजसिंघाहसन पर बैठा। उसके अभिलेखों में सर्वत्र उसे ‘ देवनामप्रिय ‘ , ‘ देवानां प्रियदसि ‘ कहा गया है जिसका अर्थ है – देवताओं का प्रिय या देखने में सुंदर | पुराणों में उसे ‘ अशोकवर्द्धन ‘ कहा गया है। दशरथ भी अशोक की तरह ‘ देवानामप्रिय ‘ की उपाधि धारण करता था।

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  • सिंहली अनुश्रुतियों – दीपवंश तथा महावंश के अनुसार , अशोक के राज्यकाल में ‘ पाटलिपुत्र ‘ में बौद्ध धर्म की तृतीय संगीति हुई। इसकी अध्यक्षता ‘ मोग्गलिपुत्त तिस्स ‘ नामक प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु ने की थी।
  • दीपवंश एवं महावंश के अनुसार , अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष ‘ निग्रोध ‘ नामक भिक्षु ने बौद्ध मत में दीक्षित किया। तत्पश्चात मोग्गलिपुत्र तिस्स के प्रभाव में आकर वह पूर्ण रूपेण बौद्ध हो गया। * दिव्यावदान के अनुसार , अशोक को उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने बौद्ध धर्म में दीक्षित किया। मौर्य शासकों अशोक और उसका पौत्र दशरथ बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।
  • अशोक के अभिलेखों में ‘ रज्जुक ‘ नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है |  रज्जुकों की स्थिति आधुनिक जिलाधिकारी जैसी थी , जिसे राजस्व तथा न्याय दोनों क्षेत्रों में अधिकार प्राप्त थे |  अग्रोनोमोई जिले के अधिकारी को कहा जाता था | मौर्य काल में व्यापारिक काफिलों ( कारवां ) को सार्थवाह की संज्ञा दी गई थी |  बौद्ध धर्म ग्रहण करने के उपरांत अशोक ने आखेट तथा विहार यात्रा रोक दी और उनके स्थान पर धर्म यात्राएं प्रारंभ की |
  • सर्वप्रथम उसने बोधगया की यात्रा की थी | उसकी यात्राओं का क्रम इस प्रकार है – गया , कुशीनगर , लुंबिनी , कपिलवस्तु , सारनाथ तथा श्रावस्ती | अशोक ने अपने राज्याभिषेक के दसवें वर्ष बोधगया की यात्रा की | 20वें वर्ष लुंबिनी की यात्रा की तथा वहां एक शिलास्तंभ स्थापित किया | बुद्ध की जन्म भूमि होने के कारण लुंबिनी ग्राम का धार्मिक कर माफ कर दिया गया तथा भू राजस्व 1/ 6 से घटाकर 1 / 8 कर दिया गया |
  • कालसी, गिरनार और मेरठ के अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है | अशोक का इतिहास हमें मुख्यतः अभिलेखों से की ज्ञात होता है। उसके अभिलेखों का विभाजन 3 वर्ग में किया जा सकता है –
  1. शिलालेख
  2. स्तंभलेख
  3. गुहालेख |
  • शिलालेख 14 विभिन्न लेखों का एक समूह है जो 8 भिन्न-भिन्न स्थानों से प्राप्त किए गए हैं , ये स्थान हैं –
  1. शाहबाजगढ़ी
  2. मानसेहरा
  3. कालसी
  4. गिरनार
  5. धौली
  6. जौगड़
  7. एर्रागुडी
  8. सोपारा |
  • अशोक के अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं केवल दो अभिलेख – शाहबाजगढ़ी , मानसेहरा की लिपि ब्राह्मी  ना होकर खरोष्ठी है | तक्षशिला से आरमेइक लिपि में लिखा गया एक भग्न अभिलेख , शरेकुना नामक स्थान से यूनानी तथा आरमेइक लिपियों में लिखा गया द्विभाषीय यूनानी एवं सीरियाई भाषा अभिलेख तथा लंघमान नामक स्थान से आरमेइक लिपि में लिखा गया अशोक की अभिलेख प्राप्त हुआ है।  
  • ब्राह्मी लिपि का प्रथम उद्धवाचन पत्थर की पट्टियों ( शिलालेखों ) पर उत्कीर्ण अक्षरों से किया गया था। इस कार्य को संपादित करने वाले प्रथम विद्वान सर जेम्स प्रिंसेप थे जिन्होने अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का श्रेय हासिल किया | डीआर भंडारकर ने मात्र अभिलेखों के आधार पर अशोक का इतिहास लिखने का प्रयास किया है | प्राक् अशोक ब्राह्मी लिपि का पता श्रीलंका स्थित अनुराधापुर से चला। कुछ और स्थानों के अभिलेखों से इस प्रकार की लिपि का साक्ष्य मिला है जिसके नाम इस प्रकार है – पिपरहवां , सोहगौरा और महास्थान | प्राचीन भारत में खरोष्ठी लिपि दाएं से बाएं लिखी जाती थी। इसे पढ़ने का श्रेय मैसन , प्रिंसेप , नोरिस , लैसेन , कनिंधम , आदि विद्वानों को है। यह मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत की लिपि थी | अशोक का नामोल्लेख करने वाला गुर्जरा लघु शिलालेख मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित है | मस्की , नेत्तूर एंव उड़ेगोलम के लेखों में भी अशोक का व्यक्तिगत नाम मिलता है।

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  • भाब्रू ( बैराट ) स्तंभ लेख में अशोक ने स्वमं को मगध का सम्राट बताया है। (पियदसि लाजा मागधं संघं अभिवादेतूनं आहा अपाबा धतं च……)। यही अभिलेख अशोक को बौध्द धर्मावलंबी प्रमाणित करता है। अशोक के प्रथम शिलालेख में पशुबलि के निषेध के बारे में लेख इस प्रकार है – ” यहां कोई जीव मारकर बलि न दिया जाए और न कोई उत्सव किया जाए। पहले प्रियदर्शी राजा की पाकशाला में प्रतिदिन सैकड़ो जीव मांस के लिए मारे जाते थे, लेकिन अब इस अभिलेख के लिखे जाने तक सिर्फ तीन पशु प्रतिदिन मारे जाते थे – दो मोर एवं एक मृग, इसमें भी मृग हमेशा नही मारा जाता। ये तीनों भी भविष्य में नही मारे जाएंगे। * पांचवे स्तंभ लेख में भी अशोक द्वारा राज्याभिषेक के 26वें वर्ष बाद विभिन्न प्रकार के प्राणियों को वध को वर्जित करने का स्पष्ट उल्लेख है।
  • अशोक के राज्यकाल की पहली बड़ी घटना कलिंग युद्ध और इसमें अशोक की विजय थी। * अशोक के तेरहवें (XIII) शिलालेख से इस युद्ध के संदर्भ में स्पष्ट साक्ष्य मिलते हैं। * यह घटना अशोक के शासनकाल के आठवें वर्ष अर्थात् 261 ई पू में घटित हुई। इस शिलालेख में उसने कलिंग युद्ध से हुई पीड़ा पर अपना दुःख और पश्चाताप व्यक्त किया है।
  • अशोक के दीर्घ शिलालेख XII में सभी संप्रदायों के सार की वृद्धि होने की कामना की गई है तथा धार्मिक सहिष्णुता हेतु पालनीय उपाय बताए गए हैं। अशोक के दूसरे (II) एवं तेरहवें (XIII) शिलालेख में संगम राज्यों – चोल , पांड्या , सतियपुत्त एवं केरलपुत्त सहित ताम्रपर्णी ( श्रीलंका ) की सूचना मिलती है। मौर्य शासक अशोक के तेरहवें शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि अशोक के पांच यवन राजाओं के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध थे- जिनमें अंतियोक ( एंटियोकस II थियोस – सीरिया का शासक ) , तुरमय या तुरमाय ( टालेमी II फिलाडेल्फ्स – मिस्र का राजा ) , अंतकिनी या एनिकीनी ( एंटीगोन्स गोनातास – मेसीडोनिया या मकदूनिया का राजा ) , मग , मकमास या मेगारस ( साइरीन का शासक ) , अलिक सुंदर या एलिरू संट्रो ( एलेक्जेंडर-एपाइरस – एपीरस का राजा) |
  • गोरखपुर जिले से प्राप्त सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेख और बोगरा जिले ( बांग्लादेश ) से प्राप्त महास्थान अभिलेख की रचना अशोक कालीन प्राकृत भाषा में हुई और उन्हें ईसा पूर्व तीसरी सदी की ब्राह्मी लिपि में लिखा गया। ये अभिलेख अकाल के समय किए जाने वाले राहत कार्यों के संबंध में हैं। इस अकाल की पुष्टि जैन स्रोतों से होती है।
  • मौर्य काल में न्यायालय मुख्यतः दो प्रकार के थे – धर्मस्थनीय तथा कंटकशोधन | धर्मस्थनीय ‘दीवानी ‘ तथा केंटकशोधन ‘ फौजदारी न्यायलय थे।गुप्तचरों को अर्थशास्त्र में ‘ गूढ़ पुरुष ‘ कहा गया है। अर्थशास्त्र में दो प्रकार के गुप्तचरों का उल्लेख मिलता है – ‘संस्था ‘ अर्थात् एक ही स्थान पर रहने वाले तथा ‘ संचरा ‘ अर्थात् प्रत्येक स्थान पर भ्रमण करने वाले |
  • मेगास्थनीज की ‘ इंडिका ‘ में पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन का वर्णन मिलता है | इसके अनुसार पाटलिपुत्र नगर का प्रशासन 30 सदस्यों की विभिन्न समितियों द्वारा होता था। इसकी कुल 6 समितियां होती थी तथा प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे। तीसरी समिति जनगणना का हिसाब रखती थी | वर्तमान में भी यह कार्य नगरपालिका प्रशासन द्वारा किया जाता है | छठी समिति का कार्य बिक्री कर वसूल करना था। विक्रय कर मूल्य का दसवें भाग के रूप में वसूला जाता था। करों की चोरी करने वालो को मृत्युदंड दिया जाता था। वह नगर के पदाधिकारियों को एस्टिनोमोई कहता है।
  • मेगस्थनीज सेल्यूक्स निकेटर द्वारा चंद्रगुप्त मौर्य की राजसभा में भेजा गया यूनानी राजदूत था। * मौर्य युग में नगरों का प्रशासन नगरपालिकाओं द्वारा चलाया जाता था , जिसका प्रमुख ‘ नागरक ‘ या ‘पुरमुख्य ‘ था। * मेगास्थनीज ने तत्कालीन भारतीय समाज को सात श्रेणियों में विभाजित किया | जो इस प्रकार है –

1.    दार्शनिक

2.    कृषक

3.    पशुपालक

4.    कारीगर

5.    योद्धा

6.    निरीक्षक

7.    मंत्री |

·      मेगास्थनीज भारतीय समाज में दास प्रथा के प्रचलित होने का उल्लेख नहीं करता है। उसके अनुसार , मौर्य काल में कोई व्यक्ति न तो अपनी जाति से बाहर विवाह कर सकता था और न ही उससे भिन्न पेशा अपना सकता था।

  • इतिहासकार स्मिथ के अनुसार, हिंदुकुश पर्वत भारत की वैज्ञानिक सीमा थी। अशोक के अभिलेखों में मौर्य साम्राज्य के 5 प्रांतों के नाम मिलते हैं –

प्रांत

राजधानी

उत्तरापथ

तक्षशिला

अवंतिरट्ठ

उज्जयिनी

कलिंग

तोसली

दक्षिणापथ

सुवर्णगिरी

प्राच्य या पूर्वी प्रदेश

पाटलिपुत्र

 

  • भाग एवं बलि प्राचीन भारत में राजस्व के स्रोत थे | अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि राजा भूमि का मालिक होता था, वह भूमि से उत्पन्न उत्पादन के एक भाग का अधिकारी था | इस कर को ‘ भाग ‘ कहते थे | इसी प्रकार ‘ बलि ‘ भी राजस्व का स्त्रोत था।
  • मौर्य मंत्रिपरिषद में राजस्व एकत्रित करने का काम समाहर्ता के द्वारा किया जाता था | अंतपाल सीमारक्षक या सीमावर्ती दुर्गों की देखभाल करता था जबकि प्रदेष्टा विषयों या कमिश्नरियों का प्रशासक था।
  • उपर्युक्त पदाधिकारियों के अतिरिक्त अन्य पदाधिकारी हैं –
  • पण्याध्यक्ष (वाणिज्य का अध्यक्ष)
  • सुराध्यक्ष , सूनाध्यक्ष (बूचड़खाने का अध्यक्ष)
  • गणिकाध्यक्ष (वेश्याओं का निरीक्षक)
  • सीताध्यक्ष (राजकीय कृषि विभाग का अध्यक्ष)
  • अकाराध्यक्ष (खानों का अध्यक्ष)
  • लक्षणाध्यक्ष (छापे खाने का अध्यक्ष)
  • लोहाध्यक्ष (धातु विभाग का अध्यक्ष)
  • नवाध्यक्ष (जहाजरानी का अध्यक्ष)
  • पतनाध्यक्ष (बंदरगाहों का अध्यक्ष)
  • गांवों के शासन को स्वायत्तशासी पंचायतों के माध्यम से संचालित करने की व्यवस्था का सूत्रपात मौर्यों ने किया | इस काल में ग्राम सभा गाँव से संबंधित किसी भी मुद्दे पर निर्णय देने के लिए स्वतंत्र थी।

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  • अर्थशास्त्र में पति द्वारा परित्यक्त पत्नी के लिए विवाह विच्छेद की अनुमति दी गई है। मौर्यकालीन समाज में तलाक की प्रथा थी | पति के बहुत समय तक विदेश में रहने या उसके शरीर में दोष होने पर पत्नी उसका त्याग कर सकती है। इसी प्रकार पत्नी के व्यभिचारिणी होने या बन्ध्या होने पर पति उसका त्याग कर सकने का अधिकारी था।
  • मनुस्मृति के 38वें खंड में स्पष्ट उल्लेख है कि वह व्यक्ति जिसकी पत्नी मर गई हो वह पुनर्विवाह कर सकता है लेकिन विधवा (जिस स्त्री का पति मर गया हो अर्थात् Widow) को पुनर्विवाह की अनुमति नही है। विदेशियों को भारतीय समाज में मनु द्वारा व्रात्य क्षत्रिय ( fallen kshatriyas ) का सामाजिक स्तर दिया गया था। सारनाथ स्तंभ का निर्माण अशोक ने कराया था। इस स्तंभ के शीर्ष में सिंह की आकृति बनी है , जो शक्ति का प्रतीक है | इस प्रतिकृति को भारत सरकार ने अपने प्रतीक चिह्न के रूप में लिया है। * मौर्ययुगीन सभी स्तंभ चुनार के बलुए पत्थरों से निर्मित है।
  • स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से सांची के स्तूप को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सांची मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है | इसका निर्माण अशोक ने कराया था। * इस स्तूप का आरंभिक काल तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व था | जबकि भरहुत का स्तूप म.प्र. के सतना जिले में स्थित है जिसकी तिथि दूसरी शताब्दी ई.पू. के लगभग है। सांची तथा भरहुत क स्तूपों की खोज एल्जेंडर कनिंघम ने की थी। अमरावाती का स्तूप आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के दाहिने तट पर स्थित है, कर्नल कॉलिन मैकेंजी ने 1797 ई. में इस स्तूप का पता लगाया था। सारनाथ का धमेख स्तूप गुप्तकालीन है, जो बिना आधार के समतल भूमि पर बनाया गया है।
  • बिहार में पटना (पाटलिपुत्र) के समीप बुलंदीबाग एवं कुम्रहार में की गई खुदाई से मौर्य काल के लकड़ी के विशाल भवनों के अवशेष प्रकाश में आए है | * इन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है। * बुलंदीबाग से नगर के परकोटे के अवशेष तथा कुम्रहार से राजप्रासाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं। बुलंदीबाग, पाटलिपुत्र का प्राचीन स्थान था।* जिस महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने 184 ई. पू. में अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या करके शुंग राजवंश की स्थापना की वह इतिहास में पुष्यमित्र शुंग के नाम से विख्यात है। * शुंग वंश का अंतिम राजा देवभूति अत्यंत विलासी था , वह अपने अमात्य वासुदेव के षडयंत्रो द्वारा मारा गया | * वायु पुराण के अनुसार , अंतिम कण्व शासक सुशर्मा अपने आंध्र जातीय भृत्य सिमुक ( सिंधुक ) द्वारा मार डाला गया।
  • ई. पू. की कुछ शताब्दियों में चंद्रगुप्त मौर्य एवं अशोक ने गिरनार क्षेत्र में जल संसाधन व्यवस्था की ओर ध्यान दिया। उस क्षेत्र में चंद्रगुप्त मौर्य ने सुदर्शन झील खुदवाई तथा अशोक ने ईपू तीसरी शताब्दी में इससे नहरें निकाली | * शक क्षत्रप रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में इन दोनों के कार्यों का वर्णन है। * जूनागढ़ के शासक रूद्रदामन ने इस झील की मरम्मत कराई थी |

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  • चन्द्रगुप्त मौर्य की गणना भारत के महान शासकों में होती है। वह भारत का प्रथम ऐतिहासिक सम्राट था। वह ऐसा पहला सम्राट था, जिसने वृहत्तर भारत पर अपना शासन स्थापित किया और जिसका विस्तार ब्रिटिश साम्राज्य से बड़ा था। उसके साम्राज्य की सीमा ईरान से मिलती थी। उसने ही भारत को सर्वप्रथम राजनीतिक रुप से एकबध्द किया।
  • मौर्य राजवंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी। इसके बाद कुषाण वंश, गुप्त राजवंश (319-550 ई.) और वर्धन राजवंश ने प्राचीन भारत पर शासन किया।
  • विशाखादत्त कृत मुद्राराक्षस से चन्द्रगुप्त मौर्य के विषय में विस्तृत सूचना प्राप्त होती है। इस ग्रंथ में चन्द्रगुप्त को नंदराज का पुत्र माना गया है। मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त को वृषल तथा कुलहीन भी कहा गया है।
  • विलियम जोंस पहले विद्वान थे, जिन्होंने सैंड्रोकोट्स की पहचान मौर्य शासक चन्द्रगुप्त मौर्य से की। एरियन तथा प्लूटार्क ने चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रोकोट्स के रुप में वर्णित किया है, जबकि जस्टिन ने सैंड्रोकोट्स (चंद्रगुप्त मौर्य) और सिकंदर महान की भेंट का उल्लेख किया है।
  • कौटिल्य इतिहास में विष्णुगुप्त तथा चाणक्य इन दो नामों से भी विख्यात थे। जब मौर्य भारत का एकछत्र सम्राट बना तो कौटिल्य प्रधानमंत्री, महामंत्री तथा प्रधान पुरोहित के पद पर आसीन हुए। उन्होंने राजनीति शास्त्र पर अर्थशास्त्र नामक प्रसिध्द ग्रंथ की रचना की थी। यह भारत में राजशासन के ऊपर उपलब्ध प्राचीनतम रचना है।
  • ऋषि चानक ने अपने पुत्र का नाम चाणक्य रखा था। अर्थशास्त्र के लेखक के रुप में इसी पुस्तक में उल्लिखित कौटिल्य तथा एक पद्यखंड मे उल्लिखित विष्णुगुप्त नाम की चाणक्य से की जाती है। चाणक्य के अन्य अनेक नाम भी प्रचलित हैं। अंशुल, अंशु, अंकुल, वात्सायन, कात्यायन आदि नाम इन्ही में से हैं। पुराणों में उसे द्वीजर्षभ (श्रेष्ठ ब्राह्मण) कहा गया है।
  • सुह्रद (मित्र) राज्य के सप्तांग सिध्दांत के अनुसार, राज्य का सातवां अंग है। सुह्रद (मित्र) राज्य के कान हैं। राजा के मित्र शांति एवं युध्दकाल दोनों में ही उसकी सहायता करते हैं। इस संबंध में कौटिल्य सहज (आदर्श) तथा कृत्रिम मित्र में भेद करते हैं। सहज मित्र, कृत्रिम मित्र से अधिक श्रेष्ठ होता है। जिस राजा के मित्र लोभी, कामी तथा कायर होते हैं, उसका विनाश अवश्यंभावी है।
  • कौटिल्य क अर्थशास्त्र द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल की बहुत-सी बातों का ज्ञान प्राप्त होता है। यह वस्तुतः ऐतिहासिक ग्रंथ नही है अपितु राजनीति शास्त्र का एक अद्वीतीय ग्रंथ है। इसमें मुख्यतः राजनीतिक नीतियों पर प्रकाश डाला गया है।
  • बिहार में पटना (पाटलिपुत्र) के समीप बुलंदीबाग एवं कुम्रहार मे की गई खुदाई से मौर्य काल के लकड़ी के विशाल भवनों के अवशेष प्रकाश में आए हैं। उन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय स्पूनर महोदय को है। बुलंदीबाग से नगर के परकोटे के अवशेष तथा कुम्रहार के राजप्रसाद के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • 150 ई. के रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख में आनर्त और सौराष्ट्र (गुजरात) प्रदेश में चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रांतीय राज्यपाल पुष्यगुप्त द्वारा सिंचाई के बांध के निर्माण का उल्लेख मिलता है, जिससे यह सिध्द होता है कि पश्चिम भारत का यह मौर्य साम्राज्य मे शामिल था।
  • मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य ने सिकंदर के साम्राज्य के पूर्वी भाग के शासक सेल्यूकस की आक्रमणकारी सेना को 305 ई.पू. में परास्त किया था।
  • अशोक ने अपनी प्रजा के विशाल समूह को ध्यान में रखकर ही एक ऐसे व्यावहारिक धम्म का प्रतिपादन किया, जिसका पालन आसानी से सब कर सके। अशोक का धम्म सदाचार का धर्म था, ये एक ऐसे नैतिक नियम थे, जिनका संप्रदाय विशेष से कोई संबंध नही था और  जो मानवता के कल्याण के लिए घोषित किए गए थे। सहिष्णुता, उदारता एवं करुणा उसके त्रिविध आयाम थे।
  • श्रीलंका अशोक के साम्राज्य में स्थित नही था। अशोक के द्वीतीय शिलालेख से स्पष्ट होता है कि भारत मे अशोक का अधिकार चोल पाण्ड्य, सत्तियपुत्त, केरलपुत्त एवं ताम्रपर्णी (श्रीलंका) को छोड़कर सर्वत्र था, क्योंकि इन राज्यों प्रत्यंत या सीमावर्ती राज्य कहा गया है।
  • अशोक के अभिलेखों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है – 1. शिलालेख स्तंभ लेख एवं 3. गुहालेख। अशोक के द्वीतीय वृहद् शिलालेख मे चोल, पाण्ड्य, सतियपुत्त, केरलपुत्त आदि दक्षिण भारतीय राज्यों का उल्लेख मिलता है।
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  • अशोक 269 ई.पू. के लगभग मगध के राजसिंहासन पर बैठा। उसके अभिलेखों में सर्वत्र उसे देवनामप्रिय देवानां प्रियदसि कहा गया है। जिसका अर्थ है – देवताओं का प्रिय या देखने में सुंदर। इससे उसकी हिंदू धर्म मे आस्था के संकेत मिलते हैं।
  • सिंहली अनुश्रुतियों- दीपवंश तथा महावंश के अनुसार, अशोक के राज्यकाल में पाटलिपुत्र, में बौध्द धर्म की तृतीय संगीति हुई। इसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स नामक प्रसिध्द बौध्द भिक्षु ने की थी।
  • मौर्य शासकों अशोक और उसका पौत्र दशरथ बौध्द धर्म के अनुयायी थे। दशरथ भी अशोक की तरह देवानांपिय की उपाधि धारण करता था।
  • अशोक के अभिलेखों में रज्जुक नामक अधिकारी का उल्लेख मिलता है। अपने चौथे स्तंभ लेख में अशोक रज्जुकों में पूर्ण विश्वास प्रकट करते हुए कहता है – जिस प्रकार माता-पिता योग्य धात्री के हाथों में बच्चे को सौंप कर आश्वस्त हो जाते हैं, उसी प्रकार मैंने ग्रामीण जनता के सुख के लिए रज्जुकों की नियुक्ति की  है। रज्जुकों की स्थिति आधुनिक जिलाधिकारी जैसी थी, जिसे राजस्व तथा न्याय दोनों क्षेत्रों में अधिकार प्राप्त थे।
  • मौर्यकाल में व्यापारिक काफिलों (कारवां) को सार्थवाह की संज्ञा दी गई थी। इसका उल्लेख कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र से भी प्राप्त होता है।
  • अशोक के लेखों में उसके प्रशासन के कुछ महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं। अशोक के तृतीय शिलालेख में तीन पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं। ये तीनों पदाधिकारी हैं –
  1. युक्त – ये जिले के अधिकारी होते थे, जो राजस्व वसूल करते थे।
  2. राजुक – ये भूमि का पैमाइश करने वाला अधिकारी था। ये आज-कल के बंदोबस्त अधिकारी की भांति होते थे।
  3. प्रादेशिक – यह मंडल का प्रदान अधिकारी था। यह वर्तमान में संभागीय आयुक्त की तरह था इस न्याय का भी कार्य करना पड़ता था।
  • ब्राह्मी लिपि का प्रथम उद्वाचन पत्थर की पट्टियों (शिलालेखों) पर उत्कीर्ण अक्षरों से किया गया था। इस कार्य को संपादित करने वाले प्रथम विद्वान सर जेम्स प्रिसेंप थे जिन्होंने अशोक के अभिलेखों को पढ़ने का श्रेय हासिल किया।
  • प्राचीन भारत में खरोष्ठी लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। इसे पढ़ने का श्रेय मैसन, प्रिंसेप, नोरिस, लैसेन, कनिंघम आदि विद्वानों को है। यह मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत की लिपि थी।
  • अशोक के प्रस्तर स्तंभ स्थापत्य संरचना के भाग नही हैं बल्कि ये पृथक रचनाएँ हैं।
  • अशोक का इतिहास हमें मुख्यतः उसके अभिलेखों से ही ज्ञात होता है। उसके अभी तक 40 से अधिक अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं। मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर एवं उडेगोलम के लेखों मे अशोक का व्यक्तिगत नाम भी मिलता है।
  • अशोक ने अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष लुंबिनी की यात्रा की तथा वहां एक शिलास्तंभ स्थापित किया। बुध्द की जन्मभूमि होने के कारण लुंबिनी ग्राम का धार्मिक कर माफ कर दिया तथा भू-राजस्व 1/6 से घटाकर 1/8 कर दिया।
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  • अशोक के दूसरे (II) एवं तेरहवें (XIII) शिलालेख मे सगम राज्यों-चोल, पाण्डय, सतियपुत्त एवं केरलपुत्त सहित ताम्रपर्णी (श्रीलंका) की सूचना मिलती है।
  • अशोक के प्रथम शिलालेख में पशु बलि निषेध के संदर्भ में लेख इस प्रकार हैं – यहां कोई जीव मारकर बलि न दिया जाए और न कोई उत्सव किया जाए। पहले प्रियदर्शी राजा की पाकशाला में प्रतिदिन सैंकड़ों जीव मांस के लिए मारे जाते थे, लेकिन अब इश अभिलेख के लिखे जाने तक सिर्फ तीन पशु प्रतिदिन मारे जाते हैं – दो मोर एवं एक मृग, इसमें भी मृग स्तंभ लेख में  भी अशोक द्वारा राज्याभिषेक के 26वें वर्ष बाद विभिन्न प्रकार के प्राणियों के वध को वर्जित करने का स्पष्ट उल्लेख है।
  • गोरखपुर जिले से प्राप्त सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेख और बोगरा जिले (बांग्लादेश) से प्राप्त महास्थान अभिलेख की रचा अशोक कालीन प्राकृत भाषा में हुई और उन्हें ईसा पूर्व तीसरी सदी की ब्राह्मी लिपि मे लिखा गया। ये अभिलेख अकाल के समय किए जाने वाले राहत कार्यों के संबंध मे हैं। इस अकाल की पुष्टि जैन स्रोतों से होती है।
  • अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष कलिंग पर विजय प्राप्त कर उसे मौर्य साम्राज्य में शामिल कर लिया था। दक्षिण के साथ सीधे संपर्क के लिए समुद्री तथा स्थल मार्ग पर मौर्य का नियंत्रण आवश्यक था। यदि कलिंग स्वतंत्र देश रहता, तो समुद्री और स्थल मार्ग से होने वाले व्यापार में रुकावट पड़ सकती थी, अतः कलिग को मगध साम्राज्य में मिलाना आवश्यकत था।
  • धार्मिक आधार पर भूमिदान का प्रथम साक्ष्य मौर्योत्तर युगीन राजवंश सातवाहन के समय के एक अभिलेख से प्राप्त होता है। मौर्यकालीन शासकों ने धार्मिक आधार पर कोई भूमि दानस्वरुप नही दी थी। भूमिदान के विरुध्द कृषकों के विद्रोह का कोई वर्णन नही प्राप्त होता है।
  • भाग एवं बलि प्राचीन भारत में राजस्व के स्रोत थे। अर्थशास्त्र से ज्ञात होता है कि राजा भूमि का मालिक होता था, वह भूमि से उत्पन्न उत्पादन के एक भाग का अधिकारी था। इस कर को भाग कहते थे। इसी प्रकार बलि भी राजस्व का स्रोत था।
  • मौर्य काल में सीताध्यक्ष कृषि भूमि का अध्यक्ष था, वही भूमि कर वसूलने का कार्य करता था, जबकि अग्रोनोमोई जिले के अधिकारियों को कहा जाता था, शुल्काध्यक्ष विभिन्न प्रकार के व्यवसाय एवं व्यापार कर वसूलता था तथा अक्राध्यक्ष खानों का नियंत्रण करता था।
  • मौर्य मंत्रिपरिषद में राजस्व एकत्र करने का कार्य समाहर्ता के द्वारा किया जाता था। अंतपाल सीमा रक्षक या सीमावर्ती दुर्गों की देखभाल करता था, जबकि प्रदेष्टा विषयों या कमिश्नरियों का प्रशासक था।
  • मौर्ययुगीन अधिकारी पौतवाध्यक्ष तौल-मान का प्रभारी था। पण्याध्यक्ष वाणिज्य विभाग तथा सूनाध्यक्ष बूचड़खाने के प्रभारी थे।
  • पंकोदकसन्निरोधे मौर्य प्रशासन में सड़क पर जल और कीचड़ इकठ्ठा करने या कीचड़ फेंकने के कारण लिया जाने वाला जुर्माना था।
  • भारत में सांस्कृतिक इतिहास मे संदर्भ में इतिवृत्तों इतिहासों तथा वीरगाथाओं को कंठस्थ करने का व्यवसाय मगध एवं सूत वर्गों का था।
  • गांवो के शासन को स्वायत्तशासी पंचायतों के माध्यम से संचालित करने की व्यवस्था का सूत्रपात मौर्यों ने किया। यह व्यवस्था उस समय गांवों के प्रशासन का आधार की। मौर्य काल में ग्राम सभा, गांव से संबंधित किसी भी मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र थी।
  • अर्थशास्त्र में पति द्वारा परित्यक्त पत्नी के लिए विवाह विच्छेद की अनुमति दी गई है। मौर्यकालीन समाज में तलाक की प्रथा थी। पति के बहुत समय तक विदेश में रहने या उसके शरीर में दोष होने पर पत्नी उसका त्याग कर सकती थी। इसी प्रकार पत्नी के व्यभिचारिणी होने या बन्ध्या होने जैसी दशाओँ में पति उसका त्याग कर सकने का अधिकारी था।
  • मनुस्मृति के 38वें खंड मे स्पष्ट उल्लेख है कि वह व्यक्ति, जिसकी पत्नी मर गई हो (विधुर) पुनर्विवाह कर सकता है लेकिन विधवा (जिस स्त्री का पति मर गया हो अर्थात् विडो) को पुनर्विवाह की अनुमति नही है।
  • विदेशियों को भारतीय समाज में मनु द्वारा व्रात्य क्षत्रिय का सामाजिक स्तर दिया गया था।
  • जस्टिन आदि यूनानी लेखकों ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सैंड्रोकोट्स कहा है। विलियम जोंस ने सर्वप्रथम सैंड्रोकोट्स की पहचान भारतीय ग्रंथों के चन्द्रगुप्त मौर्य से की थी। यूनानी लेखकों ने बिंदुसार को अमित्रचेट कहा है, विद्वानों के अनुसार, अमित्रचेट का संस्कृत रुप है अमित्रघात या अमित्रखाद (शत्रुओ का नाश करने वाला) मौर्य सम्राट अशोक को पियदसि संबोधित किय गया है,  जबकि चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री चाणक्य का एक नाम विष्णुगुप्त था।
  • अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ था। बृहद्रथ की हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंगे के द्वारा 184 ई.पू. में की गई।
  • दक्षिणी बिहार के गया जिले में स्थित बराबर नामक पहाड़ी पर कुल चार गुफाएँ स्थित हैं, जिनमें से तीन गुफाओं की दीवारों पर अशोक के लेख उत्कीर्ण मिले हैं। इनमें अशोक द्वारा आजीवक सम्प्रदाय के साधुओं के निवास के लिए गुफा दान में दिए जाने का विवरण सुरक्षित है। चट्टानों को काटकर बनाई गई इन गुफाओं का संबंध मौर्यकाल (322-185 ई.पू.) से है। इन गुफाओं में उत्कीर्ण अभिलेख तीसरी सदी ई.पू. से संबंधित हैं।

 

मौर्योत्तर काल

  • रुद्रदामन ( 130-150 ई. ) का जूनागढ़ अभिलेख गुजरात में गिरनार पर्वत पर प्राप्त हुआ है | ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण संस्कृत भाषा का यह अभिलेख अब तक प्राप्त संस्कृत अभिलेखों में सर्वाधिक प्राचीन है | इस अभिलेख में संस्कृत काव्य शैली का प्राचीनतम नमूना प्राप्त होता है | इसमें रुद्रदामन की वंशावली , विजयों , शासन , व्यक्तित्व आदि पर सुंदर प्रकाश डाला गया है | इस अभिलेख का मुख्य उद्देश्य सुदर्शन झील के बांध  के पुनर्निर्माण का विवरण सुरक्षित रखना था|
  • कुजुल कडफिसेस ने भारत में सर्वप्रथम पश्चिमोत्तर प्रदेश पर अधिकार कर लिया | इसने केवल तांबे के सिक्के जारी किए | विम कडफिसेस ने स्वर्ण एवं तांबे के सिक्के चलाए थे | शिव , त्रिशूल तथा नंदी की आकृति इसके सिक्कों पर मिलती है |इसने ‘ महेश्वर ‘नामक  उपाधि धारण की थी।
  • उत्तर पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्कों का प्रचलन इंडो – ग्रीक ( हिंद यवन ) राजाओं ने करवाया था जबकि इन्हें नियमित एवं पूर्णरूप से प्रचलित करवाने का श्रेय कुषाण शासकों को जाता है | * कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं ताम्र दोनों ही प्रकार के सिक्को को व्यापक पैमाने पर प्रचलित किया था।
  • कुषाण शासकों में विम कडफिसेस ने सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी किए थे| कुषाण शासक कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध का अंकन मिलता है।
  • यौधेयों का प्रमाण पुराण , अष्टाध्यायी तथा वृह्त्संहिता इत्यादि ग्रंथों से प्राप्त होता है। इनका साम्राज्य दक्षिण-पूर्वी पंजाब तथा राजस्थान के बीच था। इनके सिक्कों पर कार्तिकेय का अंकन मिलता है।

* कनिष्क के सारनाथ बौद्ध अभिलेख की तिथि 81 ई है। यह प्रतिमा मथुरा से लाकर कनिष्क के राज्यारोहण (78 ई) के तीसरे वर्ष सारनाथ में स्थापित की गई थी। * कनिष्क के रबतक अभिलेख में 4 शहरों के नाम का उल्लेख मिलता है|  यह है – साकेत , कौशांबी , पाटलिपुत्र तथा चंपा |

  • जैन ग्रंथों के अनुसार , विक्रमादित्य ( 57 ईपू ) के उत्तराधिकारी को 135 विक्रम संवत मे शको ने पराजित कर उसके उपलक्ष्य में शक संवत चलाया था | * इस प्रकार इसकी प्रारंभिक तिथि 135 – 57 = 78 ईसवी  आती है | * अधिकांश इतिहासकारों ने कुषाण शासक कनिष्क को इसका प्रवर्तक माना है |
  • वर्तमान में तिथि एवं वर्ष के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर का प्रयोग किया जाता है जो कि विश्वव्यापी है | वर्तमान कैलेंडर से 57 जोड़ देने पर विक्रम संवत तथा 78 घटा देने पर शक संवत प्राप्त होता है | चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम माह होता है | विक्रम संवत के दो अन्य नाम भी मिलते हैं – कृत संवत् तथा मालव संवत् | भारत में राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में शक संवत को अपनाया गया है |

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  • अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे। सौंदरानंद , बुद्ध चरित तथा सारिपुत्रप्रकरण उनकी प्रमुख रचनाएं हैं | * वसुमित्र भी कनिष्क के आश्रित विद्वान थे , इन्होंने चतुर्थ बौद्ध संगीति की अध्यक्षता भी की थी | * अश्वघोष , नागार्जुन , पार्श्व तथा चरक यह चारों ही कनिष्क के दरबार से संबंधित थे | *  पतंजलि ने पाणिनी की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य की रचना की थी |* महर्षि पतंजलि शुंगकालीन विद्वान थे तथा उन्होंने ऐसे लोगों को शिष्य बनाया था जो बिना किसी अध्ययन के ही संस्कृत बोल लेते थे |
  • कुषाण वंश के साम्राज्य की सीमाएं भारतीय उपमहाद्वीप पर बाहर तक फैली थी | * इस वंश का महान शासक कनिष्क था , जिसकी सीमाएं उत्तर में चीन के तुरफान एवं कश्मीर से लेकर दक्षिण में विंध्य पर्वत तथा पश्चिम में उत्तरी अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार तक विस्तृत थी।
  • पेरीप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी और अरिकामेडु में हुई खुदाई से ऐसे अनेक बंदरगाह और व्यापारिक केंद्रों की उपस्थिति के साक्ष्य मिले हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि कुषाणों का व्यापार पश्चिमी विश्व से फारस की खाड़ी और लाल सागर के जल मार्ग से होता था | * इन सभी साक्ष्यों में किसी में भी कुषाण की सशक्त नौसेना की उपस्थिति का उल्लेख नहीं मिलता है |
  • कुषाण शासक कनिष्क के काल में कला क्षेत्र में दो स्वतंत्र शैलियों का विकास हुआ –
  1. गांधार शैली
  2. मथुरा शैली |
  • भारतीय और यूनानी आकृति की सम्मिश्रण शैली गांधार शैली है | इस कला शैली के प्रमुख संरक्षक शक एवं कुषाण थे। इस कला का विषय मात्र बौद्ध होने के कारण इसे ‘ यूनानी – बौद्ध ‘ ( greeco-buddhist ) , इंडो ग्रीक ( indo-greece ) , ग्रीको रोमन ( greeco roman ) भी कहा जाता है |  गांधार कला में सदैव हरित स्तरित या शिष्ट चट्टान  का प्रयोग ही मूर्तियां बनाने के लिए किया जाता था | अफगानिस्तान का बामियान , पहाड़ियों को काटकर बनवाई गई बुद्ध प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध था लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने इन बुद्ध प्रतिमाओं को नष्ट करवा दिया |
  • कुषाणकाल (प्रथम शती ई) में बाल विवाह की प्रथा प्रारंभ हुई थी | स्त्रियों में उपनयन की समाप्ति तथा बाल विवाह में प्रचलन से उन्हें समाज में अत्यंत निम्न स्थिति में ला दिया |
  • भारत में ब्राह्य आक्रमकों के कालो का सही कालानुक्रम है – यूनानी (326 ई पू सिंकदर महान), शक ( सीथियन – ceythian ) , कुषाण ( पहली शताब्दी ई ) |
  • ईरानी शासक डेरियस प्रथम (522-486 ई पू) ने सर्वप्रथम भारत के कुछ भागों को अपने अधीन किया था | हेरोडोटस के अनुसार , डेरियस प्रथम के साम्राज्य में संपूर्ण सिंधु घाटी का प्रदेश शामिल था। तथा पूर्व की ओर इसका विस्तार राजपूताना के रेगिस्तान तक था |
  • मेनाण्डर तथा उसके पुत्र स्ट्रेटों प्रथम के सिक्के मथुरा से मिले हैं | बौद्ध भिक्षु नागसेन के प्रभाव में मेनासुर ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। स्ट्रैटो II ने सीसे के सिक्के जारी किए थे | इस हिंद-यवन शासक का शासन 25 ई पू से 10 ईस्वी तक माना जाता है।
  • 184 ई पू में पुष्यमित्र शुंग ने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या करके शुंग राजवंश की स्थापना की |पुराणों के अनुसार पुष्यमित्र शुंग ने 36 वर्षों तक शासन किया | महर्षि पाणिनि ने ‘शुंगवंश ‘ को ‘ भारद्वाज गोत्र ‘ का ब्राह्मण बताया है | अय़ोध्या के लेख से ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र ने दो अश्वमेघ यज्ञ किए थे। पतंजलि पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे। शुंग वंश का 9वां शासक भागवत अथवा भागभद्र था | इसके शासनकाल में तक्षशिला के यवन नरेश एंटियालकीड्स का राजदूत हेलिओडोरस उसके विदिशा राज दरबार में उपस्थित हुआ था | हेलिओडोरस ने भागवत धर्म ग्रहण किया तथा विदिशा (बेसनगर) में गरुड़ स्तंभ की स्थापना कर भगवान विष्णु की पूजा की | शुंग वंश के अंतिम राजा देवभूति अपने अमात्य वासुदेव के षड्यंत्रों द्वारा मार डाला गया | वासुदेव ने जिस नवीन राजवंश की स्थापना की वह ‘कण्व ‘ या ‘कण्वायन ‘ के नाम से जाना जाता है |
  • मौर्यों के बाद दक्षिण भारत में सबसे प्रभावशाली राज्य सातवाहनों का था। * पुराणों में इस वंश के संस्थापक का नाम सिंधुक, सिमुक या शिप्रक दिया गया है, जिसने कण्व वंश के राजा सुशर्मा का वध करके अपना शासन स्थापित किया था।

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  • पुराणों में कुल तीस सातवाहन राजाओं के नाम मिलते हैं |जिनमें से सबसे लंबी सूची मत्स्य पुराण में 19 राजाओं की मिलती है | ये हैं
  1. पूर्णोत्संग
  2. स्कंधस्तंभि
  3. शातकर्णि
  4. लंबोदर
  5. अपीलक
  6. मेघस्वाति
  7. स्वाति 
  8. स्कंधस्वाति
  9. मृगेंदु
  10. कुंतलस्वाति
  11. स्वातिकर्ण 
  12. पुलुमावि-I 
  13. गौर कृष्ण
  14. हाल
  15. मंदूलक
  16. पुरींद्रसेन
  17. सुंदर स्वातिकीर्ति 
  18. चकोर स्वातिकीर्ति 
  19. शिव स्वाति |
  • सातवाहनों की वास्तविक राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन में अवस्थित थी। * पुराणों में इस राजवंश को आंध्रभृत्य या आंध्र जातीय कहा गया है। * उनकी आरंभिक राजधानी अमरावती मानी जाती है। * पुराणों के अनुसार , कृष्ण का पुत्र एवं उत्तराधिकारी शातकर्णी प्रथम सातवाहन वंश का सातकर्णि उपाधि धारण करने वाला प्रथम राजा था। * इसके शासन के बारे में हमें नागनिका के नानाघाट अभिलेख से महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
  • सातवाहन शासक गौतमीपुत्र सतकर्णी ने कहा है कि उसने विछिन्न होते चातुर्वर्ण्य ( चार वर्णों वाली व्यवस्था ) को फिर से स्थापित किया और वर्णसंकर ( वर्णों और जातियों के सम्मिश्रण) को रोका | * इसी कारण इसे वर्ण व्यवस्था का रक्षक कहा जाता है।* गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक अभिलेख में ‘ अद्वितीय ब्राह्मण ‘ ( एक ब्राह्मण ) तथा ‘ वेदों का आश्रय ‘ कहा गया है | * वशिष्ठि पुत्र पुलुमावी को दक्षिणापथेश्वर कहा गया है | * दो पतवारों वाले जहाज का चित्र उसके कुछ सिक्कों पर बना हुआ है | इस वंश का अंतिम शासक यज्ञश्री शातकर्णि था |
  • कलिंग के चेदि वंश का संस्थापक महामेघवाहन था | कलिंग का चेदि वंश के शासक खारवेल प्राचीन भारतीय इतिहास के महानतम सम्राटों में से एक था | उड़ीसा प्रांत के भुवनेश्वर से 3 मील की दूरी पर स्थित उदयगिरी पहाड़ी की ‘ हाथी गुम्फा ‘  से उसका एक बिना तिथि का अभिलेख प्राप्त हुआ है | * इसमें खारवेल के बचपन , शिक्षा , राज्य अभिषेक तथा राजा बनने के 13 वर्षों तक के शासनकाल की घटनाओं का विवरण दिया हुआ है | *  यह अभिलेख खारवेल का इतिहास जानने का एकमात्र स्रोत है | * इस अभिलेख से पता चलता है कि खारवेल ने दक्षिण के तीनों राज्यों चोल , चेर एवं पाण्ड्यों को पराजित किया था। * पाण्ड्य शासक से उसने गधे से हल चलवाया था। * इसका जैन धर्म के प्रति भारी झुकाव था।
  • पूर्वी रोमन शासक जस्टिनियन को सर्वाधिक प्रसिद्धि उसके न्याय संबंधी सुधारों से मिली | * जस्टिनियन रोमन कानून के संपूर्ण संसाधन के लिए उत्तरदायी था।
  • स्ट्रैटो II ने सीसे के सिक्के जारी किए थे। इस हिंद-यवन शासक का शासन 25 ईसा पूर्व से 10 ईसवी तक माना जाता है।
  • बिंबिसार (544-492 ई.पू.) मगध साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापक था। वह हर्यंक कुल से संबंधित था। प्रसेनजित कोसल महाजनपद का राजा था। वह महात्मा बुध्द का समकालीन था। गौतम बुध्द (563-482 ई.पू.) ने बोध्द धर्म का प्रवर्तन किया। मिनांडर, जिसे मिलिंद के नाम से जाना से भ जाना जाता है, उत्तर  भारत में इंडो-ग्रीक राजा था। इसका समय 155 अथवा 150 से 130 ई.पू. था। इस प्रकार बिंबिसार, गौतम बुध्द एवं प्रसेनजित तीनों समकालीन थे, जबकि मिलिंद इनका समसामायिक नही था।
  • रुद्रदामन (130-150 ई.) का जूनागढ़ अभिलेख गुजरात में गिरनार पर्वत पर प्राप्त हुआ है। ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण संस्कृत भाषा का यह अभिलेख अब तक प्राप्त संस्कृत अभिलेखों में सर्वाधिक प्राचीन है। इस अभिलेख में संस्कृत काव्य शैली का प्राचीनतम नमूना प्राप्त होता है।
  • जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि 170 ई. में रुद्रदामन ने गिरनार के निकट सुदर्शन झील की मरम्मत बिना बेगार लिए ही करवाई थी, जो कि मौर्य वंश के शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के आदेश पर बनवाई गई थी।
  • उत्तर-पश्चिम भारत में स्वर्ण सिक्को का प्रचलन इंडो-ग्रीक (हिंद यवन राजाओं ने करवाया था। जबकि इन्हें नियमित एवं पूर्णरुप से प्रचलित करवाने का श्रेय कुषाण शासकों को जाता है। कुषाण शासकों ने स्वर्ण एवं ताम्र दोनो ही प्रकार के सिक्को को व्यापक पैमाने पर प्रचलित किया था।
  • कुषाण शासक कनिष्क के सिक्कों पर बुध्द का अंकन मिलता है।
  • कुषाण शासकों में विम कडफिसेस ने सर्वप्रथम सोने के सिक्के जारी किये थे।
  • औधेयों का प्रमाण पुराण, अष्टाध्यायी तथा वृहत्संहिता इत्यादि ग्रंथों से प्राप्त होता है। इनका साम्राज्य दक्षिण-पूर्वी पंजाब तथा राजस्थान के बीच था। इनके सिक्कों पर कार्तिकेय का अंकन मिलता है।
  • कनिष्क के सारनाथ बौध्द अभिलेख की तिथि 81 ई. सन है। यह प्रतिमा मथुरा से लाकर कनिष्क के राज्यारोहण (78 ई. सन) के तीसरे वर्ष सारनाथ में स्थापित की गई थी।
  • कनिष्क के राज्याभिषेक की तिथि अत्यंत विवादास्पद है। इस समस्या पर विचार करने के लिए 1913 तथा 1960 ई. मे लंदन में दो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किए गए। द्वीतीय सम्मेलन में आम सहमति 78 ई. के पक्ष में ही बनी। इसी समय से शक संवत् का प्रारंभ माना गया है।
  • चैत्र भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम माह होता है। राष्ट्रीय कैलेंडर की तिथियाँ ग्रेगोरियन कैलेंडर की तिथियों से स्थायी रुप से मिलती-जुलती है। सामान्यतः 1 चैत्र 22 मार्च को होता है और लीप वर्ष में 21 मार्च को।
  • विक्रम संवत के दो अन्य नाम भी मिलते है – कृत संवत् तथा मानव संवत्। जैन साहित्य में महावीर के निर्वाण तथा विक्रम संवत् के बीच 470 वर्षों का अंतर पाया जाता है। महावीर की निर्वाण तिथि 527 ई.पू. मानी  जाती है। तद्नुसार विक्रम संवत् के  प्रारंभ की तिथि 527-470ई. = 57 ई.पू. निर्धारित होती है।
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  • अश्वघोष कनिष्क के राजकवि थे। वसुमित्र भी कनिष्क के आश्रित विद्वान थे, इन्होने चतुर्थ बौध्द संगीति की अध्यक्षता भी की थी। कालिदास गुप्तकाल में हुए थे, जबकि कंबन 12वीं शताब्दी के थे।
  • अश्वघोष, नागार्जुन, पार्श्व तथा चरक ये चारों ही कनिष्क के दरबार से संबंधित थे, जबकि पतंजलि कनिष्क के दरबार से संबंधित नही थे। पतंजलि ने पाणिनि की अष्टाध्यायी पर महाभाष्य की रचना की थी। महर्षि पतंजलि शुंगकालीन विद्वान थे।
  • रबतक अभिलेख में शुर्ख कोटल के निकट रबतक नामक स्थान से वर्ष 1933 में प्राप्त किए गए। ये यूनानी लिपि तथा वैक्ट्रियन भाषा में लिखे गए हैं। ये कुषाण वंश के शासक कनिष्क से संबंधित हैं। इस अभिलेख में चार शहरों के नाम का उल्लेख है। जो हैं – साकेत, कौशांबी, पटलिपुत्र, तथा चम्पा।
  • शुंग वंश का अंतिम राजा देवभूति अपने अमात्य वासुदेव के षडयंत्रों द्वारा मार डाला गया। वासुदेव ने जिस नवीन राजवंश की नींव डाली, वह कण्व या कण्वायन नाम से जाना जाता है। शुंगो के समान यह भी ब्राह्मण वंश था।
  • सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शतकर्णी ने कहा है कि उसने विछिन्न होते चातुर्वर्ण्य (चार वर्णों वाली व्यवस्था) को फिर से स्थापित किया और वर्णसंकर (वर्णों और जातियों के सम्मिश्रण) को रोका। इसी कारण इसे वर्ण-व्यवस्था का रक्षक कहा जाता था।
  • मौर्यों के बाद दक्षिण भारत में सबसे प्रभावशाली राज्य सातवाहनों का था। पुराणों में इस वंश के संस्थापक का नाम सिंधुक, सिमुक या शिप्रक दिया गया है। जिसने कण्व वंश के राजा सुशर्मा का वध करके अपना शासन स्थापित किया था।
  • कुषाणकाल (प्रथम शती ई.) में बाल विवाह की प्रथा प्रारंभ हुई थी। स्त्रियों में उपनयन समाप्ति तथा बाल विवाह के प्रचलन ने उसे समाज में अत्यंत निम्न स्थिति में ला दिया। इस युग में विवाह की आयु और कम करते आठ से लेकर दस वर्ष की आयु की कन्या को विवाह के लिए उपयुक्त माना गया।
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  • कुषाण शासक कनिष्क के काल में कला क्षेत्र में दो स्वतंत्र शैलियो का विकास हुआ – 1. गंधार शैली मथुरा शैली
  • कुषाणों ने सर्वाधिक शुध्द स्वर्ण के सिक्के चलवाए थे। यद्यपि भारत में सर्वप्रथम हिंद-यवन शासको ने स्वर्ण सिक्के चलाए थे। स्वर्ण के अतिरिक्त कुषाणों ने ताम्र एवं रजत सिक्के चलवाए। गुप्तों ने स्वर्ण एवं रजत के तथा कलचुरि शासको ने स्वर्ण, रजत एवं ताम्र के सिक्के चलवाए थे। सातवाहन शासको ने स्वर्ण सिक्के नही चलवाए थे। उन्होने चांदी, तांबा, तथा सीसे व पोटीन के सिक्के जारी किए थे।
  • अफगानिस्तान का बामियान पहाड़ियों को काटकर बनवाई गई बुध्द प्रतिमाओं के लिए प्रसिध्द था, लेकिन अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने इन बुध्द प्रतिमाओं को नष्ट करवा दिया।
  • भारतीय और यूनानी आकृति की सम्मिश्रण शैली गांधार शैली है। इस कला शैली के प्रमुख संरक्षक शक एवं कुषाण थे। इस कला का विषय मात्र बौध्द होने के कारण इसे यूनानी-बौध्द , इंडो-ग्रीक या ग्रीको-रोमन भी कहा जाता है।
  • गांधार कला में सदैव हरित स्तरित या शिस्ट चट्टान का प्रयोग ही मूर्तियाँ बनाने के लिए किया जाता था। यद्यपि मथुरा कला में भी इसी के अनुसरण पर शिस्ट का प्रयोग किया गया था।
  • भारत मे बाह्य आक्रामकों के कालों का सही कालानुक्रम – यूनानी (326 ई.पू. सिकंदर महान), शक (सीथियन)-(प्रथम शताब्दी ई.पू.), कुषाण (पहली शताब्दी ई.)
  • ईरानी शासक डेरियस प्रथम (522-486 ई.पू.) ने सर्वप्रथम भारत के कुछ भाग को अपने अधीन किया था। हेरोडोटस के अनुसार, डेरियस प्रथम के साम्राज्य में संपूर्ण सिंधु घाटी का प्रदेश शामिल था तथा पूर्व की ओर उसका विस्तार राजपूताना के रेगिस्तान तक था। पर्सिपोलिस एवं नक्शेरुस्तम के शिलालेखों के अनुसार, पंजाब भी उसके साम्राज्य में शामिल था।
  • पुराणो में कुल तीस सातवाहन राजाओ के नाम मिलते हैं, जिनमें से सबसे लंबी सूची मत्स्य पुराण में 19 राजाओं की मिलती है।
  • सातवाहनों की वास्तविक राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन में अवस्थित थी। पुराणों में इस राजवंश को आंध्रभृत्य या आंध्र जातीय कहा गया है। उनकी आरंभिक राजधानी अमरावती मानी जाती है। इस वंश की स्थापना सिमुक नामक व्यक्ति ने लगभग 60 ई.पू. में कण्व वंशीय शासक सुशर्मा की हत्या करके की थी।
  • सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक अभिलेख में एका ब्राह्मण कहा गया है, जिसका तात्पर्य है अद्वीतीय ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणों का एकमात्र रक्षक।
  • कलिंग का चेदि राजवंश का संस्थापक महामेघवाहन नामक व्यक्ति था। अतः इस वंश का नाम महामेघवाहन वंश भी पड़ गया। इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक खारवेल हुआ।
  • पूर्वी रोमन शासक जस्टिनियन को सर्वाधिक प्रसिध्दि उसके न्याय संबंधी सुधारों मे मिली। जस्टिनियन रोमन कानून के संपूर्ण संशोधन के लिए  उत्तरदायी था।

 

गुप्त एवं गुप्तोत्तर युग

  • गुप्त वंश ने 275-550 ई. तक शासन किया | इस वंश की स्थापना लगभग 275 ई. में महाराज श्रीगुप्त द्वारा की गई थी किंतु गुप्त वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक चंद्रगुप्त प्रथम था | जिसने 319-335 ई तक शासन किया | इसने अपनी महत्ता सूचित करने के लिए अपने पूर्वजों के विपरीत ‘ महाराजाधिराज ‘ की उपाधि धारण की | गुप्त संवत का प्रवर्तक चंद्रगुप्त प्रथम था। इसकी तिथि  319 ई है |

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  • इतिहासकार विसेंट स्मिथ ने अपनी रचना ‘ अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया ‘ में समुद्रगुप्त की वीरता एवं विजयों पर मुग्ध होकर उसे ‘ भारतीय नेपोलियन ‘ की संज्ञा दी है।
  • इलाहाबाद का अशोक स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त ( 335-375 ई ) के शासन के बारे में सूचना प्रदान करता है | इस स्तंभ पर समुद्रगुप्त के संधि विग्रहिक हरिषेण ने संस्कृत भाषा में प्रशंसात्मक वर्णन प्रस्तुत किया है | जिसे ‘ प्रयाग प्रशस्ति ‘ कहा गया है | इसमें समुद्रगुप्त की विजयों का उल्लेख है | इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के कुछ प्रशासनिक पदाधिकारियों के नाम मिलते हैं वे हैं  – संधिविग्रहिक , खाद्यटपाकिक , कुमारामात्य , तथा महादण्डनायक | अशोक निर्मित यह स्तंभ मूलतः कौशांबी में स्थित था जिसे अकबर ने इलाहाबाद में स्थापित करवाया था | इस स्तंभ पर जहांगीर तथा बीरबल का भी उल्लेख है |
  • गुप्त शासक चंद्रगुप्त द्वितीय ‘ विक्रमादित्य ‘ का एक अन्य नाम देवगुप्त मिलता है इसका प्रमाण सांची एंव वाकाटक अभिलेखों से मिलता है | उसके अन्य नाम देवराज तथा देवश्री भी मिलते हैं | चंद्रगुप्त द्वितीय ‘ विक्रमादित्य ‘ वह प्रथम गुप्त शासक था जिसने ‘ परम भागवत ‘ की उपाधि धारण की। मेहरौली लेख के अनुसार , उसने विष्णुपद पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना कराई थी। दिल्ली में मेहरौली नामक स्थान से ‘ मेहरौली लौह स्तंभ लेख ‘ प्राप्त हुआ है।जो वर्तमान में कुतुब मीनार के समीप है | इसमें चंद्र नामक किसी राजा की उपलब्धियों का वर्णन किया गया है |  जिसका समीकरण गुप्त वंश के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय से किया जाता है | गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य को शक विजेता कहा गया है| पश्चिम भारत के अंतिम शक राजा रूद्र सिंह तृतीय को चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने 5 वीं सदी के प्रथम दशक में परास्त कर पश्चिमी भारत में शक सत्ता का उन्मूलन किया था |  शकों को हराने के कारण चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की एक अन्य उपाधि “शकारि” भी है | उसने इस उपलक्ष्य में चांदी के सिक्के भी चलाएं | जिसको गुप्तकाल में “रुप्यक” (रूपक) कहा जाता था |
  • चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के कुशल शासन की प्रशंसा चीनी यात्री फाह्यान ने भी की है | इन के नवरत्नों की प्रसिद्धि सर्वकालिक रही है | नवरत्नों में सर्वोत्कृष्ट “महाकवि कालिदास” थे | अगले क्रम पर महान चिकित्सक (GREAT PHYSICIAN) धनवंतरी थे |  तीसरे खगोल विज्ञानी वराहमिहिर थे  | चौथे कोशकार अमरसिंह ,पांचवें वास्तुकार शंकु तथा छठवें रत्न फलित ज्योतिषी क्षपणक थे | इसी प्रकार सातवें विद्वान वैयाकरणज्ञ (GRAMMARIAN)    वररुचि , आठवें जादूगर वेताल भट्ट तथा नौवें घटकर्पर  महान कूटनीतिज्ञ थे|

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·      कुमारगुप्त प्रथम “महेंद्रादित्य” (लगभग 415 से 455 ईसवी) चंद्रगुप्त द्वितीय की पत्नी ध्रुव देवी से उत्पन्न बड़ा पुत्र था | इसके समय के गुप्तकालीन सर्वाधिक अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनकी संख्या लगभग 18 है | विलसद अभिलेख में कुमार गुप्त प्रथम तक गुप्तों की वंशावली प्राप्त होती है | बंगाल के तीन स्थानों से कुमार गुप्त कालीन ताम्रपत्र प्राप्त होते हैं | यह हैं धनदैह ताम्रपत्र , दामोदरपुर ताम्रपत्र तथा वैग्राम ताम्रपत्र तथा कुमारगुप्त की स्वर्ण रजत तथा ताम्र मुद्राएं प्राप्त होती है |   मुद्राओं पर उसकी उपाधियां महेंद्रादित्य, श्रीमहेंद्र, महेंद्र सिंह , अश्वमेध  महेन्द्र आदि उत्कीर्ण मिलती है|

  • स्कंद गुप्त “क्रमादित्य” द्वितीय (लगभग 455 से 467 ) ईसवी के स्वर्ण सिक्कों के मुख्य भाग पर धनुष बाण लिए हुए राजा की आकृति तथा पृष्ठ भाग पर पदासन में विराजमान लक्ष्मी के साथ साथ “श्री स्कंद” गुप्त उत्तीर्ण है | कुछ सिक्कों के ऊपर गरुड़ध्वज तथा उसकी उपाधि क्रम आदित्य अंकित है | भीतरी स्तंभ लेख में पुष्यमित्र और हूणों के साथ स्कंद गुप्त के युद्ध का वर्णन मिलता है | हूणों का पहला भारतीय आक्रमण गुप्त सम्राट स्कंद गुप्त के शासनकाल में (455 ईसवी में) हुआ तथा स्कंद गुप्त के हाथों में वे बुरी तरह परास्त हुए |
  • ईसा की तीसरी सदी से जब हूण आक्रमण से रोमन साम्राज्य का पतन हो गया, तो भारतीय दक्षिण पूर्व एशियाई व्यापार पर अधिक निर्भर हो गए|
  • तोरमाण भारत पर दूसरे हूण आक्रमण का नेता था | मध्य भारत के एरण नामक स्थान से वाराह प्रतिमा पर खुदा हुआ उसका लेख मिला है |जिससे पता चलता है कि धन्यविष्णु उसके शासनकाल के प्रथम वर्ष में उसका सामंत था। मिहिरकुल हूण शासक तोरमाण का पुत्र तथा उत्तराधिकारी था। मिहिरकुल अत्यंत क्रूर एवं अत्याचारी शासक था। चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा मंदसौर लेख के साक्ष्य से ज्ञात होता है कि सवर्प्रथम गुप्त नरेश बालादित्य पत्पश्चात मालव नरेश यशोवर्धन द्वारा मिहिरकुल को बुरी तरह पराजित किया गया था।
  • गुप्तकाल में बंगाल में ताम्रालीप्ति एक प्रमुख बंदरगाह था  ,जहां से उत्तर भारतीय व्यापार एवं साथ ही दक्षिण पूर्व एशिया , चीन , लंका ,  जावा , सुमात्रा आदि देशों के साथ व्यापार होता था |  पश्चिमी भारत का प्रमुख बंदरगTह भृगुकच्छ  (भड़ौच)   था |  जहाँ  से पश्चिमी देशों के साथ समुद्री  व्यापार होता था|   ताम्रलिप्ति  आधुनिक पश्चिमी  बंगाल के  मिदना  पुर जिले के तामलुक नामक स्थान  को कहते थे जो कि  कोलकाता  से लगभग  33 मील दक्षिण पश्चिम में रुप नारायण नदी के  पश्चिमी  किनारे पर  स्थित है।

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  • प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था में श्रेणियों का विशेष महत्व था। ये संगठन व्यापारियों के द्वारा उनके व्यापार के समुचित संचालन के लिए स्थापित किए जाते थे। श्रेणियों का अपने सदस्यों पर न्यायिक अधिकार होता था | तथा श्रेणियों के द्वारा ही सदस्यों के वेतन, काम करने के नियमों, मानकों एवं कीमतों का निर्धारण किया जाता था। प्रत्येक श्रेणी का अपना एक प्रमुख होता था। राजा का श्रेणियों के संचालन में कोई हस्तक्षेप नहीं होता था, श्रेणियां अपने नियम स्वयं बनाती थीं।
  • गुप्तकाल में गुजरात, बंगाल, दक्कन एवं तमिलनाडु वस्त्र उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थे। वस्त्रोद्योग, गुप्काल का प्रमुख उद्योग था | गुप्तकाल में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे – ताम्रलिप्ति , भृगुकच्छ, आरिकामेडु , कावेरीपतनम, मुजीरिस, प्रतिष्ठान, सोपारा, बारबेरिकम |
  • आयुर्वेद तथा चिकित्सा के क्षेत्र में प्राचीन भारत की चरम परिणति चरक एवं सुश्रुत में मिलती है। गुप्तकालीन सुश्रुत संहिता में चिकित्सक के ज्ञान एवं कार्य-कुशलता को समान रूप से महत्व दिया गया है | धन्वंतरि चंद्रगुप्त ii विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। ये आयुर्वेद शास्त्र के प्रकांड पंडित थे। चरक एवं सुश्रुत भी आयुर्वेद के विख्यात विद्वान थे। चरक कनिष्क के राजवैद्य थे, जिन्होंने चरक संहिता” की रचना की थी। जबकि भास्कराचार्य प्रख्यात खगोलज्ञ एवंगणितज्ञ थे। उन्होंने (सिद्धांत शिरोमणि ” तथा “लीलावती”  नामक ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों में गणित तथा खगोल विज्ञान संबंधी विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

·      5वीं शती ई. तक भारत में त्रिकोणमिति में ज्या (sine) ,  कोज्या (cosine) ,  और उत्क्रम ज्या (inverse sine)  ,  के सिद्धांत ज्ञात हो चुके थे। सूर्य सिद्धांत और आर्यभटीय में इनका उल्लेख है। सातवीं शती ई में ब्रह्मगुप्त द्वारा चक्रीय चतुर्भुज के सिद्धांत का वर्णन मिलता है।

  • समुद्रगुप्त की कुल 6 प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं हमें प्राप्त होती हैं। ये हैं- गरुड़ ,  धनुर्धारी ,  परशु, अश्वमेध ,  व्याघ्र हनन तथा वीणावादन प्रकार। गुप्तकाल में स्वर्ण मुद्रा को दीनार कहा जाता था। चीनी यात्री फाह्यान के अनुसार, लोग दैनिक क्रय-विक्रय में कौड़ियों का प्रयोग करते थे। गुप्त शासकों के सिक्के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़िसा में पाए गए हैं। सिक्कों का सबसे प्रसिद्ध प्राप्ति स्थल राजस्थान का भरतपुर (बयाना) है। इनके द्वारा जारी किए गए चांदी के सिक्के  रुपक कहलाते थे । तथा स्वर्ण मुद्राओं को दीनार कहा जाता था। गुप्त शासकों में चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा सर्वप्रथम सिक्के जारी किए गए।

·      सती प्रथा का प्रथम अभिलेखिक साक्ष्य एरण से प्राप्त हुआ है |  यह अभिलेख 510 ई० का है, जिसमें गोपराज नामक सेनापति की स्त्री के सती होने का उल्लेख है।

  • गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण थे- हूण आक्रमण, प्रशासन का सामंतीय ढांचा, उत्तरवर्ती गुप्तों का बौद्ध धर्म स्वीकार करना। गुप्तकाल में नगर क्रमिक पतन की ओर  अग्रसर हुए। संपूर्ण गंगा घाटी में जो शहर पहले अत्यंत समृद्ध अवस्था में थे, उनमें से अधिकांश को गुप्तकाल में या तो त्याग दिया गया था या वहां के आवसन में पर्याप्त विघटन हुआ। पाटलिपुत्र जैसा प्रमुख नगर ह्वेनसांग के आगमन तक गांवबन गया था। मथुरा जैसे प्रमुख नगर एवं कुम्रहार, सोनपुर, सोहगौरा और उत्तर प्रदेश में गंगा घाटी के अनेक महत्वपूर्ण केन्द्र इस काल में ह्रास के ही प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

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  • गुप्तकाल में कला एवं साहित्य में हुई प्रगति के आधार पर इस काल को प्राचीन भारत का”स्वर्ण युग”कहा जाता है।अजंता की तीन गुफाएँ(16वीं , 17वींतथा19वीं) गुप्त कालीन मानी जाती हैं।इनमें 16वीं तथा 17वीं गुफाएँ विहार तथा उन्नीसवीं चैत्य है।
  • गुप्त वंश के शासकों ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिए थे। गुप्तकाल में जो लोग राजकीय भूमि पर कृषि करते थे उन्हें अपनी अपज का एक भाग राजा को कर के रुप में देना पड़ता था, जो सामान्यतः षष्ठांश तक होत था। गुप्त अभिलेखों में भूमि कर को उद्रंग तथा  भाग कर कहा गया है। प्रायः सभी धर्मशास्त्रों में भू राजस्व की दर 1/6 (उप का छठां भाग) थी। प्राचीन भारत में  सिंचाई कर को बिदकभागम अथवा उदकभाग कहा गया है। हिरण्य मौर्यकाल में लिया जाने वाला नकद कर था।गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में रेशम के लिए कौशेय शब्द का प्रयोग होता था।तीसरी शताब्दी में वारंगल लोह के यंत्रों उपकरणों हेतु प्रसिद्ध था। वारंगल में अगरिया लोग बड़ी संख्या में रहते थे।अगरिया लोगों का  प्राचीन काल से वर्तमान समय तक लोहे के यंत्र एवं उपकरण बनाना परंपरागत व्यवसाय रहा है।
  • डॉ. के. पी. जायसवाल ने विशाखदत्त को चंद्रगुप्त मौर्य का समकालीन बताया है।उनके नाटक मुद्राराक्षस से चंद्रगुप्त मौर्य के कृत्यों पर प्रकाश पड़ता है।इसमें चंद्रगुप्त मौर्य के समय में राज दरबार की दुरभिसंधियों का वर्णन किया गया है।गुप्तकाल में लिखित संस्कृत नाटकों में स्त्री और शूद्र प्राकृत भाषा बोलते थे , जबकि उच्च वर्ण के लोग संस्कृत भाषा बोलते थे | शूद्रककृत  “मृच्छकटिकम”  नामक रचना से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था एवं नगर जीवन के विषय में रोचक सामाग्री मिलती है। इस ग्रंथ में चारुदत्त नामक ब्राह्मण सार्थवाह एवं एक गणिका की पुत्री वसंत सेना की प्रेम – गाथा को,शब्दों का रूप दिया गया है।
  • गुप्त साम्राज्य की शासन व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी। मौर्य शासकों के विपरीत गुप्तवंशी शासक अपनी दैवी उत्पत्ति में विश्वास.करते थे। गुप्त शासकों ने भूमिदान की परंपरा को विस्तारित किया। गुप्त प्रशासन का स्वरूप केंद्रीकृत न होकर संघात्मक था, गुप्त राजा अनेक “छोटे राजाओं का राजा” होता था। सामंत तथा प्रांतीय शासक अपने अपने क्षेत्रों में नितांत स्वतंत्रता का अनुभव करते थे।

·      शतरंज का खेल भारत में गुप्त काल के दौरान उद्भूत हुआ था जहां इसे “चतुरंग” के नाम से जाना जाता था |  भारत से यह ईरान तथा तत्पश्चात यूरोप में पहुंचा|

·      प्रवरसेन प्रथम (275 से 335 ईसवी) वाकाटक वंश का एकमात्र शासक जिसने “सम्राट” की उपाधि धारण की थी|  वाकाटक शासक प्रवर सेन  प्रथम ने चार अश्वमेध यज्ञों का संपादन किया | इसके साथ ही उसने अनेक वैदिक यज्ञ भी किए|  इसी वंश के शासक प्रवर सेन द्वितीय की रुचि साहित्य में थी , उन्होंने “सेतुबंध” नामक ग्रंथ की रचना की |

·      महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया था |  सांख्य  पुनर्जन्म अथवा आत्मा के आवागमन के सिद्धांत को स्वीकार करता है | सांख्य दर्शन में अज्ञानता को ही दुखों का कारण तथा विवेक ज्ञान को उनसे मुक्ति का एकमात्र उपाय बताया गया है | महर्षि पतंजलि को योग दर्शन का प्रतिस्थापक आचार्य माना जाता है | सर्वप्रथम महर्षि पतंजलि ने ही सुसंबंध दार्शनिक सिद्धांत के रूप में योग का विवेचन किया | इसलिए इसे “पतंजलि दर्शन” भी कहा जाता है|

·      नव्य- न्याय संप्रदाय का प्रवर्तन मिथिला के आचार्य गंगेश उपाध्याय की युग प्रवर्तक कृति “तत्व चिंतामणि” से हुआ एवं इसके संवर्धन के लिए बंगाल के नवदीप के नैयायिक वासुदेव सार्वभौम,  दीधितिकार  रघुनाथ शिरोमणि तथा मथुरानाथ , जगदीश एवं गदाधर भट्टाचार्य सुप्रसिद्ध है | भारतीय दर्शन में चार्वाक दर्शन जड़वादी या भौतिकवादी विचारधारा का पोषक है|  इस दर्शन का आदर्श है– “जब तक जीवित रहे सुख से जीवित रहे, उधार लेकर घी पियें, क्योंकि देश देह के भस्म हो जाने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता” –

यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।

भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।

  • न्याय दर्शन का प्रवर्तन गौतम ने किया जिन्हें अक्षपाद भी कहा जाता है | न्याय का शाब्दिक अर्थ तर्क या  निर्णय होता है |  न्याय दर्शन में 16 पदार्थों या तत्वों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है | न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ गौतम कृत “न्याय सूत्र” है | 

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  • कर्म का सिद्धांत भी मीमांसा दर्शन से संबंधित है| इसे पूर्व मीमांसा ,  कर्म मीमांसा या धर्म मीमांसा भी कहते हैं |  जैमिनी ने पूर्व मीमांसा का प्रतिपादन किया था |  मीमांसा के प्रखर एवं उद्भव आचार्य कुमारिल भट्ट को , जिनकी गणना भारतीय दर्शन के मूर्धन्य आचार्यों में की जाती है | और जिन्होंने अपने प्रमुख तर्कों से बहुत धर्म तथा दर्शन का खंडन करके वैदिक धर्म तथा दर्शन की पुनः प्रतिष्ठा की | 
  • पूर्व मीमांसा और वेदांत के बीच की श्रृंखला माना जा सकता है |  मीमांसा दर्शन वेद को शाश्वत सत्य मानता है |  पूर्व मीमांसा दर्शन में वेद के कर्मकांड भाग पर विचार किया गया है और उत्तर मीमांसा में वेद के ज्ञान कांड भाग पर विचार किया गया है |  मीमांसा और वेदांत , “न्याय और वैशेषिक” तथा सांख्य और योग” भारतीय षड्दर्शन के भाग हैं | वेदों को मान्यता देने के कारण ही सांख्य ,  योग,  न्याय , वैशेषिक ,  मीमांसा और वेदांत षडदर्शन आस्तिक दर्शन कहे जाते हैं | इन के प्रणेता क्रमशः कपिल ,  पतंजलि ,गौतम , कणाद , जैमिनी  तथा बादरायण थे जबकि लोकायत और कापालिक भारतीय षड्दर्शन के भाग नहीं है |
  • वेदांत दर्शन को भारतीय विचारधारा की पराकाष्ठा माना जाता है | वेदांत का शाब्दिक अर्थ है :- वेद का अंत या वैदिक विचारधारा की पराकाष्ठा  | वेदांत दर्शन के तीन आधार है:- उपनिषद ,  ब्रह्मसूत्र ,और भगवत गीता |इन्हें वेदांत दर्शन की “प्रस्थानत्रयी” कहा जाता है | कई सूक्ष्म भेदों के आधार पर इसकी कई उपसंप्रदाय एवं इसके प्रवर्तक हैं,  जैसे शंकराचार्य का अद्वैतवाद , रामानुज का विशिष्टद्वैत ,  माधवाचार्य का द्वैतवाद|
  • पुराणों के अनुसार चंद्रवंश या सोमवंशी क्षत्रिय वर्ण के 3 मूल वंशों (अन्य दो सूर्यवंश एवं अग्नि वंश) में से एक था |चंद्र वंशीय शासकों का मूल स्थान त्रेतायुग में प्रयाग था परंतु प्रलय के पश्चात द्वापर युग में चंद्रवंशीय संवारन ने प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झूसी, इलाहाबाद) में राजधानी की स्थापना की थी।
  • अग्निकुल के राजपूतों का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रतिहार वंश था। गुर्जरों की शाखा से संबंधित होने के कारण इतिहास में इसे गुर्जर- प्रतिहार वंश के नाम से जाना जाता है। गुर्जर – जाति का प्रथम उल्लेख पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल लेख में हुआ है। |  बाण भदृ के हर्षचरित में भी गुर्जरों का उल्लेख मिलता है। गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक नागभट्ट प्रथम (730-756 ई०) था।  ग्वालियर अभिलेख से पता.चलता है कि उसने म्लेच्छ शासक की विशाल सेना को नष्ट कर दिया था , जो संभवतः सिंध का अरब शासक था। इस प्रकार नागभट्ट ने अरबों के.आक्रमण से पश्चिम भारत की रक्षा भी की थी।
  • राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 736 ईसा पूर्व में दंतीदुर्ग ने की | उसने मान्यखेत को अपनी राजधानी बनाई | दंती दुर्ग के संबंध में कहा जाता है कि उज्जैनी में उसने हिरण्यगर्भ (महादान) यज्ञ करवाया था | राष्ट्रकूट राजा अमोधवर्ष I  का जन्म 800 ईसा पूर्व में नर्मदा नदी के किनारे श्री भावन नामक स्थान पर सैनिक छावनी में हुआ था | इस समय इसके पिता राष्ट्रकूट राजा गोविंद तृतीय उत्तर भारत के सफल अभियानों के बाद वापस लौट रहे थे |
  • मौखरि गुप्तों के सामंत थे, जो मूलतः गया के निवासी थे । मौखरि वंश के शासकों ने अपनी राजधानी कन्नौज को बनाई | इस वंश के प्रमुख शासक हरि वर्मा , आदित्य वर्मा , ईशान वर्मा,  सर्ववर्मा एवं गृहवर्मा थे |
  • हर्ष के समय की विस्तृत सूचना इस के दरबारी कवि बाणभट्ट की कृति हर्ष रचित से प्राप्त होती है | इससे जुड़ी कुछ सूचनाएं कल्हण कृति राज तरंगिणी में भी मिलती है | चीनी स्रोतों से पता चलता है कि हर्ष एवं राज्यश्री दोनों साथ कन्नौज के राज सिंहासन पर बैठते थे | हर्ष ने अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानांतरित की ताकि वह राज्यश्री को प्रशासनिक कार्य में पूरी सहायता प्रदान कर सकें | अन्य धर्मों से महायान की उत्कृष्टता सिध्द करने के लिए हर्ष ने कन्नौज में विभिन्न धर्मों एवं संप्रदायों के आचार्यों की एक विशाल सभा बुलवाई | चीनी साक्ष्यों के अनुसार इस सभा में 20 देशों के राजा अपने देशों के प्रसिद्ध ब्राह्मणों , श्रमणों,  सैनिकों , राजपुरुषों शादी के साथ उपस्थित हुए थे |  इस सभा की अध्यक्षता ह्वेनसांग ने की | साथ ही हर्ष के समय प्रति पांचवी वर्ष प्रयाग संगम क्षेत्र में एक समारोह का आयोजन किया जाता था जिसे “महामोक्ष परिषद” कहा गया है | ह्वेनसांग स्वयं समारोह में उपस्थित था | इसमें 18 देशों के राजा सम्मिलित हुए थे|
  • हर्ष की विजयों के फलस्वरूप उसके राज्य की पश्चिमी सीमा नर्मदा नदी तक पहुंच गई | इधर पुलकेशिन द्वितीय भी उत्तर की ओर राज्य का विस्तार करना चाहता था ऐसी स्थिति में दोनों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया | फलत: नर्मदा के तट पर दोनों के बीच युद्ध हुआ जिसमें पुलकेशिन द्वितीय ने हर्ष को पराजित किया | पुलकेशिन द्वितीय की ऐहोल प्रशस्ति एवं ह्वेनसांग का विवरण इस युद्ध के साक्ष्य हैं |

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  • औरंगाबाद बिहार के आधिकारिक वेबसाइट पर बाणभट्ट का जन्म औरंगाबाद जिले (वर्तमान बिहार) के हिरण्यवाहु नदी के किनारे अवस्थित प्रीथिकूट पर्वत के समीप पीरु गांव में हुआ था | (कुछ अन्य वेबसाइटों पर इनका जन्म स्थान छपरा जिला दिखाया गया है) | इनके पिता का नाम चित्रभानु तथा माता का नाम राज देवी था |
  • हर्षवर्धन के समय की सर्व प्रमुख घटना चीनी यात्री ह्वेनसांग के भारत आगमन की है | उसमें तांग शासकों की राजधानी चंगन से भारत वर्ष के लिए 629 ईसवी में प्रस्थान किया | अपनी भारत यात्रा के ऊपर उसने एक ग्रंथ लिखा जिसे “सी – यू – की” कहा जाता है | इसमें भीनमाल की यात्रा की थी | इसे “यात्रियों का राजकुमारकहा जाता है | ह्वेनसांग के अनुसार सड़कों पर आवागमन पूर्णतया सुरक्षित नहीं था | अपराध अथवा निर्दोष सिद्ध करने के लिए अग्नि जल वर्षा जी द्वारा दिव्य परीक्षाएं ली जाती थी | उसके अनुसार व्यापारिक मार्ग , घाटों , बिक्री की वस्तु आदि पर भी कर लगते थे जिससे राज्य को पर्याप्त धन प्राप्त होता था | ह्वेनसांग चीन के तांग वंशी शासक ताई सुंग का समकालीन तथा इसी के राज्य का नागरिक था |
  • ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा अनुभवों को पुस्तक ए रिकॉर्ड ऑफ द वेस्टर्न रीजन्स में संकलित किया था | 637 ईसवी में ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय गया। इस समय यहां के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे | ह्वेनसांग के अनुसार मथुरा उस समय सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था। , जबकि वाराणसी रेशमी वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था।  ह्वेनसांग बताता है कि थानेश्वर की समृद्धि का प्रधान कारण वहां का व्यापार ही था | बाण ने थानेश्वर नगरी को अतिथियों के लिए चिंता मणि भूमि तथा व्यापारियों के लिए लाल भूमि बताया है |

·      हर्ष की मृत्यु के बाद कन्नौज विभिन्न शक्तियों के आकर्षण का केंद्र बन गया | इसे महोदय,  महोदयाश्री ,  आदि नामों सेअभिव्यक्त किया गया है। अतः इस पर अधिकार करने के लिए आठवीं सदी की तीन बड़ी शक्तियों :- पाल , गुर्जरप्रतिहार तथा राष्ट्रकूट के बीच त्रिकोणीय संघर्ष प्रारंभ हो गया | जो आठवीं नवीं शताब्दी के उत्तर भारत के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है | इस संघर्ष में अंततः प्रतिहारों को सफलता मिली|

·      चीनी यात्री इत्सिंग ने 671 या 672 ई.में जब वह युवक था , अपने 37 बौद्ध सहयोगियों के साथ बौद्धधर्म के अवशेषों को देखने की इच्छा से पाश्चात्य  विश्व का भ्रमण करने का निश्च्य किया। वह दक्षिण के समुद्री मार्ग से होकर भारत आया। 693-94 ई० के लगभग सुमात्रा होता हुआ वह चीन वापस लौट गया।

प्राचीनकालीन चीनी लेखकों ने भारत का उल्लेख यिन तु (yin-tu) तथा “थिआन-तु” नाम से किया है।

  • नालंदा विश्वविद्यालय बख्तियार खिलजी के अधीन तुर्क मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा 1193 ई० में नष्ट किया गया था | यह भारत में बौद्ध मत के पतन के लिए अंतिम प्रहार के रूप में देखा जाता है |  विक्रमशिला के प्राचीन बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना बंगाल के  पाल वंशीय शासक धर्मपाल (783-820 ई० )  द्वारा की गई थी |  शंकराचार्य को शंकर ,श्री शंकराचार्य आदि नामों से भी जाना जाता है। 8वीं शताब्दी में इनका जन्म केरल के एक छोटे से गांव कलाड़ी में हुआ था। उनके दर्शन को अद्वैत वेदांत के नाम से जाना जाता है।शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ वर्तमान में भी हिंदू धर्म के पथ-प्रदर्शक माने जाते हैं। इनका विवरण इस प्रकार है –
  1. श्रृंगेरी (कर्नाटक) – दक्षिण में
  2. द्वारिका (गुजरात) – पश्चिम में
  3. पुरी (ओड़िशा) – पूर्व में तथा
  4. ज्योर्तिमठ (जोशीमठ, उत्तराखंड) – उत्तर में
  • चारधाम में –
  1. बद्रीनाथ
  2. द्वारिका
  3. पुरी
  4. रामेश्वरम

आते  हैं जबकि छोटा चाऱधाम में उत्तराखंड मे स्थित  गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ तथा बद्रीनाथ आते हैं।

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  • गुप्त वंश ने 275-550 ई. तक शासन किया। इस वंश की स्थापना लगभग 275 ई. में महाराज श्रीगुप्त द्वारा की गई थी, किंतु गुप्त वंश का प्रथम शक्तिशाली शाक चन्द्रगुप्त प्रथम था, जिसने 319-335 ई. तक शासन किया। इसने अपनी महत्ता सूचित करने के लिए अपने पूर्वजों के विपरीत महाराजाधिराज की उपाधि धारण की।
  • वाकाटक शासक प्रवरसेन प्रथम ने चार अश्वमेध यज्ञों का संपादन किया। इसके साथ ही उसने अनेक वैदिक यज्ञ भी किए। इसी वंश के शासक प्रवरसेन द्वीतीय की रुचि साहित्य मे थी, उन्होने सेतबंध नामक ग्रंथ की रचना की।
  • इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने अपनी रचना अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया में समुद्रगुप्त विंसेंट स्मिथ ने अपनी रचना अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया में समुद्रगुप्त की वीरता एवं विजयों पर मुग्ध होकर उसे भारतीय नेपोलियन की संज्ञा दी है।
  • गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वीतीय विक्रमादित्य का एक अन्य नाम देवगुप्त मिलता है। इसका प्रमाण सांची एवं वाकाटक अभिलेखों से मिलता है। उसके अन्य नाम देवराज तथा देवश्री भी मिलते हैं.
  • चन्द्रगुप्त द्वीतीय विक्रमादित्य वह प्रथम गुप्त शासक था, जिसने परम भागवत की उपाधि धारण की थी। मेहरौली लेख के अनुसार, उसने विष्णुपद पर्वत पर विष्णुध्वज की स्थापना कराई थी।
  • इलाहाबाद का अशोक स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त (335-375 ई.) के शासन के बारे मे सूचना प्रदान करता है। इस स्तंभ पर समुद्रगुप्त के संधि विग्रहिक हरिषेण ने संस्कृत भाषा में प्रशंसात्मक वर्णन प्रस्तुत किया है, जिसे प्रयाग प्रशस्ति कहा गया है। इसमें समुद्रगुप्त की विजयों का उल्लेख है।
  • इतिहासकार तेज रामशर्मा ने अपनी पुस्तक ए पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ द इंपीरियल गुप्ताज में उल्लेख किया है कि समुद्रगुप्त ने अश्वमेघ यज्ञ किया जिसके बाद उसने पृथिव्यामा प्रतिरथ की उपाधि ग्रहण की जिसका अर्थ है – ऐसा व्यक्ति  जिसका पृथ्वी पर कोई प्रतिद्वंधी न हो (पृथ्वी का प्रथम वीर)।
  • हूणों का पहला भारतीय आक्रमण गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के शासनकालत में (455 ई. में) हुआ तथा स्कंदगुप्त के हाथों वे बुरी तरह परास्त हुए। यह आक्रमण एक धावा मात्र रहा और देश के ऊपर इसका कोई तात्कालिक प्रभाव नही  पड़ा किंतु परोक्ष रुप से इसने गुप्त साम्राज्य के पतन की गति को तेज कर दिया। स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद 5वं शताब्दी ई. के अंत तथा 6वीं शताब्दी ई. के प्रारंभ में उत्तर-पश्चिम के कई क्षेत्रों पर हूणों ने कब्जा कर  लिया था।
  • उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में सैदनपुर तहसील मे भितरी नामक स्थान से भितरी स्तंभ-लेख मिलता है। इसमें पुष्यमित्रों और हूणों के साथ स्कंदगुप्त के युध्द का वर्णन मिलता है। उल्लेखनीय है कि हूणों का पहला भारतीय आक्रमण गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के शासनकाल में (455 ई.में) हुआ जिसमें वे स्कंदगुप्त से बुरी तरह पराजित हुए।
  • ईसा की तीसरी सदी से जब हूण आक्रमण से रोमन साम्राज्य का पतन हो गया, तो भारतीय दक्षिण-पूर्व एशियाई व्यापार पर अधिक निर्भर हो गए।
  • गुप्तकाल में बंगाल में ताम्रलिप्ति एक प्रमुख बंदरगाह था, जहां से उत्तर भारतीय व्यापार एवं साथ ही दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, लंका, जावा, सुमात्रा आदि देशों के साथ व्यापार होता था। पश्चिमी भारत का प्रमुख बंदरगाह भृगुकच्छ (भड़ौच) था। जहां से पश्चिमी देशों के साथ समुद्री व्यापार होता था।
  • भारत ने दक्षिण-पूर्वी एशिया के साथ अपने आरंभिक सांस्कृतिक संपर्क तथा व्यापारिक संबंध बंगाल की खाड़ी के पार बना रखे थे। इसका प्रमुख कारण बंगाल की खाड़ी में चलने वाली मानसूनी हवाओं के द्वारा समुद्री यात्रा का सुगम होना था।
  • चन्द्रगुप्त द्वीतीय विक्रमादित्य के कुशल शासन की प्रशंसा चीनी यात्री फाह्यान ने भी की है। इनके नवरत्नों की प्रसिध्दि सर्वकालिक रही है। नवरत्नों में सर्वोत्कृष्ट महाकवि कालिदास थे। जबकि क्षणपक रत्न फलित ज्योतिषी थे।
  • गुप्तकाल में स्वर्ण मुद्रा को दीनार कहा जाता था। चीनी यात्री फाह्यान के अनुसार, लोग दैनिक क्रय-विक्रय में कौडियों का प्रयोग करते थे।
  • गुप्त शासकों के सिक्के उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा (ओडिशा) में पाए गए हैं। सिक्कों का सबसे प्रसिध्द प्राप्ति स्थल राजस्थान का भरतपुर (बयाना) है। इनके द्वारा जारी किए गए चांदी के सिक्के रुपक कहलाते थे तथा स्वर्ण मुद्राओं को दीनार कहा जाता था।
  • गुप्तकाल में लिखित संस्कृत नाटकों में स्त्री और शूद्र प्राकृत भाषा बोलते थे, जबकि उच्च वर्ण के लोग संस्कृत भाषा बोलते थे।
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  • सती प्रथा का प्रथम अभिलेखिक साक्ष्य एरण से प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख 510 ई. का है। जिसमें गोपराज नामक सेनापति की स्त्री के सती होने का उल्लेख है।
  • गुप्त संवत का प्रवर्तक चन्द्र गुप्त प्रथम था। इसकी तिथि 319 ई. है।
  • गुप्त वंश के शासकों ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिए थे। गुप्त लेखों मे जिन भूमिदानों का उल्लेख किया गया है उससे यह स्पष्ट होता है कि भूमिदान के साथ-साथ गांव की भूमि से उत्पन्न होने वाली आय भी ग्रहीता को सौंप दी जाती थी।
  • गुप्तकाल मे कला एवं साहित्य मे हुई प्रगति के आधार पर इस काल को प्राचीन भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है।
  • गुप्तकाल में जो लोग राजकीय भूमि पर कृषि करते थे, उन्हें अपनी उपज का एक भाग राजा को कर के रुप में देना पड़ता था, जो सामान्यतः षष्ठांश तक होता था। गुप्त अभिलेखों में भूमि कर को उद्रंग तथा भागकर कहा गया है।
  • प्रायः सभी धर्मशास्त्रों में भू-राजस्व की दर 1/6 (उपज का छठां भाग) थी।
  • वह भूमि जिस पर खेती न की गई हो, अप्रहत भूमि कहा जाता था। यह गुप्तकालीन राजस्व  व्यवस्था का एक पद है।
  • चीनी यात्री सुंगयुन 518 ई. में भारत आया। इसने अपने तीन वर्षों की यात्रा में बौध्द धर्म की प्रतियाँ एकत्रित की थी।
  • सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन के प्राचीनतम संप्रदायों मे परिगणित है। महर्षि कपिल को सांख्य दर्शन का प्रतिष्ठापक आचार्य माना जता है। कहा जाता है कि उन्होने सांख्य-सूत्र एवं तत्वसमास नामक ग्रंथों की रचना की थी।
  • महाभाष्य के लेखक पतंजलि शुंग वंश के संस्थापक शासक पुष्यमित्र शुंग (185-149 ई.पू.) के समकालीन थे।
  • हर्षचरित ग्रंथ की रचना सुप्रसिध्द लेखक बाणभठ्ठ ने की थी। यह वर्ध्दन वंश के इतिहास का प्रमुख स्रोत है। यह एक आख्यायिका है, जिसमें लेखक अपने समकालीन शासक तथा उसके पूर्वजों के जीवनवृत्त का वर्णन प्रस्तुत करता है।
  • बाणभठ्ठ का जन्म औरंगाबाद जिले के (वर्तमान शहर) सोन नदी के किनारे अवस्थित प्रीथिकूटा नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम चित्रभानु तथा माता का नाम राजदेवी था।
  • गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में रेशम के लिए कौशेय शब्द का प्रयोग होता था।
  • हरिषेण प्रयाग-प्रशस्ति का रचयिता तथ समुद्रगुप्त का संधिविग्रहिका सचिव था, जबकि हर्ष का दरबारी कवि बाणभठ्ठ था।
  • अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी का दरबारी कवि था। कालिदास चन्द्रगुप्त द्वीतीय के दरबारी कवि एवं नवरत्नों में से एक थे।

 

प्राचीन भारत में स्थापत्य कला

  • मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो में चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित मंदिर आज भी चंदेल स्थापत्य की उत्कृष्टता का बखान कर रहे हैं | इन मंदिरों का निर्माण 950-1050 ई के बीच कराया गया था | यहां के मंदिरों में कंदरिया महादेव मंदिर सर्वोत्तम है | खजुराहो में 85 मंदिर के निर्माण का उल्लेख मिलता है वर्तमान में इनमें से 30 मंदिर ही शेष है |
  • यह मंदिर वैष्णव , शैव , शाक्त एवं जैन धर्म से संबंधित है | यहां का मांतगेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है | यह मंदिर संभवत: राजा धंग के काल में निर्मित हुआ | इन मंदिरों के निर्माण शैली नागर है। जैन मंदिरों में ‘ पार्श्वनाथ मंदिर ‘ प्रसिद्ध है | यहां के अन्य मंदिर है – चौसठ योगिनी , ब्रह्मा , लालगुंआ महादेव , लक्ष्मण , विश्वनाथ मंदिर आदि| यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक स्थलों में खजुराहो का मंदिर , भीमबेटका की गुफाएं एंव सांची का स्तूप शामिल है |
  • दशावतार मंदिर देवगढ़ (झांसी) में स्थित है तथा यह मंदिर गुप्तकालीन है | प्राचीन भारत में गुप्त काल से संबंधित गुफा चित्रांकन के केवल दो उदाहरण उपलब्ध है | इनमें से एक अजंता की गुफाओं में किया गया चित्रांकन है | दूसरा उदाहरण बाघ की गुफाएं हैं जिनकी तिथि गुप्तकालीन है | इन गुफाओं के चित्र लोक जीवन से संबंधित हैं तथा अजंता गुफाओं के चित्र बौद्ध धर्म से संबंधित है |
  • महाराष्ट्र में मुंबई से लगभग 200 मील उत्तर मे कन्हेरी नामक गुफाओं का एक विशाल समूह स्थित है | अनेक वर्षों तक इन गुफाओं में बौद्ध भिक्षुओं का निवास रहा | ये गुफाएं आठवी व नौवीं सदी की है |
  • माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं , जिनका निर्माण गुजरात के चालुक्य ( सोलंकी ) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमल शाह ने करवाया था | यह जैन मंदिर अपनी नक्काशी सुंदर मीनाकारी के लिए प्रसिद्ध है | पालीताणा का पवित्र जैन मंदिर गुजरात के भावनगर जिले की शत्रुंजय पहाड़ियों पर स्थित है |
  • ऐलीफेंटा ( मुंबई से समुद्र में 7 मील उत्तर-पूर्व स्थित द्वीप ) के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूट शासकों द्वारा कराया गया था |  यहां से 5 गुफा मंदिर प्राप्त हुए हैं जिनमें हिंदू धर्म ( मुख्यतः शिव )  से संबंधित मूर्तियां हैं | साथ ही यहां दो बौद्ध गुफाएं भी हैं |  इन गुफाओं का निर्माण काल पांचवी से आठवीं सदी के बीच माना जाता है |  यहां पर प्रसिद्ध त्रिमूर्ति शिव की प्रतिमा प्राप्त हुई है |
  • एलोरा महाराष्ट्र के औरंगाबाद से लगभग 25 किमी पश्चिमोत्तर में स्थित है। यह शैलकृत गुफा मंदिरों के लिए जग प्रसिद्ध है। यहां कुल 34 शैलकृत गुफाएं हैं। ये गुफाएं विभिन्न कालों में बनी है तथा इनमें गुफा सं० 1 से 12 तक बौद्धों तथा 13 से 29 तक हिंदुओं और 30 से 34 तक जैनियों से संबंधित हैं। जो थोडे-थोड़े अंतर बर बनी हैं। एलोरा का कैलाश मंदिर शैलकृत स्थापत्य का उदाहरण है। द्रविड़ शैली के इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने करवाया था।
  • पश्चिमी भारत में प्राचीनतम शैलकृत गुफाएं नासिक , एलोरा एवं अजंता में है | * ये तीनों स्थल महाराष्ट्र में स्थित हैं| नासिक की बौद्ध गुफाएं सुविख्यात हैं , उन्हें ‘ पांडुलेण ‘  कहा जाता है
  • राष्ट्रकूट शासकों के समय वैसे तो ब्राह्मण धर्म का महत्व था किंतु ब्राह्मण धर्म की तुलना में जैन धर्म का अधिक प्रचार प्रसार था तथा इसे राजकीय संरक्षण भी प्राप्त था | * राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष का गुरु जैनाचार्य जिनसेन था जिसने आदि पुराण की रचना थी | उस समय शासकों तथा सामंतों के साथ-साथ सेनापति पदों पर भी अनेक जैन धर्मानुयायियों की नियुक्ति की जाती थी |
  • अजंता की गुफाएं वाकाटकों के अधीन राजसी संरक्षण और जागीरदारों द्वारा निर्मित करवाई गई थी | * अजंता की गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण ‘ मरणासन्न राजकुमारी का चित्र ‘ प्रशंसनीय है | * इस चित्र की प्रशंसा करते हुए ग्रिफिथ , वर्गेस एवं फर्गुसन ने कहा ‘ करुणा , भाव एवं अपनी कथा को स्पष्ट ढंग से कहने की दृष्टि से यह चित्रकला के इतिहास में अनतिक्रमणीय है।
  • गुफा संख्या 16 को वाकाटक शासक हरिषेण ( 475-500 ई. ) के मंत्री वराहदेव ने बौद्ध संघ को दान में दिया था। * अजंता के चित्र तकनीकी दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान रखते हैं। * इन गुफाओं में अनेक प्रकार के फूल – पत्तियों , वृक्षों तथा पशु आकृति की सजावट तथा बुद्ध एवं बोधिसत्वों की प्रतिमाओं के चित्रण में जातक ग्रंथों से ली गई कहानियों का वर्णनात्मक दृश्य के रूप में प्रयोग हुआ है। * ये चित्र अधिकतर जातक कथाओं को दर्शाते है।
  • पुरी स्थित कोणार्क का विशाल सूर्य देव का मंदिर नरसिंह देववर्मन प्रथम चोडगंग ने बनवाया था | * यह मंदिर 13वीं शताब्दी का है तथा यह अपनी विशिष्ट शैली के लिए प्रसिद्ध है | * इस मंदिर का आधार एक विशाल चबूतरा है | * इसके चारों ओर पत्थर के तराशे हुए 12 पहिए लगे हुए हैं और सूर्य के रथ का पूरा आभास देने के लिए चबूतरे के सामने जो सीढ़ियां है उनसे सात अश्वों की स्वतंत्र मूर्तियां लगी है , मानो के सातों घोड़े रथ को खींच रहे हो | * कोणार्क के सूर्य मंदिर को ‘ काला पैगोडा (Black Pagoda) ‘ भी कहा जाता है |

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  • लिंगराज मंदिर उड़ीसा के भुवनेश्वर में स्थित है। इस मंदिर की शैली नागर है | * यह आर्य नागर शैली का सर्वोत्तम मंदिर है | * लिंगराज मंदिर का सबसे आकर्षक भाग है इसका शिखर है जिसकी ऊंचाई 180 फीट है | * जगन्नाथ मंदिर उड़ीसा राज्य के पुरी जिले में स्थित है। यह मंदिर नागर शैली में बना है | * मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर गुजरात में स्थित है | * इसका निर्माण सोलंकी वंश के राजा भीमदेव द्वारा 1026 ईस्वी में कराया गया था |
  • अंकोरवाट मंदिर समूह का निर्माण कंपूचिया ( वर्तमान कंबोडिया ) के शासक सूर्यवर्मन II द्वारा 12वी शताब्दी के प्रारंभ में अपनी राजधानी यशोधरपुर ( वर्तमान-अंगकोर ) में कराया गया था। * विष्णु को समर्पित द्रविड़ शैली का यह मंदिर विश्व का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर समूह है। * बोरोबुदुर का प्रख्यात स्तूप इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित है | * यह एक यूनेस्को द्वारा मान्य ‘ विश्व विरासत स्थल ‘ ( world heritage site ) है।
  • पाण्ड्यो के राज्यकाल में द्रविड़ शैली में मंदिरों का निर्माण हुआ | * इस काल में मंदिर छोटे होते थे किंतु उनके प्रांगण के चारों ओर अनेक प्राचीर बनाए जाते थे। ये प्राचीर तो सामान्य होते थे किंतु इनके प्रवेश द्वार जिन्हें ‘ गोपुरम ‘ कहा जाता था। * भव्य एवं विशाल और प्रचुर मात्रा में शिल्पकारिता से अलंकृत होते थे।
  • मामल्ल शैली (640-674 ई.) का विकास नरसिंह वर्मा प्रथम महामल्ल के काल में हुआ। * इसके अंतर्गत दो प्रकार के स्मारक बने – मण्डप तथा एकाश्मक मंदिर जिन्हें रथ कहा गया है। * पल्लव कला की राजसिंह शैली , जिसका प्रारंभ नरसिंह वर्मन द्वितीय ‘ राजसिंह ‘ ने किया था , के तीन मंदिर महाबलीपुरम से प्राप्त होते हैं। – शोर मंदिर (तटीय शिव मंदिर) , ईश्वर मंदिर तथा मुकुंद मंदिर | * शोर मंदिर इस शैली का प्रथम उदाहरण है |* महाबलीपुरम में रथ मंदिरों का निर्माण पल्लव शासक द्वारा करवाया गया था | * यह मंदिर एकाश्म पत्थर से निर्मित है | * पल्लव कालीन मामल्ल शैली से बने रथों या एकाश्म  मंदिरों में द्रौपदी रथ सबसे छोटा है इसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता | * तथा यह सिंह एवं हाथी जैसे पशुओं के आधार पर टिका हुआ है |
  • श्रीनिवासननल्लूर का कोरंगनाथ मंदिर चोल शासक परांतक प्रथम के काल में निर्मित हुआ था | * तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर अथवा बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण राजराज प्रथम के काल में निर्मित हुआ था | * इसके निर्माण में ग्रेनाइट पत्थरों का प्रयोग हुआ |
  • राजराज के पुत्र राजेंद्र चोल के शासनकाल में गंगेकोंडचोलपुरम में मंदिर का निर्माण हुआ | * राजराज द्वितीय द्वारा दारासुरम का ऐरावतेश्वर का मंदिर तथा कुलोतुंग तृतीय द्वारा त्रिभुवनम् का कम्पहरेश्वर मंदिर बनवाए गए | * कम्पहरेश्वर को त्रिभुवनेश्वर भी कहा जाता है | * इसकी योजना भी ऐरावतेश्वर मंदिर के ही समान है | * इसमें मूर्तिकारी की अधिकता है | * नीलकंठ शास्त्री ने इसे ‘ मूर्ति दीर्घा ‘ कहा है |

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  • तक्षशिला की स्थापना सातवीं अथवा छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में की गई थी | * जिस पहाड़ी पर तक्षशिला के सबसे पहले कस्बें की स्थापना की गई थी वह सिंधु नदी क्षेत्र में तामरा नाला के समीप स्थित है | * यह वर्तमान इस्लामाबाद से 30 किलोमीटर उत्तर -पश्चिम में स्थित है ,जो सिंधु व झेलम नदियों के मध्य का क्षेत्र है | * तक्षशिला हिंदूज राज्य ( or indus country ) की राजधानी थी और प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध थी |
  • सोनगिरि दतिया (मध्य प्रदेश ) से 15 किलोमीटर दूरी पर स्थित है | * यह दिगंबर जैनियों का पवित्र स्थल है | * सोनगिरी के चारो और सफेद जैन मंदिर स्थापित है | * वर्तमान में यहां 77 जैन मंदिर पहाड़ी पर और 26 गांव में स्थित है | * इस प्रकार इनकी कुल संख्या 103 है | * पहाड़ी पर स्थित 57वां मंदिर मुख्य मंदिर है , जो भगवान चंद्रप्रभु से संबंधित है
  • विरुपाक्ष मंदिर कर्नाटक राज्य के बेंगलुरु शहर से 350 किलोमीटर दूर हम्पी ( hampi ) में स्थित है | * यह मंदिर भगवान शिव के नाम अर्पित है , जो यहां विरुपाक्ष के नाम से जाने जाते हैं |
  • नागर, द्रविड़ तथा बेसर भारतीय मंदिर वास्तु के तीन मुख्य शैलियां है | * नागर शैली समस्त उतरी भारत में प्रचलित है | * उड़ीसा के मंदिर शुद्ध रूप से इसी शैली के हैं | * द्रविड़ शैली का प्रसार दक्षिण भारत विशेषकर कृष्णा नदी एवं कुमारी अंतरीप के मध्य ( तमिलनाडु ) में था | * बेसर शैली का विकास , नागर एवं द्रविड़ शैली के मिश्रण से हुआ है | * कन्नड़ प्रदेश के अंतिम चालुक्य शासकों के द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इस शैली को चालुक्य शैली भी कहते हैं। *
  • पंचायतन शब्द मंदिर रचना -शैली को निर्दिष्ट करता है | * बद्रीनाथ कूपर द्वारा रचित ‘ बृहत् प्रमाणिक हिंदी कोष ‘ के अनुसार , पंचायतन एक पुलिंग शब्द है जो किसी देवता और उसके साथ के 4 देवताओं की मूर्ति के समूह के लिए प्रयुक्त होता है जैसे – शिव पंचायतन , राम पंचायतन आदि |
  • बद्रीनाथ मंदिर में पांच मूर्तियां है , जो बद्री पंचायतन के नाम से प्रसिद्ध है | * राजस्थान के उदयपुर में स्थित जगदीश मंदिर शिल्प कला की दृष्टि से अनोखा है | * यह मंदिर पंचायतन शैली का है। चार लघु मंदिरों से परिवृत्त होने के कारण इसे पंचायतन कहा गया है।
  • प्रसिद्ध नैमिषारण्य तीर्थ उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित है | * यहां महर्षि दधीचि ने देवताओं को अपनी अस्थियां दान की थी, जिससे निर्मित वज्र द्वारा देवराज इंद्र ने दैत्यों का वध किया था।

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  • मध्य प्रदेश में छतरपुर जिले में स्थित खजुराहों में चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित आज भी चंदेल स्थापत्य की उत्कृष्टता का बखान कर रहे हैं। इन मंदिरों का निर्माण 950-1050 ई. के बीच कराया गया था। यहां के मंदिरों में कंदरिया महादेव मंदिर सर्वोत्तम है।
  • खजुराहों में 85 मंदिरों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। ये मंदिर चंदेल शासकों द्वारा बनवाए गए। वर्तमान में इनमे से 30 मंदिर ही शेष हैं। ये मंदिर वैष्णव, शैव,  शाक्त एवं जैन धर्म से संबंधित हैं।
  • खजुराहों का मातंगेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर संभवतः राजा धंग के काल में निर्मित हुआ। इन मंदिरों की निर्माण शैली नागर है।
  • दशावतार मंदिर (झांसी) में स्थित है तथा यह मंदिर गुप्तकालीन है।
  • यूनेस्कों की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल म.प्र. के ऐतिहासिक स्थलों में खजुराहों का मंदिर, भीमबेटका की गुफाएं एवं सांची का स्तूप शामिल हैं।
  • ग्वालियर के तेली मंदिर का शिखर द्रविड़ शैली मे बना है। जबकि नक्काशियां एवं मूर्तियां उत्तर भारतीय शैली में बनी है। इसकी वास्तु शैली में हिंदू और बौध्द वास्तुकला का मिश्रण है।
  • महाराष्ट्र में मुंबई से लगभग 200 मील उत्तर में कन्हेरी नामक गुफाओं का एक विशाल समूह स्थित है। अनेक वर्षों तक इन गुफाओं मे बौध्द भिक्षुओं का निवास रहा। ये गुफाएँ 8वीं-9वी शताब्दी की हैं.
  • आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिर संगमरमर के बने हैं, जिनका निर्माण गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक भीमदेव प्रथम के सामंत विमलशाह ने करवाया था।
  • पालिताणा का पवित्र जैन मंदिर  गुजरात के भावनगर  जिल की शत्रुंजय पहाड़ियों पर अवस्थित है। यह मंदिर जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है।
  • गुप्तकाल में चित्रांकन का दूसरा उदाहरण बाघ की गुफाएं हैं जिनकी तिथि गुप्तकालीन है। इन गुफाओं के चित्र लोक जीवन से संबंधित हैं तथा अजंता गुफाओं के चित्र बौध्द धर्म से संबंधित हैं। जबकि लोमस ऋषि गुफा मौर्यकालीन है, जो कि बराबर की पहाड़ियों मे स्थित है, जो बिहार  के जहानाबाद जिले में है। नासिक गुफाएँ सातवाहन काल की हैं।
  • एलोरा महाराष्ट्र के औरंगाबाद से लगभग 30 किमी. पश्चिमोत्तर मे स्थित है। यह शैलकृत गुफा मंदिरों के लिए जग-प्रसिध्द है। यहां कुल 34 शैलकृत गुफाएँ हैं। ये  गुफाएं विभिन्न कालों में बनी है और इनमें गुफा  सं. 1 से 12 तक बौध्दो तथा 13 से 29 तक हिंदुओं  और 30 से  34 तक जैनियों से संबंधित हैं, जो थोडे-थोड़े अंतर पर बनी है।

 

दक्षिण भारत (चोल, चालुक्य, पल्लव एवं संगम युग)

  • संगम कालीन साहित्य में कोन, को एवं मन्नन शब्द को राजा के लिए प्रयुक्त किया जाता था। संगम का तात्पर्य कवियों की गोष्ठी से है। इन  गोष्ठियों (संगमों) में कवियों द्वारा रचा गया साहित्य संगम साहित्य कहलाता है। संगम युग में दक्षिण भारत में पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में तीन संगम आयोजित किए गए थे –

प्रथम संगम

स्थान

मदुरई

 

अध्यक्षता

अगस्त्य ऋषि

द्वीतीय संगम

स्थान

कपाटपुरम (अलैवाई)

 

अध्यक्षता

अगस्त्य ऋषि

तृतीय संगम

स्थान

मदुरई

 

अध्यक्षता

नक्कीरर

 

  • दक्षिण भारत के आर्यकरण का श्रेय अगस्त्य ऋषि को जाता है | इन्हें तमिल साहित्य के जनक के रूप में जाना जाता है | तोल्काप्पियम द्वितीय संगम का एकमात्र अवशिष्ट ही नहीं प्रत्युत अद्यतन  उपलब्ध तमिल साहित्य का प्राचीनतम ग्रंथ है | इसके प्रणायनकर्ता तोल्काप्पियर ऋषि अगस्त्य के 12 योग्य शिक्षकों में से एक थे | * यह एक व्याकरण ग्रंथ है | * इसकी रचना सूत्र शैली में की गई है। * व्याकरण के साथ-साथ यह काव्य शास्त्र का भी एक उच्चकोटि का ग्रंथ है |
  • शिलप्पादिकारम ‘ का लेखक इलंगो आडिगल था | * यह संगम साहित्य का महत्वपूर्ण काव्य है | * इसका लेखक चोल नरेश करिकाल का पौत्र था | *इस ग्रंथ में पुहार या कावेरीपट्टनम के एक धनाड्य व्यापारी के पुत्र कोवलन एवं उसकी अति सुंदर किंतु दुर्भाग्यशालिनी पत्नी कन्नगी से संबंधित दुःखद एवं मार्मिक कथा का वर्णन है। * तिरुक्कुरल तमिल भाषा में रचित काव्य रचना है। जिसमें नीतिशास्त्र का वर्णन है। * इसके रचयिता तिरुवल्लुर हैं। *
  • तोल्काप्पियन तमिल भाषा के व्याकरण की पुस्तक हैं।* कुरल तमिल साहित्य का बाइबिल तथा लघुवेद माना जाता है। * इसे मुप्पाल भी कहा जाता है। * इसकी रचना सुप्रसिद्ध कवि तिरुवल्लुवर ने की थी। * अनुश्रुतियों के अनुसार , तिरुवल्लुवर ब्रह्मा के अवतार थे।
  • पल्लव शासक सिंहविष्णु ( 575-600 ई ) ने ‘ अवनिसिंह ‘ की उपाधि धारण की थी। * कशाकुडी दानपात्र से ज्ञात होता है कि सिंहविष्णु ने चोल , पाण्ड्य , सिंहल तथा कलम्र के राजाओं को पराजित किया | * नरसिंहवर्मन प्रथम ( 630-638 ई ) ने ‘ महामल्ल ‘ की उपाधि धारण की थी। * परमेश्वरवर्मन प्रथम ( 670-700 ई ) ने लोकादित्य , एकमल्ल , रणंजय , अत्यंतकाम , उग्रदंड , गुणभाजन आदि उपाधियां ग्रहण की। * महेंद्रवर्मन प्रथम ( 600-630 ई ) ने ‘ मत्तविलासप्रहसन ‘ नामक हास्य ग्रंथ की रचना की थी।
  • संगम साहित्य में केवल चोल , चेर , पाण्ड्य राजाओं के उद्भव और विकास का विवरण प्राप्त होता है। * चोल स्थापत्य के उत्कृष्ट नमूने तंजौर के शैव मंदिर , जो राजराजेश्वर या बृहदीश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं , का निर्माण राजराज प्रथम के काल में हुआ था। * भारत के मंदिरों में सबसे बड़ा तथा लंबा यह मंदिर द्रविड़ शैली का  सर्वोत्तम नमूना माना जा सकता है। * इस मंदिर के बहिर्भाग में नंदी की एकाश्म विशाल मूर्ति बनी है जिसे भारत की विशालतम नंदी मूर्ति माना जाता है।
  • कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों से लेकर कुमारी अंतरीप तक का विस्तृत भूभाग प्राचीन काल में तमिल प्रदेश का निर्माण करता था। * इसमें कोरोमंडल तट तथा दक्कन के कुछ भाग यथा -उरैयूर , कावेरीपट्टनम , तंजावुर आदि चोलो के अधिकार में थे।
  • परांतक – I के अंतिम दिनों में राष्ट्रकूट शासक कृष्णा III ने पश्चिमी गंगों ( बुत्तुग – II ) की सहायता से तक्कोलम के युद्ध में चोलों को परास्त किया और तंजौर पर अधिकार कर लिया। * कृष्णा III  ने इस उपलक्ष्य में ‘तंजैयुकोंड ‘ की उपाधि धारण की थी।
  • चोलों की राजधानी तंजौर थी। * इसके अतिरिक्त गंगैकोंडचोलपुरम भी चोलों की राजधानी थी। * संगम काल में चोलों की राजधानी उरैयूर थी। * द्रविड़ देश में चोल अधिपत्य की स्थापना वस्तुतः परांतक प्रथम ने की थी। * उसने मदुरा के पाण्ड्य राजा को हराकर ‘ मदुरैकोंड उपाधि ‘ धारण की थी। * राजराज I ने सर्वप्रथम चेरों की नौसेना को कंडलूर में परास्त किया। * राजराज प्रथम एंव उसके पुत्र  राजेंद्र I ने दक्षिणी – पूर्वी एशिया के शैलेन्द्र साम्राज्य के विरुद्ध सैन्य चढ़ाई की तथा कुछ क्षेत्रों को जीत लिया।
  • चोल शासक राजराज प्रथम ने सिंहल ( श्रीलंका ) पर आक्रमण करके उत्तरी सिंहल को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया | * विजित क्षेत्र में राजराज ने अनुराधापुर को नष्ट कर पोलोन्नरूवा को इस क्षेत्र की राजधानी बनाया और इसका नाम ‘ जननाथ मंगलम् ‘ रखा।
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  • राजराज प्रथम की मृत्यु के बाद उसका योग्यतम् पुत्र राजेंद्र प्रथम सम्राट बना। * उसने अपने पिता की साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ाया | * राजेंद्र प्रथम का काल चोल शक्ति का चरमोत्कर्ष काल था। * उसने ‘ बंगाल की खाड़ी ‘ को ‘ चोल झील ‘ का स्वरूप प्रदान कर दिया था। * 1017 ई में उसने संपूर्ण सिंहल द्वीप ( श्रीलंका ) की जीत लिया तथा वह सिंहल राजा महेंद्र पंचम को बंदी बनाकर चोल राज्य ले आया। * उसने पवित्र गंगाजल लाने के उद्देश्य से उत्तर पूर्वी भारत ( गंगा घाटी ) पर आक्रमण किया तथा पाल शासक महीपाल को पराजित किया।
  • इस विजय के उपलक्ष्य  में उसने  गंगैकोंड  की उपाधि   ग्रहण की तथा गंगैकोंडचोलपुरम  नामक नई  राजधानी की स्थापना की  |  नवीन राजधानी  के निकट ही   उसने सिंचाई  के लिए  चोलगंगम  नामक विशाल  तालाब का भी  निर्माण करवाया।  कुलोत्तुंग  प्रथम के समय में श्रीलंका के  राजा विजयबाहु  ने अपनी स्वतंत्रता घोषित की।  किंतु कुलोत्तुंग  प्रथम ने श्रीलंका  में चोल  प्रभाव की   समाप्ति के प्रति  किसी कटुता का   प्रदर्शन  नही किया  तथा  उसने अपनी   पुत्री का  विवाह  श्रीलंका के  राजकुमार वीरप्पेरूमाल के साथ कर  दिया। 
  • चोल शासक कुलोत्तुंग -1 के शासनकाल में  1077 ई०  में  72  सौदागरों का  एक चोल  दूत मंडल  चीन भेजा  गया था | कुलो्तुंग   प्रथम को   चोल लेख  में “शुंगम   तविर्त ”  अर्थात् करो  को हटाने  वाला कहा गया  है।  

·      चोल साम्राज्य को प्रशासन की सुविधा के लिए छः प्रांतों में विभाजित किया गया था।प्रांत को “मंडलम”   कहा जाता था।प्रांत का विभाजन “कोट्टम”  अथवा “वलनाडु”  में हुआ था।यह कमिश्नरियों की तरह था।   प्रत्येक कोट्टम में कई नाडु होते हैं   |  जिले को नाडु कहा जाता था।नाडु की सभा को नाट्टार कहा जाता था।ग्राम संघ को कुर्रम कहा जाता था। व्यापारित   नगरों में  नगरम  नामक  व्यापारियों  की सभा  होती थी होती थी। प्रशासन  की सबसे  छोटी  इकाई  ग्राम-सभा   होती थी।  चोलों के  अधीन  ग्राम प्रशासन  में ग्राम सभा की कार्यकारिणी  समितियों की कार्यप्रणाली  का विस्तृत  विवरण  हम उत्तर मेरुर से प्राप्त  लेखों  के माध्यम  से प्राप्त  करते हैं  |

·       चोल कालीन  गांवों के  गतिविधियों  की देख-रेख   एक  कार्यकारिणी  समिति  करती थी  जिसे वारियम्  कहा जाता  था | उद्यान  प्रशासन  का कार्य  देखने  वाली  समिति  को टोट्ट  वारियम  कहा जाता है,  जबकि संवत्सर  वारियम्  वार्षिक  समिति ,  एरि  वारियम तालाब समिति  तथा पोनवारियम्  स्वर्ण समिति  थी।|

  • चोल कलाकारों ने तक्षण कला में भी सफलता प्राप्त की है | उन्होंने पत्थर तथा धातु की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण किया | पाषाण मूर्तियों से भी अधिक धातु (कांस्य ) मूर्तियों का निर्माण हुआ | सर्वाधिक सुंदर मूर्तियां नटराज शिव की है ,  जो बड़ी संख्या में मिली है |  इन्हीं विश्व की श्रेष्ठतम प्रतिमा रचनाओं में शामिल किया जाता है | यह मूर्तियां प्रायः चतुर्भुज है |  शिव की दक्षिणामूर्ति प्रतिमा उन्हें गुरु (शिक्षक) के रूप में प्रदर्शित करती है | इस रूप में शिव अपने भक्तों को सभी प्रकार का ज्ञान प्रदान करते हुए माने गए हैं | इस रूप में शिव की दक्षिण दिशा में मुख किए हुए प्रतिमा स्थापित की गई है |
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  • चोल राजाओं ने एक विशाल संगठित सेना का निर्माण किया था | चोल सेना में कुल सैनिकों की संख्या लगभग 150000 थी | चोलों के पास अश्व , गज एवं पैदल सैनिकों के साथ ही साथ एक अत्यंत शक्तिशाली नौसेना भी थी | इसी नौसेना की सहायता से उन्होंने श्री विजय , सिंघल  , मालदीव आदि दीपों की विजय की थी | चोल काल के सम्राट प्रायः अपने जीवनकाल में ही युवराज का चुनाव कर लेते थे, जो उसके बाद उसका उत्तराधिकारी बनता था |

·      चोल साम्राज्य को अंततः अलाउद्दीन खिलजी के सेनानायक मलिक काफूर ने अपनी दक्षिण विजय के दौरान समाप्त किया था | इसका स्पष्ट विवरण अमीर खुसरो की प्रसिद्ध कृति “खजाइन-उल-फुतूह”   में प्राप्त होता है |

·      तगर प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, यह कल्याण तथा वेंगी के मध्य स्थित था | बीजापुर (कर्नाटक) जिले के वातापी नामक प्राचीन नगर का आधुनिक नाम बादामी है | छठी – सातवीं शताब्दी ईस्वी में यह चालुक्यों की राजधानी थी | वातापी के चालुक्य राजवंश का वास्तविक संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था |

·      पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंश के शासकों में सर्वाधिक योग्य तथा शक्तिशाली था | उसने 609 ईसवी से 642 ईसवी तक शासन किया |  उसकी उपलब्धियों का विवरण हमें ऐहोल अभिलेख से प्राप्त होता है |  इस लेख की रचना रविकीर्ति ने की थी | चालुक्यों के शासनकाल में  प्रायः महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था | विजयादित्य प्रथम के भाई चंद्रादित्य की रानी विजय भट्टारिका ने अपने नाम से दो ताम्रपत्र लिखवाए थे | मात्वालिन नामक चीनी यात्री ने  चालुक्यों के शासन काल में चीन एवं भारत के संबंधों का विवरण दिया है |

  • भारतीय काली मिर्च यूनानी एवं रोम वासियों को बहुत प्रिय थी इसलिए प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में इसे “यवनप्रिय” कहा गया है| अरिकामेडु पूर्वी तट पर पांडिचेरी (पुडुचेरी) से 3 किलोमीटर दक्षिण में उष्णकटिबंधीय कोरोमंडल तट पर स्थित है | पेरिप्लस में इसे “पोड़के” कहा गया है| यहां ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में रोमन बस्ती की अवस्थिति मानी जाती है।  यहां से प्राप्त अवशेषों में कई रोमन वस्तुएँ प्राप्त हुई है | जिनमें शराब के दो हत्थे कलश,  रोमन लैम्प,  रोमन ग्लास  आदि प्रमुख  हैं।

·      एम्फोरा जार  एक लंबी एवं संकीर्ण गर्दन वाला और दोनों तरफ हत्येदार जार है प्राचीन काल में इसका प्रयोग तेल या शराब को रखने के लिए किया जाता था। 

  • कंबन ने 12वीं शती ई० में तमिल रामायणम या रामावतारम की रचना तमिल भाषा में की थी।
  • दक्षिण भारत में नगरों में व्यापारियों के विभिन्न संगठन थे। जैसे मणिग्रामम् , वलंजीयर आदि।  इनका कार्य व्यापार-व्यवसाय को प्रोत्साहन देना था।

·      तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में कावेरी नदी के तट पर अवस्थित “उरैयूर”  संगम  कालीन महत्वपूर्ण नगर था। यह कारी एवं वाराणम नामों से भी प्रसिद्ध था।  संगम युग में उरैयूर  सूती वस्त्रों का बहुत बड़ा केन्द्र था।  इसका विवरण  “पेरिप्लस ऑफ वी एरीथ्रियन स्री” में मिलता है।

·      पाण्ड्य राज्य की जीवन रेखा वेंगी नदी थी।यह नदी कंडन “मणि कन्यूर”  (पश्चिमी घाट) में मदुरै के समीप (तमिलनाडु) से निकलती है |  पाण्ड्य राज्य कावेरी के दक्षिण में स्थित था | इसमें आधुनिक मदुरा तथा तिन्नेवेल्ली के जिले और त्रावणकोर का कुछ भाग शामिल था | इसकी राजधानी मदुरा थी | वेंगी नदी वाला प्रदेश अपनी उर्वरता के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध था |

·      चेर राज्य पर विजय के उपलक्ष्य में पांडय शासक जयंत बर्मन ने “वानवन” की उपाधि धारण की | पल्लवों के विरुद्ध सफलता के उपलक्ष्य में पाण्ड्य शासक मारवर्मन राजसिंह प्रथम ने “पल्लव भंजन” की उपाधि धारण की |

·      दक्षिण भारत के पांड्य वंश के राजा ने रोम राज्य में एक दूत 26 ई०पू  में भेजा था |  मीनाक्षी मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपनी राजधानी मदुरई में करवाया था | 

·      एक अज्ञात ग्रीक नाविक द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक”पेरिप्लस ऑफ वी एरीथ्रियन स्री” में प्राचीन काल के विभिन्न बंदरगाहों की सूची मिलती है |  इसमें नौरा , तोंडी , मुशिरी और नेलिसंडा पश्चिमी तट के प्रमुख  बंदरगाह थे।

·      कदंब राजाओं की राजधानी  वनवासी थी | इस  राज वंश की स्थापना मयूरशर्मन ने  की थी | कदंब  राज्य को पुलकेशिन द्वितीय ने अपने राज्य में मिला लिया था |

  • चोल साम्राज्य की स्थपाना विजयालय ने की, जो आरंभ में पल्लवों का एक सामंती सरदार था। उसने 850 ई. में तंजौर को अपने अधिकार मे कर लिया। इस समय पल्लवों एवं पाण्डयों में निरंतर संघर्ष चल रहा था। पण्डयों की निर्बल स्थित का लाभ उठाकर विजयालय ने तंजौर पर अधिकार जमा लिया तथा वहां उसने दुर्गा देवी का मंदिर बनवाया। विजयालय ने लगभग 871 ई. तक राज किया।
  • चोल स्थापत्य के उत्कृष्ट नमूने तंजौर के शैव मंदिर, जो राजराजेश्वर या वृहदीश्वर नाम से प्रसिध्द हैं, का निर्माण राजराज प्रथम के काल में हुआ था। भारत के मंदिरों में सबसे बड़ा तथा लंबा यह मंदिर द्रविड़ शैली का सर्वोत्तम नमूना माना जा सकता है। इसका विशाल प्रांगण 500×250 के आकार का है। मंदिर के प्रवेश पर दोनों ओर दो द्वारपालों की मूर्तियाँ बनी हैं। इस मंदिर के बहिर्भाग में नंदी की एकाश्म विशाल मूर्ति बनी है जिसे भारत की विशालतम नंदी मूर्ति माना जाता है।
  • कृष्णा तथा तुंगभद्रा नदियों से लेकर कुमारी अंतरीप तक का विस्तृत भू-भाग प्राचीन काल में तमिल प्रदेश का निर्माण करता था। इसमें कोरोमंडल तट तथा दक्कन के कुछ भाग यथा – उरैयूर, कावेरीपट्टनम, तंजावुर आदि चोलों के अधिकार में थे।
  • चोल शासन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता वह असाधारण शक्ति तथा क्षमता है, जो स्वायत्तशासी ग्रामीण संस्थाओं के संचालन में परिलक्षित होती है। वस्तुतः इस काल मे स्वायत्त शासन पूर्णतया ग्रामो में ही क्रियान्वित किया गया ।
  • चोलो के अधीन ग्राम प्रशासन में ग्राम सभा की कार्यकारिणी समितियों की कार्यप्राणाली का विस्तृत विवरण हम उत्तर मेरूर से प्राप्त लेखों के माध्यम से करते हैं। प्रत्येक ग्राम में अपनी सभा होती थी, जो प्रायः केन्द्रीय नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र रुप से ग्राम शासन का संचालन करती थी।
  • चोल साम्राज्य की महत्ता का वास्तविक संस्थापकत परांतक द्वीतीय (सुंदर चोल) का पुत्र अरिमोलिवर्मन था, जो 985 ई. में राजराज के नाम से गद्दी पर बैठा यह विजेता के साथ-साथ कुशल प्रशासक तथा महान निर्माता भी था। राजराज ने प्रथम एक स्थायी  सेना तथा विशाल नौसेना का गठन किया। उसने समस्त भूमि की नाप कराई तथा सोने,  चांदी एवं तांबे के सिक्कों का प्रचलनि करवाया।
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  • एरिपत्ति चोल प्रशासन के अंतर्गत वह भूमि होती थी जिससे मिलने वाला राजस्व अलग से ग्राम जलाशय के रख-रखाव के लिए निर्धारित कर दिया जाता था। 7वीं. 8वीं सदी में दक्षिण भारत में घटिका प्रायः मंदिरों के साथ संबध्द विद्यालय थे। चोल कालीन स्थानीय प्रशासन में बड़े नगरो में अलग कुर्रम (ग्राम संघ)  गठित किए जाते थे जिन्हें तनियूर अथवा तकुर्रम कहा जाता था।
  • तगर प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था, यह कल्याण तथा वेंगी के मध्य स्थित था।
  • चालुक्यों के शासनकाल में प्रायः महिलाओं को उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। विजयादित्य प्रथम के भाई चंद्रादित्य की रानी विजय भठ्ठारिका ने अपने नाम से दो ताम्रपत्र लिखवाएं थे। वह एक अच्छी कवयित्री भी थी। विजयादित्य ने अपनी छोटी बहन कुमकुम देवी के कहने पर एक विद्वान ब्राह्मण को एक गांव दान मे दिया था। कीर्तिवर्मन द्वीतीय की महारानी महादेवी के उसके साथ रक्तपुर के स्कंधावार में उपस्थित रहने का उल्लेख मिलता है। इस वंश की विजय भठ्ठारिका ने कुशलतापूर्वक शासन संचालित किया था।
  • ऐहोल प्रशस्ति बादामी के शासक पुलेकेशिन-II के इतिहास को जानने का एक शक्त माध्यम है। इस लेख की भाषा संस्कृत तथा लिपि दक्षिण ब्राह्मी है। इस लेख की रचना रविकीर्ति ने की थी, प्रशस्ति के अंत में लेखक ने यह दावा किया है कि उसने लिखकर कालिदास तथा भारवि के समान यश प्राप्त किया है। अतः इस अभिलेख में कालिदास के नाम का उल्लेख हुआ है।
  • तोल्काप्पियम के प्रणयनकर्ता तोल्काप्पियर ऋषि अगस्त्य के बारह योग्य शिष्यों में से एक थे। यह एक व्याकरण ग्रंथ है। इसकी रचना सूत्र शैली में की गई है।
  • शिलप्पादिकारम का लेखक इलंगो आडिगल था। यह संगम साहित्य का महत्वपूर्ण महाकाव्य है। इसका लेखक चोल नरेश कारिकाल का पौत्र था।
  • अरिकामेडु पूर्वी तट पर पांडिचेरी (पुडुचेरी) से 3 किमी. दक्षिण में उष्णकटिबंधीय कोरोमंडल तट पर स्थित है। पेरीप्लस में इसे पोडुके कहा गया है। यहां ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में रोमन बस्ती की अवस्थिति मानी जाती है। यहां से प्राप्त अवशेषों में कई रोमन वस्तुएं प्राप्त हुई हैं, जिनमें शराब के दो हत्थे कलश, रोमन लैम्प ग्लास आदि हैं। यहां से न केवल भारतीय माल यथा – मणियां, मोती, मलमल, सुगंधित पदार्थ, इत्र, मसाले और रेशम लादा  जाता था। अपितु रोमवासियों की रुचि एवं नमूनों के अनुसार भी माल निर्माण कर रोम भेजा जात था।
  • एम्फोरा जार एक लंबी एवं संकीर्ण गर्दन वाला और दोनों तरफ हत्थेदार जार है। प्राचीन काल में, इसका प्रयोग तेल या शराब को रखने के लिए किया जाता था। अरिकामेडु के उत्खनन से रोम आयातित इस  जार के अवशेष मिले  हैं।
  • कंबन 12वीं शती ई. में तमिल रामायणम या रामावतारम की रचना तमिल भाषा में की थी।
  • तमिल क्षेत्र के सिध्द (सित्तर) एकेश्वरवादी थे तथा मूर्तिपूजा की निंदा करते थे। लिंगायतों ने जाति की अवधारणा तथा कुछ समुदायों के दूषित होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया। इनका विश्वास था कि मृत्युपरांत भक्त शिव में लीन हो जायेंगे तथा इस संसार में पुनः नही  लौटेगे। इन्होने पुनर्जन्म के सिध्दांत को नकार दिया था।
  • दक्षिण भारत में नगरों में व्यापारियों के विभिन्न संगठन थे, जैसे – मणिग्रामम्, वलंजीयर आदि। इनका कार्य व्यापार-व्यवसाय को प्रोत्साहन देना था।
  • संगम कालीन साहित्य मे कोन, को एवं मन्न शब्द को राजा के लिए प्रयुक्त किया जाता था।
  • मीनाक्षी मंदिर का निर्माण पाण्डयों ने अपनी राजधानी मदुराई में करवाया था। महाकाल मंदिर उज्जैन में तथा वेंकटेश्वर मंदिर तिरुमाल (आंध्र प्रदेश) में स्थित है। बेलूर मठ मे रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1897 ई. में कोलकाता (प.बंगाल) में स्वामी विवेकानन्द द्वारा की गई थी।

 

प्राचीन साहित्य एवं साहित्यकार

  • यूनानी लेखक हेरोडोटस (5वीं शती ई.पू.) को इतिहास का पिता कहा जाता है। हिस्टोरिका उसकी प्रसिध्द पुस्तक है, जिसमें 5वीं शती ई.पू. के भारत-फारस संबंधों का विवरण (अनुश्रुतियों के आधार पर) मिलता है।
  • मुद्राराक्षस की रचना विशाखदत्त ने की थी। इस ग्रंथ से मौर्य इतिहास, मुख्यतः चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन पर प्रकाश पड़ता है। इसमें चन्द्रगुप्त मौर्य को वृषल तथा कुलहीन कहा गया है। धुंडिराज ने मुद्राराक्षस पर टीका लिखी है।
  • व्याकरणाचार्य पाणिनि नंद शासक महापद्मनंद के मित्र थे, अष्टाध्यायी उनकी प्रसिध्द कृति है।
  • वाराहमिहिर गुप्तयुगीन खगोलशास्त्री थे। वृहज्जातक, पंचसिध्दांतिका, , वृहत्संहिता आदि इन के प्रमुख ग्रंथ हैं | इनकी पंचसिद्धांतिका यूनानी ज्योतिर्विद्या पर आधारित है | ब्रह्मगुप्त प्रसिद्ध गणितज्ञ थे , उन्होंने ‘ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत ‘ में क्षेत्र व्यवहार , वृतक्षेत्र , चक्रीय चतुर्भुज आदि विषयों की विवेचना की है।
  • आर्यभट्ट ( चौथी- पांचवी शताब्दी ईसा ) प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे | उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ आर्यभट्टीय ‘ में बताया है कि सूर्य स्थिर है , पृथ्वी घूमती है |उन्होंने चंद्र ग्रहण एंव सूर्य ग्रहण के कारणों तथा पृथ्वी की परिधि का भी पता लगाया है | उन्हें त्रिकोणमिति का जन्मदाता भी माना जाता है | उन्होंने दशमलव स्थानिक मान की खोज की |
  • पाली भाषा में, बौद्ध भिक्षु नागसेन द्वारा लिखित मिलिंदपन्हो में नागसेन एवं हिंद यवन शासक मिनेण्डर के बीच वार्तालाप का वर्णन है |
  • कालिदास चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबारी कवि थे | इन्होंने मालविकाग्निमित्रम्, ऋतुसंहार , मेघदूत , रघुवंश , कुमारसंभव , अभिज्ञानशा-कुंतलम आदि की रचना की | इनके द्वारा रचित ‘ मालविकाग्निमित्रम् ‘ पांच अंकों का नाटक है जिसमें मालविका और अग्निमित्र की प्रणय कथा वर्णित है | अग्निमित्र शुंग शासक पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था|
  • कश्मीर के हिंदू राज्य का इतिहास हमें कल्हण की राजतरंगिणी पर ज्ञात होता है | इस ग्रंथ की रचना कल्हण ने राजा जयसिंह (1127-1159 ई) के शासनकाल में की थी। कश्मीर के शासक जैनुल आबदीन द्वारा संरक्षित दो विद्वानों जोनराज एवं उनके शिष्य श्रीवर ने कल्हण की राजतरंगिणी का आगे विस्तार किया।
  • अश्वघोष कुषाण शासक कनिष्क के राजकवि थे | इनकी तुलना मिल्टन , गेटे , कांट तथा वाल्टेयर से की जाती है। उनकी रचनाओं में तीन प्रमुख हैं –
  1. बुद्धचरित
  2. सौंदरानंद
  3. सारिपुत्र प्रकरण |
  • इनमें प्रथम दो महाकाव्य तथा अंतिम नाटक ग्रंथ है। सौंदरानंद में बुद्ध के सौतेले भाई सुंदर नंद के बौद्ध धर्म ग्रहण करने का वर्णन है। इसमें 18 सर्ग है।
  • हर्ष को संस्कृत के 3 नाटक ग्रंथों का रचयिता माना जाता है – प्रियदर्शिका , रत्नावली तथा नागानंद | प्रियदर्शिका 4 अंकों का नाटक है , जिसमें वत्सराज उदयन के अंत:पुर की प्रणय कथा का वर्णन हुआ है | रत्नावली में भी 4 अंक है तथा यह नाटक वत्सराज उदयन और उसकी रानी वासवदत्ता की परिचारिका नागरिका की प्रणय कथा का बड़ा ही रोचक वर्णन करता है। नागांनद बौद्ध धर्म से प्रभावित रचना है , इसमें पांच अंक हैं | जयदेव ने हर्ष को भास , कालिदास , बाण , मयूर आदि कवियों की समकक्षता में रखते हुए उसे कविताकामिनी का साक्षात हर्ष निरूपित किया है।
  • महाकवि भास के नाम से 13 नाटक उपलब्ध हुए हैं , जिन्हें वर्ष 1909 में टी. गणपति शास्त्री ने ट्रावनकोर राज्य से प्राप्त किया था। इन नाटकों के नाम हैं –
  1. प्रतिज्ञायौगंधरायण
  2. स्वपनवासवदत्ता
  3. उरूभंग
  4. दूतवाक्य
  5. पंचरात्र
  6. बालचरित
  7. दूतघटोत्कच
  8. कर्णभार
  9. मध्यमव्यायोग
  10. प्रतिमा नाटक
  11. अभिषेक नाटक
  12. अविमारक
  13. चारूदत्त|

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  • गीत गोविंद के रचयिता, जयदेव बंगाल के अंतिम सेन शासक लक्ष्मण सेन के आश्रित महाकवि थे। लक्ष्मणसेन के एक शिलालेख पर 1116 ई की तिथि है। अतः जयदेव ने इसी समय के आसपास गीतगोविंद की रचना की होगी। इसे गीत काव्य कहना उचित होगा | इसमें 12 सर्ग है तथा प्रत्येक सर्ग गीतों से समन्वित है।
  • प्राचीन भारतीय पुस्तक पंचतंत्र ( मूलतः संस्कृत में रचित ) का 15 भारतीय और 40 विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है | इसके मूल लेखक विष्णु शर्मा माने जाते हैं | रुडगर्टन (1924) के अनुसार , पंचतंत्र के 50 से अधिक भाषाओं में 200 से अधिक स्वरूप उपलब्ध हैं | यह भारत की सर्वाधिक बार अनुवादित साहित्यिक पुस्तक मानी जाती है | मुगल काल में पंचतंत्र का फारसी अनुवाद ‘ अनवारे सुहैली ‘ शीर्षक के तहत कराया गया था|
  • आचार्य सर्ववर्मा ( acharya sarvverma ) ने  पांच खंडों में कातंत्र व्याकरम ( katantra vyakaram ) नामक पुस्तक हिंदी एवं संस्कृत में लिखी थी | 12 वीं शताब्दी के गणितज्ञ भास्कर ( भास्कर II या भास्कराचार्य ) ने बीज गणित के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया | इनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ सिद्धांत शिरोमणि ‘ चार भागों – लीलावती , बीजगणित , ग्रहगणित और गोलाध्याय में विभाजित है | 12वीं शताब्दी में ‘ मिताक्षरा ‘ ( mitakshara ) की रचना विज्ञानेश्वर ने की थी | इसका पहला  अंग्रेजी अनुवाद हेनरी टॉमस कोलब्रुक के द्वारा 19वीं शताब्दी में किया गया | इसमें हिंदू नियमों का उल्लेख है |
  • ‘मत विलास प्रहसन ‘ एक संस्कृत नाटक है | इसके लेखक पल्लव नरेश महेंद्र वर्मन है | यह एक परिहास नाटक है , जिसमें धार्मिक आडंबर के ऊपर कटाक्ष किया गया है | दण्डी  ने ‘ दशकुमारचरित ‘ एवं ‘ काव्यादर्श ‘ की रचना की | ‘ मनुस्मृति ‘ जिसमें कुल 18 स्मृतियां सम्मिलित हैं की रचना मनु द्वारा की गई मानी जाती है।| मनुस्मृति प्राचीन भारतीय समाज व्यवस्था तथा हिंदू विधि से संबंधित है | मनु को प्राचीन भारत का प्रथम एवं महान विधि निर्माता माना जाता है | शूद्रक ने प्रसिद्ध नाटक मृच्छकटिकम  की रचना की | इस नाटक में ब्राह्मण चारुदत्त तथा उज्जयिनी की प्रसिद्ध गणिका बसंतसेना के आदर्श प्रेम की कहानी वर्णित है |
  • शून्य का अविष्कार ईसा  पूर्व दूसरी सदी में किसी अज्ञात भारतीय ने किया था |  अरबों ने  इसे भारत से सीखा और यूरोप में फैलाया | अरब देश में शून्य का प्रयोग सबसे पहले 873 ई में पाया जाता है | प्रमुख रचनाकारों की प्रमुख रचनाएं हैं – सूरदास – सूरसागर ,  सूर सारावली , साहित्य लहरी | तुलसीदास – रामचरितमानस , विनय पत्रिका , कवितावली , गीतावली | * राजशेखर – काव्यमीमांसा , बाल रामायण , बाल भारत , विद्वशालभांजिका |

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  • अमर सिंह द्वारा रचित अमरकोश, वात्स्यायन कृत काम सूत्र, कालिदास कृत मेघदूत तथा विशाखदत्त कृत मुद्रारक्षस- ये चारों रचनाएं गुप्तकालीन हैं।
  • भारवि द्वारा रचित रचना किरातार्जुनीयम महाकाव्य है, जिसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई है। इसमें अर्जुन तथा किरात वेशधारी शिव के बीच युध्द का वर्णन है। नैषधीचरित महाकाव्य श्री हर्ष की कीर्ति का स्थायी स्मारक है। इसमें 22 सर्ग हैं। महाभारत का नपोपाख्यान इस महाकाव्य का मूल आधार है। शिशुपाल वध महाकवि माघ द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य है। इसमें कृष्ण द्वारा शिशुपाल के वध की कथा का वर्णन है, जो महाभारत से ली गई है। किरातार्जुनीयम, शिशुपालवध और नैषधीयचरितम वृहत्त्रयी कहलाते हैं।
  • वराहमिहिर की पंचसिध्दांतिका यूनानी ज्योर्तिविद्या पर आधारित है।
  • अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ तारीखे अलाई, किरान उस सादेन, आशिका, मिफ्ता-उल-फुतूह आदि हैं।
  • राजतरंगिणी के लेखक कल्हण के समय कश्मीर का शासकक जयसिंह (1128-1154 ई.) था। उसी के शासनकाल के दौरान 1148-1149 ई. में कल्हण ने अपनी महान कृति राजतरंगिणी को पूरा किया। राजतरंगिणी में कुल 8 तरंग तथा 800 श्लोक हैं। प्रथम तीन तरंगों में अत्यंत प्राचीनकाल का कश्मीर का परंपरागत इतिहास है। चौथे से छठे तरंगों में कार्कोट तथा उत्पल वंशों का इतिहास है। सातवें और आठवें तरंगों में लोहारवंश का इतिहास अंकित है।
  • वृहतसंहिता गुप्तकाल वाराहमिहिर द्वारा संस्कृत में रचित एक विश्व कोष है।
  • कालिदास द्वारा रचित मालविकाग्निमित्र पांच अंको का नाटक है, जिसमें मालविका और अग्निमित्र की प्रणय कथा वर्णित है। अग्निमित्र शुंग शासक, पुष्यमित्र शुंग का पुत्र था।
  • महाकवि भास के नाम से 13 नाटक उपलब्ध हुए हैं, जिन्हें वर्ष 1909 में टी. गणपति शास्त्री ने ट्रावनकोर राज्य से प्राप्त किया था। स्वप्नवासवदत्ता और चारुदत महाकवि भास की प्रमुख रचना हैं।
  • अष्टांग-संग्रह आयुर्विज्ञान से, दशरुपक नाट्यकला से, लीलावती गणित से एवं महाभाष्य व्याकरण से संबंधित ग्रंथ है.
  • कर्म सिध्दांत पर विशेष बल देते हुए गीता मे श्री कृष्ण ने कहा है कि तुम्हारा अधिकार सिर्फ कर्म करने पर है, फल की प्राप्ति नही। (कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्….)
  • सही सुमेलन है –

 

लेखक                 ग्रंथ

सर्ववर्मा        कातंत्र

शूद्रक         मृच्छकटिकम

विज्ञानेश्वर     मिताक्षरा

कल्हण        राजतरंगिणी

  • आर्यभठ्ठ (चौथी-पांचवी शताब्दी ई.) प्राचीन भारत के प्रसिध्द गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। उन्होने अपनी पुस्तक आर्यभठ्ठीय में बताया कि सूर्य स्थित है, पृथ्वी घूमती है।
  • द नैचुरल हिस्ट्री प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) नामक रोमन लेखक की रचना है।

 

पूर्व मध्यकाल (800-1200 ई.)

  • विग्रहराज चतुर्थ (1153-1163 ई.) की सबसे प्रमुख विजय दिल्ली की थी। इसने परमभठ्ठारक, परमेश्वर, महाराजाधिराज जैसी उपाधियां धारण की। जयानक उसे कविबान्धव तथा सोमदेव ने उसे विद्वानों में सर्वप्रथम कहा है। सोमदेव ने ललित विग्रहराज नामक ग्रंथ की रचना की। अजमेर का शासक पृथ्वीराज तृतीय (1177-1192 ई.) ही पृथ्वीराज चौहान के नाम से प्रसिध्द है, जिसने 1191 ई. में तराइन के प्रथम युध्द में मुहम्मद  गोरी को पराजित किया था। परंतु 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युध्द में उसकी पराजय हुई थी।
  • पाल वंश का संस्थापक गोपाल था | धर्मपाल के खालीमपुर लेख में कहा गया है कि ‘ मत्स्यन्याय ‘ से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों ( सामान्य जनता ) ने गोपाल को लक्ष्मी की बांह ग्रहण कराई। नालंदा में इसने एक विहार का निर्माण कराया था। धर्मपाल ( 770-810 ई.) एक उत्साही बौद्ध था। उसके लेखों में उसे ‘ परमसौगत ‘ कहा गया है। उसने विक्रमशिला तथा सोमपुरी ( पहाड़पुर ) में प्रसिद्ध विहारों की स्थापना की |
  • 1203 ई. में बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया। पालवंशी शासक देवपाल (810-850 ई) बौद्ध मतानुयायी थे। उसने जावा के शैलेंद्रवंशी शासक बालपुत्रदेव के अनुरोध पर उसे नालंदा में एक बौद्ध विहार बनवाने के लिए पांच गांव दान में दिए थे।
  • गोविंदचंद्र गहड़वाल की रानी बौद्ध मतानुयायी थी | उन्होंने सारनाथ में धर्म चक्र -जिन विहार बनवाया था | गोविंद चंद का मंत्री लक्ष्मीधर ने ‘ कृत्यकल्पतरु ‘ नामक ग्रंथ की रचना की | इसमें 14 अध्याय हैं | * गहड़वाल वंश का अंतिम शासक जयचंद्र था |
  • हम्मीर महाकाव्य में चौहानों को सूर्यवंशी बताया गया है | हम्मीर महाकाव्य और पृथ्वीराज विजय के अनुसार , चौहान सूर्य के पुत्र चाहमान नामक अपने पूर्वज के वंशज थे | वे चार अग्निकुलों में से एक थे | इस वंश के प्रारंभिक शासको में वासुदेव एवं गूवक का नाम उल्लेखनीय है |
  • आल्हा -ऊदल महोबा के संबंधित थे। ये चंदेल शासक परमार्दिदेव (परमल)(1165-1203) के सेनानायक थे जो 1182 ई में पृथ्वीराज चौहान का डटकर सामना करने के बाद वीरगति को प्राप्त हुए | चंदेलों एवं चौहानों के इस संघर्ष का वर्णन चंदबरदाई कृत ‘ पृथ्वीराजरासों ‘ एंव ‘ परमाल रासो ‘ तथा जगनिक कृत ‘ आल्हाखंड में मिलता है |
  • जेजाकभुक्ति बुंदेलखंड का प्राचीन नाम था। चंदेल वंश के संस्थापक नन्नुक के पौत्र जय सिंह या जेजा के नाम पर यह प्रदेश जेजाकभुक्ति कहलाया। खजुराहो लेख में शासक हर्ष को ‘ परमभट्टारक ‘ कहा गया है। शासक धंग ने ‘ महाराजाधिराज ‘ की उपाधि धारण की। उसने प्रयाग के संगम में जल समाधि द्वारा प्राण त्याग दिया।
  • प्राचीन काल में पुंड्रवर्धन भुक्ति उत्तर बंगाल के क्षेत्र में अवस्थित थी। पाल , चंद्र , एवं सेन राजवंशों के युग में इसके क्षेत्राधिकार का विस्तार उत्तर बंगाल के बाहर भी था।
  • गुर्जर-प्रतिहार वंश का संस्थापक नागभट्ट प्रथम (730-750ई.) था। इस वंश के शासक नागभठ्ठ द्वितीय ने ‘परमभट्टारक महाराजधिराज परमेश्वर ‘ की उपाधि धारण की। मिहिरभोज प्रथम वैष्णव धर्मानुयायी था। इसने ‘आदिवाराह ‘ तथा प्रमास जैसी उपाधियां धारण की। प्रतिहार वंश का महानतम शासक मिहिरभोज था। इसका शासनकाल 836-885 ई. तक रहा। इसके बाद महेंद्रपाल प्रतिहार शासक हुआ , इसका शासनकाल 885-910 ई. तक रहा।
  • महान जैन विद्वान हेमचंद्र ( 1089-1172 ई) ने सोलंकी वंश के जयसिंह सिद्धराज के समय में प्रमुखता प्राप्त की थी। * तथापि वे उसके उत्तराधिकारी कुमारपाल (1143-1173 ई) के सलाहकार के रूप में उसकी सभा को अलंकृत करते थे।
  • सेनवंश के लेखो से ज्ञात होता है कि वे चंद्रवंशी क्षत्रिय थे तथा उनका आदि पुरूष वीरसेन था। सेनवंश के शासक बल्लालसेन ने परमभट्टारक , महाराजधिराज , परमेश्वर , परममाहेश्वर , नि:शंक शंकर आदि उपाधियां धारण की। इसने दानसागर नामक ग्रंथ की रचना की। लक्ष्मण सेन (1178-1206 ) सेन वंश के चौथे शासक थे। इन्होंने 28 वर्षों तक शासन किया। इनके द्वारा एक नए संवत् ‘ लक्ष्मण संवत् ‘ का प्रारंभ किया गया।

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  • विज्ञानेश्वर , हिमाद्रि एवं जीमूतवाहन मध्यकालीन भारत के प्रसिद्ध विधिवेत्ता थे। विज्ञानेश्वर ने याज्ञवल्क्य स्मृति पर ‘ मिताक्षरा ‘ शीर्षक से टीकांग्रथ लिखा। जीमूतवाहन ने ‘ दायभाग’ नामक ग्रंथ की रचना की।
  • गुजरात का चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धाराज एक धर्म सहिष्णु शासक था। मुस्लिम लेखक मुहम्मद औफी का कहना है कि खम्भात में कुछ मस्जिदों हेतू उसने 1 लाख बालोम (मुद्राएं ) दान में दी थी।
  • परमार शासक मुंज ने ‘ मुंजसागर ‘ नामक तालाब बनवाया था। उसने श्रीवल्लभ , पृथ्वीवल्लभ ,अमोघवर्ष आदि उपाधि धारण की | उसके छोटे भाई सिंधुराज ने कुमारनारायण , तथा साहसांक जैसी उपाधियां धारण की। राजा भोज परमार शासक था परमारों का पहले शासन केंद्र उज्जैन था। तत्पश्चात राजधानी धार में स्थानांतरित कर दी गई। राजा भोज ने धार से शासन किया। इनके द्वारा कृत्रिम वैज्ञानिक उपकरणों पर लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक ‘ समरांगण सूत्राधार ‘ है।
  • ‘ सरस्वती कण्ठाभरण ‘ , ‘ सिद्धांत संग्रह ‘ , योग सूत्र वृत्ति, राजमार्तंड ‘ विद्या विनोद ‘ युक्त कल्पतरु , तथा ‘ चारुचर्या ‘ आदि इनकी प्रसिद्ध रचनाएं है। भोजशाला मंदिर मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित है। यहां पर भगवती सरस्वती देवी अधिष्ठात्री ( स्थापित ) है। भोजशाला का निर्माण परमार शासक राजा भोज ने 1035 ई में संस्कृत पाठशाला के रूप में कराया था। अब भोजशाला कमाल मौला मस्जिद परिसर में स्थित है। गौडवहो कन्नौज के राजा यशोवर्मन के राजाश्रित कवि वाक्पति की रचना है।
  • गोविंदचन्द्र गहड़वाल की रानी कुमारदेवी बौध्द मतानुयाई थी। उन्होने सारनाथ में धर्मचक्रम-जिन विहार बनवाया था।
  • चौहानवंशी शासक पृथ्वीराज III (रायपिथौरा) के दरबारी कवि चंदबरदाई ने पृथ्वीराज  रासों की रचना की। इसमें चौहानों को अग्निकुण्ड से उत्पन्न बताया गया है।
  • पृथ्वीराज विजय के लेखक जयानक हैं।
  • हमीर रासों की रचना सारंगदेव ने की थी।
  • आठवीं शताब्दी में दिलिका (देहली) शहर की स्थापना तोमर वंश के अनंगपाल ने की। चंदबरदाई की रचना पृथ्वीराज रासों में तोमर वंश के राजा अनंगपाल को दिल्ली का संस्थापक बताया गया है। बाद में चौहान शासको ने दिल्ली को अपने अधिकार मे ले लिया.
  • जेजाभुक्ति बुंदेलखंड का प्राचीन नाम था। चंदेल वंश के संस्थापक नन्नुक के पौत्र जय सिंह या जेजा के नाम पर यह प्रदेश जेजाकभुक्ति कहलाया।
  • जेजाकभुक्ति के चंदेलों में धंगदेव सबसे प्रसिध्द एवं शक्तिशाली राजा हुआ।  उसके लंबे राज्यकाल में खजुराहों के दो प्रसिध्द मंदिर विश्वनाथ  तथा पार्श्वनाथ बने। कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण धंगदेव द्वारा 999 ई. में किया गया। धंग ने प्रयाग के संगम में शिव की अराधना करते हुए शरीर का त्याग किया।
  • ओदंतपुर जिसे उदनापुर भी कहा जाता है, प्राचीन काल में एक प्रमुख शिक्षा केन्द्र था। यह बिहार राज्य मे स्थित था। इसकी स्थापना पाल वंश के प्रथम शासक गोपाल ने की थी।
  • वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में स्थित तक्षशिला प्राचीन समय में गांधार राज्य की राजधानी थी। तक्षशिला की इतिहास में प्रसिध्दि का कारण उसका ख्याति प्राप्त शिक्षा केन्द्र होता था। यहां अध्ययन के लिए  दूर-दूर से  विद्यार्थी आते थे जिनमें राजा तथा सामान्यजन दोनों की सम्मिलित थे। कोशल के राजा प्रसेनजित, बिम्बिसार का राजवैद्य जीवक, कनिष्क का राजवैद्य चरक, बौध्द विद्वान वसुबंधु, चाणक्य आदि ने यही शिक्षा प्राप्त की थी।
  • राष्ट्रकूट वंश का स्थापना 736र ई. मे दंतिदुर्ग ने की। दंतिदुर्ग के संबंध में कहा जाता है कि उज्जयिनी में उसने हिरण्यगर्भ (महादान) यज्ञ करवाया था।
  • राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष प्रथम का जन्म 800 ई. में नर्मदा नदी के किनारे श्रीभावन नामक स्थान पर सैनिक छावनी में हुआ था। इस समय इसके पिता राष्ट्रकूट राजा गोविंद तृतीय, उत्तर भारत के सफल अभियानों के बाद वापस लौट रहे  थे।
  • प्रतिहार वंश का संस्थापक नागभठ्ठ को माना जाता है, किंतु वास्तविक संस्थापक वत्सराज था। प्रतिहार वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक मिहिरभोज था। प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज थी। चोल साम्राज्य की स्थापना विजयालय (850-887 ई.) ने की थी। तंजौर चोलो की राजधानी थी। परमार वंश का वास्तविकत संस्थापक सीयक द्वीतीय था। परमारों की राजधानी धारा थी। चालुक्य अथवा सोलंकी अग्निकुलीन  राजपूत थे। इस वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था।  सोलंकियों की राजधानी अन्हिलवाड़ थी।
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  • गुजरात का चालुक्य शासक जयसिंह सिध्दराज एक धर्म सहिष्णु शासक था। मुस्लिम लेखक मुहम्मद औफी का कहना है कि खंभात मे कुछ मस्जिदों हेतु उसने एक लाख बालोम (मुद्राएं) दान मे दी थी।
  • परमार वंश की स्थापना दसवीं शताब्दी ईस्वी में प्रथम चरण में उपेन्द्र अथवा कृष्णराज नामक व्यक्ति ने की थी। धारा नामक नगरी परमार वंश की राजधानी थी।
  • गांगेयदेव कलचुरी वंश का एक शक्तिशाली शासक था, जिसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। पूर्व मध्यकाल मे स्वर्ण सिक्कों के विलुप्त हो जाने के पश्चात उन्होंने सर्वप्रथम इसे प्रारंभ करवाया। उपेन्द्र, मुंज एवं  उदयादित्य ये सभी परमारवंशीय शासक थे।
  • गौडवहों कन्नौज के राजा यशोवर्मन के राजाश्रित कवि वाक्पति की रचना है।
  • मध्यकाल में अरघट्टा भूमि की सिंचाई के लिए प्रयुक्त जलचक्र (वाटर ह्वील) था।
  • कर्नाट वंश के संस्थापक नान्यदेव (1097-98 ई.) थे। वे एक महान योध्दा थे। नान्यदेव ने कर्नाट की राजधानी सिमरावगढ़ को बनाया। कर्नाट वंश का शासनकाल (1097-98-1378 ई.) मिथिला का स्वर्ण युग कहलाता है।
  • कर्नाट वंश का अंतिम शासक हरिसिंह देव थे। ये कला और साहित्य के महान संरक्षक थे। इन्होने पंजी व्यवस्था की शुरुआत की थी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भारत पर मुस्लिम आक्रमण

·      मक्का सऊदी अरब में स्थित है , यहीं पर 570 ई में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद का जन्म हुआ था। इसी कारण यह स्थान मुस्लिम अनुयायियों का पवित्र तीर्थ स्थल है। इनकी मृत्यु 632 ई. में हुई थी। ऋग्वेद में उल्लिखित ‘भरत ‘ कबीले के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा।

·      परंपरानुसार दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा है। कुछ विद्वानों के अनुसार ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा | ईरानियों ‘ ने इस देश को ‘ हिंदुस्तान ‘ कहकर संबोधित किया है तथा यूनानियों ने इसे इंडिया कहा है। हिंद (भारत) की जनता के संदर्भ में ‘ हिंदू ‘ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अरबों द्वारा किया गया था। भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण 711 ईसवी में अरब आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था |

·      मोहम्मद बिन कासिम से पूर्व 711 ईसवी में ही उबैदुल्लाह के नेतृत्व में एक अभियान दल भेजा गया परंतु वह पराजित हुआ और मारा गया | दूसरा अभियान बुदैल ने किया किंतु वह भी असफल रहा | इन परिस्थितियों में इराक के हाकिम अल हज्जाज ने मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरबों को सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा| भारी संघर्ष के बाद अरबों ने 712 ई में सिंध  पर विजय प्राप्त कर ली | उस समय सिंध पर चच के पुत्र दाहिर का शासन था। फारसी ग्रंथ ‘ चचनामा ‘ से अरबों द्वारा सिंध पर विजय की जानकारी मिलती है।

नोटः भारत पर प्रथम मुस्लिम आक्रमण के वर्ष के बारे में मतभेद है। बी.डी. महाजन के अनुसार यह तिथि 711 . है, जबकि हरिश्चन्द्र वर्मा के अनुसार यह तिथि 712  . है।

  • गजनी वंश का संस्थापक अल्पतगीन था | गजनी वंश का अन्य नाम यामीनी वंश भी है | अल्पतगीन ने  गजनी को अपनी राजधानी बनाया | 998 ई में महमूद गजनी का शासक बना | सर हेनरी इलियट के अनुसार,  महमूद ने भारत पर 17 बार आक्रमण किए | भीमदेव प्रथम ( 1022-64 ई.) के शासनकाल में महमूद गजनवी ने सोमनाथ के मंदिर को लूटा |
  • महमूद गजनवी का चंदेलों पर प्रथम आक्रमण 1019-20 ई में हुआ | उस समय चंदेल वंश का शासक विद्याधर था जो अपने वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था | यह अकेला ऐसा हिंदू शासक था जिसने मुसलमानों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया |
  • 1000-1026 ई. के बीच महमूद गजनी (या गजनवी) ने भारत पर 17 बार आक्रमण किए परंतु इन आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी मुस्लिम शासन की स्थापना करना नही था, बल्कि मात्र लूटपाट करना था। बगदाद के खलीफा अल-कादिर-बिल्लाह ने महमूद गजनवी को ‘ यामीन-उद्-दौला’ तथा ‘आमीन-उल-मिल्लाह ‘ की उपाधियां प्रदान की।
  • महमूद गजनवी शिक्षित एवं सुसभ्य था। | वह विद्वानों एवं कलाकारों का सम्मान करता था | उसने अपने समय के महान विद्वानों को गजनी में एकत्रित किया था। उसका दरबारी इतिहासकार उल्बी था | उसने किताब-उल-यामिनी तथा तारीख-ए-यामिनी नामक ग्रंथों की रचना की | इसके अतिरिक्त उसके दरबार में दर्शन , ज्योतिष और संस्कृत के उच्च कोटि का विद्वान अलबरूनी , ‘ तारीख-ए-सुबुक्तगीन ‘ का लेखक बैहाकी जिसे इतिहासकार लेनपूल ने ‘ पूर्वी पेप्स ‘  की उपाधि दी थी , फारस का कवि उजारी , खुरासानी विद्वान तुसी एवं उन्सुरी , विद्वान अस्जदी और फार्रुखी प्रमुख व्यक्ति थे।
  • शाहनामा का लेखक फिरदौसी है | यह महमूद गजनवी के दरबार का प्रसिद्ध विद्वान कवि था | इसे पूर्व के होमर की उपाधि दी जाती है | फरिश्ता (1560 से 1620 ईसवी ) ने तारीख- ए- फरिश्ता या गुलशन ए इब्राहिमी नामक किताब लिखी है | इसका पूरा नाम मुहम्मद कासिमश हिंदू शाह था | इसकी पुस्तक तारीख – ए – फरिश्ता बीजापुर के शासक इब्राहिम आदिल शाह को समर्पित थी|
  • महमूद गजनी के साथ प्रसिद्ध इतिहासकार अलबरूनी 11 वीं सदी में भारत आया था | उसकी पुस्तक “किताब- उल- हिंद” से तत्कालीन भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति की जानकारी मिलती है | पुराणों का अध्ययन करने वाला प्रथम मुसलमान अलबरूनी था | उसका जन्म 973 ईस्वी में हुआ था | वह खीवा (प्राचीन ख्वारिज्म) देश का रहने वाला था | वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था | अलबरूनी मात्र इतिहासकार ही नहीं था , उसके ज्ञान और रुचियों की व्याप्ति जीवन के अन्य क्षेत्रों तक थी | जैसे खगोल विज्ञान , भूगोल , तर्कशास्त्र , औषधि विज्ञान ,  गणित तथा धर्म और धर्म शास्त्र | उसने संस्कृत का अध्ययन किया और अनेक संस्कृत रचनाओं का उपयोग किया | जिसमें ब्रह्मगुप्त , बलभद्र तथा वाराह मिहिर की रचनाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय है | उसने जगह-जगह भगवद गीता , विष्णु पुराण तथा वायु पुराण को उदृधत किया है | अलबरुनी ने अरबी भाषा में तहकीक- ए- हिंद की रचना की थी | सर्वप्रथम साचाऊ ने  अरबी भाषा से इस ग्रंथ का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया। इसका अनुवाद हिंदी में रजनीकांत शर्मा द्वारा किया गया|
  • संस्कृत मुद्रालेख के साथ चांदी के सिक्के महमूद गजनवी ने जारी किए थे। महमूद गजनवी द्वारा चांदी के सिक्कों के दोनों तरफ दो अलग अलग भाषाओं में मुद्रालेख अंकित थे। ऊपरी भाग पर अंकित मुद्रालेख अरबी भाषा में था तथा दूसरी तरफ अंकित  लेख संस्कृत भाषा ( देवनागरी लिपि ) में था। सिक्के के मध्य भाग में संस्कृत भाषा में लिखा था।  “अवयक्तमेकम मुहम्मद अवतार नुरुपति महमूद।”
  • मध्य एशिया के शासक शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने 1192 ईस्वी में उत्तर भारत को जीता | शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का प्रथम आक्रमण 1175 ईस्वी में मुल्तान पर हुआ और 1205 ईसवी तक वह बराबर साम्राज्य विस्तार अथवा पूर्वविजित राज्य की रक्षा के लिए भारत पर चढ़ाई करता रहा |

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  • 1178 ई. में मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया किंतु मूलराज द्वितीय या भीम द्वितीय ने अपनी योग्य एवं साहसी विधवा मां नायिका देवी के नेतृत्व में आबू पर्वत के निकट गौरी का मुकाबला किया और उसे परास्त कर दिया| यह गौरी की भारत में पहली पराजय थी| 1191 ई. में पृथ्वीराज चौहान और गौरी के मध्य तराइन का प्रथम युद्ध हुआ| इस युद्ध में शिहाबुद्दीन की सेना के दोनों पार्श्व परास्त हो गए| 1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद गोरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद भारत में मुस्लिम शक्ति की स्थापना हुई | गोरी की सजगता और श्रेष्ठ युद्ध प्रणाली के कारण मुसलमानों की जीत हुई |
  • पृथ्वीराज चौहान ने हताश होकर घोड़े पर बैठकर भागने का प्रयत्न किया, किंतु सुरसती (आधुनिक सिरसा , हरियाणा राज्य में) के निकट उसे बंदी बना लिया गया। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बारे में विभिन्न मत प्रकट किए गए हैं, किंतु उनमें हसन निजामी का मत ही स्वीकार किया जाता है कि पृथ्वीराज चौहान गोरी के साथ अजमेर गया था और उसने गोरी की अधीनता स्वीकार कर ली थी।परंतु जब उसने विद्रोह करने का षड्यंत्र किया तो उसे मृत्यु दंड दे  दिया गया। यह युद्ध भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण था। 1194 ई. में चंदावर के युद्ध में मुहम्मद गोरी ने कनौज के गहड़वाल राजा जयचंद को पराजित किया था।चंदावर,वर्तमान फिरोजाबाद जिले में यमुना तट पर स्थित है।मुहम्मद गोरी के सिक्कों पर देवी  लक्ष्मी की आकृती बनी है और दूसरे तरफ कलमा (अरबी में) खुदा हुआ है।
  • गौरी की विजयों के बाद शीघ्र ही उत्तर भारत में अक्ता प्रथा स्थापित हो गई | गोर के मोहम्मद साम (मोहम्मद गौरी) ने कुतुबुद्दीन ऐबक को 1191 ईसवी में हांसी में नियुक्त किया | 1192 ईस्वी में तराइन के द्वितीय युद्ध में उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | उसके कार्यों से प्रसन्न होकर गौरी ने उसे क्रमशः कुहराम और समाना का प्रशासक नियुक्त किया | वस्तुतः 1192- से 1206 ईस्वी तक उसने गौरी के प्रतिनिधि के रूप में उत्तरी भारत के विजित भागों का प्रशासन संभाला | इस अवधि में ऐबक ने उत्तरी भारत में तुर्की शक्ति का विस्तार भी किया |
  • बिहार और उत्तरी बंगाल की विजय के बारे में गौरी अथवा ऐबक ने सोचा भी ना था | इस कार्य को गौरी के एक साधारण दास मोहम्मद इख्तियारुद्दीन बिन बख्तियार खिलजी ने किया | उसने 1202 ई. तक बिहार की विजय की तथा नालंदा एवं विक्रमशिला को तहस-नहस कर राजधानी उदंतपुर पर कब्जा कर लिया | उसने 1204-1205 ईसवी में बंगाल पर आक्रमण किया | उस समय वहां का शासक लक्ष्मण सेन था | वह बिना युद्ध किए ही भाग निकला | तुर्की सेना ने राजधानी नदिया में प्रवेश कर बुरी तरह लूट-पाट की | राजा की अनुपस्थिति में नगर ने आत्मसमर्पण कर दिया | लक्ष्मण सेन ने भागकर दक्षिण बंगाल में शरण ली और वहीं कुछ समय तक शासन करता रहा |

·      इख्तियारुद्दीन ने भी संपूर्ण बंगाल को जीतने का प्रयत्न नहीं किया | इख्तियारुद्दीन ने लखनौती को अपनी राजधानी बनाया | प्रोफेशर हबीब के अनुसार , तुर्कों द्वारा उत्तर पश्चिम की विजय ने क्रमशः“शहरी क्रांति” और “ग्रामीण क्रांति” को जन्म दिया  |

  • मुहम्मद बिन कासिम एक अरबी था। वह इराक के राजा अल-हज्जाज का भतीजा और दामाद दोनों था। जिस समय उसने सिंध पर आक्रमण किया उसकी आयु मात्र 17 वर्ष थी।
  • गजनी वंश का संस्थापक अल्पतगीन था। गजनी वंश का अन्य नाम यामीनी वंश भी है। अल्पतगीन ने गजनी को अपनी राजधानी बनाया। इस समय उत्तर-पश्चिम भारत में हिंदूशाही राजवंश का राज्य था, जिसका विस्तार हिंदुकुश पर्वतमाला तक था।
  • संस्कृत मुद्रालेख के साथ चांदी के सिक्के महमूद गजनवी ने जारी किए थे। महमूद गजनवी द्वारा जारी चांदी के सिक्कों के दोनो तरफ दो अलग-अलग भाषाओं में मुद्रालेख थे। ऊपरी भाग पर अंकित मुद्रालेख अरबी भाषा में तथा दूसरी तरफ अंकित लेख संस्कृत भाषा (देवनागरी लिपि) में था। सिक्के के मध्य भाग में संस्कृत भाषा में लिखा था – अवयक्तमेकम मुहम्मद अवतार नुरुपति महमूद। इस लेख के चारों तरफ अंकित लेख था – अवयक्तिया नाम अयाम टनकम हतो महमूदपुर सवंतो चांदी के इस सिक्के (दिरहम) का वजन 3.0 ग्राम था।
  • 1192 ई. में तराइन के द्वीतीय युध्द में मोहम्मद गोरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद भारत में मुस्लिम शक्ति की स्थापना हुई। गोरी की सजगता और श्रेष्ठ युध्द प्रणाली के कारण मुसलमानों की जीत हुई। पृथ्वीराज चौहान ने हताश होकर घोडे पर बैठकर भागने का प्रयत्न किया किंतु सुरसती (आधुनिक सिरसा, हरियाणा राज्य में) के निकट उसे बंदी बना लिया गया। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बारे में विभिन्न मत प्रकट किए गए हैं, कितु उनमें हसन निजामी का मत ही स्वीकार किया जाता है। कि पृथ्वीराज चौहान गोरी के साथ अजमेर गया था और उसने गोरी की अधीनता स्वीकार कर ली थी। परंतु जब उसने विद्रोह करने का षड्यंत्र किया तो उसे मृत्युदंड दे दिया गया। यह युध्द भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण था।
  • मुहम्मद गोरी के सिक्कों पर देवी लक्ष्मी की आकृति बनी है और दूसरे तरफ कलमा (अरबी में) खुदा हुआ है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

दिल्ली सल्तनत-गुलाम वंश

·      1206 से 1290 ई० तक दिल्ली सल्तनत के सुल्तान गुलाम वंश के सुल्तानों के नाम से विख्यात हुए, जिसका संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक था। यद्यपि वे एक वंश के नहीं थे, वे सभी तुर्क थे तथा उनके वंश पृथक-पृथक थे। साथ ही, वे स्वतंत्र माता-पिता की संतान थे ।अतःइन सुल्तानों को गुलाम वंश के सुल्तान कहने के स्थान पर प्रारंभिक तुर्क सुल्तान या दिल्ली के ममलूक सुल्तान कहना अधिक उपयुक्त है।

·      भारत में गुलाम वंश का प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ( 1206-10 )ईस्वी था |  वह ऐबक नामक तुर्क जनजाति का था| बचपन में उसे निशापुर के काजी फखरुद्दीन अब्दुल अजीज कुकी ने  एक दास के रूप में खरीदा था |  बचपन से ही अति सुरीले स्वर में कुरान पढ़ता था | जिस कारण वह कुरान-ख्वां ( कुरान का पाठ करने वाला)  के नाम से प्रसिद्ध हो गया | बाद में वह निशापुर से गजनी लाया गया जहां उसे गौरी ने खरीद लिया | अपनी प्रतिभा, लगन और ईमानदारी के बल पर शीघ्र ही ऐबक  ने गौरी का विश्वास प्राप्त कर लिया | गौरी ने उसे अमीर-ए-आखूर के पद पर प्रोन्नत कर दिया | उसने अपना राज्यअभिषेक गौरी की मृत्यु के 3 माह पश्चात जून , 1206 ईस्वी में कराया था | ऐबक की राजधानी लाहौर थी |

·      ऐबक ने कभी सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की | उसने केवल मलिक और “सिपहसालार” की पदवियों से ही अपने को संतुष्ट रखा | गौरी के अधिकारी गियासुद्दीन महमूद से मुक्ति पत्र प्राप्त करने के बाद 1208 ईस्वी में ऐबक को दासता से मुक्ति मिली।

·      अपनी उदारता के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक इतना अधिक दान करता था कि उसे  “लाख-बख्श” (लाखों को देने वाला) के नाम से पुकारा गया | ऐबक  ने दिल्ली में कुवत उल इस्लाम और अजमेर में “ढाई दिन का झोपड़ा” नामक मस्जिद का निर्माण कराया था | उसने दिल्ली में स्थित कुतुब मीनार का निर्माण कार्य प्रारंभ किया | जिसे इल्तुतमिश ने पूरा कराया |

·      फिरोजशाह तुगलक के शासन काल में इसकी चौथी मंजिल को काफी हानि पहुंची थी, जिस पर फिरोज ने चौथी मंजिल के स्थान पर दो और मंजिलों का भी निर्माण करवाया | सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु चौगान के खेल (आधुनिक पोलो की भांति का एक खेल)  में घोड़े से गिरने के दौरान 1210 ईस्वी में हुई थी | उसे लाहौर में दफनाया गया |

·      दिल्ली का पहला सुल्तान इल्तुतमिश था |  उसने सुल्तान के पद की स्वीकृति गोर के किसी शासक से नहीं अपितु खलीफा से प्राप्त की | खलीफा ने इल्तुतमिश के शासन की पुष्टि उस सारे क्षेत्र में कर दी, जो उसने विजित किया और उसे “सुल्तान- ए- आज़म” की उपाधि प्रदान की |

·      “गुलाम का गुलाम” इल्तुतमिश को कहा जाता था | इल्तुतमिश “इल्बरी” जनजाति का तुर्क था | सुल्तान बनने से पहले वह बदायूं का सूबेदार था | 1205-1206 ईस्वी में खोक्खर जाति के विद्रोह को दबाने के लिए गए अभियान में वह मोहम्मद गोरी और ऐबक के साथ था | युद्ध में उसने साहस और कौशल का परिचय दिया | जिससे प्रभावित होकर गोरी ने ऐबक को उसकी दासता से मुक्त कराने का आदेश दिया।

·      मंगोल नेता चंगेज खां भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा पर इल्तुतमिश के शासनकाल में आया था | चंगेज खां के प्रकोप से रक्षार्थ ख्वारिज्म शाह का पुत्र जलालुद्दीन मंगबरनी सिंधु घाटी पहुंचा | संभवतः चंगेज खां ने इल्तुतमिश के पास अपने दूत भेजे थे कि वह मंगबरनी की सहायता न करें, अतः इल्तुतमिश ने उसकी कोई सहायता न की और जब   मंगबरनी 1224 ईस्वी में भारत से चला गया तो इस समस्या का समाधान हो गया |

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  • 1225 ईस्वी में इल्तुतमिश ने बिहार शरीफ एवं बाढ़ पर अधिकार कर राजमहल की पहाड़ियों में तेलियागढ़ी के समीप हिसामुद्दीन ऐवाज को पराजित किया | ऐवाज ने इल्तुतमिश की अधीनता स्वीकार कर ली | इल्तुतमिश ने ऐवाज के स्थान पर मलिक जानी को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया |
  • इल्तुतमिश ने हीं भारत में सल्तनत काल में सर्वप्रथम शुद्ध अरबी सिक्के चलाए थे | सल्तनत युग के दो महत्वपूर्ण सिक्के चांदी का टंका (175 ग्रेन) और तांबे का जीतल उसी ने आरंभ किए तथा सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखवाने की परंपरा शुरू की | 1229 ई मे इल्तुतमिश को बगदाद के खलीफा से “खिलअत” का प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ जिससे इल्तुतमिश वैध सुल्तान और दिल्ली सल्तनत स्वतंत्र राज्य बन गया |
  • इब्नबतूता के वर्णन से ज्ञात होता है कि इल्तुतमिश ने अपने महल के सामने संगमरमर की दो शेरों की मूर्तियां स्थापित कराई थी | जिनके गले में 2 घंटियां लटकी हुई थी, जिनको बजाकर कोई भी व्यक्ति सुल्तान से न्याय की मांग कर सकता था | इल्तुतमिश ने सभी शहरों में काजी और अमीरदाद नामक अधिकारी नियुक्त किए थे | डॉक्टर आर.पी. त्रिपाठी के अनुसार भारत में मुस्लिम संप्रभुता का इतिहास इल्तुतमिश से आरंभ होता है| सर वूल्जले हेग के अनुसार इल्तुतमिश गुलाम शासकों में सबसे महान था | डॉ ईश्वरी प्रसाद के अनुसार इल्तुतमिश , निस्संदेह गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक था |
  • मध्यकालीन भारत की प्रथम महिला शासिका रजिया सुल्तान (1236-40) थी | व्यक्तिगत दृष्टि से उसने भारत में पहली बार स्त्री के संबंध में इस्लाम की परंपराओं का उल्लंघन किया और राजनीतिक दृष्टि से उसने राज्य की शक्ति को सरदारों अथवा सूबेदारों में विभाजित करने के स्थान पर सुल्तान के हाथों में केंद्रित करने पर बल दिया तथा इस प्रकार उसने इल्तुतमिश के संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन किया जो उस समय की परिस्थितियों में तुर्की राज्य के हित में था | रजिया बेगम को सत्ताच्युत करने में तुर्कों का हाथ था | उन्होंने भटिंडा के गवर्नर मलिक अल्तूनिया के नेतृत्व में रजिया के विरुद्ध विद्रोह कर उसे सत्ता से हटाया था |
  • सुल्तान बलबन का पूरा नाम गयासुद्दीन बलबन था। बलबन ने 1266 से 1287 ई. तक सुल्तान के रूप में सल्तनत की बागडोर संभाली। उसे उलुग खां के नाम से भी जाना जाता है | उसका वास्तविक नाम बहाउद्दीन था | इल्तुतमिश की भांति वह भी इल्बरी तुर्क था | उसने एक नवीन राजवंश बलबनी वंश की नींव डाली | बलबन बचपन में  ही मंगोलों  द्वारा पकड़ लिया गया था | जिन्होंने उसे गजनी में बसरा के निवासी ख्वाजा जमालुद्दीन के हाथों बेच दिया | अनंतर 1232 ईसवी में उसे दिल्ली लाया गया जहां इल्तुतमिश ने 1233 ईसवी में ग्वालियर विजय के पश्चात उसे खरीदा | उसकी योग्यता से प्रभावित होकर इल्तुतमिश ने उसे खसदार का पद दिया |
  • रजिया के काल में वह अमीर-ए-शिकार के पद पर पहुंच गया | रजिया के विरुद्ध षड्यंत्र में उसने तुर्की सरदारों का साथ दिया, फलस्वरूप बहराम शाह के सुल्तान बनने के बाद उसे अमीर-ए-आखूर का पद मिला | बदरुद्दीन रूमी की कृपा से उसे रेवाड़ी की जागीर मिली | महमूद शाह को सुल्तान बनाने में उसने तुर्की अमीरों का साथ दिया ,  जिसके फलस्वरूप उसे हांसी की सूबेदारी दी गई | 1249 ईस्वी में बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह सुल्तान नसिरुद्दीन से किया | इस अवसर पर उसे “उलुग खां”  की उपाधि और “नायाब-ए-ममलिकात”  का पद दिया गया | 1266 ई. में बलबन दिल्ली की राजगद्दी पर आसीन हुआ था |
  • बलबन के विषय में कहा गया है कि उसने ‘ रक्त और लौह ‘ की नीति अपनाई थी | बलबन के राजत्व सिद्धांत की दो मुख्य विशेषताएं थी – प्रथम, सुल्तान का पद ईश्वर के द्वारा प्रदत्त होता है और द्वितीय , सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है |

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  • बलबन ने फारस के लोक प्रचलित वीरों से प्रेरणा लेकर अपना राजनीतिक आदर्श निर्मित किया था |उनका अनुकरण करते हुए उसने राजत्व की प्रतिष्ठा को उच्च सम्मान दिलाने का प्रयास किया | राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि ‘ नियामत-ए- खुदाई ‘ माना गया | उसके अनुसार मान मर्यादा में वह केवल पैगंबर के बाद है | राजा ‘ जिले अल्लाह ‘ या ‘ जिल्ले इलाही ‘ अर्थात ‘ ईश्वर का प्रतिबिंब ‘ है | यह दिल्ली का प्रथम सुल्तान था , जिसने राजत्व संबंधी सिद्धांतों की स्थापना की | उसने पुत्र बुगरा खाँ से कहा था – ‘ सुल्तान का पद निरंकुशता का सजीव प्रतीक है ” |
  • बलबन ने ईरानी बादशाहों के कई परंपराओं को अपने दरबार में आरंभ किया | उसने सिजदा ( भूमि पर लेट कर अभिवादन करना) और पाबोस ( सुल्तान के चरणों को चूमना ) की रीतियां आरंभ की | उसने अपने दरबार में प्रतिवर्ष फारसी त्यौहार ‘ नौरोज ‘ बड़ी शानो-शौकत के साथ मनाने की प्रथा प्रारंभ की।

·      मंगोलो से मुकाबला करने के लिए बलबन ने एक सैन्य विभाग दीवान-ए-अर्ज की स्थापना की थी। बलबन ने अपना सेना मंत्री (दीवान-ए-अर्ज) इमाद-उल-मुल्क को बनाया था, जो अत्यंत ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति था। बलबन ने उसे वजीर के आर्थिक नियंत्रण से मुक्त रखा ताकि उसे धन की कमी न हो।

 

  • कुतुबमीनार का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने आरंभ किया और इसका निर्माण कार्य इल्तुतमिश के काल में पूरा हुआ। फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में इसकी चौथी मंजिल को काफी हानि पहुंची थी, जिस पर फिरोज ने चौथी मंजिल के स्थान पर दो और मंजिलो का भी निर्माण करवाया ग्यासुद्दीन तुगलक ने इसके निर्माण में कोई योगदान नही दिया था।
  • मुहम्मद गौरी की मृत्यु (1206) के बाद लाहौर के विशिष्ट जनों एवं अमीरों ने कुतुबुद्दीन ऐबक को सार्वभौम शक्तियाँ ग्रहण करने के लिए आमंत्रित किया। अतः उसने लाहौर जाकर सत्ता ग्रहण की तथा 24 जून, 1206 को औपचारिक रुप से सिंहासनारुढ़ हुआ। ऐबक की राजधानी लाहौर थी। गद्दी पर बैठने के बाद ऐबक के सामने सबसे बड़ी कठिनाई गोरी के दास और उसके राज्य के उत्तराधिकारी ताजुद्दीन यल्दौज और नासिरुद्दीन कुबाचा की तरफ से थी। ऐबक ने अपनी बहन की शादी कुबाचा से कर उसे अपने पक्ष में कर लिया, किंतु यल्दौज की तरफ से खतरा बना रहा। यही कारण था कि ऐबक सदा लाहौर में ही रहा। उसे दिल्ली आने का कभी अवसर नही मिला।
  • वस्तुतः दिल्ली का पहला सुल्तान इल्तुतमिश था। उसने सुल्तान के पद की स्वीकृति गोर के किसी शासक से नही अपितु खलीफा से प्राप्त की। खलीफा ने इल्तुतमिश के  शासन की पुष्टि उस सारे क्षेत्र में कर दी जो उसने विजित किया और उसे सुल्तान-ए-आजम की उपाधि प्रदान की। इस प्रकार वह कानूनी तरीके से दिल्ली का प्रथम स्वतंत्र सुल्तान था। व्यावहारिक दृष्टि से उसने दिल्ली की गद्दी के दावेदार ताजुद्दीन यल्दौज और नासिरुद्दीन कुबाचा को समाप्त किया, भारत मे तुर्की राज्य को संगठित किया, मंगोल आक्रमण से बचाया, राजपूतों की शक्ति को तोड़ने का प्रयत्न किया, सुल्तान के पद को वंशानुगत बनाया, दिल्ली को तुर्की राज्य की राजधानी के अनुरुप वैभवपूर्ण बनाया और अपने नाम के सिक्के चलाए।
  • गुलाम का गुलाम इल्तुतमिश को कहा जाता है। मो. गोरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को खरीदा था। ऐबक ने आरंभ से ही इसे सरजहांदार (अंगरक्षकों का प्रधान) का महत्वपूर्ण पद दिया। ऐबक ने अपनी पुत्री का विवाह इल्तुतमिश से किया था।
  • चंगेज खान एक मंगोल शासक था जिसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार में एक अहम भूमिका निभाई। चंगेज खान का वास्तविक या प्रारंभिक नाम तेमुजिन (या तेमुचिन) था।
  • बलबन ने गढ़मुक्तेश्वर के मस्जिद के दीवारों पर उत्कीर्ण शिलालेख पर स्वयं को खलीफा का सहायक कहा है।

 

खिलजी वंश

  • जलालुद्दीन खिलजी ने 1290 ई में खिलजी वंश की स्थापना की | इसने अपना राज्याभिषेक 1290 ई में कैकुबाद द्वारा बनवाए गए अपूर्ण किलोखरी ( कीलूगढ़ी ) के महल में करवाया था। डॉक्टर ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार , जलालुद्दीन दिल्ली का प्रथम तुर्की सुल्तान था जिसने उदार निरंकुशवाद के आदर्श को अपने सामने रखा |
  • जलालुद्दीन जब दिल्ली का सुल्तान बना तब उसने अलाउद्दीन को ‘ अमीर-ए-तुजुक ‘ का पद दिया तथा अपनी पुत्री का विवाह अलाउद्दीन से किया | मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण अलाउद्दीन खिलजी को कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी प्राप्त हुई |
  • अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था , जिसने धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया | उसने अपने आपको ‘ यामिन-उल-खिलाफत नासिरी अमीर-उल-मुमनिन ‘  बताया | वह उलेमा  वर्ग के प्रभाव से मुक्त रहा|अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वाकांक्षी सुल्तान था। उसने ‘ सिकंदर द्वितीय सानी ‘ की उपाधि धारण की और उसे अपने सिक्कों पर अंकित करवाया | अलाउद्दीन का प्रसिद्ध सेनापति जफर खां मंगोलो के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया जो अपने समय का श्रेष्ठ और साहसी सेनापति था|
  • जफर खां के शौर्य और भारतीय सेना की दृढ़ता से मंगोल इतने प्रभावित हुए कि उसी रात को 30 कोस पीछे हट गए और वापस चले गए | पद्मिनी , राणा रतन सिंह की पत्नी थी , अलाउद्दीन खिलजी के मेवाढ़ की राजधानी चित्तौड़ पर आक्रमण के दौरान राणा रतन सिंह की मृत्यु हो जाने के कारण रानी पद्मिनी ने जौहर कर लिया था। पद्मिनी की कहानी का आधार 1540 ई में मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित काव्य-पुस्तक ‘ पद्मावत ‘ है।
  • अलाउद्दीन के शासनकाल के प्रारंभ में कुछ विद्रोह हुए | इन विद्रोह के कारणों पर विचार करके अलाउद्दीन खिलजी ने इसे समाप्त करने के लिए चार अध्यादेश जारी किए | पहले अध्यादेश के द्वारा उपहार , पेंशन , दान में प्राप्त भूमि आदि व्यक्तियों से वापस ले ली गई तथा सरकारी अधिकारियों को सभी व्यक्तियों से अधिकाधिक कर लेने का आदेश दिए गए | दूसरे अध्यादेश के अनुसार , गुप्तचर विभाग का गठन किया गया | तीसरे अध्यादेश के अनुसार , मादक द्रव्यों ( शराब , भांग आदि ) का प्रयोग तथा जुआ खेलने पर रोक लगा दी गई | चौथे अध्यादेश द्वारा सरदारों , अमीरों की दावतों , विवाह संबंधों पर प्रतिबंध लगा दिया गया |
  • अलाउद्दीन के आक्रमण के समय देवगिरि का शासक रामचंद्रदेव था। 1296 ई में देवगिरि के शासक रामचंद्रदेव ने अलाउद्दीन के सफल आक्रमण से बाध्य होकर उसे प्रतिवर्ष एलिचपुर की आय भेजने का वायदा किया था। परंतु 1305 ई अथवा 1306 ई में उसने उस कर को दिल्ली नहीं भेजा | जिस कारण 1307 ई में अलाउद्दीन ने मलिक काफूर के नेतृत्व में एक सेना देवगिरि पर आक्रमण करने के लिए भेजी | राजा रामचंद्रदेव युद्ध में पराजित हुआ और उसने आत्मसमर्पण कर दिया | अलाउद्दीन ने रामचंद्रदेव के प्रति सम्मानपूर्ण व्यवहार किया तथा उसे ‘ राय रायन ‘ की उपाधि दी | छह माह पश्चात् उसे एक लाख सोने का टंका और नवसारी का जिला देकर उसे उसके राज्य को वापस भेज दिया गया | 1312  ई में मलिक काफूर ने  रामचंद्रदेव के पुत्र शंकरदेव के विरुद्ध भी एक अभियान का नेतृत्व किया था।
  • मलिक काफूर को अलाउद्दीन ने अपने गुजरात विजय के द्वारा दौरान प्राप्त किया था | इसे ‘ हजार दीनारी ‘ भी कहा जाता था |
  • अलाउद्दीन पहला सुल्तान था , जिसने भूमि की पैमाइश करा कर लगान वसूल करना प्रारंभ किया | अपनी व्यवस्था को लागू करने के लिए अलाउद्दीन ने एक पृथक विभाग ‘ दीवान-ए-मुस्तखराज ‘ की स्थापना की | * अलाउद्दीन ने परंपरागत लगान अधिकारियों ( खुत्त , मुकद्दम एवं चौधरी ) से लगान वसूल करने का अधिकार छीन लिया था। उनके सारे विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए | उनकी भूमि पर से कर लिया जाने लगा और बाकी अन्य सभी कर भी लिए गए जिसके कारण खुत्त (जमींदार) और बलाहार ( साधारण किसान ) में कोई अंतर नही रहा |
  • अलाउद्दीन की राजस्व और लगान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य एक शक्तिशाली और निरंकुश राज्य की स्थापना करना था | उसने उन सभी व्यक्तियों से भूमि छीन ली , जिन्हें वह मिल्क ( राज्य द्वारा प्रदत्त संपत्ति , ईनाम तथा पेंशन ) तथा वक्फ ( धर्मार्थ से प्राप्त हुई भूमि ) आदि के रूप में मिली थी , फलतः खालिसा भूमि अधिक पैमाने पर विकसित हुई | * अलाउद्दीन खिलजी ने उपज का 50% भूमिकर (खराज) के रूप में निश्चित किया | अलाउद्दीन खिलजी भारत का प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने भूमि की वास्तविक आय पर राजस्व  सुनिश्चित किया |
  • अलाउद्दीन ने बाजार नियंत्रण या मूल्य नियंत्रण की नीति लागू की | अलाउद्दीन ने अपने बाजार नियंत्रण की सफलता के लिए कुशल कर्मचारी नियुक्त किए। उसने मलिक कबूल को शहना या बाजार का अधीक्षक नियुक्त किया |  बरनी इन बाजार सुधारों का उद्देश्य मंगोलों के विरुद्ध एक विशाल सेना तैयार करना तथा हिंदुओं में विद्रोह के विचार न पनपने देना बताता है |
  • सल्तनत कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी ने “सार्वजनिक वितरण प्रणाली” प्रारंभ की थी | अलाउद्दीन खिलजी द्वारा लगाए गए दो नवीन कर  थे । ” घरी कर” जो कि घरों एवं झोपड़ियों पर लगाया जाता था तथा “चराई कर” जो की दुधारू पशुओं पर लगाया जाता था |
  • 1306 ई० के बाद अलाउद्दीन खिलजी के समय में दिल्ली सल्तनत एवं मंगोलो के बीच सीमा सिंधु नदी थी | सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के समय में सिर्फ मुगल के नेतृत्व में (1325ईसवी) मंगोल सेना ने सिंधु को अवश्य पार किया था | लेकिन समाना के सूबेदार मलिक शादी ने उन्हें हरा दिया था |
  • मुबारक खिलजी ने स्वयं को खलीफा घोषित किया तथा “अल-इमाम” , “उल- इमाम” , “खलाफत-उल-लह” आदि उपाधियाँ धारण की जिनका वह सर्वथा अयोग्य था  | नसिरुद्दीन खुसरवशाह (15 अप्रैल से 7 सितंबर 1320) हिंदू से परिवर्तित मुसलमान था | इसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा “पैगंबर का सेनापति”  की उपाधि ग्रहण की |  इसके विरोधियों ने इसे “इस्लाम का शत्रु” और “इस्लाम खतरे में है” का नारा दिया|

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  • जब उसने राजत्व प्राप्त किया, तो वह शरियत के नियमों और आदेशों से पूर्णतया स्वतंत्र था। बरनी ने यह कथन अलाउद्दीन खिलजी के लिए कहा है। अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसने धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया। इस संदर्भ में अपनी नीति की व्याख्या करते हुए वह स्वयं कहता है कि – मैं नही जानता कि कानून की दृष्टि से क्या  उचित है और क्या अनुचित? मैं राज्य की भलाई अथवा अवसर विशेष के लिए  जो उपयुक्त समझता हूँ, उसी को करने की आज्ञा देत हूँ, अंतिम न्याय के दिन मेरा  क्या होगा, मैं नही जानता। अलाउद्दीन ने राजपद के विषय में बलबन के विचार को पुनः जीवित किया। वह राजा की सार्वभौमिकता में विश्वास रखता था, जो पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मात्र है। उसने अपनी शक्ति की वृध्दि के विषय मे खलीफा की अनुमति लेना आवश्यक नही समझा। इसलिए उसने खलीफा से अपने पद की मान्यता प्राप्त करने के संबंध में कोई याचना नही की।
  • अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वकांक्षी सुल्तान था। उसने सिकंदर द्वीतीय सानी की उपाधि धारण की और उसे अपने सिक्कों पर अंकित करवाया। वह संपूर्ण विश्व को जीतने की अभिलाषा रखता था। और साथ ही एक नवीन धर्म की भी, किंतु अपने वफादार मित्र एवं कोतवाल अलाउल-मुल्क की सलाह पर उसने अपना विचार त्याग दिया।
  • डॉ. के. एस. लाल ने लिखा है कि “धन के लालच और गौरव की लालसा ने अलाउद्दीन को भी दक्षिण के सभी राज्यों पर एक के बाद एक आक्रमण करने की प्रेरणा दी।” दक्षिण भारत के इन राज्यों पर आक्रमण करने का अलाउद्दीन का उद्देश्य धन और विजय की लालसा ही  थी,  उनकी आंतरिक नीति में हस्तक्षेप नही था। वह इन दक्षिणी राज्यों को अपने कब्जे में नही करना चाहता था।

 

तुगलक वंश

  • अलाउद्दीन के सेनापतियों में गयासुद्दीन तुगलक या गाजी मलिक तुगलक वंश का प्रथम शासक था| उसने तुगलक वंश की स्थापना की थी | उसकी माता हिंदू जाट महिला थी तथा पिता एक करौना  तुर्क था, ,जो बलबन का दास था | गयासुद्दीन तुगलक अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में  कई महत्वपूर्ण अभियानों का अध्यक्ष था तथा उसे दीपालपुर का राज्यपाल नियुक्त किया गया था | 29 अवसरों पर उसने मंगोलो के विरुद्ध युद्ध किया | उन्हें भारत से बाहर खदेड़ा |  इसलिए वह मलिक-उल-गाजी के नाम से प्रसिद्ध हुआ | खुसरो शाह को समाप्त करके उसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार कर लिया तथा 8 सितंबर 1320 ई. को सुल्तान बना | इसका एक नाम गाजी बेग तुगलक या गाजी तुगलक भी था | इसी कारण इतिहास में उसके उत्तराधिकारियों को तुगलक पुकारा जाने लगा और उसका वंश तुगलक वंश कहलाया |
  • गयासुद्दीन तुगलक के समय में लगान किसानों से पहले की तरह पैदावार का 1/5 से 1/3 भाग वसूल किया जाने लगा | आवश्यकतानुसार अकाल की स्थिति में भूमि कर को माफ किया जा सकेगा |राजस्व वसूली में सरकारी कर्मचारियों को हिस्सा ना देकर मुक्त जागीरें दी गई |  गयासुद्दीन तुगलक के समय “नस्ल”  एवं “बटाई” की प्रथा प्रचलन में रही | अलाउद्दीन के समय की कठोर दंड व्यवस्था समाप्त कर दी गई  परंतु कर न देने वालों ,सरकारी धन की बेईमानी करने वालों और चोरों को कठोर दंड  दिए गए | बरनी के अनुसार तुगलक शाह के न्याय से भेड़िए को भी इस बात का साहस नहीं होता था कि वह किसी  भेड़ की ओर देखें |
  • दिल्ली सल्तनत के सभी सुल्तानों में मोहम्मद बिन तुगलक (1325 से 1351) सर्वाधिक विद्वान एवं शिक्षित शासक था | वह खगोल शास्त्र , गणित एवं आयुर्विज्ञान सहित अनेक विधाओं में निपुण था |
  • मोहम्मद बिन तुगलक ने कृषि की उन्नति के लिए एक नई विभाग “दीवान- ए –अमीर-ए- कोही” की स्थापना की | इस विभाग का मुख्य कार्य कृषकों को प्रत्यक्ष सहायता देकर अधिक भूमि कृषि कार्य के अधीन लाना था | 60 वर्ग मील की भूमि का एक लंबा टुकड़ा इस कार्य के लिए चुना गया | भूमि पर कृषि सुधार किए गए और फसल चक्र के अनुरूप हेरफेर के साथ विभिन्न फसलों की खेती की गई |
  • मुहम्मद तुगलक के प्रयोगों में एक सबसे महत्वपूर्ण था | राजधानी दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरि) ले जाना | इब्नबतूता के अनुसार सुल्तान को दिल्ली के नागरिक सम्मान पूर्ण पत्र लिखते थे इसलिए उन्हें दंड देने के लिए उसने देवगिरी को राजधानी बनाने का निर्णय लिया | डॉक्टर के.ए. निजामी के अनुसार , सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी ने देवगिरि का नाम कुतबाबाद रखा तथा मुहम्मद तुगलक ने दौलताबाद | देवगिरी को कुव्वत-उल इस्लाम भी कहा गया |

·      मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने सिक्कों पर “अल सुल्तान जिल्ली अल्लाह” (सुल्तान ईश्वर की छाया है), ईश्वर सुल्तान का समर्थक है , आदि वाक्य अंकित करवाया | मुहम्मद बिन तुगलक के द्वारा जारी स्वर्ण सिक्कों को इब्नबतूता द्वारा दी नार की संज्ञा दी गई थी | बरनी मोहम्मद तुगलक की पांच मुख्य  योजनाओं का विशेष रूप से उल्लेख करता है – .

1.    दोआब में कर की वृद्धि

2.    देवगिरी को राजधानी बनाना

3.    सांकेतिक मुद्रा जारी करना

4.    खुरासन पर आक्रमण और

5.    कराचिल की ओर अभियान |

·      इब्नबतूता (1333-1347) मोरक्को मूल का अफ्रीकी यात्री था | यह मोहम्मद बिन तुगलक के कार्यकाल  (1325-51) में भारत आया | मोहम्मद बिन तुगलक ने इसे दिल्ली का काजी नियुक्त किया था | बाद में 1342 ईसवी में उसे सुल्तान का राजदूत बनाकर चीन भेजा गया | इब्नबतूता ने किताब-उल-रेहला नामक अपनी पुस्तक में अपनी यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया है|  सल्तनत काल में डाक व्यवस्था का विस्तृत विवरण हमें इब्नबतूता की यात्रा वृतांत द्वारा प्राप्त होता है|

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  • दिल्ली के सुल्तानों में मोहम्मद बिन तुगलक प्रथम सुल्तान था, जो हिंदुओं के त्यौहारों, मुख्यतया होली में भाग लेता था | उसने गैर-तुर्कों  और भारतीय मुसलमानों को भी सरकारी पदों पर नियुक्त किया था |  जिसके कारण बरनी ने उसकी कटु आलोचना की और ऐसे व्यक्तियों को छिछोरा, माली, जुलाहा , नाई, रसोईया आदि कहा | 20 मार्च 1351 को मोहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु हो गई | उसके निधन पर बदायूंनी ने लिखा है, सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिल गई |  फिरोजशाह तुगलक ने सामान्य लोगों की भलाई के लिए कुछ उपकार के कार्य किए | नियुक्ति के लिए एक दफ्तर (रोजगार दफ्तर) खोलकर तथा प्रत्येक मनुष्य के गुण एवं योग्यता की पूरी जांच पड़ताल के बाद यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को नियुक्ति देकर उसने बेकारी की समस्या को हल करने का प्रयास किया | फिरोजशाह तुगलक संतों एवं धार्मिक व्यक्तियों को जागीर एवं संपत्ति दान करता था | उसने एक विभाग “दीवान ए खैरात” स्थापित किया था जो गरीब मुसलमानों , अनाथ स्त्रियों एवं विधवाओं को आर्थिक सहायता देता था और निर्धन मुसलमान लड़कियों के विवाह की व्यवस्था करता था | राज्य के खर्च पर हज की व्यवस्था करने वाला पहला भारतीय शासक फिरोज तुगलक था | उसने दारुल-शफा नामक एक खैराती अस्पताल की स्थापना भी की और उसमें कुशल हकीम रखें | फिरोजशाह तुगलक को दासों का बहुत शौक था | उसके दासों की संख्या संभवत 180000 तक पहुंच गई थी | उनकी देखभाल के लिए एक पृथक विभाग (दीवान-ए-बंदगान)  का गठन किया गया था|
  • सल्तनत काल में सर्वप्रथम फिरोजशाह तुगलक ने ही लोक निर्माण विभाग की स्थापना की थी |कहा जाता है कि फिरोज ने 300 नवीन नगरों का निर्माण कराया | उसके द्वारा बसाए नगरों में फतेहाबाद , हिसार, फिरोजपुर,  जौनपुर और फिरोजाबाद प्रमुख थे | फरिश्ता के अनुसार फिरोज ने 40 मस्जिदें , 30 विद्यालय , 20 महल , 100 सराय , 200 नगर अस्पताल , 5 मकबरे, 100 सार्वजनिक स्नानगृह, 10 स्तंभ , 150 पुलों का निर्माण कराया था | अपने बंगाल अभियान के दौरान उसने इकदला का नया नाम आजादपुर तथा पंडुवा का नया नाम फिरोजाबाद रखा | उसके राज्य का मुख्य वास्तुकार  मलिक गाजी शहना था | प्रत्येक भवन की योजना को उसके व्यय अनुमान के साथ “दीवान-ए- वीजारत” के सम्मुख रखा जाता था | तभी उस पर धन स्वीकार किया जा सकता था |
  • फिरोज तुगलक का शासनकाल भारत में नहरों के सबसे बड़े जाल का निर्माण करने के कारण प्रसिद्ध रहा | सिंचाई की सुविधा के लिए उसने पांच बड़ी नहरों का निर्माण कराया :-
  1. प्रथम नहर 150 मील लंबी थी जो यमुना नदी का पानी हिसार तक ले जाती थी

2.    दूसरी 96 मील लंबी थी जो सतलज से घाघरा तक जाती थी |

3.    तीसरी सिरमौर की पहाड़ियों से निकलकर हांसी तक जाती थी |

4.    चौथी घाघरा से फिरोजाबाद तक थी

5.    पांचवी यमुना नदी से फिरोजाबाद तक थी|

  • फिरोज तुगलक ने सिंचाई और यात्रियों की सुविधा के लिए 150 कुएं भी खुदवाए | फरिश्ता के अनुसार फिरोज ने सिंचाई की सुविधा के लिए विभिन्न स्थानों पर 50 बांधों और 30 झीलों अथवा जल को संग्रह करने के लिए तालाबों का निर्माण करवाया | फिरोज तुगलक उलेमा वर्ग की स्वीकृति के पश्चात “हक्क-ए-शर्ब” नामक सिंचाई कर लगाने वाला दिल्ली का प्रथम सुल्तान था | उन किसानों को , जो सिंचाई के लिए शाही नहरों का पानी प्रयोग में लाते थे , अपनी पैदावार का 1/10 भाग सरकार को देना पड़ता था |

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  • फिरोज तुगलक द्वारा ब्राह्मणों पर जजिया लगाया गया था | उल्लेखनीय है कि उस समय तक ब्राह्मण इस कर से मुक्त रखे गए थे | फिरोजशाह तुगलक ने बागवानी में अपनी अभिरुचि के कारण दिल्ली के निकट 1200 नए फलों के बाग लगाए तथा अलाउद्दीन के 30 पुराने बागों को फिर से लगवाया | उसने अपने बागों में फलों की गुणवत्ता सुधारने के लिए भी उपाय किए थे |
  • फिरोजशाह तुगलक द्वारा अशोक के दो स्तंभों को मेरठ एवं टोपरा (अब अंबाला जिले में) से दिल्ली लाया गया| टोपरा वाले स्तंभ को महल तथा फिरोजाबाद की मस्जिद के निकट पुनः स्थापित कराया गया | मेरठ वाले स्तंभ को दिल्ली के वर्तमान बाड़ा हिंदू राव अस्पताल के निकट एक टीले कश्के – शिकार या आखेट- स्थान के पास पुनः स्थापित कराया गया |
  • दिल्ली के सुल्तान फिरोज तुगलक ने इस उद्देश्य से एक “अनुवाद विभाग”  की स्थापना की थी कि उससे हिंदू एवं मुस्लिम दोनों संप्रदायों के लोगों में एक दूसरे के विचारों की समझ बेहतर हो सके | उसने कुछ संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद भी करवाया |
  • नसीरुद्दीन महमूद (1394 से 1412 ईसवी ) तुगलक वंश का अंतिम शासक था | इसके शासनकाल में ख्वाजा जहाँ ने जौनपुर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की | पंजाब का सूबेदार खिज्र खां स्वतंत्र होकर दिल्ली को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगा |फिरोज के एक अन्य पुत्र नुसरत शाह ने नासिरूदीन को चुनौती दी। फलस्वरूप तुगलक वंश दो भागों में विभाजित हो गया और दोनों शासकों ने एक ही साथ दिल्ली के छोटे से राज्य पर शासन किया | नासिरुद्दीन दिल्ली में रहा और नुसरत शाह फिरोजाबाद में |
  • नसीरुद्दीन महमूद के शासनकाल में मध्य एशिया के महान मंगोल सेनानायक तैमूर ने भारत पर आक्रमण (1398 ईसवी) में किया | यह कथन इसी शासक के लिए प्रचलित था- शाहंशाह की सल्तनत दिल्ली से पालम तक फैली हुई है | तैमूर के आक्रमण (1398 ईसवी ) ने दिल्ली सल्तनत एवं तुगलक वंश दोनों को ही नष्ट कर दिया | 1412 ईस्वी में नसीरुद्दीन महमूद की मृत्यु के साथ ही तुगलक वंश का अंत हो गया | 1413 ईसवी में सरदारों ने दौलत खां को दिल्ली का  सुल्तान चुना | परंतु उसे खिज्र खान ने पराजित कर दिया | वह तैमूर द्वारा नियुक्त लाहौर का सूबेदार था | तैमूर के आक्रमण के बाद 1414 ईसवी में उसने दिल्ली पर अधिकार कर एक नए वंश सैयद वंश की नींव डाली |

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  • मुहम्मद बिन तुगलक के द्वारा जारी स्वर्ण के सिक्कों को इब्नबतूता द्वारा दीनार की संज्ञा दी गई थी। मुहम्मद बिन तुगलक अपनी सैन्य शक्ति में अभिवृध्दि के लिए स्वर्ण सिक्कों की टोकन मुद्रा जारी करना चाहता था। न कि पश्चिम एशियाई  देशों तथा उत्तरी अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार करने के लिए।
  • दिल्ली के सुल्तानों में मुहम्मद बिन तुगलक प्रथम सुल्तान था, जो हिंदुओ के त्यौहारों, मुख्यतया होली में भाग लेता था।
  • रुकनुद्दीन – 1236 ई.

मुबारक खान              – 1316-1320 ई.

फिरोज  शाह तुगलक  – 1351-1388 ई.

आलमशाह               – 1445-1451 ई.

रुक्नुद्दीन 1236 ई. में इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद  शासक बना, जबकि  इल्तुतमिश ने रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। मुबारक खान 1316 ई. में मुबारक खिलजी के नाम से दिल्ली का सुल्तान बना, फिरोज शाह तुगलक 1351-1388 ई. तक दिल्ली का सुल्तान रहा तथा सैयद वंशी शासक आलमशाह 1445-1451 ई. तक दिल्ली का सुल्तान रहा।

 

लोदी वंश

  • लोदी वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने 1451 ई. में की। वह बहलोलशाह गाजी के नाम से सिंहासन पर बैठा तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाया। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विजय जौनपुर की थी। बहलोल लोदी ने हिंदुओं के प्रति धार्मिक कट्टरता का व्यवहार नही किया।

·      उसके दरबार में कई प्रतिष्ठित हिंदू सरदार थे-राय करन सिंह, राय प्रताप सिंह,  राय नरसिंह, राय त्रिलोक चंद्र और राय दांदू | उसने बहलोल सिक्का चलाया जो उत्तर भारत में अकबर से पूर्व विनिमय का मुख्य साधन था। “बहलोल लोदी”ने अपनी मृत्यु के पहले ही अपने तीसरे पुत्र निजाम खां को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था, किंतु कुछ सरदारों ने इसका विरोध किया जिसका मुख्य कारण यह था कि निजाम खाँ की माँ जैबंद एक सुनार की पुत्री थी। कुछ शक्तिशाली सरदारों ने निजाम खां का साथ दिया और 17 जुलाई 1489 ईस्वी को निजाम खां सुल्तान सिकंदरशाह के नाम से सिंहासन पर बैठा | वह लोदी वंश का महानतम शासक था |

·      1504 ई. में सिकंदर लोदी ने राजस्थान के शासकों पर नियंत्रण के ध्येय से यमुना नदी के किनारे आगरा नामक नवीन नगर बसाया और इसे अपनी राजधानी बनाया | सिकंदर शाह अत्यधिक परिश्रमी, उदार एवं न्याय प्रिय शासक था | उसने कृषि और व्यापार की उन्नति के लिए प्रयत्न किया | नाप का पैमाना “गज- ए- सिकंदरी” उसी के समय में आरंभ किया गया | उसने निर्धनों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था की | उसने मोहर्रम में ताजिए निकालना बंद कर दिया तथा पीरों और संतों की मजारों पर मुस्लिम स्त्रियों को जाने से रोका था | उसके समय में योग्य व्यक्तियों की एक सूची बनाकर प्रत्येक 6 माह  पश्चात उसके सामने प्रस्तुत की जाती थी |

·      वह शिक्षित और विद्वान था | उसके स्वयं के आदेश से एक आयुर्वेदिक ग्रंथ का फारसी में अनुवाद किया गया जिसका नाम “फरहंगे सिकंदरी”  रखा गया | उसके समय में गायन विद्या के एक श्रेष्ठ ग्रंथ लज्जत-ए-सिकंदरशाही की रचना हुई| सिकंदर लोदी शहनाई सुनने का बहुत शौकीन था | वह ” गुलरूखी ” उपनाम से कविताएं लिखता था | सुल्तान सिकंदर ने अनाज से जकात (आयकर) समाप्त कर दिया|

·      1518 ईस्वी में महाराणा सांगा और इब्राहिम लोदी के मध्य खातोली का युद्ध हुआ | इस युद्ध में इब्राहिम लोदी पराजित हुआ था | पानीपत का प्रथम युद्ध 12 अप्रैल 1526 को बाबर और इब्राहिम लोदी के मध्य हुआ था | बाबर के योग्य सेनापतित्व, श्रेष्ठ युद्ध नीति और तोप खाने के कारण इब्राहिम की पराजय हुई और युद्ध स्थल में मारा गया |

·      फरिश्ता के अनुसार वह मृत्यु पर्यंत लड़ा और एक सैनिक की भांति मारा गया | नआमतउल्ला (नियामतउल्ला)  के अनुसार, सुल्तान इब्राहीम के अतिरिक्त भारत का अन्य कोई सुल्तान युद्ध स्थल में नहीं मारा गया |

  • दिल्ली सल्तनत में लोदी वंश के शासक अफगान मूल के थे। लोदी वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने 1451 ई. में किया था। इस वंश का शासनकाल 1451-1526 ई. तक रहा। अंतिम लोदी शासक इब्राहिम लोदी था जिसको 1526 ई. में पानीपत के युध्द में पराजित करके बाबर ने मुगल वंश की स्थापना किया था।
  • 1518 ई. में महाराणा सांगा और इब्राहिम लोदी के मध्य खातोली का युध्द हुआ। इस युध्द मे इब्राहिम लोदी पराजित हुआ था।
  • 1206-90 ई. के मध्य दिल्ली सल्तनत के सुल्तान गुलाम वंश के सुल्तानों के नाम से विख्यात हुए। इस दौरान कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-10 ई.) इल्तुतमिश (1210-36 ई.) तथा बलबन (1266-87 ई.) जैसे महान शासकों ने शासन किया, जबकि इब्राहिम लोदी, लोदी वंश का शासक था। इसने 1517-26 ई. तक दिल्ली पर शासन किया।

 

विजयनगर साम्राज्य

  • विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर तथा बुक्का ने 1336 ई. में की थी | उनके पिता संगम के नाम पर उनका वंश संगम वंश कहलाया | हरिहर और बुक्का काम्पिली राज्य में मंत्री थे | मोहम्मद तुगलक ने जब काम्पिली को विजित किया तब हरिहर और बुक्का को बंदी बना लिया | इन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया | बाद में उन्हें दक्षिण के विद्रोह को शांत करने के लिए भेजा गया | वे उस कार्य में सफल नहीं हुए और अंत में एक संत विद्यारण्य के प्रभाव में आकर पुनः हिंदू बन गए |
  • विजय नगर को संस्थापित करने के लिए हरिहर एवं बुक्का ने अपने गुरु विद्यारण्य तथा वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार सायण से शिक्षा ली थी | इस साम्राज्य के चार राजवंशों :-संगम वंश (1336-1485) , सालुव वंश (1485-1505), तुलुव वंश (1505-1570), अरावीडु वंश (1570-1650)ने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया।  विजयनगर साम्राज्य की राजधानियां क्रमश: _-  अनेगोंडी , विजयनगर , वेनुगोंडा  तथा  चंद्रगिरि  थी।
  • 1352-53 ई. में हरिहर प्रथम ने मदुरा विजय हेतु दो सेनाएं भेजी – एक कुमार सवल के नेतृत्व में तथा दूसरी कुमार कंपन के नेतृत्व में | कुमार कंपन अड्यार ने मदुरा को जीतकर उसे विजय नगर में शामिल कर लिया | उसकी पत्नी गंगा देवी ने अपने पति की विजय का अपने ग्रंथ मदुरा विजयम में सजीव वर्णन किया है |
  • कुमार कंपन बुक्का राय प्रथम का पुत्र था। 1377 ईस्वी में बुक्का की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.) सिंहासन पर बैठा उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की | उसने कनारा, मैसूर, त्रिचनापल्ली, कांची आदि प्रदेशों को जीता और श्रीलंका के राजा से राजस्व वसूल किया | हरिहर द्वितीय की सबसे बड़ी सफलता पश्चिम में बहमनी राज्य से बेलगांव और गोवा छीनना था। वह शिव के विरुपाक्ष रूप का उपासक था |
  • चंद्रगिरि के सामंत नरसिंह सालुव ने संगम वंश के अंतिम शासक विरुपाक्ष द्वितीय को पदच्युत करके 1485 ईस्वी में सिंहासन पर अधिकार कर लिया एवं एक नवीन राजवंश “सालुव वंश” की स्थापना की | वीर नरसिंह ने नरसिंह सालुव के पुत्र ( इम्माड़ि नरसिंह, सालुव वंश का अंतिम शासक) को पदच्युत करके सिंहासन पर अधिकार कर लिया एवं तुलुव वंश की नींव डाली | 1509 ईस्वी में उसकी मृत्यु के बाद उसका अनुज कृष्णदेव राय (1509-29 ईस्वी)  सिंहासनासीन हुआ | कृष्ण देव राय का उत्तराधिकारी उसका भाई अच्युत देव राय हुआ, जिसने 1529 से 1542 ईसवी तक शासन किया |
  • विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय ने गोलकुंडा का युद्ध गोलकुंडा के सुल्तान कुली कुतुब शाह के साथ लड़ा था। जिसमें कुतुबशाही सेना पराजित हुई| कृष्णदेव राय का शासनकाल विजय नगर में साहित्य का क्लासिकी युग माना जाता है| उसके दरबार को तेलुगु के 8 महान विद्वान एवं कवि ( जिन्हें अष्ट दिग्गज  कहा जाता है )  सुशोभित करते थे | इसलिए इसके शासनकाल को तेलुगु साहित्य का स्वर्ण युग भी कहा जाता है |
  • कृष्णदेव राय ने “आंध्र भोज” की उपाधि धारण की थी | कृष्णदेव राय स्वयं एक उत्कृष्ट कवि और लेखक थे। उनकी प्रमुख रचना अमुक्तमाल्यद थी जो तेलुगु भाषा के पांच महाकाव्य में से एक है | उसने नागलपुर नामक नगर की स्थापना की |उसने हजारा एवं विट्ठल स्वामी नामक मंदिर का निर्माण भी करवाया था | उसके समय में पुर्तगाली यात्री “डोमिन्गो पायस” ने विजयनगर साम्राज्य की यात्रा की |
  • बाबर ने अपनी आत्मकथा में कृष्ण देवराय को भारत का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है | फारसी राजदूत अब्दुल रज्जाक संगम वंश के सबसे प्रतापी शासक देवराय द्वितीय के शासनकाल में विजयनगर आया था |
  • महाभारत के तेलुगु अनुवाद का कार्य 11 वीं शताब्दी में नन्नय ने प्रारंभ किया था , जिसे 13वीं शताब्दी में टिक्कन द्वारा तथा फिर 14वीं शताब्दी में येररन द्वारा पूरा किया गया | ये तीनों तेलुगु साहित्य के कवित्रय के रूप में विख्यात हैं | वैदिक ग्रंथों के भाष्यकार सायण को विजय नगर राजाओं का आश्रय मिला |
  • 1565 में तालीकोटा के प्रसिद्ध युद्ध में बहमनी राज्यों की संयुक्त सेना ने विजयनगर को पराजित किया | इस संयुक्त सेना में केवल बरार शामिल नहीं था | फरिश्ता के अनुसार यह युद्ध तालीकोटा में लड़ा गया | किंतु युद्ध का वास्तविक क्षेत्र राक्षसी एवं तगड़ी नामक 2 ग्रामों के बीच स्थित था | तालीकोटा के युद्ध के समय विजयनगर का शासक सदाशिव राय (1542-1572 ई० ) था किंतु वास्तविक शक्ति उसके मंत्री रामराय के हाथों में थी | तालीकोटा के इसी युद्ध में हुसैन निजाम शाह ने अपने हाथ से रामराय का वध कर दिया |

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  • अरावीडु वंश (1570-1650 ई ) की स्थापना 1570 के लगभग तिरुमल ने सदाशिव को अपदस्थ कर पेनुकोंडा में की थी| उसका उत्तराधिकारी रंग प्रथम हुआ | रंग प्रथम के बाद वेंकट द्वितीय शासक हुआ | उसने चंद्रगिरी को अपना मुख्यालय बनाया | विजय नगर के महान शासकों की श्रृंखला में यह अंतिम वंश था |
  • वेंकट द्वितीय राजा वोडियार का समकालीन था, जिन्होंने 1612 ईसवी में मैसूर राज्य की स्थापना की | विजयनगर राज्य में राजस्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्रोत भूमि कर था | भूमि का भली-भांति सर्वेक्षण किया जाता था और उपज का 1/6 भाग भूमि कर के रूप में वसूल किया जाता था | “शिष्ट” नामक कर राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था | केंद्रीय राजस्व विभाग को “अठावने” (अस्थवन या अथवन ) कहा जाता था |
  • होयसल राजवंश की राजधानी द्वारसमुद्र का वर्तमान नाम हलेबिड है जो कर्नाटक के हासन जिले में है | इसकी ख्याति इसकी स्थापत्य की विरासत के कारण है | हलेविड के वर्तमान मंदिरों में होयसलेश्वर का प्राचीन मंदिर विख्यात है | यह मंदिर 12-13 वी सदी का है |
  • होयसल नरेश नरसिंह प्रथम के समय लोक निर्माण विभाग के मुख्य अधिकारी केतमल्ल की देखरेख में शिल्पकार केदरोज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था | होयसल काल में निर्मित चेन्ना केशव मंदिर बेलूर में अवस्थित है | इस मंदिर का निर्माण होयसल वंश के शासक विष्णु वर्धन ने करवाया था |
  • हंपी के खंडहर (वर्तमान उत्तरी कर्नाटक में अवस्थित) विजयनगर साम्राज्य की प्राचीन राजधानी का प्रतिनिधित्व करते हैं | विजय नगर काल में बना विरुपाक्ष मंदिर यहीं पर अवस्थित है | हम्पी यूनेस्को की विश्व विरासत स्थलों की सूची में भी सम्मिलित है | विठ्ठल मंदिर (हंपी) का निर्माण विजयनगर साम्राज्य के तुलुव वंश के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय (1509-29 ई.) ने करवाया था | इस मंदिर में स्थित 56 तक्षित स्तंभ संगीतमय स्वर निकालते हैं |
  • हरिहर प्रथम ने कृष्णा नदी की सहायक नदी (तुंगभद्रा) के दक्षिणी तट पर एक नए नगर (विजयनगर) की स्थापना की और उस देवता के प्रतिनिधि के रुप में अपने इस नए राज्य पर शासन करने का दायित्व लिया जिसके बारे में माना जाता था कि कृष्णा नदी से दक्षिण की समस्त भूमि उस देवता (भगवान विरुपाक्ष) की है।

 

दिल्ली सल्तनतः प्रशासन

·      गुलाम वंश के सुल्तानों ने 1206 से 1290 ई. तक शासन किया | खिलजी वंश ने 1290 से 1320 ई. तक शासन किया | तुगलक वंश के शासकों ने 1320 से 1414 ईसवी तक शासन किया | लोदी वंश के शासकों ने 1450 से 1526 ई. तक शासन किया | इसमें तुगलक वंश का शासन सबसे  दीर्घकालिक था |

·      सल्तनत काल के अधिकांश अमीर एवं सुल्तान तुर्क वर्ग के थे | सुल्तान केंद्रीय शासन का प्रधान था | इसी तरह सल्तनत काल में प्रायः सभी प्रभावशाली पदों पर नियुक्त व्यक्तियों को अमीर की संज्ञा दी जाती थी | इन अमीरों का प्रभाव उस समय अधिक होता था जब सुल्तान अयोग्य और निर्बल अथवा अल्प वयस्क होता था |

  • प्रशासनिक विभाग एवं इसे प्रारंभ करने वाले शासक निम्न हैं –
  • दीवान-ए-मुस्तखराज (राजस्व विभाग) – अलाउद्दीन खिलजी
  • दीवान-ए-रियासत (बाजार नियंत्रण विभाग – अलाउद्दीन खिलजी
  • दीवान-ए-अमीरकोही (कृषि विभाग) – मुहम्मद बिन तुगलक
  • दीवान-ए-खैरात (दान विभाग) –       फिरोज तुगलक
  • दीवान-ए-बंदगान – फिरोज तुगलक
  • विभाग एवं उनकी कार्यविधियां निम्न हैं –
  • दीवाने अर्ज – सेना विभाग से संबंधित
  • दीवाने रिसालत – धार्मिक मुद्दों से संबंधित
  • दीवाने इन्शा – सरकारी पत्रव्यवहार से संबंधित
  • दीवाने वजारत – वित्तीय मामलात से संबंधित

·      विजारत एक ऐसी संस्था थी, जिसे इस्लामी संविधान में मान्यता दी गई थी | जिन गैर-अरबी संस्थाओं को अंतर्मुक्त किया गया तथा मुस्लिम सम्राटों के अधीन मंत्रिपरिषद के लिए जो नाम व्यवहार में लाए गए थे उन्हें विजारत की संज्ञा दी गई थी | विजारत को एक संस्था के रूप में अपनाने की प्रेरणा अब्बासी खलीफाओं ने फारस से ली थी |  महमूद गजनवी के राज्य काल में अब्बास फजल बिन अहमद प्रथम वजीर हुए जो शासन व्यवस्था चलाने में निपुण थे |

·      राज्य का प्रधानमंत्री वजीर कहलाता था | वजीर मुख्यतया राजस्व विभाग (दीवान-ए-वजारत) का प्रधान होता था | इस दृष्टि से वह लगान, कर व्यवस्था, दान तथा सैनिक व्यय आदि सभी की देखभाल करता था | तुगलक काल मुस्लिम भारतीय विजारत का स्वर्ण काल था | फिरोज तुगलक के समय वजीर का पद अपने चरमोत्कर्ष पर जा पहुंचा |

  • दशमलव प्रणाली के आधार पर सेना का संगठन और पदों का विभाजन किया गया था | घुड़सवारों की टुकड़ी का प्रधान “सरेखेल” कहलाता था | 10 “सरेखेल” के ऊपर एक “सिपहसालार”, 10 “सिपहसालारों” के ऊपर एक “अमीर”, 10 “अमीरों”  के ऊपर एक “मलिक” और 10 मालिकों के ऊपर एक “खान” होता था |
  • सुल्तान सेना का मुख्य सेनापति होता था | फिरोज तुगलक ने कुरान के नियमों को दृष्टि में रखकर कर निर्धारण किया | उसने कुरान में अनुमोदित चार कर लगाने की अनुमति दी :-
  1. खराज
  2. जजिया
  3. खुम्स एवं
  4. जकात
  • खुम्स लूट का धन था | जो युद्ध में शत्रु राज्य की जनता से लूट में प्राप्त होता था | इस लूट का 4/5 भाग सैनिकों में बांट दिया जाता था और शेष 1/5 भाग राजकोष में जमा होता था | किंतु अलाउद्दीन खिलजी और मोहम्मद तुगलक ने 4/5 भाग राजकोष में रखा और 1/5 भाग सैनिकों में बांटा |
  • सिकंदर लोदी ने गड़े हुए खजाने से कोई हिस्सा नहीं लिया | सल्तनत काल में शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी | जो स्वशासन तथा पैतृक अधिकारियों की व्यवस्था के अंतर्गत थी | ग्राम स्तर पर चौधरी भू राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी था |

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  • सल्तनत कालीन दो प्रमुख मुद्राएं है :- जीतल एवं टंका | इल्तुतमिश पहला तुर्क शासक था जिसने शुद्ध अरबी के सिक्के चलाए | उसी ने दो प्रमुख सिक्के अर्थात् चांदी का टंका और तांबे का जीतल प्रचलित किया | जीतल एवं टंका का अनुपात 48 : 1 था| अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46 ई.) के सिक्के पर सर्वप्रथम बगदाद के अंतिम खलीफा का नाम अंकित हुआ था | बगदाद के अंतिम खलीफा-अल-मुस्तसीम थे।| 
  • यह 1242-58 ई. तक खलीफा रहे | इल्तुतमिश के सिक्के पर खलीफा अल मुस्तनसीर का नाम उल्लिखित था जो 1226-42 ई. तक खलीफा रहे | हदीस एक इस्लामिक कानून है जबकि जवाबित्त राज्य कानून से संबंधित है |
  • इतिहासकार बरनी ने दिल्ली के सुल्तानों के अधीन भारत में शासन को वास्तव में इस्लामी नही माना है, क्योकि सल्तनत काल में अधिकतर आबादी इस्लाम का अनुसरण नही करती थी।
  • दीवान-ए-आरिज अथवा आरिज-ए-मुमालिक सल्तनत काल में सैन्य विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था और आरिज-ए-मुमालिक का विभाग ही दीवान-ए-अर्ज कहलाता था। इस विभाग की स्थापना बलबन ने की थी।
  • भारत में इक्ता व्यवस्था की शुरुआत इल्तुतमिश ने की थी। यह हस्तांतरणीय लगान अधिन्यास था। यह भूमि का एक विशेष खंड होता था, जो सैनिक या सैनिक अधिकारियों को प्रदान किया जाता था। किंतु वे इस भूभाग के मालिक नही होते थे। वे केवल लगान का ही उपभोग कर सकते थे।
  • सल्तनत कालीन प्रशासनिक शब्दावली में जवाबित का संबंध राज्य के कानून से है।
  • हदीस एक इस्लामिक कानून है। इस्लाम धर्म के मूल स्रोत कुरान के बाद दूसरा स्रोत हदीस है। दोनो को मिलाकर इस्लाम धर्मि की संपूर्ण व्याख्या और इस्लामी अरीअत की संरचना होती है।
  • सल्तनत काल में फवाजिल या फाजिल शब्द से आशय इक्तादारों द्वारा सरकारी खजाने में जमा की जाने वाली अतिरिक्त राशि से है।

 

दिल्ली सल्तनतः कला एवं स्थापत्य

·      कुतुबद्दीन ऐबक ने अजमेर में “ढाई दिन का झोपड़ा” मस्जिद तथा दिल्ली में रायपिथौरा के किले के निकट कुव्वातउलइस्लाम  मस्जिद बनवाया |  दिल्ली में कुतुबमीनार का निर्माण प्रारंभ करवाया जिसे इल्तुतमिश ने  पूरा किया।  इल्तुतमिश  ने सुल्तानगढ़ी , हौज-ए-शम्सी , शम्सी ईदगाह , बदायूं की जामा  मस्जिद अतरकीन का दरवाजा (नागौर) बनवाया था।

·      “अलाई दरवाजा” का निर्माण सुल्तान अलाउदीन खिलजी ने “कुतुबमीनार” के निकट करवाया था। इसका निर्माण लाल पत्थरों तथा संगमरमर के द्वारा हुआ। यह 1311 ई. मे  बनकर तैयार  हुआ।  अलाउदीन खिलजी ने निजामुद्दीन  औलिया की दरगाह में जमैयतखाना  मस्जिद ,  हजार सितून , हौज-ए-अलाई का निर्माण करवाया था।  सुल्तान मुबारकशाह खिलजी  ने राजपूताना मे उखा मस्जिद  का निर्माण करवाया था। 

·      भारत में विशुद्ध इस्लामी शैली में निर्मित प्रथम मकबरा सुल्तान बलबन द्वारा दिल्ली में किला  रायपिथौरा के समीप बनवाया गया स्वयं का मकबरा था। 

·      गयासुद्दीन तुगलक (1320-25 ई० ) ने तुगलक वंश की स्थापना के  बाद दिल्ली में एक  तृतीय नगर  की स्थापना की और उसका नाम “तुगलकाबाद”  रखा।  मोठ  मस्जिद का निर्माण सिकंदर लोदी के शासनकाल में हुआ था।  सिकंदर लोदी के मकबरे  का निर्माण सुल्तान इब्राहिम लोदी ने करवाया था।

·      मालवा विजय के उपलक्ष्य में मेवाड़ के राणा कुंभा ने कीर्ति स्तंभ का निर्माण कराया था।  कीर्ति स्तंभ का निर्माण जैता ने किया था।  जबकि  कीर्ति स्तंभ के प्रशस्तिकार अभि और महेश थे।

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  • बलबन का मकबरा किला-ए-रायपिथौरा के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। मकबरे का कक्ष वर्गाकार है। सर्वप्रथम इस मकबरे में मेहराब का वास्तविक रुप दिखाई पड़ता है।
  • स्थापत्य और उनसे संबंधित स्थल

स्थल          स्थापत्य

दिल्ली         कुवल-अल-इस्लाम

जौनपुर        अटाला मस्जिद

मालवा        जहाज महल

गुलबर्गा        जामा मस्जिद

  • सही सुमेलित हैं –

वास्तु शैली                                 संबंध्द राजवंश

मेहराब की निचली सतह पर कमलकलि की झालर     खिलजी

अष्टभुजीय मकबरों का उदय                   तुगलक

स्तंभों में बोदिगोई का प्रयोग                    विजयनगर

झुकी हुई दीवारों के साथ विशाल मुख्य द्वार            शर्की

 

दिल्ली सल्तनतः साहित्य

·      अबुल हसन यामिनुद्दीन खुसरो जिसे प्रायः अमीर खुसरो के नाम से जाना जाता है , का जन्म 1253 ईस्वी (651 हिजरी) में उत्तर प्रदेश के वर्तमान कासगंज (कांशीराम नगर) जिले के पटियाली नामक स्थान पर हुआ था |खुसरो ने स्वयं को तूती- ए- हिंद कहा है | वह 8 वर्ष की आयु में ही कविता रचने लगा था | ऐतिहासिक विषय को लेकर उसकी पहली मनसवी किरान- उस- सादेन है | उसकी अन्य रचनाओं में मिफता-उल-फुतूह ,  तारीख-ए-दिल्ली , खजाइन-उल-फुतूह (तारीख- ए- अलाई) ,  आशिका नूह सीपिहर तथा तुगलकनामा प्रमुख हैं |

·      तुगलकनामा अमीर खुसरो की अंतिम ऐतिहासिक मसनवी है | खुसरो पहला मुसलमान था जिसने भारतीय होने का दावा किया था | अमीर खुसरो स्वयं कहता है- मैं तुर्की ,भारतीय और हिंदी बोलता हूं | भारत में कव्वाली नामक संगीत शैली के प्रारंभिक रूप के आरंभकर्ता अमीर खुसरो थे |

·      नई फारसी काव्य शैली सबक-ए- हिंदी या “हिंदुस्तानी शैली का जन्मदाता अमीर खुसरो को माना जाता है | उसका कहना था– ना तफ्जे हिंदी अस्त्र आज फारसी कम , अर्थात हिंदी का शब्द फारसी से कम नहीं है| संगीत यंत्रों “तबला” तथा “सितार” का प्रचलन 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने ही किया था | भारत में फारसी साहित्य का विकास मुस्लिम विजेताओं के आगमन से प्रारंभ हुआ | यहां इसे एक नवीन रूप प्रदान किया गया | दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद फारसी को राजभाषा का स्थान प्रदान किया गया|

·      तबकात–ए-नासिरी मिनहाज -उस-सिराज  का ग्रंथ है जो सुल्तान नसीरुद्दीन को समर्पित किया गया था | जियाउद्दीन बरनी ने फारसी में तारीख ए फिरोजशाही की रचना की थी ताजुल मासिर को सदरुद्दीन मोहम्मद हसन निजामी ने लिखा था। याहिया बिन अहमद ने सैयद शासक मुबारक शाह के संरक्षण में तारीख ए मुबारक शाही लिखी जो सैयद शासकों के इतिहास को जानने का एकमात्र साधन है। शम्स –ए-सिराज अफीक ने तारीख-ए-फिरोजशाही की तथा ख्वाजा अबू मलिक इसामी ने फुतूह-उस-सलातीन की रचना की।

·      राणा कुंभा संगीत के साथ साथ साहित्य एवं कला का भी  पोषक था | उसने संगीत शास्त्र पर संगीत मीमांसा , संगीत राज , संगीत रत्नाकर आदि ग्रंथों का प्रणयन किया | तुगलक वंशीय शासक फिरोजशाह तुगलक ने अपने संस्मरण  फुतुहातफिरोजशाही के नाम से लिखा है |

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  • किताब-उल-हिंद की रचना अलबरुनी ने की थी। अरब से आने वाले यात्रियों में अलबरूनी प्रमुख था, इसका वास्तविक नाम अबू रेहान था।  उसकी महत्वपूर्ण कृति तहकीके-हिंद अथवा किताब-उल-हिंद से तत्कालीन  भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था पर विशेष विवरण प्राप्त होता है।
  • अमीर खुसरों एवं शेख निजामुद्दीन औलिया दोनों ने ही सात सुल्तानों का शासनकाल देखा था।
  • अमीर खुसरो आरंभ में बलबन के सबसे बड़े पुत्र महमूद की सेवा में रहा। मंगोलों के साथ एक मुकाबले में महमूद मारा गया। मंगोलों ने अमीर  खुसरों को बंदी बना लिया। किंतु किसी तरह वह जेल से भागने मे सफल रहा और बलबन के राजदरबार मे संबंध्द हो गया। अमीर खुसरो बलबन, कैकुबाद, जलालुद्दीन खिलजी, मुबारकशाह, गयासुद्दीन तुगलक  तथा मुहम्मद बिन तुगलक  के शासन के अंतर्गत रहा। 1325 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के सत्ता संभालने के वर्ष में ही  अमीर खुसरों की मृत्यु हो गई। वह सूफी  संत निजामुद्दीन औलिया का शिष्य  था।
  • खड़ी बोली हिंदी के प्रवर्तकों में से एक अमीर खुसरो एक कवि, इतिहासकार एवं संगीतज्ञ तीनों थे। उन्हें तूती-ए-हिन्द का उपनाम दिया गया था।

 

 

 

दिल्ली सल्तनतः विविध

  • भारत में पोलो खेल का प्रचलन तुर्कों ने किया था। ज्ञातव्य है कि कुतुबुद्दीन ऐबक पोलो (चौगान) का शौकीन था। इसी खेल के दौरान घोड़े से गिर जाने के कारण 1210 ई में उसकी मृत्यु हो गई थी।
  • सल्तनत काल में ऊंचे धार्मिक और न्यायिक पदों पर बैठे व्यक्तियों (उलेमा) को सामूहिक रूप से ‘ दस्तार बन्दान ‘(पगड़ी पहनने वाले) कहा जाता था क्योंकि वे सिर पर अधिकारिक रूप से पहने जाने वाली पगड़ी धारण करते थे। राजपूतों द्वारा मुस्लिम आक्रमणकारियों से स्त्रियों की रक्षा के लिए जौहर प्रथा का प्रचलन हुआ।

 

  • राजधानी में आर्थिक मामलों के देखभाल के लिए दीवान-ए-रियासत विभाग की स्थापना अलाउद्दीन खिलजी ने की थी। फिरोज तुगलक ने 5 बड़ी नहरों का निर्माण कराया था। फारसी त्यौहार नौरोज को बलबन ने दिल्ली दरबार में प्रचलित किया था। अंग्रेज सर थामस रो मुगल शासक जहांगीर के काल में भारत आया था।
  • चुंबकीय दिशासूचक का भारतीय महासागरों में प्रयोग की प्रारंभिक सूचना 1232-33 ई. में सदरुद्दीन मुहम्मद अल औफी द्वारा की गई। इनकी पुस्तक का नाम लुबाब-उल-अल्बाब तथा जवामी-उल-हिकायत थी। जवामी-उल-हिकायत में ही इन्होंने दिशासूचक यंत्र के बारे में संदर्भित किया था।
  • शासक शासनकाल

रजिया सुल्तान       1236-1240

अलाउद्दीन खिलजी   1296-1316

शेरशाह             1540-1545

अकबर             1556-1605

  • चांद बीबी अहमदनगर के तीसरे शासक हुसैन निजामशाह प्रथम की पुत्री थी जिनका संबंध अवध राज्य से नही, बल्कि अहमदनगर व बीजापुर से था। जबकि बहादुरशाह का संबंध गुजरात से, रजिया सुल्तान का संबंध दिल्ली से तथा बाज बहादुर का संबंध मालवा से था।
  • कुतुबमीनार का निर्माण 1210 ई., फिरोज तुगलक की मृत्यु सितंबर, 1388 ई. में पुर्तगालियों का भारत आगमन 1498 ई. (वास्कोडीगामा के नेतृत्व में) तथा कृष्णदेव राय का शासनकाल 1509-1529 ई. है।
  • हेमचन्द्र सूरी मध्यकालीन विद्वान/लेखकों में जैन धर्म का अनुयायी था। वह जयसिंह सिध्दराज के दरबार को सुशोभित करता था। उसी से प्रभावित होकर जयसिंह सिध्दराज ने आबू पर्वत पर एक मंडप का निर्माण करवाया था और उसमें जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ स्थापित करवाई थी, जो अनंतर एक जैन तीर्थ के नाम से जाना जाता था।
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  • प्लासी का युध्द 23 जून, 1757 को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ था। नवाब की सेना का नेतृत्व राजद्रोही-मीर जाफर, यार लतीफ तथा राय दुर्लभ ने किया, जिनके विश्वासघात के कारण नवाब की हार हुई।
  • कलिंग का युध्द अशोक ने 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया। इस युध्द में एक लाख लोग मारे गए तथा पचास हजार बंदी बनाए गए। इसी युध्द के बाद अशोक ने बौध्द धर्म अपना लिया। कलिंग युध्द तथा उसके परिणामों के बारे में तरहवें शिलालेख से विस्तृत जानकारी मिलती है।
  • हल्दीघाटी का युध्द 1576 ई. मे मुगल सम्राट अकबर तथा महाराणा प्रताप के बीच लड़ा गया जिसमें अकबर विजयी हुआ।
  • तराईन का द्वीतीय युध्द (1192 .) – पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच हुआ था, जिसमें गोरी की सजगता और श्रेष्ठ युध्द प्रणाली के कारण उसकी जीत हुई।
  • शेरशाह द्वारा निर्मित सड़कों में विशेष उल्लेखनीय सड़क लाहौर से लेकर सोनारगांव (बंगाल तक जाती थी जो सबसे लंबी थी तथा सड़क-ए-आजम के नाम से जानी जाती थी। प्रतीक मुद्रा मुहम्मद तुगलक ने जारी की थी। आइन-ए-अकबरी पध्दति का संबंध अकबर की भू-राजस्व व्यवस्था से हैं। चहलगानी अमीर (तुर्क-ए-चहलगानी) दल का गठन इल्तुतमिश ने किया था।
  • कृषि भारतीयों की जीविका का मुख्य आधार था। भारत की अधिकांश जनसंख्या कृषक ही थी। उर्वर भूमि एवं सिंचाई के साधनों की व्यवस्था के कारण यहां उपज बहुत अधिक होती थी। देश के विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न फसलें बोई जाती थी। 13-14 वीं शताब्दी में भारतीय कृषक गेंहूँ, जौ, चावल, कपास और चना आदि की खेती करते थे परंतु वे मक्के की खेती नही करते थे। इब्नबतूता के अनुसार किसान साल में तीन फसलें काटते थे। धान, गेंहूं, ईख और कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती थी। दक्षिण भारत में विभिन्न मसाले उपजाए जाते थे।
  • भारतीय राजनीति एसोसिएशन (Indian Political Science Association) के जनवरी-मार्च, 2004 अंक ( 65, No. 1) में विलेज एडमिनिस्ट्रेशन इन एनशिएंट इंडिया (Village Administration in Ancient India) शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित लेख के अनुसार, प्राचीन समय में (600 एवं 1200 AD के मध्य) भारत में प्रशासन का केन्द्र-बिंदु गांव था। वैदिक साहित्य के अनुसार गांव का मुखिया ग्रामिणी (Gramini) कहलाता था। उत्तर भारत में उसे ग्रामिका (Gramika) या ग्रामेयाका (Grameyaka) कहा जाता था। महाराष्ट्र में उसे ग्रामाकुत (Gramakuta) या पट्टकिल (Pattakila), कर्नाटक में गवुंद (Gavunda) था उत्तर प्रदेश में महत्तक (Mahattaka) कहा जाता था। Indian Epigraphical Glossary (लेखकःदिनेश चन्द्र सरकार) में भी महत्तक (Mahattaka) गांव के मुखिया या पंचायत बोर्ड के सदस्य के रुप में परिभाषित किया गया है। यह उल्लेख कर देना भी समुचित है कि डॉ. हरिश्चन्द्र वर्मा ने अपनी संपादित पुस्तक मध्यकालीन भारत का इतिहास प्रथम खंड में महत्तर का इस प्रकार उल्लेख किया है – शिल्पकारों की श्रेणियों का उल्लेख अभिलेखों में भी मिलता है। इनके प्रधान महत्तर कहे जाते थे।

उत्तर  भारत एवं दक्कन के प्रांतीय राजवंश

  • जौनपुर की स्थापना फिरोज तुगलक ने अपने चचेरे भाई जौना खां ( मुहम्मद बिन तुगलक ) की स्मृति में की थी। सुल्तान मुहम्मद शाह द्वितीय के शासनकाल ( 1394 ई ) में जौनपुर एक स्वतंत्र राज्य बना। इसका संस्थापक मलिक सरवर था। जिसने स्वतंत्र शर्की राज्य की स्थापना की। मलिक सरवर मुहम्मद शाह द्वितीय का दास था।
  • सुल्तान ने उसे मलिक-उश-शर्क ( पूर्व का स्वामी ) तथा ख्वाजा-ए-जहां की उपाधि प्रदान की। शर्की शासकों ने लगभग 85 वर्षों तक जौनपुर की स्वतंत्रता को स्थापित रखा। किंतु 1479 ई में बहलोल लोदी ने इसके अंतिम शासक हुसैन शाह शर्की को पराजित कर जौनपुर को पुनः दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया।
  • इब्राहिम शाह शर्की ( 1402-1436 ई ) जौनपुर के शर्की वंश का सबसे महान शासक था | * उसके शासनकाल में एक नवीन प्रकार की शैली , जिसे ‘शर्की शैली ‘ कहते हैं , का उदय हुआ | उसने स्वयं ‘ सिराज-ए-हिंद ‘ की उपाधि धारण की | उसके समय में जौनपुर की सांस्कृतिक ख्याति चारों तरफ फैल गई और जौनपुर ‘ भारत का सिराज ‘ नाम से विख्यात हो गया | विद्यापति ने ‘  कीर्तिलता काव्य ‘  में जौनपुर और इब्राहिम शाह  का सुंदर वर्णन किया है |
  • 1420 ई में अली शाह का भाई शाही खाँ जैन-अल-आबेदीन के नाम से कश्मीर के सिंहासन पर बैठा | वह कश्मीर का सबसे महान शासक हुआ। उसकी धार्मिक उदारता के कारण उसकी तुलना मुगल बादशाह अकबर से की जाती है | उसने जजिया कर हटा दिया तथा गोहत्या को निषिद्ध कर दिया।वूलर झील में ” जैना लंका ” नामक द्वीप का निर्माण जैन-उल-आबेदीन ने ही करवाया था।
  • जैन-उल-आबेदीन (1420-70 ई.) को धार्मिक सहिष्णुता तथा अच्छे कार्य के कारण ‘ कश्मीर का अकबर ‘ कहा जाता है | 1407 ई में सुल्तान मुजफ्फर शाह के नाम से जफर खान ने स्वयं को गुजरात का सुल्तान घोषित किया | * इसमें मालवा के शासक हुसंगशाह को पराजित कर उसकी राजधानी धार पर अधिकार कर लिया किंतु बाद में  उसने उसका राज्य वापस कर दिया |
  • 1458 ई में फतह खां सिंहासन पर बैठा | उसने ‘ अबुल फतह महमूद ‘ की उपाधि धारण की परंतु इतिहास में वह महमूद बेगड़ा के नाम से विख्यात हुआ | इसकी मुख्य विजय चंपानेर और गिरनार के दृढ़ किलों की थी। दक्कन के अमीरान-ए-सादाह के विद्रोह के परिणामस्वरूप मोहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के अंतिम दिनों में बहमनी साम्राज्य की स्थापना हुई | जफर खाँ ( हसन गंगू 1347-1358 ई ) नामक एक सरदार ‘ अलाउद्दीन हसन बहमन शाह ‘ की उपाधि धारण करके 1347 ईस्वी में सिंहासनारूढ़ हुआ  और बहमनी साम्राज्य की नींव डाली | उसने गुलबर्गा को अपने नव संस्थापित साम्राज्य की राजधानी बनाया तथा उसका नाम ‘ अहसानाबाद ‘ रखा। अपने साम्राज्य के शासन के लिए उसने इसे चारों तरफों अथवा प्रांतों में विभाजित किया –  गुलबर्गा , दौलताबाद , बरार और बीदर |

          बहमनी राज्य से स्वतंत्र हुए राज्य हैं

राज्य

संस्थापक

राजवंश

बरार

फतेहउल्ला इमादशाह

इमादशाही वंश

बीजापुर

यूसुफ आदिलशाह

आदिलशाही वंश

अहमदनगर

मलिक अहमद

निजामशाही वंश

गोलकुंडा

कुली कुतुबशाह

कुतुबशाही वंश

बीदर

अमीर अली बरीद

बरीदशाही वंश

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·      बीजापुर का शासक इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय एक महान विद्याप्रेमी तथा विद्या का संरक्षक था। उसकी प्रजा उसके उदार दृष्टिकोण के कारण उसे ‘ जगतगुरू ‘ की उपाधि से संबोधित करती थी। गरीबों की सहायता करने के कारण उसे ‘ अबलाबाबा ‘ या ‘ निर्धनों का मित्र ‘ भी कहा जाता था। इब्राहिम आदिलशाह ने हिंदी संगीत संग्रह ‘ किताब-ए-नौरस ‘ की रचना की। इब्राहिम ने नौरसपुर नगर की स्थापना की  तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।

·      बीजापुर के मोहम्मद आदिल शाह का मकबरा ‘ गोल गुंबद ‘ के नाम से विख्यात है। यह भारत के ऐतिहासिक भवनों में शामिल हैं तथा विश्व के विशालतम गुंबदों में से एक है। गूजरी महल राजा मानसिंह तोमर ने 15वी शताब्दी में बनवाया था। इस पर अकबरकालीन शैली की छाप पड़ी है।

  • सिकंदर बुतशिकन द्वारा श्रीनगर में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया गया था। जिसके बाद जैन-उल-आबेदीन द्वारा और विस्तारित करवाया गया था। मस्जिद की विशेषताओं मे बुर्ज, फारसी शैली तथा बौध्द पगोडाओं से समानता, ये सभी शामिल हैं।
  • जैन विद्वान मुनि जिन विजय सूरी अकबर के दरबार से संबंधित थे। जबकि मुनि सुंदर सूरी, नाथा तथा टिल्ला भठ्ठ कुम्भा के दरबार से संबंध थे।
  • मध्यकालीनि भारतीय राज्यों में चंपक (चंबा) तथा कुल्लू (कुल्लू) का संबंध हिमाचल प्रदेश से है। दुर्गर जम्मू में स्थित था। चंपक, दुर्गर और कुलूत राजपूतों से संबंधित हैं, जो तत्कालीन पंजाब के भाग थे।
  • बीजापुर का शासक इब्राहिम आदिलशाह द्वीतीय एक महान विद्या प्रेमी तथा विद्या का संरक्षक था। उसकी प्रजा उदार दृष्टिकोण के कारण उसे जगतगुरु की उपाधि से संबोधित करती थी। गरीबों की सहायता करने के कारण उसे अबलाबाबा या निर्धनों का मित्र भी कहा जाता था।
  • शाहजहाँ ने छल-बल से अहमदनगर पर अधिकार किया तथा निजामशाही सुल्तान हुसैन निजाम शाह को बंदी बनाकर ग्वालियर के किले में भेज दिया। ध्यातव्य है कि 1632 ई. में शाहजहाँ ने महावत खां के नेतृत्व में दौलताबाद दुर्ग को जीतने के लिए एक सेना भेजी तथा अहमदनगर के वजीर फतेह खां को दस लाख पचास हजार रुपया घूस देकर दौलताबाद दुर्ग प्राप्त कर लिया। दौलताबाद दुर्ग का पतन अहमदनगर राज्य का पतन था। सुल्तान हुसैन को बंदी बनाकर अहमदनगर राज्य को मुगल साम्राज्य मे मिला लिया गया।
  • दक्षिण भारत मे हैदराबाद से सात मील पश्चिम में, बहमनी वंश की राजधानी गोलकुंडा के विस्तृत खंडहर फैले हुए हैं। यह देवगिरि के यादवों तथा वारंगल के काकतीय नरेशों के अधिकार में भी रहा था। मुगल काल में औरंगजेब ने गोलकुंडा के कुतुबशाही वंश का अंत करके उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया। उस युग में यह हीरों के लिए प्रसिध्द था।
  • होयसल वंश की राजधानी द्वारसमुद्र थी, जबकि काकतीय वंश की राजधानी वारंगल तथा यादव वंश की राजधानी देवगिरी में थी। पाण्ड्य वंश की प्रारंभिक राजधानी कोरकई में अवस्थित थी जिसे बाद में मथुरा स्थानांतरित कर दिया गया।
  • हलेबिड (Halebidu) कर्नाटक राज्य के हासन जिले में स्थित है। इसे पूर्व में द्वारसमुद्र के नाम से जाना जाता था। यह होयसल राजवंश की राजधानी थी।
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  • स्मारक शासक

दोहरा गुंबद              सिकंदर लोदी

अष्टभुज मकबरा          शेरशाह

सत्य मेहराबीय मकबरा बलबन

गोल गुंबद               मुहम्मद आदिल शाह

  • मांडू में जहाज महल एक लोकप्रिय स्मारकीय इमारत है। इस महल का निर्माण सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी के शासनकाल में किया गया। मांडू में कोई जंतर महल नही है बल्कि जहाज महल है।
  • गूजरी महल राजा मानसिंह तोमर ने 15वीं शताब्दी में बनवाया था। स्थापत्य के क्षेत्र में यह एक अद्भुत नमूना है। इस पर अकबरकालीन शैलियों की सुंदर छाप पड़ी है। राजा मानसिंह एक महान विजेता भी था।
  • पोलिगार एक सामंतवादी उपाधि थी जो दक्षिण भारत के नायक शासकों द्वारा 16वीं से 18वीं शताब्दी के दौरान नियुक्त किए गए क्षेत्रीय प्रशासकीय और सैन्य नियंत्रकों के एक वर्ग को प्रदान की गई थी।

 

भक्ति और सूफी आंदोलन

  • भक्ति आंदोलन का उदय सर्वप्रथम द्रविड़ देश में हुआ तथा वहां से उसका प्रचार उत्तर में किया गया | भागवत पुराण में कहा गया है कि भक्ति द्रविड़ देश में जन्मी , कर्नाटक में विकसित हुई और कुछ काल तक महाराष्ट्र में रहने के बाद गुजरात में पहुंचकर जीर्ण हो गई |
  • भक्ति आंदोलन का सूत्रपात दक्षिण में 8 वीं सदी में महान दार्शनिक शंकराचार्य के उदय के साथ हुआ था जिन्होंने विशुद्ध अद्वैतवाद का प्रचार किया |भक्ति आंदोलन को दक्षिण के वैष्णव अलवार संतों और शैव नयनार संतों ने प्रसारित किया था | भक्ति आंदोलन का पुनर्जन्म 15वी-16वी सदी ई में हुआ जब इसके नेतृत्व की बागडोर कबीर , नानक , तुलसी , सूर एवं मीराबाई ने संभाली |
  • मध्यकालीन भारत में सूफियों के उद्भव से समाज में समरसता फैलाने में मदद मिली | यह सूफी ध्यान साधना और कठोर श्वास-नियमन , जटिल यौगिक क्रियाओं को किया करते थे | वे एकांत में कठोर यौगिक व्यायाम करते थे तथा समाज में एकता और सौहार्द्र फैलाने तथा श्रोताओं में आध्यात्मिक हर्षोन्माद उत्पन्न करने के लिए गीत और संगीत का सहारा लेते थे |
  • कामरूप जो असम राज्य में स्थित है , वहां पर वैष्णव धर्म को लोकप्रिय बनाने का कार्य शंकर देव ने किया था| एकेशवरवाद उनके धर्म का मूल उद्देश्य था | वे विष्णु या उनके अवतार कृष्ण को अपना अभीष्ट मानते थे | उन्होंने एकशरण संप्रदाय की स्थापना की | वे कर्मकांड व मूर्ति पूजा दोनों के विरोधी थे | वे असम के चैतन्य के रूप में प्रसिद्ध थे|
  • श्री वल्लभाचार्य , सोमयाजी कुल के तैलंग ब्राह्मण  श्री लक्ष्मणभट्ट  के पुत्र थे | परंपरानुसार इन्होंने रुद्र संप्रदाय के प्रवर्तक विष्णुस्वामी के मत का अनुसरण तथा विकास करके अपना शुद्धादैत मत ( शुद्ध अद्वैतवाद ) या पुष्टीमार्ग प्रतिष्ठित किया। ये   अग्नि के अवतार माने जाते हैं |
  • वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित महत्वपूर्ण ग्रंथ-ब्रह्मसूत्र का ‘ अणु-भाष्य’ और ‘ वृहद-भाष्य ‘ , भागवत की ‘ सुबोधिनी’ टीका , भागवत तत्वदीप निबंध , पूर्व मीमांसा भाष्य  , गायत्री भाष्य पत्रावलंवन , दशम स्कंध अनुक्रमणिका, त्रिविध नामावली आती है |
  • द्वैतवाद के प्रवर्तक मध्वाचार्य हैं। विशिष्ट द्वैतवाद के रामानुजाचार्य और द्वैताद्वैतवाद के प्रवर्तक निम्बार्काचार्य है जो कि सनक संप्रदाय से संबंधित हैं। उत्तर भारत में रामानंद भक्ति आंदोलन के प्रथम प्रवर्तक थे , जिनका जन्म 1299 ईसवी में प्रयाग के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था | यह सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे | उन्होंने सर्वप्रथम अपने संदेश का प्रचार हिंदी भाषा में किया | कबीर (1398-1518) रामानंद के 12 शिष्यों में से प्रमुख थे |
  • लोक परंपरा के अनुसार उनका जन्म किसी विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से वाराणसी के समीप हुआ था तथा उनका पालन-पोषण एक जुलाहा दंपति नीरू और नीमा ने किया था | ‘ बीजक’  संत कबीर के उपदेशों का संकलन है जो कबीरपंथी संप्रदाय के मानने वालों का पवित्र ग्रंथ है | ‘ सबद’ , ‘साखी ‘ एवं ‘ रमैनी ‘ कबीर की रचनाएं हैं परंतु धर्मदास के साथ उनके संवादों का संकलन ‘अमरमूल ‘ शीर्षक के अंतर्गत प्राप्त होता है |
  • संत मलूकदास का जन्म लाला सुंदरदास खत्री के घर में 1574 ई में कड़ा ( वर्तमान कौशांबी जिले ) में हुआ था | गुरु घासीदास का जन्म दिसंबर , 1756 ई में रायपुर जिले के गिरौदपुरी गांव में हुआ था | उनके पिता महंगूदास और माता अमरौतीन बाई थी | भगवान शिव की प्रतिष्ठा में भारत के विभिन्न भागों में 12 ज्योतिर्लिंगों की स्थापना की गई है | यह है –
  1. केदारनाथ
  2. विश्वनाथ
  3. वैद्यनाथ
  4. महाकालेश्वर
  5. ओमकारेश्वर
  6. नागेश्वर
  7. सोमनाथ
  8. त्रयंबकेश्वर
  9. घृष्णेश्वर
  10. भीम शंकर
  11. मल्लिकार्जुनस्वामी और
  12. रामेश्वरम |
  • गुरु नानक का जन्म 1469 ई में तलवंडी नामक स्थान पर हुआ था। अब यह ‘ ननकाना साहब ‘ कहलाता है | यह पश्चिमी पंजाब ( पाकिस्तान ) के शेखपुरा जिले में स्थित है। गुरु नानक की मृत्यु 1539 ईसवी में डेराबाबा नामक स्थान पर हुई थी | गुरु नानक ( 1469-1539 ई )  ने सिख धर्म की स्थापना  सिकंदर लोदी ( 1489-1517 ई ) के समय में की थी | नानक एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल देते थे |
  • गुरु नानक का कहना है – ” ईश्वर व्यक्ति के गुणों को जानता है , पर वह उसकी जाति के बारे में नहीं पूछता क्योंकि दूसरे लोक में कोई जाति नहीं है | ” गुरु नानक ने गुरु का लंगर नाम से मुक्त सामुदायिक रसोई की शुरुआत की | उनके अनुयाई किसी की भी जाति पर ध्यान दिए बिना एक साथ भोजन करते थे |
  • मीराबाई मेड़ता के रतन सिंह राठौड़ की इकलौती पुत्री थी | इनका जन्म 1498 ई में मेड़ता के कुदकी नामक ग्राम में हुआ था | इनका विवाह उदयपुर के प्रसिद्ध शासक राणा सांगा के पुत्र युवराज भोजराज से हुआ था। महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में नामदेव की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इनका जन्म 1270 ईसवी में पंढरपुर में हुआ था| इनके गुरू ज्ञानेश्वर थे। नामदेव वारकरी  संप्रदाय से संबंधित थे।
  • बिठोबा खेचड़ अथवा खेचर नाथ नामक एक नाथपंथी कनफटे ने इन्हें रहस्यवादी जीवन की दीक्षा दी तथा ईश्वर के सर्वव्यापी स्वरूप से परिचय कराया। नामदेव ने कहा था – ” एक पत्थर की पूजा होती है , तो दूसरे को पैरों तले रोंदा जाता है यदि एक भगवान है तो दूसरा भी भगवान है ” | इनके कुछ गीतात्मक पद्य गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है |
  • तुकाराम का काल 1608 से 1649 ई के मध्य माना जाता है | ऐसी मान्यता है कि 1608 इसवी में जन्मे संत तुकाराम 1649 ई में अदृश्य हो गए | यह वारकरी संप्रदाय से संबंधित थे।
  • दादू दयाल का समय 1544 ई से 1603 ई के मध्य था | त्याग राज का समय 1767 ई से 1847 ई तक था | यह भक्ति मार्गी कवि एवं कर्नाटक संगीत के महान संगीतज्ञ थे। भक्ति आंदोलन के प्रसिद्ध संत महाप्रभु चैतन्य ( 1486-1534 ई ) का जन्म बंगाल के नदिया जिले में एक संभ्रात ब्राह्मण परिवार में हुआ था | उनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र तथा माता का नाम शची देवी था | चैतन्य के बचपन का नाम निमाई था | चैतन्य ने कृष्ण को अपना आराध्य बनाया तथा उन्हीं की भक्ति का प्रचार किया |
  • सुप्रसिद्ध भक्त/संत कवि गोस्वामी तुलसीदास अकबर तथा जहांगीर के समकालीन थे | तुलसीदास ने लगभग 25 ग्रंथ लिखे जिनमें ‘ रामचरितमानस ‘ तथा ‘ विनय पत्रिका ‘ सर्वोत्तम है | रामचरितमानस की रचना गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623 ई)  ने अवधी भाषा में की थी |
  • चिश्तिया सूफी मत की स्थापना अफगानिस्तान के चिश्त में अबू इस्हाक सामी और उनके शिष्य ख्वाजा अबू अब्दाल चिश्ती ने की थी, किंतु भारत में सर्वप्रथम इसका प्रचार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के द्वारा हुआ था | वे 1192 ई में मोहम्मद गोरी की सेना के साथ भारत आए थे। उन्होंने अजमेर में अपना निवास स्थान बनाया| 1236 ई में उनकी मृत्यु हो गई |
  • कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी इनके प्रमुख शिष्य थे | निशापुर के हारोन में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती , ख्वाजा उस्मान चिश्ती हारुनी के शिष्य बने | शेख फरीदुदीन -गंज-ए-शकर चिश्ती सिलसिले के सूफी संत थे, जो बाबा फरीद के नाम से प्रसिद्ध थे। इन्हीं के प्रयत्नों के फलस्वरूप चिश्तियां सिलसिले को भारत में लोकप्रियता मिली | इनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान वे रचनाएं है जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है | ये बलबन के दामाद थे |  
  • शेख निजामुद्दीन औलिया के आध्यात्मिक गुरु हजरत बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर ( hazarat baba fariduddin masood ganjshakar ) थे जिन्हें बाबा फरीद के नाम से भी जाना जाता है | इनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के मुल्तान जिले के कोठवाल गांव में हुआ था | इनके अन्य प्रमुख शिष्य अलाउद्दीन साबिर कलियारी और नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहलवी थे | शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह दिल्ली में स्थित है | 1325 ई में निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु हुई | उन्हें गियासपुर ( दिल्ली ) में दफनाया गया था |
  • शेख निजामुद्दीन औलिया ने सात सुल्तानों का राज्य देखा , जो कि एक के बाद एक सत्तासीन होते रहे , किंतु वह कभी भी किसी के दरबार में नहीं गए | जब अलाउद्दीन ने उनसे मिलने की आज्ञा मांगी तो शेख ने उत्तर दिया कि ‘ मेरे मकान के 2 दरवाजे हैं यदि सुल्तान एक के द्वारा आएगा तो मैं दूसरों के द्वारा बाहर चला जाऊंगा | ‘ इस प्रकार उन्होंने अलाउद्दीन से मिलने के इनकार कर दिया था | वह महबूब-ए-इलाही और ‘ सुल्तान-उल-औलिया ‘ ( संतों का राजा ) के नाम से प्रसिद्ध थे।
  • चिश्ती शाखा के अंतिम सूचियों में शेख सलीम चिश्ती का नाम विशेष उल्लेखनीय है | इनके पिता का नाम शेख बहाउद्दीन था | ये बहुत दिनों तक अरब में रहे और वहां उन्हें ‘ शेख-उल-हिंद ‘ की उपाधि से विभूषित किया गया | तत्पश्चात वे भारत लौट आए और आगरा से 12 कोस की दूरी पर स्थित सीकरी नामक स्थान पर रहने लगे, जिसे अकबर ने अपना प्रसिद्ध नगर फतेहपुर सीकरी का रूप प्रदान किया | कहा जाता है कि जहांगीर का जन्म शेख सलीम चिश्ती  के आशीर्वाद से हुआ था | चिश्ती सिलसिले का प्रभाव क्षेत्र दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में था जबकि सुहरावर्दी सिलसिले का प्रभाव क्षेत्र सिंध के क्षेत्र में था |
  • फिरदौसी सिलसिला चिश्ती सिलसिले का ही भाग था जिसका प्रभाव क्षेत्र बिहार में था। कादरी शाखा के सर्वप्रथम संस्थापक बगदाद के शेख मुहीउद्दीन कादिर जिलानी थे , जिनकी गणना इस्लाम के महान संतों में की जाती है। शेख अब्दुल कादिर जिलानी की प्रमुख उपाधियां थी – महबूब-ए-सुमानी ( ईश्वर का प्रेमी ) , ‘ पीरान-ए-पीर’ ( संतो के प्रधान ) , ‘ पीर-ए-दस्तगीर ‘ ( मददगार संत )। भारत में सर्वप्रथम इस शाखा का प्रचार शाह नियामतुल्ला और मखदूम जिलानी ने 15वीं सदी में किया था| मखदूम जिलानी ने उच्छ को अपना शिक्षा केंद्र बनाया था |
  • नक्शबंदी सिलसिले की स्थापना चौदहवी सदी में ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद ने की थी | ख्वाजा ख्वांद महमूद इस शाखा के एक प्रमुख संत थे जो भारत आए और कश्मीर को अपना केंद्र बनाया किंतु भारत में इस शाखा का मुख्यतः प्रचार 17वी सदी के लगभग ख्वाजा बकी बिल्लाह द्वारा हुआ , जो अपने गुरु की आज्ञा से काबुल से आए थे | शेख अहमद सरहिंदी इनके प्रमुख शिष्य थे जो ‘ मुजद्दिद ‘ अर्थात्  इस्लाम धर्म के सुधारक के नाम से भी प्रख्यात हैं। उन्होंने ‘ वजहत-उल-शुहूद ‘ ‘ प्रत्यक्षवादी दर्शन ‘ का प्रतिपादन किया | यह सिलसिला समा ( संगीत ) के विरुद्ध था।
  • सूफियों में यह सबसे अधिक कट्टरवादी सिलसिला था | इन्होंने अकबर की उदार नीतियों का विरोध किया | औरंगजेब इसी सिलसिले का अनुयाई था | सूफी संत शाह मोहम्मद गौस ने कृष्ण को औलिया के रूप में स्वीकार किया है | वह सत्तारी सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत थे | मुगल बादशाह हुमायूं तथा तानसेन से उनका घनिष्ठ संबंध था | मुहम्मद गौस की प्रसिद्ध रचना ‘ जवाहिर-ए-खम्स’ है जिसमें उन्होंने अपनी अध्यात्मिक खोज को अभिव्यक्त किया है। उन्होंने हठ-योग की एक पुस्तक ‘ अमृतकुंड ‘ का अनुवाद ‘ बहर-उल-हयात’ के नाम से किया।* सूफी  संतो के निवास स्थान को ‘ खानकाह ‘ कहते हैं |  ‘ समा ‘ एक सूफी समारोह का नाम है |  ‘शेख ‘सूफीवाद में शिक्षण और मार्गदर्शन के लिए अतिरिक्त व्यक्ति को कहते हैं | इस्लाम के धार्मिक कानूनों के विद्वानों को ‘ उलेमा ‘ कहा जाता है |
  • ‘प्रेम वाटिका ‘ काव्य ग्रंथ की रचना रसखान ने की थी| इसमें उन्होंने कृष्ण के जीवन को पंक्तिबंद्ध किया है | ‘ सुजान रसखान ‘ भी इनकी प्रसिद्ध रचना है | रसखान की भाषा विशुद्ध ब्रज भाषा है |
  • ‘ बारहमासा ‘ की रचना मलिक मोहम्मद जायसी ने की थी | जायसी की ‘ पद्मावत ‘ ‘ अखरावट ‘ तथा ‘ आखिरी कलाम ‘ में से  पद्मावत का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है |  ‘ बारहमासा ‘ पद्मावत का ही एक भाग है |
  • उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित देवा शरीफ के प्रसिद्ध सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार स्थित है | ईसा मसीह (जीसस क्राइस्ट) का जन्म 4 ईसा पूर्व में यहूदी प्रांत बेथलेहम नामक नगर में हुआ था।| ईसाई मान्यता के अनुसार , ईसा मसीह सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन पुनर्जीवित हुए थे, इसी की याद में ईस्टर त्योहार मनाया जाता है | ‘ गुड फ्राइडे ‘ ईसा मसीह की शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है | बाइबिल के अनुसार , ईसा मसीह को शुक्रवार के दिन ही फांसी दी गई थी |असीसी के संत फ्रांसिस ( 1181-1226 ई ) ऐसे ईसाई संत है जो पशु पक्षियों से प्रेम के लिए विख्यात हैं |
  • वेटिकन इटली में स्थित स्थलरुद्ध संप्रभु देश हैं जिसका कुल क्षेत्रफल मात्र 44 हेक्टेयर है, जो विश्व का सबसे छोटा ( जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों में ) स्वतंत्र देश है | यह रोम के पादरी ( bishop of rome ) जिन्हें पोप भी कहा जाता है के द्वारा शासित है | इसे रोमन कैथोलिक चर्च की राजधानी के रूप में भी जाना जाता है | मदीना पश्चिमी सऊदी अरब के हेजाज क्षेत्र में स्थित शहर है | यह मक्का के बाद इस्लाम धर्म का दूसरा पवित्रतम शहर है |
  • बुध्द और मीराबाई के जीवन दर्शन में मुख्य साम्य यह था कि दोनों ने संसार को दुःखपूर्ण माना। दुःख बौध्द धर्म के चार आर्य सत्यों मे प्रथम है।
  • भक्ति आंदोलन के संतों का आचार बहुत ऊंचा था। उसमें से बहुतों ने देश का भ्रमण किया और वे कई प्रकार के लोगों से मिले जिनके विचार विभिन्न थे। उन संतो ने साधारण लोगो की भाषाओं को उन्नत करने में अपना योगदान दिया। उन्होने हिंदी, पंजाबी, बंगला, तेलुगू, कन्नड़, तमिल इत्यादि भाषाओं की उन्नति में बहुत योगदान दिया। भक्ति आंदोलन के संत अपने उपदेश क्षेत्रीय एवं स्थानीय भाषाओं में देते थे ताकि वहां के लोग उनके उपदेश आसानी से सुन और समझ सकें। इस कारण क्षेत्रीय भाषाओ का विकास हुआ।
  • कामरुप जो असम राज्य में स्थित है, वहां पर वैष्णव धर्म को लोकप्रिय बनाने का कार्य शंकरदेव ने किया था। एखेश्वरवाद उनके धर्म का मूल उद्देश्य था। वे विष्णु या उनके अवतार कृष्ण को अपना अभीष्ट मानते थे।
  • असम एवं कूच बिहार में वैष्णव धर्म का प्रवर्तन शंकरदेव ने किया था।
  • मध्यकालीन संत शंकरदेव वैष्णव संप्रदाय से संबंधित थे।
  • वैष्णव आचार्य रामानुज भक्ति आंदोलन के प्राचीनतम प्रचारक थे, इन्होने सगुण ईश्वर की उपासना पर बल दिया। उनके मत को विशिष्टाद्वैत कहा जाता है। जिसका अर्थ है – ब्रह्म अर्थात ईश्वर अद्वैत होते हुए भी जीव तथा जगत की शक्तियों द्वारा विशिष्ट है।
  • भक्तिकालीन सगुणधारा की कृष्ण भक्ति शाखा के आधार स्तंभ एवं पुष्टिमार्ग के प्रणेता श्री वल्लभाचार्य का जन्म विक्रम संवत् 1535, वैशाख कृष्ण एकादशी को दक्षिण भारत के कांकरवाड ग्रामवासी तैलंग ब्राह्मण श्री लक्ष्मण भठ्ठ जी की पत्नी इलम्मागारू के गर्भ से वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर के निकट  चम्पारण मे हुआ। उन्हें वैश्वानरावतार (अग्नि का अवतार) कहा गया है।
  • कबीरपंथी संप्रदाय के अनुयायियों का मुख्य धार्मिक ग्रंथ सुप्रसिध्द बीजक है जो कि कबीर के दोहों का संकलन है।
  • सबद, साखी एवं रमैनी कबीर की रचनाएँ हैं परंतु धरमदास के साथ उनके संवादों का संकलन अमरमूल शीर्षक के अंतर्गत प्राप्त होता है।
  • संत मूलकदास का जन्म लाला सुंदरदास खत्री के घर में 1574 ई. में कड़ा (वर्तमान कौशांबी जिला) में हुआ था।
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  • शंकराचार्य का काल 788-820 ई. तक, रामानुज काल 1017-1137 ई. तथा चैतन्य का काल 1486-1534 ई. तक था।
  • भक्ति आंदोलन के प्रचारक प्रसिध्द वैष्णव आचार्य रामानुज ने सगुण ईश्वर की उपासना पर बल दिया। उनका मत विशिष्टाद्वैत कहा जाता है। उनके अनुयायी वैष्णव कहलाए।
  • व्यक्ति कालानुक्रम

कबीर              1398-1518

गुरुनानक           1469-1539

चैतन्य             1486-1534

मीराबाई            1498-1557

  • मीराबाई हिंदू आध्यात्मिक कवयित्री थी, जिनके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित भजन उत्तर मानव में लोकप्रिय हैं। इन्होने चार ग्रंथों की रचना की थी। ये ग्रंथ हैं – बरसी का मायरा, गीत गोविंद टीका, राग-गोविंद और राग सोरठ। इसके अतिरिक्त उनके गीतों का संकलन मीराबाई की पदावली नामक ग्रंथ में किया गया है।
  • सही सुमेलित हैं

नामदेव   –    दर्जी

कबीर     –    जुलाहा

रविदास   –    मोची

सेना      –    नाई

  • चैतन्य के बचपन का नाम निमाई था। चैतन्य ने कृष्ण को अपना आराध्य बनाया तथा उन्हीं की भक्ति का प्रचार किया। बहुत दिनों तक उन्होंने वृंदावन में भी निवास किया। नदिया आकर उन्होने कीर्तन-जुलूसों का आयोजन किया तथा वे गलियों में घूम-घूम कर कृष्ण लीलाओं का कीर्तन किया करते थे।
  • रामचरित मानस की रचना गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623) ने अवधी भाषा में की थी।
  • गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 12 ग्रंथ प्रसिध्द हैं जिसमें 5 बड़े तथा 7 छोटे ग्रंथ हैं। बड़े ग्रंथों में दोहावली, गीतावली, कवितावली, रामचरित मानस, विनय पत्रिका हैं। इसके अलावा पार्वती मंगल, जानकी मंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी, कृष्णगीतावली आदि छोटे ग्रंथ हैं। साहित्य रत्न गोस्वामी तुलसी की रचना नही है।
  • वरकरी संप्रदाय के रुप में विचारधारा की गौरवशाली परंपरा की स्थापना में नामदेव की मुख्य भूमिका रही। बिसोवा खेचड़ ने उन्हें रहस्यवादी जीवन की दीक्षा दी तथा ईश्वर के सर्वव्यापी स्वरुप से परिचित करवाया।
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  • तुकाराम, त्यागराज एवं वल्लभाचार्य मध्यकालीन भक्ति आंदोलन से संबंधित हैं, जबकि नागार्जुन ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों में शून्यवाद के संस्थापक थे।
  • ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का जन्म अफगानिस्तान के दक्षिणी प्रांत साजिस्तान (सिस्तान) में 1142 ई. में हुआ था। बाद में अपने माता-पिता के साथ वे खुरासान प्रांत मे बस गए। निशापुर के हारेन मे ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, ख्वाजा उस्मान चिश्ती हरुनी के शिष्य बने।
  • अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर नजर (भेंट) भेजने वाले प्रथम मराठा सरदार राजा साहू, शिवाजी के पौत्र थे।
  • चिश्ती संप्रदाय की स्थापना अबू इस्हाक सामी चिश्ती ने की थी, वे अली की नवीं पीढ़ी थे। वे एशिया माइनर से प्रवासित होकर खुरासान में स्थित चिश्त में जाकर बस गए थे, इसीलिए वे चिश्ती कहलाए। परंतु भारतवर्ष में चिश्ती विचारधारा का प्रचार सर्वप्रथम ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने किया था।
  • शेख अब्दुल जिलानी का संबंध कादरिया सिलसिले से था। जबकि ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, शेख मुइनुद्दीन व शेख निजामुद्दीन औलिया का संबंध चिश्तिया शाखा से था। भारत में सर्वप्रथम चिश्ती सिलसिले का प्रचार ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के द्वारा हुआ।
  • अमीर हसन-ए-देहलवी को उसकी उच्च गजलों के कारण उसे भारत का सादी कहा गया है।
  • शेख फरीद के शिष्य शेख निजामुद्दीन औलिया ने दिल्ली के सात सुल्तानों का शासन देखा। शेख निजामुद्दीन औलिया को महबूब-ए-इलाही (ईश्वर का प्रिय) और सुल्तान-उल-औलिया (संतो का राजा) भी कहा जाता है।
  • सही सुमेलित हैं

ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती        चिश्तियां

शेख अहमद सरहिन्दी      नक्शबंदिया

दारा शिकोह              कादिरिया

शेख शहाबुद्दीन          सुहरावर्दिया

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  • प्रेमवाटिका काव्यग्रंथ की रचना रसखान ने की थी। इसमें इन्होने कृष्ण के जीवन को पंक्तिबध्द किया है। सुजान रसखान भी इनकी प्रसिध्द रचना है। रसखान की भाषा विशुध्द ब्रजभाषा है।
  • अमीर खुसरों का पूरा नाम अबुल हसन यामिनुद्दीन खुसरो था। अमीर खुसरो अपने समय का एक महान विद्वान और कवि था। वह भक्ति आंदोलन से संबंधित नही था। चैतन्य महाप्रभु ने मध्य गौड़ीय संप्रदाय की स्थापना की। वल्लभाचार्य वैष्णव धर्म की कृष्णमार्गी शाखा के दूसरे महान संत थे। गुरुनानक का जन्म पंजाब मे एक खत्री परिवार में हुआ था। उन्होने निराकार  ईश्वर की कल्पना की और इस निराकार ईश्वर को उन्होने अकाल पुरुष की संज्ञा दी।
  • बारहमासा की रचना मलिक मोहम्मद जायसी ने की। जायसी की पद्मावत, अखरावट तथा आखिरी कलाम में से पद्मावत का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है। बारहमासा, पद्मावत का ही एक भाग है।
  • उत्तर प्रदेश में बाराबंकी से लगभग 12 किमी दूर स्थित देवा शरीफ में प्रसिध्द सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार स्थित है।
  • ईसा मसीह (जीसस क्राइस्ट) का जन्म 4 ई.पू. में यहूदिया प्रांत के बेथलेहम नामक नगर में हुआ था।
  • ईसाई मान्यता के अनुसार, ईसा मसीह सूली पर चढ़ाए जाने के तीसरे दिन पुनर्जीवित हुए थे, इसी की याद में ईस्टर त्यौहार मनाया जाता है।
  • असीसी के संत (फ्रांसिस (1181-1226 ई.) ऐसे ईसाई संत हैं, जो पशु-पक्षियों से प्रेम के लिए विख्यात हैं।
  • गुडफ्राइडे ईसा मसीह के शहीदी दिवस के रुप में ईसाइयों द्वारा मनाया जाता है। बाइबिल के अनुसार ईसा मसीह को शुक्रवार के दिन ही फांसी दी गई थी।

मुगल वंशः बाबर

  • मुगल शासक वास्तव में तुर्कों की चगताई नामक शाखा के थे। इस शाखा का नाम प्रसिद्ध मंगोल नेता चंगेज खां के द्वितीय पुत्र के नाम पर पड़ा था , जिसके अधिकार में मध्य एशिया तथा तुर्कों का देश तुर्किस्तान थे।
  • बाबर का पूरा नाम जहीरूदीन मोहम्मद बाबर था , इसका जन्म 14 फरवरी , 1483 ई को फरगना में उमर शेख मिर्जा एवं कुतलुग निगारखानम के घर हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद लगभग बारह वर्ष की अल्पायु में 1495 ई में वह फरगना के सिंहासन पर बैठा |
  • शैबानी खाँ ने 1501 ई में सर-ए-पुल के युद्ध में बाबर को पराजित कर मध्य एशिया से खदेड़ दिया। इस युद्ध में उजबेगों की युद्ध नीति ‘ तुलगमा ‘ पद्धति का प्रयोग शैबानी खाँ ने बाबर के विरुद्ध किया था। 1504 ई में काबुल विजय के उपरांत बाबर ने अपने पूर्वजों द्वारा धारण की गई उपाधि ‘ मिर्जा ‘ का त्याग कर नई उपाधि ‘ पादशाह ‘ धारण की। *
  • आलम खां , इब्राहिम लोदी का चाचा था। उसने दिल्ली के राजसिंहासन पर अपना अधिकार जताते हुए बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। 1524 ई में बाबर के चौथी बार भारत अभियान के दौरान दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी तथा पंजाब के गर्वनर दौलत खां के मध्य कटु संबंध हो गए थे। सुल्तान इब्राहिम लोदी ने दौलत खां को राजधानी आने का आदेश दिया था, जिसका दौलत खाँ ने उल्लंघन किया था। दौलत खाँ ने अपने पुत्र दिलावर खां को बाबर के पास इस संदेश के साथ भेजा कि वह सुल्तान इब्राहिम लोदी को दिल्ली के सिंहासन से अपदस्थ कर उसके स्थान पर उसके चाचा आलम खां को पदस्थ करने में सहायता करें। बाबर के लिए यह स्वर्णिम अवसर था क्योंकि उसे मेवाड़ के राजा राणा संगा का भी निमंत्रण प्राप्त हो चुका था। अतः बाबर को यह विश्वास हो गया कि भारत-विजय का अवसर आ गया है।
  • पानीपत का प्रथम युद्ध 21 अप्रैल , 1526 को बाबर तथा इब्राहिम लोदी के बीच हुआ। बाबर के पास विशिष्ट सुविधाएं थी। उसके तोपखाने ने इस युद्ध में आश्चर्यजनक कार्य किया। इब्राहिम लोदी की सेना संख्या में अधिक होते हुए भी पराजित हुई और वह रण क्षेत्र में मारा गया। फलस्वरूप दिल्ली और आगरा पर बाबर का अधिकार हो गया।
  • 27 अप्रैल , 1526 को बाबर ने अपने आपको बादशाह घोषित कर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली। बाबर ने तुलगमा युद्ध नीति का प्रयोग पानीपत के प्रथम युद्ध में ही किया था। इस युद्ध में बाबर की सफलता का सबसे मुख्य कारण उसका विशाल तोपखाना था। जिसका नेतृत्व उस्ताद अली कुली नामक व्यक्ति कर रहा था। बंदूकचियों का नेतृत्व मुस्तफा कर रहा था।
  • बाबर की उदारता के कारण लोगों ने उसे ‘ कलंदर ‘ की उपाधि प्रदान की। भारत में सर्वप्रथम पानीपत की पहली लड़ाई में तोपों का प्रयोग किया। बाबर ने खानवा के युद्ध में जेहाद की घोषणा की थी। खानवा का युद्ध 17 मार्च , 1527 को बाबर और राणा सांगा के बीच हुआ था। इस युद्ध में राणा सांगा पराजित हुआ | इसी युद्ध में विजयश्री मिलने के उपरांत बाबर ने ‘ गाजी ‘ ( काफिरों को मारने वाला ) की उपाधि धारण की।
  • 1528 ई में बाबर ने चंदेरी के किले पर अधिकार कर लिया। युद्ध में मेदनीराय मारा गया। घाघरा का युद्ध 5 मई , 1529 को बाबर और महमूद लोदी के मध्य हुआ। इस युद्ध में बाबर विजयी हुआ। बाबर का यह अंतिम युद्ध था। बाबर के साम्राज्य में काबुल , पंजाब एवं आधुनिक उत्तर प्रदेश का क्षेत्र सम्मिलित था | अपने इस विशाल साम्राज्य की शासन व्यवस्था को सही ढंग से चलाने के लिए बाबर ने एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में अलग अलग व्यवस्था की थी |
  • भारत से बाहर बदख्शां का शासन हुमायूं , मीर फख्र अली , हिंदाल तथा मिर्जा सुलेमान को प्रदान किया गया | मीर युसूफ अली को पंजाब का गवर्नर नियुक्त किया गया जिसके नियंत्रण में – भीरा , लाहौर , दीपालपुर , सियालकोट , सरहिंद तथा हिसार-फिरोजा सम्मिलित थे | हिसार-फिरोजा से लेकर बलिया तक के प्रदेश तथा बयाना , चंदेरी एवं ग्वालियर तक के प्रदेशों में बाबर ने एक नवीन शासन व्यवस्था कार्यान्वित की | इस प्रकार बाबर का साम्राज्य बदख्शां से बिहार तक फैला किंतु आधुनिक राजस्थान का क्षेत्र उसके साम्राज्य में सम्मिलित नहीं था | यह क्षेत्र उस समय विभिन्न राजपूत शासकों के शासनांतर्गत था।
  • मुगल साम्राज्य की आधारशिला रखने वाले जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर ने अपने जीवन संबंधी घटनाओं को एक ग्रंथ में स्वयं ही लिखा। इसे ‘ तुजुक-ए-बाबरी ‘ या ‘ बाबारनामा ‘ कहते हैं | बाबर ने अपनी आत्मकथा में जिन दो हिंदू राज्यों का उल्लेख किया है उनमें एक विजय नगर है तथा दूसरा मेवाड़।
  • तुर्की भाषा में बाबर द्वारा लिखित यह ग्रंथ संसार की श्रेष्ठतम आत्मकथाओं में स्थान रखता है | अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना द्वारा बाबरनामा का फारसी में रूपांतरण करवाया | इसके अतिरिक्त बाबर द्वारा पद्य रचनाओं का संकलन ‘ दीवान ‘ में किया गया जो तुर्की पद्य में श्रेष्ठ स्थान रखता है | पद्य में उसने एक नवीन शैली में ‘ मुबइयान ‘ लिखा जो मुस्लिम कानून की पुस्तक है | बाबर की एक रचना ‘ रिसाल-ए-उसज ‘ ( खत-ए-बाबरी ) थी जिसकी शैली नवीन मानी गई थी | मुगल बादशाह बाबर के सेनानायक मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था |

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  • बाबर ने खानवा के युध्द में जेहाद की घोषणा की थी। खानवा का युध्द 17 मार्च, 1527 को बाबर और राणा सांगा के बीच हुआ था। इस युध्द में राणा सांगा पराजित हुआ। इसी युध्द में विजयश्री मिलने के उपरांत बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की।
  • बाबर के साम्राज्य में काबुल, पंजाब एवं आधुनिक उत्तर प्रदेश का क्षेत्र सम्मिलित था। किंतु आधुनिक राजस्थान का क्षेत्र उसके साम्राज्य में सम्मिलित नही था। यह क्षेत्र उस समय विभिन्न राजपूत शासकों के शासनांतर्गत था।
  • जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर के जीवन से धैर्य व संकल्प से सफलता की शिक्षा मिलती है। बाल्यावस्था मे ही पिता का साया छिन जाने के बावजूद बाबर ने कभी हिम्मत नही हारी। उसके साहस एवं धैर्य का ही प्रतिफल था, कि उसने भारत मे मुगल साम्राज्य की नींव डाली। उसने अपने पुत्र हुमांयू को सलाह  दी थी कि “संसार उसका है जो परिश्रम करता है। किसी भी आपत्ति का मुकाबला करने से मत चूकना। परिश्रमहीनता और आराम बादशाह के लिए  हानिकारक है।
  • बाबर ने अपनी आत्मकथा में जिन दो हिंदू राज्यों का उल्लेख किया है – उनमें से एक विजयनगर है तथा दूसरा मेवाड़। बाबर लिखता है कि – “जब हम लोग काबुल में ही थे तो राणा सांगा (मेवाड़ का शासक) ने उपस्थित होकर उसकी ओर से निष्ठा प्रदर्शित की थी और यह निश्चय किय था कि सम्मानित बादशाह इस ओर स देहली के समीप पहुंच जाए तो मैं  (राणा सांगा) इस ओर से आगरा पर आक्रमण कर दूंगा। तुर्की भाषा में बाबर द्वारा लिखित  यह ग्रंथ संसार की श्रेष्ठतम आत्मकथाओं मे स्थान रखता है।
  • ऐसी मान्यता है कि मुगल बादशाह बाबर के सेनानायक मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था।

 

 

 

हुमायूँ और शेरशाह

  • कामरान , अस्करी एवं हिंदाल बाबर के पुत्र तथा हुमायु के भाई थे | हुमायूं बाबर का जेष्ठ पुत्र था | हुमायूं 1508 ई में काबुल में पैदा हुआ था | उसकी मां माहम बेगम शिया संप्रदाय से संबंधित थी। कामरान और अस्करी की मां गुलरूख बेगम तथा  हिंदाल की मां दिलदार बेगम थी |
  • हुमायूं ने चुनार दुर्ग पर प्रथम बार आक्रमण 1532 ई में किया। इस किले को उसने 4 महीने तक घेरे रखा जिसके बाद शेर खां ने हुमायूं  की अधीनता स्वीकार कर ली | इसके अतिरिक्त 1531 ई में उसने कालिंजर पर आक्रमण किया और 1532 ई  में रायसीन के महत्वपूर्ण किले को जीत लिया |
  • हुमायूं द्वारा लड़े गए चार प्रमुख युद्धों का काम इस प्रकार है – देवरा , चौसा ,कन्नौज एवं सरहिंद | 1532 ईस्वी में उसने गोमती के तट पर स्थित देवरा नामक स्थान पर अफगान  विद्रोहियों को पराजित किया | 26 जून , 1539 को चौसा के युद्ध में हुमायूं को शेरशाह से पराजित होना पड़ा | इसी युद्ध में निजाम नामक भिश्ती ने हुमायूं की जान बचाई। हुमायु के विरुद्ध चौसा की इस विजय से शेर खां ( शेरशाह )  की शक्ति और प्रतिष्ठा दोनों में वृद्धि हुई। उसने ‘ शेरशाह ‘ की पदवी धारण कर अपने नाम का खुतबा पढ़ाया तथा सिक्के पर भी अंकित करवाया | 17 मई 1540 को कन्नौज या बिलग्राम के युद्ध में भी हिमायूं को शेरशाह से पराजित होना पड़ा और विवश होकर एक निर्वासित की भांति इधर-उधर भटकना पड़ा | 22 जून 1555 को सिरहिंद  युद्ध की विजय ने हुमायूं को एक बार पुनः उसका खोया राज्य वापस दिला दिया|
  • फरीद जो बाद में शेर शाह सूरी बना, ने अपनी शिक्षा जौनपुर से प्राप्त की थी | 1494 ई में फरीद ने घर छोड़ दिया तथा विद्याध्ययन के लिए जौनपुर चला गया जो ‘ पूर्व के सिराज ‘ नाम से प्रसिद्ध था |
  • शेरशाह सूरी द्वारा किए गए सुधारों में राजस्व सुधार , प्रशासनिक सुधार , सैनिक सुधार , करेंसी प्रणाली में सुधार सम्मिलित थे। शेरशाह ने बंगाल को सरकारों ( जिलों ) में बांट दिया इनमें से प्रत्येक को एक छोटी सी सेना के साथ शिकदारों के नियंत्रण में दे दिया गया |  ‘ आमीन- ए-बांग्ला ‘ अथवा ‘ अमीर-ए-बंगाल ‘ नामक असैनिक अधिकारी को शिकदारों की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया |सर्वप्रथम काजी फजीलात नामक व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया गया |
  • शेरशाह ने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर शुद्ध सोने , चांदी , तांबे के सिक्कों का प्रचलन किया| उसने शुद्ध चांदी का रुपया ( 180 ग्रेन ) तथा तांबे का दाम ( 380 ग्रेन ) चलाया |  रुपया और दाम की विनिमय में 1:64 थी। इसके समय में 23 टकसाले थी |
  • दिल्ली सल्तनत के पराभव के उपरांत हुमायूं द्वारा सर्वप्रथम स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन किया गया था | हाजी बेगम ने अपने पति हुमायु के मकबरे का निर्माण दिल्ली( दीन पनाह ) में 1564 ईसवी में करवाया था | इस मकबरे का नक्शा मीरक मिर्ज़ा गियास ( इरानी वास्तुकार )  ने तैयार किया था | श्वेत संगमरमर से बना यह भारत का प्रथम गुंबद वाला मकबरा है |
  • कालिंजर विजय ( 1545 ई ) के दौरान जब शेरशाह के सैनिक हुक्के (गोले) फेंकने में व्यस्त थे, तो बारूद से भरा हुआ गोला दुर्ग की दीवार से टकराकर गिरा जहां बारूद से भरे हुए बहुत से गोले रखे हुए थे जिससे गोलों में आग लग गई और वे फट-फट कर सभी दिशाओं में विध्वंस करने लगे | शेरशाह वहा  से अधजला बाहर निकला | यद्यपि दुर्ग जीत लिया गया किंतु यही जीत शेरशाह के लिए अंतिम हो गई |
  • 22 मई 1545 ईसवी को 60 वर्ष की आयु में वह ( कालिंजर में ही ) मर गया। कालिंजर का अभियान शेरशाह का अंतिम अभियान था | उस समय वहां का राजा कीरत सिंह था। शेरशाह सूरी मारवाड़ के युद्ध में राजपूतों के शौर्य से प्रभावित होकर कहा कि ” मात्र एक मुट्ठी बाजरे के चक्कर में मैंने अपना साम्राज्य खो दिया होता ” | शेरशाह का मकबरा , बिहार के शाहाबाद के सासाराम नामक स्थान पर एक तालाब के बीच ऊंचे चबूतरे पर बना है। दिल्ली स्थित पुराना किला के भवनों का निर्माण शेरशाह ने करवाया था। यहां किला-ए-कुहना मस्जिद , शेर मंडल आदि भवन शेरशाह द्वारा बनवाए गए थे।
  • कृषकों की मदद के लिए शेरशाह ने ‘ पट्टा ‘ एवं ‘ कबूलियत ‘ की व्यवस्था प्रारंभ की थी। किसानों को सरकार की ओर से ‘ पट्टे ‘ दिए जाते थे , जिनमें स्पष्ट किया गया होता था कि उस वर्ष उन्हें कितना लगान देना है | किसान ‘ कबूलियत पत्र ‘ के द्वारा इन्हें स्वीकार करते थे।

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  • हुमायूं द्वारा लड़े गए चार प्रमुख युध्दों का क्रम इस प्रकार है – देवरा (1532 ई.), चौसा (1539 ई.), कन्नौज (1540 ई.) एवं सरहिंद (1555 ई.)
  • शेरशाह सूरी ने जौनपुर में औपचारिक शिक्षा प्राप्त किया था, जो उस समय उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र था।
  • 1529 ई. मे बंगाल के शासक नुसरत शाह को पराजित करके शेर खां (शेरशाह सूरी) ने हजरते आला की उपाधि धारण की। 1539 ई. में चौसा के युध्द में हुमायूं को पराजित करके उसने शेरशाह की उपाधि धारण की तथा अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और सिक्का चलवाया।
  • शेरशाह सूरी का मध्ययुगीन भारत में एक महत्वपूर्ण स्थान है। साम्राज्य निर्माता एवं प्रशासक के रुप में उसे अकबर का पूर्वगामी माना जाता है।
  1. राजस्व सुधार शेरशाह का विश्वास था कि साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिए कृषकों का सुखी एवं संतुष्ट होना आवश्यक है। उसकी यह भी धारणा थी कि भू-राजस्व के रुप में कृषकों पर भारी धनराशि बकाया रह जाती है जिससे राजकोष को काफी हानि उठानी पड़ती है। अतः भू-राजस्व की धनराशि बकाया नही रहनी चाहिए। इस उद्देश्य से शेरशाह ने भूमि व्यवस्था में अनेक सुधार किए। उसकी लगान व्यवस्था मुख्य रुप से रैयतवाड़ी थी जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित किया गया था।
  2. प्रशासनिक सुधार शेरशाह ने सर्वप्रथम अपने पिता की जागीर के प्रबंधक के रुप में प्रशासन की जानकारी प्राप्त की थी। मुगल सेवा में रहने के कारण उस मुगलों के प्रशासन, सैनिक संगठन एवं वित्तीय व्यवस्था का पूर्ण ज्ञान था।यही कारण है कि शेरशाह ने अपने पांच वर्षों के अल्प शासनकाल में जो प्रशासन कार्य दिखाया उसके कारण उसकी गणना दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ सुल्तानों में की  जाती है। शेरशाह का प्रशासन अत्यंत केन्द्रीकृत था। शासक स्वयं शासन का प्रधान होता था और संपूर्ण शक्तियाँ उसी में केन्द्रित थी। शेरशाह ने अपने संपूर्ण साम्राज्य को 47 सरकारों में विभाजित किया था। शेरशाह ने बंगाल सूबे के लिए एक अलग प्रकार की व्यवस्था की थी। संपूर्ण सूबे को उसने 19 सरकारों में बांट दिया था तथा प्रत्येक सरकार को एक सैनिक अधिकारी (शिकदार) के नियंत्रण मे छोड़ दिया था। उसकी सहायता के लिए एक असैनिक अधिकारी अमीर-ए-बंगाल की नियुक्ति होती थी। यह प्रबंध की आशंका को समाप्त करने के लिए किया गया था।
  3. सैनिक सुधार प्रणाली अपने साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए शेरशाह ने सैनिक संगठन के क्षेत्र में अनेक सुधार किए। वह सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सुधारों से बहुत प्रभावित था। बेईमानी को रोकने के लिए उसने घोड़ों को दागने की प्रथा तथा सैनिकों का हुलिया लिखने की प्रथा को अपनाया था।
  4. करेंसी प्रणाली में सुधार शेरशाह का शासनकाल भारतीय मुद्राओं के इतिहास में एक परीक्षण का का काल था। उसके मुद्रा सुधार के बारे में स्मित ने लिखा है कि – यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्र प्रणाली का आधार है। शेरशाह ने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर शुध्द सोने, चांदी के सिक्कों का प्रचलन किया। उसने शुध्द चांदी का रुपया (180 ग्रेन) तथा तांबे का दाम (380 ग्रेन) चलाया।
  • हाजी बेगम ने अपने हुमायूँ के मकबरे का निर्माण दिल्ली (दीन पनाह) में 1564 ई. में करवाया था। इस मकबरे का नक्शा मीरक मिर्जा गियास (ईरानी वास्तुकार) ने तैयार किया था। श्वेत संगमरमर से बना यह भारत का प्रथम गुंबद वाला मकबरा है। इस मकबरे के परितः एक बाग की रचना हुई है।
  • दिल्ली का पुराना किला के वर्तमान स्वरुप का निर्माण शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में 1540 से 1545 के बीच करवाया था। यह किला नई दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित प्राचीन दीन-पनाह नगर का आंतरिक किला है।

 

अकबर

  • अकबर का जन्म 15 अक्टूबर , 1542 को अमरकोट के राजा वीरसाल के यहां हुआ था। 14 फरवरी , 1556 को पंजाब में गुरदासपुर जिले के निकट कलानौर नामक स्थान पर बादशाह घोषित किया गया | इस समय उसकी आयु 14 वर्ष से कम थी | शाह अब्दुल माली ने अकबर के राज्याभिषेक में सम्मिलित होने से इनकार कर दिया था | हुमायूं इसे फर्जंद ( पुत्र ) पुकारता था |
  • बैरम खाँ अकबर का संरक्षक था | अकबर ने उसे अपना वकील ( वजीर ) नियुक्त किया तथा उसे ‘ खान-ए-खाना ‘ की उपाधि से विभूषित किया | अकबर ने सर्वप्रथम कछवाहा राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे| जिस समय अकबर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा हेतु जा रहा था, तो सांगानेर नामक स्थान पर 20 जनवरी 1562 को आमेर के राजा बिहारीमल ( भारमल ) बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ, उसने अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा उससे अपनी ज्येष्ठ पुत्री हरखा बाई (लोक प्रचलित नाम- जोधाबाई)  का विवाह करने की इच्छा भी व्यक्ति की | अकबर ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा अजमेर से लौटते समय सांभर में 6 फरवरी 1562  को उसने राजा बिहारीमल की  पुत्री से विवाह किया, यह अकबर का प्रथम राजपूत कन्या से विवाह था। इस प्रकार बिहारीमल पहला राजपूत राजा था, जिसमें स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की | इसी राजपूत राजकुमारी से शहजादे सलीम ( जहांगीर ) का जन्म हुआ |
  • अकबर ने सूफी मत में अपनी आस्था जताते हुए चिश्तिया संप्रदाय को समर्थन दिया था | वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह पर दर्शन हेतु अक्सर जाता था | अपनी उदार धार्मिक नीति के अंतर्गत उसने 1562 ई में दास प्रथा , 1563 ई में तीर्थ यात्रा कर , तथा 1564 ई में जजिया कर को समाप्त कर दिया। अपने सामाजिक सुधार के अंतर्गत उसने बाल विवाह और सती प्रथा रोकने का प्रयत्न किया। उसने यह आज्ञा दी थी कि आदमी को एक ही स्त्री से विवाह करना चाहिए और वह दूसरा विवाह तब कर सकता है जब उसकी पहली पत्नी बन्ध्या हो।
  • माहम अनगा के पुत्र आधम खां को 1562 ई में अकबर ने स्वयं मारा था क्योंकि उसने अकबर के प्रधानमंत्री अतगां खां की हत्या कर दी थी।
  • दुर्गावती गोंडवाना कें हिंदू राज्य की योग्य शासिका थी , अकबर के आक्रमण ( 1564 ई ) के फलस्वरूप शत्रु से घिर जाने पर इस वीर रानी ने आत्महत्या कर ली थी।
  • 1565 ईस्वी में मारवाड़ के शासक राव चंद्रसेन ने भाद्राजूण में मुगल सेनाओं का सामना किया लेकिन चारों तरफ से घिर जाने के कारण उसे सिवाना जाना पड़ा | राव चंद्रसेन ने 1579 ई में सोजन पर अधिकार कर लिया | अतः अकबर ने पुनः सेनाएं भेजकर उस पर आक्रमण करवाया लेकिन वह पहाड़ी क्षेत्र में चला गया और 1581 ईसवी में उसकी मृत्यु हो गई।
  • हल्दी घाटी युद्ध के पीछे अकबर का मुख्य उद्देश्य राणा प्रताप को अपने अधीन लाना था | अकबर ने अप्रैल 1576 ईस्वी में मानसिंह के नेतृत्व में 5000 सैनिकों को राणा प्रताप के विरुद्ध भेजा | मानसिंह मंडलगढ़ के मार्ग से होता हुआ गोगुंडा गढ़ से 14 मील दूर हल्दी घाटी दर्रे के निकट पहुंचा, राणा प्रताप भी मुगल सेना का सामना करने के लिए पहाड़ियों से उतर आया| फलतः जो युद्ध हुआ , वह हल्दीघाटी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें राणा पराजित हुआ और उसे अरावली की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी।
  • मेवाड़ राज्य ने अकबर की संप्रभुता स्वंय स्वीकार नहीं की थी। राणा प्रताप ने लंबे समय तक मुगलों से युद्ध लड़ा। राणा प्रताप की मृत्यु के बाद उनके पुत्र राणा अमर सिंह ने 1615 ई में जहांगीर से संधि की थी।
  • जब शाहजादा सलीम ने विद्रोह कर इलाहाबाद में स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करना आरंभ कर दिया था, तब अकबर ने 1602 ई में दक्षिण से अपने मित्र अबुल फजल को बुलाया | उसी समय सलीम के इशारे से ओरछा के बुंदेला सरदार वीरसिंह देव ने मार्ग में अबुल फजल की हत्या कर दी थी।
  • अकबर पहला मुस्लिम शासक था जिसने इस बात का अनुभव किया कि मुगल साम्राज्य की सुदृढ़ता के लिए भारत की बहुसंख्यक हिंदू जनता का सहयोग प्राप्त करना नितांत आवश्यक है | उसने हिंदू मुस्लिम समुदायों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया |
  • मुगल शासन व्यवस्था को स्थापित करने का श्रेय अकबर को ही है | उसकी केंद्रीय शासन व्यवस्था तथा बादशाह के पद और अधिकारों एवं कर्तव्यों की व्याख्या , उसका प्रांतीय शासन , उसकी लगान व्यवस्था , उसकी मुद्रा व्यवस्था , उसकी मनसबदारी व्यवस्था आदि सभी को उसके समय में सफलता प्राप्त हुई और वह उसके उत्तराधिकारियों के लिए आधार स्वरूप बनी |
  • अकबर एक महान शासक था जिसका साम्राज्य अफगानिस्तान कश्मीर से लेकर गोदावरी नदी के किनारे तक विस्तृत था | वह एक धर्मनिरपेक्ष शासक था | संपूर्ण सत्ता उसी में निहित थी , एतएव वह प्रशा के फ्रेडरिक महान और इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ की तरह प्रबुद्ध निरंकुश शासक कहा जाता है, जिसके शासनकाल में कानून की दृष्टि में सभी सामान थे | *
  • अकबर के शासन काल में पुर्नगठित केंद्रीय प्रशासन तंत्र के अंतर्गत मीर बक्शी मुख्यतः सैन्य विभाग का प्रमुख था। उसका कार्य सैनिकों का वेतन और सैनिक संगठन से संबंधित था। अकबर ने 1573 ई. में घोड़ो को दागने की प्रथा का पुनः प्रचलन किया जिससे सेनापति अपने घोड़े न बदल सके अथवा एक घोड़े को दो बार न प्रस्तुत कर सके।
  • 1575 ई में अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था के आधार पर सैनिक संगठित किया | ‘मनसब ‘ शब्द का अर्थ ‘श्रेणी ‘ या ‘ पद ‘ है तथा ‘ मनसबदार ‘ का अर्थ उस अधिकारी से था , जिसे शाही सेना में एक पद या श्रेणी प्राप्त थी | अकबर की मनसबदारी व्यवस्था दशमलव प्रणाली पर आधारित थी |
  • दीवान शब्द फारसी भाषा का है और खलीफा उमर के काल में मुसलमानों ने इसे अपनाया था | वे इसका प्रयोग खजाना विभाग के लिए करते थे | अकबर के शासन काल के 9 वें से लेकर 30 वर्ष तक दीवान पद मुजफ्फर खां तुरबती ,  राजा टोडरमल एवं ख्वाजा शाह मंसूर के हाथों आता जाता रहा |दीवान आर्थिक मामलों एवं राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी होता था |
  • मुगल मनसबदारी प्रणाली मध्य एशिया से ली गई थी | इस प्रकार का सैन्य विभाजन चंगेज खान के नेतृत्व में मंगोल सेना में किया गया था |
  • मुगल बादशाह अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था अपने शासनकाल के 11वें वर्ष में प्रारंभ किया। मनसब प्राप्तकर्ता तीन वर्गों में विभक्त थे – 10 से 500 तक उमरा , 500 से 2500 तक अमीर तथा 2500 से ऊपर अमीर-ए-आजम कहलाते थे। इसके अलावा जात और सवार की दृष्टि से भी तीन श्रेणियों में बाटा गया था।
  • अकबर के शासन काल में भू राजस्व वसूली के लिए जाब्ती प्रणाली का प्रचलन हुआ , जो भूमि सर्वेक्षण , भू राजस्व निर्धारण के लिए दस्तूर-उल-अमल तथा जाबती खासरे की तैयारी पर आधारित थी |टोडरमल ने भू राजस्व के क्षेत्र में ख्याति अर्जित की थी | अकबर ने अपने शासन के 24 वर्ष (1580 ई.) में आईने दहसाला ( टोडरमल बंदोबस्त ) नामक नई कर प्रणाली को शुरू करके मुगलकालीन व्यवस्था को स्थाई स्वरुप प्रदान किया |
  • इस प्रणाली का वास्तविक प्रणेता टोडरमाल था। इसी कारण इसे टोडरमल बंदोबस्त भी कहते हैं | उस समय टोडरमल अर्थ मंत्री था और उसका मुख्य सहायक ख्वाजा शाह मंसूर था | इस प्रणाली के अंतर्गत अलग-अलग फसलों के पिछले 10 वर्ष के उत्पादन और उसी समय के उनके प्रचलित मूल्यों का औसत निकाल कर उस औसत का एक तिहाई हिस्सा राजस्व के रूप में वसूला जाता था | अकबर कालीन भू-राजस्व व्यवस्था की दहसाला पध्दति को बंदोबस्त व्यवस्था के नाम से जाना जाता है।
  • जहांगीर के समकालीन मोहसिन फानी ने अपनी रचना ‘ दबिस्तान-ए-मजाहिब ‘ में पहली बार ‘ दीन ए इलाही ‘ को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में उल्लेख किया था |
  • अकबर ने आगरा से 36 किलोमीटर दूर फतेहपुर सीकरी में 1572 ई. में एक राज महल-सह-किले  का निर्माण आरंभ किया | यह 8 वर्षों में बनकर तैयार हुआ | इनमें जोधाबाई महल , पंचमहल , स्वर्ण महल अथवा सुनहला मकान, दीवाने आम , दीवाने खास , मरियम की कोठी , तुर्की सुल्तान की कोठी , बीरबल कोठी आदि प्रमुख है |
  • तुर्की सुल्तान का महल इतना सुंदर है कि पर्सी ब्राउन ने उसे ‘ स्थापत्य कला का मोती ‘ कहा है | पंचमहल पिरामिड के आकार का पांच महलों का भवन था और भारतीय बौद्ध विहारों के अनुरूप था |
  • अकबर ने गुजरात विजय 1572-73 ई में की थी और फतेहपुर सीकरी नामक नगर की स्थापना कराई थी। एक वर्ग के इतिहासकारों का मत है कि गुजरात विजय के उपलक्ष्य में सम्राट अकबर ने सीकरी के बुलंद दरवाजा का निर्माण विजय स्तंभ के रुप में कराया था, जबकि पर्सी ब्राउन ने इसका निर्माण दक्षिण विजय (1601 ई) के उपलक्ष्य में बताया है।
  • अकबर ने 1582 ईसवी में ‘ तौहीद-ए-इलाही ‘ या ‘ दीन ए इलाही ‘ की स्थापना की | इसके अंतर्गत अकबर ने सभी धर्मों के मूल सिद्धांतों को सम्मिलित कर इसे सर्वमान्य बनाने का प्रयास किया | दीन ए इलाही वास्तव में सूफीवाद पर आधारित एक विचार पद्धति थी | इस नवीन संप्रदाय का प्रधान पुरोहित अबुल फजल था | हिंदुओं में केवल बीरबल ने इसे स्वीकार किया था।
  • अकबर का मकबरा सिकंदरा नामक गांव में स्थित है , जिसे सुल्तान सिंकदर लोदी ने इसे अपने नाम पर बसाया था। अकबर ने इसका नाम ‘ बहिश्ताबाद’ रखा था | इसके निर्माण की योजना अकबर ने बनवाई थी किंतु निर्माण जहांगीर ने 1613 ई में करवाया था | यह मकबरा 5 मंजिला है। इसकी विशेषता इसका गुंबद विहीन होना है |
  • अकबर ने अपने राज कवि फैजी की अध्यक्षता में अनुवाद विभाग की स्थापना की थी| अकबर के आदेश से महाभारत के विभिन्न भागों का ‘ रज्जनामा ‘ नाम से फारसी में अनुवाद – नकीब खां , बदायूंनी तथा फैजी आदि विभिन्न विद्वानों के सम्मिलित प्रयत्नों से किया गया | इसके अतिरिक्त बदायूंनी ने रामायण का , फैजी ने ‘ लीलावती ‘ का तथा अबुल फजल ने ‘ कालियादमन ‘ का फारसी में अनुवाद किया।

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·      अकबर के दरबार के प्रसिद्ध ग्रंथकर्ताओं में सबसे प्रमुख कश्मीर का मोहम्मद हुसैन था, जिसे अकबर ने “जरी कलम” की उपाधि प्रदान की थी | हरि विजय सूरी वह जैन साधु था जो अकबर के दरबार में कुछ वर्षों तक रहा एवं जिसे जगतगुरु की उपाधि से सम्मानित किया गया | मुगल दरबार में एक अन्य विद्वान जिन चंद्र सूरी भी रहते थे जिन्हें ” युग प्रधान” की उपाधि प्रदान की गई थी |

·      इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ प्रथम का समकालीन भारतीय राजा अकबर था | दिसंबर 1600 ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के समय इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ थी | भारत में उस समय अकबर (1556-1605 ईसवी) तक का शासन था | एलिजाबेथ प्रथम का काल (1533से 1603 )था | मुगलकालीन विद्वान अबुल फजल ने अमेरिका की खोज का उल्लेख किया है|

·      रॉल्फ़ फिंच  (1583-91 ईसवी)  तक फतेहपुर सीकरी और आगरा पहुंचने वाला पहला अंग्रेज व्यापारी था |

·      अकबर ने फतेहपुर सीकरी में 1575 ई० में इबादतखाने  की स्थापना की जिसका उद्देश्य दार्शनिक एवं धार्मिक विषयों पर वाद विवाद करना था |

·      1578 ई० में इसने सभी धर्मावलंबियों के लिए इबादतखाना का द्वार खोल दिया | अकबर ने समस्त धार्मिक मामलों को अपने हाथों में लेने के लिए 1579 ईसवी में “महजरनामा”  की घोषणा की | यह महजरनामा अबुल फजल के पिता शेख मुबारक ने तैयार किया था। मजहर को स्मिथ और वूल्जले हेग ने अचूक आज्ञा पत्र कहा है | मजहर जारी करने के बाद अकबर ने सुल्तान-ए-आदिल की उपाधि धारण की |

·      अकबर स्वयं बसंत , होली , दिवाली जैसे त्योहारों/उत्सवों में भाग लेता था | उसने तुलादान , झरोखा दर्शन आदि हिंदू त्योहारों को भी स्वीकार कर लिया था | लेनपूल के अनुसार, हिंदू राजाओं को एकजुट कर लेना अकबर के समय की सबसे स्पष्ट विशेषता थी | डॉ आरपी त्रिपाठी के अनुसार अकबर अपने युग की संतान और पिता दोनों था |

  • माहम अनगा के पुत्र अधम खां को 1562 ई. में अकबर ने स्वयं मारा था। क्योंकि उसने अकबर ने प्रधानमंत्री अतगा खां की हत्या कर दी थी।
  • अकबर अपनी धार्मिक कट्टरता के लिए नही अपितु धार्मिक उदारता एवं धार्मिक सहिष्णुता के लिए जगप्रसिध्द है। उसके द्वारा प्रतिपादित सुलह-ए-कुल की नीति इसका सबल प्रमाण है।
  • अकबर के शासनकाल में पुनर्गठित केन्द्रीय प्रशासन तंत्र के अंतर्गत मीर बख्शी मुख्यतः सैन्य विभाग का प्रमुख था किंतु उसे प्रधान सेनापति नही कहा जा सकता। उसका कार्य सैनिकों के वेतन एवं सैनिक संगठन से संबंधित था। वह मनसबदारों की सूची रखता था। उसे बादशाह अकबर के समक्ष प्रस्तुत करना था। सैनिको की भर्ती, उनके शस्त्रों की व्यवस्था, सैनिकों का निरीक्षण आदि कार्यों के अंतर्गत था।
  • अकबर के काल में, हर दस घुड़सवार सैनिकों के लिए मनसबदारों को बीस घोड़े रखने होते थे। इसका मूल कारण यह था कि लंबी यात्रा के दौरान घोड़ों को आराम देना आवश्यक था और युध्द में उन्हें बदलने की आवश्यकता भी पड़ती थी।
  • अकबर कालीन भू-राजस्व व्यवस्था की दहसाला पध्दति को बंदोबस्त व्यवस्था के नाम से भी जाना जाता है।
  • 1580 मे जौनपुर के एक धर्म गुरु ने सभी मुस्लिमों को अकबर के विरुध्द विद्रोह करने के लिए फतवा जारी किया था।
  • हुमायूं का मकबरा दिल्ली में स्थित है, जो हुमायूं की पत्नी के संरक्षण में निर्मित हुआ तथा मीरक मिर्जा गियास के द्वारा इसका डिजाइन किय गया। यह मकबरा भारतीय-फारसी वास्तुकला शैली का उदाहरण है।
  • मुगल कालीन विद्वान अबुल फजल ने अमेरिका की खोज का उल्लेख किया है।
  • 1572 ई. में सुलेमान करारानी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र दाऊद खां गद्दी पर बैठा। दाऊद खाँ ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर पटना के मुगल किले पर आक्रमण किया। अकबर ने मुनीम खाँ को दाऊद पर आक्रमण करने तथा बिहार को जीतने का आदेश दिया। मुनीम खाँ ने दाऊद को एक युध्द में पराजित किया तथा 1574 ई. में बिहार पर मुगलों का आधिपत्य हो गया। पराजित होने के बाद दाऊद बंगाल भाग गया। किंतु 12 मार्च, 1576 को टोडरमल खाँ एवं हुसैन कुली खां ने मिलकर दाऊद को पूर्णतः पराजित किया। इस प्रकार 1576 ई. में बंगाल तथा बिहार को पूर्ण रुप से मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
  • अकबर के दरबार में प्रसिध्द ग्रंथकर्ताओं (जिनकी एक सूची आइने अकबरी में मिलती है) मे सबसे प्रमुख कश्मीर का मुहम्मद हुसैन था, जिसे अकबर ने जरी कलम की उपाधि प्रदान की थी।
  • हरिविजय सूरि ही वह जैन साधु थ , जो अकबर के दरबार में कुछ वर्ष तक रहा एवं जिसे जगद्गुरु की उपाधि से सम्मानित किया गया। 1582 ई. में अकबर ने उक्त जैनाचार्य को जैन सिध्दांतों को समझने की इच्छा से आहूत किया था। इनकी विद्वता एवं चिंतन तथा विनम्रता से प्रभावित होकर अकबर ने कुछ दिनों के लिए मांस भक्षण बंद कर दिया था एवं पशु-पक्षियों के वध पर भी रोक लगा दी थी। मुगल दरबार में एक अन्य विद्वान जिन चन्द्र सूरी भी रहते थे  जिन्हें युग प्रधान की उपाधि प्रदान की गई थी।

जहांगीर

  • जहांगीर का जन्म अगस्त, 1569 ई. में हुआ था। इसका पहला विवाह अम्बर (जयपुर) के राजा भगवानदास की पुत्री और राजा मानसिंह की बहन  मानबाई से 1585 ई. में हुआ था। खुसरो मान बाई की संतान था। 1586 ई. में सलीम का दूसरा विवाह उदयसिंह की पुत्री जगतगोसाई से हुआ था। शाहजादा खुर्रम इसी का पुत्र था।
  • आगरा के किले में 1605 ई. में जहांगीर का राज्याभिषेक हुआ और उसने नूरुद्दीन मुहम्मद  जहांगीर बादशाह  गाजी की उपाधि धारण की जहांगीर ने अपने पक्ष के सरदारों को उच्च पद प्रदान किए जिनमें से एक अबुल फजल का हत्यारा राजा वीर सिंह  बुंदेला भी था। अकबर की परंपरा को स्थापित रखते हुए जहांगीर ने अपना शासन उदारता से आरंभ किया और गद्दी पर  बैठते ही उसने विभिन्न लोकहितकारी आदेश दिए।
  • दो अस्पा एवं सिह-अस्पा प्रथा जहांगीर ने चलाई थी। इसके अंतर्गत बिना जात पाद बढ़ाए ही मनसबदारों को अधिक सेना रखनी पड़ती थी।
  1. दो अस्पा – इसमें मनसबदारों को अपने सवार पद के दोगुने घोड़े रखने पड़ते थे।
  2. सिंह अस्पा – इसमें मनसबदारों को अपने सवार पद के तीन गुने घोड़े रखने होते थे।
  • 1615 ई. में राणा अमर सिंह तथा मुगल बादशाह जहांगीर के मध्य चित्तौड़गढ़ की संधि हुई। इसमें राणा ने मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार  कर ली तथा बादशाह जहांगीर ने राणा को चित्तौड़ (दुर्ग की किलाबंदी न करने की शर्त के साथ) समेत समस्त भू-भाग वापस कर दिया  जो अकबर के समय से मुगल  आधिपत्य में था।
  • जहांगीर से विवाह के बाद नूरजहां ने नूरजहां गुट का निर्माण किया। इस गुट के प्रमुख सदस्य थे – एत्मामुद्दौला या मिर्जा गियास बेग (नूरजहां का पिता), अस्मत बेगम (नूरजहां की मां) आसफ खां (नूरजहां का भाई) एवं शाहजादा खुर्ऱम (बाद  में शाहजहां)। इस गुट का प्रभाव 1627 ई. तक रहा। नूरजहां से प्रभावित जहांगीर के शासनकाल को दो भागों मे बांटा जा सकता है – 1611-1622 ई. तक और 1622-1627 ई. तक। प्रथम काल में खुर्रम नूरजहाँ गुट का सदस्य था लेकिन दूसरे काल में खुर्रम इस गुट से अलग हो गया था।
  • विलियम हांकिंस (1608-1611) जहांगीर के दरबार में भेजा जाने वाला ब्रिटिश् राजा जेम्स प्रथम का अंग्रेज राजदूत तथा मुगल दरबार में उपस्थित होने वाला पहला अंग्रेज था। जहांगीर ने हाकिंस को इंग्लिश खां की उपाधि देकर आर्मीनिया की एक स्त्री से उसका विवाह कर दिया। जहांगीर के दरबार में आने वाले दूसरे शिष्टमंडल का नेतृत्वकर्ता सर थामस रो थे। सर थामस रो (1615-1619 ई.) ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रुप में 18 सितंबर , 1615 को सूरत पहुंचा। जनवरी, 1616 ई. में वह अजमेर में  जहांगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। उसे बादशाह के साथ मांडू अहमदाबाद तथा अजमेर जैसे अनेक स्थानों पर जाने का अवसर मिला। वह बादशाह के साथ शिकार खेलने भी गया। वह आगरा में एक वर्ष तक रहा था।
  • पीटर मुंडी इटली का यात्री था, जो शाहजहाँ के समय आया था। फ्रांसिस्कों पेलसर्ट डच पर्यटक था, जो  जहांगीर के समय भारत आया, इसने अपनी पुस्तक रिमान्स्ट्री में जहांगीर के समय का अद्भुत विवरण छोड़ा है।

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  • मुगल चित्रकला जहांगीर के शासनकाल में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई। पहले चित्रकारी हस्तलिखित ग्रंथ  की विषय-वस्तु में संबंध्द होती थी। जहांगीर ने उसे इस  बंधन से मुक्त कर दिया। जहांगीर के समय के सर्वोत्कृष्ट चित्रकार उस्ताद मंसूर और अबुल हसन थे। सम्राट जहांगीर ने उन दोनों को क्रमशः नादिर-उल-अस्त्र (उस्ताद मंसूर) तथा नादिर-उद-जमा (अबुल हसन) की उपाधि प्रदान की थी। उस्ताद मंसूर प्रसिध्द पक्षी विशेषज्ञ चित्रकार था। जबकि अबुल हसन को व्यक्ति चित्र में महारत हासिल थी।
  • जहांगीर एक उच्चकोटि का लेखक तथा समालोचक था। उसने अपनी आत्मकथा फारसी भाषा में लिखी और उसका नाम तुजुक-ए-जहांगीरी रखा।
  • जहांगीर के सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने जहांगीर के गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद विद्रोह किया था, जो कि 1606 में पराजित हुआ। 1623 ई. में शहजादे खुर्रम के विद्रोह का महाबत खाँ के नेतृत्व वाली मुगल सेना ने दमन किया था। 1626 ई. में महाबात खाँ ने जहांगीर के विरुध्द विद्रोह किया था।
  • मुगल बादशाह बाबर एवं जहांगीर के मकबरे क्रमशः काबुल एवं शाहदरा (लाहौर) में स्थिति है। ये क्रमशः अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान में स्थित है। एत्मादुद्दौला का मकबरा नूरजहाँ ने 1622-1628 ई. के मध्य अपने पिता की मृत्यु के बाद  बनवाया। यह पहली कृति है, जो पूर्णतया संगमरमर में  बनाई गई। इसमें गुदाई एवं संगमरमर के अलावा  पित्रादुरा का प्रयोग सजावट हेतु पहली  बार किया गया।
  • गोविंद महल मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित 17 मंजिला महल  है। इसका निर्माण 1614 ई. में राजा बीर सिंह देव  द्वारा पत्थरों से करवाया गया था।
  • दो अस्पा एवं सिंह-अस्पा प्रथा जहांगीर ने चलाई थी। इसके अंतर्गत बिना जात पद बढ़ाए ही मनसबदारों को अधिक सेना रखनी पड़ी थी।
  • मुगल शासक बाबर एवं जहांगीर के मकबरे क्रमशः काबुल एवं शाहदरा (लाहौर) में स्थित हैं। ये क्रमशः अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान में स्थित हैं।
  • शेख निजामुद्दीन औलिया का मकबरा अजमेर में नही बल्कि दिल्ली में है। 1325 ई. में निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु हई। इन्हें गियासपुर (दिल्ली) मे दफनाया गया। इनके शिष्यों ने अमीर खुसरों और ह सन अहमद देहलवी प्रमुख थे।

 

शाहजहां

  • 5 जनवरी, 1592 को लाहौर में शाहजादा खुर्रम का जन्म हुआ था। उसकी माता मारवाड़ के शासक उदयसिंह की पुत्री जगतगोसाई थी। 1612 ई. में आसफ खां की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम से उसका विवाह हुआ, जो बाद में इतिहास में मुमताज महल के नाम से विख्यात हुई।
  • 24 फरवरी, 1628 को शाहजहाँ अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा। आगरा में उसका राज्याभिषेक हुआ। इसी ने राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की।
  • अहमदनगर को 1633 ई. में मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया। यहां के अंतिम शासक हुसैन शाह को ग्वालियर के किले में कैद कर दिया गया। निजामशाही सरदार शाहजी भोसले ने एक बच्चे (मुर्तजा तृतीय) के नाम से मुगलों से संघर्ष जारी रखा। अंत में 1636 में. मुगलों द्वारा शाहजी को चुनार किले में घेर लिया गया। शाहजी ने बहुत से किले तथा मुर्तजा तृतीय को मुगलों को सौंप दिया। मुर्तजा तृतीय को भी ग्वालियर के किले में कैद कर लिया गया तथा शाहजी ने बीजापुर राज्य की सेवा स्वीकार कर ली। शाहजहाँ के समय  गोलकुंडा और बीजापुर ने मुगलों से संधि कर ली।
  • शाहजहाँ के शासनकाल में औरंगजेब पहले 1636-44 ई. तक दक्कन का सूबेदार रहा था तथा 1652 ई. में उसे पुनः इस पद पर नियुक्त किया गया था। जिस पर वह उत्तराधिकार के युध्द मे विजय और मुगल बादशाह  बनने तक रहा।
  • कंधार राज्य ईरान के शाह और मुगलों के  बीच संघर्ष की जड़ था क्योंकि कंधार को अपने हाथों में रखना मुगल शासक तथा ईरान के शाह के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया था। शाहजहाँ के शासनकाल में 1649 ई. में कंधार पर पुनः ईरानी अधिकार हो जाने से मुगल साम्राज्य को सामरिक महत्व के केन्द्र के दृष्टिकोण से एक बड़ा धक्का पहुंचा क्योंकि कंधार के बिना  उत्तर-पश्चिमी सीमा पर मुगलों की स्थिति अपेक्षाकृत दुर्बल थी। शाहजहाँ के समय मे कंधार अंतिम रुप से मुगलों के अधिकार से निकल गया।
  • शाहजहाँ के बल्ख अभियान का उद्देश्य काबुल की सीमा से चटे बल्ख और बदख्शां में एक मित्र शासक को लाना था। ताकि वे ईरान और मुगल साम्राज्य के बीच बफर राज्य बन सके।
  • शाहजहाँ का काल मुगल काल का स्वर्ण काल माना जाता है। इसके समय में कला, साहित्य, शिक्षा क्षेत्र में पर्याप्त विकास हुआ। साहित्य के क्षेत्र में शाहजहाँ के शासनकाल में विशेष उन्नति हुई। इस काल में फारसी भाषा में दो शैलियाँ प्रचलित थी। प्रथम भारतीय फारसी तथा दूसरी ईरानी फारसी। भारतीय फारसी शैली का उत्कृष्ट प्रवर्तक अबुल फजल था। इस शैली के विद्वानों में  अब्दुल हमीद लाहौरी, मोहम्मद वारिस व चंद्रभान ब्राह्मण आदि थे। ईरानी फारसी शैली का इस समय काफी बोलबाला  था। शाहजहाँ ने ईरानी  फारसी पद्य शैली के कवि कलीम को राजकवि भी नियुक्त किया। कलीम के अतिरिक्त फारसी कवियों में सईदाई गीलानी, कुदसी, मीरमुहम्मद काशी, साएगा,  सलीम मसीह, रफी, फारुख, मुनीर, शोदा, चंद्रभस ब्राह्मण हाजिक, दिलेरी आदि थे।
  • कवींद्राचार्य शाहजहाँ के आश्रित कवि थे, इनकी भाषा में ब्रज एवं अवधी का अनुपम समन्वय है। कवींद्र कल्पलता उन्होंने शाहजहाँ की प्रशस्ति में प्रणीत की थी। सरस्वती उपाधि धारक यह विद्वान संस्कृत का मर्मज्ञ था, इसने बादशाह से निवेदन कर तीर्थयात्रा कर समाप्त करवा दिया था।
  • ताजमहल के निर्माण के लिए शाहजहाँ ने भारत, ईरान एवं मध्य एशिया से डिजाइनरों, इंजीनियरों एवं वास्तुकारों को एकत्र किया था। ताजमहल की वास्तुकला में भारतीय,  ईरानी एवं मध्य एशियाई वास्तुकला का संतुलित समन्वय  दिखाई पड़ता है।
  • दिल्ली की जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था। शाहजहाँ द्वारा निर्मित इमारतों में – दीवाने आम, दीवाने खास, शीशमहल, मोती मस्जिद, खास महल, मुसम्मन  बुर्ज, नगीना मस्जिद, जामा मस्जिद, ताजमहल तथा लाल किला प्रमुख हैं।
  • अकबर के फतेहपुर सीकरी की भांति शाहजहाँ ने दिल्ली में अपने नाम पर शाहजहाँनाबाद नामक एक नगर की स्थापना 1648 ई. में की तथा वहां अनेक सुंदर एवं वैभवपूर्ण भवनों का निर्माण कर उसे सुसज्जित करने का प्रयास किया।
  • शाहजहांनाबाद के भवनों मे लाल किला प्रमुख है। इसका निर्माण कार्य 1648 ई. में पूर्ण हुआ। इस किले के  पश्चिमी द्वार का नाम- लाहौरी दरवाजा एवं दक्षिणी द्वारा का नाम दिल्ली  दरवाजा है। यह सुंदरता तथा शोभा में अनोखा है।
  • उपनिषदों का फारसी अनुवाद शाहजहाँ के शासनकाल में शहजादे दारा शिकोह ने सिर्र-ए-अकबर शीर्षक के तहत किया। इसमें 52 उपनिषदों का अनुवाद किया गया है। दारा को उसकी सहिष्णुता एवं उदारता के लिए लेनपूल ने  लघु अकबर की संज्ञा  दी है। यही नही शाहजहाँ ने भी दारा को शाह बुलंद इकबाल की उपाधि प्रदान की थी। मज्म-उल-बहरीन दारा की  मूल रचना है।
  • शाहजहाँ के चारों पुत्रों में ज्येष्ठ दारा शिकोह सर्वाधिक सुशिक्षित, अध्येता तथा लेखक था। उसने अनेक  हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया एवं उपनिषदों, योग वशिष्ठ, भगवतगीता आदि हिंदू धर्म ग्रंथों का फारसी में अनुवाद कराया।
  • मुगल बादशाह शाहजहाँ ने बलबन द्वारा प्रारंभ ईरानी दरबारी रिवाज सिजदा समाप्त कर दिय था। 1636-37 ई. में सिजदा प्रथा का अंत कर दिया गया।  जमीनबोस की प्रथा भी खत्म कर दी गई और पगड़ी में बादशाह की तस्वीर पहनने की मनाही कर दी गई।
  • डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक मुगलकालीन भारत में लिखा है कि शाहजहाँ का शासनकाल भारत में मध्यकालीन इतिहास में स्वर्ण युग के नाम से प्रसिध्द है। तथापि यह केवल कला और कला में भी वास्तुकला की दृष्टि से ही सत्य माना जा सकता है। एल्फिन्सटन ने शाहजहाँ के काल के बारे में लिखा है कि शाहजहाँ का काल भारतीय इतिहास में सर्वाधिक समृध्दि का काल था।
  • आसफ खां की पुत्री अर्जुमंद बानो बेगम का विवाह मुगल बादशाह जहांगीर के पुत्र शहजादे खुर्रम (शाहजहां) के साथ हुआ। भविष्य में अर्जुमंद बानो बेगम मुमताज महल के नाम से प्रसिध्द हुई।
  • 24 फरवरी, 1628 को शाहजहाँ अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा। आगरा में उसका राज्याभिषेक हुआ। इसी ने राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की।
  • स्मारक निर्माता

अलाई दरवाजा                अलाउद्दीन खिलजी

बुलंद दरवाजा, फतेहपुर सीकरी    अकबर

मोती मस्जिद, आगरा          शाहजहाँ

मोती मस्जिद, दिल्ली          औरंगजेब

  • मीर जुमला का वास्तविक नाम मोहम्मद सईद था। यह मूल रुप से आर्दिस्तान का रहने वाला था। वह व्यापार-व्यवसाय करने के उद्देश्य से गोलकुंडा चला आया और प्रारंभ में यह हीरे का व्यापार करता था। बाद में वह गोलकुंडा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह (1626-1672) की सेवा में जाकर वजीर का पद प्राप्त किया। बादशाह शाहजहां ने मीर जुमला को पांच हजार का मनसब तथा उसके पुत्र मोहम्मद अमीन को दो हजार का मनसब प्रदान किया। इससे खिन्न होकर गोलकुंडा के सुल्तान अब्दुल्ला कुतुबशाह ने मीर जुमला के परिवार तथा संपत्ति को जब्त कर लिया। इससे क्रोधित होकर शाहजहाँ ने  औरंगजेब को गोलकुंडा से युध्द करने के लिए भेजा पर दोनों में संधि हो गई। यहां मीर जुमला भी औरंगजेब से आ मिला। शाहजहाँ ने मीर जुमला को आगरा वापस बुलाया और उसे मुअज्जम खां की पदवी से सम्मानित किय़ा। इस अवसर  पर मीर जुमला अपने साथ बादशाह के लिए अमूल्य भेंट लेकर आया। इसी अवसर पर उसने शाहजहाँ को कोहिनूर हीरे की भेंट दी, जो मूल्य तथा सौंदर्य़ में संसार में अद्वीतीय समझा जाता है।

 

औरंगजेब

  • मुगल गद्दी पर शाहजहाँ का उत्तराधिकारी औरंगजेब हुआ, किंतु ज्येष्ठ पुत्र उत्तराधिकार के नियम से नही अपितु तलवार के बल से। मुगलकाल में तलवार ही सत्ता का प्रतीक थी। तलवार के बल पर ही उत्तराधिकार का निर्णय होता था।
  • मुगल बादशाह औरंगजेब का राज्याभिषेक दो बार हुआ। उसका पहला राज्याभिषेक दिल्ली में 31 जुलाई, 1658 को  हुआ था। उसका दूसरा राज्याभिषेक खजवा एवं देवराई के युध्द में सफल होने के बाद दिल्ली मे ही 15 जून, 1659 को हुआ तथा अब्दुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर पादशाह गाजी की उपाधि धारण  कर वह मुगल शाहजहाँ के सिंहासन पर आसीन हुआ।
  • मध्य प्रदेश मे स्थित उज्जैन के निकट धरमत नामक स्थान पर 15 अप्रैल, 1658 को औरंगजेब तथा दारा शिकोह के मध्य हुआ था। इस युध्द में  जोधपुर के राजा जसवंत सिंह ने दारा शिकोह की तरफ से तथा मुराद  ने औरंगजेब  की तरफ से भाग लिया था।
  • सामूगढ़ का युध्द 29 मई, 1658 को औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेनाओं एवं दारा शिकोह के मध्य हुआ था जिसमें दारा शिकोह पराजित हुआ था।
  • उत्तराधिकार के युध्द मे औरंगजेब से पराजित दारा शिकोह के पुत्र शहजादे सुलेमान शिकोह ने श्रीनगर गढ़वाल के शासक पृथ्वीसिंह के यहाँ शरण ली थी। किंतु उसके उत्तराधिकारी मेदिनीसिंह ने उसे औरंगजेब को सौंप दिया। सुलेमान शिकोह को ग्वालियर के किले में बंद कर दिया गया और वहां उसको अफीम खिलाकर मार डाला गया।
  • 1665 ई. के आरंभ में औरंगजेब के राजा जयसिंह के नेतृत्व में विशाल सेना शिवाजी का दमन करने के लिए भेजी। जयसिंह कछवाहा शासक थे जो कि युध्द और शांति,  दोनों कलाओं मे निपुण थे। वह चतुर कूटनीतिज्ञ थे और उसने समझ लिया कि बीजापुर को जीतने के लिए शिवाजी से मैत्री करना आवश्यक है। अतः पुरंदर के किले पर मुगलों की विजय और राजगढ़ की घेराबंदी के बावजूद उन्होंने शिवाजी से संधि की। पुरंदर की यह संधि जून, 1665 ई. में हुई।
  • औरंगजेब के पुत्र मुहम्मद अकबर ने 1681 ई. में विद्रोह करके राजपूतों के विरुध्द अपने पिता की स्थिति दुर्बल  कर दी थी। अकबर राजपूतों के विरुध्द लड़ जाने वाले युध्द से निराश हो गया था। उसे अपने पिता धर्मांधता की नीति की सफलता में विश्वास न था। तथा विचारों से वह उदार था। उसी अवसर पर मेवाड़ के राजा जयसिंह और राठौर नेता मारवाड़  के दुर्गादास ने उसके सामने प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपने को भारत का बादशाह घोषित कर दे तो मेवाड़ और मारवाड़ दोनो की सेनाएं उसकी सहायता करेंगी।
  • औरंगजेब जो कुछ दूसरों पर लागू करना चाहता था। उसका वह स्वयं अभ्यास करता था उसके व्यक्तिगत जीवन का नैतिक स्तर ऊंचा था तथा वह अपने युग के प्रचलित पापों से दृढ़तापूर्वक अलग रहता था। इस प्रकार उसके समकालीन उसे शाही दरवेश समझते थे तथा सुमलमान उसे जिंदा पीर के रुप में मानते थे।
  • 1652 ई. में जब औरंगजेब दूसरी बार दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया गया तो उसने गोलकुंडा एवं बीजापुर के विरुध्द आक्रामक नीति अपनाई थी, संभवतः उसने इन दोनों राज्यों को विध्वंस भी कर दिया होता, किंतु दारा शिकोह के परामर्श पर शाहजहाँ द्वारा भेजे  आदेश के अनुसार 1656 ई.में गोलकुंडा एवं 1657 ई. में बीजापुर के विरुध्द उसे युध्द स्थागित कर संधि करनी पड़ी थी।
  • बादशाह बनने के बाद उसने अपनी इस अधूरी योजना को पूरा किया और बीजापुर (1686) एवं गोलकुंडा (1687) पर आधिपत्य स्थापित किया। औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मुगल सेना मे सर्वाधिक हिंदू सेनापति थे। उसके शासनकाल में कुल सेनापतियों में 33 प्रतिशत  हिंदू थे। जिसमें मराठों की संख्या आधे से आधिक थी। अकबर के काल मे यह अनुपात 16 प्रतिशत तथा शाहजहाँ के काल में 24 प्रतिशत था।
  • अकबर महान ने अपने साम्राज्य से जजिया कर समाप्ति की घोषणा की थी, किंतु औरंगजेब ने उसे 1679 ई. में पुनर्जीवित कर दिया। इस कर के लिए हिंदुओं को तीन वर्गों में बांटा गया  –
  1. जिनकी आय 200 दिरहम प्रतिवर्ष से कम थी, उनको 12 दिरहम प्रतिवर्ष देना था।
  2. जिनकी आय 200 से 10000 दिरहम प्रतिवर्ष थी, उनको 24 दिरहम प्रतिवर्ष देना था।
  3. जिनकी आय 10000 दिरहम प्रतिवर्ष के ऊपर थी, उनको 48 दिरहम प्रतिवर्ष देना पड़ता था।
  • स्त्रियाँ, गुलाम, 14 वर्ष की आयु से कम के बच्चे, भिखारी और आय रहित व्यक्ति इस कर से मुक्त थे। अधीनस्थ हिंदू राजाओं एवं ब्राह्मणों को भी इसे देने के लिए बाध्य किया गया।
  • औरंगजेब सर्वोपरि एक उत्साही सुन्नी मुसलमान था। उसकी धार्मिक नीति सांसारिक लाभ के किसी विचार से प्रभावित नही थी। उदार दारा के विरुध्द सुन्नी कट्टरता के समर्थक के रुप में राजसिंहासन प्राप्त करने वाले की हैसियत से उसने कुरान के कानून को कठोरता से लागू करने का प्रयत्न किया। इस कानून के अनुसार  प्रत्येक धार्मिक मुसलमान को अल्लाह की राह में मेहनत करनी चाहिए। या दूसरे शब्दों में तब तक गैर-मुसलमानी देशों (दारूल-हर्ब) के विरुध्द धर्म-युध्द (जिहाद) करना चाहिए, जब तक कि वे इस्लाम के राज्य (दारुल-इस्लाम) के रुप में परिवर्तित नही हो जाते हैं।
  • औरंगजेब ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना, नौरोज का त्योहार मनाना, तुलादान तथा झरोखा दर्शन बंद कर दिया। उसने अकबर द्वारा प्रारंभ हिंदू, राजाओं के माथे पर अपने हाथ से तिलक लगाना बंद कर दिया। वेश्याओं को शादी करने अथवा देश छोड़ने का आदेश दिया। दरबार में बसंत, होली, दीवाली आदि त्योहार मनाने बंद कर दिए।
  • औरंगजेब ने औरंगाबाद में अपनी प्रिय पत्नी राबिया-उद-दौरानी के मकबरे का निर्माण 1678 ई. में कराया था। इसे बीबी का मकबरा भी कहा जाता है। इसकी स्थापत्य कला शैली सुप्रसिध्द ताजमहल पर आधारित थी। अतः इसे द्वितीय ताजमहल भी कहा जाता है। दिल्ली के लाल किले में औरंगजेब ने मोती मस्जिद का निर्माण किया था।
  • मेहरुन्निसा औरंगजेब की पुत्री थी, इसके अतिरिक्त जहांआरा रोशन आरा तथा गौहर आरा औरंगजेब की  बहन तथा शाहजहाँ की पुत्रियाँ थी। औरंगजेब की अन्य़ पुत्रियाँ थी – जेबुन्निसा, जीनतुन्निसा, बदरुन्निसा तथा  जुबदतुन्निसा। औरंगजेब ने जहाँआरा को साहिबात –अज-जमानी की उपाधि प्रदान की थी।
  • संत अथवा समर्थ रामदास महाराष्ट्र के महान संत थे। इनका जन्म 1608 ई. में जबकि मृत्यु 1682 ई. में हुई थी। यह मुगल शासक औरंगजेब के समकालीन थे।
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  • अकबर महान अपने साम्राज्य से जजिया कर की समाप्ति की घोषणा की थी, किंतु औरंगजेब ने उसे 1679 ई. में पुनर्जीवित कर दिया।
  • औरंगजेब ने जहां आरा को साहिबात-उज-जमानी उपाधि प्रदान की थी। जहां आरा बेगम सम्राट और महारानी मुमताज महल की सबसे बड़ी बेटी थी। वह अपने पिता के उत्तराधिकारी और छठें मुगल सम्राट औरंगजेब की बड़ी बहन भी थी।
  • दिल्ली के लाल किले के अंदर औरंगजेब ने संगमरमर की एक मस्जिद (मोती मस्जिद) का निर्माण करवाया क्योंकि शाहजहाँ ने अपनी योजना के अनुसार, किले के अंदर मस्जिद का निर्माण न करवा कर किले के बाहर जामा मस्जिद का निर्माण करवाया था। अतः औरंगजेब ने किले के अंदर मस्जिद की आवश्यकता का अनुभव कर मोती मस्जिद का निर्माण करवाया।

 

मुगलकालीन प्रशासन

  • मुगल प्रशासन के दौरान जिले को सरकार के नाम से जाना जाता था। शासन की सुविधा के लिए प्रत्येक सूबा (प्रांत) कई सरकारों (जिलों) मे  बंटा होता था। सरकार को पुनः परगना या महल में विभाजित किया गया था। प्रत्येक सरकार के प्रमुख अधिकारी-फौजदार, अमलगुजार, काजी कोतवाल, बितिक्ची और खजानदार होते थे।
  • मुगलकाल मे मीर बख्शी सैन्य विभाग का प्रधान था। वह सरखत नामक प्रमाण-पत्र पर हस्ताक्षर करके सैनिकों का मासिक वेतन भी निर्धारित करता था। इसके अतिरिक्त प्रांतों मे भी बख्शी होते थे, जो मीर बख्शी के नियंत्रण मे कार्य करते थे।
  • मुगल शासन में मीर बख्शी भू-राजस्व अधिकारियों का पर्य़वेक्षण करता था तथा साथ ही सैन्य विभाग के वेतन के लिए भी उत्तरदायी था। सर जदुनाथ सरकार ने मीर बख्शी को वेतनाधिकारी कहा है। किंतु वेतनाधिकारी का कार्य मीर बख्शी का नियमित एवं स्थायी कार्य नही था। वेतनाधिकारी का कार्य दीवान-ए-तन करता था।
  • मुगलकाल में मनसबदारों के सैनिकों के अतिरिक्त दो प्रकार के और घुड़सवार सैनिक थे। जो अहदी तथा दाखिली कहलाते थे। अहदी सैनिक बादशाह द्वारा नियुक्त किए जाते थे। तथा उसके अंगरक्षक के रुप मे कार्य करते थे। दाखि